


भोजपुरी अदाकारा पूनम दुबे को उनके शानदार डांस के लिए जाना जाता है. हाल ही में पूनम ने अपने इंस्टाग्राम अकाउंट पर एक डांस वीडियो शेयर किया है जो काफी वायरल हो रहा है. पूनम के फैंस उनके इस वीडियो को फैंस काफी पसंद कर रहें है. पूनम दुबे इस वीडियो में बौलीवुड के सुपर हिट डांस नंबर कजरारे कजरारे पर ऐश्वर्या के स्टेप को कौपी करती हुई नजर आ रहीं हैं.
कजरारे कजरारे गाना रानी मुखर्जी और अभिषेक बच्चन के फिल्म ‘बंटी और बबली’ का है. आपको याद होगा कि कजरारे कजरारे गाने पर फिल्म में ऐश्वर्या राय, अभिषेक बच्चन और अमिताभ बच्चन ने बहुत शानदार डांस किया था. पूनम दुबे का कजरारे पर डांस आपको ऐश्वर्या राय के डांस की याद दिलवा देगा.
पूनम दुबे का फिल्मों की लिस्ट में चना जोर गरम, लूटेरे, मोहब्बत, रंगदारी टैक्स, बहुरानी, हम है जोड़ी नंबर वन, ये मोहब्बते, द रियल इंडियन मदर, ये मोहब्बतें, इंतकाम, जानम, घुस के मारब, हमार फर्ज और बाबा रंगीला आदि शामिल हैं.
6 मई, 2018 का दिन था. सुबह के यही कोई 11 बज रहे थे. उत्तराखंड के जिला हरिद्वार के थाना पीरान कलियर के थानाप्रभारी देवराज शर्मा अपने औफिस में बैठे थे. तभी किसी व्यक्ति ने उन्हें फोन कर के कहा, ‘‘सर, मेरा नाम अशोक है और मैं धनौरी कस्बे में रहता हूं. मैं एक मामले में आप से बात करना चाहता हूं.’’
‘‘बताइए क्या मामला है?’’ थानाप्रभारी ने कहा.
‘‘सर, मेरे साथ एक धोखाधड़ी हुई है.’’ अशोक ने बताया.
‘‘किस तरह की धोखाधड़ी हुई है आप के साथ?’’ थानाप्रभारी ने पूछा.
‘‘सर, दरअसल बात यह है कि गत 2 मई, 2018 को ज्वालापुर के रहने वाले मेरे एक परिचित तथा उस के दोस्त मुकेश ने मेरी शादी रीता से कराई थी, जो जिला कोटद्वार के पौड़ी की रहने वाली थी. इस शादी के लिए मैं ने 2 लाख रुपए में अपनी प्रौपर्टी गिरवी रख कर लोन लिया था.’’ अशोक बोला.
‘‘इस के बाद क्या हुआ?’’ थानाप्रभारी देशराज शर्मा ने पूछा.
‘‘सर, इस शादी में मुकेश बिचौलिया था. उस ने मेरी शादी कराने के एवज में मुझ से 50 हजार रुपए नकद लिए थे. मुकेश ने मुझ से कहा था कि रीता एक गरीब घर की लड़की है. उस के पिता महेंद्र उस की शादी में ज्यादा रकम खर्च नहीं कर सकते. वह साधारण तरीके से शादी कर के बेटी के हाथ पीले करना चाहते हैं.’’ अशोक ने बताया.
‘‘क्या तुम ने मुकेश और महेंद्र से भी संपर्क किया था?’’ शर्मा ने पूछा.
‘‘नहीं सर, इस बीच हमारी बात सिर्फ मुकेश के माध्यम से ही चलती रही और महेंद्र से केवल उस दिन मुलाकात हुई थी, जिस दिन वह वरवधू को आशीर्वाद देने के लिए आया था. मुकेश ने यह शादी 2 अप्रैल को हरिद्वार की रोशनाबाद कोर्ट में कराई थी. इस के बाद मुकेश व महेंद्र हम से कभी नहीं मिले. शादी के 2 दिन बाद ही रीता हमारे घर से सोनेचांदी की सारी ज्वैलरी और नकदी ले कर भाग गई. रीता को हम ने कोटद्वार, ज्वालापुर, बिजनौर आदि कई जगहों पर तलाश किया, मगर हमें उस का कुछ भी पता नहीं चल सका. अब मुकेश का फोन भी बंद है.’’ अशोक ने बताया.
‘‘तुम्हारी बातों से लग रहा है कि तुम शादी कराने वाले ठगों के गिरोह के चक्कर में फंस गए हो. इसीलिए उन्होंने अपने फोन भी बंद कर लिए हैं. अगर दुलहन रीता ठीक होती तो वह जेवर सहित क्यों भागती?’’ थानाप्रभारी बोले.

‘‘आप ठीक कह रहे हैं सर, अब मैं इन जालसाजों के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कराना चाहता हूं.’’ अशोक ने कहा.
‘‘ठीक है तुम धनौरी पुलिस चौकी चले जाओ. वहां के चौकी इंचार्ज रंजीत सिंह तोमर से मिल कर तुम अपनी रिपोर्ट दर्ज करा सकते हो.’’ थानाप्रभारी ने बताया.
पुलिस ने शुरू की जांच
इस के बाद अशोक धनौरी पुलिस चौकी पहुंचा और चौकी इंचार्ज रंजीत तोमर से मिल कर खुद के ठगे जाने की घटना सिलसिलेवार बता दी. अशोक की तहरीर पर चौकी इंचार्ज ने लुटेरी दुलहन रीता उर्फ पूजा, बिचौलिए मुकेश तथा रीता के तथाकथित बाप महेंद्र के खिलाफ भादंवि की धाराओं 420, 417, 406 तथा 120 बी के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया.
थानाप्रभारी ने चौकी प्रभारी रंजीत तोमर को ही इस केस की जांच करने के निर्देश दिए और इस केस की जानकारी सीओ (रुड़की) स्वप्न किशोर सिंह को भी दे दी.
7 मई की शाम को एसपी (देहात) मणिकांत मिश्रा और सीओ स्वप्न किशोर सिंह थाना पीरान कलियर पहुंचे. उन्होंने इस ठग गिरोह को पकड़ने के लिए थानाप्रभारी देशराज शर्मा व चौकी प्रभारी रंजीत तोमर के साथ मीटिंग की.
मीटिंग में उन्होंने इस केस को खोलने के संबंध में कुछ दिशानिर्देश देते हुए कहा कि यह गिरोह अब जल्द ही आसपास के क्षेत्र में शादी के लिए किसी नए व्यक्ति को शिकार बनाएगा. आप अपने मुखबिरों को सतर्क कर दें.
एसपी (देहात) मणिकांत मिश्रा ने थानाप्रभारी के नेतृत्व में एक टीम बनाई. इस टीम में एसआई रंजीत तोमर, चरण सिंह चौहान, अहसान अली, कांस्टेबल अरविंद, ब्रजमोहन, महिला कांस्टेबल सुषमा आदि को शामिल किया गया.
इस के बाद थानाप्रभारी और चौकी इंचार्ज ने अपने मुखबिरों को भी सतर्क कर दिया और उन ठगों की तलाश में जुट गए. उन्होंने मुकेश के फोन नंबर को भी सर्विलांस पर लगा दिया. उन्हें तलाश करतेकरते 7 दिन बीत चुके थे. मगर अभी तक उन के बारे में कोई जानकारी नहीं मिली थी.
17 मई, 2018 को एसआई रंजीत सिंह तोमर को एक मुखबिर ने उन ठगों के बारे में एक महत्त्वपूर्ण जानकारी दी. एसआई रंजीत तोमर ने इस सूचना से थानाप्रभारी और सीओ स्वप्न किशोर सिंह को भी अवगत करा दिया.
मुखबिर ने बताया था कि गैंग के सदस्य हरिद्वार के टिबड़ी इलाके में हैं. यह गिरोह कल रात ही राजस्थान के जयपुर शहर के रहने वाले संजय को शिकार बना कर लौटा है. रीता ने संजय से 2 दिन पहले ही शादी की थी. वह यहां से कहीं जाने की तैयारी में है.
