बिखरे हुए रिश्तों में

1 दिसंबर, 2017 की रात को एक युवक बदहवास हालत में दिल्ली के करावलनगर थाने पहुंचा. उसके हाथों से खून टपक रहा था. उस ने ड्यूटी अफसर के सामने पहुंच कर कहा, ‘‘साहब, मुझे गिरफ्तार कर लो, मैं ने अपनी बीवी का कत्ल कर दिया है.’’

युवक की बातें सुन कर ड्यूटी पर तैनात एएसआई सतीश पाल चौंके. उन्होंने हैरत से उस की ओर ध्यान से देखते हुए पूछा, ‘‘लाश कहां है?’’

‘‘मेरे घर में.’’

युवक ने अपना नाम हीरालाल और पता शिव विहार, गली नंबर-6, मकान नंबर 846 बताया. साथ ही यह भी बताया कि उस ने पत्नी को मारने के बाद आत्महत्या करने की कोशिश की थी, लेकिन कामयाब नहीं हो पाया और थाने आ गया.

हीरालाल की बात सुन कर एएसआई सतीश पाल ने थाने के डीडी नंबर 20ए में सूचना दर्ज कर दी. पुलिस ने पहले हीरालाल के घायल हाथ की मरहमपट्टी कराई. फिर थाने में मौजूद सबइंसपेक्टर इंद्रवीर कांस्टेबल अनुज को साथ ले कर घटनास्थल के लिए रवाना हो गए. हीरालाल उन के साथ था.

सबइंसपेक्टर इंद्रवीर शिवविहार स्थित हीरालाल के घर पहुंचे. वहां बैडरूम में डबलबैड पर एक औरत की लाश पड़ी थी. लाश के पास 3 बच्चे गुमशुम बैठे थे. बच्चों को वहां से उठा कर दूसरी जगह बिठा दिया गया. इस के बाद एसआई इंद्रवीर ने लाश का मुआयना शुरू किया. मृतका के चेहरे और कंधों पर ताजा खरोंचों के निशान थे. लाश को देखने के बाद उन्होंने थानाप्रभारी रविकांत के मोबाइल पर फोन कर के हत्या की सूचना दे दी.

थोड़ी देर में थानाप्रभारी रविकांत, अतिरिक्त थानाप्रभारी नरेंद्र कुमार और पुलिस टीम के साथ वहां पहुंच गए. लाश का बारीकी से मुआयना करने पर उन्होंने देखा कि मृतका के गले पर गहरे रंग के निशान थे. कमरे की हालत देख कर ऐसा लग रहा था जैसे मारने के पहले मृतक के साथ बड़ी बेदर्दी से मारपीट की गई हो.

मृतका का पति हीरालाल सिर झुकाए खड़ा था. थानाप्रभारी ने उसे गिरफ्तार करने का आदेश दिया. इस के तुरंत बाद उसे हिरासत में ले लिया गया. घटनास्थल की तलाशी के दौरान वहां पर 6 शेविंग ब्लेड और मच्छर मारने वाली दवा मोर्टिन की 3 खाली शीशी मिलीं. हीरालाल ने बताया कि उस ने मोर्टिन पी कर आत्महत्या करने की कोशिश की थी.

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थानाप्रभारी रविकांत ने क्राइम टीम को भी घटनास्थल पर बुला लिया. क्राइम टीम ने घटनास्थल के फोटो लिए और जरूरी साक्ष्य एकत्र किए. प्राथमिक काररवाई के बाद लाश को पोस्टमार्टम के लिए जीटीबी अस्पताल भेज दिया गया.

थाने लौट कर थानाप्रभारी ने इस घटना की सूचना मृतका के उत्तर प्रदेश स्थित मायके को दी और उन से जल्दी दिल्ली पहुंचने के लिए कहा. चूंकि आरोपी हीरालाल की कलाई कुछ ज्यादा घायल थी, इसलिए उसे इलाज के लिए शाहदरा के जीटीबी अस्पताल में एडमिट करा दिया गया.

उसी दिन डौली की हत्या का केस भादंवि की धारा 302 के तहत दर्ज कर लिया गया. केस में हीरालाल को नामजद अभियुक्त बनाया गया. जांच की जिम्मेदारी थानाप्रभारी रविकांत ने खुद संभाली.

रविकांत को मृतका डौली के मायके वालों के आने का इंतजार था. वे लोग जिला अलीगढ़, उत्तर प्रदेश के गांव बरौली के रहने वाले थे और दिल्ली के लिए रवाना हो चुके थे. अगले दिन मृतका डौली के पिता राकेश कुमार और मां कुसुमा देवी करावलनगर थाने पहुंच कर इंसपेक्टर रविकांत से मिले.

उन्होंने अपने दामाद हीरालाल पर आरोप लगाया कि वह उन की बेटी से पहले भी मारपीट करता था. मार्च, 2017 में भी एक बार उस ने डौली की हत्या करने की कोशिश की थी, लेकिन सही समय पर उपचार मिल जाने से उस की जान बच गई थी.

थानाप्रभारी रविकांत ने उन्हें एक कांस्टेबल के साथ जीटीबी अस्पताल की मोर्चरी भेज दिया, जहां डौली की लाश रखी थी. शिनाख्त की औपचारिक काररवाई के बाद लाश का पोस्टमार्टम किया गया.

पोस्टमार्टम रिपोर्ट में डौली की हत्या की वजह दम घुटना बताया गया. पोस्टमार्टम के बाद डौली की लाश उस के पिता राकेश कुमार को सौंप दी गई. राकेश कुमार ने उसी दिन कुछ रिश्तेदारों की मदद से डौली का अंतिम संस्कार कर दिया.

एक दिन बाद हीरालाल जब अस्पताल से डिस्चार्ज हुआ तो उसे डौली की हत्या के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया. थानाप्रभारी रविकांत ने हीरालाल से डौली की हत्या का कारण जानने के लिए काफी देर तक पूछताछ की. हीरालाल ने पुलिस को डौली की हत्या के पीछे की जो कहानी बताई, वह कुछ इस तरह थी—

हीरालाल और डौली की शादी जनवरी 2007 में हुई थी. बाद में दोनों के 3 बच्चे हुए, जिन में 2 लड़के थे और एक लड़की.

