भाजपा के दांव पर किरकिरी

कर्नाटक में बहुमत न पा कर भी सत्ता में आ जाने की प्रबल चाह भारतीय जनता पार्टी के लिए कोई शर्म या नैतिक मूल्य के घटने का मामला नहीं है. हिंदू पौराणिक सोच के अनुसार यह अपनेआप में सही है और हमारे पुराण इस तरह की घटनाओं से भरे पड़े हैं. इन्हीं पुराणों का गुणगान आज भी प्रवचनकर्ता बड़े गर्व से करते हैं.

भाजपा वैसे बड़ेबड़े सपने दिखा रही है पर वह देश को भ्रष्टाचारमुक्त और गरीबीमुक्त कर पाए या न कर पाए, कांग्रेसमुक्त बनाने में एड़ीचोटी का जोर लगा रही है. कर्नाटक में 130 से 150 सीटें हासिल करने की उम्मीद लगाए भाजपा 104 सीटों पर सिमट गई तो कितने ही चैनलों के एंकरों के मुंह जिस तरह लटके रह गए थे उस से साफ है कि भारतीय जनता पार्टी की सोच किस तरह हमारे देश के अमीर, समृद्ध और उच्चवर्ग में गहरे तक बैठी है कि उस की हजार गलतियों को अनदेखा किया जा रहा है.

कांग्रेस में कोई सुरखाब के पर नहीं लगे हैं लेकिन वह देश को जाति व धर्म के नाम पर भाजपा की तरह विभाजित नहीं कर रही. गैरभाजपा पार्टियों को जाति का सवाल भाजपा के हमले से बचाव में उठाना पड़ रहा है. देश के मतदाताओं में बहुमत पिछड़ी व निचली जातियों के मतदाताओं का ही है, इसलिए सभी पार्टियां उन पर डोरे डाल रही हैं. भारतीय जनता पार्टी सब से बड़ी व सक्षम पार्टी होते हुए भी पूरी तरह छा नहीं पा रही. उस की पिछड़ी व निचली जातियों को जोड़ने की कला अब कमजोर हो रही है, क्योंकि पिछड़ी व निचली जातियां अपने साथ हो रहे भेदभाव पर नाराजगी जताने लगी हैं.

कर्नाटक में कांग्रेस को जिन सीटों का नुकसान हुआ है वे असल में पिछले चुनावों में भारतीय जनता पार्टी के विभाजित वोटों के लाभ से मिली थीं.

55 घंटे के मुख्यमंत्री बने बी एस येदियुरप्पा ने तब अलग पार्टी बना कर भारतीय जनता पार्टी के खिलाफ चुनाव लड़ा था. अब चूंकि भ्रष्टाचार के आरोपों में तब हटाए गए येदियुरप्पा अब फिर से शुद्धि पा कर भाजपाई हो गए हैं तो भाजपा ने कांग्रेस से सीटें छीन लीं. 2014 के चुनावों में जो सफलता भाजपा को मिली थी वह अब दोहराई नहीं गई पर भाजपा को आशा थी कि वह कांग्रेस व जनता दल (सैक्युलर) में विभीषणों को ढूंढ़ लेगी और सत्ता पर बनी रहेगी. लेकिन ऐसा हो नहीं सका.

104 सीटें पा कर जनता दल (सैक्युलर) व कांग्रेस के संयुक्त मोरचे की 116 सीटों के मुकाबले कम सीटें मिलने पर भी भाजपा ने गोवा व मणिपुर को दोहराया तो इसलिए कि यहां का उच्चवर्ग इसी बात का समर्थन करता है. सत्ता उस के पास हो जो जन्म से इस का अधिकारी हो. ऐरेगैरों को भला सत्ता कैसे दी जा सकती है.

अफसोस यह है कि कांग्रेस और जनता दल (सैक्युलर) का एक भी विधायक भाजपा के साथ जुड़ने को तैयार नहीं हुआ और येदियुरप्पा 55 घंटे मुख्यमंत्री बने रहने के बाद चलते बने. भाजपा चुप नहीं बैठेगी, यह पक्का है. पर उस की अलग पार्टी की छवि गोवा, मणिपुर के बाद अब ध्वस्त हो गई है. फिर भी, ‘जो राजा उसी का बजेगा बाजा,’ पुरानी मगर सही कहावत है.

‘हावड़ा पटना लव ऐक्सप्रैस’ वाया फेसबुक

‘तुम क्या काम करते हो? तुम्हारा घर कहां है?’ लड़की ने अपने फेसबुक फ्रैंड के चैट बौक्स में मैसेज डाला.

लड़के ने तुरंत जवाब दिया, ‘तुम मुझे बहुत अच्छी लगती हो. मेरा घर पटना में है. तुम कहां रहती हो?’

लड़की ने भी पलट कर जवाब दिया, ‘मैं कोलकाता में रहती हूं. तुम भी मुझे काफी अच्छे लगते हो.’

लड़के ने मैसेज टाइप किया, ‘कोलकाता में कहां रहती हो? मैं तुम से मिलना चाहता हूं. हमारा मिलन कैसे होगा? मैं तुम्हारे बगैर जिंदा नहीं रह सकता हूं.’

लड़की ने लिखा, ‘‘मैं हावड़ा में रहती हूं. मैं भी तुम्हारे बिना जिंदगी की सोच नहीं सकती हूं….’’

इस तरह की मुहब्बत से भरी चैटिंग का सिलसिला चलता रहा. इस के बाद उन दोनों ने एकदूसरे का मोबाइल फोन नंबर मांगा. दोनों के बीच बातचीत का सिलसिला भी चल पड़ा. उन दोनों की मुहब्बत इतनी परवान चढ़ी कि वे मिलने के लिए बेताब हो उठे. दोनों मिले भी. शादी भी कर ली. उस के बाद लड़की के साथ जो कुछ घटा, वह रूह कंपा देने वाला था.

दरअसल, पश्चिम बंगाल के हावड़ा जिले की रहने वाली 22 साल की लड़की सुलेखा को फेसबुक और ह्वाट्सऐप के जरीए बिहार के एक लड़के आसिफ से दोस्ती हुई. सोशल साइटों के जरीए शुरू हुई उन की प्रेमकहानी इस कदर परवान चढ़ने लगी कि लड़की अपने फेसबुकिया आशिक से मिलने पटना पहुंच गई.

मुहब्बत की आस में हावड़ा से पटना पहुंची सुलेखा को पटना में उस के प्रेमी से छलावा और ब्लैकमेलिंग के सिवा कुछ नहीं मिला. प्रेम में पागल उस लड़की ने अपने बदमाश प्रेमी को काफी समझाने की कोशिश की, पर बात नहीं बनी. प्रेमी की खातिर लड़की ने अपना धर्म भी बदलवा लिया, पर उस के बाद भी उस के हाथ कुछ नहीं आया. थकहार कर उस ने पुलिस और अदालत का दरवाजा खटखटाया.

सुलेखा ने 13 जून, 2016 की रात को पटना के महिला थाने में दुष्कर्म, धोखेबाजी और साइबर क्राइम का मामला दर्ज कराया. इस में उस ने पटना के फुलवारीशरीफ के हारुननगर के रहने वाले आसिफ के साथसाथ 5 लड़कों को आरोपी बनाया.

इस लड़की की शिकायत मिलने के बाद छापामारी कर पुलिस ने 2 लड़कों रिजवी और फैज को गिरफ्तार कर लिया. सुलेखा ने बताया कि अप्रैल, 2015 में उसे फुलवारीशरीफ के एक लड़के का फोन आया और उस के बाद ह्वाट्सऐप पर भी मैसेज आए. दोनों फेसबुक फ्रैंड थे. उस ने बताया कि उसे किसी काम से पटना आना था, तो उस ने अपने फेसबुक फ्रैंड को फोन किया. वह उस से मिलने मीठापुर महल्ले में आया. सुलेखा मीठापुर के ही ‘सौरभगौरव’ होटल में ठहरी हुई थी.

होटल में बातचीत और नाश्ते के दौरान आसिफ ने सुलेखा की कोल्ड ड्रिंक में नशीली चीज मिला दी. जब वह बेहोश हो गई, तो उस लड़के ने उस के साथ बलात्कार किया और उस का वीडियो भी बना लिया. इस के बाद वह सुलेखा को वीडियो दिखा कर उसे ब्लैकमेल करने लगा.

ब्लैकमेलिंग से परेशान सुलेखा 28 जनवरी, 2016 को पटना आई और लड़के से मिल कर मामले को खत्म करने की कोशिश की.

आसिफ ने उस से शादी करने का भरोसा दे कर अपने जाल में फिर फंसा लिया. उस ने उसे पटना कालेज के पास के एक गर्ल्स होस्टल में ठहराया. उस के बाद गांधी मैदान के आसपास के पार्क में उस का जबरन धर्म बदलवा कर निकाह कराया गया.

निकाह के बाद वे दोनों एनआईटी कालेज के पास नफीस कालोनी में रहने लगे. सुलेखा को लगा कि अब आसिफ सुधर गया है और उस की जिंदगी पटरी पर लौट आई है.

कुछ दिनों तक तो सबकुछ ठीकठाक चला, पर 15-16 दिनों के बाद ही आसिफ फिर अपने पुराने रंग में आ गया. निकाह के 25 दिनों के बाद अचानक आसिफ गायब हो गया. उस ने अपना मोबाइल फोन भी स्विच औफ कर दिया.

सुलेखा ने 5 दिनों तक अपने शौहर के आने का इंतजार किया, लेकिन जब वह कई दिनों तक नहीं लौटा, तो सुलेखा आसिफ के फुलवारीशरीफ वाले घर पर पहुंच गई.

पहले तो आसिफ के घर वालों ने उसे जलील किया और चले जाने को कहा. जब वह आसिफ से मिलने और उस के ही घर में रहने की जिद पर अड़ी रही, तो लड़के के भाई ने उसे अपने दोस्त के मकान में किराए पर रहने का इंतजाम करा दिया.

सुलेखा ने बताया कि उस के बाद उसे यह कह कर जलील किया जाता था कि उस ने सही तरीके से इसलाम नहीं अपनाया है. अच्छी तरह से सीखने के लिए उसे एक मदरसे में रख दिया गया. वहां भी उस के साथ बदसलूकी की गई. जब वह पेट से हुई, तो जबरन उस का बच्चा गिरा दिया गया.

14 जून, 2016 को अदालत में सुलेखा का बयान दर्ज कराया गया. आसिफ और उस के दोस्तों के खिलाफ किसी के धर्म को ठेस पहुंचाने के लिए धारा 295/ए, पेट गिराने के लिए धारा 313, मारपीट के लिए धारा 323, बंधक बनाने के लिए धारा 344, बलात्कार के लिए धारा 376, नशा कराने के लिए धारा 328, हत्या करने की धमकी देने के लिए धारा 387, धोखाधड़ी करने के लिए धारा 420, धोखे से शादी करने के लिए धारा 496 और धमकी देने के लिए धारा 506 के तहत केस दर्ज किया गया है.

तारतार यह फेसबुकिया प्यार

बिहार के भागलपुर शहर की रहने वाली सीमा (बदला हुआ नाम) बनारस के चेतगंज के इंटर कालेज में पढ़ती थी. पढ़ाई के दौरान ही फेसबुक के जरीए उस की दोस्ती रोहित नाम के लड़के से हुई. वह बनारस के धोरौया थाने के लोहरिया गांव का रहने वाला था.

फेसबुक के जरीए ही रोहित ने सीमा को बताया कि वह ‘मनमोहिनी’ नाम की फिल्म बना रहा है. उस ने सीमा को अपनी फिल्म में हीरोइन बनने का लालच दिया. इस के बाद उन दोनों के बीच चैटिंग शुरू हो गई.

जब वे दोनों चैटिंग के जरीए गहरे दोस्त बन गए, तो एक दिन सीमा रोहित से मिलने पहुंच गई. रोहित ने स्क्रीन टैस्ट के बहाने उस के जिस्म को खूब सहलाया और उस से लिपटने की कोशिश की.

सीमा को उस की हरकत पसंद नहीं आई और वह वहां से जाने लगी. रोहित ने उसे समझाया कि फिल्मों में काम करने के लिए बहुतकुछ करना पड़ता है और बहुतकुछ सहना भी पड़ता है. इस के बाद रोहित ने उस से कहा कि पटना में शूटिंग होनी है, इसलिए वह पटना में उस से मिले.

पटना पहुंचने से पहले सीमा ने रोहित से फोन पर बात की और ठहरने का ठिकाना पूछा. रोहित ने उसे एक होटल का पता बताया. पटना पहुंच कर सीमा उसी होटल में ठहरी.

सीमा को यह पता नहीं चला कि कब उसे गहरी नींद लग गई. कुछ देर बाद रोहित उस के कमरे में पहुंचा और उस के जिस्म से खेलने लगा. उस ने सीमा के साथ बलात्कार किया और उस की वीडियो फिल्म भी बना ली.

रोहित ने उसे धमकाया कि अगर वह किसी को कुछ बताएगी, तो उस की ब्लू फिल्म इंटरनैट पर डाल दी जाएगी. सीमा रोतेबिलखते बनारस लौट गई.

सीमा की तकलीफों का यहीं खात्मा नहीं हुआ. इस के बाद रोहित फोन कर के बताई हुई जगह पर आने के लिए उस पर दबाव बनाने लगा.

सीमा ने उस की बात नहीं मानी, तो उस ने उस के साथ बलात्कार के वीडियो को इंटरनैट पर डाल दिया. रोहित ने सीमा को इस बारे में बता भी दिया.

सीमा ने तुरंत चेतनगंज थाने में रोहित के खिलाफ एफआईआर दर्ज करा दी. पुलिस ने रोहित को वाराणसी कैंट स्टेशन से गिरफ्तार कर लिया. अब रोहित जेल की हवा खा रहा है और पुलिस उस के पुराने रिकौर्ड को खंगालने में लगी हुई है.

