अटल की विरासत

लंबी बीमारी के बाद भारतीय जनता पार्टी के दिग्गज नेता अटल बिहारी वाजपेयी का 93 वर्ष की आयु में निधन होने से देश ने एक लोकप्रिय नेता खो दिया. भारतीय जनता पार्टी यानी भाजपा को दूसरे दलों के लिए सहज बनाने में अटल बिहारी वाजपेयी का बहुत बड़ा योगदान रहा. भारतीय जनसंघ का स्वरूप असल में कट्टरवादी हिंदू का था जिसे कम्युनिस्ट, समाजवादी तो छोडि़ए, स्वतंत्र पार्टी जैसी पार्टियां भी सहज न ले पाती थीं पर अटल बिहारी वाजपेयी ने अपने सौम्य व मिलनसार व्यवहार से भारतीय जनसंघ के नए अवतार भारतीय जनता पार्टी को सब के लिए सहयोग करने योग्य बना दिया.

1977 में अटल बिहारी वाजपेयी के कारण ही कांग्रेस का एक हिस्सा, कम्युनिस्ट, समाजवादी, लोकदल और दूसरे कई एक मंच पर आए और उन्होंने इंदिरा गांधी को हराया ही नहीं, बल्कि आपातस्थिति को इस्तेमाल करने के संवैधानिक हथियार को सदासदा के लिए दफना भी दिया.

1977 से 1981 के दौरान राज में भागीदार होने के बाद भाजपा को 18 वर्षों तक इंतजार तो करना पड़ा पर अगर वह इन 18 वर्षों तक विपक्षी धुरी बनी रही तो अकेले अटल बिहारी वाजपेयी के ही कारण. वाजपेयी कट्टरवादी हिंदू संघ के होने के बावजूद दूसरों को भी सहज लेने में विश्वास करते थे और उन का व्यवहार दोस्ताना था.

आज जो भारतीय जनता पार्टी अपनेआप में दलितों, आदिवासियों और पिछड़ों को समेट पा रही है उस में बड़ी भूमिका अटल बिहारी वाजपेयी की डाली नींव की है. भाजपा नेता व प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी असल में इसी का लाभ उठा रहे हैं. नरेंद्र मोदी तो वास्तव में अटल बिहारी वाजपेयी की विरासत को नष्ट करने में लगे हैं. मौजूदा भाजपा व मोदी की नीतियों के चलते मुसलमान तो भयभीत हैं ही, दलित और पिछड़े भी रुष्ट हो चले हैं.

‘हार नहीं मानूंगा,

रार नहीं ठानूंगा’

के सिद्धांत को मानने वाले अटल बिहारी वाजपेयी ने हिंदूवादी पार्टी को बाधकों की पार्टियों के कट्टर चोले से निकाल कर उसे सब के लायक बनाया था और 1984 में केवल 2 सीटें लोकसभा में जीतने के बावजूद हार नहीं मानी और 1998 में फिर सत्ता पा ली, उस बार अपने दम पर.

2005 के बाद सक्रिय न रह कर अटल बिहारी वाजपेयी ने भारतीय राजनीति को कट्टरवादियों के हाथों में फिसल जाने दिया. 2004 में पार्टी की हार का मुख्य कारण अटल बिहारी वाजपेयी नहीं, वे कट्टरवादी थे जो

‘जरूरी यह है कि ऊंचाई के साथ विस्तार भी हो, जिस से मनुष्य ठूंठ सा खड़ा न रहे, औरों से घुलेमिले, किसी को साथ ले, किसी के संग चले’ के सिद्धांत में विश्वास नहीं करते. पार्टी के दूसरे नेताओं के अहं व अहंकार के कारण व रार पालने अर्थात बदले की भावना से काम करने की प्रवृत्ति ने पार्टी को 2004 व 2009 में पराजय दिलाई.

अटल बिहारी वाजपेयी भारतीय जनता पार्टी के लिए विरासत में बहुत सारी सोच दे गए हैं पर उन्हें उन के पीछे पैदल चलने वाले बंद संदूक में रखेंगे, यह पक्का है.

जीनियस : अति घटिया फिल्म

‘श्रद्धांजली’, ‘गदरःएक प्रेम कथा’ सहित कई सफल फिल्मों के सर्जक अनिल शर्मा की नई फिल्म ‘‘जीनियस’’ अति निराश करने वाली फिल्म है. ‘जीनियस’ देखकर अहसास होता है कि अनिल शर्मा बतौर लेखक व निर्देशक अब चुक गए हैं. फिल्म की टैग लाइन है-दिल की लड़ाई दिमाग से..मगर फिल्म में न दिल है और न दिमाग.

फिल्म की कहानी मथुरा में पले बढ़े अनाथ वासुदेव शास्त्री की है. जिसे हिंदी, संस्कृत व अंग्रेजी भाषा में महारत हासिल है. पढ़ाई में जीनियस है. वह आई आई टी का विद्यार्थी है. कौलेज में उसे एक बुद्धिमान लड़की नंदिनी (इशिता चौहान) से प्यार हो जाता है. वासुदेव शास्त्री को कम्प्यूटर हैकिंग में महारत हासिल है. इसी के चलते उसे रॉ के चीफ जयशंकर प्रसाद अपनी संस्था के साथ जुड़ने के लिए कहते हैं. कई बार मना करने के बाद महज आईएसआई के सफाए के लिए वह रॉ से जुड़ता है और उसे एक नई टीम दी जाती है.

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मगर हथियारों की चोरी की जांच करते हुए जब वह पोरबंदर पहुंचता है, तो वहां उसकी मुठभेड़ एमआरएस (नवाजुद्दीन सिद्दिकी) से होती है. जो कि एक डिजिटल कंपनी का मालिक है. जयशंकर प्रसाद से उसकी निजी दुश्मनी है, इसलिए वह आईएसआई के साथ भी हाथ मिला लेता है. इस बीच कई घटनाक्रम तेजी से बदलते हैं. पता चलता है कि एमआरएस से व आईएसआई के साथ रॉ के कुछ अफसर व देश के एक मंत्री भी जुड़े हुए हैं. अंततः वासुदेव शास्त्री के हाथों  मंत्री, रॉ के गद्दार अफसर व एमआरएस मारे जाते हैं. और वासुदेव शास्त्री को उसका प्यार मिल जाता है.

