मुंहबोले रिश्तों में शादी

‘आप तो हिंदू लगते हो. करीबी और मुंहबोली रिश्तेदारियों में शादियां तो मुसलिमों में होती हैं…’

उत्तर भारत के एक बड़े हिस्से में इस तरह की सोच देखने को मिलती है, जबकि ऐसा नहीं है कि यह सब हिंदू धर्म में नहीं होता. हिंदू धर्म के भीतर भी इस तरह की कई परंपराएं हैं और इन में कुछ गलत नहीं है, लेकिन ऐसे मसलों पर यहां एक बड़ा तबका मरनेमारने को उतारू हो जाता है.

दरअसल, यह हमारी कमअक्ली का नतीजा है. इस के अलावा यह भी सच है कि आज ऐसा समय है जब हिंदू धर्म को ले कर एक खास तरह की संस्कृति थोपने की कोशिश की जा रही है और इस से अलग हर बात को पश्चिमी संस्कृति या मुसलिमों से जोड़ कर खारिज करने की कोशिश की जा रही है.

ऐसे समय में यह जानना बेहद जरूरी है कि उत्तर भारत ही पूरा देश नहीं है और वही सही नहीं है जो हम जानते या मानते हैं.

आप यह भी जान लीजिए कि उत्तर भारत में भी शादीब्याह को ले कर कोई एक तरह की मान्यता या परंपरा नहीं है.

पहला हक इन का चाय की दुकान पर महाराष्ट्र के एक नौजवान लोकेश जाधव से मुलाकात हुई. लोकेश ने बताया कि उस की शादी उस के सगे मामा की बेटी से हुई है.

यह सुन कर हमारी बगल में बैठे कुछ नौजवानों में कानाफूसी शुरू हो गई. वे नौजवान बोलचाल से हरियाणा के लग रहे थे और लोकेश की तरह ही शायद घूमने के इरादे से वे भी जयपुर आए थे.

तिलक  लगाए और शिव की तसवीर वाली टीशर्ट पहने बैठे नौजवान के मुंह से बहन के साथ शादी की बात उन्हें अजीब लगी.

आखिरकार एक नौजवान ने कहा, ‘‘आप तो हिंदू लगते हो. इस तरह की शादियां तो मुसलिमों में होती हैं.’’

लोकेश जाधव ने हैरानी जताई और कहा, ‘‘हमारे यहां यह मामूली बात है. मेरे मामा ने कहा तो इनकार करना नैतिकता भी नहीं थी. मेरी सरकारी नौकरी लगी तो मेरी मां ने ही कह दिया था कि तुझ पर पहला हक तेरे मामा की बेटी का ही बनता है.’’

मुझे कोई हैरानी नहीं हुई. कई साल पहले केरल जाते हुए रेलगाड़ी में आंध्र प्रदेश के एक नौजवान वेंकट से मेरी मुलाकात हुई थी. लंबे सफर में सीटें एकसाथ होने की वजह से हमारी थोड़ी जानपहचान हो गई थी.

वेंकट की नईनई सरकारी नौकरी लगी थी और उस की पोस्टिंग एर्नाकुलम में थी. अगले महीने उस की शादी थी.

मैं ने कहा कि दहेज बटोरेगे, तो वह बोला कि बहन की बेटी से शादी है. मैं ज्यादा दबाव नहीं दे सकता. सरकारी नौकरी लगी है तो रिश्ते खूब आ रहे हैं, लेकिन पहला हक बहन की बेटी का ही है.

मैं ने इस बात का जिक्र करते हुए अपने इलाके के नौजवानों से कहा कि हिंदू धर्म कोई एक चीज नहीं है. इस में हजार परंपराएं मौजूद हैं. अच्छाबुरा, पवित्रअपवित्र हर जगह वही नहीं होता जो हमें किसी खास दायरे में पैदा होने के साथ घुट्टी की तरह पिला दिया जाता है.

रेलगाड़ी में ही एक बार एक ईरानी नौजवान फैसल मिला था. कजन से शादी की परंपरा का जिक्र आने पर उस ने बताया था कि मौसी की बेटी से शादी नहीं की जा सकती, क्योंकि मौसी तो मां ही ठहरी.

शायद हमारे इलाके में मुसलिमों में खाला के बेटाबेटी से शादी की मनाही नहीं है.

उस ईरानी नौजवान फैसल को हिंदी में सहज हो कर बातचीत करते देख कर मैं हैरान रह गया था, जबकि वह 3 महीने से ही भारत में था.

फैसल के मुताबिक, उसे अमिताभ बच्चन और शाहरुख खान की फिल्मों ने हिंदी सिखाई है. मतलब यह कि वह ईरान में कंप्यूटर पर हिंदी फिल्में जम कर देखा करता था.

आंध्र प्रदेश के मेरे एक दोस्त ने अपनी बड़ी बहन की बेटी से शादी की थी और बताया था कि वहां यह मामूली बात है.

हैरानी तब होती है, जब 5 पतियों की एक पत्नी द्रौपदी और ब्रह्मा की अपनी लड़की सरस्वती से शादी को पवित्रता और मान्यता देने वाले नखरे दिखाते हैं.

मेरे एक परिचित राजपाल दहिया के मुताबिक, ‘‘15 साल पहले परिवार के साथ केरल जाने का मौका मिला. एक महिला ने स्वागत किया. घर चलने का आदेश हुआ. एक घर में ले जा कर बैठा दिया गया. चायपकौड़े लाए गए. परिचय होने पर होस्ट महिला ने अपने मम्मीपापा से मिलाया.

‘‘थोड़ी देर में एक नौजवान आया और बोला कि चलो, घर पर खाना तैयार है.

‘‘हम ने होस्ट महिला से पूछा कि कहां?

‘‘उस ने कहा कि मेरी ससुराल में.

‘‘कितनी दूर? पूछने वह बोली कि 100 मीटर.

‘‘ये कौन हैं? पूछने पर जवाब मिला कि पति.

‘‘बूआ का बेटा, वह भी ब्राह्मण.’’

मेरे एक और परिचित कुमार सत्येंद्र बताते हैं, ‘‘भारतीय नौसेना में नौकरी करने के दौरान मैं ऐसे संबंधों का गवाह रहा हूं और बिहारी होने के चलते कुछ हैरान भी हुआ था. पर ऐसे संबंध

उन राज्यों के लिए बहुत ही मामूली बात हैं.’’

मेरे मुसलिम दोस्त अनवर अली कहते हैं, ‘‘हर जगह अलगअलग परंपराएं, मान्यताएं और रिवाज हैं. सभी को अपनीअपनी तरह से रहना पसंद है. रहनसहन, खानपान अलगअलग हैं. उन्हें एक सा नहीं बनाया जा सकता.

‘‘अनेकता में एकता भारत की शान रही है, जिसे कुछ लोग खत्म करना चाहते हैं. सभी धर्मों और रिवाजों का आदर करना जरूरी है.’’

अनिरुद्ध शर्मा बताते हैं, ‘‘केरल में मामाभांजी की शादी की प्रथा तो सैकड़ों सालों से है. हमारी दिक्कतें असल में यहीं से शुरू हो जाती हैं, जब हम उत्तर भारत को ही सारा जहां मान बैठते हैं.’’