बचें सरकारी नौकरियों के फर्जी इश्तिहारों से

गांवदेहात की रहने वाली अनीता ने रोजगार संबंधी एक अखबार में 8वीं जमात पास लोगों के लिए आंगनबाड़ी सहायिकाओं की भरती का इश्तिहार देखा, जिस के लिए 3 सौ रुपए के आवेदन शुल्क की मांग की गई थी, जो शिक्षा विकास संस्थान, मेरठ में बैंक ड्राफ्ट के जरीए भेजनी थी. उस इश्तिहार में हर ग्राम पंचायत में आंगनबाड़ी सुपरवाइजर, आंगनबाड़ी वर्कर व आंगनबाड़ी सहायिकाओं के पदों के लिए अर्जी मांगी गई थी.

अनीता ने फार्म खरीद कर तय शुल्क के साथ शिक्षा विकास संस्थान, मेरठ को नौकरी के लिए अर्जी भेजी, लेकिन अर्जी भेजने के एक साल बाद भी जब उक्त पद के लिए कोई बुलावा नहीं आया, तो उन्होंने इश्तिहार में दिए गए फोन नंबर पर बात करने की कोशिश की. लेकिन सभी फोन नंबर स्विच औफ थे.

जब अनीता ने अपने आसपास के गांवों में पता किया, तो पता चला कि कई औरतों ने इस पद के लिए अर्जी दी थी, लेकिन आज तक उन सब से कोई संपर्क नहीं किया गया था.

इसी तरह चांद ऐजूकेशनल ऐंड कल्चरल सोसाइटी, लेखू नगर, नई दिल्ली द्वारा सर्वशिक्षा अभियान के तहत 20 हजार से ज्यादा अध्यापकों के पदों पर भरती निकाली गई, जिस की न्यूनतम योग्यता 12वीं जमात पास होना तय थी. इस के लिए इस संस्था द्वारा आवेदन शुल्क के रूप में 250 रुपए के पोस्टल और्डर की डिमांड की गई थी.

लाखों बेरोजगारों द्वारा उक्त पद के लिए अर्जी दाखिल की गई, लेकिन उक्त संस्था द्वारा मांगा गया आवेदन फर्जी निकला. कैरियर काउंसलिंग से जुड़े ‘दिशा सेवा संस्थान’ के डायरैक्टर अमित मोहन का कहना है कि सरकारी महकमों में नियुक्तियों का अधिकार सिर्फ सरकार के पास होता है और इस के लिए सरकार इश्तिहार निकाल कर नियुक्तियां करती है. महकमों में होने वाली नियुक्तियों में पदों के मुताबिक अलगअलग शैक्षिक योग्यता तय की जाती है.

किसी भी गैरसरकारी संस्था द्वारा अगर सर्वशिक्षा अभियान, आंगनबाड़ी, अग्निरक्षा विभागों सहित सरकारी महकमों में किसी तरह की नियुक्ति के लिए आवेदन मांगा जाता है, तो उस का मकसद महज ठगी करना होता है.

अनीता के मामले में कुछ इसी तरह की ठगी की गई, क्योंकि आंगनबाड़ी विभाग में भी सरकार से जुड़ा महिला एवं बाल विकास मंत्रालय करता है.

उत्तर प्रदेश में गांवों में आंगनबाड़ी व उस से जुड़े दूसरे पदों की नियुक्तियां की जा चुकी हैं. ऐसे में इस तरह के इश्तिहार भोलेभाले लोगों को नौकरी के नाम पर लूटना होता है. फर्जी संस्थाओं द्वारा निकाली गई वैकैंसी के आधार पर कुछ ही समय में करोड़ों रुपए इकट्ठा हो जाते हैं.

इस के बाद ये संस्थाएं अपना बोरियाबिस्तर समेट कर चंपत हो जाती हैं और 200-300 रुपए की मामूली रकम के लिए ठगी का शिकार हुआ शख्स इन के खिलाफ कोई शिकायत नहीं करता. इस के बाद इन संस्थाओं के लोग फिर से दूसरे शहरों में इस तरह की ठगी का जाल फैलाना शुरू कर देते हैं.

कम पढ़े ही बने शिकार

सरकारी नौकरियों के नाम पर फर्जी संस्थाओं द्वारा ठगी का मकसद सिर्फ कम पढ़ेलिखे लोगों को ठगने का होता है. कुछ इसी तरह का एक मामला बस्ती जिले के बनकटी ब्लौक के मरवटिया उर्फ जोगिया गांव के रहने वाले सुदामा प्रसाद के साथ हुआ.

सुदामा प्रसाद ने अखिल भारतीय मानव हित संस्थान नाम की एक संस्था में नौकरी के लिए आवेदन किया और उस संस्था ने सुदामा को यह यकीन दिलाया कि वह भारत सरकार द्वारा नामित की गई एक संस्था है. जिस के द्वारा सभी गांवों में सायंकालीन स्कूल चलाए जाने हैं.

गोरखपुर की इस संस्था ने सुदामा से शिक्षक पद पर नियुक्ति के लिए 50 हजार रुपए घूस के रूप में लिए और सुदामा की ही तरह जिले के तमाम गांवों के बेरोजगारों नौजवानों को नौकरी देने के नाम पर इस संस्था द्वारा पैसे की वसूली की गई.

सुदामा 10 हजार रुपए महीने की तनख्वाह पर नियुक्त हुआ, लेकिन उस को पढ़ाते हुए जब 2 महीने से ऊपर हो गए, तो उस ने उस संस्था से अपनी तनख्वाह की मांग की, पर इस के पहले कि सुदामा उस संस्था से तनख्वाह ले पाता, संस्था गोरखपुर से अपना बोरियाबिस्तर समेट चुकी थी.

इस संस्था से जुड़े लोगों से जब ठगे गए और भी लोगों ने उन के मोबाइल नंबरों पर बात करनी चाही, तो सभी नंबर बंद मिले.

वैबसाइटों पर न करें यकीन

सरकारी नौकरियों के लिए सिर्फ वैबसाइटों पर निकलने वाली वैकैंसी को आधार मान कर विश्वास नहीं करना चाहिए, क्योंकि आएदिन रेलवे भरती बोर्ड सहित तमाम महकमों की फर्जी वैबसाइट बना कर बेरोजगारों से नौकरी के नाम पर ठगी के मामले सामने आते रहते हैं, जिस में ठगी करने वाला अपनेआप को संबंधित महकमे का अधिकारी बता कर न केवल वैबसाइटों के जरीए फार्म भरवाता है, बल्कि नौकरी की पक्की गारंटी के नाम पर भारीभरकम रकम वसूल कर फर्जी नियुक्तिपत्र भी थमा देता है.

ऐसे में जब भी आप सरकार नौकरी के लिए आवेदन कर रहे हों, तो संबंधित विभाग व उस के द्वारा जारी किए गए इश्तिहारों की ठीक तरह से जांच करें, इस के बाद ही नौकरी के लिए आवेदन करें.

इन पर भी रखें नजर

अगर कोई संस्था आप को सरकारी महकमे में नियुक्ति कराने का दावा करती है, तो इस की शिकायत तुरंत अपने नजदीकी पुलिस स्टेशन पर जरूर करें, क्योंकि किसी भी तरह की नियुक्तियों का अधिकार फर्जी संस्थाओं को नहीं दिया जाता है.

कुछ महकमों द्वारा सेवा प्रदाता संस्थाओं के जरीए नियुक्यिं की जाती हैं, जिस में किसी तरह के आवेदन शुल्क की मांग नहीं की जाती और न ही नौकरी देने लिए किसी तरह की रकम की मांग की जाती है.

नौकरियों के आवेदनों के फार्म बेचने की दुकान चलाने वाले एक आदमी का कहना है कि फर्जी संस्थाओं द्वारा नियुक्तियों के लिए निकाले गए आवेदन फार्म अकसर उन की दुकान पर मुफ्त में भेज दिए जाते हैं, लेकिन वे ऐसे फार्मों को फाड़ देते हैं, क्योंकि उन्हें अच्छी तरह पता है कि सरकारी नौकरियों के लिए निकाले गए कौन से इश्तिहार सही हैं और कौन से फर्जी.

अगर आप कम पढ़ेलिखे हैं और सरकारी नौकरी पाने का ख्वाब देखते हैं, तो अपनी पढ़ाईलिखाई के मुताबिक पदों को चुनें. उस के लिए पूरी तैयारी के साथ इम्तिहान में शामिल हों, जिस से किसी भी तरह की ठगी से बच सकें. नहीं तो कोई छोटामोटा

कारोबार कर के अपने कैरियर को आगे बढ़ाएं. आजकल प्राइवेट नौकरियों में भी बहुत गुंजाइश है.

साड़ी पहन एक्सरसाइज करती दिखीं अदा शर्मा

बौलीवुड एक्ट्रेस अदा शर्मा सोशल मीडिया पर काफी एक्टिव रहती हैं और अक्सर ही अपने वीडियो और फोटोज सोशल मीडिया पर शेयर करती रहती हैं. इसी बीच उन्होंने एक बार फिर अपने इंस्टाग्राम अकाउंट पर एक वीडियो शेयर किया है. इस वीडियो में वह साड़ी पहन कर एक्सरसाइज करते हुए नजर आ रही हैं. बता दें, अदा ने यह वीडियो केंद्रीय मंत्री राज्यवर्धन सिंह राठौर द्वारा दिए गए फिटनेस चैलेंज को एक्सेप्ट करते हुए शेयर किया है.

वीडियो में अदा साड़ी में नजर आ रही हैं और वह किसी जिम में नही बल्कि किसी बिल्डिंग की छत पर एक्सरसाइज करते हुए दिखाई दे रही हैं. इतना ही नहीं वह एक्सरसाइज के लिए मुद्गर का इस्तेमाल कर रही हैं. अदा ने इस वीडियो को शेयर करते हुए लिखा, ‘क्योंकि यह फिट इंडिया चैलेंज है और इसलिए मैं पूरी तरह से ट्रेडिशनल अवतार में यह कर रही हूं. साथ ही उन्होंने ब्रैकेट में लिखा, कोई भी एक्ट्रेस उनके इस साड़ी लुक को कौपी न करें क्योंकि वह इसे पेटेंट करा रही हैं’.

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इसके अलावा उन्होंने लिखा, ‘खुद को फिट रखने के लिए किसी को भी बड़े जिम में जाने की जरूरत नहीं है. कुछ वक्त पहले मैं महाराष्ट्र के एक अखाड़े में गई थी और वहां के लोगों की फिटनेस को देख मैं काफी इंस्पायर हुई. वो लोग अपने ही वजन और कुछ सिंपल प्रोप्स के इस्तेमाल से खुद को फिट बनाते हैं. इसी में से एक है मुद्गर’. आपको बता दें कि भारत में मुद्गर का इस्तेमाल प्राचीन काल से किया जा रहा है.

गौरतलब है कि अदा ने फिल्म ‘1920’ से डेब्यू किया था और इस फिल्म के लिए उन्हें बेस्ट डेब्यू एक्टर फीमेक का फिल्मफेयर अवौर्ड भी मिला था. हालांकि, इसके बाद वह साउथ फिल्म इंडस्ट्री की ओर चली गई और उन्होंने कई साउथ फिल्मों में काम किया है.

यामी ने इस फिल्म के लिए दी अपने बालों की कुर्बानी

बौलीवुड अदाकारा यामी गौतम ने भले ही ज्यादा फिल्मों में काम न किया हो, पर उन्होंने आजतक जितनी भी फिल्में की हैं उन सब में हमेशा अपने रोल को अच्छी तरह से समझा है और अपना बनाया है. यामी गौतम ने फिल्म ‘विक्की डोनर’, ‘काबिल’ और ‘सरकार 3’ में अलग अलग किरदार को निभाया है. इसलिए वह अपनी आने वाली फिल्म ‘उरी’ में भी कुछ अगल तरह का किरदार निभा रही हैं.

फिल्म ‘उरी’ के लिए यामी ने फिजिकल फिटनेस के साथ-साथ अपने पूरे लुक को भी बदल दिया है. उन्होंने इंस्टाग्राम पर अपने नए लुक को पोस्ट किया है. एक्ट्रेस फिलहाल एक स्टाइलिश बौब लुक में हैं. पहली बार ऐसा हुआ है जब उन्होंने अपने लंबे बालों की कुर्बानी दी है और अपने रोल के लिए हेयर कट कराया है.

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तीन हेयर स्टाइलिस्ट और फिल्म के डायरेक्टर की टीम ने यह तय किया कि फिल्म में उनके बाल कैसे दिखेंगे और उसी के अनुसार वीकेंड में हेयर ट्रांसफार्मेशन किया गया है. इस लुक में एक्ट्रेस बेहद क्लासी दिख रही हैं. उनके नए हेयर कट को देखकर यूजर्स उन्हें अच्छे कमेंट दे रहे हैं.

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यामी ने बताया फिल्म के किरदार के इस खास लुक को लेकर वो काफी उत्साहित थी. जब आदित्य ने उनके साथ बात की तो वह अपने कैरेक्टर को अधिक रियल बनाने का मौका चूकना नहीं चाहती थी. मुझे अपना लुक काफी पसंद आया और आशा है कि दर्शक भी इसे पसंद करेंगे. फिल्म उरी 2016 में उरी में हुए हमलों पर आधारित है. आदित्य धर इस फिल्म के साथ डायरेक्शन की शुरुआत कर रहे हैं और फिल्म में यामी के अपोजिट विक्की कौशल होंगे.

