Short Story: मजाक – प्यार का एहसास

Short Story, लेखिका- सुनीता चंद्रा

मैं अकेली पत्नी बेचारी, मुझे धुन चढ़ी कि प्रेम का एहसास पाऊं. इस एहसास को पाने के लिए मैं ने क्याक्या नहीं किया. अब आप पूछेंगे कि मुझे यह धुन चढ़ी क्यों? तो हुआ यों कि मैं बाल धो कर सजसंवर कर अपनी बालकनी में खड़ी थी तो युवकयुवती मेरी बालकनी के नीचे खड़े बातें कर रहे थे. अब कोई इतनी जोरजोर से बातें करेगा, तो मैं कान तो बंद नहीं कर सकती. बातें कुछ रोमांटिक थीं तो मैं भी ध्यान से सुनने लगी.

युवती कह रही थी कि भई, यह प्यार का एहसास भी क्या एहसास है, सबकुछ भुला देता है. सब नयानया लग रहा है. अपने पराए हो जाते हैं और जिसे कुछ दिन पहले मिले उस के लिए दुनिया भी छोड़ देने को तैयार…

अब मैं उन्हें सुनना छोड़ कर प्यार का एहसास क्या होता है, यह सोचने लग गई. भई, इतने साल हो गए मुझे क्यों नहीं यह एहसास हुआ अभी तक? अब मैं ने भी ठाना कि यह एहसास तो कर के ही रहूंगी.

अब मैं सजसंवर कर शाम को पति के आने का इंतजार करने लगी. पति आए और मैं झट से पेड़ की लता की माफिक उन से लिपट गई. पति बेचारे घबरा कर दूर हटे. मैं बेचारी प्यार के एहसास से महरूम उलटे पति के पसीने से तरबतर शरीर से आती बदबू से चकरा गई. मैं ने झट से अच्छा सा अपना मनपसंद परफ्यूम नथुनों से लगाया और सोचा, कोई बात नहीं, किला तो फतह कर के ही रहूंगी.

मैं ने अगले दिन रात के खाने में अच्छेअच्छे व्यंजन बनाए और फिर से पति का इंताजर करने लगी. पतिदेव आए, लेकिन साथ में ढेर सारे दोस्तों को ले कर और दरवाजे से ही आवाज लगाई, ‘‘अरे भई, देखो मेरे साथ कौनकौन आया है… ये सब आज तुम्हारे हाथों का बना खाना खा कर जाएंगे.’’

मैं अब अकेली पत्नी बेचारी. लंबी सांस भर कर रह गई. खैर, खाना बनाया गया. सब ने खाना खा कर खूब तारीफ की, डकार मारी और देर शाम तक खूब मस्ती की और फिर चले गए. मैं फिर प्यार के एहसास से कोसों दूर उलटे किचन में चारों तरफ बिखरे जूठे बरतन देख परेशान हो उठी.

अगले दिन मैं ने तय किया कि कुछ शौपिंग की जाए पति के साथ जा कर. हो सकता है वहीं कुछ प्यार का एहसास हो जाए. अब पतिदेव से कहा, ‘‘शाम को शौपिंग के लिए जाना है. कुछ जरूरी सामान लेना है. आप के साथ ही चलूंगी, इसलिए जल्दी आ जाना.’’

अभी महीने की शुरुआत थी, नईनई तनख्वाह आई थी हाथ में. सो उसे समेटा और अपनी जमापूंजी भी ली और चल पड़ी शौपिंग करने. मैं बड़े प्यार से इन की बांहो में बांह डाल कर पूरे बाजार से कुछ न कुछ खरीदती रही.

बाद में घर आ कर अपनी खरीदारी को देखा. मैं जो खरीद कर लाई थी उस की तो बिलकुल भी जरूरत नहीं थी. सोचा अब घर का बाकी खर्च कैसे चलेगा पर अगले ही पल मन को समझा लिया कि कोई बात नहीं. प्यार का एहसास तो करना ही था. फिर कुछ दिन शांत हो कर सोचा कि ऐसा क्या करूं कि मुझे भी प्यार का एहसास हो जाए. फिर एक आइडिया आया. पति के औफिस जाते ही एक बड़ा सा फूलों का गुलदस्ता पति के औफिस भेजा और एक प्यारा सा कार्ड भी. उस पर भी न जाने क्याक्या लिख डाला. फिर यह सोच कर बेसब्री से पति का इंतजार करने लगी कि वे आ कर जरूर अपनी खुशी का इजहार करेंगे और मुझे फिर प्रेम का एहसास हो ही जाएगा.

मगर यह क्या. पति आए, न कोई बात, न चेहरे पर कोई मुसकान, उलटे रोनी सूरत.

मैं ने पूछा, ‘‘क्या हुआ?’’

बोले, ‘‘पता नहीं किस ने आज औफिस में गुलदस्ता भेजा और साथ में एक कार्ड भी. कार्ड पर भी न जाने क्याक्या लिखा था. मेरे सपनों का राजा, मेरे जानू, वगैरहवगैरह.

‘‘2-4 बातें बौस के बारे में भी लिखी थीं कि खड़ूस? तुम से ओवरटाइम करवाता है, फालतू के काम भी लेता है. इसलिए मेरे लिए तुम्हारे पास वक्त ही नहीं है… और भी न जाने क्याक्या…

‘‘मेरे बौस मेरी मेज पर गुलदस्ता देख उस में से कार्ड निकाल कर सब के सामने चिल्लाचिल्ला कर पढ़ने लगे. शुक्र है उस पर भेजने वाले का नाम नहीं था, वरना आज मेरी नौकरी चली जाती.’’

अब मैं रोंआसी हो गई. यह देख पतिदेव बोले, ‘‘भई, तुम क्यों उदास होती हो? मेरी नौकरी थोड़ी ही चली गई है. फिर वह गुलदस्ता तुम ने थोड़े ही भेजा था.’’

मैं संभल कर कुछ देर बाद धीरे से बोली, ‘‘वह मैं ने ही भेजा था. मैं अपना नाम लिखना भूल गई थी.’’

इतना सुनना था कि वे चिल्लाने के लिए तत्पर हुए, पर

फिर शांत हो कर पूछा तो मैं ने सब उगल दिया.

सुन कर जोर से हंसे और बोले, ‘‘तो यह बात है. तभी मैं सोचूं कि तुम यह कैसा व्यवहार कर रही हो. मैं ने तो सोच लिया था कि तुम्हें डाक्टर के पास ले जाना पड़ेगा.’’

वे और भी न जाने क्याक्या बोलते रहे और मैं प्यार का एहसास पाने के अगले नुसखे के बारे में सोच रही हूं. पाठको, आप को भी यदि कोई उपाय सूझे तो मुझे जरूर लिखना.

Hindi Story: जुगाड़ – आखिर वह लड़की अमित से क्या चाहती थी?

Hindi Story, लेखक- अमित कुमार अम्बष्ट ‘आमिली’

मैं ठीक 10 बजे पूर्व निर्धारित स्थान पर पहुंच गया था. वह दूर से आती हुई दिखी. मैं ने मन ही मन में कहा ‘जुगाड़’ आ गई. हम ने फिर साथ में रिकशा लिया. इस बार मैं पहले की अपेक्षा अधिक चिपक कर बैठा शायद उसे आजमाना चाहता था.

मैंने फर्राटे से दौड़ते, हौर्न का शोर मचाते वाहनों के बीच दबे कदमों से चौराहा पार किया.

बीच चौराहे पर अंबेडकर की प्रतिमा जैसे हाथ खड़ी कर सब को स्टेशन की ओर जाने का संकेत कर रही हो. कैसरबाग, अमीनाबाद एक सवारी की रट लगाते वाहनचालक. दिन के 10 बजे लखनऊ के चारबाग चौराहे की हालत ऐसी ही होती है. भीड़ का एक हजूम, भागतेदौड़ते लोग, न जाने कितनी जल्दी है उन्हें मंजिल तक पहुंचने की.

मैं ने रिकशावाले से पूछा, ‘‘लाटूश रोड के कितने लोगे?’’

‘‘कहां जाना है लाटूश रोड में?’’ उस ने प्रश्न किया.

मैं ने कहा, ‘अमीनाबाद चौक से दोचार कदम आगे.’

‘एक सवारी के 8 रुपए और एक और बैठा लूं, तो 5 रुपए लगेंगे?’

मैं ने कहा, ‘अगर कोई मिलता है तो बैठा लो.’

अभी रिकशावाले ने पैडल पर पांव डाले ही थे कि आसमानी शमीज और सफेद सलवार धारण किए एक लड़की ने पूछा, ‘भैया, अमीनाबाद का क्या लोगे?’

‘5 रुपए,’ उस ने उत्तर दिया और वह लड़की आ कर मेरे साथ रिकशे पर बैठ गई.

गर मैं कहूं कि उस के मेरे साथ बैठने से मु झे कोई फर्क नहीं पड़ा तो शायद यह  झूठ होगा. विपरीत लिंग के प्रति आकर्षण एक स्वाभाविक प्रक्रिया है. चाहे वह स्त्री का पुरुष के प्रति हो या पुरुष का स्त्री के प्रति. मैं भी इस से अछूता नहीं था. कई बार हम अपनी पत्नी या फिर प्रेमिका से कहते हैं, ‘मैं तुम्हारे सिवा किसी और को नहीं देखता. जबकि, हमें पता है कि हम  झूठ बोल रहे हैं उस से जिस से वास्तव में हम बेहद प्रेम करते हैं. हर इंसान को खुद से प्यार करने वाले का संपूर्ण समर्पण बेहद सुकून देता है चाहे वह स्त्री का पुरुष के प्रति हो या पुरुष का स्त्री के प्रति.

हम जैसे आम लोगों के लिए इस चुंबकीय आकर्षण से बचना संभव नहीं. बस, हम आकर्षण की दिशा बदल सकते हैं. किसी लड़की को बहन स्वीकार करना भी उतना ही बड़ा आकर्षण है जितना किसी स्त्री में प्रेयसी ढूंढ़ना. फर्क सिर्फ रिश्तों का है क्योंकि दोनों में ही प्रेम है. हां, दोनों ही प्रेम के आयाम भले भिन्न हों पर मेरी दृष्टि से बहन का रिश्ता जितना शुद्ध है उतना ही पवित्र प्रेमिका का रिश्ता भी है. शायद मैं भावना में बह गया.

उस लड़की की ड्रैस देख कर मैं सम झ चुका था कि वह किसी कालेज की छात्रा है और इस से पहले मैं अपनी जबान खोलता, उस ने मु झ से पूछा, ‘‘आप कहीं नौकरी करते हैं?’’

बड़ा ही सहज मगर दूरगामी प्रश्न था क्योंकि इस के उत्तर के साथ ही वह मु झे और मेरी शैक्षिक योग्यता को अपने मूल्यों के तराजू पर तौलने वाली थी.

मैं ने जोशीले अंदाज में कहा, ‘‘मैं ने एमबीए किया है और जरमनी की एक बहुराष्ट्रीय कंपनी के लिए काम करता हूं. मैं कविताएं और आलेख भी लिखता हूं जिन में से कुछ विभिन्न पत्रपत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं.’’ मैं ने शेखी बघारी मगर मेरे हृदय में आत्मविश्वास के भाव थे.

