साजिश जो छिप न सकी

पंजाब के जिला संगरूर के गांव लखोवाल निवासी शेर सिंह पहली अक्तूबर, 2017 को थाना भवानीगढ़ के अंतर्गत पड़ने वाली पुलिस चौकी पहुंचे. उन्होंने चौकीइंचार्ज एएसआई गुरमीत सिंह को एक लिखित तहरीर देते हुए कहा कि मैं कल सुबह अपने बेटे यादविंदर के साथ अपने खेतों पर काम करने के लिए गया था. खेतों के नजदीक ही एक प्लाईवुड फैक्ट्री थी. कुछ देर बाद उसी फैक्ट्री में काम करने वाले शिवकुमार और राम नरेश हमारे पास खेत पर आ गए.

शिवकुमार और रामनरेश दिन भर खेतों पर साथ ही रहे. रात करीब 9 बजे मैं ने और मेरे बेटे ने उन दोनों को अपनी मोटरसाइकिलों से प्लाईवुड फैक्ट्री छोड़ दिया. उन्हें छोड़ कर मैं अपने बेटे के साथ घर की ओर लौट रहा था तभी कोई ट्रक बेटे की मोटरसाइकिल में पीछे से टक्कर मार कर भाग गया. उस समय रात के यही कोई साढ़े 9 बज रहे थे, इसलिए मैं ट्रक का नंबर भी नहीं देख पाया.

यादविंदर खून से लथपथ सड़क पर पड़ा तड़पने लगा. फोन करने के बाद जब अस्पताल की एंबुलेंस वहां पहुंची तो उसे नाभा अस्पताल ले जाया गया, जहां डाक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया. यादविंदर के पास उस समय एक मोबाइल फोन था. वह मौके पर ही कहीं खो गया. शेर सिंह ने उस अज्ञात ट्रक चालक के खिलाफ कानूनी काररवाई किए जाने की मांग की.

शेर सिंह की इस सूचना पर चौकीइंचार्ज गुरमीत सिंह ने भादंसं की धारा 279, 304ए के तहत अज्ञात ट्रक चालक के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर काररवाई शुरू कर दी. पुलिस ने काफी कोशिश की, लेकिन घटना के 3-4 महीने बाद भी वह उस ट्रक चालक को नहीं ढूंढ पाई. लिहाजा इस केस की जांच वहां से सीआईए के इंचार्ज इंसपेक्टर विजय कुमार को ट्रांसफर कर दी गई.

शुरूशुरू में इंसपेक्टर विजय कुमार को भी इस केस में कोई सफलता मिलती नजर नहीं आई, पर उन्हें मामले की तह तक तो पहुंचना ही था सो उन्होंने घटनास्थल का निरीक्षण किया. साथ ही अपने खास मुखबिरों को इस काम पर लगाने के बाद मृतक के पिता शेर सिंह से भी पूछताछ की. इस बार शेर सिंह ने बताया कि उन्हें संदेह है कि उस के बेटे यादविंदर की मृत्यु दुर्घटना में नहीं हुई थी, बल्कि उस की हत्या की गई थी.

‘‘ऐसा कैसे हो सकता है?’’ इंसपेक्टर विजय कुमार ने आश्चर्यचकित होते हुए कहा, ‘‘आप ने तो अपने बयानों में लिखवाया था कि उस की मौत एक्सीडेंट से हुई थी. आप के बयानों के अनुसार एक अंजान ट्रक चालक के खिलाफ रिपोर्ट भी लिखी गई थी. अगर ऐसी बात थी तो आप ने यह सब पहले क्यों नहीं बताया था. इस प्रकार गलतबयानी कर के आप ने पुलिस को गुमराह करने की कोशिश की है.’’

‘‘साहबजी, दरअसल किसी ने मुझे उस रात खबर दी थी कि यादविंदर का एक्सीडेंट हो गया है और उस की लाश सड़क पर पड़ी है. खबर सुनते ही मैं मौके पर पहुंचा तो बेटा तड़प रहा था. वहीं उस की मोटरसाइकिल भी पड़ी थी. फोन कर के मैं ने एंबुलेंस बुलाई और उसे नाभा के अस्पताल ले गया था.
‘‘पहली अक्तूबर को मैं ने पुलिस चौकी के एसआई गुरमीत सिंह को जो बयान दिया था, वह किसी के कहने पर दिया था, जबकि सच्चाई यह है कि मैं ने ट्रक वाले को नहीं देखा था.