हुनर पाने में लगाएं दमखम

शिक्षा संस्थानों व सरकारी नौकरियों में युवाओं की आरक्षण की चाहत हर पार्टी के लिए गले की हड्डी बन गई है. नौकरी के गिरते अवसरों से परेशान युवा एक बार फिर सरकारी नौकरियों के पीछे दौड़ रहे हैं पर वहां पहली बाधा पद के अनुकूल स्कूली या कालेजी शिक्षा की अनिवार्यता आड़े आ जाती है. दोनों जगहों पर पिछड़ी व निचली जातियों के युवा और ऊंची जातियों के युवा जिन में सदियों से सवर्ण माने गए पढ़ेलिखे व खातेपीते घरों के तो हैं ही, 1947 के बाद हुए भूमि सुधारों से जमीनमालिक बने तब के थोड़े कम पिछड़े घरों के युवा भी अब शामिल होने लगे हैं.

नतीजा यह है कि सरकारी शिक्षा संस्थानों या सरकारी नौकरियों में लाखों को निराशा होने लगी है. जिन्हें आरक्षण नहीं मिला वे रोना रोते रहते हैं कि आरक्षण न होता तो वे अपने से कमतर के मुकाबले स्कूलकालेज या सरकारी दफ्तर में जगह पा जाते. उन का गुस्सा कहीं मराठा, कहीं जाट, कहीं पाटीदार, कहीं केषलिंगा तो कहीं किसी और जाति के नाम से दिख रहा है.

सड़कों पर भगवा दुपट्टा लपेटे युवाओं के जो हुजूम दिखने लगे हैं उन में ज्यादातर इसी नाराज वर्ग से हैं. वे धर्म के पैरोकार बन कर आरक्षण को समाप्त करने की जुगत में पूजापाठी बनने का ढोंग रच रहे हैं. वे शासकों को खुश करना चाहते हैं कि  उन से ज्यादा बड़ा भक्त कोई नहीं है. वे, दाता, अब तो कालेज में सीट या सरकारी नौकरी का वर दे दो, की गुहार करते नजर आते हैं.

ये युवा भटके ही नहीं, मूर्ख भी हैं. इन्हें नहीं मालूम कि सपनों के चमकीले पहाड़ को तोड़ने का लालच दे कर इन से लोगों के सिर तुड़वाए जा रहे हैं. एक राजनीतिक माफिया तैयार किया जा रहा है जिस का हिस्सा बन कर ये युवा अपनी पूरी जिंदगी स्वाह कर देंगे. आज तो ये मातापिता के या धमकियों  से वसूले चंदे के पैसों से मोटरसाइकिलों पर नारे लगाते घूमते हैं और झंडे, लाउडस्पीकर, गाय, राष्ट्रभक्ति, राष्ट्रगान के नाम पर तोड़फोड़ करते हैं पर जैसे ही जरा बड़े होंगे तो इन के हाथों में न शिक्षा होगी, न नौकरी और न ही हुनर. बाइकों पर इन की जगह युवाओं की अगली खेप ले लेगी और बुढ़ाते नेता भी इन्हें दूध से मक्खी की तरह निकाल फेंकेंगे.

आरक्षण का लाभ ज्यादा जातियों को मिले तो भी सीटें तो उतनी ही रहेंगी. यदि दलितों, ओबीसीयों के हाथों से कुछ छीना गया तो वे भी उसी तरह का शोर मचाने लगेंगे जैसे आज पाटीदार, जाट व गुर्जर मचा रहे हैं. उन का हल्ला ज्यादा दमदार होगा और ज्यादा खतरनाक क्योंकि वे लोग सदियों का हिसाब करने के लिए तैयार बैठे हैं. धर्म की लुटिया पूरी तरह डूब सकती है और उन का आरक्षण आबादी के हिसाब से 50 से बढ़ कर 70-75 प्रतिशत तक पहुंच सकता है.

अच्छा यही है कि युवा अपना दमखम नए हुनर पाने में लगाएं. आज हुनरमंदों की हर क्षेत्र में जरूरत है. अगर चीन जैसा बनना है तो चीन जैसी उत्पादन क्षमता तैयार करनी होगी.

पुरुष रजोनिवृत्ति को इस तरह समझिए

पुरुषों के लिए रजोनिवृत्ति शब्द का प्रयोग कभी कभी उम्र बढ़ने के कारण टेस्टोस्टोरोन का स्तर कम होने या टेस्टोस्टोरोन की जैव उपलब्धता में कमी बताने के लिए किया जाता है. महिलाओं की रजोनिवृत्ति और पुरुषों में रजोनिवृत्ति 2 भिन्न स्थितियां हैं. हालांकि, महिलाओं में अंडोत्सर्ग (औव्यूलेशन) खत्म हो जाता है और हार्मोंस बनने भी कम हो जाते हैं और यह सब अपेक्षाकृत कम समय में होता है जबकि पुरुषों में हार्मोन बनना और टेस्टोस्टोरोन की जैव उपलब्धता कई वर्षों में कम होती है. जरूरी नहीं है कि इस के नतीजे स्पष्ट हों.

पुरुषों में रजोनिवृत्ति महिलाओं की अपेक्षा अचानक नहीं होती है. इसके संकेत और लक्षण धीरे धीरे और सूक्ष्मतौर पर सामने आते हैं. पुरुषों के हार्मोन टेस्टोस्टोरोन के स्तर में कमी किसी भी सूरत में उस तेजी से नहीं होती है जिस तेजी से महिलाओं में होती है. हैल्थकेयर विशेषज्ञ इसे एंड्रोपौज, टेस्टोस्टोरोन डैफिशिएंसी या देर से

शुरू हुआ हाइपोगोनाडिज्म कहते हैं. हाइपोगोनाडिज्म का मतलब है पुरुषों के हार्मोन में इतनी कमी जो किसी उम्रदराज व्यक्त्ति के लिए भी कम हो.

संकेत और लक्षण

-मूड बदलना और चिड़चिड़ापन.

-शरीर में चरबी का पुनर्वितरण.

-मांसपेशियों की कमी.

-शुष्क व पतली त्वचा.

-हाइपर हाइड्रोसिस यानी अत्यधिक पसीना निकलना.

-एकाग्रता की अवधि कम होना.

-उत्साह कम होना.

-सोने में असुविधा यानी अनिद्रा या थकान महसूस होना.

-यौन इच्छा कम हो जाना.

-यौन क्रिया ठीक से न होना.

उपरोक्त लक्षण भिन्न पुरुषों में अलग अलग हो सकते हैं और यह अवसाद से ले कर दैनिक जीवन व खुशी में हस्तक्षेप तक, कुछ भी हो सकता है. इसलिए, संबंधित कारण मालूम करना महत्त्वपूर्ण है और इसे दूर करने के लिए आवश्यक इलाज किया जाना चाहिए. कुछ लोगों की हड्डियां भी कमजोर हो जाती हैं. इसे औस्टियोपीनिया कहा जाता है.

कुछ मामलों में जब जीवनशैली या मनोवैज्ञानिक समस्या आदि जिम्मेदार नहीं लगते हैं, तो पुरुष रजोनिवृत्ति के लक्षण हाइपोगोनाडिज्म के कारण हो सकते हैं जब हार्मोन कम बनते हैं या बनते ही नहीं हैं. कभीकभी हाइपोगोनाडिज्म जन्म से ही मौजूद होता है. इस से यौनारंभ देर से आने और अंडग्रंथि छोटा होने जैसे लक्षण हो सकते हैं. कुछेक मामलों में हाइपोगोनाडिज्म का विकास जीवन में आगे चल कर भी हो सकता है खासकर उन पुरुषों मे जो मोटे हैं या जिन्हें टाइप 2 डायबिटीज है. इसे देर से हुआ हाइपोगोनाडिज्म कहा जा सकता है और ऐसे पुरुष में रजोनिवृत्ति के लक्षण सामने आ सकते हैं. हाइपोगोनाडिज्म देर से शुरू होने का पता आमतौर पर आप के लक्षणों और खून की जांच के नतीजों से पता चलता है. इस का उपयोग टेस्टोस्टोरोन का स्तर जानने के लिए किया जाता है.

पुरुष रजोनिवृत्ति के लक्षण का सब से आम किस्म का उपचार जीवनशैली से संबंधित स्वास्थ्यकर विकल्प चुनना है. उदाहरण के लिए, आप का चिकित्सक आप को सलाह दे सकता है :

-पौष्टिक आहार लें.

-नियमित व्यायाम करें.

-पर्याप्त नींद लें.

-तनाव मुक्त रहें.

जीवनशैली से संबंधित ये आदतें सभी पुरुषों के लिए फायदेमंद हो सकती हैं. इन आदतों को अपनाने के बाद पुरुष, रजोनिवृत्ति के लक्षणों को महसूस करने वाले पुरुष अपने संपूर्ण स्वास्थ्य में सकारात्मक परिवर्तन देख सकते हैं. अगर आप अवसाद में हैं तो आप के चिकित्सक ऐंटी डिप्रैसैंट्स थेरैपी और जीवनशैली में परिवर्तन की सलाह देंगे. हार्मोन रीप्लेसमैंट थेरैपी भी एक उपचार है. हालांकि इलाज के लिए मरीज के परिवार का कैंसर प्रोस्टेट का इतिहास और ब्लड पीएसए की रिपोर्ट चाहिए होती है अगर डाक्टर को लगता है कि हार्मोन रीप्लेसमैंट थेरैपी से फायदा होगा.

(लेखक इंद्रप्रस्थ अपोलो अस्पताल, दिल्ली में सीनियर कंसल्टैंट (यूरोलौजी) हैं.)

धर्मजनित भीड़तंत्र का खतरा और हिंसा का सिलसिला

पश्चिम बंगाल के 24 परगना जिले के बशीरहाट कसबे में 12वीं में पढ़ने वाले एक किशोर द्वारा 22 जुलाई 2017 को फेसबुक पर मुसलमान युवकों पर आपत्तिजनक पोस्ट डालने से प्रदेश के कई शहर सुलग उठे. पोस्ट ज्योंही वायरल हुई, मुसलमान सड़कों पर उतर आए. भीड़ ने घरों पर हमला कर दिया. दुकानें लूटीं, कईर् वाहन फूंक दिए. भीड़ पोस्ट करने वाले किशोर को भीड़ के हवाले करने की मांग करने लगी. गोलियां चलने से कसबे में कार्तिक चंद घोष नामक व्यक्ति की मौत हो गई. इस घटना के बाद मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को दोषी ठहरा कर विपक्षी दलों में आरोपप्रत्यारोप लगाने का खेल शुरू हो गया.

इस से पहले, फरीदाबाद-पलवल टे्रन में 15 वर्षीय जुनैद खान नामक किशोर को बीफ ले जाने के शक में भीड़ ने उस पर खूब छींटाकशी की, फिर चाकू घोंप कर उस की हत्या कर दी. कुछ समय पहले गायों को ले जा रहे अलवर के पहलू खान की गाय की तस्करी के नाम पर भीड़ ने जान ले ली थी. पिछले साल दादरी में गोमांस के संदेह में घर में घुस कर भीड़ द्वारा मारे गए मोहम्मद अखलाक की मौत का कहर उस के परिवार पर टूट पड़ा था.

भीड़तंत्र द्वारा नफरत के विस्फोट का यह अंतहीन सिलसिला थमता हुआ नहीं दिख रहा है. देशभर में इन दिनों यह भयावह दृश्य देखा जा रहा है. ऐसी घटनाओं ने देश के विचारकों को गहरी चिंता में डाल दिया है. जुनैद हत्याकांड के बाद हजारों लोगों ने सड़कों पर उतर कर ‘नौट इन माई नेम’ नारे के साथ दिल्ली के जंतरमंतर, मुंबई, कोलकाता, बैंगलुरु, हैदराबाद जैसे शहरों में विरोध प्रदर्शन किया.

देश की सरकार न सिर्फ बहरा कर देने वाली चुप्पी साधे हुए है, बल्कि अल्पसंख्यकों के खिलाफ हमले और भीड़ द्वारा हत्या करने को खुलेआम बढ़ावा देने में लगी हुई है. अल्पसंख्यक आयोग और मौजूदा केंद्र सरकार अल्पसंख्यक समुदाय को सम्मान दिलाने व उस की सुरक्षा का दिखावा तक करने में असफल रही है.

यह और ऐसे कई आरोप लगाते हुए प्रख्यात मानवाधिकार कार्यकर्ता 60 वर्षीया शबनम हाशमी ने अपना राष्ट्रीय अल्पसंख्यक अधिकार पुरस्कार सरकार को वापस लौटाया तो इस पर कोई खास होहल्ला तो दूर, औपचारिक चर्चा भी नहीं हुई.

मानवाधिकार के क्षेत्र में शबनम हाशमी को कार्य करते 2 दशकों से भी ज्यादा का वक्त गुजर चुका है. वे एक धीरगंभीर पर आकर्षक व्यक्तित्व वाली महिला हैं जो आमतौर पर खामोशी से अपना काम करना पसंद करती हैं.

पिछले दिनों देश के विभिन्न क्षेत्रों में खासतौर से गौरक्षा और बीफ खाने व उस की कथित तस्करी के नाम पर उन्मादी भीड़ ने जिस तरह मुसलमानों की चुनचुन कर हत्या की वह दीर्घकालिक चिंता की बात है. समाज पर राज एक वर्गविशेष की भीड़ का चल रहा है जिस पर सुप्रीम कोर्ट और राष्ट्रपति ने गंभीरता से जबकि प्रधानमंत्री ने औपचारिक रूप से चिंता जताई है.

देश धर्मजनित भीड़तंत्र की दहलीज पर न केवल खड़ा है बल्कि यह रोग काफी भीतर तक दाखिल भी हो गया है. इसे समझने के लिए कुछ हादसों पर गौर करना जरूरी है. अफसोस की बात यह भी है कि कट्टर और अदूरदर्शी लोग इन हादसों का समर्थन कर रहे हैं. जब से मौजूदा सरकार सत्ता में आई है, एक सर्वे बताता है कि पिछले 3 वर्षों में इस तरह की घटनाओं में 97 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है. हाल की कुछ बहुचर्चित घटनाएं तफसील से पढि़ए.

