कहते हैं कि रेप की शिकार का 2 बार रेप होता है. एक बार तब जब उस के अंगों में प्रवेश किया जाता है और दूसरा तब जब वह उस पहले रेप की शिकायत करने जाती है. भोपाल की एक लड़की के साथ गैंगरेप हुआ पर रेप के बाद 4 दिनों तक वह थानों के चक्कर काटती रही. एक दिन उसे एफआईआर लिखाने में लगा. दूसरे दिन पुलिस ने सारे दिन उस के बयान लिए. तीसरे दिन मैडिकल चैकअप के लिए पुलिस वालों के साथ अस्पताल में रही और चौथे दिन सोनोग्राफी के लिए गई.
बारबार उस से पूछा गया कि उस के साथ क्या हुआ, कैसे हुआ, कितना हुआ, कितने लोग थे, वे लोग किस तरह के दिखते थे. इस तरह के सवाल कांस्टेबलों ने ही नहीं पूछे बल्कि अफसरों, यहां तक कि महिला अफसरों ने भी पूछे. किसी को हमदर्दी नहीं थी, किसी ने सांत्वना नहीं दी, किसी ने मामले को तुरंत समाप्त करने की कोशिश नहीं की.
इस तरह के हर मामले में रेप पीडि़ता को परेशान किया जाता है क्योंकि पुलिस थानों में इस तरह के रेप करना बहुत आम है. देशभर के पुलिस वाले अपराधी महिलाओं और अपराधियों की मां, बहनों, बेटियों के साथ अपराधी को तोड़ने के लिए उन के सामने रेप करने के हथकंडे अपनाते हैं. यह मामला शिकायत नहीं बनता क्योंकि उस से अपराधी का मामला बिगड़ जाता है. फिर शिकायत केवल मीडिया में की जा सकती है या अदालत में और अपराधी के परिवार वालों की गंभीरता से कोई सुनता ही नहीं.
यही वजह है कि आमतौर पर रेप विक्टिम चुप ही रह जाती हैं क्योंकि वे अपने कीमती साल बरबाद नहीं करना चाहतीं.
समाज की मानसिकता भी वही है जो पुलिस वालों की है कि रेप की गई लड़की ने कहीं न कहीं कोई गलती तो की ही होगी. घरों में जब रेप न हो तो इस तरह के सवाल उठते ही हैं और घरों में होने वाले रेप की शिकायत करने का अर्थ है घर वालों और रिश्तेदारों का गुस्सा सहना.
वैसे भी पुरुष मानसिकता को बदलना फिलहाल कठिन ही है कि औरत प्रजाति बनी ही सैक्स के लिए है. पुलिस वाले तो आते ही उस पृष्ठभूमि से हैं जहां औरतों को वैसे भी पैर की जूती समझा जाता है. उन्हें उस तरह की लड़कियों से कोई सहानुभूति नहीं होती है. वे तो उस रेप की शिकार लड़की का रेप करने को उत्सुक रहते हैं. उन के सवाल और उन की निगाहें ही दूसरा रेप करती हैं.
यह रेप कम नहीं होता. जैसेजैसे मामला बढ़ता है, यह और तीखा होता है. अदालतों में सालों लगते हैं. अपराधी जहां खुले सांड की तरह घूमता है वहीं लड़की हर रोज तड़पती है, रोती है, कलपती है, तीखी निगाहों का शिकार बनती है. अगर वह चुप रहती तो दर्द 2-4 दिनों में चला जाता, पर अधिकार के लिए बोल कर वह दर्द को सौ गुना कर डालती है. जिस समाज में मासिकधर्म में मुंह छिपाया जाता है वहां रेप पीडि़ता को न आदर मिलता है न राहत.
यह समाज बदलेगा, भूल जाइए.
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पंजाब के जिला होशियारपुर के टांडा उड़मुड़ के रहने वाले सरदार सुखदेव सिंह सुखी और संपन्न किसान थे. उन के परिवार में पत्नी और 3 बच्चे, जिन में 2 बेटियां मनदीप कौर, संदीप कौर और एक बेटा गुरप्रीत सिंह उर्फ गोल्डी था. उन्होंने बड़ी बेटी मनदीप कौर की शादी जिस लड़के से की थी, वह आस्ट्रेलिया में रहता था. शादी के बाद मनदीप कौर भी पति के साथ आस्ट्रेलिया जा कर रहने लगी थी. बहन के जाने के बाद गुरप्रीत सिंह उर्फ गोल्डी का भी मन बहन के पास आस्ट्रेलिया जाने का हुआ तो सुखदेव सिंह ने उसे भी आस्ट्रेलिया भेज दिया. वहां बहन और बहनोई की मदद से गुरप्रीत ने जो काम शुरू किया, वह चल निकला था. जीजा की वजह से गुरप्रीत को भी वहां की नागरिकता मिल गई थी. सुखदेव सिंह का बेटा एनआरआई बन गया तो उस के लिए अच्छे घरों के रिश्ते आने लगे. उन्होंने कुछ लड़कियों के फोटो गुरप्रीत के पास भेजे तो उन में से उस ने किरणदीप कौर को पसंद कर लिया. इस के बाद आस्ट्रेलिया से पंजाब आ कर उस ने किरणदीप कौर से शादी कर ली.
शादी के बाद गुरप्रीत सिंह आस्ट्रेलिया चला गया. कुछ दिनों बाद किरणदीप कौर के भी आस्ट्रेलिया जाने की व्यवस्था कर दी गई. वह कुछ दिनों तक पति के पास आस्ट्रेलिया में रहती तो कुछ दिनों के लिए पंजाब आ कर सासससुर के साथ रह कर उन की सेवा करती. गुरप्रीत के आस्ट्रेलिया जाने के बाद सुखदेव सिंह गांव वाला मकान बेच कर टांडा शहर के बाईपास के पास पौश इलाके में एक बड़ी सी कोठी खरीद कर उसी में रहने लगे थे. खेतों को उन्होंने ठेके पर दे दिया था.
26 मार्च, 2016 की रात गुरप्रीत सिंह ने पिता सुखदेव सिंह को फोन किया. वह पिता को बताना चाहता था कि उन के आस्ट्रेलिया आने की व्यवस्था हो गई है. दरअसल वह अपने मातापिता को भी स्थाई रूप से अपने साथ रखना चाहता था, जिस से उन की ठीक से देखभाल हो सके. लेकिन पूरी घंटी बजने के बाद भी फोन नहीं उठा था. उस ने कई बार फोन किया. हर बार पूरी घंटी बजी, पर फोन नहीं उठा.
फोन न उठने से वह परेशान हो उठा. पत्नी किरणदीप और छोटी बहन संदीप ने समझाया कि दोनों लोग सो गए होंगे, इसीलिए फोन नहीं उठ रहा. सुबह फोन कर लेना. संदीप कौर उन दिनों गुरप्रीत सिंह के पास ही थी. पंजाब में उस समय सुखदेव सिंह ही पत्नी संतोष कौर के साथ थे. पत्नी और बहन ने कहा तो गुरप्रीत को भी लगा कि शायद वे सो गए होंगे.
अगले दिन यानी 27 मार्च को उस ने फोन किया तो फिर वैसा ही हुआ. घंटी पूरी बजती थी, पर फोन नहीं उठता था. वह पूरे दिन फोन करता रहा, पर फोन नहीं उठा. मांबाप में से किसी ने फोन नहीं उठाया तो वह परेशान हो गया. रात 11 बजे उस ने टांडा के शिमला पहाड़ी में रहने वाले अपने मौसा बलबीर सिंह को फोन कर के सारी बात बता कर उस ने आग्रह किया कि वह उस की कोठी पर जा कर देखें कि पिता और मांजी फोन क्यों नहीं उठा रहे हैं.
उस समय रात के 11 बज रहे थे, इसलिए बलबीर सिंह ने कहा कि अब उतनी रात को तो वह नहीं जा सकते, सवेरा होते ही उस के यहां जा कर पता करेंगे कि क्या बात है, जो उन का फोन नहीं उठ रहा है. गुरप्रीत की मौसी विजय कौर ने उसी समय अपने भाई कुलदीप सिंह को फोन कर के यह बात बता कर कह दिया था कि सुबह उठ कर उन्हें सीधे वहां पहुंच जाना है.
कुलदीप सिंह वार्ड नंबर-1 दारापुर, टांडा दसुइया में रहते थे. सवेरे उठ कर वह अपने बहनोई सुखदेव सिंह की कोठी पर पहुंचे तो बाहर वाला गेट खुला था. इस बात पर तो उन्होंने ध्यान नहीं दिया, लेकिन जब उन्होंने पूरी कोठी के दरवाजे खुले देखे तो उन्हें हैरानी हुई. उन्हें मामला गड़बड़ लगा.
वह भाग कर बैडरूम में पहुंचे तो सामने बैड पर उन की बहन संतोष कौर और बहनोई सुखदेव सिंह चित लेटे थे. कोठी के एक कमरे से उन के पालतू कुत्ते के भौंकने की आवाजें आ रही थीं. कुलदीप सिंह आवाजें देते हुए बैड के पास पहुंचे तो देखा, दोनों के शरीरों में किसी तरह की कोई हरकत नहीं हो रही थी. वह समझ गए कि दोनों जीवित नहीं हैं.
वह घबरा गए और उन्होंने तुरंत बहन विजय कौर और जीजा बलबीर सिंह को फोन कर के यह बात बता दी. इस के बाद अन्य रिश्तेदारों को भी सूचना दे दी गई. थोड़ी ही देर में सब इकट्ठा हो गए तो थाना टांडा पुलिस को इस बात की सूचना दी गई.
सूचना मिलते ही थानाप्रभारी इंसपेक्टर जगजीत सिंह एएसआई भूपेंद्र सिंह और कुछ सिपाहियों के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए. फोन कर के क्राइम टीम, डौग स्क्वायड को भी बुला लिया गया था. घटनास्थल के निरीक्षण में वहां ऐसा कुछ भी नहीं मिला, जिस से यह पता चलता कि उन की हत्या की गई थी या उन्होंने आत्महत्या की थी. लाशों पर चोट के भी निशान नहीं थे. कोठी का सारा सामान सुरक्षित था.
सिर्फ एक बात हैरान करने वाली यह थी कि कोठी के सभी कमरों के दरवाजे खुले थे, जबकि पालतू कुत्ते के कमरे का दरवाजा बाहर से बंद था. जगजीत सिंह ने रिश्तेदारों और पड़ोसियों से पूछताछ की. पड़ोसियों का कहना था कि कोठी का गेट 2 दिनों से खुला था. इस बीच सुखदेव सिंह और उन की पत्नी संतोष कौर दिखाई नहीं दीं. उन की किसी से कोई दुश्मनी भी नहीं थी. रिश्तेदारों के अलावा उन के यहां किसी का आनाजाना भी नहीं था.
इस तरह शुरुआती जांच में पुलिस यह नहीं पता कर पाई कि मृतकों ने आत्महत्या की थी या उन की हत्या की गई थी. डीएसपी परमजीत सिंह हीर के निर्देश पर इंसपेक्टर जगजीत सिंह ने कुलदीप सिंह की शिकायत पर रपट नंबर-13 पर सीआरपीसी की धारा 174 के तहत काररवाई कर के दोनों लाशों को पोस्टमार्टम के लिए सरकारी अस्पताल भिजवा दिया. घटना की सूचना आस्ट्रेलिया में रह रहे सुखदेव सिंह के बच्चों को भी दे दी गई थी.
अगले दिन 3 डाक्टरों के पैनल द्वारा पोस्टमार्टम करने पर जो रिपोर्ट आई, वह चौंकाने वाली थी. रिपोर्ट के अनुसार, सुखदेव सिंह और संतोष कौर की मौत दम घुटने से हुई थी. उन के गले पर गला घोंटने के निशान भी पाए गए थे. इस से साफ हो गया था कि यह आत्महत्या का नहीं, हत्या का मामला था.
पोस्टमार्टम के बाद सुखदेव सिंह और संतोष कौर की लाशें उन के घर वालों को सौंप दी गई थीं. अब तक आस्ट्रेलिया से मृतक सुखदेव सिंह के परिवार के सभी लोग आ चुके थे. इस पूरे मामले में पुलिस की भागदौड़, मृतकों के अंतिम संस्कार से ले कर रिश्तेदारों के ठहरने तक का सारा इंतजाम मृतक की साली यानी गुरप्रीत की मौसी के दामाद जसप्रीत सिंह उर्फ जस्सी ने किया था.
पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने के बाद सुखदेव सिंह और संतोष कौर की हत्या का मुकदमा अज्ञात हत्यारों के खिलाफ दर्ज कर जगजीत सिंह ने इस मामले की जांच शुरू कर दी थी. घटनास्थल की स्थिति देख कर उन्होंने अंदाजा लगाया था कि हत्यारे का मकसद लूटपाट नहीं, सिर्फ हत्या करना था. कोठी में पुलिस को चाय के 3 खाली कप मिले थे, जिन्हें पुलिस सीएफएसएल जांच के लिए भेजा दिया था. वहां से आई रिपोर्ट के अनुसार, 2 कपों में नशीली दवा पाई गई थी. इस का मतलब हत्यारा जो भी था, वह मृतकों का परिचित था.