‘‘सच्चाई यह है कि उस समय बेटे की लाश देख कर मैं अपना होश खो बैठा था. लोग जैसा कह रहे थे, मैं वैसा ही कर रहा था. अब मैं पूरी तरह ठीक हूं. मुझे उम्मीद है कि मेरे बेटे की किसी ने हत्या कर मामले को एक्सीडेंट का रूप देने की कोशिश की है.’’

शेर सिंह की बात सुनने के बाद इंसपेक्टर विजय कुमार ने इस मामले की जांच शुरू कर दी. जांच की शुरुआत उन्होंने शेर सिंह के घर से ही की. उन्होंने यह जानने की कोशिश की कि कहीं यादविंदर या शेर सिंह की किसी से कोई दुश्मनी तो नहीं थी. इस काम में उन्होंने अपने मुखबिरों को भी लगा दिया.
इस बीच एक मुखबिर ने इंसपेक्टर विजय कुमार को खबर दी कि शेर सिंह के परिवार की नूरपुर गांव के रहने वाले जसवंत सिंह उर्फ जस्सा के साथ दुश्मनी थी. दुश्मनी की वजह क्या थी, यह बात मुखबिर नहीं बता सका.

जस्सा के साथ शेर सिंह की क्या दुश्मनी थी, यह जानने के लिए उन्होंने शेर सिंह को सीआईए औफिस बुलाया तो शेर सिंह ने बताया, ‘‘साहब, जस्सा से उस की ऐसी कोई खास दुश्मनी नहीं है. बस खेतों के पानी को ले कर एकदो बार उस से कहासुनी जरूर हो गई थी.’’

शेर सिंह के हावभाव और बातों से इंसपेक्टर विजय कुमार समझ गए कि वह कुछ छिपा रहा है या जानबूझ कर वह सच नहीं बताना चाहता. और फिर खेतों के पानी को ले कर तो गांवों में अकसर छोटेमोटे झगड़े होते ही रहते हैं. इस के पीछे कोई किसी का कत्ल नहीं करता. बात जरूर कोई और ही रही होगी.
बहरहाल, इंसपेक्टर विजय को किसी ऐसे आदमी की तलाश थी जो जस्सा और शेर सिंह के बीच चल रही दुश्मनी की सही वजह का पता लगा सके. थोड़ी कोशिश के बाद उन्हें एक ऐसी चतुर औरत मिल गई. वह न केवल जसवंत सिंह उर्फ जस्सा और शेर सिंह के परिवारों के बीच की दुश्मनी का पता लगा सकती थी बल्कि उन की कुंडली भी खंगाल सकती थी.

इंसपेक्टर विजय ने उसे कुछ ईनाम देने का लालच दिया तो वह यह काम करने के लिए तैयार हो गई. काम सौंपे जाने के कुछ दिनों बाद उस औरत ने सब पता लगाने के बाद उन्हें जो कुछ बताया, उस में उन्हें सच्चाई दिखाई दी.

उस औरत ने बताया कि जस्सा और शेर सिंह के बीच दुश्मनी की वजह खेतों का पानी नहीं था बल्कि जस्सा की खूबसूरत बेटी थी. जस्सा की एक बेटी थी कल्पना, जिस की सुंदरता की चर्चा आसपास के गांवों में भी थी. उस के चाहने वालों की लंबी फेहरिस्त थी.

शेर सिंह के बेटे यादविंदर की नजर जब उस पर पड़ी तो पहली नजर में ही वह उस का दीवाना हो गया था. लड़की के अन्य चाहने वालों की तरह वह भी उस के घर के इर्दगिर्द चक्कर लगाने लगा था.
यादविंदर भी अच्छाखासा गबरू नौजवान था. वह पढ़ालिखा भी था और अच्छे घर से ताल्लुक रखता था, पर कल्पना ने उसे कभी लिफ्ट नहीं दी. वह भी एक अच्छे परिवार की संस्कारी लड़की थी.

