दीपिका चिखालिया अब गुजराती फिल्म ‘‘नट सम्राट’’ में

अस्सी के दशक के सर्वाधिक लोकप्रिय धार्मिक सीरियल ‘‘रामायण’’ में दीपिका चिखालिया ने सीमा का किरदार निभाया. इस सीरियल में चर्चित होने के बाद वह व्यवसायी हेमंत टोपीवाला के संग व्याह रचाकर अभिनय से दूर हो गयी थीं. लेकिन अब वह पुनः अभिनय में वापसी कर रही हैं. एक तरफ उन्होंने धीरज मिश्रा की हिंदी फिल्म ‘गालिब’ की है, तो दूसरी तरफ वह हिंदी फिल्म ‘चाक एंड डस्टर’ फेम निर्देशक जयंत गिलाटकर की गुजराती फिल्म ‘‘नट सम्राट’’ में अभिनय किया है, जो कि मराठी की सर्वाधिक चर्चित फिल्म ‘‘नट सम्राट’’ का गुजराती रूपांतरण है. 30 अगस्त 2018 को प्रदर्शित हो रही गुजराती फिल्म ‘‘नट सम्राट’’ में दीपिका चिखालिया के साथ गुजराती के लोकप्रिय अभिनेता सिद्धार्थ रंदेरिया की जोड़ी है.

गुजराती फिल्म ‘‘नट सम्राट’’ करने की चर्चा करते हुए दीपिका चिखालिया कहती हैं- ‘‘जब जयंत गिलाटकर ने मेरे पास इस फिल्म को करने का प्रस्ताव भेजा, उस वक्त तक मैं उनसे परिचित नहीं थी. इसलिए मैंने पहले उनकी हिंदी फिल्म ‘चाक एंड डस्टर’’ देखी. इस फिल्म को देखकर मैं बहुत प्रभावित हुई और मुझे यकीन हो गया कि जयंत बेहतरीन फिल्म निर्देशक हैं. उसके बाद मैंने मराठी फिल्म ‘‘नट सम्राट’’ देखी. फिल्म ने मुझ पर काफी प्रभाव डाला. फिर क्या था, मैंने जयंत गिलाटकर के साथ गुजराती में ‘नट सम्राट’ करने के लिए हां कर दिया. अब जब यह फिल्म प्रदर्शित होने जा रही है, तो मैं बहुत उत्साहित व खुश हूं.’’

‘‘बंदा नवाज’’ के मुहूर्त पर लगा मुख्यमंत्री सहित कई राजनेताओं का जमावड़ा

कई टीवी सीरियलों व कुछ फिल्मों में अभिनय कर चुके अभिनेता हेरम्ब त्रिपाठी की झोली में इन दिनों खुशियां ही खुशियां आ रही हैं. एक तरफ बतौर हीरो उनकी फिल्म ‘‘खामियाजा’’ प्रदर्शित होने जा रही है, तो वहीं हाल ही में उनकी नई फिल्म ‘‘बंदा नवाज’’ की भव्य शुरुआत हुई.

अर्जुन राज निर्देशित रहस्य रोमांच प्रधान फिल्म ‘‘बंदा नवाज’’ की शूटिंग शुरू होने के पहले दिन महाराष्ट्र राज्य के मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़नवीस, राज्यमंत्री सुधाकर राव देशमुख, कैबिनेट मंत्री चंद्रशेखर बावनकुले, विकास कुंभारे व मिलिंद माने खासतौर पर मौजूद थे.

इस अवसर पर फिल्म के निर्देशक अर्जुन राज ने कहा- ‘‘इसकी कहानी काफी रोचक व दिलचस्प है. फिल्म के नायक हेरम्ब त्रिपाठी तथा दूसरे कलाकार हैं- संदेश गौर, तन्मय त्रिपाठी, रोहित मेहता, जीतराय सिंह, नाफे खान, गौरी शंकर व अन्य.’’

फिल्म में हेरम्ब त्रिपाठी की दोहरी भूमिका है. वह कहते हैं- ‘‘इसमें मेरी दोहरी भूमिका है. पहली बार मैं किसी फिल्म में दोहरी भूमिका कर रहा हूं. यह एक ऐसी सस्पेंस थ्रिलर फिल्म है, जिसमें हीरो और विलेन दोनों एक ही है. यह फिल्म काफी अच्छी बनने वाली है.’’

‘‘हैप्पी क्राउड इंटरटेनमेंट’’ के बैनर तले बन रही फिल्म ‘‘बंदा नवाज’’ के लेखक रंजू साइक्लोनी, कैमरामैन लक्की शाह, नृत्य निर्देशक रिक्की गुप्ता, एक्शन अनिल सिक्कू व संतोष हैं.

लालू, राबड़ी, तेजस्वी के खिलाफ चार्जशीट

आईआरसीटीसी होटल आवंटन धनशोधन मामले में शुक्रवार को प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने पहला आरोपपत्र दाखिल किया. इसमें राजद प्रमुख और बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव, उनकी पत्नी राबड़ी देवी और छोटे बेटे तेजस्वी यादव समेत कईअन्य लोगों को आरोपी बनाया गया है.

धनशोधन रोकथाम कानून के तहत विशेष अदालत के समक्ष दायर किए गए आरोपपत्र में ईडी ने लालू के परिवार के अलावा राजद नेता पीसी गुप्ता, उनकी पत्नी सरला गुप्ता, लारा प्रोजेक्ट्स नाम की एक कंपनी और 10 अन्य को नामजद किया है.

ईडी का आरोप है कि पुरी और रांची स्थित रेलवे के दो होटलों के अधिकारों के सब-लीज कोचर के स्वामित्व वाली मेसर्स सुजाता होटल प्राइवेट लिमिटेड को दिए जाने में लालू और आईआरसीटीसी के अधिकारियों ने अपने पदों का दुरुपयोग किया.

होटल के सब-लीज के बदले पटना के एक प्रमुख स्थान की 358 डिसमिल जमीन फरवरी 2005 में मेसर्स डिलाइट मार्केटिंग कंपनी प्राइवेट लिमिटेड (राजद सांसद पी.सी. गुप्ता के परिवार के स्वामित्व वाली) को दे दी गई थी. उस वक्त के सर्किल दरों से काफी कम दर पर यह जमीन कंपनी को दी गई थी.

ईडी ने आरोप-पत्र में कहा है कि काफी महंगी जमीन से लैस वह कंपनी धीरे-धीरे राबड़ी देवी और तेजस्वी को हस्तांतरित कर दी गई. बहुत ही मामूली कीमत पर शेयर खरीद कर ऐसा किया गया.

151 कंपनियों का इस्तेमाल

जमीन हासिल करने के लिए इस्तेमाल की गई धनराशि संदिग्ध स्रोत से आई थी और मेसर्स अभिषेक फाइनेंस कंपनी लिमिटेड नाम की एक एनबीएफसी का इस्तेमाल करके पीसी गुप्ता से जुड़ी 151 कंपनियों से धनशोधन किया गया.

मिट्टी के मोल लिए शेयर

राबड़ी देवी व तेजस्वी ने बाजार मूल्य से काफी कम कीमत पर मेसर्स डिलाइट मार्केटिंग कंपनी प्राइवेट लिमिटेड के शेयर खरीदे थे. राबड़ी देवी की ओर से शेयरों की खरीद के लिए इस्तेमाल किए गए धन सवालों के घेरे में हैं.

42 की उम्र में इस अदाकारा ने तोड़ी बोल्डनेस की सारी हदें

बौलीवुड अभिनेत्री अमीषा पटेल भले ही पिछले काफी समय से फिल्मों से दूर हैं लेकिन वह किसी न किसी कौन्ट्रोवर्सी के चलते लाइमलाइट में आ ही जाती हैं. वह अपनी बोल्ड तस्वीरों के चलते लोगों के बीच चर्चा का विषय बन जाती हैं. लोग उनकी ऐसी तस्वीरों को लेकर मजाक बनाते हैं.

हालांकि अमीषा को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता और वह अपनी हौट एंड सेक्सी फोटोज सोशल मीडिया पर समय समय पर शेयर करती रहती हैं. इस बार भी उन्होंने अपनी एक बेहद बोल्ड तस्वीर सोशल मीडिया पर पोस्ट की है. जो तेजी से इंटरनेट पर वायरल हो रही हैं.

वह अपनी लेटेस्ट हौट तस्वीर की वजह से एक बार फिर ट्रोलर्स के निशाने पर आ गई हैं. उन्होंने ट्विटर पर अपनी एक बोल्ड तस्वीर शेयर कर अपने फौलोअर्स से पूछा कि उनका लेफ्ट प्रोफाइल अच्छा है या राइट. बस फिर क्या था लोगों ने ऐसे ऐसे कमेंट्स कर दिए कि सब ट्विटर पर हैरान हो गए. उनकी इस तस्वीर पर कई लोगों ने उनकी तारीफ को तो कई लोगों ने उनकी उम्र को लेकर ही उन्हें ट्रोल कर दिया.

हद तो तब हो गई जब कुछ यूजर्स ने उन पर काफी भद्दे कमेंट्स कर दिए. हालांकि कई लोगों ने इसका विरोध भी किया है. उनकी इस तस्वीर पर आए कमेंट्स से सोशल मीडिया पर छिड़ी बहस इतनी तेज हो गई कि अमीषा पटेल की तस्वीर कुछ देर में ही वायरल हो गई. ऐसा पहली बार नहीं है जब अमीषा ट्रोलर्स के निशाने पर आई हों. इससे पहले भी अमीषा अपने हट फोटोशूट और ड्रेसिंग स्टाइल को लेकर लोगों से काफी कुछ सुन चुकी हैं.

अकेले में ही देखें भोजपुरी सिनेमा के ये हौट गाने

भोजपुरी सिनेमा में आज कोई भी गाना आते ही सोशल मीडिया पर छा जाता है. भोजपुरी इंडस्ट्री के कई गाने कभी कभी ऐसे भी होते हैं जो आपको परिवार के साथ देखने पर शर्मिन्दा भी कर सकते हैं. भोजपुरी की यूट्यूब क्वीन आम्रपाली दुबे, अक्षरा सिंह, अंजना सिंह और भोजपुरी स्टार पवन सिंह जैसे कई सुपरस्टार्स के ऐसे बहुत सारे गाने हैं जो आप अकेले में तो देख सकते हैं लेकिन परिवार के साथ नहीं

इंटरनेट के दौर में आज कोई भी गाना, डांस या आपके फेवरेट कवि की कविता, फिल्म का ट्रेलर या पूरी फिल्म ही, इन सबका एक ही ठिकाना है और वो है यूट्यूब. लेकिन अब ऐसा नहीं है क्योंकि हम आपके लिए वहां मौजूद वो कंटेंट जिसे आप देखना चाहते हैं, इस सीरीज के जरिए लेकर आ रहे हैं. क्योंकि यूट्यूब  की दुनिया इतनी बड़ी है कि अगर आप सुबह इसमें पहुंचे तो तो शाम तक एक चौथाई भी नहीं खंगाल पाएंगे. यहां मौजूद एंटरटेनमेंट का खजाना इतना बड़ा कि इसमें सभी वीडियोज़ को देखने के लिए आपको तकरीबन 70,000 साल लगातार यूट्यूब देखते रहना होगा!!! ऐसे में इस प्लेटफौर्म पर इतना कुछ होता है, जो हमारी नजरों से छूट ही जाता है. लेकिन फ़िक्र मत कीजिए, हम लेकर आए हैं एक ऐसी सीरीज़ जहां आपको यूट्यूब पर मौजूद हर मसाले की पूरी जानकारी मिलेगी.

भोजपुरी फिल्म ‘देवरा भइल दीवाना’ जोकि भोजपुरी सिंगर अल्का और प्रियंका सिंह ने गाया है. इस भोजपुरी गाने को देखने के लिए आपको एक बंद कमरा तलाशना ही पड़ जाएगा क्योंकि भोजपुरी सिनेमा का ये गाना काफी ज्यादा ही हौट है. भोजपुरी जगत में धूम मचाने वाला ये गाना खबर लिखे जाने तक 6 करोड़ 14 लाख से भी ज्यादा बार देखा जा चुका था. आप भी देखिए भोजपुरी सिनेमा का ये हौट गाना…

भोजपुरी एल्बम ‘सत्या’ का गाना ‘राते दिया बुता के’ काफी हौट गाना है. गाने में पवन सिंह और आम्रपाली दुबे ने जबर्दस्त डांस किया है. बता दें इस गाने को इंदु सोनाली के साथ खुद पवन सिंह ने गाया है. पवन सिंह और आम्रपाली दुबे का ये गाना यूट्यूब पर अब तक 11 करोड़ से ज्यादा बार देखा जा चुका है.