फिर उस ने पूछा, ‘‘तुम्हारी सैलरी कितनी है?’’

मैं ने कहा, ‘‘20 हजार रुपए.’’

उस ने पूछा, ‘‘कुल कितना मिल  जाता है.’’

मैं ने उत्तर दिया, ‘‘तकरीबन 25-30 हजार रुपए हो जाता है.’’

इस बार मैं थोड़ा असहज था क्योंकि मैं  झूठ बोल रहा था. फिर भी मैं ने अपने चेहरे का भाव छिपाने का हर संभव प्रयास किया. मु झे पता नहीं कि उस ने मु झ पर भरोसा किया या नहीं.

उस ने मु झ से अपने बारे में बताते हुए कहा, ‘‘मैं ने आईटी में एमबीए किया है. किंतु नौकरी नहीं मिली. अब बीएड कर रही हूं. शिक्षा का क्षेत्र महिलाओं के लिए बहुत उपयुक्त है.’’

उस ने साथ में तर्क दिया और मैं ने स्वीकृति में सिर हिलाया. उस ने आगे पूछा, ‘‘तुम्हारा नाम क्या है?’’

मैं ने कहा, ‘‘अमित.’’

फिर उस ने चहक कर कहा, ‘‘मेरे भाई का नाम भी अमित है.’’

इस बार मु झे लगा जैसे वह जानबू झ कर मेरे करीब आने की कोशिश कर रही हो. उस ने फिर प्रश्न किया, ‘‘तुम रहने वाले कहां के हो?’’

मैं ने कहा, ‘‘बिहार.’’

उस ने इस बार चौंक कर कहा, ‘‘बिहार, फिर हाथ मिलाओ, मैं भी बिहार की हूं.’’

इस बार मु झे उस का उत्तर थोड़ा संदेहास्पद लगा. मैं ने धीरे से उस के हाथ पर अपना हाथ रख दिया. लेकिन यह पकड़ वैसी नहीं थी जिस आत्मविश्वास से मैं ‘मिली’ (मेरी प्रेमिका) का हाथ पकड़ता था. मैं ने जासूस की तरह उस से सवाल किया, ‘‘बिहार में कहां की रहने वाली हो?’’

उस ने कहा. ‘‘गया.’’

इस बार मु झे लगा जैसे वह सच कह रही हो. मैं ने कहा, ‘‘मैं हाजीपुर का रहने वाला हूं.’’

उस ने अनभिज्ञता से कहा, ‘‘हाजीपुर?’’

मैं ने कहा, ‘‘हां, वही जहां से माननीय रामविलास पासवानजी सांसद का चुनाव जीतते रहे  हैं.’’ मनुष्य भी अजीब प्राणी है. जब वह कमजोर पड़ता है, सभी उस से दूरी बना लेते हैं और जैसे ही वह शक्तिशाली हो जाता है लौह चुंबक की भांति, अनजानों को भी अपनी ओर समेट लेता है. इसलिए मैं ने भी रामविलासजी से अपना रिश्ता जोड़ा.

अब उस ने मेरा मोबाइल नंबर मांगा और मैं ने उस का. फिर मैं औफिस के पास रिकशे से उतर गया. उस ने कहा, ‘‘अगर कभी चाहो तो मेरे घर आओ. मु झे मिलना हुआ तो मैं इस औफिस में आ जाऊंगी.’’

मैं ने असहज भाव से उसे देखा, रिकशे वाले को अपने हिस्से के पैसे दिए. फिर औफिस के अंदर चला गया. हृदय में अजीब सा द्वंद्व था. मैं ने सब से पहले इस घटना की चर्चा अपने औफिस की महिला सहकर्मियों से की. सुनते ही सब के सब साथ हंस पड़ीं, साथ मैं भी हंसा. किंतु उन सब की हंसी में एक रहस्य था जो उस लड़की के चरित्र की ओर इशारा कर रहा था और मैं असमंजस की हालत में था.

दिन खत्म हुआ. घर पहुंचा. अजीब सी मनोस्थिति थी. इस घटना का जिक्र मैं ने अपने रूमपार्टनर विकास से किया. उस ने जोर दे कर पूछा, ‘‘उस ने तेरा हाथ छुआ?’’

‘‘मैं ने कहा, ‘‘हां.’’

‘‘तु झे अपने घर भी बुलाया है?’’

‘‘हां.’’

‘‘अपना मोबाइल नंबर भी दिया है. फिर तो वह साली जुगाड़ है. मु झे उस का मोबाइल नंबर देना,’’ उस ने कहा.

पता नहीं क्यों लेकिन मैं उस की बात टाल गया और मैं ने उसे मोबाइल नंबर नहीं दिया. जुगाड़ का अभिप्राय मैं अच्छी तरह से सम झ सकता था. पता नहीं क्यों, हम सब दोहरी जिंदगी जीते हैं, चाहे हम और हमारा समाज नारी स्वतंत्रता की कितनी ही बड़ीबड़़ी बातें सार्वजनिक स्थल पर कर ले पर सब ‘ढाक के तीन पात’ अपने हमाम में सब नंगे.

यों देखें, तो हाथ का पकड़ा जाना एक साधारण सी घटना थी. पर न जाने क्यों हम सब को लगा कि इस में कुछ असामान्य था और यह सिर्फ इसलिए क्योंकि वह एक लड़की थी.

क्या हम सचमुच 21वीं शताब्दी के दौर में हैं? मेरे लिए यह एक यक्ष प्रश्न था क्योंकि उन सब की सोच में मैं भी शामिल था.

मैं 2 दिनों तक उस के फोन आने का इंतजार करता रहा. पर कोई कौल नहीं आई. अकसर लड़कियों की जबान से सुना है, ‘लड़के एक नंबर के कुत्ते होते हैं’ और मैं इस से कभी इनकार नहीं करता. मन में अजीब सा कुतूहल था. तीसरे दिन मैं ने उस का नंबर मिलाया.

मैं ने कहा, ‘‘मैं अमित बोल रहा हूं. हम लाटूश रोड पर मिले थे.’’

उस ने कहा, ‘‘हां अमित, कैसे हो?’’

मैं ने कहा, ‘‘मैं ठीक हूं. तुम कैसी हो?’’

‘‘मैं भी ठीक हूं.’’

इस से पहले मैं कुछ पूछता, उस ने फिर सवाल दागना शुरू किया, ‘‘तुम कमरे में अकेले रहते हो?’’

मेरा उत्तर ‘हां’ था. मैं फिर  झूठ बोल रहा था मगर इस बार मु झे अपने चेहरे के भाव छिपाने की जरूरत न पड़ी क्योंकि दूरभाष पर आप हमेशा आधीअधूरी बात ही करते हैं. आप वे बातें सुन तो सकते हो जो सामने वाला कह रहा होता है किंतु आप उस के चेहरे पर लिखे शब्दों को पढ़ नहीं सकते.

उस ने सवाल किया, ‘‘तुम ने अब तक शादी क्यों नहीं की?’’

मैं ने महसूस किया कि जैसे वह मु झे खोलने का प्रयास कर रही हो. मैं ने अनमने ढंग से कहा, ‘‘हो जाएगी, मम्मीपापा देख

रहे हैं.’’

उस के प्रश्न का सिलसिला अभी थमा नहीं था, ‘‘अमित तुम्हारी उम्र कितनी है?’’

मैं ने कहा, ‘‘26 प्लस.’’

उस ने कहा, ‘‘अमित, तुम्हें शादी की शारीरिक जरूरत महसूस नहीं होती?’’

इस से पहले मैं हां या न कुछ भी उत्तर दे पाता, उस ने आगे कहना शुरू किया, ‘‘मैं तुम लड़कों का मनोविज्ञान बहुत अच्छे से सम झती हूं. सोचते होगे, पहले सैटल हो जाओ. खूब पैसे कमा लो, फिर किसी परी जैसी लड़की से शादी करोगे. अमित, मु झे लगता है ये सब करतेकरते कब जिंदगी निकल जाती है, हमें पता भी नहीं चलता. जिंदगी जैसी है, जितनी है, उसे बस जी लेनी चाहिए.’’

अब मु झे विकास की बातों पर भरोसा होने लगा था. मु झे लगा जैसे वह मु झे आमंत्रण दे रही हो और इस से पहले कुछ कह पाता, उस ने फिर सवाल दागा, ‘‘तुम खाना कहां खाते हो?’’

मैं ने कहा, ‘खुद ही बनाता हूं.’

‘‘अमित, तुम किसी कामवाली को क्यों नहीं रख लेते. काम से थक जाते होगे,’’ उस ने हंसते हुए आगे कहा, ‘‘किसी जवान लड़की को मत रख लेना. किसी उम्रदराज या किसी छोटे लड़के को रख लो, तुम्हारी मदद करेगा.’’

मैं ने जानबू झ कर उसे कुरेदा, ‘‘जवान लड़की क्यों नहीं?’’

उस ने कहा, ‘‘यह लखनऊ है,  दिल्ली नहीं.’’

इस बार मु झे लगा जैसे वह मेरी भावनाओं को छेड़ने का प्रयास कर रही हो. सवाल अभी खत्म नहीं हुए थे. अगला प्रश्न फिर सामने था.

‘‘तुम ने कभी किसी से प्यार किया है?’’

मैं ने कहा, ‘‘लड़कियां दोस्त बहुत हैं मगर कोई रिश्ता अब तक प्यार तक नहीं पहुंचा.’’ इस बार मु झे खुद पर हंसी आई.

‘‘अमित, तुम ने बताया था कि तुम कविताएं लिखते हो.’’

मेरे पास बस यही मौका था. मैं ने कहा, ‘अगर कविता सुननी हो तो मु झ से मिलो. मु झे खुद नहीं पता था कि मैं ने उसे क्यों बुलाया क्योंकि यह शारीरिक आकर्षण कतई नहीं था. अगर वह मु झे अपना संपूर्ण समर्पण कर भी देती तो भी मैं शायद उस के लिए न जाता. यह शायद इसलिए क्योंकि एक पुरुष एक साधारण स्त्री से भी बेहद कमजोर होता है. लेकिन, उस के बारे में जानने की जिज्ञासा जरूर थी.

उस ने कहा, ‘‘मु झे प्रेम वाली कविताएं अच्छी लगती हैं.’’

मैं ने उत्तर दिया, ‘‘मैं रोमांटिक कविता ही लिखता हूं.’’ और फिर अगले दिन चारबाग चौराहे पर मिलना तय हुआ.

मैं ठीक 10 बजे पूर्व निर्धारित स्थान पर पहुंच गया. वह दूर से आती हुई दिखी. मैं ने मन ही मन में कहा जुगाड़ आ गई. हम ने फिर साथ में रिकशा लिया. इस बार मैं पहले की अपेक्षा अधिक चिपक कर बैठा.

मैं ने पूछा, ‘‘कैसी हो?’’

उस ने कहा, ‘‘बस, ठीक. अमित, तुम ने कहा था कि तुम अपनी कविता सुनाओगे.’’