पुलिस क्षेत्राधिकारी स्वप्न सिंह ने पुलिस टीम को तुरंत टिबड़ी जाने के निर्देश दिए. पुलिस टीम ने मुखबिर द्वारा बताई गई जगह पर दबिश दी तो वहां पर मुकेश उर्फ यादराम, उस के बेटे अरुण, भोपाल और रीता उर्फ पूजा को गिरफ्तार कर लिया. थाने ला कर जब उन से पूछताछ की गई तो शादी कर के लूट का धंधा चलाने वाले इस गैंग की कहानी सामने आई, जो इस प्रकार निकली—
रीता उर्फ पूजा मूलरूप से जिला बिजनौर के कस्बा अफजलगढ़ की रहने वाली थी. उस का भाई राजू और पिता कृपाल सिंह गांव में खेतीबाड़ी करते थे. सन 2002 में पिता ने उस की शादी झाड़पुर निवासी पवन से कर दी. बाद में रीता 2 बेटों और एक बेटी की मां बनी. रीता के गलत चालचलन की वजह से सन 2013 में पवन ने उसे छोड़ दिया और बच्चों सहित उस से अलग रहने लगा था.
जिस्मफरोशी से आई ठगी के धंधे में
रीता की बदचलनी की वजह से पति से संबंध टूट जाने की बात उस के मायके वालों को भी पता चल गई थी इसलिए उस के मायके वालों ने भी उस से नाता तोड़ लिया था. रीता के भाई राजू का एक दोस्त था मुकेश जो कि बिजनौर के नरैना गांव का रहने वाला था. पति द्वारा छोड़े जाने के बाद रीता ने मुकेश के साथ अपनी नजदीकियां बढ़ा ली थीं.
मुकेश उस वक्त ज्वालापुर के कड़च्छ मोहल्ले में रहता था. साथसाथ रहने पर दोनों के नाजायज संबंध बन गए. मुकेश रीता के जरिए कमाई करना चाहता था, लिहाजा उस ने उसे जिस्मफरोशी के धंधे में धकेल दिया. वह उसे धंधा करने के लिए रात को होटलों में भेजता. 2 सालों तक उन का यह धंधा चलता रहा.
सन 2015 में मुकेश ने सोचा कि होटलों में जिस्मफरोशी के धंधे में पुलिस के छापे आदि का डर रहता है. पकडे़ जाने पर जेल की हवा भी खानी पड़ सकती है. इसलिए मुकेश ने रीता से सलाह कर के यह धंधा बदलने का विचार किया.
उस ने रीता से कहा कि वह उसे गरीब घर की लड़की बता कर उस की शादी ऐसे अमीर परिवार के युवकों से करा दिया करेगा, जिन की शादी नहीं हो रही हो. शादी के बाद वह उस परिवार के जेवर व नकदी ले कर रफूचक्कर हो जाया करेगी.
रीता को मुकेश की यह सलाह पसंद आ गई और उन्होंने अपने इस नए धंधे को अमली जामा पहनाना शुरू कर दिया.
इस के बाद उन दोनों ने कुछ ऐसे लोगों को ढूंढना शुरू कर दिया जो किसी कारण से अपनी शादी बिरादरी में या अन्य कहीं नहीं कर पा रहे थे. शादी के समय मुकेश अधेड़ व्यक्ति भोपाल को रीता के बाप के रूप में पेश करता था. उसे फिल्मी स्टाइल में रीता के बाप का अभिनय करते हुए कन्यादान जैसी रस्में पूरी करनी होती थीं. इस काम के एवज में मुकेश उसे 2 हजार रुपए प्रति शादी देता था.

मुकेश पहले तो किसी अमीर व्यक्ति से रीता की शादी करवाता, उस के बाद रीता अपने कथित पति के घर के जेवर व नकदी ले कर एकदो दिन में ही वहां से फुर्र हो जाती थी.
मुकेश व रीता के जालसाजी के इस धंधे में अकसर मुकेश का बेटा अरुण भी शामिल रहता था. मुकेश उसे भी ठगी की रकम में से हिस्सा देता था. शादी के नाम पर ठगी करने की लगभग 10 घटनाओं को वह अंजाम दे चुके थे. इस गिरोह में मुकेश का बेटा अरुण रीता का भाई बनता था. जबकि ज्वालापुर की लाल मंदिर कालोनी का रहने वाला भोपाल लड़की का फरजी पिता बनता था.
रीता ने बताया कि अब तक वह गरीब लड़की बन कर उत्तर प्रदेश, राजस्थान व हरियाणा के 11 लोगों से शादी का नाटक कर के ठग चुकी है. वह यह धंधा पिछले 3 सालों से कर रही थी. ठगी के कुछ शिकार लोग लोकलाज के चलते पुलिस तक नहीं गए थे.
जिन लोगों ने पुलिस से शिकायत की थी तो पुलिस उन लोगों के पास तक नहीं पहुंच सकी. क्योंकि पुलिस को उन लोगों का पता मालूम नहीं था.
रीता ने बताया कि सन 2017 में उस ने हरियाणा के जिला करनाल निवासी 2 युवकों को ठगा था. उन के यहां से भी वह लाखों रुपए की ज्वैलरी और नकदी ले कर रफूचक्कर हो गई थी. पिछले साल उस ने शिवदासपुर गांव तेलीवाला के युवक एस. कुमार को ठग कर उस के लगभग 50 हजार रुपए और जेवरों पर हाथ साफ किया था.
गत 24 अप्रैल, 2017 को मुकेश ने उस की शादी मुजफ्फरनगर जिले के गांव गुर्जरहेड़ी निवासी संदीप शर्मा से कराई थी. शादी के 2 दिन बाद ही वह रात को 3 बजे संदीप शर्मा के परिवार का मालपानी समेट खिसक गई थी.
मुकेश था आदतन अपराधी
कुछ महीने पहले ही मुकेश ने उस की शादी बिजनौर के सोनू के साथ कराई थी. उस शादी में भी वह 2 दिन बाद घर के जेवर व नकदी ले कर फरार हो गई थी. सोनू ने इस की शिकायत पुलिस से की तो एसआई मीनाक्षी गुप्ता को इस की जांच सौंपी गई. इस प्रकरण में मुकेश ने सोनू के घर वालों को वधू का नाम नेहा बताया था.
पूछताछ में मुकेश ने भी बताया कि पहले उस की रीता के भाई राजू से गहरी दोस्ती थी. करीब 5 साल पहले जब रीता की बदचलनी की वजह से उस के भाई व बाप ने उस से नाता तोड़ लिया था तो वह उस के साथ रहने लगी थी. पहले वह दोनों कोटद्वार के कौडि़यों कैंप मोहल्ले में रहा करते थे. इस के बाद वह ज्वालापुर के मोहल्ला कड़च्छ में रहने लगे.
ठगी की रकम से डबल हिस्सा लेने के लिए मुकेश ने अपने बेटे अरुण को भी इस गैंग में शामिल कर लिया था. पुलिस को मुकेश के बारे में पता चला कि वह आपराधिक प्रवृत्ति का इंसान है. कोटद्वार के लकड़ी पड़ाव में सन 2011 में हुए डबल मर्डर में भी वह शामिल था.
सन 2013 में एडीजे कोर्ट कोटद्वार से उसे आजीवन कारावास की सजा हो चुकी थी. आरोपी की अपील माननीय उच्च न्यायालय उत्तराखंड, नैनीताल में विचाराधीन है. वर्तमान में मुकेश जमानत पर था.
इस गिरोह के गिरफ्तार होने की सूचना पर एसएसपी कृष्ण कुमार और एसपी (देहात) मणिकांत मिश्रा भी थाने पहुंच गए. एसएसपी ने प्रैस कौन्फ्रैंस आयोजित कर मीडिया को इस शातिर गैंग के बारे में जानकारी दी.
पुलिस ने अभियुक्तों के पास से 35 हजार रुपए नकद, चांदी के गहने, मंगलसूत्र, बिछुए आदि बरामद किए. पूछताछ के बाद चारों अभियुक्तों को न्यायालय में पेश कर जेल भेज दिया गया.
केस की जांच एसआई रंजीत तोमर कर रहे थे. एसआई तोमर आरोपियों के शिकार सभी लोगों से संपर्क कर आरोपियों के खिलाफ साक्ष्य इकट्ठा कर रहे थे, जिस से उन्हें कोर्ट से उचित सजा मिल सके.