पवन सिंह और अक्षरा सिंह का गाना ‘दोल्हा पट्टी’ फिल्म धड़कन फिल्म का है. इस हौट गाने को ख़ुद भोजपुरी एक्टर और सिंगर पवन सिंह ने प्रियंका सिंह के साथ गया है. पवन और अक्षरा का ये गाना इतना वायरल हुआ कि अब तक इसे 3 करोड़ से भी ज्यादा बार देखा जा चुका है.

भोजपुरी सुपरस्टार पवन सिंह के साथ मणि भट्टाचार्य का यह हौट गाना काफी वायरल हो रहा है. भोजपुरी फिल्म वांटेड का गाना ‘पलंगिया सोने ना दिया’ यूट्यूब पर अब तक 4 करोड़ से भी ज्यादा बार देखा जा चुका है.

बता दें मणि भट्टाचार्य जोकि बांग्ला हीरोइन हैं, ने भोजपुरी सिनेमा में खेसारी लाल की फिल्म ‘जिला चंपारण’ से डेब्यू किया था.

6 टुकड़े करने के बाद मांगी 50 लाख की फिरौती

मूलरूप से मुजफ्फरपुर, बिहार के रहने वाले रामनाथ यादव सालों पहले काम की तलाश में दिल्ली आए थे. वह पढ़ेलिखे थे, इसलिए किसी अच्छी कंपनी में नौकरी ढूंढने लगे. जब उन के मनमुताबिक नौकरी नहीं मिली तो उन्होंने एक सीए के यहां नौकरी कर ली. नौकरी मिल गई तो वह अपने बीवीबच्चों को भी दिल्ली ले आए और परिवार के साथ पश्चिमी दिल्ली के नांगलोई रोड पर स्थित अग्रसेन पार्क में रहने लगे. उन के परिवार में पत्नी के अलावा 2 बेटियां और एक बेटा सचिन यादव था.

21 साल का सचिन कृष्णा मंदिर नजफगढ़ के पास स्थित बालाजी कारपेट की दुकान पर नौकरी करता था. रामनाथ ने सचिन की शादी कर दी थी. करीब 2 महीने पहले ही सचिन के बेटा हुआ था. घर में बच्चे की किलकारियां गूंजने से सभी खुश थे. लेकिन इसी साल मई के दूसरे सप्ताह में उन के घर में एक ऐसी घटना घटी, जिसे यह परिवार जिंदगी भर नहीं भुला सकेगा.

दरअसल 12 मई, 2018 को सुबह करीब साढ़े 7 बजे सचिन के मोबाइल पर किसी की काल आई. फोन पर बात करने के कुछ देर बाद वह किसी के साथ बाइक पर बैठ कर निकल गया. जब 2 घंटे बाद भी सचिन घर नहीं लौटा तो घर वालों ने उस का फोन नंबर मिलाया, पर उस का फोन स्विच्ड औफ मिला.

सचिन वैसे तो कभी भी अपना फोन बंद नहीं करता था, पर फोन बंद आने पर घर वालों ने सोचा कि शायद उस के फोन की बैटरी डाउन हो गई होगी.

उस के एकाध घंटे बाद उन्होंने फिर से सचिन का नंबर मिलाया. इस बार भी उस का फोन बंद ही मिला. घर वालों ने सोचा कि कहीं ऐसा तो नहीं कि वह उधर से ही अपनी ड्यूटी पर चला गया हो. इस बात की पुष्टि करने के लिए रामनाथ यादव ने बालाजी कारपेट की दुकान का फोन मिलाया. वहां बात करने पर पता चला कि वह दुकान पर नहीं पहुंचा है.

यह जानकारी मिलने के बाद घर वालों का परेशान होना लाजिमी था. फिर तो उन्होंने उस के यारदोस्तों और जानपहचान वालों के पास फोन करने शुरू कर दिए.

रामनाथ यादव पूरे दिन इधरउधर बेटे को तलाशते रहे, लेकिन कहीं से भी उस के बारे में उन्हें कोई जानकारी नहीं मिली. जवान बेटे के गायब होने के बात रामनाथ के परिचितों को पता लगी तो वह भी खोजने में उन की मदद करने लगे.

बीचबीच में घर वाले सचिन का फोन भी मिलाते रहे लेकिन उस का फोन बंद ही मिलता रहा. सचिन की पत्नी, मां और बहनों का तो रोरो कर बुरा हाल था. 12-13 मई की रात को घर के सभी लोगों की नींद गायब थी. सभी की निगाहें दरवाजे पर ही लगी हुई थीं.

कभीकभी तो उन के दिमाग में सचिन को ले कर तरहतरह के विचार आते. सभी लोग यह नहीं समझ पा रहे थे कि आखिर सचिन मोटरसाइकिल पर बैठ कर कहां चला गया. सचिन जिस युवक के साथ गया था, उसे कोई नहीं जानता था.

घर वाले सभी संभावित जगहों पर सचिन को ढूंढ चुके थे. इस के बावजूद भी 13 मई की पौ फटने के बाद वह फिर से सचिन की तलाश में जुट गए. चारों ओर से हताश होने के बाद जब उस का कहीं पता नहीं चला तो आखिर वह क्षेत्र के थाना हरिदासनगर पहुंच गए.

रामनाथ ने थानाप्रभारी को सचिन के गायब होने की बात बताई. थानाप्रभारी ने सचिन की गुमशुदगी दर्ज कर ली. उस की गुमशुदगी दर्ज करने के बाद उन्होंने वह सब जरूरी काररवाई की, जो किसी की भी गुमशुदगी दर्ज होने के बाद अमूमन की जाती है. मसलन सभी थानों को गुम हुए व्यक्ति का हुलिया भेजना, पैंफ्लेट छपवा कर सार्वजनिक स्थानों पर चिपकवाना आदि.

अपने स्तर से पुलिस भी सचिन का पता लगाने में जुट गई. सचिन 21 साल का युवक था, इस बात को देखते हुए इस बात की भी आशंका जताई जा रही थी कि कहीं उस का किसी के साथ कोई अफेयर तो नहीं चल रहा था.

हालांकि वह शादीशुदा था, लेकिन प्यारमोहब्बत के मामले में किसी का कुछ नहीं कहा जा सकता. इसलिए पुलिस उस के दोस्तों से यह जानने में लग गई कि कहीं उस का किसी लड़की के साथ कोई चक्कर तो नहीं था. दोस्तों ने थानाप्रभारी को बताया कि सचिन इस किस्म का नहीं था. और तो और वह किसी से फालतू बात तक नहीं करता था.

सचिन को गायब हुए 3 दिन बीत चुके थे, न तो पुलिस और न ही सचिन के घर वालों को उस के बारे में कोई जानकारी मिल पा रही थी. 15 मई को सचिन की बहन ने फिर सचिन का फोन नंबर मिलाने की कोशिश की तो उस दिन उस का नंबर मिल गया. इस से बहन बहुत खुश हुई. लेकिन फोन उस के भाई के बजाय किसी और ने उठाया. बहन ने जब सचिन के बारे में पूछा तो उस व्यक्ति ने कहा कि सचिन अभी टायलेट में है.

पास में रामनाथ यादव भी थे. बेटी से हो रही बातचीत को सुन कर उन्हें लगा कि सचिन के बारे में शायद जानकारी मिल गई है. इसलिए बेटी से फोन ले कर वह खुद बात करने लगे.

उन्होंने भी उस शख्स से बेटे के बारे में जानकारी हासिल करनी चाही, लेकिन वह शख्स उन्हें इधरउधर की बातें सुनाने लगा. उन्होंने जब पूछा कि वह कौन और कहां से बोल रहे हैं तो वह रामनाथ यादव से उलटीसीधी बातें करने लगा. इतना ही नहीं, वह उन्हें धमकी भी देने लगा. इस के बाद उस ने फोन काट दिया.

रामनाथ ने फिर से बेटे का नंबर मिलाया, लेकिन इस बार वह स्विच्ड औफ हो गया. वह घबरा गए कि जो शख्स उन से बात कर रहा था वह कौन था. कहीं ऐसा तो नहीं कि सचिन का किसी ने अपहरण कर लिया हो. वह घबराए हुए सीधे थाना हरिदासनगर पहुंचे और थानाप्रभारी को बात बताई.

थानाप्रभारी ने उसी समय अपने फोन से सचिन का नंबर मिलाया तो वह स्विच्ड औफ मिला. मामले की गंभीरता को देखते हुए उन्होंने सचिन यादव के अपहरण की रिपोर्ट दर्ज कर ली. इस के बाद पुलिस ने सचिन के मोबाइल की काल डिटेल्स निकलवाने की काररवाई शुरू कर दी.

15 मई, 2018 को ही रामनाथ यादव के पास उन के बेटे सचिन के फोन से काल आई. अपने फोन स्क्रीन पर बेटे का नंबर देख कर रामनाथ यादव खुश हो गए. उन्होंने जैसे ही काल रिसीव की, तभी दूसरी ओर से किसी ने रौबदार आवाज में कहा, ‘‘तुम घबराओ मत, सचिन हमारे कब्जे में है. यदि तुम उसे सहीसलामत चाहते हो तो 50 लाख रुपए का इंतजाम कर लो, वरना सचिन की लाश कई टुकड़ों में मिलेगी.’’

‘‘देखो जी, मैं आप के आगे हाथ जोड़ कर विनती करता हूं कि मेरे बेटे को कुछ नहीं कहना. आप चाहे मेरा सब कुछ ले लो, मगर मेरे सचिन को मुझे दे दो.’’

‘‘हम भी तो यही कह रहे हैं कि यदि बेटा जिंदा चाहिए तो 50 लाख रुपए हमें दे दो.’’ अपहर्त्ता ने कहा.

‘‘देखिए साहब, मैं एक मामूली नौकरी वाला आदमी हूं. इतने पैसे तो पूरी उमर काम कर के भी नहीं कमा सकूंगा. मेरी प्राइवेट नौकरी है. इतने पैसे भला मैं कहां से लाऊंगा.’’ रामनाथ गिड़गिड़ाए.

‘‘यदि तुम्हारा बेटा अस्पताल के आईसीयू में भरती हो और डाक्टर इलाज के 50 लाख बता रहा हो तो बताओ उसे ऐसे ही मर जाने दोगे या बचाने की कोशिश करोगे?’’ उस शख्स ने सवाल किया.

‘‘देखिए जी, मैं क्या दुनिया का हर बाप बेटे को बचाने की कोशिश करेगा लेकिन जब डाक्टर द्वारा मांगी गई वह रकम उस के बूते के बाहर की होगी तो वह हाथ खड़े कर देगा. क्योंकि यह उस की मजबूरी होगी.’’ रामनाथ यादव बोले.

‘‘बहरहाल, अब तुम देख लो कि तुम्हें पैसा प्यारा है या बेटा.’’ अपहर्त्ता ने एक तरह से धमकी दी.

‘‘देखिए साहब, मैं गरीब आदमी हूं. इतने पैसे मेरे पास नहीं हैं.’’ रामनाथ यादव ने मजबूरी जताई, ‘‘मैं अपनी हैसियत के अनुसार दे सकता हूं.’’

दोनों तरफ से बात होती रही और अंत में 4 लाख रुपए में बात तय हो गई. अपहर्त्ता ने फिरौती की रकम एशिया की सब से बड़ी आजादपुर सब्जीमंडी में ले कर आने को कहा.

फिरौती मांगने पर यह स्पष्ट हो गया कि सचिन का अपहरण कर लिया गया है और इस समय वह अपहर्त्ताओं के कब्जे में हैं. घर वाले और अन्य लोग सचिन के सहीसलामत होने की कामना करने लगे. अपहर्त्ता से रामनाथ की फोन पर जो बातचीत हुई थी, उस के बारे में उन्होंने पुलिस को भी बता दिया. फिर तो पुलिस भी सक्रिय हो गई.

