बौलीवुड के नामी अभिनेता की बेटी को लौन्च कर सकते हैं सलमान खान

सुपरस्टार सलमान खान बौलीवुड में न्यूकमर्स के लिए किसी मसीहा से कम नहीं हैं. सोनाक्षी सिन्हा, जरीन खान, स्नेहा उलाल, डेजी शाह, अथिया शेट्टी, आदित्य पंचोली से लेकर अब तक कई स्टार्स बौलीवुड में ला चुके हैं. इस फेहरिस्त में अब एक नया नाम जुड़ सकता है. पिछले दिनों सलमान ने यह घोषणा की थी कि वह अपने बचपन के दोस्त के बेटे जहीर इकबाल को लौन्च करने वाले हैं. इस फिल्म के डायरेक्टर नितिन कक्कड़ होंगे. सलमान चाहते हैं कि इस फिल्म में जहीर के अपोजिट वह किसी नए चेहरे को ही दर्शकों के सामने पेश करें.

एक खबर की मानें तो सलमान खान को वह नया चेहरा मिल चुका है. वह खुशकिस्मत लड़की कोई और नहीं बल्कि सलमान के साथ कई फिल्मों में काम कर चुके अभिनेता मोहनीश बहल की बेटी प्रनुतन बहल हैं.

आपको बता दें कि प्रनुतन पहले ही फिल्मों में आने की अपनी ख्वाहिश जाहिर कर चुकी हैं. पिछले दिनों एक इंटरव्यू में प्रनुतन ने कहा था कि वह फिल्मों में आने के लिए बेताब है लेकिन वह अपने डेब्यू फिल्म में कुछ ऐसा रोल चाहती हैं, जिससे उन्हें याद रखा जाये.

आपको बता दें कि प्रनुतन सोशल मीडिया पर काफी एक्टिव रहती हैं और यहां उनकी फैन फौलोइंग खूब है. प्रनुतन अक्सर अपनी तस्वीरें सोशल मीडिया पर शेयर करती रहती हैं. उनकी तस्वीरों पर फैन अक्सर यह कमेंट करते हैं कि वह बिल्कुल अपनी दादी नूतन की तरह दिखाई देती हैं. इसके साथ आपको यह भी बता दें कि प्रनुतन को काफी पहले से फिल्मों के औफर मिल रहे हैं लेकिन प्रनुतन ने यह फैसला किया था कि जब तक वह अपनी एजुकेशन पूरा नहीं कर लेती तब तक वह फिल्मों में नहीं आएंगी.

क्या करें जब लग जाए आग

19 जून, 2018 को लखनऊ के व्यस्ततम इलाके चारबाग में 2 होटलों में भीषण आग लगने से 5 लोगों की मौत हो गई और कई गंभीर रूप से घायल हो गए.

13 जून को मुंबई के वर्ली में प्रभादेवी इलाके की व्यूमौंट बिल्डिंग में भीषण आग लग गई. आग इतनी भीषण थी कि दमकल की 6 बड़ी गाडि़यों व 5 टैंक मिल कर भी आग को घंटों बाद काबू कर पाए. 33 मंजिला इस टावर में अभिनेत्री दीपिका पादुकोण का भी एक फ्लैट है. आग पर काबू पाने में लगा घंटों का समय बताता है कि अगर सुरक्षा के इंतजाम न होते तो कई जानें जातीं.

बहरहाल, आग लगते ही धुएं से भरे स्थान पर, बस, एक ही पल में हम क्या निर्णय लेते हैं, उसी निर्णय पर, उसी पल पर निर्भर करता है कि हम अपने जीवन की सुरक्षा कर पाएंगे या नहीं. हम में से कोई भी किसी अनिष्ट की कल्पना नहीं करना चाहता, पर आगे के कदम के बारे में प्लान बना कर हम खुद को और अपने प्रियजनों को सुरक्षित कर सकते हैं.

फायर ऐंड सेफ्टी एसोसिएशन के प्रमुख पंकज का कहना है, ‘‘हमारे देश में आग से बचने के तरीकों व सावधानियों पर बहुत कम ध्यान दिया जाता है. ज्यादातर बिल्डर्स इसे गैरजरूरी समझते हैं कि आग लगने पर इस्तेमाल किए जाने वाले आवश्यक साधनों पर खर्च किया जाए. आप जब नई बिल्डिंग्स के विज्ञापन देखते हैं तो आप को उस में स्विमिंग पूल और लैंडस्केप दिखाए जाते हैं, लेकिन कभी यह नहीं बताया जाता कि आग लगने पर सुरक्षा के क्या साधन उपलब्ध हैं.’’

फायर एडवायजर पी देशमुख का इस बारे में कहना है, ‘‘रोकथाम और सुरक्षा पर ध्यान देना चाहिए. हर प्रौपर्टी, रैजीडैंशियल हो या कौमर्शियल, में बाहर निकलने के लिए उपयुक्त सीढि़यां होनी चाहिए. साल में कम से कम 2 बार सेफ्टी औडिट्स होने चाहिए और यह चैक कर लेना चाहिए कि आग बुझाने वाले सभी यंत्र, अलार्म सही हैं और ठीक तरह से काम कर रहे हैं.’’

आग से बचाव के लिए विशेषज्ञों के मुताबिक निम्न बातों की सभी को जानकारी होनी आवश्यक है-

  • सीढि़यों, दरवाजों और गलियारों में सामान न रखें. आग लगने पर लोग इन्हीं रास्तों से बाहर भागते हैं. आग लगते ही बिल्डिंग से बाहर निकल जाना चाहिए.
  • आग लगने पर फायर ब्रिगेड की गाड़ी को पहुंचने में 20 से 30 मिनट लग ही जाते हैं, इसलिए सुरक्षा आप की जागरूकता पर निर्भर करती है. अकसर कई बिल्ंिडग्स में आग बुझाने वाले यंत्र ऐसी जगह पर रहते हैं जहां वे दिखते ही नहीं हैं. याद रखिए, ऐसी स्थिति में आप के पास क्षणिक समय होता है, जिस में कुछ आवश्यक कदम उठा कर आप अपना और अपने प्रियजनों का जीवन बचा सकते हैं.
  • लोग इस आशंका पर कम ही ध्यान देते हैं कि उन के घरों में उन की अनुपस्थिति में भी आग लग सकती है. यदि आप के घर में बुजुर्ग मातापिता, छोटे बच्चे हैं तो अपने पड़ोसियों को इन के बारे में जरूर बता कर रखें. आग लगने पर सब से पहले खुद को सुरक्षित करें, फिर परिवार के अन्य सदस्यों की सहायता करें. याद रखें, यदि आप अक्षम हो गए तो किसी की भी सहायता नहीं कर पाएंगे.
  • यदि धुआं है तो अपना सिर नीचे रखें. यदि कोई भी सुरक्षा उपाय नहीं है तो अपना रूमाल पानी में भिगोएं और उसे अपनी नाक पर रख लें. यह कार्बन कणों को कुछ दूर करेगा, आप अच्छी तरह सांस ले सकेंगे.
  • यदि कमरे में आग लग गई है और दरवाजा बंद है तो तुरंत दरवाजा न खोलें. पहले हाथ से दरवाजा छुएं कि कितना गरम है. यदि ज्यादा गरम नहीं है तो घुटनों पर झुक जाएं ताकि जब आप दरवाजा खोलें तो लपटों या धुएं से नुकसान कम से कम हो. धुआं या लपटें दिखें तो फौरन दरवाजा बंद कर दें. आपातकालीन सेवा से संपर्क करें और स्थान खाली कर दें.
  • आग लगने पर तुरंत बाहर चले जाएं. यदि बाहर नहीं जा सकते और कमरा धुएं से भर गया है, तो ताजी हवा के लिए तुरंत खिड़कियां खोल दें. जितना धुआं आप की सांसों में जाएगा, उतनी ही स्थिति प्रतिकूल हो जाएगी. धुएं से अगर कोई बेहोश हो जाए तो यथाशीघ्र उसे हवादार जगह पर शिफ्ट कर दें.
  • हर व्यक्ति को बेसिक लाइफ सपोर्ट की ट्रेनिंग लेनी चाहिए. इस से आप       विषम परिस्थितियों में भी लोगों की जान बचा सकते हैं.
  • आग लगने पर लिफ्ट का प्रयोग न करें. सीढि़यों से उतरने में ही सुरक्षा है.
  • यदि कोई व्यक्ति आग से झुलस गया हो तो उसे जमीन पर न लिटाएं. उसे कंबल या किसी भारी कपड़े में लपेटने की कोशिश करें.

विशेषज्ञों द्वारा बताई गई इन बातों की सभी को जानकारी होनी जरूरी है ताकि अनहोनी होने पर सभी अपनी व अपने प्रियजनों की जान बचा सकें.

धर्म की अमानवीयता : दोयम दर्जे की हैं औरतें

दलितों और महिलाओं पर अत्याचार कम होने का नाम नहीं ले रहे. दोनों पर ही धर्म और जाति का कहर जारी है. लगातार एक के बाद एक सामने आ रही घटनाओं ने देश को झकझोर कर रख दिया है. सहारनपुर में जातीय रंजिश में भीम आर्मी के नेता के भाई सचिन वालिया की हत्या से एक बार फिर दलित समाज आक्रोशित है. उधर, जम्मू में एक नाबालिग लड़की आसफा के साथ बलात्कार के बाद नृशंस हत्या और उत्तर प्रदेश में उन्नाव के विधायक कुलदीप सिंह सेंगर द्वारा एक युवती का बलात्कार किए जाने के मामलों को ले कर महिलाएं आंदोलनरत हैं.

कानून में संशोधन के बावजूद वारदातों में कमी नहीं हो रही. आसफा मामले में जनआक्रोश को देखते हुए बलात्कारियों को कड़ी से कड़ी सजा देने की मांग उठने के बाद सरकार द्वारा बलात्कारी को मृत्युदंड की सजा का प्रावधान किया गया. इस से पहले 2012 में निर्भया कांड के बाद भी बलात्कार कानून में संशोधन किया गया था. फिर भी, महिलाओं और बच्चियों के यौन शोषण की घटनाओं में कमी नहीं आई.

अफसोस की बात यह है कि जम्मू के कठुआ में लड़की के बलात्कारियों के पक्ष में भीड़ सड़कों पर प्रदर्शन करने लगी. इस भीड़ में धर्म के पथ पर चलने वाली भारतीय जनता पार्टी के 2 विधायक भी शामिल थे. उधर, दलितों के साथ हो रही हिंसा की पैरवी करने में भी हिंदू कट्टरपंथी खुल कर सामने आने से नहीं हिचकिचा रहे हैं.

इन्हीं घटनाओं के बीच कांग्रेस नेता रेणुका चौधरी ने संसद में और कोरियोग्राफर सरोज खान ने बौलीवुड में कास्टिंग काउच की बात कही तो इस पर बहस छिड़ गई.