हीरालाल भजनपुरा की चार्जर बनाने वाली एक फैक्ट्री में प्लंबर का काम करता था. उस की पगार बस इतनी थी कि जैसेतैसे गुजारा हो जाए. जबकि डौली चाहती थी कि उस का पति उसे सुखसुविधा के वे सारे साधन खरीद कर दे, जो घरगृहस्थी के लिए जरूरी होते हैं. जबकि उस की थोड़ी सी पगार में यह संभव नहीं था.

अभावों को ले कर पति-पत्नी के बीच आए दिन कलह होने लगी. दोनों के बीच जब संबंध ज्यादा तल्ख हुए तो डौली आंतरिक संबंधों में हीरालाल से दूरी बनाने लगी. डौली की इस हरकत से वह परेशान रहता था. फलस्वरूप दोनों के बीच खटास बढ़ती गई.

काफी प्रयासों के बाद भी हीरालाल डौली को नहीं मना सका. अब डौली बिना बताए घर से गायब भी रहने लगी थी. इस से हीरालाल को लगने लगा कि उस ने किसी के साथ अवैध संबंध बना लिए हैं. वह सोचता था कि उस के फैक्ट्री चले जाने के बाद वह किसी से मिलने बाहर जाती है. ऐसा इसलिए कि घंटों बाद जब वह घर लौटती थी तो नशे में होती थी. लेकिन डौली उस के इन आरोपों को गलत बताती थी.

18 मार्च, 2017 को भी डौली काफी देर से घर लौटी थी. हीरालाल पहले से ही परेशान था. उसे डौली का रोजरोज देर से घर लौटना पसंद नहीं था. वह आपे से बाहर हो कर उस के साथ मारपीट करने लगा. डौली ने विरोध किया तो उस ने उसे गालियां देते हुए फर्श पर पटक दिया.

लात और घूंसे बरसाने के बाद हीरालाल ने जबरन डौली को मच्छर मारने वाली दवा मोर्टिन की 2 शीशियां पिला दीं. डौली ने किसी तरह खुद को हीरालाल के चंगुल से छुड़ाया और अपने मोबाइल से 100 नंबर पर फोन कर दिया.

फलस्वरूप पुलिस आ गई और डौली की शिकायत पर थाना करावलनगर में हीरालाल के खिलाफ भादंवि की धारा 323, 341, 352, 328 के तहत मामला दर्ज कर लिया गया. पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर कोर्ट में पेश किया.

कोर्ट ने उसे 18 दिन के लिए जेल भेज दिया. डौली का अस्पताल में इलाज कराया गया. ठीक होने के बाद उस के पिता राकेश कुमार उसे अपने साथ गांव ले गए. बच्चे कुछ दिनों तक हीरालाल के रिश्तेदारों के पास रहे. जब हीरालाल जेल से छूटा तो वह बच्चों को अपने घर ले आया.

डौली अपने मायके में रह रही थी. हीरालाल के खिलाफ उस का केस महिला अपराध शाखा में चलने लगा. पति के व्यवहार से उस का दिल टूट चुका था. अब वह उस से तलाक ले कर अलग हो जाना चाहती थी.

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लेकिन हीरालाल ने डौली के मायके जा कर उस से अपने व्यवहार के लिए माफी मांगी. उस ने तीनों बच्चों को पालने की दुहाई दे कर डौली के ऊपर कभी हाथ न उठाने की कसम भी खाई. इस से डौली को उस पर दया आ गई.

वैसे भी डौली के लिए अकेले जीवन गुजारना मुमकिन नहीं था. मांबाप भी आखिर कब तक उस का साथ दे सकते थे. आखिर उस ने हीरालाल को माफ कर दिया. हीरालाल ने अपने सासससुर से भी अपने किए के लिए माफी मांगी और बरेली से दिल्ली लौट आया.

दिल्ली की महिला अपराध शाखा में 7 महीने तक केस चलने के बाद दोनों के बीच सुलह हो गई.

कुछ दिनों तक दोनों की जिंदगी सामान्य गति से चलती रही. लेकिन जल्द ही डौली का मन हीरालाल से भर गया. एक बार फिर हीरालाल और उस में आए दिन झगड़ों का सिलसिला शुरू हो गया.

1 दिसंबर, 2017 की सुबह हीरालाल काम पर चला गया था. दोपहर 2 बजे जब वह घर लौटा तो उसे जोरों की भूख लगी थी. उस ने डौली को जल्दी से खाना निकालने के लिए कहा. डौली ने दूसरी तरफ देखते हुए बेरुखी से बताया कि उस ने तबियत खराब होने की वजह से खाना नहीं बनाया है.

उस के खाना न बनाने की बात सुन हीरालाल गुस्से से लालपीला हो गया. उस ने डौली के ऊपर आरोप लगाया कि उसे मोबाइल पर यारों से बात करने से फुरसत मिले तो खाना बनाए. डौली ने भी अपनी गलती मानने की जगह कहा कि वह खाना नहीं बनाएगी, उसे जो करना हो कर ले.

यह सुन कर वह आपे से बाहर हो कर डौली पर टूट पड़ा. डौली ने खुद को बचाने की काफी कोशिश की पर हीरालाल के सिर पर जैसे खून सवार था. उस ने तीनों बच्चों को कमरे में बंद कर दिया, फिर डौली की बुरी तरह पिटाई करने के बाद उस का गला घोंटने लगा.

डौली ने उस का विरोध कर के खुद को बचाने का पूरा प्रयास किया, लेकिन आखिर में वह हार गई. उस की हत्या करने के बाद हीरालाल ने उस की लाश को बैड पर लिटा दिया. इस के बाद उस ने कमरा खोल कर बच्चों को बाहर निकाला तो तीनों बच्चे मम्मी की लाश के पास जा कर बैठ गए. बच्चे समझ रहे थे कि पिटाई की वजह से उन की मम्मी बेहोश हो गई है.

