
VIDEO : रोज के खाने में स्वाद जगा देंगे ये 10 टिप्स
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एक प्राइवेट कंपनी में एकाउंटेंट सचिन अरोड़ा की उस दिन छुट्टी थी, इसलिए उस ने सोचा क्यों न कुछ देर फेसबुक में ही समय गुजारा जाए. अभी उस ने फेसबुक खोला ही था कि सामने एक खूबसूरत तसवीर के साथ एक आकर्षक इबारत चमकी, ‘जानिए आप की शक्ल देशविदेश के किस महान एक्टर से मिलती है.’
सचिन को हमेशा यह खुशफहमी रही थी कि उस की शक्ल विनोद खन्ना से /मिलती है, इसलिए उस ने यह पढ़ते ही सोचा क्यों न आजमा कर देख लिया जाए कि उस का अनुमान सही भी है या नहीं. अत: उस ने तुरंत उस पौइंट पर क्लिक कर दिया, जहां से यह जानने के लिए कदम दर कदम आगे बढ़ना था.
पहली क्लिक के बाद ही बारीक अक्षरों में लिखी यह बात सामने आई कि अगर आप इस मनोरंजक क्विज में भाग लेते हैं तो इस ऐप को, जिस ने यह क्विज डेवलप की है, क्या मिलेगा? साथ ही जवाब में लिखा था, आप की सार्वजनिक प्रोफाइल, तसवीरें और आप के कमेंट.
सचिन ने सोचा ऐसी कौन सी खास चीजें हो सकती हैं. इसलिए वह नेक्स्ट के बाद नेक्स्ट बटन क्लिक करता गया. हालांकि उसे बाद में निराशा हुई, क्योंकि ऐप ने उसे हौलीवुड के एक्टर टौम हैंक जैसा बताया था, जिसे वह जानता तक नहीं था.
बहरहाल, इस पहेली में टाइम पास कर के सचिन यह सब भूल गया था, लेकिन कुछ महीनों बाद उसे तब आश्चर्य हुआ जब एक असहिष्णुता संबंधी औनलाइन वोटिंग में उस ने अपने आप को उन लोगों के विरुद्ध मोर्चाबंदी करते हुए पाया, जो सरकार की सांस्कृतिक गतिविधियों में हस्तक्षेप कर रहे थे.
सचिन को तो शायद यह पूरा मामला पता ही नहीं चलता, अगर उस के एक दोस्त ने व्यंग्य करते हुए यह न कहा होता कि आजकल कलाकारों का बहुत विरोध कर रहे हो. सचिन को इस से ही पता चला कि उस के नाम और तसवीरों का किसी ने दुरुपयोग किया है.
दरअसल, हाल के सालों में हम ने भले ही ध्यान न दिया हो, लेकिन फेसबुक में इस तरह के खेलों की बाढ़ आ गई है, जिस में कहा जाता है कि जानिए आप किस हीरो की तरह लग रहे हैं? पिछले जन्म में क्या थे? या आप उद्योगपति होते तो किस के जैसे होते? या फिर आप खिलाड़ी के रूप में किस खेल के लिए ज्यादा उपयुक्त हैं? ऐसी तमाम पहेलियों में भाग लेने के लिए आमंत्रित करने वाले कार्यक्रमों की इंटरनेट में बाढ़ आ गई है. इन में लोग रुचि से भाग भी लेते हैं.
सब से पहले इस तरह के सवाल आने शुरू हुए थे— आप 60 साल बाद कैसे दिखेंगे? आप की जोड़ी किस हीरोइन या हीरो के साथ जमती है? मनोवैज्ञानिक रूप से आकर्षित करने वाले टाइमपास खेलों की यह शृंखला लगातार बढ़ती गई तो ऐसा यूं ही नहीं हुआ, बल्कि इस के पीछे एक पूरी साजिश थी.
दरअसल, आम लोग भले ही न जानते हों लेकिन इन खेलों के जरिए पर्सनल डाटा चुराने का बहुत ही सोचासमझा खेल चल रहा था. इस डाटा चोरी की बात शायद इतनी डरावनी नहीं लगती, अगर पिछले दिनों इस बात का खुलासा न होता कि इसी तरह डाटा चुरा कर कुछ कंपनियों ने डोनाल्ड ट्रंप को अमेरिका का राष्ट्रपति बनवा दिया है.
जी हां, ये सब उन साइको प्रोफाइल विकसित करने वाली कंपनियों का खेल है, जिस को ले कर आज पूरी दुनिया में हंगामा है. वास्तव में ये कंपनियां आम लोगों को सोशल मीडिया में विशेषकर फेसबुक जैसे लोकमंच में मनोवैज्ञानिक रूप से फांसती हैं.
अपने सहज मानवीय आकर्षण वाले सवालों के जरिए ये कंपनियां लोगों को अपने जाल में फांस कर उन का प्रकट रूप में तो मनोरंजन करती हैं, लेकिन इस मनोरंजन के पीछे उन का असली मकसद इन लोगों की मेल आईडी, तसवीरें और तमाम पर्सनल जानकारियां हासिल करना होता है.
बाद में एकत्र की गई इन प्रोफाइल जानकारियों को ये कंपनियां कारपोरेट सेक्टर से ले कर विभिन्न मार्केटिंग एजेंसियों तक को बेच देती हैं. अब यह खुलासा इसलिए खौफनाक लगने लगा है, क्योंकि पता चला है कि ये अपना डाटा राजनीतिक पार्टियों को भी बेचती हैं और वे इस डाटा के जरिए मतदाताओं का ब्रेनवाश कर के मनपसंद नतीजे हासिल करने की कोशिश करती हैं.
2 बड़े अखबारों के स्टिंग से घबराई भाजपा, कांग्रेस
गत 17 मार्च, 2018 को अमेरिका और ब्रिटेन के 2 अखबारों ने जब इस बात का खुलासा किया कि अमेरिकी चुनावों में मौजूदा राष्ट्रपति ट्रंप के पक्ष में इस तरह के खेल का किस तरह से इस्तेमाल किया गया तो पूरी दुनिया में हड़कंप मच गया. इस खुलासे के बाद भारत में भी हंगामा मचा हुआ है.
देश की दोनों मुख्य राजनीतिक पार्टियां भाजपा और कांग्रेस डर रही हैं कि कहीं अमेरिका की तरह यहां भी अगले साल होने वाले चुनाव में राजनीतिक फायदे के लिए इस तरह के तथ्यों का इस्तेमाल न किया जाए. इसीलिए दोनों पार्टियां एकदूसरे पर आरोप लगा रही हैं कि वे देश के आम मतदाताओं का निजी डाटा हासिल कर के उन का राजनीतिक ब्रेनवाश कर रही हैं. हालांकि चुनाव आयुक्त ए.के. रावत ने साफतौर पर इनकार करते हुए कहा है कि ऐसा कुछ नहीं हो रहा, न हो सकता है.
लेकिन अमेरिका में घटी घटना ने साबित कर दिया है कि जब अमेरिकी मतदाताओं का ब्रेनवाश हो सकता है तो हिंदुस्तानी मतदाताओं का क्यों नहीं?
कांग्रेस ने तो भाजपा पर आरोप भी लगा दिया है कि भाजपा ने 2014 का चुनाव फेसबुक के जरिए इसी तरह से मतदाताओं का ब्रेनवाश कर के जीता था. हालांकि इस के लिए डाटा चोरी का आरोप नहीं लगाया गया. बहरहाल, डर की यह पूरी कहानी कहां और कैसे सामने आई, इस पर हम आगे बात करेंगे. फिलहाल अमेरिका में डाटा लीक के दुरुपयोग के जरिए जो डर पूरी दुनिया के सामने आया है, वह यह है कि इस साल और अगले साल दुनिया के 2 दरजन देशों में होने जा रहे आम चुनावों में इंटरनेट कंपनियां हारजीत का फैसला कर सकती हैं.
कुल मिला कर यह डर वैसा ही है, जैसा 1970 के दशक में हुआ करता था. तब राजनीतिक पार्टियों को लगता था कि उन के धाकड़ विरोधी जीतने के लिए बूथ कैप्चरिंग कर लेंगे. यह भी एक किस्म से कैप्चरिंग की ही आशंका है.
फर्क बस यह होगा कि तब भौतिक रूप से लठैतों और हथियारों की बदौलत यह काम होता था और अब आशंका है कि सोशल मीडिया के मनोवैज्ञानिक कब्जे के जरिए यह खेल खेला जाएगा. बहरहाल, यह आशंका कहां से पैदा हुई और कैसे कदम दर कदम आगे बढ़ी, इस का सिलसिला कुछ यूं शुरू होता है.
वाट्सऐप के को-फाउंडर ब्रायन एक्टन ने फैलाई सनसनी
21 मार्च, 2018 को शाम 5 बज कर 18 मिनट पर किए गए अपने एक ट्वीट से मैसेजिंग ऐप वाट्सऐप के को-फाउंडर ब्रायन एक्टन ने तब हड़कंप मचा दिया, जब उन्होंने सभी से अपना फेसबुक एकाउंट डिलीट करने को कहा. एक्टन ने ट्वीट किया, ‘यह डिलीट फेसबुक का वक्त है.’
एक्टन का यह ट्वीट ऐसे समय में आया, जब पौलिटिकल डाटा एनालिस्ट कंपनी कैंब्रिज एनालिटिका पर अमेरिका के 5 करोड़ फेसबुक यूजर्स का डाटा चुरा कर, उस का गलत इस्तेमाल करने का आरोप लगा था.
अमेरिकी अखबार न्यूयार्क टाइम्स और ब्रिटेन के अखबार औब्जर्वर के एक संयुक्त स्टिंग से यह खुलासा हुआ है कि ब्रिटेन की कैंब्रिज एनालिटिका नामक कंपनी ने फेसबुक के 5 करोड़ यूजर्स के बारे में विस्तृत जानकारियां एकत्र कर के उन की अनुमति के बिना उन का दुरुपयोग किया.
यह सब 2016 के अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव के समय हुआ और माना जाता है कि डोनाल्ड ट्रंप को राष्ट्रपति बनवाने के लिए किया गया. स्टिंग के मुताबिक कंपनी ने एक ऐप बनाया और उस के जरिए इन जानकारियों का कई किस्म से दुरुपयोग किया. मालूम हो कि इस कंपनी ने ऐप के जरिए वोटरों के व्यवहार की भविष्यवाणी की थी, जिस में डोनाल्ड ट्रंप को जीतता हुआ बताया गया था.
इस खुलासे के बाद से माना जा रहा है कि फेसबुक मुश्किल में है. चूंकि कैंब्रिज एनालिटिका ने यह डाटा फेसबुक से हासिल किया था, इस वजह से यह आशंका जताई जा रही है कि फेसबुक में किसी का भी डाटा सुरक्षित नहीं है.
इस आशंका का एक कारण यह भी है कि स्टिंग से यह भी पता चलता है कि कंपनी के पास 5 और देशों के फेसबुक यूजर्स का डाटा है, जिस में से एक देश भारत भी है. इस असुरक्षा के बाद अब बड़ा सवाल यह पैदा हो गया है कि क्या फेसबुक जिंदा भी रहेगा या बंद हो जाएगा?
लेकिन सवाल यह भी है कि अगर फेसबुक बंद हो गया तो इस प्लेटफार्म में मौजूद असंख्य अनंत डाटा का क्या होगा? लोगों के एकाउंट में मौजूद अपार जानकारियों, तसवीरों और वीडियोज का क्या होगा? क्या फेसबुक का हश्र भी सोशल मीडिया वेबसाइट माईस्पेस डौटकौम जैसा होगा?
गौरतलब है कि माईस्पेस डौटकौम पर भी साल 2011 में इसी तरह डाटा बेचने का आरोप लगा था. माना गया था कि उस ने भी अपने यूजर्स के डाटा को चोरीछिपे एक एजेंसी को बेच दिया था.
क्या होगा फेसबुक का और उस के यूजर्स के डाटा का
इस आरोप के बाद जिस माईस्पेस डौटकौम को साल 2005 में रूपर्ट मर्डोक ने 58 करोड़ डालर में खरीदा था, उसे साल 2011 में महज 3.5 करोड़ डालर में बेचना पड़ा. क्योंकि इस खुलासे के बाद साइट की विश्वसनीयता बिलकुल खत्म हो गई थी. नतीजतन उस की सदस्य संख्या नहीं बढ़ रही थी. यही कारण था कि रूपर्ट की कंपनी न्यूज कारपोरेशन को मजबूरी में अपनी इस कंपनी को औनलाइन विज्ञापन कंपनी स्पेसिफिक मीडिया को बेचना पड़ा था.
लेकिन माईस्पेस डौटकौम को तो फिर भी ग्राहक मिल गया था, मगर क्या फेसबुक को भी कोई ग्राहक मिल पाएगा? यह इसलिए भी संभव नहीं है, क्योंकि दोनों के आकार में जमीनआसमान का फर्क है.
जब माईस्पेस डौटकौम को बेचना पड़ा था, उस समय उस की सदस्य संख्या महज 3 करोड़ के आसपास थी, जबकि फेसबुक के सदस्यों की संख्या इस समय करीब 2.1 अरब है. इस में इस के सक्रिय उपभोक्ताओं की संख्या 1 अरब 40 करोड़ है. ये फेसबुक के वे सदस्य हैं, जो हर दिन फेसबुक का चक्कर काटते हैं.
यही वजह है कि दुनिया की कोई भी कारपोरेट कंपनी फिलहाल फेसबुक के अधिग्रहण की नहीं सोच पा रही. लेकिन स्टिंग औपरेशन से हुए खुलासे ने फेसबुक की नींव हिला कर रख दी है. इस खुलासे के बाद फेसबुक के शेयरों में भारी गिरावट आई है.
इन पंक्तियों के लिखे जाने तक यह गिरावट 8 फीसदी से ज्यादा हो चुकी थी, जिस के कारण मार्क जकरबर्ग को 350 अरब रुपए से ज्यादा का नुकसान हो चुका है, जबकि कंपनी को अब तक इस से 600 फीसदी से ज्यादा का नुकसान हो चुका है. इस वजह से भी कारपोरेट दुनिया में फेसबुक के भविष्य को ले कर हड़कंप मचा हुआ है.