पिछले साल सहारनपुर में राजपूतों और दलितों के संघर्ष में 2 लोग मारे गए थे और कई घायल हुए थे. दलितों की बस्ती में तोड़फोड़ और आगजनी हुई थी. घटना के विरोध में दिल्ली के जंतरमंतर पर दलित संगठनों का प्रदर्शन हुआ. दलितों को एकजुट करने वाले भीम आर्मी के नेता चंद्रशेखर आजाद को गिरफ्तार किया गया और उस पर देशद्रोह का आरोप मढ़ कर उसे जेल में डाल दिया गया. इस से पहले भीमा कोरेगांव में दलितों पर हमले की वारदात हुई.

आएदिन कहीं दलितों के साथ शादी में घोड़ी पर चढ़ने को ले कर तो कहीं मूंछें रखने जैसी बातों पर सवर्णों द्वारा मारपीट, हिंसा की खबरें सुर्खियां बन रही हैं.

दलितों पर अत्याचार करने के मामले में सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले के बाद देशभर के दलितों द्वारा 2 अप्रैल को भारत बंद रखा गया. सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में दलित अत्याचार निरोधक कानून के तहत आरोपी की गिरफ्तारी से पहले एसपी स्तर के अधिकारी से जांच कराने और आरोपी को जमानत देने का निर्देश दिया था. सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश का देशभर में दलित संगठनों ने विरोध किया और भारत बंद का आह्वान किया था.

औरतों पर हमले

मई 2014 में हिंदू राष्ट्रवादी सरकार आने के बाद दलितों, महिलाओं और मुसलमानों के खिलाफ नफरत की हवाएं चलने लगीं. औरतों की अस्मत पर हमले बढ़ गए. सोशल मीडिया और सड़कों दोनों जगहों पर कट्टर हिंदूवादी लोग दलितों और महिलाओं को औकात में रखने की चेतावनी देने लगे, उन्हें डरानेधमकाने लगे.

पिछले साल रामजस कालेज में एबीवीपी और आइसा के बीच हुई हिंसा के बाद गुरमेहर कौर नामक युवती सोशल मीडिया के जरिए शांति का संदेश ले कर आई तो हिंदू राष्ट्रवादी सेना उस पर टूट पड़ी. उसे जान से मारने और उस का बलात्कार करने की धमकियां दी जाने लगीं. गुरमेहर ने कहा था कि उस के पिता को पाकिस्तान ने नहीं, युद्ध ने मारा था. उस के पिता मनदीप सिंह कारगिल हमले में शहीद हुए थे.

उसी दौरान निर्देशक अलंकृता श्रीवास्तव की फिल्म ‘लिपस्टिक अंडर माय बुर्का’ पर कहने को तब के सैंसर बोर्ड के मुखिया, पर असल में धर्म और संस्कृति के ठेकेदार, पहलाज निहलानी द्वारा रोक लगा दी गई. इस फिल्म में 4 औरतों की कहानियां हैं जो सैक्स को ले कर अपनीअपनी इच्छा जाहिर करती हैं.

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महिलाओं की आवाज दबाने और उन के यौनशोषण के किस्सों की आएदिन भरमार रहती है. भारत में ही नहीं, दुनियाभर में महिलाओं की स्थिति एकजैसी है. 2016 में 26 वर्षीय पाकिस्तानी मौडल कंदील  बलोच को उसी के भाई ने औनर किलिंग के तहत इसलिए मार डाला क्योंकि वह सोशल मीडिया पर बहुत बेबाकी से महिलाओं की आजादी की बातें किया करती थी. इस पर परिवार की ओर से उसे धमकियां मिलती थीं. परिवार नहीं चाहता था कि वह मौडलिंग और सोशल मीडिया पर सक्रिय रहे. जब उस ने उन की बात नहीं मानी तो उस के भाई वसीम ने हमेशा के लिए उस की जबान बंद कर दी. उसे गला घोंट कर मार दिया गया.

इस से पहले पाकिस्तान में मलाला यूसुफजई द्वारा लड़कियों की शिक्षा के लिए मुहिम चलाने पर उसे भी जान से मारने की कोशिश की गई. उसे परिवार सहित ब्रिटेन में शरण दी गई.

इसी तरह मजहब और उस के कट्टरपंथियों की पोल खोलने पर बंगलादेशी लेखिका तसलीमा नसरीन की आवाज दबाने की कोशिश की गई. मुसलिम कट्टरपंथी तसलीमा नसरीन की जान के पीछे पड़े हुए हैं.

पश्चिम में भी भेदभाव

पश्चिम की बात करें तो वहां भी समाज महिलाओं के साथ भेदभाव करने में पीछे नहीं है. दुनियाभर में चल रहा ‘मी टू’ आंदोलन महिलाओं के यौनशोषण के बेबाक बयानों का मंच है. हाल ही में साहित्य का नोबेल पुरस्कार देने की घोषणा इसलिए नहीं की गई क्योंकि इस पुरस्कार के मुख्य चयनकर्ता पर ‘मी टू’ कैंपेन के तहत यौनशोषण का आरोप लगा है.

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड टं्रप पर एक दर्जन से अधिक महिलाओं ने यौनशोषण के आरोप लगाए हैं. इन में कई मशहूर मौडल और विख्यात हस्तियां शामिल हैं. जनवरी 2017 में टं्रप के खिलाफ हजारों महिलाएं आजादी के लिए सड़कों पर उतर कर अपनी आवाज बुलंद कर चुकी हैं. अमेरिका में महिलाएं अब और ज्यादा भयभीत हैं. उन्हें डर है कि सनकी राष्ट्रपति टं्रप उन के बोलने, चलनेफिरने पर धर्म द्वारा निर्देशित पाबंदियां थोप सकते हैं.

समूची दुनिया में आज महिलाएं भेदभाव, हिंसा और यौन उत्पीड़न का सामना कर रही हैं, बोलने की स्वतंत्रता के लिए लड़ रही हैं. विश्वभर में संकीर्णता का दौर चरम पर है. संविधान में भले ही समानता, स्वतंत्रता की बात हो और भारत जैसा देश महिला के देवी होने का लाख ढिंढोरा पीटे पर हकीकत में महिलाएं पाप की गठरी, पैर की जूती ही समझी जाती रही हैं.

धर्म की भूमिका

असल में स्त्री के प्रति इस सोच की जड़ें धर्र्म की किताबों में हैं, जो इन कथित पवित्र किताबों, प्रवचनों से होती हुई लोगों के दिमागों में जम चुकी हैं. इन किताबों को ईश्वररचित करार दिया गया. स्त्रियों के बारे में लिखी गई बातों को देववाणी कहा गया. पौराणिक नायकों ने जब उन के मन में आया, स्त्री को लालच दे कर, धोखा दे कर भोगा और त्याग दिया. पुरुष की यौन इच्छापूर्ति करना ही औरत के कल्याण का कारक बताया गया है. इस में चाहे औरत की मरजी हो या न हो.

स्त्री की दुर्दशा के लिए दासीप्रथा, नियोगप्रथा, सतीप्रथा जैसे अत्याचारों का वर्णन धार्मिक ग्रंथों में मिलता है. वेदों से पता चलता है कि लड़की पिता की अनिच्छित संतान होती है. वेदोें में नारी को स्वर्ग के नाम पर पति की चिता पर लिटा कर चुपचाप मौत के मुंह में धकेल दिया जाता था. अथर्ववेद में लिखा है-

इयं नारी पतिलोकं वृणाना

नि पद्यत उपत्वा मर्त्य प्रेतम.

धर्मपुराणमनुष्यपालयंती तस्यै द्रविणं चेह धेहि.

-अथर्ववेद, 18/3/1

अर्थात हे मृत पुरुष, प्राचीन धर्म का पालन करती हुई और पतिलोक की कामना करती हुई यह स्त्री तेरे पास आती है. तुम इसे परलोक में इसी प्रकार संतान वाली बनाना और धन देना.

इस तरह से रचे श्लोक स्त्रियों को प्रवचनों में सुना कर उन के यौनशोषण के लिए ब्रेनवाश का आधार हैं.

इंद्रश्चिदा तद्बरीत स्त्रिया अशास्यं मन:,

उतो अहं क्रतुं रघुम.

-ऋग्वेद, 8/33/17

अर्थात स्वयं इंद्र ने कहा है कि स्त्री के मन को शिक्षित नहीं किया जा सकता. उस की बुद्धि तुच्छ होती है.

इस का अर्र्थ है कि स्त्री को शिक्षा के लायक नहीं समझा गया. उसे बारबार पढ़नेलिखने से इसलिए रोका गया ताकि वह शिक्षित हो कर पुरुष समाज से जवाब न मांगने लगे. उसे बेजबान रखने का षड्यंत्र किया गया.

मनु का आदेश है कि पति के मर जाने के बाद स्त्री दूसरे पति का तो नाम भी नहीं ले सकती. उस के विवाह करने की तो बात ही छोडि़ए.

न तु नामापि गृहणीयात् पत्यौ,

प्रेते परस्य तु,  -मनुस्मृति,5/157

व्यास का कहना है कि यदि विधवा सती न हो तो उस के केश काट देने चाहिए और वह तप द्वारा अपने शरीर को दुर्बल बना कर रहे.

जीवंती चेत् त्यक्तकेश्या तपसा शोधयेत वपु:

-व्यास स्मृति, 2/53

आज वृंदावन, बनारस जैसे तीर्थस्थलों पर विधवाओं की जो भीड़ है और वहां उन का जो शोषण हो रहा है वह इसी धर्म की वजह से है.

घरघर में पढ़ीसुनी जाने वाली रामचरितमानस में तुलसीदास भी जब स्त्री को अवगुणों की खान, पीड़ा देने वाली और सब दुखों की जड़ बताते हैं तो इस धर्मभीरू देश में स्त्री की दुर्दशा के कई कारण सामने आ जाते हैं.

गुरु, प्रवाचक धर्मग्रंथों की कथाएं औरतों को, परिवारों को दिनरात सुनाते हैं. इस वजह से न तो लड़कियां इस बुराई का विरोध करती हैं न परिवार.

यह न समझें कि ये किताबें और ग्रंथ हम भूल गए हैं. इन का गुणगान हर रोज होता है और आधुनिक तार्किक तकनीक पर बने इंटरनैट पर इन्हें आसानी से देखा जा सकता है, क्योंकि भक्त ही श्रद्धापूर्वक इन्हें उस पर डालते रहते हैं.

हमारी विवाह पद्धतियों में भी स्त्री को बिक्री की वस्तु बताया गया है. इन में दहेज का गुणगान है. ‘षोडश संस्कार विधि’ में लिखा है-

कन्यार्थ कनकं धेनुर्दासीरथमहीगृहा:,

महिष्यश्वगजा: शय्या महादानानि वे दश.

अर्थात कन्यादान के समय वर को सोना, गाय, दासी स्त्री, रथ, पृथ्वी, गृह, भैंसा, घोड़ा, हाथी और पलंग आदि देना चाहिए.

स्त्री को संपत्ति माना जाना

स्त्री को संपत्ति समझा गया. पैसों के बदले में उसे बेच दिया जाता है, कहीं दावं पर लगा दिया जाता है. युद्धिष्ठिर ने जुए में सबकुछ हारने के बाद अपनी पत्नी द्रौपदी को ही दावं पर लगा दिया था.