मैं ने उसे अपनी एक छोटी सी कविता सुनाई. इस बार मैं उस के चेहरे पर उभरे शब्दों को पढ़ सकता था.

उस ने कहना प्रारंभ किया, ‘‘अमित, कविताओं की कोंपलें हृदय के भीतर से निकलती हैं. पहले हम अपनी भावनाओं को कोरे कागज पर उकेरते हैं, फिर धीरेधीरे उसे जीने लगते हैं. शायद, मैं गलत होऊं मगर मु झे लगता है हर लिखने वाले का दिल आईने की तरह बिलकुल साफ होता है. पता नहीं क्यों मैं उस दिन तुम से मिली तो तुम पर विश्वास करने को दिल चाहा और मैं ने तुम्हें अपना मोबाइल नंबर दे दिया.

‘‘अमित, पता नहीं इस अंधी दौड़ में हम कहां जा रहे हैं. पैसापैसा और पैसा, जिंदगी बस इस में सिमट कर रह गई है. पर मेरे लिए प्यार महत्त्वपूर्ण है.’’

उस ने मेरा हाथ फिर खींच कर अपने हाथों में लिया. हमारी मानसिकता संकीर्ण होती जा रही है. हम जो हैं वह दिखना नहीं चाहते और जो नहीं हैं, चाहते हैं बस वही दिखे. अजीब सी सचाई थी उस की आंखों में.

‘‘अमित, अगर मु झे कोई तुम्हारे साथ इस तरह बैठे देखे तो पता नहीं क्या सोचेगा और मैं उन्हें रोक भी नहीं सकती क्योंकि बहुत कम ऐसे लोग हैं जो व्यवस्थित सोचते हैं या इस की कोशिश करते हैं. मगर यह जरूरी नहीं है कि हम रोज मिलें क्योंकि  2 अच्छे लोगों का बिखर जाना अच्छा होता है ताकि वे 2 अलगअलग दिशाओं में अच्छाइयां फैला सकें.’’

मैंने एक भरपूर दृष्टि उस के चेहरे पर डाली और खुद से प्रश्न किया, क्या सचमुच मैं एक अच्छा आदमी हूं? अचानक रिकशे वाले ने कहा, ‘‘अमीनाबाद आ गया.’’ हमारे बीच का वार्त्तालाप थम सा गया.

वह हंसी और कहना शुरू किया, ‘‘अमित अपना खयाल रखो, बिलकुल दुबलेपतले हो. खाने का ध्यान रखा करो और हां, जल्दी शादी कर लो. लेकिन, मु झे बुलाना मत भूलना.’’

उस के चेहरे पर आदेश का भाव था. मैं रिकशे से उतरा. इस बार मैं ने उस का हाथ उसी आत्मविश्वास से पकड़ा जैसे मैं किसी परममित्र या अपनी प्रेमिका का पकड़ता था क्योंकि इस बार मेरे आकर्षण को दिशा मिल चुकी थी. उस का रिकशा धीरेधीरे आगे बढ़ने लगा. मैं वहीं खड़ा तब तक उसे देखता रहा जब तक वह मेरी आंखों से ओझल नहीं हो गई.

Hindi Story: चौराहे की काली

Hindi Story: ‘‘मेरी बीवी बहुत बीमार है पंडितजी…’’ धर्म सिंह ने पंडित से कहा, ‘‘न जाने क्यों उस पर दवाओं का असर नहीं होता है. जब वह मुझे घूर कर देखती है तो मैं डर जाता हूं.’’ ‘‘तुम्हारी बीवी कब से बीमार है?’’ पंडित ने पूछा.

‘‘महीनेभर से.’’ ‘‘पहले तुम मुझे अपनी बीवी से मिलवाओ तभी मैं यह बता पाऊंगा कि वह बीमार है या उस पर किसी भूत का साया है.’’

‘‘मैं अपनी बीवी को कल सुबह ही दिखा दूंगा,’’ इतना कह कर धर्म सिंह चला गया. पंडित भूतप्रेत के नाम पर लोगों को बेवकूफ बना कर पैसे ऐंठता था. इसी धंधे से उस ने अपना घर भर रखा था.

अगली सुबह धर्म सिंह के घर पहुंच कर पंडित ने कहा, ‘‘अरे भाई धर्म सिंह, तुम ने कल कहा था कि तुम्हारी बीवी बीमार है. जरा उसे दिखाओ तो सही…’’ धर्म सिंह अपनी बीवी सुमन को अंदर से ले आया और उसे एक कुरसी पर बैठा दिया.

पंडित ने उसे देखते ही पैसा ऐंठने का अच्छा हिसाबकिताब बना लिया. सुमन के बाल बिखरे हुए और कपड़े काफी गंदे थे. उस की आंखें लाल थीं और गालों पर पीलापन छाया था. जो भी उस के सामने जाता, वह उसे ऐसे देखती मानो खा जाएगी.

पंडित सुमन की आंखें देख कर बोला, ‘‘अरे धर्म सिंह, मैं देख रहा हूं कि तुम्हारी बीवी पर बड़े भूत का साया है.’’ ‘‘कैसा भूत पंडितजी?’’ धर्म सिंह ने हैरानी से पूछा.

‘‘तुम नहीं समझ पाओगे कि इस पर किस किस्म का भूत है,’’ पंडित बोला. ‘‘क्या भूतों की भी किस्में होती हैं?’’

‘‘क्यों नहीं. कुछ भूत सीधे होते हैं, कुछ अडि़यल, पर तुम्हारी बीवी पर…’’ पंडित बोलतेबोलते रुक गया. ‘‘क्या बात है पंडितजी… जरा साफसाफ बताइए.’’

‘‘यही कि तुम्हारी बीवी पर सीधेसादे भूत का साया नहीं है. इस पर ऐसे भूत का साया है जो इनसान की जान ले कर ही जाता?है,’’ पंडित ने हाथ की उंगली उठा कर जवाब दिया. ‘‘फिर तो पंडितजी मुझे यह बताइए कि इस का हल क्या है?’’ धर्म सिंह कुछ सोचते हुए बोला.

पंडित ने हाथ में पानी ले कर कुछ बुदबुदाते हुए सुमन पर फेंका और बोला, ‘‘बता तू कौन है? यहां क्या करने आया है? क्या तू इसे ले कर जाएगा? मगर मेरे होते हुए तू ऐसा कुछ नहीं कर सकता.’’ ‘‘पंडितजी, आप किस से बातें कर रहे हैं?’’ धर्म सिंह ने पूछा.

‘‘भूत से, जो तेरी बीवी पर चिपटा है,’’ होंठों से उंगली सटा कर पंडित ने धीरे से कहा. ‘‘क्या भूत बोलता है?’’ धर्म सिंह ने सवाल किया.

‘‘हां, भूत बोलता है, पर सिर्फ हम से, आम आदमी से नहीं.’’ ‘‘तो क्या कहता है यह भूत?’’

‘‘धर्म सिंह, भूत कहता है कि वह भेंट चाहता है.’’ ‘‘कैसी भेंट?’’ यह सुन कर धर्म सिंह चकरा गया.

‘‘मुरगे की,’’ पंडित ने कहा. ‘‘पर हम लोग तो शाकाहारी हैं.’’

‘‘तुम नहीं चढ़ा सकते तो मुझे दे देना. मैं चढ़ा दूंगा,’’ पंडित ने रास्ता सुझाया. ‘‘पंडितजी, मुझे एक बात बताओ?’’

‘‘पूछो, क्या बात है?’’ ‘‘मेरी बीवी पर कौन सी किस्म का भूत है?’’

पंडित ने सुमन की तरफ उंगली उठाते हुए कहा, ‘‘इस पर ‘चौराहे की काली’ का असर है.’’ ‘‘क्या… ‘चौराहे की काली’,’’ धर्म सिंह की आंखें डर के मारे फैल गईं, ‘‘मेहरबानी कर के कोई इलाज बताएं पंडितजी.’’

‘‘जरूर. वह काली कहती है कि तुझे एक मुरगा, एक नारियल, 101 रुपए, बिंदी, टीका, कपड़ा और सिंदूर रात को 12 बजे चौराहे पर रख कर आना पड़ेगा.’’ ‘‘इतना सारा सामान पंडितजी?’’ धर्म सिंह ने कहा.

‘‘हां, अगर ऐसा नहीं हुआ तो तेरी बीवी गई काम से,’’ पंडित तपाक से बोला. ‘‘जी अच्छा पंडितजी, पर इतना सामान और वह भी रात के समय, यह मेरे बस की बात नहीं है,’’ धर्म सिंह ने कहा.

‘‘तेरे बस की बात नहीं है तो मैं रख आऊंगा…’’ पंडित ने कहा, ‘‘शाम को सारा सामान लेते आना. मैं शाम को आऊंगा.’’ धर्म सिंह तैयारी करने में लग गया. हालांकि उस ने बीवी को डाक्टर से दवा भी दिला दी, पर वह पंडित को भी मौका देना चाहता था इसीलिए चौराहे पर जाने से मना कर दिया.

रात को पंडित पूरा सामान ले कर चौराहे पर रखने के लिए चल दिया. हवा के झोंके, झींगुरों का शोर और उल्लुओं की डरावनी आवाजें रात के सन्नाटे को चीर रही थीं.

पंडित जैसे ही चौराहे से 30 फुट की दूरी पर पहुंचा, उसी समय वहां 15-16 फुट ऊंची मीनार सी मूर्ति नजर आने लगी. वह कभी छोटी हो जाती तो कभी बड़ी. उस में से घुंघरू की खनखनाती आवाज भी आ रही थी. पंडित यह सब देख कर बुरी तरह घबरा गया. हिम्मत कर के उस ने पूछा, ‘‘क… क… कौन है तू?’’

‘‘मैं चौराहे की काली हूं,’’ मीनार से घुंघरूओं की झंकार के साथ एक डरावनी आवाज निकली. ‘‘तू… तू… क्या चाहती है?’’

‘‘मैं तुझे खाना चाहती हूं,’’ मीनार में से फिर आवाज आई. ‘‘क… क… क्यों? मेरी क्या गलती है?’’ पंडित ने डरते हुए पूछा.

‘‘क्योंकि तू ने लोगों से बहुत पैसा ऐंठा है. अब मैं तेरे खून से अपनी प्यास बुझाऊंगी,’’ कहतेकहते काली धीरेधीरे नजदीक आ रही थी. पंडित के हाथों से सामान तो पहले ही छूट चुका था. ज्यों ही उस ने मुड़

कर पीछे की तरफ भागना चाहा, उस का पैर धोती में अटक गया और वह

गिर पड़ा. जब पंडित को होश आया तो उस ने अपनेआप को बिस्तर पर पाया. वह उस समय भी चिल्लाने लगा, ‘‘बचाओ… बचाओ… चौराहे की काली मुझे खा जाएगी…’’

‘‘कौन खा जाएगी? कैसी काली पंडितजी?’’ पंडित के कानों में धर्म सिंह की आवाज गूंजी. पंडित ने आंखें खोलीं तो अपने सामने धर्म सिंह व गांव के तमाम लोगों को खड़ा पाया. पंडित फिर बोला, ‘‘चौराहे की काली.’’