बहरहाल, फेसबुक के अस्तित्व की आशंकाओं और अनुमानों वाले सवालों के जवाब हम बाद में जानेंगे, पहले हम इस विषय पर बात करते हैं कि आखिर हम इस सब पर बात ही क्यों कर रहे हैं?
अमेरिका और ब्रिटेन के इन 2 अखबारों के इस साझा स्टिंग से आखिर हमारा क्या लेनादेना? लेनादेना है, जैसा कि पहले ही लिखा जा चुका है कि इस स्टिंग से पता चलता है कि कैंब्रिज एनालिटिका ने सिर्फ अमेरिका के फेसबुक यूजर्स का ही डाटा नहीं चुराया है, बल्कि उस ने ब्रिटेन, दक्षिण कोरिया और भारत सहित 5 देशों के फेसबुक यूजर्स के डाटा की चोरी की है.
हकीकत पर परदा डालने की कोशिश
हालांकि कैंब्रिज एनालिटिका ने इस का खंडन किया है, लेकिन इस स्टिंग के प्रकाश में आने के बाद भारत के कानून और सूचना मंत्री रविशंकर प्रसाद ने साफसाफ कहा है कि यदि फेसबुक डाटा का दुरुपयोग भारतीय चुनावों को प्रभावित करने की कोशिश में किया गया तो यह कतई सहन नहीं किया जाएगा. उन्होंने 17 मार्च, 2018 को इस खुलासे के बाद फेसबुक को कड़ी चेतावनी दी, जिस में यहां तक कहा कि अगर जरूरत पड़ी तो भारत सरकार फेसबुक के विरुद्ध कड़े से कड़ा कदम उठाएगी.
हालांकि कैंब्रिज एनालिटिका ने कहा है कि उस ने फेसबुक के भारतीय उपभोक्ताओं का कोई डाटा नहीं चुराया है और न ही उस का चुनाव को प्रभावित करने का कोई इरादा है. फेसबुक के मालिक जकरबर्ग ने तो इस संबंध में भारत से स्पष्ट तौर पर माफी भी मांगी है और फेसबुक में डाटा संबंधी सुरक्षा को और मजबूत करने की बात भी कही है.
फिर भी अगर इस सब से भारत के राजनीतिक गलियारों में एकदूसरे के विरुद्ध आरोपप्रत्यारोप का सिलसिला थम नहीं रहा तो इस के पीछे बड़ी वजह यही है कि सभी राजनीतिक पार्टियां डरी हुई हैं कि साल 2019 के लोकसभा चुनाव में मतदाताओं के मतों का अपहरण करने की कोशिश की जा सकती है.
इस आशंका की वजह से देश की दोनों बड़ी राजनीतिक पार्टियों— कांग्रेस और भाजपा का एकदूसरे पर यह आरोप लगाना है कि उस का कैंब्रिज एनालिटिका से संबंध है. भारतीय जनता पार्टी की तरफ से कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने सवाल उठाया है कि आखिर कांग्रेस का कैंब्रिज एनालिटिका से इस कदर प्रेम क्यों है?
भाजपा की तरफ से कांग्रेस पर यह भी आरोप लगाया गया है कि राहुल गांधी की सोशल मीडिया प्रोफाइल में कैंब्रिज एनालिटिका की क्या भूमिका है? क्या कांग्रेस अब चुनाव जीतने के लिए डाटा चोरी का इस्तेमाल करेगी, जैसा कि इस कंपनी ने अमेरिका में किया. चूंकि हाल ही में राहुल गांधी के ट्विटर पर फालोअर्स की संख्या काफी बढ़ी है तो भाजपा का आरोप यह भी है कि ये फरजी फालोअर्स हैं, जिन्हें ऐसे ही डाटा जगलरी के जरिए हासिल किया गया है.
कांग्रेस की सफाई और आरोप में दम है
इस पर कांग्रेस के प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने भाजपा की खबर ली है. उन्होंने भाजपा को इन आरोपों के बदले खूब खरीखोटी सुनाई है. सुरजेवाला के मुताबिक भाजपा फेक न्यूज की फैक्ट्री है, वही इस तरह की कंपनियों का सहारा लेती है.
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने या कांग्रेस के अध्यक्ष ने कभी भी इस कंपनी की किसी भी तरह की कोई मदद नहीं ली है. अगर स्वतंत्र रूप से कैंब्रिज एनालिटिका के दावों की बात करें तो उस का कहना है कि साल 2010 में बिहार विधानसभा चुनाव में उस ने काम किया था.
कैंब्रिज एनालिटिका की वेबसाइट में मौजूद विवरण में एक जगह यह दावा किया गया है कि हमारे प्रयासों से हमारे ग्राहक की बड़ी जीत हुई. हम ने जितना टारगेट किया, उस की 90 फीसदी सीटें हमारे क्लाइंट को मिलीं. अगर इतिहास में पीछे मुड़ कर जाने की कोशिश करें कि साल 2010 में बिहार विधानसभा में किस को जीत मिली थी तो निश्चित रूप से वह भाजपा और जेडीयू का गठबंधन था, जिसे भारी बहुमत मिला था.
जनता दल यूनाइटेड ने तब 141 सीटों पर चुनाव लड़ा था और 115 सीटें जीती थी जबकि भारतीय जनता पार्टी जिस ने सिर्फ 102 सीटों पर चुनाव लड़ा था, उस ने 91 सीटें जीती थीं. इस तरह देखा जाए तो तथ्यात्मक रूप से यह भारतीय जनता पार्टी है, जिस ने 2010 के विधानसभा चुनाव में 90 फीसदी सीटें जीती थीं. इस तरह कैंब्रिज एनालिटिका के दावे में वही फिट हो रही है.
यही नहीं, रणदीप सुरजेवाला का यह भी कहना है कि साल 2010 में कैंब्रिज एनालिटिका की इंडियन पार्टनर ओवलेनो बिजनैस नाम की कंपनी वास्तव में भाजपा की साथी पार्टी के सांसद के बेटे की थी और तब ओबीआई की सेवाओं का राजनाथ सिंह ने अपने लिए इस्तेमाल किया था.
रणदीप सुरजेवाला भाजपा पर आरोप लगाते हैं कि भाजपा फेक स्टेटमेंट, फेक कौन्फ्रैंस के साथसाथ फेक डाटा का सहारा लेने वाली पार्टी है. इसी क्रम में कांग्रेस आईटी सेल की प्रभारी दिव्या स्पंदना का कहना है कि कैंब्रिज एनालिटिका राइट विंग पार्टियों के साथ मिल कर काम करती है, लिबरल्स के साथ नहीं और सब को पता है कि राइट विंग कौन है.
कुल मिला कर अब यह डाटा लीक इतना डरावना क्यों है, इसे समझ लेते हैं. दरअसल, भारत में फेसबुक के करीब 20 करोड़ सक्रिय उपभोक्ता हैं, जिस में ज्यादातर की उम्र 18 से 35 साल के बीच है.
समाजशास्त्रियों और मनोविदों का मानना है कि ये लोग राजनीतिक दलों द्वारा फैलाई गई अफवाहों को सच मान लेते हैं और उसी के मुताबिक उन के बारे में अपनी राय बना लेते हैं.
कहने का मतलब यह है कि ये लोग तात्कालिक माहौल के प्रभाव में आ कर अपना मतदान करते हैं. ऐसे में आशंका है कि परदे के पीछे रहने वाली ये डाटा विश्लेषक कंपनियां चोरी से हासिल किए गए डाटा के जरिए आगामी चुनावों में अपनी सेवा लेने वाली राजनीतिक पार्टियों को कृत्रिम माहौल बना कर जिताने की कोशिश करेंगी, जैसा कि आरोप है कि 2 साल पहले अमेरिका में ट्रंप के लिए ऐसा माहौल बनाया गया.
क्या भारतीय वोटरों को भ्रमित कर के मतदान कराया जाएगा?
चूंकि भारत में 20 करोड़ से ज्यादा फेसबुक के सक्रिय उपभोक्ता हैं और उन में से 90 फीसदी 35 साल से कम उम्र के हैं. ये उपभोक्ता आमतौर पर हमेशा अपने जैसे तमाम दूसरे लोगों के साथ जुड़े रहते हैं और इस तरह एकदूसरे की बातों से प्रभावित होते हैं. इसलिए आशंका है कि ऐसी जानकारियों को व्यक्तिगत स्तर पर प्रसारित किया जाएगा, जिस से कि इन लोगों का दिमाग बदल जाए.
चूंकि लोगों का वास्तविक इंटरैक्शन बहुत कम हो गया है, जबकि आभासी मेलमिलाप बहुत बढ़ गया है, इसलिए यह माना जा रहा है कि उपभोक्ता एकदूसरे को प्रभावित करेंगे. लब्बोलुआब यह है कि साल 2019 में राजनीतिक पार्टियां मतदाताओं के बीच अपने लोकप्रिय समर्थन के बजाय आंकड़ों के जोड़तोड़ और भ्रामक माहौल से उपजी भावनात्मक स्थितियों के जरिए चुनाव जीतने की कोशिश करेंगी.
यह भी माना जा रहा है कि साल 2016 में अमेरिका में राष्ट्रपति ट्रंप ऐसे ही चुनाव जीते थे. यही वजह है कि कैंब्रिज एनालिटिका के डाटा चोरी संबंधी खबर के खुलासे से भारत में हड़कंप मच गया है.
इंटरनेट के जानकारों का मानना है कि यह आशंका पूरी तरह से हवाहवाई नहीं है. कैंब्रिज एनालिटिका या कोई भी कंपनी जिस के पास किसी समुदाय विशेष का बड़े पैमाने पर व्यक्तिगत डाटा हो, वह ऐसा माहौल रच सकती है, जिस के मनोविज्ञान में उलझ कर मतदाता वैसा ही निर्णय ले जैसा कि कोई शातिर कंपनी उन से निर्णय लिवाने की कोशिश करे.
स्टिंग औपरेशन के दौरान यह बात सामने आई है कि कैंब्रिज एनालिटिका लोगों के डाटा से उन की साइकोलौजिकल प्रोफाइलिंग करती है और उसी प्रोफाइलिंग के आधार पर किसी उम्मीदवार के समर्थन में या उस के विरोधी के खिलाफ सूचनाएं प्लांट की जाती हैं. कुल मिला कर नतीजा यह होता है कि मत देने वाले मतदाता का मन बदल जाता है और वह अपना वोट उसे दे देता है, जिसे वह इस तरह के प्रभाव में आने के पहले अपना वोट नहीं देना चाहता हो.
मतदाता का मन बदलने का षडयंत्र
यह पूरा किस्सा शायद महज एक अनुमान ही होता, अगर ब्रिटेन के चैनल-4 ने कैंब्रिज एनालिटिका कंपनी के बड़े अधिकारियों का स्टिंग औपरेशन प्रसारित न किया होता. इस प्रसारण के बाद ही पूरी दुनिया को पता चला कि यह कंपनी दुनिया के तमाम राजनीतिक दलों के लिए सोशल मीडिया में कैंपेन चलाती है और अपने क्लाइंट या ग्राहकों को जितवाने के लिए हर वह हथकंडा अपनाती है, जिस से कि मतदाता का मूड बदला जा सके.
फेसबुक और ट्विटर जैसी सोशल मीडिया पर जो लोग ज्यादा से ज्यादा समय बिताते हैं और अपने दिलदिमाग की तमाम बातों को यहां दर्ज करते हैं. ये कंपनियां इन्हीं बातों से इन के मनोविज्ञान का अध्ययन करती हैं. फिर उसी अध्ययन के आधार पर इन्हें भावनात्मक बाहुपाश में कैद करने के लिए चक्रव्यूह रचती हैं. देश की 2 सब से बड़ी राजनीतिक पार्टियां अगर इस डाटा लीक से डरी हुई हैं और एकदूसरे पर गंभीर से गंभीरतम आरोप लगा रही हैं तो इस के पीछे बहुत बड़ा कारण लोगों की साइकोलौजिक प्रोफाइलिंग करने वाली कैंब्रिज एनालिटिका जैसी कंपनियों के कामकाज का तौरतरीका भी है.
इस तरह की कंपनियां सोशल मीडिया प्लेटफार्म से डाटा चुरा कर मनोवैज्ञानिक कैंपेन विकसित करती हैं. यही नहीं, ये कंपनियां नेताओं के भाषण, राजनीतिक पार्टियों के घोषणापत्रों तक को अपने इन्हीं सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक विश्लेषणों के आधार पर तैयार करवाती हैं.
कहने का मतलब यह है कि अगर भाजपा यह घोषणा करे कि वह अगले साल, इस महीने, इस तारीख तक अयोध्या में मंदिर बनवा देगी तो हो सकता है यह भाजपा के नेताओं के बजाए मतदाताओं का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण करने वाली कंपनी का निष्कर्ष हो और जो किसी पार्टी के नेता विशेष के मुंह से जारी हुआ हो.
जकरबर्ग की सीनेट के सामने पेशी
फेसबुक के संस्थापक और सीईओ मार्क जकरबर्ग बहुत बड़ी हस्ती हैं. दुनिया भर में फेसबुक के अरबों यूजर्स हैं, जिन का सीधा लाभ जकरबर्ग की कंपनी को मिलता है. फेसबुक के माध्यम से हुई गलतियों के लिए जकरबर्ग सितंबर 2006 से नवंबर 2011 तक 5 बार माफी मांग चुके हैं.
इस बार तो उन्होंने अमेरिकी सीनेटर्स के सामने माफी मांगी और अपनी गलतियों को सुधारने का वादा भी किया. लेकिन अपने इस वादे पर वह कब तक कायम रहेंगे, कहा नहीं जा सकता.
जकरबर्ग पर सब से बड़ा आरोप यह है कि उन की कंपनी की वजह से 8.7 करोड़ फेसबुक यूजर्स का डाटा लीक हुआ, जिस का चुनाव के समय सीधा लाभ अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को मिला, वरना वह राष्ट्रपति नहीं बन पाते.
इस का सीधा मतलब यह है कि किसी भी देश में, चाहे वह भारत ही क्यों न हो, अमेरिका में बैठे चंद लोग चुनाव के समय फेसबुक यूजर्स का सहारा ले कर चुनाव परिणामों का रुख मोड़ सकते हैं.