प्यार वगैरह के फालतू चक्करों में वह नहीं पड़ना चाहती थी. इसलिए यादविंदर क्या उस ने किसी भी लड़के को भाव नहीं दिया. लेकिन यादविंदर किसी न किसी तरह उस के नजदीक पहुंचने की कोशिश करता रहा.

कल्पना के घर के चक्कर लगाने की यादविंदर की दिनचर्या सी बन गई थी. कल्पना की झलक पाने या उस से बात करने के चक्कर में वह उस के घर के कई चक्कर रोजाना लगाता था. जब वह उसे रास्ते में मिल जाती तो वह उस के साथ छेड़छाड़ करे बिना नहीं मानता था.

1-2 बार तो कल्पना के पिता जस्सा ने यादविंदर को अपनी बेटी के साथ छींटाकशी करते देख लिया था. तब उन्होंने उसे चेतावनी दे कर छोड़ दिया था. पर यादविंदर अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रहा था.
एक रोज तो यादविंदर ने हद ही कर दी. उस ने कल्पना का रास्ता रोक कर उस का हाथ पकड़ कर बात करने की कोशिश की. कल्पना को यह बात बहुत बुरी लगी. उस ने यह सारी बात अपने पिता जसवंत सिंह को बता दी. पानी सिर से इतना ऊंचा पहुंच जाएगा, इस बात का अंदाजा शायद जसवंत सिंह उर्फ जस्सा को नहीं था.

बेटी के मुंह से यादविंदर की करतूतें सुन कर जस्सा का खून खौल उठा. वह सीधा शेर सिंह के घर गया. उस ने यादविंदर को ही नहीं, बल्कि शेर सिंह को भी खरीखोटी सुनाई. बापबेटे की उस ने गांव वालों के सामने ही बेइज्जती की और बाद में चलते समय उस ने शेर सिंह को यह भी धमकी दी कि अगर उस ने अपने बेटे पर लगाम नहीं लगाई तो वह उस के टुकड़ेटुकड़े कर देगा.

यह धमकी जस्सा ने पूरे गांव के सामने दी थी, पर इंसपेक्टर विजय कुमार को गांव वालों ने यह बात नहीं बताई थी. बहरहाल, जस्सा और शेर सिंह के बीच दुश्मनी की असली वजह इंसपेक्टर विजय कुमार को पता चल चुकी थी. उन्होंने जस्सा को पूछताछ के लिए सीआईए औफिस बुलवा लिया.

उन्होंने उस से यादविंदर की हत्या के बारे में पूछताछ की तो उस ने खुद को निर्दोष बताया. उस ने कहा, ‘‘साहब, आप को शायद गलतफहमी हुई है. यादविंदर की हत्या नहीं हुई, बल्कि उस का एक्सीडेंट हुआ था.’’
‘‘बकवास बंद करो.’’ इंसपेक्टर विजय ने उसे धमकाते हुए कहा, ‘‘हमें सब मालूम है कि यादविंदर का एक्सीडेंट हुआ था या अपनी बेटी के चक्कर में तुम ने मिल कर उस की हत्या की थी. यह सारी सच्चाई मैं तुम्हारे मुंह से सुनना चाहता हूं.’’

इंसपेक्टर विजय की घुड़की के बाद जसवंत सिंह उर्फ जस्सा हाथ जोड़ कर माफी मांगने लगा और रोते हुए कहने लगा, ‘‘साहबजी, मैं यादविंदर की हत्या नहीं करना चाहता था पर जब बात इज्जत पर बन आई तो मजबूरन मुझे यह कदम उठाना पड़ा.’’

इस के बाद उस ने यादविंदर के एक्सीडेंट के रहस्य से परदा उठाते हुए उस की हत्या की जो कहानी बताई, इस प्रकार निकली—

यादविंदर काफी समय से जस्सा की बेटी कल्पना को छेड़छेड़ कर परेशान कर रहा था. जस्सा ने उसे प्यार से और धमका कर हर तरह से समझा कर देख लिया था पर वह अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रहा था.
जस्सा ने उस के पिता शेर सिंह को भी चेतावनी दी पर यादविंदर पर किसी बात का असर नहीं हुआ था. उल्टे यादविंदर कल्पना को धमकी देता था कि यदि उस ने उस की बात नहीं मानी तो वह उसे उठा कर ले जाएगा.