अब पुलिस ने उस फोन नंबर पर जांच केंद्रित कर दी, जिस नंबर से फिरौती की काल आई थी. उधर अपहर्त्ता की जो 4 लाख रुपए की डील फाइनल हुई थी, पुलिस ने योजना बना कर रामनाथ को पैसे ले कर आजादपुर मंडी भेजा.

पुलिस टीम भी सादा कपड़ों में रामनाथ के इधरउधर रही. लेकिन अपहर्त्ता वहां पैसे लेने नहीं आया और न ही उस ने इस के लिए रामनाथ को फिर से फोन किया. इस से यही लगा कि अपहर्त्ता को पुलिस के मौजूद होने की भनक लग गई थी.

पुलिस की टैक्निकल सर्विलांस टीम ने बताया कि अपहर्त्ता ने उत्तरी दिल्ली के मजनूं का टीला इलाके से फोन कर के फिरौती मांगी थी. पुलिस मजनूं का टीला इलाके में पहुंच गई. फोन की लोकेशन के आधार पर पुलिस मजनूं के टीला से हरियाणा के पानीपत शहर पहुंची, लेकिन किडनैपर्स वहां भी नहीं मिले. पकड़े जाने के भय से वे बिहार भाग गए.

दिल्ली पुलिस की टीम भी पीछा करते हुए बिहार चली गई और उस ने 20 मई की रात को बिहार में एक जगह दबिश डाल कर भूषण कुमार सिंह उर्फ वरुण को हिरासत में ले लिया. उस से सचिन यादव के बारे में पूछताछ की गई तो उस ने बताया कि सचिन तो दिल्ली में ही है.

दिल्ली में वह किस जगह पर है, पूछने पर भूषण ने बताया कि वह अब जीवित नहीं है. बल्कि उन्होंने उस की हत्या कर लाश के टुकड़े गटर में डाल दिए हैं.

यह बात सुन कर पुलिस टीम को धक्का लगा. पुलिस ने भूषण से पूछताछ की तो उस ने बताया कि इस मामले में उस के साथ विक्की कुमार भी शामिल था. करीब 2 घंटे की मशक्कत के बाद पुलिस ने विक्की कुमार को भी बिहार से ही गिरफ्तार कर लिया. ये दोनों आपस में सालेबहनोई थे.

दोनों आरोपियों को ट्रांजिट रिमांड पर ले कर टीम दिल्ली लौट आई. दिल्ली के कोर्ट में पेश करने के बाद थानाप्रभारी ने दोनों आरोपियों से पूछताछ की तो उन्होंने अपहरण की जो कहानी बताई, वह इस प्रकार निकली.

भूषण कुमार सिंह और विक्की कुमार दोनों ही बिहार के रहने वाले थे. दोनों काम की तलाश में बिहार से दिल्ली आए थे. ये दोनों उसी शोरूम पर ठेके पर काम करते थे, जहां सचिन नौकरी करता था. पर वहां सचिन की नौकरी लग जाने के बाद शोरूम मालिक ने इन दोनों को काम से हटा दिया था.

इन के वहां से हट जाने के बाद भी सचिन की उन से फोन पर बातचीत होती रहती थी. करीब 2 महीने पहले सचिन के घर बेटा हुआ तो उस ने इस खुशी में कुछ लोगों को घर पर पार्टी दी थी. इस पार्टी में उस ने भूषण और विक्की को भी बुलाया था.

भूषण और विक्की तो सचिन से इस बात की रंजिश रखते थे कि उस के शोरूम पर नौकरी पर लगने के बाद उन दोनों की छुट्टी हो गई थी. इस के लिए वह सचिन को ही दोषी मानते थे. इस बात का सचिन को आभास नहीं हुआ. वह तो उन्हें अपना दोस्त ही समझता था, तभी तो उस ने बेटा पैदा होने पर दोनों को अपने घर पार्टी में बुलाया था.

सचिन का रहनसहन देख कर भूषण और विक्की समझने लगे कि सचिन अमीर बाप का बेटा है. उसी दिन उन्होंने सचिन को सबक सिखाने की ठान ली. उन्होंने सोचा कि यदि किसी तरह सचिन का अपहरण कर लिया जाए तो इस के बदले में मोटी फिरौती मिल सकती है. इस के बाद उन्होंने सचिन का अपहरण करने की योजना बना ली.

योजना बनाने के बाद उन्होंने 12 मई, 2018 को सुबह करीब साढ़े 7 बजे सचिन को फोन किया और भूषण मोटरसाइकिल ले कर सचिन के घर के पास पहुंच गया. चूंकि सचिन उस की योजना से अनजान था और वह उस पर विश्वास करता था, इसलिए वह उस के साथ मोटरसाइकिल पर बैठ कर चला गया.

मोटरसाइकिल से वह सचिन को दिल्ली के ओल्ड खयाला रोड पर प्रेमनगर स्थित एक कमरे पर ले गया. वह कमरा उस ने 2 दिन पहले ही किराए पर लिया था. भूषण और विक्की ने वहां उसे नशे की गोली मिली कोल्डड्रिंक पीने को दी.

जब सचिन अर्द्धबेहोशी की हालत में हो गया तो उन दोनों ने गला दबा कर उस की हत्या कर दी. हत्या करने के बाद उन्होंने उस का मोबाइल फोन स्विच्ड औफ कर के अपने कब्जे में ले लिया और लाश टांड पर छिपा दी.

इस के बाद वे लाश को ठिकाने लगाने के उपाय खोजने लगे. लाश को वे बाहर ले कर नहीं जा सकते थे लिहाजा उन्होंने 21 वर्षीय सचिन की लाश के 6 टुकड़े किए और उन टुकड़ों को गटर में डाल दिया.

लाश ठिकाने लगा कर वे निश्चिंत हो गए थे. फिर उन्होंने सचिन का फोन प्रयोग करते हुए उस के घर वालों से फिरौती मांगनी शुरू कर दी. जिस में वे सफल नहीं हो सके.

उन्हें शक हो गया कि मामला पुलिस तक पहुंच गया है. पुलिस कभी भी उन के पास पहुंच सकती है, लिहाजा दोनों बिहार भाग गए पर दिल्ली पुलिस उन्हें वहीं से गिरफ्तार कर लाई.

दोनों अभियुक्तों से पूछताछ करने के बाद पुलिस ने उन की निशानदेही पर खयाला रोड, प्रेमनगर के गटर से भारी मशक्कत के बाद सचिन के शरीर के सभी टुकड़े बरामद कर लिए, जिन्हें पुलिस ने पोस्टमार्टम के लिए राव तुलाराम अस्पताल भेज दिया.

अभियुक्त भूषण कुमार सिंह उर्फ वरुण और विक्की कुमार को गिरफ्तार कर पुलिस ने न्यायालय में पेश कर जेल भेज दिया. पुलिस अब यह जांच कर रही है कि इस मामले में इन दोनों के अलावा कहीं कोई तीसरा तो शामिल नहीं था.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

बाप का इश्क बेटी को ले डूबा

उत्तर प्रदेश के जिला वाराणसी के रहने वाले भालचंद्र सरोज अपने परिवार के साथ महानगर मुंबई के तालुका वसई के उपनगर नालासोपारा की साईं अपर्णा बिल्डिंग में लगभग 30 सालों से रह रहे थे. अपनी रोजीरोटी के लिए उन्होंने उसी बिल्डिंग के परिसर में किराने की दुकान खोल ली थी. परिवार में उन की पत्नी के अलावा एक बेटा संतोष सरोज था, जिस की शादी उन्होंने मालती नाम की लड़की से कर दी थी. संतोष की एक बेटी थी अंजलि. भालचंद्र सरोज का एक छोटा सा परिवार था, उन का जीवन हंसीखुशी के साथ व्यतीत हो रहा था. संतोष 10वीं जमात से आगे नहीं पढ़ सका था, इसलिए भालचंद्र ने उसे एक आटोरिक्शा खरीदवा दिया था. किराने की दुकान और आटो से जो कमाई होती थी, उस से उन की घरगृहस्थी आराम से चल रही थी.

अंजलि अपने मातापिता के अलावा दादादादी की भी लाडली थी. संतोष भले ही खुद नहीं पढ़लिख सका था, लेकिन बेटी को उच्चशिक्षा दिलाना चाहता था. इसीलिए उस ने अंजलि का दाखिला जानेमाने लोकमान्य तिलक इंगलिश स्कूल में करवा दिया था. परिवार में सब कुछ ठीकठाक चल रहा था. इसी दौरान एक ऐसी घटना घटी, जिस का दुख यह परिवार जिंदगी भर नहीं भुला सकेगा.

बात 24 मार्च, 2018 की है. संतोष सरोज की 5 वर्षीय बेटी अंजलि हमेशा की तरह उस शाम 7 बजे बच्चों के साथ खेलने के लिए बिल्डिंग से नीचे आई तो फिर वह वापस नहीं लौटी. वह बच्चों के साथ कुछ देर तक तो अपने दादा भालचंद्र सरोज की दुकान के सामने खेलती रही. फिर वहां से खेलतेखेलते कहां गायब हो गई, किसी को पता नहीं चला.

जब वह 8 बजे तक वापस घर नहीं आई तो उस की मां मालती को उस की चिंता हुई. जिन बच्चों के साथ वह खेलने गई थी, मालती ने उन से पूछताछ की तो उन्होंने अनभिज्ञता जाहिर की. उसी दौरान संतोष घर लौटा तो मालती ने बेटी के गुम हो जाने की बात पति को बताते हुए उस का पता लगाने के लिए कहा.

संतोष बिल्डिंग से उतरने के बाद अंजलि को इधरउधर ढूंढने लगा. वहीं पर उस के पिता की दुकान थी. वह पिता की दुकान पर पहुंचा और उन से अंजलि के बारे में पूछा. पोती के गायब होने की बात भालचंद्र को थोड़ी अजीब लगी. उन्होंने बताया कि कुछ देर पहले तक तो वह यहीं पर बच्चों के साथ खेल रही थी. इतनी देर में कहां चली गई.

उन्हें भी पोती की चिंता होने लगी. वह भी दुकान बंद कर के बेटे के साथ उसे ढूंढने के लिए निकल गए. संभावित जगहों पर तलाशने के बाद भी जब वह नहीं मिली तो उन की चिंता और बढ़ गई.

अंजलि के गायब होने की बात जब पड़ोस के लोगों को पता चली तो वे भी उसे खोजने लगे. वहां आसपास खुले गटर और नालों को देखने के बाद भी अंजलि का कहीं पता नहीं चला. बेटी की चिंता में मां मालती की घबराहट बढ़ती जा रही थी. चैत्र नवरात्रि होने की वजह से लोग यह भी आशंका व्यक्त कर रहे थे कि कहीं उसे तंत्रमंत्र की क्रियाएं करने वालों ने तो गायब नहीं कर दिया.

सभी लोग अंजलि की खोजबीन कर के थक गए तो उन्होंने पुलिस की मदद लेने का फैसला किया. लिहाजा वे रात करीब 11 बजे तुलीज पुलिस थाने पहुंच गए. थानाप्रभारी किशोर खैरनार से मिल कर उन लोगों ने उन्हें सारी बातें बताईं और अंजलि की गुमशुदगी दर्ज करवा दी. अंजलि का सारा विवरण दे कर उन्होंने उस का पता लगाने का अनुरोध किया. थानाप्रभारी ने अंजलि का पता लगाने का आश्वासन दे कर उन्हें घर भेज दिया.

थाने से घर लौटे सरोज परिवार का मन अशांत था. उन का दिल अपनी मासूम बच्ची को देखने के लिए तड़प रहा था. वह रात उन के लिए किसी कालरात्रि से कम नहीं थी. सुबह होते ही संतोष सरोज का परिवार फिर से अंजलि की खोज में निकल गया. उन्होंने उस की गुमशुदगी के पैंफ्लेट छपवा कर रेलवे स्टेशनों के अलावा बसस्टैंड और सार्वजनिक जगहों पर लगवा दिए.

उधर थानाप्रभारी किशोर खैरनार ने अंजलि की गुमशुदगी की जांच सहायक पीआई के.डी. कोल्हे को सौंप दी. के.डी. कोल्हे ने जब मामले पर गहराई से विचार किया, तो उन्हें लगा कि या तो बच्ची का फिरौती के लिए अपहरण किया गया है या फिर उसे किसी दुश्मनी या तंत्रमंत्र क्रिया के लिए उठा लिया गया है.