– पुलिस सूत्रों पर आधारित.
रमजान का पवित्र महीना चल रहा था. मसजिद से सुबह की अजान हुई तो शबाना की आंखें खुल गईं. वह फटाफट सेहरी के लिए उठी तो देखा कि उस की 4 साल की बेटी रिजवाना बिस्तर पर नहीं थी. वहां केवल छोटी बेटी ही दिखी. शबाना ने सोचा कि रिजवाना को शायद टौयलेट आया होगा तो वह नीचे चली गई होगी.
उस ने रिजवाना को आवाज दी, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला. इस पर शबाना सोचने लगी कि रिजवाना कहां गई होगी. मेरे पास ही तो सो रही थी. शबाना अपनी बेटी को तलाश करने लगी. यह 8 जून, 2018 के तड़के की बात है.
राजस्थान में जोधपुर जिले के पीपाड़ शहर में सिलावटों का मोहल्ला है. इस मोहल्ले में नवाब अली अपने मामा मोहम्मद साजिद के घर में उन के साथ ही ऊपरी मंजिल पर रहता था. नवाब अली और मोहम्मद साजिद मिल कर मीट की दुकान चलाते थे. नवाब अली मूलरूप से पिचियाक गांव का रहने वाला था. वह अपनी बीवी शबाना और 4 साल की बेटी रिजवाना तथा एक छोटी बेटी के साथ मामा के मकान में रहता था.
जून महीने में राजस्थान में भीषण गरमी पड़ती है इसलिए नवाब अली अपनी बीवी और दोनों बेटियों के साथ छत पर सोया हुआ था. शबाना को जब बेटी रिजवाना नहीं मिली तो वह उसे देखने नीचे की मंजिल पर बने कमरे में गई.
कमरे का दृश्य देख कर शबाना की आंखें फटी रह गईं. वहां उस की मासूम रिजवाना खून में सनी पड़ी थी. उस के गले से खून बह रहा था. बेटी को रक्तरंजित हालत में देख कर शबाना रोने लगी. उस ने नब्ज देख कर बेटी के जिंदा होने का अनुमान लगाने की कोशिश की लेकिन उसे कुछ पता नहीं चला.
वह रोती हुई तेजी से सीढि़यां चढ़ कर छत पर पहुंची और वहां सो रहे पति नवाब अली को जगा कर नीचे वाले कमरे में खून से लथपथ पड़ी बेटी रिजवाना के बारे में बताया. इस पर नवाब अपनी बीवी के साथ नीचे वाले कमरे में आया और वहां खून फैला देख कर बीवी से कहा कि लगता है इस पर बिल्ली ने हमला किया है, इस से उस का गला कट गया है.
शबाना की चीखपुकार सुन कर नवाब अली के मामा मोहम्मद साजिद के परिवार वाले भी जाग गए. शबाना पति के साथ खून से लथपथ बेटी को अस्पताल ले गई. अस्पताल में डाक्टरों ने चैकअप के बाद बच्ची को मृत घोषित कर दिया. नवाब अली ने बच्ची पर बिल्ली के हमले की बात कह कर अस्पताल में डाक्टरों को संतुष्ट कर दिया और बेटी का शव घर ले आया.

तब तक सूरज का उजाला नजर आने लगा था. नवाब की मासूम बेटी की मौत होने का पता चलने पर मोहल्ले के लोग भी एकत्र हो गए. नवाब ने मोहल्ले वालों को भी बेटी पर बिल्ली के हमले की बात बताई, लेकिन यह बात लोगों के गले नहीं उतरी. इस बीच किसी आदमी ने पुलिस को सूचना दे दी.
पुलिस मौके पर पहुंच गई. पुलिस ने जब बच्ची की लाश का निरीक्षण किया तो उस के शरीर पर कहीं भी बिल्ली के पंजों के निशान नहीं दिखे.
गला भी किसी धारदार हथियार से काटा हुआ दिख रहा था, इसलिए पुलिस को शक हो गया कि यह हत्या का मामला है. पुलिस ने लाश पोस्टमार्टम के लिए सरकारी अस्पताल भिजवा दी.
पुलिस ने बच्ची की मौत के कारणों का पता लगाने के लिए जोधपुर से विधिविज्ञान प्रयोगशाला की टीम को मौके पर बुलाया, लेकिन इन से भी पुलिस को कोई ऐसे सबूत नहीं मिले, जिस से हत्यारे तक पहुंचा जा सके. पुलिस ने डाक्टरों के पैनल से बच्ची के शव का पोस्टमार्टम कराने के बाद शव परिजनों को सौंप दिया.
पुलिस इस बात से भी आश्चर्यचकित थी कि जब कमरे में बच्ची के मातापिता सो रहे थे तो फिर गला रेतने के समय उन्हें रिजवाना के चीखनेचिल्लाने की आवाज सुनाई क्यों नहीं पड़ी. मां के पास सो रही रिजवाना नीचे वाले कमरे में कैसे पहुंची. पुलिस को इस बात के भी कोई सबूत नहीं मिले कि हत्यारा बाहर से आया था, क्योंकि घर के दरवाजे बंद थे.
मासूम बच्ची की हत्या से पूरे इलाके में सनसनी फैल गई. शबाना की तरफ से पुलिस ने अज्ञात आदमी के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज कर लिया. जोधपुर एसपी (ग्रामीण) राजन दुष्यंत राजन, अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक (ग्रामीण) खींवसिंह भाटी और पुलिस उपाधीक्षक सेठाराम बंजारा ने भी मौके पर पहुंच कर जांचपड़ताल की.
एसपी राजन दुष्यंत ने मौकामुआयने के बाद थाने में पुलिस अधिकारियों के साथ इस मामले पर चर्चा की. उन्हें लगा कि रिजवाना की हत्या में परिवार के ही किसी सदस्य का हाथ रहा होगा.
परिवार वालों ने जब रिजवाना का शव दफना दिया तो पुलिस नवाब अली और उस के मामा मोहम्मद साजिद को पूछताछ के लिए थाने ले आई. दोनों से अलगअलग पूछताछ की गई.
पूछताछ में नवाब अली ने अपनी बेटी रिजवाना की हत्या की जो लोमहर्षक कहानी सुनाई, उसे सुन कर पुलिस अफसर भी स्तब्ध रह गए.
नवाब अली कुरैशी ने पुलिस को बताया कि रमजान के महीने में अल्लाह को खुश करने के लिए वह अपनी सब से प्यारी चीज की कुरबानी देना चाहता था. वह बेटी रिजवाना को बहुत प्यार करता था, इसलिए उसे ही कुरबान कर दिया. नवाब जिस छुरी से बकरे काटता था, उसी से उस ने अपनी बेटी को हलाल कर दिया.

26 साल के नवाब ने पुलिस को बताया कि मैं नमाजी हूं. बेटी को कुरबान कर के अल्लाह को खुश करना चाहता था. वह कई दिनों से अपने ननिहाल में थी. मैं ने रिजवाना को ननिहाल से बुलवा लिया.
7 जून को उसे बाजार ले गया और शहर में घुमायाफिराया. उसे मिठाई, फ्रूट, चौकलेट आदि खिलाए और उस की पसंद की चीजें दिलवाईं. उस के बाद मैं घर आ गया. रात को रिजवाना अपनी मां शबाना के साथ छत पर सोई थी, मैं भी पास में ही सोया था.
आधी रात बाद मैं रिजवाना को चुपके से उठा कर नीचे के कमरे में ले गया. वहां उसे कलमा सुनाया. फिर अपनी गोद में बिठा कर बकरा काटने वाली छुरी से धीरेधीरे उस का गला रेत दिया.
बेटी को हलाल करने से मेरी पैंट खून से सन गई तो मैं ने कपड़े बदले. फिर छुरी और खून से सने कपड़े छिपा कर रख दिए और वापस छत पर आ कर सो गया. मुझे नींद नहीं आ रही थी, पर मैं सोने का नाटक कर रहा था.
