बेरोजगार को न दें बेटी वरना आपको पड़ेगा पछताना

पटना से सटे नौबतपुर गांव का रहने वाला 27 साल का मनोज पंडित कोई नौकरी नहीं करता था, पर उस के घर वाले पिछले 2-3 सालों से उस पर शादी करने का दबाव बना रहे थे. उस के परिवार वालों की यह सोच थी कि जब मनोज की शादी हो जाएगी, तो उस के सिर पर जिम्मेदारियां बढ़ेंगी और उस के बाद वह कोई न कोई काम करने ही लगेगा. पर आज मनोज की शादी हुए 8 साल गुजर गए हैं और 35 साल का मनोज अभी भी बेरोजगार ही है. ज्यादा उम्र हो जाने और किसी तरह के काम का कोई तजरबा नहीं होने की वजह से अब उसे कोई काम मिलना मुश्किल ही लगने लगा है.

मनोज के दोस्तरिश्तेदार भी उसे सलाह देते हैं कि कोई छोटीमोटी दुकान खोल ले, जिस से कुछ कमाई हो सके, पर वह अब भी नौकरी पाने के लिए हाथपैर मार रहा है, लेकिन कामयाबी नहीं मिल रही है.

मनोज की बड़ी बेटी 6 साल की हो गई है और छोटा बेटा 4 साल का. बच्चों के बड़े होने के साथसाथ खर्च भी बढ़ता जा रहा है. मनोज के पिता की खेती की कमाई से ही मनोज, उस के बीवीबच्चों का गुजारा जैसेतैसे चल रहा है. मनोज को यह बात कचोटती रहती है कि उसे हर छोटे से छोटे खर्च के लिए अपने बूढ़े बाप का मुंह देखना पड़ता है.

समाज और परिवार में आमतौर पर यह सुनने को मिलता है कि शादी के बाद बीवी बच्चों की जिम्मेदारी आने के बाद लड़का कमाने ही लगता है. लोग यह मुफ्त की सलाह बांटते रहते हैं, ‘आप का बेटा कुछ काम कर रहा है या नहीं उस की शादी कर दो. सिर पर जिम्मेदारी आएगी, तो कमाने लगेगा. अमुक शख्स का बेटा कोई काम नहीं करता था, शादी होने के बाद उसे नौकरी मिल गई.’

कभी कोई यह कहता फिरता है कि उस का बेटा कम दिमाग है. वह ज्यादा पढ़लिख भी नहीं पाया. 40 साल की उम्र हो गई है. वह कुछ काम भी नहीं करता है. हो सकता है कि शादी के बाद उस के दिमाग में कुछ सुधार आ जाए और वह किसी कामधंधे पर लग जाए.

लड़का बेरोजगार है, कोई कामधंधा नहीं कर रहा है, तो उस के परिवार वाले उसे किसी रोजगार पर लगाने के बजाय उस की शादी करनेकराने पर जोर देते हैं. ऐसा करने के पीछे उन की यही सोच होती है कि शादी के बाद जवाबदेही और जिम्मेदारी सिर पर आएगी, तो कमाने लगेगा. पर परिवार वालों की इस सोच का अकसर उलटा ही नतीजा देखने को मिलता है.

बेरोजगार लड़के की शादी करने के बाद ज्यादातर मामलों में यही होता है कि एकसाथ कई जिंदगियां तबाह हो जाती हैं. सब से खराब हालत तो लड़की की ही होती है, जिस के मांबाप सबकुछ जानते हुए भी उस के गले में फटा ढोल बांध देते हैं और समझते हैं कि उन की जिम्मेदारी तो पूरी हो गई.

बेरोजगार पति अपनी पत्नी की जरूरतें भी पूरी नहीं कर पाता है और उसे घरपरिवार के तानेउलाहने भी सुनने पड़ते हैं. छोटीछोटी जरूरतों के लिए भी उसे सासससुर या मायके का मुंह देखना पड़ता है.

नागपुर शहर की रहने वाली गौतमी के मांबाप ने भी एक बेरोजगार लड़के से शादी करा कर उस की जिंदगी तबाह कर डाली. आज गौतमी अपनी बदहाली और समाज के उलाहनों को सुनसुन कर आंसू बहा रही है और उस के मातापिता भी सिर पीट रहे हैं.

कालेज की पढ़ाई के बाद बाकी लड़कियों की तरह गौतमी ने भी अपनी शादी के सपने देखे थे. वह खुद का घर बसाने की उधेड़बुन में लगी रहती थी. उस के सारे सपने उस समय टूट गए, जब उस की शादी एक कम दिमाग लड़के से तय कर दी गई.

गौतमी ऐसी शादी के लिए कतई तैयार नहीं थी, पर उस के मांबाप ने उसे समझाया कि लड़के का अपना मकान है. उस के पिता बड़े सरकारी अफसर हैं. गांव में भी काफी जमीनजायदाद है. लेकिन आज कोई भी गौतमी के काम नहीं आ रहा है.

मगध यूनिवर्सिटी के प्रोफैसर अरुण कुमार प्रसाद कहते हैं कि आज भी कई लड़की वाले लड़के की कमाई और आगे का कैरियर देखने के बजाय लड़के के पिता की कमाई के साथसाथ खानदानी जमीनजायदाद देख कर अपनी बेटी की शादी बेरोजगार लड़के से करने को तैयार हो जाते हैं.

ऐसी बेकार सोच वाले लड़की के मातापिता अपनी लाड़ली की जिंदगी को बसाने के बजाय बरबाद कर डालते हैं. उसे जिंदगीभर रोनेबिलखने के लिए छोड़ देते हैं.

बिहार के मुजफ्फरपुर जिले के कांटी ब्लौक की रहने वाली दीपिका साहू बताती है कि साल 2007 में उस की शादी पटना के एक लड़के से की गई. उस के पिता ने शादी में अच्छाखासा खर्च भी किया. शादी से पहले लड़के के बारे में पता किया गया, तो लड़के के पिता ने बताया था कि लड़का कोलकाता में चाय कंपनी में काम करता है और 30 हजार रुपए तनख्वाह मिलती है.

दीपिका के पिता जब लड़के के बारे में पता करने के लिए कोलकाता गए और लड़के के दफ्तर के पास पहुंच कर उस के मोबाइल फोन पर बात की, तो लड़के ने कहा कि वह बौस के साथ किसी काम से बाहर निकला हुआ है. आंधे घंटे में पहुंच जाएगा.

थोड़ी देर बाद लड़का वहां पहुंचा और उस ने दीपिका के पिता से सड़क पर खड़ेखड़े ही बातें कीं और कहा कि आज उस के दफ्तर में बहुत लोग आए हुए हैं, इसलिए वह उन्हें दफ्तर में नहीं बिठा सकता.
दीपिका के पिता को तसल्ली हो गई कि लड़का चाय कंपनी में काम करता है और घर वापस आ कर शादी की तैयारियों में जुट गए. शादी के बाद पता चला कि लड़का कहीं कोई नौकरी नहीं करता है. उस के परिवार वालों ने लड़की वालों को झांसे में रख कर शादी कर दी.

लड़के के मांबाप ने यह सोच कर उस की शादी करा दी कि उस के सिर पर परिवार का बोझ पड़ेगा, तो वह कमाने लगेगा, पर लड़का शादी के बाद भी मटरगश्ती में ही लगा रहा. उस की कई जगह नौकरी भी लगवाई गई, पर वह कहीं टिक ही नहीं सका.

पटना सिविल कोर्ट के पारिवारिक मामलों के वकील अभय कुमार बताते हैं कि अदालतों में ऐसे कई मामले सुनवाई के लिए पड़े हुए हैं, जिन में लड़की या उस के परिवार वालों ने लड़के वालों पर शादी के नाम पर धोखाधड़ी करने का केस दर्ज किया है.

बेरोजगार पति जबतब अपनी बीवी पर यह दबाव डालता रहता है कि वह मायके से रुपए मांग कर लाए. शादी के बाद लड़की अपने मांबाप से रुपए मांगने में शर्म महसूस करती है और अपने पिता को परेशान नहीं करना चाहती है. इसी बात को ले कर शुरू हुई तूतूमैंमैं झगड़े में बदलती है और फिर मामला घर की दहलीज से निकल कर कोर्ट तक पहुंच जाता है.

पुलिस अफसर अशोक कुमार कहते हैं कि बेरोजगार लड़के की शादी करने से उस के मांबाप को भी परहेज करना चाहिए और लड़की के मातापिता को चाहिए कि वे बेटी की शादी में कमाऊ लड़के को ढूंढ़ें, न कि लड़के के बाप की कमाई और दौलत को देख कर किसी नकारा के साथ बेटी का रिश्ता जोड़ दें. ऐसा कर के मांबाप एकसाथ कई जिंदगियों को तबाह कर डालते हैं.

इन बातों का रखें ध्यान
* बेटी की शादी पक्की करते समय लड़के का रोजगार जरूर देखें, न कि उस के बापदादा की कमाई देखें.

* लड़के की पढ़ाईलिखाई, नौकरी, तनख्वाह और उस के आगे के कैरियर का पता कर के ही बेटी की शादी तय करें.

* लड़के की तनख्वाह कम भी हो तो चलेगा, क्योंकि काम करने वाला तरक्की का रास्ता खुद बना ही लेता है.

* इस घिसीपिटी सोच को बदलें कि शादी के बाद लड़के पर जिम्मेदारियां आएंगी, तो वह कमाई करने लगेगा.

* अगर सही समय पर काम नहीं मिलता है, तो ज्यादातर लड़कों में बैठ कर खाने और बापदादा की कमाई पर मौज करने की आदत पड़ जाती है.

* अगर लड़के की नौकरी नहीं लग रही हो, तो उसे कोई दुकान, दूध का बूथ, साइबर कैफे वगैरह शुरू करने के लिए समझाएं. इस में कुछ शुरुआती माली मदद भी कर दें. कारोबार जमने के बाद ही उस की शादी के बारे में सोचें.

VIDEO : पीकौक फेदर नेल आर्ट

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रासिला ने ऐसा सोचा भी न था

आईटी क्षेत्र में बंगलुरु की इंफोसिस सौफ्टवेयर कंपनी का एक बड़ा नाम है. केरल की रहने वाली रासिला ओ.पी. इसी कंपनी के पुणे फेज-2 स्थित कंपनी में नौकरी करती थी. वह सौफ्टवेयर इंजीनियर थी. इस कंपनी के प्रोजेक्ट इतने महत्त्वपूर्ण होते हैं कि उन्हें पूरा करने के लिए कर्मचारियों और अधिकारियों को कभीकभी 24-24 घंटे तक काम करना पड़ता है. 29 जनवरी को रविवार था. शहर के अधिकांश औफिस और प्रतिष्ठान बंद थे. लेकिन इंफोसिस कंपनी का एक प्रोजेक्ट इतना अर्जेंट था कि उसे पूरा करने के लिए कर्मचारियों को रविवार को भी औफिस आना पड़ा था. इस प्रोजेक्ट को पूरा करने की जिम्मेदारी पुणे और बंगलुरु टीम को सौंपी गई थी. रासिला भी उस दिन इसी प्रोजेक्ट की वजह से औफिस आई थी. बंगलुरु में कुछ कर्मचारी अपनेअपने घरों में बैठ कर उस की मदद कर रहे थे.

कंपनी का प्रोजेक्ट लगभग पूरा हो गया था. केवल कुछ ही औपचारिकताएं बाकी रह गई थीं कि शाम 7 बजे अचानक रासिला और बंगलुरु टीम के बीच फोन और ईमेल से होने वाली बातचीत बंद हो गई. बंगलुरु के कर्मचारी समझ नहीं पाए कि अचानक यह क्या हो गया.

तमाम कोशिशों के बाद भी रासिला और बंगलुरु के कर्मचारियों के बीच जब संपर्क नहीं हो पाया तो उन के मन में तरहतरह की आशंकाएं जन्म लेने लगीं. उन्होंने पुणे के बड़गांव में रहने वाले इंफोसिस सौफ्टवेयर के सीनियर एसोसिएट कंसलटेंट और रासिला के प्रोजेक्ट रिपोर्टिंग मैनेजर अभिजीत कोठारी को फोन किया.

उन्हें सारी बातें बता कर रासिला के विषय में पता लगाने के लिए कहा. अभिजीत ने उसी वक्त रासिला को फोन लगाया. उस के फोन की घंटी तो बज रही थी, पर वह फोन नहीं उठा रही थी. इस के बाद उन्होंने पुणे फेज-2 स्थित कंपनी के औफिस के लैंडलाइन पर फोन किया.

फोन एक सिक्योरिटी गार्ड ने उठाया. उस ने अभिजीत को बताया कि वह ड्यूटी पर अभीअभी आया है. उस के पहले ड्यूटी पर सिक्योरिटी गार्ड भावेन सैकिया था. वह अपनी ड्यूटी पूरी कर के अपना चार्ज उसे दे कर चला गया है. अभिजीत कोठारी ने जब ड्यूटी पर मौजूद गार्ड से रासिला के बारे में पूछा तो गार्ड रासिला की केबिन में गया. इस के बाद उस गार्ड ने जो जानकारी दी, उसे सुन कर उन के पैरों तले से जमीन खिसक गई.

फिर क्या था, कुछ ही देर में अभिजीत कोठारी इंफोसिस के औफिस पहुंच गए. उन्होंने देखा कि औफिस के अंदर रासिला की खून से लथपथ लाश पड़ी थी. शव के आसपास काफी खून फैला था. चेहरा पूरी तरह किसी भारी और ठोस वस्तु से कुचला गया था. अभिजीत कोठारी ने मामले की जानकारी कंपनी के प्रमुख अधिकारियों और रासिला के परिवार वालों को देने के बाद थाना हिंजवाली पुलिस को दे दी थी.

थाना हिंजवाली के थानाप्रभारी अरुण वायकर अपने सहायकों के साथ तुरंत घटनास्थल पर पहुंच गए. हत्या की जानकारी अपने वरिष्ठ अधिकारियों को दे कर वह मामले की जांच में जुट गए. वह घटनास्थल का निरीक्षण कर रहे थे कि पुणे शहर के डीसीपी गणेश शिंदे, एसीपी वैशाली जाधव भी घटनास्थल पर आ गईं.

उन के साथ डौग स्क्वायड और फिंगरप्रिंट ब्यूरो के अधिकारी भी आए थे. सभी ने घटनास्थल का बारीकी से निरीक्षण किया तो पाया कि रासिला की हत्या की बड़ी बेरहमी से की गई थी. उस के गले में एक पीले रंग का तार लपेटा हुआ था. वह कंप्यूटर का तार था. पुलिस यह जानने की कोशिश करने लगी कि ऐसा कौन व्यक्ति हो सकता है, जिस ने इस की हत्या के बाद चेहरा तक कुचल दिया.

घटनास्थल की काररवाई पूरी कर के पुलिस ने लाश को पोस्टमार्टम के लिए पुणे के मसन अस्पताल भिजवा दिया. इस के बाद कंपनी के प्रोजेक्ट मैनेजर अभिजीत कोठारी की ओर से रासिला की हत्या का मुकदमा दर्ज कर मामले की जांच शुरू कर दी. शुरुआती जांच में पुलिस को पता चला कि रासिला जिस केबिन में बैठती थी, वह बेहद सुरक्षित थी.

उस का दरवाजा एक विशेष कार्ड के टच होने पर ही खुलता था. इस से पुलिस को यही लगा कि उस की हत्या में किसी ऐसे आदमी का हाथ है, जिस का उस केबिन में आनाजाना था. इस संबंध में पुलिस ने कंपनी के कर्मचारियों से पूछताछ की तो कंपनी का सिक्योरिटी गार्ड भावेन सैकिया पुलिस के शक के दायरे में आ गया. इस के बाद कंपनी के सीसीटीवी कैमरों की फुटेज देखी गई तो स्पष्ट हो गया कि सिक्योरिटी गार्ड भावेन ने ही रासिला की हत्या की थी.

एसीपी वैशाली जाधव के निर्देशन में जब पुलिस टीम सिक्योरिटी गार्ड भावेन के घर पर पहुंची तो वह घर पर नहीं मिला. उस के घर के दरवाजे पर ताला लगा था. पड़ोसियों ने बताया कि भावेन की मां की तबीयत अचानक खराब हो गई थी, इसलिए वह अपने गांव चला गया है. जिस सिक्योरिटी एजेंसी में उस की नियुक्ति थी, उस से संपर्क कर पुलिस ने भावेन के बारे में सारी जानकारी ले ली.