वल्लभगढ़, 22 जून, 2017

हरियाणा के वल्लभगढ़ से 4 किलोमीटर की दूरी पर एक गांव है खदावली. खदावली गांव में मुसलिमों की तादाद खासी है. इस गांव के एक बुजुर्ग निवासी हैं जलालुद्दीन, जिन का घर भरापूरा है. जलालुद्दीन का छोटा बेटा जुनैद मेवात के एक मदरसे फैज-ए-सोमानिया में पढ़ रहा था. जुनैद इस दफा ईद की छुट्टियां मनाने खदावली आया.

ईद की खरीदारी करने के लिए, हादसे के दिन, जुनैद अपने बडे़ भाई हाशिम के साथ दिल्ली गया था और खरीदारी के बाद रात की लोकल ट्रेन से घर वापस लौट रहा था. वल्लभगढ़ से दिल्ली तकरीबन 45 मिनट का रास्ता है. बहैसियत हाफिज, जुनैद की यह पहली ईद थी और वह दिल्ली की जामा मसजिद का इमाम बन जाने का ख्वाब संजोए था. यह ख्वाब, हद से ज्यादा, हर धार्मिक मुसलमान किशोर का होता है.

सदर स्टेशन से हाशिम और जुनैद लोकल ट्रेन में बैठे. उन के साथ 2 पड़ोसी दोस्त मोहसिन और मोईन भी थे. सदर में तो ट्रेन में कुछ जगह थी लेकिन जैसेजैसे यह वल्लभगढ़ की तरफ बढ़ने लगी तो मुसाफिरों की तादाद बढ़ने लगी. ये चारों चूंकि बैठ चुके थे, इसलिए जगह और बैठने की मारामारी को देखते हुए बतियाते जा रहे थे. भीड़ में एक बुजुर्ग को खड़ा देख जुनैद ने उन्हें बैठने के लिए अपनी सीट दे दी और खुद उन की जगह खड़ा हो गया.

ओखला स्टेशन से उस डब्बे में एकसाथ कई लोग चढ़े, जिस से धक्कामुक्की होने लगी. लोकल ट्रेनों में ऐसा होना आम बात है. लेकिन धक्कामुक्की इतनी बढ़ी कि एक धक्के से जुनैद गिर पड़ा. इस पर धक्का मारने वालों से हाशिम और जुनैद ने कहा कि वे धक्का न मारें.

बस, इतना कहना भर था कि ओखला से चढ़े एकसाथ 15-20 लोगों में से एक ने हाशिम की टोपी छीन कर नीचे फेंक दी और उसे फिल्मी स्टाइल में अपने पैरों तले कुचल दिया. यह भीड़ इतने से ही शांत नहीं हुई. भीड़ में से एक ने हाशिम की दाढ़ी पकड़ ली. हाशिम और जुनैद, अंजाना पर पहचाना कुछ भी कह लें, खतरा देख अब बचाव की मुद्रा में आ गए.

कायदे से तो बात यहीं खत्म हो जानी चाहिए थी कि भीड़ ने 2 मुसलमान युवकों की टोपी रौंदी और दाढ़ी नोची, पर भीड़ का इरादा कुछ और था. इन लोगों ने हाशिम और जुनैद की पिटाई करनी शुरू कर दी. मोईन और मोहसिन को भी खींच कर मारा जाने लगा. मौजूद मुसाफिरों की भीड़ इस मारकुटाई पर कुछ नहीं बोली. इन चारों को पीटने वाले 10-15 लोग चिल्लाते भी जा रहे थे कि ये मुसलमान हैं, गाय खाते हैं और देशद्रोही हैं. पिटाई के दौरान ही हाशिम ने अपने मोबाइल फोन से वल्लभगढ़ में रह रहे अपने बड़े भाई शाकिर को हादसे की खबर दे दी थी, जिस से वह उन्हें लेने के लिए स्टेशन पहुंच गया था.

वल्लभगढ़ पर ट्रेन रुकी तो भीड़ ने इन चारों को उतरने नहीं दिया. इस पर शाकिर ढूंढ़ता हुआ उन के डब्बे तक जा पहुंचा. उस के साथ उस के कुछ दोस्त भी थे. शाकिर और उस के दोस्तों ने देखा कि इन चारों को भीड़ ने पकड़ रखा है, और उन्हें उतरने नहीं दे रहे हैं. इस पर कहासुनी शुरू हुई तो भीड़ ने शाकिर और उस के साथियों की धुनाई शुरू कर दी.

वल्लभगढ़ से टे्रन खिसकी तो भीड़ में से किसी ने एक नुकीला चाकू निकाला और शाकिर पर वार कर दिया. शाकिर को खतरे में देख उस के दोनों छोटे भाई हाशिम और जुनैद आगे आए तो इन पर भी चाकू से हमला किया गया.

अगला स्टेशन असावटी था, महज 10 मिनट का रास्ता, लेकिन जुनैद पर चाकू के इतने हमले हुए थे कि वह मर गया.

चलती टे्रन में एक मुसलमान युवक की हत्या की बात जंगल की आग की तरह देशभर में फैली जिस पर तरहतरह की बातें हुईं. अस्पताल में भरती हाशिम आगंतुकों को रट्टू तोते की तरह यही कहानी सुना रहा था. जलालुद्दीन के घर ईद की खुशियों की जगह मातम ने ले ली और इस इलाके के मुसलमानों ने ईद की नमाज अपने बाजुओं में काली पट्टी बांध कर पढ़ी.

जुनैद को क्यों मारा, यह बात ट्रेन में ही चिल्लाचिल्ला कर हत्यारी भीड़ बता चुकी थी कि ये मुसलमान हैं, ये गाय खाते हैं और देशद्रोही हैं.

रामगढ़, झारखंड

29 जून, 2017

झारखंड के रामगढ़ जिले में मोहम्मद अलीमुद्दीन नाम के युवक को गौरक्षकों ने पीटपीट कर मार डाला. यह वह वक्त था जब गुजरात के साबरमती आश्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी नसीहत या चेतावनी दे रहे थे कि गौरक्षा के नाम पर आदमियों की हत्या स्वीकार्य नहीं.

इस बात से रामगढ़ के गौरक्षकों ने जो सीखा वह बेहद घृणित, अमानवीय और वीभत्स है. हादसे के दिन अलीमुद्दीन वैन में मांस, कथित रूप से प्रतिबंधित मांस यानी बीफ, ले कर जा रहा था, जिस की भनक इस इलाके के गौरक्षकों को लग गई थी. उन्होंने रामगढ़ के बाजार टांड़ में अलीमुद्दीन को वैन सहित बलपूर्वक रोका और वैन की तलाशी ली.

वैन में 4 बोरियों में मांस देख गौरक्षक भड़क गए और उन्होंने तुरंत वैन को आग लगा दी. वैन में रखी बोरियों में मांस गाय का था या किसी और जानवर का था या फिर था ही नहीं, यह सचाई कभी पता नहीं चलने वाली.

यह बात भी यहीं खत्म हो जानी चाहिए थी पर यह शुरुआत थी. गौरक्षकों के आतंक को सैकड़ों लोगों ने देखा. अलीमुद्दीन को खींच कर बीच चौराहे पर लाया गया और गौरक्षकों ने उसे मौत की सजा सुना दी. यह किसी अदालत द्वारा दी गई सजा नहीं थी जिस में कथित मुजरिम को अपनी सफाई देने के लिए कोई वक्त मिलता. मौत की सजा के फैसले पर भीड़ ने तुरंत अमल भी किया और अलीमुद्दीन की जम कर पिटाई की और बाकायदा उस का वीडियो भी बनाया गया. मंशा तय है, ताकि सनद रहे…की थी.

हिंसक और उन्मादी भीड़ अलीमुद्दीन को पीटती रही. इसी बीच कहीं या किसी से खबर मिलने पर पुलिस भी आ गई और बमुश्किल भीड़ के चंगुल से उस ने अलीमुद्दीन को छुड़ाया. जल्द ही इस हादसे की खबर भी आग की तरह फैली कि झारखंड के रामगढ़ जिले में गौरक्षकों ने पीटपीट कर एक मुसलमान को मार डाला. उस पर आरोप यह लगाया कि वह गौमांस ले जा रहा था.

पुलिस अलीमुद्दीन को इलाज के लिए अस्पताल ले गई पर इलाज के दौरान ही उस की मौत हो गई. मौके पर बड़ी तादाद में उस इलाके के आसपास से आए मुसलमान इकट्ठा हो गए. इस वक्त तक अपना मिशन पूरा कर गौरक्षक छूमंतर हो चुके थे.

रिम्स, रांची में पोस्टमौर्टम के बाद अलीमुद्दीन की लाश पुलिस हिफाजत में उस के गांव मनुआ फूलसराय लाई गई. मनुआ फूलसराय के लोगों ने पुलिस वालों का विरोध किया और अलीमुद्दीन के घर वालों ने उस का शव लेने से इनकार कर दिया. सरकारी अधिकारियों ने विरोध झेलते हुए 3 बार मध्यस्थता की, तब कहीं जा कर अलीमुद्दीन की लाश उस के घर वालों ने ली. अब तक रामगढ़ जिले में अघोषित कर्फ्यू लग गया था और 33 संवेदनशील इलाकों में सुरक्षा बल तैनात कर दिए गए थे.

दूसरे दिन सुबह पुलिस ने 12 लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया. ये दर्जनभर तो गायब हो ही गए थे, इस इलाके के तमाम हिंदूवादी नेता भी अलीमुद्दीन की मौत के बाद फरार हो गए. हिंसा और रोमांच से भरपूर भीड़ द्वारा की गई इस हत्या में गुल तो कई खिले और अभी तक खिल रहे हैं पर एक बासी बात यह भी प्रचारित हुई कि अलीमुद्दीन पर अपहरण और चोरी के मामले दर्ज थे. इस का उस की हत्या से संबंध किसी को समझ नहीं आया.

भारी तनाव के बीच रामगढ़ और मनुआ फूलसराय के लोग बारबार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का यह भाषण स्मार्टफोन पर सुन रहे थे जिस में उन्होंने कहा था, गौरक्षा के नाम पर हिंसा क्यों, मौजूदा हालात पर पीड़ा होती है. गाय की सेवा ही गाय की भक्ति होती है. गौरक्षा के नाम पर हिंसा ठीक नहीं. देश को अहिंसा के रास्ते पर चलना होगा, गौभक्ति के नाम पर लोगों की हत्या स्वीकार नहीं की जाएगी. अगर वह इंसान गलत है तो कानून अपना काम करेगा, किसी को भी कानून अपने हाथ में लेने की जरूरत नहीं है. हिंसा समस्या का समाधान नहीं है.

यह भाषण उल्लेखनीय इसलिए था कि रामगढ़ में गौभक्तों के गैंग ने न केवल कानून अपने हाथ में लिया था बल्कि गाय के नाम पर एक मुसलमान को पीटपीट कर मार डाला था. समस्या का समाधान जिस हिंसा के जरिए निकाला गया उस की प्रतिध्वनि सदियों तक गूंजती रहेगी. प्रधानमंत्री का भाषण ऐसे हर हादसे पर उल्लेखित होगा.

झारखंड, गिरिडीह जिले का बरवाबाद गांव, 29 जून

रांची से लगभग 270 किलोमीटर दूर गिरिडीह जिले के देवरी थाने के तहत आने वाले बरवाबाद गांव में 28 जून को हिंसक भीड़ ने मुहम्मद उस्मान अंसारी की हत्या करने की कोशिश की. उस का घर जला दिया और परिवार वालों को जला कर मारने का प्रयास किया. उस की गायों को लूट कर ले जाया गया.

500 घरों और 15 मुसलमानों के इस गांव में उस्मान के घर से सटा बदरी मंडल का घर है. उस्मान दूध का कारोबार करता था. उस के पास पहले 14 गाएं थीं पर अब नहीं हैं. इस कारोबार में उस का बेटा सलीम भी मदद करता था. उस्मान की एक जर्सी गाय कई दिनों से बीमार थी. इलाज के बावजूद गाय 25 जून को मर गई. उस्मान ने गांव के एक दलित को सूचना दी कि वह उस की मर चुकी गाय को फेंक आए. दलित गाय फेंकने के एवज में 2 हजार रुपए मांग रहा था पर उस्मान इतने पैसे देने को तैयार नहीं था. वह 700 सौ रुपए देना चाहता था. बात नहीं बनी तो उस्मान ने बेटे की मदद से खुद ही अपने घर के सामने मैदान के पार एक बड़े नाले में फेंक दी.

मैदान में मंगलवार के दिन बाजार लगता है. 27 जून को बाजार लगने की तैयारी हो रही थी. तभी कुछ युवकों ने 60 वर्षीय उस्मान को पकड़ लिया और कहने लगे कि तुम ने गाय को काट कर फेंक दिया. उस्मान कहता रहा कि गाय मेरी थी और बीमारी की वजह से मर गई थी. पर युवकों ने शोरशराबा शुरू कर दिया. भीड़ उस्मान को मारनेपीटने लगी. उस के घर में आग लगा दी गई और घर में बंधी हुई गायों को खोल दिया और लूट कर ले गए.. उस की पत्नी को भी पीटा गया. बेटे और बहू ने भाग कर, छिप कर जान बचाई.

उस्मान को मरा समझ कर भीड़ हटी, तब पुलिस आई. भीड़ ने पुलिस पर भी पथराव किया. बदले में पुलिस ने हवाई फायर किए, तब जा कर भीड़ तितरबितर हुई. उस्मान को इलाज के लिए गिरिडीह ले जाया गया. उस की हालत गंभीर थी.