विजयशंकर चतुर्वेदी बताते हैं, ‘‘कर्नाटक में वधू के मांबाप वर के साथ रहने चले आते हैं, जबकि गायपट्टी में बेटी के घर का पानी भी पीना हराम है.’’

कौशल किशोर बताते हैं, ‘‘उन्नाव और उस के पड़ोसी हरदोई, लखनऊ, रायबरेली, कन्नौज, कानपुर वगैरह जिलों में यादवों व कई पिछड़ी जातियों और कई दलित जातियों में सगे मामा की बेटी से शादी होना आम बात है.

‘‘मेरे गांव के पुराने रिश्तों में इस की तादाद आधे से भी ज्यादा होगी. यादवों में दिशा वाली शर्त होती है, जैसे बेटी की शादी पश्चिम और बेटे की शादी पूरब में. दूसरे लोगों में यह शर्त नहीं है.’’

नरेश सैनी बताते हैं, ‘‘हरियाणा में तो इस तरह की शादियां आम बात हैं. सगी मौसी व सगी बूआ की बेटी से शादी. सामान्य वर्ग व अनुसूचित परिवारों में ऐसी बहुत सी शादियों में मुझे खुद जाने का मौका मिला है.’’

कुछ दिन पहले ही 12वीं पास कर चुकी मेरी एक छात्रा की शादी उस की सगी बूआ के बेटे से हुई है. इस में हिंदूमुसलिम वाली कोई बात नहीं है.

इस सिलेब्रिटी डिजाइनर के बेटे को डेट कर रही हैं अनन्या पांडे

बौलीवुड अभिनेता चंकी पांडे की खूबसूरत बेटी अनन्या पांडे जल्द ही बौलीवुड में डेब्यू करने जा रही हैं. उन्हें लेकर आएं दिन कुछ ना कुछ खबर आती रहती है. अब खबर है कि अनन्या सिंगल नही हैं. बेशक ये खबर आपका दिल तोडने वाली है क्योंकि ऐसा लगता है कि अनन्या पहले ही रिलेशनशिप में हैं. ऐसा हम नहीं कह रहे बल्कि मीडिया में आईं कुछ रिपोर्ट्स कह रही हैं.

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, अनन्या इस समय मशहूर फैशन डिजाइनर मोनिका जयसिंह के बेटे करण जयसिंह को डेट कर रही हैं. इन दोनों की मुलाकात अपने परिवार के जरिए ही हुई. कहा जाता है कि दोनों के परिवारों के काफी अच्छे ताल्लुकात हैं. बात केवल यहीं तक नहीं है बल्कि ऐसा भी सुनने में आ रहा है कि अनन्या की कजिन अलाना पांडे भी रिलेशनशिप में हैं और वह करण के बड़े भाई युवराज जयसिंह को डेट कर रही हैं.

अनन्या और करण की तस्वीरें भी सोशल मीडिया पर मौजूद हैं. करण ने अपने इंस्टाग्राम अकाउंट पर अनन्या और अन्य दोस्तों के साथ मौजमस्ती करते हुए फोटो शेयर कर चुके हैं.

हालांकि इससे इनकी रिलेशनशिप कन्फर्म नहीं होती लेकिन इतना तो है ही दोनों के कौमन फ्रेंड्स हैं. अब अगर इन खबरों में सच्चाई है तो जल्द ही इन दोनों को पब्लिक में भी एक साथ देखा जा सकता है.

व्हाइट कालर्स को पसंद ब्लैक ब्यूटी

देह व्यापार की दुनिया में दखल और दिलचस्पी रखने वाला भोपाल का कोई बिरला शख्स ही होगा जो सना को न जानता हो. भोपाल की इस महिला की अपनी एक पहचान है, क्योंकि वह कालगर्ल्स और कस्टमर के बीच पुल का काम करती है. सना के पास हजारों उन लड़कियों के मोबाइल नंबर हैं, जो पार्ट या फुल टाइम देह व्यापार के जरिए पैसे कमाना चाहती हैं.

सना के पास हजारों ऐसे ग्राहकों के भी नंबर हैं, जिन्हें कभीकभार सैक्स सर्विस की जरूरत पड़ती है. ये लोग बेहतर जानते हैं कि भोपाल में मनपसंद लड़की अगर कोई मुहैया करा सकता है तो वह केवल सना ही है.

सना कई खूबियों की मालकिन है, और उस की इन खूबियों को भोपाल के लोग ही नहीं पुलिस वाले भी जानते हैं. भोपाल में लंबे अर्से से सैक्स रैकेट चला रही सना ने पुलिस को छकाने का नया तरीका खोज निकाला है, वह भोपाल में ही ठिकाने बदलबदल कर अपना धंधा चलाती है. 4-6 महीने में वह पहला ठिकाना छोड़ कर दूसरे पर जा बैठती थी.

इस साल फरवरी के महीने में सना ने निशातपुरा इलाके के विश्वकर्मा नगर को चुना था, जहां से कभी भोपाल शहर शुरू होता था. विश्वकर्मा नगर में मध्यमवर्गीय लोगों की भरमार है जो शराफत और सुकून की जिंदगी जीते हैं.

भोपाल के होशंगाबाद रोड निवासी और पेशे से ट्रांसपोर्टर रमेश शर्मा ने सना को विश्वकर्मा नगर स्थित अपना मकान साढ़े 5 हजार रुपए महीना किराए पर दिया था. तब उन्हें इल्म तक नहीं रहा होगा कि खुद को अकेली और बेसहारा बता रही यह खूबसूरत बला उन्हें किस झमेले में डालने वाली है.

बीती 11 मई की अलसुबह भोपाल गरमी और उमस से बेहाल था. जब आसमान से उजाला उतरने लगता है, तब पुलिस थानों में ड्यूटी बजा रहे पुलिसकर्मी भी अंगड़ाइयां लेते हुए सोचते हैं कि चलो आज की रात बगैर किसी भागदौड़ी के गुजर गई. सुबह 5 बजे तक अगर किसी संगीन वारदात की खबर न मिले तो पुलिस वाले बेफिक्र हो जाते हैं, क्योंकि इस वक्त से ले कर दोपहर 12 बजे तक जुर्म न के बराबर होते हैं.

निशातपुरा थाने के टीआई चैन सिंह भी चैन की सांस लेते हुए घर जाने की सोच रहे थे, तभी उन के पास सीएसपी लोकेश सिन्हा का फोन आया. फोन पर मिले निर्देशानुसार वे तुरंत पुलिस टीम के साथ विश्वकर्मा नगर की तरफ रवाना हो गए.

लोकेश सिन्हा की बातों से उन्हें इतना ही समझ में आया था कि विश्वकर्मा नगर के एक मकान में देह व्यापार चल रहा है, जिस में कुछ विदेशी युवतियां भी शामिल हैं.

लोकेश सिन्हा को यह शिकायत विश्वकर्मा नगर के एक संभ्रांत और जिम्मेदार नागरिक ने दी थी. मामला चूंकि गंभीर और देह व्यापार का था, इसलिए उन्होंने अपनी टीम में थाने में मौजूद महिला पुलिसकर्मियों को भी शमिल कर लिया.