पुलिस ने जानपहचान वालों और रिश्तेदारों को ध्यान में रख कर जांच आगे बढ़ाई. जगजीत सिंह ने एएसआई दविंदर सिंह और भूपिंदर सिंह के नेतृत्व में 2 अलगअलग टीमें बना कर इस मामले की जांच पर लगा दिया था. इस के साथसाथ मुखबिरों की भी मदद ली गई. जानपहचान वालों और रिश्तेदारों में किसी पर शक नहीं हो रहा था. सब काफी दुखी लग रहे थे. मृतका संतोष कौर की बहन की बेटी का पति जसप्रीत सिंह उर्फ जस्सी तो बिना कुछ खाएपिए दिनरात घर वालों की ही नहीं, पुलिस वालों की भी जांच में हर तरह से मदद कर रहा था. धीरेधीरे एक महीना गुजर गया. पुलिस के हाथ कोई सुराग नहीं लगा. आखिर एक दिन जगजीत सिंह के एक मुखबिर ने उन्हें एक ऐसी खबर दी, जिस से उन्हें जांच को आगे बढ़ाने की राह मिल गई.
मुखबिर ने उन्हें बताया था कि सुखदेव सिंह की बहू किरणदीप कौर के अपने पति गुरप्रीत सिंह के मौसी के दामाद जसप्रीत सिंह उर्फ जस्सी के साथ अवैध संबंध थे. कहीं उन दोनों की हत्या इसी अवैध संबंध की वजह से तो नहीं हुई.
यह वही जसप्रीत सिंह उर्फ जस्सी था, जो दिनरात पुलिस के साथ हत्यारों की तलाश में जुटा था, ताकि सपने में भी कोई उस पर शक न कर सके. इस के बाद जगजीत सिंह ने सीधे उस पर और किरणदीप कौर पर हाथ न डाल कर पहले उन के मोबाइल नंबर ले कर दोनों की काल डिटेल्स और लोकेशन निकलवाई.
काल डिटेल्स के अनुसार, पिछले डेढ़ महीने में जसप्रीत सिंह और किरणदीप कौर के बीच लगातार काफी लंबीलंबी बातें हुई थीं. 26 मार्च, 2016 की दोपहर 1 बजे से शाम 4 बजे के बीच दोनों में न जाने कितनी बार बातें हुई थीं. ज्यादातर फोन किरणदीप कौर ने ही किए थे. जसप्रीत सिंह मिस्डकाल करता था तो आस्ट्रेलिया से किरणदीप कौर फोन करती थी.
इन बातों का पता चलने के बाद जगजीत सिंह ने हत्याकांड के बारे में बात करने के बहाने जसप्रीत सिंह को थाने बुला कर उस का फोन ले कर चेक करवाया तो इस दोहरे हत्याकांड का रहस्य उजागर हो गया. पता चला कि मृतकों की बहू किरणदीप कौर ने ही प्रेमी जसप्रीत सिंह उर्फ जस्सी से दोनों की हत्या करवाई थी.
जगजीत सिंह ने जसप्रीत सिंह उर्फ जस्सी को उसी समय हिरासत में ले लिया. वह भी समझ गया कि झूठ बोलने से कोई फायदा नहीं है, इसलिए बिना किसी हीलाहवाली के उस ने अपना अपराध स्वीकार कर लिया. उस ने बताया कि किरणदीप कौर के कहने पर ही उस ने अपने दोस्तों वार्ड नंबर-6 टांडा निवासी अजय कुमार उर्फ बंटी तथा बुताला ब्यास निवासी मनिंदर सिंह के साथ मिल कर मौसा ससुर सुखदेव सिंह और मौसी सास संतोष कौर की हत्या गला दबा कर की थी.
इस के बाद जगजीत सिंह ने उसी दिन अजय कुमार, मनिंदर सिंह और किरणदीप कौर को गिरफ्तार कर लिया था. अगले दिन सभी को अदालत में पेश कर के पूछताछ के लिए 2 दिनों के पुलिस रिमांड पर लिया गया. करीबी लोगों की गिरफ्तारी से घर वाले ही नहीं, सब हैरान तो थे ही, गहरे सदमे में भी थे. खासकर गुरप्रीत सिंह उर्फ गोल्डी, जिस के मांबाप मारे गए थे तो उन की हत्या के आरोप में पत्नी गिरफ्तार हो गई थी.
अभियुक्तों से पूछताछ के बाद दिल दहला देने वाले इस दोहरे हत्याकांड की जो कहानी प्रकाश में आई, वह स्वार्थ और वासनापूर्ति में उलझी आज की आधुनिक और भटकी हुई युवा पीढ़ी की घिनौनी सोच का नतीजा थी.
गुरप्रीत सिंह उर्फ गोल्डी की मौसेरी बहन जसप्रीत सिंह उर्फ जस्सी को ब्याही थी, इसलिए वे जीजासाले लगते थे. लेकिन रिश्ते से ज्यादा दोनों के बीच दोस्ती थी. गुरप्रीत सिंह की शादी से सब से ज्यादा जसप्रीत ही खुश था. शादी के बाद गुरप्रीत और जसप्रीत अपनीअपनी पत्नियों को साथ ले कर पंजाब के अनेक पर्यटनस्थलों पर घूमने भी गए थे.
एक साथ घूमने की वजह से किरणदीप कौर और जसप्रीत सिंह एकदूसरे से काफी घुलमिल गए थे. पासपोर्ट और वीजा न होने की वजह से किरणदीप कौर यहीं रह गई थी, जबकि गुरप्रीत सिंह आस्ट्रेलिया चला गया था. जाते समय उस ने मौसेरी बहन मनप्रीत कौर और उस के पति जसप्रीत सिंह से किरणदीप कौर का हर तरह से ध्यान रखने को कहा था.
गुरप्रीत सिंह के आस्ट्रेलिया जाते समय उस के कहे अनुसार, उस की मौसेरी बहन मनप्रीत कौर तो कभी किरणदीप से मिलने नहीं आई, लेकिन उस का पति जसप्रीत सिंह हर दूसरेतीसरे दिन उस से मिलने उस के घर आया करता था. धीरेधीरे वह बिना नागा रोज आने लगा.
उन का हंसीमजाक का रिश्ता था, इसलिए जसप्रीत सिंह और किरणदीप कौर अलग कमरे में बैठ कर आपस में बातें ही नहीं करते थे, बल्कि खूब हंसीमजाक भी करते थे. जल्दी ही किरणदीप कौर उस के साथ बाजार भी जाने लगी. इसी सब का नतीजा था कि उन के बीच नजदीकियां इतनी बढ़ गईं कि उन के बीच शारीरिक संबंध बन गए.
पहले तो सुखदेव सिंह और संतोष कौर ने इसे ननदोई और सलहज का रिश्ता मान कर नजरअंदाज किया और उन के हंसीमजाक पर कोई आपत्ति नहीं जताई. लेकिन जब बात बेशरमी की हद तक पहुंच गई तो उन्होंने बहू को समझाते हुए मर्यादा में रहने की बात कही, जो किरणदीप कौर को काफी नागवार लगी.
अब उसे न सासससुर का डर रह गया था और न शरम. उसे जो करना होता था, वह अपनी मरजी से करती थी. सासससुर के मना करने के बावजूद किरणदीप कौर का जसप्रीत के साथ न घर से बाहर जाना बंद हुआ और न उस का घर आना.
सुखदेव सिंह और संतोष कौर बहू की इन हरकतों से दुखी ही नहीं थे, बल्कि असमंजस में भी थे कि दोनों को कैसे समझाएं. न वे बहू को डांट सकते थे, न ही जसप्रीत को कुछ कह सकते थे. इस की वजह यह थी कि अगर वह दामाद को कुछ कहते तो बात खुलने पर बिरादरी में बदनामी हो सकती थी. इसलिए उन्होंने चुप रहना ही उचित समझा.
संयोग से उसी बीच किरणदीप कौर की आस्ट्रेलिया जाने की सारी प्रक्रिया पूरी हो गई और वह वहां चली गई तो सुखदेव सिंह और संतोष कौर ने राहत की सांस ली. किरणदीप कौर आस्ट्रेलिया तो चली गई, लेकिन उसे अधिक दिनों तक न वहां की खूबसूरती और आकर्षण बांध सका और न पति का प्यार. जसप्रीत के प्यार में पागल किरणदीप कौर सासससुर की सेवा के बहाने पंजाब लौट आई.
पंजाब आ कर किरणदीप कौर पहले की ही तरह जसप्रीत सिंह से मिलनेजुलने लगी. आस्ट्रेलिया से लौटने के बाद वह काफी आधुनिक भी हो गई थी. सुखदेव सिंह और संतोष कौर को अब बहू मुसीबत लगने लगी थी, लेकिन इस बार वह पहले की तरह चुप नहीं रहे. उन्होंने किरणदीप कौर को टोकना और समझाना शुरू कर दिया. उसे ही नहीं, जसप्रीत सिंह को भी समझाया.
इस के बाद जसप्रीत ने उन के घर आना बंद कर दिया. सासससुर की बातों से किरणदीप कौर और जसप्रीत सिंह समझ गए थे कि उन के अनैतिक संबंधों की बात अब छिपी नहीं रही. जसप्रीत ने घर आना बंद कर दिया था और किरणदीप कौर भी ज्यादा समय तक बाहर नहीं रह सकती थी. इसलिए सुखदेव सिंह और संतोष कौर दोनों को खटकने लगे. ऐसे में जब किरणदीप कौर ने कहा कि इस हालत में उसे गुरप्रीत के पास आस्ट्रेलिया चली जाना चाहिए तो जसप्रीत ने कहा, ‘‘तुम यह क्या कह रही हो, तुम्हारे जाने के बाद मेरा क्या होगा?’’
‘‘तुम्हारा क्या होगा, मुझे पता नहीं, लेकिन जब तक घर में यह बूढ़ा और बुढि़या है, तब तक हम ठीक से मिल नहीं सकते.’’ किरणदीप कौर ने कहा.
‘‘तो फिर चलो कहीं भाग चलते हैं.’’ जसप्रीत ने कहा.
जसप्रीत की इस बात पर किरणदीप कौर ने हंसते हुए कहा, ‘‘भागने के लिए तुम्हारे पास पैसे भी हैं? कोई कामधाम तो करते नहीं, मुझे भगाने के सपने देख रहे हो? तुम्हारे कहने से मैं इतनी जमीनजायदाद, धनदौलत और विदेशी नागरिकता छोड़ दूंगी? कुछ ऐसा सोचो कि सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे.’’
‘‘तो फिर दोनों को निपटा देते हैं. इतनी बड़ी कोठी में कौन उन्हें मार गया, किसी को कहां पता चलेगा?’’
‘‘ये हुई न पते की बात.’’ किरणदीप कौर ने कहा, ‘‘सुनो, मैं जैसा कहूं, तुम वैसा ही करो.’’
किरणदीप कौर ने सासससुर की हत्या की फूलप्रूफ योजना बना कर उस में जसप्रीत सिंह के दोस्तों अजय कुमार उर्फ बंटी और मनिंदर सिंह को भी शामिल कर लिया. जसप्रीत और उस के ये आवारा दोस्त कुछ करतेधरते तो थे नहीं, इसलिए तीनों पर काफी कर्ज हो गया था. किरणदीप कौर ने कहा था कि अगर वे उस के सासससुर की हत्या वाला काम कर देंगे तो वह तीनों का कर्ज तो चुकता करवा ही देगी, ऊपर से 5-5 लाख रुपए और भी देगी. यह काम कब और कैसे करना है, यह भी किरणदीप कौर ने जसप्रीत सिंह को समझा दिया था.
योजना के अनुसार, किरणदीप कौर ने गुरप्रीत सिंह से कह कर अपना और छोटी ननद संदीप कौर का आस्ट्रेलिया जाने का वीजा लगवा लिया और फरवरी, 2016 में वह संदीप कौर के साथ आस्ट्रेलिया चली गई. जाते समय वह जसप्रीत को खर्च के लिए काफी रुपए दे गई थी.
गुरप्रीत सिंह जब से आस्ट्रेलिया गया था, तब से वह मांबाप को अपने पास आस्ट्रेलिया बुलाना चाहता था. किरणदीप कौर आस्ट्रेलिया पहुंची तो सब से पहले उस ने यही बताया कि अब वह अपने मांबाप को हमेशा के लिए आस्ट्रेलिया बुला सकता है, क्योंकि उन के यहां आने की सारी कानूनी प्रक्रिया पूरी हो चुकी है. वह इसी हफ्ते उन के टिकट भेजने जा रहा है.
यह सुन कर किरणदीप कौर बेचैन हो उठी. उसे लगा कि अगर वे दोनों आस्ट्रेलिया आ गए तो फिर न उन की हत्या हो सकती है और न ही वह कभी जसप्रीत के पास पंजाब जा सकती है. दोनों फोन द्वारा संपर्क में तो थे ही, गुरप्रीत टिकट भेजे उस के पहले ही किरणदीप कौर ने उन्हें खत्म करने को कह दिया.
26 मार्च, 2016 की दोपहर 3 बजे जसप्रीत सिंह अपने दोस्तों मनिंदर सिंह और अजय कुमार को कोठी के बाहर कुछ दूरी पर खड़ा कर के अकेला ही कोठी के अंदर चला गया. जसप्रीत सुखदेव सिंह और संतोष कौर को नमस्कार कर के उन के पास बैठ कर हालचाल पूछने लगा. उस ने चाय पीने की इच्छा व्यक्त की. संतोष कौर चाय बनाने के लिए जाने लगीं तो उस ने उन्हें रोकते हुए कहा, ‘‘मौसीजी, आप आराम करें. मैं खुद ही चाय बना लाता हूं.’’
