Family Story: निराधार डर – माया क्यों शक करती थी

Family Story: ‘‘शादी हुई नहीं कि बेटा पराया हो जाता है,’’ माया किसी से फोन पर कह रही थीं, ‘‘दीप की शादी हुए अभी तो केवल 15 दिन ही हुए हैं और अभी से उस में इतना बदलाव आ गया है. पलक के सिवा उसे न कोई दिखाई देता है, न ही कुछ सूझता है. ठीक है कि पत्नी के साथ वह ज्यादा से ज्यादा वक्त बिताना चाहता है, पर मां की उपेक्षा करना क्या ठीक है.’’ यह सुन कर दीप हैरान रह गया. उस ने अनुमान लगाया कि फोन के दूसरी तरफ सोमा बूआ ही होंगी. वही हैं जो इस तरह की बातों को शह देती हैं. वह भी तो हमेशा अपने बेटेबहू को ले कर नाराज रहती हैं. सब जानते हैं कि सोमा बूआ की किसी से नहीं बनती. वे तो सभी से परेशान रहती हैं और दूरपास का कोई ऐसा रिश्तेदार नहीं है जो उन के व्यंग्यबाणों का शिकार न हुआ हो. अपने बेटे को तो वे सब के सामने जोरू का गुलाम तक कहने से नहीं चूकती हैं. पर मां, उस के बारे में ऐसा सोचती हैं, यह बात उसे भीतर तक झकझोर गई. घर में और तो किसी ने ऐसा कुछ नहीं कहा, तो मां को ऐसा क्यों लग रहा है. पापा, उस की बहन दीपा, किसी ने भी तो ऐसा कुछ जाहिर नहीं किया है जिस से लगे कि वह शादी के बाद बदल गया है. फिर मां को ही क्यों लग रहा है कि वह बदल गया है.

पलक को इस समय नए घर में एडजस्ट होने में उस का सहयोग और साथ चाहिए और वही वह उसे दे रहा है तो इस से क्या वह मां के लिए पराया हो गया है. पलक के लिए यह घर नया है, यहां के तौरतरीके, रहनसहन सीखनेसमझने में उसे समय तो लगेगा ही और अगर वह यहां के अनुरूप नहीं ढलेगी तो क्या मां नाराज नहीं होंगी. आखिर मां क्यों नहीं समझ पा रही हैं कि पलक के लिए नए माहौल में ढल पाना सहज नहीं है. इस के लिए उसे पूरी तरह से अपने को बदलना होगा और वह चाहती है कि इस घर को जल्दी से जल्दी अपना बना लें ताकि सारी असहजता खत्म हो जाए. वह पूरी कोशिश कर रही है, पर मां का असहयोग उसे विचलित कर देता है. दीप खुद हैरान था मां के व्यवहार को देख कर. मां तो ऐसी नहीं हैं, फिर पलक के प्रति वे कटु कैसे हो गई हैं.

‘‘मां, ये कैसी बातें कर रही हैं आप? मैं पराया कहां हुआ हूं? बताइए न मुझ से कहां चूक हो गई या आप की कौन सी बात की अवहेलना की है मैं ने? हां, इतना अवश्य हुआ है कि मेरा समय अब बंट गया है. मुझे अब पलक को भी समय देना है ताकि वह अकेलापन महसूस न करे.

‘‘अभी मायके की यादें, मांबाप, भाईबहन से बिछुड़ने का दुख उस पर हावी है. हम सब को उसे सहयोग देना चाहिए ताकि वह खुल कर अपनी बात सब से कह सके. उसे थोड़ा वक्त तो हमें देना ही होगा, मां छुट्टियां खत्म हो जाने से पहले वह भी सब कुछ समझ लेना चाहती है, जिस से औफिस और घर के काम में उसे तालमेल बिठाने में दिक्कत न हो.’’

‘‘मुझे तुझ से बहस नहीं करनी है, चार दिन हुए हैं उसे आए और लगा है उस की तरफदारी करने.’’ पलक अपने कमरे में बैठी मांबेटे की बातें सुन रही थी. उसे हैरानी के साथसाथ दुख भी हो रहा था कि आखिर मां, इस तरह का व्यवहार क्यों कर रही हैं. वह तो उन के तौरतरीके अपनाने को पूरे मन से तैयार है, फिर मां की यह सोच कैसे बन गई कि उस ने दीप को अपनी मुट्ठी में कर लिया है. कमरे में दीप के आते ही उस ने पूछा, ‘‘मुझ से कहां चूक हो गई, दीप, जो मां इस तरह की बात कर रही हैं. मैं ने कब कहा कि तुम हमेशा मेरे पल्लू से बंधे रहो. इतना अवश्य है कि मां से मुझे किसी तरह भी सहयोग नहीं मिल रहा है, इसलिए मुझे तुम्हारे ऊपर ज्यादा निर्भर होना पड़ रहा है. फिर चाहे वह घरगृहस्थी से जुड़ी बात हो या रसोई के काम की या फिर मेरे दायित्वों की. इसी कारण तो हम हनीमून के लिए भी नहीं गए ताकि मुझे इस माहौल में एडजस्ट होने के लिए समय मिल जाए. जानते ही हो कि छुट्टी भी मुश्किल से एक महीने की ही मिली है.’’

‘‘मैं खुद हैरान हूं, पलक कि मां इस तरह का व्यवहार क्यों कर रही हैं. जबकि उन्हें ही मेरी शादी की जल्दी थी. हमारी लव मैरिज उन की स्वीकृति के बाद ही हुई है. शादी से पहले तो वे तुम्हारी तारीफ करते नहीं थकती थीं, फिर अब अचानक क्या हो गया. कितने चाव से उन्होंने शादी की एकएक रस्म निभाई थी. सोमा बूआ टोकती थीं तो मां उन की बातों को नजरअंदाज कर देती थीं. सब से यही कहतीं, मेरा तो एक ही बेटा है, उस की शादी में अपने सारे चाव पूरे करूंगी. आज वे सोमा बूआ की बातों को सुन रही हैं, उन से ही हमारी शिकायत कर रही हैं. ‘‘आज उन्हें अपने ही बेटे की खुशी खल रही है. उन्हें तो इस बात की तसल्ली होनी चाहिए कि हम दोनों खुश हैं और एकदूसरे से प्यार करते हैं. डरता हूं सोमा बूआ कहीं हमारे बीच भी तनाव न पैदा कर दें. मां ने उन की बातें सुनीं तो अवश्य ही उन के बेटेबहू की तरह हमारे बीच भी झगड़े होने लगेंगे.’’

‘‘मुझ पर विश्वास रखो दीप, ऐसा कुछ नहीं होगा,’’ पलक के स्वर में दृढ़ता थी. ‘‘हमें मां के भीतर चल रही उथलपुथल को समझ कर उन से व्यवहार करना होगा. उन के मनोविज्ञान को समझना होगा. दीप, मनोविज्ञान की छात्र रहने के कारण मैं उन की मानसिक स्थिति बखूबी समझ सकती हूं. जब बेटे की शादी होती है तो कई बार एक डर मां के मन में समा जाता है कि अब तो उस का बेटा हाथ से निकल गया. उस में सब से खराब स्थिति बेटे की ही होती है, क्योंकि वह ‘किस की सुने’ के चक्रव्यूह में फंस जाता है. त्रिशंकु जैसी स्थिति हो जाती है उस की. पत्नी जो दूसरे घर से आती है वह पूरी तरह से नए परिवेश में ढलने के लिए उस पर ही निर्भर होती है, और मां को लगता है कि बेटा जो आज तक हर काम उन से पूछ कर करता था, अब बीवी को हर बात बताने लगा है. बस, यही वजह है जब मां को लगता है कि उन की सत्ता में सेंध लगाने वाली आ गई है और वह बहू के खिलाफ मोरचा संभाल लेती है. लेकिन हमें मां को उस डर से बाहर निकालना ही होगा.’’

‘‘पर यह कैसे होगा?’’ दीप पलक की बात सुन थोड़ा असमंजस में था. वह किसी भी तरह से मां को दुखी नहीं देख सकता था और न ही चाहता था कि पलक और मां के संबंधों में कटुता आए.

‘‘यह तुम मुझ पर छोड़ दो, दीप. बस यह खयाल रखना कि मां चाहे मुझ से जो भी कहें, तुम हमारे बीच में नहीं बोलोगे. इस तरह बात और बिगड़ जाएगी और मां को लगेगा कि मेरी वजह से मांबेटे के रिश्ते में दरार आ रही है या बेटा मां से बहस कर रहा है. हालांकि उन की जगह कोई नहीं ले सकता पर फिर भी हमें उन्हें बारबार यह एहसास कराना होगा कि उन की सत्ता में सेंध लगाने का मेरा कोई इरादा नहीं है. ‘‘हर सदस्य की परिवार में अपनी तरह से अहमियत होती है. बस, यही उन्हें समझाना होगा. उस के बाद उन के मन से सारे भय निकल जाएंगे तब वे तुम्हें ले कर शंकित नहीं होंगी कि तुम उन के बुढ़ापे का सहारा नहीं बनोगे, न ही वे इस बात से चिंतित रहेंगी कि मैं उन के बेटे को उन से छीन लूंगी.’’

‘‘सही कह रही हो तुम, पलक. मैं ने भी कई घरों में यही बात देखी है. इसी की वजह से न चाहते हुए मेरे दोस्त वैभव को शादी के बाद अलग होने को मजबूर होना पड़ा था. सासबहू की लड़ाई में वह पिस रहा था. यह देख उस के पापा ने ही उस से अलग हो जाने को कहा था. बेटा हाथ से न निकल जाए का डर, यह अनिश्चतता कि बुढ़ापे में कहीं वे अकेले न रह जाएं, बहू घर पर अधिकार न कर ले, बहू की बातों में आ कर कहीं बेटा बुरा व्यवहार न करे या घर से न निकाल दे, ये बातें जब मन में पलने लगती हैं तो निराधार होने के बावजूद संबंधों में कड़वाहट ले आती हैं. मैं नहीं चाहता कि मेरे परिवार में ऐसा कुछ हो. मैं अपने मांबाप को किसी हाल में नहीं छोड़ सकता,’’ दीप भावुक हो गया था.

‘‘दीप, अब अंदर ही बैठा रहेगा या बाहर भी आएगा. देखो, तुम्हारे मामामामी आए हैं,’’ मां के स्वर में झल्लाहट साफ झलक रही थी. दीप को बुरा लगा पर पलक ने उसे शांत रहने का इशारा किया. बाहर आ कर दोनों ने मामामामी के पैर छुए. फिर पलक किचन में उन के लिए चायनाश्ता लेने चली गई. ‘‘दीदी, अब तो आप का मन खूब लग रहा होगा. पलक काफी मिलनसार और खुशमिजाज लड़की है. बड़ों का आदर भी करती है. जब कुछ दिन पहले दीप और पलक घर आए थे तभी पता लग गया था. बहुत प्यारी बच्ची है.’’ अपनी भाभी के मुंह से पलक की तारीफ सुन माया ने सिर्फ सिर हिलाया. यह सच था कि पलक उन्हें भी अच्छी लगती थी, पर उस की तारीफ करने से वे डरती थीं कि कहीं इस से उन का दिमाग खराब न हो जाए. पलक उस की हर बात को मानती थी, पर वे थीं कि एक दूरी बनाए हुए थीं, पता नहीं पढ़ीलिखी, नौकरी वाली बहू बाद में कैसे रंग दिखाए. वैसे ही बेटा उस के आगेपीछे घूमता रहता है, न जाने क्यों उन के अंदर एक खीझ भर गई थी जिस के कारण वे पलक से खिंचीखिंची रहती थी. और इस वजह से उन के पति और बेटी भी उन से नाराज थे.

‘‘मां, आप एक मिनट के लिए यहां आएंगी,’’ पलक ने 5 मिनट बाद आवाज लगाई, ‘‘मां, प्लीज मुझे बता दीजिए कि मामामामी को क्या पसंद है. आप तो सब जानती हैं.’’ माया को यह सुन अच्छा लगा. पलक जब नाश्ता ले कर आ रही थी तो उस ने मामी को कहते सुना, ‘‘मानना पड़ेगा दीदी, इतनी पढ़ीलिखी होने पर भी पलक में घमंड बिलकुल नहीं है, वरना कमाने वाली लड़कियां तो आजकल रसोई में जाने से ही परहेज करती हैं. ‘‘उस दिन जब हमारे घर आई थी तभी परख लिया था मैं ने कि इस में नखरे तो बिलकुल नहीं हैं. मेरी भाभी की बहू को ही देख लो. उस ने शादी के बाद ही साफ कह दिया था कि घर का कोई काम नहीं करेगी. नौकर रखो या और कोई व्यवस्था करो, उसे कोई मतलब नहीं है. भाभी की तो उस के सामने एक नहीं चलती. आप को तो खुश होना चाहिए बेटाबहू दोनों ही आप को इतना मान देते हैं.’’

‘‘अरे, अभी उसे आए दिन ही कितने हुए हैं. औफिस जाना एक बार शुरू करने दो, सारे रंग सामने आ जाएंगे,’’ पलक को आते देख माया एकदम चुप हो गईं. पलक को बुरा तो बहुत लगा पर वह हंसते हुए नाश्ता परोसने लगी. दीप अंदर ही अंदर कुढ़ कर रहा गया था. वह कुछ कहना ही चाहता था कि पलक ने उसे इशारे से मना कर दिया. मामी ने महसूस किया कि माया पलक के प्रति कुछ ज्यादा ही कटु हो रही हैं और दीप को अच्छा न लगना स्वाभाविक ही था. जातेजाते वे बोलीं, ‘‘दीदी, हो सकता है आप को मेरा कुछ कहना अच्छा न लगे, पर आप पलक के बारे में कुछ ज्यादा ही गलत सोच रही हैं. हो सकता है उस में कुछ कमियां हों, तो क्या हुआ. वे तो सभी में होती हैं. बच्ची को प्यार देंगी तो वह भी आप का सम्मान करेगी. मुझे तो लगता है कि वह आप के जितना निकट आना चाहती है, आप उस से उतनी ही दूरियां बनाती जा रही हैं. ‘‘दीप की खुशी के बारे में सोचें. पलक की वजह से ही वह चुप है, पर कब तक चुप रहेगा. बेटा चाहे वैसे दूर न हो, पर आप की सोच की वजह से दूर हो जाएगा. बहू बेटे को छीन लेगी, यह डर ही आप को रिश्ते में दरार डालने के लिए मजबूर कर रहा है. पलक को खुलेदिल से अपना लीजिए, वरना बेटा सचमुच छिन जाएगा.’’

‘‘सही तो कह रही थीं तुम्हारी भाभी,’’ रात को मौका पाते ही उन के पति ने उन्हें समझाना चाहा, ‘‘इतनी अच्छी बहू मिली है, पर तुम ने दूसरों के बेटेबहू के किस्से सुन एक धारणा बना ली है जो निराधार है. आज वह हर बात तुम से पूछ रही है, लेकिन अगर तुम्हारा यही रवैया रहा तो दीप ही सब से पहले तुम्हारा विरोध करेगा. ‘‘सोचो, अगर पलक उसे तुम्हारे खिलाफ भड़काने लगे तो क्या होगा. सोमा की बातों पर मत जाओ. बहू को दिनरात ताने दे कर उस ने संबंध खराब किए हैं. नए घर में जब एक लड़की आती है तो उस के कुछ सपने होते हैं, वह नए रिश्तों से जुड़ने की कोशिश करती है. पर तुम हो कि उस की गलतियां ही ढूंढ़ती रहती हो. इस तरह तुम दीप को दुखी कर रही हो. क्या तुम नहीं चाहतीं कि तुम्हारा बेटा खुश रहे.

‘‘कल हमारी दीपा के साथ भी उस की सास ऐसा ही व्यवहार करेगी तो क्या वह सुखी रह पाएगी या तुम बरदाश्त कर पाओगी? अपने डर से बाहर निकलो माया, और पलक व दीप पर विश्वास करो.’’ पूरी रात माया कशमकश से जूझती रहीं. सच में बेटे के छिन जाने का डर ही उन्हें पलक के साथ कठोर व्यवहार करने को मजबूर कर रहा है. आखिर जितना प्यार वे दीप और दीपा पर उड़ेलती हैं, पलक को दें तो क्या वह भी उन की बेटी नहीं बन जाएगी. जरूरी है कि उसे बहू के खांचे में जकड़ कर ही रखा जाए? वह भी तो माया में मां को ही तलाश रही होगी? माया जब सुबह उठीं तो उन के चेहरे पर कठोरता और खीझ के भाव की जगह एक कोमलता व नजरों में प्यार देख पलक बोली, ‘‘मां, आइए न, साथ बैठ कर चाय पीते हैं. आज संडे है तो दीप तो देर तक ही सोने वाले हैं.’’

‘‘तुम क्यों इतनी जल्दी उठ गईं? जाओ आराम करो. नाश्ता मैं बना लूंगी.’’ ‘‘नहीं मां, हम मिल कर नाश्ता बनाएंगे और इस बहाने मैं आप से नईनई चीजें भी सीख लूंगी.’’ डाइनिंग टेबल पर मां को पलक से बात करते और खिलखिलाते देख दीप हैरान था. पलक ने आंखों ही आंखों में जैसे उसे बताया कि उसे यहां भी मां मिल गई हैं.

Hindi Story: चिड़िया का बच्चा

Hindi Story: ‘टिंग टांग…टिंग टांग’…घंटी बजते ही मैं बोली, ‘‘आई दीपू.’’

मगर जब तक दरवाजा न खुल जाए, दीपू की आदत है कि घंटी बजाता ही रहता है. बड़ा ही शैतान है. दरवाजा खुलते ही वह चहकने लगा, ‘‘मौसी, आप को कैसे पता चलता है कि बाहर कौन है?’’

मैं ने हंसते हुए कहा, ‘‘पता कैसे नहीं चलेगा.’’

तभी अचानक मेरे मुंह से चीख निकल गई, मैं ने फौरन दीपू को उस जगह से सावधानी से परे कर दिया. वह हैरान हो कर बोला, ‘‘क्या हुआ, मौसी?’’

मैं आंगन में वहीं बैठ गई जहां अभीअभी एक चिडि़या का बच्चा गिरा था. मैं ने ध्यान से उसे देखा. वह जिंदा था. मैं फौरन ठंडा पानी ले आई और उसे चिडि़या के बच्चे की चोंच में डाला. पानी मिलते ही उसे कुछ आराम मिला. मैं ने फर्श से उठा कर उसे एक डब्बे पर रख दिया. फिर सोच में पड़ गई कि अगर दीपू का पांव इस के ऊपर पड़ गया होता तो? कल्पना मात्र से ही मैं सिहर उठी.