द्रौपदी की बोलती बंद करा दी गई और छोटे से ले कर बड़े भाई तक सब खामोश बैठे तमाशा देखते रहे. इस से पहले धर्म का हवाला दे कर द्रौपदी को एक नहीं, 5 पुरुषों की अंकशायिनी बन कर रहने पर विवश किया गया. धर्म के नाम पर क्या यह उस का यौनशोषण नहीं था?

मीरा की कथा बताती है कि वह कथित अदृश्य अवतार के प्रेम में मगन हो कर गीत रचना करने लगी तो परिवार के लोगों ने उसे चुप कराने के लिए तरहतरह के षड्यंत्र किए. उसे जहर दे कर मारने तक का प्रयास किया गया. आखिर उसे निर्वासित जीवन बिताना पड़ा.

सीता, उर्मिला, शूर्पणखा, शकुंतला, गांधारी, कुंती, सत्यवती, अहल्या, अंबा, अंबालिका जैसी महिलाओं की दुदर्शा की कहानियां हमारा समाज बड़ी श्रद्धा के साथ सुनता है.

मुसलिम देशों में तो औरत होना सब से बड़ा गुनाह माना जाता है. मुसलिम समाज में महिलाएं शिक्षा का अधिकार, घर से बाहर काम करने का अधिकार, तलाक में पुरुष के समान ही अधिकार की मांग कर रही हैं पर उन पर फतवे थोपने वालों की कमी नहीं है.

इसलामी ग्रंथ और शरीयत इस तरह की बातों से भरे पड़े हैं और सुप्रीम कोर्ट को इन्हें पढ़ कर व्याख्या करनी पड़ रही है.

स्त्री तलाक मांगती है तो उस का यह काम कुफ्र में शामिल माना जाता है. इसलामी आदेश है कि जो औरत बेहयाई का काम करे, तुम उसे घर में कैद कर दो. यहां तक कि मौत उस का खात्मा है.

धर्म की किताब में यह आयत है,

‘अररिजालू कव्वा मूना उनन्निसाई.’

इस का अर्थ है, मर्द हाकिम है औरतों पर.

इस तरह के हुक्म से औरत का शोषण धर्म के नाम पर किया जाता रहा है. उस पर किसी भी प्रकार से उपयोग करने का खुला अधिकार दे दिया गया.

समझ नहीं आता कि खुदा ने ऐसे संदेश क्यों दिए? क्या ईश्वर स्त्री और पुरुष नाम की अपनी दोनों रचनाओं में भेदभाव करता है? असल में यह ईश्वर, धर्म के नाम पर ढोंगियों की कारस्तानी है जो उन्होंने अपनी स्वार्थपूर्ति के लिए निर्मित कर रखी हैं ताकि स्त्रीवर्ग पर अंकुश लगा कर रखा जाए.

अकेले पाकिस्तान में औनर किलिंग के नाम पर पिछले साल 1,092 औरतों को मार दिया गया. स्त्री को देवी का रूप मानने का ढोंग करने वाले भारत में हर मिनट में किसी न किसी तरह 18 औरतों का शोषण किया जाता है.

स्त्री विरोधी इस तरह की सोच की रक्षा धर्मग्रंथ करते हैं. लड़कियों को जानबूझ कर ऐसी शिक्षा दी जाती है कि वे धर्म से बाहर कुछ भी सोचने की कोशिश न करें. इसी शिक्षा की आड़ में उन्हें पुरुषों का प्रभुत्व स्वीकार करवा दिया जाता है और फिर चाह कर भी वे भेदभाव, शोषण के खिलाफ एक शब्द भी नहीं बोल पातीं.

धर्म के अनुयायी शासक

विज्ञान और टैक्नोलौजी नए क्षितिज खोज रही है जबकि धर्म के रास्ते चलने वाले शासकों के साथ मिल कर धर्म के रक्षक संकीर्णता थोपना चाहते हैं, समाज को नियंत्रित रखना चाहते हैं.

आज महिलाएं जागरूक हो रही हैं, अपने नैसर्गिक अधिकारों की मांगों को ले कर सतर्क हो रही हैं और आवाज उठा रही हैं तो इस से जमीजमाई धार्मिक और सामाजिक सत्ताओं को चुनौती मिल रही है. उन्हें भय सताने लगा है. इसलिए स्त्रियों पर पाबंदियां और कड़ी की जा रही हैं. स्त्रियों पर हिंसा के नए रूप सामने आ रहे हैं पर समानता के लिए उन की जंग जारी है.

यह  समानता की लड़ाई राजनीतिक कभी नहीं रही. यह हमेशा धर्म के खिलाफ रही है, क्योंकि धर्म ही समाज को उकसाता है और राजा या शासक को आदेश देता है. पौप, दलाई लामा, शंकराचार्य, इमाम समाज की गरीबी, भेदभाव, बीमारी, गंदगी, भ्रष्टाचार की बात नहीं करते जबकि औरतों को कुचलने की बातें वे करते रहते हैं.

ऐसी बीवी किसी की न हो

24  मार्च, 2018 को राजस्थान के जिला चुरू के एडीजे जगदीश ज्याणी की अदालत में और दिन से ज्यादा भीड़ थी. इस की वजह यह थी कि उस दिन माननीय न्यायाधीश द्वारा एक बहुचर्चित मामले का फैसला सुनाया जाना था. फैसला सुनने की उत्सुकता में कोर्ट में वकीलों के अलावा आम लोग भी मौजूद थे.

कोर्ट रूम में मौजूद सभी को लग रहा था कि संतोष ने जिस तरह से अपने दोनों बच्चों की निर्दयतापूर्वक हत्या की थी, उसे देखते हुए उस निर्दयी औरत को फांसी की सजा तो होनी चाहिए. सभी लोग सजा को ले कर उत्सुक थे. आखिर ऐसा क्या मामला था कि संतोष को अपने जिगर के टुकड़ों 2 बेटों और एक बेटी की हत्या के लिए मजबूर होना पड़ा. यह जानने के लिए हमें घटना की पृष्ठभूमि में जाना पड़ेगा.

राजस्थान का एक जिला है चुरू. इसी जिले के थाना राजलदेसर के अंतर्गत आता है एक गांव हामूसर. इंद्रराम इसी गांव में रहता था, जो कबड्डी का खिलाड़ी था. बाद में उस की नौकरी भारतीय सेना में लग गई. उस की पोस्टिंग बरेली की जाट रेजीमेंट में थी. उस की शादी संतोष से हुई थी.

इंद्रराम से ब्याह कर संतोष जब ससुराल आई थी, तब वह बहुत खुश थी. सब कुछ ठीकठाक चल रहा था. पर धीरेधीरे संतोष का स्वभाव सामने आने लगा. उस ने घर में कलह करनी शुरू कर दी. वह सास, पति, देवर और अन्य पारिवारिक लोगों से लड़ाईझगड़ा करने लगी. बातबात पर गुस्सा हो जाती थी.

इंद्रराम सालभर में दोढाई महीने की छुट्टी पर घर आता था. मगर बीवी की कलह से घर में हर समय लड़ाई होती रहती थी. तब इंद्रराम को लगता कि अगर वह छुट्टी पर नहीं आता तो ठीक रहता. जैसेतैसे छुट्टियां काट कर वह अपनी ड्यूटी चला जाता. इसी तरह कई साल बीत गए और संतोष 2 बेटों और एक बेटी की मां बन गई.

पति के ड्यूटी पर चले जाने के बाद संतोष ससुराल वालों के साथ कलह करती रहती थी. जब इंद्रराम को घर वाले फोन कर के उस की शिकायत करते तो उसे पत्नी पर बहुत गुस्सा आता था.

वह अपना घर टूटते नहीं देखना चाहता था. इसलिए वह चुप रह कर सब कुछ सहने लगा. छुट्टी में इंद्रराम के घर आने पर पत्नी क्लेश करती तो वह घर से बाहर जा कर वक्त काटता.

उस की बड़ी बेटी करुणा 12 साल की हो चुकी थी और बेटे अनीश व जितेंद्र 9 व 7 साल के थे. तीनों बच्चों की पढ़ाई चल रही थी. संतोष ने अपनी ससुराल वालों के साथ कलह करनी बंद नहीं की तो वह परेशान हो गए. उन लोगों ने अपने खेतों में एक मकान बना रखा था. उन्होंने संतोष से कहा कि वह खेतों वाले मकान में रहे, इस के बाद संतोष बच्चों को ले कर खेतों वाले मकान में रहने लगी.

इस तरह सासससुर और देवर अलग हो गए. संतोष अपने बच्चों से कहती कि वे दादा के घर न जाएं. फोन पर भी वह पति से भी सीधे मुंह बात नहीं करती थी. 12 जुलाई, 2015 का दिन था. इंद्रराम ने संतोष को फोन किया. किसी बात को ले कर वह पति से फोन पर झगड़ने लगी. झगड़ा बढ़ा तो गुस्से में तमतमाई संतोष ने पति से कहा कि वह अपने तीनों बच्चों के साथ पानी के टांके (कुंड) में डूब कर जीवनलीला समाप्त कर लेगी.

इतना कह कर उस ने फोन काट दिया. इंद्रराम ने उसे दोबारा फोन किया मगर संतोष ने बात नहीं की. इस के बाद वह अपने तीनों बच्चों को ले कर रात में ही कुंड के पास पहुंच गई. तीनों बच्चों को उस ने एकएक कर के कुंड में धकेल दिया. इस के बाद वह स्वयं भी आत्महत्या के इरादे से कुंड में कूद गई.

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कुंड में करीब पौने 5 फुट पानी था, जिस की वजह से तीनों बच्चों की डूबने से मौत हो गई थी. संतोष जब पानी में डूबने लगी तो वह बचने के लिए हाथपैर मारने लगी. वह पानी में बेटी के ऊपर खड़ी हो गई. रात भर वह पानी में बेटी के ऊपर खड़ी रही. पानी संतोष के गले तक था. सारी रात वह ऐसे ही खड़ी रही.

संतोष के ससुराल वाले पास के खेत में रहते थे. उन्होंने जब रात में संतोष और उस के बच्चों को नहीं देखा तो उन्होंने इंद्रराम को फोन किया.

इंद्रराम ने संतोष से हुई लड़ाई वाली बात बताते हुए कहा कि संतोष ने यह कहा था कि वह बच्चों सहित पानी के कुंड में कूद कर मरने जा रही है. मैं ने उस की बात को केवल धमकी समझा था.

इंद्रराम से बात कर के घर के लोग कुंड पर पहुंचे तो संतोष पानी में खड़ी दिखी. तीनों बच्चे दिखाई नहीं दे रहे थे. घर वालों के शोर मचाने के बाद गांव के कई लोग इंद्रराम फौजी के खेत में बने पानी के कुंड पर पहुंच गए. गांव के ही मनफूल टांडी ने राजलदेसर थाने में इस की सूचना दे दी.

तत्कालीन थानाप्रभारी सुभाष शर्मा पुलिस टीम के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए. उन्होंने संतोष को कुंड से जीवित निकाल लिया लिया जबकि तीनों बच्चों की मौत हो चुकी थी. प्रारंभिक पूछताछ में संतोष ने पुलिस को कोई संजोषजनक जवाब नहीं दिया. इस के बजाय उस ने पुलिस को गुमराह करने का प्रयास किया.