यह जितनी गहन चिंता का विषय भारत में है, उतना ही अमेरिका में भी है. इसी के मद्देनजर 11-12 अप्रैल को अमेरिकी सीनेट ने मार्क जकरबर्ग को सीनेटर्स के सामने पेश होने को कहा. मंगलवार और बुधवार को जकरबर्ग सीनेट के सामने पेश हुए, जहां 44 सीनेटर्स को 5-5 मिनट का समय दे कर जकरबर्ग से सवाल पूछने को कहा गया. हालांकि यह मात्र औपचारिकता जैसा था, क्योंकि इतने समय में क्रौस क्वेश्चन नहीं किए जा सकते थे. जबकि यह जरूरी था.
10 घंटे चली इस काररवाई में सीनेटर डिक डर्बिन ने जकरबर्ग से पूछा कि पिछली रात आप किस होटल में ठहरे थे और किसे मैसेज किया था? जवाब में जकरबर्ग ने कहा कि यह निजी मामला है, जिसे मैं सार्वजनिक नहीं करना चाहूंगा. इस पर डर्बिन बोले, ‘डाटा लीक का मामला भी निजता से जुड़ा है.’
लंबी चली सवालजवाबों की इस फेहरिश्त के दौरान जकरबर्ग ने अपनी गलती सुधारने का वादा करते हुए कहा कि फेसबुक यह तय करेगा कि आने वाले साल में भारत, पाकिस्तान, हंगरी, ब्राजील और अमेरिका में होने वाले चुनावों में फेसबुक का दुरुपयोग न हो.
इस सुनवाई की वजह था ब्रिटिश फर्म कैंब्रिज एनालिटिका द्वारा फेसबुक के 8.7 करोड़ यूजर्स का डाटा लीक करने का मामला, जिस का इस्तेमाल अमेरिकी चुनाव में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के पक्ष में हुआ बताया जाता है.
जकरबर्ग ने हर गलती को स्वीकारते हुए माफी मांगी और कहा कि फेसबुक को मैं चलाता हूं, इस के माध्यम से जो भी गलती हुई या होगी, उस के लिए जिम्मेदार भी मैं ही रहूंगा.
जकरबर्ग ने अपनी कंपनी को ले कर कई दावे भी किए, लेकिन न्यूयार्क टाइम्स ने उन की हकीकत बताते हुए उन दावों को गलत बताया. मसलन जकरबर्ग ने कहा कि फेसबुक काल का डाटा स्टोर नहीं करता, जबकि हकीकत यह है कि फेसबुक एंड्रायड फोन के काल और एसएमएस तक के रिकौर्ड रखता है.
उधर सीएनएन का कहना है कि जकरबर्ग की पेशी महज एक दिखावा है. इस मौके पर जकरबर्ग ने यह भी कहा कि उन की कंपनी कैंब्रिज यूनिवर्सिटी के न्यूरो साइंटिस्ट अलेक्सांद्र और कैंब्रिज एनालिटिका पर मुकदमा करने की सोच रही है. लेकिन इस पर कुछ सीनेटर्स ने कहा कि उन्हें शंका है कि ऐसा होगा.
योग अब सिर्फ भारत का नहीं पूरे विश्व का हो चुका है. आज पूरा विश्व योग दिवस का जश्न मना रहा है. बौलीवुड कलाकारों में भी योग का काफी क्रेज है. बात करें बौलीवुड की सबसे फिट अभिनेत्रियों की तो मलाइका अरोड़ा का नाम इनमें सबसे पहले आता है. मलाइका अरोड़ा अपने जीवन में योग को काफी महत्व देती हैं. मलाइका अपने को फिट रखने के लिए नियमित योग का अभ्यास करती हैं.
योग दिवस के अवसर पर एक बातचीत में उन्होंने अपने फेवरेट योगासन और उनके फायदों के बारे में बताया है. आइए जानते हैं उन्होंने योग पर क्या बात की है.
पद्मासन या कमल आसन, बैठ कर की जाने वाली योग मुद्रा है. जिसमें घुटने विपरीत दिशा में रहते हैं. इस आसन को करने से मन शांत होता है. जिससे ध्यान लगाने में सहायता मिलती है. साथ में यह योगासन कई शारीरिक बीमारियों को दूर करता है. पद्मासन पर बात करते हुए मलाइका ने कहा, ‘पद्मासन मेरा फेवरेट योगासन है. इसके लिए दिमाग और एकाग्रता शक्ति का ध्यान रखना आवश्यक है. यह आसन आपके पूरे शरीर को स्वस्थ रखता है. यह शरीर और आत्मा के बीच संतुलन को दर्शाता है. यह शरीर में ऊर्जा के प्रवाह को तेज करता है. चटाई पर बैठ कर किया जाना वाला यह योग आपके क्षमताओं को बढ़ाता है.’
सूर्य नमस्कार
सूर्य नमस्कार को सभी योगासनों में सबसे बेहतर माना जाता है. इस आसन को करने से पूरे शरीर का कसरत हो जाता है. इस आसन को करते हुए सूर्य की तन, मन और मन्त्र से उपासना की जाती है क्योंकि सूर्य ऊर्जा का सबसे बड़ा स्रोत है.
सूर्य नमस्कार पर बात करते हुए 44 वर्षीय इस अभिनेत्री ने कहा, ‘सूर्य नमस्कार से आपके शरीर के सभी अंगों का कसरत हो जाता है. इसे करने से शरीर के विषैले पदार्थ बाहर निकल जाते हैं. यह शरीर में रक्त-संचार को ठीक करता है, जिससे चेहरे पर निखार आता है. यह शारीरिक और मानसिक दोनों तौर पर आपको फिट रखता है. मेरे लिए सूर्य नमस्कार कम्प्लीट वर्कआउट पैकेज है.’
कर्नाटक में भारतीय जनता पार्टी की किरकिरी हुई. हालांकि वह चुनाव में हारी नहीं है, बल्कि सब से बड़ी पार्टी बन कर उभरी है. पर इतनी बात साफ है कि यदि अपनी गायों के लिए भाजपा के पास चारा कम होगा तो वह अब दूसरों से झटकने की कोशिश सोचसमझ कर ही करेगी ताकि फिर से किरकिरी न होने पाए. सरकार बनाने में उस के गच्चा खा जाने के बाद अब जो पलायन दूसरी पार्टियों से भाजपा की ओर हो रहा था, वह बंद हो जाएगा. भारतीय जनता पार्टी के गौरक्षक गायों के लिए दूसरों को मारनेपीटने को तो हर समय तैयार रहते हैं पर गायों के लिए चारा उगाने की कोशिश उन्होंने कभी नहीं की. मेक इन इंडिया, स्किल इंडिया, ईज औफ डूइंग बिजनैस उसी तरह के मंत्र हैं जैसे आयुष्मान भव:, सौभाग्यवती भव:, अतिथि देवो भव: जो बोले तो जाते हैं लेकिन उन के लिए किया कुछ नहीं जाता.
अब वोटरों को भी दिखने लगा है और नेताओं को भी कि भाजपा हर हालत में सत्ता में रहेगी, ऐसी गारंटी नहीं है. राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार, केरल, पश्चिम बंगाल के उपचुनावों में हार, गुजरात में ढीले प्रदर्शन और कर्नाटक में बहुमत न पा सकने से भारतीय जनता पार्टी से ज्यादा हिंदू समाज के उन स्वयंभू ठेकेदारों के तेवर ढीले हुए हैं जो सोच रहे थे कि रामराज्य आ ही गया है जिस में पिछड़े हनुमान दास को पूजते रहेंगे व शंबूकों को पढ़ने से मना किया जाता रहेगा और ब्राह्मण श्रेष्ठों की ही चलेगी चाहे उस के लिए पत्नी सीता को फिर वनवास देना पड़े.
भारतीय जनता पार्टी की 2014 के बाद की चुनावी जीतें सामाजिक परिवर्तन ला रही थीं जो एकदम उलट दिशा में जा रहा था. उदारता, विभिन्नता, आधुनिकता, तार्किकता को छोड़ा जा रहा था और मंदिरों, यज्ञों, हवनों, तिलिस्मी तावीजों, तीर्थयात्राओं का युग लौट रहा था. भारत की आर्थिक प्रगति बनी हुई है क्योंकि उस सब के बावजूद देश की कानून व्यवस्था चरमरा नहीं गई थी. देश पश्चिम एशिया की तरह गृहयुद्धों की चपेट में नहीं आया था पर धर्म और जाति को ले कर दूषित माहौल बनने लगा था. कर्नाटक और 15 उपचुनावों के नतीजे शायद इस पर रोक लगाएंगे और भाजपाई सरकारों को अपना कांग्रेसीकरण करना होगा जिस में सब को अपनी इच्छा के हिसाब से चलने की इजाजत होगी. नरेंद्र मोदी की सरकार के अच्छेबुरे फैसले वैसे ही हैं जैसे किसी भी सरकार के होते हैं. देश में एक चुनी सरकार ही होनी चाहिए जिस के सिर पर चुनावों में जनसमर्थन की तलवार लटकी रहे. परिणामों ने साबित कर दिया है कि इस तलवार पर सरकार या पार्टी का कब्जा नहीं हुआ है.
भारत में साइबर मौबिंग का खतरा तेजी से बढ़ रहा है. देश में किशोरों और बच्चों को धमकाने, प्रताडि़त करने और ब्लैकमेल करने की प्रवृत्ति तेजी से बढ़ रही है. ऐसी ही कुछ घटनाएं हाल में हुई हैं.
कानपुर के एक स्कूल में पढ़ने वाला विवेक साइबर बुलिंग का शिकार हो गया. कुछ बदमाश युवकों की दहशत से विवेक अब न तो कंप्यूटर पर काम करता है और न ही स्कूल के मैदान में खेलने जाता है. वह लगातार आसमान की तरफ देखता रहता है.
ऐसा ही कुछ सृजन के साथ भी हुआ. वह बनारस के एक पब्लिक स्कूल में पढ़ता है. उस के दोस्तों ने फोटोशौप पर उस की फोटो एडिट कर क्लास की एक लड़की के साथ जोड़ दी और सोशल नैटवर्किंग साइट पर अपलोड कर दी. तभी से सृजन और वह लड़की शर्म के मारे एक महीने तक स्कूल नहीं गए.
पंजाब में इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने वाली 21 साल की एक छात्र अपने हौस्टल के कमरे में पंखे से लटकी मिली. उस का कंप्यूटर इंजीनियर बनने का सपना था. उस के कमरे में एक नोट मिला जिस में उस ने आरोप लगाया था कि कालेज के 2 पूर्व छात्र कथित तौर पर फेसबुक पर उस के बारे में आपत्तिजनक कमैंट कर उसे परेशान करते थे.
इसी तरह बेंगलुरू में आईएमए में पढ़ने वाली नीलम जो एक होनहार लड़की थी, ने भी आत्महत्या कर ली. नीलम का अपने बौयफ्रैंड से ब्रैकअप हुआ और सुबह जब वह उठी तो उस युवक ने कथित तौर पर फेसबुक पर लिखा था. ‘मैं सुपर कूल महसूस कर रहा हूं क्योंकि मैं ने अपनी ऐक्स गर्लफ्रैंड को छोड़ दिया है.’ इस के बाद नीलम ने आत्महत्या कर ली.
इलाहाबाद के एक स्कूल में निशी को मामूली सी बात पर उस के दोस्तों ने अपने गु्रप से बाहर कर दिया क्योंकि उस की स्कूल गु्रप के एक लड़के से कहासुनी हो गई थी. उस का बदला लेने के लिए उस की कक्षा के बच्चों ने निशी को व्हाट्सऐप गु्रप से डिलीट और फेसबुक से अनफ्रैंड कर दिया. 16 साल की निशी ने इस से खुद को अपमानित महसूस किया. उस के चेहरे की खुशी गायब हो गई. उस के गुमसुम रहने के कारण मातापिता भी चिंतित हैं.
सार्वजनिक होती जिंदगी
आजकल बहुत से युवा अपने निजी जीवन का एकएक पल फेसबुक, ट्विटर पर खुल्लमखुल्ला जीते हैं. उन्हें यह समझ में नहीं आता कि ऐसे में उन की निजी जिंदगी अपनी न रह कर सार्वजनिक हो जाती है. फिर उन के जीवन का हर पहलू दुनिया के सामने रहता है.
जब अनजान लोगों से करीबी बढ़ती है तो ऐसे में साइबर बुलिंग की आशंका भी बढ़ जाती है. देश में बच्चे जिस तेजी से इंटरनैट से जुड़ रहे हैं, उसी तेजी से वहां होने वाली गुंडागर्दी के शिकार भी हो रहे हैं. साइबर की दुनिया उन्हें चंद मिनटों में मजाक का पात्र बना रही है. वे अपने ही दोस्तों में बदनाम होने लगे हैं और आत्महत्या कर रहे हैं.
आज साइबर बुलिंग मातापिता और टीचर्स के लिए चुनौती बन रही है. उन की समझ में नहीं आ रहा कि बच्चों को इस से कैसे बचाया जाए, आज साइबर दुनिया में कमैंट्स से दादागीरी करने वालों की भरमार है. ऐसे लोग बेवजह दूसरों के निजी मामलों में घुसपैठ करते हैं. कमैंट्स, अश्लील टिप्पणी तथा कैंपेन पेज बनाने में उन को मजा आता है. ये दूसरों का सुखचैन खत्म करने पर तुले रहते हैं.
दरअसल, साइबर बुलिंग आज साइबर दुनिया की जानलेवा वजह बन गई है. सुनंदा पुष्कर की मौत क्यों हुई? यह जांच का विषय है, लेकिन सच यह है कि वे भी साइबर दुनिया के उन सिरफिरों की शिकार थीं जो किसी के भी मानसम्मान और नाम पर दाग लगाने को आमादा हैं.