मैं ने ऊपर देखा. पड़ोसियों का वृक्ष हमारे आंगन की ओर झुका हुआ था. शायद उस में कोई घोंसला होगा. बहुत सारी चिडि़यां चूंचूं कर रही थीं. मुझे लगा, जैसे वे अपनी भाषा में रो रही हैं. पशुपक्षी बेचारे कितने मजबूर होते हैं. उन का बच्चा उन से जुदा हो गया पर वह कुछ नहीं कर पा रहे थे.

‘‘करुणा…’’ कमला दीदी की आवाज ने मुझे चौंका दिया. मैं ने फौरन चिडि़या के बच्चे को उठाया और नल के पास ऊंचाई पर बनी एक सुरक्षित जगह पर रख दिया.

छुट्टियों में हमारे घर बड़ी रौनक रहती है. इस बार तो मेरी दीदी और उस के बच्चे भी अहमदाबाद से आए थे. इत्तफाक से विदेश से फूफाजी भी आए हुए थे. फूफाजी को सब लोग ‘दादाजी’ कहते थे. यह विदेशी दादाजी हमारे छोटे शहर के लिए बहुत बड़ी चीज थे. सुबह से शाम तक लोग उन्हें घेरे ही रहते. कभी लोग मेहमानों से मिलने आते तो कभी मेहमान लोग घूमनेफिरने निकल जाते.

मेहमानों के लिए शाम का नाश्ता तैयार कर के मैं फिर चिडि़या के बच्चे के पास चली आई. वह अपना छोटा सा मुंह पूरा खोले हुए था. ऐसा लगता था जैसे वह पानी पीना चाहता है. पर नहीं, पानी तो बहुत पिलाया था. मुझे अच्छी तरह पता भी तो नहीं था कि यह क्या खाएगा?

‘‘ओ करुणा मौसी, चिडि़या को पानी में डाल दो,’’ दीपू ने मेरे पास रखी गेंद उठाते हुए कहा.

मैं ने उसे पकड़ा, ‘‘अरे दीपू, सामने जो सफेद प्याला पड़ा है, उसे ले आ. मैं ने उस में दूधचीनी घोल कर रखी है. इसे भूख लगी होगी.’’

मेरी बात सुन कर दीपू जोर से हंसा, ‘‘मौसी, इसे उठा कर बाहर फेंक दो,’’ कहते हुए वह गेंद नचाते हुए बाहर चला गया.

मैं दूध ले आई, चिडि़या का बच्चा बारबार मुंह खोल रहा था. मैं अपनी उंगली दूध में डुबो कर दूध की बूंदें उस की चोंच में डालने लगी.

‘‘बूआ…’’ मेरी भतीजी उर्मिला की आवाज थी, ‘‘अरे बूआ, यहां क्या कर रही हो?’’ वह करीब आ कर बोली.

मैं ने उसे चिडि़या के बच्चे के बारे में बताया. मैं चाहती थी कि मेरी गैरमौजूदगी में उर्मिला जरा उस का खयाल रखे.

‘‘वाह बूआ, वाह, भला चिडि़या के बच्चे के पास बैठने से क्या फायदा?’’ कह कर वह अंदर चली गई. नल के पास बैठे हुए जो भी मुझे देखता वह खिलखिला कर हंस पड़ता. सब के लिए चिडि़या का बच्चा मजाक का विषय बन गया था.

मैं फिर रसोई में चली गई. थोड़ी देर बाद मैं ने बाहर झांका तो देखा कि मेरी भतीजी जूली, उर्मिला और कुछ अन्य लड़कियां नल के पास आ कर खड़ी हो गई थीं. मैं एकदम चिल्लाई, ‘‘अरे, रुको.’’

मैं उन के पास आई तो वे बोलीं, ‘‘क्या बात है?’’

‘‘वहां एक चिडि़या का बच्चा है.’’

‘‘चिडि़या का बच्चा? अरे हम ने सोचा, पता नहीं क्या बात है जो आप इतनी घबराई हुई हैं,’’ वे भी जोरदार ठहाके मारती हुई चली गईं.

मैं खीज उठी और शीघ्र ही ऊपर चली गई. वहां आले में रखे एक घोंसले को देखा,जो इत्तफाक से खाली था. मैं ने उस में चिडि़या के बच्चे को रख कर घोंसले को ऊपर एक कोने में रख दिया.

मैं रसोई में आ गई और सब्जी काटने लगी. तभी पड़ोसन सुषमा बोली, ‘‘आज तो पता नहीं, करुणा का ध्यान कहां है? मैं रसोई में आ गई और इसे पता नहीं चला.’’

‘‘इस का ध्यान चिडि़या के बच्चे में है,’’ नमिता ने उसे चिडि़या के बच्चे के बारे में बताया.

‘‘अरे, पक्षी बिना घोंसले के बड़ा नहीं होगा. उसे किसी घोंसले में रखो,’’ सुषमा सलाह देती हुई बोली.

‘‘मैं उसे घोंसले में ही रख कर आई हूं,’’ मैं ने खुश होते हुए कहा.

रात को सब लोग खाना खाने के बाद घूमने गए. शायद किशनचंद के यहां से भी हो कर आए थे, ‘‘भई, हद हो गई, किशनचंद की औरत इतनी बीमार है. इतनी छटपटाहट घर के लोग कैसे देख रहे थे?’’ यह दादाजी की आवाज थी.

सब लोग आंगन में बैठे बातचीत कर रहे थे. दादाजी विदेश की बातें सुना रहे थे, ‘‘भई, हमारे अमेरिका में तो कोई इस कदर छटपटाए तो उसे ऐसा इंजेक्शन दे देते हैं कि वह फौरन शांत हो जाए. भारत न तो कभी बदला है और न ही बदलेगा. अभी मैं मुंबई से हो कर ही राजस्थान आया हूं. वहां मूलचंद की दादी की मृत्यु हो गई. अजीब बात है, अभी तक यहां लोग अग्निसंस्कार करते हैं.’’

सुनते ही अम्मां बोलीं, ‘‘आप लोग मृत व्यक्ति का क्या करते हैं?’’

‘‘अरे, बस एक बटन दबाते हैं और सारा झंझट खत्म. अमेरिका में तो…’’ दादाजी पता नहीं कैसी विचित्र बातें सुना रहे थे.

मैं ने सोने से पहले चिडि़या के बच्चे की देखभाल की और फिर सो गई. सुबह उठते ही देखा, चिडि़या का बच्चा बड़ा ही खुश हो कर फुदक रहा था. दीपू ने उस की ओर पांव बढ़ाते हुए कहा, ‘‘मौसी, रख दूं पैर इस के ऊपर?’’

‘‘अरे, नहीं…’’ मैं उस का पैर हटाते हुए चीख पड़ी. अचानक मैं ने सामने देखा, ‘‘अरे, यह तो वही आदमी है…’’

शायद जीजाजी ने मेरी बात सुन ली थी. वह बाहर ‘विजय स्टोर’ की तरफ देखते हुए बोले, ‘‘तुम जानती हो क्या उस आदमी को?’’

मेरे सामने एक दर्दनाक दृश्य ताजा हो उठा, ‘‘हां,’’ मैं ने कहा, ‘‘यह वही आदमी है. एक प्यारा सा कुत्ता लगभग मेरे ही पास पलता था, क्योंकि मैं उसे कुछ न कुछ खिलाती रहती थी. एक दिन वह सामने भाभी के घर से दीदी के घर की तरफ आ रहा था कि इस आदमी का स्कूटर उसे तेजी से कुचलता हुआ निकल गया. कुत्ता बुरी तरह तड़प कर शांत हो गया. हैरत की बात यह थी कि इस आदमी ने एक बार भी मुड़ कर नहीं देखा था.’’

जीजाजी पहले तो ठहाका मार कर हंसे फिर जरा क्र्रोधित होते हुए बोले, ‘‘अब कहीं वह फिर तुम्हें नजर आ जाए तो उसे कुछ कह मत देना. हम कुत्ते वाली फालतू बात के लिए किसी से कहासुनी करेंगे क्या?’’

कुछ दिन पहले की ही तो बात है. पड़ोस में शोर उठा, ‘अरे पास वाली झाडि़यों से सांप निकला है,’ सुनते ही मेरा बड़ा भतीजा फौरन एक लाठी ले कर गया और कुछ ही पलों में खुश होते हुए उस ने बताया कि सांप को मार कर उस ने तालाब में फेंक दिया है.

‘‘क्या?…तुम ने उसे जान से मार दिया है?’’ मैं ने सहमे स्वर में पूछा.

‘‘मारता नहीं तो क्या उसे घर ले आता? अगर किसी को काट लेता तो?’’

एक दिन दादाजी बालकनी में कुछ लोगों के साथ बैठे कौफी पी रहे थे, बाहर का दृश्य देखते हुए बोले, ‘‘अफ्रीका में सूअर को घंटों खौलते हुए पानी में डालते हैं और फिर उसे पकाने के लिए…’’ दादाजी बोले जा रहे थे और मैं सूअर की दशा की कल्पना मात्र से ही तड़प उठी थी. मुझे डर लगने लगा कि कहीं चिडि़या के बच्चे को कोई बाहर न फेंक दे.

घोंसले में झांका तो देखा कि बच्चा उलटा पड़ा था. मैं ने डरतेडरते हाथों में कपड़ा ले कर उसे सीधा किया. बिना कपड़ा लिए मेरे नाखून उसे चुभ जाते.

‘‘करुणा मौसी, आप ने चिडि़या के बच्चे को हाथ लगाया?’’ ज्योति ने पूछा.

‘‘हां, क्यों?’’ मैं ने उसे आश्चर्य से देखा.

‘‘अब देखना मौसी, चिडि़या के बच्चे को उस की मां अपनाएगी नहीं. मनुष्य के हाथ लगाने के बाद दूसरे पक्षी उस की ओर देखते भी नहीं.’’

‘‘अरे, उठाती कैसे नहीं, आंगन के बीचोबीच पड़ा था. किसी का पांव आ जाता तो?’’ मैं ने कहा और अपने काम में लग गई.

3 दिन गुजर गए. जराजरा सी देर में मैं चिडि़या के बच्चे की देखभाल करती. चौथे दिन बहुत सवेरे ही चिडि़यों के झुंड के झुंड घोंसले के पास आ कर जोरजोर से चींचीं, चूंचूं करने लगे. मुझे लगा जैसे वे रो रहे हों. मैं ने घोंसले के अंदर देखा. चिडि़या का बच्चा बिलकुल शांत पड़ा था. मेरा दिल भर आया. तरहतरह के खयाल मन में उठे. रात को वह बिलकुल ठीक था. कहीं सच में दीपू ने उस के ऊपर पांव तो नहीं रख दिया?

चिडि़या के बच्चे पर किसी तरह के हमले का कोई निशान नहीं था. मगर फिर भी मैं ने दीपू से पूछा, ‘‘सच बता दीपू, तू ने चिडि़या के बच्चे को कुछ किया तो नहीं?’’

पर दीपू ने तो जैसे सोच ही रखा था कि मौसी को दुखी करना है. वह बोला, ‘‘मौसी, मैं ने सुबह उठते ही पहले उस का गला दबाया और फिर सैर करने चला गया.’’

मैं सरला दीदी से बोली, ‘‘दीदी, ऐसा नहीं लगता कि यह आराम से सो रहा है?’’

दीपू ने मुझे दुखी देख कर फिर कहा, ‘‘मौसी, मैं ने इसे मारा ही ऐसे है कि जैसे हत्या न लग कर स्वाभाविक मौत लगे.’’

पता नहीं क्यों, मुझ से उस दिन कुछ खायापिया नहीं गया. संगीतशाला भी नहीं गई. दिल भर आया था. कागजकलम ले कर दिल के दर्द को रचना के जरिए कागज की जमीन पर उतारने लगी. रचना भेजने के बाद लगा कि जैसे मैं ने उस चिडि़या के बच्चे को अपनी श्रद्धांजलि दे दी है.

Family Story: दूसरा विवाह – विकास शादी क्यों नहीं करना चाहता था?

Family Story: अपने दूसरे विवाह के बाद, विकास पहली बार जब मेरे घर आया तो मैं उसे देखती रह गई थी. उस का व्यक्तित्व ही बदल गया था. उस के गालों के गड्ढे भर गए थे. आंखों पर मोटा चश्मा, जो किसी चश्मे वाले मास्टरजी के कार्टून वाले चेहरे पर लगा होता है वैसे ही उस की नाक पर टिका रहता था लेकिन अब वही चश्मा व्यवस्थित तरीके से लगा होने के कारण उस के चेहरे की शोभा बढ़ा रहा था. कपड़ों की तरफ भी जो उस का लापरवाही भरा दृष्टिकोण रहता था उस में भी बहुत परिवर्तन दिखा. पहले के विपरीत उस ने कपड़े और सलीके से पहने हुए थे. लग रहा था जैसे किसी के सधे हाथों ने उस के पूरे व्यक्तित्व को ही संवार दिया हो. उस के चेहरे से खुशी छलकी पड़ रही थी.

मैं उसे देखते ही अपने पास बैठाते हुए खुशी से बोली, ‘‘वाह, विकास, तुम तो बिलकुल बदल गए. बड़ा अच्छा लग रहा है तुम्हें देख कर. शादी कर के तुम ने बहुत अच्छा किया. तुम्हारा घर बस गया. आखिर कितने दिन तुम ममता का इंतजार करते. अच्छा हुआ तुम्हें उस से छुटकारा मिल गया.’’

उस के लिए चाय बनातेबनाते, मैं मन ही मन सोचने लगी कि इस लड़के ने कितना झेला है. पूरे 8 साल अपनी पहली पत्नी ममता का मायके से लौटने का इंतजार करता रहा. लेकिन वह अपनी जिद पर अड़ी रही कि वह नहीं आएगी. विकास को ही अपना परिवार, जिस में उस की मां और एक कुंआरी बहन थी, को छोड़ कर उस के साथ रहना होगा.

विकास के छोटे से घर में उन सब के साथ रहना उस को अच्छा नहीं लगता था. ममता की अपनी मां का घर बहुत बड़ा था. विकास ने उसे बहुत समझाया कि बहन का विवाह करने के बाद वह बड़ा घर ले लेगा. लेकिन ममता को अपने सुख के सामने कुछ भी दिखाई ही नहीं पड़ता था. उस के मायके वालों ने भी उसे कभी समझाने की कोशिश नहीं की. विकास ने ममता की अनुचित मांग को मानने से साफ इनकार कर दिया. लेकिन ससुराल में जा कर ममता को समझाने में कोई कसर नहीं छोड़ी. अंत में वही हुआ, दोनों का तलाक हो गया. उन 8 सालों में हम ने विकास को तिलतिल मरते देखा था. वह मेरे बेटे रवि का सहकर्मी था. अकसर वह हमारे घर आ जाता था. मैं ने उस को कई बार समझाया कि वह अब पत्नी ममता का इंतजार न करे और तलाक ले ले. लेकिन वह कहता कि वह ममता को तलाक नहीं देगा, ममता को पहल करनी है तो करे. ममता को जब यह विश्वास हो गया कि विकास उस की शर्त कदापि पूरी नहीं करेगा तो उस ने विकास से अलग होने का फैसला ले लिया.

चाय पीते हुए मैं ने विकास से उस की नई पत्नी के बारे में पूछा तो उस ने बताया, ‘‘आंटी, मैं तो शादी करना ही नहीं चाहता था, लेकिन मां और बहन की जिद के आगे मुझे झुकना पड़ा. आप को पता है कि उमा जिस से मैं ने शादी की है, वह एक स्कूल में टीचर है. उस के 2 बच्चे, एक लड़का और एक लड़की हैं. लड़का 12 साल का और लड़की 16 साल की है. उमा भी शादी नहीं करना चाहती थी. उमा के मांबाप तो उसे समझा कर थक गए थे, लेकिन अपने बच्चों की जिद के आगे उस ने शादी करना स्वीकार किया. जब उन बच्चों ने मुझे अपने पापा के रूप में पसंद किया, तभी हमारा विवाह हुआ. ‘‘मेरी होने वाली बेटी ने विवाह से पहले, मुझ से कई सवाल किए, पहला कि मैं उस के पहले पापा की तरह उन से मारपीट तो नहीं करूंगा. दूसरा, मुझे शराब पीने की आदत तो नहीं है? जब उसे तसल्ली हो गई तब उस ने मुझे पापा के रूप में स्वीकार करने की घोषणा की. मैं ने भी उन को बताया कि मेरे ऊपर जिम्मेदारी है, मैं उन को उतनी सुखसुविधाएं तो नहीं दे पाऊंगा, जो वर्तमान समय में उन्हें अपने नाना के घर में मिल रही हैं. मैं ने अभी बात भी पूरी नहीं की कि मेरी बेटी बोली कि उसे कुछ नहीं चाहिए, बस, पापा चाहिए. मुझे पलेपलाए बच्चे मिल गए और उन्हें पापा मिल गए.

‘‘मेरा तो कोई बच्चा है नहीं, अब इस उम्र में ऐसा सुख मिल जाए तो और क्या चाहिए. उमा भी यह सोच कर धन्य है कि उस को एक जीवनसाथी मिल गया और उस के बच्चों को पापा मिल गए. अब घर, घर लगता है. बच्चे जब मुझे पापा कहते हैं तो मेरा सीना गर्व से फूल जाता है. एक बार मेरी बेटी ने मेरे जन्मदिन पर एक नोट लिख कर मेरे तकिए के नीचे रख दिया. उस में लिखा था, ‘दुनिया के बैस्ट पापा’. उसे पढ़ कर मुझे लगा कि मेरा जीवन ही सार्थक हो गया है.’’

उस ने एक ही सांस में अपने मन के उद्गार मेरे सामने व्यक्त कर दिए. ऐसा करते हुए उस के चेहरे की चमक देखने लायक थी. बातबात में जब वह बड़े आत्मविश्वास के साथ ‘मेरी बेटी’ शब्द इस्तेमाल कर रहा था, उस समय मैं सोच रही थी कि कितनी खुश होगी वह लड़की, लोग तो अपनी पैदा की हुई बेटी को भी इतना प्यार नहीं करते. मैं ने कहा, ‘‘सच में, तुम ने एक औरत और उस के बच्चों को अपना नाम दे कर उन का जीवन खुशियों से भर दिया. एक तरह से उन का नया जन्म हो गया है. तुम ने इतना बड़ा काम किया है कि जिस की जितनी भी प्रशंसा की जाए, कम है. तुम्हें घर बसाने वाली पत्नी के साथ पापा कहने वाले बच्चे भी मिल गए. मुझे तुम पर गर्व है. कभी परिवार सहित जरूर आना.’’ उस ने मोबाइल पर सब की फोटो दिखाई और दिखाते समय उस के चेहरे के हावभाव से ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे वह कोई नैशनल लैवल का मैडल जीत कर आया है और दिखा रहा है.