‘‘नहीं पंडितजी, आप बिना वजह ही डर गए हैं. वह काली नहीं थी,’’ धर्म सिंह ने पंडित को थपथपाते हुए कहा. ‘‘तो फिर कौन थी वह?’’

‘‘वहां मैं था पंडितजी, आप तो यों ही डर रहे हैं,’’ धर्म सिंह ने कहा. ‘‘पर वह तो… कभी छोटी तो कभी बड़ी और घुंघरुओं की आवाज…’’ पंडित बड़बड़ाया, ‘‘न… न… नहीं, तुम नहीं हो सकते.’’

‘‘क्यों नहीं हो सकता? मैं वही नजारा फिर दिखा सकता हूं,’’ इतना कह कर धर्म सिंह काला कपड़ा लगा लंबा बांस, जिस में घुंघरू लगे थे, ले आया. उस ने बांस से कपड़ा कभी ऊंचा उठाया तो कभी नीचा किया और खुद को बीच में छिपा लिया. तब जा कर पंडित को यकीन हुआ कि वह काली नहीं थी.

धर्म सिंह ने पंडित से कहा, ‘‘इस दुनिया में न तो भूत हैं और न ही चुड़ैल. यह सारा चक्कर तो सरासर मक्कारी और फरेब का है.”

Social Story: यह कैसा बदला

Social Story: मृदुल को अब अहसास हो रहा था कि बदले की आग ने उसे ही झुलसा कर रख दिया है… और फिर बदला भी कैसा? उस के साथ किसी और ने अपराध किया और उस ने किसी और से बदला लिया. उसे ऐसा फैसला नहीं लेना चाहिए था.

पुलिस मृदुल के पीछे पड़ी हुई थी और यकीनन उसे पकड़ लेगी. उस के 2 साथियों को पुलिस ने पकड़ भी लिया था. क्या करे क्या न करे, उस की समझ में नहीं आ रहा था.

तकरीबन 3 महीने पहले तक मृदुल की जिंदगी काफी अच्छी चल रही थी. वह एक एयर कंपनी में पायलट था. वह थाईलैंड में रहता था और अच्छी जिंदगी जी रहा था. वैसे तो तकरीबन हर देश में उसे जाना होता था, पर ज्यादातर वह भारत और यूरोप ही जाता था.

काफी खर्च कर के मृदुल ने पायलट का कोर्स किया था. नौकरी भी मिल गई थी. 2-3 सालों तक उस ने नौकरी की, पर कोरोना महामारी के चलते सब से ज्यादा असर अगर किसी कारोबार पर पड़ा था तो, वह थी एयर इंडस्ट्री. कई देशों ने दूसरे देशों से आवाजाही बंद कर दी थी. यहां तक कि घरेलू उड़ान भी रद्द हो गई थी. ऐसे हालात में कई पायलटों को कंपनियों ने अलविदा कह दिया था और उन में से एक वह भी था.

महामारी ने सिर्फ इतना कहर ही मृदुल के ऊपर नहीं बरपाया था. एक दिन वह थाईलैंड में अपने फ्लैट में बैठा भविष्य के बारे में सोच रहा था कि अचानक कुछ लोग उस के घर में आए. वे सरकारी वरदी में थे. उन्होंने उसे बताया कि वे कस्टम महकमे से हैं और उस के घर की तलाशी लेने आए हैं.

जब तक मृदुल कुछ समझ पाता, उस के मोबाइल फोन, लैपटॉप, पर्स वगैरह को उन्होंने अपने कब्जे में ले लिया. उन में से कुछ लोग इस घटना का वीडियो भी बना रहे थे.

“पुलिस स्टेशन…” एक ने कहा और मृदुल को घसीटते हुए गाड़ी में बिठाया वे और पुलिस स्टेशन की ओर ले चले, पर कुछ दूर जाने के बाद उन लोगों ने मृदुल को एक टैक्सी में बिठाया और टैक्सी वाले को वहां की भाषा में कुछ कह कर थाईलैंड की करंसी कुछ ‘बाट’ दिए. मृदुल हक्काबक्का था. कुछ ही देर में टैक्सी वाले ने उसे उस के फ्लैट के नजदीक ही छोड़ दिया.

“पुलिस स्टेशन?” मृदुल ने ड्राइवर से पूछा.

“नो पुलिस स्टेशन…” ड्राइवर ने कहा और चलता बना.

मृदुल समझ गया कि उसे अपराधियों ने ठग लिया है. नजदीकी पुलिस स्टेशन में जा कर उस ने रिपोर्ट लिखवा दी और दुखी मन से उस ने थाईलैंड छोड़ मुंबई में रहने की योजना बना ली.

भारत सरकार हर देश से अपने नागरिकों को लाने का इंतजाम कर रही थी और उसी के तहत मृदुल भी वापस आ गया.

थाईलैंड में हुए कांड को मृदुल भूल तो नहीं पाया था, पर जख्म कुछ कम जरूर हो गए थे. एक दिन वह मुंबई में भटक रहा था कि उस की नजर यूंग नाम के एक थाई बाशिंदे पर नजर पड़ी. थाईलैंड में यूंग उस के फ्लैट के नजदीक ही रहता था और सुबह की सैर के लिए नजदीकी पार्क में आया करता था. अकसर यूंग से उस की बात होती थी.

यूंग को देख मृदुल ने टोकना चाहा, पर एकाएक उस के मन में खयाल आया कि जिस तरह उसे थाईलैंड में ठगा गया था, वैसे ही वह यूंग को ठग सकता है. पर अगर वह यूंग के पास जाएगा तो वह उसे पहचान लेगा, यह सोच उस ने दूरी बना कर उस का पीछा किया और उस का फ्लैट कहां है, इस की जानकारी ले ली.

मृदुल ने सब से पहले यूंग पर निगरानी रखना शुरू कर दिया. उस ने देखा कि वह किसी लड़की के साथ वह रहता है. लगता था कि वह यूंग की गर्लफ्रैंड है. उन के घर से आनेजाने के समय पर भी वह निगाह रख रहा था. वह चाहता था कि जब यूंग घर में अकेला हो, तभी उस के ऊपर धावा बोला जाए.

यूग की गर्लफ्रैंड अमूमन सुबह 9 बजे घर से निकलती थी और शाम 6 बजे वापस आती थी. इस बीच ही काम को अंजाम देना उचित रहेगा, मृदुल ने सोचा.

मृदुल खुद यूंग के पास जा नहीं सकता था, क्योंकि वह उसे पहचान जाता. जिस तरह यूंग के देश वालों ने उसे ठगा है उसी तरह मृदुल भी उसे अपने देश में ठगेगा. पर कैसे? कस्टम डिपार्टमैंट की ओर से कुछ अफसर यूंग के पास जाएंगे और जो समान उस के पास होगा उसे छीन लेंगे. पर कस्टम डिपार्टमैंट के आदमी वह लाए कहां से?

एकाएक मृदुल को अपने क्लब का ध्यान आया जहां कई बाउंसर रहते थे. 1-2 से उस की जानपहचान भी थी. एक दिन समय निकाल कर वह एक बाउंसर के पास गया और बोला, “भाई, एक छोटा सा काम है, पर उसे आप जैसे बाहुबली ही कर सकते हैं.”

“क्या काम है बताओ?” खुद को बाहुबली कहलाने में उस बाउंसर को फख्र महसूस हुआ.

“कस्टम डिपार्टमैंट का अफसर बन कर एक थाई बाशिंदे को लपेटना है,” मृदुल ने कहा.

“पुलिसथाने के चक्कर में नहीं पड़ेंगे हम,” उस बाउंसर ने साफ माना किया.

“क्या पुलिस का चक्कर… उस थाई के समझ में कुछ आएगा तब न? वह न तो हमारा नाम जानता है, न हमें पहचानता है. क्या बताएगा पुलिस को.. और पुलिस भी आप लोगों से पंगा नहीं लेना चाहेगी. फिर जो कुछ भी मिलेगा उस में आधा हिस्सा आप लोगों का,” मृदुल ने उसे समझाया.

“आप लोगों का मतलब? और कौन रहेगा इस में?” बाउंसर ने पूछा.

“भाई, कस्टम डिपार्टमैंट की ओर से जाओगे, तो कम से कम 4-5 आदमी तो होने चाहिए,” मृदुल ने समझाया.

“अगर उस के पास एक लाख मिले भी तो 5 आदमियों में क्या मिलेगा? क्यों इतना बड़ा रिस्क लें हम?” बाउंसर ने एतराज जताया.

“कैसे जानते हो कि एक लाख ही मिलेगा… अरे, उस का मोबाइल, आईपैड, पर्स, जेवर सभी कुछ मिला कर कई लाख हो जाएंगे,” मृदुल ने समझाया.

कुछ नानुकर के बाद वह बाउंसर राजी हो गया और अपने कुछ और साथी बाउंसरों को भी राजी कर लिया.

वे सब दोपहर के 2 बजे यूंग की हाउसिंग सोसाइटी में कस्टम अफसर बन कर पहुंच गए. सरकारी अफसर समझ कर सिक्योरिटी गार्ड ने भी उन्हें नहीं रोका.

वे यूंग के फ्लैट के दरवाजे पर गए और डोरबैल का बटन दबाया. यूंग डोरबैल की आवाज सुनते ही बाहर निकाला. इस से पहले कि वह कुछ समझ पाता, वे चारों उस के घर में धड़ाधड़ घुस गए. उन्होंने उस का मोबाइल फोन छीन लिया. साथ ही पास में रखे आईपैड, कंप्यूटर, पर्स वगैरह को भी छीन लिया. 2 लोग अंदर जा कर तलाशी लेने लगे और बाकी 2 वीडियो बनाने लगे.

आननफानन में सामान बटोर कर यूंग को थाने चलने को कहा गया. जैसे ही वह बाहर निकला उसे एक आटोरिकशा में बिठा दिया गया और ड्राइवर को नजदीक की किसी जगह पर छोड़ने को कह दिया.

मृदुल के प्लान के मुताबिक, जैसा उस के साथ थाईलैंड में हुआ था, सबकुछ वैसा ही हो गया. पर यूंग ने तुरंत पुलिस स्टेशन में इस की खबर कर दी और पुलिस ने वीडियो फुटेज की मदद से सभी बाउंसरों को पकड़ लिया. इस की जानकारी मृदुल को आज के अखबार से मिली थी.

अब क्या करे, मृदुल समझ ही नहीं पा रहा था. एकाएक उस के मोबाइल की घंटी बज उठी. स्क्रीन पर उस बाउंसर का नाम फ्लैश हो रहा था, जिसे पुलिस गिरफ्तार कर चुकी थी. इस का मतलब पुलिस ने बाउंसर के मोबाइल से उसे फोन किया है. उस ने कांपते हाथों से मोबाइल को स्विच औफ किया और चेहरे पर आए पसीने को पोंछा.

मृदुल जानता था कि आज नहीं तो कल पुलिस की गिरफ्त में उसे आना ही है. यह कैसा बदला लिया था उस ने यूंग से. बदले की इस आग ने तो उसे ही झुलसा दिया था. अब पछताने के सिवा उस के पास कोई चारा नहीं था.