फिल्म ‘‘जीनियस’’ देखकर इस बात का अहसास नहीं होता कि इस फिल्म के लेखक व निर्देशक ‘गद रः एक प्रेम कथा’, ‘वीर’, ‘श्रद्धांजली’ फेम निर्देशक अनिल शर्मा ही हैं. बतौर लेखक व निर्देशक अनिल शर्मा इस फिल्म में बुरी तरफ से असफल हुए हैं. फिल्म के संवाद भी प्रभावहीन हैं और उनका यह दावा खोखला साबित होता है कि उन्होंने चार वर्ष अमेरिका जाकर पढ़ाई करते हुए अपने आपको नए सिरे से खोजने के बाद फिल्म ‘जीनियस’ की पटकथा लिखी है. मगर अफसोस की बात है कि कम्प्यूटर हैंकिंग को छोड़ दें, तो फिल्म में कुछ भी नयापन नहीं है. पूरी फिल्म की कहानी अनिल शर्मा की ही कई पिछली व अन्य फिल्मों का मिश्रण ही है.

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इतना ही नही अनिल शर्मा का दावा है कि वह और उनका बेटा उत्कर्ष शर्मा, जो फिल्म का हीरो है, दोनों विज्ञान के विद्यार्थी रहे हैं, पर उन्हे यह भी नहीं पता कि आईआईटी की प्रयोगशाला में रसायन शास्त्र की तरह केमिकल वाली प्रयोग शाला नहीं होती है. पूरे पौने तीन घंटे की फिल्म में कहानी शून्य है. इसे इतना लंबा बनाने की जरुरत भी नहीं थी. मगर पुत्र मोह में अनिल शर्मा फिल्म का जितना कबाड़ा कर सकते थे, उसे करने में कोई कसर बाकी नहीं रखी. फिल्म में बेवजह कहीं भी गाने ठूंसे गए हैं. मिथुन चक्रवर्ती व नवाजुद्दीन सिद्दिकी जैसे प्रतिभाशाली कलाकारों के किरदारों को ठीक से नहीं गढ़ा गया. पटकथा के स्तर पर फिल्म में कमियां ही कमियां हैं.

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जहां तक अभिनय का सवाल है तो वासुदेव शास्त्री के किरदार में उत्कर्ष शर्मा काफी कमजोर साबित हुए हैं. उन्हे अभी बहुत मेहनत करने की जरुरत है. उनके चेहरे पर ठीक से भाव ही नहीं आते. हीरोईन यानी कि नंदिनी के किरदार में इशिता चौहान का चयन भी गलत ही रहा. उन्हे अभिनय आता ही नहीं है. अकेले नवाजुद्दीन सिद्दिकी इस फिल्म को कितना आगे ले जाएंगे? अफसोस यह है कि फिल्मकार व लेखक ने तो नवाजुद्दीन के किरदार को कई जगह कैरीकेचर व मिमिक्री वाला बना दिया है.

दो घंटे  44 मिनट की अवधि वाली फिल्म ‘‘जीनियस’’ का निर्माण अनिल शर्मा ने दीपक मुकुट व कमल मुकुट के साथ मिलकर किया है. फिल्म के निर्देशक अनिल शर्मा,पटकथा लेखक अनिल शर्मा, सुनिल सिरवैया व अमजद अली, संगीतकार हिमेश रेशमिया और कलाकार हैं – उत्कर्ष शर्मा, इशिता चौहान, नवाजुद्दीन सिद्दिकी, आयशा जुल्का, मिथुन चक्रवर्ती, मालती चहर, देव गिल, जाकिर हुसेन, के के रैना, अभिमन्यु सिंह व अन्य.

हैप्पी फिर भाग जाएगी : जबरन भागती हैप्पी

2016 की मुदस्सर अजीज की सफल फिल्म ‘‘हैप्पी भाग जाएगी’’ की सिक्वअल फिल्म ‘‘हैप्पी फिर भाग जाएगी’’ पहली फिल्म का दोहराव ही है. सोनाक्षी सिन्हा के रूप में एक और हैप्पी और कहानी को पाकिस्तान की बजाय चीन ले जाना ही नयापन है. अन्यथा पहली फिल्म के मुकाबले यह फिल्म निराश करती है.

2016 की सफल फिल्म ‘‘हैप्पी भाग जाएगी’’ की सिक्वअल फिल्म ‘‘हैप्पी फिर भाग जाएगी’’ की कहानी शुरू होती है अमृतसर की ही दो हरप्रीत कौर उर्फ हैप्पी का चीन के शंघाई शहर जाने से. गुड्डू को एक साजिश के तहत चीन के शंघाई शहर के चाउ की तरफ से एक संगीत कार्यक्रम में गाने के लिए बुलाया जाता है. गुड्डू (अली फजल) अपने साथ अपनी प्रेमिका हरप्रीत कौर उर्फ हैप्पी (डायना पेंटी) को भी लेकर जाता है.

उधर दूसरी हरप्रीत कौर उर्फ हैप्पी (सोनाक्षी सिन्हा) अपने पिता की खुशी के लिए चीन में अपने मंगेतर अमन वाधवा (अपराशक्ति खुराना) को ढूढ़ने निकली है, इसके लिए उसने शंघाई शहर के विश्वविद्यालय में नौकरी के लिए आवेदन दिया है और उसे वहां पर बुलाया गया है. दोनों एक ही हवाई जहाज से शंई पहुंचते हैं. एअरपोर्ट से बाहर निकलते ही नाम की समानता के चलते चाउ के गुर्गे हरप्रीत कौर उर्फ हैप्पी (सोनाक्षी सिन्हा) को किडनैप कर लेते हैं. जबकि गुड्डू अपनी हैप्पी के साथविश्वविद्यालय पहुंच जाता है. जब चाउ को पता चलता है कि यह वह हैप्पी नहीं है, जिसकी उन्हे तलाश थी, तो वह अपने गुर्गे से कहकर अमृतसर में डोली चढ़े बग्गा (जिम्मी शेरगिल) और पाकिस्तान से उस्मान अफरीदी (पीयूष मिश्रा) को किडनैप करा लेते हैं.hindi movie review happy bhag jayegi

वास्तव में चाउ (बिजौय थांगजम) एक चीनी एजेंट है, जिसने पाकिस्तान के साथ चीन  सरकार के लिए एक व्यापारिक अनुबंध किया था. मगर अब वह अधर में लटक गया है. उसे पता है कि यह काम लाहौर में रह रहे राजनेता जावेद अहमद ही कर सकते हैं. जावेद अहमद पर हैप्पी व उस्मान अफरीदी दबाव डाल सकते हैं. उस्मान अफरीदी जावेद अहमद के करीब हैं और हैप्पी, जावेद अहमद के बेटे के करीब है.