30 सितंबर, 2017 की रात यादविंदर कल्पना से बातचीत करने के लिए उस के घर की तरफ चक्कर लगाने के लिए आया था. इत्तफाक से उस समय जस्सा भी अपने घर के बाहर खड़ा था.

यादविंदर को देखते ही उस के तनबदन में आग लग गई. उस जलती हुई आग पर तेल खुद यादविंदर ने ही डाला. वह जस्सा के घर के बाहर खड़ा हो कर अपनी बाइक का हौर्न बजाने लगा.

जस्सा ने यादविंदर को अपने पास बुला लिया और प्यार से बातें करते हुए उसे अपने खेतों की ओर ले गया. उस समय जस्सा के साथ उस का भतीजा मनदीप सिंह मनी व नौकर सुखविंदर सिंह उर्फ काला भी था.
अपने खेत में पहुंचने के बाद यादविंदर को सबक सिखाने की नीयत से तीनों ने जम कर उस की पिटाई की. उन का इरादा यादविंदर की हत्या करने का नहीं था पर अंधाधुंध पिटाई करने से यादविंदर की मौत हो गई. यादविंदर की मौत के बाद तीनों घबरा गए और इस हत्या से बचने के उपाय सोचने लगे.

अंत में तीनों ने मिल कर यादविंदर की हत्या को एक्सीडेंट का रूप देने की योजना बनाई और उस की लाश और मोटरसाइकिल अपनी ट्रौली पर लाद कर नाभा रोड पर चन्नो गांव के पास ला कर सड़क पर फेंक दिया. उस की लाश उधर से गुजरने वाले किसी वाहन से कुचल गई थी. फिर जस्सा ने ही किसी से यादविंदर का एक्सीडेंट होने की सूचना शेर सिंह के पास पहुंचा दी थी.

शेर सिंह चन्नो गांव के करीब गया तो बेटे की लहूलुहान लाश देख कर घबरा गया. फिर वह उसे एंबुलेंस से नाभा अस्पताल ले गया था. जस्सा से पूछताछ करने के बाद पुलिस ने अन्य आरोपी मनदीप सिंह और सुखविंदर उर्फ काला को भी गिरफ्तार कर लिया. तीनों को अदालत में पेश कर उन्हें 2 दिनों के पुलिस रिमांड पर लिया गया.

रिमांड अवधि में उन की निशानदेही पर कुछ सबूत भी हासिल किए. बाद में उन्हें पुन: न्यायालय में पेश कर जिला जेल भेज दिया गया. पुलिस को यह मामला सुलझाने में भले ही 8 महीने लग गए, लेकिन साजिश का खुलासा कर के आरोपियों को जेल पहुंचा दिया.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित. कथा में कल्पना परिवर्तित नाम है.

सरकार का कैदियों को छोड़ देने का फैसला

सरकार को उन कैदियों को छोड़ देने का फैसला जिन की उम्र ज्यादा हो, जिन्होंने सजा के आधे दिन गुजार दिए हों और जो बीमार हों, अच्छा है. कैद समाज को ज्यादा साफसुथरा रखती है, यह गलतफहमी है. पकड़े जाने पर और जेल में कैद काटने से कोई सुधरता है या नहीं, समाज में अपराध तो कम बिलकुल नहीं होते.

अमेरिका आजकल बदनाम हो गया है कि उस ने बहुत ज्यादा लोगों को जेलों में भर रखा है. वहां जेलों का निजीकरण हो गया है और प्राइवेट ठेकेदार हल्ला मचवाते रहते हैं कि यदि अपराधी जल्दी छोड़ दिए गए तो वे समाज को तहसनहस कर देंगे. फिर भी वहां समाज में अपराध कम नहीं हो रहे.

हमारे देश में जेलों में आमतौर पर वही बंद हैं जो अदालतों में महंगे वकील नहीं कर पाए. कुछ मोटे मामलों को छोड़ कर महंगे वकीलों के सहारे आरोपी आमतौर पर बच ही निकलते हैं. यदि वे लोग जो अपराध के शिकार हुए हों चुप बैठ जाएं तो हमारे यहां सजा मिलना कम ही होता है इसलिए जेलें या तो ऐसे लोगों से भरी हैं जो पुलिस से भिड़ गए होते हैं या जो गरीब होते हैं पर कोई जुर्म कर बैठे हों. उन्हें छोड़ने का फैसला ठीक है क्योंकि अब उन्हें पता चलेगा कि जेल से बाहर की जिंदगी भी आसान नहीं.