Dowry: मैं अपने घरवालों से उनकी दहेज लेने की डिमांड से परेशान हूं

Dowry: अगर आप भी अपनी समस्या भेजना चाहते हैं, तो इस लेख को अंत तक जरूर पढ़ें.

सवाल –

मैं 26 साल का हूं और एक प्राइवेट कंपनी में काम करता हूं. अभी तक मेरी शादी नहीं हुई है. मेरे घर वाले शादी में दहेज लेने की बात कर रहे हैं, जबकि मैं इस बुराई के खिलाफ हूं. मेरे औफिस में एक लड़की है, जो मुझे बहुत पसंद है. मैं उस से शादी करना चाहता हूं, पर मेरे घर वाले कहते हैं कि उस लड़की का परिवार ज्यादा पैसे वाला नहीं है, जबकि लड़की बहुत सुंदर है और अच्छा कमाती भी है, फिर दहेज कहां से बीच में आ गया. मैं अपने परिवार की सोच की वजह से दिमागीतौर पर परेशान रहने लगा हूं. मैं क्या करूं?

जवाब –

आप घर वालों से दोटूक कह दीजिए कि शादी करेंगे तो अपनी पसंद की उसी लड़की से और वह भी बिना कोई दहेज लिए. सब से अहम बात यह है कि आप को वह पसंद है. यह बात सही है कि दहेज कहां से बीच में आ गया. वह जो भी कमाएगी, उस का इस्तेमाल आप और आप के घर वाले ही तो करेंगे. ऊपर से वह आम गृहिणी की तरह घर भी तो संभालेगी.

यह बात घर वालों को समझ आए तो ठीक, वरना जी कड़ा कर के घर वालों से अलग हो जाइए. शादी के बाद दहेज को ले कर कोई अनहोनी, हादसा या गृह क्लेश हो, उस से तो बेहतर है अलग हो जाना. अपनी कमाई से जो भी घर वालों को देना चाहें, वह उन्हें बता दें और उस लड़की को भी, जिस से आगे की जिंदगी में कोई झंझट पेश न आए.

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Social Issue: पति ने की दूसरी शादी, तो पहली पत्नी ने मचाया तांडव

Social Issue: बिहार पुलिस के एक जवान ने दूसरी शादी की, तो उस की पहली पत्नी ने जबरदस्त हंगामा किया… दरअसल, यह मामला बिहार के एक जिले से सामने आया है, जहां पुलिस जवान ने बिना अपनी पहली पत्नी को बताए और बिना तलाक दिए दूसरी शादी कर ली.

पहली पत्नी को जब इस बारे में पता चला, तो उस ने गुस्से में आ कर जम कर हंगामा किया और पुलिस जवान पर कई आरोप लगाए… महिला ने पुलिस जवान के खिलाफ शिकायत भी दर्ज कराई.. इस के बाद मामला इलाके में चर्चा की बात बन गया और लोग इसे ले कर सोशल मीडिया पर भी कमैंट करने लगे.

जानिए पूरा मामला

भागलपुर में एक सिपाही ने पहली बीवी को छोड़ कर दूसरी औरत से शादी रचा ली, जिस को ले कर पहली बीवी ने जम कर तांडव किया.

इन दिनों देखा जा रहा है कि 2 शादी करना ट्रैंड सा हो गया है. और तो और अब इस में पुलिस के जवान भी शामिल हो गए हैं. यह मामला भी खूब तूल पकड़ रहा है. यह मामला शिवनारायणपुर के बिहार पुलिस जवान मोहम्मद वहाब अंसारी का है. वह बिना तलाक दिए ही दूसरी शादी कर के नई बीवी घर ले आया, तो हंगामा मच गया, क्योंकि जब इस की खबर पहली पत्नी अजमीरा खातून को मिली और उस ने जम कर तांडव किया.

पहली बीवी अपने परिवार वालों के साथ मोहम्मद वहाब अंसारी के घर पर पहुंची और हंगामा शुरू हो गया. इस मामले में जब आरोपी सिपाही से पूछा गया कि आप ने अपनी पहली बीवी को तलाक दिया है या नहीं, तो उस ने कहा कि नहीं मैं ने तलाक नहीं दिया है.

तब आप क्या कानून को नहीं मानते हैं, तो उस ने कहा कि यह हमारी गलती है, हम गलती स्वीकार करते हैं.

बताते चलें कि कुछ दिन पहले ही मोहम्मद वहाब अंसारी पर ऐसा आरोप है कि कुछ दिन पहले ही अजमीरा खातून को घर से बेघर कर दिया है. उन को बिहार पुलिस के जवान मोहम्मद वहाब से एक बच्चा भी है. पहली बीवी ने पति पर मारपीट का भी आरोप लगाया है. कहा कि वे दहेज की भी मांग करते हैं, जबकि जवान मोहम्मद वहाब ने पहली बीवी से लव मैरिज की थी.. और दूसरी बीवी से भी लव मैरिज की है… तो ऐसे बिहार पुलिस जवान को कब तक सजा मिलेगी, यह देखने वाली बात है.

लेकिन इस घटना ने यह सवाल उठाया कि समाज में ऐसे मामलों के प्रति सोच और संवेदनशीलता क्या होनी चाहिए, खासकर जब बात पारिवारिक और कानूनी अधिकारों की होती है? यह घटना एक गंभीर और दिलचस्प मामला है, जो समाज में बढ़ते हुए तलाक और दूसरी शादी के मामलों को ले कर कई सवाल खड़े करता है. कानूनी रूप से देखा जाए तो एक पति को बिना अपनी पहली पत्नी को तलाक दिए दूसरी शादी करना भारतीय दंड संहिता और मुसलिम पर्सनल ला के तहत गलत है.

इस तरह की घटनाओं से समाज में दोहरी शादी को ले कर और भी विचार-विमर्श बढ़ेगा… खासकर पुलिस जैसे संवेदनशील विभाग में काम करने वाले लोगों से यह उम्मीद की जाती है कि वे कानून और नैतिकता का पालन करें, ताकि समाज में एक पौजिटिव संदेश जाए.

Farming: मैं मशरूम की खेती करना चाहती हूं लेकिन मुझे इस बारे में जानकारी नहीं है

Farming: अगर आप भी अपनी समस्या भेजना चाहते हैं, तो इस लेख को अंत तक जरूर पढ़ें.

सवाल-

मैं 22 साल की हूं और हरियाणा के एक गांव में रहती हूं. मैं ने ग्रेजुएशन तक पढ़ाई की है और कंप्यूटर का 6 महीने का कोर्स भी किया है. हमारे पास 5 एकड़ जमीन है. हम सोच रहे हैं कि अब नई तकनीक के साथ खेतीबारी करें. मुझे लगता है कि हमें मशरूम की खेती से काफी मुनाफा हो सकता है, पर हमें इस बारे में ज्यादा जानकारी नहीं है. क्या मशरूम उगाने के लिए कोई ट्रेनिंग दी जाती है? वैसे, हम ने इंटरनैट पर काफी जानकारी हासिल की है, पर हमें ऐसी जगह से ट्रेनिंग लेनी है, जो सही तरीके से मशरूम उगाने के बारे में बता सके. हमें क्या करना चाहिए?

जवाब –

आप का फैसला एकदम सही है. मशरूम की खेती से बढि़या पैसा बनाया जा सकता है. इस की खेती के लिए इन दिनों इफरात से ट्रेनिंग हर कहीं दी जा रही है. आप अपने नजदीकी कृषि विज्ञान केंद्र या कृषि विभाग से संपर्क करें. वहां से आप को पता चलेगा कि अगला नजदीकी ट्रेनिंग प्रोग्राम कब और कहां है.

वैसे, केंद्र और राज्य सरकार मुफ्त में मशरूम खेती की ट्रेनिंग देती हैं. इस के लिए आप हिसार के चौधरी चरण सिंह कृषि विश्वविद्यालय में भी संपर्क कर सकती हैं. आप दिल्ली प्रैस की पत्रिका ‘फार्म एन फूड’ से भी यह जानकारी ले सकती हैं. फोन नंबर है- 011-41398888.

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Editorial: हरियाणा पुलिस ने तोड़ीं किसानों की जमीन पर बनाई गई अवैध कालोनियां

Editorial: दिल्ली के पास फरीदाबाद में 21 एकड़ में बसी किसानों की जमीन पर काट कर बनाई गई सरकार की बिना इजाजत वाली कालोनियों को हरियाणा सरकार की पुलिस और दूसरे विभागों ने मार्च में धराशायी कर दिया. इन कालोनियों की जमीनें मजदूरों, गरीबों ने कौड़ीकौड़ी जमा कर खरीदी थीं और मेहनत के पैसे से मकान बनाए थे. खेती की जमीन पर रहने के मकान नहीं बन सकते इसलिए इन्हें तोड़ डाला गया.

यह पूरे देश में हो रहा है. गरीब लोग शहरों के आसपास के खेतों में जमीन खरीद कर बेहद छोटे मकान बना रहे हैं ताकि उन के सिर पर छत तो हो सके. इन कालोनियों में सीवर नहीं होता और पानी के लिए ये लोग ट्यूबवैल लगा लेते हैं. बिजली का कनैक्शन जरूर मिल जाता है कभी किसी आसपास की फैक्टरी से तो कभी किसी और ढंग से. शहर में नौकरी और 10-20 किलोमीटर दूर रहने को पक्की छत मिल जाए तो ये मजदूर अपने को बहुत सुखी मान लेते हैं.

ये लोग उन से अलग हैं जो सरकार की जमीन पर झोंपडि़यां बना लेते हैं और बरसों रह जाते हैं. इन कालोनियों की जमीन किसान ने मरजी के खरीदार या बिल्डर को बेची होती है जो छोटेछोटे प्लौट काट कर मजदूरों को बेचता है. इन में सड़क का इंतजाम होता है और कुछ होशियार बिल्डर पानीबिजली का भी जुगाड़ कर देते हैं.

सरकार को इन से परेशानी यही है कि जो पोथों के पोथों के कानून बनाए गए हैं उन्हें माना नहीं गया. सरकार की बीसियों तरह की इजाजत नहीं ली गई. अफसरोंनेताओं की जेबें नहीं भरी गईं, परमिटलाइसैंस नहीं लिए गए. इस से सरकारी अफसरों के पास हक हो जाता है कि वे जब चाहें बुलडोजर चला दें और जो थोड़ीबहुत संपत्ति इन लोगों ने बनाई है उसे नष्ट कर दें.

नियमकानूनों के नाम पर यह असल में तानाशाही है जो पूरे देश में पुलिस, प्रशासन, नेता, मंत्री के हाथों होती है. तानाशाही करने वालों की सोच होती है कि गरीब लोग अपनी एक छत कैसे बना सकते हैं? वे कैसे सुख से रह सकते हैं? उन्हें तो हमेशा इन के सामने पसरे रहना चाहिए, हमेशा दया की, जिंदा रहने की भीख मांगते रहना चाहिए.