चाउ के गुर्गों के चंगुल मे फंसी हैप्पी भाग निकलती है और उसकी मुलाकात भारतीय दूतावास में काम कर रहे खुशवंत गिल उर्फ खुशी (जस्सी गिल) से होती है. खुशवंत हैप्पी की मदद के लिए चाउ के पास जाता है. उसकी नजर में चाउ एक अच्छे व रुतबे वाले इंसान हैं. चाउ उन्हे मदद का भरोसा दिलाते हैं, मगर उसी वक्त अपने गुर्गों को हैप्पी को पकड़ने के लिए खुशवंत गिल के घर भेज देता है. पर हैप्पी उन्हे मारकर भगा देती है.

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इस बीच हैप्पी व खुशी को बग्गा और उस्मान अफरीदी का भी साथ मिल जाता है. एक तरफ हैप्पी को अमन वाधवा की तलाश है, तो दूसरी तरफ उसे उस हैप्पी की भी तलाश है, जिसके कारण वह फंसी हुई है. इधर चाउ, खुशी को गुमराह करता रहता है और उनकी मुसीबतें बढ़ाता रहता है. पर एक दिन हैप्पी को अमन वाधवा जेल में मिलता है. पता चलता है कि वह ‘गे’ है और अपने साथी के जेल में होने की वजह से वह भी जेल में है. उधर खुशी को चाउ की असलियत पता चल जाती है. काफी भागमभाग के बाद दोनों हैप्पी, गुड्डू, बग्गा आदि चीने से भारत के लिए रवाना होते हैं.

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जहां तक पटकथा व संवाद लेखन का सवाल है, तो पिछली फिल्म में मुदस्सर अजीज ने लेखन के लिए काफी तारीफ बटोरी थी, पर इस बार वह असफल रहे हैं. इस बार उनकी पटकथा व संवादों में परिपक्व लेखक की छाप नजर नहीं आती. मुदस्सर ने इस फिल्म में भी जिम्मी शेरगिल व पीयूष के बीच भारत व पाकिस्तान को लेकर ही हास्यव्यंग के संवाद रचे हैं. जो कि काफी हतोत्साहित करते हैं.

कुछ व्यंगात्मक हास्य व्यंग वाले संवाद अच्छे बन पड़े हैं. इंटरवल से पहले फिल्म दर्शकों को हंसाती रहती है, मगर इंटरवल के बाद निर्देशक फिल्म पर से अपनी पकड़ खो देते हैं. इतना ही नहीं तमाम दृश्यों को देखते हुए लगता है कि हैप्पी जबरन व बेवजह भाग रही है. एडीटिंग टेबल पर कसकर इसकी लंबाई कम करने की जरुरत थी.

इस बार फिल्म की कहानी के केंद्र में है वह हैप्पी है, जिसे सोनाक्षी सिन्हा ने बेहतर तरीके से निभाया है. डायना पेंटी और अली फजल के हिस्से ज्यादा कुछ करने को रहा नहीं. मगर एक बार फिर जिम्मी शेरगिल ने साबित कर दिखाया कि उनके अंदर अभिनय के कई रंग समाए हुए हैं. जिम्मी के तकिया कलाम वाले संवाद दर्शकों को काफी राहत देते हैं. मसलन-‘तू गिल है, तो मैं शेरगिल हूं.’ सोनाक्षी सिनहा के अभिनय से ज्यादा प्रभावशाली तो जिम्मी शेरगिल व पीयूष मिश्रा की जुगलबंदी है. पीयूष मिश्रा के अभिनय में काफी दोहराव नजर आता है. जस्सी गिल उम्मीदों पर खरे नहीं उतरते हैं.

फिल्म का गीत संगीत ठीक ठाक है. अब तक एक भी गाना लोकप्रिय नहीं हुआ है. दो घंटे 17 मिनट की अवधि वाली फिल्म ‘‘हैप्पी फिर भाग जाएगी’’ का निर्माण आनंद एल राय ने ‘इरोज इंटरनेशनल’ के साथ मिलकर किया है. फिल्म के लेखक व निर्देशक मुदस्सर अजीज, कैमरामैन सुनील पटेल, संगीतकार सोहेल सेन  तथा फिल्म के कलाकार हैं – अली फजल, डायना पेंटी, सोनाक्षी सिन्हा, जिम्मी शेरगिल, पीयूष मिश्रा, जस्सी गिल, अपराशक्ति खुराना, जासन थाम, बिजौय थांगजम व अन्य.

करीम मोहम्मद : आतंकवाद पर तमाचा

‘‘जमीर और जिंदगी के बीच किसे चुनेंगे?’’ के सवाल के साथ आतंकवाद पर तमाचा जड़ने वाली रोड ट्रिप प्रधान फिल्म ‘‘करीम मोहम्मद’’ में कश्मीर के हालातों को निष्पक्ष तरीके से पेश किया गया है. कश्मीर के अंदर आम जनता और आर्मी के बीच जो टकराव है, उसका भी सटीक चित्रण है. एक बालक के नजरिए से उठाए गए सवाल दर्शक को सोचने पर मजबूर करते है.