जेल काट कर आए लोगों को न घर वालों का प्यार मिलेगा, न दोस्तों का. आजकल जिस तरह की बेरोजगारी है, उन्हें रोजगार मिलेगा इस के भी मौके कम हैं. उन्हें हकीकत का पता अब चलेगा. जेल से बाहर रह कर भी वे अपनी खुद की बनाई कैद में रहेंगे.

सदियों से कानून को समझने वाले बहस करते रहे हैं कि सजा क्या किसी को सुधारती है. कई बार तो कैद से सजा पूरी कर के आए और ज्यादा खूंख्वार हो जाते हैं क्योंकि जेलों की दुनिया में अपराध ज्यादा होते हैं क्योंकि वहां तो सभी बेईमान, हत्यारे होते हैं. विदेशों में जहां जेलों में सुविधाएं मिलनी शुरू हो गई हैं वहां भी जेल से बाहर आने तक लोग और ज्यादा अपराध करने के गुर सीख जाते हैं.

जेलों में न रख कर आजकल पैर में खास बिजली की चेन पहना कर घर तक रहने की सजा दी जा रही है. कैदी केवल अपने घर में रह सकता है, बाहर जाते ही सायरन बज जाता है. सरकार को इस तरह के कैदी पर खर्च नहीं करना पड़ता.

समाज गुनाहगारों को सजा देने के लिए रोजदररोज खर्च करे यह भी कोई अच्छा नहीं. उन्हें छोड़ना गलत न होगा. अगर कुछ शिकायती काम करेंगे तो फिर पकड़े जा ही सकते हैं.

चीन में सेंध लगाता बौलीवुड

तकरीबन 11,500 स्क्रीन्स और रोजाना 56 हजार शो. यह आंकड़ा भारत में रिलीज किसी भी हिंदी फिल्म का आज तक नहीं रहा लेकिन इसी स्क्रीन संख्या और शोज के साथ जब अक्षय कुमार अभिनीत फिल्म ‘टौयलेट-एक प्रेमकथा’ (चाइनीज टाइटल- टौयलेट हीरो) चीन में रिलीज हुई तो इस ने लोकल चीनी भाषा की फिल्मों समेत कई हौलीवुड फिल्मों को भी कमाई के मामले में पीछे छोड़ दिया.

महज 17 दिनों में चीन में 100 करोड़ रुपए का आंकड़ा छूने वाली यह फिल्म भारत में कुल 100 करोड़ रुपए भी नहीं कमा पाई थी. इतने बड़े पैमाने पर ‘दंगल’, ‘सीक्रेट सुपरस्टार’, ‘बजरंगी भाईजान’ और ‘हिंदी मीडियम’ के बाद चीन में रिलीज होनी वाली यह 5वीं भारतीय फिल्म है.

अब तक ओवरसीज मार्केट में सीमित हैसियत रखने वाले बौलीवुड को इन पांचों फिल्मों की बंपर ओपनिंग ने चीनी बौक्सऔफिस के तौर पर एक नया और बड़ा बाजार उपलब्ध करा दिया है.

भारत में आज भी बड़ी से बड़ी फिल्म 4 से 5 हजार स्क्रीन्स में ही रिलीज हो पाती है, क्योंकि देश में सिनेमाघरों की तादाद कम है. लेकिन चीन में बीते कुछ सालों में करीब चारगुनी गति से सिनेमाघर खुले हैं.

हालांकि अब तक यह बाजार अमेरिकी (हौलीवुड) व अन्य यूरोपियन फिल्मों की गिरफ्त में था लेकिन चंद सालों में हिंदी फिल्मों ने अप्रत्याशित कमाई कर बौक्सऔफिस का ओवरसीज मार्केट पूरी तरह से बदल दिया है.