डौली की हत्या करने के बाद हीरालाल ने पुलिस के डर से पहले तो मच्छर मारने की दवा पी कर जान देने की कोशिश की. जब इस से उस की मौत नहीं हुई तो उस ने शेविंग ब्लेड से कलाई की नस काट ली. कलाई में ज्यादा दर्द हुआ तो उस के सिर से सुसाइड करने का भूत उतर गया.

काफी सोचविचार के बाद उस ने सरेंडर करने का मन बनाया और थाना करावलनगर जा कर अपना अपराध स्वीकार कर लिया. 4 जनवरी को उसे डौली की हत्या के आरोप में कड़कड़डूमा अदालत में पेश किया गया, जहां से उसे 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया.

इस हौलीवुड फिल्म में अपनी आवाज देंगी काजोल

कुछ वक्त पहले रिलीज हुई हौलीवुड सुपरहीरो फिल्म ‘डेडपूल 2’ के लिए बौलीवुड अभिनेता रणवीर सिंह ने रेयान रेनोल्ड्स की आवाज दी थी. इस फिल्म से रणवीर का नाम जुड़ने की वजह से दर्शकों के बीच फिल्म को लेकर एक अलग माहौल बन गया था. रणवीर के बाद अदाकारा काजोल भी हौलीवुड फिल्म में अपनी आवाज देंगी. हालांकि, यह एक एनिमेटिड फिल्म है.

बता दें कि काजोल ने डिज्नी डौट पिक्सर्स की ‘इनक्रेडिबल्स 2′ के हिंदी संस्करण के लिए हेलेन पार, इलास्टीगर्ल के चरित्र को अपनी आवाज दी है. काजोल ने एक बयान में आईएएनएस को बताया, “द इनक्रेडिबल्स 2’ हमारे जैसे ही एक परिवार की गर्मजोशी भरी कहानी पेश करती है, लेकिन फिर भी वे अलग हैं, कहानी में कई ऐसे क्षण थे जिनसे मैंने खुद को जुड़ा पाया और मुझे पता था कि मुझे इसमें मजा आएगा,”

यह सीक्वल फिल्म 2004 में आई फिल्म का संस्करण है जिसमें क्रैग टी. नेल्सन ने बौब पार के चरित्र, होली हंटर ने इलास्टीगर्ल के चरित्र और सैमुएल एल. जैकसन ने फ्रोजोन के चरित्र की आवाज दी है, ब्रैड बर्ड जो फिल्म में फैशन डिजाइनर एडना मोड के चरित्र को आवाज दे रहे हैं. वह फिल्म के निर्देशक भी हैं. काजोल ने कहा, “मैं सुपरपावर से लैस इस परिवार का हिस्सा बनकर वास्तव में उत्साहित हूं और मैंने इस मजेदार फिल्म में अपने विशेष तरीके से योगदान दिया है.” फिल्म भारत में 22 जून को हिंदी, अंग्रेजी, तमिल और तेलुगू में रिलीज होगी.

फैशन को धर्म से जोड़ना गलत

हिजाब, बुरका, परदा, घूंघट वैसे तो सामाजिक नियमों से बंधे हैं और इन्हें न अपनाने वाले अपने धर्म से अलग नहीं करे जाते पर यह पक्का है कि कुछ को छोड़ कर ज्यादातर औरतें इन्हें अपनी सामाजिक व पारिवारिक गुलामी का रूप ही मानती हैं.

अरब देशों की बहुत सी पढ़ीलिखी युवतियां जो अपने देश में हिजाब या बुरका पहनने को मजबूर रहती हैं, यूरोप के देशों में पहुंचते ही उन्हें बक्सों में बंद कर अपने रूपसौंदर्य पर इतराने का लोभ नहीं छोड़ पातीं.

भारत के कट्टरपंथी घरों से निकलते ही औरतों का परदा या घूंघट सिर से खिसक कर कंधों पर आ गिरता है और उन के गहरे काले बालों का सौंदर्य जगमग करने लगता है.

यह कहना कि औरतें इन्हें खुदबखुद अपनी सामाजिक संस्कृति बचाने के लिए अपनाती हैं, सच नहीं है. सिर पर क्या पहना जाए यह औरतों का अपना स्वविवेक है. एक समय दक्षिण भारत में बालों में फूल लगाने का चलन था पर कोई अनिवार्यता न थी. उत्तर भारत में भी इस का खूब फैशन था पर आज नहीं है.

एक समय लड़कियों ने साधना कट बाल कटवाए थे तो फिर हेयर स्विचों का जमाना आया था. आज नहीं है. जब इन्हें इस्तेमाल करा जा रहा था तो कोई जोरजबरदस्ती नहीं थी. अपनी स्वतंत्रता थी. अच्छा लगे तो करें वरना छोड़ दें.

यूरोप के बहुत से देशों में हवा में लंबे बाल न उड़ें इसलिए स्कार्फ पहनना फैशन था. आज ऐसे हेयर कैमिकल आ गए हैं कि शाम तक बाल बिखरते नहीं हैं और स्कार्फ का प्रयोग न के बराबर हो गया है. सर्दियों में ठंड से बचने के लिए आदमीऔरत दोनों कैप पहनते हैं और गरमियों में नहीं. यह फैशन और सुविधा का मामला है.

इसलाम जबरन औरतों को हिजाब और पुरुषों को स्कल पहनने को मजबूर कर रहा है. इसलाम के प्रचारक इसे सामाजिक व धार्मिक पहचान का हिस्सा मान रहे हैं जबकि यह मानसिक गुलामी का एक स्वरूप है. आप जो पहनते हैं यदि वह किसी नियम से बंधा है, तो इस का अर्थ यह है कि आप उस नियम को बनाने या लागू करने वालों के और आदेशों को भी मानेंगे ही. तभी पुलिस, सेना व बड़ी फैक्टरियों के मजदूरों में एक ड्रैस होती है. यह विभिन्नता को कम करने का मानसिक तरीका है. पर पुलिस, सेना या फैक्टरियां यह नहीं कहतीं कि घर में भी निर्धारित कपड़े पहने जाएं, हिजाब, बुरका, परदा और घूंघट समर्थक 24 घंटे इन का प्रयोग अनिवार्य मानते हैं.