पुलिस टीम जब बताए हुए ठिकाने पर पहुंची तो मकान की कुंडी बाहर से बंद थी, जो मोहल्ले वालों ने बंद कर दी थी. दरवाजा खोल कर पुलिस टीम अंदर पहुंची तो वहां का नजारा देख कर सकते में आ गई.

6 युवतियां और 5 पुरुष ब्लू फिल्मों जैसी आपत्तिजनक अवस्था में एकदम जंगली और वहशियाना तरीके से सैक्स कर रहे थे. शायद पुलिस वालों ने भी अप्राकृतिक सहवास के ऐसे दृश्य पहली दफा देखे थे. सैक्स के इस खेल में कोई बंदिश नजर नहीं आ रही थी.

अप्रत्याशित रूप से पुलिस टीम को आया देख कर इन युवक युवतियों में दहशत और अफरातफरी मच गई. हर कोई अपने आप को ढकने की कोशिश में लग गया. 2 लड़कियां तो चादर में मुंह छिपा कर सो गईं.

पुलिस टीम ने वक्त न गंवा कर काररवाई शुरू की तो मौजूद युवक हिम्मत जुटा कर बहसबाजी पर उतर आए. उन का कहना था कि वे अपने एक दोस्त की बर्थडे पार्टी मनाने के लिए इकटठा हुए थे और रात ज्यादा हो जाने के कारण यहीं रुक गए थे.

इस के अलावा उन्होंने यह कह कर भी पुलिस पर दबाव बनाने की कोशिश की कि वे पतिपत्नी हैं, पतिपत्नी के बीच यूं दखल देने का हक पुलिस को भी नहीं है. लेकिन जब पुलिस वालों ने पतिपत्नी होने के सबूत मांगे तो उन की सिट्टीपिट्टी गुम हो गई.

बाकी 9 लोग तो कपड़े पहन कर लाइन में खड़े हो गए, लेकिन मुंह ढक कर सोई 2 युवतियां चुपचाप चादर ओढ़े बिना हिलेडुले पड़ी रहीं. पुलिस वालों ने जब चादर हटाई तो उन्हें देख चौंक गए, क्योंकि वे अफ्रीकन थीं, जिन्हें लोग नीग्रो भी कहते हैं. इधर पुलिस ने युवक युवतियों के भागने का कोई रास्ता नहीं छोड़ा था इसलिए वे हल्ला मचाने के बाद खामोशी से आगे की काररवाई का इंतजार करने लगे.

पूछताछ के पहले मकान की तलाशी की औपचारिकता में आपत्तिजनक सामग्री बरामद हुई, जिन में कंडोम, नशे की सामग्री और सैक्स पावर बढ़ाने वाली दवाइयां भी थीं. अब शक की कोई गुंजाइश नहीं रह गई थी कि देह व्यापार की खबर गलत नहीं थी.

उस में विदेशी युवतियों के लिप्त होने की बात भी सच थी. आपत्तिजनक सामान जब्त करने के बाद पुलिस ने आरोपियों से पूछताछ शुरू की तो पता चला कि इस सैक्स रैकेट की सरगना सना नाम की चर्चित महिला है.

युवकों के नाम अनवर मछली, बुधवारा निवासी सादिक और फैजान खान के अलावा कोहेफिजा निवासी जैद, आयाज खान व तलैया निवासी सलमान खान थे.

रमजान का पाक महीना शुरू होने से पहले ही ईद मना रहे इन युवाओं के बाद जब 4 देसी और 2 विदेशी कालगर्ल्स से पूछताछ की गई तो कुछ नई बातें भी उजागर हुईं. सना तो खामोशी से आगे की सोचती रही, लेकिन अफ्रीकन युवतियों ने खुद को युगांडा का नागरिक बता कर अपने वीजा पर आने की बात कबूली.

भोपाल की 3 लड़कियों ने भी सच उगलने में ही भलाई समझी कि वे पेशेवर कालगर्ल्स हैं और भोपाल के होटलों व बार में डांस करती हैं. डांस करते करते ही वे ग्राहक फंसाती थीं और उन के मोबाइल नंबर ले कर बाद में सौदेबाजी करती थीं.

शुरुआती पूछताछ में भी पता चला कि हर एक लड़की को एक रात के लिए 1500 रुपए से ले कर 5000 रुपए मिलने थे. जबकि युगांडाई युवतियों को कुछ ज्यादा रकम मिलनी थी, क्योंकि वे बिना किसी हिचक के अप्राकृतिक और ओरल सैक्स भी करती थीं.

भोपाल में युगांडा की ये कालगर्ल्स कटारा हिल्स जैसे पौश इलाके में रह रही थीं और पिछले 2 महीनों से सना की सरपरस्ती में देह व्यापार कर रही थीं. ये दोनों मुंबई से भोपाल अपनी एक हमवतन युवती से मिलने आई थीं. चूंकि पैसों की जरूरत थी, इसलिए वे जिस्म फरोशी के धंधे में आ गई थीं.

ये दोनों बहुत फिल्मी तरीके से सना के संपर्क में आई थीं. आमतौर पर अफ्रीकी यानी नीग्रो लोग सार्वजनिक स्थलों पर दिखने से बचने की कोशिश करते हैं तो इस की कई दीगर वजहें भी हैं. लेकिन इन्हें कभी कभार खानेपीने गांधीनगर स्थित एक रेस्टोरेंट में जाना पड़ता था, जहां उन की जानपहचान जैद नाम के शख्स से हुई.

जैद की पहल पर इन की दोस्ती एक अन्य युवती से हो गई. इसी युवती ने इन दोनों को देह व्यापार में आने के लिए राजी किया.

पकड़ी गई भोपाली युवतियों ने इस का राज भी यह बता कर खोल दिया कि भोपाल में इन दिनों अफ्रीकन लड़कियों के शौकीनों की तादाद बढ़ रही है. इस के पीछे मर्दों की यह सोच है कि अफ्रीकन यानी काली लड़कियां सैक्स में माहिर होती हैं और अप्राकृतिक व ओरल सैक्स से परहेज नहीं करतीं. इस के अलावा इन के सामान्य से बड़े आकार के स्तन भी पुरुषों को बहुत लुभाते हैं.

एक कालगर्ल का कहना था कि मर्द जो कुछ ब्लू फिल्मों में देखते हैं, वह खुद भी वैसा ही करना चाहते हैं. लेकिन आमतौर पर देसी कालगर्ल्स इस तरह के जंगली सैक्स से परहेज करती हैं, इसलिए युगांडाई युवतियों को फंसाया गया या राजी किया गया, कहना मुश्किल है. हां, सैक्स में प्रयोग का यह शौक पांचों युवकों को महंगा पड़ा.

सना के बयान इस मामले में काफी अहम थे, जिस ने यह तो माना कि उस के संपर्क में कई लड़कियां थीं, इन में भी कालेज गर्ल्स खास तादाद में हैं. ये लड़कियां फुल टाइम देह व्यापार नहीं करतीं बल्कि महीने में एकदो दफा सर्विस देती हैं.

वे एक दो दिन ही सना के ठिकाने पर रुकती थीं और पैसा मिल जाने पर चली जाती थीं. बारबार सना की मोहताजी से बचने के लिए ये लड़कियां ग्राहकों से उन के मोबाइल नंबर ले कर उन की मांग के मुताबिक सर्विस देती थीं.