साइबर बुलिंग है क्या
साइबर बुलिंग के बारे में लोग ज्यादा नहीं जानते, इसलिए वे उस के शिकार होते हैं, लेकिन इसे समझना मुश्किल नहीं है. आज यह बालिग और नाबालिग हर तरह के नैट यूजर्स के लिए खतरा बन चुका है. दरअसल, इस का मतलब इंटरनैट के जरिए किसी को धमकाया, डराना या प्रताडि़त करना होता है. इंटरनैट पर की गई हर ऐसी गतिविधि बुलिंग है जो किसी आदमी को निशाना बनाती है. किसी की निजी जानकारी, फोटो या वीडियो सार्वजनिक करना साइबर बुलिंग है. किसी के बारे में इंटरनैट पर अश्लील बातें करना भी साइबर बुलिंग है. साइबर संसार में किसी भी तरीके से किसी को ब्लैकमेल करना भी साइबर बुलिंग ही कहलाता है.
आंकड़ों की बात करें तो भारत में इस तरह औनलाइन प्रताड़ना, परेशानी या शर्मिंदगी का शिकार होने वालों में 53% इंटरनैट का इस्तेमाल करने वाले हैं. एक सर्वेक्षण के मुताबिक, अकेले कोलकाता महानगर में यह समस्या हर साल 30 फीसदी की दर से बढ़ रही है. करीब 55 फीसदी अभिभावकों का मानना है कि नैटवर्किंग साइबर के कारण ऐसा हो रहा है.
भारत में करीब 50 प्रतिशत किशोर मोबाइल फोन पर इंटरनैट का इस्तेमाल करते हैं. दरअसल, साइबर अपराधों और कानून की जानकारी न होने की वजह से देश में ऐसे अपराध तेजी से बढ़ रहे हैं. युवा इस के सब से ज्यादा शिकार हैं. सोशल नैटवर्किंग साइबर पर बनने वाले काल्पनिक मित्र किशोरों को कल्पना की दुनिया में ले जाते हैं. बस, वहीं से उन के प्रताडि़त होने की जमीन तैयार होती है.
परेशानी तो इस बात की है कि बच्चों के मातापिता भी जानेअनजाने में उन को बढ़ावा देते हैं. हालात अब यह है कि सोशल नैटवर्किंग साइट्स पर 5 साल के बच्चे का भी अकाउंट बन जाता है जबकि इस की न्यूनतम आयु 13 साल है.
क्या कहता है हमारा कानून
भारत ने वर्ष 2000 में सूचना प्रौद्योगिकी कानून पारित किया था. उस समय सोशल नैटवर्किंग साइट्स का चलन नहीं था. साइबर अपराध से जुडे़ यह कानून कारगर नहीं हैं. अगर इस से मुकदमा दर्ज हो भी गया तो जमानत मिल जाती है. इसलिए लोगों के मन में डर नहीं है.
कानून की कुछ अहम बातें ये हैं
मन पर गहरा असर
सोशल साइट्स पर अपमानित होने के कारण किशोरमन पर गहरा असर पड़ता है. ये साइट्स नशे की तरह कम उम्र के बच्चों को अपनी चपेट में लेती जा रही हैं. अभिभावकों को इस खतरे के प्रति जागरूक होना जरूरी है. भारत में 77 प्रतिशत मातापिता साइबर बुलिंग से अवगत हैं. साइबर मौबिंग कहीं भी हो सकती है. इस से किशोर उम्र के बच्चों में उग्रता बढ़ रही है. वे अपनी हर बात मनवाना चाहते हैं. पहले दादागीरी स्कूल और खेल के मैदानों तक ही सीमित थी. लेकिन आज यह औनलाइन हो गया है.
औनलाइन सैकड़ों लोगों के सामने युवाओं को धमकाए जाने या मजाक उड़ाए जाने की स्थिति में उन का आत्मविश्वास डगमगा जाता है. इस से या तो वे उग्र हो जाते हैं या फिर हीनभावना के शिकार हो जाते हैं.
मातापिता के दफ्तर जाने के बाद बच्चे ज्यादातर समय कंप्यूटर पर बिताते हैं. मध्यम तबके के लोग भी अब बच्चों को लैपटौप खरीद कर दे रहे हैं. इस के अलावा स्मार्टफोन ने भी औनलाइन रहना आसान बना दिया है. लेकिन इन सब से फायदे के बजाय नुकसान ही हो रहा है.
धर्म के नाम पर ढोंग, पाखंड और आडंबर के खेल में 4 दशकों तक जनता को मूर्ख बनाता रहा आसुमल सिरूमलानी उर्फ आसाराम बापू आखिरकार आजीवन सीखचों के पीछे चला गया. अदालत में साढे़ 4 वर्षों तक चली कार्यवाही में आसाराम के झूठ, पाखंड से आवरण हटा कर उसे बलात्कारी सिद्ध कर बेनकाब कर दिया गया.
यह फैसला उस समय आया है जब देश में चारों ओर धर्म, जातीय नफरत की फैली विषैली हवा का माहौल है और समूचा देश बच्चियों व महिलाओं के साथ हो रहे पाश्विक हमलों से आहत, उद्वेलित है. बच्चियों के यौनशोषण को ले कर धर्मों में तूतू मैंमैं हो रही है. असुरक्षा और अविश्वास के वातावरण के बीच जोधपुर की विशेष अनुसूचित जाति, जनजाति अदालत ने ढोंगी आसाराम को आजीवन कारावास की सजा सुनाए जाने का फैसला सुना कर न्याय के प्रति एक नई आशा जगाई है.
15 अगस्त, 2013 की रात को आसाराम ने जोधपुर स्थित अपने आश्रम में उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर की लड़की के साथ यौन दुराचार किया. लड़की आसाराम के छिंदवाड़ा स्थित गुरुकुल में पढ़ती थी. उसे कुछ मानसिक परेशानी हुई तो स्कूल के निदेशक शरद चंद्र और वार्डन शिल्पी मिल कर उसे आसाराम के पास जोधपुर ले गए. उस के मातापिता को भी जोधपुर बुला लिया. कहा गया कि लड़की पर ‘बुरी आत्मा’ का फेर है, इस का इलाज किया जाएगा.
जोधपुर आश्रम में आसाराम ने उसे कुटिया में बंद किया. डेढ़ घंटे तक बंधक बना कर रखा. लड़की के मांबाप को बाहर बैठा कर रखा गया. बलात्कार किए जाने के बाद लड़की अपने मांबाप और भाई के साथ रवाना हुई तो रास्ते में उस ने मांबाप के गुरु यानी आसाराम की काली करतूत का खुलासा किया.
घिनौनी करतूत
पीडि़ता ने अपने बयानों में जो कुछ बताया, अदालत ने 25 अप्रैल, 2018 को दिए अपने फैसले में उसे शामिल किया, ‘‘मैं जोधपुर के मणाई आश्रम में सीढि़यों के पास बैठी हुई थी तो बापू ने पीछे वाले दरवाजे से इशारा कर के मुझे बुलाया. मैं आ गई तो बापू ने कहा कि जाओ, देख कर आओ कि तुम्हारे मम्मीपापा क्या कर रहे हैं. मैं ने जा कर देखा तो पापा चले गए थे, मम्मी गार्डन के गेट पर बैठी थीं. वापस आ कर मैं ने बापू को बताया कि मम्मी बैठी हैं और पापा चले गए हैं.
‘‘उस दौरान बापू ने पहले से ही रूम की लाइट बंद कर दी थी और वे बेड पर लेटे हुए थे. उन्होंने मुझे बेड पर अपनी साइड में बिठा लिया और फिर मेरा हाथ सहलाने लगे. उन्होंने मुझ से कहा कि पढ़लिख कर क्या करोगी. मैं तुम्हें वक्ता बना देता हूं. तुम समर्पित हो जाओ. हमारे साथ ही रहना. मैं तुम्हारी जिंदगी संवार दूंगा. फिर उठ कर उन्होंने दरवाजा बंद कर दिया और बदतमीजी करने लगे.
‘‘जब उन्होंने अपने कपड़े उतार लिए, तो मैं चिल्लाई कि आप यह क्या कर रहे हो, तो उन्होंने मेरा मुंह दबा दिया और धमकाया कि जरा सी भी आवाज निकाली तो देखना, मैं क्या करता हूं. तुम्हारे मांबाप को मरवा दूंगा. तुम्हारा खानदान खत्म हो जाएगा.
‘‘फिर वे बदतमीज करने पर उतारू हो गए, कहा कि मेरे प्राइवेट पार्ट को छुओ और…करो.’’
पीडि़ता ने इस आशय के बयान दिए हैं कि आसाराम ने उस के प्राइवेट पार्ट और मुंह पर और सभी जगह किस किया. वह रो रही थी कि उसे छोड़ दो.
पीडि़ता ने अपने बयान में आगे बताया कि उस ने आसाराम से कहा, ‘‘हम तो आप को भगवान मानते हैं. आप यह क्या कर रहे हो.’’
करीब सवा घंटे बाद आसाराम ने उसे छोड़ा और कहा कि अपने बाल व कपड़े ठीक कर लो, फिर जाना और किसी से कुछ मत बताना.
अदालत ने अपने फैसले में लिखा है कि पीडि़ता इस घटना से शौक्ड रह गई. जिस आदमी को वह भगवान समझती थी उस ने उस के साथ ऐसी घिनौनी हरकत की. उस के कपड़े खोल डाले. वह कुछ सोच नहीं पा रही थी. जब वह कमरे से बाहर आई तो उस की मां गार्डन के गेट पर बैठी हुई थी. वह अपनी माता के साथ रूम में आ गई. उस की माता ने पूछा भी था कि क्या हुआ तो उस ने कहा कि अभी यहां से चलो. बापू अच्छा इंसान नहीं है.
जज ने फैसले में आगे लिखा है कि इस साक्ष्य से अभियोजन पक्ष आरोपित अपराध की आधारशिला साबित करने में सफल हुआ है. यह तय कानून है कि पीडि़ता का एकमात्र साक्ष्य ही अपराधी को दंडित करने के लिए पर्याप्त है, बस, सावधानी यह रखनी है कि बयान संदेह से परे और विसंगतियों से हीन हो. न्यायाधीश के अनुसार, उक्त साक्ष्य को किसी संपुष्टिकारक साक्ष्य की आवश्यकता नहीं है. न्यायालय ने उपरोक्त साक्ष्य को देखते हुए यह तय किया कि अभियुक्त ने उस पर आरोपित अपराध किया ही होगा.
थाने पहुंचा मामला
लड़की ने मांबाप को सारी बात बताई तो पिता ने कहा कि वह बापू से पूछेगा कि आखिर उस ने ऐसा क्यों किया. लड़की के पिता कर्मवीर सिंह ने आसाराम के सहायक से पूछा कि बापू कहां है. सहायक ने बताया कि उन का 19 अगस्त को दिल्ली में सत्संग है.
मांबाप लड़की को ले कर दिल्ली आए. वहां आसाराम का सत्संग का पंडाल तो लगा था पर वह नहीं आया. इस पर उन्होंने दिल्ली के कमला मार्केट थाने में एफआईआर दर्ज कराई. पुलिस ने जीरो एफआईआर लिखी. पीडि़ता के बयान लिए और मैडिकल जांच कराई. बाद में जीरो एफआईआर जोधपुर ट्रांसफर कर दी गई. 31 अगस्त को जोधपुर पुलिस ने आसाराम को बड़ी हीलहुज्जत के बाद इंदौर से गिरफ्तार कर लिया.

लड़की के मातापिता आसाराम के अंधभक्त थे. ट्रांसपोर्ट का व्यवसाय करने वाला लड़की का पिता आसाराम को खुलेहाथों दानदक्षिणा देता था. उस ने शाहजहांपुर में आसाराम के लिए एक आश्रम भी बनवा कर दिया था. आसाराम के प्रवचनों में यह परिवार नियमित जाता था.
तरहतरह के हथकंडे
आसाराम ने सजा से बचने के लिए तरहतरह के हथकंडे अपनाए. शुरू में उस ने लड़की को झूठा बताया. कहा गया कि 50 करोड़ रुपए झटकने के लिए साजिश की गई है. साथ ही, लड़की के घर वालों पर समझौते के लिए दबाव बनाया. खुद की बीमारी का बहाना बनाया और स्वास्थ्य के झूठे प्रमाणपत्र पेश किए. सरकार और अदालतों पर दबाव डालने के लिए प्रदर्शन करवाए.
जमानत के लिए आसाराम व उस के अंधभक्तों द्वारा सुप्रीम कोर्ट तक को प्रभावित करने की कोशिशें की गईं. मामले को सांप्रदायिक रंग दिलाने के प्रयास किए गए. नेताओं से कहलवाया गया कि किसी हिंदू संत को ही क्यों फंसाया गया. सोनिया गांधी के इशारे पर फंसाने का आरोप लगाया गया. यहां तक कि आसाराम ने खुद को नपुंसक साबित करने की कोशिश भी की.
आसाराम पर जब बलात्कार का आरोप लगा तो भक्तों की फौज यह सच स्वीकार करने को तैयार नहीं थी. यह अराजकता का ऐसा नमूना है कि उस के जेल जाने और मुकदमा शुरू होते ही तमाम और मामले खुले, मामलों में गवाहों पर जानलेवा हमले भी शुरू हो गए. उन के एक निजी सहायक और आश्रम के एक विश्वासपात्र रसोइए समेत 3 गवाहों की हत्याएं भी कर दी गईं. कई और हत्याएं हुईं, कई गवाह लापता हुए.
आसाराम को बचाने के लिए दिल्ली से राम जेठमलानी, सुब्रह्मण्यम स्वामी जैसे नामी वकीलों को जोधपुर बुलाया गया. फिर भी उसे छुड़ाया नहीं जा सका. उस की जमानत के लिए 12 बार अर्जी लगाई गईं पर हर बार वे निरस्त कर दी गईं.
संतों की छवि को नुकसान
अपने फैसले में जज मधुसूदन शर्मा ने लिखा है, ‘‘अभियुक्त ने न केवल पीडि़ता का विश्वास तोड़ा, आम लोगों में संतों की छवि को नुकसान भी पहुंचाया. सजा देने का उद्देश्य समाज को सुरक्षित करना है और अभियुक्त को रोकना है. अपराध न केवल पीडि़त, बल्कि उस समाज के विरुद्ध भी है जिस से अपराधी और पीडि़त संबंध रखते हैं. उचित दंड नहीं दिया तो कोर्ट कर्तव्य से पथभ्रष्ट हो जाएगा.