घटना के समय खेतों में बनी उस ढाणी में संतोष व उस के 3 बच्चों के अलावा कोई दूसरा नहीं रहता था. पुलिस ने जांचपड़ताल की तो स्पष्ट हुआ कि संतोष ने ही अपनी बेटी करुणा, बेटे अनीश व जितेंद्र को कुंड में धकेला था, जिस से उन की मौत हो गई.

पुलिस ने संतोष के खिलाफ हत्या व आत्महत्या के प्रयास का मामला दर्ज किया और उसे गिरफ्तार कर लिया. थानाप्रभारी संतोष शर्मा द्वारा की गई जांच में पाया गया कि संतोष व उस के पति इंद्रराम के बीच काफी समय से गृहक्लेश चल रहा था.

इंद्रराम भी छुट्टी ले कर अपने घर आ गया था. पत्नी द्वारा परिवार उजड़ जाने का उसे बड़ा दुख हुआ. उस ने सपने में भी नहीं सोचा था कि उस की बीवी ऐसा भी कर सकती है. बच्चों की मौत ने इंद्रराम को तोड़ कर रख दिया. मगर उस ने भी कसम खा ली कि वह पत्नी को सजा दिला कर ही दम लेगा. संतोष की गिरफ्तारी के बाद उसे न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया.

जांच अधिकारी द्वारा आरोपपत्र दाखिल करने के बाद यह मामला एडीजे कोर्ट में चला. अभियोग को साबित करने के लिए अभियोजन पक्ष ने कोर्ट में 16 गवाह पेश किए, जिन में मृत बच्चों के पिता इंद्रराम, दादी जोरादेवी, ताऊ श्रवण कुमार व सांवरमल भी शामिल थे. बचावपक्ष को भी साक्ष्य पेश करने का मौका दिया गया. लेकिन वह कोई भी साक्ष्य कोर्ट में प्रस्तुत नहीं कर पाया.

13 मार्च, 2018 को कोर्ट ने दोनों पक्षों की अंतिम बहस सुनने के बाद 24 मार्च, 2018 को एडीजे जगदीश ज्याणी ने हत्यारी मां संतोष को धारा 302 यानी हत्या का दोषी मानते हुए आजीवन कारावास व 10 हजार रुपए जुरमाना और धारा 309 में एक हजार रुपए के जुरमाने की सजा सुनाई.

बीवी को उम्रकैद की सजा मिलने पर इंद्रराम ने पत्रकारों को बताया कि अपने कलेजे के टुकड़ों को इस तरह पानी के कुंड में डाल कर हत्या कर देने वाली मां को सजा देने के लिए कोर्ट पर पूरा विश्वास था. उसे विश्वास था कि आरोपी को कड़ी से कड़ी सजा मिलेगी और आज फैसला आने के बाद यह स्पष्ट भी हो गया.

वहीं अपर लोक अभियोजक एडवोकेट राजकुमार चोटिया ने मामले को अप्रत्याशित बताते हुए कोर्ट से आरोपी को मृत्युदंड की सजा देने का निवेदन किया था. मगर सजा मिली उम्रकैद.

फरेब के जाल में फंसी नीतू

लाश की हालत देख कर पुलिस वाले तो दूर की बात कोई भी आम आदमी बता देता कि हत्यारा या हत्यारे मृतका से किस हद तक नफरत करते होंगे. साफ लग रहा था कि हत्या प्रतिशोध के चलते पूरी नृशंसता से की गई थी और युवती के साथ बेरहमी से बलात्कार भी किया गया था.

मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ को जोड़ते जिला शहडोल के ब्यौहारी थाने के इंचार्ज इंसपेक्टर सुदीप सोनी को भांपते देर नहीं लगी कि मामला उम्मीद से ज्यादा गंभीर है. 25 मार्च की सुबहसुबह ही उन्हें नजदीक के गांव खामडांड में एक युवती की लाश पड़ी होने की खबर मिली थी. वक्त न गंवा कर सुदीप सोनी ने तुरंत इस वारदात की खबर शहडोल से एसपी सुशांत सक्सेना को दी और पुलिस टीम ले कर खामडांड घटनास्थल की तरफ रवाना हो गए.

गांव वाले जैसे उन के आने का ही इंतजार कर रहे थे. पुलिस टीम के आते ही मारे उत्तेजना और रोमांच के उन्होंने सुदीप को बताया कि लाश गांव से थोड़ी दूर आम के बगीचे में पड़ी है. पुलिस टीम जब आम के बाग में पहुंची तो लाश देखते ही दहल उठी. ऐसा बहुत कम होता है कि लाश देख कर पुलिस वाले ही अचकचा जाएं.

लाश लगभग 24 वर्षीय युवती की थी, जिस की गरदन कटी पड़ी थी. अर्धनग्न सी युवती के शरीर पर केवल ब्लाउज और पेटीकोट थे. ब्लाउज इतना ज्यादा फटा हुआ था कि उस के होने न होने के कोई माने नहीं थे. दोनों स्तनों पर नाखूनों की खरोंच के निशान साफसाफ दिखाई दे रहे थे.

पेटीकोट देख कर भी लगता था कि हत्यारे चूंकि उसे साथ नहीं ले जा सकते थे इसलिए मृतका की कमर पर फेंक गए थे. युवती के गुप्तांग पर जलाए जाने के निशान भी साफसाफ नजर आ रहे थे. गाल पर दांतों से काटे जाने के निशान देख कर शक की कोई गुंजाइश नहीं रह गई थी कि मामला बलात्कार और हत्या का था.

खामडांड छोटा सा गांव है जिस में अधिकतर पिछडे़ और आदिवासी रहते हैं इसलिए पुलिस को लाश की शिनाख्त में दिक्कत पेश नहीं आई. लाश के मुआयने के बाद जैसे ही सुदीप सोनी गांव वालों से मुखातिब हुए तो पता चला कि मृतका का नाम नीतू राठौर है और वह इसी गांव के किसान बाबूलाल राठौर की बहू और रामजी राठौर की पत्नी है.

सुदीप ने तुरंत उपलब्ध तमाम जानकारियां सुशांत सक्सेना को दीं और उन के निर्देशानुसार जांच की जिम्मेदारी एसआई अभयराज सिंह को सौंप दी. चूंकि लाश की शिनाख्त हो चुकी थी इसलिए पुलिस के पास करने को एक ही काम रह गया था कि जल्द से जल्द कातिल का पता लगाए.

कागजी काररवाई पूरी कर  के नीतू की लाश पोस्टमार्टम के लिए भेज दी गई. नीतू की हत्या की खबर उस के मायके वालों को भी दे दी गई थी जो मऊ गांव में रहते थे.

मौके पर अभयराज सिंह को कोई सुराग नहीं लग रहा था. अलबत्ता यह बात जरूर उन की समझ में आ गई थी कि कातिल उन की पहुंच से ज्यादा दूर नहीं है. छोटे से गांव में मामूली पूछताछ में यह उजागर हुआ कि नीतू के घर में उस के ससुर बाबूलाल और पति रामजी के अलावा और कोई नहीं है.

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नीतू और रामजी की शादी अब से कोई 4 साल पहले हुई थी. बाबूलाल का अधिकांश वक्त खेत में ही बीतता था और इन दिनों तो फसल पकने को थी इसलिए दूसरे किसानों की तरह वह खाना खाने ही घर आता था. फसल की रखवाली के लिए वह रात में सोता भी खेत पर ही था.

इसी पूछताछ में जो अहम जानकारियां पुलिस के हाथ लगीं उन में से पहली यह थी कि रामजी एक कम बुद्धि वाला आदमी है और आए दिन नीतू से उस की खटपट होती रहती थी. दूसरी जानकारी भी कम महत्त्वपूर्ण नहीं थी कि 2 साल पहले 2016 में इन पतिपत्नी के बीच जम कर झगड़ा हुआ था. झगड़े के बाद नीतू मायके चली गई थी और उस ने ससुर व पति के खिलाफ दहेज प्रताड़ना का मामला दर्ज कराया था, पर बाद में सुलह हो जाने पर नीतू वापस ससुराल आ गई थी.

ब्यौहारी थाने में पुलिस ने अज्ञात आरोपियों के खिलाफ हत्या का मामला दर्ज कर लिया और नीतू का शव उस के ससुराल वालों को सौंप दिया. दूसरे दिन ही उस का अंतिम संस्कार भी हो गया. पोस्टमार्टम रिपोर्ट से पता चला कि उस की हत्या धारदार हथियार से गला काट कर की गई थी.

ये जानकारियां अहम तो थीं लेकिन हत्यारों तक पहुंचने में कोई मदद नहीं कर पा रही थीं. गांव वाले भी कोई ऐसी जानकारी नहीं दे पा रहे थे जिस से कातिल तक पहुंचने में कोई मदद मिलती.

नीतू के अंतिम संस्कार के बाद पुलिस ने उस के मायके वालों से पूछताछ की तो उन्होंने सीधेसीधे हत्या का आरोप बाबूलाल और रामजीलाल पर लगाया. उन का कहना था कि शादी के बाद से ही बापबेटे दोनों नीतू को दहेज के लिए मारतेपीटते रहते थे.

लेकिन नीतू की हत्या जिस तरह हुई थी उस से साफ उजागर हो रहा था कि हत्या बलात्कार के बाद इसलिए की गई थी कि हत्यारा अपनी पहचान छिपा सके. वैसे भी आमतौर पर दहेज के लिए हत्याएं इस तरह नहीं की जातीं.

रामजी राठौर के बयानों से पुलिस वालों को कुछ खास हासिल नहीं हुआ, क्योंकि बातचीत करने पर ही समझ आ गया था कि यह मंदबुद्धि आदमी कुछ भी बोल रहा है. पत्नी की मौत का उस पर कोई खास असर नहीं हुआ था. अभयराज सिंह को वह कहीं से झूठ बोलता नहीं लगा. मंदबुद्धि लोगों को गुस्सा आ जाए तो वे हिंसक भी हो उठते हैं पर इतने योजनाबद्ध तरीके से हत्या करने की बुद्धि उन में होती तो वे मंदबुद्धि क्यों कहलाते.

बाबूलाल से पूछताछ की गई तो उस ने अपने खेत पर व्यस्त होने की बात कही. लेकिन हत्या का शक बेटे रामजी पर ही जताया. इशारों में उस ने पुलिस को बताया कि रामजी चूंकि पागल है इसलिए गुस्से में आ कर पत्नी की हत्या कर सकता है.

बाबूलाल ने अपनी बात में दम लाते हुए यह भी कहा कि मुमकिन है कि नीतू रामजी के साथ सोने से इनकार कर रही हो, इसलिए रामजी को उसे मारने की हद तक गुस्सा आ गया हो और इसी पागलपन में उस ने नीतू की हत्या कर डाली हो.