इस के बाद रसोई में जा कर उस ने 3 कप चाय बनाई और 2 कपों में नशे की दवा मिला दी, जिसे पीते ही सुखदेव सिंह और संतोष कौर बेहोश हो गए. इस के बाद उस ने फोन कर के बाहर खड़े मनिंदर सिंह एवं अजय को अंदर बुला लिया और उन की मदद से दोनों की गला घोंट कर हत्या कर दी. इस के बाद उन्होंने उन के मुंह पर तकिया रख कर भी दबाए रखा. जब उन्हें विश्वास हो गया कि दोनों मर गए हैं तो जसप्रीत संतोष कौर के हाथों की सोने की चूडि़यां, कानों की बालियां और अंगूठियां खर्च के लिए घर में रखे 17 हजार रुपए ले कर दोस्तों के साथ चला गया. जाने से पहले उस ने कोठी से ही किरणदीप कौर को हत्या की जानकारी फोन द्वारा दे दी थी. यही नहीं, फोटो भी खींच कर वाट्सऐप द्वारा भेज दिया था. पालतू कुत्ते को उस ने उस के कमरे में बंद कर दिया था.
पूछताछ के बाद जगजीत सिंह ने जसप्रीत सिंह, अजय कुमार और मनिंदर की निशानदेही पर संतोष कौर के गहने और 2 हजार रुपए बरामद कर लिए थे. शेष रुपए उन्होंने खर्च कर दिए थे. रिमांड अवधि समाप्त होने पर 30 अप्रैल, 2016 को सभी अभियुक्तों को अदालत में पेश कर के 2 दिनों के और रिमांड पर लिया गया. इस दौरान अन्य सबूत जुटा कर 1 मई को फिर से उन्हें अदालत में पेश किया गया, जहां से सभी को जिला जेल भेज दिया गया. मामले की जांच कर के जगजीत सिंह ने चार्जशीट अदालत में पेश कर दी गई है. मुकदमा अभी विचाराधीन है.
– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित
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‘‘अदिति, हम कह रहे थे न, तेरी मेड ठीक नहीं लगती, थोड़ी नजर रखा कर उस पर, मगर तू है एकदम बेपरवाह. किसी दिन हाथ की बड़ी सफाई दिखा दी उस ने तो बड़ा पछताएगी तू. हम सही पकड़े हैं.’’ 4 दिनों से बेटी के घर आईं सुशीला उसे दस बार सचेत कर चुकी थीं. ‘‘अरे मां, रिलैक्स, आप फिर शुरू हो गईं, सही पकड़े हैं. कुछ नहीं कोई ले जाता, ले भी जाएगा तो ऐसा क्या है, खानेपीने का सामान ही तो है. हर वक्त उस पर नजर रखना अपना टाइम बरबाद करना है. आप भी न, अच्छा, मैं जाती हूं. 1 घंटा लग जाएगा मुझे. प्लीज, रत्ना (मेड) को अपना काम करने देना. वह चाय बना लाए तो मम्मीजीपापाजी के साथ बैठ कर आराम से पीना. आज छुट्टी है, बंटू, मिंकू और आप के दामाद तरुण की भी. वे देर तक सोते हैं, जगाना नहीं.’’
अदिति चली गई तो सुशीला ने गोलगोल आंखें नचाईं, ‘हमें क्या करना है जैसी भी आदत डालो, हम तो कुछ भी सब के भले के लिए ही कहते हैं.’ मेड थोड़ी देर बाद चाय टेबल पर रख गई. सुशीला भी अदिति के सासससुर तारा और तेजप्रकाश संग बैठ चाय की चुस्कियां लेने लगीं, पर शंकित आंखें मेड की गतिविधियों पर ही चिपकी थीं.
‘‘आजकल लड़कियां काम के लिए बाहर क्या जाने लगीं, घर के नौकरनौकरानी कब, क्या कर डालें, कुछ कहा नहीं जा सकता. हमें तो जरा भी विश्वास नहीं होता इन पर. निगाह न रखो तो चालू काम कर के चलते बनते हैं,’’ सुशीला बोल पड़ीं. ‘‘ठीक कह रही हैं समधनजी. लेकिन मैं पैरों से मजबूर हूं. क्या करूं, पीछेपीछे लग कर काम नहीं करा पाती और इन्हें तो अपने अखबार पढ़नेसुनने से ही फुरसत नहीं,’’ तारा ने पेपर में आंखें गड़ाए तेजप्रकाश की ओर मुसकराते हुए इशारा किया. तेजप्रकाश ने पेपर और चश्मा हटा कर एक ओर रख दिया और सुशीला की ओर रखे बिस्कुट अपनी चाय में डुबोडुबो कर खाने लगे.
‘‘आप तो बस भाईसाहब. भाभीजी तो पांव से परेशान हैं पर आप को तो देखना चाहिए. मगर आप तो बैठे रहते हो जैसे कोई घर का बंदा अंदर काम कर रहा हो. हम आप को एकदम सही पकड़े हैं,’’ सुशीला कुछ उलाहना के अंदाज में बोलीं. उन की आंखें चकरपकर चारों ओर रत्ना को आतेजाते देख रही थीं. रत्ना कपप्लेट ले जा चुकी थी. ‘काफी देर हो चुकी, पता नहीं क्या कर रही होगी,’ उन्हें और बैठना बरदाश्त नहीं हुआ. वे उठ खड़ी हुईं और उसे किचन में पोंछा लगाते देख यहांवहां दिखादिखा कर साफ करवाने लगीं. ‘‘ढंग से किया कर न, कोई देखता नहीं तो क्या मतलब है, पैसे तो पूरे ही लेती हो न?’’ उन का बारबार इस तरह से बोलना रत्ना को कुछ अच्छा नहीं लगता.
‘‘और कोई तो ऐसे नहीं बोलता इस घर में, अम्माजी आप तो…’’ रत्ना हाथ जोड़ कर माथे से लगा लिया करती. कभी अकेले में अन्य सदस्यों से शिकायत भी करती. 10 बज गए, मिंकी और बंटू का दूध और सब का नाश्ता बना मेज पर रख कर रत्ना चली गई तो सुशीला ढक्कन खोलखोल कर सब चैक करने लगीं.
‘‘अरे, दूध तो बिलकुल छान कर रख दिया पगलेट ने, जरा भी मलाई नहीं डाली बच्चों के लिए. ऐसे भला बढ़ेंगे बच्चे.’’ वे दोनों गिलास उठा कर किचन में चली आईं. दूध के भगौने में तो बिलकुल भी मलाई नहीं थी. ‘जरूर अपने बच्चों के लिए चुरा कर ले जाती होगी, कोई देखने वाला भी तो नहीं, बच्चों का क्या, वैसे ही पी जाते होंगे,’ सुशीला मन ही मन बोलीं. तभी प्लेटफौर्म पर वाटर डिस्पोजर की आड़ में से झांक रहे मलाई के कटोरे पर उन की नजर पड़ी. वे भुनभुनाईं, ‘सही पकड़े हैं, महारानीजी हड़बड़ी में ले जाना भूल गई.’ उन्होंने गोलगोल आंखें घुमाईं और एक चम्मच मलाई मुंह में डाल कर बाकी मलाई दूध के गिलासों में बांटने जा रही थीं कि तेजप्रकाश आ पहुंचे, कटोरा हाथ में लेते हुए बोले, ‘‘अरे, क्या करने जा रही थीं बहनजी. बच्चे तो मलाई डला दूध मुंह भी नहीं लगाएंगे, थूथू करते रहेंगे. मौडर्न बच्चे हैं.’’
‘‘तभी तो रत्ना की ऐश है. मलाई का कटोरा छिपा कर अपने घर ले जा रही थी, पर भूल गई. हम सही पकड़े हैं.’’ ‘‘अरे, नहीं बहनजी, मैं ने ही उस से कह रखा है, हफ्तेभर बाद तारा सारी इकट्ठी मलाई का घी बनाती है. घर के घी का स्वाद ही और है. आप तारा के पास बैठिए, मैं इसे डब्बे में डाल कर आता हूं.’’
‘‘यह भी ठीक है,’’ वे बालकनी में तारा के पास आ बैठीं. ‘‘हम से तो यह खटराग कभी न हुआ.’’
‘‘कैसा खटराग?’’ ‘‘यह देशी घी बनाने का खटराग, भाईसाहब बता रहे हैं, हफ्ते में एक बार आप बना लेती हैं.’’
‘‘हां, इस बार ज्यादा दिन हो गए. दूध वाला अब सही दूध नहीं ला रहा, इतनी मलाई ही नहीं आती.’’ ‘‘अरे नहीं, आज भी मलाई से तो पूरा कटोरा भरा हुआ था. हमें तो लगता है आप की रत्ना ही पार कर देती होगी, कल से चौकसी रखते हैं, रंगेहाथ पकड़ेंगे.’’
बंटू, मिंकी और तरुण भी ब्रश कर के आ गए थे. ‘गुडमौर्निंग दादू, दादी, नानी, सही पकड़े हैं,’ कहते हुए बंटू, मिंकी उन से लिपट कर खिलखिला उठे.
‘‘गुडमौर्निंग टू औल औफ यू. आइए, चलिए सभी नाश्ता करते हैं, अदिति पहुंच ही रही होगी. चलोचलो बच्चो…’’ तरुण ने मां को सहारा दिया और डायनिंग टेबल तक ले आया. ‘‘भाईसाहब तो फीकी चाय पीते होंगे?’’ सुशीला ने केतली से टिकोजी हटाते हुए पूछा.
‘‘बहनजी, बस 2 चम्मच चीनी,’’ स्फुट स्वरों में बोल कर कप में डालने का इशारा किया तेजप्रकाश ने. ‘‘नहीं, बिलकुल नहीं मम्मीजी, पापा को शुगर बरसों से है, कंट्रोल कर के रखा है, तब भी बौर्डर पर ही है. एक बार इन्हें दिल में बहुत जोर का दर्द उठा, डाक्टर के पास गए नहीं, पर प्रौमिस किया कि अब से मक्खन, चीनी नहीं खाएंगे. बस, तब से मक्खन वगैरा भी बंद. मां को तो शुगर नहीं है पर वे एहतियात के तौर पर अपनेआप ही नहीं लेतीं. आप बैठिए मम्मीजी, मैं निकालता हूं,’’ तरुण ने कहा.
‘‘अरे गैस थी, खाली पेट में वही चढ़ गई थी. खामखां लोगों ने एनजाइना समझ लिया और जबरदस्ती प्रौमिस ले लिया,’’ तेजप्रकाश ने सफाई दी. ‘‘ऐसे कैसे? शुक्र मनाइए कि खयाल रखने वाला परिवार मिला है, भाईसाहब. इतना लालच ठीक नहीं. जबान पर तो कंट्रोल होना ही चाहिए एक उम्र के बाद. वैसे भी, हमें इस उम्र में खुद भी अपना ध्यान रखना चाहिए,’’ सुशीला ने शुगरपौट तरुण की ओर बढ़ा दिया. तेजप्रकाश ने चीनी की ओर बढ़ता हुआ अपना हाथ मन मसोस कर पीछे खींच लिया. ‘‘तब तो चीनी का बहुत कम ही खर्चा आता होगा यहां. मिंकू, बंटू को देख रही हूं दूध में चीनी नहीं लेते पर सुबह से कई सारी चौकलेट खाने से उन का शुगर का कोटा पूरा हो जाता होगा, दामादजी भी बस आधा चम्मच, अदिति तो पहले ही वेट लौस की ऐक्सरसाइज व डाइट पर रहती है,’’ सुशीला सस्मित हो उठीं.
जिम से लौटी अदिति ने भी हाथ धो कर टेबल जौइन कर लिया, ‘‘अरे मम्मी, कहां हिसाबकिताब ले कर बैठ गईं. चीनी हो या चावल, अपनी रत्ना बड़ी परफैक्ट है, सब हिसाब से ही लाती, खर्च करती है. हम तो कभीकभी ही दुकान जा पाते हैं, उसी ने सब संभाला हुआ है.’’ वह चेयर खींच कर आराम से बैठ गई और कप में अपने लिए चाय डाल कर चीनी मिलाने लगी. तभी तेजप्रकाश ने उस से इशारे से रिक्वैस्ट की तो उस ने चुपके से आधा चम्मच चीनी तेजप्रकाश के कप में मिला दी.
‘‘हांहां, क्यों नहीं, सिर पर बिठा कर रखो महारानीजी को. एक दिन वही ऐसा गच्चा देगी तब समझ में आएगा. और भाईसाहब ने 2 शुगरफ्री डाले हैं. तू ने उन के कप में चीनी क्यों मिलाई अदिति?’’ सुशीला बोली थीं. ‘‘अरे मम्मी, अभी पापाजी का सबकुछ नियंत्रण में है, बिलकुल फिट हैं. काफी वक्त से कोई दर्द भी उन्हें दोबारा नहीं हुआ. बैलेंस के लिए सबकुछ थोड़ाथोड़ा खाना सही है. लाल और हरीमिर्च भी तो आप मानती नहीं, बहुत सारी खाती रही हैं खाने में ऐक्स्ट्रा नमक के साथ, वह क्या है? खाने के बाद एक चम्मच मलाईचीनी, रबड़ीचीनी या मक्खनचीनी के बिना आप का पेट साफ नहीं होता, वह क्या है? जबकि डाक्टर की रिपोर्ट है आप के पास. आप को सब मना है. बीपी भी है और आप को हार्ट प्रौब्लम भी. अच्छा है कि आप मेरे पास हैं, सब बंद है.’’