अलवर, राजस्थान

1 अप्रैल, 2017

यों तो साल 2017 में ऐसे छोटेबड़े हादसों की तादाद दर्जनभर हैं जिन में गाय के नाम पर दलितों और मुसलमानों को हिंदूवादियों और गौभक्तों ने धुना. जिन मामलों में भीड़ द्वारा कोई मरा नहीं, वे दफन हो कर रह गए. पर जिन मामलों में किसी, खासतौर से मुसलमान, को दफन होना पड़ा उन्होंने जरूर तूल पकड़ा. इन में से एक राजस्थान के अलवर का है. इस में 51 वर्षीय पशुपालक पहलू खान की भीड़ ने मारमार कर हत्या कर दी थी.

हरियाणा के नूह जिले के गांव जयसिंहपुर के रहने वाले पहलू खान अपने 4 साथियों सहित जयपुर के मशहूर पशु मेले में गए थे. उन का मकसद था दुधारू मवेशी खरीदना जिस से उन की रोजीरोटी और घर चलते हैं.

पहलू और उन का काफिला मवेशी खरीद कर वापस लौट रहा था. गौरक्षकों ने उन्हें अलवर में रोक लिया. आरोप यह लगाया कि ये लोग गायों की तस्करी करते हैं. इस पर पहलू खान ने उन्हें खरीदे गए मवेशियों की रसीदें दिखाईं कि वे लोग मवेशियों को जायज तरीके से ले जा रहे हैं.

यहां भी बात यहीं खत्म हो जानी चाहिए थी पर गौरक्षकों की इस भीड़ का मकसद कुछ और था. पहलू खान सहित उन के 2 बेटों और साथी यूनुस खान को गौरक्षकों की भीड़ ने बेरहमी से धुना और इतना धुना कि पांचों बेहोश हो गए. पुलिस आई, भीड़ छंटी पर इन लोगों को पता नहीं चला. हां, यूनुस की बेहोशी जब मुकम्मल तौर पर टूटी तब उन्हें यह दुखद समाचार मिला कि पहलू दुनिया में नहीं रहे.

यूनुस को समझ नहीं आ रहा था कि किस जुर्म की सजा उन्हें मिली जबकि वे तो दुधारू गाय ला रहे थे. इस के सुबूत भी उन के पास थे.

हादसे में पहलू खान के जिंदा बच गए 22 वर्षीय बेटे इरशाद का कहना है कि गायों की रक्षा के नाम पर वे लोग लूटना चाहते थे. गौरक्षकों ने सब से पहले

हमें रोक कर जेबों की तलाशी ली और 75 हजार रुपए छीन लिए. भगवा कपड़े पहन कर आम लोगों को पीटना, फिर उन से पैसे व मवेशी छीन लेना इन गौरक्षकों का मुख्य उद्देश्य प्रतीत होता है.

हालत खराब होने से पहलू खान को इमरजैंसी वार्ड में रखा गया था. वहीं उन की मौत हो गई. इरशाद का कहना है कि वे तो दूध बेच कर अपना पेट पालते हैं और उस दिन भी गाय और भैंसें खरीदने गए थे. गौरक्षकों ने उन्हें गौ तस्कर कह कर मारा.

जयसिंहपुर मुसलिम बाहुल्य गांव है लेकिन पहलू खान की गौरक्षकों की भीड़ द्वारा पिटाई के बाद मौत हुई तो अब वहां कोई गाय नहीं पालना चाहता. कोई और अब पहलू खान की तरह भीड़ के हाथों मरना नहीं चाहता.

यहां भी ये कथित गौरक्षक हिंदूवादी संगठनों से जुड़े थे. उन्होंने साजिश के तहत पहलू खान और उन के साथियों को बेरहमी से मारा और औन द स्पौट अपना फैसला थोप दिया.

नोएडा, उत्तर प्रदेश

12 जुलाई, 2017

भीड़तंत्र का रोग अन्य क्षेत्रों में भी फैला है. उत्तर प्रदेश के नोएडा स्थित महागुन मौडर्न सोसायटी में घुस कर 500 से अधिक लोगों ने तोड़फोड़ की. पुलिस पर पत्थरबाजी की गई. हंगामे के कारण घंटों तक सोसायटी में दहशत का माहौल रहा. कहा गया कि घर में काम करने वाली एक महिला को फ्लैट में बंधक बना कर रखा गया. नौकरानी पर एक घर से 10 हजार रुपए चुराने का आरोप था. उस की चोरी सीसीटीवी फुटेज में पकड़ी गई थी. इस पर नौकरानी का पति भीड़ के साथ सोसायटी में पहुंचा और तोड़फोड़ शुरू कर दी.

इस भीड़ ने फैसला करना अपने हाथ में ले लिया. यह भीड़ पुलिस, कानून को नकारने लगी है. लोकतंत्र में भीड़ का यह कैसा फैसला है? भीड़ विरोध करे तो जायज कहा जा सकता है पर भीड़ तो फैसले करने लगी है. यह खतरनाक है. कुछ समय पहले व्यवस्था के खिलाफ दिल्ली के जंतरमंतर पर उमड़ा आक्रोश जायज था. वह शांतिपूर्वक विरोध था. इस तरह का विरोध लोकतंत्र के लिए जरूरी है पर भीड़ द्वारा हिंसा फैलाना लोकतंत्र के लिए घातक है.

भीड़तंत्र की दुनिया

लोकतंत्र के वोटतंत्र और भीड़तंत्र में फर्क है. वोटतंत्र का एक मकसद होता है. वोट सोचसमझ कर डाले जाते हैं. पर भीड़तंत्र का मकसद मात्र विध्वंस होता है. बाबरी मसजिद, चर्चों, सरकारी दफ्तरों, सार्वजनिक इमारतों में तोड़फोड़ के पीछे भीड़ का उन्माद होता है. यह भीड़ लोकतंत्र के हित में नहीं, नुकसान में

जुटी दिखती है. यह भीड़ अमेरिका के औक्युपाई वालस्ट्रीट, दिल्ली के जंतरमंतर का आंदोलन, फ्रांस की क्रांति, रूसी क्रांति, चीनी क्रांति, अरब वसंत वाली भीड़ नहीं है. यह विध्वंसक भीड़ है.

भीड़ उन्मादी होती है. उसे पुलिस या सेना रोक नहीं सकती. आएदिन पुलिस थानों पर हमला, पत्थरबाजों की भीड़ द्वारा सेना पर हमला रोके नहीं रुक रहा. मिस्र, लीबिया, सीरिया, ट्यूनीशिया, इन चारों देशों को राजनीतिक तौर पर अस्थिर कर दिया गया. इस का असर अभी तक कायम है. सेना के टैंकों के बावजूद भीड़ नियंत्रित नहीं हो पाई. तख्तापलट कर दिए गए

पर ये देश स्थिरता के लिए तरस रहे हैं. तेल जैसे समृद्ध संसाधनों के बावजूद इसलामिक भीड़ ने पश्चिम एशिया को विनाश के मुहाने पर ला खड़ा किया.

इसी भीड़तंत्र से दुनिया को विभाजन का दंश झेलना पड़ा है. भारत-पाक बंटवारा भीड़तंत्र का नतीजा था, जिस में साफ था 2 धर्म आमनेसामने खड़े थे. भीड़तंत्र द्वारा दोनों धर्मों के लोगों के बीच नफरत फैलाई जा रही थी. दोनों अपनेअपने धर्म के पक्ष और बचाव में नारेबाजी करते हुए तोड़फोड़ करने में जुटे थे. दोनों के बीच हिंसा चरम पर पहुंच गई थी और नतीजा धर्म के आधार पर ‘टू नैशन थ्योरी’ के अंजाम तक पहुंच गया.

भीड़तंत्र ‘धर्म खतरे में है’ जैसे नारे देता है. अब यह नाजियों की तरह ‘राष्ट्रवाद खतरे में है’ के नए रूप में सामने आ रहा है.

भीड़तंत्र ने राष्ट्रों को सामाजिक, आर्थिक तौर पर बड़ा नुकसान पहुंचाया है. कम्युनिज्म का खात्मा इसीलिए हुआ कि वह सर्वहारा के नाम पर उद्योगों को चौपट करने पर तुला हुआ था. भारत के कोलकाता में हजारों कारखाने भीड़तंत्र की उन्मादी मानसिकता के कारण बंद हो गए. आएदिन मजदूरों की हड़तालों ने, तोड़फोड़ ने आर्थिक संसाधनों को बंदी के कगार पर पहुंचा दिया.

भीड़तंत्र का तुरंत नुकसान नजर नहीं आता, पर दीर्घकालीन प्रभाव रहता है.

2 समाजों, वर्गों के बीच पैदा हुआ वैमनस्य कभी खत्म नहीं होता. समयसमय पर इन के बीच हिंसा, कटुता की वारदातें सामने आती रहती हैं. हिंदू, मुसलमान, ईसाई, यहूदी के बीच झगड़ा सैकड़ों सालों से चला आ रहा है.

भीड़ का फैसला

भीड़ जहां फैसला करने लगती है, वहां सरकार के होने न होने के कोई माने नहीं रह जाते. राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया पहलू खान की मौत पर उस के गांव नहीं गईं तो बात हैरानी की है. जिस तरह इस वारदात को अंजाम दिया गया वह साफसाफ बता रहा है कि अगर दूध आप की रोजीरोटी है और आप गाय खरीदतेबेचते हैं तो आप की जिंदगी आज सुरक्षित नहीं है बशर्ते आप मुसलमान या दलित हैं तो. पिछड़ों को अभी नहीं छेड़ा जा रहा क्योंकि कट्टरों के लठैत वही हैं.

साफ है कि समूचे देश में लोकतंत्र और संविधान की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं. गौरक्षक गिरोह, एंटी रोमियो स्क्वैड अब खुलेआम सड़कों पर उतर आए हैं और कानून अपने हाथों में ले रहे हैं. इन गिरोहों को सरकार का संरक्षण हासिल है. कट्टरपंथियों का मनोबल आसमान छू रहा है. देशभर में दलितों, अल्पसंख्यकों पर हमलों की बाढ़ सी आ गई है.

ये मामले इतने नए भी नहीं हैं. यही भीड़ कभी अयोध्या में बाबरी मसजिद गिरा देती है. गुजरात में कत्लेआम मचा देती है. गोधरा कांड बन जाता है. दिल्ली में सिखों पर टूट पड़ती है. गैंगरेप से ले कर औरतों को डायन कह कर मार डालने वाली यह भीड़ खुद फैसले करने पर उतारू दिख रही है.

दुख और आश्चर्य की बात यह है कि इस भीड़ को सत्ता का अभयदान मिल रहा है. छत्तीसगढ़ की भाजपा सरकार गौहत्या में शामिल लोगों को मृत्युदंड देने का ऐलान कर चुकी है. जो एक तरह से गौरक्षकों के लिए कवच है कि जिसे मृत्युदंड मिलना ही है, उसे भीड़ ने मार डाला तो क्या गुनाह है?

मुख्यमंत्री रमन सिंह मीडिया के सामने कह चुके हैं कि गौहत्या जैसे अपराधों में शामिल होने वालों को लटका दिया जाएगा. गुजरात में इसी अपराध के लिए आजीवन कारावास की सजा का प्रावधान है. हरियाणा सरकार गौहत्या के अपराधी को 10 साल के कारावास की सजा का प्रावधान कर चुकी है. महाराष्ट्र में 5 साल जेल की सजा है.

भीड़तंत्र का यह उभार और सरकार का इसे खुला समर्थन देना एक खतरनाक संकेत है जो आएदिन उग्र और अराजक होता जा रहा है. यह भीड़ जागरूक नागरिक नहीं, उन्मादी है. यह मानवीयता के मकसद से नहीं, मजहबी नफरत से उपजा उभार है जो किसी भी समाज के आपसी प्रेम, भाईचारे, शांति के खात्मे के लिए काफी है.

आज राष्ट्र, धर्म, रंग, जाति के नाम पर पनपती भीड़ का नागरिक विवेक खत्म हो चुका है. समाज को सच बताने वाला कोई नहीं है, न मीडिया, न नेता. झूठ को सच बता कर बेचा जा रहा है. युवा धर्म और संस्कृति के सड़ेगले विचारों की अर्थी ढो रहा है. युवाओं के पास तर्क नहीं हैं. उन में तर्कशक्ति का विकास करने वाले साधन न के बराबर हैं जबकि मध्यकालीन बर्बर मानसिकता में धकेलने वाले साधन काफी ज्यादा हैं.

यह भीड़तंत्र की धर्मजनित सोच लोकतंत्र को जल्दी ही तानाशाही में तबदील कर देगी. सवाल मनुष्यता और लोकतंत्र पर मंडराते खतरे को ले कर है. धर्मजनित भीड़तंत्र की ओर बढ़ रहा देश इस बात का संकेत है कि हम बर्बर युग की ओर बढ़ रहे हैं.

सोशल मीडिया की भूमिका

अफवाहें पहले भी फैलती थीं. खासकर धर्म पर आधरित अफवाहों के फैलने में देर नहीं लगती थी. बिना मोबाइल के दिल्ली में गणेश की मूर्ति के दूध पीने की अफवाह सैकड़ों किलोमीटर दूर तक घंटों में पहुंच गई. ऐसे उदाहरण कई हैं. धर्म पर आधारित अफवाहें पहले तेज गति की आंधियों की रफ्तार से चलती थीं.  सोशल मीडिया के जमाने में ये तूफान से भी तेज गति से फैलने लगी हैं. धर्म की अफवाहें धर्मभीरुओं को सक्रिय कर देती हैं जो कानून को अपने हाथ में लेने में नहीं घबराते. यही वजह है कि घटना एक  शहर में होती है तो उस की प्रतिक्रियाएं दूसरे शहरों में भी होती हैं. पहले अफवाहें फैलाने के माध्यम कम थे. उन में बहुत क्रिएशन नहीं होता था. साधारणतौर पर कभी पोस्टकार्ड तो कभी एक या दो रंग में छपे हुए पंफ्लेट ही प्रमुख साधन होते थे.