यह एक अजीब सी बात इस लिहाज से थी कि हत्या के मामले में किसी भी पिता की कोशिश बेटे को बचाने की रहती है. लेकिन बाबूलाल इस का अपवाद था. हालांकि संभावना इस बात की भी थी कि वह वाकई सच बोल रहा हो क्योंकि रामजी घोषित तौर पर मंदबुद्धि वाला था और गुस्सा आ जाने पर ऐसा कर भी सकता था. लेकिन इस थ्यौरी में आड़े यही बात आ रही थी कि कोई मंदबुद्धि इतनी प्लानिंग से हत्या नहीं कर सकता.

अभयराज सिंह ने नीतू के बारे में जानकारियां इकट्ठी करने के लिए एक लेडी कांस्टेबल को काम पर लगा दिया था. अलबत्ता अभी तक की जांच में ऐसी कोई बात सामने नहीं आई थी जिस से यह लगे कि नीतू के चालचलन में कोई खोट थी. ये सब बातें अभयराज ने जब आला अफसरों से साझा कीं तो उन्होंने बाबूलाल को टारगेट करने की सलाह दी.

महिला कांस्टेबल की दी जानकारियों ने मामला सुलझाने में बड़ी मदद की. पता यह चला कि नीतू दूसरी महिलाओं के साथ मजदूरी करने ब्यौहारी जाती थी और शाम तक लौट आती थी. 25 मार्च को यानी हादसे के दिन भी वह मजदूरी करने गई थी. लेकिन लौटते वक्त वह गांव के बाहर से ही अपने ससुर बाबूलाल से मिलने खेत की तरफ चली गई थी.

बाबूलाल शक के दायरे में तो पहले से ही था पर इस खुलासे से उस पर शक और गहरा गया था. चूंकि उसे धर दबोचने के लिए कोई पुख्ता सबूत या गवाह नहीं था. इसलिए पुलिस ने बारबार पूछताछ करने का अपना परंपरागत तरीका आजमाया.

इस पूछताछ में उस के साथ कोई जोर जबरदस्ती नहीं की गई और न ही कोई यातना दी गई. पुलिस ने तरहतरह से उसे धर्मग्रंथों का हवाला दिया कि जो जैसे कर्म करता है उसे वैसा ही फल भुगतना पड़ता है. फिर चाहे वह नीचे धरती पर मिले या ऊपर कहीं मिले.

धर्मगुरुओं  की तरह प्रवचन दे कर जुर्म कबूलवाने का शायद यह पहला मामला था. कर्म फल और पाप पुण्य की पौराणिक कहानियों का बाबूलाल पर वाजिब असर पड़ा और उस ने अपना गुनाह कबूल कर लिया.

यह डर था या ग्लानि थी यह तो शायद बाबूलाल भी न बता पाए, लेकिन नीतू की हत्या की जो वजह उस ने बताई वह वाकई अनूठी थी. कहानी सुनने से पहले पुलिस ने उस की निशानदेही पर खेत में छिपाई गई चप्पलें व साड़ी बरामद करने में ज्यादा दिलचस्पी दिखाई.

बहू नीतू की हत्या की वजह बताते हुए बाबूलाल का चेहरा सपाट था. बाबूलाल तब किशोरावस्था में था जब उस के पिता संतोषी राठौर की मौत हो गई थी. शादी के बाद पत्नी भी ज्यादा साथ नहीं निभा पाई, लेकिन इन तकलीफों से बड़ी उस की तकलीफ मंदबुद्धि बेटा रामजी था.

जवान होते रामजी को देख बाबूलाल का कलेजा मुंह को आता था कि उस के बाद यह लड़का किस के भरोसे रहेगा. कम अक्ल रामजी को पालतेपोसते बाबूलाल ने कई जगह उस की शादी की बात चलाई लेकिन जिस ने भी रामजी की मंदबुद्धि के चर्चे सुने उस ने बाबूलाल के सामने हाथ जोड़ लिए.

खेतीकिसानी बहुत ज्यादा भी नहीं थी, इसलिए बाबूलाल ज्यादा पैसों के लिए खेतों में हाड़तोड़ मेहनत करता था, जिस के चलते 54 साल की उम्र भी उस पर हावी नहीं हो पाई थी.

फिर एक दिन पागल कहे जाने वाले रामजी की तब मानो लाटरी लग गई, जब बात चलाने पर नीतू के घर वाले रामजी से उस की शादी करने तैयार हो गए. नीतू गठीले बदन की चंचल लड़की थी, जिसे पत्नी बनाने का सपना आसपास के गांवों के कई युवक देख रहे थे.

गोरीचिट्टी नीतू की खूबसूरती के चर्चे हर कहीं थे पर लोग यह जानकर हैरान रह गए कि उस की शादी रामजी से हो रही है, जिसे गांव की भाषा में पागल, सभ्य लोगों की भाषा में मंदबुद्धि और आजकल सरकारी जुबां में मानसिक रूप से दिव्यांग कहा जाता है.

जब नीतू के घर वालों ने रिश्ते के बाबत हां भर दी तो बाबूलाल की खुशी का ठिकाना नहीं रहा. घर में बहू के पांव पड़ेंगे, अरसे बाद छमछम पायल बजेगी और जल्द ही पोता उस की गोद में होगा जैसी बातें सोच कर वह अपनी गुजरी और मौजूदा जिंदगी के दुख भूलता जा रहा था.

उधर रामजी पर इस का कोई असर नहीं पड़ा था, वह तो अपनी दुनिया में मस्त था, जैसे कुछ हो ही नहीं रहा हो. शादी के नए कपड़े, धूमधड़ाका, बैंडबाजा बारात वगैरह उस के लिए बच्चों के खेल जैसी बातें थीं. पर बाबूलाल का मन कह रह था कि बहू के आते ही वह सुधर भी सकता है.

खुशी से फूले नहीं समा रहे बाबूलाल को आने वाली परेशानियों और दुश्वारियों का अहसास तक नहीं था. नीतू बहू बन कर आई तो वाकई घर में रौनक आ गई. पर यह रौनक चार दिन की चांदनी सरीखी साबित हुई.

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सुहागरात के वक्त नीतू शर्माती लजाती कमरे में बैठी पति का इंतजार कर रही थी कि वह आएगा, रोमांटिक और प्यार भरी बातें करेगा, फिर मन की बातों के बाद धीरे से तन की बात करेगा और फिर… फिल्मों और टीवी सीरियलों में देखे सुहागरात के दृश्य नीतू की जवानी और सपनों को पर लगा रहे थे जिन्हें सोच कर ही वह रोमांचित हुई जा रही थी.

रामजी कमरे में आया और बगैर कुछ कहे सुने बिस्तर पर गया तो नीतू एकदम से कुछ समझ नहीं पाई. उस रात रामजी ने कुछ नहीं किया तो यह सोच कर नीतू ने खुद के मन को तसल्ली दी कि होगी कोई वजह और आजकल के मर्द भी शर्माने में औरतों से कम नहीं हैं.

यह सिलसिला लगातार चला तो शर्म छोड़ते खुद नीतू ने पहल की लेकिन यह जानसमझ कर वह सन्न रह गई कि रामजी मानसिक ही नहीं बल्कि शारीरिक तौर पर भी अक्षम है. एक झटके में आसमान से जमीन पर गिरी नीतू की हालत काटो तो खून नहीं जैसी हो गई थी.

घर के कामकाज करती नीतू को लगने लगा था कि उस की हैसियत एक नौकरानी से ज्यादा कुछ नहीं है और बाबूलाल व रामजी ने उसे धोखा दिया है. यह सोच कर वह चोट खाई नागिन की तरह फुंफकारने लगी. इस पर रामजी ने उसे मारना पीटना शुरू कर दिया तो वह मायके चली गई और दहेज की रिपोर्ट भी लिखा दी. बेटेबहू के बीच अनबन की असल वजह जब बाबूलाल को पता चली तो वह अवाक रह गया.

अब उसे समझ आया कि क्यों बातबात पर नीतू गुस्सा होती रहती है. इधर दहेज की रिपोर्ट तलवार बन कर उस के सिर पर लटक रही थी. रामजी को तो कोई फर्क नहीं पड़ता था लेकिन पुलिस काररवाई से उस का नप जाना तय था.

एक समझदार ससुर की तरह बाबूलाल मऊ नीतू के मायके पहुंचा और दुनिया की ऊंच नीच और इज्जत दुहाई देते उसे मना कर वापस ले आया. यह पिछले साल नवरात्रि की बात है. नीतू दोबारा ससुराल आ गई. पत्नी क्यों मायके चली गई थी और फिर वापस क्यों आ गई और सेक्स से अंजान रामजी को इन बातों से कोई सरोकार नहीं था.

हालात देख बाबूलाल के मन में पाप पनपा और उस ने नीतू से नजदीकियां बढ़ानी शुरू कर दीं. किसी नएनवेले आशिक की तरह बाबूलाल नीतू की हर पसंदनापसंद का खयाल रखने लगा तो नीतू भी उस की तरफ झुकने लगी.

आखिर उसे भी पुरुष सुख की जरूरत थी, जिसे वह कहीं बाहर से हासिल करती तो बदनामी भी होती और गलत भी वही ठहराई जाती.

देहसुख का अघोषित अनुबंध तो बाबूलाल और नीतू के बीच हो गया लेकिन पहल कौन और कैसे करे, यह दोनों को समझ नहीं आ रहा था. मियांबीवी राजी तो क्या करेगा काजी वाली बात इन दोनों पर इसलिए लागू नहीं हो रही थी कि दोनों के बीच कोई काजी था ही नहीं. दोनों भीतर ही भीतर सुलगने लगे थे पर शायद लोकलाज का झीना सा परदा अभी बाकी था.

यह परदा भी एक दिन टूट गया जब आंगन में नहाती नीतू को बाबूलाल ने देखा. उस के दुधिया और भरे मांसल बदन को देखते ही बाबूलाल के जिस्म में चीटियां सी रेंगी तो सब्र ने जवाब दे दिया. एकाएक उस ने नीतू को जकड़ लिया.

नीतू ने कोई एतराज नहीं जताया. वह तो खुद पुरुष संसर्ग के लिए बेचैन थी. उस दिन जो हुआ नीतू के लिए किसी मनोकामना के पूरी होने से कम नहीं था. बाबूलाल को भी सालों बाद स्त्री सुख मिला था, सो वह भी निहाल हो गया.

अब यह रोजरोज का काम हो गया था. दोनों को रोकनेटोकने वाला कोई नहीं था. रामजी जैसे ही बिस्तर पर आ कर सोता था, नीतू सीधे बाबूलाल के कमरे में जा पहुंचती थी.

उम्र और रिश्तों का लिहाज नाजायज संबंधों में नहीं होता और आमतौर पर उन का अंत में किसी तीसरे का रोल जरूर रहता है. पर इन दोनों पर यह बात लागू नहीं थी. ससुर की मर्दानगी पर निहाल हो चली नीतू ने एक दिन बाबूलाल से साफ कह दिया कि अब मुझ से शादी करो नहीं तो…

इस ‘नहीं तो’ में छिपी धमकी बाबूलाल को समझ आ रही थी और मजबूरी भी, लेकिन जो जिद नीतू कर रही थी उसे वह पूरी नहीं कर सकता था. अब जा कर बाबूलाल को समाज और रिश्तों के मायने समझ आए.