‘‘अरे तू हमारी कहां ले बैठी, वह तो 4-5 साल पहले की बात है. मुंह बंद कर, चुपचाप अपना नाश्ता कर,’’ सुशीला ने आंखें नचाते हुए अदिति को कुछ ऐसे डांटा कि सभी मुसकरा उठे. ब्रेकफास्ट के बाद, तरुण और अदिति स्टोर जा कर महीनेभर का कुछ राशन और हफ्तेभर की सब्जी व फल ले आए. सुशीला डायनिंग टेबल पर फैले विविध सामानों को किचन में ले जा कर सहेजती रत्ना को बड़े गौर से देख रही थीं. रत्ना दोबारा लंच बनाने आ चुकी थी.
सुशीला की तेज नजरें सप्ताह बाद ही तेजी से खत्म हो रहे सामनों का लेखाजोखा किए जा रही थीं. खास चीनी, मक्खनमलाई, देशी घी, चाय, कौफी, मिठाई, बिस्कुट्स, नमकीन की खपत पर उस का शक 15 दिनों के भीतर यकीन में बदलने लगा.
एक दिन रंगेहाथ पकड़ेंगे रत्ना महारानी को. अदिति तो उस के खिलाफ सुनने वाली नहीं, तरुण को झमेले में पड़ना नहीं, भाभीजी को तो धर्मकर्म से फुरसत नहीं और भाईसाहब के तो कहने ही क्या. वे कहते हैं, ‘रत्ना के सिवा कौन ऐसा करेगा, वह काम समझ चुकी है, उस के बिना घर कैसे चलेगा, इसलिए उसे बरदाश्त तो करना ही होगा, कोई चारा नहीं. नजरअंदाज करें, बस.’ यह भी कोई बात हुई भला? बच्चों को पकड़ती हूं अपने साथ इस चोर को धरपकड़ने के मिशन में. अगले हफ्ते से ही बच्चों की गरमी की छुट्टियां शुरू होने वाली हैं. वे चोरसिपाही के खेल में खुशीखुशी साथ देंगे. तब तक हम अकेले ही कोशिश करते हैं, सुशीला ने दिमाग दौड़ाया.
रत्ना दिन में 3 बार काम करने आती थी. सुबह सफाई करती, बरतन मांजती और फिर नाश्ता बनाती. फिर 12 बजे आ कर लंच बनाती. और फिर शाम को आ कर बरतन साफ करती. शाम का चायनाश्ता, डिनर बना जाती. रत्ना के आने से पहले सुशीला तैयार हो जाती और उस के आते ही दमसाधे उस पर निगाह रखने में जुट जाती. हूं, सही पकड़े हैं, जाते समय तो बड़ा पल्ला झाड़ कर दिखा जाती है कि देख लो, जा रहे हैं, कुछ भी नहीं ले जा रहे, पर असल में वह अपना डब्बाथैला बाहर ऊपर जंगले में छिपा जाती है. काम करते समय मौका मिलते ही इधर से उधर कुछ उसी में सरका जाती है. सुशीला ने जाते वक्त उसे थैलाडब्बा जंगले से उठाते देख लिया था. कल चैक करेंगे, थैले में क्या लाती है और क्या ले जाती है,’ वह स्फुट स्वरों में बुदबुदा रही थी.
दूसरे दिन रत्ना जैसे ही आई, सुशीला मौका पाते ही बाहर हो ली. जंगले पर हाथ डाला और सामान उतार कर चैक करने लगी. ‘यह तो पहले ही इतना भरा है. दूध, कुछ आलूबैगन, 2-4 केले, आटा, थोड़ी चीनी उस ने फटाफट सामान का थैला फिर से ऊपर रख दिया और अंदर हो ली. पिछले घर से लाई होगी, आज ले जाए तो सही,’ सुशीला सोच रही थीं. रत्ना झाड़ू ले कर बाहर निकल रही थी, उस से टकरातेटकराते बची.
‘‘क्या है, थोड़ा देख कर चला कर, कोई घर का बाहर भी आ सकता है,’’ कह कर सुशीला अर्थपूर्ण ढंग से मुसकराई, जैसे अब तो जल्द ही उस की करनी पकड़ी जाने वाली है. ‘‘जी अम्माजी,’’ वह अचकचा गई, उस अर्थपूर्ण मुसकराहट का अर्थ न समझते हुए वह मन ही मन बुदबुदा उठी, ‘अजीब ही हैं अम्माजी.’
तेजप्रकाश आधा कटोरा मलाई खा कर प्रसन्न थे कि चलो, अच्छा है कि बहनजी का रत्ना पर शक यों ही बना रहे. जब सब सो रहे होते, वे अपनी जिह्वा और उदर वर्जित मनपसंद चीजों से तृप्त कर लिया करते. हालांकि, सुशीला की जासूसी से उन के इस क्रियाकलाप में थोड़ी खलल पैदा हो रही थी.
‘गनीमत यही हुई कि मैं ने सुशीला बहनजी और बच्चों की प्लानिंग सुन ली,’ तेजप्रकाश सतर्क हो मन ही मन मुसकरा रहे थे. ‘बच्चों की छुट्टियां क्या शुरू हुईं, जासूसी और तगड़ी हो गई. मक्खनमलाई, मीठा खाना दुश्वार हो गया. अभी तक तो एक ही से उन्हें सावधान रहना था, अब तीनतीन से,’ तेजप्रकाश के दिमाग के घोड़े दौड़ने लगे. सोचा, क्यों न बच्चों को अपनी ओर कर लिया जाए. और जो सब से छिपा कर सुशीला बहनजी अपने बैग से लालमिर्च का अचार और हरीमिर्च, नमक, खटाई अलग से खाती हैं, उस तरफ लगा देता हूं. अभी तक तो मैं ने नजरअंदाज किया था पर ये तो रत्नारत्ना करतेकरते अब मुझ तक ही न पहुंच जाएं, इसलिए जरूरी है कि मैं बच्चा पार्टी को इन की ओर ही मोड़ दूं. यह ठीक है. यह सब सोचते हुए तेजप्रकाश के चेहरे पर मुसकान फैल गई. वे शरारती योजना बुनने में लग गए.
‘‘बंटू, मिंकू इधर आओ,’’ तेज प्रकाश ने उन्हें धीरे से बुलाया. सुशीला कमरे में बैठी थीं. तारा के पैरों की मालिश वाली मालिश कर रही थी. तरुण, अदिति और रत्ना जा चुके थे. ‘‘मामा वाली चौकलेट खानी है?’’ बच्चों ने उतावले हो कर हां में सिर हिलाया.
‘‘यह जो नानी का बैग देख रहे हो, जिस में नंबर वाला लौक पड़ा है. इस में से नानी रोज निकाल कर कुछकुछ खाती रहती हैं, मुझे तो लगता है बहुत सारी इंपौर्टेड चौकलेट अभी भी हैं, जो आते ही इन्होंने तुम्हें दी थीं. तुम्हारे मामा ने तुम लोगों के लिए दी थीं इन्हें. पहले खाते हुए पकड़ लेना, फिर मांगना.’’ वे जानते थे कि बहनजी को स्वयं कहना कतई श्रेयस्कर नहीं होगा, अतएव खुद नहीं कहा. ‘‘सही में दादू, पर उन्होंने तो कहा था खत्म हो गई हैं,’’ दोनों एकसाथ बोले.
‘‘वही तो पकड़ना है. अब से जरा आतेजाते नजर रखना.’’ ‘‘ओए मिंकू, मजा आएगा. अब तो दोदो मिशन हो गए. अपनीअपनी टौयगन निकाल लेते हैं, चल…’’ दोनों उछलतेकूदते भाग जाते हैं. तेजप्रकाश मुसकराने लगे.
सुबह से दोनों बच्चों की धमाचौकड़ी होने लगती. दोनों छिपछिप कर जासूस बने फिरते. सुशीला अलग छानबीन में हैरानपरेशान थीं. आखिर मक्खनमलाई डब्बे से, कनस्तर से चीनी, मिठाई फ्रिज से, सब कैसे गायब हुए जा रहे हैं. रत्ना है बड़ी चालाक चोरनी.
रत्ना पर बेमतलब शक किए जाने से, उस की खुंदस बढ़ती ही जा रही थी. वह चिढ़ीचिढ़ी सी रहती. लगता, बस, किसी दिन ही फट पड़ेगी कि काम छोड़ कर जा रही है. कई बार अम्माजी डब्बे खोलखोल कर दिखा चुकी हैं कि ताजी निकाली सुबह की कटोराभर मलाई आधी से ज्यादा साफ, मक्खन पिछले हफ्ते आया था, कहां गया? परसों ही 2 पैकेट मिठाई के रखे थे, कहां गए? महीनेभर की चीनी 15 दिनों में ही खत्म. कितनी जरा सी बची है? मैं तो नहीं खाती, ले जाती नहीं, पर सही में ये चीजें जाती कहां हैं? वह भी सोचने लगी. कैसे पकड़ूं असली चोर, और रोजरोज के शक से जान छूटे. वह भी संदिग्ध नजरों से हर सदस्य को टटोलने लगी.
उस दिन रत्ना घर की चाबी प्लेटफौर्म पर छोड़ आई, आधे रास्ते जा कर लौटी तो तेजप्रकाश को फ्रिज में मुंह डाले पाया. वे मजे से एक, फिर दो, फिर तीन गपागप मिठाइयां उड़ाए जा रहे थे. उस का मुंह खुला रह गया. वह एक ओट में छिप कर देखने लगी. जब वह मिठाइयों से तृप्त हुए तो मलाई के कटोरे को जल्दीजल्दी आधा साफ कर, बाकी पहले की इकट्ठी मलाई के डब्बे में उलट कर अगलबगल देखने लगे. मूंछों पर लगी मलाई को देख कर रत्ना को हंसी आने लगी. जिसे एक झटके में उन्होंने हाथों से साफ करना चाहा.
‘‘सही पकड़े हैं…बाबूजी आप हैं और अम्माजी तो हमें…’’ वह हैरान हो कर मुसकराई. तेजप्रकाश दयनीय स्थिति में हो गए, चोरी पकड़ी गई. याचना करने लगे थे. ‘‘सुन, बताना मत री किसी को. सब की डांट मिलेगी सो अलग, चैन से कभी खाने को नहीं मिलेगा. यदि बीमार होऊं तो परहेज भी कर लूं, पहले से क्या, इतनी सी बात किसी के पल्ले नहीं पड़ती,’’ उन्होंने बड़ी आजिजी से कहा.
रत्ना उन की हालत देख कर हंसने लगी, ‘‘ठीक है, नहीं कहूंगी बाबूजी, पर एक शर्त है, अम्माजी को तो आप समझाओ कैसे भी कर के, हर वक्त वे मेरे पीछे पड़ी रहती हैं.’’ ‘‘तू चिंता मत कर उस का बंदोबस्त हो जाएगा.’’
उन के दिमाग में शरारती योजना घूम ही रही थी पर अब बच्चों को नहीं शामिल कर सकते, बच्चे तो सब को ही बता देंगे. फिर मैं सुशीला बहन को ब्लैकमेल कैसे कर पाऊंगा कि रत्ना को इन से बचा सकूं और रत्ना से अपने को. वरना तरुण, अदिति, तारा सब तक मेरी बात पहुंच गई तो मेरा जीना मुहाल हो जाएगा. सिर्फ परहेजी खाना, उफ्फ… क्यों बढि़याबढि़या मिठाईरबड़ी न खाऊं, मरे हुए सा सौ साल जियूं इसलिए… तो जीने का फायदा क्या?’ मनपसंद चीजों का दिमाग में खुला इंसायक्लोपीडिया देशी घी के बेसन के लड्डू, चमचम, रसमलाई… उन्हें बेचैन किए जा रहा था.
‘कुछ भी हो, सुशीला बहन को मुझे जल्दी, अकेले ही रंगेहाथ पकड़ना होगा. वरना रत्ना, बहनजी से तंग आ कर सब को मेरा सच बता देगी और मैं सूक्ष्म फलाहारी, परहेजी बाबा बन कर कहीं का नहीं रहूंगा.’ दिन में खाने के बाद एक घंटे बच्चों का सोने का टाइम और रात के खाने के बाद 9 बजे के बाद का समय, जब सुशीला बहन सब से नजरें बचा, अपना मिर्चखटाईर् का शौक पूरा करती होंगी क्योंकि नाश्ता भले ही साथ कर लेती हैं पर आदत का बहाना बता कर रात के खाने का अपना अलग ही टाइम बना रखा है, तभी पकड़ता हूं. अपने को बचाने का यही एक चारा है,’ तेजप्रकाश दिमाग की धार तेज किए जा रहे थे. आखिरकार दूसरे दिन ही सुशीला जैसे ही अपना खाना परोस कर कमरे में ले गईं, तेजप्रकाश दबेपांव उन के पीछे हो लिए. सुशीला ने पास पड़े स्टूल पर अपना खाना, पानी रखा, दरवाजा भेड़ा और परदा खींच कर तसल्ली से बैग का लौक खोल कर पसंदीदा लालमिर्च का अचार बड़े प्रेम से निकाला और साथ में चटपटी पकी इमली भी. प्लेट में नमक के ऊपर सजी बड़ीबड़ी 2 हरीमिर्चें देख परदे के पीछे खड़े तेजप्रकाश के मुंह से सीसी निकल रही थी, उस पर से यह और कि कैसे खा पाती हैं ये सब.’
सुशीला के खाना शुरू करते ही तेजप्रकाश सामने आ गए, ‘‘सही पकड़े हैं बहनजी, इतना सारा मिर्चखटाई. अदिति सही कहती है इतना मना है आप को पर चुपकेचुपके… बहुत गलत बात है.’’ वे उन का तकियाकलाम बोल कर उन्हीं के अंदाज में आंखें नचा रहे थे. सुशीला उन्हें सामने पा घबरा कर कातर हो उठीं. लिहाजन, तेजप्रकाश उन के कमरे में कभी वैसे आते न थे.