जहांजहां से भावेन के गांव जाने के साधन मिलते थे, उन सभी रास्तों पर नाकेबंदी करवा दी गई. इस के अलावा जांच टीम को 7 भागों में विभाजित कर उन्हें महानगर मुंबई और पुणे के विभिन्न इलाकों के लिए रवाना कर दिया गया. रासिला की हत्या पुणे पुलिस के लिए प्रतिष्ठा का प्रश्न बन चुकी थी. क्योंकि पिछले साल आईटी प्रोफेशनल महिला ज्योति कुमारी, नयना पुजारी, दर्शना टोगारी और अंतरा दास की कंपनी के सिक्योरिटी गार्डों द्वारा जिस तरह हत्याएं की गई थीं, उसे देख कर आईटी कंपनियों में काम करने वाली महिलाओं के भीतर डर का माहौल बन गया था.

इसलिए इस मामले का खुलासा करने के लिए वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों पर दबाव बढ़ गया था. यही वजह थी कि एसीपी वैशाली जाधव ने इस मामले की जांच अपने हाथों में ले ली थी. आखिरकार एसीपी वैशाली जाधव और उन की टीम की मेहनत रंग लाई और 8 घंटे की कोशिश के बाद सौफ्टवेयर इंजीनियर रासिला के हत्यारे भावेन सैकिया को महानगर मुंबई के छत्रपति शिवाजी रेलवे स्टेशन से गिरफ्तार कर लिया गया.

पुलिस टीम जिस समय छत्रपति शिवाजी रेलवे स्टेशन पहुंची थी, उस समय रात के लगभग 3 बज रहे थे. भावेन सैकिया अपना पूरा चेहरा कंबल के नीचे ढक कर टिकट खिड़की के पास बैठा खिड़की के खुलने का इंतजार कर रहा था. मुखबिर के इशारे पर पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया था.

सिक्योरिटी गार्ड भावेन सैकिया को ले कर पुलिस पुणे आ गई. उस से थोड़ी पूछताछ कर के उसे पुणे के प्रथम श्रेणी दंडाधिकारी ए.एस. वारूलकर के सामने पेश कर 4 फरवरी, 2017 तक की रिमांड पर ले लिया. पूछताछ में उस ने अपना जुर्म स्वीकार कर लिया. उस ने इस हत्याकांड की जो कहानी बताई, इस प्रकार निकली.

27 वर्षीय भावेन सैकिया मूलरूप से असम के गांव ताती विहार का रहने वाला था. उस के पिता ने 3 शादियां की थीं. भावेन सैकिया उन की तीसरी पत्नी का बेटा था. भावेन महत्त्वाकांक्षी के साथ पढ़ाईलिखाई में भी होशियार था.

उस का स्वभाव उग्र था. इस वजह से उस की अपने सौतेले भाइयों से नहीं पटती थी. 12वीं कक्षा में अच्छे अंक पाने के बाद उस ने स्नातक की पढ़ाई करनी चाही पर उस के सौतेले भाई नहीं चाहते थे कि वह पढ़े. किसी न किसी बात को ले कर वह उस से झगड़ने लगते थे. फिर एक दिन झगड़ा इतना बढ़ गया कि सन 2013 में उस ने अपने सौतेले भाई की हत्या कर दी. हत्या के बाद वह घर से फरार हुआ तो वापस गांव नहीं लौटा.

सन 2014 में वह पुणे पहुंच गया और वहां की एक सिक्योरिटी एजेंसी में सिक्योरिटी गार्ड के पद पर उस की नौकरी लग गई. कंपनी की तरफ से भावेन की तैनाती इंफोसिस सौफ्टवेयर कंपनी के औफिस में हो गई. उस ने औफिस के पास ही हिजवाड़ी जयरामनगर के फेज-3 में एक कमरा किराए पर ले लिया.

नौकरी के दौरान उस में काफी परिवर्तन आ गया था. औफिस में काम करने वाली लड़कियों को वह चाहत की निगाहों से देखता. खूबसूरत लड़कियां उस की कमजोरी बन गई थीं. किसी न किसी बहाने वह उन से बातें करता और उन्हें छूने की कोशिश करता था. इसी प्रकार की कोशिश जब उस ने रासिला ओ.पी. के साथ की तो उस ने भावेन की बात अनदेखी नहीं की, बल्कि उस से अपनी नाराजगी भी जता दी.

घटना के 2 दिन पहले रासिला ने भावेन सैकिया को अपने केबिन में बुला कर काफी डांटाफटकारा और उस की हरकतों की शिकायत ईमेल द्वारा उस की सिक्योरिटी कंपनी के वरिष्ठ अधिकारियों से करने की भी धमकी दी. इस धमकी से भावेन काफी डर गया था. उसे लग रहा था कि रासिला उस की शिकायत जरूर कर देगी. उस की शिकायत पर उसे अपनी नौकरी जाने का डर था.

24 वर्षीय रासिला ओझम पोईल पुराईत उर्फ रासिला ओ.पी. मूलरूप से केरल राज्य के कालीकट जिले के गांव कुदमंगलम की रहने वाली थी. उस के पिता ओझम पोईल पुराईत उर्फ राजू ओ.पी. होमगार्ड में एक तृतीय श्रेणी कर्मचारी थे. परिवार में उस के और पिता के अलावा एक बड़ा भाई तेजस कुमार ओ.पी. था. मां पुष्पलता का देहांत उस समय हो गया, जब छोटी थी. दोनों भाईबहन का बचपन बहुत ही गरीबी में बीता था. पिता से ही दोनों को मां का प्यार मिला था. घर की परिस्थतियों को देखते हुए दोनों बच्चों ने मन लगा कर पढ़ाई की.

रासिला और तेजस कुमार दोनों ने 98 प्रतिशत अंकों से 12वीं की परीक्षा पास की. इंजीनियरिंग की परीक्षाएं भी दोनों ने प्रथम श्रेणी से पास की थीं. इंजीनियरिंग के बाद तेजस कुमार को आबूधाबी की एयरलाइंस कंपनी में और रासिला की बंगलुरु की इंफोसिस सौफ्टवेयर कंपनी में असिस्टैंट इंजीनियर के पद पर नौकरी लग गई. अपने बच्चों को अच्छी जगह और अच्छे पद पर देख कर राजू ओ.पी. की सारी चिंताएं दूर हो गईं. रासिला की अच्छी पोस्ट देख कर तो उस की शादी के रिश्ते भी आने शुरू हो गए थे.

रासिला खूबसूरत तो थी ही, साथ ही वह कंपनी की जिस पोस्ट पर काम करती थी, उस की जिम्मेदारी भी अच्छी तरह निभा रही थी. अपने काम और व्यवहार से उस ने कंपनी के कई वरिष्ठ अधिकारियों के दिल में एक खास जगह बना ली थी. इस श्रेणी में एक बड़ा अधिकारी ऐसा था जो रासिला को अपने दिल में एक खास जगह देना चाहता था, पर रासिला को वह पसंद नहीं था. जिस के कारण वह अधिकारी रासिला से चिढ़ गया और उसे किसी न किसी बहाने परेशान करने लगा.

उस अधिकारी से परेशान हो कर रासिला ने कुछ वरिष्ठ अधिकारियों से उस की शिकायत कर दी. साथ ही अपना इस्तीफा भी दे दिया. लेकिन कंपनी ने उस का इस्तीफा स्वीकार नहीं किया. बल्कि कंपनी ने रासिला का ट्रांसफर इंफोसिस कंपनी की पुणे ब्रांच में कर दिया और पुणे के हिजवाड़ी के जयरामनगर फेज-1 में उस के रहने की व्यवस्था भी कर दी. पुणे ब्रांच में रासिला को आए अभी 5 महीने ही हुए थे कि उसे औफिस के सिक्योरिटी गार्ड भावेन सैकिया से दोचार होना पड़ा.

घटना के दिन सारा औफिस बंद होने के बावजूद भी कंपनी द्वारा सौंपे गए प्रोजेक्ट को पूरा करने के लिए रासिला को अपने औफिस आना पड़ा था. दिन के 2 बजे जब वह अपने औफिस में पहुंची तो काफी खुश थी. उस समय सिक्योरिटी गार्ड भावेन अपनी ड्यूटी पर तैनात था. रासिला ने अपने एक्सेस कार्ड से केबिन का लौक खोला और केबिन के अंदर जा कर अपने बंगलुरु ब्रांच के कुछ साथियों के साथ औनलाइन जुड़ कर अपने प्रोजेक्ट की तैयारी में जुट गई थी.

इधर रासिला की धमकी और अपनी नौकरी को ले कर भावेन काफी परेशान था. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करे क्या न करे. शिकायत को अपने वरिष्ठ अधिकारियों तक जाने से कैसे रोके इसी बारे में वह सोचने लगा. सोचविचार करने के बाद उस ने खतरनाक फैसला ले लिया.

उस समय रासिला औफिस में अकेली थी. बातचीत करने के लिए मौका अच्छा था. अपनी हरकतों की माफी मांगने के बहाने वह रासिला के केबिन में जाने में कामयाब हो गया. केबिन के अंदर पहुंचते ही उस ने रासिला से कहा, ‘‘मैडम, आप मेरी शिकायत मेरे अधिकारियों से नहीं करना वरना मेरी नौकरी चली जाएगी और मैं बेकार हो जाऊंगा.’’ वह गिड़गिड़ाया.

रासिला ने एक बार गार्ड के चेहरे को देखा. जिस पर मिलेजुले खौफ का असर स्पष्ट दिखाई पड़ रहा था. हालांकि रासिला ने उस की हरकतों को नजरअंदाज कर दिया था. लेकिन वह उसे थोड़ा और सबक सिखाना चाहती थी, जिस से वह सुधर जाए. इसलिए वह गंभीर होते हुए बोली, ‘‘नौकरी चली जाएगी, बेकार हो जाओगे तो मैं क्या करूं. तुम्हें  लड़कियों को परेशान करने का बड़ा शौक है न, अब भुगतो, मैं ने तो तुम्हारी शिकायत तुम्हारी कंपनी के सीनियर अधिकारियों को ईमेल से कर दी है. अब जाओ गांव में ही बैठना.’’

यह सुन कर भावेन का चेहरा क्रोध से तमतमा उठा. अपने आपे से बाहर होते हुए उस ने इंटरनेट का वायर खींच कर रासिला के गले में डालते हुए कहा, ‘‘मैडम, यह तुम ने अच्छा नहीं किया. अब तुम्हें इस की सजा तो भुगतनी ही पड़ेगी.’’

रासिला उस का इरादा जान कर अपने बचाव के लिए काफी चीखीचिल्लाई. पर उस वक्त उस की मदद के लिए वहां कोई नहीं था. उस ने उस इंटरनेट वायर से रासिला का गला घोंट दिया. उस की हत्या करने के बाद उस ने अपने बूटों से ठोकरें मारमार कर उस का चेहरा लहूलुहान कर दिया.

रासिला की हत्या करने के बाद जब भावेन का गुस्सा शांत हुआ तो वह बाहर आ कर आराम से अपनी जगह बैठ गया. उसे पुलिस और कानून का डर लगने लगा. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि वह अब कहां जाए. गांव जा नहीं सकता था, क्योंकि उस पर सौतेले भाई की  हत्या का आरोप था. पुणे और गांव की पुलिस से बचने के लिए उस के पास कोई रास्ता नहीं था. ऐसे में उसे बस आत्महत्या के अलावा और कोई चारा नहीं दिखा.

उस की ड्यूटी का टाइम भी पूरा हो चुका था. जैसे ही दूसरा सिक्योरिटी गार्ड शिफ्ट बदलने आया तो उसे जिम्मेदारी सौंप कर भावेन औफिस से निकल गया. आत्महत्या करने के लिए वह पुणे रेलवे स्टेशन पर पहुंचा ताकि किसी टे्रेन के सामने कूद कर जीवनलीला खत्म कर ले लेकिन ऐसा करने की उस की हिम्मत नहीं हुई.

फिर उस ने आत्महत्या करने के बजाय किसी दूसरे शहर में जाने का इरादा बनाया. अपने कमरे से उसे कुछ जरूरी सामान भी साथ लेना था. इसलिए कमरे पर पहुंच कर उस ने पड़ोसियों से झूठ कह दिया कि उस की मां की तबीयत खराब है. बैग में कपड़े आदि भर कर वह महानगर मुंबई के छत्रपति शिवाजी रेलवे स्टेशन पहुंचा. वहां से टिकिट ले कर उसे अपनी किसी मंजिल की ओर रवाना होना था. पर इस के पहले ही वह पुलिस के हत्थे चढ़ गया. भावेन मराली सैकिया से विस्तार से पूछताछ करने के बाद पुलिस ने न्यायालय में पेश कर उसे जेल भेज दिया.

पुलिस ने रासिला ओ.पी. के शव को पोस्टमार्टम के बाद उस के पिता राजू ओ.पी. और परिजनों को सौंप दिया. पिता और परिवार वालों का कहना था कि रासिला की हत्या एक साजिश के तहत इंफोसिस कंपनी के ही एक बड़े अधिकारी ने कराई है, जिस की शिकायत उन्होंने हिजवाड़ी पुलिस थाने में दर्ज करवा दी.

पुलिस ने उन्हें भरोसा दिया कि रासिला की हत्या के मामले में जो भी दोषी होगा, उस के खिलाफ सख्त काररवाई की जाएगी. मामले की जांच थानाप्रभारी अरुण वायकर कर रहे थे. कथा लिखे जाने तक भावेन सैकिया की जमानत नहीं हो सकी थी.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

नशेड़ी नहीं होते किसी के भी यार

9 अक्तूबर, 2016 की रात 10 बजे पंजाब के शहर जालंधर के कैंट इलाके की हाऊसिंग बोर्ड कालोनी अर्बन स्टेट फेज-1 में अपनी मां और नवविवाहिता पत्नी के साथ रहने वाला वरुण अरोड़ा जैसे ही रात का खाना खाने डाइनिंग टेबल पर बैठा, वैसे ही उस के मोबाइल फोन की घंटी बज उठी. वरुण ने फोन रिसीव किया तो फोन किस का है, यह न तो बगल में बैठी पत्नी डिंपल को पता चला न मां शशि अरोड़ा को. लेकिन धीरेधीरे शुरू हुई बातचीत एकाएक बहस का रूप धारण करते हुए झगड़े में बदल गई तो डिंपल ने कहा, ‘‘किस का फोन है, काट क्यों नहीं देते. पहले खाना खा लो, उस के बाद बात करना.’’

फोन काटने के बजाए वरुण हाथ से पत्नी को चुप रहने का इशारा कर के लगभग 7-8 मिनट तक फोन पर उसी तरह लड़ता रहा. इस के बाद वरुण ने फोन काटा तो पत्नी के साथ मां ने भी पूछा, ‘‘बेटा, किस का फोन था, किस बात को ले कर बहस हो रही थी?’’

‘‘आप नहीं जानती मां, है एक कमीना. मुझे धमकी दे रहा था. शायद अपनी औकात भूल गया.’’ वरुण ने कहा.

इस के बाद यह बात यहीं खत्म हो गई. खाना खाने के बाद डिंपल बरतन समेट कर रसोई में चली गई तो वरुण ने ड्राईंगरूम से ऐक्टिवा स्कूटर की चाबी ले कर कहा, ‘‘डिंपल, मैं जरा सिगरेट लेने जा रहा हूं. अगर तुम्हें कुछ मंगाना हो तो बता दो, मैं लेते आऊंगा.’’

‘‘नहीं, मुझे कुछ नहीं मंगाना. लेकिन आप जरा जल्दी आ जाइएगा.’’ डिंपल ने कहा.

‘‘सरकार का जो आदेश.’’ कह कर वरुण चला गया.

वरुण सिगरेट लेने चला गया तो शशि अरोड़ा अपने कमरे में जा कर लेट गईं. डिंपल भी रसोई का काम निपटा कर गिलास में दूध ले कर बैडरूम में आ गई और वरुण का इंतजार करने लगी. 10 बजे के करीब घर से निकला वरुण साढ़े 11 बजे तक नहीं लौटा तो डिंपल को चिंता हुई. उस ने वरुण के मोबाइल पर फोन कर के पूछना चाहा कि उसे देर क्यों हो रही है तो पता चला कि उस का फोन बंद है.