फैसले में आगे लिखा है, ‘‘अभियुक्त के प्रति अवांछित सहानुभूति न्याय व्यवस्था को अधिक हानि पहुंचाएगी क्योंकि इस से जनता का विधि की व्यवस्था में विश्वास कम होगा. यदि न्यायालय क्षतिग्रस्त व्यक्ति को संरक्षित नहीं करेगा तो क्षतिग्रस्त व्यक्ति स्वयं बदला लेने के मार्ग पर चलेगा.’’
आश्रमों का साम्राज्य
देश में मौजूद आसाराम के 230 से ज्यादा आश्रमों में से कई विवादों में रहे हैं. खासतौर से सरकारी जमीन से ले कर आम लोगों की जमीन हथियाने के मामले सामने आए. गुजरात, मध्य प्रदेश, हिमाचल प्रदेश जैसे राज्यों में तो शासन ने आश्रम से जमीनें छीन ली हैं.
गुजरात के मोटेरा आश्रम में 2008 में 2 मासूम चचेरे भाइयों दीपेश और अभिषेक वाघेला की लाशें नदी की तलहटी में मिली थीं. ये आसाराम के आश्रम में रहते थे. उन के मातापिता ने काला जादू के नाम पर हत्या की आशंका जताई थी. इस साल जनवरी में भी ओडिशा का एक साधक खून से लथपथ हालत में मृत मिला था.
2008 में ही छिंदवाड़ा के गुरुकुल में 2 छात्रों के शव बाथरूम में मिले थे. उस समय इस आश्रम को बंद करने की मांग उठी थी. जिस नाबालिग से दुष्कर्म के मामले में आसाराम को सजा हुईर् है वह भी इसी गुरुकुल में पढ़ती थी.
70 के दशक में साबरमती तट के छोटे से आश्रम से निकल कर 19 देशों में 400 से अधिक आश्रमों, 4 करोड़ से ज्यादा भक्तों और 10 हजार करोड़ रुपए से भी अधिक की संपत्ति का स्वामी बना आसाराम ऐसा नाम है जो धर्म की डगर पर सरपट दौड़ता रहा. उस के आगे नतमस्तक बड़ेबड़े राजनेता, उद्योगपति और राजनीतिबाज उस की राह आसान बनाते रहे.
अहमदाबाद के मोटेरा में आसाराम ने एक कुटिया बनाईर् थी. कुछ समय बाद यहां आश्रम बन गया. इस के बाद राज्य सरकार उसे जमीन दान में देती रही.
80 से 90 के दशक के बीच कांग्रेस सरकार ने 14 हजार 500 वर्ग मीटर जमीन दान दी. 1997 से 1999 के बीच भाजपा सरकार उस पर मेहरबान हुई. उसे 23 हजार वर्ग मीटर जमीन और दे दी. इस के बाद 10 एकड़ जमीन दी गई.
इसी तरह मध्य प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड की सरकारों ने उसे जमीनें दीं. कई जगह तो जमीनें कब्जा ली गईं. छिंदवाड़ा में 10 एकड़ जमीन पर आश्रम है, यह जमीन किसी महिला की थी, जिस की हत्या के बाद इसे हड़प लिया गया. अहमदाबाद में एक किसान ने आसाराम पर 15 हजार गज जमीन कब्जाने का आरोप लगाया था. दिल्ली के रिज क्षेत्र में कई एकड़ में आश्रम बना कर सरकारी जमीन कब्जा ली गई, जिस का मामला अदालत में है.
इस तरह जमीन के बिना ही आसाराम की कुल संपत्ति करीब 10 हजार करोड़ रुपए आंकी गई. यह बात 2014 में उस के विभिन्न आश्रमों में छापों के दौरान बरामद दस्तावेजों से साबित हुई.
और भी हैं चाणक्य
ये ढोंगी लोगों को त्याग और आत्मसंयम की सीख देते हैं जबकि खुद महंगी गाडि़यों में घूमते हैं. आलीशान आश्रमों में रहने वाले इन ढोंगियों की फेहरिस्त लंबी है. इन में आसाराम, उस का बेटा नारायण साईं, निर्मल बाबा उर्फ निर्मलजीत सिंह, राधे मां उर्फ सुखविंदर कौर, इच्छाधारी बाबा भीमानंद उर्फ शिवमूर्ति द्विवेदी, स्वामी नित्यानंद, सच्चिदानंद उर्फ सचिन दत्ता शामिल हैं. ये बाबा स्वयं को भगवान बताने से परहेज नहीं करते.
पिछले कईर् सालों से हिंदुत्व को ले कर कारोबारी संतों, ज्योतिषियों और धर्म के तथाकथित संगठनों व राजनीतिबाजों ने हिंदुओं को पूरी तरह से गर्त में धकेल दिया पर हाल के दिनों में अदालतों की सख्ती से इन में से कइयों के ढोंग की पोलें खुली हैं.
कुछ दिनों पहले बाबा राम रहीम के आश्रम में चल रही काली करतूतों का काला चिट्ठा जगजाहिर हुआ था. हरियाणा की 2 लड़कियों ने राम रहीम पर बलात्कार का आरोप लगाया था. बाद में अदालत के आदेश पर उसे जेल भेज दिया गया. उस पर एक पत्रकार की हत्या का मामला भी दर्ज है. गुरमीत राम रहीम का साम्राज्य 700 एकड़ में फैला है.
दिल्ली के रोहिणी में आध्यात्मिक विश्वविद्यालय चलाने वाला कथित बाबा वीरेंद्र देव दीक्षित शिष्या के साथ दुष्कर्म के आरोप के बाद से फरार है. कहा जाता है कि बाबा 16,800 लड़कियों के साथ यौनसुख पाना चाहता था ताकि ऐसा करने के बाद उसे सिद्धि मिल सके.
आश्रम के अंदर सुरंग में बने कमरे में वह लड़कियों को गुप्त प्रसाद देने के बहाने दुष्कर्म व अश्लील हरकतें करता था.
इस से पहले हरियाणा में सतलोक आश्रम के बाबा रामपाल का साम्राज्य तहसनहस हुआ था. उस पर भी महिलाओं के साथ यौनशोषण, हत्या जैसे कई मामले हैं.
ऐसी तमाम घटनाएं बताती हैं कि बाबागीरी इस देश में इतना बड़ा धंधा है जहां बिना किसी निवेश के भक्तों की फसल बोईर् जा सकती है और उसे बारबार काट कर मालामाल हुआ जा सकता है.
अंधभक्त दर अंधभक्त
मजे की बात है कि आसाराम, रामपाल, राम रहीम जैसे बाबाओं की गिरफ्तारी के बाद भी इन के अंधभक्तों की जरा भी कमी नहीं हुई. इन्हीं अंधभक्तों की अंधश्रद्धा का फायदा उठा कर ये ढोंगी बाबा और स्वयंभू संत हर गलत काम को अंजाम देने से नहीं चूकते.
देशभर में कुकुरमुत्तों की तरह फैले बाबाओं ने सामाजिक विभाजन का पूरा फायदा उठाया. 4 वर्णों में बंटी मानसम्मान की मारी हजारों जातियां, उपजातियां ऐसे लोगों के चंगुल में फंसा दी गईं. दलितों, पिछड़ों को ईश्वर, पूजापाठ, मंदिरों से दूर रखा गया. इन बाबाओं ने इन वर्गों के लोगों को बरगलाया और अपने आश्रमों से जोड़ा. शिष्य मूंडे़ गए. उन्हें प्रवचनों में बुलाया गया. इन जातियों को जोड़ कर धूर्त और चालाक लोग गिरोह बना कर स्वयंभू संत, गुरु हो गए.
अपनी बातों में फंसा कर ये ढोंगी लोगों को बरगलाते हैं. आसाराम जैसे लोगों की वाकपटुता की वजह से भोलेभाले लोग आसानी से उन की बातों में आ जाते हैं. ये तरहतरह की मोहमाया त्याग, स्वर्गनरक, पापपुण्य, दानदक्षिणा के बहाने बना कर लोगों से पैसे ऐंठते रहते हैं. ये लोगों की कमजोरियों का फायदा उठाने की कला बखूबी जानते हैं. आस्था के नाम पर भक्तों के साथ खिलवाड़ किया जाता है.
ये पाखंडी धर्म की मार्केटिंग की बारीकियां जानते हैं. अखबार, टैलीविजन, इंटरनैट के माध्यम से लोगों के दुखों का उपाय करने के लिए स्वयं का प्रचार करते हैं. अपने दुखपरेशानियों में उलझी जनता इन के झांसे में आसानी से आ जाती है.
आसाराम विरोध करने वालों को चुप कराने की अकसर कोशिश कराता रहा. ‘सरिता’ ‘गृहशोभा’ पत्रिकाओं में आसाराम के पाखंडों के खिलाफ जब कुछ लिखा जाता था, तो वह अपने अनुयायियों, खासतौर से महिलाओं को भेज कर कार्यालय में हंगामा करवाता था. संपादक व लेखकों को धमकियां दी जाती थीं.
फर्जी बाबाओं का साम्राज्य रातोंरात खड़ा नहीं होता. धीरेधीरे ये जनता के दुखदर्द की नस पकड़ते हैं. धर्र्म के नाम पर ऐश करने वाले ये बाबा जितने दोषी हैं उतने ही इन के भक्त हैं. राम रहीम की गिरफ्तारी के वक्त उस के अंधभक्तों ने पंचकूला में बवाल मचाया था, जिस से कई लोगों की जानें चली गईं. सरकारी कार्यवाही में बाधा डालने की कोशिशें की जाती रहीं. उसी तरह आसाराम की गिरफ्तारी से ले कर सजा सुनाए जाने तक उस के अधंभक्त धमकियां, हत्याएं, तोड़फोड़, धरनेप्रदर्शन करते रहे.
धर्म का धंधा ऐसा धंधा है, जहां बिना किसी प्रयास के बड़ेबड़े राजनीतिबाज और रईसों की फौज न सिर्फ अनुयायी बनी दिखती है बल्कि आसाराम सरीखे ऐसे फर्जी चरित्र वालों की ढाल बन कर खड़ी भी नजर आती है.
नरेंद्र मोदी का आसाराम बापू के चरणों में सिर झुका कर प्रणाम करता हुआ वीडियो आजकल बहुत चर्चित है.
ये घटनाएं साबित करती हैं कि हमारा समाज किस तरह बाबाओं के सामने घुटने टेक कर बैठा हुआ है.
धर्मसंरक्षित यौनशोषण
दरअसल, यौनशोषण धर्र्म द्वारा संरक्षित है. धर्म की किताबों में देवताओं, अवतारों द्वारा स्त्रियों के साथ यौन संबंध बनाने, मौजमस्ती, ऐयाशी करने के किस्से भरे पड़े हैं. समाज की मानसिकता स्पष्ट है कि स्त्री दोयम दर्जे की है, पुरुष की अंकशायिनी बनना ही उस की नियति है. यही उस का धर्म है.
ग्रंथों में बलात्कार की अनगिनत कथाएं हैं. ब्रह्मा द्वारा अपनी पुत्री के साथ सहवास करना, ऋष्यशृंग, ऋषि पराशर द्वारा मछुआरे की बेटी के साथ, वेदव्यास द्वारा अंबिका, अंबालिका और दासी, महात्मा दीर्घतमा द्वारा सुदेष्णा और उन की दासी व अन्य ऋषियोंमुनियों द्वारा दूसरों की स्त्रियों व कन्याओं के साथ यौन संबंध बनाने की कहानियां भरी पड़ी हैं. ऐसे किस्से ढोंगी बाबाओं को ललचाते रहे हैं.
देखिए कुछ उदाहरण-
तत: कालेन महता मेनका परमाअप्सरा:,
पुण्करेषु नरश्रेष्ठ स्नातुं समुपचक्रमे.
तां ददर्श महातेजा मेनका कुशिकात्मज:,
रूपेणाप्रतिभा तत्र विद्युत जलदे यथा.
दृष्टवा कंदर्पवशमो मुनिस्तामिदमब्रवीत्,
अप्सरास्स्वागत तेअस्तु वस चेह ममाश्रमे.
अनुगृहीष्व भद्रं ते मदनेन सुमोहितम्.
(वाल्मीकि रामायण 1/63/4,5,6)
अर्थात बहुत समय बीत जाने पर मेनका नाम की परम सुंदरी अप्सरा पुष्कर में स्नान करने आई. महातेजस्वी विश्वामित्र ने कुशिक की पुत्री मेनका को देखा. अद्वितीय रूप वाली मेनका बादलों में बिजली के समान मालूम पड़ती थी. विश्वामित्र ने कामभावना के वशीभूत हो कर उस से कहा, ‘‘हे अप्सरा, तुम्हारा स्वागत है. तुम यहां आश्रम में रहो. मुझ काम मोहित पर तुम कृपा करो.’’
पराशर ऋषि ने सत्यवती से बलात्कार किया. पराशर सत्यवती के रूपसौंदर्र्य पर आसक्त हो गए और बोले, ‘‘देवी, मैं तुम्हारे साथ सहवास करना चाहता हूं.’’ सत्यवती ने कहा, ‘‘मुनिवर, आप ब्रह्मज्ञानी हैं और मैं निषाद कन्या. हमारा सहवास संभव नहीं है. मैं कुंआरी हूं, मेरे पिता क्या कहेंगे.’’ पराशर मुनि बोले, ‘‘बालिके, तुम चिंता मत करो. प्रसूति होने पर भी तुम कुंआरी ही रहोगी.’’ पराशर ने फिर मांग की तो सत्यवती बोली, ‘‘मेरे शरीर से मछली की दुर्गंध निकलती है.’’ तब उसे आशीर्र्वाद देते हुए पराशर ने कहा कि तुम्हारे शरीर से जो मछली की गंध निकलती है वह सुगंध में परिवर्तित हो जाएगी. इतना कह कर पराशर ने अपने योगबल से चारों ओर घने कोहरे का जाल रच दिया ताकि कोई उन्हें उस हाल में न देखे. इस प्रकार पराशर ने सत्यवती के साथ दैहिक संबंध कायम किया.
इसी तरह वेदव्यास द्वारा अंबिका, अंबालिका और उन की दासी के साथ यौन रिश्ते बनाए गए. इस से धृतराष्ट्र, पांडु और विदुर पैदा हुए.