‘‘अअआप भाईसाहब, यहां, कैसे, बब…बैठिए. प्लीज, अदिति को कुछ मत कहिएगा,’’ वे खिसियाई सी बोलीं. ‘‘सही तो नहीं, पर इस उम्र में मन का खाएगा नहीं, तो आदमी करे क्या?’’
इस बात पर सुशीला थोड़ी हैरान हुईं, फिर सहज हो कर मुसकराती हुई बोलीं, ‘‘आप भी ऐसा ही मानते हैं. मैं तो घबरा ही गई थी. आप प्लीज, बताना नहीं किसी को.’’ ‘‘ठीक है, नहीं बोलूंगा, पर एक शर्त है. आप भी मेरे बारे में नहीं कहेंगी किसी से.’’
‘‘पर क्या?’’ वे सोच में पड़ गईं, ऐसा क्या है जो… ‘‘दरअसल, वह जो आप मलाई, मिठाई, चाय, चीनी सब के गायब होने के पीछे रत्ना को कारण समझती हैं, वह रत्ना नहीं, बल्कि मैं हूं.’’
‘‘क्या?’’ सुशीला का मुंह खुला रह गया. फिर वे मुंह दबा कर हंसने लगीं. ‘‘तारा, तरुण, अदिति सब मेरी जान खा जाएंगे, प्लीज.’’
‘‘फिर ठीक.’’ वे चटखारे ले कर अपना खाना खाने लगीं. ‘‘आप खाओगे?’’
‘‘नहीं बहनजी, आप मजे लो, मैं रसोई में जा कर अपनी तलब पूरी करता हूं, खौला कर स्ट्रौंग चाय बनाता हूं.’’ ‘‘इस समय?’’
‘‘आप पियोगी, बहुत बढि़या पकाने वाली मसालेदार मीठी कड़क?’’ उन के चेहरे पर राहत की मुसकान थी. ‘‘अरे नहीं, आप ही मजे लो,’’ कहती हुई उन्होंने लालमिर्च, अचार मुंह में भर लिया और हंसने लगीं.
‘‘यह भी खूब रही. और हां, बच्चों को जो चोर पकड़ने के लिए लगाया है, मना कर देना.’’ मुसकराते हुए तेजप्रकाश राहत से रसोई की ओर बढ़ गए. सोचते जा रहे थे कि ‘मैं भी कल बच्चों को कोई कहानी बना कर बहनजी को पकड़ने से मना कर दूंगा.’
इधर आंखें बंद किए बंटू और मिंकू दादू की स्टोरी से आज सो नहीं पाए थे. दादू उन्हें सोया जान कर अपने रूम में चले गए. काफी देर तक यों ही पड़े रहे. खट से हलकी सी आवाज क्या हुई, आंखें खोल कर दोनों ने एकदूसरे को कोहनी मारी. ‘‘उठ न, नींद नहीं आ रही. कोई है, लगता है.’’
‘‘हां, दादू की कहानी आज बहुत शौर्ट थी.’’ ‘‘दादू तो सोने गए, अब क्या करें?’’
‘‘सब सो गए हैं लगता है, रसोई में छोटी लाइट जल रही है. चल चोर को पकड़ते हैं.’’ दोनों पलंग से उतर कर अपनीअपनी टौयगन थाम लीं और सधे कदमों से कहतेफुसफुसाते हुए नन्हे जासूस मिशन पर चल पड़े. ‘‘तू इधर से जा बंटू, मैं उधर से, अकेला डरेगा तो नहीं?’’
‘‘बिलकुल भी नहीं.’’ ‘‘अच्छा, तो यह मम्मी का स्टौल पकड़, अगर चोरी करते कोई दिखे, पीठ पर गन लगाना और झट से स्टौल में फंसा कर चिल्लाना. सही पकड़े हैं नानी के जैसे. खूब मजा आएगा.’’
‘‘रात के एक बज रहे थे. ताली मार कर दोनों अलगअलग दिशाओं में चल पड़े.
तेजप्रकाश और सुशीला स्वाद व खुशबू का पूरा मजा ले भी न पाए कि बच्चों ने अलगअलग पर लगभग एकसाथ उन्हें धर पकड़ा और खुशी से चिल्लाए, ‘‘सही पकड़े हैं दादू…, पापा…, मम्मी…सही पकड़े हैं नानी…, मम्मी… पापा…, सब जल्दी आओ.’’
घबराए से तेजप्रकाश किचन में मलाई की चोरी बयान करती अपनी मूंछों के साथ खौलती मसालेदार कड़क चाय को देख रहे थे तो कभी सामने गुस्से में खड़े तरुण को और सुशीला अपने खुले हुए बैग से झांकती लालमिर्च, अचार और मसालेदार इमली की खुली शीशियों को, तो कभी आगबबूला हुई नजरों से उन्हें देखती अदिति को देख कर नजरें चुरा रही थीं. ‘‘अदिति, देखो अपने लाड़ले पापाजी क्या कर रहे हैं, बड़ा विश्वास है न तुम्हें इन पर?’’
‘‘शांत हो जाओ तरु, आगे से ऐसा नहीं होगा.’’ ‘‘और तुम अपनी चहेती मम्मीजी को देखो, डाक्टर ने सख्त मना किया है पर मानना ही नहीं, बच्ची बनी हुई हैं, मुझ से छिपा कर रखा था, छिपा कर, देखो ये…’’ वह एक हाथ में शीशी दूसरे से मम्मीजी को थामे रसोई में आ गई.
‘‘अदिति, सुन तो, अब ऐसा नहीं होगा.’’ तेजप्रकाश और सुशीला के हाथ बरबस अपनेअपने कानों तक चले गए, ‘‘देखो, इस बार हम सही पकड़े हैं… पर अपनेअपने कान…’’ सुशीला ने गोलगोल आंखें नचा कर कुछ यों कहा कि तरुण, अदिति की हंसी छूट गई.
‘‘कोई हमें भी तो बताए क्या हुआ,’’ दादी तारा की आवाज सुन बंटू, मिंकू भागे कि उन्हें कौन पहले बताएगा कि आज वे कैसे दादू, नानी की चोरी सही पकड़े हैं.
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‘ईश्वर की विशेष कृपा से विवाह के 20 साल सफलतापूर्वक गुजर गए,’ उन्होंने बतौर इन्फौर्मेशन, धांसू अचीवमैंट, फांसू फोटो शृंखला के साथ फेसबुक पर गुरिल्ला स्टाइल में घोषणा की, ‘थैंक्स टू ईश्वर.’ यों आप चाहें तो इसे महज सूचना भी मान सकते हैं, धमकी भी और चैलेंज भी. आगे उन्होंने याचना सी करते हुए लिखा, ‘इस मौके पर आप की शुभकामनाओं की दरकार है.’ सूचना दे कर वे लाइक व कमैंट रूप में शुभेच्छाओं का इंतजार करने लगे. शुभेच्छाओं से बल मिलता है. विशेषकर विवाह जैसे मसलों में शुभेच्छाएं शिलाजीत से भी ज्यादा बलवर्द्धक होती हैं.
गौर करने वाली बात यह थी कि उन्होंने 20 साल सफलतापूर्वक कहा. इसे आप व्यंजना में शांतिपूर्वक समझ सकते हैं. गोया एक पिक्चर है, जो 20 वर्षों से चल रही है और पिक्चर अभी बाकी है, मेरे दोस्त. कई दोस्तों ने हैरत जताई. वौव, 20 साल, इतना लंबा पीरियड. रश्क तो होता है. कुछ हतप्रभ हुए, तो कुछ स्मृतियों में खो गए कि उन के अपने कैसे गुजर रहे हैं. कुछ ने ‘कैसे कटे ये दिन, कैसे कटीं ये रातें…’ गुनगुनाते हुए ठंडी आह भरी. दिन हैं कि गुजरने का नाम नहीं लेते. इस से पता चलता है कि विवाह में ईश्वर की विशेष कृपा की कितनी अहमियत है. थैंक्स टू ईश्वर.
ईश्वर अपनी विशेष कृपादृष्टि बनाए रखे, तो 20 क्या, बंदा सात जन्मों तक का रिस्क उठा लेता है. बिन ईश्वर कृपा, 7 मिनट ही सात जन्मों के समान लगते हैं. ऐसे में 20 साल गुजरना अपनेआप में बड़ी परिघटना है. बिग अचीवमैंट है. स्तुत्य है. प्रशंसनीय है. ओलिंपिकनुमा कारनामा है. इस से तो गठबंधन की सरकार चलाना कहीं आसान है, सिर्फ तुष्टीकरण से चल जाती है. शादीशुदा जिंदगी सतत संतुष्टिकरण तक से सफलतापूर्वक नहीं चलती. इसलिए ऐसे मसलों में आदमी स्वयं पर कतई भरोसा नहीं करता. अपने बूते चला ले जाने का कोई मुगालता नहीं पालता.
हालांकि, विवाहपूर्व बड़ा जोश रहता है, दौड़ा ले जाने का. फिर धीरेधीरे दिन गुजरते हैं, विश्वास के आईने पर जमी धूल छंटती है, सबकुछ ईश्वर पर छूटता जाता है. मैं ने इधरउधर खूब खंगाला. मुझे एक भी व्यक्ति ऐसा नहीं मिला जिसे खुद पर भरोसा हो, जिस ने कहा हो कि हमारे प्यार, सहयोग, समर्पण के बल पर विवाह के 20 साल गुजर गए. इस के पीछे कारण शायद यह हो कि ईश्वर पर छोड़ देने से किसी पक्ष को एतराज नहीं होता. वरना एक के श्रेय ले लेने पर दूसरा पक्ष चैलेंज कर सकता है, समर्थनवापसी का ऐलान कर सकता है. चलती सरकार को अल्पमत में ला कर पटखनी दे सकता है.
एक मित्र हैं, जिन्होंने परसों फेसबुक पर लिखा- ‘पता ही नहीं चला, विवाह के 25 साल कैसे गुजर गए.’ इस में ऐसा ध्वनित हो रहा था कि उन्हें ये साल गुजरने की कतई उम्मीद नहीं थी और अब वे खुद यह कल्पना कर हैरान हो रहे हैं कि हा, हू, हाय, उफ, अहा, हुर्रे. आखिर गुजर कैसे गए. एक मित्र तो हर साल मैरिज एनिवर्सरी पर लिखते हैं- ‘जैसे कल ही की बात हो.’ उन का समझ आता है. हादसों को कौन भूल सकता है, भला. कल के से ही लगते हैं. वह तारीख, वह दिन, वह घटना उन के दिमाग में इस कदर फ्रीज हो गई है कि उस के बाद का उन्हें याद ही नहीं. उन्हें रहरह कर लगता रहता है जैसे कल की ही बात है.
कुछकुछ लोगों के दिमाग के पट पर उन की शादी होने की घटना घंटे की तरह टकराती रहती है. अनुगूंज आती रहती है-जैसे कल की ही बात है. सही भी है, जिस से आज प्रभावित हो रहा हो, उस कल को कौन भूल सकता है. पिछले हफ्ते एक मित्र ने मैरिज एनिवर्सरी पर रात 12 बजते ही तूफानी अंदाज में फेसबुक पर दनादन कई तसवीरें अपलोड कर डालीं. या तो उत्साह का अतिरेक था, या फिर एक और साल गुजर जाने की बेतहाशा खुशी कि उन्हें सुबह तक का भी इंतजार नहीं हुआ. मुमकिन है, इस के पीछे शायद यह धारणा भी हो कि विवाह के बाद वह सुबह कभी आती ही नहीं, जिस का इंतजार रहता है, इसलिए जब मानो, तभी सवेरा. आधी रात को सुबह मानने की उलटबांसी वैवाहिक जीवन में ही संभव है. खैर, सिलसिलेवार डाली गई तसवीरों का कुल सार यह था कि शादी के बाद इस बंदे से सुखी व्यक्ति संसार में दूसरा कोई नहीं.
मैं ने चकित होते हुए शुभकामना देने के लिए फोन किया. उन की कौलर ट्यून ‘सुन रहा है तू, रो रहा हूं मैं…’ सुन कर चौंक गया. फोन उठाते ही मैं ने कहा, भई, सुन तो रहा हूं मैं, लेकिन तुम्हें रोते हुए कभी देखा नहीं. वह एकदम रोंआसा सा हो गया, जैसे दुखती नस पर मैं ने हाथ रख दिया हो, वह बोला, आप जैसे मित्रों से ही उम्मीद रहती है कि कम से कम वे तो सुन ही लेंगे. वैसे भी, विवाह लोकल एनेस्थेसिया की तरह होता है, सुन्न में गुजर जाता है. होश आया और जोश गया.
मैं ने दिलासा देने के अंदाज में कहा, ‘सही कह रहे हो, भाई. खुशफहमी में साल गुजर जाते हैं. इसीलिए समझदार कहते हैं, खुशफहमी सफल वैवाहिक जीवन का आधार है.’ वह ‘हूंहूं’ करता रहा.
उन्हें एक बार फिर सांत्वनात्मक बधाई देने के बाद फोन काट कर मैं खुशफहमी पालने लगा, ताकि मेरे अपने आधार को मजबूती मिल सके.