सना ने यह भी बताया कि उस के पास आने वाली अधिकांश लड़कियां भोपाल के आसपास के शहरों की होती थीं, हालांकि उन में कुछ भोपाल की भी थीं.

यह मानने से उस ने एकदम इनकार कर दिया कि वह या उस की नियमित कालगर्ल्स कालेजों और दूसरी सार्वजनिक जगहों पर जा कर लड़कियों को देहव्यापार के लिए उकसाती या फंसाती थीं. उस के मुताबिक यह मरजी और जरूरत का सौदा था. जिस में उस का रोल केवल एक मध्यस्थ का हुआ करता था.

भोपाल के होटलों व बार में डांस करने वाली बाकी 3 लड़कियां अपने लिए खुद ग्राहक फंसातीं, या ढूंढती थीं, इन में से चूंकि अधिकांश के पास खुद का कोई ठिकाना नहीं होता था, इसलिए वे अपने ग्राहकों को सना के ठिकाने पर ले आती थीं.

जब युगांडा की कालगर्ल्स की और छानबीन की गई तो पता चला कि वे मैडिकल वीजा पर भारत आई थीं. इन में से एक को पथरी थी और दूसरी को एलर्जी की शिकायत. भारत आने पर इन्होंने मैडिटेशन सीखने की बात कही थी. पर ये किस तरह का ध्यान लगा या लगवा रही थीं, यह 11 मई की सुबह उजागर हो गया.

पकड़ी गई कालगर्ल्स ने यह भी बताया कि अप्राकृतिक और ओरल सैक्स के चलते सना की दुकान लगातार गुलजार हो रही थी, जिसे उस ने पावर पौइंट का नाम दिया था. सना ग्राहकों की मर्दाना ताकत आजमाने के लिए कहती थी कि जो मर्द इन अफ्रीकन लड़कियों को संतुष्ट कर देगा वही असली और सच्चा मर्द है.

पांचों सच्चे और असली मर्द जो आपस में दोस्त भी हैं, अब हवालात और अदालत के चक्कर काट रहे हैं. पुलिस युगांडा के दूतावास से युगांडाई युवतियों के बाबत उन के देश से जानकारियां इकट्ठा कर रही है.

हालफिलहाल यह आशंका निर्मूल साबित हुई कि देहव्यापार के अलावा वे किसी और तरह से भी संदिग्ध हैं. इन पंक्तियों के लिखे जाने तक कटारा हिल्स में रहने वाली युगांडा की ही तीसरी युवती फरार हो जाने के कारण गिरफ्तार नहीं हो पाई थी, जिस के यहां ये दोनों कालगर्ल्स आ कर ठहरी थीं.

पढ़ाने से परहेज करते ज्यादातर टीचर

गुरु की महिमा का बखान करने का रिवाज हमारे समाज में बहुत पुराना है. लेकिन यह कड़वा सच है कि आजकल सीधेसच्चे गुरु कम व गुरुघंटाल ज्यादा दिखते हैं.

स्कूलकालेजों में पढ़ाने वाले बहुत से गुरुओं या टीचरों का बुरा हाल है. वे भी खुद को ऐसे गुरु मानते हैं, जिन्हें पूजा जाए, पर काम करने को न कहा जाए. टीचर मोटी तनख्वाह व भरपूर छुट्टियां जैसी सहूलियतें लेते हैं, लेकिन इस के बावजूद ज्यादातर टीचर अपने काम को सही ढंग से अंजाम नहीं देते हैं.

ज्यादातर टीचर अपने घर के आसपास तैनाती को तरजीह देते हैं, ताकि वे दूसरे कामधंधे कर सकें. वे खासतौर पर दूरदराज के इलाकों में जाना ही नहीं चाहते. जहां रहते हैं, वहां पढ़ाते नहीं, इसलिए पढ़ाईलिखाई की बुनियाद लगातार कमजोर हो रही है.

टीचरों द्वारा मन लगा कर न पढ़ाने के चलते बहुत से बच्चे पढ़ेलिखे हो कर भी नाकाबिल रह जाते हैं. इस से बेरोजगारों की भीड़ बढ़ रही है.

बहुत से टीचर मौका मिलते ही पढ़ाना छोड़ कर क्लासों में सो जाते हैं. बीड़ी, सिगरेट, पानतंबाकू, गुटका व शराब जैसी नशीली चीजों का सेवन करते हैं. पैसे के लालच में पेपर आउट व नकल कराते हैं. वजीफे बांटने में हेराफेरी व गड़बड़ी करते हैं.

कई टीचर सारी हदें पार कर छात्रछात्राओं से जोरजबरदस्ती करने तक से भी बाज नहीं आते हैं.

बेशक सारे टीचर ऐसे नहीं हैं, पर बहुत से हैं जो सारे टीचर समाज को बदनाम करते हैं. हैरत की बात है कि अच्छे माने जाने वाले व हड़ताल के लिए हमेशा तैयार रहने वाले टीचर व उन के संगठन कुसूरवार टीचरों को सुधारने या सबक सिखाने की दिशा में कभी कोई कारगर कदम नहीं उठाते हैं.

क्या है वजह

टीचरों द्वारा पढ़ाने में दिलचस्पी न लेने की एक बड़ी वजह उन का निकम्मापन व ट्यूशन का बढ़ता कारोबार है. इस के अलावा भाईभतीजावाद, सिफारिश व घूस के बल पर बहुत से ऐसे नाकाबिल लोग भी टीचरों की जमात में शामिल हो गए हैं, जो खुद किसी लायक नहीं हैं.

पिछले दिनों टीचरों के ऊपर सोशल मीडिया में वायरल हुआ एक वीडियो खूब सुर्खियों में रहा था. उस में एक पत्रकार ने गांवदेहात के इलाकों में चल रहे स्कूलों में पढ़ाने वालों की पोल खोली थी.

उस वीडियो में केवल टीचर ही नहीं, बल्कि कई प्रिंसिपल भी देश के प्रधानमंत्री, प्रदेश के मुख्यमंत्री व देश की राजधानी तक का नाम भी नहीं बता सके थे.

चंद नामी, बेहद महंगे प्राइवेट स्कूलों को छोड़ कर ज्यादातर सरकारी व निजी स्कूलों की हालत अच्छी नहीं है. इन में पढ़ाने वालों की हालत तो और भी ज्यादा खराब है.

दरअसल, एक बार नौकरी मिल जाने के बाद ज्यादातर टीचरों पर कोई देखरेख या निगरानी नहीं होती है. शिक्षा अधिकारी भी सिर्फ खानापूरी के लिए कागजों में ही चेकिंग करते हैं.

पहले सभी टीचर रोज अपनी डायरी लिखते थे कि किस क्लास में कबक्या पढ़ाया था. प्रिंसिपल उसे चैक करते थे, लेकिन अब यह चलन ही नहीं रहा.

ऐसे टीचरों की गिनती कम नहीं है जो पैसे कमाने के लिए अपनी सारी इज्जत को ताक पर रख कर नाजायज काम करने से भी नहीं चूकते हैं.

पिछले दिनों जब आधारकार्ड के जरीए जांचपरख हुई तो 80,000 से भी ज्यादा टीचर 2-2 जगह से तनख्वाह लेते पकड़े गए. इस के अलावा कई टीचरों के नाम पेपरलीक कांड व नकल कराने के ठेके लेने में आए थे.