उन्होंने सरोज परिवार से भी कह दिया कि यदि किसी का फिरौती मांगने के संबंध में फोन आए तो वह उस से प्यार से बात करें और इस की जानकारी पुलिस को जरूर दे दें.

जांच के लिए पीआई के.डी. कोल्हे ने पुलिस की 6 टीमें तैयार कीं, जिस में उन्होंने एपीआई राकेश खासरकर, नितिन विचारे, शिवाजी पाटिल, एसआई भरत सांलुके, हैडकांस्टेबल सुरेश शिंदे, कांस्टेबल भास्कर कोठारी, महेश चह्वाण आदि को शामिल किया. सभी टीमें अलगअलग तरीके से मामले की जांच में जुट गईं.

पुलिस ने अंजलि के फोटो सहित गुमशुदगी का संदेश अनेक वाट्सऐप गु्रप में भेजा और उसे अन्य लोगों को भी भेजने का अनुरोध किया. पीआई के.डी. कोल्हे दूसरे दिन अपनी जांच की कोई और रूपरेखा तैयार करते, इस के पहले ही उन्हें स्तब्ध कर देने वाली एक खबर मिली.

खबर गुजरात के नवसारी रेलवे पुलिस की तरफ से आई थी. रेलवे पुलिस ने मुंबई पुलिस को बताया कि जिस बच्ची की उन्हें तलाश है, वह बच्ची मृत अवस्था में नवसारी रेलवे स्टेशन के बाथरूम में पड़ी मिली है. किसी ने गला काट कर उस की हत्या की है.

सूचना मिलते ही पुलिस की एक टीम अंजलि के परिवार वालों को ले कर तुरंत नवसारी रेलवे स्टेशन के लिए रवाना हो गई. नवसारी रेलवे पुलिस ने जब संतोष सरोज और उस के परिवार वालों को बच्ची की लाश दिखाई तो वे सभी दहाड़ मार कर रोने लगे, क्योंकि वह लाश अंजलि की ही थी.

जरूरी काररवाई पूरी कर के मुंबई पुलिस बच्ची के शव को अपने कब्जे में ले कर मुंबई लौट आई और उसे पोस्टमार्टम के लिए अस्पताल भेज दिया. इधर जब अंजलि की हत्या की बात उस बिल्डिंग और आसपड़ोस के रहने वालों को पता लगी तो लोगों में आक्रोश फूट पड़ा.

देखते ही देखते पुलिस स्टेशन के सामने हजारों की भीड़ जमा हो गई. भीड़ पुलिस के खिलाफ नारेबाजी करने लगी. भीड़ तब तक शांत नहीं हुई, जब तक एसएसपी राजतिलक रोशन, एसपी मंजुनाथ शिंगे और एएसपी जयंत वंजवले ने पुलिस थाने आ कर 24 घंटे के अंदर हत्यारे को गिरफ्तार करने का आश्वासन नहीं दिया.

मामले को तूल पकड़ते देख पुलिस के बड़े अधिकारियों की आंखों से नींद गायब हो गई थी. उन्होंने जांच टीम को शीघ्र से शीघ्र अंजलि के हत्यारों को गिरफ्तार करने का निर्देश दिए. पुलिस टीम ने अंजलि के परिवार और आसपास के लोगों से गहराई से पूछताछ करने के अलावा इलाके में लगे सभी सीसीटीवी कैमरों की फुटेज भी खंगाली. लोकमान्य तिलक स्कूल के एक सीसीटीवी कैमरे की फुटेज में अंजलि एक महिला के साथ नालासोपारा स्टेशन की तरफ जाते हुए दिखाई दी.

वह महिला कौन थी और कहां से आई थी, यह जानने के लिए पुलिस टीम ने उस का स्केच बनवा कर जब मामले की जांच की तो पता चला कि वह महिला कई बार अंजलि के स्कूल और उस के घर साईं अपर्णा बिल्डिंग के आसपास संदिग्ध अवस्था में दिखाई दी थी. जिस दिन अंजलि गायब हुई थी, उस दिन भी वह बिल्डिंग परिसर में आई थी.

पुलिस जांच का चक्र तेजी से घूम रहा था. उस महिला का स्केच पूरे शहर में चिपकवाने के अलावा जनपद के सभी पुलिस थानों को भी भेज दिया गया. इस के अलावा स्केच अंजलि के पिता संतोष सरोज को भी दिखाया गया.

स्केच देखते ही संतोष ने अपना सिर पीट लिया. उस ने कहा कि यह तो उस की प्रेमिका है. पुलिस ने संतोष को सीसीटीवी कैमरे में अंजलि के साथ जाने वाली उस महिला की फुटेज दिखाई तो संतोष ने कहा कि यह उस की प्रेमिका अनीता वाघेला है और यह नालासोपारा (पूर्व) के नगीनदास पाड़ा इलाके में रहती है.

बिना देर किए पुलिस टीम अनीता के घर पहुंच गई. वह घर पर ही मिल गई. पुलिस उसे हिरासत में ले कर थाने लौट आई. पुलिस ने जब उस से अंजलि की हत्या के बारे में पूछताछ की तो उस ने आसानी से अपना जुर्म स्वीकार कर लिया. अनीता से पूछताछ के बाद अंजलि की हत्या की जो कहानी सामने आई, वह प्यार में चोट खाई नागिन के प्रतिशोध वाली निकली—

22 साल की अनीता का रंग हालांकि बहुत साफ नहीं था, लेकिन कुदरत ने उसे कुछ इस तरह गढ़ा था कि जो भी उसे देखता, देखता ही रह जाता था. सांवले सौंदर्य की मालकिन अनीता के जिस्म की कसावट और फिगर देख मनचले गहरी सांसें लेते हुए फिकरे कसते थे. इस के अलावा अनीता खुले विचारों वाली महत्त्वाकांक्षी युवती थी.

आमतौर पर अनीता जैसी महत्त्वाकांक्षी युवतियां जो सपने देखती हैं, उन्हें किसी भी कीमत पर या कोई भी जोखिम उठा कर पूरा करने की कोशिश करती हैं.

यह अलग बात है कि इस के लिए उन्हें जो कीमत चुकानी पड़ती है, वह कभीकभी भारी पड़ जाती है. तब उन के पास हाथ मलने और अपनी नादानियों पर पछताने के सिवा कुछ नहीं रह जाता. यही हाल अनीता का हुआ था. वह आंख मूंद कर संतोष सरोज पर भरोसा कर के प्यार करने की भूल कर बैठी थी.

मूलरूप से गुजरात की रहने वाली अनीता वाघेला अपने मातापिता और भाईबहनों के साथ नालासोपारा (पूर्व) के नगीनदास पाड़ा इलाके में रहती थी. वह अपने और परिवार के लिए कैटरिंग का काम किया करती थी. उस की और संतोष सरोज की मुलाकात करीब 7 साल पहले नगीनदास पाड़ा के आटो स्टैंड पर हुई थी.

उस दिन वह अपने काम पर जाने के लिए काफी लेट हो रही थी. तब वह अपनी मंजिल तक संतोष के आटोरिक्शा से पहुंची थी. अनीता आटो से उतर कर चली तो गई लेकिन उस की शोख चंचल निगाहें, मुसकराता चेहरा संतोष के दिमाग में ही घूमता रह गया. उस की पहली ही झलक में संतोष अपना होशोहवास खो बैठा था, यह जानते हुए भी कि वह एक शादीशुदा और एक बच्ची का बाप है.

लेकिन वह यह सब भूल कर अनीता का सामीप्य पाना चाहता था. इस के लिए वह अकसर नगीनदास पाड़ा के आटो स्टैंड पर अनीता के आने का इंतजार करता था. वह दिख जाती तो वह मुसकराते हुए उस से अपने आटो में चलने की बात कहता. अनीता को तो किसी न किसी आटो से जाना ही था, लिहाजा वह संतोष के आग्रह पर उस के ही आटो में बैठ जाती.

2-4 बार संतोष के आटो से आनेजाने के बाद अनीता और संतोष के बीच बातों का सिलसिला शुरू हो गया. स्वयं को अविवाहित बता कर उस ने अनीता को अपने प्रभाव में ले लिया. बातों और मिलने का सिलसिला शुरू हो गया तो दोनों एकदूसरे के करीब आ गए. जब भी अनीता को संतोष के साथ कहीं घूमने के लिए जाना होता तो वह संतोष को बेझिझक फोन कर बुला लेती. इस तरह दोनों में गहरी दोस्ती हो गई.

दोस्ती का दायरा बढ़ा तो अनीता के मन में संतोष के प्रति प्यार का अंकुर फूट पड़ा. वह सरोज को अपने मनमंदिर में बैठा कर गृहस्थ जीवन के सुंदर सपने देखने लगी. जिस का संतोष ने भरपूर फायदा उठाया.

उस ने अनीता को शादी का लालच दे कर उस का अपनी पत्नी की तरह इस्तेमाल किया. 7 सालों में अनीता 2 बार गर्भवती भी हुई. लेकिन संतोष ने अपनी कोई न कोई मजबूरी बता कर उस का गर्भपात करवा दिया था.

7 सालों का समय कुछ कम नहीं होता. संतोष और अनीता के संबंधों की सारी जानकारी उस के परिवार वालों को हो चुकी थी. वे लोग अब उस पर शादी करने का दबाव बनाने लगे थे. अनीता भी अब और ज्यादा इंतजार नहीं करना चाहती थी.

वह भी अपने और संतोष के प्यार को रिश्ते का नाम देने के लिए दबाव बनाए हुए थी. वह उस से शादी कर के अपना एक घर बनाना चाहती थी. इस से संतोष की परेशानी बढ़ गई थी.

संतोष शादीशुदा और एक बच्ची का बाप था. वह अनीता की वजह से अपने परिवार की शांति भंग नहीं करना चाहता था. लेकिन जब पानी संतोष के गले तक आ गया तो मजबूरन उसे अनीता के सामने अपना मुंह खोलना पड़ा. अनीता को एक अच्छे माहौल में ले जा कर उस ने अपने शादीशुदा होने की बात बता दी.

उस ने कहा कि उस की शादी गांव और जाति के रस्मोरिवाज से बचपन में ही हो गई थी और अब वह एक बच्ची का पिता भी है.

ऐसे में अगर वह दूसरी शादी करेगा तो उस की ब्याहता का क्या होगा. उस ने साफ कह दिया कि अब वह दूसरी शादी नहीं कर सकता. लेकिन वह चाहे तो उस के साथ जीवन भर रह सकती है. उसे किसी भी तरह की परेशानी नहीं होने देगा.

यह जान कर अनीता सन्न रह गई. उसे लगा कि उस के ऊपर कोई पहाड़ गिर पड़ा. उसे लगा कि मानो उस का अस्तित्व ही खत्म हो गया. कुछ समय के लिए तो वह एक मूर्ति जैसी बन गई, लेकिन जब होश आया तो वह पागल सी हो गई थी. उस दिन अनीता और संतोष के बीच काफी कहासुनी और लड़ाईझगड़ा हुआ था.

संतोष की इस बात से अनीता काफी आहत हुई थी. उस के दिल में संतोष के प्रति नफरत हो गई. जाहिर सी बात है कोई भी लड़की तलाकशुदा या विधवा हो कर रह सकती है, लेकिन रखैल बन कर रहना पसंद नहीं करेगी.

काफी सोचनेविचारने के बाद अनीता ने यह तय किया कि बच्चे और प्यार का गम क्या होता है, अब वह संतोष को समझाएगी. जिस तरह से उस ने उस के 2-2 बच्चों का खून किया था, उस का बदला वह उसी तरह से चुकाएगी. तब उसे यह एहसास होगा कि बच्चा चाहे गर्भ में हो या गर्भ से बाहर, उसे खोने में कितना दर्द होता है.

अनीता ने संतोष की बेटी अंजलि के प्रति एक खतरनाक योजना बना कर उस के घर और स्कूल का पता लगा लिया और उस की अच्छी तरह रेकी की. पहले उस की योजना अंजलि को स्कूल से उठाने की थी, लेकिन स्कूल की चाकचौबंद सुरक्षा और अकसर मां के साथ होने के कारण उस का प्लान सफल नहीं हो सका.

इस के बाद उस ने संतोष के घर के पास से ही अंजलि को उठा लिया था. अंजलि को उठाने के पहले वह उस जगह पर आ कर बैठ जाती थी, जहां अंजलि बच्चों के साथ खेला करती थी.