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‘ऐ… इधर आ… कौन है तू? मैं तेरे बाप का नौकर हूं, जो तू ने मेरा नाम नहीं बोला. बताऊं क्या तुझे…’
5 सितंबर, 2016 को ये अल्फाज मध्य प्रदेश के मुरैना जिले की दिमनी सीट से बहुजन समाज पार्टी के विधायक बलवीर दंडोतिया ने मंच से इस्तेमाल किए, तो सनाका सा खिंच गया था कि ये विधायकजी अचानक इतने उखड़ क्यों गए? ‘शिक्षक दिवस’ मनाए जाने के दौरान गर्ल्स कालेज में छात्राओं को सरकार की तरफ से स्मार्टफोन बांटे जा रहे थे, तब मंच पर राज्य के उच्च शिक्षा मंत्री जयभान सिंह पवैया और खा- मंत्री रुस्तम सिंह भी मौजद थे. जलसे का संचालन कर रहे कालेज के प्रोफैसर जेके मिश्रा ने सकपका कर दोनों मंत्रियों की तरफ देखा, तो उन के चेहरों पर कोई तल्खी नहीं थी. उलटे बाद में जयभान सिंह पवैया ने कहा कि जनप्रतिनिधियों का नाम लेने से पहले उन्हें माननीय, सम्मानीय या आदरणीय कहा जाना चाहिए, तो बात आईगई हो गई, लेकिन कई सवाल एकसाथ छोड़ गई कि आखिरकार ऐसे हालात बने क्यों?
एक विधायक द्वारा प्रोफैसर की बेइज्जती का राज्यभर के प्रोफैसरों ने विरोध किया, लेकिन नेताओं खासतौर से बसपा ने हवा नहीं दी, तो वजह साफ है कि यह एक बसपा विधायक से जुड़ा मामला था. बलवीर दंडोतिया का यह कहना अपनी जगह वाजिब था कि संचालन करने वाले प्रोफैसर ने उन का नाम नहीं लिया, उन्हें न्योता दे कर बुलाया है, तो उन की बेइज्जती क्यों की गई?
सदियों पुराना सवाल
दरअसल, मुरैना के इस वाकिए में भी राजनीति कम जातिगत भेदभाव ज्यादा है, जिस के तहत एक विधायक को महज बसपा का होने के नाते जानबूझ कर सवर्णों के बराबर इज्जत नहीं दी जाती.
देश में कहीं भी देख लें, दलितों की एक आदत सी पड़ी हुई है कि वे ऊंची जाति वालों को अभी भी हुजूर, माईबाप, अन्नदाता, साहब या मालिक कह कर ही बुलाते हैं.
यह आदत पीढ़ी दर पीढ़ी दलित तबके के लोग गुलामी की तरह ढो रहे हैं, तो वजह साफ है कि उन में अपने नीची जाति होने का जज्बा कूटकूट कर भरा हुआ है. दूसरे, दबंगों का दबदबा अभी भी ज्यों का त्यों है. शहरों में थोड़ेबहुत हालात बदले हैं, पर वहां यह दिमागी गुलामी की सोच दूसरे तरीके से देखने में आ ही जाती है.
क्यों दलित ऊंचे तबके वालों को इज्जत से बुलाए जाने के लिए मजबूर हैं? इस सवाल का कोई एक नहीं, बल्कि सैकड़ों जवाब हैं. सार यही निकलता है कि दलित अभी भी दलित है. उस से इज्जत करवाना और उस की बेइज्जती करना 2 अलगअलग बातें हैं.
‘दरअसल, यह दिमागी गुलामी है…’ बहुजन संघर्ष दल के अध्यक्ष फूलसिंह बरैया बताते हैं कि दलित अगर ऊंची जाति वालों की जीहुजूरी नहीं करता, तो उसे तरहतरह से इतना तंग कर दिया जाता है कि वह जिंदगीभर किसी पंडित या ठाकुर को उस का नाम ले कर नहीं बुला पाता. उलटे पांय लागूं, पंडितजी या प्रणाम ठाकुर साहब ही कहता रहता है यानी दबंगों के जुल्मोसितम से बचने के लिए वह इज्जतदार लफ्जों से ऊंची जाति वालों को पुकारने को मजबूर रहता है.
दलित संघ, सोहागपुर के एक कार्यकर्ता रतन उमरे का कहना है कि ऐसे हालात जानबूझ कर बनाए गए थे, जिन्हें आज भी बरकरार रखा गया है. वजह, छोटी जाति वालों के दिलोदिमाग में दहशत और गुलामी की आदत बनी रहे. आज तक किसी इलाके में सुनने को नहीं आया कि किसी दलित ने ऊंची जाति वाले किसी शख्स को उस का नाम ले कर बुलाया हो.
हालांकि रतन उमरे दलितों को भी इस का जिम्मेदार यह कहते हुए मानते
हैं कि अब लोकतंत्र है और दलित किसी को साहब, हुजूर, भाई साहब, हुकुम, अन्नदाता या मालिक कहने के लिए कानूनन मजबूर नहीं है, लेकिन सामाजिक तौर पर कोई खास बदलाव देखने में नहीं आ रहे हैं.
दूसरी बात यह है कि तालीम हासिल करने और सरकारी नौकरियों में आने के बाद भी दलितों में उम्मीद और जरूरत के मुताबिक आत्मविश्वास नहीं आ पाया है, क्योंकि बारबार तरहतरह से धर्म और उस के उसूलों का हवाला दे कर उन्हें यह एहसास कराया जाता है कि तुम छोटी जाति के हो, जो ऊंची जाति वालों की सेवा और जीहुजूरी करने के लिए पैदा हुए थे. अगर ये उसूल तोड़े, तो तुम्हारा लोक तो दबंग बिगाड़ेंगे ही, परलोक भी भगवान बिगाड़ देंगे.
पहले यह एहसास लतिया कर कराया जाता था, तो अब बराबरी का ढिंढोरा पीट कर कराया जाता है.
इस के उलट दलितों को जानबूझ कर उन की जाति के हिसाब से पुकारा जाना आम है. इस पर हजार में से एक दलित कानून और संविधान का हवाला दे कर एतराज जताता है, लेकिन उस का असर सिस्टम या समाज पर नहीं पड़ता.
हरिजन ऐक्ट के तहत मामला दर्ज जरूर होता है, लेकिन बाद में उस का क्या होता है, यह किसी को पता नहीं चलता, क्योंकि 95 फीसदी मामलों में सुलह हो जाती है और इस बाबत दलितों पर चौतरफा दबाव बनाया जाता है, जिस से वे घबरा जाते हैं.
भोपाल के एक पटवारी की मानें, तो वे कायस्थ हैं और ऊंची जाति के हैं. एक दफा दलित तबके के एक तहसीलदार उन के घर आए, तो चायनाश्ता करने में ऐसे हिचक रहे थे मानो किसी का कत्ल कर रहे हों.
ये पटवारी साहब कहते हैं, ‘‘मैं ने तो अपनी तरफ से अपने अफसर का पूरी तरह ध्यान रखा. उन्हें दूसरों के बराबर इज्जत दी और पूछपरख की, लेकिन वही अपनी जाति की हीनभावना को ले कर सिकुड़े जा रहे थे, तो मैं क्या करता?’’
फिर ढकोसला क्यों
केंद्र की सत्ता में बैठी भाजपा का अब देश के ज्यादातर राज्यों पर कब्जा है, जो इन दिनों दलित हिमायती होने का ढिंढोरा पीटने में सब से आगे है. भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह दलितों के घर जा कर खाना खा रहे हैं, उन के साथ कुंभ में डुबकी लगा रहे हैं, पर दलितों की सोच बदलने के लिए कोई कुछ नहीं कर रहा.
ऐसा इसलिए कि हकीकत में धर्म और समाज को हांकने व चलाने वाले लोग दलितों से भेदभाव के मामले में किसी पार्टी के नहीं हैं और अपना दबदबा कायम रखने के लिए हर टोटका आजमाते हैं.
अमित शाह या राहुल गांधी के दलितों के घर जाने, सोने और खाने से दलितों में गैरत नहीं आने वाली, क्योंकि जरूरत जहां सुधार की है, वहां कोई पहल नहीं हो रही है.
कभी किसी पार्टी के नेता ने इस बाबत नहीं सोचा कि समाज की खासतौर से गांवदेहातों की हालत अब भी पुराने जमाने की हिंदी फिल्मों सरीखी है. इन में दलित ऊंची जाति वालों की ड्यौढ़ी पर उकड़ू ही बैठता है. उन के यहां उन्हें पानी को भी कोई नहीं पूछता और जब भी दलित सवर्ण से कुछ कहता है, तो सब से पहला लफ्ज हुजूर माईबाप, अन्नदाता या मालिक वगैरह ही होता है.
दिल्ली की जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी के छात्र नेता कन्हैया कुमार और गुजरात के ऊना में दलितों की गैरत की लड़ाई लड़ रहे जिग्नेश मेवाणी जैसे नौजवान इस तरफ पहल जरूर कर रहे हैं, पर उन का भी दायरा सिमटता जा रहा है.
दरअसल, ये नेता शहरों में बराबरी की लड़ाई लड़ रहे हैं, जबकि जरूरत देहातों में लड़ाई लड़ने की है और लड़ाई का यह मतलब नहीं कि लाठियां चलें, सिर फूटें, बल्कि यह है कि दलितों को चेताया जाए कि वे किसी के गुलाम या सेवक नहीं हैं, बल्कि एक आजाद देश के बाशिंदे हैं, जिन्हें संविधान ने बराबरी का दर्जा दिया हुआ है.
दरअसल, दलितों से लफ्जों का भेदभाव स्कूल से ही शुरू हो जाता है, सवर्णों के बच्चे दलित बच्चों के लिए उन्हीं जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल करते हैं, जो उन्हें घर से सीखने को मिलते हैं यानी सवर्णों में जाति के लिहाज से बड़ा होने की ठसक बचपन से ही भर दी जाती है और दलितों को भी बचपन से ही समझ आ जाता है कि अगर जूतों की मार और बेइज्जती से बचना है, तो ऊंची जाति वालों को साहबमालिक वगैरह कहते रहो, नहीं तो इस का खमियाजा कब किस शक्ल में भुगतना पड़ जाए, इस की कोई गारंटी नहीं.
यह गारंटी कोई नेता या अफसर नहीं ले सकता, जो मंच पर ही इज्जत से न बुलाने पर झगड़ पड़ते हों और जिस का असर पूरे राज्य पर पड़ता हो.
भोपाल के एक सरकारी कालेज के एक दलित प्रोफैसर की मानें, तो यह सच है कि दलितों के खानपान और रहनसहन में बदलाव आया है, पर बोलचाल के मामले में वे अभी भी सदियों पुरानी जगह खड़े हैं. यहां ऊंची जाति वाला उन के लिए आदरणीय और पूजनीय होता है, इस ओछी सोच से छुटकारा पाने के लिए तो खुद दलितों को पहल करनी पड़ेगी कि वे ऊंची जाति वालों को जीहुजूरी वाले संबोधनों से बुलाना बंद करें.
इस बारे में विदिशा के एक गांव के स्कूल में पढ़ाने वाले टीचर का कहना है कि आरक्षण के जरीए जिन दलित नौजवानों में गैरत आ रही है, वे जब गांव आते हैं, तो उन्हें कोई सवर्ण पूछता नहीं और कहा यह जाता है कि माया तेरे तीन नाम परशु, परसा, परशुराम यानी दलित, पिछड़ा और सवर्ण.
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वह औरतों से खूब प्यार से मीठी-मीठी बातें करता है. खूब पुचकारता है. उसके बदन को सहलाता है, टटोलता है. काफी देर तक उसके जिस्म पर हाथ फेरता रहता है. औरत या लड़की के इलाज के नाम पर जम कर अपने सेक्स की भूख को शांत करता है.
वहीं कोई मर्द मरीज अपने इलाज के लिए आता है तो उसे 2-3 मिनट में ही चलता कर देता है. झाड़-फूंक के जरिए रोगियों का इलाज करने वाले ढ़ोंगी और पाखंडी बाबाओं का यही हथकंडा है.
बीमारियों के इलाज और झाड़-फूंक करने वाले ठग बाबा और ओझा मर्दों के झाड़-फूंक में कम और औरतों के झाड़-फूंक में ज्यादा दिलचस्पी लेता है. ढोंगी बाबा इलाज के नाम पर औरतों को नशा कराके बेहोश करने के बाद बलात्कार तक कर डालता है. लेकिन फिर भी लोगों की आंखें नहीं खुल रही हैं और सबकुछ जानने के बाद भी लोग बाबाओं के बुने जाल में पफंसने चले जाते हैं.
वहीं मर्दों का भूत-प्रेत झाड़ने के नाम पर उनके शरीर पर डंडा, जूता, चप्पल, थप्पड़ की धुंआधार बारिश की जाती है. हर महीने पूर्णमासी के मेले के मौके पर तकरीबन हर जिलों के गांवों में बाबाओं का धंधा खूब चलता रहता है.
पटना में तो जिला अधिकारी के औफिस और पुलिस हेडक्वार्टर के पास ही भूत-प्रेत झाड़ने और डायन-चुड़ैल भगाने का धंधा बेरोक टोक चलता रहता है. पूर्णमासी के दिन तो वहां बाबाओं की ठगी का खुला खेल चलता रहता है. कानून का पालन करने और कराने वालों के नाक के नीचे लूट और ठगी का जाल पफैला रहता है और वे लोग तमाशा देखते रहते हैं.
पटना के गंगा नदी के किनारे क्लेक्ट्रेरियट घाट के किनारे बिहार के गया जिला के शेरघाटी इलाके का रहने वाला किसान मदन साहनी बताता है कि उसकी 22 साल की बीबी सीमा को 3-4 दिनों से काफी उल्टियां हो रही थी. गांव के डाक्टरों को दिखाया पर कोई पफायदा नहीं हुआ. उसकी हालत बिगड़ती गई तो उसकी झाड़-फूंक के लिए बाबा के पास लेकर गया.