करते दूसरे कामधंधे

दरअसल, बहुत से टीचर ट्यूशन व कोचिंग समेत और भी बहुत से दूसरी तरह के कामधंधों में लग जाते हैं. ऐसे बहुत से टीचर देखे जा सकते हैं जो तनख्वाह को बोनस या पैंशन मानते हैं. वे पढ़ाना छोड़ कर धड़ल्ले से खेतीबारी, कारोबार या नेतागीरी करते रहते हैं.

दूरदराज के गंवई इलाकों में चल रहे बहुत से स्कूलों में तो ज्यादातर टीचर रोज पढ़ाने के लिए जाते ही नहीं हैं. ऐसे भी बहुत से टीचर हैं जो सिर्फ हाजिरी लगाने के लिए स्कूल जाते हैं, इस के बाद वे वहां से लापता हो जाते हैं.

खराब हैं हालात

टीचरों की कामचोरी का सीधा नुकसान बच्चों को उठाना पड़ता है. वे पढ़ाई में कमजोर रह कर फेल हो जाते हैं. इस के अलावा उन के मांबाप को भी माली नुकसान भुगतना पड़ता है.

सरकारी स्कूलों की खस्ता हालत देख कर ज्यादातर मांबाप अपने बच्चों को प्राइवेट स्कूलों में दाखिला कराते हैं. वहां पढ़ाना अब हर आम इनसान के बस की बात नहीं रह गई है, क्योंकि निजी स्कूलों में मांबाप को फीस वगैरह के नाम पर तरहतरह से लूटा जाता है.

पढ़ाईलिखाई को बढ़ावा देने के नाम पर सरकारें पानी की तरह पैसा बहा रही हैं. दोपहर को भोजन भी खिला रही हैं, लेकिन क्या इस से अनपढ़ों व कमपढ़ों की गिनती कम हुई?

टीचरों की शिकायत है कि सरकारें अकसर उन्हें चुनाव, जनगणना व वोट बनाने जैसे दूसरे कामों में लगा देती हैं इसलिए वे अपना काम ठीक से नहीं कर पाते हैं. आमतौर पर टीचर कम होने व क्लासों में ज्यादा बच्चे होने से भी वे पूरा ध्यान नहीं दे पाते हैं.

उपाय भी हैं

राजकाज चलाने वाले ओहदेदारों के बच्चे खूब महंगे व बढि़या स्कूलों में पढ़ते हैं इसलिए वे मौजूदा शिक्षा व्यवस्था के हालात व उस का लैवल देखने की जरूरत ही नहीं समझते. सरकारी स्कूलों के हालात काफी बदतर हैं. गंवई इलाकों में हालात और भी ज्यादा खराब हैं.

देश की तकरीबन 80 फीसदी आबादी कम आमदनी होने के चलते अपने बच्चों को महंगी तालीम नहीं दिला पाती है, इसलिए उन्हें सरकारी स्कूलों का मुंह ताकना पड़ता है.

नेता, अफसर व धर्मगुरु सब यही चाहते हैं कि ज्यादातर लोग अनपढ़ रहें ताकि वे उन का मुकाबला न करें व उन्हें आसानी से उल्लू बनाया जा सके, इसलिए सरकार के भरोसे रहने से कुछ हासिल होने वाला नहीं है. अब तो हर बस्ती के बाशिंदों का जागरूक होना जरूरी है. वे एकजुट हों और खुद जा कर देखें कि कहां, कौन व कितने टीचर तैनात हैं? इस के अलावा बच्चों से भी टीचरों के बारे में फीडबैक लेना चाहिए.

तालीम के नाम पर खर्च हो रहा पैसा करदाताओं की मेहनत का है, इसलिए हर जिम्मेदार नागरिक को आगे आना चाहिए. थोड़ा वक्त निकाल कर अपने गलीमहल्ले में पास के सरकारी स्कूल में जाना चाहिए. वहां यह देखना जरूरी है कि कितने टीचर रोज वक्त से आतेजाते हैं? वे क्या और कैसा पढ़ाते हैं?

अगर पढ़ाने वालों पर निगाह, निगरानी, शिक्षा विभाग का सोशल आडिट व सूचना के अधिकार की नकेल हो तो सुधार जरूर होगा.

प्राइवेट नौकरियों ने बढ़ाए लड़कियों के रोजगार

लड़कियां पढ़ाई में तेजी से आगे आ रही हैं. ऐसे में अब उन के लिए नौकरियों के मौके बढ़ रहे हैं. वे सरकारी नौकरियों के साथसाथ प्राइवेट नौकरियां भी करने लगी हैं. उन्हें प्राइवेट नौकरियां इसलिए भी लुभा रही हैं, क्योंकि शादी के बाद नौकरी छोड़ना आसान होता है.

सरकारी नौकरियों की आस छोड़ कर लड़कियों ने जब से प्राइवेट नौकरियों की तरफ रुख करना शुरू किया है तब से उन के लिए रोजगार के मौके बढ़ गए हैं. छोटेबड़े शहरों में बहुत तेजी से प्राइवेट स्कूल, नर्सिंगहोम, शौपिंग माल और तमाम तरह के संस्थान खुल रहे हैं. इन में टीचर, नर्स, सेल्सगर्ल वगैरह के रूप में लड़कियों को नौकरियां मिल रही हैं.

इस के लिए जरूरी है कि वे टीचर टे्रनिंग कोर्स, नर्सिंग कोर्स और पर्सनैलिटी निखारने के लिए कोर्स कर लें. जिस लड़की को टीचर बनना है, वह अगर बीऐड कर ले तो पढ़ाने की नौकरी मिलना आसान हो जाता है.

इस में छोटे से छोटा स्कूल भी शुरुआत से ही 4,000 से 5,000 रुपए हर महीने देने लगता है, जबकि अच्छा स्कूल 10,000 से ऊपर तनख्वाह देना शुरू करता है.

टीचिंग का कैरियर लड़कियों के लिए पहले से ही बहुत अच्छा रहा है और अब तो इस में आगे बढ़ने के मौके भी खूब हो गए हैं.

नर्स बनने के लिए नर्सिंग की टे्रनिंग करना जरूरी होता है. अब तो इस के लिए कई प्राइवेट संस्थान भी खुल गए हैं. अगर कोई लड़की किसी संस्थान से ट्रेनिंग नहीं ले सकती है तो वह किसी अच्छे नर्सिंगहोम में भी इस काम को सीख सकती है. वहां वह जो सीखती है उसी के आधार पर उसे अच्छी तनख्वाह मिल सकती है.

छोटेबड़े शहरों और कसबों में रोज खुल रहे शौपिंग माल, शोरूम और मल्टीप्लैक्स भी रोजगार का एक अच्छा साधन बन गए हैं. वहां पर खूबसूरत और पढ़ीलिखी लड़कियों को सेल्सगर्ल और असिस्टैंट की नौकरियां मिल जाती हैं.

देह से मजबूत कम पढ़ीलिखी लड़कियों को सिक्योरिटी गार्ड वगैरह की नौकरी मिलने के मौके बढ़ रहे हैं. अगर कोई लड़की खिलाड़ी है या उस ने एनसीसी वगैरह की ट्रेनिंग ले रखी है, तो उसे ऐसी नौकरी में प्राथमिकता मिलती है.