मौका देख कर वह अंजलि को अपने पास बुला कर टौफी और चौकलेट दिया करती थी. 2-4 दिनों में जब अंजलि उस के काफी करीब आ गई तो वह उसे अपनी मीठीमीठी बातों में बहला कर अपने साथ ले कर चली गई.

अंजलि को पहले वह लोकमान्य तिलक स्कूल तक पैदल ले कर आई. फिर आटोरिक्शा से नालासोपारा रेलवे स्टेशन ले गई. वारदात को अंजाम देने के लिए उस ने अपने पास चाकू रख लिया था.

नालासोपारा स्टेशन से बोरीवली स्टेशन और फिर वहां से एक्सप्रेस ट्रेन पकड़ कर वह गुजरात के नवसारी रेलवे स्टेशन पहुंची. वहां मौका देख कर वह अंजलि को बाथरूम में ले गई और उस 5 वर्षीय बच्ची का गला काट कर हत्या कर दी.

अपने इंतकाम का बदला लेने के बाद अनीता सुबह की गाड़ी से अपने घर लौट आई थी. वह निश्चिंत थी कि पुलिस उस के पास तक नहीं पहुंच सकेगी. लेकिन पुलिस उस तक पहुंच ही गई.

अनीता वाघेला से पूछताछ करने के बाद पुलिस ने उस के विरुद्ध भादंवि की धारा 302, 362 के तहत मुकदमा दर्ज कर उसे गिरफ्तार कर न्यायालय में पेश किया, जहां से उसे तलोजा जेल भेज दिया गया.

अंजलि सरोज की हत्या की कहानी जब लोगों के सामने आई तो उस के परिवार वालों को तो क्या पूरे इलाके के लोगों को एक धक्का सा लगा. एक मासूम बच्ची अपने पिता के इश्क की भेंट चढ़ गई थी.

कथा लिखे जाने तक अनीता वाघेला जेल में बंद थी. आगे की जांच पीआई के.डी. कोल्हे कर रहे थे.

ठगों के निशाने पर बेरोजगार

हमारे यहां मूर्खों की कमी नहीं, एक  ढूंढ़ो हजार मिल जाते हैं. इन्हीं मूर्खों को ठग मनमाने तरीकों से ठग कर अपनी रियासतें खड़ी कर लेते हैं. वैसे ठगी का धंधा बहुत पुराना है. पहले के ठग पुराने तरीकों से लोगों को मूर्ख बना कर लूटते थे लेकिन आज ठगी के तरीकों में बदलाव आ गया है. अब नई टैक्नोलौजी के सहारे घरबैठे इंटरनैट, मोबाइल फोन आदि का सहारा ले कर जालसाजी की जाती है, विज्ञापनों के भ्रमजाल में फंसा कर लूटा जाता है. लेकिन मूर्खों में अब तक कोई बदलाव नहीं आया. वे जस के तस हैं. ऐसे लोग कभी सारदा चिटफंड जैसी फ्रौड कंपनियों द्वारा 2 के 4 किए जाने के लालच में अपना सबकुछ लुटा बैठते हैं तो कभी भविष्य बांचने वाले ज्योतिषियों, ढोंगी बाबाओं, संतों की बातों में आ कर अपनी गाढ़ी कमाई उन की झोली में डाल देते हैं. कभी कोई ठग मिट्टी की ईंटें सोने के दामों में इन के हाथों बेच देता है तो कभी नौकरी के नाम पर ये अपने लाखों रुपए फर्जी एजेंटों के हवाले कर देते हैं. आज के जमाने में ऐसे भी ठग हैं जो परचे बांट कर लोगों को आमंत्रित करते हैं और फिर उन्हें ठगते हैं.

एक आंकडे़ के मुताबिक, पूर्वी दिल्ली के लक्ष्मीनगर, निर्माण विहार, शकरपुर व इन के आसपास लगभग 250 फर्जी प्लेसमैंट एजेंसियां काम कर रही हैं और परचे बांट कर युवकयुवतियों को नौकरी दिलाने के नाम पर चूना लगा रही हैं. 24 साल का अंकुल वर्मा गाजियाबाद के एक छोटे से गांव का रहने वाला है. वह दिल्ली के एक इंस्टिट्यूट में पढ़ रहा है. पढ़ाई का खर्च निकालने के लिए वह काफी समय से पार्टटाइम नौकरी ढूंढ़ रहा था.

एक दिन उस ने सड़क पर लगे नौकरी दिलाने के एक विज्ञापन को देख कर उस पर दिए गए मोबाइल नंबर पर संपर्क किया. उसे इंटरव्यू के लिए नोएडा बुलाया गया, जहां एक छोटे से टैंपरेरी औफिस में एक मेज व कुछ कुरसियां पड़ी थीं और कुछ युवकयुवतियां बैठे थे. अंकुल से कुछ प्रश्न पूछने के बाद उस से एक फार्म भरवाया गया और जौब सिक्योरिटी के नाम पर उस से 500 रुपए वसूल कर उसे एक परची दे कर नोएडा स्थित एक्या टैक्नोलौजीज नामक कंपनी में भेज दिया गया जहां उस की नौकरी लगवा दिए जाने का दावा किया गया था. जब अंकुल वहां पहुंचा तो उसे पता चला कि इस कंपनी को कोई जानकारी ही नहीं थी कि उस के यहां किसी का इंटरव्यू होना है. अंकुल समझ गया कि दाल में कुछ काला है. उस ने विज्ञापन में दिए गए उस नंबर पर फिर संपर्क किया, फोन बंद था. अंकुल वापस उसी औफिस में पहुंचा जहां उस ने 500 रुपए दिए थे, लेकिन वह औफिस भी बंद निकला.

अंकुल ने कई चक्कर काटे, लेकिन औफिस नहीं खुला. यह 1 साल पुरानी घटना है. हाल ही में अंकुल जब लक्ष्मीनगर स्थित एक फर्जी प्लेसमैंट एजेंसी में नौकरी के लिए पहुंचा तो उसे होटल में वेटर की नौकरी दिलवाने का आश्वासन दे कर वरदी और जौब सिक्योरिटी के नाम पर उस से 1 हजार रुपए जमा करवाने को  कहा गया. यह छोटा सा औफिस लक्ष्मीनगर में एक बेसमैंट में चलाया जा रहा है जहां रमेश (बदला हुआ नाम) नाम का 25-26 साल का एक नौजवान युवक बौस बन कर बैठा है और उस के साथ काम करने वाली 3-4 लड़कियां आने वाले युवकों को नौकरी दिलाने का झांसा दे कर उन से 1 हजार रुपए वसूलने का जिम्मा संभालती हैं. यहां लंबे समय से युवकयुवतियों के साथ नौकरी दिलाने के नाम पर खिलवाड़ किया जा रहा है.

यहां पहुंचने पर हम ने पाया कि इस औफिस में एक पुलिस वाला भी बड़े दोस्ताना अंदाज में रमेश से अपने किसी रिश्तेदार की नौकरी लगवाने के लिए दबाव बना रहा था. रमेश व उस के यहां काम करने वाली एक लड़की निकिता (बदला हुआ नाम) ने हमें नौकरी देने का वादा किया और बताया कि हमें यहां आने वाले युवकों की जेब से किसी भी तरह 1 हजार रुपए निकलवाने होंगे. उन से ऐसे बात करनी होगी जिस से कि वे हमारी कंपनी पर आंख मूंद कर भरोसा कर लें. हमारी सैलरी इसी कार्यकुशलता के आधार पर निर्धारित की जानी थी कि हम 1 दिन में कितने युवकयुवतियों से रुपए निकलवाने में कामयाब हो पाते हैं. शुरू के 15 दिन हमें ट्रेनिंग पर रखे जाने की बात कही गई.

दरअसल, यहां आए युवकों को यहां मौजूद लड़कियां सोचनेविचारने का बिलकुल मौका नहीं देतीं और इस तरह बात करती हैं मानो यह नौकरी सिर्फ आज ही मिल सकती है. यदि देर की तो नौक री हाथ से निकल सकती है. ऐसे में युवक की जेब में जितने पैसे होते हैं उन्हें जमा करने क ो कह  कर बाकी दूसरे दिन जमा करवाने की मोहलत दे दी जाती है. हड़बड़ी में आ कर व्यक्ति तुरंत 1 हजार रुपए इन के हवाले कर देता है और फिर चक्कर पर चक्कर काटता रहता है और आखिरकार थक कर बैठ जाता है.

जब हम ने बतौर रिपोर्टर रमेश से इस बाबत बात की तो वह साफ मुकर गया कि वह किसी से भी 1 हजार रुपए नहीं लेता है. उस ने आगे कहा कि वह बिना पैसा लिए लोगों की नौकरी लगवाता है. लेकिन उस के पास इस बात का एक भी सुबूत नहीं था कि उस ने किसी की नौकरी लगवाई हो.

दरअसल, रमेश जैसे सैकड़ों ठग पूरी दिल्ली में चप्पेचप्पे पर अपना जाल बिछाए बैठे हैं और अंकुल जैसे सैकड़ों लड़केलड़कियों को मूर्ख बना रहे हैं. विशेष रूप से पूर्वी दिल्ली के लक्ष्मीनगर, शकरपुर व निर्माण विहार में पुलिस की नाक के नीचे लंबे समय से चलाया जा रहा यह धंधा चरम पर है. गलियों में छोटेछोटे औफिस 6 से 8 हजार रुपए में किराए पर ले कर इस तरह के ठगी के धंधों को अंजाम दिया जा रहा है. हैरानी की बात यह है कि यह ठगी छिपा कर नहीं बल्कि खुल्लमखुल्ला बसों, सड़कों, चौराहों पर परचे व हैंडबिल बांट कर, अखबारों में भ्रमित विज्ञापन दे कर, दीवारों पर पोस्टर आदि चिपका कर की जा रही है. ठग बड़ी कंपनियों में पार्टटाइम व फुलटाइम नौकरियों व आकर्षक वेतन का लालच देते हैं.

और तो और, राह चलते भी आप के हाथ में कोई सड़क किनारे खड़ा व्यक्ति विज्ञापन का छोटा सा परचा पकड़ा कर कौल सैंटर, बैंकों, रिसैप्शनिस्ट, वेटर आदि की नौकरी के लिए तुरंत इंटरव्यू करवा सकता है. इस के लिए न कोई उम्र का बंधन और न किसी विशेष डिगरी या उच्च शिक्षा की आवश्यकता बताई जाती है. इस तरह बेरोजगार युवकयुवतियां इन ठगों के जाल में फंस जाते हैं. इन परचों में औफिस का कोई पता या नाम नहीं दिया गया होता है. बस, एक  मोबाइल नंबर छपा होता है जिस पर संपर्क करने पर इंटरव्यू के लिए बुलाया जाता है और फिर ठगी के बाद इन मोबाइल नंबरों को बंद कर दिया जाता है या ठगी के किसी नए धंधे में प्रयोग किया जाता है.

एक ही समय में ये ठग कई टैंपरेरी औफिस खोल कर कई निजी कंपनियों के नाम से बेरोजगारों का पैसा हड़प रहे हैं.  एक जगह ठगी करने के बाद ये अपनी दुकान दूसरी जगह खोल कर अपना धंधा फिर से शुरू कर देते हैं. हैरानी तो तब होती है जब इन मामूली पढ़ेलिखे ठगों के निशाने पर पढ़ेलिखे लोग होते हैं जिन्हें फंसा कर ये अपनी उंगलियों पर नचाते हैं. पहले तो आश्वासन दिया जाता है कि बस 1 हजार रुपए देते ही नौकरी आप के हाथ में. जैसे ही 1 हजार रुपए इन के हाथ में आ जाते हैं, ये कहते हैं कि आप की 15 दिन की ट्रेनिंग होगी जिस के लिए 1 हजार से 15 हजार और जमा करवाने होंगे. जबकि ऐसी किसी टे्रनिंग के बारे में पहले नहीं बताया जाता.

टे्रनिंग के बाद 10-20 हजार रुपए वेतन वाली नौकरी मिल जाने का झांसा दिया जाता है. फंसा हुआ व्यक्ति यह पैसा भी जमा करवा देता है. इस के बाद उसे लंबे समय तक टाला जाता है और अंत में धमका कर या हाथापाई कर के भगा दिया जाता है. कभीकभी ट्रेनिंग के बाद किसी युवक को यदि किसी कंपनी में भेज भी दिया जाता है तो वहां उसे मात्र 4 या 5 हजार रुपए वेतन पर सफाईकर्मी या चपरासी की नौकरी पर रखा जाता है.