‘‘चलता हूं, आंटीजी, बेटी को स्कूल से लेने जाना है. वह मेरा इंतजार कर रही होगी. अगली बार सब को ले कर आऊंगा…’’ और झुकते हुए मेरे पांव छू कर दरवाजे की ओर वह चल दिया. मैं उसे विदा कर के सोच में पड़ गई कि समय के साथ लोगों की सोच में कितना सकारात्मक परिवर्तन आ गया है. पहले परित्यक्ता और विधवा औरतों को कितनी हेय दृष्टि से देखा जाता था, जैसे उन्होंने ही कोई अपराध किया हो. पहली बात तो उन के पुनर्विवाह के लिए समाज आज्ञा ही नहीं देता था और किसी तरह हो भी जाता तो, विवाह के बाद भी ससुराल वाले उन को मन से स्वीकार नहीं करते थे. अच्छी बात यह है कि अब बच्चे ही अपनी मां को उन के जीवन के खालीपन को भरने के लिए उन्हें दूसरे विवाह के लिए प्रोत्साहित करते हैं, जैसा कि विकास के साथ घटित हुआ है. यह सब देख कर मुझे बहुत सुखद अनुभूति हुई और आज की युवा पीढ़ी की सोच को मैं ने मन ही मन नमन करते हुए आत्मसंतुष्टि का अनुभव किया.

Hindi Story: अंतिम निर्णय – कुछ तो लोग कहेंगे!

Hindi Story: सुहासिनी के अमेरिका से भारत आगमन की सूचना मिलते ही अपार्टमैंट की कई महिलाएं 11 बजते ही उस के घर पहुंच गईं. कुछ भुक्तभोगियों ने बिना कारण जाने ही एक स्वर में कहा, ‘‘हम ने तो पहले ही कहा था कि वहां अधिक दिन मन नहीं लगेगा, बच्चे तो अपने काम में व्यस्त रहते हैं, हम सारा दिन अकेले वहां क्या करें? अनजान देश, अनजान लोग, अनजान भाषा और फिर ऐसी हमारी क्या मजबूरी है कि हम मन मार कर वहां रहें ही. आप के आने से न्यू ईयर के सैलिब्रेशन में और भी मजा आएगा. हम तो आप को बहुत मिस कर रहे थे, अच्छा हुआ आप आ गईं.’’

उन की अपनत्वभरी बातों ने क्षणभर में ही उस की विदेशयात्रा की कड़वाहट को धोपोंछ दिया और उस का मन सुकून से भर गया. जातेजाते सब ने उस को जेट लैग के कारण आराम करने की सलाह दी और उस के हफ्तेभर के खाने का मैन्यू उस को बतला दिया. साथ ही, आपस में सब ने फैसला कर लिया कि किस दिन, कौन, क्या बना कर लाएगा.

सुहासिनी के विवाह को 5 साल ही तो हुए थे जब उस के पति उस की गोद में 5 साल के सुशांत को छोड़ कर इस दुनिया से विदा हो गए थे. परिजनों ने उस पर दूसरा विवाह करने के लिए जोर डाला था, लेकिन वह अपने पति के रूप में किसी और को देखने की कल्पना भी नहीं कर सकती थी. पढ़ीलिखी होने के कारण किसी पर बोझ न बन कर उस ने अपने बेटे को उच्चशिक्षा दिलाई थी. हर मां की तरह वह भी एक अच्छी बहू लाने के सपने देखने लगी थी.

सुशांत की एक अच्छी कंपनी में जौब लग गई थी. उस को कंपनी की ओर से किसी प्रोजैक्ट के सिलसिले में 3 महीने के लिए अमेरिका जाना पड़ा. सुहासिनी अपने बेटे के भविष्य की योजनाओं में बाधक नहीं बनना चाहती थी, लेकिन अकेले रहने की कल्पना से ही उस का मन घबराने लगा था.

अमेरिका में 3 महीने बीतने के बाद, कंपनी ने 3 महीने का समय और बढ़ा दिया था. उस के बाद, सुशांत की योग्यता देखते हुए कंपनी ने उसे वहीं की अपनी शाखा में कार्य करने का प्रस्ताव रखा तो उस ने अपनी मां से भी विचारविमर्श करना जरूरी नहीं समझा और स्वीकृति दे दी, क्योंकि वह वहां की जीवनशैली से बहुत प्रभावित हो गया था.

सुहासिनी इस स्थिति के लिए बिलकुल तैयार नहीं थी. उस ने बेटे को समझाते हुए कहा था, ‘बेटा, अपने देश में नौकरियों की क्या कमी है जो तू अमेरिका में बसना चाहता है? फिर तेरा ब्याह कर के मैं अपनी जिम्मेदारी से मुक्त होना चाहती हूं. साथ ही, तेरे बच्चे को देखना चाहती हूं, जिस से मेरा अकेलापन समाप्त हो जाए और यह सब तभी होगा, जब तू भारत में होगा. मैं कब से यह सपना देख रही हूं और अब यह पूरा होने का समय आ गया है, तू इनकार मत करना.’ यह बोलतेबोलते उस की आवाज भर्रा गई थी. वह जानती थी कि उस का बेटा बहुत जिद्दी है. वह जो ठीक समझता है, वही करता है.

जवाब में वह बोला, ‘ममा, आप परेशान मत होे, मैं आप को भी जल्दी ही अमेरिका बुला लूंगा और आप का सपना तो यहां रह कर भी पूरा हो जाएगा. लड़की भी मैं यहां रहते हुए खुद ही ढूंढ़ लूंगा.’ बेटे का दोटूक उत्तर सुन कर सुहासिनी सकते में आ गई. उस को लगा कि वह पूरी दुनिया में अकेली रह गई थी.

सालभर के अंदर ही सुशांत ने सुहासिनी को बुलाने के लिए दस्तावेज भेज दिए. उस ने एजेंट के जरिए वीजा के लिए आवेदन कर दिया. बड़े बेमन से वह अमेरिका के लिए रवाना हुई. अनजान देश में जाते हुए वह अपने को बहुत असुरक्षित अनुभव कर रही थी. मन में दुविधा थी कि पता नहीं, उस का वहां मन लगेगा भी कि नहीं. हवाई अड्डे पर सुशांत उसे लेने आया था. इतने समय बाद उस को देख कर उस की आंखें छलछला आईं.

घर पहुंच कर सुशांत ने घर का दरवाजा खटखटाया. इस से पहले कि वह अपने बेटे से कुछ पूछे, एक अंगरेज महिला ने दरवाजा खोला. वह सवालिया नजरों से सुशांत की ओर देखने लगी. उस ने उसे इशारे से अंदर चलने को कहा. अंदर पहुंच कर बेटे ने कहा, ‘ममा, आप फ्रैश हो कर आराम करिए, बहुत थक गई होंगी. मैं आप के खाने का इंतजाम करवाता हूं.’

सुहासिनी को चैन कहां, मन ही मन मना रही थी कि उस का संदेह गलत निकले, लेकिन इस के विपरीत सही निकला. बेटे के बताते ही वह अवाक उस की ओर देखती ही रह गई. उस ने इस स्थिति की कल्पना भी नहीं की थी. उस के बहू के लिए देखे गए सपने चूरचूर हो कर बिखर गए थे.

सुहासिनी ने अपनी भावनाओं पर नियंत्रण रखते हुए कहा, ‘मुझे पहले ही बता देता, तो मैं बहू के लिए कुछ ले कर आती.’

मां की भीगी आखें सुशांत से छिपी नहीं रह पाईं. उस ने कहा, ‘ममा, मैं जानता था कि आप कभी मन से मुझे स्वीकृति नहीं देंगी. यदि मैं आप को पहले बता देता तो शायद आप आती ही नहीं. सोचिए, रोजी से विवाह करने से मुझे आसानी से यहां की नागरिकता मिल गई है. आप भी अब हमेशा मेरे साथ रह सकती हैं.’ उस को अपने बेटे की सोच पर तरस आने लगा. वह कुछ नहीं बोली. मन ही मन बुदबुदाई, ‘कम से कम, यह तो पूछ लेता कि विदेश में, तेरे साथ, मैं रहने के लिए तैयार भी हूं या नहीं?’

बहुत जल्दी सुहासिनी का मन वहां की जीवनशैली से ऊबने लगा था. बहूबेटा सुबह अपनीअपनी जौब के लिए निकल जाते थे. उस के बाद जैसे घर उस को काटने को दौड़ता था. उन के पीछे से वह घर के सारे काम कर लेती थी. उन के लिए खाना भी बना लेती थी, लेकिन उस को महसूस हुआ कि उस के बेटे को पहले की तरह उस के हाथ के खाने के स्थान पर अमेरिकी खाना अधिक पसंद आने लगा था. धीरेधीरे उस को लगने लगा था कि उस का अस्तित्व एक नौकरानी से अधिक नहीं रह गया है. वहां के वातावरण में अपनत्व की कमी होने के चलते बनावटीपन से उस का मन बुरी तरह घबरा गया था.

सुहासिनी को भारत की अपनी कालोनी की याद सताने लगी कि किस तरह अपने हंसमुख स्वभाव के कारण वहां पर हर आयुवर्ग की वह चहेती बन गई थी. हर दिन शाम को, सभी उम्र के लोग कालोनी में ही बने पार्क में इकट्ठे हो जाया करते थे. बाकी समय भी व्हाट्सऐप द्वारा संपर्क में बने रहते थे और जरा सी भी तबीयत खराब होने पर एकदूसरे की मदद के लिए तैयार रहते थे.

उस ने एक दिन हिम्मत कर के अपने बेटे से कह ही दिया, ‘बेटा, मैं वापस इंडिया जाना चाहती हूं.’

यह प्रस्ताव सुन कर सुशांत थोड़ा आश्चर्य और नाराजगी मिश्रित आवाज में बोला, ‘लेकिन वहां आप की देखभाल कौन करेगा? मेरे यहां रहते हुए आप किस के लिए वहां जाना चाहती हैं?’ वह जानता था कि उस की मां वहां बिलकुल अकेली हैं.

सुहासिनी ने उस की बात अनसुनी करते हुए कहा, ‘नहीं, मुझे जाना है, तुम्हारे कोई बच्चा होगा तो आ जाऊंगी.’ आखिर वह भारत के लिए रवाना हो गई.

सुहासिनी को अब अपने देश में नए सिरे से अपने जीवन को जीना था. वह यह सोच ही रही थी कि अचानक उस की ढलती उम्र के इस पड़ाव में भी सुनीलजी, जो उसी अपार्टमैंट में रहते थे, के विवाह के प्रस्ताव ने मौनसून की पहली झमाझम बरसात की तरह उस के तन के साथ मन को भी भिगोभिगो कर रोमांचित कर दिया था. उस के जीवन में क्या चल रहा है, यह बात सुनीलजी से छिपी नहीं थी.

सुहासिनी के हावभाव ने बिना कुछ कहे ही स्वीकारात्मक उत्तर दे दिया था. लेकिन उस के मन में आया कि यह एहसास क्षणिक ही तो था. सचाई के धरातल पर आते ही सुहासिनी एक बार यह सोच कर कांप गई कि जब उस के बेटे को पता चलेगा तो क्या होगा? वह उस की आंखों में गिर जाएगी? वैधव्य की आग में जलते हुए, दूसरा विवाह न कर के उस ने अपने बेटे को मांबाप दोनों का प्यार दे कर उस की परवरिश कर के, समाज में जो इज्जत पाई थी, वह तारतार हो जाएगी?

‘नहीं, नहीं, ऐसा मैं सोच भी नहीं सकती. ठीक है, अपनी सकारात्मक सोच के कारण वे मुझे बहुत अच्छे लगते हैं और उन के प्रस्ताव ने यह भी प्रमाणित कर दिया कि यही हाल उन का भी है. वे भी अकेले हैं. उन की एक ही बेटी है, वह भी अमेरिका में रहती है. लेकिन समाज भी कोई चीज है,’ वह मन ही मन बुदबुदाई और निर्णय ले डाला.

जब सुनीलजी मिले तो उस ने अपना निर्णय सुना दिया, ‘‘मैं आप की भावनाओं का आदर करती हूं, लेकिन समाज के सामने स्वीकार करने में परिस्थितियां बाधक हो जाती हैं और समाज का सामना करने की मेरी हिम्मत नहीं है, मुझे माफ कर दीजिएगा.’’ उस के इस कथन पर उन की तरफ से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई, जैसे कि वे पहले से ही इस उत्तर के लिए तैयार थे. वे जानते थे कि उम्र के इस पड़ाव में इस तरह का निर्णय लेना सरल नहीं है. वे मौन ही रहे.

अचानक एक दिन सुहासिनी को पता चला कि सुनीलजी की बेटी सलोनी, अमेरिका से आने वाली है. आने के बाद, एक दिन वह अपने पापा के साथ उस से मिलने आई, फिर सुहासिनी ने उस को अपने घर पर आमंत्रित किया. हर दिन कुछ न कुछ बना कर सुहासिनी, सलोनी के लिए उस के घर भेजती ही रहती थी. उस के प्रेमभरे इस व्यवहार से सलोनी भावविभोर हो गई और एक दिन कुछ ऐसा घटित हुआ, जिस की वह कल्पना भी नहीं कर सकती थी.

अचानक एक दिन सलोनी उस के घर आई और बोली, ‘‘एक बात बोलूं, आप बुरा तो नहीं मानेंगी? आप मेरी मां बनेंगी? मुझे अपनी मां की याद नहीं है कि वे कैसी थीं, लेकिन आप को देख कर लगता है ऐसी ही होंगी. मेरे कारण मेरे पापा ने दूसरा विवाह नहीं किया कि पता नहीं नई मां मुझे मां का प्यार दे भी पाएगी या नहीं. लेकिन अब मुझ से उन का अकेलापन देखा नहीं जाता. मैं अमेरिका नहीं जाना चाहती थी. लेकिन विवाह के बाद लड़कियां मजबूर हो जाती हैं. उन को अपने पति के साथ जाना ही पड़ता है. मेरे पापा बहुत अच्छे हैं. प्लीज आंटी, आप मना मत करिएगा.’’ इतना कह कर वह रोने लगी. सुहासिनी शब्दहीन हो गई. उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह क्या कहे. उस ने उसे गले लगा लिया और बोली, ‘‘ठीक है बेटा, मैं विचार करूंगी.’’ थोड़ी देर बाद वह चली गई.

कई दिनों तक सुहासिनी के मनमस्तिष्क में विचारों का मंथन चलता रहा. एक दिन सुनीलजी अपनी बेटी के साथ सुहासिनी के घर आ गए. वह असमंजस की स्थिति से उबर ही नहीं पा रही थी. सबकुछ समझते हुए सुनीलजी ने बोलना शुरू किया, ‘‘आप यह मत सोचना कि सलोनी ने मेरी इच्छा को आप तक पहुंचाया है. जब से वह आई है, हम दोनों की भावनाएं इस से छिपी नहीं रहीं. उस ने मुझ से पूछा, तो मैं झूठ नहीं बोल पाया. अभी तो उस ने महसूस किया है, धीरेधीरे सारी कालोनी जान जाएगी. इसलिए उस स्थिति से बचने के लिए मैं अपने रिश्ते पर विवाह की मुहर लगा कर लोगों के संदेह पर पूर्णविराम लगाना चाहता हूं.

‘‘शुरू में थोड़ी कठिनाई आएगी, लेकिन धीरेधीरे सब भूल जाएंगे. आप मेरे बाकी जीवन की साथी बन जाएंगी तो मेरे जीवन के इस पड़ाव में खालीपन के कारण तथा शरीर के शिथिल होने के कारण जो शून्यता आ गई है, वह खत्म हो जाएगी. इस उम्र की इस से अधिक जरूरत ही क्या है?’’ सुनील ने बड़े सुलझे ढंग से उसे समझाया.

सुहासिनी के पास अब तर्क करने के लिए कुछ भी नहीं बचा था. उस ने आंसूभरी आंखों से हामी भर दी. सलोनी के सिर से मानो मनों बोझ हट गया और वह भावातिरेक में सुनील के गले से लिपट गई.

अब सुहासिनी को अपने बेटे की प्रतिक्रिया की भी चिंता नहीं थी.

जीवन की मुसकान मैं इलाहाबाद में लोकनिर्माण विभाग में स्थानिक अभियंता के पद पर कार्यरत था. एक दिन मैं अपने स्कूटर से साइट निरीक्षण के लिए जा रहा था. मैं ने अपना ब्रीफकेस स्कूटर पर आगे रखा हुआ था, जिस कारण मेरा बायां पैर स्कूटर के बाहर लटका हुआ था.

मैं जब पुल पर पहुंचा, तभी एक स्कूल बस ने मुझे ओवरटेक किया और मेरे स्कूटर से आगे निकलने लगी. उस बस की खिड़की के पास एक 6-7 साल का छात्र बैठा था, उस ने स्कूटर से बाएं लटकते मेरे पैर को देखा और जोरजोर से मुझे आवाज देने लगा, ‘‘अंकल, अपना पैर अंदर कर लें वरना आप को चोट लग जाएगी.’’

इतनी कम उम्र में इतनी समझदारी व मुझ अनजान के प्रति प्रेम देख कर मुझे बहुत प्रसन्नता हुई. मैं ने मन ही मन अच्छे संस्कार देने के लिए उस छात्र के मातापिता व अध्यापकअध्यापिकाओं को धन्यवाद दिया.      राजेश कुमार सक्सेना पूरे 40 वर्षों तक सरकारी नौकरी करने के बाद मैं रिटायर हो गई. तब समकक्ष दोस्तों ने समझाया कि अब इंद्रियां शिथिल होने लगेंगी, इसलिए सक्रिय रहने के लिए स्वाध्याय कीजिए और समाज से जुड़ कर अपने अनुभव को प्रेमपूर्वक बांटिए.

मैं ने ऐसा ही किया और आसपास के इलाकों में घूमघूम कर लोगों से परिचय बढ़ाया. फिर इसी दौरान एक पोलियोग्रस्त युवक से लगाव हो गया. वह तसवीरों को फ्रेम करने का काम करता था और प्रतिदिन विकलांग वाली गाड़ी में बैठ कर महल्ले में घूमता था. उस की दुकान छोटी है, मगर ग्राहकों के बैठने के लिए एक छोटा सा स्टूल रखा हुआ है जिस पर बैठ कर मैं उस से बातें करती थी.