बाद में जब शबाना मुझे बेटी की लाश के पास ले गई तो मैं ने बेटी पर बिल्ली के हमले की बात कह कर मामले को दूसरा रूप देने की कोशिश की लेकिन बाद में पुलिस आ गई और मेरी मंशा पूरी नहीं हो सकी.
पुलिस ने बेटी की हत्या के आरोप में नवाब अली कुरैशी को गिरफ्तार कर कोर्ट में पेश किया और वहां से उसे जेल भेज दिया गया. दूसरी ओर इसलाम से जुड़े लोगों ने आरोपी के बयान और कृत्य को धर्मविरोधी बताया. इन का कहना था कि इसलाम में इंसान का कत्ल हराम है. यह कृत्य सरासर धर्म के खिलाफ है.
कृति सेनन हाल ही में अपने एक नए फोटोशूट को लेकर सोशल मीडिया पर ट्रोलिंग का शिकार हो गईं. इस फोटोशूट में कृति एक मृत जिराफ के साथ पोज देती नजर आ रही हैं. कृति ने यह कवर शूट एक मैगजीन के लिए कराया था, जिसे इस मैगजीन ने ही अपने इंस्टाग्राम पर शेयर किया. लेकिन इसके बाद से ही कृति को इसके लिए ट्रोल किया जाने लगा. कई एनिमल लवर्स को कृति का ये अंदाज बिलकुल पसंद नहीं आया है.
दरअसल इस तस्वीर में कृति के पीछे बड़ी सी खिड़की पर लटकता हुआ जिराफ नजर आ रहा है. एक फोटो में कृति जिराफ का मुंह छूते हुए नजर आ रही हैं. कृति का यही फोटो एक मैग्जीन के कवर पर भी लिया गया है. वैसे तो कृति ने महिला सशक्तिकरण को बढ़ावा देने के लिए यह कवरशूट कराया था, लेकिन उनका यही अंदाज सोशल मीडिया पर जरा भी पसंद नहीं किया जा रहा है. कृति को इसके लिए जमकर ट्रोल किया जा रहा है.
बता दें कि यह फोटोशूट लंदन के अनहौय पार्क में किया गया था, जहां कई जानवरों को प्रिजर्व कर के रखा जाता है. यहां प्राकृतिक रूप से मरने वाले जानवरों को टैक्सीडर्मी विधि से संजो कर रखा जाता है. हालांकि मैगजीन ने कृति के पोस्ट के साथ ही यह भी साफ किया है कि इस शूट के दौरान या बाद में किसी जानवर को कोई आपत्ति नहीं पहुंचाई गई है. बता दें कि इससे पहले इसी साल मार्च में सोनम कपूर भी लंदन के इस अहोय पार्क में ब्राइड्सटुडेइन मैगजीन के लिए यहां फोटोशूट करा चुकी हैं.
इस सारे विवाद पर चुप्पी तोड़ते हुए कृति सेनन ने अपनी अलोचनाओं का जवाब दिया है. कृति ने कहा, ‘यह लंदन के होटल जैसे स्थान पर कराया गया एक सामान्य फोटोशूट था. यह सब पूरी तरह नकली था. मैं भी जानवरों से प्यार करती हूं.’
ताजमहल को किस ने और क्यों बनाया, यह बात आर्किटैक्टों या हिस्टोरियनों के मतलब की हो सकती है, पर आमजन के लिए यह सौंदर्य का अद्भुत नमूना है. ताजमहल उन सैकड़ों मकबरों में से एक है जिन्हें मुगल व अन्य राजाओं ने अपने मरने के बाद शरीर को रखे जाने के लिए बनवाया था, लेकिन इस इमारत की जो वास्तुकला है वह अनूठी है. प्रवेश करते ही चबूतरे पर खड़े हो कर इमारत को देखने के साथ ही जो अनुभूति होती है वह अनूठी होती है.
अफसोस यह है कि देश की भगवा ब्रिगेड जहां इस को भगवा रंग में रंगने में लगी है, वहीं इमारत के आसपास उगते कारखाने इस का रंग फीका कर रहे हैं. देश का पुरातत्त्व विभाग इस की देखभाल करता है पर यह देखभाल खालिस भारतीय तौर पर बेदिल से अधकचरी की जाती है. सरकारी अमले की ताजमहल में रुचि है ही नहीं, यह इस बात से साफ है कि सुप्रीम कोर्ट को कहना पड़ा कि या तो इस की देखभाल करो या फिर इसे गिरा दो.
एक बार एक ब्रिटिश औफिसर ने इसे गिराने का प्रस्ताव रखा भी था ताकि इस ‘खंडहर’ के पत्थर सड़क बनाने में इस्तेमाल किए जा सकें. गनीमत है कि तभी पुरातत्त्व विभाग ने इसे संरक्षित करने का जिम्मा लिया. ताजमहल अब न मकबरा है जिसे किसी मुगल बादशाह ने बनवाया था, न भगवा भाषा में कोई हिंदू मंदिर. यह तो एक भव्य सुंदर इमारत है जिस के हर कोने से शांति और प्रेम टपकता है. यह विशाल होेते हुए भी अपना सा लगता है और जो इस की छावं में होता?है उसे यह बौना नहीं बनाता, यह इस की खासीयत है.
ताजमहल यों ही प्रेम का प्रतीक नहीं बन गया. मुगल राजाओं ने दुनियाभर में इस से बड़ेबड़े निर्माण कराए हैं. मिस्र में पिरामिड हैं, चीन में ग्रेटवाल है, रोम में वैटिकन है, पेरिस में एफिल टावर है पर इन सब से प्रेम का एहसास नहीं टपकता. ये सब खुशी के प्रतीक नहीं हैं जैसे सफेदशुद्ध लगता ताजमहल है.
इस शुद्धसफेद ताज का रंग अब भूरा हो रहा है और सुप्रीम कोर्ट इसीलिए झल्ला रहा है क्योंकि सरकार का कोई अफसर या नेता इसे ठीक करने की जिम्मेदारी नहीं ले रहा है. इसे ठीक करने के लिए पिछले 20-25 वर्षों में इस के 20-30 मील के दायरे में बनीं फैक्टरियां अगर बंद करनी पड़ें, मकानमहल्ले हटाने पड़ें, सड़कें बंद करनी पड़ें तो कोई हर्ज नहीं. इन सब ने जानते हुए भी ताजमहल को नुकसान पहुंचाने का काम किया है. इन से हमदर्दी जताने की जरूरत नहीं है क्योंकि डिज्नीलैंड फिर बनाए जा सकते हैं लेकिन ताजमहल नहीं.
कारोबार के हर क्षेत्र में इन दिनों एक नई संस्कृति का उभार होता नजर आ रहा है और वह है कौर्पोरेट संस्कृति. चिकित्सा के क्षेत्र में भी यह संस्कृति अपने पांव तेजी से फैला रही है. आजादी के बाद से ले कर अब तक अस्पताल प्रबंधन और इलाज में तकनीकी बदलाव के साथ ही साथ पेशेवर रवैया अपनाया जा रहा है. बिड़ला, टाटा, अपोलो, हिंदुजा जैसे बड़ेबड़े औद्योगिक घरानों के अस्पताल पहले से ही सुपर स्पैशलिटी अस्पताल के रूप में जाने जाते थे, अब रिलायंस, डालमिया, इमामी, फोर्टिस सहित बहुत सारे औद्योगिक ग्रुप कौर्पोरेट चिकित्सा के साथ स्वास्थ्य सेवा के क्षेत्र में कदम बढ़ा रहे हैं, फिर वह अस्पताल, नर्सिंगहोम, क्लिनिक, डायग्नौसिस सैंटर हो या स्वास्थ्य बीमा का क्षेत्र. चिकित्सा से जुड़े इन तमाम क्षेत्रों में कौर्पोरेट स्तर की सेवाएं दी जा रही हैं.
आधुनिक चिकित्सा व्यवस्था को ले कर समयसमय पर हुए सर्वेक्षण का नतीजा यही कहता रहा है कि कौर्पोरेट अस्पताल संस्कृति के कारण आने वाले समय में चिकित्सा क्षेत्र में बहुत बड़ा परिवर्तन आने वाला है. आधुनिक चिकित्सा मोटेतौर पर हर किसी को उपलबध हो रही है. वहीं रोजगार की भी गुंजाइश बढ़ी है. कौर्पोरेट अस्पतालों में आधुनिक चिकित्सा उपकरणों को औपरेट करने वाले प्रशिक्षित लैब तकनीशियनों, रेडियोलौजिस्ट, फिजियोथेरैपी पैरामैडिकल स्टाफ, नर्सिंग कर्मियों और नई बीमारियों से निबटने के लिए विशेषतौर पर प्रशिक्षित डाक्टरों के लिए भी गुंजाइश बढ़ी है.