समझाने और मना करने पर नीतू झल्लाने लगी थी, जिस से बाबूलाल घबराया हुआ रहने लगा था. नीतू की लत तो उसे भी लग गई थी पर उस पर लदी शर्त उस से पूरी करते नहीं बन रही थी.

साफ है बाबूलाल बहू के जिस्म को तो भोगना चाहता था लेकिन समाज को ठेंगा बता कर उसे पत्नी बनाने की बात सोचते ही उस के पैरों तले से जमीन खिसकने लगती थी. जितना वह समझाता था नीतू उसी तादाद में एक बेतुकी जिद पर अड़ती जा रही थी.

अब बाबूलाल नीतू से बचने के बहाने ढूंढने लगा था, जिन में से एक उसे मिल भी गया था कि फसल पक रही है, इसलिए उसे चौकीदारी के लिए खेत पर सोना पड़ेगा. इस के लिए उस ने खेत में झोपड़ी भी डाल ली थी.

नीतू जब शहर से मजदूरी कर लौटती थी तब तक बाबूलाल खेत पर जा चुका होता था. कुछ दिन ऐसे ही बिना मिले गुजरे तो नीतू का सब्र जवाब देने लगा. वैसे भी वह महसूस रह रही थी कि बाबूलाल अब उस में पहले जैसी दिलचस्पी नहीं लेता. 25 मार्च को नीतू जब सहेलियों के साथ लौटी तो उसे याद आया कि अगले दिन उसे मायके जाना है.

मायके जाने से पहले वह अपनी प्यास बुझा लेना चाहती थी. इसलिए सीधे खेत पर पहुंच गई और बाबूलाल को इशारा किया कि आज रात वह यहीं रुकेगी तो बाबूलाल के हाथ के तोते उड़ गए, क्योंकि रात में दूसरे किसान तंबाकू और बीड़ी के लिए उस के पास आते रहते थे.

समझाने की कोशिश बेकार थी फिर भी बाबूलाल ने दूसरे किसानों के आनेजाने की बात बताई तो नीतू ने खुद अपने हाथों से अपने कपड़े उतार लिए और धमकी देते हुए बोली, ‘‘खुले तौर पर मुझ से बीवी की तरह पेश आओ नहीं तो पुलिस में रिपोर्ट लिखा दूंगी.’’ उस दिन सुबह वह बाबूलाल से कह भी रही थी कि रात में घर पर ही मिलना.

रोजरोज की धमकियों और परेशानियों से तंग आ गए बाबूलाल को कुछ नहीं सूझा तो उस ने बेरहमी से नीतू की हत्या कर दी और स्तनों को खरोंचा, जिस से मामला सामूहिक बलात्कार का लगे. नीतू का गुप्तांग भी उस ने इसी वजह के चलते जलाया था.

नीतू की हत्या पर वह उस की लाश को कंधे पर उठा कर ले गया और आम के बाग में फेंक आया. पुलिस को दिए शुरुआती बयान में वह रामजी को फंसा देना चाहता था जिस से खुद साफ बच निकले. पर ऐसा नहीं हो पाया.

ससुर बहू के अवैध संबंधों का यह मामला अजीब इस लिहाज से है कि इसे और ज्यादा ढोने की हिम्मत नीतू में नहीं बची थी और वह अधेड़ ससुर को ही पति बनाने पर उतारू हो आई थी यानी राजकुमार, हेमामालिनी, कमल हासन और पद्मिनी कोल्हापुरे अभिनीत फिल्म ‘एक नई पहेली’ की तर्ज पर वह अपने ही पति की मां बनने तैयार थी.

बड़ी गलती बाबूलाल की है जिस की सजा भी वह भुगत रहा है. उस ने पहले पागल बेटे की शादी करा दी और जब बेटा बहू की शारीरिक जरूरतें पूरी नहीं कर पाया तो खुद पाप की दलदल में उतर गया.

नीतू रखैल की तरह नहीं रहना चाह रही थी. साथ ही वह दुनियादारी की परवाह भी नहीं कर रही थी, इसलिए उस से छुटकारा पाने के लिए बाबूलाल को उस की हत्या ही आसान रास्ता लगा पर कानून के हाथों से वह भी नहीं बच पाया.

इमरान के आने से क्या बदलेगा पाकिस्तान

पाकिस्तान में पाकिस्तान तहरीके इंसाफ पार्टी के नए नेता ने सत्ता संभाल ली है. 1992 में विश्वकप जीतने वाले इमरान खान ने 22 साल का लंबा सफर राजनीति में अपनी प्रधानमंत्री बनने की इच्छा को पूरा करने के लिए तय किया. इस दौरान कई से शादियों का सेहरा पहना और कितनी औरों के साथ संबंध बनाए पता नहीं पर फिर भी पाकिस्तान की कट्टरपंथी जनता ने इस बार उन्हें जिता दिया है और पुराने नवाज शरीफ व जुल्फीकार भुट्टो के वारिसों को नकार दिया है.

भारत में कहा जा रहा है कि यह वहां की सेना की कृपा से हुआ और सेना ने असल में अपने मुखौटे को सत्ता में बैठाया पर यह निरर्थक सा आरोप है. पाकिस्तान में किसी की भी सरकार बने, सेना को फर्क नहीं पड़ता क्योंकि वह तो वही करेगी जो चाहती है. देश की असली कमान तो वहां सेना के पास ही है.

भारत के लिए इमरान खान कुछ खास साबित होंगे इस की उम्मीद नहीं है. बस फर्क इतना है कि उन के चेहरे से भारत के वे करोड़ों परिचित हैं जो 1992 में उन के दीवाने थे जब उन्होंने क्रिकेट कप जीता था. खेल के मैदान में जीतने वाले से उम्मीद की जा सकती है कि वह राजनीति को खेलों की सी योग्यता की प्लेट पर रख कर देखेगा और अति करने से बचेगा.

पाकिस्तान की स्थिरता भारत के लिए बहुत जरूरी है क्योंकि यदि किसी गृहयुद्घ में पाकिस्तान फंसता है तो उस का खामियाजा भारत को भुगतना पड़ सकता है. पाकिस्तान का आर्थिक पिछड़ापन भारत के लिए परेशानी भी बन सकता है हालांकि अब तो पाकिस्तान ने सिर्फ अपनी जनता का ध्यान बंटाने के लिए भारत पर आक्रमण नहीं किया है. 1971 के बाद पाकिस्तान को अपनी हैसियत मालूम है.

अब तो वैसे उलटा होता नजर आ रहा है. जो कट्टरता पहले पाकिस्तान में दिखती थी उस पर भारत में खिल्ली उड़ाई जाती है, अब भारत में दिखने लगी है. पाकिस्तान ने पहले एटम बम बना कर अपनी शक्ति दिखा ही दी है और अब चीन के साथ वन रोड योजना का अहम पार्टनर बन कर वह अपने विकास के नए रास्ते भी खोज रहा है. पाकिस्तान में गरीबी है पर फिर भी बहुत गरीब भारत के गरीबों से अच्छे हैं क्योंकि वहां दलित नहीं हैं.

धार्मिक कट्टरपन में भारत पाकिस्तान से अब 2 हाथ आगे जा रहा है और ऐसे में यदि इमरान खान के 2-4 काम भी सही बैठ गए तो काफी कुछ नया हो सकता है. इमरान खान पश्चिम से काफी प्रभावित हैं और भारत विरोधी होते हुए भी उन्हें मालूम है कि पश्चिमी देशों की तरह एक साथ बैठ कर ही समस्याएं सुलझाई जा सकती हैं.

इमरान और सेना के संबंधों के पूर्वाग्रह को छोड़ कर ही भारत को पाकिस्तान से व्यवहार करना होगा और कम से कम नागरिकों के मिलनेजुलने पर लगी बीसियों रोकटोकें समाप्त कर देनी होंगी. उम्मीद करें कि दो कट्टरप्राय देश अब कुछ समझेंगे.

ग्रहों का बौस : जोशीजी को कौन समझाए

लोगबाग जमीनी चिंता से नहीं, बल्कि आसमानी चिंता से ज्यादा त्रस्त रहते हैं. उन्हें हरदम डर लगा रहता है कि आसमान में ठिया जमाए ग्रह कहीं उन से नाराज न हो जाएं. ऊपर बैठे 9 में से न जाने कब और कौन सा ग्रह उन से नाराज हो जाए और अच्छीभली जिंदगी में मुसीबत खड़ी कर दे. ग्रहों की नाराजगी बहुत महंगी पड़ती है. वे चाहें तो अच्छे पढ़ाकू विद्यार्थी को परीक्षा में फेल कर दें, अच्छीभली नौकरी छुड़वा दें, धंधे में नुकसान करवा दें या फिर दिवालिया ही बना दें. ज्यादा ही नाराज हो गए तो फिर बिस्तर से चिपका दें या हमेशा के लिए ही सुला दें.

इसलिए वे सालभर ग्रहों को शांत करने के लिए तरहतरह के जतन करतेफिरते हैं. वे धरती की परवा नहीं करते, जिस पर उन का शरीर टिका हुआ है और जिस पर वे दिनरात अत्याचार करते रहते हैं. आखिर ज्योतिषियों ने धरती का डर जो नहीं बताया है. उन की निगाह में ऊपर बैठे ग्रह ही सब के बौस हैं.

एक हैं जोशी. ये बताते हैं कि उन का असली सरनेम कभी ज्योतिषी था. दूसरों की जन्मकुंडली पढ़ना उन का खानदानी धंधा था. पता नहीं वे खुद की कुंडली नहीं समझ पाए या दूसरों से नहीं

पढ़ा पाए, इसलिए समय के साथ घिसतेघिसते जोशी हो गए. ये जोशीजी हरदम शोकमुद्रा लादे फिरते हैं क्योंकि आसमान में बैठा कोई न कोई ग्रह इन पर नाराज रहता है. इन दुखीराम पर मंगल कई बार नाराज हो चुका है.

बचपन के खेल का वाक्य ‘एक का पीछा साढ़े सात दाम’ इन के मंगल पर कभी लागू नहीं होता. इन का अंदाजा भी इतना सटीक है कि जरा सी छींक आई तो समझ जाते हैं कि शुक्र ग्रह फेवर में नहीं है और लग जाते हैं शुक्र ग्रह को खुश करने में. कभी उपवास, कभी अंगूठी तो कभी पूजापाठ. इन के सामने शनि का नाम भी ले लें तो मारे डर के पीले पड़ जाते हैं. इसलिए भूल कर भी शनिवार नहीं बोलते. कंप्यूटर में फीड किए शब्द की तरह या तो साफ सैटरडे कहते हैं या फिर रविवार के पहले का, शुक्रवार के बाद का दिन.

वैसे भी, शनि सब से खूंखार ग्रह माना जाता है. दूसरे ग्रह तो ट्वैंटीट्वैंटी मैच खेल कर अगला शिकार ढूंढ़ने में लग जाते हैं, लेकिन शनि महाराज टैस्ट क्रिकेट की तरह लंबे समय तक जमे रहते हैं. साढ़े 7 साल. नतीजा निकलेगा ही, इस बात की गारंटी नहीं है. इसलिए लोग सालभर डोरटूडोर तेल मांगने वाले शनि महाराज को तेल की किस्त बांध देते हैं.