एक दिन पुरस्कारस्वरूप कुछ किताबें और एक प्रशस्तिपत्र कोरियर से मेरे पास आया. इस प्रशस्तिपत्र को फ्रेम कराने के लिए मै उसी युवक के पास गई और अपना पर्स स्टूल पर रख कर बतियाने लगी और फिर घर वापस आ गई.

घर आ कर मुझे अपने पर्स का ध्यान न रहा और दोपहर से शाम तक का वक्त गुजर गया. तभी वह युवक अपनी विकलांग गाड़ी चलाता हुआ मेरे दरवाजे तक आ गया और फ्रेम देने के बाद हंसता हुआ बोला, ‘‘यह लीजिए अपना पर्स, आप वहीं भूल आई थीं.’’

मैं उस की ईमानदारी देख कर हैरान रह गई.

Hindi Story: निकम्मा – जिसे जिंदगीभर कोसा, उसी ने किया इंतजाम

Hindi Story: दीपक 2 साल बाद अपने घर लौटा था. उस का कसबा भी धीरेधीरे शहर के फैशन में डूबा जा रहा था. जब वह स्टेशन पर उतरा, तो वहां तांगों की जगह आटोरिकशा नजर आए. तकरीबन हर शख्स के कान पर मोबाइल फोन लगा था.

शाम का समय हो चुका था. घर थोड़ा दूर था, इसलिए बीच बाजार में से आटोरिकशा जाता था. बाजार की रंगत भी बदल गई थी. कांच के बड़े दरवाजों वाली दुकानें हो गई थीं. 1-2 जगह आदमीऔरतों के पुतले रखे थे. उन पर नए फैशन के कपड़े चढ़े हुए थे. दीपक को इन 2 सालों में इतनी रौनक की उम्मीद नहीं थी. आटोरिकशा चालक ने भी कानों में ईयरफोन लगाया हुआ था, जो न जाने किस गाने को सुन कर सिर को हिला रहा था.

दीपक अपने महल्ले में घुस रहा था, तो बड़ी सी एक किराना की दुकान पर नजर गई, ‘उमेश किराना भंडार’. नीचे लिखा था, ‘यहां सब तरह का सामान थोक के भाव में मिलता है’. पहले यह दुकान भी यहां नहीं थी.

दीपक के लिए उस का कसबा या यों कह लें कि शहर बनता कसबा हैरानी की चीज लग रहा था.

आटोरिकशा चालक को रुपए दे कर जब दीपक घर में घुसा, तो उस ने देखा कि उस के बापू एक खाट पर लेटे हुए थे. अम्मां चूल्हे पर रोटी सेंक रही थीं, जबकि एक ओर गैस का चूल्हा और गैस सिलैंडर रखा हुआ था.

दीपक को आया देख अम्मां ने जल्दी से हाथ धोए और अपने गले से लगा लिया. छोटी बहन, जो पढ़ाई कर रही थी, आ कर उस से लिपट गई.

दीपक ने अटैची रखी और बापू के पास आ कर बैठ गया. बापू ने उस का हालचाल जाना. दीपक ने गौर किया कि घर में पीले बल्ब की जगह तेज पावर वाले सफेद बल्ब लग गए थे. एक रंगीन टैलीविजन आ गया था.

बहन के पास एक टचस्क्रीन मोबाइल फोन था, तो अम्मां के पास एक पुराना मोबाइल फोन था, जिस से वे अकसर दीपक से बातें कर के अपनी परेशानियां सुनाया करती थीं.

शायद अम्मां सोचती हैं कि शहर में सब बहुत खुश हैं और बिना चिंता व परेशानियों के रहते हैं. नल से 24 घंटे पानी आता है. बिजली, सड़क, साफसुथरी दुकानें, खाने से ले कर नाश्ते की कई वैराइटी. शहर यानी रुपया भरभर के पास हो. लेकिन यह रुपया ही शहर में इनसान को मार देता है. रुपयारुपया सोचते और देखते एक समय में इनसान केवल एक मशीन बन कर रह जाता है, जहां आपसी रिश्ते ही खत्म हो जाते हैं. लेकिन अम्मां को वह क्या समझाए?

वैसे, एक बार दीपक अम्मां, बापू और अपनी बहन को ले कर शहर गया था. 3-4 दिनों बाद ही अम्मां ने कह दिया था, ‘बेटा, हमें गांव भिजवा दो.’

बहन की इच्छा जाने की नहीं थी, फिर भी वह साथ लौट गई थी. शहर में रहने का दर्द दीपक समझ सकता है, जहां इनसान घड़ी के कांटों की तरह जिंदगी जीने को मजबूर होता है.

अम्मां ने दीपक से हाथपैर धो कर आने को कह दिया, ताकि सीधे तवे पर से रोटियां उतार कर उसे खाने को दे सकें. बापू को गैस पर सिंकी रोटियां पसंद नहीं हैं, जिस के चलते रोटियां तो चूल्हे पर ही सेंकी जाती हैं. बहन ने हाथपैर धुलवाए. दीपक और बापू खाने के लिए बैठ गए.

दीपक जानता था कि अब बापू का एक खटराग शुरू होगा, ‘पिछले हफ्ते भैंस मर गई. खेती बिगड़ गई. बहुत तंगी में चल रहे हैं और इस साल तुम्हारी शादी भी करनी है…’

दीपक मन ही मन सोच रहा था कि बापू अभी शुरू होंगे और वह चुपचाप कौर तोड़ता जाएगा और हुंकार भरता जाएगा, लेकिन बापू ने इस तरह की कोई बात नहीं छेड़ी थी.

पूरे महल्ले में एक अजीब सी खामोशी थी. कानों में चीखनेचिल्लाने या रोनेगाने की कोई आवाज नहीं आ रही थी, वरना 2 घर छोड़ कर बद्रीनाथ का मकान था, जिन के 2 बेटे थे. बड़ा बेटा गणेश हाईस्कूल में चपरासी था, जबकि दूसरा छोटा बेटा उमेश पोस्ट औफिस में डाक रेलगाड़ी से डाक उतारने का काम करता था.

अचानक न जाने क्या हुआ कि उन के छोटे बेटे उमेश का ट्रांसफर कहीं और हो गया. तनख्वाह बहुत कम थी, इसलिए उस ने जाने से इनकार कर दिया. जाता भी कैसे? क्या खाता? क्या बचाता? इसी के चलते वह नौकरी छोड़ कर घर बैठ गया था.

इस के बाद न जाने किस गम में या बुरी संगति के चक्कर में उमेश को शराब पीने की लत लग गई. पहले तो परिवार वाले बात छिपाते रहे, लेकिन जब आदत ज्यादा बढ़ गई, तो आवाजें चारदीवारी से बाहर आने लगीं.

उमेश ने शराब की लत के चलते चोरी कर के घर के बरतन बेचने शुरू कर दिए, फिर घर से गेहूंदाल और तेल वगैरह चुरा कर और उन्हें बेच कर शराब पीना शुरू कर दिया. जब परिवार वालों ने सख्ती की, तो घर में कलह मचना शुरू हो गया.

उमेश दुबलापतला सा सांवले रंग का लड़का था. जब उस के साथ परिवार वाले मारपीट करते थे, तो वह मुझे कहता था, ‘चाचा, बचा लो… चाचा, बचा लो…’

2-3 दिनों तक सब ठीक चलता, फिर वह शराब पीना शुरू कर देता. न जाने उसे कौन उधार पिलाता था? न जाने वह कहां से रुपए लाता था? लेकिन रात होते ही हम सब को मानो इंतजार होता था कि अब इन की फिल्म शुरू होगी. चीखना, मारनापीटना, गली में भागना और उमेश का चीखचीख कर अपना हिस्सा मांगना… उस के पिता का गालियां देना… यह सब पड़ोसियों के जीने का अंग हो गया था.

इस बीच 1-2 बार महल्ले वालों ने पुलिस को बुला भी लिया था, लेकिन उमेश की हालत इतनी गईगुजरी थी कि एक जोर का थप्पड़ भी उस की जान ले लेता. कौन हत्या का भागीदार बने? सब बालबच्चों वाले हैं. नतीजतन, पुलिस भी खबर होने पर कभी नहीं आती थी.

उमेश को शराब पीते हुए 4-5 साल हो गए थे. उस की हरकतों को सब ने जिंदगी का हिस्सा मान लिया था. जब उस का सुबह नशा उतरता, तो वह नीची गरदन किए गुमसुम रहता था, लेकिन वह क्यों पी लेता था, वह खुद भी शायद नहीं जानता था. महल्ले के लिए वह मनोरंजन का एक साधन था. उस की मित्रमंडली भी नहीं थी. जो कुछ था परिवार, महल्ला और शराब थी. परिवार के सदस्य भी अब उस से ऊब गए थे और उस के मरने का इंतजार करने लगे थे. एक तो निकम्मा, ऊपर से नशेबाज भी.

लेकिन कौऐ के कोसने से जानवर मरता थोड़े ही है. वह जिंदा था और शराब पी कर सब की नाक में दम किए हुए था.

लेकिन आज खाना खाते समय दीपक को पड़ोस से किसी भी तरह की आवाज नहीं आ रही थी. बापू हाथ धोने के लिए जा चुके थे.

दीपक ने अम्मां से रोटी ली और पूछ बैठा, ‘‘अम्मां, आज तो पड़ोस की तरफ से लड़ाईझगड़े की कोई आवाज नहीं आ रही है. क्या उमेश ने शराब पीना छोड़ दिया है?’’

अम्मां ने आखिरी रोटी तवे पर डाली और कहने लगीं, ‘‘तुझे नहीं मालूम?’’

‘‘क्या?’’ दीपक ने हैरानी से पूछा.

‘‘अरे, जिसे ये लोग निकम्मा समझते थे, वह इन सब की जिंदगी बना कर चला गया…’’ अम्मां ने चूल्हे से लकडि़यां बाहर निकाल कर अंगारों पर रोटी को डाल दिया, जो पूरी तरह से फूल गई थी.

‘‘क्या हुआ अम्मां?’’

‘‘अरे, क्या बताऊं… एक दिन उमेश ने रात में खूब छक कर शराब पी, जो सुबह उतर गई होगी. दोबारा नशा करने के लिए वह बाजार की तरफ गया कि एक ट्रक ने उसे टक्कर मार दी. बस, वह वहीं खत्म हो गया.’’

‘‘अरे, उमेश मर गया?’’

‘‘हां बेटा, लेकिन इन्हें जिंदा कर गया. इस हादसे के मुआवजे में उस के परिवार को 18-20 लाख रुपए मिले थे. उन्हीं रुपयों से घर बनवा लिया और तू ने देखा होगा कि महल्ले के नुक्कड़ पर ‘उमेश किराने की दुकान’ खोल ली है. कुछ रुपए बैंक में जमा कर दिए. बस, इन की घर की गाड़ी चल निकली.

‘‘जिसे जिंदगीभर कोसा, उसी ने इन का पूरा इंतजाम कर दिया,’’ अम्मां ने अंगारों से रोटी उठाते हुए कहा.

दीपक यह सुन कर सन्न रह गया. क्या कोई ऐसा निकम्मा भी हो सकता है, जो उपयोगी न होने पर भी किसी की जिंदगी को चलाने के लिए अचानक ही सबकुछ कर जाए? जैसे कोई हराभरा फलदार पेड़ फल देने के बाद सूख जाए और उस की लकडि़यां भी जल कर आप को गरमागरम रोटियां खाने को दे जाएं. हम ऐसी अनहोनी के बारे में कभी सोच भी नहीं सकते.

Family Story: वापसी – क्या पूनम ने दूसरी शादी की?

Family Story, लेखिका – निधि अमित पांडे

आंगन में तुलसी के चबूतरे पर लगी अगरबत्ती की खुशबू ने पूरे घर को महका दिया था. पूनम अभीअभी पूजा कर के रसोईघर में गई ही थी कि दादी मां ने रोज की तरह चिल्लाना शुरू कर दिया था, ‘‘अरी ओ पूनम, पूजापाठ का ढकोसला खत्म हो गया हो, तो चायवाय मिलेगी कि नहीं.

‘‘ऐसे भी कौन सा सुख दिया है ऊपर वाले ने… मेरे हंसतेखेलते परिवार की सारी खुशियां छीन लीं,’’ बोलते हुए दादी मां ने गुस्से से अपनी भंवें सिकोड़ ली थीं.

पूनम ने रसोईघर में से झांकते हुए कहा, ‘‘चाय बन गई है दादी मां, अभी लाती हूं.’’

दादी मां को चाय दे कर पूनम मुड़ी ही थी कि उन्होंने फुसफुसाना शुरू कर दिया, ‘‘आदमी का तो कुछ अतापता नहीं है… जिंदा है भी कि नहीं, फिर भी न जाने क्यों इतना बनसंवर कर रहती है…’’

पूनम ने सबकुछ सुन कर भी अनसुना कर दिया था. और करती भी क्या, उस के दिन की शुरुआत रोज ऐसे ही दादी मां के तीखे शब्दों से होती थी.

दादी मां को चाय देने के बाद पूनम अपने ससुर को चाय देने के लिए उन के कमरे में जाने लगी, तो उन्होंने उसे आवाज दे कर कहा, ‘‘पूनम बेटा, मेरी चाय बाहर ही रख दे, मैं उधर ही आ कर पी लूंगा.’’

‘‘जी पापा,’’ बोल कर पूनम वापस चली आई थी.

पूनम के ससुर शशिकांतजी रिटायर्ड आर्मी अफसर थे. उन का बेटा मोहित

भी सेना में जवान था. पूनम मोहित की पत्नी थी.

3 साल पहले ही मोहित और पूनम का ब्याह हुआ था और ब्याह के

2-4 दिन बाद ही मोहित को किसी खुफिया मिशन पर जाने के लिए सेना में वापस बुला लिया गया था.

इस बात को 3 साल बीत चुके थे, पर अब तक मोहित वापस नहीं लौटा था और न ही उस की कोई खबर आई थी, इसलिए फौज की तरफ से उसे गुमशुदा करार दिया गया था.

मोहित के लापता होने की खबर से शशिकांतजी की पत्नी को गहरा सदमा लगा था, जिस के चलते वे कोमा में चली गई थीं. डाक्टर का कहना था कि मोहित की वापसी ही उन के लिए दवा का काम कर सकती है.

पूनम को यकीन था कि मोहित जिंदा है और एक दिन जरूर वापस आएगा. उस के इस यकीन को कायम रखने के लिए शशिकांतजी पूरा साथ देते थे. उन्हें पूनम का पहनओढ़ कर रहना पसंद था. मोहित के हिस्से का लाड़प्यार भी वे पूनम पर ही लुटाते थे.

पूनम ने फैशन डिजाइनिंग का कोर्स किया हुआ था. उस की शादी के कुछ समय बाद ही उस के ससुर ने एक बुटीक खुलवा दिया था.

तब दादी मां ने इस बात का भरपूर विरोध करते हुए कहा था कि समय काटने के लिए घर के काम कम होते हैं क्या, पर शशिकांतजी ने उन की एक न सुनी थी.

सास की बीमारी के बाद घर के कामकाज की पूरी जिम्मेदारी पूनम के कंधों पर आ गई थी. बुटीक के साथ वह घर भी बखूबी संभाल रही थी. पर दादी मां हमेशा उस से नाराज ही रहती थीं. उन्हें पूनम का साजसिंगार करना, गाड़ी चलाना, बुटीक जाना बिलकुल नहीं सुहाता था. वे पूनम को ताने मारने का एक भी मौका अपने हाथों से जाने नहीं देती थीं.

समय बीतता जा रहा था. मोहित की मां की तबीयत में कोई सुधार नहीं था. इस बीच पूनम के मातापिता कई बार उसे अपने साथ घर ले जाने के लिए आए, पर हर बार उन्हें खाली हाथ ही लौटना पड़ा.

पूनम का कहना था कि मोहित वापस आएगा तो उसे यहां न पा कर परेशान होगा और उस के परिवार की जिम्मेदारी भी अब मेरी है. अब ससुराल ही मेरा मायका है.

शशिकांतजी को पूनम की ऐसी सोच  और समझदारी पर बहुत गर्व होता था.

एक दिन शशिकांतजी के करीबी दोस्त कर्नल मोहन घर आए और बोले, ‘‘शशि, मैं एक प्रस्ताव ले कर तेरे पास आया हूं.’’

‘‘कैसा प्रस्ताव?’’ शशिकांतजी ने पूछा.

इस के बाद उन दोनों दोस्तों ने बहुत देर तक साथ में समय बिताया और बातें कीं, फिर कर्नल मोहन जातेजाते बोले, ‘‘मुझे तेरे जवाब का इंतजार रहेगा.’’

कर्नल मोहन के जाने के बाद शशिकांतजी काफी दिन तक किसी गहरी सोच में डूबे रहे.

पूनम ने कई बार पूछने की कोशिश की, पर उन्होंने ‘चिंता की कोई बात नहीं’ बोल कर उसे टाल दिया. पर मन ही मन वे पूनम के लिए एक बड़ा फैसला ले चुके थे, जिस की चर्चा पूनम के मातापिता से करने के लिए आज वे उस के मायके जा रहे थे. पूनम इस बात से पूरी तरह बेखबर थी.

पूनम के बुटीक जाते ही शशिकांतजी घर से निकल गए थे. उन्हें अचानक यों देख कर पूनम के मातापिता थोड़े चिंतित हो उठे थे.

पूनम के पिताजी ने हाथ जोड़ कर शशिकांतजी से पूछा, ‘‘आप अचानक यहां? सब ठीक तो है न?’’

‘‘हांहां, सब ठीक है. चिंता की कोई बात नहीं…’’ शशिकांतजी बोले, ‘‘मैं ने पूनम के लिए एक फैसला लिया है, जिस में आप दोनों की राय लेना जरूरी था.’’

यह सुन कर पूनम के मातापिता एकदूसरे की तरफ हैरानी से देखने लगे.

पूनम की मां ने बड़े ही उतावलेपन से पूछा, ‘‘कैसा फैसला भाई साहब?’’

शशिकांतजी ने कहा, ‘‘पूनम के दूसरे ब्याह का फैसला.’’

‘‘यह आप क्या कह रहे हैं… यह कैसे मुमकिन है…’’ पूनम के पिता ने हैरानी से कहा.

शशिकांतजी बोले, ‘‘क्यों मुमकिन नहीं है? मोहित की वापसी अब एक सपने जैसी है. चार दिन की शादी को निभाने के लिए पूनम अपनी पूरी जिंदगी अकेलेपन के हवाले कर दे, ऐसा मैं नहीं होने दे सकता. उस बच्ची के विश्वास पर अपने यकीन की मोहर अब और नहीं लगा सकता. बिना किसी कुसूर के वह एक अधूरेपन की सजा क्यों काटेगी…’’

‘‘पर भाई साहब…’’ पूनम की मां ने बीच में बोलना चाहा, तो शशिकांतजी ने उन्हें रोकते हुए कहा, ‘‘माफ कीजिएगा, पर मेरी बात अभी पूरी नहीं हुई है.’’