अगर फ्रांस जैसे देश इन का विरोध कर रहे हैं, तो सही कर रहे हैं, स्कूलों, कालेजों व दफ्तरों में धार्मिक या सामाजिक रूप से अलग दिखाने वाले निशान अपनाने पर रोक होनी चाहिए, फिर चाहे व तिलक हो या टोपी.

ट्विटर बनाम जनभावना

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ट्विटर पर सब से ज्यादा लोग भारत में फौलो करते हैं और सब से अधिक 10 में से शेष 9 ऐक्टर व खिलाड़ी हैं. यह संयोग ही नहीं है कि ट्विटर पर नरेंद्र मोदी ऐक्टरों व क्रिकेटरों की गिनती में आते हैं. ट्विटर पर फौलो करने वाले आमतौर पर वे लोग हैं जिन्हें सुबह से शाम तक काम की फिक्र कम, मोबाइल पर बटन दबाने की चिंता ज्यादा होती है. वे सितारों और खिलाडि़यों के साथ जुड़ कर समय बरबाद कर फालतू में ही खुश होते हैं.

देश का प्रधानमंत्री अपनी लोकप्रियता ट्विटर से नहीं, जनता की भावनाओं से सिद्ध करता है. जिस प्रधानमंत्री के फैसलों से जनता खुश होती है, वहां खुदबखुद पता चल जाता है. वहां विपक्ष में बैठे लोग भी फैसलों का आदर व सम्मान करते हैं.

अभिनेता शाहरुख खान और अक्षय कुमार किसी की जिंदगी पर कोई प्रभाव नहीं छोड़ते लेकिन प्रधानमंत्री का हर कदम, हर फैसला, हर वक्त कभी कुछ की तो कभी पूरे देश की जिंदगी बदल देता है.

ट्विटर अगर सफलता का पैमाना होता तो 10 में से शेष 9 के कुछ करने का भी असर देश पर पड़ता. सच यह है कि विराट कोहली हों या दीपिका पादुकोण, इन के कुछ भी करने से देश का एक पत्ता भी नहीं हिलता. ये स्क्रीन या स्टेडियम पर कुछ भी कर लें, देश में उन के कहनेकरने से न सड़कें बनती हैं, न न्याय मिलता है, न विकास होता है.

क्या जनता 10वें को भी ऐसा ही समझती है?

आबादी का राजनीतिक लाभ

जो लोग दुनिया की बढ़ती आबादी से चिंतित हो रहे हैं उन्हें अब राहत का एहसास होगा कि चीन में 40 वर्षों से चल रही एक बच्चे की नीति को ढीला करने के बावजूद वहां बच्चों की जन्मदर बढ़ने की जगह घट ही रही है. 2016 में 1.86 करोड़ बच्चे पैदा हुए थे जबकि 2017 में घट कर 1.72 करोड़ बच्चे ही पैदा हुए. ऐसे में वहां कामकाजी लोगों की कमी महसूस की जाने लगी है.

चीन की आबादी अभी घट नहीं रही है क्योंकि वहां अगर बच्चे घट रहे हैं तो मृत्युदर भी घट रही है और लोग ज्यादा दिन जी रहे हैं. अब समस्या यह आ रही है कि प्रौढ़ और वृद्धों की देखभाल कौन करेगा.

भारत में वृद्धि अभी भी काफी है और भारत जल्दी ही जनसंख्या के मामले में दुनिया का सब से बड़ा देश बन जाएगा. हालांकि सब से ज्यादा गरीब भी यहीं होंगे और सब से ज्यादा बीमार भी यहीं होंगे.

चीन ने आबादी घटाने के लिए कड़ी मेहनत की थी और अपनी जनता पर बहुत अंकुश लगाए थे. आज उसे उस का भरपूर लाभ मिल रहा है. चीन की वर्तमान प्रगति का राज उस का नास्तिक होना और बच्चों का कम होना है. चीनी न धर्म के नाम पर पैसा व समय बरबाद करते हैं और न ही उन्हें ज्यादा बच्चे पालने में अपने काम छोड़ने पड़ते हैं.

बच्चों से बहुत सुख मिलता है, पर जितने सुख गिनाए जाते हैं उस से ज्यादा आफतें होती हैं. जब तक केवल कृषि पर आधारित समाज था, बच्चे जैसेतैसे खेतों के किनारे पल जाते थे, पर जब से उत्पादन फैक्टरियों में होने लगा और सेवा क्षेत्र बढ़ने लगा है, तब से घर व काम करने की जगहें अलग हो गई हैं और दूसरे कामों के साथ बच्चे पाले नहीं जा सकते.

हमारे यहां नीतियां आज भी पौराणिक सोच पर बन रही हैं और इसीलिए हमारी जन्मदर दूसरे देशों से ज्यादा है. गरीबी के कारण बच्चों को पैदा होने से रोकना कठिन होता है और पैदा हुए बच्चों को उसी गरीबी को झेलना पड़ता है. हमारी रूढि़वादी सरकार केवल गैरहिंदुओं की बढ़ती आबादी का हल्ला मचा कर राजनीतिक लाभ उठाना चाहती है और उस ने ‘हम दो, हमारा एक’ का नारा लगभग भुला दिया है. चीन अब 3 बच्चों तक की अनुमति दे रहा है, वास्तव में वह पारिवारिक जीवन में दखलंदाजी बंद कर रहा है.

सैक्स जीवन के लिए अहम है पर बच्चे केवल बाईप्रोडक्ट हैं. आज कम बच्चों के साथ ही अर्थव्यवस्थाएं मजे में चल सकती हैं. आर्टिफिशल इंटैलिजैंस के सहारे चलने वाली स्वचालित मशीनों का दौर अब केवल नुक्कड़ के परे है और जल्दी ही बहुत अधिक उत्पादन, बहुत कम लोगों से होने लगेगा. घरघर में ऐसी मशीनें पहुंच सकती हैं जो घर का काम भी तुरंत कर देंगी और बच्चों के कारण होने वाली मानसिक व आर्थिक समस्याएं खड़ी न होंगी.

कम बच्चे या बच्चे न होना एक गुण होगा, कभी नहीं.