शौपिंग माल में ऐंट्री गेट पर औरतों की तलाशी लेने के लिए लड़कियों को बतौर सिक्योरिटी गार्ड खूब नौकरियां दी जा रही हैं.

आज पर्यटन उद्योग भी बढ़ रहा है. इस के चलते शहरों में बड़े होटल तेजी से खुल रहे हैं. उन में भी लड़कियों को नौकरियां मिलने लगी हैं. होटल में वेटर, रिसैप्शनिस्ट और असिस्टैंट के रूप में लड़कियां नौकरी कर रही हैं. इस के लिए कोर्स भी कराया जाता है.

आज के दौर में होटलों में नौकरियों को अच्छा माना जाता है. लड़कियों के लिए यह कैरियर बहुत इज्जत का माना जाता है. पर्यटन उद्योग बढ़ने से हैल्थ क्लब भी बड़ी तेजी से खुल रहे हैं. ब्यूटीशियन, डाइटीशियन, योग टीचर और जिम ट्रेनर के रूप में भी उन्हें अच्छी नौकरियां मिल रही हैं.

‘मिस यूपी’ रह चुकी खुशबू गुप्ता कहती हैं, ‘‘मैं ने जिम ट्रेनर के रूप में नौकरी शुरू की थी. तब मुझे बहुत अच्छा लगा था.’’

क्षेत्रीय फिल्मों के बनने और फैशन शो के बढ़ते दायरे ने मौडलिंग, डांस, ऐक्टिंग सीखने वाली लड़कियों के लिए भी रोजगार के रास्ते खोल दिए हैं. मास कम्यूनिकेशन करने वाली लड़कियों के लिए प्रिंट मीडिया और इलैक्ट्रौनिक मीडिया में नौकरी करने के मौके बहुत ज्यादा हैं.

प्रचार अधिकारी के रूप में प्राइवेट कंपनियां भी उन्हें नौकरी दे देती हैं. अगर नौकरी न भी करनी हो तो भी फ्रीलांस लेखन कर के पैसा कमाया जा सकता है.

जब से स्कूलों में डांस, कंप्यूटर वगैरह की पढ़ाई को अनिवार्य कर दिया गया है तब से डांस या कंप्यूटर सीख चुकी लड़कियों के लिए रोजगार के मौके बढ़ गए हैं.

शहरों में फैशन डिजाइनिंग सिखाने वाले स्कूल भी तेजी से बढ़ रहे हैं. जिन लड़कियों ने फैशन डिजाइनिंग सीखी है, वे वहां पर नौकरी तो कर ही रही हैं, पर अगर वे नौकरी नहीं करना चाहें तो अपना खुद का बुटीक खोल कर कमाई कर सकती हैं.

नौकरी के मामले में इस बात का ध्यान रखें कि जिस संस्थान में आप नौकरी करने जा रही हैं, वह कैसा है, उस का मालिक कैसा है, आप को जो तनख्वाह दी जा रही है, वह कितनी है. कुछ लड़कियां मेहनत के बजाय

दूसरे गलत रास्तों से कामयाबी हासिल करना चाहती हैं. इस से बचना चाहिए और अपने काम से ही काम रखना चाहिए.

मायावती : 2019 के चुनावों में बड़ी ताकत

दलित तबका सामाजिक तौर पर भले ही हाशिए पर हो, पर राजनीतिक रूप से वह सत्ता हासिल करने का जरीया बन सकता है. यही वजह है कि हर राजनीतिक दल दलितों का करीबी दिखने की होड़ में लगा है.

लोकसभा की 544 सीटों में से 131 सीटें दलित तबके के लिए रिजर्व्ड हैं. साल 2014 में भाजपा को मिली कामयाबी में भी दलित तबके का खास हाथ था. तब लोकसभा की 131 रिजर्व्ड सीटों में से 65 सीटों पर भाजपा ने जीत हासिल की थी.

2019 के आगामी लोकसभा चुनाव में ये सीटें काफी खास हैं. भाजपा का इन रिजर्व्ड सीटों पर प्रदर्शन दोहरा पाना मुश्किल है. भाजपा का साथ दे कर दलित नेता उदित राज, सावित्री बाई फुले, रामदास अठावले और रामविलास पासवान काफी हद तक अपनी पुरानी इमेज को खो चुके हैं. अब दलित तबके में उन की पुरानी साख नहीं रह गई है.

लिहाजा, दलित नेताओं में मायावती खुद को मजबूत विकल्प के रूप में सामने रख कर दलित वोट बैंक को दोबारा खुद से जोड़ने की कवायद में जुट गई हैं.

दलित तबके को एक मजबूत नेता के साथ जुड़ कर ही अपना भला होता दिखता है. ऐसे में बसपा ने मायावती को प्रधानमंत्री के रूप में पेश करना शुरू कर दिया है.

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में कार्यकर्ता सम्मेलन का आयोजन कर इस बात को समझाया गया. इस सम्मेलन में बसपा प्रमुख मायावती शामिल नहीं थीं. वहां पार्टी के महासचिव और कोऔर्डिनेटर वीर सिंह समेत कई बड़े नेताओं ने मायावती को प्रधानमंत्री बनाने की बात कही.

राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और जोनल कोऔर्डिनेटर जय प्रकाश सिंह ने भीम आर्मी जैसे दूसरे दलित संगठनों को मायावती का साथ देने की बात कही.

जय प्रकाश सिंह ने अपने भाषण में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ‘गब्बर’ कह दिया. कांग्रेस के नेता राहुल गांधी पर भी टिप्पणी कर दी. सम्मेलन के बाद मायावती को प्रधानमंत्री के रूप में पेश किया गया.

लोकसभा चुनावों को ले कर बसपा बूथ लैवल पर अपनी रणनीति तैयार कर चुकी है. वह चाहती है कि नेताकार्यकर्ता बिना किसी प्रचार के काम करते रहें. प्रमोशन में रिजर्वेशन और दलित ऐक्ट के सहारे बसपा दलितों को एकजुट करने का काम कर रही है.

बसपा का कैडर अपने वोट बैंक को यह समझाने का काम कर रहा है कि रिजर्वेशन तब तक है, जब तक मायावती और बसपा मजबूत रहेगी, इसलिए बसपा के लोग मायावती को देवी तक बताने का काम कर रहे हैं.

लेकिन मायावती को लगता है कि इन बातों का विरोधी दुष्प्रचार न करने लगें इसलिए वे इन बातों को मीडिया से दूर रखने की बात कर रही हैं. वे नहीं चाहती हैं कि उन के प्रचार की बातें मीडिया और विपक्षी लोगों में जाएं.

भाजपा का दुष्प्रचार

कार्यकर्ता सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के खिलाफ टिप्पणी करने वाले राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और जोनल कोऔर्डिनेटर जय प्रकाश सिंह को मायावती ने बसपा से बाहर कर दिया.  बसपा ने रामजी गौतम को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाया.

बसपा प्रमुख मायावती को सोशल मीडिया पर हुआ प्रचार भी पसंद नहीं आया. बसपा ने इसे अपनी पार्टी के खिलाफ दुष्प्रचार मानते हुए गलत बताया. यही नहीं, बसपा ने साफ कर दिया है कि सोशल मीडिया पर वे सक्रिय नहीं हैं.