स्वास्थ्य सेवा के सितारे
भारत में स्वास्थ्य सेवा का पिछले ढाईतीन दशकों का सफर बड़ा दिलचस्प रहा है. कौर्पोरेट चिकित्सा पद्घति से पहले देश के निजी अस्पतालों में सुपरस्पैशलिटी सेवाएं आरंभ हुईं. इस ने स्वास्थ्य सेवा को एक नया आयाम तो दिया पर यह एक खास वर्ग तक ही सीमित थी. स्वास्थ्य सेवा के क्षेत्र में कुछ नाम हैं जिन्होंने इस क्षेत्र को नई ऊंचाइयां दी हैं और ये नाम इस क्षेत्र के सितारे हैं. ऐसा ही एक नाम हैं डा. प्रताप रेड्डी. इन के अवदानों को कभी भुलाया नहीं जा सकता. अपोलो फेम डा. रेड्डी को भारत के कौर्पोरेट चिकित्सा क्षेत्र में अग्रणी के रूप में जाना जाता है. इस क्षेत्र में अपोलो एक क्रांति के रूप में उभर कर आया. कहते हैं डा. रेड्डी का मकसद भारत में अपोलो अस्पतालों की श्रृंखला के रूप में ऐसा मैडिकल इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार करने का था जिस में हर किसी को इलाज मुहैया हो सके. देश का आम आदमी चिकित्सा का खर्च वहन कर सके.
चेन्नई में 1983 में अपोलो अस्पताल ने अपना पहला कदम रखा. आज दक्षिण एशिया और मध्यपूर्व के देशों समेत दुनिया के 9 देशों में अपोलो की स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध हैं. भारत में अपोलो के 64 वर्ल्ड क्लास अस्पताल व क्लिनिक हैं, लगभग 9 हजार बैड, डेढ़ हजार से अधिक फार्मेसी, लगभग 150 प्राथमिक चिकित्सा केंद्र और डायग्नौसिस सैंटर के साथ स्वास्थ्य बीमा, ग्लोबल कंसल्टैंसी, 15 नर्सिंग कालेज व अस्पताल मैनेजमैंट व रिसर्च फाउंडेशन हैं.
हमारे देश में डा. प्रताप रेड्डी के अलावा चिकित्सा क्षेत्र में एक और व्यक्तित्व है जो पूरे दिलोजान से अपने पेशे के लिए समर्पित है. और वह व्यक्तित्व है डा. देवी शेट्टी. दिल की बीमारी से ग्रस्त गरीबों के लिए डा. शेट्टी नाम किसी से छिपा नहीं. अब तक वे लगभग 20 हजार ओपन हार्ट सर्जरी कर चुके हैं. सफल सर्जरी का प्रतिशत 98 है. 1991 में डा. शेट्टी ने एक बच्चे की हार्ट सर्जरी की, जो कि देश में पहली सफल ओपन हार्ट सर्जरी के रूप में जानी जाती है. वे मदर टेरेसा के व्यक्तिगत डाक्टर थे.
मदर टेरेसा की सोहबत में इन के दिल में गरीबों के लिए दर्द पैदा हुआ और बिड़ला के कैलकटा हौस्पिटल में एक गरीब मरीज की ओपन हार्ट सर्जरी करने के बाद सर्जन के रूप में डा. शेट्टी ने अपनी फीस माफ कर दी. यह बात अस्पताल प्रबंधन को नागवार गुजरी. डा. शेट्टी ने उसी दम इस्तीफा दे दिया.
डा. शेट्टी बेंगलुरु चले गए और वहां उन्होंने मणिपाल हार्ट फाउंडेशन की स्थापना की. इस के बाद 2001 में नारायण हृदयालय के नाम से एक ट्रस्ट और अस्पताल की स्थापना की. अस्पताल के पीछे हैल्थ सिटी भी तैयार की गई है.
आज नारायण गु्रप का हृदयालय बेंगलुरु, अहमदाबाद, बरहमपुर, धारवाड़, गुवाहाटी, जयपुर, हैदराबाद और जमशेदपुर समेत 17 जगहों में 29 हैं. कोलकाता में डा. शेट्टी का अस्पताल रवींद्रनाथ टैगोर हार्ट फाउंडेशन के नाम से जाना जाता है. डा. शेट्टी के लगभग हरेक अस्पताल में 4-5 बिल्ंिडग्स और 2-5 हजार बैड हैं. इन अस्पतालों में हार्ट, बौनमैरो, किडनी और लीवर प्रत्यारोपण से ले कर हर तरह की बीमारियों का इलाज समाज के हर स्तर के लोगों का हो रहा है.
बढ़ रहा है कौर्पोरेट अस्पतालों का कारोबार
देश के महानगरों और बड़े शहरों में पिछले 2 दशकों से निजी अस्पतालों में इलाज से ले कर प्रबंधन तक का काम कौर्पोरेट ढांचे में ढल रहा है. कोलकाता, बिहार और पूर्वोत्तर के राज्यों समेत देशभर से लोगों के लिए दक्षिण भारत में चेन्नई, वेल्लोर, हैदराबाद, बेंगलुरु इलाज का सब से भरोसेमंद ठिकाना हुआ करता था. हर छोटेबड़े इलाज के लिए लोग दक्षिण भारत का रुख किया करते थे. आंखों के लिए चेन्नई का शंकर नेत्रालय और हैदराबाद का एल वी प्रसाद अस्पताल, दूसरी अन्य गंभीर बीमारियों के इलाज के लिए वेल्लोर के क्रिश्चियन मैडिकल कालेज और चेन्नई में अपोलो अस्पताल हैं. कोलकाता, बिहार और पूर्वोत्तर भारत के राज्यों के अलावा बंगलादेश और म्यांमार तक से मरीज दक्षिण भारत आते रहे हैं. यहां तक कि जमीनजायदाद तक बेच कर लोग दक्षिण भारत में कम खर्च में बेहतरीन इलाज के लिए जाते रहे हैं.
अब अगर कोलकाता की बात करें तो एक समय था यहां के लोग भी बेहतरीन इलाज के लिए ज्यादातर दक्षिण भारत का रुख किया करते थे. दक्षिण भारत ही उन का एकमात्र भरोसा था. उस समय यहां इक्केदुक्के निजी अस्पताल ही थे पर वे धनीमानी के लिए ही थे. आम आदमी इन अस्पतालों का रुख कर नहीं पाता था.
पर समय बदला और समय के साथ कोलकाता के चिकित्सा क्षेत्र में भी बड़ा बदलाव आया. पिछले 2 दशकों में अकेले ईस्टर्न बाईपास में 15-20 निजी कौर्पोरेट अस्पताल खुल चुके हैं और एक हद तक यहां अत्याधुनिक चिकित्सा का लाभ समाज के निचले स्तर के लोगों को भी मिल रहा है.
पिछले 5 सालों से अत्याधुनिक चिकित्सा सुविधा के नजरिए से कोलकाता पूर्वोत्तर भारत के लिए गेटवे बना हुआ है. इस के अलावा हर साल हजारों की संख्या में बंगलादेशी कोलकाता आ कर इलाज करा रहे हैं. पिछले साल कोलकाता के पियरलैस अस्पताल में 14 हजार बंगलादेश के नागरिकों ने अपना इलाज करवाया. दिल की बीमारी के अत्याधुनिक इलाज के लिए कोलकाता में प्रख्यात कार्डियक सर्जन डा. देवी शेट्टी का रवींद्रनाथ टैगोर इंटरनैशनल इंस्टिट्यूट औफ कार्डियक साइंस बड़ा भरोसे का अस्पताल माना जाता है. यहां भी बंगलादेश समेत नेपाल, भूटान, म्यांमार से मरीज आते हैं.