बंगाली अंदाज में कहर ढा रही हैं मोनालिसा

भोजपुरी फिल्‍मों का जाना माना नाम एक्‍ट्रेस मोनालिसा इन दिनों अपने बंगाली अंदाज के लिए सुर्खियों में हैं. पहले जहां मोनालिसा का एक होली डांस वायरल हुआ तो वहीं अब मोनालिसा का ‘भाभी’ अंदाज सोशल मीडिया पर हिट हो रहा है. मोनालिसा जल्‍द ही बंगाली वेब सीरीज ‘डुपुर ठाकुरपो’ सीजन 2 में नजर आने वाली हैं. इस वेब सीरीज में वह बेहद ग्लैमरस अवतार में नजर आएंगी. इसी वेब सीरीज का नया गाना ‘झुमा बौदी’ आ गया है.

मोनालिसा ने अपने इस गाने की एक झलक इंस्टाग्राम पर शेयर की है. इस वीडियो में वह स्‍टाइलिश अंदाज में नाचती और बारिश में भीगती दिख रही हैं. वही इस बौदी (भाभी) के दीवाने भी इस गाने में नजर आ रहे हैं. आप भी देखें मोनालिसा का यह अंदाज.

मोनालिसा को बिग बॉस 10 में भाग लेने के बाद घर-घर में पहचान मिली. उन्होंने अपने भोजपुरी को-स्टार विक्रांत सिंह राजपूत के साथ बिग बौस 10 के घर के भीतर ही शादी रचाई और उनकी शादी नेशनल टेलीविजन पर औन एयर की गई थी. 2008 में फिल्‍म ‘भोले शंकर’ से भोजपुरी इंडस्ट्री में कदम रखने वाली मोनालिसा इसके बाद लगातार कई सुपरहिट फिल्मों का हिस्सा रही हैं.

जब बोल्ड फोटो शेयर करने पर लोगों ने शमा सिकंदर को कहा बेशर्म…

हाल ही में हिना खान ने अपनी एक डांस वीडियो सोशम मीडिया पर शेयर की थी. लोगों ने हिना को काफी बुरा भला कहा था. वहीं अब हिना खान के बाद स्माल स्क्रीन की एक और अदाकारा शमा सिकंदर को भी ट्रोलिंग का शिकार होना पड़ रहा है. उन्हें अपनी बोल्ड तस्वीर शेयर करने के लिए सोशल मीडिया पर ट्रोल किया जा रहा है.

आपकी जानकारी के लिए बता दें कि शमा सिकंदर ने बिकिनी में इंस्टाग्राम पर एक तस्वीर शेयर की है. कैप्शन में उन्होंने मोटिवेशनल लाइन्स लिखते हुए कहा कि हमेशा अपने दिल की सुनो. शमा की ये तस्वीर कई फैंस को बेहद पसंद आई. लेकिन वहीं कई लोगों ने उन्हें ट्रोल इस फोटो को लेकर ट्रोल करना शुरू कर दिया

एक यूजर ने लिखा, कम से कम रमजान में तो मान जाओ. बेशर्म, वहीं दूसरे ने लिखा- थोड़ा सा रमजान का एहतराम कर लो. कई लोग ऐसे भी थे जो शमा सिकंदर को डिफेंड करते हुए नजर आए. उन्होंने आलोचकों की जमकर क्लास लगाई.

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बता दें, शमा 2003 में सोनी टीवी के सीरियल ”ये मेरी लाइफ है” से फेमस हुई थीं. इसके बाद उन्होंने सीरियल ‘बालवीर’ में ‘भयंकर परी’ का किरदार निभाया था. शमा ने शार्ट फिल्म ”सेक्सोहौलिक” से वापसी की थी. इस शौर्ट फिल्म में शमा ने अपने को-स्टार के साथ कई किसिंग और बोल्ड सीन दिए थे. वे विक्रम भट्ट की वेब सीरीज ”माया” में भी नजर आई हैं.

ब्रेट ली के साथ कुछ यूं डांस करती दिखीं एली अवराम

रविवार (27 मई) को मुंबई के वानखेड़े स्टेडियम में चेन्नई ने हैदराबाद को 8 विकेट से मात देकर तीसरी बार इस खिताब को अपने नाम किया है. दो साल के बैन के बाद टूर्नामेंट में वापसी करने वाली चेन्नई की यह तीसरी खिताबी जीत है. इससे पहले वो 2010 और 2011 में खिताब अपने नाम कर चुकी है. इसी के साथ वह सबसे ज्यादा आईपीएल खिताब जीतने के मामले में मुंबई के बराबर पहुंच गई है. दोनों टीमों के नाम सबसे ज्यादा तीन-तीन खिताब हैं.

यह चेन्नई का सातवां आईपीएल फाइनल था और उसके कप्तान धोनी का आठवां चेन्नई का नाम आईपीएल इतिहास की सबसे सफल टीमों में गिना जाता है क्योंकि उसने नौ सीजन खेले हैं और सभी बार प्लेऔफ में जगह बनाई.

मैच शुरु होने से पहले आईपीएल की क्लोजिंग सेरेमनी में क्रिकेट के साथ-साथ बौलीवुड का भी तड़का लगा. आईपीएल के फाइनल से पहले बौलीवुड अभिनेत्री एली अवराम डांस फ्लोर पर औस्ट्रेलिया के पूर्व दिग्गज गेंदबाज ब्रेट ली और भारतीय औल राउंडर इरफान पठान के साथ जमकर धमाल मचाया.

एली ने कुछ इस अंदाज में ब्रेट ली और इरफान पठान को इंटरड्यूस किया. एली ने ब्रेट ली और इरफान के साथ शाहरुख खान और अनुष्का शर्मा की फिल्म ‘रब ने बना दी जोड़ी’ के गाने डांस पे चांस मार ले पर सबसे पहले डांस किया. इसके बाद एली ने ब्रेट ली के साथ ‘रंग दे तू मोहे गेरुआ’ और इरफान के साथ ‘दबंग-दबंग’ पर डांस किया. डांस का अंत एली, ब्रेट और इरफान ने अमिताभ बच्चन के गाने ‘शावा-शावा’ किया.