मायावती ने पार्टी कार्यकर्ताओं को बताया कि उन को किसी तरह के दुष्प्रचार का हिस्सा नहीं बनना है. इस वजह से मीडिया में किसी भी तरह की बयानबाजी पर भी रोक लगा दी गई.

मायावती ने कहा कि चुनावी तालमेल जैसे संवेदनशील मुद्दों पर पार्टी पदाधिकारी कुछ न बोलें. इस तरह की किसी भी टिप्पणी को अनुशासनहीनता माना जाएगा. पार्टी हाईकमान ही इस बारे में आखिरी फैसला करेगा.

दरअसल, मायावती की असली चिंता भाजपा का काम करने का तरीका है. भाजपा के पास किसी भी बयानबाजी पर पलटवार करने की ताकत है. भाजपा का प्रचारतंत्र केवल अपनी पार्टी के नेताओं की इमेज को निखारने का काम ही नहीं करता है, बल्कि वह दूसरे दलों का दुष्प्रचार भी करता है.

कांग्रेस नेता राहुल गांधी की ‘पप्पू इमेज’ इस का बेहतर उदाहरण है. सपा नेता अखिलेश यादव को ‘टोंटी चोर’ प्रचारित किया गया.

मायावती खुद और बसपा को इस तरह के दुष्प्रचार का मौका नहीं देना चाहतीं. इस वजह से उन्होंने अपने नेताओं को चुप रहने की सीख दे दी है.

मायावती ने कार्यकर्ताओं से कहा है कि भाजपा ने राजनीतिक वातावरण को काफी खराब कर दिया है. यह पार्टी लांछन वाली राजनीति करने पर उतारू है. ऐसे में जरूरी है कि बसपा के नेता और कार्यकर्ता बोलने में संयम बरतें. बसपा की पहचान सेना की तरह अनुशासन में बने रहने की है. इस के जरीए ही बाबा साहब के सपनों को पूरा किया जा सकता है.

प्रधानमंत्री बनने का सपना

मायावती के मन में प्रधानमंत्री बनने का सपना साल 2009 के लोकसभा चुनाव से पल रहा है. तब बसपा के महासचिव सतीश मिश्रा ने इस की कोशिश भी शुरू की थी. पर तब लोकसभा में बसपा को मनचाही कामयाबी नहीं मिली थी. तब कांग्रेस ने बसपासपा को साथ ले कर डाक्टर मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बना दिया था और 2014 तक सरकार चलाई थी.

साल 2019 के आगामी लोकसभा चुनाव में जब बसपा नेताओं ने मायावती को प्रधानमंत्री बनने का सपना दिखाया तो वे सचेत हो गईं. उन को लगा कि कहीं भाजपा इस को आधार बना कर दूसरे दलों से दूरियां न बना दे.

ऐसे में मायावती ने अपने नेताओं और कार्यकर्ताओं को कहा है कि वे इस तरह का प्रचार न करें.

दरअसल, मायावती को यह पता है कि चुनाव से पहले इस तरह की बातोेंसे कोई फायदा नहीं होगा, उलटे नुकसान होने का डर ज्यादा है.

साल 2019 का लोकसभा चुनाव भाजपा के लिए बहुत अहम है. उत्तर भारत के राज्यों में उस को अपना पुराना प्रदर्शन दोहरा पाना मुमकिन नहीं दिख रहा है. ऐसे में बहुमत की सरकार बनाने की उम्मीद कम है.

कांग्रेस भी तालमेल की राजनीति पर जोर दे रही है. ऐसे में प्रधानमंत्री बनने का सपना दल के सांसदों की तादाद के बल पर निर्भर करेगा.

इस के अलावा 2 बड़े दलों के रूप में भाजपा और कांग्रेस उभरेंगी. ऐसे में प्रधानमंत्री पद पर मुख्य रूप से दावा इन दलों का ही रहेगा.

यह भी मुमकिन है कि बड़े दलों का खेल बिगाड़ने के नाम पर तीसरे दल के नेता को प्रधानमंत्री बना दिया जाए. चौधरी चरण सिंह, वीपी सिंह, चंद्रशेखर, इंद्रकुमार गुजराल और देवगौड़ा इस तरह के समीकरण से ही देश के प्रधानमंत्री बन चुके हैं.

मायावती को लगता है कि अगर अभी से कार्यकर्ता उन को प्रधानमंत्री का उम्मीदवार कहेंगे तो विरोधी सचेत हो जाएंगे और उन के खिलाफ रणनीति बनाने में कामयाब हो जाएंगे.

यह बात जरूर है कि 2009 के लोकसभा चुनाव से 2019 का लोकसभा चुनाव अलग होगा. मायावती इस बार पहले वाली गलती नहीं करना चाहती हैं. वे उत्तर प्रदेश से बाहर भी अपना जनाधार बढ़ाना चाहती हैं. ऐसे में वे कांग्रेस के साथ तालमेल का फैसला भी कर सकती हैं.

मायावती उत्तर प्रदेश में भले ही मजबूत हों पर मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ में बसपा का जनाधार नहीं है. यह बात जरूर है कि इन राज्यों में दलित वोट बैंक है. अब बसपा इस जनाधार को अपने कब्जे में कर संसद में अपनी तादाद को बढ़ाना चाहती है. संसद में संख्या बल ही प्रधानमंत्री बनने का उन का सपना पूरा कर सकता है.

दलित वोट बैंक का गणित

लोकसभा के पिछले चुनाव के आंकड़ों को देखें तो रिजर्व्ड सीटों पर सब से बेहतर प्रदर्शन भाजपा का रहा है. उत्तर प्रदेश में 17 रिजर्व्ड सीटों पर भाजपा ने कब्जा जमाया था. देशभर की 131 सीटों में से 65 सीटें भाजपा ने जीती थीं. बसपा को अब भाजपा से दलित वोट बैंक को वापस लेना है. मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में दलित वोट निर्णायक हैं. ऐसे में अगर बसपा ने इन 3 राज्यों के चुनाव में बेहतर प्रदर्शन कर लिया तो लोकसभा चुनाव में उस का भाव बढ़ जाएगा.

मध्य प्रदेश की 35 फीसदी आबादी दलित व आदिवासी है. यहां लोकसभा की 10 सीटें रिजर्व्ड हैं. छत्तीसगढ़ में 43 फीसदी आबादी दलित और आदिवासी है. यहां लोकसभा की 5 सीटें रिजर्व्ड हैं. राजस्थान में 29.8 फीसदी दलित व आदिवासी आबादी और 7 सीटें रिजर्व्ड हैं. ऐसे में इन 3 राज्यों में 22 सीटें रिजर्व्ड हैं. अगर कांग्रेस और बसपा यहां तालमेल कर बेहतर प्रदर्शन कर लेती हैं तो भाजपा को कड़ी चुनौती दी जा सकती है.

पत्रकार पारस अमरोही कहते हैं, ‘‘भाजपा गठबंधन ने उत्तर प्रदेश में 72 लोकसभा की सीटें जीती थीं जो अब घट कर 69 रह गई हैं. लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में ही सब से ज्यादा 80 सीटें हैं. मोदीयोगी की खोती चमक और सपाबसपा गठबंधन की राजनीति से भाजपा को 30 से ज्यादा सीटें मिलना मुश्किल है. ऐसे में केवल उत्तर प्रदेश में भाजपा से 40 सीटों का सीधा नुकसान दिख रहा है.