अमेरिका (नौर्थ अमेरिका) के बाद चीन दुनिया का सब से बड़ा मूवी मार्केट है. ऐसे में वहां बौलीवुड की घुसपैठ बड़ी बात है. आलम यह रहा कि आमिर खान की फिल्म ‘दंगल’ ने चीन में सिर्फ कमाई के ही झंडे नहीं गाड़े, बल्कि लोकल फिल्म समीक्षकों और राष्ट्रपति शी जिनपिंग की तारीफें भी बटोरीं.

बासी माल से ताजा मुनाफा

दिलचस्प बात यह है कि इन 5 हिंदी फिल्मों और ‘बाहुबली-2’ (डब वर्जन) ने चीन में अपनी मूल रिलीज डेट के महीनों बाद इतनी कमाई की है यानी ये सभी फिल्में भारत में प्रदर्शन के साथ चीन में रिलीज नहीं हुईं. मसलन, ‘टौयलेट-एक प्रेमकथा’ भारत में 11 अगस्त, 2017 को रिलीज हुई थी जबकि चीन में 8 जून, 2018 को यानी 10 महीने बाद रिलीज हुई यह फिल्म वहां की लेटैस्ट रिलीज फिल्मों पर भारी है.

ये फिल्में इस लिहाज से भी बासी हैं क्योंकि भारत में रिलीज होने और टीवी सैटेलाइट प्रीमियर के बाद इन का प्रदर्शन चीन में हुआ. इतने अंतराल में हिंदी फिल्में डबिंग और सबटाइटल के साथ देशविदेश के दर्शकों द्वारा देखी जा चुकी होती हैं, जैसे कि भारत में अन्य भाषा की फिल्में औनलाइन डाउनलोड के लिए उपलब्ध होती हैं और रिलीज से पहले ही देख ली जाती हैं.

बौलीवुड इस मामले में काफी फायदे की पोजिशन में है. देशी माध्यमों (थिएटर राइट्स, म्यूजिक राइट्स, सैटेलाइट राइट्स डिजिटल स्ट्रीमिंग राइट्स और रेडियो आदि) से मोटा मुनाफा कमाने के बाद बौलीवुड चीन में बासी सामान से ताजा मुनाफा कमा रहा है.

बड़े पैमाने पर इस ट्रैंड की शुरुआत का श्रेय आमिर खान को जाता है. उन की फिल्म ‘सीक्रेट सुपरस्टार’ ने चीनी बौक्सऔफिस पर रिलीज के महज 2 दिनों में 100 करोड़ रुपए का बिजनैस कर लिया था, जबकि भारत में यह आंकड़ा फिल्म द्वारा छुआ ही नहीं गया. यानी फिल्म भारत में 80-80 करोड़ रुपए के लाइफटाइम कलैक्शन पर सिमट गई. फिलहाल इस की कुल कमाई 810 करोड़ रुपए है और अभी गिनती जारी है.

आमिर खान की एक और मनोरंजक फिल्म ‘पीके’ चीन में 4,500 स्क्रीन्स पर रिलीज हुई थी और वह चीन में 100 करोड़ रुपए कमाने वाली पहली फिल्म बनी. जबकि उन की ही फिल्म ‘दंगल’ ने रिकौर्ड तोड़ते हुए 9 हजार स्क्रीन्स पर रिलीज हो कर करीब 1,400 करोड़ रुपए कमाए थे.

इतना ही नहीं, चीन के छोटे हिस्से हौंगकौंग में इस फिल्म ने करीब 5 करोड़ रुपए की कमाई की, जबकि इस से पहले वहां रिलीज होने वाली फिल्में बहुत ज्यादा नहीं कमाती थीं. मसलन, ‘हैप्पी न्यू ईयर’ मात्र 1.68 करोड़, ‘थ्री इडियट्स’ 16.8 करोड़, ‘बाहुबली’ 7.54 करोड़ और ‘धूम-3’ जैसी ब्लौकबस्टर फिल्म महज 24 करोड़ रुपए ही कमा पाई थीं.

चीन का चहेता बौलीवुड

चीन के रिश्ते भारत के साथ हमेशा तल्खीभरे रहे हैं. दोनों देशों के बीच आर्थिक, सामरिक मोरचों पर कड़वाहट आज भी बरकरार है. एक युद्ध 1962 में दोनों ने लड़ा है. दोनों देशों के बीच सीमा विवाद भी जगजाहिर है. ऐसे में बौलीवुड फिल्मों का वहां लोकप्रिय होना थोड़ा तो चौंकाता ही है.