औफिशयल टि्वटर हैंडिल से ब्रेट ली और इरफान पठान के साथ कुछ तस्वीरें शेयर कीं. इन तस्वीरों को शेयर करते हुए एली ने लिखा- दो सुपर कूल क्रिकेट के साथ डांस फ्लोर पर ग्रेट फन.

बता दें कि एली अवराम का नाम पिछले कुछ वक्त से टीम इंडिया के औल राउंडर खिलाड़ी हार्दिक पांड्या के साथ जुड़ता रहा है. हार्दिक पांड्या और एली अवराम को कई मौकों पर एक साथ भी देखा गया है.

एली अवराम हार्दिक पांड्या के भाई की शादी के हर फंक्शन में परिवार के सदस्य की तरह नजर आई थीं, जिसके बाद उन दोनों के अफेयर की अफवाहों ने जोर पकड़ लिया था. इसके बाद भी यह दोनों मुंबई में कई बार एक साथ नजर आए. जब टीम इंडिया इस साल दक्षिण अफ्रीका के दौरे पर गई थी, उस वक्त भी एली को दक्षिण अफ्रीका में टीम इंडिया के बाकी खिलाड़ियों की पत्नियों के साथ देखा गया था.

जब करीना की फटी ड्रेस देखकर भड़के सैफ

बौलीवुड अभिनेत्री करीना कपूर खान इन दिनों अपनी फिल्‍म ‘वीरे दी वेडिंग’ के प्रमोशन में व्यस्त हैं. इस प्रमोशन के दौरान करीना अलग-अलग लुक में मीडिया से रुबरु होती नजर आई. करीना कभी इंडियन लुक में तो कभी वेस्‍टर्न लुक में फैंस पर कहर बरपाती हुई नजर आईं. फिल्‍म प्रमोशन के दौरान करीना के हर लुक को काफी पंसद किया गया लेकिन करीना का हौट और बेहद खूबसूरत लुक पति सैफ अली खान को पसंद नहीं आया. इतना ही नहीं, करीना की एक ब्‍लैक डिजाइनर ड्रेस सैफ को बेहद गंदी लगी और उन्‍होंने करीना से गुस्से में कहा कि तुम जाओ और ढंग के साधारण कपड़ों में आओ.

इस बात का खुलासा खुद करीना ने किया है. हाल ही में करीना कपूर खान फिल्‍म ‘वीरे दी वेडिंग’ के म्‍यूजिक लौन्‍च पर पहुंचीं. यहां करीना एक बेहद खूबसूरत ब्‍लैक ड्रेस में नजर आईं. लेकिन सैफ को करीना का यह ड्रेस जरा भी पसंद नहीं आया.

करीना ने इस बात का खुलासा एक इंटरव्यू के दौरान किया. करीना ने बताया कि जब मैं इवेंट के बाद घर पहुंची तो सैफ ने मुझे देख कर कहा, ‘तुमने ये क्‍या पहन रखा है?’ मैंने कहा कि ये तो बहुत सुंदर है, हर किसी ने मेरी तारीफ की लोगों ने कहा मैं अच्छी लग रही थी… तो सैफ ने कहा, ‘नहीं..’ तुम ढंग के साधारण कपड़ों में क्‍यों नहीं हो… जाओ कपड़े बदलो और फिर वापस आओ.’ करीना ने आगे कहा, ‘फिर मैंने बाद में सैफ को अपनी फोटो दिखाई तो उन्‍होंने कहा कि यह अच्‍छी ड्रेस है.

बौलीवुड की पहली महिला सुपरवुमन होंगी दीपिका पादुकोण

बौलीवुड एक्ट्रेस दीपिका पादुकोण पिछले काफी वक्त से ‘पद्मावत’ के बाद किसी दूसरी फिल्म को साइन न करने के चलते सुर्खियों का हिस्सा बनी हुई हैं. इसी बीच कई बार ऐसी अफवाहें भी आईं कि वह रणवीर सिंह के साथ शादी करने वाली हैं और इस वजह से वह फिलहाल कोई फिल्म साइन नहीं कर रहीं. हालांकि, अब सामने आ रही खबरों की मानें तो दीपिका अपनी अगली फिल्म में ‘वंडर वुमन’ की भूमिका में नजर आएंगी. यह बौलीवुड की पहली फीमेल सुपरहीरो फिल्म होगी और इसका बजट बौलीवुड की अब तक की फिल्मों में सबसे ज्यादा होगा.

एक खबर के मुताबिक, इस फिल्म के दीपिका पादुकोण मार्शलआर्ट्स की ट्रेनिंग लेंगी. रिपोर्ट के मुताबिक, फिल्म में दीपिका पादुकोण का करेक्टर हौलीवुड फिल्म ‘वंडर वुमन’ से प्रेरित है. फिलहाल फिल्म का बजट 300 करोड़ बताया जा रहा है और फिल्म में कई इंवेस्टर्स इंवेस्ट कर रहे हैं. बता दें, ‘वंडर वुमन’ हौलीवुड की मशहूर फिल्म है और इस फिल्म ने काफी अच्छा कारोबार किया था. जिसके बाद अब बौलीवुड में दीपिका सुपर वुमन बनने जा रही हैं. उन्हें इस नए अवतार में देखना बेहद दिलचस्प होने वाला है.

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गौरतलब है कि, दीपिका ‘पद्मावत’ के बाद विशाल भारद्वाज के साथ अपनी अगली फिल्म सपना दीदी की शूटिंग शुरू करने वाली थीं लेकिन अचानक इरफान खान की तबियत खराब होने की वजह से इस फिल्म की शूटिंग को रोक दिया गया है. जिसके बाद दीपिका ने किसी फिल्म को साइन नहीं किया था और अब वह सुपर वुमन फिल्म का हिस्सा बनने जा रही हैं. यहां आपको बता दें कि बौलीवुड में इन दिनों ‘ब्रह्मास्त्र’ और ‘कृष 4’ जैसी फिल्में भी सुर्खियों में है जिनमें शक्तियां और सुपरनेचुरल पावर नजर आएगी.