इतना कह कर वे आगे बोले, ‘‘मैं अपने बेटे के मोह में पूनम के भविष्य की बलि नहीं चढ़ने दूंगा. आज मेरी जगह  मोहित भी होता तो पूनम के लिए इस तरह की अधूरी जिंदगी उसे कभी स्वीकार नहीं होती.

‘‘आप दोनों ने उसे जन्म दिया है. उस की जिंदगी का इतना बड़ा फैसला लेने के पहले आप को इस की सूचना देना मेरा फर्ज था, इसलिए चला आया वरना पूनम का कन्यादान करने का फैसला मैं ले चुका हूं. अब इजाजत चाहता हूं.’’

शशिकांतजी के जाने के बाद पूनम के मातापिता बहुत देर तक सोचते रहे कि वे अपनी बेटी के भविष्य के बारे में इतनी गहराई से नहीं सोच पाए, पर शशिकांतजी जैसे लोग बहू को बेटी की जगह रख कर अपनी सोच का लैवल कितना ऊपर उठाए हुए हैं. पूनम के दूसरे ब्याह के बारे में सोचते समय मोहित का चेहरा न जाने कितनी बार उन की आंखों के सामने घूमा होगा.

पूनम के मायके से लौटने के बाद शशिकांतजी अपने कमरे से बाहर नहीं आए थे. पूनम शाम की चाय ले कर उन के कमरे में ही चली गई थी.

चाय का कप टेबल पर रखते हुए उस ने पूछा, ‘‘क्या हुआ पापा? तबीयत ठीक नहीं है क्या?’’

‘‘सब ठीक है बेटा,’’ उन्होंने जवाब दिया और कहा, ‘‘आ, थोड़ी देर मेरे पास बैठ. तुझ से कुछ बात करनी है.’’

‘‘जी पापा,’’ बोल कर पूनम उन के पास बैठ गई.

शशिकांतजी ने एक गहरी सांस ली और बोलना शुरू किया, ‘‘मोहित की गैरमौजूदगी में तू ने इस घर की जिम्मेदारियों के साथसाथ हम सब को भी बहुत अच्छे से संभाला है. अपने छोटेबड़े हर फर्ज को तू ने प्यार और अपनेपन से निभाया है.

‘‘इतना ही नहीं, अपनी दादी मां के रूखे बरताव के बाद भी तू कभी उन की सेवा करने से पीछे नहीं हटी. अगर मैं यह कहूं कि मोहित की कमी तू ने कभी महसूस ही नहीं होने दी, तो यह गलत नहीं होगा.

‘‘पर अब नहीं बेटा. मैं चाहता हूं कि  मोहित की चंद यादों का जो दायरा तू ने अपने आसपास बना रखा है, उसे तोड़ कर तू बाहर निकले और जिंदगी में आगे बढ़े…’’

पूनम ने कहा, ‘‘आज अचानक ऐसी बातें क्यों कर रहे हैं आप? कुछ हुआ है क्या? मोहित की कोई खबर आई क्या? बोलिए न पापा, क्या हुआ है?’’ पूनम बेचैन हो उठी थी.

शशिकांतजी ने भरे हुए गले से कहा, ‘‘कोई खबर नहीं आई मोहित की और न ही आएगी. उस की वापसी की उम्मीद अब छोड़नी होगी हमें.’’

पूनम जोर से चिल्लाते हुए बोली, ‘‘नहीं पापा, ऐसा मत कहिए…’’

इतने सालों से पति के बिछड़ने का दर्द जो उस ने अपने अंदर दबा कर रखा था, वह आज आंसुओं की धार के साथ बहता जा रहा था.

शशिकांतजी ने पूनम के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, ‘‘आज यह लाचार और बेबस पिता तुझ से कुछ मांगना चाहता है बेटा, मना मत करना. बहुत सोचसमझ कर मैं ने तेरा कन्यादान करने का फैसला लिया है.’’

पूनम ने चौंकते हुए कहा, ‘‘पापा, आप भी…’’ कमरे से बाहर जातेजाते वह रुकी और बोली, ‘‘आप गलत कह रहे हैं पापा, अगर मोहित की कमी मैं पूरी कर पाती तो मम्मी आज अस्पताल में कोमा में न होतीं, दादी मां को मुझ से इतनी नफरत न होती और आज आप मुझे इस घर से विदा करने की बात नहीं करते,’’ ऐसा बोल कर वह तेजी से कमरे से बाहर निकल गई.

पूनम के जाने के बाद शशिकांतजी सोच में पड़ गए थे कि ‘आप भी’ से पूनम का क्या मतलब था?

इस बात को 8 दिन बीत चुके थे. शशिकांतजी अपने फैसले पर अटल थे. उन के इस फैसले से दादी मां बहुत नाराज थीं और दादी मां ने उन से बात करना बंद कर दिया था, पर उन्होंने हार नहीं मानी थी.

शशिकांतजी एक बार फिर पूनम को समझाने की उम्मीद से उस के बुटीक पहुंच गए थे.

उन्हें देखते ही पूनम ने कहा, ‘‘अरे पापा, आप यहां कैसे?’’

‘‘कुछ नहीं बेटा, शाम की सैर के लिए निकला था…’’ शशिकांतजी बोले, ‘‘सोचा कि तुझे देख लेता हूं… तेरा काम खत्म हो गया होगा, तो साथ में घर चलेंगे.’’

पूनम ने कहा, ‘‘पापा, मुझे थोड़ा समय और लगेगा.’’

‘‘ठीक है…’’ शशिकांतजी बोले, ‘‘मैं बाहर तेरा इंतजार करता हूं, आ जाना.’’

थोड़ी देर बाद बुटीक बंद कर के पूनम अपनी कार ले कर बाहर आ गई. शशिकांतजी ने उस से कहा, ‘‘आज मैं गाड़ी चलाता हूं.’’

कार चलाते हुए शशिकांतजी ने फिर अपनी बात शुरू की और पूनम से कहा, ‘‘तू ने मेरी बात का कोई जवाब नहीं दिया बेटा… और उस दिन तू ने ‘आप भी’ ऐसा क्यों कहा था?’’

पूनम ने कहा, ‘‘मोहित ने मिशन पर जाने से पहले मुझे कसम दी थी कि अगर वह वापस नहीं लौटा तो मैं उस के इंतजार में अपनी पूरी जिंदगी नहीं निकालूंगी और एक नई शुरुआत करूंगी. उस दिन आप ने भी वही बात कह दी. आप ही की तरह शायद वह भी मुझे अपने से दूर करना चाहता था.’’

शशिकांतजी को इस बात की बहुत खुशी हो रही थी कि मोहित के बारे में उन की सोच गलत नहीं थी. वह भी पूनम के लिए इस तरह की अधूरी जिंदगी नहीं चाहता था.

शशिकांतजी अपने फैसले पर अब और ज्यादा मजबूत हो गए थे. उन्होंने बात को आगे बढ़ाते हुए कहा, ‘‘तुझे याद है, कुछ दिन पहले कर्नल मोहन अपने घर आए थे. वे अपने बेटे गौरव के लिए तेरा हाथ मांगने आए थे.

‘‘गौरव की पहली पत्नी की शादी के 4 महीने बाद ही मौत हो गई थी. वह अमेरिका में बहुत बड़ी कंपनी में काम करता है. वह अभी यहीं है और कुछ दिन बाद वापस जाने वाला है, इसलिए उन्हें शादी की जल्दी है.

‘‘कर्नल मोहन को मैं बहुत सालों से जानता हूं. वे बेहद सुलझे और समझदार लोग हैं. तू बहुत खुश रहेगी… और तुझे तो गौरव के साथ अमेरिका में ही रहना होगा. इस रिश्ते के लिए हां कह दे बेटा,’’ शशिकांतजी ने जोर देते हुए पूनम से कहा.

पूनम ने जवाब दिया, ‘‘मुझे नहीं पता था पापा कि आप के लाड़प्यार का

कर्ज मुझे एक दिन आप से दूर जा कर चुकाना पड़ेगा.’’

शशिकांतजी ने पूनम और गौरव का रिश्ता तय कर दिया. पूनम के मातापिता को भी खबर कर दी गई.

शादी का दिन आ चुका था. बंगले की सजावट शशिकांतजी ने पूनम की पसंद के लाल गुलाब के फूलों से कराई थी.

बरात जैसे ही बंगले के सामने पहुंची, तो शशिकांतजी ने सभी का स्वागत किया. थोड़ी देर बाद पूनम की मां उसे मंडप में ले जाने के लिए आईं, तो पूनम ने कस कर अपनी मां के हाथों को पकड़ा और कहा, ‘‘मुझ से यह नहीं होगा मां. मेरा मन बहुत घबरा रहा है. पता नहीं, क्यों बारबार ऐसा लग रहा है कि मोहित यहींकहीं आसपास है.

‘‘मैं किसी और से शादी नहीं कर सकती. यह सब होने से रोक दो मां,’’ पूनम अपनी मां के सामने हाथ जोड़ कर रोते हुए बोली और बेसुध हो कर जमीन पर गिर पड़ी.

पूनम की मां उस के बेसुध होने की सूचना देने बाहर आईं, तो उन्होंने देखा कि फौज की एक गाड़ी बंगले के बाहर आ कर रुकी है. उस गाड़ी में से सेना के 2 जवान उतरे, फिर उन्होंने हाथ पकड़ कर काला चश्मा पहने एक शख्स को गाड़ी से नीचे उतारा.

विवाह समारोह में आए सभी लोगों  की नजरें बड़ी हैरानी से उस शख्स

को देख रही थीं. उसे देखते ही शशिकांतजी की आंखों से आंसुओं का सैलाब उमड़ पड़ा.

‘‘मोहित… मेरे बेटे, तू ने बहुत इंतजार कराया,’’ बोलते हुए शशिकांतजी ने उसे अपने सीने से लगा कर बेटे की वापसी की तड़प को शांत कर दिया.

पूनम की मां खुशी से भागते हुए अंदर गईं और उन्होंने पूनम के ऊपर पानी के छींटे मारे, फिर जोर से उसे झकझोर कर बोलीं, ‘‘उठ बेटा, बाहर जा कर देख… तेरे विश्वास ने आज तेरे सुहाग की वापसी कर ही दी.’’

पूनम सभी मर्यादाओं को लांघ कर गिरतीपड़ती भागते हुए बाहर गई और मोहित से जा लिपटी. वह फूटफूट कर रोते हुए बोली, ‘‘आखिर आप ने मेरे यकीन की इज्जत रख ही ली मोहित.’’

शोरगुल की आवाज से दादी मां भी बाहर आ गई थीं और मोहित को देख कर अपने आंसुओं के बहाव को रोक नहीं पाई थीं.

मोहित ने पूनम से कहा, ‘‘मेरी वापसी एक अधूरेपन के साथ हुई है पूनम. लड़ाई में मैं अपनी दोनों आंखें गंवा चुका हूं. जिसे अब खुद हर समय सहारे की जरूरत पड़ेगी वह तुम्हारा सहारा क्या बनेगा.’’

पूनम ने चिल्लाते हुए कहा, ‘‘यह कैसी बात कर रहे हैं आप. हम पूरी जिंदगी के साथी हैं. हमें एकदूसरे के सहारे और हमदर्दी की नहीं, बल्कि साथ की जरूरत है…’’ इतना कह कर पूनम ने अपना हाथ मोहित के आगे बढ़ाया और कहा, ‘‘आप देंगे न मेरा साथ?’’

गौरव इतनी देर से दूर खड़ा हो कर सब देख रहा था. उस ने मोहित का हाथ पकड़ कर अपने हाथों से पूनम के हाथ में दे दिया.

पूनम कर्नल मोहन के पास गई और हाथ जोड़ कर बोली, ‘‘मुझे माफ कर दीजिए अंकल. इस घर और मोहित को छोड़ कर मैं कहीं नहीं जा सकती.’’

कर्नल मोहन ने पूनम के सिर पर अपना हाथ रख दिया.

Family Story: लक्ष्मण रेखा – मिसेज राजीव कैसे बन गई धैर्य का प्रतिबिंब

Family Story: मेहमानों की भीड़ से घर खचाखच भर गया था. एक तो शहर के प्रसिद्ध डाक्टर, उस पर आखिरी बेटे का ब्याह. दोनों तरफ के मेहमानों की भीड़ लगी हुई थी. इतना बड़ा घर होते हुए भी वह मेहमानों को अपने में समा नहीं पा रहा था. कुछ रिश्ते दूर के होते हुए भी या कुछ लोग बिना रिश्ते के भी बहुत पास के, अपने से लगने लगते हैं और कुछ नजदीकी रिश्ते के लोग भी पराए, बेगाने से लगते हैं, सच ही तो है. रिश्तों में क्या धरा है? महत्त्व तो इस बात का है कि अपने व्यक्तित्व द्वारा कौन किस को कितना आकृष्ट करता है.

तभी तो डाक्टर राजीव के लिए शुभदा उन की कितनी अपनी बन गई थी. क्या लगती है शुभदा उन की? कुछ भी तो नहीं. आकर्षक व्यक्तित्व के धनी डाक्टर राजीव सहज ही मिलने वालों को अपनी ओर आकर्षित कर लेते हैं. उन की आंखों में न जाने ऐसा कौन सा चुंबकीय आकर्षण है जो देखने वालों की नजरों को बांध सा देता है. अपने समय के लेडीकिलर रहे हैं डाक्टर राजीव. बेहद खुशमिजाज. जो भी युवती उन्हें देखती, वह उन जैसा ही पति पाने की लालसा करने लगती. डाक्टर राजीव दूल्हा बन जब ब्याहने गए थे, तब सभी लोग दुलहन से ईर्ष्या कर उठे थे. क्या मिला है उन्हें ऐसा सजीला गुलाब सा दूल्हा. गुलाब अपने साथ कांटे भी लिए हुए है, यह कुछ सालों बाद पता चला था. अपनी सुगंध बिखेरता गुलाब अनायास कितने ही भौंरों को भी आमंत्रित कर बैठता है. शुभदा भी डाक्टर राजीव के व्यक्तित्व से प्रभावित हो कर उन की तरफ खिंची चली आई थी.

बौद्धिक स्तर पर आरंभ हुई उन की मित्रता दिनप्रतिदिन घनिष्ठ होती गई थी और फिर धीरेधीरे दोनों एकदूसरे के लिए अपरिहार्य बन गए थे. मिसेज राजीव पति के बौद्धिक स्तर पर कहीं भी तो नहीं टिकती थीं. बहुत सीधे, सरल स्वभाव की उषा बौद्धिक स्तर पर पति को न पकड़ पातीं, यों उन का गठा बदन उम्र को झुठलाता गौरवर्ण, उज्ज्वल ललाट पर सिंदूरी गोल बड़ी बिंदी की दीप्ति ने बढ़ती अवस्था की पदचाप को भी अनसुना कर दिया था. गहरी काली आंखें, सीधे पल्ले की साड़ी और गहरे काले केश, वे भारतीयता की प्रतिमूर्ति लगती थीं. बहुत पढ़ीलिखी न होने पर भी आगंतुक सहज ही बातचीत से उन की शिक्षा का परिचय नहीं पा सकता था. समझदार, सुघड़, सलीकेदार और आदर्श गृहिणी. आदर्श पत्नी व आदर्श मां की वे सचमुच साकार मूर्ति थीं. उन से मिलते ही दिल में उन के प्रति अनायास ही आकर्षण, अपनत्व जाग उठता, आश्चर्य होता था यह देख कर कि किस आकर्षण से डाक्टर राजीव शुभदा की तरफ झुके. मांसल, थुलथुला शरीर, उम्र को जबरन पीछे ढकेलता सौंदर्य, रंगेकटे केश, नुची भौंहें, निरंतर सौंदर्य प्रसाधनों का अभ्यस्त चेहरा. असंयम की स्याही से स्याह बना चेहरा सच्चरित्र, संयमी मिसेज राजीव के चेहरे के सम्मुख कहीं भी तो नहीं टिकता था.

एक ही उम्र के माइलस्टोन को थामे खड़ी दोनों महिलाओं के चेहरों में बड़ा अंतर था. कहते हैं सौंदर्य तो देखने वालों की आंखों में होता है. प्रेमिका को अकसर ही गिफ्ट में दिए गए महंगेमहंगे आइटम्स ने भी प्रतिरोध में मिसेज राजीव की जबान नहीं खुलवाई. प्रेमी ने प्रेमिका के भविष्य की पूरी व्यवस्था कर दी थी. प्रेमिका के समर्पण के बदले में प्रेमी ने करोड़ों रुपए की कीमत का एक घर बनवा कर उसे भेंट किया था. शाहजहां की मलिका तो मरने के बाद ही ताजमहल पा सकी थी, पर शुभदा तो उस से आगे रही. प्रेमी ने प्रेमिका को उस के जीतेजी ही ताजमहल भेंट कर दिया था. शहरभर में इस की चर्चा हुई थी. लेकिन डाक्टर राजीव के सधे, कुशल हाथों ने मर्ज को पकड़ने में कभी भूल नहीं की थी. उस पर निर्धनों का मुफ्त इलाज उन्हें प्रतिष्ठा के सिंहासन से कभी नीचे न खींच सका था.

जिंदगी को जीती हुई भी जिंदगी से निर्लिप्त थीं मिसेज राजीव. जरूरत से भी कम बोलने वाली. बरात रवाना हो चुकी थी. यों तो बरात में औरतें भी गई थीं पर वहां भी शुभदा की उपस्थिति स्वाभाविक ही नहीं, अनिवार्य भी थी. मिसेज राजीव ने ‘घर अकेला नहीं छोड़ना चाहिए’ कह कर खुद ही शुभदा का मार्ग प्रशस्त कर दिया था. मां मिसेज राजीव की दूर की बहन लगती हैं. बड़े आग्रह से पत्र लिख उन्होंने हमें विवाह में शामिल होने का निमंत्रण भेजा था. सालों से बिछुड़ी बहन इस बहाने उन से मिलने को उत्सुक हो उठी थी.

बरात के साथ न जा कर मिसेज राजीव ने उस स्थिति की पुनरावृत्ति से बचना चाहा था जिस में पड़ कर उन्हें उस दिन अपनी नियति का परिचय प्राप्त हो गया था. डाक्टर राजीव काफी दिनों से अस्वस्थ चल रहे थे. डाक्टरों के अनुसार उन का एक छोटा सा औपरेशन करना जरूरी था. औपरेशन का नाम सुनते ही लोगों का दिल दहल उठता है.