हमारा धर्म भी यही सिखाता है कि इन लोगों को इस जन्म में नरक भोगना लिखा है क्योंकि इन्होंने पिछले जन्म में कोई पाप किए होंगे, दानपुण्य नहीं किया होगा, ऋषिमुनियों को तंग किया होगा, इसलिए इस जन्म में अगर इन्हें यमदूतों के हाथों नरक भोगना पड़े, तो यह तो भगवान का कानून है, शासन, नेता बेचारा क्या करेगा?

अफसोस यह है कि इन में से ही बहुत से लोग ढोलमंजीरे ले कर उस धर्म के गुणगान करते हैं जिस के इशारे पर इन के मकानों को मिट्टी में मिला दिया जाता है. मुंबई के धारावी में यही काम अब अडानी के साथ मिल कर महाराष्ट्र की भारतीय जनता पार्टी कर रही है. जो लोग सरकार की पार्टी में होते हैं वे भी अफसरों के सामने कुछ नहीं कर पाते क्योंकि नेता बनते ही इलाके का चौधरी समझ जाता है कि जिस जमीन पर मकान बने हैं, वह सोना उगलेगी तो फिर उस पर गरीबों के मकान क्यों बने रहें.

ये मकान चाहे 1 साल पहले बने हों या 10-15 साल पहले, तोड़े जाते समय सभी ढह जाते हैं और इन के साथ लाखों सपने भी ढह जाते हैं.

॥॥॥

पेट की भूख, पक्की छत और बीमारी के बाद जो बात एक आम गरीब को तंग करती है वह पुलिस और अदालत है. पुलिस और अदालत की धौंसबाजी घरों को बुरी तरह तबाह करती है और इन की बिजली कब किस के सिर पर गिर जाए यह कहा नहीं जा सकता. कसबों की अदालतों में छप्परों के नीचे बैठे वकीलों और उन से घिरे मुरझाए चेहरे वाले गरीब गांवकसबाई लोगों को देख कर अंदाजा लगाया जा सकता है कि असली सरकार तो अदालत में बैठती है, सरकार के 5-5 मंजिलों के एयरकंडीशंड दफ्तरों में नहीं.

राज्य के मंत्री हों या केंद्र सरकार के, वे ज्यादा कुछ आम आदमी का न बिगाड़ सकते, न बना सकते. उन के बनाए हर कानून को पुलिस, इंस्पैक्टर और अदालतें जब लागू करती हैं तो अमीर तो क्या गरीब भी फंदों में फंसते चले जाते हैं और पूरी जिंदगी इन काले कोट पहने जजों के हाथों में गुजर जाती है जो बेहद बेदर्दी से अदालत में पहुंचे लोगों को न्याय दिलाते हैं. यह न्याय कभी 5 साल में मिलता है, कभी 10 साल में, तो कभी 15-20 साल में. हर फैसले पर एक खुश होता है दूसरा खून के घूंट पी कर रह जाता है.

काले कोट वाले जज के यहां जब नोटों से भरे बोरे मिले जो अचानक आग लगने पर आग बुझाने वालों को मिले तो पक्का हो जाता है कि ऊपर से नीचे तक न्याय दिलाने वाले इंसाफ के नाम पर ही कर रहे हैं वह कितना गलत हो सकता है.

अदालतों में देर तो एक बात है पर जब लगने लगे कि पैसे ले कर इंसाफ बिक रहा है तो गरीब, कमजोर टूट जाता है. जब पुलिस या इंस्पैक्टर किसी गरीब को अदालत में घसीट लाए तो आम आदमी को मालूम रहता है कि सुनवाई तो उस की होगी जिस के हाथ में पैसा है, ताकत है.

आम जजों के फैसले सरकारी वकीलों की मांग पर ही होते हैं क्योंकि गरीब के पास इतने पैसे कहां कि वह अच्छा पढ़ालिखा और समझदार वकील कर सके. दूसरी तरफ पुलिस और कानूनों को लागू करने वाली सरकार के पास वकीलों की भरमार होती है. अच्छे वकील सरकारी मामला हाथ में लेना चाहते हैं क्योंकि उन्हें उम्मीद रहती है कि जब सुप्रीम कोर्ट के जज को भी कमीशन का अध्यक्ष, राज्यसभा की मैंबरशिप, कहीं की उपराज्यपाल की गद्दी या मोटा पैसा मिल सकता है तो वे क्यों गरीब का मामला हाथ में ले कर अपनी पूरी जिंदगी स्वाहा करें.

आज सरकार तो किसी की भी सुनती नहीं है. वोट लेने के समय नेता घरघर जाते हैं पर सिनेमा के सितारों की तरह सिर्फ शक्ल दिखाने के लिए, यह भरोसा दिलाने के लिए नहीं कि उन की सत्ता आने पर उन के दरबार में आम आदमी की सुनवाई होगी. यह तो सिर्फ अदालतों में होता है जहां आम आदमी अपनी बात को कह तो सकता है, पर अब अदालतें निशाने पर हैं. यह आम आदमी के लिए खतरा है कि चाहे सुनवाई के दरबार में घुसने के लिए खर्च करना होता हो कम से कम मौका तो है, वह भी फिसल रहा है. सरकार, नेता, अफसर, कांस्टेबल, इंस्पैक्टर, पटवारी सब जनता को गुलाम बनाए रखना चाहते हैं और जो छोटी सी मोरी के साइज की खिड़की खुली थी वह भी अब छिपाई जा रही है. हम उस पौराणिक युग में जा रहे हैं जब दस्युओं से अमृत का घड़ा छीन लिया था, शंबूक का सिर काट दिया था, एकलव्य से अंगूठा ले लिया था. तब भी कोई सुनवाई नहीं थी, आज भी बंद की जा रही है.

Short Story: बरसात की एक रात

Short Story, लेखक- राजीव रोहित

थोड़ी देर पहले तक बरसात अपने शबाब पर था. रात के आठ साढ़े आठ बजनेवाले थे. अब बारिश की रफ्तार थोड़ी धीमी हो रही थी.

वे दोनों बस स्टॉप की एक शेड के नीचे खड़े थे.बहुत देर से एक भी बस नहीं आयी थी. आम कहानी के नायक और नायिका की तरह…! लड़की का जिक्र पहले…तो लड़की बेहद खूबसूरत..

चेहरे पर परिपक्वता भी स्पष्ट नजर आ रही थी. बारिश की बूंदे उसके चेहरे को सुंदरता और गरिमा दोनों प्रदान कर रही थीं.

फिलहाल परिस्थिति के अनुसार चेहरे पर चिंता छायी हुई थी. जो  उसकी उदासी को दर्शाने में कोई कसर नहीं छोड़ना चाहती थी.

सबसे खास बात यह कि वह गौर से बस स्टॉप पर खड़े एकमात्र सहयात्री पुरुष को देखे जा रही थी. सहयात्री पुरुष युवावस्था से थोड़ा बहुत आगे बढ़ चुका प्रतीत हो रहा था.

कपड़े उसने किसी युवा के समान ही चुस्त दुरुस्त पहन रखे थे.चेहरा एकदम साफ सुथरा. चिकना या चॉकलेटी कहें तो ज्यादा बेहतर होगा.बालों की शैली में दिलीप साहब, अमित जी और शाहरूख का बेमिसाल गठजोड़ दिखाई दे रहा था.गोरे चिट्टे भी थे.कुल मिलाकर उनके और उनके दोस्तों के हिसाब से उनके चेहरे में युवा तत्व अभी भी नजर आते थे.

लड़की वो भी अकेली…दुर्लभ संयोग था. उनके होंठो पर बरबस रफी साहब की मीठी आवाज में कभी ‘जिंदगी भर नहीं भूलेगी वो बरसात की रात’ गीत आ जा रहा था तो कभी किशोर दा का प्यारा सा मदहोश करनेवाला गीत ‘एक लड़की भीगी भागी सी’…उनकी आंखों से बरस पड़ने को तड़प रहा था.

उनका हृदय कभी या खुदा ये बरसात की रात कभी खत्म न हो.ताकि बन जाये एक नया खूबसूरत सा  रिश्ता !

लड़की अब भी उन्हें गौर से देखे जा रही थी. उनका दिल बेचैन हो रहा था.

‘क्या वो बात करना चाहती है?

‘क्या वो उन पर फिदा हो गयी है?’

‘क्या सचमुच एक नया रिश्ता बन जायेगा आज की रात?’

‘दोस्त उसे यूं ही नहीं कहते कि भाई किस चक्की का आटा खाते हो?

‘उम्र का पता ही नहीं चलता.‘

‘भाभी बहुत किस्मतवाली है.‘

‘विवाह पश्चात प्रेम संबंध क्या उचित होगा?’

‘लोग क्या कहेंगे?’

”पत्नी का तो दिल ही टूट जाएगा.गुस्से में कहीं तलाक का नोटिस भेज देगी तो फिर क्या होगा?

‘पता नहीं, प्रत्येक महीने में कितना हरजाना भरना पड़ेगा?’

‘समाज की  नजरों से गिरकर  वो कैसे जियेंगे?

इतना सोचेंगे तो मिल चुका जीवन में आनंद!

जो होगा वो देखा जाएगा.

इश्क और जंग में सब  जायज है.

इतिहास के पन्नों पर पहुँच गए.

दुनिया की जितनी मशहूर प्रेम कथाएँ हैं. उनमें किसी में भी मिलन-योग नहीं है.

तो क्या हुआ प्रेम-योग तो है.

फिल्मों में ऐसे ही नहीं दिखाते !पहली नजर में प्रेम…!

इस उधेड्बुन में फंसे थे कि  उनके कानों में मिश्री की डली में घुली आवाज पड़ी.

“क्या दो मिनट आपसे बात कर सकती हूँ ? आखिर चीर-प्रतीक्षित कामना पूर्ण हुई.

“हाँ-हाँ कहिए न?”

“जी मेरे मोबाईल की बैटरी डाउन हो गई है.क्या आपका फोन इस्तेमाल कर सकती हूँ.

घर  में जरा फोन करना था.“

“हाँ-हाँ, क्यों नहीं?घरवालों को चिंता तो हो ही रही होगी. बारिश का मौसम है. समय  भी

ज्यादा होता जा रहा है.“ उन्होने  फोन निकालकर उसे बड़े प्यार से दिया.

ऐसा करते समय उनका हाथ उसकी हथेलियों से छू  गया. इतना मखमली  स्पर्श…!

“थैंक्स.“ उसने फोन अपने हाथों में लिया.

“ जरा मेरा बैग पकड़िए न. अगर आप बुरा न मानें तो. उसमें रखी हुई डायरी में नंबर है.  “

कहते हुये उसने .बैग से डायरी निकालनी है.

‘घर का नंबर तो सबको याद रहता है. इसका अर्थ है यह भी चाहती है कि बातचीत का सिलसिला आगे बढ़े.

उन्होने बैग बड़ी नजाकत से पकड़ा.

उसने अंदर से एक छोटी सी प्यारी सी डायरी निकाली.

“पापा ने नंबर कल ही बदला है. इसलिए याद नहीं है. “ उसने मुस्कुराकर कहा.