‘‘उत्तर भारत के हिंदीं बोली वाले राज्यों में ही नहीं, बल्कि महाराष्ट्र और गुजरात में भी भाजपा को नुकसान होना तय है. इन राज्यों के नुकसान को पूरा करने के लिए किसी भी प्रदेश में कमी पूरी होती नहीं दिख रही है.

‘‘भाजपा कांग्रेस का मुकाबला तो भले ही कर ले पर क्षेत्रीय दलों को टक्कर देने में वह पीछे दिख रही है. यहीं से यह संभावना बनती है कि कर्नाटक की तरह कांग्रेस भाजपा केंद्र में सरकार बनाने से रोकने के लिए क्षेत्रीय नेता को प्रधानमंत्री बनाने में आगे आ सकती है. इस में मायावती की संभावना ज्यादा प्रबल दिखती है.’’

मियां बीवी की लड़ाई वकीलों की कमाई

विवाह बहुत आसान है पर तलाक बहुत कठिन. कभी असल में पैसे की कमी की वजह से तो कभी केवल अपना अहं साबित करने के लिए पतिपत्नी मनमुटाव के बाद एकदूसरे को अदालतों, पुलिस थानों और अफसरों के आगे घसीटते रहते हैं. एकदूसरे पर जान छिड़कने वाले जानलेवा बन जाते हैं.

एक मामले में समस्तीपुर, बिहार का एक जोड़ा महज 8 हजार मासिक के गुजारेभत्ते की अपील करने के लिए सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया. सुप्रीम कोर्ट में वकीलों को बहुत मोटी फीस देनी पड़ती है और दूसरे और हजारों के खर्च होते हैं.

बड़ी बात यह है कि 2010 में तलाक की दी गई अर्जी 2018 में भी पैंडिंग है. उसी दौरान मैंटेनैंस को ले कर पतिपत्नी फैमिली कोर्ट से हाई कोर्ट और हाई कोर्ट से सुप्रीम कोर्ट तक का चक्कर लगा आए हैं. सुप्रीम कोर्ट ने पति को कोई राहत नहीं दी और मामले को बेगूसराय के फैमिली कोर्ट पर ही छोड़ दिया.

एक तरह से यह पतिपत्नी दोनों के प्रति अन्याय है कि 2010 में दाखिल मामला 2018 में भी निबटाया नहीं गया और जब उच्च न्यायालय व सर्वोच्च न्यायालय में गुजारेभत्ते को ले कर मामला पहुंचा तो अदालतों ने सिर्फ खर्च की सीमा पर कई सुनवाइयां कर डालीं. इतने में तो वे बेगूसराय से मामला अपने हाथ में ले कर तलाक की डिक्री दे सकते थे. सुप्रीम कोर्ट के पास अनुच्छेद 142 के अंतर्गत इस तरह के फैसले करने का हक है.

पतिपत्नी के बीच विवाद अदालतों में न उलझे रहें यह देखना हर अदालत का काम है. बेगूसराय अदालत की ही 2-3 सुनवाइयों में 2010 में ही फैसला कर डालना चाहिए था. जब 2018 में सुप्रीम कोर्ट को यह एहसास था कि पतिपत्नी में फिर प्रेम पैदा हो ही नहीं सकता तो क्व8 हजार कैसे, कब दिए जाएं इस पर फैसला करने के साथ दोनों को एकदूसरे से मुक्त कर देना चाहिए था.

हमारा विवाह कानून इस मामले में एकदम आतंकवादी है कि वह पतिपत्नी को तलाक न दिला कर मामले को लटकाए रखता है. उस के पीछे अदालतों की आज भी सोच यही है कि विवाह तो संस्कार है, जो तोड़ा नहीं जा सकता.

जैसे जब लड़केलड़की में प्रेम हो तो पतिपत्नी बनने से रोकटोक संभव नहीं है और मिनटों में प्रेमी पतिपत्नी बन सकते हैं, वैसे ही जब विवाह हो चुका हो तो बच्चे हों या न हों, एकदूसरे से मुक्ति भी तुरंत हो जानी चाहिए.

सुप्रीम कोर्ट के पास अब ऐसे काफी मामले आते हैं और यदि वह फटकार लगाने लगे कि फैमिली कोर्ट ने 2-3 माह में क्यों नहीं निर्णय दिया तो यह समस्या इसी कानून के रहते दूर हो सकती है. कानून की व्याख्या करते हुए सुप्रीम कोर्ट को लोगों की इस सब से बड़ी समस्या का खयाल रखना चाहिए कि जब भी कोई जोड़ा अदालत तक पहुंचता है वह एकदूसरे से उकता चुका होता है.

अदालतों को प्रक्रिया की बारीकियों में जाने के बजाए समझानेबुझाने का लाभ न हो तो बंधनमुक्ति पर जोर देना चाहिए. ‘मियांबीवी की लड़ाई, वकीलों की कमाई’ का सिद्धांत दफना दिया जाना चाहिए.

पहली बार दिखा सपना चौधरी का ऐसा अंदाज

हरियाणवी डांसर सपना चौधरी अपने बेहतरीन डांस को लेकर हमेशा ही सुर्खियों में बनी रहती हैं. उनके बेहतरीन डांस स्टाइल को फैंस काफी पसंद करते हैं. सपना के डांस वीडियो रिलीज होते ही तेजी से वायलर हो जाते हैं. लेकिन इस बार उनका जो वीडियो वायरल हो रहा है उसे देखकर आपका भी दिल भर आयेगा.

सपना चौधरी हमेशा से अपने देसी ठुमकों के साथ अपने चुलबुले अंदाज के लिए जानी जाती हैं लेकिन सपना के इस नये गाने में उनका इमोशनल लुक फैंस की आखों में आंसू ला देगा. सपना चौधरी का ये गाना हाल ही में रिलीज हुआ है. उनका यह गाना अब तक किए उनके दूसरे गानों से काफी अलग है. लाल जोड़े में सजी धजी दुल्हन सपना विदाई गाने में बेहद खूबसूरत नजर आ रही हैं.

इस वीडियो में सपना चौधरी एक आम लड़की की तरह एक फौजी से शादी करने का सपना देखती हैं लेकिन शादी वाले दिन कुछ ऐसा होता है कि सारे सपने टूट जाते हैं. सपना का ये नया गाना सेना के जवान की जिंदगी पर आधारित है. सपना के गाने को काफी पसंद किया जा रहा है. अब तक गाने को 3 लाख से ज्यादा बार देखा जा चुका है.

गौरतलब है कि, रिएलिटी शो बिग बौस में आने के बाद से सपना चौधरी लगातार सुर्खियों में बनी हुई हैं. सपना पहले सलवाल सूट में नजर आती थी इसी में उनका हर डांस वायरल होता था पर जबसे वह बौस के घर से बाहर आईं हैं उनका जबरदस्त मेकओवर देखने को मिला है. कुछ समय पहले सपना चौधरी ने हौट फोटोशूट करवाया था. जिसे फैंस ने काफी पसंद किया था.

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