लिखा है-
किं तु मातु: स वैगुण्यात् अंध एवं भविष्यति,
तस्य तद् वचनं शृवा माता पुत्रमथाब्रवीत. 10
नांघ: कुरुणां नृपतिरनुरूपस्तपोधन,
ज्ञाति वंशस्य गोप्तारे पितृणां वंशवर्द्धनम्. 11
द्वितीयं कुरुवंशस्य राजानं दातुमर्हसि,
स तथेति प्रतिज्ञाय निश्चक्राम महायशा:. 12
(महा. आदि पर्व, अध्याय 105)
सत्यवती ने व्यास से पुत्र उत्पन्न करने का अनुरोध पांडुवंश की सुरक्षा के लिए किया था. पहला पुत्र अंधा होने की आशंका थी, तो सत्यवती ने कहा कि अंधा बालक कुरुवंश का राजा नहीं हो सकता. ऐसा दूसरा पुत्र दो जो जाति तथा वंश की रक्षा करे. व्यास ने माता की बात मान ली.
ततोनिष्क्रांतमालोक्य सत्या पुत्रमथाब्रवीत,
शशंस स पुनर्मात्रे तस्य बालस्य पांडुताम्. 19
तं माता पुनरेवान्यमेकं पुत्रमयाचत्,
तथेति च महर्षिस्तां मातरं प्रत्यभाषत्. 20
(महा. आदि पर्व अध्याय 105)
दूसरी बार व्यास सहवास कर के निकले तो सत्यवती ने होने वाले बालक के विषय में पूछा. व्यास ने उसे पांडु रंग का बताया तो माता ने एक और बालक के लिए कहा और व्यास मान गए.
तीसरी बार जब व्यास गए तो अंबालिका ने स्वयं न जा कर व्यास के पास अपनी दासी भेज दी. व्यास ने उसे दासी जान कर भी उस से सहवास किया और प्रसन्न हो कर उसे दासीपन से मुक्त कर दिया.
इसी तरह महाभारत में भीष्मसत्यवती संवाद में दीर्घतमा मुनि द्वारा सुदेष्णा और उस की शूद्र दासी के साथ सहवास करने की कथा भी है.
कथा के अनुसार, सुदेष्णा दीर्घतमा धर्मात्मा को अंधा और बूढ़ा समझ कर उन से सहवास करना नहीं चाहती थी और उस ने अपनी शूद्र दासी को उस के पास भेज दिया. दीर्घतमा ने दासी को शूद्र समझते हुए भी कामुकता पूरी की और काक्षीवद् आदि 11 पुत्र उत्पन्न किए.
वाल्मीकि रामायण में कहा गया है-
देवतानां प्रतिज्ञाय गंगामभ्येत्य पावक:,
गर्भ धारय वै दैवि देवतानामिदं प्रियम्
समंततस्य देवीमभ्यषिंचत पावक:,
तमुवाच ततो गंगा सर्वदेवपुरोगमम्.
शक्ता धारणे देव तेजस्तव समुद्धतम्,
गंगा तं गर्भमतिभास्वरम्.
उत्ससर्ज महातेजा: स्रोतेभ्यो हि तदानद्य,
निक्षिप्त मात्रे गर्भे तु तेजोभिरभिरंजितम.
तं कुमारं ततो जातम्.
अर्थात देवताओं के पास प्रतिज्ञा कर के अग्नि देवता गंगा के पास आया और बोला, ‘‘हे देवी, तुम मुझ से गर्भधारण करो. देवताओं की इच्छा है.’’ तब अग्नि ने उसे गर्भधारण कर दिया. वह उस के तेजोमय गर्भ को धारण करने में कठिनाई अनुभव करने लगी. गंगा ने उस गर्भ को फेंक दिया. उस के फेंकने पर एक तेजस्वी बालक पैदा हुआ.
श्रीमद्भागवत पुराण की एक कथा में कहा गया है कि उतथ्य की गर्भवती पत्नी के साथ बृहस्पति ने बलात्कार किया और उस के वीर्य से भरद्वाज नामक पुत्र उत्पन्न हुआ. बाद में यही भरद्वाज एक बार गंगा स्नान को गया तो वहां कपड़े बदल रही घृताचि नामक अप्सरा को देख कर स्खलित हो गया. शरद्वान ऋषि भी जानपदी नाम की अप्सरा को कम कपड़ों में देख कर वीर्यपात कर बैठे जिस से कृप नामक बालक पैदा हुआ.
पुराणों के अनुसार, बहलाफुसला कर या जबरन स्त्रियों के साथ ऋषियों, मुनियों द्वारा संबंध बनाना बलात्कार नहीं माना जाता था. आसाराम, राम रहीम, रामपाल, वीरेंद्र देव दीक्षित जैसे लोग तो इसी धर्म के प्रतीक हैं. यह वही प्रवृत्ति है जो स्त्रियों के प्रति सदियों से पुराणों में चरितार्थ होती आई है. ये लोग आधुनिक चरित्र हैं जिन्हें स्त्रियों के शोषण का धार्मिक हक प्रदान था.
पौराणिक काल में राजा ऐसे ऋषियों को भूमि, धनसंपत्ति और कन्याएं दे कर कृतार्थ होते रहे.
आज के बाबा
आधुनिक साधु और बाबा आज अगर बलात्कार के मामलों में लिप्त पाए जाते हैं तो आश्चर्य कैसा? ये लोग धार्मिक किताबों की कथाओं का फायदा उठाते आए हैं. अपने प्रवचनों में और स्त्रियों को बहलाफुसला कर बिस्तर पर लाने के लिए ऐसी कहानियों का भरपूर इस्तेमाल करते हैं. ये खुद को ईश्वर का अवतार बता कर स्त्रियों को राजी करने में कामयाब हो जाते हैं. इसी वजह से कथित चमत्कारी बाबाओं और स्वयंभू भगवानों द्वारा स्त्रियों के शोषण के किस्से हमेशा से प्रकाश में आते रहे हैं.
सोचने की बात है कि हम किस तरह के समाज में रह रहे हैं. हमारे ज्ञान पर हमें शर्मसार होना चाहिए. हमारा ज्ञान लज्जित नहीं हो रहा? तमाम वैज्ञानिक तरक्की के बावजूद विज्ञान की धज्जियां उड़ रही हैं. अज्ञान का अंधकार चारों ओर दिख रहा है.
सवाल है कि क्या आसाराम, राम रहीम, रामपाल के साथ धर्म का यह घिनौना ढोंग आजीवन कैद हो गया है? नहीं, जब तक इस देश में लोग धर्म, साधुसंत, गुरु, प्रवचकों में सुख, समृद्धि, शांति, ऐश्वर्य तलाशते रहेंगे, तब तक नए आसाराम, रामपाल, रामरहीम पैदा होते रहेंगे और लोगों को ठगते रहेंगे, स्त्रियों का यौनशोषण करते रहेंगे.
हाल के दशकों में कितने ऐसे साधु या बाबा हुए जिन्होंने कोई सुधार या जनजागृति का काम किया हो? कहां हैं धर्म की अच्छाइयों का बखान करने वाले नेता और हिंदू धर्र्म के संगठन? जो संगठन और उन के कार्यकर्ता हाथों में भगवा झंडा और सिर और कंधे पर भगवा दुपट्टा डाले धर्म की अलख जगाते सड़कों पर घूमते नजर आते हैं क्या वे पहले हिंदू धर्म की इस भीतरी गंदगी को साफ करने का बीड़ा उठाएंगे?
क्या अब ऐसे तमाम बाबाओं, साधुसंतों, गुरुओं के खिलाफ समाज को उठ खड़े होने का वक्त नहीं आ गया? इन के विरुद्ध क्रांति की आवश्यकता नहीं है? क्या अभी भी समाज को और ठगे जाने की घटनाओं का इंतजार है?
अमृतसर के जीटी रोड से सटे व्यस्तम इलाके दशमेश एवेन्यू की कोठी नंबर 157 से 4-5 फरवरी की आधी रात के बाद अचानक धुआं उठने लगा. वह कोठी गगनदीप वर्मा की थी. फरवरी का महीना होने के कारण अधिक ठंड भी नहीं थी फिर भी लोग अपनेअपने घरों में घुसे हुए थे.
कोई राहगीर सड़क से गुजरा भी तो उस ने इस तरफ ध्यान नहीं दिया. कुछ ही देर में कोठी से आग की ऊंची लपटें उठने लगीं, जिन्होंने कोठी को चारों तरफ से घेर लिया था.
आग बढ़ने पर मोहल्ले के तमाम लोग अपने घरों से निकल कर गगनदीप वर्मा की कोठी की तरफ दौड़ पड़े. सभी अपनेअपने तरीके से कोठी में लगी आग को बुझाने की कोशिश करने लगे. इस बीच किसी ने फायर ब्रिग्रेड और थाना सुलतानविंड पुलिस को सूचना दे दी थी.
घटना की सूचना मिलते ही फायर ब्रिगे्रड के साथ थाना सुलतानविंड के थानाप्रभारी नीरज कुमार, एसआई राजवंत कौर, एएसआई अर्जुन सिंह, दर्शन कुमार, हवलदार लखविंदर कुमार, गुरनाम सिंह, बलविंदर सिंह, गुरमेज सिंह, हरजिंदर सिंह, कांस्टेबल सुनीता के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए.
आग की लपटें लगातार बढ़ती जा रही थीं. सुरक्षा के लिहाज से थानाप्रभारी ने आसपास के घरों को भी खाली करवा लिया था. फायर ब्रिग्रेड के कर्मचारी लगातार आग बुझाने की कोशिश में लगे रहे, तब कहीं सुबह साढ़े 6 बजे तक आग पर काबू पाया गया.
आग बुझने के बाद पड़ोसी पुलिस के साथ जब कोठी के भीतर गए तो सब के पैरों तले से जमीन खिसक गई. भीतर का नजारा डरावना और दिल दहला देने वाला था. कोठी में मालकिन गगनदीप वर्मा और उन की बेटी शिवनैनी की झुलसी हुई लाशें पड़ी थीं.
थानाप्रभारी ने यह जानकारी अपने वरिष्ठ अधिकारियों को भी दे दी. जिस के बाद अमृतसर के सीपी एस.एस. श्रीवास्तव, एडीसीपी जे.एस. वालिया, एडीसीपी हरजीत सिंह धारीवाल और एसीपी मंजीत सिंह घटनास्थल पर पहुंच गए. थानाप्रभारी ने क्राइम इन्वैस्टीगेशन टीम को भी मौके पर बुलवा लिया.
पुलिस जांच कर रही थी तभी वहां एक 48 वर्षीय संजीव वर्मा नाम का शख्स आया. वह खुद को गगनदीप वर्मा का भाई बता रहा था. उस ने बताया कि वह 2 भाईबहन थे. उस के पिता रामदेव और मां जीवन रानी की मृत्यु हो चुकी है. वह अपनी पत्नी गीता और बेटे चंदन के साथ जंडियाला गुरु स्थित मकान नंबर 1334 में रहता है. पेशे से वह डाक्टर है और घर के पास ही उस का क्लीनिक है.
पड़ोसियों से पूछताछ करने पर पता चला कि दोनों मांबेटी किसी से कोई संबंध नहीं रखती थीं. यहां तक कि पड़ोसियों के घर भी उन का कम आनाजाना था. शिवनैनी का शव जिस आपत्तिजनक हालत में मिला उस से रेप की आशंका जताई जा रही थी.
वरिष्ठ पुलिस अधिकारी थानाप्रभारी को दिशा निर्देश दे कर चले गए. इसके बाद थानाप्रभारी नीरज कुमार ने जरूरी काररवाई कर के दोनों लाशों को पोस्टमार्टम के लिए सरकारी अस्पताल भेज दिया.
पुलिस कमिश्नर ने थानाप्रभारी नीरज कुमार के साथ क्राइम ब्रांच के जिला इंचार्ज इंसपेक्टर वविंदर महाराज को भी लगा दिया था. वे सब पुलिस अधिकारी इस दोहरे हत्याकांड की जड़ें खोदने में जुट गए.
हत्या की वजह अभी तक सामने नहीं आई थी. लेकिन यह अनुमान लगाया गया कि हत्या में किसी करीबी का हाथ रहा होगा. गगनदीप वर्मा का बेटा रिधम कनाडा में रह रहा था. उसे भी मां और बहन की हत्या की सूचना दे दी गई. ताकि वह जल्द से जल्द इंडिया आ कर अपनी मां बहन की लाशें देख सके. थानाप्रभारी को इस बात की भी उम्मीद थी कि रिधम के आने के बाद शायद कोई ऐसी बात पता चल सके जिस से हत्यारों तक पहुंचने में मदद मिले.
बहरहाल पुलिस को इसी बात की आशंका थी कि वारदात में ऐसे शख्स का हाथ रहा होगा जिस का उस कोठी में आनाजाना रहा हो. यानी कोई नजदीकी व्यक्ति ही वारदात में शामिल रहा होगा.
पुलिस ने मृतका गगनदीप के भाई डा. संजीव वर्मा से एक बार फिर पूछताछ की. उस ने बताया कि 25 साल पहले उस के मांबाप ने अपने जीतेजी गगनदीप वर्मा की शादी नवजोत सिंह के साथ कर दी थी. शादी के बाद एक बेटा रिधम और बेटी शिवनैनी पैदा हुई. दोनों बच्चों की अच्छी परवरिश होने लगी.

इस के बाद नवजोत सिंह स्टडी करने कनाडा चला गया. इस के बाद वह वापस नहीं लौटा. मजबूरी में गगनदीप ने जंडियाला के सरकारी सीनियर सैकेंडरी स्कूल में क्लर्क की नौकरी कर ली. इसी से उन्होंने दोनों बच्चों को पढ़ाया लिखाया. गगनदीप ने बेटे रिधम को भी अपने एक रिश्तेदार के माध्यम से कनाडा भेज दिया.