62 में सेवानिवृत्ति : आरक्षण कमजोर करने की साजिश

भारतीय जनता पार्टी के लिए सब से आसान काम है दलितों व पिछड़ों को बेवकूफ बनाना, वह भी इस तरह कि सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे. दलितों व आदिवासियों को संविधान बनने के समय और शूद्र व पिछड़ों को मंडल आयोग द्वारा मिला संवैधानिक आरक्षण सीधे खत्म करने का जोखिम उठाने से बच रही भाजपा इस थ्योरी पर चल रही है कि आरक्षण को कमजोर कर उस की अहमियत ही खत्म कर दो और ऐसे करो कि आरक्षित तबका भौचक्का, मुंह ताकता रह जाए कि आखिर हो क्या रहा है.

चुनावी साल में फूंकफूंक कर कदम रख रहे मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान अकसर अपनी छाती ठोंक कर कहते रहते हैं कि जब तक वे हैं, कोई माई का लाल आरक्षण खत्म नहीं कर सकता. लेकिन दलितों के हितों के दावे करते रहने वाले शिवराज सिंह चौहान आरएसएस की आरक्षण खत्म करो की मंशा पूरी करने के लिए जिन नएनए टोटकों का आविष्कार कर रहे हैं, सरकारी कर्मचारियों की सेवानिवृत्ति की उम्र पहले 58 से 60 व अब 60 से 62 साल कर देना उन में से एक है.

इन दिनों रोज दर्जनों घोषणाएं कर चुनावी तैयारियों में जुटे शिवराज सिंह ने एक अहम फैसला  यह लिया है कि अब राज्य में सरकारी कर्मचारियों के रिटायरमैंट की उम्र 62 साल होगी. यह घोषणा वाकई अहम है जिस से उन्होंने एक तीर से एक ही निशाना साधा है. उन की मंशा हर किसी की समझ में नहीं आ रही कि यह आरक्षण को कमजोर करने की साजिश है और इस का बड़ा असर दलित आदिवासियों व पिछड़े वर्ग के बेरोजगार नौजवानों पर पड़ेगा.

यह है घोषणा 

रिटायरमैंट की उम्र बढ़ाने की घोषणा करने की देर थी कि राज्यभर के सरकारी कर्मचारियों में खुशी की लहर दौड़ गई. जगहजगह नारियल फोड़े गए और मंदिरों में प्रसाद चढ़ाया गया. जिन कर्मचारियों को 1 अप्रैल, 2018 को रिटायर होना था उन की नौकरी की मियाद 2 साल और बढ़ गई. वे 2 साल और ब्राह्मणश्रेष्ठों की तरह हलवापूरी खाएंगे और दक्षिणा ले कर जनजनार्दन को तृप्त करेंगे.

कहनेसुनने को तो यह चुनावी घोषणा है जिस के बारे में मीडिया और जानकारों ने तुरंत आंकड़े पेश कर दिए कि इस से क्याक्या प्रभाव पड़ेंगे. लेकिन हकीकत में इस घोषणा के माने कुछ और भी हैं जिस से मायूस आरक्षित वर्ग है जो समझ तो रहा है कि एक और धोखा सामाजिक समरसता के बाद दे दिया गया है, लेकिन वह कर कुछ नहीं पा रहा.

सेवानिवृत्ति की उम्र 62 साल कर देने से राज्य के 4 लाख 35 हजार सरकारी कर्मचारियों को फायदा मिलेगा. अगले 2 साल में राज्य के 33 हजार कर्मचारियों को रिटायर होना था जो अब 2020 तक नौकरी पर रहेंगे. इस फैसले से गलेगले तक कर्ज में डूबे मध्य प्रदेश के सरकारी खजाने के 6,600 करोड़ रुपए बचेंगे. रिटायर्ड कर्मचारियों को भविष्य निधि, बीमा और दूसरा पैसा दिया जाता, वह भी हालफिलहाल बच गया है.

दलील में भी छल

रिटायरमैंट की उम्र बढ़ाने में भी शिवराज सिंह चौहान ने बड़ी चालाकी से दलितों को ही ढाल की तरह इस्तेमाल किया है जिस से उन का दलित हितों का ढिंढोरा डपोर शंख नजर आने लगा है.

यह रही हकीकत

रिटायर होने से बच गए 4 लाख 35 हजार कर्मचारियों में से दलित कितने हैं, इस सवाल का ठीकठाक जवाब किसी के पास नहीं है. वजह, तमाम आंकड़ेबाजी में यह अहम आंकड़ा किसी ने पेश नहीं किया. सामान्य प्रशासन विभाग के एक अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि बात वाकई हैरान करने वाली है कि आरक्षित वर्ग के कर्मचारियों की तादाद 10 प्रतिशत के आसपास ही है यानी लगभग 45 हजार दलित और 3 लाख 90 हजार सवर्ण कर्मचारियों को फायदा होगा. पिछड़े तो नाममात्र के होंगे क्योंकि जब ये नौकरियां आती थीं तब तक मंडल आयोग की सिफारिशें लागू नहीं हुई थीं.

इस अधिकारी के मुताबिक, इस आंकड़े में अगर फर्क भी आया तो वह किसी भी सूरत में 2 फीसदी से ज्यादा नहीं होगा यानी फैसले से बड़ा फायदा सामान्य वर्ग के कर्मचारियों को होना तय है.

दरअसल, जो कर्मचारी रिटायर होने से बच गए उन में से अधिकांश की भरती 1980 के बाद हुई थी. नौकरियों में आरक्षण तब भी था पर उस दौर में आरक्षण का फायदा कम ही लोग उठा पा रहे थे. इस का सटीक उदाहरण आज भी आरक्षित वर्ग के खाली पड़े हजारों पद हैं जिन पर भरतियां हुई ही नहीं हैं.

दूसरा, तब पिछड़ा वर्ग आरक्षण के दायरे में नहीं आता था. उस की गिनती सामान्य वर्ग में ही होती थी. तब 10 फीसदी भी पिछड़े सरकारी नौकरी हासिल नहीं कर पाते थे. दोटूक कहा जाए तो लगभग 75 प्रतिशत ऊंची जाति वालों को इस फैसले का लाभ मिलना है.