यह हैरान करने वाली बात थी. डिंपल ने न जाने कितनी बार वरुण को फोन किया, लेकिन हर बार एक ही जवाब मिला कि फोन बंद है. यह चिंता की बात थी, इसलिए वह सास के कमरे में जा पहुंची और उन्हें सारी बात बताई. घर में कोई दूसरा मर्द नहीं था, इसलिए सास के कहने पर उस ने वरुण के मामा राजीव नागपाल को फोन कर के वरुण के घर न आने की बात बताई तो उन्होंने कहा कि वह तुरंत आ रहे हैं.

वह पास में ही रहते थे, इसलिए पत्नी के साथ तुरंत आ गए. उन्होंने बहन और डिंपल को सांत्वना देते हुए कहा, ‘‘इतना भी परेशान होने की बात नहीं है. नईनई शादी हुई है, कोई खास यारदोस्त मिल गया होगा, पीने बैठ गया होगा.’’

‘‘नईनई शादी है, इसलिए इतनी रात को उसे घर पर होना चाहिए न कि दोस्तों के साथ.’’ शशि अरोड़ा ने कहा.

सास की इस बात पर डिंपल को रुलाई आ गई, क्योंकि उसे किसी अनहोनी की आशंका हो रही थी. राजीव नागपाल ने भी उन लोगों को सिर्फ सांत्वना देने के लिए यह बात कही थी, जबकि वह भी जानते थे कि यह समय दोस्तों के साथ बैठने का नहीं था. अंदर ही अंदर वह भी चिंतित और घबराए हुए थे.

बहरहाल, रात को ही सब ने हर उस जगह जा कर वरुण की तलाश कर ली, जहांजहां उस के मिलने की संभावना थी. खबर पा कर डिंपल के पिता करन पुरी भी परिवार के साथ बेटी के यहां आ गए थे. सभी वरुण की तलाश में लगे थे, लेकिन पूरी रात तलाश करने के बावजूद वरुण का कहीं पता नहीं चला था.

10 अक्तूबर, 2016 की सुबह साढ़े 6 बजे के करीब अर्बन एस्टेट से लगभग एक फर्लांग की दूरी पर स्थित सुरेंद्र सिंह के खेतों पर उन का नौकर रामू जानवरों के लिए चारा काटने गया तो ट्यूबवैल की पानी वाली हौदी के पास उस ने एक नौजवान की लाश पड़ी देखी.

लाश देख रामू घबरा गया. चारा काटना भूल कर वह सीधे सुरेंद्र सिंह की कोठी पर पहुंचा और उन्हें हौदी के पास लाश पड़ी होने की बात बताई. खेतों पर लाश पड़ी होने की बात सुन कर सुरेंद्र सिंह कुछ परिचितों को ले कर खेत पर पहुंचे और पानी की हौदी के पास लाश देख कर इस की सूचना थाना कैंट पुलिस को दे दी.

सूचना मिलते ही थानाप्रभारी इंसपेक्टर सुखदीप सिंह कुछ सिपाहियों को ले कर घटनास्थल पर पहुंच गए. चलने से पहले उन्होंने इस बात की सूचना अधिकारियों को भी दे दी थी, इसलिए उन के पहुंचने के कुछ देर बाद ही डीएसपी हरजीत सिंह क्राइम एक्सपर्ट टीम को ले कर पहुंच गए थे.

पुलिस घटनास्थल और लाश का निरीक्षण करने लगी. मृतक की उम्र 25-26 साल थी. उस का सिर फटा हुआ था और पूरे शरीर में छेद थे, जिन से अभी भी खून रिस रहा था. वह जींस और शर्ट पहने था, जो कई जगहों पर फटी हुई थी. लाश के पास ही नल का हत्था पड़ा था, जिस से पुलिस ने अंदाजा लगाया कि इसी हत्थे से मृतक के सिर पर वार किया गया था.

लेकिन वहां इस तरह का कोई औजार नहीं मिला, जिस से मृतक के शरीर में छेद किए गए थे. जहां लाश पड़ी थी, उस से लगभग सौ मीटर की दूरी पर घसीटने के निशान थे. इस से अंदाजा लगाया गया कि हत्या कहीं और कर के लाश यहां ला कर फेंकी गई थी.

अब तक हाऊसिंग बोर्ड कालोनी वालों को भी सुरेंद्र सिंह के खेत में लाश पड़ी होने की सूचना मिल गई थी. इस कालोनी में ज्यादातर फौजी रहते हैं. लाश मिलने की सूचना पा कर कालोनी के तमाम लोग वहां आ गए थे. उन्हीं लोगों ने लाश की शिनाख्त कर दी थी.

वह लाश ओमप्रकाश अरोड़ा के बेटे वरुण अरोड़ा की थी, जो रात से गायब था. पुलिस इस बात की जानकारी मृतक वरुण के घर वालों तक पहुंचाती, उस के पहले ही किसी ने शशि अरोड़ा को खबर दे दी थी. इस अनहोनी की खबर पा कर शशि अरोड़ा, उन की बहू डिंपल, भाईभाभी तथा समधीसमधन रोतेबिलखते घटनास्थल पर आ पहुंचे.

इस के बाद वहां रोनेचिल्लाने का ऐसा हृदयविदारक दृश्य बना कि देखने वाले भी अपने आंसू नहीं रोक पाए. जवान बेटे की लाश देख कर शशि अरोड़ा ही नहीं, उन की बहू डिंपल भी बेहोश हो गई थी. दोनों को अस्पताल भिजवाना पड़ा था.

थानाप्रभारी सुखदीप सिंह ने किसी तरह सभी को समझाबुझा कर बड़ी मुश्किल से हालात पर काबू पाया और अपनी काररवाई आगे बढ़ाते हुए लाश को पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल भिजवाया. इस के बाद थाने आ कर वरुण की हत्या का मुकदमा अज्ञात के खिलाफ दर्ज कर के जांच शुरू कर दी.

वरुण के हत्यारों तक पहुंचने के लिए सुखदीप सिंह ने एक पुलिस टीम बनाई, जिस में उन्होंने एसआई चरण सिंह, एएसआई जसवंत सिंह, गुरदीपचंद, हैडकास्टेबल कुलदीप सिंह, सुरेंद्रपाल, रामपाल और कांस्टेबल मलकीत सिंह को शामिल किया.

उन्हें अपने मुखबिरों से पता चला कि वरुण महंगा वाला नशा करता था. वह ऐसा नशा था, जिस में एक बार में ही हजार, डेढ़ हजार रुपए खर्च हो जाते थे. इतने महंगे नशे के लिए वरुण पैसे कहां से लाता था, यह सोचने वाली बात थी. कहीं नशापूर्ति के लिए वह किसी लूटपाट करने वाले गैंग में तो नहीं शामिल था. बंटवारे में कहासुनी हो गई हो और उस की हत्या कर दी गई हो.

पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार, सिर पर किसी भारी चीज की गंभीर चोट और सूजे से जगहजगह गोदे गए घावों से खून बह जाने की वजह से वरुण की मौत हुई थी. छाती पर लगे सूजे से उस के हार्ट में भी छेद हो गया था.

बहरहाल, वरुण के अंतिम संस्कार के बाद उस के घर वाले कुछ सामान्य हुए तो सुखदीप सिंह ने घर जा कर सभी से विस्तार से पूछताछ की. इस पूछताछ में जब उन्हें पता चला कि घर से निकलने से पहले वरुण की फोन पर किसी से कहासुनी हुई थी तो उन्हें जांच की दिशा मिल गई.

वरुण का फोन और जिस ऐक्टिवा स्कूटर से वह घर से निकला था, वह भी गायब था. सुखदीप सिंह ने वरुण का मोबाइल सर्विलांस पर लगवाने के साथ उस के नंबर की काल डिटेल्स निकलवाई तो पता चला कि रात 9 बज कर 38 मिनट पर उस के नंबर पर जिस नंबर से फोन आया था, उस पर 8 मिनट 38 सेकेंड बात हुई थी. इस के बाद उसी नंबर पर वरुण ने 10 बज कर 10 मिनट पर फोन किया था तो मात्र 57 सैकेंड बात हुई थी.

सुखदीप सिंह ने उस नंबर के बारे में पता किया तो वह नंबर स्पेयर पार्ट्स नाने वाली फैक्ट्री में काम करने वाले शिवप्रकाश का निकला. उन्होंने उसे थाने ला कर पूछताछ की तो उस ने बताया कि लगभग ढाई महीने पहले 25 अगस्त, 2016 को फैक्ट्री में काम करते समय उस का फोन चोरी हो गया था, जिस की उस ने थाने में रिपोर्ट भी दर्ज करा दी थी.

उस का कहना था कि वह किसी वरुण को नहीं जानता. हां, वह इतना जरूर जानता है कि उस का फोन अतुल ने चुराया था. सुखदीप सिंह ने उस से अतुल के बारे में पूछा तो उस ने कहा कि वह कई दिनों से गायब है. इस के बाद उन्होंने अतुल के पीछे अपने मुखबिरों को लगा दिया.

आखिर दिनरात मेहनत कर के उन्होंने पता लगा ही लिया कि अतुल, साहिल, शिवप्रकाश और वरुण एक साथ नशा करते थे. घटना वाली रात भी ये चारों रामामंडी चौक के पास देखे गए थे. यह जानकारी मिलने के बाद साफ हो गया कि शिवप्रकाश ने अपना पीछा छुड़ाने के लिए पुलिस से झूठ बोला था.

पुलिस शिवप्रकाश के घर दोबारा पहुंची तो वह घर से गायब मिला. इस के बाद पुलिस शिवप्रकाश, अतुल और साहिल की तलाश में लग गई. इस का नतीजा यह निकला कि मुखबिर की सूचना पर जालंधर बाईपास से साहिल और शिवप्रकाश को उस समय गिरफ्तार कर लिया, जब दोनों वैष्णो देवी जाने की फिराक में वहां खड़े थे. थाने ला कर दोनों से पूछताछ की गई तो उन्होंने बिना किसी सख्ती के वरुण की हत्या का अपराध स्वीकार कर लिया. उन्होंने बताया कि उन्हीं लोगों ने उस की हत्या कर लाश को खेतों में ले जा कर फेंक दिया था. हत्या में अतुल भी शामिल था. इस के बाद दोनों को अदालत में पेश कर के पूछताछ एवं सबूत जुटाने के लिए 2 दिनों के रिमांड पर लिया गया. पुलिस ने हत्या के इस मुकदमे में धारा 201, 34 और जोड़ दी थी. शिवप्रकाश और साहिल जालंधर के गढ़ा मोहल्ला में रहते थे, जबकि इन का फरार साथी अतुल रामामंडी में रहता था. तीनों ज्यादा पढ़ेलिखे नहीं थे. आवारा किस्म के ये युवक कहने को तो फैक्ट्रियों में काम करते थे, पर इन का असली काम नशे के लिए चोरीराहजनी करना था. क्योंकि ये ऐसा नशा करते थे, जो महंगा तो था ही, मिलता भी मुश्किल से था. यह ऐसा नशा है, जो न मिलने पर आदमी छटपटाने लगता है.

शिवप्रकाश एवं साहिल द्वारा की गई पूछताछ में वरुण की हत्या की जो कहानी सामने आई, वह अच्छेभले घर के एक युवक की नशे की लत लगा लेने के बाद आवारा युवकों के बीच फंस कर जान गंवाने की थी.

5 साल पहले वरुण के पिता ओमप्रकाश अरोड़ा की मौत हो चुकी थी. उस के बाद वह और उस की मां शशि अरोड़ा रह गई थीं. वह टाटा मोटरर्स कंपनी के शोरूम में नौकरी करता था. अगस्त, 2016 के आखिरी सप्ताह में जालंधर की ही बस्ती शेख के मोहल्ला सोहिया की रहने वाली डिंपल से उस की शादी हुई थी. वह शराब तो पहले से ही पीता था, इधर न जाने कैसे पिछले कुछ दिनों से उसे महंगे नशे की लत लग गई थी.

नशे के ही चक्कर में उस की मुलाकात साहिल से हुई तो दोनों साथ मिल कर नशा करने लगे. साहिल ने ही उस की मुलाकात अतुल और शिवप्रकाश से कराई थी. अतुल बेहद चालाक और मतलबी आदमी था. वह नशा तो करता ही था, जरूरतमंद लोगों को नशे का सामान बेचता भी था. बेचने के बाद नशे का जो सामान बच जाता था, उसी से अपनी जरूरत पूरी कर लेता था. यही वजह थी कि नशेड़ी उस के पीछे लगे रहते थे. वरुण भी उस से नशे का सामान खरीदता था. जब कभी उस के पास पैसे नहीं होते थे, अतुल उसे उधार भी नशे का सामान दे देता था. इस में मजे की बात यह थी कि उधार के उस नशे के सामान में अतुल ही नहीं, साहिल और शिवप्रकाश भी नशा करते थे. अतुल के वरुण पर इस समय भी 7-8 हजार रुपए उधार थे. अगस्त में जब वरुण की शादी हुई तो वह नशा छोड़ने की कोशिश करने लगा था, जिस से अतुल उस से अपने रुपए वापस मांगने लगा था.

जबकि वरुण कह रहा था कि अभीअभी उस की शादी हुई है, इसलिए उस के पास पैसे नहीं हैं. पैसे होते ही वह उस के पैसे लौटा देगा. यही नहीं, अतुल, साहिल और शिवप्रकाश चाहते थे कि वह नशा करना बंद न करे.

वरुण असमंजस की स्थिति में था. इधर नशे को ले कर बदनाम हुई पंजाब सरकार ने सख्ती की तो अतुल का धंधा बंद हो गया. इस के बाद चोरीराहजनी कर के वह अपनी नशे की लत पूरी कर रहा था. यही वजह थी कि उस ने वरुण पर पैसे लौटाने के लिए दबाव बनाया. एक तो वरुण के पास पैसे नहीं थे, दूसरी ओर वह अतुल से उधार का जो नशे का सामान लिया था, उस में सभी ने नशा किया था, इसलिए अब वह कहने लगा था कि जब नशा सब ने किया है तो वह अकेला सारा खर्च क्यों उठाए.

अतुल को जब लगा कि वरुण सीधे पैसे नहीं देगा तो उस ने उस से पैसा वसूलने के लिए एक योजना बनाई. उसी योजना के तहत उस ने 9 अक्तूबर, 2016 की रात फोन कर के पहले तो पैसे मांगे, जिस से दोनों में कहासुनी हो गई. उस के बाद उस ने कहा कि ईरान का बहुत बढि़या माल आया है, अगर वह खरीदना नहीं चाहता तो कोई बात नहीं, आ कर साथ में 2-4 कश मार कर देख ले. ईरान के माल के बारे में सुन कर वरुण के मुंह में पानी आ गया और वह खुद को रोक नहीं सका. खाना खाने के बाद सिगरेट लेने के बहाने वह घर से निकला और फोन कर के अतुल के पास बाईपास पर पहुंच गया. उस के साथ शिवप्रकाश और साहिल भी थे.

चारों बाईपास से कैंट स्थित खेतों में बैठ कर अतुल द्वारा लाए समान से नशा करने लगे. नशा करने के बाद एक बार फिर अतुल ने वरुण से पैसे मांगे तो बात झगड़े तक पहुंच गई. तीनों ने पहले से जो योजना बना रखी थी, उस के अनुसार उन्होंने वरुण के हाथपैर बांधने चाहे. अतुल का सोचना था कि वरुण की नईनई शादी हुई है, इसलिए उस के घर में काफी पैसा होगा. अगर वे उस का अपहरण कर लें तो घर वालों से फिरौती के रूप में मोटी रकम मिल सकती है. फिरौती मिलने के बाद वे उस की हत्या कर देंगे. वरुण जवान भी था और तगड़ा भी. इसलिए वह उन तीनों पर भारी पड़ा. जब उन्होंने देखा कि वे उसे काबू नहीं कर सकते तो अतुल ने वहां लगे हैंडपंप का हत्था निकाला और पूरी ताकत से उस के सिर पर वार कर दिया. उसी एक वार में वरुण का सिर फट गया और वह चकरा कर जमीन पर गिर पड़ा.