दरअसल, ठगी के ये ठिकाने लक्ष्मीनगर या शकरपुर में इसलिए हैं क्योंकि इस क्षेत्र में होस्टल व कंपीटिशन की किताबों की दुकानों की भरमार है, जहां छात्रछात्राएं बड़ी संख्या में देखे जाते हैं. इसी का लाभ उठा कर ठगी का धंधा करने वाले विशेषकर इन युवकयुवतियों को ही अपना निशाना बनाते हैं. इन फर्जी प्लेसमैंट एजेंसियों पर नौकरी पाने के लिए नौजवान लड़केलड़कियों का जमावड़ा लगा रहता है.

ऐसी ही ठगी करने वाले एक व्यक्ति ने अपना नाम न छापने की शर्त पर बताया, ‘‘पूर्वी दिल्ली में जितने नौकरी दिलाने के नाम पर औफिस खुले हैं वे सब ठगी के ठिकाने हैं. आज तक इन्होंने कभी किसी को नौकरी नहीं दिलाई और न ही किसी कंपनी के साथ इन का कोई कौंटै्रक्ट होता है. धोखाधड़ी के इस धंधे को बिना किसी बाधा के चालू रखने के लिए पुलिस को हफ्ता पहुंचाया जाता है. इसलिए ठगी का शिकार हुआ कोई व्यक्ति जब शिकायत ले कर पुलिस के पास जाता है तो उसे बहाने बना कर बैरंग लौटा दिया जाता है. ये धंधा पूर्वी दिल्ली के अलावा नेहरू प्लेस, पीतमपुरा, बदरपुर व जनकपुरी में भी जोरों पर है. मौडलिंग या फिल्मों में काम दिलाने के नाम पर भी लूट का धंधा चल रहा है.’’

वास्तव में ये कम पढ़ेलिखे ठग बड़ी आसानी से लोगों को अपने झांसे में फंसा लेते हैं. इन में से कुछ ऐसे ठग भी मिल जाएंगे जिन की बुरी नजर सिर्फ आप की जेब पर ही नहीं बल्कि खूबसूरत लड़कियों पर भी रहती है. ये लोग अपने पास आने वाली खूबसूरत लड़कियों को अच्छी नौकरी दिलाने के एवज में शारीरिक संबंध बनाने का प्रस्ताव रखते हैं. अधिकतर दूसरे शहरों से आए भोलेभाले युवकयुवतियां नौकरी की आवश्यकता के चलते आसानी से इन के चंगुल में फंस कर अपना सबकुछ गंवा बैठते हैं.

नौकरी के नाम पर ही नहीं, आप को पार्टटाइम, फुलटाइम बिजनैस में इनवैस्ट कर के अपना पैसा दोगुना करने का प्रलोभन भी दिया जाता है. इन के दरवाजे गृहिणियों, स्टूडैंट्स, रिटायर्ड आदि हर किसी के लिए खुले होते हैं. बस, जेब में पैसा होना चाहिए. यहां आप को शुरू में तो पैसा कमाने के लिए बिजनैस का बड़ा आसान तरीका बताया जाता है लेकिन समय के साथसाथ आप को इस फ्रौड बिजनैस के जाल में पूरी तरह उलझा दिया जाता है और आप के हजारों रुपए डूब चुके होते हैं और तब व्यक्ति जैसेतैसे इस से बाहर आने में ही अपनी भलाई सम?ाता है.

नौकरी दिलाने के गिरोह पूरे भारत में सक्रिय हैं जो भोलेभाले लोगों से लाखों रुपए की ठगी कर के फरार हो जाते हैं. विदेश में नौकरी दिलाने के नाम पर एजेंट इन युवकों से लाखों रुपए वसूल कर इन्हें अवैध तरीके से विदेशों में छोड़ कर भाग आते हैं. रेलवे, एमसीडी, पीडब्लूडी, मैट्रो ट्रेन, स्कूलों, सेना आदि में नौकरी दिलाने के नाम पर पूरे देश में सक्रिय ये गिरोह लोगों को लाखों का चूना लगा कर चंपत हो जाते हैं.

दरअसल, ठगी का यह धंधा और ये ठग इसलिए कभी कम नहीं होते क्योंकि भारत जैसे करोड़ों की आबादी वाले देश में आम जनता को लालच दे कर ठगना बड़ा आसान है. यह ठीक है कि बेरोजगारी और गरीबी के कारण लोग इन ठगों के चंगुल में फंसने को बाध्य हो जाते हैं. ऐसे सैकड़ों गिरोह निजी कंपनियों के नाम से हमारे और आप के बीच सक्रिय हैं.

यहां सवाल यह नहीं है कि ठग ठगी क्यों करता है बल्कि इस से बड़ा सवाल है कि आखिर हम ठगे क्यों जाते हैं? वास्तव में क्या हम पढ़ेलिखे हो कर भी इतने बेवकूफ हैं कि कोई भी राह चलता व्यक्ति हमें मूर्ख बना कर ठग ले. हमारे सोचनेसम?ाने की शक्ति क्या इतनी क्षीण हो चुकी है कि हम यह भी नहीं भांप पाते कि सारदा चिटफंड जैसी धोखेबाज कंपनी 1 लाख लोगोंका पैसा कैसे दोगुना कर देगी, कहां से लाएगी वह इतना पैसा. दरअसल, हमें भेड़चाल की आदत लग चुकी है. जिस तरफ 10 लोगों को दौड़ते देखा, सब उधर ही भागने लगते हैं. चाहे वे 10 लोग कुएं में ही कूदने क्यों न जा रहे हों. सम?ादार लोग दूसरों की गलतियों से सीख लेते हैं लेकिन इस तरह के मूर्ख जब तक खुद खड्डे में नहीं गिर जाते तब तक संभलते नहीं हैं. ऐसे लोगों के बल पर ही धोखाधड़ी के नएनए धंधे पनप रहे हैं.

यदि आप को सड़क पर कहीं किसी दीवार आदि पर नौकरी दिलाने का कोई विज्ञापन चिपका दिखे या नौकरी के नाम पर कोई आप से पैसा मांगे तो कतई उस के झांसे में न आएं. ये बहुरुपिए ठग आप से कहीं भी किसी भी रूप में टकरा जाएंगे और आप को ठग कर रफूचक्कर हो जाएंगे.

ऐसे मौके कम ही आते हैं जब ये ठग पकड़े जाते हों, इसलिए ठगे जाने के बाद हायतौबा करने से अच्छा है कि इन से सचेत और सावधान रहें.

कुछ बदल रहा है (भाग-1)

सुनीता जब भी भारत में रह रहे अपने बेटे से फोन पर उस की शादी की बात करती, वह टाल जाता. बेटे का कुंआरापन अब सुनीता को जबरदस्त अखरने लगा था. 6 फुट की उस की हृष्टपुष्ट काठी, 28 साल की जवान उम्र, ऊपर से नौकरी भी अच्छीखासी…ऐसे में ‘सिंगल’ बने रहने का भला क्या तात्पर्य.

कुछ माह पहले ही सुनीता ने भारत के कई अखबारों व वेबसाइट्स पर उस की शादी के लिए वैवाहिक विज्ञापन निकाला था. कई तरह के प्रस्ताव आ रहे थे. लड़की वाले चिट्ठियां, फोन व ईमेल्स से संपर्क कर रहे थे और अपनी लड़कियों के आकर्षक बायोडाटा भेज रहे थे.

भारत में अपने रिश्तेदारों से सुनीता की जब भी बात होती तो वह भी न जाने कितनी लड़कियां सुझा देते. यहां डेनमार्क में रह रहे कुछ भारतीय भी, जब उन्हें पता चलता कि उन का एक काबिल लड़का अविवाहित है, तो दबे शब्दों में अपनी लड़कियों का जिक्र करने लगते. मगर लड़का था कि किसी भी रिश्ते में कुछ रुचि ही नहीं लेता.

सुनीता की पिछली बार जब बेटे से फोन पर बात हुई तो उसे अल्टीमेटम दे डाला, ‘‘हम कुछ नहीं जानते. अगली बार जब हम भारत आएंगे तो मुझे शादी करनी पडे़ेगी, चाहे तू किसी से भी करे.’’

‘‘मां, मैं किसी विधवा से शादी कर सकता हूं? किसी बच्चे वाली अकेली औरत से शादी कर सकता हूं? किसी दूसरे धर्म की लड़की से शादी कर सकता हूं?’’ वह अजीबोगरीब सवाल पूछने लगा.

सुनीता का माथा ठनका, ‘‘यह तू कैसे सवाल पूछ रहा है? क्या तू वाकई किसी…’’

‘‘नहींनहीं, बस मजाक कर रहा हूं.’’

‘‘नहीं, बेटा बता… क्या तू किसी को पसंद करता है? हम इतने दकियानूसी नहीं हैं,’’ सुनीता ने गंभीर स्वर में कहा.

‘‘मां, जब आप यहां आओगे तो बताऊंगा,’’ वह बोला और झट से बात का रुख बदल दिया.

बेटे से बात खत्म करने के बाद भी सुनीता का ध्यान उसी की तरफ रहा. 10 साल हो गए थे उन्हें उस से अलग रहते हुए. वह तब 18 साल का था, पति की पोस्टिंग तेहरान में थी और उन्होंने उस को 12वीं के बाद तेहरान से भारत भेज दिया था, इंजीनियरिंग कोर्स करने के लिए. पति की विदेश मंत्रालय की नौकरी होने के कारण 3 पोस्टिंग उन्हें लगातार बाहर के देशों की मिलती रहीं. तबादले के इसी क्रम में वे तेहरान के बाद रोम गए, फिर रियाद गए और अब पिछले वर्ष कोपनहेगन आ गए थे.

इसी बीच बेटे ने हैदराबाद से इंजीनियरिंग की, पूना से एम.बी.ए. किया और 4 सालों से बंगलौर इन्फोसिस में नौकरी कर रहा था. बेटी को भी उन्होंने 3 साल पहले रियाद से हैदराबाद के उसी इंस्टीट्यूट से इंजीनियरिंग करने भेज दिया था, जहां से बेटे ने की थी. इस तरह शर्मा दंपती के दोनों बच्चे भारत में थे और वे विदेश में. बेटी अभी पढ़ रही थी इसलिए शर्मा दंपती चाहते थे कि बेटा शादी कर के अपनी गृहस्थी बसा ले तो वे बेटे के प्रति अपनी जिम्मेदारियों से स्वयं को मुक्त समझें.

सुनीता के पड़ोस में एक भारतीय शीतल श्रीनिवासन का परिवार रहता था. यद्यपि शीतल, सुनीता से उम्र में लगभग 12 साल छोटी थी पर उन के बीच दोस्ती अच्छी हो गई थी. इसीलिए शीतल से सुनीता अपने मन की सब बातें कर लेती थी. शीतल के सामने सुनीता अपने मन की शंका जाहिर करते हुए बोली कि बेटे ने आखिर ऐसे सवाल क्यों पूछे? कहीं वास्तव में वह किसी विधवा, बच्चे वाली को चाहता तो नहीं है. जब पिछली बार हम दिल्ली गए थे तो उस के आफिस से एक तलाकशुदा औरत का अकसर उसे फोन आता था. कहीं उस के साथ उस का कुछ चक्कर तो नहीं है.

शीतल का दिमाग बड़ा शातिर था. वह इंटरनेट पर भारत की खबरें पढ़पढ़ कर सुनीता को बताती कि भारत अब तेजी से बदल रहा है. सभी जवान लड़केलड़कियां गर्लफे्रंड बनाने लगे  हैं. डेटिंग, ब्रेकिंगअप व लव मैरिज आज वहां भी आम बात बनती जा रही है.

बेटे की बातें सुन कर सुनीता का मन इस कदर बेचैन था कि भारत जाने का जो कार्यक्र्रम 6 महीने बाद का था वह पति से जिद कर के 1 महीने बाद का करवा लिया. दिल्ली स्थित उन का पहाड़गंज का अपना घर तब ही खुलता था जब वे होम लीव पर भारत आते थे. उन का बेटा मनु अपनी नौकरी से महीने भर का अवकाश ले कर बंगलौर से  दिल्ली अपने मातापिता के स्वागत के लिए पहले ही पहुंच गया. मातापिता के आनेजाने की सुविधा के लिए उस ने किराए की एक कार का इंतजाम कर दिया.