बाबा ने कहा कि उसके उपर प्रेत की छाया है. उसे ठीक करने के लिए सीमा का औपरेशन करना पड़ेगा. इसके लिए ढाई हजार रूपया, 5 किलो सेव, 2 किलो संतरा, एक किलो मेवा, एक किलो घी और हवन का सामना लगेगा. रजनी की लगातार बिगड़ती हालत देख मदन सारा खर्च उठाने को तैयार हो गया.
जब सारा सामान आ गया तो बाबा ने सीमा को लिटा कर उसे चादर से पूरी तरह ढक दिया. उसके बाद कुछ बुदबुदाते हुए मंत्र पढ़ने का ड्रामा करता हुआ चादर के भीतर हाथ घुसा कर ऑपरेशन करने का काम शुरू कर दिया.
औपरेशन के बहाने वह सीमा के जिस्म से खेलता रहा और उसका पति मदन चुपचाप खड़ा तमाशा देखता रहा. पति के सामने ही बाबा सीमा के अंगों से खेलता रहा और आध घंटा के बाद जब बाबा का मन भर गया तो उसने मदन से कहा कि औपरेशन खत्म हो गया और वह अपनी बीबी को घर ले जाए.
झाड़-फूंक के बाद भी सीमा की तबीयत ठीक नहीं हुई तो उसे इलाज के लिए बाद में पटना के बड़े डौक्टर के पास ले जाया गया. कुछ समय के इलाज के बाद सीमा की तबीयत ठीक हो गई. डॉक्टरों ने बताया कि सीमा को मलेरिया हुआ था.
ढोंगी बाबाओं की कारगुर्जरियों को देख आसानी से अंजादा लगाया जा सकता है कि वह ठग है और उसकी दिलचस्पी सिर्फ औरतों की झाड़-फूंक और टोटका करने में है. टोटके के बहाने वह औरतों के जिस्म को अपने हाथों से टटोल-टटोल कर अपनी वासना की प्यास बुझाने का मजा लेता है.
औरतों के घरवालों के सामने बड़ी ही चालाकी और बेशर्मी से बीमार औरत के कपड़ों के भीतर अपना हाथ घुसेड़ देता है और आंखें बंद कर मंत्र पढ़ने का ढोंग करता रहता है. औरत के घरवालें भी बाबा की सेक्सी हरकतों को इलाज करने का तरीका समझ कर चुपचाप तमाशा देखते रहते हैं और बाबा अपना ‘खेला’ कर लेता है.
आमतौर पर यही देखा जाता है कि चाहे कोई भी बीमारी हो, बाबा उसे भूत, प्रेत, डायन, बुरी आत्मा, चुड़ैल, जिन्न आदि का प्रकोप बता कर अनपढ़ गांव वालों को अपने जाल में पफंसा लेता है.
शेखुपरा जिला के भदौसी गांव की रजिया खातून को शादी के 7 साल बाद भी बच्चा नहीं हो रहा था तो उसके परिवार वाले भी बाबा के पास इलाज के लिए गए. बाबा ने औरत के घरवालों के सामने ही औरत के कपड़ों के भीतर हाथ घुसा कर मंतर पढ़ने का ड्रामा करने लगा.
8-10 मिनट तक अंगों को सहलाने के बाद बाबा ने 5 हजार रूपए का पूजा और हवन का सामान लाने को कहा और 3 रात पूजा करने की बात कही. रजिया के शौहर परवेज ने बताया कि गांव के स्कूल के हेडमास्टर ने पटना या दिल्ली जाकर इलाज कराने की सलाह दी. पटना में डॉक्टर से इलाज कराने के बाद उसकी बीबी को बच्चा हुआ. वह बाबा के चक्कर में फंस कर पैसा और समय बर्बाद करने से बच गया.
औरतों को सहला-पुचकार कर घंटों समय लगा कर इलाज किया जाता है वहीं मर्दो का इलाज बड़े ही टरकाउ तरीके से मिनट 2 मिनट में कर दिया जाता है. पटना मेडिकल कॉलेज हॉस्पीटल के डॉक्टर विमल कारक कहते हैं कि झाड़-फूंक कर इलाज करने वाले बाबाओं का 2 ही मकसद होता है. रूपया और सेक्स की भूख को शांत करना.
भूत-प्रेत झाड़ने के नाम पर गांव के लोग आसानी से उनके जाल में फंस जाते हैं और अपनी आंखों के सामने बाबा की बेशर्म हरकतों को पुतला बने देखते रहते हैं. इलाज के नाम पर बाबा अपनी सेक्स की आग को ठंडा करता है और औरत के घरवालों से रूपया भी ठग लेता है. इसे ही कहते हैं हींग लगे न फिटकिरी और रंग चोखा आए.
नालंदा जिला के नूरसराय गांव का रहने वाला 42 साल का श्याम राय बताता है कि पिछले महीने उसके सिर में चक्कर आने लगा. हर 2-4 दिनों पर जोर का चक्कर आने लगा. उसके घरवाले उसे बाबा के पास ले गए तो बाबा ने दूर से ही देख कर कहा कि उसके सिर पर भूत का साया है.
जब घरवालों ने उसका इलाज करने का अनुरोध किया तो पहले तो बाबा ने कहा कि अभी उसके पास समय नहीं है. अभी 12 ऑपरेशन करना है. 5 दिनों के बाद आएं. जब लोगों ने बाबा से मिन्नतें की तो बाबा ने उसे बाहर बैठने को कहा.
5 घंटे के बाद बाबा हाथ में डंडा लिए अपनी झोपड़ी से बाहर निकला. आते ही उसने सुखदेव के सिर पर डंडे से मारना चालू कर दिया. 8-10 डंडा मारने के बाद बाबा ने कहा कि अब भूत परेशान नहीं करेगा, फल, फूल और हुमाद के लिए 501 रूपया दानपेटी में डाल दो.
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भगवा राजनीति का पूरापूरा लाभ देशभर के धर्म के दुकानदारों को मिल रहा है. हिंदूमुसलिम विवाद, आरक्षण, पद्मावती, पाकिस्तान, गौसेवा, गौवध, तीन तलाक, योग, वंदेमातरम, राष्ट्रभक्ति के नाम पर पूजापाखंड, भक्ति आदि का लाभ मिल रहा है नेताओं को और पंडेपुजारियों को भी. इस वर्ष मकर सक्रांति के मौके पर इलाहाबाद के माघ मेले में रिकौर्ड संख्या में अंधभक्तों ने गंगायमुना में डुबकी लगाई.
यह सेवा ईश्वर की या जनता की नहीं, यह भक्तों ने खुद की सेवा भी नहीं की, बल्कि यह सेवा की गई निठल्ले हजारों साधुओं, पुजारियों, पंडों, हस्तरेखा पाखंडियों की, फूलपत्ते बेचने वाले दुकानदारों की, खाना परोसने वाले दुकानदारों की और बस मालिकों की. हर अंधभक्त ने दिल खोल कर अपनी जेब ढीली की ताकि उस के खाते में पुण्य जमा हो जाए व मरने के बाद उसे स्वर्ग मिले और जीतेजी धनधान्य ऊपर से टपक कर उस की झोली में आ गिरे.
इस बार 1.55 करोड़ अंधभक्तों ने 2 दिनों में पानी में डुबकी लगा कर इस बहकावे पर मुहर लगाई कि इसी से, और केवल इसी से, उन का कल्याण होगा. ये 1.55 करोड़ लोग जहां भी जो भी काम करते हैं, उस के प्रति उन की निष्ठा उतनी नहीं होती जितनी इस पांखड के प्रति कि डुबकी लगाने से ही वे कुछ पा सकेंगे.
सरकार इसे सफल बनाने के लिए वर्षों से करोड़ों रुपए हर साल खर्च करती है. सरकार करों से एकत्र पैसा अंधभक्तों पर इस तरह से खर्च करती है मानो विकास की कुंजी यही है. भगवा राजनीति का उद्देश्य इसी तरह का पर्यटन बढ़ाना है ताकि लोग घूमने के बहाने दानदक्षिणा दें और एक संकुचित विचारधारा के गुलाम बने रहें.
धर्म के नाम पर कितनी ही सभ्यताओं ने बड़े विशाल निर्माण किए हैं तो साथ ही, लाखों नहीं, अरबों को मारा भी है. धर्म ने सुरक्षा देने का ऐसा छद्म जाल बुन रखा है कि हर व्यक्ति का दिमाग तर्क के प्रति सुन्न हो जाता है. विज्ञान व तकनीक की उन्नति के बावजूद अच्छेअच्छे अस्पतालों और आधुनिक कारखानों में मूर्तियों की बरात लगी रहती है मानो मानव अपनेआप में सक्षम नहीं है. मानव द्वारा ही निर्मित पर अब उस का लाभ उठा रहे बिचौलिए अंधभक्तों को यही बताते हैं कि धर्म ही अकेला स्वस्थ, सार्थक, साधनसंपन्न और संपूर्ण जीवन दे सकता है.
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मुझे अपनी सहेली, जो कि जज हैं, के साथ जेल में सैक्स अपराध के आरोपों में बंद कैदियों से बात करने का मौका मिला था.
एक 24 साला कैदी ने बताया, ‘‘मैं गांव का रहने वाला हूं. शहर में मैं एक कारखाने में काम करता था. मैं जिस मकान में रहता था, वे दोनों पतिपत्नी ही उस मकान में रहते थे. उन की शादी को कई साल हो चुके थे, मगर उन के कोई बच्चा नहीं हुआ था.
‘‘30 साला मकान मालिक भी एक कारखाने में चौकीदारी करता था और रात की ड्यूटी करता था. एक रात जब वह ड्यूटी पर चला गया, तो उस की पत्नी मेरे कमरे में आई. उस समय मैं शराब पी रहा था. उस ने इतने झीने कपड़े पहन रखे थे कि उस के शरीर के सभी मादक अंग साफसाफ दिखाई दे रहे थे.
‘‘वह मुझे देख कर मुसकराने लगी. मैं हैरानी से उस की ओर देखने लगा, तो वह मुसकराते हुए बोली, ‘मुझे नहीं पिलाओगे क्या?’
‘‘इतना सुन कर मैं ने उसे एक पैग बनाया, तो उसे पी कर वह मुझ से बुरी तरह से लिपट कर बोली, ‘मैं अब रातभर तुम से मजे लूंगी. मेरा पति तो कुछ कर नहीं पाता है. वह जरा सी देर में पस्त हो जाता है. मैं प्यासी ही रह जाती हूं.’
‘‘इतना कह कर वह मेरा हाथ पकड़ कर बिस्तर पर ले गई और फिर हम दोनों ने वह किया, जो हमें नहीं करना चाहिए था. उस के बाद तो हम दोनों का यह रोजाना का ही खेल हो गया था.
‘‘एक साल तक हम दोनों का यह खेल चलता रहा, मगर एक रात उस का पति अचानक गांव से लौट आया.
‘‘मकान की एक चाबी उस के पास थी. जब कमरे में उस की बीवी नहीं मिली, तो वह मेरे कमरे पर आया. मेरे कमरे की लाइट जली हुई थी और कमरे का दरवाजा भी खुला हुआ था.
‘‘मैं और उस की बीवी अपने खेल में मस्त थे. यह देख कर उस ने अपने पड़ोसियों को वहां पर बुला लिया.
‘‘जब उस की बीवी ने अपने आपको फंसता हुआ देखा, तो वह रोते हुए बोली, ‘यह मुझे रोजाना जबरदस्ती पकड़ लेता है. मैं मना करती हूं, तो यह मेरे पति को जान से मारने की धमकी देता है. मैं डर कर इस की हवस का शिकार होती हूं. इसे खूब मारो और पुलिस के हवाले कर दो, तभी इस नीच से हमारा पीछा छूटेगा.’
‘‘उस की इन बातों को सुन कर उस के पति और पड़ोसियों ने मुझे खूब मारा और फिर पुलिस के हवाले कर दिया था.
‘‘मेरे बारे में जब मांबाप को मालूम हुआ, तो उन्होंने दुखी हो कर खुदकुशी कर ली. मकान मालकिन के चक्कर में मेरी जिंदगी बरबाद हो गई है,’’ कहते हुए वह कैदी बुरी तरह रोने लगा.
एक 55 साला कैदी से भी बात करने का मौका मिला. वे बोले, ‘‘मैं एक गांव के राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय में प्राचार्य था. मैं अनुशासनप्रिय था. मेरी इस बात के चलते शहर से रोजाना स्कूल आने वाली 2 टीचर मुझ से नाराज रहती थीं. वे रोज ही देर से स्कूल आती थीं.
‘‘एक दिन देर से आने वाली एक टीचर को अपने कमरे में बुला कर डांटा, तो उस ने अपना ब्लाउज फाड़ कर
बुरी तरह से दहाड़ मार कर रोते हुए ‘बचाओबचाओ’ की आवाज लगा कर स्टाफ को वहां बुला लिया.
‘‘जब स्टाफ वहां आया, तो उस ने रोते हुए बताया कि मैं उस की आबरू से खिलवाड़ कर रहा था. दूसरी टीचर भी सभी से कह रही थी कि यही हरकत मैं कई बार उस से भी कर चुका हूं.
‘‘तब तक गांव के और लोग भी वहां आ गए थे. उन्होंने मुझे टीचर के नाम पर कलंक मान कर उसी समय पुलिस को फोन कर मुझे गिरफ्तार करा दिया था.