साहिल अपने साथ बर्फ तोड़ने वाला सूजा ले आया था. उस ने उसी सूजे से वरुण का पूरा शरीर गोद दिया. वरुण की मौत हो गई तो तीनों ने लाश को घसीट कर सुरेंद्र सिंह के खेतों में बनी पानी की हौदी के पास फेंक दिया. इस के बाद वे उस की ऐक्टिवा स्कूटर और मोबाइल फोन ले कर चले गए. वरुण की मौत होने के बाद अतुल की अपहरण कर फिरौती की योजना पर पानी फिर गया था. पूछताछ के बाद सुखदीप सिंह ने शिवप्रकाश और साहिल की निशानदेही पर वरुण की ऐक्टिवा स्कूटर और मोबाइल फोन बरामद कर लिया था. नल का हत्था पहले ही बरामद हो चुका था, बाद में सूजा भी बरामद कर लिया गया. रिमांड अवधि समाप्त होने के बाद 14 नवंबर को पुन: दोनों को अदालत में पेश किया गया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. वरुण की बुरी लत की वजह से एक नवविवाहिता की जिंदगी तो बरबाद हुई ही, शशि का बुढापे का सहारा भी छिन गया. कथा लिखे जाने तक अतुल पकड़ा नहीं जा सका था. पुलिस उस की तलाश कर रही थी.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

VIDEO : पीकौक फेदर नेल आर्ट

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धोखे में लिपटी मोहब्बत

9 जनवरी, 2017 को पश्चिम बंगाल के उत्तरी 24 परगना के रहने वाले 65 वर्षीय रामजी सिंह पटना के सचिवालय थाने पहुंचे तो उस समय इंसपेक्टर प्रकाश सिंह अपने कक्ष में बैठे कुछ जरूरी फाइलें निबटा रहे थे. रामजी सिंह उन के सामने खाली पड़ी कुरसी पर बैठ गए. इंसपेक्टर ने फाइलों को एक तरफ किया और रामजी सिंह से मुखातिब हुए. रामजी सिंह ने उन्हें बताया कि उन का बेटा विनोद कुमार सिंह पटना के सचिवालय में लघु सिंचाई विभाग में नौकरी करता है. वह अंतरराष्ट्रीय तैराक भी रह चुका है. जन्म से उस के दोनों हाथ नहीं हैं. पिछले 2 दिनों से उस का कहीं पता नहीं चल रहा है और उस का मोबाइल भी बंद है.

रामजी सिंह की बात सुन कर इंसपेक्टर प्रकाश सिंह चौंके. हाई प्रोफाइल मामला था और सचिवालय से जुड़ा हुआ भी. उन्होंने सारा काम छोड़ कर रामजी की पूरी बात सुनी. रामजी ने उन्हें आगे बताया कि 2 दिन पहले 7 जनवरी, 2017 को दोपहर को बेटे से उन की बात हुई थी. उस ने कहा था कि वह कुछ जरूरी काम से भागलपुर जा रहा है. काम निपटा कर वह वापस पटना लौट जाएगा.

उस के बाद से उस का फोन बंद बता रहा है. वह 2 दिनों से लगातार उस के मोबाइल पर फोन कर रहे थे, लेकिन उस से न तो बात हो सकी और न ही उस का कुछ पता चल रहा है.

मामला गंभीर था, इसलिए बिना देर किए प्रकाश सिंह ने इस मामले की जानकारी एसएसपी मनु महाराज और आईजी नैयर हसनैन खान को दे दी. मामला सचिवालय से जुड़ा होने की वजह से अधिकारियों के भी हाथपांव फूल गए. वे किसी तरह का जोखिम नहीं उठाना चाहते थे, इसलिए उन्होंने प्रकाश सिंह को उचित काररवाई करने के आदेश दिए.

त्वरित काररवाई करते हुए प्रकाश सिंह रामजी सिंह के साथ विनोद के कमरे पर पहुंचे. विनोद शास्त्रीनगर के राजवंशीनगर, रोड संख्या 6 के मकान नंबर 396/400 में अपने भांजे अंकित कुमार सिंह के साथ रहता था. प्रकाश सिंह ने सब से पहले अंकित से विनोद के बारे में पूछताछ की. लेकिन वह विनोद के बारे में कुछ खास नहीं बता सका तो उन्होंने कमरे में रखे विनोद के सामान की जांच की. तो उस में उन्हें विनोद की एक पुरानी डायरी मिली.

उस डायरी में भागलपुर के रहने वाले एक तैराक संजय कुमार का मोबाइल नंबर लिखा था. इस के अलावा वहां से ऐसी कोई चीज नहीं मिली, जिस से विनोद के बारे में कुछ पता चलता. प्रकाश सिंह ने यह बात एसएसपी मनु महाराज को बता दी. मनु महाराज ने उन्हें आदेश दिया कि एक पुलिस अफसर को भागलपुर भेज कर वहां से पता लगाने की कोशिश करें. इस पर उन्होंने रामजी सिंह के साथ एसआई अरविंद कुमार को भागलपुर भेज दिया.

10 जनवरी, 2017 को रामजी सिंह और एसआई अरविंद कुमार भागलपुर पहुंचे. संजय कुमार के मोबाइल पर संपर्क कर के वे उस के घर पहुंच गए. वह तिलकामांझी मोहल्ले में अपने निजी मकान में रहता था. उस से अरविंद कुमार ने विनोद के बारे में पूछताछ की तो उस ने जो जानकारी दी, उसे सुन कर दोनों हैरान रह गए.

संजय ने बताया कि 1 जनवरी, 2017 को विनोद रंजना नाम की एक लड़की से मिलने भागलपुर आया था. रंजना को ले कर उस की रंजना के बहनोई शंभू मंडल और उस के मौसेरे भाई बिट्टू से कहासुनी हुई थी. कहासुनी के बीच शंभू मंडल ने विनोद के गाल पर कई थप्पड़ मारे थे, साथ ही उस पर अपनी साली का मोबाइल चुराने का आरोप भी लगाया था. इस के बाद दोनों उसे ले कर तिलकामांझी थाने गए थे.

तिलकामांझी थाने के थानाप्रभारी विनोद को देख कर दंग रह गए थे, क्योंकि विनोद के दोनों हाथ नहीं थे. ऐसे में वह चोरी कैसे कर सकता था. थानाप्रभारी को शंभू और बिट्टू पर शक हुआ तो उन्होंने उन से पूछताछ की. उन्होंने कहा कि जिस के दोनों हाथ ही नहीं हैं, वह भला चोरी कैसे कर सकता है. यह कुछ और ही मामला लगता है.

उन्होंने शंभू से रंजना के बारे में पूछा तो उस ने कहा कि वह यहां नहीं है. हां, उस से बात करा सकता है. इस के बाद उस ने रंजना की थानाप्रभारी से बात कराई. रंजना ने उन्हें बताया कि विनोद ने उस का मोबाइल चुराया नहीं, बल्कि जबरन अपने पास रख लिया है, जिसे वह उसे लौटा नहीं रहा है.

थानाप्रभारी तिलकामांझी ने रंजना के मोबाइल के बारे में विनोद से पूछा तो उस ने कहा कि उस का मोबाइल उस के पास है. थानाप्रभारी ने विनोद से उस का मोबाइल लौटाने को कहा तो उस ने मोबाइल शंभू मंडल को लौटा दिया. शंभू मंडल और बिट्टू मोबाइल ले कर चले गए. थानाप्रभारी ने विनोद को समझाया कि वह अपने घर लौट जाए. ये अच्छे लोग नहीं हैं. उन दोनों के चले जाने के बाद थानाप्रभारी ने थाने के 2 सिपाहियों के साथ विनोद को स्टेशन पहुंचवा दिया. इस के आगे संजय कुछ नहीं बता सका.

संजय ने जो भी बताया था, उस की तसदीक करने के लिए एसआई अरविंद कुमार और रामजी सिंह तिलकामांझी थाने पहुंचे. वहां से पता चला कि संजय द्वारा दी गई जानकारी सही थी. सच्चाई जानने के बाद एसआई अरविंद कुमार ने रामजी सिंह से रंजना के बारे में पूछा.  वह केवल इतना ही बता सका कि रंजना राज्य स्तर की वौलीबाल खिलाड़ी थी. दोनों का एकदूसरे से परिचय खेल के माध्यम से ही हुआ था. 6 महीने पहले दोनों को पटना सचिवालय में एक साथ देखा गया था.

रामजी सिंह ने इस बारे में बेटे विनोद से पूछा था तो उस ने बताया था कि भागलपुर की रहने वाली वौलीबाल खिलाड़ी रंजना उस की दोस्त है. रामजी सिंह को इस से ज्यादा कुछ पता नहीं था. जो भी जानकारी मिली, उसी के आधार पर एसआई अरविंद कुमार को यह प्रेमप्रसंग का मामला लगा.

विनोद कुमार का मामला रहस्यमय ढंग से उलझ गया था. जब कोई सुराग हाथ नहीं लगा तो दोनों पटना लौट आए. 2 दिनों तक रामजी सिंह पटना में रह कर अपने स्तर से बेटे की तलाश करते रहे. उन्होंने दोस्तों, रिश्तेदारों और परिचितों के यहां पता लगाया, लेकिन विनोद का कहीं पता नहीं चला. जब कहीं से भी कोई जानकारी नहीं मिली तो उन्होंने 13 जनवरी को बेटे की गुमशुदगी थाना सचिवालय में दर्ज करा दी.

गुमशुदगी दर्ज होने के बाद पुलिस की काररवाई में तेजी आई. कई दिनों तक पुलिस विनोद की खोज करती रही. मुखबिर भी लगाए गए, फिर भी विनोद के बारे में कुछ पता नहीं चला. 21 जनवरी, 2017 को पुलिस ने अंतरराष्ट्रीय तैराक विनोद कुमार सिंह के अपहरण का मुकदमा अज्ञात के खिलाफ भादंसं की धारा 363, 365 और 34 के तहत दर्ज कर लिया.

मुकदमा दर्ज होने के बाद पुलिस ने विनोद की सुरागरसी में जमीनआसमान एक कर दिया. पूछताछ के लिए उस के कुछ दोस्तों को भी हिरासत में लिया गया, लेकिन इस से भी पुलिस के हाथ कुछ नहीं लगा. स्थानीय अखबारों ने दिव्यांग तैराक विनोद के अपहरण की खबरों को खूब सुर्खियों में उछाला, जिस से पुलिस की खूब छीछालेदर हो रही थी.

23 जनवरी, 2017 को भागलपुर के लोदीपुर थाने के थानाप्रभारी भारतभूषण ने सचिवालय थाने के थानाप्रभारी प्रकाश सिंह को फोन कर के बताया कि उन के थानाक्षेत्र में आने वाली कलवलिया नदी के किनारे झाड़ी में एक सड़ीगली लाश मिली है, जिस का हुलिया लापता विनोद कुमार सिंह से मिलता है.

सूचना मिलते ही रामजी सिंह, छोटे बेटे मनोज कुमार सिंह और एसआई अरविंद कुमार को साथ ले कर भागलपुर के थाना लोदीपुर पहुंचे. उन्होंने लाश देखी तो हतप्रभ रह गए. उस लाश का चेहरा बुरी तरह जला हुआ था. इस के बावजूद लाश देख कर रामजी सिंह ने उस की शिनाख्त अपने बेटे विनोद के रूप में कर दी.

विनोद की हत्या की सूचना मिलते ही उस के घर में कोहराम मच गया. उस की पत्नी वीणा और उस के दोनों बच्चों प्रियांशु और सोनाली का रोरो कर बुरा हाल हो रहा था. 17 दिनों से रहस्य बनी अंतरराष्ट्रीय तैराक विनोद कुमार सिंह की गुमशुदगी की कहानी हत्या के रूप में सामने आई.

मृतक विनोद के पिता रामजी सिंह ने बेटे की हत्या का आरोप राज्यस्तर की महिला वौलीबाल खिलाड़ी रंजना कुमारी, उस की मां सबरी देवी, पिता राधाकृष्ण मंडल उर्फ वकील मंडल, रंजना के मौसेरे भाई बिट्टू और बहनोई शंभू मंडल पर लगाया.

उन के आरोपों के आधार पर पटना पुलिस ने थाना लोदीपुर के थानाप्रभारी भारतभूषण की मदद से उसी दिन कोहड़ा गांव से रंजना कुमारी, सबरी देवी, राधा मंडल उर्फ वकील और शंभू मंडल को गिरफ्तरार कर लिया. पांचवां आरोपी बिट्टू घर से फरार था.

गिरफ्तार चारों आरोपियों को पटना पुलिस सचिवालय थाने ले आई. थाने में सचिवालय रेंज के एएसपी अशोक कुमार चौधरी ने उन से अलगअलग पूछताछ की. चारों आरोपियों ने अंतरराष्ट्रीय तैराक विनोद कुमार सिंह की हत्या की बात स्वीकार कर ली.

पुलिस ने अगले दिन चारों आरोपियों को अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. विनोद कुमार सिंह की हत्या के पीछे प्यार, धोखा और ब्लैकमेलिंग की कहानी कुछ ऐसे सामने आई—

36 वर्षीय विनोद कुमार सिंह मूलरूप से बिहार के सीवान जिले के बड़ा सिकवा गांव का रहने वाला था. उस के पिता रामजी सिंह पश्चिम बंगाल के उत्तरी 24 परगना जिले में रहते थे. विनोद के बाबा ने यहीं रह कर नौकरी की थी. तभी उन्होंने वहां मकान बनवा लिया था. तब से उन का परिवार यहीं रह रहा था. विनोद के पिता रामजी सिंह ने यहीं रह कर शिक्षा विभाग में नौकरी की थी और यहीं से सेवानिवृत्त हुए थे.

रामजी सिंह के 4 बच्चों में 2 बेटियां और 2 बेटे थे. बेटियों से छोटे विनोद कुमार सिंह और मनोज कुमार थे. विनोद पैदाइशी दिव्यांग था. कंधे से नीचे उस के दोनों बाजू नहीं थे. धीरेधीरे विनोद बड़ा हुआ. दोनों बाजू न होने की वजह से विनोद कभी मायूस या दुखी नहीं हुआ, बल्कि उस ने अपनी इसी कमजोरी को ताकत बनाया.

पैरों को उस ने हाथ बनाया. उन्हीं पैरों के सहारे वह अपने सारे दैनिक कार्य करता था. वह पैर के सहारे अपनी कमीज के बटन बंद करने से ले कर पढ़नेलिखने, यहां तक कि चकले पर बेलन के सहारे गोल रोटियां बेलने, चावल पकाने, पैरों से चम्मच के सहारे खाना खाने और कंप्यूटर चलाने जैसे सारे काम कर लेता था. उसे सिर्फ पैंट के बटन बंद करने में दूसरे की मदद लेनी पड़ती थी.

विनोद ने उत्तरी 24 परगना जिले के नइहट्टी कालेज से इंटरमीडिएट की पढ़ाई पूरी की और मगध विश्वविद्यालय गया से स्नातक. वह अपनी जिंदगी में कुछ बड़ा करना चाहता था. उस की मंजिल उसे तब मिली, जब उस ने कुछ लड़कों को पानी में तैराकी सीखते देखा.

इसी जिले के श्यामनगर में स्विमिंग क्लब था. यहां बच्चे तैराकी सीखने आते थे. विनोद भी अपने दोस्तों के साथ वहां आताजाता था. बच्चों को तैरता देख कर विनोद के मन में आया कि वह भी तैरना सीखेगा. वहां के कोच अशोक पाल थे. कोच से उस ने तैराकी सीखने की इच्छा जाहिर की. लेकिन उस के दोनों हाथ न देख कर कोच ने उसे तैराकी सिखाने से मना कर दिया.

कोच अशोक पाल की बातों का विनोद ने कतई बुरा नहीं माना, बल्कि उन की नकारात्मकता से उसे ऊर्जा मिली. विनोद ने उन से फिर आग्रह किया. कई दिनों की मिन्नतों के बाद कोच अशोक पाल उसे तैराकी सिखाने को तैयार हो गए. उन्होंने 4-5 लड़कों के साथ उसे पानी में उतार दिया. उन्होंने दूसरे लड़कों को हिदायत दी कि कोई भी उसे पकड़े न, देखें यह कैसे क्या करता है, बस इतना ध्यान रखना कि यह डूबने न पाए.

लड़कों ने वैसा ही किया. पहली बार पानी में उतरे विनोद ने दोनों पैरों के सहारे पानी में अद्भुत करतब दिखाए. विनोद के अदम्य साहस को देख कर सभी दंग रह गए. तैरने के लिए पहली बार पानी में उतरे विनोद ने कोच अशोक पाल का दिल जीत लिया. वह उसे तैराकी सिखाने को राजी हो गए. उन्होंने विनोद को तैराकी के गुर सिखाए.