सोशल मीडिया के जमाने में अफवाहों को फैलाने के लिए तरहतरह के सजीव से दिखने वाले वीडियो का सहारा लिया जाता है. अपनी अफवाह की आड़ में मजबूत तर्क गढ़ लिए जाते हैं. कई बार वीडियो देश के बाहर के होते हैं. पर उन को ऐसे प्रस्तुत किया जाता है जैसे वे अपने देश के हों. इन को चंद घंटों में ही लाखों लोगों तक न केवल पहुंचा दिया जाता है बल्कि इन को ले कर धर्म के नाम पर भड़काने वाली एक बहस भी शुरू हो जाती है. यह बहस ही भीड़तंत्र के लिए हथियार का काम करती है. बेंगलुरु में पूर्वोत्तर राज्यों के रहने वाले युवाओं के खिलाफ ऐसे संदेश वायरल हुए कि उन युवाओं को दूसरे शहरों में भी मुश्किलों का सामना करना पड़ा.

दलित चिंतक रामचंद कटियार कहते हैं, ‘‘सोशल मीडिया का सब से बड़ा प्रभाव धर्म पर आधारित बातों के प्रचारप्रसार में देखने को मिलता है. धर्म की अफवाह फैलाने वाले पहले इस टैक्नोलौजी का विरोध करते थे. उन का कहना था कि यह पश्चिमी संस्कृति का हिस्सा है. जैसे ही यह टैक्नोलौजी लोगों को पसंद आई, धर्म का प्रचार करने वालों ने इस को स्वीकार कर लिया. यह केवल अफवाहों के फैलाने तक ही सीमित नहीं है. चंदा मांगने और उसे सीधे बैंक के अपने खाते में जमा करने तक में सोशल मीडिया की भूमिका प्रभावी हो गई है. इस तरह का प्रचार करने वालों की संख्या बढ़ रही है और इतनी अधिक होती जा रही है कि इस का विरोध करने वाले कमजोर पड़ते जा रहे हैं.’’

नफरत फैलाने का काम

धर्म को ले कर सोशल मीडिया के बडे़ ग्रुप में कुछ संदेश ऐसे होते हैं जो केवल आपस में धर्म को ले कर टकराव व नफरत फैलाने का काम करते हैं. ये हर बात में धर्म को बीच में लाते हैं और फिर इस के आधार पर दूरियां पैदा करते हैं. इस से धर्म के वैमनस्य की जमीन तैयार होती है. बड़े अचंभे की बात यह होती है कि अपना काम होते ही ऐसे संदेश मीडिया पटल से पूरी तरह से गायब हो जाते हैं. उदाहरण के लिए उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में एक संदेश बहुत तेजी से प्रचारित किया गया. उस में कहा गया था, ‘भाजपा ने किसी भी मुसलिम को टिकट नहीं दिया है. यह हिंदुत्व की सब से बड़ी जीत है. अब हिंदुओं की बारी है कि वे मुसलिम समर्थक पार्टियों को वोट न दें.’ चुनावभर यह मुद्दा बना रहा. प्रदेश में भारी जीत हासिल करने के बाद सरकार बनी तो भाजपा ने मुसलिम मंत्री भी बनाया. अब यह बात मुद्दा नहीं बनी कि भाजपा ने ऐसा क्यों किया.

सोशल मीडिया के जानकार कहते हैं, ‘‘ऐसी अफवाहें फैलाने वाले अपनी बात को कहते हैं, पूरी तरह से प्रचारित करते हैं और फिर आसानी से बाहर निकल जाते हैं. वे तर्क में फंसने की कोशिश नहीं करते. अगर तर्क में फंसते हैं तो दूसरे पर आरोप लगा कर निकल लेते हैं. ऐसे संदेश केवल दिलों में नफरत भरने का काम करते हैं. यह काम संगठित तौर पर चलाया जाता है.

‘‘मैसेज के ऐसे संदेश बनाए जाते हैं जो लोगों को पसंद आएं. उन के दिल को छू जाएं. संदेश के साथ फोटो और वीडियो को सुबूत के रूप में जोड़ा जाता है. कई बार ऐसे फोटो और वीडियो एडिट कर सामने रखे जाते हैं जिन से देखने वाले का खून खौल उठे. भारत और पाकिस्तान को ले कर एक वीडियो ऐसा जारी किया गया जिस में

2 सैनिकों के सिर चाकू से काटते दिखाया जाता है. इसे पाकिस्तान की करतूत बताई गई. असल में यह वीडियो भारत व पाकिस्तान के सैनिकों की जगह आतंकी संगठन आईएसआईएस का था जो इराक में शूट किया गया था.’’

विरोधियों पर निशाना

धर्मजनित भीड़तंत्र के खिलाफ काम करने वालों, ऐसी घटनाओं पर सचेत करने वालों को ये लोग अपने निशाने पर लेते हैं. उन को अपने प्रचारतंत्र से सब से बड़ा खलनायक समझाने का काम करते हैं. सोशल मीडिया के संदेशों को सब से प्रमुख मानने वाले लोग इन की बातों को सच मान लेते हैं. ये केवल धर्म से धर्म को ही नहीं लड़ाते, जाति से जाति के बीच भी टकराव का सब से बड़ा कारण बनते हैं.

सहारनपुर में दलित-ठाकुर हिंसा रही हो या रायबरेली में ब्राहमण-पिछड़ा हिंसा, सोशल मीडिया के भड़काऊ संदेश ही माध्यम रहे हैं. सहारनपुर में प्रशासन को ऐसे संदेशों को रोकने के लिए इंटरनैट को ही बंद करना पड़ा था. कश्मीर में ऐसे संदेश बड़े पैमाने पर हिंसा भड़काने का काम करते हैं. वहां भी बारबार इंटरनैट को बंद करना पड़ता है.

सोशल मीडिया पर आने वाले ये संदेश बहुत ही संगठित तरह से फैलाए जाते हैं. ऐसा करने वाले बहुत होशियार होते हैं. उन को पता होता है कि किस काम के लिए कैसे संदेश प्रभाव डाल सकेंगे. ये लोग केवल पैसे के लिए अपना काम करते हैं. कभी ये चुनावों में नेताओं के प्रचारप्रसार के लिए काम करते हैं तो कभी ये विरोधी नेता की छवि को खराब करने का काम करते हैं. एक बार ऐसे संदेशों का जखीरा तैयार कर सोशल मीडिया के हवाले कर के ये लोग बाहर हो जाते हैं.

जानकार बताते हैं कि ऐसे काम करने वाले देश के बाहर भी बैठे हो सकते हैं. ये काम केवल भारत में ही नहीं हो रहा, देश के बाहर भी ऐसे काम खूब हो रहे हैं. यही वजह है कि नेताओं में अब काम करने के बजाय इस तरह के दिखावे करने की आदत बढ़ती जा रही है.

धर्म के आगे नतमस्तक

धर्मजनित अफवाहें सब से ज्यादा फैलती हैं, इस का खास कारण भी है. धर्म का डर बहुत सारे भारतीयों के मन में बसा है. वे धर्म की अफवाह को अफवाह मानते हुए भी दिल से अस्वीकार नहीं करना चाहते. यह सोशल मीडिया के तंत्र का ही कमाल है कि जो धर्म के अंधविश्वास, रूढि़वादिता का विरोध करता है, उसे राष्ट्र का विरोधी मान लिया जाता है.

राष्ट्र और धर्म को आपस में जोड़ कर देखने की प्रवृत्ति ने तर्कशक्ति को प्रभावित किया है. जिस के कारण अब धर्म को गलत मानते हुए उस का विरोध करने का साहस लोगों में घटता जा रहा है. ऐसा लगता है कि धर्म की खामियों का विरोध करना आप के भारतीय होने के सुबूत को छीन लेगा.

धर्म के गलत बयानों का विरोध करने वालों के खिलाफ जनमानस को तैयार करने में सोशल मीडिया की बड़ी भूमिका होेती जा रही है. ऐसे लोगों के खिलाफ पहले धर्मजनित संदेश फैलाए जाते हैं. इस के बाद भीड़ इन पर हमला कर देती है. उस समय कानून भी इन का साथ नहीं दे पाता.

कानून पीडि़त का साथ नहीं देता और दोषी के खिलाफ कड़े कदम नहीं उठाता. ऐसे में धर्म पर आधारित प्रचार और भीड़तंत्र दोनों को ही बढ़ावा देने वाले लोग बच जाते हैं. सोशल मीडिया पर सक्रिय ऐसे लोगों में से बहुतायत फर्जी नाम से अपनी पहचान बनाते हैं और प्रचार को आगे बढ़ाते हैं.

धर्म के नाम पर जिस तरह से समाज अपनी खुली आंखों को भी बंद करता है वह भीड़तंत्र और उस के प्रचारतंत्र के हौसले को बढ़ाता है. गौरक्षा से ले कर, लव जिहाद तक ऐसे मामले खूब देखने में आए हैं. जब कानून और प्रशासन इन के खिलाफ ऐसे काम नहीं करता तो इन का हौसला बढ़ता है. ऐसे मामले भाजपा सरकार से पहले भी होते थे पर अब जब भाजपा सरकार धर्म का बचाव करती और उस की आलोचना करने वाले को दोषी मानती हैं तो ऐसे काम करने वाले लोगों को शह मिलती है. जब धर्म की आलोचना करने वाले को निशाना बनाया जाता है तो धर्म के नाम पर आंख बंद कर चुके लोगों को लगता है कि यह धर्म पर आधारित न्याय है. लोग यह भूल जाते हैं कि देश के बाहर इस तरह का न्याय ही आतंकवाद को बढ़ावा देता है.

आतंकवाद का पोषण करने वाले धर्म के नाम पर ही जिहाद फैलाते हैं. अपना धर्म न मानने वालों को कत्ल से ले कर उन्हें तमाम तरह ये उत्पीडि़त करने को अपना अधिकार समझ लेतेहैं. जब हम ऐसे लोगों को गलत मानते हैं तो फिर अपने देश में धर्मजनित भीड़तंत्र द्वारा की जाने वाली हत्याओं का समर्थन कैसे कर सकते हैं. हत्या ही नहीं, अफवाहों से भरे संदेशों को फैलाने वाले, उन का समर्थन करने वाले भी उसी तरह के दोषी होते हैं.

बदहाली : बच्चा जनने के दौरान जाती जान

रामपुर गांव के रहने वाले रामकुमार की पत्नी सीमा पेट से थी. रामकुमार गरीब परिवार का था. बहुत कोशिशों के बाद भी उस का बीपीएल कार्ड नहीं बना था. इस वजह से गरीबी रेखा से नीचे रहने वालों को मिलने वाले सरकारी फायदे भी  नहीं मिल रहे थे. दलित जाति का होने के चलते उस के पास जमीन का कोई पट्टा भी नहीं था. उस की पत्नी पेट से हुई, तो गांव की स्वास्थ्यकर्मी ‘आशा बहू’ ने प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में ले जा कर दवाएं दिलवा दी थीं.

सीमा कमजोर थी. यह उस का तीसरा बच्चा था. बच्चा जनने के दिन उसे बहुत दर्द हो रहा था. गांव में पहले वह स्वास्थ्य केंद्र गई. वहां डिलिवरी कराने की अच्छी सुविधा नहीं थी, तो डाक्टर ने उसे जिला अस्पताल, लखनऊ भेज दिया. रास्ते में ही उसे दर्द शुरू हो गया. कमजोर होने के चलते वह डिलिवरी नहीं कर पाई और उस की सांसें समय से पहले ही थम गईं.

दहिला गांव की रहने वाली सुभावती भी बच्चा जनने के दौरान गुजर गई. उसे जब दर्द उठा, तो सब से पहले गांव की कुछ औरतों ने घर में ही बच्चा पैदा कराने की कोशिश की. इस दौरान बच्चे का सिर अंग से बाहर आ गया, पर आगे का हिस्सा बाहर नहीं आ पाया. सुभावती को खून बहने लगा. उस का पति ब्रजेश और गांव के लोग अस्पताल ले जाने लगे, तभी रास्ते में उस की मौत हो गई.

ब्रजेश अतिपिछड़ी मल्लाह जाति का था. गांव से सड़क तक आने में 2 किलोमीटर का रास्ता तय करना पड़ता है. आसपास कोई डाक्टर या दूसरी स्वास्थ्य सेवाएं न होने के चलते ऐसी घटनाएं कई बार घट जाती हैं. गांव में रहने वाली गरीब औरतों के मामलों में सब से ज्यादा बच्चा जनने के दौरान मौत होती है. ये लोग गरीब और नासमझ दोनों होते हैं. ऐसे में इन को किसी तरह की सरकारी मदद भी नहीं मिल पाती है.

ऐसी घटनाएं केवल उत्तर प्रदेश में ही नहीं, देश के बाकी प्रदेशों में भी होती हैं. देश में बच्चा जनने के दौरान मरने वाली औरतों की तादाद काफी है.

मुसीबत में गांव वालियां  

एक तरफ सरकार ने संसद में ‘मातृत्व अवकाश’ यानी मैटरनिटी लीव के लिए बिल ला कर उसे 6 हफ्ते से बढ़ा कर 12 हफ्ते कर के ऐसा जताया है, जैसे औरतों के लिए बहुत बड़ा काम कर दिया हो, दूसरी ओर अभी भी देश में बच्चा जनने के दौरान हर घंटे 5 औरतों की जान जा रही है.

‘मातृत्व अवकाश’ का फायदा चंद औरतों तक ही पहुंच रहा है. जरूरत इस बात की है कि देश में बदहाल महिला स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर किया जाए, जिस से गांव में काम करने वाली मजदूर औरतें भी महफूज तरीके से बच्चा पैदा कर सकें. उन्हें अपनी जान से हाथ न धोना पड़े.

‘मातृत्व अवकाश’ का फायदा लेने वाली औरतें हर तरह से जागरूक और सक्षम हैं. वे अपना इलाज और देखभाल बेहतर तरीके से कर सकती हैं.