फिल्म की कहानी जम्मू और कश्मीर की पहाड़ियों पर घुमंतू/ खानाबदोश की जिंदगी जी रहे बकरवाल जाति के लोगों के इर्द गिर्द घूमती है. कहानी शुरू होती है बकरवाल होने पर गौरवान्वित महसूस करने वाले अशिक्षित हामिद (यशपाल शर्मा) से. जो कि अपने बेटे मोहम्मद (हर्षित राजावत) व पत्नी नाजनीन (अलका अमीन) के साथ दो घोड़ों पर अपना सामान बांधकर अपनी भेड़ बकरियों के साथ पहाड़ से नीचे उतर रहा है. क्योंकि ठंड शुरू हो गयी है और ठंड के बर्फीले मौसम में पहाड़ की उंचाईयों पर रहना संभव नहीं है.hindi film review kareem mohammad

हामिद पक्के देशभक्त होने के साथ इंसानियत में यकीन करते हैं. वह निडर हैं. सच के रास्ते पर चलते हैं. रास्ते में मोहम्मद एक नदी देखकर अपने पिता से एक दिन नदी के उस पार यानी कि पाकिस्तान की सीमा में जाने की बात करता है. तब हामिद उससे कहता है कि, ‘नदी के पार पड़ोसी मुल्क है. वहां जाना खतरे से खाली नहीं. इसलिए कभी मत जाना.’ इस पर बेटा मोहम्मद कहता है-‘हमारे यहां कोई पड़ोसी आता है, तो हम उसका स्वागत करते हैं.’ पिता कहता है कि, ‘बेटा तेरी समझ में नहीं आएगा. यह सरहद की लकीरों का मसला है.’’ और उसकी मां उसे डांटकर चुप करा देती है.

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हामिद पूरे परिवार के साथ आगे बढ़ता है. रास्ते में मोहम्मद अपने पिता से सवाल करता रहता है और हामिद उसे उसके सवालों के जवाब देता रहता है. एक सवाल पर हामिद अपने बेटे से कहता है कि यह कुदरत ही सब कुछ सिखाती है. यह परिवार गुर्जर बाबा की मजार पर फूल चढ़ाता है और मोहम्मद के कहने पर हामिद, गुर्जर बाबा की बहादुरी की कहानी सुनाते हैं कि किस तरह अकेले ही चार आतंकवादियों को अकेले ही मौत के घट उतारते हुए खुद भी मारे गए थे.

रात्रि विश्राम के बाद परिवार लगातार आगे बढ़ता रहता है. बीच में मोहम्मद के एक सवाल के जवाब में हामिद कहता है कि आतंकवादी शैतान की औलाद हैं. अन्यथा अल्लाह हर इंसान को किसी न किसी मकसद से धरती पर भेजता है. पर यह आतंकवादी उन्हे अल्लाह द्वारा तय समय से पहले ही धरती से विदा कर देते हैं. इस बीच हामिद की पत्नी नाजनीन गर्भवती हो जाती है. तो वह एक जगह बने मकान में डेरा डाल देते हैं. एक दिन रात्रि में रिजवान (राजेश जैस) उस वक्त इस घर में बंदूक के साथ घुसता है, जब हामिद व मोहम्मद घर से बाहर थे. रिजवान बताता है कि वह शरीफ युवक है और कालेज में पढ़ता है. आतंकवादी जबरन उसे अपने डेरे पर उठा ले गए थे और उसे मारपीट कर गलत राह पर ले जाना चाहते थे पर किसी तरह वह भाग आया है.

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हामिद, रिजवान को उसके माता पिता के पास पहुंचाता है. उसके बाद नाजनीन एक बेटी को जन्म देती है, जिसका नाम जूही रखा जाता है. अब हामिद पूरे परिवार के साथ अपनी बहन के घर की तरफ रवाना होता है. रास्ते में रात्रि में नदी से तीन आतंकवादी आते हैं, वह खुद को श्रीनगर निवासी और सिल्क के व्यापारी बताते हैं. हामिद उन पर यकीन कर लेता है. एक आतंकवादी के अंगूठे पर बह रहे खून को रोकने लिए नाजनीन पट्टी बांधती है. वह आतंकवादी उसे बहन बना लेते हैं. खाना भी खाते हैं. उसके बाद हामिद अपने परिवार के साथ बहन के घर पहुंचता है, जहां उनकी भांजी की शादी है. दिन में हामिद को महसूस होता है कि उसके जीजा ने कुछ आतंकवादियों को शरण दे रखी है. वह विरोध करता है. तो उसके जीजा उसे लेकर पूरे गांव वालों के पास जाते हैं.

गांव का सरपंच कहता है कि आतंकवादियों को शरण देने से उनका गांव आबाद है, उनके गांव पर आंच नहीं आती है. पर हामिद इसे गैरकानूनी बताता है. वह पुलिस कोसूचना देने की बात करता है. एक युवक आतंकवादियों को खबर कर देता है. आतंकवादी गोलियां बरसाते हैं. जिसमें हामिद व नाजनीन मारे जाते हैं. मोहम्मद अपनी बुआ से कहता है कि वह हमेशा अपने पिता हामिद की तरह जिंदगी की बजाय जमीर को चुनना चाहेगा. उसके बाद मोहम्मद, रिजवान के घर जाकर मदद मांगता है. रिजवान,मोहम्मद की बुआ को समझाता है और फिर पूरा गांव एक साथ इकट्ठा होकर आतंकवादियों के अड्डे पर हमला कर देते हैं.

आतंकवादियों को पुलिस की गिरफ्त मे देते हैं. मोहम्मद को उसकी वीरता के लिए पुरस्कृत किया जाता है. इस बीच गर्मी शुरू हो जाती है. फिर मोहम्मद अपनी बहनजूही को पीठ पर लादकर बकरवालों की तरह पहाड़ पर चढ़ना शुरू कर देता है.

कुछ कमियों के बावजूद फिल्म ‘‘करीम मोहम्मद’’ दर्शकों को सोचने पर मजबूर करती है. हामिद और मोहम्मद के इर्द गिर्द घूमती फिल्म इंटरवल से पहले धीमी गति से चलती है और शुष्क लगती है. पर इंटरवल के बाद फिल्म तेज गति से भागती है. तमाम घटनाक्रम तेजी से घटित होते हैं. मगर पटकथा के स्तर पर इंटरवल के बाद काफी कमियां हैं. यदि कहानी व पटकथा लेखक जीतेंद्र गुप्ता ने थोड़ी सी मेहनत की होती, तो यह एक बेहतरीन फिल्म बन सकती थी.