धीरेधीरे वह इस कला में पारंगत हो गया. पहले जिला, फिर राज्य, फिर देश और विदेशों में जा कर उस ने अपने नाम का झंडा फहराया. उस ने 6 बार अंतरराष्ट्रीय तैराकी में मैडल और कई बार नेशनल तैराकी में मैडल जीते. बिहार सरकार ने सन 2012 में खेल कोटे से विनोद को पटना सचिवालय में लघु सिंचाई विभाग में नौकरी दे दी.

जिन दिनों तैराकी में विनोद कुमार के नाम का देशविदेश में डंका बज रहा था, उन्हीं दिनों उस की जिंदगी में वीणा कुमारी सिंह ने जीवनसंगिनी के रूप में कदम रखा. शादी के बाद विनोद 2 बच्चों बेटे प्रियांशु और बेटी सोनाली उर्फ गुनगुन का पिता बना. विनोद की जिंदगी खुशियों से भर गई. अब उसे किसी चीज की कमी नहीं थी.

बात सन 2013-14 की है. सामान्य कदकाठी और तीखे नैननक्श वाली गोरीचिट्टी, छरहरे बदन की रंजना पटना सचिवालय किसी काम से आतीजाती रहती थी. वह भी बिहार की राज्य स्तर की वौलीबाल खिलाड़ी थी. वह भी जीत के कई मैडल अपने नाम कर चुकी थी.

खेल के आधार पर उसे भी नौकरी मिलने वाली थी. उसी की औपचारिकता पूरी करने के लिए वह सचिवालय आयाजाया करती थी. सचिवालय में उन दिनों विनोद की नईनई नौकरी लगी थी. वहीं दोनों की पहली मुलाकात हुई. रंजना सुंदर भी थी और वाकपटु भी. विनोद पहली ही नजर में उसे दिल दे बैठा.

रंजना भागलपुर से एकदो दिनों के लिए पटना आती थी और अपना काम निपटा कर भागलपुर लौट जाती थी. रंजना जब भी सचिवालय आती, विनोद उस का खास खयाल रखता. वह सब से पहले उस का काम करा देता था. इसी बात से रंजना उस की मुरीद हो गई थी.

विनोद की आंखों में उस ने अपने लिए चाहत देख ली. उसे विनोद से मिलनाजुलना अच्छा लगने लगा. धीरेधीरे वह उस की ओर खिंची चली गई. विनोद भी रंजना के दिल में उतर गया था. दोनों के दिलों में मोहब्बत के शोले भड़कने लगे. जल्दी ही दोनों ने अपनी मोहब्बत का इजहार कर दिया.

शादीशुदा और 2 बच्चों का पिता होने की बात विनोद ने रंजना से छिपा ली थी. उस ने रंजना से खुद को कुंवारा बताया था. प्यार के सामने रंजना को विनोद की दिव्यांगता नजर नहीं आई. रंजना भागलपुर के लोदीपुर कोहड़ा गांव की रहने वाली थी. उस के पिता का नाम राधाकृष्ण मंडल उर्फ वकील था. वह स्वास्थ्य विभाग से सेवानिवृत्त हुए थे. रंजना उन की दूसरे नंबर की बेटी थी.

वह बड़ी हो कर कुछ ऐसा करना चाहती थी, जिस से नाम और शोहरत दोनों मिले. बचपन से ही उस का मन पढ़ाई के बजाए खेलकूद में लगता था. स्कूली पढ़ाई के दौरान वह स्कूल के किसी भी खेल में बढ़चढ़ कर हिस्सा लेती थी. इंटरमीडिएट के बाद उस ने वौलीबाल की ट्रेनिंग ली. उस के बाद उस ने खेल के मैदान में अपनी प्रतिभा का जादू दिखाया.

जिला स्तर से खेलती हुई रंजना ने राज्य में अपने नाम का परचम फहराया. उसे कई मैडल मिले. उस की खेल प्रतिभा की गूंज बिहार सरकार तक पहुंची तो सरकार ने उसे नौकरी देने का फैसला कर लिया. इसी सिलसिले में रंजना की सचिवालय में विनोद से मुलाकात हुई थी.

विनोद ने रंजना के सामने शादी का प्रस्ताव रखा तो वह इनकार नहीं कर सकी. दोनों ने चुपके से मंदिर में जा कर शादी कर ली. सात फेरों की उन की तसवीरें रंजना के मोबाइल में कैद थीं, लेकिन विनोद ने बड़ी चालाकी से उस का मोबाइल अपने कब्जे में ले लिया था, ताकि आगे चल कर वह इन तसवीरों को हथियार बना कर उसे अपनी बात मनवाने के लिए मजबूर न कर सके.

विनोद कुमार की देखरेख के लिए उस के साथ उस का भांजा अंकित कुमार सिंह रहता था. उसे भी इस शादी के बारे में पता नहीं चला था. विनोद ने यह बात अंकित से भी छिपा ली थी. इस की भनक उस ने न तो पत्नी वीणा को लगने दी थी और न ही पिता रामजी सिंह को. वीणा कभीकभार पटना आती थी और कुछ दिनों उस के साथ रह कर बंगाल लौट जाती थी.

शादी के बाद रंजना की नियुक्ति सीतामढ़ी के डीएवी इंटर कालेज में पीटी शिक्षक के रूप में हो गई थी. रंजना ने नौकरी जौइन की और सीतामढ़ी के डुमरा इलाके में किराए का एक कमरा ले कर अकेली रहने लगी. विनोद उस से मिलने सीतामढ़ी आताजाता रहता था. मजे की बात यह थी कि रंजना भी शादीशुदा थी, लेकिन उस ने भी अपनी शादीशुदा जिंदगी की बात सभी से छिपाए रखी थी. उस ने कभी अपनी मांग में सिंदूर नहीं भरा था. इसलिए लोग उसे कुंवारी ही समझते थे.

शादी के बाद रंजना विनोद को साथ ले कर कई बार अपने घर आई थी. विनोद का परिचय उस ने मांबाप से खिलाड़ी मित्र के रूप में कराया था. एकदो दिन घर रह कर वह विनोद के साथ लौट जाती थी. विनोद को जीवनसाथी चुन कर रंजना खुश थी. वह भी उसे खुश रखने के लिए पैसा पानी की तरह बहाता था.

जिस सच्चाई को विनोद छिपा रहा था, आखिरकार एक दिन उस की कलई रंजना के सामने खुल ही गई. विनोद की सच्चाई खुलते ही रंजना के ख्वाबों का महल रेत के महल के समान भरभरा कर ढह गया. विनोद इतना बड़ा धोखा देगा, उस ने कभी सपने में भी नहीं सोचा था. इस के बाद रंजना ने विनोद से दूरियां बना लीं.

अपनी गलतियों पर परदा डालने के लिए विनोद ने रंजना से संपर्क कर के उसे भरोसा दिलाने की काफी कोशिश की, लेकिन रंजना उस की चिकनीचुपड़ी बातों में नहीं आई. इतना ही नहीं, वह अपना मोबाइल उस से वापस लेने की जिद पर अड़ गई. मोबाइल में उस की जिंदगी का अहम राज छिपा था, जबकि विनोद उसे मोबाइल लौटाने से इनकार कर रहा था.

मोबाइल न मिलने से रंजना काफी परेशान थी. एक दिन रंजना अपनी बड़ी बहन विमला के यहां गई. वह काफी परेशान और उदास थी. उस की परेशानी और उदासी देख कर विमला से रहा नहीं गया. उस ने इस का कारण पूछा तो रंजना की आंखों से आंसू टपकने लगे और वह बहन के गले लिपट कर रोने लगी. विमला समझ नहीं पाई कि आखिर ऐसी क्या बात है.

आखिर रंजना ने सारी बातें बेझिझक बता दीं. रंजना की बात सुन कर विमला के पैरों तले से जमीन खिसक गई. रंजना ने जो गलती की थी, वह माफ करने लायक नहीं थी. बड़ी बहन ने उस के गाल पर 2 थप्पड़ रसीद कर दिए, साथ ही उसे काफी भलाबुरा भी कहा.

खैर, जो होना था हो चुका था. अब सवाल उस के निदान का था. शाम के वक्त काम से जब उस का पति शंभू मंडल घर लौट कर आया और साली रंजना को देखा तो उस की खुशी दोगुनी हो गई. रात का खाना सब ने एक साथ खाया. शंभू खाना खाने के बाद कमरे में सोने गया. उस के पीछे विमला भी आ गई. उस ने पति से रंजना की सारी बातें बता दीं. पत्नी की बात सुन कर शंभू का खून खौल उठा.

उस से रहा नहीं गया तो उस ने उसी समय ससुराल फोन कर के रंजना की करतूत अपनी सास सरबी देवी और ससुर राधाकृष्ण उर्फ वकील मंडल से बता दी. हकीकत जान कर मांबाप भी सिर पकड़ कर बैठ गए. वे यह सोच कर परेशान थे कि जब रंजना की सच्चाई बिरादरी वालों को पता चलेगी तो वे कौन सा मुंह दिखाएंगे. उन्होंने यह कह कर सब कुछ शंभू मंडल पर छोड़ दिया कि वह जो उचित समझे, करे.

सुबह हुई तो शंभू ने सब से पहले रंजना से बात की. बातचीत करने के बाद उस ने कुछ सोचा और रंजना से कहा कि उसे परेशान होने की जरूरत नहीं है. सब पहले की ही तरह ठीक हो जाएगा. वह अपनी नौकरी पर लौट जाए और मन लगा कर काम करे. जीजा की बातें रंजना को ठीक लगीं. उस ने वैसा ही किया.

रंजना सीतामढ़ी नौकरी पर लौट आई. इस बीच विनोद ने उस से फोन कर बात करने की कोशिश की, लेकिन रंजना ने उस से बात करने से साफ मना कर दिया. इस के बाद विनोद मोबाइल में सेव शादी की तसवीरें सार्वजनिक करने की धमकी दे कर उसे मानसिक रूप से प्रताडि़त करने लगा.

रंजना परेशान हो गई और घर वालों को सारी बातें बता दीं. बेटी की परेशानी देख कर सबरी देवी परेशान हो गई. उस ने दामाद शंभू से जल्द से जल्द कोई उचित कदम उठाने को कहा. इस बारे में शंभू मंडल ने रंजना के मौसेरे भाई बिट्टू, जो उसी के मोहल्ले में रहता था, से बात की. बिट्टू अपने इलाके का दबंग था.

बिट्टू और शंभू मंडल ने आपस में मिल कर रंजना की राह के कांटे को जड़ से उखाड़ने की योजना बना डाली. इस योजना में उन्होंने रंजना को भी शामिल किया. क्योंकि उस के बिना योजना को अंजाम नहीं दिया जा सकता था.

29 दिसंबर, 2016 को रंजना कालेज प्रशासन को धोखे में रख कर वहां से 2 दिनों की छुट्टी ले कर घर आई कि नया साल परिवार के साथ बिता कर लौट आएगी. घर आते समय उस ने किराए का कमरा खाली कर दिया था और सारा सामान ले कर भागलपुर चली आई थी.

30 दिसंबर को मां सबरी देवी और जीजा शंभू मंडल के कहने पर रंजना ने विनोद को नए साल को सेलिब्रेट करने के लिए भागलपुर बुलाया. रंजना के बुलाने पर विनोद 1 जनवरी, 2017 को भागलपुर आ गया.

अपने यहां आने की सूचना उस ने भागलपुर में रहने वाले अपने दोस्त संजय को दे दी थी. संजय विनोद के पास आ चुका था. विनोद को अपने साथ धोखे का अहसास तब हुआ, जब उस ने रंजना की जगह उस के बहनोई शंभू मंडल और बिट्टू को देखा.

शंभू मंडल और बिट्टू उसे रंजना के घर ले जाने के लिए अपने साथ ले कर निकले. लेकिन उसे वहां न ले जा कर तिलकामांझी थाने ले गए. संजय भी उन के साथ था. पहले से आगबबूला शंभू ने रास्ते में विनोद के गाल पर 4-5 थप्पड़ जड़ दिए थे. इस के बाद वह उसे थाने ले गया था.

थानाप्रभारी तिलकामांझी से उस ने मोबाइल चुराने की शिकायत की. विनोद के दोनों हाथ नहीं थे, उसे देख कर उन्होंने मामले को भांप लिया कि यह मामला चोरी का नहीं, बल्कि कुछ और है. जब थानाप्रभारी ने इस बाबत शंभू से पूछताछ की तो उस ने साली के मोबाइल चुराने की बात कही.

थानाप्रभारी के कहने पर उस ने अपनी साली रंजना की बात उन से करा दी. रंजना ने उन्हें बताया कि विनोद ने उस का मोबाइल चुराया नहीं है, बल्कि जबरन अपने पास रख लिया है और उसे लौटा नहीं रहा है. थानाप्रभारी ने विनोद से पूछा तो उस ने इस बात को सही बताया और रंजना का मोबाइल उसे लौटा दिया. मोबाइल ले कर दोनों थाने से चले गए और विनोद भी पटना लौट गया.

5 दिनों बाद 6 जनवरी, 2017 की शाम साढ़े 5 बजे के करीब शंभू मंडल ने विनोद को फोन किया. उस ने साली का जीवन बरबाद करने की बात कह कर उसे जान से मारने की धमकी दी.

विनोद शंभू मंडल की धमकी से डर गया. इस के ठीक आधे घंटे बाद शाम 6 बजे रामजी सिंह बेटे का हालचाल लेने के लिए फोन किया. ड्यूटी कर के औफिस से विनोद कमरे पर जा रहा था. पिता का फोन रिसीव कर के वह शंभू मंडल द्वारा जान से मारने की धमकी वाली बात बता कर रोने लगा.

वह काफी आतंकित लग रहा था. बेटे का रोना सुन कर उन्होंने उसे समझाया कि रोने के बजाए वह उसी समय उन के पास (बंगाल) आ जाए या फिर वही वहां आ जाएं. इस के बाद फोन कट गया. दरअसल विनोद ने रंजना से दूसरी शादी वाली बात घर वालों से छिपा ली थी. उस की इस नई कहानी से उस के घर वाले अनजान थे.

उस के एक घंटे बाद 7 बजे के करीब विनोद ने पिता को फोन कर के बताया कि वह भागलपुर रंजना की मां सबरी देवी से मिलने जा रहा है. उस के पास रंजना के मौसेरे भाई बिट्टू का फोन आया था. वह रंजना की मां से समझौता कराने की बात कह रहा था.

यह सुन कर रामजी सिंह का माथा ठनका. उन्होंने विनोद को वहां जाने से मना किया, लेकिन विनोद ने पिता की बात नहीं मानी और भागलपुर चला गया. वह औफिस से सीधे निकला था. फोन से ही उस ने अंकित को भागलपुर जाने की जानकारी दे दी थी. इसलिए उस के पास केवल बैग ही था. उस बैग में उस के सारे सर्टिफिकेट और टिफिन था.

7 जनवरी, 2017 की दोपहर 1 बजे भागलपुर पहुंच कर उस ने रामजी सिंह को फोन कर के अपने भागलपुर पहुंच जाने की सूचना दे दी. उस ने बिट्टू का वह नंबर भी उन्हें बता दिया था, जिस नंबर से उस ने उसे फोन किया था.

विनोद ने बिट्टू को फोन कर के बता दिया था कि वह भागलपुर पहुंचने वाला है. बिट्टू शंभू मंडल के साथ स्टेशन पहुंचा. दोनों ने उसे रिसीव किया. विनोद का बैग बिट्टू ने ले लिया था. तीनों एक ही मोटरसाइकिल पर बैठ कर रंजना के घर जाने के लिए निकले. लेकिन दोनों उसे वहां न ले जा कर सीधे कलवलिया नदी के किनारे ले गए. यह देख कर विनोद डर गया.

उस की समझ में आ गया कि उस के साथ धोखा हुआ है. उस ने भाग कर जान बचाने की कोशिश की, लेकिन उन के चंगुल से बच नहीं सका. शंभू और बिट्टू ने मिल कर उसे जमीन पर गिरा दिया. बिट्टू ने उस के दोनों पैर कस कर पकड़ लिए, जबकि मजबूत जिस्म वाला शंभू मंडल हाथों से विनोद के मुंह को तब तक दबाए रहा, जब तक उस का जिस्म ढीला नहीं पड़ गया.