लेकिन बंगलादेशी नागरिकों के लिए कोलकाता मैडिकल हब बना हुआ है. इस के पीछे एक बड़ा कारण दिल्ली, मुंबई या दक्षिण भारत में जा कर इलाज करवाने के बजाय कोलकाता में इलाज करवाने में ज्यादा सहूलियत होती है. दरअसल, दोनों का खानपान, रहनसहन और भाषा लगभग एकजैसी है. उस पर बंगलादेश बंगाल के बहुत ही करीब है. बंगाल में यही सुविधा नेपाली, भूटानी नागरिकों को मिलती है. जाहिर है बड़ी संख्या में नेपाल, भूटान के लोग कोलकाता इलाज कराने आते हैं.
इन्हीं वजहों से यहां के कौर्पोरेट अस्पतालों का कारोबार भी बढ़ रहा है. अब इस का फायदा एयरवेज कंपनियों को भी मिलता ही है. हाल ही में अपोलो और जेट एयरलाइंस ने फ्लाई टू गुड हैल्थ योजना के तहत इलाज और हवाईजहाज के किराए में 10 प्रतिशत छूट की भी घोषणा की है.
मल्टीस्पैशलिटी से कौर्पोरेट तक का सफर
निजी अस्पतालों के कौर्पोरेट अस्पताल में तबदील होने के बाद भारत में कुछ सरकारी अस्पताल भी सुपर स्पैशलिटी चिकित्सा सेवा उपलब्ध करा रहे हैं. वैसे भी आज देश में जो अस्पताल कौर्पोरेट अस्पताल के रूप में स्थापित हैं, उन के सफर की शुरुआत सुपर स्पैशलिटी सेवाओं से ही हुई थी. दरअसल, सुपर स्पैशलिटी सेवाओं से अस्पतालों में कौर्पोरेट कल्चर की नींव पड़नी शुरू हुई. शुरू के दिनों में इस तरह की सेवाओं को केवल बड़े निजी अस्पताल ही मुहैया करा रहे थे. लेकिन बाद में देश के कुछ नामीगिरामी सरकारी अस्पतालों में भी इस की शुरुआत हुई.
दिल्ली का एम्स इसी श्रेणी में आता है. आने वाले दिनों में एम्स की शाखाएं देश के अन्य राज्यों में भी खोले जाने का प्रस्ताव है. इस को ले कर राजनीति भी कुछ कम नहीं हो रही है. बहरहाल, जिस किसी राज्य में एम्स की शाखा खुलेगी, उस राज्य के लिए यह फख्र की बात होगी. वहीं, माना यह भी जा रहा है कि एम्स की स्थापना से उस राज्य में स्वास्थ्य सेवा के क्षेत्र में बड़ी क्रांति हो जाएगी. बजट में कई राज्यों में एम्स खोले जाने की घोषणा हो चुकी है.
एम्स की ही श्रेणी में आता है कोलकाता का सेठ सुखलाल करनानी अस्पताल, जो एसएसकेएम अस्पताल के नाम से जाना जाता है. इस की स्थापना 1770 में ईस्ट इंडिया कंपनी ने की थी. तब यह कोलकाता का पहला अस्पताल था और प्रैसिडैंसी जनरल अस्पताल के नाम से जाना जाता था. आजादी के बाद इस का नाम सेठ सुखलाल करनानी अस्पताल पड़ा. यह कोलकाता का सुपर स्पैशलिटी सरकारी अस्पताल है. यहां अत्याधुनिक इलाज की सहूलियत है.
मुंबई के किंग एडवर्ड मैमोरियल अस्पताल को ही लें तो यह न्यूरोसर्जरी के लिए बैस्ट सरकारी अस्पताल के लिए जाना जाता है. हैदराबाद के निजाम इंस्टिट्यूट औफ मैडिकल साइंस में 28 विभागों में से 14 विभाग ऐसे हैं जहां सुपर स्पैशलिटी सेवाएं मुहैया हैं. चंडीगढ़ का पीजीआईएमईआर और लखनऊ का संजय गांधी इंस्टिट्यूट औफ मैडिकल साइंस भी न्यूरोसर्जरी के लिए विख्यात है. ये इसी श्रेणी के सरकारी अस्पताल हैं, जहां अत्याधुनिक कौर्पोरेट चिकित्सा सुविधा उपलब्ध है. यहां यह भी कहने की जरूरत है कि अगर सरकारी अस्पतालों का आधुनिकीकरण हो भी रहा है तो यह केवल बड़े शहरों तक ही सीमित है.
ऐसे में भरोसा कौर्पोरेट अस्पताल ही हैं. कुछ कौर्पोरेट अस्पताल हैं जिन की शाखाएं देशभर के विभिन्न राज्यों में हैं. फोर्टिस, अपोलो और टाटा मैमोरियल ऐसे ही कौर्पोरेट अस्पताल हैं. चेन्नई के शंकर नेत्रालय, क्रिश्चियन मैडिकल कालेज, अपोलो, कोलकाता के अपोलो, वेलव्यू और आमरी, हैदराबाद के इंडोयूएस सुपर स्पैशलिटी अस्पताल, एलवी प्रसाद अस्पताल, सैंचुरी अस्पताल, यशोदा अस्पताल से ले कर मुंबई के टाटा अस्पताल, बीच कैंडी, हिंदुजा, लीलावती, कोकिलाबेन अस्पताल, बेंगलुरु के सत्य साईंबाबा इंटरनैशनल अस्पताल, ऐक्सिस सुपर स्पैशलिटी,नैशनल इंस्टिट्यूट औफ मैंटल हैल्थ ऐंड न्यूरोसाइंस और दिल्ली में सर गंगाराम अस्पताल, सफदरजंग अस्पताल, राम मनोहर लोहिया अस्पताल और गुरुग्राम के मेदांता जैसे अस्पतालों में दुनियाभर से लोग इलाज कराने के लिए आते हैं.
मैडिकल टूरिज्म टैलीमैडिसिन
वर्ष 2012 से चिकित्सा क्षेत्र में मैडिकल टूरिज्म और टैलीमैडिसिन की संस्कृति ने जोर पकड़ा. एक वर्ष के अंदर रूस, यूक्रेन, पाकिस्तान, बंगलादेश, श्रीलंका, अफ्रीका और दूसरे कई खाड़ी के देशों से मरीज दिल्ली से ले कर मुंबई, कोलकाता, हैदराबाद, बेंगलुरु में इलाज के लिए आते हैं.
आंकड़ों की मानें तो 2012 में जहां एक लाख 72 हजार लोग इलाज के लिए भारत आए तो 2013 में 2 लाख 36 हजार और 2014 में एक लाख 84 हजार से अधिक विदेशी इलाज के लिए भारत आए. मैडिकल टूरिज्म मार्केट रिपोर्ट के अनुसार, अक्तूबर 2015 तक भारत का मैडिकल टूरिज्म लगभग 2 अरब 22 करोड़ रुपए का था. और अब उम्मीद की जा रही है कि 2020 में यह 4 खरब 67 अरब 18 करोड़ रुपए से 5 खरब 33 अरब 92 करोड़ रुपए तक हो जाएगा.
मैडिकल टूरिज्म में उफान का जो कारण रहा है वह कम खर्च में बेहतरीन इलाज है. मिसाल के तौर पर किसी बीमारी के इलाज के लिए अमेरिका में जो खर्च आता है, उस रकम के महज 10वें हिस्से में एक विदेशी मरीज भारत आ कर इलाज का पूरा खर्च उठा कर लौट जाता है. केवल अमेरिकी नहीं, दुनिया के तमाम हिस्से से लोग यहां आ कर इलाज करवाते हैं. हाल ही में दुनिया की सब से अधिक वजन वाली मिस्र की महिला नागरिक इमान अहमद इलाज के लिए मुंबई आई हैं. बताया जाता है कि अगले 2 सालों तक इमान अहमद का भारत में इलाज होगा.
एक अमेरिकी एजेंसी है जौइंट कमीशन इंटरनैशनल (संक्षेप में जेसीआई) यह एक अलाभकारी एजेंसी है. इस एजेंसी ने दुनियाभर में 21 हजार अस्पतालों को मान्यता दे रखी है. भारत के ऐसे 28 अस्पताल हैं जिन्हें जेसीआई की मान्यताप्राप्त है. इस एजेंसी की ओर से भारत में परामर्शदाता तेलंगाना के डा. महबूब अली खान हैं. यह जेसीआई कौर्पोरेट चिकित्सा पद्घति के बहुत सारे नियमों का पालन करता है.