‘‘बाद में मुझे पता चला कि उन्हें अपनी एक रिश्तेदार प्राचार्य को मेरे उस स्कूल में लाना था, ताकि वे अपनी मरजी से स्कूल आएंजाएं.’’
उन प्राचार्य की दास्तान सुन कर मुझे और मेरी जज सहेली को यकीन ही नहीं हो पा रहा था कि स्कूल के एक प्राचार्य के साथ ऐसी भी घिनौनी साजिश रच कर उन की जिंदगी बरबाद करने वाली टीचर भी शिक्षा विभाग में मौजूद हैं.
फिर हमें सैक्स अपराध के आरोप में जेल में बंद एक 40 साला कैदी ने बताया, ‘‘मैं अपने एक दोस्त की मदद करने की भूल की सजा भुगत रहा हूं.
‘‘उस की छोटी बहन की शादी थी. उस ने कहा कि मैं पैसे उधार ले कर उस की मदद कर दूं. मैं ने किसी जानपहचान वाले से पैसे उधार ले कर उस की मदद कर दी.
‘‘उस की बहन की शादी को काफी समय हो गया था, मगर मेरे उस दोस्त ने मुझे एक भी पैसा नहीं लौटाया था.
‘‘एक दिन मैं ने उस दोस्त से पैसे मांगे, तो वह साफ मुकर गया कि मैं ने उसे पैसे दिए ही नहीं थे.
‘‘मैं ने उसे याद दिलाते हुए पैसों के लिए कहा, तो दोस्त और उस की बीवी ने मुझे सैक्स अपराध के आरोप में जेल भिजवाने की साजिश रची.
‘‘मुझे उस की बीवी ने अपने घर पर बुलाया. मैं जब उस के घर गया, तो वह बड़े प्यार से बोली, ‘तुम्हारे दोस्त तो पैसों के इंतजाम के लिए बाहर गए हुए हैं. 3-4 दिन बाद लौटेंगे. तब तक आप यहीं रहें. मुझे मर्द के साथ सोए बगैर रात में नींद नहीं आती है. रातभर खूब मजे लेंगे,’ कह कर उस ने मुझे शराब पिलाई.
‘‘शराब पिलाने के बाद वह मुझ से बोली कि मैं उसे अपनी गोद में उठा कर पलंग पर ले जाऊं और उस के बदन के कपड़ों को फाड़ते हुए ऐसा करूं, जैसे तुम मुझ से जबरदस्ती कर रहे हो.
‘‘उस की इन बातों को सुन कर मैं ने ऐसा ही किया था. जब वह दर्द से चिल्लाने लगी, तो उस का पति आ गया.
‘‘अपनी बीवी को इस हालत में
देख वह बौखला गया. बोला, ‘तू ने मेरी बीवी के साथ यह क्या किया. अभी तुझे गिरफ्तार कराता हूं,’ कह कर उस ने मुझे गिरफ्तार करा दिया.’’
उस कैदी की दुखभरी दास्तान सुन कर मैं और मेरी जज सहेली मन ही मन सोच रही थीं कि यह कैसा जमाना आ गया है कि किसी पर रहम खा कर उस की मदद करते हैं, तो मदद पाने वाला अपनी मदद करने वाले के खिलाफ ही साजिश रच कर उस की जिंदगी तबाह कर देता है.
जेल से लौटते समय मैं और मेरी जज सहेली जेल में बंद सैक्स अपराध के इन आरोपी कैदियों की दास्तान सुन कर इसी नतीजे पर पहुंची थीं कि ज्यादातर कैदी दूसरों की साजिश के शिकार हो कर ऐसी बदहाल जिंदगी जीने को मजबूर हो रहे हैं.
मध्यप्रदेश की कांग्रेसी राजनीति में कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया 2 ऐसी समानान्तर रेखाएं हैं जिनके कहीं भी जाकर मिलने की संभावना कभी नहीं रही. मध्यप्रदेश की ही कांग्रेसी राजनीति में पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह की हालत नोटबंदी के पहले के एक हजार के नोट जैसी है जिसे न तो रखने की इच्छा होती है और न ही फेंकने की, क्योंकि आज हो न हो, कल तक तो उसकी कीमत थी. इस आकर्षक नोट को कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने तिजोरी में संभाल कर रख लिया है और 2 नए नोट चलन में ला दिये हैं जिनका खासा मूल्य बाजार में है.
कमलनाथ अब नए प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष हैं और ज्योतिरादित्य सिंधिया प्रचार समिति के मुखिया हैं. इस संतुलन से हाल फिलहाल दोनों के बीच की खाई अब और नहीं बढ़ेगी. इन दोनों ही नेताओं का अपना अलग रसूख और हैसियत है इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 2014 के लोकसभा चुनाव में प्रचंड मोदी लहर में कमलनाथ अपनी सीट छिंदवाड़ा और सिंधिया गुना से हारे नहीं थे इससे न केवल मध्यप्रदेश में बल्कि पूरी हिन्दी पट्टी में कांग्रेस की लाज बच गई थी.
अब एक बार फिर इन दोनों को लाज बचाने की जिम्मेदारी विधिवत सौंपकर राहुल गांधी ने नरेंद्र मोदी के सामने एक चुनौती पेश कर दी है, वजह सिर्फ यह नहीं कि राज्य में शिवराज सिंह विरोधी लहर चल रही है बल्कि यह भी है कि इस दफा कांग्रेस दिल से एक दिखाई दे रही है.
आमतौर पर शांत रहने वाले कमलनाथ मूलरूप से कारोबारी हैं जिन्हें आपातकाल के बाद संजय गांधी पश्चिम बंगाल से लाये थे. आदिवासी बाहुल्य जिला छिंदवाड़ा उन्हें इतना रास आया कि वे यहीं के होकर रह गए और इस इलाके को गुलजार करने में कोई कसर उन्होंने नहीं छोड़ी है. संजय गांधी की मौत के बाद भी कमलनाथ ने गांधी परिवार का साथ नहीं छोड़ा और इंदिरा गांधी और फिर राजीव गांधी के बेहद भरोसेमंद और वफादार नेताओं में उनका नाम शुमार होने लगा.
कब आहिस्ता से मध्यप्रदेश की राजनीति में कमलनाथ, शुक्ला बंधुओं, अर्जुन सिंह और माधवराव सिंधिया जैसे धाकड़ नेताओं की कद काठी के बराबर के नेता हो गए इसका एहसास जब कांग्रेसियों को हुआ तब तक नर्मदा का काफी पानी बह चुका था. सोनिया गांधी और राहुल गांधी के भी वे खास सिपहसलार हैं, मध्यप्रदेश कांग्रेस का अध्यक्ष पद संभाल लेना इसका सबूत है. पिछले तीन विधानसभा चुनावों से कांग्रेस प्रदेश में सत्ता के लिए तरस रही है बावजूद इस हकीकत के कि उसके पास एक से बढ़ कर एक जमीनी नेता हैं तो इसकी उजागर वजह उसमें पसरी गुटबाजी ही रही है. आपसी फूट का जो पौधा अर्जुन सिंह रोप गए थे उसे मुख्यमंत्री रहते 1993 से लेकर 2003 तक दिग्विजय सिंह ने मुरझाने नहीं दिया और बाद में भी उसे खूब खाद पानी से सींचा.
लेकिन दिग्विजय सिंह भूल गए थे कि लोकतन्त्र में कोई भी पार्टी एक नेता के दम पर ज्यादा नहीं चलती और इस भूल का खामियाजा वे आज तक भुगत भी रहे हैं. हालिया फेर बदल में उनकी भूमिका कुछ इस तरह समेट कर रख दी गई है जिस पर न तो वे खुश हो सकते और न ही अफसोस जाहिर कर सकते. दिग्विजय सिंह के बारे में गलत नहीं कहा जाता कि वे कांग्रेस को जिता भले ही न पाएं लेकिन हराने में अहम रोल निभा सकते हैं. पिछले दो विधानसभा चुनावों में उनकी भूमिका ने इस मिथक को एक पुख्ता ख्याल में बदला भी था.
जब वे अपने ही कर्मों यानि तोड़ फोड़ की राजनीति के चलते हाशिये पर आ गए तब भी अपनी हरकतों से बाज नहीं आए और 6 महीने की फ्लाप ही सही नर्मदा यात्रा करने के बाद अपने तरकश का आखिरी जहर बुझा तीर छोड़ ही दिया कि प्रदेश कांग्रेस का मुखिया या मुख्यमंत्री पद का चेहरा कमलनाथ ही होना चाहिए तो बात फिर बिगड़ती नजर आई. दिग्विजय सिंह की मंशा इस बार भी नाथ – सिंधिया के बीच की खाई और गहरी करने की थी, अगर ज्योतिरादित्य की नजरंदाजी की जाती तो कांग्रेस वहीं खड़ी नजर आती जहां साल 2003 में थी.
चतुराई दिखाते राहुल गांधी ने कमलनाथ और ज्योतिरादित्य दोनों को बराबर वजन देते दिग्विजय सिंह की बात भी रख ली और उनकी मंशा पर पानी फेरते उन्हें खुला भी छोड़ दिया कि अब वे जो चाहे सो कर लें. अब दिग्विजय पहले सी कोई खुरफात करने की स्थिति में नहीं हैं क्योंकि उन्हे अपने बेटे और पत्नी अमृता राय को चुनाव लड़ाना है दूसरे उनका गुट भी तितर बितर हो चुका है और उम्रजनित थकान का शिकार भी वे हो चले हैं.
चार कार्यकारी अध्यक्ष जीतू पटवारी, राम निवास रावत, सुरेन्द्र चौधरी और बाला बच्चन को बनाकर राहुल गांधी ने क्षेत्रीय और जातिगत समीकरण भी साध लिए हैं और कमलनाथ को सहूलियत भी दे दी है कि उन्हें अपना कारोबार और संसद छोडकर भागदौड़ी करने की जहमत उठाने की जरूरत नहीं, बात या यह नियुक्ति विधानसभा चुनाव तक के लिए ही है अगर कांग्रेस हारी तो कमलनाथ खुद हार की जिम्मेदारी लेते पद छोड़ देंगे और जीती तो अब तक उसे संभाले रखने वाले अरुण यादव को पद वापस ससम्मान सौंप दिया जाएगा.
इस डील में कोई जोखिम नहीं है वजह कमलनाथ की तरह मुद्दे की बात ज्योतिरादित्य सिंधिया को भी समझ आ रही है कि अगर इस बार भी कांग्रेस हारी तो उनकी हालत भी दिग्विजय सरीखी हो जाएगी. सिंधिया का अपना एक अलग ग्लेमर युवाओं और महिलाओं में है अलावा इसके बीते दो सालों से वे जमीनी मेहनत भी करते आम जनता के बीच जाकर अपनी महल और महाराजा वाली छवि से छुटकारा पाने की कोशिश में कामयाब होते नजर आ रहे हैं. पहले अटेर और फिर अशोकनागर और कोलारस विधानसभा के उपचुनाव अपने दम और पहुंच पर जिताकर उन्होंने शिवराज सिंह की नींद तो उड़ा ही रखी है.
नया फेरबदल कांग्रेस को सुकून देने वाला है जिसे एक बड़ी और एकलौती चुनौती शिवराज सिंह से जूझना है. यह कोई आसान काम भी नहीं है बावजूद इस हकीकत के तीसरे कार्यकाल के उत्तरार्ध में शिवराज सिंह से दलित आदिवासी युवा और किसान उतने ही नाराज हैं जितने 2003 में दिग्विजय सिंह से थे.
इन दिनों शिवराज सिंह की बौखलाहट शबाब पर है जो 2003 के दिग्विजय सिंह की तरह दलितों की हिमायत पर कुछ इस तरह उतारू हो आए हैं मानों सवर्ण वोटो की कोई अहमियत ही न हो. दलितों और आरक्षण की उनकी खुलेआम तरफदारी से सवर्ण नाराज हैं और भाजपा का तगड़ा वोट बैंक ब्राह्मण तो उन्हें श्राप तक दे चुका है. इस पर भी दिक्कत यह कि दलित उनके झांसे में नहीं आ रहा है. शिवराज सिंह कैसे कमलनाथ और सिंधिया की जुगलबंदी से निबटेंगे यह देखना दिलचस्पी नहीं बल्कि रोमांच की भी बात होगी. इन दोनों के ही पास पैसों और साधनों की कमी नहीं है यानि कांग्रेस की कंगाली का कोई असर ये दोनों चुनाव पर नहीं पड़ने देंगे.
शिवराज सिंह की एक बड़ी दिक्कत उनकी पार्टी के कुछ बड़े नेता भी होंगे जिनमें बाबूलाल गौर, राघव जी भाई और सरताज सिंह के नाम प्रमुख हैं, यानि भाजपा और शिवराज सिंह की मौजूदा हालत और दिक्कतें वैसी ही हैं जैसे 2003 मे कांग्रेस और दिग्विजय सिंह की हुआ करती थीं. इन सबसे भी बड़ी दिक्कत नरेंद्र मोदी का उतरता जादू है जिनकी जुमलेबाजी अब कहीं नहीं चल रही. मुसलमान और दलित तो अब उनके जिक्र से ही चिढ़ने लगे हैं.
इन हालातों में कांग्रेस का फैसला सटीक तभी साबित होगा जब नाथ और सिंधिया दोनों वाकई मिलकर काम करें और वोटर के गुस्से को लाइटर दिखाते रहें उनकी राह के सनातनी रोड़े दिग्विजय सिंह के पर राहुल गांधी ने कुतरे भी इसीलिए हैं.
VIDEO : प्री वेडिंग फोटोशूट मेकअप
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