घर पर केवल मांबेटी ही रह गए थे. ग्रैजुएशन के बाद शिवनैनी इन दिनों बीएड की तैयारी कर रही थी. जिस कोठी में यह दोनों रह रही थीं, वह उन्होंने 4 साल पहले ही बनवाई थी. कोठी क्या यह एक प्रकार का किला था. चारों तरफ से बंद, जहां उन की मरजी के बिना कोई परिंदा भी पर न मार सके. जब उन की कोठी इतनी सुरक्षित थी तो ऐसा कौन आ गया, जिस ने दोनों की हत्या कर दी, पुलिस यह बात नहीं समझ पा रही थी.
पुलिस की जांच की सुई गगनदीप के रिश्तेदारों और पहचान वालों पर आ कर अटक गई. पुलिस ने मृतका गगनदीप और उन की बेटी के मोबाइल नंबरों की काल डिटेल्स खंगालनी शुरू कीं. साथ ही यह भी जांच की कि घटना वाली रात को दशमेश एवेन्यू एरिया में स्थित फोन टावर के संपर्क में कितने फोन नंबर आए थे.
उन फोन नंबरों की भी पुलिस ने जांच शुरू कर दी. अगले दिन दोनों लाशों का पोस्टमार्टम कराया गया. पोस्टमार्टम के समय पुलिस ने वीडियोग्राफी भी करवाई. कनाडा से मृतका का बेटा भी पंजाब नहीं लौट सका. उस की गैरमौजूदगी में दोनों लाशों का अंतिम संस्कार किया गया.
साइबर क्राइम सेल फोन नंबरों की जांच में जुटी हुई थी. साइबर सैल ने शिवनैनी की फेसबुक आईडी को भी अच्छी तरह खंगालना शुरू किया. पुलिस ने शक के आधार पर एक दरजन से ज्यादा हिस्ट्रीशीटरों व अन्य लोगों को भी पूछताछ के लिए उठाया. लेकिन उन से कोई सफलता नहीं मिली.
पुलिस टीम हत्या के इस मामले को कहीं नहीं न कहीं अवैध सबंधों से जोड़ कर भी देख रही थी. रिधम ने फोन पर हुई बात में इस हत्याकांड के पीछे अपने किसी रिश्तेदार का हाथ होने की शंका जताई.
पुलिस ने जब तफ्तीश की तो इस मामले में शहर के 2 बडे़ नेताओं के नाम सामने आए. यह नाम मांबेटी के फोन नंबरों की काल डिटेल्स खंगालने के बाद सामने आए थे.
इस दोहरे हत्याकांड के 48 घंटे बीत जाने के बाद भी पुलिस के हाथ खाली रहे. उधर रिधम भी कनाडा से नहीं लौट पाया था. गगनदीप और एक पार्षद के बीच फोन पर जो बातचीत होने के सबूत मिले थे, उस ने उन दोनों के संबंधों को भी शक के दायरे में ला कर खड़ा कर दिया था.
थानाप्रभारी नीरज और इंसपेक्टर वविंदर महाराज पूरे मामले की कड़ी से कड़ी जोड़ कर विचारविमर्श कर रहे थे कि अचानक थानाप्रभारी का ध्यान रिधम के खास दोस्तों 21 वर्षीय पंकज शर्मा और 18 वर्षीय नीरज निवासी गुरु गोविंदसिंह नगर की ओर गया.
हालांकि यह एक संभावना थी. इस का कोई ठोस सबूत या वजह नहीं थी, फिर भी वह पंकज शर्मा और नीरज से पूछताछ के लिए उन के घर पहुंच गए. वहां पता चला कि पंकज और नीरज दोनों ही गरीब परिवारों से हैं. पंकज के पिता सोफा मरम्मत का काम करते हैं जबकि नीरज ओपन स्कूल से पढ़ाई करता है. दोनों ही दोस्त आवारा किस्म के थे. मौजमस्ती और अपने खर्चे के लिए वह छोटीमोटी चोरी और ठगी भी करते थे.
पुलिस टीम जब पंकज के घर पहुंची तो पंकज के पिता ने बताया कि पंकज और नीरज 5 फरवरी की रात से गायब हैं. इस के बाद उन दोनों पर पुलिस का शक बढ़ गया. पुलिस उन की तलाश में जुट गई.
एक मुखबिर की सूचना पर पुलिस ने दोनों को गिरफ्तार कर लिया. थाने ला कर जब उन से गगनदीप और उन की बेटी की हत्या के संबंध में पूछताछ की गई तो उन्होंने आसानी से स्वीकार कर लिया कि उन्होंने ही गगनदीप और उन की बेटी की हत्या कर के कोठी में आग लगाई थी. उन्होंने उन की हत्या की जो कहानी बताई वह आस्तीन का सांप बन कर डंसने वाली निकली.
दरअसल पंकज और नीरज की गगनदीप के बेटे रिधम से अच्छी दोस्ती थी. दोस्ती के नाते उन का गगनदीप के यहां आनाजाना था. कुछ दिनों पहले रिधम कनाडा चला गया तो पंकज और नीरज का उन के यहां आनाजाना बंद हो गया. ये दोनों दोस्त कोई कामधंधा करने के बजाए दिन भर नशा कर के खाली घूमते थे. साथ ही उन्हें अय्याशी का भी शौक लग गया था.
अपने शौक पूरे करने के लिए उन्हें पैसों की जरूरत पड़ती थी, लिहाजा उन्होंने छोटीमोटी चोरियां करनी शुरू कर दीं. साथ ही कोई लालच दे कर लोगों को ठग लेते. लेकिन अभी तक दोनों कभी पुलिस के हत्थे नहीं चढ़़े थे.
दोनों कोई ऐसा काम करने की सोच रहे थे जिस से उन के हाथ मोटा पैसा लग सके और रोजरोज की छोटीमोटी चोरी न करनी पड़े. 4 फरवरी, 2018 को दोनों इसी विषय पर चर्चा कर रहे थे, तभी पंकज बोला, ‘‘यार मेरे पास एक बिना रिस्क का आसान तरीका है. इस में इतना पैसा मिलेगा कि हम रात दिन ऐश कर सकते हैं और मजे की बात यह है कि हम पर किसी को रत्ती भर भी शक भी नहीं होगा.’’ पंकज ने बताया.
नीरज ने खुश होते हुए कहा, ‘‘जल्दी भौंक, देर क्यों कर रहा है. और यह भी कि करना क्या है?’’
‘‘रिधम के घर डकैती.’’ पंकज बोला.
‘‘अबे तेरा दिमाग तो खराब नहीं है. जानता नहीं वह हमारा बचपन का दोस्त है. हम साथ खेले और साथ खातेपीते रहे हैं. नहीं, यह गलत काम है.’’ नीरज ने साफ मना कर दिया.
‘‘अबे गधे उन के पास करोड़ों रुपया है और फिर रिधम भी आजकल कनाडा में है. हम पर कौन शक करेगा?’’ पंकज ने समझाया.
बाद में पंकज की बात उस की समझ में आ गई. पंकज व नीरज को पता था कि इस समय दोनों मांबेटी घर में अकेली रहती हैं. इसलिए वहां काम को अंजाम देना आसान हो जाएगा.
योजना के अनुसार पंकज शर्मा व नीरज कुमार ने बाजार से क्लोरोफार्म की शीशी खरीद ली और 4-5 फरवरी की रात सवा 8 बजे गगनदीप वर्मा के घर चले गए. गगनदीप दोनों को अच्छी तरह जानती ही थीं. इसलिए उन्होंने दरवाजा खोल दिया. दोनों हत्यारोपी अंदर जा कर बैठ गए.

चाय पीने के बाद पंकज शर्मा ने गगनदीप को क्लोरोफार्म सुंघाई, जिस से वह बेहोश हो कर बिस्तर पर गिर गईं. इस के बाद दोनों ऊपर की मंजिल पर बैठी शिवनैनी के कमरे में दाखिल हुए और उसे भी क्लोरोफार्म सुंघा कर बेहोश कर दिया. दोनों आरोपियों ने घर की तलाशी ली और कुछ ज्वैलरी के साथसाथ नकदी भी चुरा ली. नीयत खराब होने पर दोनों ने बेहोशी की हालत में पड़ी शिवनैनी से अश्लील हरकतें भी कीं.
गगनदीप और उन की बेटी के होश में आने पर उन का भेद खुलना लाजिमी था. इसलिए उन्होंने सुबूत मिटाने के लिए गगनदीप व उन की बेटी शिवनैनी की हत्या करने की योजना बनाई. उन्होंने कोठी में आग लगा दी और मौके से फरार हो गए.
पुलिस ने पंकज और नीरज से विस्तार से पूछताछ के बाद उन्हें अदालत पर पेश कर के 5 दिनों के पुलिस रिमांड पर ले लिया. रिमांड के दौरान दोनों अभियुक्तों की निशानदेही पर पुलिस ने 85 ग्राम सोने, चांदी की ज्वैलरी, एक टेबलेट, कैमरा, लैपटौप व अन्य कीमती सामान बरामद कर लिया.
पुलिस ने रिमांड अवधि समाप्त होने पर अभियुक्त पंकज और नीरज को पुन: अदालत में पेश किया गया, जहां से दोनों को जिला जेल भेज दिया गया.
– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित
उत्तर प्रदेश के जिला सीतापुर के थाना महमूदाबाद का एक गांव है बेहटी मानशाह. इसी गांव का रामकुमार 19 फरवरी, 2018 को बड़ी बेचैनी से घर के आंगन में इधर से उधर चक्कर लगा रहा था. बारबार उस की निगाहें एक उम्मीद से दरवाजे की तरफ उठतीं और फिर अगले ही पल निराश हो कर दूसरी ओर देखने घूम जातीं.
रामकुमार की बेचैनी की वजह थी, उस की 19 वर्षीय बेटी सावित्री, जो शाम 5 बजे सिरौली में लगने वाले बाजार के लिए निकली थी, लेकिन रात में काफी देर होने के बाद भी वह घर नहीं लौटी थी. एकलौती बेटी के साथ कोई अनहोनी न हो गई हो, इस आशंका से उस का दिल घबरा रहा था.
सावित्री गांव की ही शांति नाम की एक महिला के साथ बाजार गई थी. रामकुमार शांति के घर पता लगाने के लिए गया. शांति का घर गांव की सीमा पर एकांत में था. वह शांति के घर पहुंचा तो वह घर पर ही मिल गई.
रामकुमार ने उस से बेटी के बारे में पूछा तो उस ने बताया कि सावित्री उस के साथ बाजार गई तो थी, लेकिन बीच रास्ते में ही उसे कोई काम याद आ गया था तो वह वापस लौट आई थी.
शांति की बात सुन कर रामकुमार के दिमाग में विचार आया कि अगर वह बीच रास्ते से लौट आई थी तो अभी तक घर क्यों नहीं पहुंची. आखिर क्या हुआ उस के साथ. वह शांति के घर से वापस लौट आया. चूंकि उस समय काफी रात हो गई थी. मोहल्ले के लोग भी अपनेअपने घरों में सो गए थे, पर बेटी की चिंता में वह पूरी रात नहीं सो पाया.
अगले दिन सुबह होते ही वह अपने दोनों बेटों मुकेश और सुरेश के साथ सावित्री की खोज में लग गया. तीनों इधरउधर सावित्री को ढूंढ ही रहे थे कि गांव के कुछ लोगों ने रामकुमार को बताया कि सावित्री की लाश सुरेश के गन्ने के खेत में लगे यूकेलिप्टस के पेड़ से बंधी हुई है.
यह खबर मिलते ही रामकुमार दोनों बेटों के साथ मौके पर पहुंच गया. वहां पेड़ से उस की बेटी की लाश बंधी मिली. बेटी की लाश देख कर वह फूटफूट कर रोने लगा. गांव के तमाम लोग भी वहां पहुंच चुके थे. किसी ने फोन द्वारा इस की सूचना थाना महमूदाबाद को भी दे दी.
सूचना पाकर थानाप्रभारी रंजना सचान पुलिस टीम के साथ घटनास्थल के लिए रवाना हो गईं. जाने से पहले उन्होंने मामले की सूचना अपने उच्चाधिकारियों को भी दे दी थी. पुलिस ने घटनास्थल का मुआयना किया. सावित्री की लाश यूकेलिप्टस के पेड़ से बंधी थी. उस के गले पर किसी तेज धारदार हथियार से काटने के निशान थे.
घटनास्थल का निरीक्षण करने पर वहां हत्या से संबंधित कोई सबूत नहीं मिल सका. इसी बीच एसपी आनंद कुलकर्णी, एएसपी मार्तंड प्रताप सिंह, सीओ (महमूदाबाद) जावेद खान भी वहां पहुंच गए.
उच्चाधिकारियों ने भी लाश और घटनास्थल का निरीक्षण किया. उन्होंने मृतका के पिता रामकुमार व वहां मौजूद अन्य लोगों से भी पूछताछ की. इस के बाद एसपी आनंद कुलकर्णी थानाप्रभारी रंजना सचान को जरूरी दिशानिर्देश दे कर चले गए. थानाप्रभारी ने मौके की जरूरी कार्रवाई करने के बाद सावित्री की लाश पोस्टमार्टम के लिए सीतापुर के जिला अस्पताल भेज दी.
थानाप्रभारी ने रामकुमार की तहरीर के आधार पर अज्ञात के खिलाफ भादंवि की धाराओं 302/201 और एससी/एसटी एक्ट 3 (2) 5 के तहत मुकदमा दर्ज करवा दिया.
पुलिस ने जांच की तो यह बात सामने आई कि शांति ही सावित्री को बाजार के बहाने अपने साथ ले गई थी. लिहाजा शांति पुलिस के शक के दायरे में आ गई.
21 फरवरी, 2018 को शाम करीब साढ़े 7 बजे थानाप्रभारी रंजना सचान शांति के घर पहुंचीं. वह घर पर ही मिल गई. पूछताछ के लिए वह उसे थाने ले आईं. उन्होंने शांति से जब सख्ती से पूछताछ की तो घटना का राजफाश हो गया.

उस से पूछताछ के बाद पुलिस ने उसी रात करीब 10 बजे सावित्री के गांव के ही रहने वाले उस के प्रेमी महेंद्र यादव उर्फ सगुनी को सिरौली तिराहे से गिरफ्तार कर लिया. शांति और महेंद्र यादव से पूछताछ के बाद सावित्री की हत्या की जो कहानी सामने आई, वह इस प्रकार निकली—
महेंद्र यादव बेहटी मानशाह गांव के रहने वाले राजबहादुर यादव का बेटा था. महेंद्र के अलावा राजबहादुर यादव के एक बेटी व 3 बेटे और थे. राजबहादुर खेतीकिसानी से परिवार का ठीक से पालनपोषण कर रहा था.