जोशीजी का मानना है कि जब भी उन की तबीयत गड़बड़ होती है तो वे समझ जाते हैं कि शुक्र नाराज हैं. हाथपैर टूटे, तो यह शनि के कोप का नतीजा है. दूसरी नौकरी के लिए इंटरव्यू में फेल हो गए, तो यह गुरू का गुस्सा है. अनचाहा खर्च हुआ यानी बुध ने जेब काट ली. किसी से झगड़ा हुआ है तो राहु को ढंग से नहीं खुश किया होगा.

एक बार उन पर सूर्य की कुदृष्टि पड़ गई. वैसे सूर्य पर जब केतु नाराज होता है तो वह मुंह छिपा लेता है. समझदार लोग इसे सूर्यग्रहण कहते हैं, लेकिन वही सूर्य जोशी पर रुष्ट हो गया. उन की आंखें लाल, सिरदर्द, बदन गरम, हरदम प्यास. दौड़ेदौड़े पंडित के पास गए. पंडितों के पास हर मर्ज की दवा होती है, जो डाक्टरों के पास भी नहीं होती. वे केतु को प्रसन्न करने का इलाज नहीं बताते, बल्कि सूर्य को मनाने का तरीका जानते हैं.

डाक्टर दवा खाने की सलाह देते हैं लेकिन पंडित तो खिलाने को कहते हैं यानी उन्हें स्वयं को खिलाने को. उन के नुस्खे में पीडि़त के लिए हवन, पाठ और उपवास होता है. वे तो चौकी पर बैठ कर सूर्य से पीडि़त की सिफारिश करते हैं. तो जोशीजी को पंडित ने दवा की पर्ची लिख दी और डाक्टरों के अनुसार तयशुदा दुकानदार से ही खरीदने को कहा. पूरे एक सप्ताह तक हवन होता रहा. इसलिए दफ्तर की छुट्टी. चूंकि सूर्य का प्रकोप था, इसलिए रविवार को उपवास करने को कहा. बेचारे जोशीजी.

एक रविवार ही तो मिलता है, जब भरपेट माल उड़ाने को मिलता है, लेकिन सूर्य देवता को प्रसन्न करने में परिवार के दूसरे सदस्यों को माल उड़ाते देख वे मन मसोस कर रह जाते. उन्हें समझाने की जरूरत नहीं है भले ही आप के अच्छे मित्र ही क्यों न हों. वे आप पर उखड़ पड़ेंगे. यदि वे किसी समझदार की बात मान लें तो सूर्यदेव उन्हें कभी भी तंग नहीं करेंगे. बस, छाता तान कर बाहर निकलें. यदि आप फिर भी समझाएं तो सुनने को मिलेगा, ‘‘तुम्हें जरूर विदेशों से पैसा मिलता है. तुम जैसे लोगों के कारण ही भारत की दुर्दशा हो रही है.’’ और वे अज्ञात भूतकाल में गुम हो जाएंगे जब देश में दूध की नदियां बहती थीं, सोने के पहाड़ हुआ करते थे, चंदन के जंगल हुआ करते थे.

उन की राय में छाते से सूर्य को खुश करने की सलाह देने वालों के कारण ही नदियां गटर बन गई हैं और पहाड़ों के सिर कट गए. जंगलों की हजामत हो रही है. ‘‘देखना 9 के 9 ग्रह मिल कर जब तुम पर हमला बोलेंगे न, तब पंडितों के यहां चक्कर लगालगा कर जूते घिस जाएंगे,’’ और वे दुर्वासा बन कर कोई श्राप देंगे.

वे ये सब खटकर्म इसलिए करतेफिरते हैं ताकि सारे ग्रह एकमत से खुश हो कर उन्हें नौकरी में प्रमोशन दिलवा दें, लेकिन ऐसा होता नहीं. हर साल कोई और ही प्रमोशन ले जाता. उन का जूनियर तक उन से आगे बढ़ गया. उन्हें मिले भी तो कैसे? जिन ग्रहों को वे पूजते हैं, वे ही उन की राह के रोड़े बन जाते हैं. जगराते के कारण नींद पूरी नहीं हो पाती, इसलिए दफ्तर में झपकियां लेते रहते. उपवास की कमजोरी की वजह से औफिस का काम ठीक तरह से नहीं कर पाते. जबतब बीमार पड़ते और छुट्टी लेते, सहकर्मियों पर झल्लाते और बौस की डांट खाते. जाहिर है उन्हें प्रमोशन नहीं मिलता.

उन की राय में कभी शुक्र नाराज तो कभी गुरू. मंगल भी पीछा नहीं छोड़ता. उन पर यदि राहु खफा हुआ तो उन के लिए पूर्णिमा को भी अमावस्या होती है. इस बार प्रमोशन लैटर आए. बौस ने एकएक कर सब को केबिन में बुलाया और लैटर दिए. जब बौस के केबिन में जाने की बारी आई तो पहले जोशीजी ने तमाम अंगूठियों और तावीजों को चूमा, फिर सभी ग्रहों को याद किया और अपनी ओर उन का ध्यान खींचा, लेकिन जो होना था वही हुआ.

सालाना परंपरा के अनुसार केबिन से मुंह लटकाए बाहर निकले यानी इस बार भी ग्रहों ने साथ नहीं दिया. उस दिन बुधवार था. उन्होंने कारण ताड़ लिया और कहा, ‘‘अब की बुध ने साथ नहीं दिया. प्रमोशन के लैटर तो कल ही आए थे. दिए आज हैं, इसलिए सब गड़बड़ हो गया. कल देते तो प्रमोशन पक्का था. लगता है मेरी पूजा में ही कुछ कमी रह गई होगी वरना उसे तो मुझ से खुश होना था. अब दूसरे पंडित के पास जाऊंगा और दूनी भक्ति से बुध की पूजा किया करूंगा.’’

यदि कोई उन्हें समझाता कि अगर उन्हें प्रमोशन चाहिए तो वे इन ऊपरी ग्रहों की खुशामद करने के बजाय सब ग्रहों के बौस को खुश रखें. यह बौस आसमान में नहीं रहता, बल्कि धरती पर रहता है और हम इसे देख सकते हैं, छू सकते हैं, इस से बात कर सकते हैं. लेकिन वे सलाह देने वाले को इस तरह देखते मानो वह पगला गया हो. ग्रहों का कोई बौस कैसे हो सकता है? उसे खुश कैसे किया जा सकता है? ऐसा होता भी है कभी?

दफ्तर का बौस. जी हां, वही है सब ग्रहों का बौस. जोशीजी उसे खुश रखें तो उन के सारे दुख दूर हो जाएं. एक तो उसे अपने काम से खुश रखें यानी समय पर दफ्तर आएं और देर से जाएं. काम ढंग से और समय पर करें. ग्रहों को बारबार याद करने के बजाय बौस को हर सुबह आने पर गुडमौर्निंग कहें. जाने के पहले गुड डे कहें. उन का जन्मदिन याद रखें और दफ्तर में ही केक मंगवाएं. उन के विवाह की सालगिरह के दिन उन्हें बधाई दें. दफ्तर की पार्टी में उन की पसंद के गाने गाएं. चुटकुले सुना कर उन्हें हंसाएं. उन के ड्रैस सैंस की तारीफ करें. अपने लायक काम के बारे में पूछें. कभी बाहर जाएं तो उन के लिए मिठाई लाया करें. देखो, वह खुश होते हैं या नहीं, प्रमोशन आसमान से नहीं, धरती से मिलेगा. कोई एक तरीका आजमाएं. अगली बार बौस के केबिन से खुशीखुशी लौटेंगे.

बहरहाल, बहुत दिन हुए जोशीजी नजर नहीं आए. इसलिए कोई नहीं जानता कि वे अब किस बौस को खुश करने में लगे हैं, ऊपर वाले या दफ्तर वाले.

तलाक न लेने की सजा

भोपाल शहर के निशातपुरा इलाके में 4 जनवरी, 2018 को एक अधेड़ उम्र की औरत शबनम आग से बुरी तरह झुलस गई थी. पहले तो यह केस खुदकुशी की कोशिश का लगा. लेकिन निशातपुरा थाने की पुलिस ने जांच की तो जो हकीकत सामने आई सभी चौंक गए. पता चला कि वह 52 साल के सलीम खान की तीसरी पत्नी थी और उसे एक सोचीसमझी साजिश के तहत जलाया गया था.

दरअसल शबनम का पति सलीम खान सिक्योरिटी गार्ड था. 11 बच्चे होने के बाद भी वह चौथी शादी करने की कोशिश कर रहा था. उस का बड़ा बेटा 18 साल का हो चुका था. इस के बावजूद उस ने चौथी शादी थी.

पुलिस को इस मामले की खबर एक दिन बाद यानी 5 जनवरी को लगी तो थाना निशातपुरा के टीआई चैनसिंह रघुवंशी ने एसआई संतराम खन्ना को हमीदिया अस्पताल भेज दिया क्योंकि आग से झुलस जाने के बाद शबनम उसी अस्पताल में जिंदगी और मौत के बीच झूल रही थी.

एसआई संतराम खन्ना बिना वक्त गंवाए हमीदिया अस्पताल पहुंच गए. वहां शबनम की हालत चिंताजनक बनी हुई थी. अस्पताल में सलीम खान के परिवार के और लोग भी मौजूद थे. संतराम खन्ना ने जब शबनम और अन्य लोगों से बात की तो इस वारदात के पीछे की जो कहानी सामने आई वह इस प्रकार निकली—

सलीम एक मामूली नौकरीपेशा इंसान था. उस की पहली शादी शहनाज नाम की एक लड़की से हुई थी. लेकिन शादी के कुछ दिनों बाद कुछ ऐसे हालात पैदा हो गए कि बहुत जल्द शहनाज से उस का तलाक हो गया. सलीम एक मामूली आदमी था. जैसेतैसे कर के उस की शादी शहनाज से हुई थी. उस से तलाक के बाद सलीम इस फिक्र में लग गया कि अब उस की दूसरी शादी कैसे होगी.

पर इस मामले में सलीम की किस्मत औरों से काफी जुदा निकली. तभी तो कुछ ही दिनों में उस की दूसरी शादी हो गई. दूसरी बीवी से सलीम के 7 बच्चे हुए. सलीम फकीर बिरादरी से था. उस की बिरादरी के अधिकांश लोग भीख मांगा करते थे. इसलिए परिवार बढ़ने की उसे कोई चिंता नहीं हुई.

उस का खर्च समाज से पूरा हो रहा था. बच्चे जब थोड़े बडे़ हो गए तो वह भीख मांगने लगे. वहीं दूसरी ओर सलीम की पत्नी भी आसपड़ोस के घरों में साफसफाई करने और खाना बनाने का काम करने लगी. कुल मिला कर सारा घर अपने खानेपीने का इंतजाम खुद ही कर लेता था. भीख मांग कर शौक तो पूरे नहीं किए जा सकते. लेकिन उस की जिंदगी बदस्तूर चल रही थी.

इसी बीच सलीम की दूसरी पत्नी भी उसे छोड़ कर चली गई तो सलीम ने 35 वर्षीय शबनम नाम की एक महिला से शादी कर ली. शबनम भी तलाकशुदा थी. उस के पास 2 बच्चे पहले से थे. सलीम से शादी के बाद वह 2 बच्चों की मां और बन गई.

अब उस के परिवार में 11 बच्चे हो गए थे. शबनम समझदार और सुलझी हुई महिला थी. वही अपने और सलीम के सारे बच्चों की परवरिश कर रही थी. बाद में सलीम शांति अपार्टमेंट में गार्ड की नौकरी करने लगा.

11 बच्चे होने के बावजूद सलीम ने शबनम के होते हुए आयशा से चौथी शादी कर ली. लेकिन उस ने यह बात काफी दिनों तक शबनम से छिपाए रखी.

उस ने अपनी चौथी बीवी को अपने घर में न रख कर कुछ दूरी पर भानपुर में एक किराए के मकान में रखा था. वह आयशा को हर महीने खर्च के लिए लगातार पैसे भेजता और वहीं पर उस से मिलने जाता रहता था.

पर आयशा से शादी वाली बात वह शबनम से ज्यादा दिनों तक नहीं छिपा सका. शबनम को जब यह जानकारी मिली तो उसे बहुत गुस्सा आया. शबनम ने सलीम से शिकायत की, ‘‘मैं तुम्हें इतना प्यार करती हूं, बच्चों की देखभाल कर रही हूं. तो ऐसी क्या मजबूरी आ गई जो तुम ने आयशा से शादी कर ली. तुम्हें ऐसा नहीं करना चाहिए था.’’

‘‘तुम्हें मेरी शादी से कोई परेशानी नहीं होनी चाहिए. क्योंकि जिस तरह पहले से चलता आ रहा है, ठीक वैसे ही अब भी चलता रहेगा. आयशा भी एक तलाकशुदा औरत है. वो परेशान थी तो मैं ने उसे अपने यहां एक तरह से आश्रय दिया है.’’ सलीम ने सफाई दी.

‘‘शहर में और भी तमाम तलाकशुदा महिलाएं हैं. उन्हें भी आश्रय दे दो. वो भी बेचारी न जाने कहांकहां धक्के खा रही होंगी.’’ शबनम ने कटाक्ष किया.

‘‘तुम तो बेवजह पेरशान हो रही हो. उस के आने पर तुम्हारे प्यार में कमी नहीं आने दूंगा. इसलिए तुम कोई चिंता मत करो.’’ सलीम ने उसे फिर समझाने की कोशिश की. लेकिन इतनी बड़ी बात को शबनम भला कैसे स्वीकार कर सकती थी, लिहाजा वह पति से खूब झगड़ी. कुछ ही दिनों बाद इस बात को ले कर अकसर ही घर पर झगड़ा होने लगा.

आयशा अपने पहले शौहर को तलाक दे कर अपनी मां के साथ एक छोटे से घर में रहती थी. पर अब तो सलीम ने उसे एक किराए का कमरा दिला दिया था. सलीम हर महीने उसे खर्च के पैसे देता रहता था. पर आयशा ने अब एक जिद यह पकड़ रखी थी कि वह शबनम से तलाक दे कर उसे अपने घर पर रखे.

सलीम शबनम को तलाक देने के लिए राजी नहीं था. इसी बात को ले कर दोनों में पहले तो सिर्फ बहस होती. लेकिन जल्दी ही इस मुद्दे के तूल पकड़ते देर न लगी. सलीम के दिए पैसों से मांबेटी का खर्च चलता था.

दिसंबर 2017 में इत्तफाक से सलीम को अपने तय वक्त पर तनख्वाह नहीं मिली तो वह आयशा को समय पर खर्च के लिए पैसे नहीं भेज पाया. जब भी सलीम उसे समय से पैसे नहीं भेज पाता तो आयशा अपनी मां के साथ सलीम के घर आ धमकती थी. इस के लिए मांबेटी शबनम को दोषी मानती थीं. वह दोनों आते ही शबनम पर हावी हो जाती थीं.

आयशा शबनम पर इस बात का दबाव बनाती कि वह सलीम से जल्द तलाक ले कर वहां से चली जाए ताकि वह इस घर में आ कर रह सके. पर शबनम आयशा की बातों को अनसुना कर देती.

दिसंबर के महीने में भी वह दोनों घर आ कर शबनम से झगड़ने लगीं. आयशा की मां वसीमा बी आग बबूला हो गई. होहल्ला सुन कर आसपास के लोग भी अपने घरों से बाहर निकल कर दोनों को समझाने लगे. इतने में किसी ने सलीम को फोन कर के इस की जानकारी दे दी.

सलीम उस समय शांति अपार्टमेंट में अपनी ड्यूटी पर था. वह दूसरे गार्ड को थोड़ी देर में लौट आने की बात बोल कर जल्दी से घर आ गया. उस समय घर पर महाभारत छिड़ी हुई थी. सलीम ने आते ही आयशा को समझाया कि यहां पर मत लड़ो, सब लोग देख रहे हैं. आयशा ने सलीम से गुस्से में कहा, ‘‘सब से पहले तो तुम शबनम को तलाक दो. तभी मैं तुम्हारे साथ रहूंगी.’’

सलीम ने उसे समझाने की पूरी कोशिश की, लेकिन आयशा इसी बात पर अड़ी रही. सलीम के साथ पड़ोस के लोगों के समझाने के बाद आयशा थोड़ी ठंडी पड़ी और झगड़ा खत्म कर लिया. झगड़ा खत्म होने पर सलीम ने राहत की सांस ली.

दोबारा ड्यूटी पर जाने से पहले सलीम ने शबनम और आयशा को समझाया, ‘‘मैं जा रहा हूं, इसलिए अब लड़ना नहीं.’’ कह कर सलीम वहां से चला गया. उसे लगा कि उस के समझाने के बाद दोनों नहीं लड़ेंगी. वह दोनों बीवियों की तरफ से बेफिक्र हो गया.

अभी सलीम अपार्टमेंट में इत्मीनान से खड़ा भी नहीं हुआ था कि एक पड़ोसी का फोन आ गया. अचानक फोन आने से सलीम को शंका हुई कि दोनों के बीच फिर से लड़ाई शुरू हो गई होगी? जैसे ही उधर से रूहकंपा देने वाली आवाज आई, वैसे ही सलीम ने बिना किसी को बताए घर की तरफ दौड़ लगा दी.

जब वह घर पर पहुंचा तो उस के घर के चारों तरफ मजमा सा लगा था. भीड़ देख कर सलीम को पूरा यकीन हो गया था कि कोई बड़ी बात हो गई है. करीब पहुंच कर देखा तो उस की तीसरी बीवी शबनम पूरी तरह आग में जली एक तरफ पड़ी थी और चारों ओर देखने वालों की भीड़ लगी थी, मामले की गंभीरता की गवाही दे रही थी.

जैसेतैसे शबनम को हमीदिया अस्पताल में भरती कराया गया. डाक्टरों ने देखते ही हाथ खडे़ कर लिए. क्योंकि उन्हें मालूम था कि शबनम इस दुनिया में बमुश्किल एकदो दिनों की मेहमान है. सलीम ने डाक्टर के सामने अपनी बीवी को बचाने की गुहार लगाई. वह किसी भी कीमत पर शबनम को खोना नहीं चाहता था. डाक्टरों की लाख कोशिशों के बावजूद शबनम ने दम तोड़ दिया.

पता चला कि 4 जनवरी, 2018 को जब आयशा अपनी मां के साथ सलीम के पहले घर पर आ धमकी तो उस की बीवी शबनम से बहस होने लगी थी. जिसे बाद में सलीम ने आ कर शांत करा दिया था. उस के बाद हुआ ये कि एक बार फिर से दोनों सौतनों में तलाक को ले कर बहस शुरू हो गई थी.

उस समय शबनम की बेटी चूल्हे पर खाना बना रही थी. बात अचानक से इतनी बढ़ गई कि आयशा और उस की मां ने मिल कर शबनम को धक्का दे कर जमीन पर गिरा दिया, जिस वजह से उस के सिर और हाथ में चोट लग गई.

शबनम इस के लिए बिलकुल भी तैयार  नहीं थी कि वह अपने शौहर को तलाक दे. उस ने आयशा से साफ कह दिया था कि जब मैं ने अभी तक सलीम की पहली बीवी के बच्चों को एक मां की तरह पालापोसा है, तो अब तलाक ले कर कहां जाऊंगी.

इस बात को सुन कर आयशा को तैश आ गया. उस ने कहा कि तुम जहन्नुम में जाओ या कहीं और, मुझे इस से मतलब नहीं है. लेकिन तुम्हें सलीम से तलाक लेना ही पड़ेगा.

उन्होंने जब देखा कि शबनम अपने इरादे पर अटल है तो आयशा झगड़ा करने पर उतारू हो गई. इसी दौरान वसीमा बी ने अपनी बेटी आयशा से कहा कि देखती क्या है इस करमजली के ऊपर केरोसीन डाल कर आग लगा दे.

यह सुन कर आयशा ने पास ही रखा केरोसीन का गैलन उठाया और जमीन पर गिरी पड़ी शबनम पर उस की बेटी के सामने ही डाल कर जलती हुई माचिस की तीली उस की तरफ उछाल दी.

एक छोटी सी चिंगारी शबनम पर पड़ते ही आग का गोला बन गई. गुस्से में आयशा ने इतना बड़ा कदम तो उठा लिया, लेकिन बाद में पुलिस केस होने की बात सोच कर वह डर गई.

आयशा और उस की मां ने सलीम के साथ मिल कर शबनम को हमीदिया अस्पताल में भरती कराया और शबनम से बोलीं कि तुम पुलिस को इस की गवाही मत देना. हम लोग तुम्हारा इलाज करा देंगे. जिस से तुम पहले की तरह ठीक हो जाओगी.

पहले तो शबनम को उन की बातों पर भरोसा हो गया. लेकिन जब अपनी हालात देखी तो उसे अपने मासूम बच्चों की फिक्र सताने लगी. जिस से वह परेशान हो गई. उस ने बाद में एसआई संतराम खन्ना को पूरी सच्चाई बता दी. इस के साथ शबनम ने मजिस्ट्रैट के सामने भी मौत से जद्दोजहद करते हुए पूरी घटना के बारे में जानकारी दे दी.

निशातपुरा पुलिस ने मौके का मुआयना कर के आग लगाने के सबूत इकट्ठे कर लिए. आयशा और उस की मां पर भादंवि की धारा 307 और 34 के तहत मामला दर्ज कर लिया गया. शबनम की सौतन आयशा जल्दी ही पुलिस के हत्थे चढ़ गई.

उस की शातिर मां वसीमा बी पुलिस को चकमा देने में कामयाब रही. पुलिस ने वसीमा बी की धरपकड़ के लिए उस के घर पर दबिश दी. लेकिन पुलिस टीम को खाली हाथ लौटना पड़ा. वसीमा बी की तलाश में पुलिस ने कई जगह छापेमारी की, लेकिन उस का कहीं पता नहीं चल सका.

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