बतौर निर्देशक पवन कुमार शर्मा का प्रयास सराहनीय है. मगर वह भी वास्तविकता और आदर्शवाद के द्वंद में कुछ जगह उलझे हुए नजर आते हैं. फिल्म का अति आदर्शवादी अंत वर्तमान परिस्थितियों में फिल्म को वास्तविकता से दूर ले जाता है. पर वह अपनी फिल्म के माध्यम से आतंकवाद और हिंसात्मक राजनीति पर तमाचा जड़ते हुए सार्थक संदेश देने में सफल रहते हैं.

हामिद के किरदार में यशपाल शर्मा ने अपने सहज व स्वाभाविक अभिनय से जान फूंकी है. यशपाल शर्मा अपने बलबूते पर पूरी फिल्म को लेकर चलते हैं. मोहम्मद के किरदार में बाल कलाकार हर्षित बहुत ज्यादा उत्साहित नहीं करते. गीत संगीत ठीक ठाक है. लोकेषन नयनसुख देने वाली कमाल की है. फिल्म के कैमरामैन सुभ्रांष  कुमार दास बधाई के पात्र हैं.

एक घंटे 35 मिनट की अवधि वाली फिल्म ‘‘करीम मोहम्मद’’ का निर्माण रवींद्र सिंह राजावत ने ‘‘अनहद स्टूडियो प्रा.लिमिटेड’’ के बैनर तले किया है. फिल्म के लेखक जीतेंद्र गुप्ता, निर्देशक पवन कुमार शर्मा, कैमरामैन सुभ्रांष कुमार दास, संगीतकार बाल कृष्ण शर्मा और कलाकार हैं – हर्षित राजावत, यशपाल शर्मा, अलका अमीन,राजेश जैस, रवि जंगू, सुनील जोगी, जुही सिंह व अन्य.

ये पोर्न स्टार होंगे ‘बिग बौस 12’ के सबसे महंगे कंटेस्टेंट

एक बार फिर कौन्ट्रोवर्शियल शो ‘बिग बौस सीजन 12’ टीवी पर धमाल मचाने के लिए आ रहा है. जिसकी मेजबानी हर सीजन की तरह इस सीजन भी सलमान खान करते नजर आएंगे. हाल ही में मेकर्स ने इसका पहला प्रोमो रिलीज किया, जिसमें सलमान ने बताया कि यह सीजन विचित्र जोड़ियों से भरा होगा. खबरें गर्म हैं कि ब्रिटिश पोर्न स्टार डैनी डी और एक्ट्रेस माहिका शर्मा शो में एंट्री ले सकते हैं. दोनों बिग बौस के घर में कैद होने के लिए इतनी फीस चार्ज करेंगे, जिसे सुन आप हैरान रह जाएंगे.

मीडिया रिपोर्ट्स में कहा जा रहा है कि डैनी डी और माहिका शर्मा BB12 की सबसे महंगी जोड़ी होगी. दोनों को हर हफ्ते 95 लाख रुपये की फीस दी जा सकती है. खैर इस बात में कितनी सच्चाई है, यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा.

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सनी लियोन के बाद डैनी डी ऐसे दूसरे अडल्ट स्टार होंगे, जो सुपरस्टार सलमान खान के शो ‘बिग बौस’ का हिस्सा ले सकती है. ‘बिग बौस’ के अलावा डैनी डी फिल्मों में भी किस्मत आजमाने जा रहे हैं.

डैनी और माहिका अपने फिल्मी करियर की शुरुआत करने जा रहे हैं. फिल्म ‘द मौर्डन कल्चर’ में माहिका की जोड़ी पोर्न स्टार डैनी डी के साथ जमने वाली है. दोनों ही इस फिल्म के प्रोड्यूसर्स भी होंगे. फिल्म की घोषणा करते हुए माहिका ने कहा- “मैं ‘द मौर्डन कल्चर’ में गीता का किरदार निभा रही हूं. फिल्म की कहानी गीता नामक टिपिकल भारतीय लड़की पर आधारित होगी, जिसे लास एंजिलिस के हिसाब से ढलने में बेहद दिक्कतों का सामना करना पड़ता है. जैसे ही वह अपने प्यार के साथ भारत लौटती है, वैसे ही डैनी को भारतीय संस्कृति को समझने में मुश्किलें आती हैं.”

भारतीय का मतलब ही अहिंसक होना : राहुल गांधी

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने बुधवार को जर्मनी में कहा कि भारतीय का मतलब ही अहिंसक है. उन्होंने कहा कि नफरत का जवाब नफरत से देना उचित नहीं है. राहुल ने कहा कि मैं खुद हिंसा के दौर से गुजरा हूं.

राहुल ने कहा कि आतंकवादियों ने मेरे पिता और दादी की हत्या कर दी. लेकिन इससे आगे बढ़ने का एक ही रास्ता माफ करना है. जर्मनी के हैमबर्ग में बकिरस समर स्कूल के कैंपनजेल थियेटर में एक सवाल के जवाब ने राहुल ने ये बाते कहीं. उन्होंने कहा कि जब मेरे पिता को मारने वाले आतंकी की मौत हुई तो मैं खुश नहीं हुआ. क्योंकि मैंने खुद को उसके बच्चों में देखा. मैंने हिंसा को झेला है और मैं आपको बता सकता हूं कि इससे निकलने का एकमात्र तरीका है-माफ करना और माफ करने के लिए आपको यह समझना होगा कि ये कहां से आ रही है.

राहुल ने कहा कि संसद में मैंने जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को गले लगाया तो मेरी ही पार्टी के भीतर कुछ लोगों को यह अच्छा नहीं लगा. उन्होंने कहा कि नफरत का जवाब नफरत से देना सही नहीं है.