कार ले कर उन्हें रिसीव करने मनु एअरपोर्ट आया. 1 साल बाद सुनीता बेटे से मिल रही थी. वह उस के गले लग गई. पूरे रास्ते, जब वह गाड़ी चला रहा था, पीछे की सीट पर ठीक उस के पीछे बैठी अपने दोनों हाथों से उस का कंधा पकडे़ रही. बेटे का यह स्पर्श सुनीता को एक सुकून दे रहा था.

घर पहुंच कर मनु ने कार पार्क की. डिक्की से मातापिता के बैग व सूटकेस निकाले और उन्हें थाम कर अपने घर की तरफ बढ़ गया, पीछेपीछे सुनीता व पंकज शर्मा थे. जैसे ही सुनीता घर में घुसी तो घर एकदम साफसुथरा व सुव्यवस्थित लगा. सुनीता पुलकित हो कर अपने बेटे से बोली, ‘‘मनु, यह तो अच्छा लगा कि तू ने हमारे घर पहुंचने से पहले ही घर की सफाई कर के रख दी.’’

‘‘उस ने की,’’ मनु बोला.

‘‘किस ने?’’

‘‘वह भी मेरे साथ बंगलौर से यहां आई है न.’’

‘‘कौन?’’ सुनीता अनजान बनते हुए बोली.

‘‘और कौन? इस की फ्रेंड जो है,’’ सुनीता के पति बीच में बोले.

‘‘उस का नाम सेंनली है मां.’’

सुनीता ने बेटे को भरपूर नजरों से देखा तो वह नजरें चुराते हुए बोला, ‘‘मां, वह यहां हौजखास में अपनी किसी सहेली के घर टिकी है. कल वह यहां आई थी. उसी ने यह घर ठीकठाक किया है.’’

‘‘कहां की है वह और जाति क्या है उस की?’’

‘‘मैं जातिपाति को नहीं मानता, मां. सेंनली क्रिश्चियन है और असम की है.’’

‘‘क्रिश्चियन, कहां मिली वह तुझे?’’

‘‘हैदराबाद में मेरे साथ इंजीनियरिंग करती थी.’’

‘‘इस का मतलब पिछले 10 सालों से तेरा उस से चक्कर है और तू ने कभी हमें बताया भी नहीं.’’

‘‘मां, हम एकदूसरे के प्रति कुछ समय से सीरियस हुए हैं और आप दोनों पहले भी उस से मिल चुके हैं. जब पापा की कुछ समय के लिए दिल्ली पोस्टिंग थी और मैं गरमियों की छुट्टियों में उसे ले कर घर आया हुआ था.’’

खैर, दूसरे दिन हैदराबाद से सुनीता की बेटी तुला भी दिल्ली पहुंच गई. दोनों बच्चे सान्निध्य में…इन क्षणों का सुनीता को बड़ी बेसब्री से इंतजार रहता था. अगले रोज ही अपने बेटे को पीतमपुरा भाई के घर मां को लिवाने भेज दिया. मां भी उस के पास पहुंच गईं. मां और बच्चे….अगर विदेश में वह कुछ मिस करती थी तो अपने इन करीबी रिश्तों को.

सुनीता ने उन सब के बीच अपनी गृहस्थी ऐसे शुरू कर दी जैसे दिल्ली के अपने इस घर से वह कभी कहीं गई ही नहीं. हमेशा इस की चारदीवारी के भीतर ही बंधी रही.

2-3 दिन गुजरे तो सुनीता बेटे से बोली, ‘‘मनु, जहां कहीं की भी वह हो, जो कुछ भी उस का नाम हो, हमें उस से मिला तो सही. हम दरअसल इस बार उसी से मिलने यहां आए हैं.’’

‘‘वह भी आप लोगों से मिलने ही बंगलौर से यहां आई है,’’ कहते हुए मनु ने मोबाइल निकाला, सभी से थोड़ी दूर खिसक, एकांत में जा उस से कुछ बातें कीं और दूसरे दिन, दोपहर में सेंनली आ गई.

सुनीता को सब अच्छी तरह मालूम था कि सेंनली किस प्रदेश की है, किस जाति की है, मगर जब वह सामने आई तो उसे देख कर उन के दिल पर सांप लोट गया. उन्हें लगा जैसे चीन, जापान, थाईलैंड या कोरिया की कोई युवती उस के सामने आ गई है.

‘यह हिंदुस्तान भी कितना विचित्र देश है. कैसीकैसी शक्लसूरत व स्वर वाले लोग यहां रहते हैं,’ सुनीता मन ही मन बुदबुदाई.

‘‘जरनी कैसा…था?’’

वह बात भी कर रही थी तो टूटीफूटी हिंदी में….उफ.

‘‘तुम कहती हो कि तुम हिंदुस्तानी हो पर तुम्हें हिंदी तक ढंग से बोलनी नहीं आती,’’ सुनीता तल्खी से बोली.

वह मुसकराते हुए बोली, ‘‘मनु से सीख तो रही हूं…’’

‘‘विदेश में कई भारतीयों के बच्चों को मैं ने देखा है. वे विदेश में जन्मे व पलेबढ़े हैं पर बहुत अच्छी हिंदी बोलते हैं. तुम अपने देश में रहते हुए भी ढंग से हिंदी बोलना नहीं जानतीं?’’

‘‘विदेश में जो भारतीय बच्चे हिंदी बोलते होंगे उन की मदर टंग हिंदी होगी. मेरी मदर टंग असमीज है.’’

सुनीता का बात करने का तरीका सेंनली को पसंद नहीं आया तो वह उन्हें उपेक्षित कर तुला व मनु की तरफ उन्मुख हो कर उन से अंगरेजी में बातें करने लगी. तीनों को आपस में फर्राटेदार अंगरेजी में बातें करते देख सुनीता को बड़ी कोफ्त हुई.

‘‘यह तुम लोग अंगरेजी में बात क्यों कर रहे हो?’’

‘‘मम्मी, समझा करो. सेंनली को हिंदी ढंग से नहीं आती,’’ तुला बोली.

‘‘मम्मी, तुम उन छोटेछोटे इसलामी व यूरोपीय देशों की तुलना भारत से मत करो, प्लीज,’’ मनु ने जबान खोली, ‘‘यहां लोग एक नहीं कई भाषाएं बोलते हैं. यहां कई जाति व धर्म के लोग रहते हैं. यहां कई तरह के रंग हैं.’’

सुनीता ने महसूस किया कि मनु को यों अपनी मां के साथ तर्क करते देख सेंनली के चेहरे पर एक भीनी मुसकान तैर गई थी.

बहरहाल, मनु व तुला सेंनली से बात करने में लगे थे और सुनीता के पति पंकज शर्मा हाथों में डिजिटल कैमरा पकड़े बेटे के साथ सेंनली का पोज बनाए तसवीरें खींचने में लगे थे.

सुनीता मौन साधे सोफे पर बैठी रही. मनु व तुला का सेंनली के साथ यों घनिष्ठता से बात करते, पति का उस की तसवीरें खींचना और मां का उसे चाय- पकौडे़ परोसना, सब सुनीता को बेहद अखर रहा था. सेेंनली को बहू स्वीकार करने को उस का मन गवाही नहीं दे रहा था.

खैर, चायनाश्ते के दौर के बाद सेंनली ने अपना पर्स उठाया और सोफे पर से उठ गई.

– क्रमश:

आतंकवादी नहीं हूं मैं (भाग-1)

रात के 12 बज रहे थे. राजा अभी तक घर वापस नहीं लौटा था. रानो के 6 साल के विवाहित जीवन में ऐसा पहली बार हुआ था कि राजा के घर आने में इतनी देर हुई. रानो ने अपने 5 वर्षीय पुत्र अरमान को सुला दिया और पति के लौटने का बेसब्री से इंतजार करने लगी. बारबार फोन की तरफ उस का हाथ बढ़ जाता पर राजा की हिदायत याद आते ही वह अपने को नियंत्रित कर लेती. इंतजार करतेकरते जब वह थक गई तो मन कई तरह की आशंकाओं से घिर गया. आखिर बेचैन हो कर उस ने बेकरी में फोन लगा ही लिया.

उस तरफ से सुखदेव की आवाज आई, ‘‘सवेरेसवेरे ही राजा कहीं चला गया. किसी को बता कर भी नहीं गया. हम भी उस का इंतजार कर रहे हैं. बेकरी बंद करने का समय हो गया है.’’

यह सुनते ही रानो सन्न रह गई. उस ने धीरे से पूछा,  ‘‘अकेले गए हैं या किसी के साथ?’’

‘‘बीबीजी, आज सवेरे कु छ विचित्र सा घटा. एक ग्राहक राजा को देख कर ऐसे चौंका जैसे पुराना परिचित हो और उस से भी विचित्र बात तो यह लगी कि उस ने राजा को  ‘रज्जाक’ नाम से पुकारा,’’ वह बोला.

कुछ रुक कर सुखदेव आगे धीरे से रहस्यमय ढंग से बोला, ‘‘रज्जाक, संबोधन पर राजा ने ऐसे पलट कर देखा जैसे वह वाकई में रज्जाक हैं, राजा नहीं. उसी के साथ गए हैं, आते ही होंगे. आप चिंता मत करो. जानपहचान वाला लगता था. बातोंबातों में समय का ध्यान नहीं रहा होगा.’’

आतंकित हो उठी रानो. पूरी बात सुने बिना ही फोन रख दिया. आगे सुनने की उस में हिम्मत नहीं थी. वह सुखद वर्तमान में अपने दुखद अतीत को भूल चुकी थी. डर से मन ही मन बोली कि कहीं वह  ‘इतवारी’ तो नहीं जिस ने राजा को अपने आतंकवादी गिरोह में मिलाने का असफल प्रयास किया था.

उस के आगे वह नहीं सोच सकी. तनाव से उस ने अपने दोनों हाथों से सिर थाम लिया. याद आई उसे वह भयानक रात.

एम.ए. अंतिम वर्ष की परीक्षा समाप्त होते ही वह अपने ननिहाल अरवा गांव में आई थी. खूबसूरत घाटी में सब के साथ हंसतेघूमते 1 माह कैसे गुजर गया पता ही नहीं चला. अपने घर जम्मू वापस लौटने की घड़ी आ पहुंची थी. छोटे मामा के साथ अगली सुबह पहली बस से जम्मू लौटने का प्रोग्राम बना करसब सोने की तैयारी करने लगे थे.

रात के 11 बजे थे कि गोलियों की आवाज ने सन्नाटे को बींध दिया. अचानक दरवाजा तोड़ कर 5 व्यक्ति अंदर घुसे और देखतेदेखते सब को बंदूक की  गोलियों से भून कर वहीं ढेर कर दिया. रानो को गोली बगल से छू कर निकल गई. वह बच गई पर सांस रोक कर डर के मारे शव के समान पड़ी रही. सब को मृत समझ कर आतंकवादी वापस जाने को जैसे ही मुड़े तो वह झट से उठी और अंदर के कमरे में आ गई. पर एक आतंकवादी की नजर उस पर पड़ गई. लंबे डग भर कर, बंदूक ताने वह उस के पीछे आ गया. डर के मारे रानो की घिग्घी बंध गई. मौत सामने खड़ी थी. फटीफटी आंखों से वह उसे देखने लगी. उस का शरीर भय से कांप रहा था. खिड़की से चांद का प्रकाश उस के चेहरे पर पड़ रहा था.  वह युवक गोली न चला कर मंत्रमुग्ध सा उस का चेहरा देखने लगा. अचानक उस ने बंदूक ऊपर उठाई और हवा में फायर कर दिया. मुंह पर उंगली रख कर रानो को चुप रहने का निर्देश दिया फिर धीरे से बोला, ‘घबरा मत. दोस्त समझ. आ कर बचाऊंगा तुझे.’

कमरे को बाहर से बंद कर के वह अपने साथियों के साथ रात के अंधेरे में गुम हो गया. पूरे गांव में दहशत फैलाने के बाद जब उस के चारों साथी नशे में धुत हो गए तो वह चुपके से रानो के पास वापस आया और उसे बुर्का देते हुए बोला, ‘बुर्का पहन ले और चल मेरे साथ.’