विदेशी मरीजों का भारत में इलाज कराने के मामले में आईएसओ की तुलना में जेसीआई की मान्यता कहीं अधिक माने रखती है. ज्यादातर विदेशी मरीज जेसीआई द्वारा मान्यताप्राप्त अस्पतालों में इलाज कराना चाहते हैं. अस्पताल और मरीज के बीच जेसीआई एक कड़ी का काम करता है.
बहरहाल, मैडिकल टूरिज्म का एक हिस्सा है टैलीमैडिसिन. यह वह तकनीक है जिस के तहत विदेश में बैठ कर कोई भारत के डाक्टरों से परामर्श कर सकता है. जब कोई मरीज विदेश या भारत के ही किसी दूरदराज के इलाके से आ कर कहीं किसी बड़े शहर में इलाज कराना चाहता है तो इलाज से पहले और बाद में टैलीमैडिसिन की सुविधा बड़ी सहूलियत देती है. भारत में इस की शुरुआत चित्तूर के अपोलो अस्पताल में अरागोंडा नामक प्रोजैक्ट के तहत हुई.
लेकिन आगे चल कर अपोलो अस्पताल के अलावा एशियन हार्ट फाउंडेशन, सूचना तकनीक विभाग, इसरो, दूसरे कई राज्य सरकारों और निजी संस्थाओं के सहयोग से रियल टाइम में मैडिकल परामर्श देने व लेने का काम होता है. कार्डियोलौजी, टैलीरेडियोलौजी, टैलीपैथेलौजी को सपोर्ट करती है. आज दिल्ली में एम्स, लखनऊ में संजय गांधी इंस्टिट्यूट औफ मैडिकल साइंस के अलावा चंडीगढ़, ओडिशा, शिमला, कटक, रोहतक के कुछ अस्पतालों में इस की सुविधा उपलब्ध है.
पिछले कुछ सालों में इसरो के टैलीमैडिसिन नैटवर्क का विस्तार हुआ है. अब इस नैटवर्क से कम से कम 45 ग्रामीण अस्पताल और 15 सुपर स्पैशलिटी अस्पताल जुड़े हुए हैं जिन में अंडमान निकोबार से ले कर कारगिल, लेह, लक्षद्वीप शामिल हैं. जहां तक पश्चिम बंगाल का सवाल है तो कोलकाता में स्कूल औफ ट्रौपिकल मैडिसिन, एसकेकेएम, नीलरतन सरकारी अस्पताल में भी टैलीमैडिसिन की सहूलियत है. इस के साथ ही, बंगाल के कई जिलों में भी टैलीमैडिसिन की सुविधा है. कोलकाता के रवींद्रनाथ टैगोर इंटरनैशनल इंस्टिट्यूट औफ कार्डियक साइंस और बेंगलुरु का नारायण हृदयालय को टैलीमैडिसिन का लिंक हब बनाया गया है.
सरकारी स्वास्थ्य बजट
सरकारी बजट में स्वास्थ्य सेवाओं के लिए अलग से रकम मुहैया कराई जाती है. लेकिन पाया गया है कि ज्यादातर सरकारी अस्पताल कुछ अत्याधुनिक चिकित्सा से संबंधित डायग्नौसिस मशीनें और दूसरे कई उपकरण तो खरीद लेते हैं और उन का खूब प्रचार भी हो जाता है पर प्रशिक्षित तकनीशियनों व स्वास्थ्य अधिकारियों के अभाव में महंगी मशीनें पड़ीपड़ी कबाड़ हो जाती हैं.
आखिरकार इन आधुनिक उपकरणों का लाभ आम जनता को नहीं मिल पाता है. और ऐसी चिकित्सा सेवा पाने के लिए लोग मजबूरन इस उम्मीद के साथ, कि निजी अस्पतालों में उम्दा इलाज होगा, उधर का रुख करने लगते हैं, अपने बीमार परिजनों को भलाचंगा कर के घर लौटा ले जाने के लिए भले ही उन्हें कर्ज लेना पड़े या सबकुछ दांव पर लगाना पड़े. ऐसे में साफ है कि सरकारी अस्पताल ठूंठ बन कर रह जाते हैं. कर के रूप में जनता का पैसा जाया हो जाता है.
चिकित्सा का हब बना भारत
डेढ़दो दशकों से भारत विदेशी नागरिकों के लिए मैडिकल हब बन गया है. यहां यह देखा जाना जरूरी है कि आखिर भारत मैडिकल हब क्यों बना, खासतौर पर अंग प्रत्यारोपण का? एक कारण तो यही है कि विदेशी नागरिकों के लिए उन के देश की तुलना में भारत में इलाज का खर्च कहीं सस्ता है. इस सहूलियत की चर्चा पहले ही की जा चुकी है.
अंग प्रत्यारोपण के लिए भी विदेशी नागरिक भारत का रुख करना पसंद करते हैं. भारत के कुछ राज्य अलगअलग अंगों के प्रत्यारोपण के लिए दुनियाभर में जाने जाते हैं. मिसाल के तौर पर आंध्र प्रदेश हार्ट, किडनी, लीवर, लंग्स, गुजरात किडनी और लीवर, कर्नाटक हार्ट, होमोग्राफ्ट, किडनी, लीवर, लंग्स, पैनक्रियाज, केरल हाथ, घुटना, माइक्रोवैस्कुलर, चेन्नई कोर्निया, हाथ, हार्ट किडनी, लीवर, लंग्स के प्रत्यारोपण के लिए हर साल हजारों की तादाद में विदेशी भारत के इन शहरों में आते हैं.
हाल ही में किसी अमेरिकी अखबार में एक विज्ञापन आया था, जिस में कहा गया था कि हर 15 घंटे में एक न्यूयौर्क निवासी किसी न किसी अंग के डोनर का इंतजार करते हुए लंबी नींद सो जाता है. इस विज्ञापन की टैगलाइन थी- ‘बीकम एन और्गन डोनर.’ यह विज्ञापन अमेरिका के महज एक शहर में देखा गया है. जाहिर है कि इस विज्ञापन के जरिए स्थिति की भयावहता का अंदाजा लगाया जा सकता है. यही स्थिति है जो मानव अंग तस्करी को बढ़ावा देती है. केवल भारत में नहीं, बल्कि पूरे विश्व में ऐसा रैकेट काम कर रहा है.
वैसे भी, दुनियाभर के एक प्रतिशत धनकुबेरों के लिए अंग प्रत्यारोपण कोई समस्या नहीं है. मुंबई, बेंगलुरु, हैदराबाद और चेन्नई के अस्पतालों में इलाज कराते सऊदी शेखों को देखा जा सकता है. बताया जाता है कि वे भारत जैसे तीसरी दुनिया के देशों में छुट्टियां मनाने के नाम पर आते हैं और अंग प्रत्यारोपण करवा कर लौट जाते हैं.
हालांकि मानव अंगों की तस्करी के मामले सामने आने पर भारत के अस्पतालों को विदेशियों के लिए अंग प्रत्यारोपण हब बनाने को ले कर विरोध भी कम नहीं होता रहा है. हमारे देश में चिकित्सा के क्षेत्र से जुड़ी बिरादरी के एक बड़े धड़े का यह भी मानना है कि जिस तादाद में विदेशी नागरिक अंग प्रत्यारोपण के लिए भारत आ रहे हैं, इसे देखते हुए ऐसा लगता है कि वह दिन दूर नहीं जब डाक्टर मैडिकल काउंसिल औफ इंडिया ऐक्ट को धता बताते हुए देशी व विदेशी मरीजों के बीच अंतर करने लगेंगे. अगर ऐसा दिन आया तो देशी मरीज बगैर इलाज के मरने को मजबूर हो जाएंगे.