अपनी संतुष्टि के लिए दोनों ने विनोद कुमार सिंह को हिलाडुला कर देखा. उस के जिस्म में कोई हरकत नहीं हुई. उस की लाश पहचानी न जा सके, इस के लिए शंभू मंडल ने साथ लाया तेजाब उस के चेहरे पर उड़ेल दिया और लाश को झाड़ी में फेंक दिया.

विनोद का सारा सामान उन्होंने नदी में डाल दिया और मोटरसाइकिल से अपने घर लौट गए. विनोद की हत्या की जानकारी उस ने सास सबरी देवी को दे दी थी. बेटी के रास्ते का कांटा साफ होने की खबर पा कर वह खुश थी. यह बात उस ने रंजना को नहीं बताई थी.

दूसरी ओर रामजी सिंह ने बेटे से बात करने के लिए शाम को जब उस के मोबाइल पर फोन किया तो उस के दोनों फोन बंद मिले. उन्होंने कई बार फोन किया, लेकिन हर बार उस का फोन बंद मिला तो वह घबरा गए.

2 दिनों बाद बेटे का पता लगाने वह पश्चिम बंगाल से पटना पहुंचे. उन्हें बेटे का कोई पता नहीं चला तो उन्होंने सचिवालय थाने में उस के अपहरण की रिपोर्ट दर्ज करा दी. मुकदमा दर्ज होने के बाद पुलिस हरकत में आई तो 17 दिनों से गायब विनोद की लाश भागलपुर में मिली.

नदी के किनारे झाड़ी के पास खेलते बच्चों की टोली ने सड़ीगली लाश देखी थी और शोर मचा दिया था. इस तरह मामला लोदीपुर थाने तक पहुंच गया.

23 जनवरी, 2017 को विनोद कुमार सिंह हत्याकांड के 4 आरोपी रंजना कुमारी, उस की मां सबरी देवी, पिता राधाकृष्ण उर्फ वकील और शंभू मंडल थाना लोदीपुर पुलिस की मदद से गिरफ्तार कर लिए गए. पांचवां आरोपी बिट्टू फरार था.

पूछताछ में शंभू मंडल ने पुलिस को बता दिया था कि विनोद का सारा सामान और मोबाइल उस ने नदी में फेंक दिया था. उस के बताए अनुसार पुलिस शंभू मंडल को भागलपुर ले गई, वहां विनोद के सामान की खोजबीन की, लेकिन उस का कोई सामान नदी से नहीं मिला.

पूछताछ के बाद चारों आरोपियों को अदालत में पेश किया गया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. चारों आरोपी जेल में बंद हैं. सचिवालय पुलिस ने बाद में इस मुकदमे को अपहरण की धाराओं से हत्या की धाराओं में बदल दिया था.

– कथा मृतक के परिजनों और पुलिस सूत्रों पर आधारित

कुरसी की आत्मकथा : हर जमाने में रहा जिसका जलवा

मैं कुरसी हूं. हर जमाने में मेरा जलवा रहा है. मुझे हसीनाओं से भी ज्यादा भाव मिले हैं. इतिहास की ज्यादातर लड़ाइयां मेरे लिए ही लड़ी गईं. मैं सब की प्रिय हूं, सभी मेरे लिए जान पर खेलने को तैयार रहते हैं. लोगों ने मुझे हासिल करने के लिए अपने अजीजों तक को मार डाला. पिता को कारागार में डाल दिया. दोस्तों से मुंह मोड़ लिया. मुझ से नाता तोड़ना बेहद मुश्किल है, भले ही अपनी बीवी से नाता टूट जाए. राजा, मंत्री, नौकरशाह, बाबू सभी के लिए मैं माननीय हूं. मुझे पाने के लिए राजनीति की बिसात बिछाई जाती है, तमाम हथकंडे अपनाए जाते हैं. राजतंत्र में बाहुबल व कूटनीति के जरीए मैं हासिल होती थी, मगर प्रजातंत्र में वोट ही मुझे पाने का जरीया है.

मैं नेताओं की पैदल यात्राओं, आंदोलनों, भूख हड़तालों का इनाम हूं. जिस ने मेरी अनदेखी की, उस की जिंदगी में अंधेरा छा गया. जिस ने भी मुझे लात मारी, वह दुनिया वालों की लात का शिकार बन गया. मेरे लिए लोकतंत्र का जनाजा उठाया जाता है, संविधान को ठेंगा दिखाया जाता है और कानून को नजरबंद कर दिया जाता है. मेरे लिए दो धु्रव एक हो जाते हैं, दुश्मनों में सुलह हो जाती है, शेर और मेमना जंगलराज बनाने के लिए मिलाजुला जतन करते हैं. मैं कुरसी हूं यानी सत्ता, हक, सहूलियत, ऐश्वर्य, ख्याति. मेरे सामने बड़ेबड़ों की बोलती बंद हो जाती है. ताकतवर भी लाचार हो जाते हैं. जानकार बेजान हो जाते हैं. मेरे लिए रातोंरात ईमान बदल जाते हैं. बैनर बदल जाते हैं. मैं ही हकीकत हूं और सब बकवास.

मैं ही घोषणापत्रों का सार और विपक्ष की टीस हूं. मुझे हासिल करते ही कंगाल मालामाल और मूर्ख अक्लमंद हो जाते हैं. मेरे छूने से अंधे देखने लगते हैं. गरीबी का नामोनिशान मिट जाता है. दौलत से घर भर जाते हैं. जुल्म मेरा औजार है, झूठ मेरा कवच, बेईमानी मेरी बुनियाद है, तिकड़मबाजी मेरा ईमान है, घडि़याली आंसू मेरे गहने हैं और भ्रष्टाचार मेरी औलाद है. मैं कुरसी हूं. राजा विक्रमादित्य को मुझ पर बैठने से पहले बेताल के मुश्किल और उलझाऊ सवालों के जवाब देने पड़े थे. मेरी ही खातिर औरंगजेब ने अपनों को भी मार डाला था. लोकतंत्र में मैदान और लड़ाई का तरीका बदल गया है. अब मुझे पाने के लिए जनता के सामने न निभाने वाले वादे करने पड़ते हैं, भूख हड़ताल और पैदल यात्राओं के भीड़खींचू नाटक करने पड़ते हैं, गुंडों की फौज रखनी पड़ती है और किराए पर ‘जिंदाबाद’ बोलने वाले लोग रखने पड़ते हैं.

मैं कुरसी हूं. जो मुझे पा लेता है, उसे कुछ पाने की ख्वाहिश नहीं रहती है. वह उम्रभर मेरा हो कर रह जाता है. मेरे पास आंख और कान नहीं हैं, इसीलिए मैं दुखियों की चीखें सुन नहीं पाती, भूखेनंगों की हालत देख नहीं पाती. मेरे पास कपटी दिमाग और मजबूत पैर हैं. मैं इन दोनों अंगों का भरपूर इस्तेमाल करती हूं. अपने दिमाग से ही मैं राजनीति की बिसात बिछाती हूं, विरोधियों के कुचक्र को नाकाम करती हूं और मजबूत पैरों से आगे वाली कुरसी पर बैठे विरोधियों को ठोकरें मारती हूं.  अपने ऊपर बैठने वाले को मैं रस से भर देती हूं. साहित्य के ठेकेदारों ने नौ रसों में जगह न दे कर मेरे साथ नाइंसाफी की है. शृंगार को रसराज कहा गया है, जबकि मेरे बगैर वह भी बेकार है, इसलिए साहित्य के ठेकेदारों को ‘कुरसी रस’ नामक एक नए रस का खुलासा कर देना चाहिए.

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स्कूल में बच्चों के ऊपर भाषा थोपना गलत

उत्तर प्रदेश की भाजपा सरकार नर्सरी से सभी सरकारी स्कूलों में अंगरेजी पढ़ाएगी तो केरल की वामपंथी सरकार निजी व सरकारी सभी स्कूलों में  10वीं तक मलयालम अनिवार्य कर रही है. अपनीअपनी खप्ती सोच पर जो नियम लागू किए जा रहे हैं उन का मातापिता या बच्चों पर क्या प्रभाव पड़ेगा, यह दोनों सरकारें जानने की भी इच्छुक नहीं हैं. अंगरेजी काम की भाषा है पर यह तो पक्का कर लें कि आखिर कितने लोग सही अंगरेजी पढ़, बोल और लिख पाते हैं? देश के प्राइवेट स्कूलों से निकले ज्यादातर बच्चे भी अंगरेजी में फिसड्डी रहते हैं, क्योंकि उन्हें अंगरेजी का ज्ञान कम ही होता है और रोजमर्रा की भाषा में चूंकि हिंदी व्याकरण का इस्तेमाल होता है, अंगरेजी के शब्दों या छोटे वाक्यों से काम चलाया जाता है.

अंगरेजी पढ़ कर देश का विकास हो जाएगा यह ऐसी ही मूर्खता है जैसे कहना कि संस्कृत पढ़ने से संस्कार सुधर जाएंगे. अमेरिका के अश्वेत, ब्लैक, लैटिनो अंगरेजी पढ़ते और बोलते हैं पर उन का आर्थिक स्तर बहुत कम है. वे अमेरिका की प्रगति का लाभ भी सिर्फ अंगरेजी जान कर न उठा पाए. अंगरेजी का ज्ञान होना विश्व के कितने ही और देशों में काफी फैला है पर विकास वहां न के बराबर है, क्योंकि उन के लिए अंगरेजी ऐसी ही है जैसे उत्तर भारतीयों के लिए हिंदी.

अंगरेजी के अल्फाबेट आना और छोटे वाक्यों का समझ आ जाना गलत नहीं है और अंगरेजी पढ़ाना इस दृष्टि से गलत नहीं है क्योंकि कंप्यूटर की भाषा अंगरेजी ही है और अब इसे कोई हटा नहीं सकता, पर अंगरेजी लिखनेपढ़ने या ज्ञान प्राप्त करने का सहारा नहीं बन सकती.

अगर सरकारें भाषा थोपेंगी तो यह गलत होगा. भाषा के मामले में सरकार को उदार होना चाहिए. हां, भाषा वर्ण या वर्ग व्यवस्था का जरिया न बने, कम से कम सरकार को यह खयाल रखना चाहिए. आज सरकार अधिकांश आदेश अंगरेजी या संस्कृतनिष्ठ हिंदी में जारी करती है जो ज्यादातर के पल्ले नहीं पड़ते. सरकार अंगरेजी विज्ञापनों पर ज्यादा महत्त्व देती है. हिंदी को जो स्थान मिला है वह उत्तर प्रदेश में न तो अंगरेजी पढ़ाने से कम होगा और न ही केरल में मलयालम पढ़ाने से मलयालम का स्थान और ऊंचा हो जाएगा. भाषा विचार और भाव प्रकट करने के लिए होती है और किसी भी एक या 2 भाषाओं पर महारत अच्छी है पर यह फैसला सरकारें न करें.

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‘धर्म’ और ‘सहानुभूति’ के सहारे भाजपा

गोरखपुर और फूलपुर में लोकसभा के उपचुनाव में हार के बाद भाजपा कैराना और नूरपुर को हल्के में नहीं लेना चाहती. दूसरी तरफ विपक्ष ने भाजपा की घेराबंदी करने का फैसला लिया है. अगर नूरपुर और कैराना में भाजपा को मात मिलती है तो 2019 के लोकसभा चुनाव में विपक्ष के एकजुट होने का रास्ता साफ हो जायेगा.

भाजपा को घेरने के लिये सपा-बसपा के साथ लोकदल खुल कर मैदान में है. कांग्रेस ने अभी अपने पत्ते नहीं खोले है पर विपक्षी एकता की हिमायती वह भी है. ऐसे में कैराना और नूरपुर को जीतना भाजपा के लिये सरल नहीं होगा. विपक्ष की घेराबंदी को तोड़ने के लिये भाजपा ने ‘धर्म’ और ‘सहानुभूति’ का सहारा लेने का फैसला किया है.

कैराना लोकसभा सीट भाजपा के सांसद हुकुम सिंह की मृत्यु के कारण रिक्त हुई है. भाजपा यहां से हुकुम सिह की बेटी मृगांका सिंह को टिकट दे रही है. नूरपुर विधानसभा की सीट विधायक लोकेन्द्र सिंह की सड़क दुर्घटना में मृत्यु के कारण खाली हुई है. लोकेन्द्र सिंह की मृत्यु सड़क दुर्घटना में हुई थी. उस समय वह नूरपूर से लखनऊ इंवेस्टर मीट में हिस्सा लेने जा रहे थे. लोकेन्द्र सिंह 2012 और 2017 में विधायक का चुनाव जीते थे. भाजपा अब वहां से लोकेन्द्र की पत्नी अवनी को चुनाव लड़ाने जा रही है.

असल में विपक्षी एकता से भाजपा के तोते उड़े हुये हैं. उसे फूलपुर और गोरखपुर की हार दिखाई दे रही है. ऐसे में भाजपा ने ‘सहानुभूति’ के साथ ही साथ ‘धर्म’ का सहारा लेने के लिये अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में जिन्ना की तस्वीर को लेकर विवाद को भड़का दिया. पश्चिम उत्तर प्रदेश में धर्म के नाम पर वोट पड़ते रहे हैं. भाजपा विपक्षी एकता की काट के लिये धर्म का सहारा लेने की योजना में है.

कैराना से समाजवादी पार्टी की तबस्सुम लोकदल के टिकट पर चुनाव लड़ेगी. नूरपुर से सपा नईमूल हसन चुनाव लड़ेंगे. सपा के नेता अखिलेश यादव और लोकदल के नेता जयंत चैधरी ने आपसी तालमेल से चुनाव लड़ने का फैसला किया है. बसपा यहां सपा और लोकदल के साथ है. कैराना में 2014 में जब हुकुम सिंह चुनाव जीते थे तो मोदी की लहर चल रही थी. उस समय भाजपा के हुकुम सिंह को 50 फीसदी वोट मिले थे. सपा को 29 फीसदी, बसपा को 14 फीसदी और लोकदल को 3 फीसदी वोट मिले थे. हुकुम सिंह का भाजपा के अलावा दूसरे वोट बैंक पर भी प्रभाव था. इसके बाद मोदी लहर का असर था.

हुकुम सिंह की बेटी मृगांका सिंह का क्षेत्र में कोई बहुत प्रभाव नहीं है. 2014 जैसी मोदी लहर भी नहीं है. ऐसे में कैराना जीतना भाजपा के लिये सरल नहीं होगा. भाजपा के लिये सबसे कड़ी चुनौती विपक्षी एकता भी है. ऐसे में केवल सहानुभूति लहर के बल पर चुनाव जीतना सरल नहीं है. कैराना जैसी हालत नूरपुर में भी है. वहां से 2 बार विधायक रहे लोकेन्द्र सिंह की पत्नी अवनी के लिये चुनाव जीतना सरल नहीं होगा. ‘मोदी-योगी’ की चमक गायब है. अवनी सिंह नेता नहीं हैं, ऐसे में केवल सहानुभूति लहर से जीत नहीं हासिल होने वाली.

विकास की बात करने वाली भाजपा अब अलीगढ़ के जिन्ना मुद्दे को उठा कर पश्चिम उत्तर प्रदेश का चुनाव जीतना चाहती है. 31 मई को कैराना और नूरपुर का चुनाव परिणाम आयेगा. इस बीच कर्नाटक विधानसभा चुनाव के परिणाम सामने होंगे. ऐसे में अगर कर्नाटक में भाजपा को जीत मिलती है तो उसका असर उत्तर प्रदेश के कैराना और नूरपुर उपचुनाव पर पड़ सकता है. अगर भाजपा कैराना और नूरपुर हारती है तो उत्तर प्रदेश में उसकी उखडती जड़ों पर मोहर लग जायेगी. 2019 में उसे आधी सीटे जीतना भी मुश्किल हो जायेगा.

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926 करोड़ की डकैती, जो हो नहीं पाई

पुलिस कांस्टेबल सीताराम की जयपुर की सी स्कीम के रमेश मार्ग स्थित एक्सिस बैंक की चेस्ट ब्रांच में ड्यूटी थी. 5 फरवरी की रात करीब 2 बजे वह बैंक की चेस्ट ब्रांच पर पहुंच गया. सीताराम जब पहुंचा तो बैंक का निजी सुरक्षा गार्ड प्रमोद मेनगेट पर तैनात था. सीताराम को आया देख कर प्रमोद ने उसे नमस्कार किया. सीताराम ने भी उस के अभिवादन का जवाब देते हुए पूछा, ‘‘प्रमोदजी, बैंक के अंदर आज ड्यूटी पर कौनकौन हैं?’’