परिणामस्वरूप ससुराल से भी रिश्तेदार उन्हें देखने आए थे. अस्पताल में शुभदा की उपस्थिति, उस पर उसे बीमार की तीमारदारी करती देख ताईजी के तनबदन में आग लग गई थी. वे चाह कर भी खुद को रोक न सकी थीं. ‘कौन होती हो तुम राजीव को दवा पिलाने वाली? पता नहीं क्याक्या कर के दिनबदिन इसे दीवाना बनाती जा रही है. इस की बीवी अभी मरी नहीं है,’ ताईजी के कर्कश स्वर ने सहसा ही सब का ध्यान आकर्षित कर लिया था.

अपराधिनी सी सिर झुकाए शुभदा प्रेमी के आश्वासन की प्रतीक्षा में दो पल खड़ी रह सूटकेस उठा कर चलने लगी थी कि प्रेमी के आंसुओं ने उस का मार्ग अवरुद्ध कर दिया था. उषा पूरे दृश्य की साक्षी बन कर पति की आंखों की मौन प्रार्थना पढ़ वहां से हट गई थी. पत्नी के जीवित रहते प्रेमिका की उपस्थिति, सबकुछ कितना साफ खुला हुआ. कैसी नारी है प्रेमिका? दूसरी नारी का घर उजाड़ने को उद्यत. कैसे सब सहती है पत्नी? परनारी का नाम भी पति के मुख से पत्नी को सहन नहीं हो पाता. सौत चाहे मिट्टी की हो या सगी बहन, कौन पत्नी सह सकी है?

पिता का आचरण बेटों को अनजान?े ही राह दिखा गया था. मझले बेटे के कदम भी बहकने लगे थे. न जाने किस लड़की के चक्कर में फंस गया था कि चतुर शुभदा ने बिगड़ती बात को बना लिया. न जाने किन जासूसों के बूते उस ने अपने प्रेमी के सम्मान को डूबने से बचा लिया. लड़के की प्रेमिका को दूसरे शहर ‘पैक’ करा के बेटे के पैरों में विवाह की बेडि़यां पहना दीं. सभी ने कल्पना की थी बापबेटे के बीच एक जबरदस्त हंगामा होने की, पर पता नहीं कैसा प्रभुत्व था पिता का कि बेटा विवाह के लिए चुपचाप तैयार हो गया. ‘ईर्ष्या और तनावों की जिंदगी में क्यों घुट रही हो?’ मां ने उषा को कुरेदा था.

एकदम चुप रहने वाली मिसेज राजीव उस दिन परत दर परत प्याज की तरह खुलती चली गई थीं. मां भी बरात के साथ नहीं गई थीं. घर में 2 नौकरों और उन दोनों के अलावा और कोई नहीं था. इतने लंबे अंतराल में इतना कुछ घटित हो गया, मां को कुछ लिखा भी नहीं. मातृविहीन सौतेली मां के अनुशासन में बंधी उषा पतिगृह में भी बंदी बन कर रह गई थी. मां ने उषा की दुखती रग पर हाथ धर दिया था. वर्षों से मन ही मन घुटती मिसेज राजीव ने मां का स्नेहपूर्ण स्पर्श पा कर मन में दबी आग को उगल दिया था. ‘मैं ने यह सब कैसे सहा, कैसे बताऊं? पति पत्नी को मारता है तो शारीरिक चोट ही देता है, जिसे कुछ समय बाद पत्नी भूल भी जाती है पर मन की चोट तो सदैव हरी रहती है. ये घाव नासूर बनते जाते हैं, जो कभी नहीं भरते.

‘पत्नीसुलभ अधिकारों को पाने के लिए विद्रोह तो मैं ने भी करना चाहा था पर निर्ममता से दुत्कार दी गई. जब सभी राहें बंद हों तो कोई क्या कर सकता है? ‘ऊपर से बहुत शांत दिखती हूं न? ज्वालामुखी भी तो ऊपर से शांत दिखता है, लेकिन अपने अंदर वह जाने क्याक्या भरे रहता है. कलह से कुछ बनता नहीं. डरती हूं कि कहीं पति को ही न खो बैठूं. आज वे उसे ब्याह कर मेरी छाती पर ला बिठाएं या खुद ही उस के पास जा कर रहने लगें तो उस स्थिति में मैं क्या कर लूंगी?

‘अब तो उस स्थिति में पहुंच गई हूं जहां मुझे कुछ भी खटकता नहीं. प्रतिदिन बस यही मनाया करती हूं कि मुझे सबकुछ सहने की अपारशक्ति मिले. कुदरत ने जिंदगी में सबकुछ दिया है, यह कांटा भी सही. ‘नारी को जिंदगी में क्या चाहिए? एक घर, पति और बच्चे. मुझे भी यह सभीकुछ मिला है. समय तो उस का खराब है जिसे कुदरत कुछ देती हुई कंजूसी कर गई. न अपना घर, न पति और न ही बच्चे. सिर्फ एक अदद प्रेमी.’

उषा कुछ रुक कर धीमे स्वर में बोली, ‘दीदी, कृष्ण की भी तो प्रेमिका थी राधा. मैं अपने कृष्ण की रुक्मिणी ही बनी रहूं, इसी में संतुष्ट हूं.’ ‘लोग कहते हैं, तलाक ले लो. क्या यह इतना सहज है? पुरुषनिर्मित समाज में सब नियम भी तो पुरुषों की सुविधा के लिए ही होते हैं. पति को सबकुछ मानो, उन्हें सम्मान दो. मायके से स्त्री की डोली उठती है तो पति के घर से अर्थी. हमारे संस्कार तो पति की मृत्यु के साथ ही सती होना सिखाते हैं. गिरते हुए घर को हथौड़े की चोट से गिरा कर उस घर के लोगों को बेघर नहीं कर दिया जाता, बल्कि मरम्मत से उस घर को मजबूत बना उस में रहने वालों को भटकने से बचा लिया जाता है.

‘तनाव और घुटन से 2 ही स्थितियों में छुटकारा पाया जा सकता है या तो उस स्थिति से अपने को अलग करो या उस स्थिति को अपने से काट कर. दोनों ही स्थितियां इतनी सहज नहीं. समाज द्वारा खींची गई लक्ष्मणरेखा को पार कर सकना मेरे वश की बात नहीं.’

मिसेज राजीव के उद्गार उन की समझदारी के परिचायक थे. कौन कहेगा, वे कम पढ़ीलिखी हैं? शिक्षा की पहचान क्या डिगरियां ही हैं?

बरात वापस आ गई थी. घर में एक और नए सदस्य का आगमन हुआ था. बेटे की बहू वास्तव में बड़ी प्यारी लग रही थी. बहू के स्वागत में उषा के दिल की खुशी उमड़ी पड़ रही थी. रस्म के मुताबिक द्वार पर ही बहूबेटे का स्वागत करना होता है. बहू बड़ों के चरणस्पर्श कर आशीर्वाद पाती है. सभी बड़ों के पैर छू आशीष द्वार से अंदर आने को हुआ कि किसी ने व्यंग्य से चुटकी ली, ‘‘अरे भई, इन के भी तो पैर छुओ. ये भी घर की बड़ी हैं.’’ शुभदा स्वयं हंसती हुई आ खड़ी हुई. आशीष के चेहरे की हर नस गुस्से में तन गई. नया जवान खून कहीं स्थिति को अप्रिय ही न बना दे, बेटे के चेहरे के भाव पढ़ते हुए मिसेज राजीव ने आशीष के कंधों पर हाथ रखते हुए कहा, ‘‘बेटा, आगे बढ़ कर चरणस्पर्श करो.’’

काम की व्यस्तता व नई बहू के आगमन की खुशी में सभी यह बात भूल गए पर आशीष के दिल में कांटा पड़ गया, मां की रातों की नींद छीनने वाली इस नारी के प्रति उस के दिल में जरा भी स्थान नहीं था. शाम को घर में पार्टी थी. रंगबिरंगी रोशनियों से फूल वाले पौधों और फलदार व सजावटी पेड़ों से आच्छादित लौन और भी आकर्षक लग रहा था. शुभदा डाक्टर राजीव के साथ छाया सी लगी हर काम में सहयोग दे रही थी. आमंत्रित अतिथियों की लिस्ट, पार्टी का मीनू सभीकुछ तो उस के परामर्श से बना था.

शहनाई का मधुर स्वर वातावरण को मोहक बना रहा था. शहर के मान्य व प्रतिष्ठित लोगों से लौन खचाखच भर गया था. नईनेवली बहू संगमरमर की तराशी मूर्ति सी आकर्षक लग रही थी, देखने वालों की नजरें उस के चेहरे से हटने का नाम ही नहीं लेती थीं. एक स्वर से दूल्हादुलहन व पार्टी की प्रशंसा की जा रही थी. साथ ही, दबे स्वरों में हर व्यक्ति शुभदा का भी जिक्र छेड़ बैठता. ‘‘यही हैं न शुभदा, नीली शिफौन की साड़ी में?’’ डाक्टर राजीव के बगल में आ खड़ी हुई शुभदा को देखते ही किसी ने पूछा.

‘‘डाक्टर राजीव ने क्या देखा इन में? मिसेज राजीव को देखो न, इस उम्र में भी कितनी प्यारी लगती हैं.’’ ‘‘तुम ने सुना नहीं, दिल लगा गधी से तो परी क्या चीज?’’

‘‘शुभदा ने शादी नहीं की?’’ ‘‘शादी की होती तो अपने पति की बगल में खड़ी होती, डाक्टर राजीव के पास क्या कर रही होती?’’ किसी ने चुटकी ली, ‘‘मजे हैं डाक्टर साहब के, घर में पत्नी का और बाहर प्रेमिका का सुख.’’

घर के लोग चर्चा का विषय बनें, अच्छा नहीं लगता. ऐसे ही एक दिन आशीष घर आ कर मां पर बड़ा बिगड़ा था. पिता के कारण ही उस दिन मित्रों ने उस का उपहास किया था. ‘‘मां, तुम तो घर में बैठी रहती हो, बाहर हमें जलील होना पड़ता है. तुम यह सब क्यों सहती हो? क्यों नहीं बगावत कर देतीं? सबकुछ जानते हुए भी लोग पूछते हैं, ‘‘शुभदा तुम्हारी बूआ है? मन करता है सब का मुंह नोच लूं. अपने पैरों पर खड़ा हो जाऊं तो मैं तुम्हें अपने साथ ले जाऊंगा. तुम यहां नहीं रहोगी.’’

मां निशब्द बैठी मन की पीड़ा, अपनी बेबसी को आंखों की राह बहे जाने दे रही थी. बच्चे दुख पाते हैं तो मां पर उबल पड़ते हैं. वह किस पर उबले? नियति तो उस की जिंदगी में पगपग पर मुंह चिढ़ा रही थी. बेटी साधना डिलीवरी के लिए आई हुई थी. उस के पति ने लेने आने को लिखा तो उस ने घर में शुभदा की उपस्थित को देख, कुछ रुक कर आने को लिख दिया था. ससुराल में मायका चर्चा का विषय बने, यह कोईर् लड़की नहीं चाहती. उसी स्थिति से बचने का वह हर प्रयत्न कर रही थी. पर इतनी लंबी अवधि के विरह से तपता पति अपनी पत्नी को विदा कराने आ ही पहुंचा.

शुभदा का स्थान घर में क्या है, यह उस से छिपा न रह सका. स्थिति को भांप कर ही चतुर विवेक ने विदा होते समय सास और ससुर के साथसाथ शुभदा के भी चरण स्पर्श कर लिए. पत्नी गुस्से से तमतमाती हुई कार में जा बैठी और जब विवेक आया तो एकदम गोली दागती हुई बोली, ‘‘तुम ने उस के पैर क्यों छुए?’’ पति ने हंसते हुए चुटकी ली, ‘‘अरे, वह भी मेरी सास है.’’

साधना रास्तेभर गुमसुम रही. बहुत दिनों बाद सुना था आशीष ने मां को अपने साथ चलने के लिए बहुत मनाया था पर वह किसी भी तरह जाने को राजी नहीं हुई. लक्ष्मणरेखा उन्हें उसी घर से बांधे रही.

आंतरिक साहस के अभाव में ही मिसेज राजीव उसी घर से पति के साथ बंधी हैं. रातभर छटपटाती हैं, कुढ़ती हैं, फिर भी प्रेमिका को सह रही हैं सुबहशाम की दो रोटियों और रात के आश्रय के लिए. वे डरपोक हैं. समाज से डरती हैं, संस्कारों से डरती हैं, इसीलिए उन्होंने जिंदगी से समझौता कर लिया है. सुना था, इतनी असीम सहनशक्ति व धैर्य केवल पृथ्वी के पास ही है पर मेरे सामने तो मिसेज राजीव असीम सहनशीलता का साक्षात प्रमाण है.

Family Story: झुनझुना – आखिर क्यों रिना को गुस्सा नहीं आता था

Family Story: आत्मनिर्भर बनने के भाषण ने नेताओं जैसे गुणों वाले मेरे घर के 3 तेज बुद्धि वालों को और सयाना बना दिया. भाषण का असर किसी पर हुआ हो या न, इन 3 सयानों के चेहरों की चमक देखने वाली थी.

मैं चुप रही. कोरोना टाइम में चौबीसों घंटे सब को झेलझेल कर इन की नसनस पहचानने लगी हूं. रातदिन देख रही हूं सब को. सरकार सा हो गया है घर मेरा. करनाधरना कम, शोर ज्यादा.

मुझे अपना अस्तित्व किसी मूर्ख, गरीब जनता जैसा लगता है. एक जरूरी काम बताती हूं, तो ये दस जगह ध्यान भटकाने की कोशिश करते हैं. कोशिश रहती है कि कोई जिम्मेदारी इन के ऊपर न आए. कोरोनाकाल में आजकल हाउसहैल्प नहीं है, तो इन सयानों को घर के कामों में कम से कम ही हाथ बंटाना पड़े.

मयंक कहने लगे, “रीना, वैसे सब काम मैनेज हो ही रहा है न, तो अब तुम पूरी तरह से आत्मनिर्भर हो गई हो. अब तो तुम्हें आशाबाई की भी जरूरत नहीं लगती न, प्राउड औफ़ यू, डिअर.”

मैं फुंफकारी, ”उस के बिना हालत खराब है मेरी. चुपचाप काम किए जा रही हूं, तो इस का मतलब यह नहीं कि बहुत अच्छा लग रहा है. तुम तीनों तो किसी काम को हाथ तक नहीं लगाना चाहते. पता नहीं कैसे इतने सौलिड बहाने देते हो कि चुप ही हो जाती हूं.‘’

मलय को अचानक कुछ याद आया, ”मौम, आप को पता है कि विपिन की मौम घर पर ही पिज़्ज़ा बेस बना लेती हैं. कल इंस्टाग्राम पर विपिन ने पिक डाली, तो मैं ने उस से पूछा था कि सब शौप्स तो बंद हैं, तुम्हें पिज़्ज़ा बेस कहां से मिल गया? मौम, उस ने गर्व से बताया कि उस की मम्मी को पिज़्ज़ा बेस घर पर बनाना आता है.”

मैं ने उसे घूरा तो उस ने टौपिक बदलने में ही अपनी भलाई समझी. पर, उस ने मेरी दुखती रग तो छू ही दी थी. सो, मैं शुरू हो गई, ”तुम लोग हाथ मत बंटाना, बस, मुझे यह बता दिया करो कि और घरों में क्याक्या बन रहा है. मलय, उस से यह पूछा कि उन के घर में भी कोई घर के कामों में हैल्प कर रहा है या नहीं? बस, मां को ही आत्मनिर्भर बनाना है सब को?”

मौली कम सयानी थोड़े ही है, एक कुशल नेता की तरह मीठे स्वर में मौके की नजाकत देख कर कहा, ”मलय, मौम कितना काम कर रही हैं आजकल, देखते हो न. अब ऐसे में उन से पिज़्ज़ा बेस भी बनाने की ज़िद न करो. मेरे भाई, मौम जो बनाती हैं, ख़ुशीख़ुशी खा लो. उन के हाथ में तो इतना स्वाद है, जो भी बनाती हैं, अच्छा ही होता है. मौम, आप को जिस चीज में मेहनत कम लगे, वही बनाया करो. हम तो वर्क फ्रौम होम में फंस कर आप की हैल्प नहीं कर पाते. लव यू, मौम,” ‘कहतेकहते उस ने मेरे गाल चूम लिए. और मैं एक गरीब जनता की तरह फिर सब के झांसे में आ कर, सब भूल दुगने जोश से काम करने लगी.

मौली ने एक झुनझुना पकड़ा ही दिया था. लौकडाउन शुरू होने पर मेरे मूर्ख बनने की जो प्रक्रिया शुरू हुई, वह ख़त्म होने का नाम ही नहीं ले रही. मैं बारबार इन सयानी बातों में फंसती हूं. तीनों ने मुझे काफी समझाया. एक भाषण काफी नहीं था आत्मनिर्भर बनने का, 3 और सुने.

मयंक उन में से हैं जो ऐसे भाषण को काफी गंभीरता से लेते हैं. जो कह दिया गया, बस, वही करेंगे. बुद्धि गई तेल लेने. कई बार सोचती हूं, इतना ध्यान अगर अपने पिताजी के भाषणों पर दिया होता, तो पता नहीं आज क्या बन गए होते. सेल्स की नौकरी में कमाखा तो अभी भी रहे हैं, पर पिताजी के भाषण तो बेकार गए न.

उन्हें तो मयंक को डाक्टर बनाना था. आज लगता है अगर टीवी पर भाषण में सुनते कि डाक्टर बनना है तो मेहनत शायद कर लेते, पर पिताजी की बात में टीवी के भाषण जैसा दम थोड़े ही था. मयंक अकसर कहते हैं, ‘मुझ पर ऐसे भाषणों का असर कहां होता है. मुझे तो रोज बढ़ती महंगाई में खींचतान कर घर का बजट देखना पड़ता है.’ मैं समझ गई कि मुझे आत्मनिर्भर बनाने के लिए तीनों एड़ीचोटी का जोर लगा देंगे.

मुझे कोई शौक नहीं आत्मनिर्भर बनने का. नहीं हो रहा है मुझ से अब अकेले घर का काम. मुझे आशाबाई भी चाहिए, इन लोगों की हैल्प भी चाहिए. घर में रहरह कर सब का हर समय कोई न कोई शौक जागा करता है जिसे पूरा मुझे करना होता है. एक दिन मलय ने कहा, मौम, चलो, घर की सैटिंग कुछ चेंज करते हैं, एक चीज एक तरह से देखदेख कर बोर हो गए.”