उलट इस के, लगभग 50 फीसदी आरक्षित वर्ग के युवा बेरोजगार अब 2 साल तक और सरकारी नौकरियों से वंचित रहेंगे, क्योंकि जब कर्मचारी रिटायर ही नहीं होंगे तो पदों पर भरतियां भी नहीं होंगी.

और बढ़ेंगे दलित बेरोजगार

सवर्णों को तो शिवराज सिंह ने खुश कर दिया लेकिन बेरोजगारों की नाराजगी भी मोल ले ली. राज्य में बेरोजगारों ने बेरोजगार सेना के बैनर तले एकजुट हो कर इस फैसले का विरोध करते हुए इसे बेरोजगारी बढ़ाने वाला बताया जो एक कड़वा सच मध्य प्रदेश ही नहीं, बल्कि पूरे देशभर का है.

यह कम हैरत की बात नहीं कि इस बेरोजगारी की दोहरी मार भी उन दलित युवाओं पर ही ज्यादा पड़ने वाली है जो पढ़ाईलिखाई सरकारी नौकरी मिलने की उम्मीद में करते हैं. उलट इस के, सवर्ण युवा बड़ी तादाद में प्राइवेट सैक्टर में चले जाते हैं.

अधिकतर दलित गरीब होते हैं, इसलिए वे महंगी ऊंची शिक्षा नहीं ले पाते और न ही प्राइवेट सैक्टर में उन्हें आसानी से नौकरी मिलती है. एक दलित युवा निरंजन सिंह का कहना है कि बीई इलैक्ट्रौनिक्स करने के बाद उस ने प्राइवेट सैक्टर में नौकरी हासिल करने की कोशिश की, पर वह नहीं मिली. अब निंरजन भोपाल के अशोका गार्डन स्थित एक रैफ्रीजरेशन कंपनी में मामूली पगार पर काम कर रहा है और इंतजार कर रहा है कि कब सरकारी नौकरी की जगह निकले और वह कोटे से नौकरी पाए. निरंजन का एक डर यह भी है कि अगर 2 वर्षों में कोर्ट से मामला नहीं निबटा तो उस की नौकरी की अधिकतम उम्र निकल जाएगी.

तेजी से पढ़ते दलित बेरोजगारों की तादाद बढ़ने की वजह यह भी है कि राज्य सरकार ने साल 1998 के बाद नियमित नौकरियां देनी ही बंद कर दी हैं. 1998 में मध्य प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने रिटायरमैंट की उम्र 58 से बढ़ा कर 60 साल की थी. उन्हें इस का खासा फायदा भी मिला था. तब सवर्ण कांग्रेस की तरफ झुके थे और दलित भी, क्योंकि 1998 में रिटायर होने वाले दलित कर्मचारियों की संख्या न के बराबर थी, लिहाजा, उन्हें कोई नुकसान इस फैसले में नजर नहीं आया था. दूसरा, 20 साल पहले दलित व पिछड़ा युवा आज की तरह ज्यादा पढ़ालिखा नहीं था.

बहुजन संघर्ष दल के अध्यक्ष फूलसिंह बरैया कहते हैं, ‘‘अब दलित पढ़लिख रहा है और भाजपा का दोहरा चरित्र भी समझने लगा है.’’ आरक्षण में प्रमोशन को फूलसिंह बरैया एक धोखा व बहाना मानते हुए कहते हैं कि अगर वाकई शिवराज सिंह चौहान दलितों के प्रति इतने संवेदनशील और गंभीर हैं जितना वे खुद को बताते हैं तो अगले 2 वर्षों में रिटायर होने जा रहे कर्मचारियों की ही उम्र बढ़ाते पर चूंकि वे भी आरक्षण कमजोर करो मुहिम की टीम के मैंबर हैं, इसलिए उन्होंने सारी गाज दलितों पर गिरा दी है.

58 साल ही होना चाहिए

राजनीति से परे प्रशासनिक नजरिए से देखें तो भी रिटायरमैंट की उम्र 62 साल किया जाना कोई तुक की बात नहीं है. वजह सिर्फ इतनी नहीं कि सरकार युवाओं को नौकरियां नहीं दे पा रही, बल्कि यह भी है कि 25-30 साल की सरकारी नौकरी में कर्मचारी खासा पैसा बना लेता है.

सरकारी कर्मचारियों की तनख्वाह हर साल 3 बार महंगाई भत्ते और वेतनवृद्धि के जरिए बढ़ती है जो पद और तनख्वाह के हिसाब से औसतन 5 हजार से ले कर 20 हजार रुपए सालाना तक होती है. यह भार आखिरकार आम लोगों को ही ढोना पड़ता है. इस पर भी अगर रिटायरमैंट की उम्र बढ़ा दी जाए तो यह भी बोझ सरकार को नहीं, बल्कि आम लोगों ही उठाना पड़ता है.

दूसरा, 95 फीसदी सरकारी नौकरियों में ऊपरी कमाई भी कर्मचारियों को होती है.

रिटायरमैंट की उम्र 58 साल होना इस लिहाज से भी ठीक है कि इस उम्र तक कर्मचारी हर लिहाज से सैटल हो जाता है.

रही बात हालिया फैसले की, तो रिटायरमैंट की उम्र बढ़ाया जाना सिर्फ चुनावी शिगूफा नहीं है बल्कि यह दलितों और पिछड़ों के पेट पर इस तरह लात मारने वाली बात है कि वह चिढ़ न पाए, बस, बेबसी से तिलमिला कर रह जाए.

विदिशा की एक दलित युवती नेहा अहिरवार का मत है कि भाजपा आरक्षण भले ही खत्म न करे, लेकिन उस का महत्त्व कम करने से चूक नहीं रही. अगर 2019 में भी वह सत्ता में आई तो दलितों के पर कतरने और अंगूठा काटने के लिए वह देशभर में शिवराज सिंह का यह फार्मूला लागू कर सकती है जिस के चलते दलित व पिछड़े युवाओं को नौकरी की गुंजाइश ही खत्म हो जाएगी और उन की हिम्मत व आस टूट जाएगी.

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