कड़ाके की ठंड में रात में बैंक के बाहर ड्यूटी दे रहे प्रमोद ने जवाब में कहा, ‘‘साहब, रतिराम और मानसिंह ड्यूटी पर हैं.’’

‘‘ठीक है प्रमोदजी, उन दोनों से मेरी अच्छी पटरी बैठती है.’’ सीताराम ने अपनी टोपी सिर पर लगाते हुए कहा, ‘‘दोनों से बात करते हुए पता ही नहीं लगता कि कब रात गुजर गई.’’

कह कर कांस्टेबल सीताराम बैंक के अंदर जाने लगा, तभी जैसे उसे कुछ याद आया. उस ने पलट कर प्रमोद से कहा, ‘‘भैयाजी, ठंड ज्यादा पड़ रही है. रात का समय है. संभल कर होशियारी से ड्यूटी करना.’’

सीताराम की इस बात पर प्रमोद ने हंसते हुए कहा, ‘‘भाईसाहब, आप देखते ही हो कि मैं अपनी ड्यूटी पर किस तरह मुस्तैद रहता हूं.’’

प्रमोद की बात सुन सीताराम हंसते हुए अंदर बैंक में चला गया.

सीताराम ने बैंक के अंदर पहुंच कर देखा तो उस के साथी पुलिसकर्मी रतिराम और मानसिंह रेस्टहाउस में थे. सीताराम ने अपनी बंदूक संभाली और ड्यूटी पर खड़ा हो गया.

सीताराम को बैंक के अंदर आए हुए करीब आधा घंटा ही हुआ होगा कि उस ने बैंक के बाहर मेनगेट से किसी के कूद कर आने और कुछ टूटने जैसी आवाज सुनी. सीताराम चौंकन्ना हो गया. वह बैंक के अंदर बनी खिड़की से मुंह बाहर निकाल कर चिल्लाया, ‘‘कौन है?’’

सीताराम के चिल्लाने पर जवाब में कोई आवाज नहीं आई तो उस ने बाहर झांक कर देखा. उसे 4-5 लोग नजर आए. रात करीब ढाई बजे बैंक के अंदर लोगों को देख कर सीताराम एक बार तो घबरा गया, लेकिन तुरंत ही उस ने खुद को संभाला और हिम्मत से काम लेते हुए बंदूक ले कर थोड़ा बाहर तक आया.

बाहर देखा तो उसे 10 से भी ज्यादा लोग नजर आए. उन के हाथों में हथियार थे. किसी ने रूमाल से तो किसी ने मंकी कैप से और किसी ने मफलर से चेहरे ढंक रखे थे. इन में से 4-5 लोग बैंक का मेनगेट फांद कर अंदर आ गए थे. इन्होंने बैंक की बिल्डिंग का चैनल गेट भी खोल लिया था.

इतने सारे हथियारबंद लोगों को देख कर सीताराम समझ गया कि उन लोगों के इरादे ठीक नहीं हैं. वे बदमाश हैं और बैंक लूटने आए हैं. सीताराम ने इधरउधर देखा कि बैंक का गार्ड प्रमोद कहीं नजर आ जाए, लेकिन उसे वह कहीं नजर नहीं आया. सीताराम को लगा कि इन बदमाशों को नहीं रोका गया तो ये लोग बैंक लूट ले जाएंगे और हो सकता है किसी को मार भी डालें.

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सीताराम का समय पर लिया गया निर्णय सही साबित हुआ

सीताराम ने एक पल सोचा कि अंदर रेस्टहाउस से अपने साथी पुलिसकर्मियों रतिराम व मानसिंह को बुलाने जाए या नहीं. इतना समय नहीं था. अगर वह साथी पुलिसकर्मियों को बुलाने जाता तो हो सकता था तब तक बदमाश बैंक के अंदर चेस्टरूम तक पहुंच जाते. सीताराम ने तुरंत फैसला लिया. उस ने बदमाशों को ललकारा और अपनी बंदूक से हवाई फायर कर दिया.

फायर होते ही बदमाश हड़बड़ा गए और तेजी से मेनगेट फांद कर वापस भागने लगे. उन के साथी जो बैंक के बाहर खड़े थे, वे भी फटाफट वहां खड़ी गाड़ी में बैठ गए. इस के बाद सभी बदमाश गाड़ी से भाग गए.

बदमाशों के भागने पर सीताराम बैंक की बिल्डिंग से बाहर निकला तो देखा बाहर ड्यूटी पर तैनात बैंक के गार्ड प्रमोद के हाथपैर बंधे हुए थे. सीताराम ने उस के हाथपैर खोले. प्रमोद  बेहद घबराया हुआ था. वह सीताराम से लिपट कर बोला, ‘‘भाईसाहब, आज तो आप ने हमारी जान बचा ली वरना वे बदमाश हमें मार सकते थे.’’

सीताराम ने उसे ढांढस बंधाते हुए कहा कि चिंता मत करो, जो बदमाश आए थे, वे भाग गए हैं. तब तक हवाई फायर की आवाज सुन कर बैंक के रेस्टहाउस से पुलिसकर्मी रतिराम व मानसिंह भी वहां आ गए.

यह सारा घटनाक्रम मुश्किल से 3 मिनट में हो गया था. कांस्टेबल सीताराम ने सब से पहले फोन कर के पुलिस कंट्रोल रूम को सूचना दी. सूचना देने के 5-7 मिनट में ही पुलिस गश्ती दल बैंक के बाहर पहुंच गया.

पुलिस के गश्ती दल ने बैंक के निजी सुरक्षा गार्ड प्रमोद कुमार से पूछताछ की. करौली के रहने वाले प्रमोद ने बताया कि एक्सिस बैंक प्रशासन ने उसे बाहरी हिस्से में सुरक्षा की जिम्मेदारी दे रखी है.

प्रमोद ने पुलिस को बताया कि रात करीब ढाई बजे वह बैंक के बाहरी हिस्से में राउंड ले रहा था. जब वह पीछे की ओर चैकिंग करने गया था, तभी बैंक के आगे वाले हिस्से के गेट से किसी के कूदने की आवाज आई. इस पर वह मेनगेट की तरफ आया तो देखा कि 2 युवकों ने मुंह पर नकाब पहना हुआ था और उन के हाथों में पिस्तौलें थीं.

मैं उन्हें रोक ही रहा था कि 3 और युवक मेनगेट से बैंक के अंदर आ गए. उन लोगों ने पिस्तौल कनपटी पर लगा कर मुझे पकड़ कर नीचे गिरा दिया. मुझ से चाबी छीन ली, उसी चाबी से एक युवक ने चेस्ट ब्रांच के गेट से पहले वाले चैनल गेट का ताला खोल लिया. एक युवक ने मेरा मुंह बंद कर दिया और 2 युवक मेरे ऊपर बैठ गए. बाकी बचे एक युवक ने मेरे हाथ बांध दिए.

वे मेरे पैर बांध रहे थे, तभी बैंक के अंदर से सीताराम के चिल्लाने की आवाज आई. इस पर बदमाश घबरा गए. इस के कुछ सैकेंड बाद ही गोली चलने की आवाज सुनाई दी. गोली चलने की आवाज सुन कर सभी बदमाश बैंक के गेट को फांद कर बाहर भाग गए. प्रमोद ने बताया कि जो बदमाश बैंक के अंदर घुसे थे, उन्होंने आपस में कोई बात नहीं की थी. फायरिंग की आवाज सुन कर सिर्फ इतना कहा कि भागो यहां से. इस के बाद सीताराम ने आ कर मुझे संभाला और पुलिस को सूचना दी.

926 करोड़ रुपए थे लुटेरों के निशाने पर

रात को ही एक्सिस बैंक के अफसरों को मौके पर बुलाया गया. राजधानी जयपुर में बैंक लूटने के प्रयास की सूचना मिलने पर जयपुर पुलिस कमिश्नरेट के आला अफसर रात को ही मौके पर पहुंच गए. बैंक के अफसरों ने बताया कि राजस्थान में एक्सिस बैंक की सभी शाखाओं में इसी चेस्ट ब्रांच से पैसा जाता है.

पूरे राज्य से जमा हो कर पैसा भी इसी चेस्ट ब्रांच में आता है. बैंक अफसरों से पुलिस अधिकारियों को पता चला कि इस चेस्ट ब्रांच में वारदात के समय 926 करोड़ रुपए रखे हुए थे. इतनी बड़ी रकम की बात सुन कर पुलिस अफसर हैरान रह गए.

अगर पुलिस कांस्टेबल सीताराम हिम्मत दिखा कर गोली नहीं चलाता तो शायद बदमाश बैंक लूटने में कामयाब हो जाते. अगर यह बैंक लुट जाती तो यह भारत की अब तक की सब से बड़ी बैंक डकैती होती. सीताराम के गोली चलाने से यह बैंक डकैती होने से बच गई थी.

कांस्टेबल सीताराम की ओर से बदमाशों को ललकारने के लिए चलाई गई गोली बैंक के सामने बाईं ओर एक मकान की खिड़की में जा कर लगी. गोली लगने से खिड़की का कांच टूटा तो मकान मालिक और उन के परिवार की नींद खुल गई. उन्होंने बाहर आ कर पता किया तो बैंक में डकैती के प्रयास का पता चला. तब तक पुलिस भी मौके पर पहुंच गई थी.

पुलिस ने रात को जयपुर से बाहर निकलने वाले सभी रास्तों पर कड़ी नाकेबंदी करवा दी. 6 फरवरी को कांस्टेबल सीताराम की रिपोर्ट के आधार पर जयपुर के अशोक नगर थाने में मुकदमा दर्ज कर लिया गया.

6 फरवरी को सुबह से पुलिस और एक्सिस बैंक के आला अफसरों का मौके पर जमावड़ा लगा रहा. जयपुर के पुलिस कमिश्नर संजय अग्रवाल ने भी मौके पर पहुंच कर बैंक के सुरक्षा इंतजामों के बारे में जानकारी ली. पुलिस को जांचपड़ताल के दौरान 4 बड़े खाली कट्टे (बोरी) मिले. ये कट्टे बदमाश अपने साथ लाए थे, लेकिन गोली की आवाज सुन कर भागते समय छोड़ गए.

बदमाशों का पता लगाने के लिए पुलिस ने बैंक के अंदरबाहर और आसपास लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज देखी तो पता चला कि बदमाश 7 सीटर इनोवा गाड़ी से आए थे. इस गाड़ी से 11 बदमाश बाहर निकले और 2 बदमाश अंदर ही बैठे रहे. बाहर निकले सभी बदमाशों के चेहरे ढंके हुए थे. इन में से 4-5 बदमाशों के हाथ में पिस्तौल और बाकी के हाथों में डंडे और सरिए थे. इस इनोवा का नंबर तो साफ दिखाई नहीं दे रहा था, लेकिन राजस्थान के नागौर जिले की नंबर सीरीज जरूर नजर आ रही थी.

पुलिस की जांच में पता चला कि बैंक की इस चेस्ट ब्रांच में लिमिट से करीब 3 सौ करोड़ रुपए ज्यादा रखे हुए थे. नियमानुसार बैंक को यह राशि रिजर्व बैंक में जमा करानी चाहिए थी. यह बात सामने आने पर करेंसी चेस्ट में सुरक्षा मापदंडों को ले कर चूक और लिमिट से ज्यादा कैश रखने के मामले में रिजर्व बैंक के महाप्रबंधक करेंसी पी.के. जैन ने एक्सिस बैंक से रिपोर्ट मांगी.

बहरहाल, एक्सिस बैंक में देश की सब से बड़ी डकैती टल गई थी. कांस्टेबल सीताराम की सूझबूझ से बदमाशों को भागना पड़ा. सीताराम जयपुर का हीरो बन गया था. सीताराम की सतर्कता और बहादुरी से 926 करोड़ रुपए की बैंक डकैती टल जाने पर जयपुर पुलिस कमिश्नर संजय अग्रवाल ने राजस्थान के पुलिस महानिदेशक ओ.पी. गल्होत्रा से बात की और कांस्टेबल सीताराम को पुरस्कृत करने की सिफारिश की.

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पुलिस के लिए आसान नहीं था लुटेरों का सुराग ढूंढना

डकैती तो टल गई थी, लेकिन जयपुर पुलिस के लिए बैंक में घुसने वाले बदमाशों का पता लगाना सब से पहली चुनौती थी. इस के लिए पुलिस कमिश्नर संजय अग्रवाल ने अपने मातहत अधिकारियों की मीटिंग कर के वारदात के लिए आए बदमाशों का पता लगाने को कहा.

विचारविमर्श में यह बात सामने आई कि 7 सीटर इनोवा में 13 लोगों का बैठना आसान नहीं है. इस का मतलब बदमाशों के पास कोई दूसरा वाहन भी रहा होगा, लेकिन सीसीटीवी फुटेज में दूसरा वाहन नजर नहीं आ रहा था. इनोवा गाड़ी भी चोरी की होने या उस पर फरजी नंबर प्लेट होने की आशंका थी. इस बात पर भी विचार किया गया कि बैंक में वारदात करने से पहले बदमाशों ने रैकी जरूर की होगी. अगर उन्होंने रैकी की थी तो उन्हें इस बात का पता रहा होगा कि बैंक की इस चेस्ट ब्रांच में 3-4 पुलिसकर्मी हमेशा मौजूद रहते हैं.

एक सवाल यह भी उठा कि बदमाशों की संख्या करीब 13 थी और उन में 4-5 के पास पिस्तौल भी थी तो वे केवल एक गोली चलने से घबरा क्यों गए? बैंक में डकैती डालने की हिम्मत करने वाले बदमाश डर कर भागने के बजाय मरनेमारने पर उतारू हो जाते हैं. इस से संदेह हुआ कि बदमाश कहीं नौसिखिया तो नहीं थे. इस के अलावा बदमाशों को इस बात का अंदाजा नहीं था कि बैंक में 926 करोड़ रुपए होंगे.

पुलिस ने वारदात की जानकारी मिलने के तुरंत बाद जयपुर से बाहर निकलने वाले रास्तों पर नाकेबंदी कर दी थी. फिर भी बदमाशों का कोई सुराग नहीं मिला था. इस से यह बात भी उठी कि बदमाश जयपुर शहर के ही रहने वाले तो नहीं हैं.

पचासों तरह के सवालों का हल खोजने के लिए पुलिस कमिश्नर ने 4 आईपीएस अधिकारियों के सुपरविजन में एक दर्जन टीमें गठित कीं. इन टीमों में सौ से ज्यादा पुलिसकर्मियों को शामिल किया गया. अलगअलग टीमों को अलग जिम्मेदारियां सौंपी गईं.

पुलिस टीमों ने मुख्य रूप से बैंक कर्मचारियों और वहां तैनात गार्डों से पूछताछ, बैंक से रुपए लाने ले जाने वाली 3 निजी सिक्योरिटी एजेंसियों के मौजूदा और पुराने कर्मचारियों से पूछताछ, जयपुर से निकलने वाले रास्तों पर स्थित टोल नाकों पर सीसीटीवी फुटेज, जयपुर के आसपास हाइवे और कस्बों में स्थित होटल, ढाबों पर हुलिए के आधार पर बदमाशों की जानकारी हासिल करने, इस तरह की वारदात करने वाले गिरोहों की जानकारी जुटाने आदि बिंदुओं पर अपनी जांचपड़ताल शुरू की.

दूसरी ओर, पुलिस कमिश्नर ने रिजर्व बैंक में जयपुर के सभी पब्लिक सैक्टर और निजी सैक्टर के बैंक अधिकारियों, रिजर्व बैंक के अधिकारियों और गोल्ड लोन देने वाली कंपनियों के प्रतिनिधियों के साथ बैठक की. इस मीटिंग में पुलिस कमिश्नर ने कहा कि सभी बैंक सुरक्षा व्यवस्था के बारे में रिजर्व बैंक की गाइडलाइन का पूरी तरह पालन करें.

इस के अलावा उन्होंने सुरक्षा के खास प्रबंधों के साथसाथ अलार्म और हौटलाइन की आवश्यक व्यवस्था करने को भी कहा. कैश लाने ले जाने से पहले मौकड्रिल करने की भी बात की. उन्होंने राय दी कि बैंक के सीसीटीवी कैमरे अपग्रेड किए जाएं, जिन में कम से कम 90 दिन का बैकअप होना चाहिए. अलार्म सिस्टम भी जरूर लगाए जाएं.