राहुल गांधी ने कहा, मैं उन्हें बताना चाहता था कि दुनिया इतनी भी बुरी नहीं है और मैं उनके गले लग गया. राहुल गांधी ने कहा, यही चीज महात्मा गांधी ने भी हमें सिखाई है. हैमबर्ग पहुंचे राहुल गांधी ने राज्यमंत्री और सांसद नील्स एन्नेन से भेंट की. राहुल ने इस दौरान जर्मन राजनीति, केरल की बाढ़, एवं नौकरियों के बारे में बातचीत की.

अमेरिका-चीन के साथ संतुलन बनाना जरूरी

राहुल ने कहा कि अमेरिका के साथ भारत के अहम सामरिक संबंध हैं और हम उनके साथ लोकतंत्र जैसे विचार साझा करते हैं. लेकिन चीन काफी तेजी से विकास कर रहा है और भविष्य में प्रभावी भूमिका निभाएगा. ऐसे में भारत को इन दो शक्तियों के बीच संतुलन बनाना होगा. उन्होंने यह भी कहा कि इसको संतुलित करने में भारत और यूरोप की भूमिका होगी.

छोटे उद्योगों को बढ़ावा देना होगा

राहुल ने कहा कि चीन से मुकाबला करना है तो छोटे और मध्यम उद्योगों को बढ़ावा देना होगा. उन्होंने कहा कि चीन एक दिन में 50 हजार नौकरियां देता है जबकि भारत में यह संख्या सिर्फ 400 है. उन्होंने कहा कि देश में रोजगार की समस्या है.

महिलाओं पर विचार को बदलना होगा

महिलाओं की सुरक्षा पर राहुल गांधी ने कहा कि देश में हिंसा का स्तर बढ़ रहा है और महिलाओं को आसानी से निशाना बनाया जाता है. उन्होंने कहा कि पुरुषों को महिलाओं पर अपने विचार को बदलने की जरूरत है. राहुल ने कहा कि राष्ट्र निर्माण के लिए महिलाएं एक महत्वपूर्ण पहलू हैं.

सभी को रोजगार मिले तो जनसंख्या समस्या नहीं

एक सवाल के जवाब में राहुल गांधी ने कहा कि अगर भारत में हम सभी लोगों को रोजगार दे पाते हैं, तो जनसंख्या अपने आप में कोई समस्या नहीं है.

बेमेल शादी : तकरार नहीं बढ़ाएं प्यार

संजना और राजीव की शादी अरेंज्ड थी और उन की शादी को अभी सिर्फ 5 महीने ही हुए थे कि उन के रिश्ते की नींव कमजोर पड़ने लगी थी. वे दोनों एकदूसरे के साथ किसी भी बात में तालमेल नहीं बैठा पा रहे थे. उन के बीच काफी मतभेद थे. दरअसल, संजना और राजीव की शादी बेमेल शादी थी जो उन पर जबरदस्ती थोप दी गई थी.

रिश्ता तय करते वक्त संजना के पिता ने लड़के वालों के बारे में अधिक जानकारी एकत्र नहीं की थी. संजना के पिता को सिर्फ इतना पता था कि लड़का काफी पढ़ालिखा है, प्राइवेट नौकरी करता है और पैसों के साथसाथ अपना घर भी है. संजना ससुराल गई तो शुरुआत में सबकुछ ठीकठाक चला लेकिन 5 महीने बाद राजीव का व्यवहार देख कर वह परेशान रहने लगी.

राजीव रोजरोज शराब पी कर आता और संजना को मारतापीटता. संजना जब भी राजीव को कहीं चलने को कहती तो वह साफ मना कर देता. वह जो भी काम करती, राजीव उसे करने नहीं देता. इस सब से तंग आ कर एक दिन वह अपने मायके चली गई. बाद में उसे पता चला कि राजीव एक बदनाम, आवारा किस्म का लड़का था.

ऐसी बेमेल शादी सिर्फ संजना और राजीव की ही नहीं हुई, अकसर ऐसी बेमेल शादियां देखने को मिलती हैं. दरअसल, शादी का रिश्ता प्यार, विश्वास, कमिटमैंट और आपसी तालमेल पर टिका होता है. यह एक ऐसा समूह है जिस में 2 लोग एकदूसरे से जुड़े होते हैं जो पूरी जिंदगी प्यार करने के साथसाथ कई परीक्षाओं, उतारचढ़ावों से भी गुजरते हैं. जो लोग अपने बीच के मतभेद को दूर कर अपनी योग्यता और दृढ़ इच्छाशक्ति से कठिनाइयों से पार पाने की कोशिश करते हैं उन की बेमेल शादी भी सफल बन जाती है.

मैरिजथैरेपिस्ट द काउंसिलिंग इंस्टिट्यूट यानी टीसीआई, दिल्ली की साइकोलौजिस्ट, तुलिका भंडारी कहती हैं, बेमेल शादियां अरेंज्ड और लव मैरिज दोनों में ही होती हैं लेकिन अरेंज्ड मैरिज में इस की संभावना अधिक होती है. ऐसा इसलिए क्योंकि अरेंज्ड मैरिज में लड़के या लड़की के स्वभाव, पसंदनापसंद को 2-4 दिन में नहीं जाना जा सकता.

बेमेल शादी या रिश्ते में मतभेद तभी पैदा होते हैं जब आप न चाहते हुए भी दबाव में आ कर किन्हीं गलत कारणों से या फिर दूसरों की इच्छाओं को पूरा करने के लिए शादी करने को मजबूर हो जाते हैं.

बेमेल शादी की मुख्य वजहें हैं :

मातापिता और रिश्तेदारों का दबाव: लड़कियां या लड़के अपने मातापिता या अन्य परिवार के सदस्यों को खुश करने के लिए ऐसा कर बैठते हैं. खासकर लड़कियां भावनाओं में बह कर ऐसा कदम उठा लेती हैं.

बढ़ती उम्र का दबाव : इन्कौंपैटिबल मैरिज यानी असंगत विवाह का यह दूसरा कारण है, जिस में उम्र आड़े आ जाती है. इस का भी असर लड़कियों पर ज्यादा होता है क्योंकि उन का दिमाग बारबार यह संकेत या आभास कराता रहता है कि आप की उम्र बढ़ रही है और न तो आप को अच्छा लड़का मिलेगा और न ही अधिक उम्र हो जाने पर आप की हैल्दी प्रैग्नैंसी होगी. ऐसे में आप पर भी बढ़ती उम्र व शादी का दबाव पड़ने लगता है और जिसे आप जानतीसमझती नहीं उस से शादी कर बैठती हैं.