किसी तरह बचते- छिपते बस स्टैंड आ पहुंचे और पहली बस से जम्मू के लिए रवाना हो गए.’

बस में बैठते ही रानो अपने परिजनों की मौत को याद कर के रोने लगी. बगल में छोेटे मामा के स्थान पर अब एक आतंकवादी बैठा था. उस का मन घृणा से भर उठा.

वह उस के कान के पास अपना मुख ले जा कर फुसफुसाया,  ‘डर मत, मैं तेरा दोस्त हूं. मेरा नाम रज्जाक है.’

जम्मू बस स्टैंड पर उतरते ही रज्जाक, रानो से बोला,  ‘मुझे दुख है, उन जालिमों ने तेरे परिवार के सभी सदस्यों को मार डाला. यहां तेरा कोई रिश्तेदार है तो पता बता दे, मैं तुझे वहां सकुशल पहुंचा देता हूं.’

रानो ने भर्राई आवाज में कहा, जो मारे गए वे मेरे नाना, नानी, मामा, मामी व उन के बच्चे थे. मेरा घर यहीं जम्मू में है.

रानो के बताए हुए पते पर उसे छोड़ कर रज्जाक लौटने लगा था तो उस के कानों में ऊंची आवाज पड़ी,  ‘करमजली, सुबहसुबह मनहूस खबर लाई है. ऐसे कैसे तू अकेली जिंदा बच गई? बोल किस के साथ मुंह काला कर के आई है?’

रानो रोरो कर सच बयान कर रही थी पर उस के मातापिता उस की बात मानने से इनकार कर रहे थे. क्रोधित हो रज्जाक पलटा और दरवाजे पर खड़ा हो कर बोला, ‘यह सच कह रही है.’

‘तुझे इस की सचाई की चिंता क्यों है?’ दहाड़े रानो के पिता.

‘क्योंकि मैं इसे बचा कर लाया हूं्. मैं हूं इस की सचाई का एकमात्र प्रत्यक्षदर्शी गवाह,’ प्रत्युत्तर में वह भी चीखा.

घर में कोहराम मच गया. रोती हुई मां ने धक्का मार कर जवान बेटी को घर से बाहर निकाल कर दरवाजा बंद कर दिया.

रानो विलाप करने लगी,  ‘मां, बाऊजी, दरवाजा खोलो. मैं सच बोल रही हूं. मैं ने कुछ गलत नहीं किया. कहां जाऊंगी मैं?’

‘मर, जा कर कहीं भी’, आवाज आई थी मां की.

रज्जाक की ओर मुड़ कर रानो बोली,  ‘मुझे बचाने के उपकार के बदले तुम्हें क्या मिला?’

आसपड़ोस के लोग इकट्ठा हों उस से पहले रज्जाक रानो का हाथ पकड़ कर चल पड़ा और वह सुबकियां लेते हुए रज्जाक के पीछेपीछे चल पड़ी. बीचबीच में मुड़ कर वह अपने घर का बंद दरवाजा हसरत भरी निगाहों से देखती जाती थी, जहां उस ने 20 साल गुजारे थे. दोनों एक सुनसान स्थान पर बैठ कर आगे की योजना पर विचार करने के लिए बैठ गए. रज्जाक बोला,  ‘रानो, अपने बारे में बता.’

‘संस्कृत में एम.ए. की परीक्षा दे कर मैं ननिहाल गई थी. यही है मेरी गाथा,’ बोल कर वह जमीन कुरेदने लगी थी.

एकटक रानो को देखते हुए रज्जाक दीर्घनिश्वास छोड़ कर बोला, ‘कोई सचाई पर विश्वास न करे तो दुख होता है न, रानो.’

रानो ने हां में सिर हिला दिया.

कुछ देर चुप रहने के बाद वह बोला,  ‘मुझे भी बहुत दुख हुआ था, जब तू ने मुझ पर आतंकवादी होने का झूठा आरोप लगाया था. रानो, मैं आतंकवादी नहीं हूं. मेरी बात पर विश्वास कर.’

रानो ने जब कुछ उत्तर नहीं दिया तो वह खड़ा हो गया और अचानक पलट कर बोला,  ‘अच्छा, तू यह सोच रही है कि मैं उन चारों के साथ क्यों था? तो सुन, मेरे पिता की सज्जाद बेकरी के नाम से यहीं जम्मू में अपनी दुकान है. करीब 20 दिन पहले हम 5 मित्र पिकनिक मनाने पहाड़ी पर गए थे. मेरे 2 साथियों ने भेड़ चराने वाली लड़कियों के साथ छेड़छाड़ शुरू कर दी. उन की शिकायत पर क्रोधित गांव वालों ने हमें घेर लिया और पुलिस के हवाले कर दिया. मेरे साथियों के पिता अपनेअपने बेटों को छुड़ा कर ले गए पर मेरे पिता उस दिन शहर से बाहर गए थे, इसलिए किसी ने मेरी सुधि नहीं ली.

‘आतंकवादी सरगना ‘इतवारी’ वहां से मुझे छुड़ा कर जबरदस्ती अपने साथ ले गया क्योंकि उसे अपने गिरोह के लिए लड़कों की जरूरत थी. अपने कैंप में टे्रनिंग देने के बाद उस ने कल रात पहली बार मुझे मिशन पर भेजा था. सच मान रानो, मैं ने किसी का खून नहीं किया. बोल रानो, मैं आतंक वादी नहीं हूं.’

उस के आग्रह पर रानो अचानक गंभीर हो गई और सोचने लगी कि कितना अच्छा होता जो यह मुझे मार देता.

मांबाप के झूठे लांछन को याद कर वह पहाड़ी की ओर मरने के लिए दौड़ पड़ी तो रज्जाक ने उसे दौड़ कर पकड़ लिया और बोला, ‘यह क्या, रानो? तुझे मरने के लिए नहीं बचाया था मैं ने. अच्छा हुआ रात को मैं ने तुझे देखा, उन जालिमों ने नहीं. तेरे खूबसूरत चेहरे पर चांद की रोशनी पड़ रही थी. मैं ने तुझे देखा तो देखता ही रह गया. खूबसूरती कुदरत की नियामत है.

अपनी प्रशंसा सुन कर खुश होने के बजाय रानो सिसकने लगी, ‘नहीं जी सकती मैं. मेरे मातापिता ने मुझ पर विश्वास नहीं किया. मेरी मां ने कितना गंदा आरोप मुझ पर लगाया है. कहां है तेरी बंदूक रज्जाक? कर दे सीना छलनी मेरा. मुक्ति दिला दे जीने की यंत्रणा से.’

रोती हुई रानो को रज्जाक समझाने लगा, ‘मत रो रानो. एक दिन तेरे मातापिता को अवश्य पछतावा होगा और वे तुझ से माफी मांगेंगे.’

‘जिऊं गी तभी तो वे माफी मांगेंगे. रज्जाक, मुझे मार दे और तू अपने घर लौट जा,’ वह बोली.

‘घर?’ एक दीर्घ निश्वास छोड़ कर रज्जाक बोला,  ‘कैसे लौट जाऊं? घर तो छीन लिया इतवारी ने. अब पुलिस की फाइल में आतंकवादी के रूप में मेरा नाम दर्ज है. मुझे तो अब पुलिस के साथ इतवारी से भी खतरा है.’

हालात से जकड़े दोनों एकदूसरे को मौन देखते रहे, जैसे दोनों अब आगे क्या करना है इस बारे में सोच रहे हों. फिर रज्जाक बोला कि तू यहीं छिपी बैठी रह. मैं अभी अपनी अम्मी से रुपए मांग कर लाता हूं. हम दिल्ली चलेंगे, इतवारी और पुलिस से दूर.

रानो को छोड़ कर रज्जाक छिपता हुआ अपने घर पहुंचा. पिता बेकरी में थे. अम्मी घर में अकेली थीं. अम्मी ने रज्जाक को देखते ही उस का हाथ खींच कर कमरे में बंद कर लिया और सीने से लगा कर बेतहाशा चूमने लगीं.

कुछ पल उसे देखने के बाद बोलीं,  ‘गांव में वारदात हुई है. पुलिस तुझे ढूंढ़ते हुए यहां आई थी.’

रज्जाक के साथ जो कुछ घटा था सब सचसच उस ने अपनी अम्मी को बता दिया. रानो के बारे में सुनते ही उस की अम्मी डर के मारे कांप उठीं.

‘अभी तेरे 2 दुश्मन हैं, पुलिस व इतवारी,’ अम्मी बोलीं,  ‘अब यह हिंदू- मुसलिम का बखेड़ा क्यों खड़ा कर रहा है?’

तभी दीवारघड़ी पर नजर पड़ते ही रज्जाक बुरी तरह घबरा गया. 1 घंटे से अधिक हो गया था. रानो की चिंता सताने लगी. जल्दी से अपनी दाढ़ी साफ कर के बोला, ‘अम्मी, मुझे अभी जाना होगा. जल्दी से कुछ रुपए दे दो. दिल्ली जा कर कुछ कामधंधा करूंगा. किसी को बताना नहीं. तुम्हें अपनी खबर भेजता रहूंगा.’

मां ने घर में पड़े 20 हजार रुपए बेटे को दे दिए. रज्जाक रुपए ले कर तेजी से घर के बाहर चला गया.

दिल्ली पहुंच कर रज्जाक ने गरीबों की बस्ती में एक कमरा किराए पर ले लिया. अब वह रोज सवेरे काम की खोज में निकल जाता और शाम को थकाहारा कमरे पर वापस लौट आता. उसे बेकरी के सिवा किसी काम का अनुभव नहीं था.

रानो ने सुझाव दिया,  ‘बेकरी में काम ढूंढ़ो.’

एक ब्रेड बेचने वाले से पता लगा कर रज्जाक सुलेमान बेकरी में जा पहुंचा पर सुलेमान ने उसे काम देने से मना कर दिया. उस रात रानो बोली,  ‘रज्जाक, ऐसे तो काम नहीं चलेगा. कल से मैं भी तुम्हारे साथ चल कर कुछ काम ढूंढ़ लूंगी.’

रज्जाक बीच में ही चीख पड़ा,  ‘नहींऽऽऽ.’

डर गई रानो. वह रोने लगी तो रज्जाक ने उस का चेहरा अपने दोनों हाथों में थाम लिया और प्यार से बोला,  ‘देख रानो, यह चांद सा चेहरा तू किसी को मत दिखाना. डर लगता है कि कहीं तुझे खो न दूं.’

फिर गंभीर स्वर में रज्जाक बोला,  ‘रानो, शादी करेगी मुझ से?’

लजा गई रानो,  ‘साथ तो रह रही हूं.’

‘ऐसे नहीं,’ मेरी बीवी बन कर. तब तेरे पास आने से मुझे डर नहीं लगेगा.’

‘ठीक है’, रानो ने कहा, ‘पर कौन कराएगा हमारी शादी? नाम सुनते ही लोगों को शक हो जाएगा.’

‘तो मैं अपना नाम बदल कर राजा रख लेता हूं,’ अपनी दाढ़ी तो वह पहले ही साफ कर चुका  था, अब नाम भी बदल लिया. शादी करने का निर्णय लेते ही दोनों प्रसन्न हुए और भोर होते ही मंदिर जा पहुंचे, पर वहां ताला बंद था.

रानो बोली,  ‘देख राजा, हम दुनिया के सामने तो पतिपत्नी ही हैं. पर यहां हम अपने मन की शांति और अपने रिश्ते पर पवित्रता की मुहर लगाने के लिए आए हैं.’

दुपट्टे का एक छोर अपनी कमर में बांधा और दूसरा राजा के हाथ में पकड़ाते हुए रानो ने कहा,  ‘राजा, तू आगेआगे चल मैं तेरे पीछे.’

बंद मंदिर के सात फेरे लगा कर दोनों वापस घर आ गए. दोनों के मुख पर अपूर्व शांति थी. अब दोनों के बीच में न कोई झिझक थी न ही कोई दीवार. विपरीत परिस्थितिवश साथ निभाने को विवश इस जोड़े का रिश्ता सामाजिक रूप से सम्मानित हो चुका था.

प्रसन्नचित्त राजा काम की तलाश में फिर से बेकरी जा पहुंचा. वहां जा कर पता चला कि एक कारीगर के बीमार होने के कारण सुलेमान मियां परेशान हैं.

– क्रमश :

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