वह अपनी बेटी और 3 बेटों की शादी कर चुका था. केवल महेंद्र ही शादी के लिए रह गया था. वह सब से छोटा था, जिस से उस पर कोई जिम्मेदारी भी नहीं थी. इसलिए वह दिन भर दोस्तों के साथ इधरउधर घूमताफिरता रहता था.
राजबहादुर के मकान से कुछ ही दूरी पर रामकुमार अपने परिवार के साथ रहता था. उस के परिवार में 2 बेटों मुकेश और सुरेश के अलावा एक बेटी सावित्री थी. करीब 14 साल पहले रामकुमार की पत्नी जयदेवी गांव के ही एक व्यक्ति के साथ भाग गई थी, जिस के बाद वह आज तक नहीं लौटी.
रामकुमार ने बिन मां के बच्चों को बड़े प्यार से पाला. उन्हें किसी प्रकार की तकलीफ नहीं होने दी. उस ने पिता के साथसाथ मां का भी फर्ज अदा किया. उस की एकलौती बेटी सावित्री ने घर की जिम्मेदारी बखूबी संभाल ली थी.
एक दिन सावित्री घर का खाना बना कर निपटी तो उस ने देखा कि घर में पीने का पानी नहीं है. वह बाल्टी ले कर अपने घर से कुछ दूरी पर स्थित सार्वजनिक हैंडपंप पर पहुंची. वहां कुछ औरतें पहले से पानी भर रही थीं. वहीं पास में ही एक मकान के चबूतरे पर महेंद्र अपने 2 दोस्तों के साथ बैठा बातें कर रहा था.
उन सब से अंजान सावित्री झुक कर हैंडपंप चला रही थी. हैंडपंप के हत्थे के साथसाथ उस का शरीर भी ऊपरनीचे हो रहा था. अचानक महेंद्र की नजर सावित्री पर पड़ी तो महेंद्र के दिल की घंटी बज उठी. सावित्री को ले कर महेंद्र के मन में चाहत पैदा हो गई.
हालांकि महेंद्र ने इस से पहले भी सावित्री को देखा था, पर उस के दिल में ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था. महेंद्र जिद्दी स्वभाव का था. उस ने उसी समय तय कर लिया था कि वह सावित्री को हर हाल में पा कर रहेगा.
उस दिन महमूदाबाद कस्बे में महाशिवरात्रि का मेला था, जिस से उस दिन वहां ज्यादा चहलपहल व शोरगुल था. बच्चों व बड़ों में उत्साह बना हुआ था. महेंद्र भी मेले में घूमने गया. अचानक उस की निगाह सावित्री पर चली गई.
वह अपनी एक सहेली के साथ आई थी. सावित्री एक दुकान पर खड़ी अपने लिए कंगन देख रही थी. वह काफी बनसंवर कर मेले में आई थी. सचमुच उस दिन वह बेहद खूबसूरत दिख रही थी. दूर खड़ा महेंद्र उस की खूबसूरती को निहार रहा था और मन ही मन हसीन कल्पना कर रहा था. वह यह भी सोच रहा था कि कैसे सावित्री से बात शुरू कर के नजदीकियां बढ़ाए. तभी सावित्री की सहेली एक दूसरी दुकान पर कुछ सामान खरीदने चली गई तो महेंद्र खुश हो उठा और वह सावित्री के पास पहुंच गया. सावित्री उस समय कंगन पसंद कर रही थी, तभी महेंद्र ने कहा, ‘‘सावित्री, तुम पर यह लाल वाला कंगन ज्यादा अच्छा लगेगा.’’
अपना नाम सुन कर पहले तो सावित्री चौंकी. जब उस ने नजरें उठा कर देखा तो महेंद्र को देखते ही वह बोली, ‘‘अरे महेंद्र तुम, तुम इस बिसाती की दुकान से क्या खरीद रहे हो?’’
‘‘मैं तो कुछ नहीं खरीद रहा लेकिन इधर घूमते समय मैं ने तुम्हें यहां देखा तो चला आया. वैसे आज तुम बहुत खूबसूरत लग रही हो.’’ महेंद्र ने तारीफ की.
अपनी तारीफ सुन कर सावित्री खुश होते हुए बोली, ‘‘तुम भी कोई कम हैंडसम नहीं हो.’’
‘‘सच… तुम्हारे मुंह से यह सुन कर मुझे अच्छा लगा. तो ठीक है, तुम वही लाल कंगन ले लो. मुझे अच्छे लग रहे हैं.’’ मुसकराते हुए महेंद्र ने कहा.
‘‘ठीक है, मैं लाल कंगन ही ले लेती हूं.’’ सावित्री ने दुकानदार की तरफ देखते हुए कहा, ‘‘भैया, ये लाल कंगन पैक कर देना.’’
सावित्री ने मुसकराते हुए उस की बात मान ली तो महेंद्र का दिल तेजी से धड़क उठा. महेंद्र ने झट से दुकानदार को कंगन के पैसे दे दिए. यह देख कर सावित्री मना करने लगी. तब महेंद्र ने कहा, ‘‘कम से कम नई दोस्ती के नाम पर पैसे देने दो. वैसे भी मैं कोई अजनबी तो हूं नहीं, तुम्हारा पड़ोसी ही हूं. इसलिए इतना तो हक बनता है मेरा.’’
‘‘ठीक है, मैं तुम्हारी बात मान लेती हूं. लेकिन अब तुम मेरे लिए पैसे खर्च नहीं करोगे.’’ मुसकराते हुए सावित्री ने कहा.
‘‘करूंगा…लेकिन सिर्फ एक जगह. मेरा मतलब है कि मेले में तुम्हारा मुंह मीठा जरूर कराऊंगा.’’ महेंद्र ने कहा तो सावित्री मुसकरा पड़ी.
बात को आगे बढ़ाते हुए महेंद्र ने कहा, ‘‘सावित्री, चलो न. सामने की मिठाई की दुकान पर दोनों चलते हैं. वहीं बैठ कर कुछ खाएंगे.’’
‘‘हम दोनों नहीं, बल्कि हम तीनों खाएंगे. मेरी सहेली भी मेरे साथ मेले में आई है.’’ सावित्री अभी बता ही रही थी कि उस की सहेली वहां आ गई.
सावित्री को महेंद्र के साथ बातें करते देख वह चहक उठी, ‘‘अरे तुम महेंद्र भैया के साथ? लगता है जानपहचान आगे बढ़ाई जा रही है.’’
‘‘अरे, हम दोनों पड़ोसी हैं तो क्या बात भी नहीं कर सकते. अब चलो मिठाई खाने दुकान पर.’’ महेंद्र ने कहा तो वे दोनों महेंद्र के साथ मिठाई की दुकान पर पहुंच गईं. वहां तीनों ने मिठाई और समोसे का स्वाद लिया. इस के बाद तीनों एक साथ मेला भी घूमे.
उस दिन के बाद से महेंद्र और सावित्री अकसर एकदूसरे से मिलने लगे और अपने दिल की बात करने लगे. महेंद्र स्मार्ट तो था ही, व्यवहार में भी मिलनसार था, इसलिए सावित्री बरबस उस की ओर आकर्षित होती चली गई. उस के दिल में भी महेंद्र के प्रति चाहत पैदा हो गई. एक दिन दोनों ने एकदूसरे से अपने प्रेम का इजहार भी कर दिया. इतना ही नहीं, उन्होंने जीवन भर साथ निभाने का वादा भी किया.

एक दिन मौसम सुहाना था और बारिश होने की पूरी संभावना थी. ऐसे में दोनों एकांत में बैठे प्रेमालाप कर रहे थे. वे एकदूसरे का हाथ थामे हुए थे, तभी रिमझिम फुहारें पड़ने लगीं. तब दोनों बारिश से बचने के लिए सुरक्षित जगह की ओर भागे. वे एक टूटेफूटे घर में घुस गए, जिस में कोई नहीं रहता था.
दोनों एकदूसरे को देख कर मुसकरा रहे थे. पानी की फुहारों से भीग कर सावित्री के कपड़े उस के तन से चिपक गए थे. सुनसान जगह के साथ मौसम का भी साथ मिला तो उन के दिल के साथ उन के तन भी एक हो गए.
तनमन से एक होने के बाद मुलाकातों का सिलसिला भी बढ़ गया. गांव में कोई जोड़ा प्यार की पींगें बढ़ाए और गांव वालों को पता न चले, यह तो संभव नहीं होता. जल्द ही उन दोनों के रंगढंग से गांव के लोग वाकिफ हो गए कि उन के बीच क्या खिचड़ी पक रही है.
सावित्री के पिता रामकुमार को जब बेटी के इश्क की बात पता चली तो उस के पैरों तले से जैसे जमीन खिसक गई. रामकुमार काफी समझदार था. वह जानता था कि ऐसे मामलों में बेटी के साथ मारपीट या बंदिश लगाने से कुछ नहीं होगा, बल्कि बैठ कर उसे प्यार से समझाना ही ठीक रहेगा.
उसी दिन रामकुमार ने सावित्री से बात की. उस समय रामकुमार के अलावा उस के घर में और कोई नहीं था. रामकुमार ने बेटी को समझाया कि उस की और महेंद्र की बिरादरी अलगअलग है, इसलिए उन के बीच कोई रिश्ता नहीं हो सकता.
और फिर यदि कल को कहीं महेंद्र ही बदल गया तो उस की तो जिंदगी बदतर हो जाएगी. इसलिए ऐसे में जिंदगी को जानबूझ कर परेशानियों में डालना अक्लमंदी का काम नहीं है.
पिता के मुंह से निकला एकएक शब्द सावित्री के दिमाग में बैठता चला गया. उसे अपने पिता के बातों में अपनी भलाई दिखी. इसलिए उस ने फैसला कर लिया कि अब वह महेंद्र से कोई रिश्ता नहीं रखेगी. अपने इस फैसले से उस ने पिता को भी अवगत करा दिया. बेटी की समझदारी पर रामकुमार भी खुश हो गया.
इस के बाद महेंद्र ने कई बार सावित्री से मिलने की कोशिश की लेकिन सावित्री उस से नहीं मिली. सावित्री में अचानक आए इस परिवर्तन से महेंद्र हैरत में पड़ गया. वह समझ नहीं पा रहा था कि जो सावित्री पहले उस के साथ विवाह करने को तैयार थी, वह अचानक बदल कैसे गई?
सावित्री के एकदम पलट जाने से महेंद्र बौखला गया. वह कई बार सावित्री से मिला और उसे समझाने की लाख कोशिश की लेकिन सावित्री नहीं मानी.
महेंद्र और सावित्री का मिलन कराने में गांव की शांति उर्फ संगीता नाम की महिला की खास भूमिका थी. महेंद्र की उस से पहले से ही दोस्ती थी. वह शांति को भाभी बुलाता था. शांति का पति गोपी एक ईंट भट्ठे पर मजदूर था. शांति के 2 बेटे व एक बेटी थी. इस के बावजूद वह गांव की उन कथित भाभियों में से थी, जो गांव के जवान बच्चों का भविष्य बिगाड़ने में लगी रहती हैं.
जब सावित्री और महेंद्र खेतों में मिलते थे तो शांति उन की चौकीदारी का काम करती थी. किसी के आने पर वह उन को आगाह कर देती थी. जब महेंद्र ने सावित्री से भाग कर विवाह कर लेने की बात कही तो सावित्री तैयार नहीं हुई.
महेंद्र ने इस काम में शांति को लगाया. शांति ने भी सावित्री को समझाने की भरपूर कोशिश की लेकिन सावित्री नहीं मान रही थी.
इस के बाद महेंद्र ने गांव के ही अपने दोस्त दयानंद मिश्रा, पिंटू यादव और शांति के साथ एक योजना बनाई. योजना के अनुसार 19 फरवरी, 2018 को महेंद्र दयानंद मिश्रा उर्फ पप्पू और पिंटू यादव को ले कर सुरेश के गन्ने के खेत में पहुंचा. फिर शांति से कह कर सावित्री को बाजार जाने के बहाने वहां बुला लिया. सावित्री के वहां पहुंचते ही महेंद्र ने अपने साथियों के साथ मिल कर सावित्री को पकड़ कर खेत में ही खड़े यूकेलिप्टस के पेड़ से बांध दिया.
महेंद्र ने सावित्री से एक बार फिर भाग कर विवाह करने के बारे में पूछा तो सावित्री ने साफ मना कर दिया. बेवफा माशूका के मुंह से ‘न’ सुन कर महेंद्र आगबबूला हो उठा.
उस ने सावित्री की नाक पर एक जोरदार घूंसा मारा, जिस से सावित्री बिलख कर रोने लगी और बेहोश हो गई. महेंद्र ने अपने साथियों के साथ मिल कर सावित्री के गले में पड़े दुपट्टे से उस का गला घोंट दिया.
सावित्री जीवित न रह जाए, इसलिए जेब से उस्तरा निकाल कर महेंद्र ने उस का गला भी रेत दिया. ऐसा उस ने एक बार नहीं कई बार किया. गला कटने से सावित्री की मौत हो गई. हत्या करने के बाद वे सभी वहां से फरार हो गए.
लेकिन उन का गुनाह पुलिस के सामने आ ही गया. थानाप्रभारी रंजना सचान ने शांति और महेंद्र की निशानदेही पर हत्या में प्रयुक्त उस्तरा और खून से सने कपड़े घटनास्थल से मात्र 100 मीटर की दूरी पर एक गेहूं के खेत से बरामद कर लिए. आवश्यक लिखापढ़ी करने के बाद दोनों अभियुक्तों को न्यायालय में पेश करने के बाद जेल भेज दिया गया.
कथा लिखे जाने तक पुलिस ने पिंटू यादव को भी गिरफ्तार कर जेल भेज दिया था, जबकि दयानंद मिश्रा फरार था. मामले की विवेचना सीओ (महमूदाबाद) जावेद खान कर रहे थे.
– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित
