प्याज के आंसू : आम आदमी को रूलाया

प्याज खरीदने की लंबी कतार में लगे हुए 2 घंटे से ज्यादा का समय बीत चुका था, पर बढ़ती महंगाई की तरह यह लाइन भी दिनोंदिन बढ़ती जा रही थी. किसकिस लाइन में लगे जनता? बिजली का बिल जमा करने, राशन की दुकान, रेल का टिकट, बैंक का काउंटर और सरकारी अस्पतालों की बिना बेहोशी की दवा के बेहोश करने वाली कतारें. सच, नानी याद दिला देती हैं.

खैर, लाइन आगे बढ़ी. मुश्किल से 10 लोग अपने मकसद से दूर रह गए. मुझे संतोष हुआ कि चलो अब मंजिल दूर नहीं है कि तभी अचानक स्टे और्डर सा लग गया.

मालूम हुआ कि प्याज का स्टौक खत्म हो गया है. दूसरा स्टौक आने में कुछ देर लग जाएगी.

तभी एक सज्जन ने हद कर दी. उन्होंने ‘हद है भैया’ कहते हुए मेरी ओर पान की पीक थूक दी, तभी आगे से एक वाक्य उछल कर मेरे कानों से टकराया, ‘अरे, आप धक्का क्यों दे रहे हैं?’

जवाब आया, ‘मैं ने कोई धक्का नहीं दिया. आप ने इतनी जोर से मेरे पेट में कुहनी मारी कि मैं गिरतेगिरते बचा.’

यह तो अच्छा हुआ कि इस धक्कामुक्की में मेरी जगह नहीं गई. इसी शोरशराबे में मेरा नंबर आ गया. मैं झपट कर पहुंचा तो देखा कि काउंटर पर निर्धन के धन की तरह मुश्किल से पावभर प्याज पड़े थे. मरता क्या न करता, प्याज के आंसू रोते हुए मैं ने झोला आगे कर दिया. आज समझ में आया कि प्याज के आंसू किसे कहते हैं. जो खरीदने से ले कर पकाने तक में सौसौ आंसू गिरवाते हैं.

प्याज खरीद कर मैं ने अपना स्कूटर स्टार्ट किया. घर की घंटी बजाने से पहले ही पत्नी ने सजग द्वारपाल की तरह ऐसे दरवाजा खोल दिया, जैसे वह पहले ही से दरवाजे पर कान लगाए बैठी थी.

‘‘लो, अब तो खुश हो जाओ,’’ कहते हुए मैं ने झोला पत्नी की ओर बढ़ा दिया और मासूम सी एक मुसकान के साथ उन की ओर देखने लगा.

लेकिन पत्नी ने झोला वापस लौटाते हुए पटक दिया. 2-4 प्याज लुढ़क कर मानो मेरी ओर देखने लगे. जैसे वे कह रहे हों कि क्या बेइज्जती करवाने के लिए तुम हमें यहां लाए थे? इस से अच्छे तो हम कालाबाजारियों के यहां थे. कम से कम बोरों में बंद दूसरे साथियों के साथ सारा दिन गपशप तो होती रहती थी. ठंडीठंडी कूलिंग का मजा अलग था, वरना इस 48 डिगरी टैंपरेचर में क्या हाल होता है, जनता खूब जानती है.

दरअसल, कुछ चीजें ऐसी हैं, जो केवल और केवल जनता के ही हिस्से में आती हैं, जैसे बिन बिजली, बिन पानी सब सून. बिन सड़कें, बिन भ्रष्टाचार जीवन बेकार. बिन महंगाई, जीवन धिक्कार. अहिंसा, परमो धर्म’, ‘संतोषी सदा सुखी’. ‘न बुरा देखो, न बुरा सुनो, न बुरा कहो’. इसी में आम जनता का पूरा जीवन दर्शन छिपा है. जो इन को अपना ले, समझ लीजिए कि उस के सारे दुख खत्म हो गए.

पता नहीं, लोग क्यों हर चीज के लिए इतना होहल्ला मचाते हैं? क्या मिट्टी के तेल के लिए लाइन लगाना कोई गुनाह है? आखिर बिजली के जन्म के पहले भी तो आप वहां लाइन लगाते ही थे. पहले भी तो लकड़ी के चूल्हों पर ही खाना बनता था, जो आज से कहीं ज्यादा स्वादिष्ठ और सेहतमंद होता था.

इस बात को मानने से बड़े से बड़ा वैज्ञानिक भी इनकार नहीं कर सकता, तो क्यों भैया इस के लिए झींकते हो? 2-4 घंटे खड़े रहोगे, तो तुम्हारे पैर नहीं टूट जाएंगे. अनुशासन मुफ्त में सीखने को मिल रहा है, जो और जगह लाइन लगाने में काम आएगा.

तभी श्रीमतीजी की मधुर आवाज कानों में पड़ी, ‘‘सुनते हो, खाना ले जाओ.’’

मैं विचारों से बाहर निकला और झट से थाली थाम ली. देखा तो रोटियों के साथ आधा कप प्याज खींसें निपोर रहे थे. पहला कौर खाया कि कमबख्त प्याज का तीखापन फिर आंसू रुला गया.

युवाओं की खोखली सामाजिक सोच

भारतीय उन्मादी धर्मनिष्ठ युवाओं द्वारा अमेरिकी टैलीविजन सीरियल ‘क्वांटिको सीजन-3’ के एक एपिसोड के प्रसारण पर जम कर हल्ला मचाया गया. आरोप लगाया गया कि ‘द ब्लड औफ रोमिया’ नामक एपिसोड में ‘भारतीय राष्ट्रवादियों’ को न्यूयौर्क में परमाणु बम हमला करने के लिए प्लौट रचते हुए दिखाया गया था ताकि उस का शक पाकिस्तान पर जाए. 1 जून को प्रसारित हुए इस एपिसोड के बाद सोशल मीडिया पर राष्ट्रवादी बिल्ला लगाए युवाओं का गुस्सा देखा गया. सीरियल में अभिनय कर रही भारतीय अभिनेत्री प्रियंका चोपड़ा और शो निर्माताओं से माफी मंगवाई गई. यह विरोध मोबाइलों से ट्रौल करने में माहिर युवा कैडर ने किया जिस पर कट्टरवादी सोच हावी रहती है. इस विरोध से जाहिर होता है कि हमारे ये युवा कितने कम उदार, अलोकतांत्रिक और अभिव्यक्ति की आजादी का सम्मान न करने की जिद रखने वाले हैं. ऐसी घटनाओं से बारबार हमारे युवाओं की छोटी सोच उजागर होती रही है. परदे पर जो दिखाया गया है उसे स्वीकार करने और सोचनेसमझने की मानसिकता उन में दिखाईर् ही नहीं देती.

दूसरी तरफ बिहार से खबर है कि लालू प्रसाद यादव के परिवार में उपेक्षा को ले कर तनातनी चल रही है. लालू के बड़े बेटे तेजप्रताप का छोटे भाईर् तेजस्वी से मनमुटाव है. तेजप्रताप ने अपनी अनदेखी से चिढ़ कर कहा था कि पार्टी में सामंतवादी लोग घुस आए हैं और ऐसे लोग दलित नेताओं व युवाओं को तरजीह नहीं दे रहे हैं. झारखंड के सिंहभूम जिले में बच्चा चोर और इसी राज्य में पशु चोरी के शक में कुछ लोगों की युवा लठैतों द्वारा जानें ले ली गईं.

देश में अफवाहों का बाजार जानलेवा रूप ले चुका है. ये अफवाहें युवा ही फैला रहे हैं. अफवाहों पर भरोसा कर मौब लिंचिंग जैसी घटनाओं को अंजाम देना आम बात हो गई है. देश के तकरीबन हर हिस्से में गौरक्षा के नाम पर गुंडागर्दी, राष्ट्रवाद के नाम पर फर्जी देशभक्ति का प्रदर्र्शन कर समाज में द्वेष, ईर्ष्या, नफरत पैदा करने में युवा आगे हैं. 14 जून को महाराष्ट्र के जलगांव के वाकड़ी गांव में ईश्वर बलवंत जोशी के कुएं पर

2 दलित बच्चों के नहाने पर युवा भीड़ द्वारा उन्हें सरेआम नंगा कर मारापीटा गया. इस तरह की घटनाएं आएदिन हो रही हैं. इन घटनाओं को युवा ही अंजाम दे रहे हैं. आज भी देश में ऊंचनीच का भेदभाव व्याप्त है. अब पढे़लिखे युवाओं का एक वर्ण एवं वर्ग सामाजिक बराबरी के सिद्धांत को स्वीकार करना नहीं चाहता.

संवेदनहीन युवा पंजाब के लुधियाना के शिवम बिरदी की नोएडा में नौकरी लगी तो वह अपनी प्रेमिका ज्योति को भी साथ ले आया. प्रेमिका भी नौकरी करने लगी. दोनों लिवइन में साथ रह रहे थे. ज्योति एक दिन देर रात में काम से लौटी तो दोनों के बीच झगड़ा हो गया. शिवम ने चाकू से प्रेमिका की हत्या कर दी और शव सूटकेस में ठूंस कर गाड़ी में रखने लगा कि मकानमालिक को शक हो गया और वह पकड़ा गया.

इसी तरह दिल्ली की गीता कालोनी की डोली ने आत्महत्या कर ली. आरोप है कि उस के पति विजय ने गर्भ में पल रहे बच्चे का डीएनए टैस्ट कराने की बात कही थी. पति ने किसी युवक के साथ उसे घूमते हुए देख लिया था, इसलिए उसे शक था कि पत्नी के पेट में पल रहा बच्चा उस का नहीं है. इन दोनों खबरों में युवाओं की अपने प्यार और परिवार के प्रति प्रेम, सहनशीलता, दायित्वहीनता दिखाई देती है. साथ ही, अपनेअपने जीवनसाथी के प्रति भरोसे की कमी भी नजर आती है. ये चीजें युवाओं ने सीखी ही नहीं हैं.

गुजरात के वेरावल में एक युवक की पत्नी की मौत हो गई तो उस युवक ने दूसरी शादी कर ली. युवक के घर वालों ने बताया कि बहू गौरी की सीढि़यों से गिर कर मौत हुई थी और उस के मांबाप को सूचना दे कर बुला लिया गया था. कुछ ही दिनों बाद गौरी के परिवार वालों ने पुलिस में शिकायत की कि बेटी की हत्या की गई है पर बाद में गौरी के परिवार वालों ने समाज की बैठक बुलाई और सजा का फैसला सुनाते हुए फरमान जारी किया कि युवक राजू 10 साल तक दूसरी शादी नहीं कर सकता. युवक ने चूंकि शादी कर ली तो उस का पूरा परिवार बिरादरी से बाहर कर दिया गया. हैरानी यह है कि समाज में इस तरह की मध्यकालीन पंचायती सोच आज भी मौजूद है. युवावर्ग इस का विरोध करने के स्थान पर इसे पुनर्स्थापित कर रहा है.

परिवार से संबंधित एक और खबर है कि देश का हर चौथा बुजुर्ग दुर्व्यवहार का शिकार है और दुर्व्यवहार करने वाले उस के अपने ही युवा बेटे, बहू और बेटियां हैं. गैरसरकारी संगठन हेल्पएज इंडिया द्वारा देश के कई शहरों में सर्वे कराए जाने के बाद जारी रिपोर्ट में कहा गया है कि दुर्व्यवहार करने वालों में आधे से अधिक पढे़लिखे लोग हैं जो उन्हें अपमानित करने से ले कर मौखिक अभद्रता, उपेक्षा व मारपीट तक करते हैं. जून में ही बौलीवुड फिल्मस्टार सलमान खान का भाई अरबाज खान सट्टेबाजी के आरोप में पकड़ा गया. उस के साथ निर्माता व फाइनैंसर पराग सांघवी का नाम भी आया है. जांच एजेंसी की पूछताछ में खुलासा हुआ कि फिल्म इंडस्ट्री की कई हस्तियां सट्टेबाजी में लिप्त हैं. आईपीएल के दौरान देश में 10 हजार करोड़ रुपए से ज्यादा का सट्टेबाजी का धंधा होता है.

युवाओं का सट्टेबाजी की ओर रुझान बढ़ रहा है. वे रातोंरात करोड़पति बनना चाहते हैं. उन में सट्टेबाजी के साथसाथ नशाखोरी जैसी बुराइयां भी भरी हुई हैं. आंकडे़ बताते हैं कि देश के 80 प्रतिशत से ज्यादा युवा किसी न किसी नशे की गिरफ्त में हैं. हमारे युवाओं के लिए आज फिल्मी हीरो, अपराधजगत का माफिया डौन, भ्रष्ट अधिकारी और बेईमान कारोबारी आदर्श बन रहे हैं.

क्या यह दुर्दशा इसलिए हो रही है कि देश के अधिकांश युवाओं के सामने भविष्य अस्पष्ट है. जो मिल रहा है वह थोड़े से युवाओं के लिए है.

दिल्ली विश्वविद्यालय में प्रवेश के लिए कटऔफ लिस्ट जारी हो रही हैं. सैंट स्टीफंस कालेज में प्रवेश के लिए पहली कट औफ में 98.75 प्रतिशत अंक रखे गए हैं. सीबीएसई, नीट, जेईई, एसएससी जैसी परीक्षाओं में गलाकाट प्रतिस्पर्धा देखी जा सकती है पर क्या केवल अंक को ही किसी युवा की प्रगति का आधार माना जा सकता है? पर ये मेधावी युवक जो कुछ कर रहे हैं, केवल अपने लिए ही कर रहे हैं. इन का समाज या देश से कोई सरोकार नजर नहीं आता. बाद में जा कर ये अपने परिवार से भी कट जाते हैं. ज्यादातर युवा आत्मकेंद्रित हो रहे हैं, अपने लिए ही जीने वाले चाहे सफल हों या असफल.

हाल में युवा प्रदर्शनों पर गौर करें तो रेलवे में नौकरी के नियम, एसएससी परीक्षा, छात्रसंघ चुनाव, आरक्षण आदि मुद्दों को ले कर वे सड़कों पर दिखे. पर यह लड़ाई उन की व्यक्तिगत जरूरतों को ले कर थी, स्वयं तक सीमित थी. सामाजिक मुद्दों को ले कर उन में कोई जागृति नहीं है. किसी तरह के आंदोलन की तैयारी का तो सवाल ही नहीं है. समाज में बिखराव युवाओं को खा गया है. भारतीय युवा आरक्षित और गैरआरक्षित श्रेणियों में बंट गया है. दोनों के बीच सामंजस्य के भाव नहीं, वैमनस्यता फैलाईर् जा रही है. उन में परिपक्व और निस्वार्थ नेतृत्व है ही नहीं जिस पर भरोसा किया जा सके.

दुनियाभर के इतिहास में हमेशा युवाशक्ति का गौरवगान हुआ है. युवाओं ने ही बड़ीबड़ी राजनीतिक व सामाजिक क्रांतियों का नेतृत्व किया है. युवा ही हैं जो इतिहास बदलने की ताकत रखते हैं. भारत में भी आजादी की अलख जगाने से ले कर संपूर्ण क्रांति और जन लोकपाल विधेयक के लिए हुए आंदोलनों में युवाशक्ति की ही अहम भूमिका रही है. छोटेबड़े सामाजिक बदलाव के वाहक युवा ही बने हैं. मौजूदा दौर में न केवल पारिवारिक नेतृत्व अपनी जगह छोड़ रहा है, सामाजिक नेतृत्व का अभाव भी खटकने लगा है. पिछले समय से सामाजिक नेतृत्व को ले कर निराशा और दायित्वहीनता की स्थिति नजर आ रही है. इस स्थिति में देश, समाज जटिल दौर में खड़ा दिखाई दे रहा है.

आज देश में पारिवारिक, सामाजिक, राजनीतिक व आर्थिक मूल्यों के मानक बदल रहे हैं. गैरबराबरी, नफरत, ईर्ष्या, बिना उद्यम किए शीर्ष पर पहुंचने की होड़, एकदूसरे को नीचे गिराने की मंशा, योग्य लोगों पर नाकाबिलों का वर्चस्व, तिकड़में, कोरी बातें बना कर सफल दिखने वालों की बढ़ती संख्या, असहनशीलता, अकर्मण्यता, नशाखोरी, दायित्वहीनता, अंधविश्वास, जैसी प्रवृत्तियों का बोलबाला है. अंधविश्वास की जकड़न

महिलाओं के प्रति यौनहिंसा से देश पीडि़त है. समाज में छुआछूत, ऊंचनीच और जातपांत की खाई अब भी बहुत गहरी है. दलितों, महिलाओं के साथ अमानवीय व्यवहार की घटनाएं आएदिन देखनेसुनने में आती हैं. डायनप्रथा के नाम पर महिलाओं की हत्याएं की जाती हैं. अंधविश्वास में जकड़े लोग नरबलि तक दे डालते हैं जो सभ्य कहलाने वाले समाज के माथे पर कलंक है. संयुक्त राष्ट्र संघ की रिपोर्ट के अनुसार, आज भारत दुनिया की सब से बड़ी युवा आबादी वाला देश है. यहां आधी से अधिक आबादी युवाओं की है. देश की लगभग 65 प्रतिशत जनसंख्या की आयु 35 वर्ष से कम है. यहां 60 करोड़ लोग 25 से 30 वर्ष के हैं जो विश्व के किसी भी देश की तुलना में सब से अधिक है.

राजनीति में मौजूद युवा नेताओं में भी सामाजिक सोच की और पढ़ने व सही ज्ञान पाने की इच्छा में कमी उजागर होती रहती है. हाल में त्रिपुरा के युवा मुख्यमंत्री बिप्लब कुमार देब ने कह डाला था कि देश में महाभारत युग में भी तकनीकी सुविधाएं उपलब्ध थीं जिन में इंटरनैट और सैटेलाइट शामिल थे. देब का दावा था कि महाभारत के दौरान संजय ने हस्तिनापुर में बैठ कर धृतराष्ट्र को बताया था कि कुरुक्षेत्र के मैदान में

युद्ध के वक्त क्या हो रहा था. संजय इतनी दूर रह कर आंखों से कैसे देख सकते थे. इस का मतलब है उस समय भी इंटरनैट और सैटेलाइट था.

यह कपोलकल्पित बात पहले पीपल के पेड़ के नीचे बैठा बुर्जुग साधू ही कहता था, शिक्षित मुख्यमंत्री नहीं कह सकता था.

इस से पहले भी वे इसी तरह की हास्यास्पद बातें कर सुर्खियों में रहे. उन्होंने कहा था कि युवा सरकारी नौकरियों के लिए समय बरबाद करने के बजाय पान की दुकान लगा लेते तो उन के खाते में अब तक 5 लाख रुपए जमा होते. वे प्रधानमंत्री मुद्रा योजना के तहत लोन ले कर पशुधन खरीद सकते हैं. इसी तरह उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री दिनेश शर्मा ने कहा था कि रामायण काल में टैस्टट्यूब बेबी की अवधारणा थी. शर्मा ने कहा था कि सीता का जन्म धरती के अंदर से निकले घड़े में हुआ था. इस का अर्थ है कि रामायण काल में भी टैस्टट्यूब बेबी का विज्ञान था.

वे यह बताने को तैयार नहीं कि सीता के मातापिता में क्या दोष था जो टैस्टट्यूब बेबी की नौबत आई. अगर ग्रंथों के आधार पर ही बताया जाए तो सीता के बारे में तथ्य उजागर करने पर उन के जैसी सोच वाले युवा ही सिर फोड़ने को तैयार हो जाएंगे, जैसे प्रियंका चोपड़ा के पीछे पड़ गए. ऐसे में युवा नेता पौराणिक काल की सोच में जी रहे हैं, वे विचलित और दिग्भ्रमित हैं. युवाओं की सोच और समझ किसी तरह के सामाजिक, राजनीतिक परिवर्तन वाली दिखाई नहीं पड़ती. इसीलिए आज युवा होते हुए भी भारत राजनीतिक, सामाजिक सड़ीगली सोच वाले वृद्ध और जर्जर हो चुके नेतृत्व से संचालित होने के लिए अभिशप्त है? इन उदाहरणों से पता चलता है कि हमारे युवाओं में कितनी काबिलीयत है. इस से यह भी मालूम होता है कि देश की शिक्षा, राजनीतिक, सामाजिक व्यवस्था में कैसे अभाव व विसंगतियां हैं. हमारे युवाओं को वह शिक्षा नहीं मिल पा रही जिस से उन में सामाजिक समझ उत्पन्न हो. उन में सही राजनीतिक सोच पैदा नहीं हो पा रही है. सामाजिक नेता कोई है नहीं. युवाओं ने परदे के फिल्मी हीरोहीरोइनों या क्रिकेट खिलाडि़यों को अपना आदर्श मान लिया है. फिल्में भी ऐसी जिन में मौलिकता व क्रिएटिविटी का सर्वथा अभाव दिखाईर् देता है. मैदान में भी खिलाड़ी बढ़ते नजर आ रहे हैं और खेलों में जबरदस्त राजनीति है.

पुरातन व संकीर्ण सोच कभीकभार ताजी हवा देने वाले कन्हैया कुमार, हार्दिक पटेल, जिग्नेश मेवाणी, चंद्रशेखर आजाद जैसे सामाजिक सोच वाले नेता सामने आते तो हैं पर उन पर सरकारों और कट्टर संकीर्ण सोच वाले समाज के लोगों का कहर टूट पड़ता है. सरकारें और पुरानी सोच वाले समाज के लोग ऐसे नेताओं को डरानेदबाने में दिनरात एक कर देते हैं. उन पर हमले किए जाते हैं, देशद्रोह जैसे मुकदमे थोप कर उन्हें जेल में डाल दिया जाता है.

यही कारण है कि आज के युवा भारत पर बुजुर्ग नेता राज ही नहीं कर रहे, उस पर प्राचीन संस्कृति, परंपराओं के नाम पर पुरानी खोखली सोच थोपी भी जा रही है. देश, समाज को आगे ले जाने का दायित्व युवाओं का है पर युवाओं को उन के दायित्व को सिखानेसमझाने वाला कोई नहीं है. अप्रैल 2011 में जनलोकपाल विधेयक को ले कर अन्ना हजारे के नेतृत्व में आंदोलन हुआ था. इस आंदोलन में

स्वत:स्फूर्त युवाओं की उपस्थिति देखी गई. आंदोलन में अरविंद केजरीवाल, योगेंद्र यादव, मनीष सिसोदिया, कुमार विश्वास, प्रशांत भूषण जैसे चेहरे उभर कर सामने आए. आंदोलन के प्रभाव का तब की यूपीए सरकार पर जबरदस्त असर हुआ पर बाद में इस से जुड़े लोग अलग होते गए और आंदोलन लक्ष्य से हट गया. कारण यह था कि युवाओं का बड़ा वर्ग किसी एक नेता को नेता स्वीकार करने को तैयार नहीं था. मध्यकाल में यूरोप में सांस्कृतिक आंदोलन के नाम पर पुनर्जागरण हुआ था. इस में सामाजिक नेताओं की भूमिका प्रमुख थी. बाद में मार्टिन लूथर द्वितीय ने क्रांतिकारी सामाजिक बदलाव किए. यही नहीं, तुर्की में मुस्तफा कमाल पाशा ने बर्बर, अंधेर, कट्टर समाज के बीच प्रकाश की लौ जगाई. कई सामाजिक सुधार किए.

1917 की रूसी क्रांति इतिहास की महत्त्वपूर्ण सामाजिकराजनीतिक घटना थी. उस ने निरंकुश शाही शासन ही नहीं, पूंजीपतियों की आर्थिक व सामाजिक सत्ता को समाप्त कर विश्व में मेहनतकशों का राज स्थापित किया. भारत में छोटेबड़े सामाजिक सुधार होते रहे हैं. समाज सुधारक नेता भी युवा थे. महाराष्ट्र में वर्णव्यवस्था के खिलाफ सामाजिक जागृति पैदा करने वाले ज्योतिबा फूले ने सत्यशोधक समाज की स्थापना युवा अवस्था में ही की थी. उन्होंने छुआछूत, भेदभाव, स्त्री शिक्षा की अलख जगाई.

भीवराव अंबेडकर युवा ही थे जब उन्होंने छुआछूत का दंश झेला और आंदोलन का रास्ता अख्तियार किया. राजा राममोहन राय पहले व्यक्ति थे जिन्होंने मध्ययुगीन बुराइयों के खिलाफ आंदोलन छेड़ा. सतीप्रथा, जातिप्रथा का भेदभाव, छुआछूत, बहुविवाह प्रथा, विधवा विवाह जैसी अमानवीय बुराइयों ने उन्हें झकझोर डाला. उन का युवामन इन बुराइयों को खत्म करने के लिए बगावत कर बैठा.

गांधी ने जब अश्वेतों के साथ भेदभाव देखा और खुद भोगा तो वे युवा ही थे. वे छुआछूत, भेदभाव के खिलाफ संघर्ष के रास्ते पर उतर पड़े. नेहरू धर्म, जाति की अमानवीयता देख चुके थे और वे समयसमय पर अपने प्रगतिशील विचारों से युवाओं को अवगत कराते रहे.

जयप्रकाश नारायण, राम मनोहर लोहिया में युवाओं का बगावती जज्बा ही था जब उन्होंने भ्रष्ट व भेदभावपूर्ण राजनीतिक व्यवस्था के खिलाफ बिगुल फूंक कर देश में समाजवादी व्यवस्था का सपना देखा था. भारतीय समाज में नेतृत्व का एक सामंती तरीका चलता आया है. खुद को मसीहा, अवतार बता कर भेड़ों की भीड़ को हांका जाए. यह तरीका सफल भी हो रहा है. हिंदूरक्षक, गौरक्षक, दलितरक्षक, पिछड़ा, मुसलिम रक्षक यानी एकदूसरे के प्रति नफरत फैला कर नेता बनना. इन्हें इस बात से कोईर् मतलब नहीं होता कि समाज में समस्याएं क्या हैं, उन पर काम कैसे करना है. नेतृत्व का यह रूप बरगलाने वाला है. यह रूप खतरनाक है. बाद में जब भीड़ की आंखें खुलती हैं तो रोनाधोना मचता है कि नेता ठग, बेईमान, भ्रष्ट, बहुरूपिया था.

सोच का अभाव युवाओं की मानसिकता एक संप्रदाय, वर्ग, जाति में रहते हुए दूसरे के प्रति नफरत पैदा कर के नेता बनने की रही है. वह अवतार, व्यक्तिपूजा, चमत्कारों पर भरोसा करने वाला है. वह लंबे समय से ऐसे ही नेतृत्व को गढ़ता आया है और उस का गुलाम बना रहता रहा है.

हम दुनिया में भारत को विश्वगुरु के रूप में पेश करते हैं. देश आर्थिक तकनीक क्षेत्र में तो आगे बढ़ा है पर जहां तक सामाजिक विकास की बात है वह अभी भी विश्व में सब से कम रैंक के साथ निचले स्तर के देशों में एक है. हाल के आंकड़े बताते हैं कि भारत मानव विकास सूचकांक में कुल 187 देशों में से 135वें स्थान पर है. सामाजिक विकास की यह खेदजनक स्थिति इसलिए है कि हम आज भी रूढि़वादी मान्यताओं, विश्वासों के नकारात्मक सोच वाले समाज में जी रहे हैं जो समानता व भाईचारे के सिद्धांत में विश्वास नहीं करता. इस से सामाजिक, आर्थिक गैरबराबरी से ले कर पिछड़ने के कई आयाम जुड़े हुए हैं. देश में हजारों युवा संगठन हैं, लाखों एनजीओ हैं. युवाओं के लिए केंद्र और राज्य सरकारों में राजधानियों से ले कर जिलों, तहसीलों में युवाओं के लिए विभाग काम कर रहे हैं. जातीय, धार्मिक सेनाएं और संगठन हैं. राजनीतिक पार्टियों के युवा संगठन हैं, फिर भी युवाओं को सही प्रगतिशील सोच की राह दिखाने वालों का एकदम अभाव है. धर्म, जाति, राष्ट्रवाद के नाम पर उन्मादी होते युवावर्ग को उदार, लोकतांत्रिक मूल्यों का खुलापन समझाने वाला कोई नहीं है.

सच तो यह है कि युवाओं के पास समय ही नहीं है. सोच नहीं है, समझ नहीं है. वह आत्मकेंद्रित बन गया है. वह कुछ करना भी नहीं चाहता, मुझे क्या, मेरी बला से. कब जागेगा युवा

युवा धर्म, जाति की जकड़न में जकड़ा रहना चाहता है. गरीबी, बेरोजगारी, महंगाई, भ्रष्टाचार, सांप्रदायिकता की मार सब से ज्यादा युवाओं पर पड़ती है. पर फिर भी वे सामाजिक मुद्दों पर एकजुट नहीं, बंटे हुए हैं. सोशल मीडिया पर वे अपना अधकचरा ज्ञान बघारने में आगे दिखते हैं. दिखावे का आवरण ओढे़ युवा भौतिकवादी व अवसरवादी बन गया है. युवा पढ़लिख नहीं रहा है. वह सुनीसुनाई बातों पर ज्यादा यकीन करने का आदी हो गया है. तार्किक सोच का उस में अभाव है. वह तर्कपूर्ण सोचना ही नहीं चाहता. धार्मिक ताकतें यही

तो चाहती हैं कि युवा तर्क न करे, हर चीज पर आस्था, विश्वास रखे. युवा तर्कशक्ति को बढ़ाना नहीं चाहता. बुराइयों से लड़ने का उस में जज्बा दिखाईर् नहीं देता.

आर्थिक नेतृत्व तो देश में ही नहीं, दुनियाभर में मजबूत है पर किसी भी समाज की मजबूती के लिए सामाजिक नेतृत्च की जरूरत अधिक है. समाज मजबूत होगा तभी देश, परिवार खुशहाल होगा. भारत में ही नहीं, यह कमी दुनियाभर में है. राजनीति में भी जो युवा हैं उन की पिछड़ी सोच समयसमय पर उजागर होती रही है. वे भी मध्यकाल के विचार जगजाहिर करते रहते हैं. नए वैज्ञानिक व तर्कशील सोचविचारों का उन में अभाव है जिन से परिवार, समाज और देश को आगे ले जाया जा सके.

किसी भी देश की युवाशक्ति समाज को तभी सही दिशा में ले जा सकती है जब वह खुद सही दिशा की ओर अग्रसर हो. क्या हमारे युवा आंखें खोलेंगे…

सियासत धर्म की

जब देश का पूरा समय और ताकत गरीबी, भुखमरी, बीमारी, पढ़ाईलिखाई पर लगना चाहिए, देश के नेता या तो हिंदूमुसलिम दंगे करा रहे हैं या तीर्थयात्राएं करा कर लोगों को धर्म की अफीम पिला कर सुला रहे हैं. देशभर की आंखें एक तरह से सुप्रीम कोर्ट में चल रहे बाबरी मसजिद मामले की सुनवाई पर लगी हैं. हिंदू गुट उसे ही रामजन्म भूमि मानते हैं और मुसलिम एक पुरानी मसजिद.

सुप्रीम कोर्ट ने अभी जिरह के दौरान कहा है कि वह इस मामले को सिर्फ जमीन की मिलकीयत का मामला मान रही है और रामजन्म से उस का कोई लेनादेना नहीं है. पर बहस के दौरान हिंदू पक्ष बारबार किसी हिंदू मंदिर की बात ही कर रहे हैं. और उन्हें तथ्यों से नहीं भाजपा से मतलब है. 1526 से, जब से कुछ फैक्ट मालूम हैं, यहां मसजिद ही है पर भगवा जमात इसे मंदिर साबित करने में लगी है.

सच यह है कि इस जगह अगर मसजिद दोबारा बने तो मुसलमानों की हालत चमक नहीं जाएगी और अगर राममंदिर बन गया तो हिंदू सुधर नहीं जाएंगे. यह मामला कोरा बहकाने का है. हिंदुओं का एक कट्टर हिस्सा किसी तरह साबित करने में लगा है कि 1947 के विभाजन के बाद भारत केवल हिंदुओं का है, संविधान चाहे जो भी कहता रहे.

हिंदू हों या मुसलमान मंदिरों और मसजिदों से किसी की कभी हालत नहीं सुधरी है. धर्म तो केवल दान की शक्ल में टैक्स वसूलता है और आम भक्त को गुलाम बना कर उसे वह करने को मजबूर करता है जो वह नहीं करना चाहता. तिलक, तीर्थ, नमाज, टोपी, क्रौस, कड़ा यह सब धर्मों की साजिश है कि किसी तरह अपने भक्तों को बेवकूफ बनाए रखो. उन्हें एकदूसरे से लड़वाते रहो और धर्म के नाम पर कुरबानी के लिए उकसाते रहो.

राममंदिर के साथसाथ कभी ताजमहल को तेजोमहालय कहना और कुतुबमीनार को विष्णु स्तंभ कहना बेबात में आम आदमी को उलझाना है. हिंदू धर्म के दुकानदार तो मक्का तक को शिवमंदिर साबित करने में लगे रहते हैं ताकि हर समय साबित करा जा सके कि उन का धर्म है तो सबकुछ है, वरना कुछ नहीं. धर्म का मतलब अगर गरीबी, बीमारी, फूहड़ता और गंदगी है तो बात दूसरी पर असल में कोई बेवकूफ ही होगा जो इसे मानेगा. भक्तों को धर्म का हुक्म मानना पड़ता है इसलिए कि धर्म के पास जाति से बाहर करने का हक होता है. धर्म ने अरबों लोगों की शादी और मौत तक पर कब्जा कर रखा है. अयोध्या का यह महज 2.77 एकड़ का प्लाट तो क्या चीज है?

सुप्रीम कोर्ट का फैसला चाहे जो भी हो, हिंदू और मुसलिम धर्मों के ठेकेदारों की बन जाएगी. जीतने वाला खुशियों के लिए दान वसूलेगा और हारने वाला लड़ने के लिए. लोग तो अपनेआप पिसेंगे.

जसोदा बेन के नरेंद्र मोदी आनंदी बेन की नजर में कुंआरे

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शादीशुदा हैं. उन की शादी साल 1968 में जसोदा बेन से हुई थी. 2014 के लोकसभा चुनाव के वक्त चुनाव आयोग को दी गई जानकारी में खुद नरेंद्र मोदी ने जसोदा बेन से अपनी शादी की बात मानी थी. देशवासी, खासतौर से मोदीभक्त, जानते हैं कि देशसेवा की खातिर उन्होंने अपनी पत्नी को छोड़ दिया था.

प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेंद्र मोदी की शादी और पत्नी को छोड़ने को ले कर अकसर आरोपप्रत्यारोप के दौर से देशवासी दोचार होते रहे हैं. मोदी ही हर मुमकिन कोशिश जिन 2 बातों से बचने की होती है उन में पहली उन की शैक्षणिक डिगरी और दूसरी उन की शादी है.

उलट इस के, जसोदा बेन कभीकभी अपने पति मोदी को याद करते जज्बाती हो उठती हैं और उन की सलामती व कामयाबी के लिए व्रतउपवास भी करती रहती हैं. यह उन की समझदारी और बड़प्पन ही कहा जाएगा कि उन्होंने छोड़ने के बाबत नरेंद्र मोदी को न कभी कोसा और न ही उन पर कोई इलजाम लगाया.

कई साक्षात्कारों में जसोदा बेन बता चुकी हैं कि शादी के बाद वे कुछ महीने ही ससुराल में रही थीं और पति के साथ तो उन्होंने कुल 3 दिन ही गुजारे. ससुराल वालों की भलमनसाहत की वे तारीफ करती हैं. वे यह भी बता चुकी हैं कि नरेंद्र मोदी ने उन से कहा था, ‘तुम अभी छोटी हो, अपनी पढ़ाई जारी रखो, मैं देशसेवा के लिए जा रहा हूं.’ और इस के बाद वे हिमालय की तरफ चले गए थे. पत्नी को छोड़ने के कुछ समय बाद नरेंद्र मोदी आरएसएस से जुड़ गए और फिर कभी उन्होंने पत्नी की सुध नहीं ली कि वह किस हाल में है.

इधर, परित्यक्ता जसोदा बेन को समझ आ गया कि पति, घरगृहस्थी और बालबच्चों का सुख उन की जिंदगी में नहीं है, तो उन्होंने गुजरात के धोलका से अपनी पढ़ाई पूरी की और फिर सरकारी स्कूल में टीचर बन गईं. वे साल 2010 में रिटायर हो गई हैं.

पति के प्रधानमंत्री बनने पर उन्होंने खुशी जताई थी, लेकिन बाद में कई परेशानियों से उन्हें रूबरू होना पड़ा था. प्रधानमंत्री की पत्नी होने के नाते उन्हें जबरन सिक्योरिटी दे दी गई तो वे एक दफा इस बात पर सार्वजनिक रूप से झल्लाई थीं कि अकसर सुरक्षाकर्मियों का खर्च उन्हें ही उठाना पड़ता है.

कई मौकों पर भावुक हो कर जसोदा बेन ने मीरा की तर्ज पर पति को भक्तिभाव से याद किया, लेकिन नरेंद्र मोदी हमेशा खामोशी ओढ़े रहे. यह उन की जिद, मजबूरी और आत्मग्लानि (अगर हो तो) ही कही जाएगी, लेकिन जसोदा बेन के अपनी पत्नी होने से वे कभी मुकर नहीं पाए.

पिछले साल सर्दी में जसोदा बेन राजस्थान में एक सड़क दुर्घटना में घायल हुई थीं, तब भी मोदी ने उन के हालचाल पूछने या जानने की औपचारिकता भी नहीं निभाई.

लेकिन ये कहती हैं

मध्य प्रदेश की राज्यपाल आनंदी बेन ने मध्य प्रदेश के हरदा जिले के टिमरनी में पिछले दिनों यह कहते सनाका सा खींच दिया कि नरेंद्र मोदी अविवाहित हैं, उन्होंने कभी शादी नहीं की. इस संबंध में आनंदी बेन का वीडियो सोशल मीडिया पर खूब वायरल हो रहा है.

वीडियो में वे एक सरकारी कार्यक्रम में मौजूद महिलाओं से यह कहती नजर आ रही हैं कि पूरी दुनिया जानती है कि आप के और आप के बच्चों के लिए नरेंद्र भाई ने शादी नहीं की, लेकिन उन्हें यह पता है कि डिलिवरी के वक्त और बाद में महिलाओं व बच्चों को क्याक्या परेशानियां होती हैं, इसलिए उन्होंने महिलाओं के लिए इतनी योजनाएं बनाई हैं.

यह हर कोई जानता है मध्य प्रदेश की मौजूदा राज्यपाल आनंदी बेन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की चहेती हैं, जिन्हें मोदी ने दिल्ली जाने से पहले गुजरात के मुख्यमंत्री पद की कुरसी सौंपी थी. आनंदी बेन का अब का यह सफेद झूठ किसी को हजम नहीं हो रहा है कि जो बात पूरी दुनिया जानती है उसे वे नहीं जानतीं कि नरेंद्र मोदी शादीशुदा हैं. अगर सबकुछ जानते हुए भी वे ऐसा कह रही हैं तो मान लेना चाहिए कि सूर्य पश्चिम से उगता है, पूर्व से नहीं.

सच पर संशय

हैरानी इस बात की भी है कि इस झूठ पर हर कोई चुप रहा, यहां तक कि विपक्ष ने भी मौका नहीं भुनाया, जबकि मध्य प्रदेश में विधानसभा चुनाव का बिगुल बज चुका है. अगर आनंदी बेन के कहने से नरेंद्र मोदी शादीशुदा से कुंआरे हो जाते हैं तो विमर्श करना लाजिमी है कि वे क्यों नरेंद्र मोदी की वैवाहिक स्थिति या सच हजम नहीं कर पा रहीं.

सार्वजनिक रूप से कही इस बात के अगर कोई व्यक्तिगत माने नहीं हैं तो तकाजा यह है कि आनंदी बेन खेद व्यक्त कर लोगों और  जसोदा बेन से माफी मांगें और अगर वीडियो फर्जी है, जिस की उम्मीद न के बराबर है, तो उस की जांच की मांग करें.

ऐसे शक अकसर पौराणिक पात्रों को ले कर रहते हैं कि किस की शादी किस से हुई थी और हुई भी थी या नहीं. अगर आनंदी बेन की मंशा और मकसद नरेंद्र मोदी को एक संत और कुंआरा आदमी साबित करने की है तो वे जोरदार सैल्यूट की हकदार हैं. वैसे, नरेंद्र मोदी की जिंदगी से ताल्लुक रखते इस वाकए के जिक्र का न कोई मौसम था न दस्तूर, बस, एक मौका जरूर था जिस से आनंदी बेन चूकीं नहीं.

भोजपुरी हीरोईनों ने बिखेरा समुद्र किनारे हौटनेस का जलवा

भोजपुरी अदाकाराओं का न सिर्फ सिल्वरस्क्रीन पर जलवा है, बल्कि वे अपनी निजी जिंदगी में भी कहर बरपाने का काम करती रहती हैं. ऐसा ही कुछ भोजपुरी की टौप अभिनेत्री अंजना सिंह ने भी किया है. अंजना सिंह ने अपने इंस्टाग्राम पर एक वीडियो पोस्ट किया है. इस वीडियो में उनके साथ उनकी दोस्त और भोजपुरी अभिनेत्री अक्षरा सिंह भी हैं. वीडियो में आप देख सकते हैं कि समुद्र किनारे दोनों किस तरह से एक दूसरे के साथ मस्ती कर रही हैं.

अक्षरा सिंह और अंजना सिंह दोनों ही हौट पैंट्स में नजर आ रही हैं, और बीच पर दिलकश अंदाज में दौड़ लगा रही हैं. उनके दौड़ने के अंदाज और पूरे वीडियो को लेकर फैन्स क्रेजी हो गए हैं, और इस पर जमकर कमेंट भी कर रहे हैं. यही नहीं, इस वीडियो के साथ अंजना सिंह ने लिखा हैः “शर्त लगी थी खुशीयों को एक लफ्ज मे लिखने की….लोग किताबे ढूंढते रह गए, हमने “दोस्त ” लिख दिया…”

वैसे भी सिनेमा की दुनिया में हीरोइनों के बीच इस तरह की दोस्ती कम ही देखने को मिलती है. अकसर दो हीरोइनों के बीच कैट फाइट की ही खबरें आती हैं, लेकिन अंजना और अक्षरा सिंह ने सिद्ध कर दिया है कि दो हीरोइनों अच्छी दोस्त भी हो सकती हैं.

‘बाहुबली बिफोर द बिगनिंग’ का हुआ ऐलान, खुलेंगे कई राज

अब आपको एक बार फिर बाहुबली देखने का मौका मिलेगा. जी हां, सबसे ज्यादा सफल और ब्लौकबस्टर फिल्मों में शुमार फिल्म बाहुबली अब एक बार फिर लोगों का मनोरंजन करने के लिए आ रही है. अगर आप सोच रहे हैं कि बाहुबली बिगनिंग और बाहुबली कन्क्लूजन के बाद अब इसका तीसरा भाग आएगा तो आप गलत हो सकते हैं. क्योंकि ऐसा नहीं है हां लेकिन बाहुबली का प्रीक्वल जरूर बनाया जाएगा.

बात यह है कि इस बार बाहुबली की कहानी वेब सीरिज के माध्यम से बताई जाएगी. इस बात की घोषणा सोशल मीडिया पर एक बड़ी वेब सीरिज बनाने वाली कंपनी नेटफ्लिक्स ने की है. इसके बारे में ट्विटर पर एक वीडियो शेयर करते हुए लिखा गया है बाहुबली बिफोर द बिगनिंग.