मैं ने कहा, ‘हां, क्यों नहीं. चलो, झाड़ू ले आओ. सामान इधरउधर हटेगा, तो नीचे की सफाई भी हो जाएगी, वरना सामान रोज तो हटता नहीं है.”

फौरन एक नेता की तरह पलटी मार दी महाशय ने, ”मौम, इस से तो आप का काम और बढ़ जाएगा. छोड़ो, फिर कभी करते हैं.”

”नहींनहीं, काम क्या बढ़ना, तुम हैल्प करवा रहे हो न!”

”मौम, कुछ काम याद आ गया अचानक, लैपटौप पर बैठना पड़ेगा, फिर कभी करते हैं. सैटिंग इतनी भी बुरी नहीं है.”

मौली को एक दिन कहा, ”आज तुम डिनर बना लेना. पता नहीं, मन नहीं हो रहा है कुकिंग का, बोर हो गई रातदिन खाना बनाबना कर.”

मौली ने अपनी मनमोहक मुसकान से कहा, “हां, मौम, बना लूंगी.” फिर उस ने मेरी कमर में बांहें डालीं और मेरे साथ ही लेट गई और बोली, ”लाओ मौम, आप की कमर दबा दूं?”

मैं झट से उलटी हो गई, ”हां, दबा दो.” यह मौका छोड़ दूं, इतनी भी मूर्ख नहीं हूं मैं. ऐसे दिन बारबार तो आते नहीं कि कोई कहे, आओ, कमर दबा दूं. कुछ ही सैकंड्स बीते होंगें, मैं सुखलोक में पहुंची ही थी कि मौली का मधुर स्वर सुनाई दिया, “मौम, जब आप को ठीक लगे, एक शार्ट कट मारोगी?”

”क्या, फिर से बोलो, बेटा?”

”किसी दिन सिर्फ मटर पुलाव बनाओगी? रायता मैं बना लूंगी. बहुत दिन हो गए, मलय तो आप को बनाने नहीं देता, पूरा खाना चाहिए होता है उसे तो.‘’

”हां, ठीक है, बना दूंगी”

बेटी इतने प्यार से अपना कामधाम छोड़ कर मेरे साथ लेटी थी, मैं तो वारीवारी जा रही थी उस पर मन ही मन. थोड़ी देर बाद वह अपने रूम में चली गई. उस की फ्रैंड का फोन था, जातेजाते बोली, “टेक रैस्ट, मौम.”

थोड़ी देर बाद मैं ने यों ही लेटेलेटे मौली को सरप्राइज देने का मन बना लिया, कि मैं आज ही मटरपुलाव बना लूंगी उस की पसंद का, खुश हो जाएगी वह. और मैं ने डिनर में सचमुच खुद ही सब बना लिया. बीचबीच में मौली आ कर हैल्प औफर करती रही, मैं मना करती रही थी.

डिनर टेबल पर सब को हंसतेमुसकराते देख मुझे अचानक याद आया कि अरे, आज तो मेरा कुकिंग का मूड ही नहीं था. मौली पर जिम्मेदारी सौंपी थी डिनर की. और मैं ही उस के लिए मटरपुलाव, रायता और मलय के लिए स्टफ्ड परांठे बनाने में जुट गई. ओह, मूर्ख जनता फिर ठगी गई. मुझे मीठीमीठी बातों में फिर फंसा लिया गया. मुझे गुस्सा आ गया, कहा, ”मैं तुम लोगों से बहुत नाराज हूं, कोई मेरी हैल्प नहीं करता. बस, सब से डायलौग मरवा लो. मर जाऊंगी काम करतेकरते, तुम लोग, बस, लाइफ एंजौय करो.”

मयंक ने मुझे रोमांटिक नजरों से देखते हुए कहा, ”मेरी रीनू, हम लोगों से गुस्सा हो ही नहीं सकती. अभी तो यह टैस्टी पुलाव खाने दो. एक बार औफिस में कपिल पुलाव लाया था, इतना बेकार था, सारे चावल के दाने चिपके हुए थे. और एक आज तुम्हारा बनाया हुआ पुलाव, देखो, कैसे खिलाखिला है एकएक दाना. वाह, खाना बनाना कोई तुम से सीखे. सच बताऊं, जो भी बनाती हो, शानदार होता है. वाह, ऐक्सीलैंट.”

मैं, हूं तो एक नारी ही न, तारीफ़ सुन कर सब भूल गई. दिल किया, अपनी जान निसार कर दूं सब पर. इतराते हुए पूछ बैठी, “कल क्या खाओगे, क्या बनाऊं?”

मलय ने मौका नहीं छोड़ा, फरमाइश सब से पहले की, ”मौम,छोलेभठूरे.”

”ओके, बनाऊंगी.”

फिर मौली कह बैठी, ”मौम, मेरी हैल्प तो नहीं चाहिए होगी न? कल मेरी कई वर्कशौप्स हैं दिनभर.”

मेरा मुंह उतरा, तो एक सयाने ने संभाल लिया, मलय ने कहा, ”मैँ करवा सकता हूं हैल्प, पर लंचटाइम में, तब तक आप मेरी हैल्प का वेट कर पाओगी, मौम?”

मैं ने थोड़ा झींकते हुए कहा, “मुझे किसी से कोई उम्मीद ही नहीं है कि मुझे हैल्प मिलेगी. यह कोरोना टाइम मेरी जान ले कर ही रहेगा. कोरोना से भले ही बच जाऊं, ये काम मुझे मार डालेंगे. बस, तुम लोग सुबह लैपटौप खोल लिया करो, बीचबीच में सोशल मीडिया पर घूम लिया करो, दोस्तों से बातें कर लिया करो. बस, यही करते हो और यही करते रहो तुम लोग.”

इतने में दूसरे सयाने ने माहौल में बातों की जादू की छड़ी घुमाने की कोशिश की. मयंक बोले, ”तुम बहुत दिन से नई वाशिंग मशीन लेने के लिए कह रही थीं न, आजकल सेल चल रही है. मैं ने देख ली है. चलो, तुम्हें दिखाता हूं. आओ, लैपटौप लाता हूं.” यह कह कर मयंक उठे. बच्चे भी नौटंकी करने लगे, बोले, मौम, देखो, पापा कितना ध्यान रखते हैं, आप के लिए नई वाशिंग मशीन आ रही है.”

मैँ क्या कहती, मुझे तो ऐसे ही घुमा दिया जाता है जैसे कि आजकल जनता किसी भी बात पर अपना हक़ जताने की कोशिश करे और उसे कोई झुनझुना हर बार पकड़ा दिया जाए. मैँ आजकल इन्हीं झुनझुनों में घूमती रहती हूं. वाशिंग मशीन का और्डर दे दिया गया.

आजकल कहीं बाहर तो निकल ही नहीं रहे हैं, तो सबकुछ औनलाइन ही तो आ रहा है. बस, काम करते रहो, कहीं आनाजाना नहीं. मेरे फ़्रस्ट्रेशन की कोई सीमा नहीं है आजकल. कब आशाबाई आएगी, कब मैँ चैन की सांस लूंगी. गुस्सा तब और बढ़ जाता है जब मैँ कहती हूं कि आशाबाई को बुला लेते हैं, तीनों एकसुर में कहते हैं, कि अरे, बिलकुल सेफ नहीं है उसे बुलाना. तुम हमें बताओ, किस काम में उस की हैल्प चाहिए.

मैँ जब हैल्प के लिए बताती हूं तो सब गायब हो जाते हैं. यह है आजकल मेरी हालत. तभी मैं खुद को मूर्ख जनता की तरह पाती हूं. जैसे ही आवाज उठाती हूं, झुनझुने पकड़ा दिए जाते हैं मुझे. तीनो ऐसे सयाने हैं कि घर के काम नहीं करने, बस, मौली तो मुंह बिसूर कर कहती है, “मौम, कहां आदत है, इतने काम…”

काम न करने पड़ें, इस के लिए सारे पैतरे आजमाए जा रहे हैं. वाशिंग मशीन आ गई. सब को लगा कि मैँ अब कुछ दिन तो उस में लगी रहूंगी, खुश रहूंगी. पर कितने दिन… काम थोड़े ही कम हो गए मेरे. एक रात को मैं ने अत्यंत गंभीर स्वर में कहा, ”कल सुबह उठते ही मुझे तुम तीनों से जरूरी बात करनी है.”

मेरे स्वर की गंभीरता पर तीनों चौंके, क्या हुआ? अभी बता दो.”

”परेशान हो चुकी हूं, सुबह ही बात करेंगे. मैँ कोई नौकर थोड़े ही हूं कि दिनरात, बस, काम ही करती रहूं,” कह कर मैँ पैर पटकते हुए सोने चली गई. अभी 10 ही बजे थे, पर आज मैँ बहुत थक गई थी.

मुझे आहट मिली कि तीनों एक रूम में ही बैठ गए हैं. मैं ने सोच लिया था कि कल मैँ तीनों को कोई काम न करने पर बुरी तरह डांटूंगी, लड़ूंगी, चिल्लाऊंगी. हद होती है कामचोरी की. और मैँ फिर जल्दी सो भी गई. सुबह उठी, तो भी मुझे रात का अपना गुस्सा और शिकायतें याद थीं. बैड पर लेटेलेटे सोचा कि आज बताती हूं सब को, कोई हैल्प नहीं करेगा तो मैं अकेले भी नहीं करने वाली सारे काम. हद होती है, सैल्फिश लोग.

तीनों अभी सोये हुए थे. मैं ने जैसे ही लिविंगरूम में पैर रखा, मेरी नजर कौर्नर की शैल्फ पर रखी अपनी मां की फोटो पर पड़ी. मेरी आंखें चमक उठीं. पास में जा कर फोटो को निहारती रह गई. ओह, किस ने रखी यह मेरी प्यारी मां की इतनी सुंदर फोटो यहां पर. मैं फोटो देखती रही. यह इन लोगों ने लगाई है रात में. लेकिन यह फोटो तो मेरी अलमारी में रहती है. ये बेचारे वहां से कैसे निकाल कर लाए होंगे कि आहट से मेरी आंख भी न खुली.

मैं ने फ्रेश हो कर अपनी मां को फोन मिला दिया और बताया कि रात को उन की फोटो कैसे तीनों ने मुझे सरप्राइज देने के लिए लगा दी है. मां को बहुत ख़ुशी हुई, तीनों को खूब प्यार व आशीर्वाद कहती रहीं. मैं सब भूल, अब, मां से इन तीनों की तारीफ़ क्यों किए जा रही थी, मुझे एहसास ही नहीं हुआ. मैं चाय पी ही रही थी कि तीनों उठे. मैं ने उन्हें थैंक्स कहा. वे मुसकराते हुए फ्रेश हो कर अपने काम में बिजी हो गए.

ब्रेकफास्ट मैं ने उन तीनों की पसंद का ही बनाया. जिस में मुझे एक्स्ट्रा टाइम लगा तो मुझे फिर अपने पर गुस्सा आने लगा. मेरा ध्यान फिर इस बात पर गया कि फिर मुझे रात में नाराज देख कर मां की फोटो का एक झुनझुना पकड़ा दिया गया है. अभी बताती हूं सब को, चालाक लोग…कैसे मेरा गुस्सा शांत किया, कितने तेज हैं सब. बताती हूं अभी. मैं ने सीरियस आवाज़ में कहा, ”आओ सब, जरा बात करनी है मुझे.”

तीनों ने आते हुए एकदूसरे को देख कर इशारे किए. मेरी आंखों से छिपा न रहा. फिर मौली और मलय को मैं ने मयंक को कुछ इशारा करते हुए देखा. मुझे पता है कि मेरे गुस्से से बचते हैं तीनों. वैसे तो मुझे जल्दी गुस्सा नहीं आता, पर, जब आता है तो मैं काफी मूड खराब करती हूं. हम चारों बैठ गए. मैं ने रूखी आवाज में कहा, “सब सामने ही रखा है, खुद ले लो. मेहमान तो हो नहीं कोई, कि परोसपरोस कर सब की प्लेट लगाऊं. और मुझे, तुम लोगों से यह कहना है कि अब से…”

मयंक ने मेरी बात पूरी नहीं होने दी, बहुत भावुक हो कर बोला, ”नहीं, पहले मुझे बोलने दो, रीनू. हम तीनों ने सोचा है कि हम हर बार कुछ भी खाने से पहले इतनी मेहनत कर के हमें खिलाने वाले को, तुम्हे, थैंक्स कहा करेंगे, थैंक्यू, रीनू, कितना करती हो तुम हम सबके लिए. बिना किसी की हैल्प के, इतने काम करना आसान नहीं है. वी लव यू, रीनू.”

”थैंक्यू मौम.”

बच्चों ने भी इतने प्यार से कहा कि मैं रोतेरोते रुकी. मन में आया, मैं ही ओवररिऐक्ट तो नहीं कर रही थी. बेचारे खाने से पहले मुझे थैंक्स बोल रहे हैं. किस के घर में यह सब होता है. ओह, कितने प्यारे हैं तीनों. देखते ही देखते मैं उन सब को प्यार से हर चीज सर्व कर रही थी. मेरी जबान से शहद टपक रही थी. मुझे फिर लच्छेदार बातों का एक झुनझुना पकड़ा दिया गया था, इस का एहसास मुझे बाद में फिर हुआ. मूर्ख जनता सी मैं एक बार फिर ठगी गई थी.

Family Story: पूर्णाहूति – क्यों सुरेखा घर छोड़ना चाहती थी?

Family Story, लेखिका- वंदना तिवारी

सुरेखा जल्दीजल्दी सूटकेस में सामान रखने में व्यस्त थी. समय और आवश्यकता के अनुसार चुनी गईं कुछ साङियां, ब्लाउज के सैट्स, सूट के साथ मैचिंग दुपट्टे. 2-3 चूड़ियों के सैट्स, कुछ रूमालें और रोजमर्रा की जरूरत की ऐसी चीजें जिन की उपस्थिति जीवन में अनिवार्य होती हैं, धीरेधीरे संभाल कर रख रही थी.

इन में भी सब से अधिक संभाल कर रखे गए उस के सारे सर्टिफिकैट्स, मार्कशीट्स और नौकरी के लिए आया कौल लेटर भी था.

इन व्यस्तताओं के बीच उस ने कई बार मणि की ओर बेपरवाही से देखा और फिर व्यस्त हो गई. सोफे पर स्थिर बैठा मणि उसे एकटक ऐसे देख रहा था मानों बहुत कुछ कहना चाह रहा हो, लेकिन उस के शब्द किसी अथाह सागर में डूबते जा रहे हों.

उधर सुरेखा थी कि उस की ओर स्थिर हो कर ताक भी नहीं रही थी मानों जताना चाह रही हो कि तुम ने मुझे कब सुना था, जो आज मैं तुम्हारी भावनाओं को समेट लूं?

जब मैं तुम्हें अपने पास रोकना चाहती थी, तब तुम हाथ छुड़ा कर चले जाते थे. जब मैं तुम से कुछ कहने का प्रयास करती, तब तुम ध्यान नहीं देते थे क्योंकि तुम्हारे अनुसार मैं बेमतलब की बातें ही तो करती थी. फिर एक अहंकारी पुरुष मेरी बातों में क्यों दिलचस्पी ले पाता?

ओह, मैं ने क्याक्या कहना चाहा था तुम से मणि. क्या एक पति का इतना भी कर्तव्य न था कि वह अर्धांगिनी कही जाने वाली अपनी पत्नी के मनोभावों को समझना तो दूर, सुन भी न सके?

मुझे आज भी याद है मणि, जब मैं ब्याह कर प्रथम दिवस तुम्हारे घर आई थी. ससुराल में पदार्पण करने के बाद नई दुलहन को देखने वालों के उत्साह ने मुझे क्षण भर भी आराम करने नहीं दिया था. हां, तुम ने आते ही सो कर अपनी थकान उतार ली थी, लेकिन मैं भारी बनारसी साड़ी के बोझ तले दुलहन बनी बैठी रही.

रात में जब सब सो गए तब मैं आधी रात कमरे में अकेली बैठी इंतजार करती रही थी. मेरे मन में कितने भाव आजा रहे थे. मैं चाहती थी कि अपने मन के सारे द्वार खोल दूं और तुम एक प्रेमाकुल भ्रमर के समान मेरे मन के कोष में बंद सारे भाव पढ़ लो. सारी नींद, सारी थकान भुला कर मैं तुम से रात भर बातें करती रहूं.

लेकिन ऐसा नहीं हुआ. तुम ने आते ही कमरे के कपाट क्या बंद किए मेरे मन के द्वार पर मानो ताला लगा दिया. तुम ने आते ही मुझे जकङ लिया था और फिर ज्योंज्यों चूङियोंगहनों का बोझ कम होता गया त्योंत्यों मेरे व्याकुल हृदय का भार और बढ़ता चला गया. उस के बाद तो सपने, कल्पनाएं, भावनाएं न जाने क्याक्या मेरे भीतर ही भीतर टूटता रहा. मेरा तो जैसे संपूर्ण अस्तित्व अस्तव्यस्त हो गया, जिसे मैं आज तक नहीं समेट पाई.

मिलन की प्रथम रात्रि की मधुर बेला में तुम्हारे द्वारा पूछा गया वह क्रूर प्रश्न क्या मैं कभी भूल पाऊंगी मणि? तुम्हारे निर्दय शब्द आज भी मेरे मन को विचलित कर देते हैं.

तुम ने मेरी वर्जिनिटी पर सवाल उठाया था,”क्या इस के पहले तुम्हारा किसी से…?”

छिः मैं कैसे बोलूं तुम्हारे वे घृणित शब्द? मैं अवाक सी तुम्हें देखती रह गई थी.

तब तुम ने और दृढ़ता से कहा था,’’आजकल कालेज में पढ़ने वाले लड़केलड़कियों के लिए यह सामान्य सी बात है. मैं बुरा नहीं मानूंगा.‘‘

चरित्र पर उछाले गए उन छीटों से मैं आज भी स्वयं को कलुषित सा महसूस करती हूं मणि.

सुरेखा के सारे घाव हरे हो उठे थे. उस की डबडबाई आंखों से कुछ बूंदें छलक पड़ीं. तभी मणि ने उस का हाथ पकड़ लिया,’’रो रही हो? फिर क्यों जा रही हो? मुझे पता है तुम मेरे बिना नहीं रह पाओगी.”

“चलो आज तुम्हें मेरा रोना तो दिखाई दिया. पर उस के पीछे का कारण तुम आज भी नहीं समझ पाए,” कहते हुए सुरेखा ने धीरे से अपना हाथ छुड़ा लिया और फिर व्यस्त हो गई.