एयर एंबुलैंस की सुविधा
बेंगलरु की एयर रेस्क्यू, मेदांता की फ्लाइंग डौक्टर्स समेत देश में कई बड़े कौर्पोरेट एयर एंबुलैंस की सुविधा मोटे दामों पर उपलब्ध कराते हैं. इन हैलिकौप्टरों में आपातकालीन मैडिकल इक्विपमैंट समेत तमाम बुनियादी सुविधाएं होती हैं जो मरीजों को आम एंबुलैंस में मुहैया करवाई जाती हैं. फिलहाल दिल्ली, मुंबई, हैदराबाद, चेन्नई, कोलकाता व चंडीगढ़ आदि जगहों पर एयर एंबुलैंस की सुविधा मौजूद है. कौर्पोरेट चिकित्सा की महंगी व खर्चीली सुविधाएं, जाहिर है, संपन्न तबके वाले ही अफोर्ड कर सकते हैं.
सरकारी अस्पताल : नियम ज्यादा सुविधाएं कम
भारत में मात्र एकचौथाई उच्चवर्गीय, साधनसंपन्न तथा शहरी लोग हैं जिन के लिए अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान, राजीव गांधी सुपर स्पैशलिटी हौस्पिटल, संजय गांधी पोस्ट ग्रेजुएट इंस्टिट्यूट औफ मैडिकल साइंस जैसे विश्व स्तरीय सुविधाओं से युक्त संस्थान हैं जहां लैप्रोस्कोपिक सर्जरी से ले कर डे केयर सर्जरी तक की सुविधाएं उपलब्ध हैं. इन के अतिरिक्त दूसरे कौर्पोरेट अस्पताल हैल्थ टूरिज्म तथा टैलीमैडिसिन जैसी आधुनिक सुविधाओं के भी विकल्प हैं. दूसरी ओर भारत में बसने वाले तीनचौथाई ग्रामीण तथा दूरदराज के लोगों के लिए उपलब्ध प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, कम्युनिटी हैल्थ सैंटर व जिला अस्पतालों में चिकित्सा की समुचित व्यवस्था तक नहीं है. वहां न तो डाक्टर हैं, न ही दवाइयां. उस पर भी सरकारी नियमों का ऐसा जाल है कि कई मरीज तो पेपरवर्क पूरा होतेहोते दम तोड़ देते हैं.
सरकारी रवैया तथा लालफीताशाही के कारण इस सैक्टर में कोई भी काम ढंग से नहीं हो पा रहा है. दूसरे देशों में प्रति हजार जनसंख्या पर अस्पतालों में 3.96 बैड हैं जबकि भारत में मात्र 0.7 ही हैं. करीब 10 लाख भारतीय प्रतिवर्ष इलाज के बिना ही मर जाते हैं तथा लगभग 7 करोड़ लोग विशेषज्ञ की सुविधा नहीं प्राप्त कर पाते क्योंकि 80 फीसदी विशेषज्ञ शहर में ही रहना पसंद करते हैं, केवल 3 फीसदी ही ग्रामीण क्षेत्रों में अपनी सेवाएं प्रदान करते हैं. भारत में प्रति 10 लाख आबादी पर 74,150 कम्युनिटी हैल्थ सैंटर की जरूरत है लेकिन इस की संख्या आधे से भी कम है.
2025 तक भारत के अस्पतालों में करीब 17 लाख बैड की जरूरत होगी. पब्लिक सैक्टर द्वारा किए जाने वाले 860 मिलियन यूएस डौलर इनवैस्मैंट के बावजूद महज 15 से 20 फीसदी ही इस की आपूर्ति हो पाएगी. इनवैस्टमैंट कमीशन के अनुसार, पिछले 4 सालों के दौरान भारत की विकास दर 4 फीसदी की दर से बढ़ी है. उसी दर से भारतीयों की इनकम भी बढ़ी है. लेकिन इस के बावजूद बहुत बड़ी संख्या में लोगों को आधारभूत चिकित्सा सुविधाएं नहीं मिल रही हैं.
मानव अंग तस्करी
इन दिनों स्वास्थ्य सेवाओं पर मानव अंग की तस्करी का धब्बा भी लग रहा है. 1994 में मानव अंग के व्यापार को गैरकानूनी घोषित किया गया था. हालांकि पारिवारिक सदस्यों द्वारा अंग डोनेट करने पर किसी तरह की बंदिश नहीं है. इसी का लाभ उठा कर फर्जी दस्तावेज बना कर डोनर के रूप में ग्रामीण इलाकों के गरीबों को पैसों का लालच दे कर डोनर बना दिया जाता है. देशभर में कई गिरोह मानव अंग तस्करी के काम में लगे हुए हैं. इस काम में देश के कुछ निजी अस्पताल के डाक्टर से ले कर नर्सिंग स्टाफ तक की मिलीभगत होती है. स्वास्थ्य मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार, हमारे देश में हर साल 1-2 लाख किडनी की जरूरत होती है.
वहीं, पूरे देश में विभिन्न तरह के अंगों के प्रत्यारोपण के लिए डोनर का इंतजार करने वालों की एक बहुत ही लंबी सूची है. ज्यादातर मरीजों का यह इंतजार कभी खत्म न होने वाला इंतजार बन कर रह जाता है. इंतजार ही इंतजार में बहुत सारे मरीजों की मौत हो जाती है. उन्हें डोनर नहीं मिलता. लेकिन वहीं विदेशी मरीज वीजा ले कर भारत आते हैं और अंग प्रत्यारोपण करवा कर लौट जाते हैं. माना जाता है कि अंग तस्करी से जुड़े एक बहुत बड़े रैकेट के कारण ही यह संभव हो पाता है. दिल्ली के एक निजी अस्पताल में मानव अंग (किडनी) की तस्करी का भंडाफोड़ हो चुका है. थौमसन रायटर्स फाउंडेशन के अनुसार, मानव अंग की तस्करी के मामले में अस्पताल प्रशासन ने भी स्वीकार कर लिया है कि अस्पताल में अनजाने में पीडि़तों के शरीर से अंगों को निकाला गया.
चिकित्सा का व्यावसायीकरण
‘‘दमा के इलाज के लिए दिल्ली के एक कौर्पोरेट अस्पताल गया था. जेब में 50 हजार रुपए थे. मैं ने सोचा कि दमे के इलाज में एक अच्छे अस्पताल में इस से ज्यादा क्या खर्च होगा. इतने में अच्छा इलाज हो जाएगा और मैं ठीक भी हो जाऊंगा. वहां जाने के बाद मुझे आईसीयू में भरती कर दिया गया. तमाम तरह की महंगी जांचें होने लगीं. दूसरे दिन मुझे पता चला कि आईसीयू का प्रतिदिन का चार्ज काफी ज्यादा है जो मेरे बजट से काफी ज्यादा है. अपने चिकित्सक से कहा कि मैं अब अच्छा महसूस कर रहा हूं, मुझे जनरल वार्ड में शिफ्ट कर दिया जाए. लेकिन मुझे 4-5 दिनों तक आईसीयू में ही रखा गया और ठीक 5वें दिन मुझ से 2.5 लाख रुपए जमा करने के लिए कहा गया. इतनी बड़ी रकम की मैं ने कल्पना तक नहीं की थी. बहुत विनती करने के बाद किसी तरह 1.5 लाख रुपए दे कर अस्पताल से मुक्त हुआ.’’
– एक भुक्तभोगी.
यह हाल हर जगह का भले न हो लेकिन 10 में से कम से कम 6 लोग इस तरह की समस्या से रूबरू हो चुके हैं. मरीज किसी अस्पताल में भरती तो अपनी मरजी से हो सकता है लेकिन वहां से बाहर निकल पाना उस के हाथ में नहीं होता. सोती हुई सरकार सब देखते हुए भी अनदेखी करती है क्योंकि बड़े अस्पतालों के कर्ताधर्ता पहले ही उन की आंखों पर रिश्वत की पट्टी बांध चुके होते हैं. चिकित्सा के व्यावसायीकरण ने इलाज का तरीका तथा स्टैंडर्ड चाहे जितना भी उम्दा क्यों न किया हो, किंतु इस में दो मत नहीं है कि स्वास्थ्यसेवा पूरी तरह व्यापार बन चुकी है. इसी मानसिकता के तहत अस्पताल खोले भी जा रहे हैं और इसी संस्कृति के तहत चलाए भी जा रहे हैं.
– डा. दीपक प्रकाश और साधना शाह