‘अरे वाह! आने दो. उसके पापा से दोस्ती कर लूँगा. फिर घर तक पहुंचाना आसान हो जाएगा.‘

“हैलो पापा, मैं यहाँ बस स्टॉप पर एक घंटे से खड़ी हूँ.आप जल्दी आ जाओ. मैं एक भाई साहब के फोन से कर रही हूँ.मैं लोकेशन भेजती हूँ.“

‘ भाई साहब कहा… भैया नहीं… अंकल नहीं…धन्यवाद शहजादी.‘ उन्होने संतोष  की सांस ली.

“लीजिये. आपका  बहुत-बहुत शुक्रिया.आप इधर ही जॉब करते हैं?”

“ जी हा. और आप?”

“ मैं तो गलत नंबर की बस पकड़ने के कारण इधर आकर फंस गई. “

“ अच्छा हुआ. “ उनके मुंह से निकाल पड़ा.

“ कुछ कहा आपने?”

“ जी  नहीं.ये मेरा कार्ड है. रख लीजिये. कभी आपके काम आ सकूँ तो मुझे अच्छा लगेगा.“

“ मेरे पास कार्ड तो नहीं है. पर आपको नंबर देती हूं.नाम शालिनी लिखिएगा.

बड़े मनोयोग से उन्होने नाम और नंबर मोबाईल में फीड किया.

“ कहाँ  काम करते हैं आप?”

“ कार्ड में है. सेंट्रल गवर्नमेंट के ऑडिट डिपार्टमेन्ट में सीनियर ऑफिसर हूँ. “

“ बहुत बढ़िया.मेरे पापा भी…!”

उसकी बात अधूरी रह गई.

एक मोटर साईकिल आकर वहाँ रुकी.

मोटरसाईकिल सवार का हेलमेट उठाना था कि उनके लिए मानों कयामत आ गई.

“ अरे शर्मा जी आप! अच्छा हुआ. मैं तो घबरा रहा था कि पता नहीं कैसा आदमी है?

बेटी, ये शर्मा जी हैं. हमारे डिपार्टमेन्ट में हैं. दूसरे सेक्शन में बैठते हैं. शर्मा जी, कभी आइये न हमारे घर पर.

बिटिया बहुत अच्छी चाय बनाती है.“वो बड़े उत्साह में बोले जा रहे थे.

“ जी अच्छा . उन्होने मरी हुई आवाज में कहा.

लड़की की आँखों में अब शोख़ी और शरारत दोनों झलक रही थीं.

वो मोटर साईकिल में पीछे  बैठ गई.

“थैंक  यू अंकल … बाय अंकल.“

मोटरसाईकिल आगे बढ़ गई.

‘क्या दो बार अंकल कहना जरूरी था?उनका दिल भर आया था.

बड़ा अफसोस हो रहा था. सारे अरमान धरे के धरे रह गए.

चल खुसरो घर आपने.

बरसात भी अब पूरी तरह थम चुकी थी.

Family Story: सच्चाई – आखिर क्यों मां नहीं बनना चाहती थी सिमरन?

Family Story: पड़ोस में आते ही अशोक दंपती ने 9 वर्षीय सपना को अपने 5 वर्षीय बेटे सचिन की दीदी बना दिया था. ‘‘तुम सचिन की बड़ी दीदी हो. इसलिए तुम्हीं इस की आसपास के बच्चों से दोस्ती कराना और स्कूल में भी इस का ध्यान रखा करना.’’ सपना को भी गोलमटोल सचिन अच्छा लगा था. उस की मम्मी तो यह कह कर कि गिरा देगी, छोटे भाई को गोद में भी नहीं उठाने देती थीं. समय बीतता रहा.

दोनों परिवारों में और बच्चे भी आ गए. मगर सपना और सचिन का स्नेह एकदूसरे के प्रति वैसा ही रहा. सचिन इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए मणिपाल चला गया. सपना को अपने ही शहर में मैडिकल कालेज में दाखिला मिल गया था. फिर एक सहपाठी से शादी के बाद वह स्थानीय अस्पताल में काम करने लगी थी. हालांकि सचिन के पापा का वहां से तबादला हो चुका था. फिर भी वह मौका मिलते ही सपना से मिलने आ जाता था. सऊदी अरब में नौकरी पर जाने के बाद भी उस ने फोन और ईमेल द्वारा संपर्क बनाए रखा. इसी बीच सपना और उस के पति सलिल को भी विदेश जाने का मौका मिल गया. जब वे लौट कर आए तो सचिन भी सऊदी अरब से लौट कर एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में नौकरी कर रहा था.

‘‘बहुत दिन लगा दिए लौटने में दीदी? मैं तो यहां इस आस से आया था कि यहां आप अपनी मिल जाएंगी. मम्मीपापा तो जबलपुर में ही बस गए हैं और आप भी यहां से चली गईं. इतने साल सऊदी अरब में अकेला रहा और फिर यहां भी कोई अपना नहीं. बेजार हो गया हूं अकेलेपन से,’’ सचिन ने शिकायत की. ‘‘कुंआरों की तो साथिन ही बेजारी है साले साहब,’’ सलिल हंसा, ‘‘ढलती जवानी में अकेलेपन का स्थायी इलाज शादी है.’’

‘‘सलिल का कहना ठीक है सचिन. तूने अब तक शादी क्यों नहीं की?’’ सपना ने पूछा.

‘‘सऊदी अरब में और फिर यहां अकेले रहते हुए शादी कैसे करता दीदी? खैर, अब आप आ गई हैं तो लगता है शादी हो ही जाएगी.’’

‘‘लगने वाली क्या बात है, शादी तो अब होनी ही चाहिए… और यहां अकेले का क्या मतलब हुआ? शादी जबलपुर में करवा कर यहां आ कर रिसैप्शन दे देता किसी होटल में.’’

‘‘जबलपुर वाले मेरी उम्र की वजह से न अपनी पसंद का रिश्ता ढूंढ़ पा रहे हैं और न ही मेरी पसंद को पसंद कर रहे हैं,’’ सचिन ने हताश स्वर में कहा, ‘‘अब आप समझा सको तो मम्मीपापा को समझाओ या फिर स्वयं ही बड़ी बहन की तरह यह जिम्मेदारी निभा दो.’’ ‘‘मगर चाचीचाचाजी को ऐतराज क्यों है? तेरी पसंद विजातीय या पहले से शादीशुदा बालबच्चों वाली है?’’ सपना ने पूछा.

‘‘नहीं दीदी, स्वजातीय और अविवाहित है और उसे भविष्य में भी संतान नहीं चाहिए. यही बात मम्मीपापा को मंजूर नहीं है.’’

‘‘मगर उसे संतान क्यों नहीं चाहिए और अभी तक वह अविवाहित क्यों है?’’ सपना ने शंकित स्वर में पूछा. ‘‘क्योंकि सिमरन इकलौती संतान है. उस ने पढ़ाई पूरी की ही थी कि पिता को कैंसर हो गया और फिर मां को लकवा. बहुत इलाज के बाद भी दोनों को ही बचा नहीं सकी. मेरे साथ ही पढ़ती थी मणिपाल में और अब काम भी करती है. मुझ से शादी तो करना चाहती है, लेकिन अपनी संतान न होने वाली शर्त के साथ.’’

‘‘मगर उस की यह शर्त या जिद क्यों है?’’

‘‘यह मैं ने नहीं पूछा न पूछूंगा. वह बताना तो चाहती थी, मगर मुझे उस के अतीत में कोई दिलचस्पी नहीं है. मैं तो उसे सुखद भविष्य देना चाहता हूं. उस ने मुझे बताया था कि मातापिता के इलाज के लिए पैसा कमाने के लिए उस ने बहुत मेहनत की, लेकिन ऐसा कुछ नहीं किया, जिस के लिए कभी किसी से या स्वयं से लज्जित होना पड़े. शर्त की कोई अनैतिक वजह नहीं है और वैसे भी दीदी प्यार का यह मतलब यह तो नहीं है कि उस में आप की प्राइवेसी ही न रहे? मेरे बच्चे होने न होने से मम्मीपापा को क्या फर्क पड़ता है? जतिन और श्रेया ने बना तो दिया है उन्हें दादादादी और नानानानी. फूलफल तो रही है उन की वंशबेल,’’ फिर कुछ हिचकते हुए बोला, ‘‘और फिर गोद लेने या सैरोगेसी का विकल्प तो है ही.’’

‘‘इस विषय में बात की सिमरन से?’’ सलिल ने पूछा. ‘‘उसी ने यह सुझाव दिया था कि अगर घर वालों को तुम्हारा ही बच्चा चाहिए तो सैरोगेसी द्वारा दिलवा दो, मुझे ऐतराज नहीं होगा. इस के बावजूद मम्मीपापा नहीं मान रहे. आप कुछ करिए न,’’ सचिन ने कहा, ‘‘आप जानती हैं दीदी, प्यार अंधा होता है और खासकर बड़ी उम्र का प्यार पहला ही नहीं अंतिम भी होता है.’’

‘‘सिमरन का भी पहला प्यार ही है?’’ सपना ने पूछा. सचिन ने सहमति में सिर हिलाया, ‘‘हां दीदी, पसंद तो हम एकदूसरे को पहली नजर से ही करने लगे थे पर संयम और शालीनता से. सोचा था पढ़ाई खत्म करने के बाद सब को बताएंगे, लेकिन उस से पहले ही उस के पापा बीमार हो गए और सिमरन ने मुझ से संपर्क तक रखने से इनकार कर दिया. मगर यहां रहते हुए तो यह मुमकिन नहीं था. अत: मैं सऊदी अरब चला गया. एक दोस्त से सिमरन के मातापिता के न रहने की खबर सुन कर उसी की कंपनी में नौकरी लगने के बाद ही वापस आया हूं.’’ ‘‘ऐसी बात है तो फिर तो तुम्हारी मदद करनी ही होगी साले साहब. जब तक अपना नर्सिंगहोम नहीं खुलता तब तक तुम्हारे पास समय है सपना. उस समय का सदुपयोग तुम सचिन की शादी करवाने में करो,’’ सलिल ने कहा.

‘‘ठीक है, आज फोन पर बात करूंगी चाचीजी से और जरूरत पड़ी तो जबलपुर भी चली जाऊंगी, लेकिन उस से पहले सचिन मुझे सिमरन से तो मिलवा,’’ सपना ने कहा. ‘‘आज तो देर हो गई है, कल ले चलूंगा आप को उस के घर. मगर उस से पहले आप मम्मी से बात कर लेना,’’ कह कर सचिन चला गया. सपना ने अशोक दंपती को फोन किया. ‘‘कमाल है सपना, तुझे डाक्टर हो कर भी इस रिश्ते से ऐतराज नहीं है?  तुझे नहीं लगता ऐसी शर्त रखने वाली लड़की जरूर किसी मानसिक या शारीरिक रोग से ग्रस्त होगी?’’ चाची के इस प्रश्न से सपना सकते में आ गई.

‘‘हो सकता है चाची…कल मैं उस से मिल कर पता लगाने की कोशिश करती हूं,’’ उस ने खिसियाए स्वर में कह कर फोन रख दिया.