हताशा में आशा की किरण नजर आई पुलिस को

वारदात के दूसरे दिन पुलिस के अधिकारी और जवान सभी बिंदुओं पर विचार कर जांचपड़ताल करते रहे, लेकिन यह भी पता नहीं चल सका कि बदमाश किस रास्ते से वापस गए. दूसरे और तीसरे दिन भी पुलिस को बदमाशों के बारे में कोई महत्त्वपूर्ण सुराग हाथ नहीं लगा. इस बीच जयपुर से पुलिस की टीमें नागौर, पाली, अजमेर, भीलवाड़ा, सीकर व झुंझुनूं आदि जिलों में गईं और संदिग्ध बदमाशों की तलाश की.

9 फरवरी को जयपुर पुलिस को इस मामले में उम्मीद की कुछ किरणें नजर आईं. कई जगह फुटेज में नजर आया कि बदमाशों की इनोवा गाड़ी के पीछे वाली बाईं ओर की लाइट टूटी हुई थी. इसी वजह से गाड़ी चलने पर यह लाइट नहीं जलती थी. इसी आधार पर पुलिस जयपुर से अजमेर की ओर टोल नाकों पर ऐसी इनोवा कार की तलाश में जुटी रही.

इसी दिशा में पुलिस आगे बढ़ी तो पता चला कि दूदू के पास एक बार के बाहर इनोवा कार रुकी थी. वहां लगे सीसीटीवी कैमरों में कुछ लोगों की तसवीर आ गई थी. इन लोगों ने कानों में सोने की मुर्की पहन रखी थीं. चेहरे भी ढंके हुए नहीं थे. इस से यह अंदाजा लगाया गया कि बदमाश जोधपुर-पाली की तरफ के हो सकते हैं. दूदू में होटल पर रुकने के बाद यह गाड़ी ब्यावर की ओर चली गई थी.

इसी बीच जांचपड़ताल में पता चला कि एक्सिस बैंक में बदमाश जो कट्टे छोड़ गए थे, वे पाली जिले की रायपुर तहसील के बर गांव में एक दुकान से खरीदे गए थे. इन कट्टों पर बर गांव की परचून की दुकान का नाम लिखा था. पुलिस उस दुकानदार तक पहुंची. हालांकि दुकानदार से बदमाशों के बारे में कोई जानकारी नहीं मिली, लेकिन इस से यह अंदाजा जरूर लग गया कि बदमाशों का पाली जिले से कोई न कोई संबंध जरूर था.

पुलिस को बदमाशों की इनोवा कार की लोकेशन ब्यावर तक मिल गई थी. इस बीच महाराष्ट्र के नंबरों का पता चलने पर एक पुलिस टीम महाराष्ट्र भेजी गई. ब्यावर से पुलिस टीम सीसीटीवी फुटेज के आधार पर इनोवा कार का पीछा करते हुए जोधपुर तक पहुंच गई.

10 फरवरी को पाली जिले की पुलिस को कुछ जानकारियां मिलीं. इस के अगले  दिन 11 फरवरी को जोधपुर पुलिस कमिश्नरेट के महामंदिर थानाप्रभारी सीताराम को सूचना मिली कि जोधपुर के कुछ बदमाश कहीं बाहर कोई बड़ी वारदात कर के आए हैं.

आखिर पकड़ में आ ही गए लुटेरे

इस पर जोधपुर पुलिस की एक टीम बदमाशों की तलाश में जुटी और शाम तक 6 बदमाशों प्रकाश जटिया, पवन जटिया, धर्मेंद्र जटिया, जयप्रकाश जटिया, दिनेश लुहार और प्रमोद बिश्नोई को पकड़ लिया. ये छहों लोग जोधपुर के रहने वाले थे. जोधपुर पुलिस कमिश्नर अशोक कुमार राठौड़ ने इस की सूचना जयपुर पुलिस कमिश्नर संजय अग्रवाल को दी. इस पर जयपुर से एक टीम रवाना हो कर रात को ही जोधपुर पहुंच गई.

पकड़े गए 6 बदमाशों से बाकी लुटेरों का भी पता चल गया. जयपुर व जोधपुर पुलिस उन की तलाश में जुट गई. 12 फरवरी को पुलिस ने 2 और बदमाशों को पकड़ लिया. इन में अनूप बिश्नोई को जोधपुर के बनाड इलाके से पकड़ा गया, जबकि झुंझुनूं के बदमाश विकास चौधरी को जैसलमेर से गिरफ्तार किया गया. विकास चौधरी आजकल जैसलमेर के शिकारगढ़ इलाके में रह रहा था.

लादेन था गिरोह का सरगना

इन बदमाशों से की गई पूछताछ में सामने आया कि लूट की योजना जोधपुर के ओसियां  के सिरमंडी निवासी हनुमान बिश्नोई उर्फ लादेन ने बनाई थी. लादेन ही इस गिरोह का सरगना है. लादेन ने जयपुर में एक्सिस बैंक की चेस्ट ब्रांच की रैकी कर रखी थी. तिजोरी के ताले तोड़ने के लिए उस ने प्रमोद बिश्नोई के सहयोग से जोधपुर की जटिया कालोनी के रहने वाले प्रकाश, पवन, धर्मेंद्र व जयप्रकाश को तैयार किया था.

तिजोरी तोड़ने के लिए ये बदमाश जोधपुर से ही औजार ले कर चले थे. हनुमान उर्फ लादेन इस योजना में प्रकाश बिश्नोई से बराबर का हिस्सा मांग कर पार्टनर बना था. बाकी बदमाशों को 20 हजार से 10 लाख रुपए तक का लालच दिया गया था. लादेन और प्रकाश ने अपने भाड़े के साथियों को यह नहीं बताया था कि जयपुर में बैंक लूटने जाना है. उन्हें बताया गया था कि जयपुर में हवाला की रकम लूटनी है.

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5 फरवरी को लादेन के नेतृत्व में 15 बदमाश जोधपुर से 2 गाडि़यों में सवार हो कर जयपुर के लिए चले. उन्होंने रास्ते में जयपुर-अजमेर के बीच दूदू के पास एक गाड़ी छोड़ दी. इनोवा गाड़ी से सभी बदमाश उसी रात जयपुर पहुंचे और एक्सिस बैंक की चेस्ट ब्रांच पर धावा बोल दिया. बैंक में तैनात पुलिस कांस्टेबल के गोली चलाने से सभी बदमाश डर कर भाग निकले थे.

प्रकाश बिश्नोई जनवरी 2014 में राइकाबाग में रोडवेज बस स्टैंड पर रात्रि गश्त कर रहे पुलिस के एक एएसआई राजेश मीणा की हत्या का भी अभियुक्त था. पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर जेल भेज दिया था. घटना के समय वह जमानत पर छूटा हुआ था.

पुलिस को लादेन के अन्य साथियों के नामपता चल गए हैं. कथा लिखे जाने तक जयपुर व जोधपुर पुलिस उस की तलाश में जुटी थी. गिरफ्तार किए गए आठों बदमाशों को पुलिस जोधपुर से जयपुर ले आई. बदमाशों से उन के साथियों और आपराधिक वारदातों के बारे में पूछताछ की गई.

सीताराम को किया गया सम्मानित

एक्सिस बैंक में लूट के प्रयास के दौरान उपयोग किए गए हथियारों के बारे में भी पता लगाया गया. गिरफ्तार व फरार बदमाशों का आपराधिक रिकौर्ड भी खंगाला गया. यह भी पता लगाया गया कि इस वारदात में बैंक के किसी नएपुराने कर्मचारी का सहयोग तो नहीं था.

देश की सब से बड़ी बैंक लूट की वारदात को विफल करने का हीरो कांस्टेबल सीताराम ही रहा. हालांकि जयपुर पुलिस ने वैज्ञानिक तरीकों से जांचपड़ताल के जरिए बदमाशों को पकड़ कर अपनी साख जरूर बचा ली.

यह भी दिलचस्प रहा कि 11 फरवरी को जोधपुर में जब 6 बदमाश पकड़े जा रहे थे, उसी समय जयपुर में राजस्थान के पुलिस महानिदेशक ओ.पी. गल्होत्रा ने कांस्टेबल सीताराम को हैडकांस्टेबल के पद पर विशेष पदोन्नति दी. जयपुर पुलिस कमिश्नरेट में आयोजित समारोह में पुलिस महानिदेशक ने कहा कि ड्यूटी के दौरान उत्कृष्ट कार्य कर के सीताराम ने राजस्थान पुलिस की शान बढ़ाई है.

राजस्थान के सीकर जिले के पूनियाणा गांव के रहने वाले सीताराम के मातापिता पढ़लिख नहीं सके थे. वे मेहनतमजदूरी करते थे. पिता टोडाराम व मां प्रेम ने अपने एकलौते बेटे सीताराम को अपना पेट काट कर पढ़ाया लिखाया. सीताराम ने सीनियर सेकैंडरी तक की पढ़ाई सीकर में दांतारामगढ़ से की. 12वीं में वह क्लास टौपर रहा. कालेज की पढ़ाई रेनवाल से की. मातापिता की ख्वाहिश थी कि सीताराम शिक्षक बन जाए. सीताराम ने बीएड करने के साथ शिक्षक बनने की तैयारी शुरू भी की थी, लेकिन तभी उस का कांस्टेबल भर्ती में चयन हो गया.

उस ने साल 2015 में नौकरी जौइन की. प्रोबेशन पीरियड पूरा होने के बाद उसे बैंक की चेस्ट ब्रांच में सुरक्षा के लिए तैनात कर दिया गया था. डेढ़ साल पहले ही उस की शादी हुई थी. सीताराम के मातापिता और गांव के लोगों ही नहीं, आज राजस्थान पुलिस के कांस्टेबल से ले कर पुलिस महानिदेशक तक सभी को उस पर गर्व है.

मैं हर कीमत पर फिल्म ‘राजी’ में काम करना चाहती थी : आलिया

आलिया भट्ट इन दिनों अपनी आने वाली फिल्म ‘राजी’ के प्रमोशन में व्यस्त है. मेघना गुलजार निर्देशित फिल्म ‘राजी’ हरिंदर सिक्का के उपन्यास ‘कौलिंग सहमत‘ पर आधारित है. आलिया भट्ट का कहना है कि वह हर कीमत पर फिल्म राजी में काम करना चाहती थी.

आलिया भट्ट का कहना है कि दर्शक उन्हें इस फिल्म में बिल्कुल अलग अवतार में देखेंगे. उन्होंने कहा कि पहली बार मैं एक पीरियड फिल्म कर रही हूं और यह सच्ची कहानी पर आधारित भी है. इसलिए मैं बहुत उत्साहित हूं और उम्मीद करती हूं कि दर्शक इसे पसंद करेंगे.

उन्होंने कहा है कि वह कभी नहीं चाहती थी कि फिल्म राजी में उनके अलावा किसी और को लीड रोल के लिए कास्ट किया जाए क्योंकि वो इस फिल्म को हर कीमत कर करना चाहती थीं.

आलिया ने कहा कि जब मेघना गुलजार ने उन्हें फिल्म राजी के बारे में बताया था तब उन्हें कहानी इतनी पसंद आई थी कि वह नहीं चाहती थी कि यह फिल्म उनके अलावा कोई और करे ,जिसके चलते वह उनकी मैनेजर से लगातार इस बारे में पूछती रहती थी कि क्या मेघना की मूवी राजी के लिए उन्होंने किसी और को तो साइन नहीं कर लिया है.

अभी उस फिल्म का क्या स्टेटस है, जिस पर उनकी मैनेजर उन्हें बार-बार इस बात का आश्वासन देती थी कि मेघना अभी भी फिल्म को लिख रही हैं. उल्लेखनीय है कि मूवी राजी में आलिया भट्ट ने एक जासूस की भूमिका निभाई है.

इस फिल्म में वह एक पाकिस्तानी अफसर के साथ विवाह करने के बाद पड़ोसी मुल्क चली जाती हैं और वहां से भारत के लिए जासूसी करती हैं, जिसके चलते पाकिस्तान के कई सारे राज सामने आते हैं. यह फिल्म 11 मई को प्रदर्शित होगी.

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एक और अलगाववाद

कांजीवरम नटराजन अन्नादुरई के मुख्यमंत्रित्वकाल में तमिलनाडु से पृथक तमिलनाडु बनाने की आवाज तो पिछले 4-5 दशकों में खो गई लेकिन अब कर्नाटक में कांग्रेसी मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने अलग द्राविड़नाडु की मांग कर के देश के विभाजन की बात कर दी है. जब यूरोप के कई देशों, पश्चिम एशिया के देशों, श्रीलंका, दक्षिण अमेरिका के कुछ देशों में ऐसी मांगें उठ रही हों तो इस मांग को हलके में नहीं लेना चाहिए.

मूलतया एक देश की सफलता के पीछे एक बड़े भूभाग में एक अर्थव्यवस्था, एक मुद्रा, एकजैसे कानून, एक जगह से दूसरी जगह जाने की स्वतंत्रता, अलगअलग तरह के लोगों को एक झंडे के नीचे रहना शामिल होता है. लेकिन जब केंद्र सरकार एक तरह के लोगों के लिए काम करने लगे और कुछ इलाकों को लगने लगे कि उन के साथ लगातार भेदभाव हो रहा है, तो अलगाव की आवाज स्वाभाविक तौर पर उठ खड़ी होती है.

ऐसा हम आंध्र प्रदेश के विभाजन में देख चुके हैं जो एक तरह से सीमित था हालांकि वहां भी बीज देश से अलग हो जाने के थे. यह तो तत्कालीन केंद्र सरकार की चतुराई थी कि उस ने सिर्फ राज्यविभाजन से काम चला लिया.

तमिल तो पहले से ही अलग होना चाहते थे. उन का सपना तो भारत के तमिलनाडु और श्रीलंका के जाफना के इलाके को मिला कर नया देश बनाने की है. अब मलयाली, कन्नडि़गा और आंध्री भी ऐसी ही मांग को दोहराने की कोशिश में लगे हैं. कटट्रपंथी जिसे आर्यावर्त्त कहते हैं उस में इस इलाके को हमेशा नीचा सा समझा गया है जहां से केवल गुलाम या दास लाए जाते थे.

भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस अभी इस मांग को गंभीरता से नहीं ले रहीं पर जिस तरह से देश में छटपटाहट का वातावरण बन रहा है और ऊंचनीच की भावना को सरकारी संरक्षण मिल रहा है, यह मांग हिंसक हो सकती है. यह नहीं भूलना चाहिए कि जब खालिस्तान की मांग ने तूल पकड़ा था तो केंद्र सरकार के हौसले पस्त हो गए थे. यह तो कांग्रेस व भाजपा की दूरदर्शिता थी कि राजीव गांधी ने हरचरण सिंह लोंगोवाल से समझौता कर लिया जबकि अटल बिहारी वाजपेयी ने प्रकाश सिंह बादल से और संकट को सदा के लिए समाप्त कर डाला.

दक्षिण में यह समस्या उग्र हो सकती है क्योंकि भाजपा कट्टर हिंदू मठों के सहारे जीत का सपना देख रही है. वह जातियों की राजनीति के तहत वर्णव्यवस्था के आधार पर एकदूसरे को लड़वाने में लगी है. कैंब्रिज एनालिटिका ने स्पष्ट किया है कि देश की पार्टियां उस से फेसबुक पर जमा डेटा के आधार पर जाति का विश्लेषण मांगती हैं क्योंकि जाति के नाम पर वोट मांगना आसान होता है. यही अलगाव बाद में अलग देश की मांग बन जाता है जो यूरोप के यूगोस्लाविया में दिखा और इराक में कुर्दों के साथ दिख रहा है.

चुनाव जीतने के लिए जाति का उपयोग पैट्रोल व माचिस से खेलने के बराबर है. इस बारे में कठिनाई यह है कि गलीगली में मौजूद धर्म के दुकानदारों को देश की नहीं, अपनी दुकानदारी की चिंता रहती है. उन्होंने पहले सदियों तक देश को गुलाम बनवाए रखा, 1947 में टुकड़े करवाए और अब पूरे समाज में ऊंचनीच की खाइयां गहरी पर गहरी करते जा रहे हैं. उन पर न मोहन भागवत का नियंत्रण है न नरेंद्र मोदी का.

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