गांव की रहने वाली गरीब औरतें न तो सक्षम हैं और न ही जागरूक. ऐसे में ‘जननी सुरक्षा योजना’ के तहत केवल एक हजार रुपए की मदद दे कर महफूज तरीके से बच्चा पैदा करने की सोचना बेमानी बात है.

‘जननी सुरक्षा योजना’ भी दूसरी तमाम सरकारी योजनाओं की तरह लालफीताशाही और भ्रष्टाचार की शिकार है, जिस से इस का सही फायदा औरतों को नहीं मिल पा रहा है.

बहुत पुरानी कहावत के हिसाब से बच्चा जनने को औरत का दूसरा जन्म माना जाता है. यह बात काफी हद तक ठीक भी है. बहुत सारी मैडिकल सेवाओं के बाद भी बच्चा जनने के दौरान देश में हर घंटे 5 औरतों की जान चली जाती है.

देश में मृत्यु दर का आंकड़ा एक लाख बच्चा जनने के मामलों पर महज 174 का है. स्वास्थ्य सेवाओं में तरक्की के बाद भी यह हालत चिंताजनक है.

विश्व स्वास्थ्य संगठन यानी डब्ल्यूएचओ ने साल 2016 की रिपोर्ट में खुलासा किया है कि भारत के गांवदेहात में हालात ज्यादा खराब हैं. बहुत सारी कोशिशों के बाद भी अभी अस्पतालों में सौ फीसदी प्रसव नहीं होते हैं. इस के लिए सब से ज्यादा जिम्मेदार लोगों का जागरूक न होना और स्वास्थ्य सेवाओं का बदहाल होना है.

पूरी दुनिया में बच्चा जनने के दौरान होने वाली कुल मौतों में से 17 फीसदी मौतें भारत में होती हैं.

भारत का हाल इंडोनेशिया जैसे देशों से भी खराब है. भारत में जहां बच्चा जनने के दौरान हर साल 174 औरतों की जान चली जाती है, वहीं इडोनेशिया में यह तादाद 126 की है.

भारत की खराब हालत के लिए गांवदेहात के इलाकों में स्वास्थ्य सेवाओं का बुरा हाल होना है.

देश की स्वास्थ्य सेवाओं के हालात पर नजर डालें, तो पता चलता है कि गांवदेहात के इलाकों में काम कर रहे सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र पर बच्चा जनने की मूलभूत सुविधाएं तक नहीं हैं. ऐसे में कई बार सड़क और अस्पताल के बाहर ही बच्चा पैदा होने की घटनाएं भी पता चलती रहती हैं.

काम नहीं आ रही योजना

बच्चा जनने के दौरान होने वाली मौतों को रोकने और जच्चा बच्चा की सेहत का ध्यान रखने के लिए साल 2005 में ‘जननी सुरक्षा योजना’ शुरू की गई.

इस योजना में गरीबी रेखा से नीचे रहने वाली औरतों का खास ख्याल रखने की कोशिश शुरू हुई. इस योजना के तहत अस्पताल में बच्चा जनने वाली औरतों को एक हजार रुपया दिया जाने लगा. इस योजना में यह तय किया गया कि बच्चा अस्पताल में पैदा हो या ट्रेनिंग दाई द्वारा ही कराया जाए.

इस योजना के फायदे उन तक पहुंचाने के लिए महिला स्वास्थ्यकर्मी ‘आशा बहू’ को तैयार किया गया. ‘जननी सुरक्षा योजना’ का लाभ लेने के लिए बच्चा पैदा कराने वाली औरत को अस्पताल में अपना रजिस्ट्रेशन कराना पड़ता है. इस के बाद भी अस्पतालों में सौ फीसदी बच्चे पैदा नहीं हो रहे हैं. इस वजह से ही बच्चा जनने के दौरान होने वाली मौतों को रोका नहीं जा सका है.

आंकड़े बताते हैं कि 80 फीसदी अस्पतालों में तय मानक से दोगुना मरीज होते हैं. 62 फीसदी सरकारी अस्पतालों में महिला डाक्टर यानी गाइनिकोलौजिस्ट नहीं होती हैं.

30 फीसदी जिलों में एएनएम यानी आरर्जिलरी नर्स मिडवाइफ ही महिला मरीजों को देखती हैं, इन पर भी दोगुना मरीजों को देखने का भार होता है.

22 फीसदी स्वास्थ्य केंद्र ऐसे होते हैं, जहां पर एएनएम तक नहीं मिलतीं. देशभर के सरकारी अस्पतालों में 3429 महिला डाक्टर होनी चाहिए, पर केवल 1296 पदों पर ही महिला डाक्टर तैनात हैं.

बदहाल स्वास्थ्य केंद्र

जमीनी सचाई इन आंकड़ों से भी कहीं ज्यादा भयावह है. किसी भी स्वास्थ्य केंद्र पर बच्चा जनने की सुविधाएं ही नहीं हैं. सामान्य प्रसव तो किसी तरह से हो भी जाता है, पर हालत खराब होते ही देखभाल करने का सिस्टम नहीं है. इस के लिए मरीज को कम से कम जिला लैवल के अस्पताल जाना होता है. कई बार आनेजाने के दौरान ही मौत हो जाती है. जिला अस्पताल पहुंचने के पहले ही कई बार ऐसे हालात हो जाते हैं कि औरत की मौत हो जाती है.

तमाम स्वास्थ्य केंद्रों पर बिजली की रोशनी तक का सही इंतजाम नहीं है. बड़े शहरों के गांवदेहात इलाकों में बने स्वास्थ्य केंद्रों पर दिन के समय में भले ही डाक्टर मिल जाए, पर किसी भी तरह की इमर्जैंसी में डाक्टर उपलब्ध नहीं होते हैं, जिस के चलते भी मरीजों को मजबूरन झोलाछाप डाक्टरों के पास जाना पड़ता है.

प्राइवेट अस्पतालों में बच्चा पैदा कराने का खर्च इतना महंगा हो गया है कि आम आदमी वहां जाना नहीं चाहता. गरीब तबका तो वहां जाने की सोच भी नहीं सकता है.

कई स्वास्थ्य केंद्रों पर काम करने वाले वार्ड बौय या सफाई मुलाजिम ही कुछ पैसों के लालच में बच्चा पैदा कराने का जोखिम उठाते हैं. इस में कई बार औरत की जान चली जाती है.

बिना जानकार लोगों के बच्चा पैदा कराने का असर केवल औरत पर ही नहीं पड़ता, बल्कि होने वाले बच्चे की जान को भी जोखिम होता है. इस दौरान सही तरह से बच्चे को अगर पकड़ा न जाए, तो उस के सिर की नस दब जाती है. कई बार बच्चे के मुंह में ऐसा तरल पदार्थ पहुंच जाता है, जिस से बच्चे को बेहद नुकसान हो जाता है.

कई मामलों में औरत बच जाती है, तो बच्चे की मौत हो जाती है. महफूज तरीके से बच्चा पैदा न हो पाने के चलते ही देश में नवजात शिशुओं की मृत्यु दर भी दूसरे देशों के मुकाबले ज्यादा है.

बिगड़ जाते हैं रिश्ते

अस्पतालों पर मरीजों के बढ़ते बोझ का एक बुरा असर यह भी पड़ता है कि मरीज और डाक्टर के बीच संबंध तनाव भरे हो जाते हैं. कई बार मरीज के परिवार वाले अस्पताल में तोड़फोड़ तक करने लगते हैं. तोड़फोड़ की घटनाएं केवल प्राइवेट अस्पतालों में होती हैं, जहां इलाज के बाद जब मरीज की मौत हो जाती है और अस्पताल में इलाज का खर्च मांगा जाने लगता है, तो मरीज के परिवार वाले तोड़फोड़ करते हैं.

प्राइवेट अस्पतालों में बच्चा पैदा कराने का खर्च सामान्य हालत में 50 हजार से ऊपर का आने लगा है. अगर जच्चा बच्चा को कोई परेशानी हो जाए, तो यह खर्च एक लाख रुपए से ऊपर तक पहुंच जाता है. ऐसे में गरीब आदमी प्राइवेट अस्पताल की तरफ रुख करने की सोच भी नहीं सकता है.

सरकारी अस्पतालों में डाक्टरों की कमी और मरीजों की ज्यादा तादाद होने से डाक्टर के पास इतना भी समय नहीं होता है कि वह मरीज की सही तरह से काउंसलिंग कर सके. ऐसे में मरीज को पता ही नहीं चलता कि गर्भावस्था में उसे अपना किस तरह से ध्यान रखना चाहिए और खानपान किस तरह का करना है, जिस से बच्चा जनने में आसानी हो और उसे किसी अनहोनी का सामना न करना पड़े.

गर्भावस्था में होने वाली देखभाल जब सही तरह से नहीं होती, तो उस का बुरा असर बच्चा जनने के समय पड़ता है, जो खतरनाक हो जाता है.

शिशु जन्म के बाद 24 घंटे के अंदर होने वाले 5 सौ मिलीलिटर से एक हजार मिलीलिटर से ज्यादा खून बहने को पोस्टपार्टम हैमरेज यानी पीपीएच कहते हैं. यह बच्चा जनने के दौरान होने वाली मौतों की सब से बड़ी वजह होती है.

डाक्टर मानते हैं कि इस के अलावा भी कई परेशानियां ऐसी हो सकती हैं, जो जानलेवा हैं. जानकार डाक्टर के पास न जाने से ऐसी परेशानियां बढ़ जाती हैं, जिस से जच्चा और बच्चा दोनों को नुकसान हो जाता है. जिला अस्पताल के दूर होने से बच्चा जनने के लिए झोलाछाप डाक्टरों के पास जाना मजबूरी होती है. मरीज का वहां जाना जानलेवा हो जाता है.

पहले ज्यादातर गांवों में दाइयां होती थीं या अनुभवी औरतें होती थीं, जिन की मदद से घर में ही बच्चा पैदा हो जाता था. अब गांवों में ये लोग नहीं हैं, जिस से घरों में बच्चा पैदा कराना खतरनाक हो गया है.

इस सब के बावजूद सरकारी अस्पतालों में बच्चा पैदा कराना मां और बच्चे के लिए सुरक्षित माना जाता है, क्योंकि वहां के डाक्टर और नर्स अपने काम को बखूबी जानते हैं और उन की कोशिश रहती है कि जच्चाबच्चा दोनों को कोई नुकसान न पहुंचे.

प्रसव से अहम होता है गर्भपात

पेट से होने के बाद भी कई बार परेशानी होने से बच्चा गिर जाता है. आमतौर पर बच्चा गिर जाने के बाद मरीज को डाक्टर के पास नहीं ले जाया जाता. इस से गर्भ के कुछ टुकड़े बच्चेदानी में रह जाते हैं, जो माहवारी को गड़बड़ करते हैं और बच्चेदानी में इंफैक्शन की वजहें बनते हैं. इस का कई बार ऐसा असर पड़ता है कि औरत बच्चा पैदा करने के काबिल ही नहीं रह जाती. ऐसे में डाक्टर से मिलें और जरूरी जांच कराएं. इस से बच्चेदानी में होने वाली परेशानी से बचा जा सकता है.

बच्चेदानी में इंफैक्शन होने से अंडवाहिनियों पर असर पड़ता है. वह गर्भ के लिए सही अंडे नहीं बना पाती, जिस से भविष्य में बच्चा ठहरने की उम्मीदें कम हो जाती हैं. बांझपन से बचने के लिए जरूरी है कि प्रसव ही नहीं, गर्भपात भी अच्छे अस्पताल और जानकार डाक्टर की देखरेख में कराएं.

आमतौर पर लोग सोचते हैं कि जब बच्चा गिर गया, तो डाक्टर के पास जाने की क्या जरूरत है? इस सोच से बाहर निकल कर अच्छी सेहत के लिए सुरक्षित गर्भपात कराना भी बेहद जरूरी होता है.

भारी पड़ता मजदूरी करना

पेट में बच्चा होने के दौरान भारी बोझ उठाना, ज्यादा मेहनत का काम करना, ऊंचाई पर चढ़ना उतरना और लंबे समय तक खड़े रहना मुसीबत की वजह बन जाता है. अगर सही तरह से खानपान न किया जाए, तो हालात और भी ज्यादा खराब हो सकते हैं.

गांवदेहात के इलाकों में अभी भी ज्यादातर औरतें पेट से होने के दौरान कामकाज और मजदूरी करती रहती हैं, जिस से इस तरह की परेशानियां बढ़ जाती हैं. इस दौरान जब शरीर को सही भोजन नहीं मिलता, तो बच्चे के विकास पर भी बुरा असर पड़ता है. कई बार बच्चे का वजन कम हो जाता है, जिस से बच्चा पैदा होने के पहले ही पेट गिर जाता है या समय से पहले ही बच्चा हो जाता है. दोनों ही हालात मां और बच्चे के लिए खतरनाक होते हैं.

सही तरह से भोजन न करने से मां के शरीर में खून की कमी हो जाती है, जिसे एनीमिया कहते हैं. इस से बच्चा जनने के समय परेशानी आती है. बच्चा जनने के दौरान मां सही तरह से दबाव नहीं लगा पाती, जिस से कई बार बच्चा अंग के रास्ते में ही फंसा रह जाता है और उस की मौत हो जाती है.

जिन जगहों पर आपरेशन की सुविधाएं होती हैं, वहां ऐसे हालात से बचने के लिए आपरेशन मुमकिन हो जाता है. आपरेशन के लिए भी मां के शरीर में सही मात्रा में खून होना जरूरी होता है, नहीं तो उस की जान को खतरा हो जाता है.

सैक्स संबंधों में बरतें सावधानी

पेट से होने के दौरान सैक्स संबंध बनाना वैसे खतरनाक नहीं होता, पर इस में सावधानी बरतना जरूरी होता है. पेट से होने के शुरुआती 2 महीने और आखिर का एक महीना सैक्स के लिए पूरी तरह से वर्जित होता है.