‘‘हम ने तो इस संभावना के बारे में सोचा ही नहीं था,’’ सब सुनने के बाद सलिल ने कहा. ‘‘अगर ऐसा कुछ है तो हम उस का इलाज करवा सकते हैं. आजकल कोई रोग असाध्य नहीं है, लेकिन अभी यह सब सचिन को मत बताना वरना अपने मम्मीपापा से और भी ज्यादा चिढ़ जाएगा.’’

‘‘उन का ऐतराज भी सही है सलिल, किसी व्याधि या पूर्वाग्रस्त लड़की से कौन अभिभावक अपने बेटे का विवाह करना चाहेगा? बगैर सचिन या सिमरन को कुछ बताए हमें बड़ी होशियारी से असलियत का पता लगाना होगा,’’ सपना ने कहा. ‘‘सिमरन के घर जाने के बजाय उस से पहले कहीं मिलना बेहतर रहेगा. ऐसा करो तुम कल लंचब्रेक में सचिन के औफिस चली जाओ. कह देना किसी काम से इधर आई थी, सोचा लंच तुम्हारे साथ कर लूं. वैसे तो वह स्वयं ही सिमरन को बुलाएगा और अगर न बुलाए तो तुम आग्रह कर के बुलवा लेना,’’ सलिल ने सुझाव दिया. अगले दिन सपना सचिन के औफिस में पहुंची ही थी कि सचिन लिफ्ट से एक लंबी, सांवली मगर आकर्षक युवती के साथ निकलता दिखाई दिया.

‘‘अरे दीदी, आप यहां? खैरियत तो है?’’ सचिन ने चौंक कर पूछा.

‘‘सब ठीक है, इस तरफ किसी काम से आई थी. अत: मिलने चली आई. कहीं जा रहे हो क्या?’’

‘‘सिमरन को लंच पर ले जा रहा था. शाम का प्रोग्राम बनाने के लिए…आप भी हमारे साथ लंच के लिए चलिए न दीदी,’’ सचिन बोला.

‘‘चलो, लेकिन किसी अच्छी जगह यानी जहां बैठ कर इतमीनान से बात कर सकें.’’

‘‘तब तो बराबर वाली बिल्डिंग की ‘अंगीठी’ का फैमिलीरूम ठीक रहेगा,’’ सिमरन बोली. चंद ही मिनट में वे बढि़या रेस्तरां पहुंच गए. ‘बहुत बढि़या आइडिया है यहां आने का सिमरन. पार्किंग और आनेजाने में व्यर्थ होने वाला समय बच गया,’’ सपना ने कहा. ‘‘सिमरन के सुझाव हमेशा बढि़या और सटीक होते हैं दीदी.’’

‘‘फिर तो इसे जल्दी से परिवार में लाना पड़ेगा सब का थिंक टैंक बनाने के लिए.’’ सचिन ने मुसकरा कर सिमरन की ओर देखा. सपना को लगा कि मुसकराहट के साथ ही सिमरन के चेहरे पर एक उदासी की लहर भी उभरी जिसे छिपाने के लिए उस ने बात बदल कर सपना से उस के विदेश प्रवास के बारे में पूछना शुरू कर दिया. ‘‘मेरा विदेश वृतांत तो खत्म हुआ, अब तुम अपने बारे में बताओ सिमरन.’’ ‘‘मेरे बारे में तो जो भी बताने लायक है वह सचिन ने बता ही दिया होगा दीदी. वैसे भी कुछ खास नहीं है बताने को. सचिन की सहपाठिन थी, अब सहकर्मी हूं और नेहरू नगर में रहती हूं.’’

‘‘अपने पापा के शौक से बनाए घर में जो लाख परेशानियां आने के बावजूद इस ने बेचा नहीं,’’ सचिन ने जोड़ा, ‘‘अकेली रहती है वहां.’’

‘‘डर नहीं लगता?’’

‘‘नहीं दीदी, डर तो अपना साथी है,’’ सिमरन हंसी. ‘‘आई सी…इस ने तेरे बचपन के नाम डरपोक को छोटा कर दिया है सचिन.’’ सिमरन खिलखिला कर हंस पड़ी, ‘‘नहीं दीदी, इस ने बताया ही नहीं कि इस का नाम डरपोक था. किस से डरता था यह दीदी?’’ ‘‘बताने की क्या जरूरत है जब रातदिन इस के साथ रहोगी तो अपनेआप ही पता चल जाएगा,’’ सपना हंसी. ‘‘रातदिन साथ रहने की संभावना तो बहुत कम है, मैं मम्मीजी की भावनाओं को आहत कर के सचिन से शादी नहीं कर सकती,’’ सिमरन की आंखों में उदासी, मगर स्वर में दृढ़ता थी. सपना ने घड़ी देखी फिर बोली, ‘‘अभी न तो समय है और न ही सही जगह जहां इस विषय पर बहस कर सकें. जब तक मेरा नर्सिंगहोम तैयार नहीं हो जाता, मैं तो फुरसत में ही हूं, तुम्हारे पास जब समय हो तो बताना. तब इतमीनान से इस विषय पर चर्चा करेंगे और कोई हल ढूंढ़ेंगे.’’

‘‘आज शाम को आप और जीजाजी चल रहे हैं न इस के घर?’’ सचिन ने पूछा.

‘‘अभी यहां से मैं नर्सिंगहोम जाऊंगी यह देखने कि काम कैसा चल रहा है, फिर घर जा कर दोबारा बाहर जाने की हिम्मत नहीं होगी और फिर आज मिल तो लिए ही हैं.’’

‘‘आप मिली हैं न, जीजाजी से भी तो मिलवाना है इसे,’’ सचिन बोला, ‘‘आप घर पर ही आराम करिए, मैं सिमरन को ले कर वहीं आ जाऊंगा.’’

‘‘इस से अच्छा और क्या होगा, जरूर आओ,’’ सपना मुसकराई, ‘‘खाना हमारे साथ ही खाना.’’ शाम को सचिन और सिमरन आ गए. सलिल की चुटकियों से शीघ्र ही वातावरण अनौपचारिक हो गया. जब किसी काम से सपना किचन में गई तो सचिन उस के पीछेपीछे आया.

‘‘आप ने मम्मी से बात की दीदी?’’

‘‘हां, हालचाल पूछ लिया सब का.’’

‘‘बस हालचाल ही पूछा? जो बात करनी थी वह नहीं की? आप को हो क्या गया है दीदी?’’ सचिन ने झल्ला कर पूछा. ‘‘तजरबा, सही समय पर सही बात करने का. सिमरन कहीं भागी नहीं जा रही है, शादी करेगी तो तेरे से ही. जहां इतने साल सब्र किया है थोड़ा और कर ले.’’ ‘‘इस के सिवा और कर भी क्या सकता हूं,’’ सचिन ने उसांस ले कर कहा. इस के बाद सपना ने सिमरन से और भी आत्मीयता से बातचीत शुरू कर दी. यह सुन कर कि सचिन औफिस के काम से मुंबई जा रहा है, सपना उस शाम सिमरन के घर चली गई. उस का घर बहुत ही सुंदर था. लगता था बनवाने वाले ने बहुत ही शौक से बनवाया था. ‘‘बहुत अच्छा किया तुम ने यह घर न बेच कर सिमरन. जाहिर है, शादी के बाद भी यहीं रहना चाहोगी. सचिन तैयार है इस के लिए?’’ ‘‘सचिन तो बगैर किसी शर्त के मेरी हर बात मानने को तैयार है, लेकिन मैं बगैर उस के मम्मीपापा की रजामंदी के शादी नहीं कर सकती. मांबाप से उन के बेटे को विमुख कभी नहीं करूंगी. प्रेम तो विवेकहीन और अव्यावहारिक होता है दीदी. उस के लिए सचिन को अपनों को नहीं छोड़ने दूंगी.’’

‘‘यह तो बहुत ही अच्छी बात है सिमरन. चाचाचाचीजी यानी सचिन के मम्मीपापा भी बहुत अच्छे हैं. अगर उन्हें ठीक से समझाया जाए यानी तुम्हारी शर्त का कारण बताया जाए तो वे भी सहर्ष मान जाएंगे. लेकिन सचिन ने उन्हें कारण बताया ही नहीं है.’’ ‘‘बताता तो तब न जब उसे खुद मालूम होता. मैं ने उसे कई बार बताने की कोशिश की, लेकिन वह सुनना ही नहीं चाहता. कहता है कि जब मेरे साथ हो तो भविष्य के सुनहरे सपने देखो, अतीत की बात मत करो. मुझे भी अतीत याद रखने का कोई शौक नहीं है दीदी, मगर अतीत से या जीवन से जुड़े कुछ तथ्य ऐसे भी होते हैं जिन्हें चाह कर भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, उन के साथ जीना मजबूरी होती है.’’ ‘‘अगर चाहो तो उस मजबूरी को मुझ से बांट सकती हो सिमरन,’’ सपना ने धीरे से कहा. ‘‘मैं भी यही सोच रही थी दीदी,’’ सिमरन ने जैसे राहत की सांस ली, ‘‘अकसर देर से जाने और बारबार छुट्टी लेने के कारण न नौकरी पर ध्यान दे पा रही थी न पापा के इलाज पर, अत: मैं नौकरी छोड़ कर पापा को इलाज के लिए मुंबई ले गई थी. वहां पैसा कमाने के लिए वैक्यूम क्लीनर बेचने से ले कर अस्पताल की कैंटीन, साफसफाई और बेबी सिटिंग तक के सभी काम लिए. फिर मम्मीपापा के ऐतराज के बावजूद पैसा कमाने के लिए 2 बार सैरोगेट मदर बनी. तब तो मैं ने एक मशीन की भांति बच्चों को जन्म दे कर पैसे देने वालों को पकड़ा दिया था, लेकिन अब सोचती हूं कि जब मेरे अपने बच्चे होंगे तो उन्हें पालते हुए मुझे जरूर उन बच्चों की याद आ सकती है, जिन्हें मैं ने अजनबियों पर छोड़ दिया था. हो सकता है कि विचलित या व्यथित भी हो जाऊं और ऐसा होना सचिन और उस के बच्चे के प्रति अन्याय होगा. अत: इस से बेहतर है कि यह स्थिति ही न आने दूं यानी बच्चा ही पैदा न करूं. वैसे भी मेरी उम्र अब इस के उपयुक्त नहीं है. आप चाहें तो यह सब सचिन और उस के परिवार को बता सकती हैं. उन की कोई भी प्रतिक्रिया मुझे स्वीकार होगी.’’

‘‘ठीक है सिमरन, मैं मौका देख कर सब से बात करूंगी,’’ सपना ने सिमरन को आश्वासन दिया. सिमरन ने जो कहा था उसे नकारा नहीं जा सकता था. उस की भावनाओं का खयाल रखना जरूरी था. सचिन के साथ तो खैर कोई समस्या नहीं थी, उसे तो सिमरन हर हाल में ही स्वीकार थी, लेकिन उस के घर वालों से आज की सचाई यानी सैरोगेट मदर बन चुकी बहू को स्वीकार करवाना आसान नहीं था. उन लोगों को तो सिमरन की बड़ी उम्र बच्चे पैदा करने के उपयुक्त नहीं है कि दलील दे कर समझाना होगा. सचिन के प्यार के लिए इतने से कपट का सहारा लेना तो बनता ही है.

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