गौरतलब है कि फिल्म बाहुबली के 2 भाग बने थे और दर्शकों ने इन दोनों ही फिल्मों को पसंद किया था. इन फिल्म का निर्देशन एस एस राजमौली ने किया था. विशेष बात यह है कि दक्षिण भारत में बनी हुई इस फिल्म ने पूरे देशभर में धूम मचाया. इतना ही नहीं इस फिल्म के माध्यम से फिल्म अभिनेता प्रभास और राणा दुग्गाबाती की लोकप्रियता बढ़ी.

खास बात यह भी थी कि बाहुबली 2 की रिलीज से पहले एक सवाल हर किसी के जहन में था कि कटप्पा ने बाहुबली को क्यों मारा? इस सवाल का जवाब पाने के लिए बाहुबली2 का बेसब्री से इंतजार किया गया था. अब खबरों क् मुताबिक बाहुबली बिफोर द बिगनिंग में कई और राज खोले जाएंगे. ये शिवगंगा की कहानी से जुड़े कई राज को दर्शकों तक पहुंचाएगा.

भोजपुरी गाने पर इस लड़की ने किया जबरदस्त डांस

भोजपुरी फिल्म जगत के सुपरस्टार खेसारीलाल यादव की फिल्म ‘राजा जानी’ पिछले ही महीने सिनेमाघरों में रिलीज हुई. वैसे इस फिल्म के सभी गाने सुपरहिट हुए, लेकिन उसमें से एक गाना ‘वीडियो कैमरा वाला’ लोगों के बीच काफी मशहूर हुआ. इतना ही नहीं अब इस गाने का क्रेज युवाओं में बढ़ता दिख रहा है, और कइयों ने तो इस गाने पर अपने डांस का वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर अपलोड कर दिया है. इसी क्रम में इन दिनों एक लड़की का इसी गाने पर डांस का वीडियो यूट्यूब पर काफी तेजी से देखा जा रहा है.

शिवी ठाकुर द्वारा पिछले महीने 31 जुलाई को अपलोड किए गए इस वीडियो को अब तक 1,051,818 बार देखा जा चुका है. बता दें, इस वीडियो में सिर्फ एक लड़की डांस करती हुई नजर आ रही हैं. इस लड़की ने ‘वीडियो कैमरा वाला’ पर इतना जबरदस्त डांस किया है कि लोगों को उनके डांस का हर एक स्टेप बेहद पसंद आ रहा है.

बेहद पसंद किया जा रहा है राजा जानी

भोजपुरी फिल्म ‘जिला चंपारण’ के बाद बौक्‍स औफिस पर एक बार फिर से सुपरस्‍टार खेसारीलाल यादव, निर्माता सुरेंद्र प्रसाद और निर्देशक लालबाबू पंडित का जलवा फिल्‍म ‘राजा जानी’ में देखने को मिल रहा है. यह फिल्‍म एक साथ बिहार-झारखंड, नेपाल, मुंबई और गुजरात के सिनेमाघरों में रिलीज हो चुकी है. जिसे सभी शो हाउसफुल चल रहे हैं. ट्रेंड पंडितों के अनुसार, दर्शकों के पहले दिन के रेस्‍पांस और रुझान इस बात की ओर इशारा कर रहा है कि फिल्‍म ‘राजा जानी’ खेसारीलाल की पिछली फिल्‍म ‘जिला चंपारण’ का रिकौर्ड तोड़ देगी.

वहीं दर्शकों के दिल में एक बार फिर से खेसारीलाल यादव उतर गए हैं. फिल्‍म देखने के बाद दर्शकों का कहना है कि खेसारीलाल यादव ने फिल्‍म ‘राजा जानी’ में कमाल की अभिनय की है. स्‍क्रीन पर वे बेहद इंटरटेंनिंग नजर आ रहे हैं. तो इमोशन और एक्‍शन में भी कम नहीं लग रहे. वे भोजपुरी सिनेमा की शान हैं. उनकी फिल्‍में का हमें इंतजार रहता है. बता दें कि फिल्‍म ‘राजा जानी’ को सेंसर बोर्ड ने भी U/A सर्टिफिकेट दिया था. इस वजह से फिल्‍म देखने के लिए लोग पूरे परिवार के साथ सिनेमाघरों में आ रहे हैं.बेस्ट एक्टर के खिताब से नवाजा गया.

अमीरों का देश से पलायन

भारत से अमीरों के दूसरे देशों में पलायन ने सरकार के सामने गंभीर सवाल खड़ा कर दिया है. सोचने वाली बात यह है कि पलायन करने वाले अमीरों की संख्या में हर साल लगातार बढ़ोतरी हो रही है. वर्ष 2017 में 7 हजार अमीरों ने देश छोड़ा था. यह संख्या प्रतिशत में वर्ष 2016 से 16 प्रतिशत अधिक है.

न्यू वर्ल्ड वैल्थ की रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2017 में 7 हजार भारतीय अमीरों ने दूसरे देशों की नागरिकता हासिल की. 2016 में यह संख्या 6 हजार थी जबकि वर्ष 2015 में 4 हजार थी.

भारत के ही अमीर देश नहीं छोड़ रहे हैं बल्कि चीन भी इस मामले में अग्रणी है. वर्ष 2017 में चीन के 10 हजार अमीरों ने दूसरे देशों की नागरिकता ली थी. अन्य देशों में तुर्की से 6 हजार, ब्रिटेन से 4 हजार, फ्रांस से 4 हजार और रूस से 3 हजार अमीरों ने 2017 में दूसरे देशों की नागरिकता प्राप्त की.

मौर्गन स्टेनली इन्वैस्टमैंट मैनेजमैंट के चीफ ग्लोबल स्ट्रैटेजिस्ट और इमर्जिंग मार्केट्स के प्रमुख रुचिर शर्मा के मुताबिक, भारत के 2.1 प्रतिशत अमीरों ने देश छोड़ा है, जबकि फ्रांस के 1.3 प्रतिशत और चीन के 1.1 प्रतिशत अमीरों ने दूसरे देशों में शरण ली है.

कहां है पसंदीदा ठौर

भारतीय अमीर सब से ज्यादा अमेरिका की नागरिकता लेना चाहते हैं.   आंकड़ों से पता चलता है कि इस के बाद उन की प्राथमिकता यूएई, कनाडा, आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड आदि देश हैं, जबकि चीन के अमीर अमेरिका, कनाडा, आस्ट्रेलिया आदि देशों की नागरिकता हासिल करना चाहते हैं. गौरतलब है कि भारत और चीन के जितने अमीर हर साल पलायन करते हैं, लगभग उतने ही नए अमीर हर साल पैदा भी हो जाते हैं.

सवाल उठना लाजिमी है कि जिस देश में लोग अमीर बने हैं, उसी देश को वे क्यों छोड़ रहे हैं. इस का जवाब जानने के लिए सरकार ने केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड के 5 सदस्यों की एक समिति बनाई है. यह समिति यह पता करेगी कि अमीर भारत छोड़ कर विदेश क्यों जा रहे हैं. साथ ही, इस समिति को यह भी जिम्मेदारी सौंपी गई है कि वह ऐसा माहौल तैयार करें जिस से विदेश गए अमीर स्वदेश वापस लौट आएं और फिर कभी देश से पलायन के बारे में न सोचें.

केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड के अनुसार, अमीरों के दूसरे देशों में पलायन करने से कर संबंधी जोखिम उत्पन्न हो रहे हैं. इस समिति का काम ऐसे सभी पहलुओं पर विचार करना और इस संबंध में समुचित नीति बनाने के लिए सुझाव देना भी है.

ग्लोबल फाइनैंशियल सर्विसेज कंपनी मौर्गन स्टैनली की रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2014 से ले कर अब तक 23 हजार अमीर देश छोड़ कर विदेश जा चुके हैं.

society

पलायन से विकास प्रभावित

क्या अमीरों को देश में कारोबार करने में परेशानी आ रही है? क्या देश की कर प्रणाली उन के कारोबार के अनुकूल नहीं है? क्या वे सरकार द्वारा किए जा रहे आर्थिक सुधारों से सकारात्मक उम्मीद नहीं रखते हैं? क्या उन के कारोबार में बढ़ोतरी नहीं हो रही है? ऐसे कई प्रश्न हैं जिन के सही जवाब सरकार द्वारा गठित समिति को खोजने होंगे.

वैसे लगता है कि कई अमीर कर से बचने के लिए पलायन विदेश कर रहे हैं, क्योंकि मोदी सरकार ने कर चोरों पर सख्ती करनी शुरू दी है. इस में दोराय नहीं है कि कुछ बड़े कारोबारी जरूर अच्छे कारोबारी माहौल की खोज में दूसरे देश की नागरिकता ले रहे हैं, लेकिन अधिकांश अपने काले कारनामों को छिपाने या जांच एजेंसियों व अदालत की कार्यवाही से बचने के लिए दूसरे देशों में पलायन कर रहे हैं.

देश के विकास के लिए देशी और विदेशी दोनों तरह के निवेश की दरकार है. देश का विकास केवल विदेशी निवेश से नहीं हो सकता. देशी निवेश की भी अहम भूमिका होती है. भारत से बड़े कारोबारियों का अगर इसी तरह से देश से पलायन होता रहेगा तो देश में निवेश कहां से आएगा.

घरेलू निवेश के बिना देश का विकास समुचित तरीके से नहीं हो सकता. बड़े कारोबारी जब देश में कारोबार करेंगे तभी रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे, कारोबारी गतिविधियों में तेजी आएगी, उद्योगधंधों का विकास होगा, नए उत्पादों का निर्माण होगा, विविध उत्पादों की मांग में इजाफा होगा, कर्ज की मांग बढ़ेगी और बाजार का विस्तार होगा. बड़े कारोबारियों के विदेश जाने से देश का नुकसान हो रहा है, जबकि दूसरे देशों को फायदा.

देशों के खजानों में इजाफा

आजकल भारतीय अमीर डोमिनिका, सैंट लूसिया, एंटीगुआ, ग्रेनाडा, सैंट किट्स, माल्टा या साइप्रस जैसे देशों की नागरिकता ले रहे हैं. कुछ देश 3-4 महीने के लिए नागरिकता की एवज में अमीरों से 1 से 2.4 लाख रुपए वसूल करते हैं. इस तरह से नागरिकता हासिल करने वालों की संख्या में बीते साल 40 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है, जबकि जुलाई 2017 से फरवरी 2018 के बीच इस तरह से नागरिकता लेने वाले अमीरों की संख्या में 65 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है.

कम खर्च में नागरिकता मिलने या ज्यादा परेशानी न होने की वजह से भारतीय अमीर कौमनवैल्थ औफ डोमिनिका और सैंट लूसिया सरीखे कैरिबियाई आइलैंड्स की नागरिकता लेने को इच्छुक रहते हैं. दूसरी बात यह है कि इन देशों के पासपोर्ट से ब्रिटेन, सिंगापुर, मलयेशिया, हौंगकौंग सहित 120 देशों में बिना वीजा के यात्रा की जा सकती है.

हां, इन सुवधिओं के एवज में नए नागरिकों को वहां के सरकारी खजाने में एक लाख डौलर जमा कराना होता है. एंटीगुआ जैसे देश तो ज्यादा कमाई करने के लिए सरकारी खजाने में 50 हजार डौलर यानी रुपए में लगभग 34 लाख, जमा करने वाले अमीरों को फटाफट नागरिकता दे रहे हैं.

उल्लेखनीय है कि ऐसे देशों में विदेशी आय, कैपिटल गेन, गिफ्ट, उत्तराधिकार में मिली संपत्ति आदि पर कोई कर नहीं लगता है. चीन में जिन अमीर भारतीयों का कारोबार है, वे ग्रेनाडा की नागरिकता हासिल कर रहे हैं, क्योंकि यह एक ऐसा कैरिबियाई देश है जिस का पासपोर्ट रहने पर चीन जाने के लिए वीजा लेने की जरूरत नहीं पड़ती है. ग्रेनाडा भारतीय अमीरों से 2 लाख डौलर ले कर नागरिकता मुहैया करा रहा है.

परिवारों को भी सुरक्षा

चूंकि भारत दोहरी नागरिकता की इजाजत नहीं देता है, इसलिए वैसे भारतीय अमीर, जो अपने परिवार की सुरक्षा चाहते हैं, थाईलैंड और पुर्तगाल की नागरिकता लेने की कोशिश करते हैं, क्योंकि इन देशों में परिवारों को भी सुरक्षा मुहैया कराई जाती है. साइप्रस एक ऐसा देश है जो पूरे परिवार को 6 महीने के भीतर नागरिकता देता है, लेकिन इस के लिए इच्छुक उम्मीदवार को कम से कम 20 लाख डौलर रियल एस्टेट में 3 साल के लिए निवेश करना होता है. हंगरी की नागरिकता सस्ती होने के कारण भारतीय अमीर वहां की नागरिकता लेने में भी रुचि ले रहे हैं.

नियमों और नैतिकता की बात करें तो कोई भी देश वैसे व्यक्ति को नागरिकता नहीं दे सकता है जो बैंक का कर्ज न चुकाने का दोषी है या फिर जिस ने कर चोरी की है या अपराधी है. आमतौर पर दूसरे देश के अधिकारियों को नागरिकता लेने वाले उम्मीदवार के बारे में कोई खास जानकारी नहीं होती है और नागरिकता पाने का इच्छुक उम्मीदवार अपनी कारगुजारियों के बारे में बताता नहीं है. ऐसे में दूसरे देशों को ऐसे तमाम मामलों की जानकारी नहीं हो पाती है और एक बार नागरिकता मिलने के बाद ऐसे मामलों का खुलासा होने पर भी उन के खिलाफ कोई भी कार्यवाही संभव नहीं हो पाती.

वास्तव में अमीरों का पलायन एक गंभीर मसला है जिस के दो पहलू हैं. पहला, अगर कोई बड़ा कारोबारी देश में मौजूदा व्यवस्था से असंतुष्ट हो कर देश छोड़ रहा है तो यह निश्चितरूप से चिंता की बात है. दूसरा, अगर कोई अमीर कर चोरी या धोखाधड़ी या बैंक का लोन चुकाए बिना या फिर कोई अपराध करने के बाद दूसरे देश की नागरिकता हासिल कर रहा है तो यह और भी ज्यादा चिंता की बात है. दोनों स्थितियां देश के लिए अच्छी नहीं हैं. ऐसे में सरकार को चाहिए कि वह जल्दी से जल्दी अमीरों के पलायन को रोकने की कोशिश करे और जरूरत के अनुसार सुधारात्मक उपायों को लागू करे.

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