औरत को कोई परेशानी न हो, तो सावधानी और सहजता के साथ सैक्स संबंध बनाने में परेशानी नहीं आती. उतावलेपन और जोर जबरदस्ती से बनाए गए सैक्स संबंध से नुकसान हो सकता है.

गांवदेहात के इलाकों में कई बार ऐसी घटनाएं दिखती हैं, जहां पर नशे में पति अपनी पत्नी के साथ सैक्स करता है. उस समय उसे इस बात का एहसास तक नहीं होता कि यह पत्नी और उस के होने वाले बच्चे के लिए घातक हो सकता है.

सैक्स के समय जब औरत को दर्द होता है, तो पति को अपनी मर्दानगी पर गुमान होने लगता है, जो जच्चाबच्चा दोनों पर भारी पड़ता है.

रेखा और जितेंद्र के साथ भी ऐसा ही हुआ. रेखा को 7वां महीना चल रहा था. जितेंद्र ने सैक्स करने की जिद पकड़ ली. रेखा ने उसे सावधानी से सैक्स करने की रजामंदी दी.

शुरुआत में कुछ देर तक तो जितेंद्र ने सब्र से काम लिया, पर आखिरी पलों में वह बहक गया. उस ने पूरे जोश से संबंध बनाना शुरू कर दिया. रेखा के दर्द से उसे और भी जोश आने लगा. उस के बाद रेखा को पेटदर्द शुरू हो गया. उस के अस्पताल पहुंचने से पहले ही ज्यादा खून बहने लगा. हालत खराब होने से शरीर में खून की कमी हो गई और पेट में पल रहे बच्चे की मौत हो गई.

दरअसल, पेट से होने के बाद 9 वें महीने का समय ऐसा होता है, जब सैक्स के लिए औरत पूरी तरह से तैयार नहीं होती. पति के  लिए यह 9वें महीने का समय बिना सैक्स के गुजारना मुश्किल हो जाता है. ऐसे में कई बार सैक्स के लिए मन करने लगता है, जो औरत के लिए खतरा बन जाता है.

गांवदेहात में डाक्टरी सलाह मुहैया नहीं होती, जिस से सैक्स संबध के दौरान सावधानी नहीं बरती जाती और खतरा हो जाता है. इस दौरान सैक्स संबंध बनाते समय कंडोम का इस्तेमाल जरूरी होता है. ऐसा न करने से सैक्स से जुड़ी बीमारियां होने का डर रहता है, जो औरत ही नहीं, बल्कि पेट में पल रहे बच्चे के लिए भी हानिकारक होता है.

टीके लगवाना है जरूरी

बच्चा पेट में आने की शुरुआत से ले कर पैदा होने के बाद तक कई तरह की बीमारियों से लड़ने के लिए टीके लगवाना बेहद जरूरी होता है. टीके लगवाने से न केवल मां की सेहत बेहतर होती है, बल्कि बच्चे को भी बीमारियों से लड़ने की ताकत मिलती है.

सरकारी अस्पतालों में टीके लगवाने का मुफ्त इंतजाम होता है. टीके लगवाने के साथसाथ कई तरह की जांच कराना भी जरूरी होता है. इस से शरीर में होने वाली परेशानियों का पता चल जाता है और उस बीमारी का इलाज हो जाता है.

कई बार लोग टीका लगवाने और जांच से बचते हैं, जो बाद में परेशानी का सबक बन जाते हैं. हर जिले के सरकारी अस्पताल में ये काम मुफ्त ही हो जाते हैं. जरूरत इस बात की है कि महफूज तरीके से बच्चा जनने की अहमियत को समझें और खुद पहल कर के सरकारी अस्पताल तक जाएं. सरकार ने सुविधाएं दे रखी हैं, जिन को अपना हक समझ कर इस्तेमाल करें.

पति के बर्थडे पर पत्नी ने दिया मौत का तोहफा

मूल रूप से चमौली, उत्तराखंड का रहने वाला यशपाल मध्य प्रदेश के पीथमपुर इलाके में बनी सिप्ला दवा कंपनी में काम करता था. यशपाल ने पूजा से पहले प्यार किया, फिर घर वालों के भारी विरोध के बाद उस ने पूजा से शादी की थी. यशपाल और पूजा एक ही कालेज में पढ़ते थे. इस दौरान दोनों में अच्छी दोस्ती थी. एक दिन पूजा अचानक गश खा कर गिर पड़ी. डाक्टरों ने जांच कर पूजा के दिल में दिक्कत बताई. डाक्टरों के मुताबिक, उस के एक वौल्व में छेद था. जो ठीक तो हो सकता था, पर इस के लिए लंबा समय और महंगी दवा की जरूरत थी. पूजा की बीमारी जान कर यशपाल बहुत दुखी हुआ. पूजा की बीमारी जानने के बावजूद यशपाल ने उस से शादी का प्रपोजल रखा, जिसे पूजा ने तुरंत मान लिया. इस के बाद उन दोनों की प्रेम कहानी की चर्चा पूरे कालेज में होने लगी.

साल 2011 में यशपाल की नौकरी सिप्ला दवा कंपनी, इंदौर में लग गई. नौकरी के बाद जब शादी की बात आई, तो यशपाल के घर वाले लड़की देखने लगे. यशपाल ने कहा कि वह अपनी गर्लफ्रैंड पूजा से ही शादी करेगा.

यशपाल ने घर वालों से पूजा के दिल की बीमारी की बात नहीं छिपाई. पूजा की बीमारी जान कर घर वालों ने यशपाल को काफी समझाने की कोशिश की, पर उस ने किसी की एक न सुनी.

आखिरकार यशपाल की जिद के आगे घर वालों को झुकना पड़ा. साल 2012 में यशपाल और पूजा की शादी बड़े धूमधाम से हो गई. शादी के बाद यशपाल पूजा को ले कर इंदौर आ गया. वह इंदौर के एबी रोड पर राऊ इलाके में ओमप्रकाश चौधरी के मकान में किराए पर रहने लगा.

इंदौर का राऊ इलाका धूल, धुआं और शोरशराबे वाला इलाका है. पूजा को दिल की बीमारी थी, इसलिए प्रदूषण की वजह से उसे सांस लेने में तकलीफ होने लगी. उसे दिखाने पर डाक्टर ने कहा कि पूजा को अगर सेहतमंद देखना चाहते हो, तो उसे किसी हिल स्टेशन पर ले जाओ.

यशपाल पहाड़ी इलाके का रहने वाला था. उस ने देहरादून में अपने मामा के घर के पास ही एक मकान किराए पर ले कर पूजा को वहां शिफ्ट कर दिया. पूजा देहरादून में अकेले रहने लगी. इधर इंदौर में यशपाल पूजा के इलाज के लिए पैसे जुटाने में लग गया. वह हर महीने पूजा से मिलने देहरादून आता था. डाक्टरी चैकअप के बाद उस की दवा वगैरह का इंतजाम कर के फिर इंदौर लौट आता. यह सिलसिला पिछले 3 सालों से चल रहा था.

यशपाल पूजा को खुश देखना चाहता था. पूजा ने भी यशपाल को प्यार देने में कोई कमी नहीं रखी. टाइमपास करने के लिए पूजा अपना समय इंटरनैट पर गुजारने लगी. उस ने फेसबुक पर अंजलि के नाम से अकाउंट खोल लिया.

बस, यहीं से उस का मन बहकने लगा. वह फेसबुक पर नएनए लड़कों से चैटिंग करने लगी. पूजा जिन लड़कों से चैटिंग करती थी, उन में कोटा, राजस्थान का रहने वाला करन सिंह सिद्धू भी था. धीरेधीरे उन की फेसबुक की दोस्ती प्यार में बदल गई. इस के बाद दोनों मोबाइल फोन पर घंटों बातें करने लगे. जब करन को यह पता चला कि पूजा देहरादून में अकेली रहती है, तो उस ने मिलने की इच्छा जाहिर की.

पूजा ने तुरंत करन सिंह को अपना पता दे दिया. पता मिलते ही वह देहरादून पहुंच गया. करन सिंह रात में पूजा के घर पर ही रुका. दोनों में उसी रात सैक्स संबंध बन गए. इस के बाद तो करन सिंह अकसर उस से मिलने कोटा से देहरादून पहुंचने लगा.

पूजा करन सिंह को दिलोजान से इतना चाहने लगी कि अब उसे यशपाल का प्यार फीका लगने लगा था. वह यशपाल को छोड़ कर करन सिंह के साथ घर बसाने की सोचने लगी.

करन सिंह भी पूजा के प्यार में पागल था. उसे पूजा के रूप में सोने के अंडे देने वाली मुरगी मिल गई थी. पूजा उसे प्यार और सैक्स के अलावा पैसा भी देती थी. उधर यशपाल पूजा की ठीक से देखभाल नहीं कर पा रहा था. इस का उसे मलाल था. इस के लिए उस ने इंदौर की दवा कंपनी सिप्ला को छोड़ने का फैसला लिया. यही फैसला उस के लिए जन्मदिन पर मौत का तोहफा साबित हुआ.

पूजा के पास वह रह सके और उस की देखभाल कर सके, इस के लिए यशपाल ने देहरादून की दवा कंपनी में नौकरी के लिए अर्जी दी.चूंकि यशपाल को सिप्ला जैसी अच्छी दवा कंपनी में काम करने का तजरबा था. सो, उसे देहरादून में एक दवा कंपनी में नौकरी मिल गई. उसे 1 जुलाई को कंपनी जौइन करनी थी.

यह खुशखबरी उस ने पूजा को सुनाई, तो वह खुश होने के बजाय दुखी हो गई.  जाहिर सी बात थी, यशपाल के देहरादून आने के बाद करन सिंह के साथ ऐयाशी कर पाना उस के लिए मुश्किल हो जाएगा. उस ने तुरंत करन सिंह को देहरादून बुलाया. पूजा ने उस से कहा कि अगर वह आगे भी उस से जिस्मानी संबंध बनाए रखना चाहता है, तो यशपाल के देहरादून पहुंचने से पहले ही उसे ठिकाने लगाना होगा.

पहले तो यह सुन कर करन सिंह चौंका, पर जब पूजा ने यशपाल को रास्ते से हटाने का प्लान बताया, तो उसे सुन कर करन सिंह राजी हो गया. 20 जून की सुबह इंदौर पुलिस ने यशपाल को अपने कमरे में मरा पाए जाने की बात बताई. यशपाल की मौत की खबर मिलते ही उस का भाई हरी सिंह, ताऊ आनंद सिंह, जीजा व दूसरे रिश्तेदार इंदौर पहुंच गए.

पूजा को भी यशपाल की मौत की सूचना मिल चुकी थी. वह भी इंदौर पहुंच गई. उस का रोतेरोते बुरा हाल था. पूजा की हालत देख कर यशपाल के घर वाले आंसू रोक न सके.

पोस्टमार्टम रिपोर्ट आ जाने के बाद यशपाल की लाश उस के परिवार वालों को दे दी गई. लेकिन अंतिम संस्कार से लौटते ही पुलिस ने पूजा को यशपाल की हत्या के आरोप में हिरासत में ले लिया. यशपाल के घर वालों ने इस का विरोध किया. पूजा भी इस बात से इनकार करती रही.

शाम तक पुलिस टीम करन सिंह को राजस्थान के हनुमानगढ़ से गिरफ्तार कर उसे इंदौर ले कर पहुंची. करन सिंह को अपने सामने देख पूजा टूट गई.

पूजा ने बताया कि यशपाल से दूर रहने के बाद वह करन सिंह से प्यार करने लगी थी. वह यशपाल से अलग हो कर करन सिंह के साथ घर बसाना चाहती थी. जब यशपाल ने फोन पर उसे बताया कि वह देहरादून की कंपनी में 1 जुलाई से जौइन करने वाला है, तो वह चौंक गई. वह हर हाल में करन सिंह को पाना चाहती थी, इसलिए उस ने यशपाल से छुटकारा पाने का प्लान बना लिया.

20 जून को यशपाल का बर्थडे था. प्लान के मुताबिक, पूजा ने यशपाल से फोन पर कहा कि वह इस बार उस के बर्थडे पर एक खास तोहफा देना चाहती है. यह तोहफा उस का फेसबुक फ्रैंड करन सिंह 19 तारीख की रात को ले कर पहुंच जाएगा. यशपाल ने पूजा से बारबार पूछा, वह तोहफे में क्या दे रही है, यह बता दे. पूजा ने सस्पैंस है कह कर उसे चुप करा दिया.

यशपाल की पत्नी पूजा उसे पहली बार उस के बर्थडे पर तोहफा भेजने वाली थी. वह तोहफे में क्या देने वाली है, इसी सोच में वह कई दिनों तक खोया रहा. वह 19 जून की रात को बेसब्री से इंतजार करने लगा.

यशपाल ने करन सिंह के लिए अपने ही घर पर एक छोटी सी पार्टी रखी थी. 19 तारीख की रात को करीब 10 बजे करन सिंह यशपाल के घर पर पहुंचा. यशपाल ने उस का जोरदार स्वागत किया. दोनों बैठ कर देर रात तक शराब पीते रहे.

करन सिंह दिखावे के लिए शराब लेता रहा. उस ने यशपाल को जम कर शराब पिलाई. नशा होने की वजह से यशपाल बेहोश हो कर बिस्तर पर लुढ़क गया. मौका पा कर करन सिंह ने यशपाल के मुंह में रूई ठूंस दी, ताकि उस की आवाज न निकल सके. इस के बाद गला दबा कर उस की हत्या कर दी और बाहर से दरवाजे पर ताला लगा कर वहां से चला गया.

लेकिन करन सिंह और पूजा का एकसाथ रहने का प्लान धरा रह गया और वे पुलिस के हत्थे चढ़ गए.

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