आर्थिक दबाव : कई मातापिता या स्वयं लड़की अपनी मरजी से ऐसे घर में शादी करने को तैयार हो जाती है जो आर्थिक रूप से मजबूत होता है. लड़की सोच बैठती है कि उसे वहां वे सारे ऐशोआराम मिलेंगे जिन से वह अब तक वंचित थी. पर वह यह भूल जाती है कि पैसों से किसी का प्यार नहीं पाया जा सकता.

बेमेल शादी में तालमेल

शादी बिलकुल नई कार खरीदने जैसी होती है. शुरुआत में तो इस की गाड़ी तेज रफ्तार से दौड़ती है पर समय के साथसाथ जैसेजैसे आगे बढ़ती है, रफ्तार धीमी हो जाती है. कई तरह के नियम व शर्तें रिश्ते में अप्लाई होने लगते हैं. हालांकि ऐसा सभी के साथ नहीं होता पर जहां आपसी तालमेल की कमी है वहां ऐसा संभव है.

  1. यदि आप अपनी शादी टूटने नहीं देना चाहते तो सब से पहले आप दोनों में जो फर्क, असमानताएं हैं उन्हें समझ कर कम करने की कोशिश करें
  2. शादी के बाद कई तरह की अड़चनें आती हैं पर इस का यह मतलब नहीं कि आप अपने पार्टनर को अपने हिसाब से जीने के लिए मजबूर कर दें. ध्यान रखें, आप एकदूसरे को जितना मौका और समय देंगे उतना ही आप का रिश्ता प्रगाढ़ होगा. कई बार कुछ लोग स्वभाव से अंतर्मुखी होते हैं. ऐसे में उन पर तुरंत अपनी इच्छाओं और मरजी को थोपना सही नहीं है. थोड़ा वक्त दें. वे आप की बात जरूर समझेंगे.
  3. यदि आप अपनी बेमेल शादी को बचाए रखना चाहते हैं तो आपस में जुड़ाव स्थापित करने की कोशिश करें. एकदूसरे की पसंदनापसंद को तवज्जुह दें, एकसाथ बैठ कर बातें करें, कहीं बाहर घूमने जाएं.
  4. भले ही आप की शादी किसी मोटे और साधारण से लड़के से हो गई हो पर जरूरी नहीं कि वह दिल से भी बुरा हो. आप सोचिए कि क्या उन का कोई दोस्त नहीं, क्या उन्हें और भी लोग प्यार नहीं करते. बस, सोच में फर्क है. क्या आप ने कभी यह सोचा है कि अनजाने में आप के साथ कोई ऐसी घटना घट जाए जिस से आप की खूबसूरती में दाग लग जाए और आप के पति भी आप को बीच राह में छोड़ दें. ऐसी स्थिति में आप क्या करेंगी? इसलिए बाहरी खूबसूरती को ज्यादा महत्त्व न दें.
  5. जब आप किसी व्यक्ति के साथ अपनी पूरी जिंदगी गुजारने का फैसला करते हैं तो रिश्ते में सिर्फ शारीरिक खूबसूरती ही नहीं बल्कि कई अन्य महत्त्वपूर्ण बातें माने रखती हैं. दरअसल, किसी भी रिश्ते को लंबे समय तक चलाने के लिए तालमेल या अनुकूलता मुख्य भूमिका निभाते हैं.
  6. अपने पार्टनर की जीवनशैली और उस के रुटीन के कार्यों को मैनेज करने का तरीका जानें. इस से आप को इस बात की जानकारी मिलेगी कि उस की जीवन शैली के अनुसार अपने को कैसे ढालना है.

– नीतू गुप्ता

बच्चों की परवरिश में न बरतें लापरवाही

बढ़ती महंगाई के चलते शहरी तो दूर देहाती इलाकों के लोग भी कमानेखाने में इतने मसरूफ हो चले हैं कि हर कोई कम से कम बच्चे पैदा कर रहा है. लोगों में परिवार नियोजन के प्रति जागरूकता भी आ रही है कि इस से नुकसान तो कोई नहीं पर फायदे कई हैं.

यह बदलाव का वह दौर है जिस में गांवदेहात से बड़ी तादाद में बेहतर जिंदगी और सहूलियतों के लिए लोग शहर की तरफ भाग रहे हैं. इस भागमभाग से किसे क्या हासिल होता है, यह दीगर बात है. पर एक अच्छी बात इस में यह है कि छोटे और गरीब तबके के लोग भी बच्चों की अहमियत सम?ाते हुए उन्हें बेहतर तालीम दिलाने के लिए जीजान से कोशिश करते हैं और परवरिश पर भी खूब ध्यान देते हैं.

परेशानी उन लोगों को उठानी पड़ रही है जिन की महीने की आमदनी मात्र 5-6 हजार रुपए के आसपास है. यह तबका शहरी आबादी का तकरीबन 40 फीसदी है. गृहस्थी चलाने और बच्चे पालने के लिए मियांबीवी दोनों को हाड़तोड़ मेहनत करनी पड़ती है तब कहीं जा कर उन का गुजारा हो पाता है. जैसेजैसे इन के बच्चे बड़े होते हैं वैसेवैसे खर्चे भी बढ़ने लगते हैं.

इन गरीब बच्चों की बदहाली कभी किसी सुबूत की मुहताज नहीं रही. इन में और अमीर बच्चों में एकलौती समानता यह है कि दोनों के मांबाप दिन में घर पर नहीं रहते. काम या नौकरी पर चले जाते हैं. अमीर तो बच्चों की देखभाल के लिए नौकर रख लेते हैं पर गरीब नहीं रख पाते. लिहाजा, उन के बच्चे प्रकृति के भरोसे पलते हैं और यह भरोसा अकसर महंगा साबित होता है जिस में बच्चों का कोई कुसूर नहीं होता.