तुम समझ भी कैसे सकते थे, मणि क्योंकि तुम ने तो मुझे कभी पत्नी का स्थान दिया ही नहीं. तुम्हारे लिए तो मैं मात्र एक उपभोग की वस्तु ही थी. इस के अतिरिक्त तो तुम ने मेरे अस्तित्व को किसी अन्य रूप में स्वीकारा ही नहीं. मैं ने बहुत चाहा था कि तुम्हारे साथ मैं कुछ क्षण शांति से बिता पाती. कुछ तुम अपने मन की कहते कुछ मैं कहती. मनुष्य एकदूसरे के भावों को तो तभी समझ सकता है जब वह उसे सुने और समझे. धरती तभी नम होती है जब जल की बूंदें उसे सिंचित करती हैं. जल के स्नेहिल स्पर्श से ही भाव पूरित हो धरा में प्रेममयी बीज अंकुरित होते हैं, अन्यथा कोई कितना ही उस पर हल चलाता रहे सब बेकार है.

ऐसा नहीं कि तुम मुझे नहीं चाहते थे. जब तुम्हें एक स्त्री की आवश्यकता होती थी तब तुम मेरे पास ही आते थे. अपनी लालसा को तृप्त कर फिर मुझे अकेली छोड़ कर चले जाते थे. मेरे हृदय तक पहुंचने का प्रयास तो तुम ने कभी किया ही नहीं और मैं थी कि अब तक दरवाजे की ओर ही निहारती रह गई.

कई बार तो मैं तुम्हारे हाथ कस कर पकड़ लेती थी. तुम से अनुनयविनय करती कि कुछ क्षण मेरे निकट बैठ कर उस प्रेम को महसूस कर लेने दो जो मेरे हृदय को तुम्हारे साथ जोड़ सके. मगर तुम्हें मेरी भावनाओं से क्या मतलब था?

मेरे लिए प्रेम एक अमूर्त भाव था, एक ऐसी डोर जो 2 प्राणों को जनमजनम के लिए बांध लेते हैं. मगर तुम्हारे लिए प्रेम की परिभाषा कुछ और ही थी, तभी तो तुम निर्दयीभाव से मेरा हाथ छुड़ा कर चले जाया करते थे.

“आखिर तुम्हें किस बात ही कमी है यहां? क्या तुम्हें वास्तव में नौकरी की आवश्यकता है? वह भी इतनी दूर जा कर? अकेली रह पाओगी?”

मणि के शब्दों ने सुरेखा की तंद्रा तोड़ी थी. वह कुछ क्षणों के लिए मणि की ओर देखती रही, बिना कुछ कहे एकटक. सुरेखा मानों उन्हीं शब्दों की डोर थामे हुए कहीं डूबी चली जा रही थी.

यह तुम्हारे लिए मात्र एक नौकरी होगी, मणि. मेरे लिए तो तुम्हारे कारागार से मुक्त हो कर स्वच्छंद हवा में सांस लेने का एक माध्यम है. अपने आत्मसम्मान और स्वाभिमान को कुचल कर तुम्हारी दी हुई सुखसुविधाओं का भोग अब मेरे लिए सहन कर पाना असंभव हो गया है.

मैं कैसे भूल सकती हूं वह काला दिन जब तुम ने मेरी भावनाओं को खंडखंड कर डाला था.

मैं वह पल कैसे भूल सकती हूं, मणि? मेरा अपराध मात्र इतना था कि जब तुम मेरी कोई बात सुननेसमझने को तैयार न थे मैं ने अपनी भावनाओं को तुम तक पहुंचाने के लिए पत्र को माध्यम बनाया था. अपने भाव के मोती शब्दों की डोर में पिरो कर तुम्हें सौंप दिया था. यही मेरी भूल थी. सोचा था इसे पढ़ कर ही कदाचित किसी सीमा तक तुम मुझे समझ पाओगे. मगर नहीं, तुम तो पूरी तरह संवेदनाशून्य थे. इसीलिए तो तुम ने उस पत्र में लिखे 1-1 शब्द को सब के सामने बोल कर मेरा मजाक उड़ाया था.

घर में गूंजते ठहाकों से मेरा हृदय चीत्कार कर उठा था. उस दिन मैं टूट कर ऐसी बिखरी कि आजतक मैं स्वयं को समेटने का प्रयास ही कर रही हूं.

शायद राख के ढेर में कहीं एक चिनगारी शेष थी. बस, मन में एक निश्चय किया था,‘अब मुक्ति चाहिए…’ और इस के लिए मुझे स्वयं को स्थापित करना ही होगा.

एक नारी का हृदय जितना कोमल और विनम्र होता है, तिरस्कार और अपमान उसे उतना ही निष्ठुर और कठोर भी बना देता है.

मणि ने अपना अंतिम प्रयास किया. उस ने सुरेखा को कस कर भींच लिया,‘‘सोच लो, बस एक बार, मेरे लिए… इतना आसान नहीं होगा यह सब.’’

“आसान तो कुछ भी नहीं होता. अपने मातापिता और परिजनों को छोड़ कर किसी अजनबी को पति मान कर उस के साथ चल पड़ना कौन सा आसान होता है?’’ सुरेखा ने प्रश्नपूर्ण दृष्टि से मणि की ओर देखा था.

जीवन के एक नए सफर पर चल पड़ने की दृढ़ता उस के चेहरे पर स्पष्ट झलक रही थी.

‘‘तो तुम नहीं मानोगी?’’

‘‘नहीं.’’

‘‘नहीं रुकोगी?’’

‘‘नहीं.”

“एक बार फिर सोच लो.’’

‘‘नहीं.”

सुरेखा ने अपने वैवाहिक जीवन की यज्ञवेदी में आज तक जितनी आहूतियां दी थीं, आज उस की पूर्णाहुति देने का समय था. सुरेखा इस के लिए पूरी तरह तैयार थी.

मणि के बाहुपाश से छूटते ही उस ने सूटकेस उठाया और दृढ़ता के साथ बाहर निकल गई.

Family Story: वह मेरे जैसी नहीं है – क्यों मां स्नेहा को आशीर्वाद देती थी?

Family Story: मैं ने तो यही सुना था कि बेटियां मां की तरह होती हैं या ‘जैसी मां वैसी बेटी’ लेकिन जब स्नेहा को देखती हूं तो इस बात पर मेरे मन में कुछ संशय सा आ जाता है. इस बात पर मेरा ध्यान तब गया जब वह 3 साल की थी. उसी समय अनुराग का जन्म हुआ था. मैं ने एक दिन स्नेहा से पूछा, ‘‘बेटा, तुम्हारा बेड अलग तैयार कर दूं, तुम अलग बेड पर सो पाओगी?’’ स्नेहा तुरंत चहकी थी, ‘‘हां, मम्मी बड़ा मजा आएगा. मैं अपने बेड पर अकेली सोऊंगी.’’

मुझे थोड़ा अजीब लगा कि जरा भी नहीं डरी, न ही उसे हमारे साथ न सोने का कोई दुख हुआ. विजय ने कहा भी, ‘‘अरे, वाह, हमारी बेटी तो बड़ी बहादुर है,’’ लेकिन मैं चुपचाप उस का मुंह ही देखती रही और स्नेहा तो फिर शाम से ही अपने बेड पर अपना तकिया और चादर रख कर सोने के लिए तैयार रहती.

स्नेहा का जब स्कूल में पहली बार एडमिशन हुआ तो मैं तो मानसिक रूप से तैयार थी कि वह पहले दिन तो बहुत रोएगी और सुबहसुबह नन्हे अनुराग के साथ उसे भी संभालना होगा लेकिन स्नेहा तो आराम से हम सब को किस कर के बायबाय कहती हुई रिकशे में बैठ गई. बनारस में स्कूल थोड़ी ही दूरी पर था. विजय के मित्र का बेटा राहुल भी उस के साथ रिकशे में था. राहुल का भी पहला दिन था. मैं ने विजय से कहा, ‘‘पीछेपीछे स्कूटर पर चले जाओ, रास्ते में रोएगी तो उसे स्कूटर पर बिठा लेना.’’ विजय ने ऐसा ही किया लेकिन घर आ कर जोरजोर से हंसते हुए बताया, ‘‘बहुत बढि़या सीन था, स्नेहा इधरउधर देखती हुई खुश थी और राहुल पूरे रास्ते जोरजोर से रोता हुआ गया है, स्नेहा तो आराम से रिकशा पकड़ कर बैठी थी.’’

मैं चुपचाप विजय की बात सुन रही थी, विजय थोड़ा रुक कर बोले, ‘‘प्रीति, तुम्हारी मम्मी बताती हैं कि तुम कई दिन तक स्कूल रोरो कर जाया करती थीं. भई, तुम्हारी बेटी तो बिलकुल तुम पर नहीं गई.’’ मैं पहले थोड़ी शर्मिंदा सी हुई और फिर हंस दी.

स्नेहा थोड़ी बड़ी हुई तो उस की आदतें और स्वभाव देख कर मेरा कुढ़ना शुरू हो गया. स्नेहा किसी बात पर जवाब देती तो मैं बुरी तरह चिढ़ जाती और कहती, ‘‘मैं ने तो कभी बड़ों को जवाब नहीं दिया.’’ स्नेहा हंस कर कहती, ‘‘मम्मी, क्या अपने मन की बात कहना उलटा जवाब देना है?’’

अगर कोई मुझ से पूछे कि हम दोनों में क्या समानताएं हैं तो मुझे काफी सोचना पड़ेगा. मुझे घर में हर चीज साफ- सुथरी चाहिए, मुझे हर काम समय से करने की आदत है. बहुत ही व्यवस्थित जीवन है मेरा और स्नेहा के ढंग देख कर मैं अब हैरान भी होने लगी थी और परेशान भी. अजीब लापरवाह और मस्तमौला सा स्वभाव हो रहा था उस का. स्नेहा ने 10वीं कक्षा 95 प्रतिशत अंक ला कर पास की तो हमारी खुशियों का ठिकाना नहीं था. मैं ने परिचितों को पार्टी देने की सोची तो स्नेहा बोली, ‘‘नहीं मम्मी, यह दिखावा करने की जरूरत नहीं है.’’

मैं ने कहा, ‘‘यह दिखावा नहीं, खुशी की बात है,’’ तो कहने लगी, ‘‘आजकल 95 प्रतिशत अंक कोई बहुत बड़ी बात नहीं है, मैं ने कोई टौप नहीं किया है.’’ बस, उस ने कोई पार्टी नहीं करने दी, हां, मेरे जोर देने पर कुछ परिचितों के यहां मिठाई जरूर दे आई. अब तक हम मुंबई में शिफ्ट हो चुके थे. स्नेहा जब 5वीं कक्षा में थी, तब विजय का मुंबई ट्रांसफर हो गया था और अब हम काफी सालों से मुंबई में हैं.

10वीं की परीक्षाओं के तुरंत बाद स्नेहा के साथ पढ़ने वाली एक लड़की की अचानक आई बीमारी में मृत्यु हो गई. मेरा भी दिल दहल गया. मैं ने सोचा, अकेले इस का वहां जाना ठीक नहीं होगा, कहीं रोरो कर हालत न खराब कर ले. मैं ने कहा, ‘‘बेटी, मैं भी तुम्हारे साथ उस के घर चलती हूं,’’ अनुराग को स्कूल भेज कर हम लोग वहां गए. पूरी क्लास वहां थी, टीचर्स और कुछ बच्चों के मातापिता भी थे. मेरी नजरें स्नेहा पर जमी थीं. स्नेहा वहां जा कर चुपचाप कोने में खड़ी अपने आंसू पोंछ रही थी, लेकिन मृत बच्ची का चेहरा देख कर मेरी रुलाई फूट पड़ी और मैं अपने पर नियंत्रण नहीं रख पाई. मुझे स्वयं को संभालना मुश्किल हो गया. स्नेहा की दिवंगत सहेली कई बार घर आई थी, काफी समय उस ने हमारे घर पर भी बिताया था.

स्नेहा फौरन मेरा हाथ पकड़ कर मुझे धीरेधीरे वहां से बाहर ले आई. मेरे आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे. हम दोनों आटो से घर आए. कहां तो मैं उसे संभालने गई थी और कहां वह घर आ कर कभी मुझे ग्लूकोस पिला रही थी, कभी नीबूपानी. ऐसी ही है स्नेहा, मुझे कुछ हो जाए तो देखभाल करने में कोई कसर नहीं छोड़ती और अगर मैं ठीक हूं तो कुछ करने को तैयार नहीं होगी. मैं कई बार उसे अपने साथ मार्निंग वाक पर चलने के लिए कहती हूं तो कहती है, ‘‘मम्मी, टहलने से अच्छा है आराम से लेट कर टीवी देखना,’’ मैं कहती रह जाती हूं लेकिन उस के कानों पर जूं नहीं रेंगती. कहां मैं प्रकृतिप्रेमी, समय मिलते ही सुबहशाम सैर करने वाली और स्नेहा, टीवी और नेट की शौकीन.

5वीं से 10वीं कक्षा तक साथ पढ़ने वाली उस की सब से प्रिय सहेली आरती के पिता का ट्रांसफर जब दिल्ली हो गया तो मैं भी काफी उदास हुई क्योंकि आरती की मम्मी मेरी भी काफी अच्छी सहेली बन चुकी थीं. अब तक मुझे यही तसल्ली रही थी कि स्नेहा की एक अच्छी लड़की से दोस्ती है. आरती के जाने पर स्नेहा अकेली हो जाएगी, यह सोच कर मुझे काफी बुरा लग रहा था. आरती के जाने के समय स्नेहा ने उसे कई उपहार दिए और जब वह उसे छोड़ कर आई तो मैं उस का मुंह देखती रही. उस ने स्वीकार तो किया कि वह बहुत उदास हुई है, उसे रोना भी आया था, यह उस की आंखों का फैला काजल बता रहा था. लेकिन जिस तरह अपनी भावनाओं पर नियंत्रण रख कर उस ने मुझ से बात की उस की मैं ने दिल ही दिल में प्रशंसा की. स्नेहा बोली, ‘‘अब तो फोन पर या औनलाइन बात होगी. चलो, कोई बात नहीं, चलता है.’’

ऐसा नहीं है कि वह कठोर दिल की है या उसे किसी से आंतरिक लगाव नहीं है. मैं जानती हूं कि वह बहुत प्यार करने वाली, दूसरों का बहुत ध्यान रखने वाली लड़की है. बस, उसे अपनी भावनाओं पर कमाल का नियंत्रण है और मैं बहुत ही भावुक हूं, दिन में कई बार कभी भी अपने दिवंगत पिता को या अपने किसी प्रियजन को याद कर के मेरी आंखें भरती रहती हैं. जैसेजैसे मैं उसे समझ रही हूं, मुझे उस पर गुस्सा कम आने लगा है. अब मैं इस बात पर कलपती नहीं हूं कि स्नेहा मेरी तरह नहीं है. उस का एक स्वतंत्र, आत्मविश्वास से भरा हुआ व्यक्तित्व है. डर नाम की चीज उस के शब्दकोश में नहीं है. अब वह बी.काम प्रथम वर्ष में है, साथ ही सी.पी.टी. पास कर के सी.ए. की तैयारी में जुट चुकी है. हमें मुंबई आए 9 साल हो चुके हैं. इन 9 सालों में 2-3 बार लोकल टे्रन में सफर किया है. लोकल टे्रन की भीड़ से मुझे घबराहट होती है. हाउसवाइफ हूं, जरूरत भी नहीं पड़ती और न टे्रन के धक्कों की हिम्मत है न शौक. मेरी एक सहेली तो अकसर लोकल टे्रन में शौकिया घूमने जाती है और मैं हमेशा यह सोचती रही हूं कि कैसे मेरे बच्चे इस भीड़ का हिस्सा बनेंगे, कैसे कालिज जाएंगे, आएंगे जबकि विजय हमेशा यही कहते हैं, ‘‘देखना, वे आज के बच्चे हैं, सब कर लेंगे.’’ और वही हुआ जब स्नेहा ने मुलुंड में बी.काम के लिए दाखिला लिया तो मैं बहुत परेशान थी कि वह कैसे जाएगी, लेकिन मैं हैरान रह गई. मुलुंड स्टेशन पर उतरते ही उस ने मुझे फोन किया, ‘‘मम्मी, मैं बिलकुल ठीक हूं, आप चिंता मत करना. भीड़ तो थी, गरमी भी बहुत लगी, एकदम लगा उलटी हो जाएगी लेकिन अब सब ठीक है, चलता है, मम्मी.’’

मैं उस के इस ‘चलता है’ वाले एटीट्यूड से कभीकभी चिढ़ जाती थी लेकिन मुझे उस पर उस दिन बहुत प्यार आया. मैं छुट्टियों में उसे घर के काम सिखा देती हूं. जबरदस्ती, कुकिंग में रुचि लेती है. अब सबकुछ बनाना आ गया है. एक दिन तेज बुखार के कारण मेरी तबीयत बहुत खराब थी. अनुराग खेलने गया हुआ था, विजय टूर पर थे. स्नेहा तुरंत अनुराग को घर बुला कर लाई, उसे मेरे पास बिठाया, मेरे डाक्टर के पास जा कर रात को 9 बजे दवा लाई और मुझे खिला- पिला कर सुला दिया. मुझे बुखार में कोई होश नहीं था. अगले दिन कुछ ठीक होने पर मैं ने उसे सीने से लगा कर बहुत प्यार किया. मुझे याद आ गया जब मैं अविवाहित थी, घर पर अकेली थी और मां की तबीयत खराब थी. मेरे हाथपांव फूल गए थे और मैं इतना रोई थी कि सब इकट्ठे हो गए थे और मुझे संभाल रहे थे. पिताजी थे नहीं, बस हम मांबेटी ही थे. आज स्नेहा ने जिस तरह सब संभाला, अच्छा लगा, वह मेरी तरह घबराई नहीं.

अब वह ड्राइविंग सीख चुकी है. बनारस में मैं ने भी सीखी थी लेकिन मुंबई की सड़कों पर स्टेयरिंग संभालने की मेरी कभी हिम्मत नहीं हुई और अब मैं भूल भी चुकी हूं, लेकिन जब स्नेहा मुझे बिठा कर गाड़ी चलाती है, मैं दिल ही दिल में उस की नजर उतारती हूं, उसे चोरीचोरी देख कर ढेरों आशीर्वाद देती रहती हूं और यह सोचसोच कर खुश रहने लगी हूं, अच्छा है वह मेरी तरह नहीं है. वह तो आज की लड़की है, बेहद आत्मविश्वास से भरी हुई. हर स्थिति का सामना करने को तैयार. कितनी समझदार है आज की लड़की अपने फैसले लेने में सक्षम, अपने हकों के बारे में सचेत, सोच कर अच्छा लगता है.

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