बच्चों, खासतौर से बच्चियों की हिफाजत को ले कर देशभर में बवाल मचा हुआ है. उन के साथ अपराध बढ़ रहे हैं जिस को ले कर देशभर में जगहजगह विरोध दर्ज हो रहा है, धरनेप्रदर्शन हो रहे हैं और समाज के जागरूक लोग चिंतित भी हैं.

एक हादसा, कई सबक

किसी का ध्यान इस तरफ नहीं जा रहा है कि मांबाप भी बच्चों की तरफ से इतने लापरवा हो चले हैं कि कई दफा बच्चों की जान पर बन आती है और देखनेसुनने व भुगतने वाले तक इसे एक हादसा समझ कर अहम गलती ढंक लेते हैं.

एक दुखद हादसा भोपाल के कोटरा सुल्तानाबाद इलाके की गंगानगर बस्ती की 3 बच्चियों की 25 अप्रैल को हुई मौतों का है. 7 वर्षीय शालिनी उर्फ शालू, पिता टिंकू जगत, 7 वर्षीय सुभाषिनी, पिता संन्यासी धुर्वे और 9 वर्षीय कमला, पिता किशोर नेताम अपने घर वालों के साथ नेहरूनगर इलाके गई थीं जहां एक सरकारी योजना के तहत बन रहे मकान इन्हें मिलने थे. इन के साथ इन की 2 और सहेलियां, रेशमा और निर्जला भी थीं. साथ आए लोग तो मिलने वाले घर को देख आने वाले कल के सुनहरे ख्वाबों में डूब गए कि उन्हें जल्द पक्का मकान मिल जाएगा जिस में सारी सुविधाएं होंगी पर पांचों बच्चियां खेलतेबतियाते नजदीक ही कलियासोत बांध पहुंच गईं. गंगानगर बस्ती के बाशिंदों की मानें तो ये पांचों पक्की सहेलियां थीं और एकसाथ खेलती व उठतीबैठती थीं.

बांध के पास पहुंचते ही इन पांचों की इच्छा पानी में खेलने की हुई और एकाएक ही शालिनी का पैर फिसल गया. वह डूबने लगी. चिल्लाने पर कमला उसे बचाने दौड़ी, उस ने शालिनी के बाल पकड़ उसे खींचने की कोशिश की पर खुद भी पानी में डूब गई. दोनों को डूबता देख घबराई सुहासिनी भी उन्हें बचाने पहुंची और डगमगा गई. नतीजतन, देखते ही देखते तीनों पानी में डूब कर मर गईं.

रेशमा और निर्जला ने बजाय डूबती सहेलियों को बचाने के ओर दौड़़ लगाई और लोगों को हादसे के बारे में बताया. लोग आए लेकिन जब तक तीनों बच्चियां डूब चुकी थीं. खबर आग की तरह भोपाल में फैली और गंगानगर बस्ती तो देखते ही देखते मातम में डूब गई. आलम यह था कि 3 नन्ही बच्चियों की अकाल मौत पर हर कोई रो रहा था. कमला की मां लीला सदमे में आ कर बारबार चिल्ला रही थी कि मेरे कलेजे के टुकड़े को वापस ला दो, मैं उस के बगैर जी नहीं पाऊंगी. रोतेरोते वह बेहोश हो कर गिर पड़ी. यही हाल बाकी दोनों बच्चियों की मां का भी था.

पुलिस वालों ने जैसेतैसे तीनों की लाशें बरामद कीं और उन का अंतिम संस्कार कर दिया गया. तीनों बच्चियों के मांबाप इतने गरीब थे कि उन के पास बेटियों के कफन के लिए पैसे नहीं थे. चंदा इकट्ठा कर उन का अंतिम संस्कार किया गया.

पुलिस वाले उस वक्त दिक्कत में पड़ गए जब तीनों के घर वाले पोस्टमार्टम न होने देने पर अड़ गए. बहुत सम?ानेबु?ाने और राहत मिलने का वादा किया गया तब कहीं जा कर लाशों का पोस्टमार्टम हो पाया.

हादसा बेशक दुखद है लेकिन इस में मांबाप की लापरवाही साफ दिख रही है. इन्हें मालूम था कि नेहरूनगर के पास ही गहरा कलियासोत बांध है जिस में आएदिन लोग डूब कर मर जाते हैं फिर भी उन्होंने बच्चियों पर ध्यान नहीं दिया.

बच्चों की परवरिश से ताल्लुक रखता लापरवाही का यह पहला मौका नहीं था. भोपाल समेत देशभर में आएदिन ऐसे हादसे होते रहते हैं. कहीं बच्चा करंट लगने से मर जाता है तो कहीं खेलतेखेलते गड्ढे में गिर कर मर जाता है. मौत के बाद दुखी मांबाप अपना गम भुला कर फिर कमानेखाने में लग जाते हैं पर कोई ऐसे हादसों से यह सबक नहीं सीखता कि बच्चों की हिफाजत उन का फर्ज है. किसी भी तरह की लापरवाही जानलेवा साबित हो सकती है.

ऐसे हादसों की बढ़ती तादाद देख जरूरी यह लगने लगा है कि मांबाप को भी इस बात का एहसास कराया जाए कि हादसों में बच्चों की मौत पर उन्हें बख्शा नहीं जाएगा.

बात कहने, सुनने, सम?ाने में कड़वी जरूर है पर है मांबाप के भले की जो बड़े अरमानों से औलादों को पालते हैं, उन के भविष्य के सपने देखते हैं और उन्हीं के लिए मेहनत से पैसा कमाते हैं. पर जब बच्चे ही नहीं रहेंगे तो इस से फायदा क्या?

बात अमीरी और गरीबी की नहीं बल्कि बच्चों की जिंदगी की है जिस की भरपाई पैसे या सरकारी इमदाद से पूरी नहीं हो सकती. बात बच्चों के जीने के हक की भी है जिस की जिम्मेदारी आखिरकार बनती तो मांबाप की ही है. लापरवाही या अनदेखी अगर यह हक छीनती है तो उस से कब तक मुंह मोड़े रखा जाएगा. पैसा एक बड़ी कमी है पर एहतियात बरतने में तो कुछ खर्च नहीं होता.

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