जहां पाकिस्तान में हिंदी फिल्मों को मास लोकप्रियता के बावजूद अकसर वहां के सैंसर बोर्ड के प्रतिबंध का सामना करना पड़ता है वहीं चीन में इन्हें हाथोंहाथ लिया जा रहा है. वहां के फिल्म क्रिटिक्स हों, लोकल मीडिया या शिक्षण संस्थान हों, हर जगह अब हिंदी फिल्मों को ले कर उत्सुकता देखी जा रही है. ऐसे में सवाल यह है कि आखिर चीन में भारतीय फिल्में इतनी पसंद क्यों की जा रही हैं? चीन भारत को अपना सब से बड़ा प्रतिद्वंद्वी मानता है. आखिर ऐसा हुआ कैसे?

जिस तरह से चीनी माल के सस्ते और कारगर होने के चलते भारतीय लोगों में चाइनीज माल/ब्रैंड्स के प्रति खास आकर्षण देखने को मिलता है वैसे ही अब तक चीन में रिलीज हुई भारतीय फिल्मों का कथानक काफी हद तक गंभीर, सामाजिक सरोकार से जुड़ा, अर्थपूर्ण और मौजूदा संकट/मसलों को उठाते हुए दिखा. जाहिर है इन में से कई समस्याओं से चीनी समाज भी गुजरता है.

इस के अलावा चीन में ज्यादातर साइंस फिक्शन, ऐक्शन, फैंटेसी व थ्रिलर की हौलीवुड फिल्में दिखाई जाती हैं या देशी भाषा की फिल्में बनती हैं. पारिवारिक फिल्मों का निर्माण वहां न के बराबर होता है. कह सकते हैं कि वहां मुद्दापरक गुणवत्ता वाली पारिवारिक फिल्मों की कमी को हिंदी फिल्मों ने पूरा किया.

‘दंगल’ में खेल को ले कर महिलाओं को बढ़ावा देने का संघर्ष और चलन चीन में ज्यादा है, लिहाजा, ‘दंगल’  वहां हाथोंहाथ ली गई. इसी तरह ‘हिंदी मीडियम’ जिस तरह से अंगरेजी भाषा के प्रभुत्व को नकार कर देशी भाषा को बढ़ावा देने पर जोर देती है, यह सिद्धांत भी चीन में है. इसी के चलते चीन ने तकनीकी तौर पर चाइनीज लैंग्वेज को समृद्ध किया है.

एक हौलीवुड फिल्म ‘जूटोपिया’ ने भी चीन में जबरदस्त कमाई की. इस कार्टून फिल्म में एक छोटे कसबे की लड़की की बड़े शहर में कामयाबी को दिखाया गया था. कुछकुछ ‘सीक्रेट सुपरस्टार’ जैसा कथानक यहां भी दिखा. जहां ‘थ्री इडियट्स’ को चीन के युवाओं ने खूब पसंद किया, वहीं ‘दंगल’ की कहानी ने चीन के मध्यवर्गीय परिवार को कनैक्ट किया. ‘सीक्रेट सुपरस्टार’, ‘टौयलेट एक प्रेमकथा’ और ‘बजरंगी भाईजान’ भी पारिवारिक व मुद्दापरक फिल्में हैं.

इस तरह से चीन में जिन भारतीय फिल्मों को बाजार मिला है, वे पारिवारिक मनोरंजन के साथ सामाजिक संदेश भी दे रही हैं और यही बात चीन के लोगों को पसंद आ रही है.

ये फिल्में भारतीय समाज की बुराइयों व परेशानियों को बेबाकी से पेश करती हैं. चीनी लोग इन में अपने समाज की झलक भी पाते हैं. हालांकि, भारतीय फिल्म निर्माता व अभिनेताओं की चतुर प्रचार रणनीति भी इस का एक अहम कारण रहा है.

महंगे टिकट का गणित

हिंदी फिल्मों की मोटी कमाई का बड़ा कारण चीन में भारतीय फिल्मों को रिलीज के लिए बड़ी संख्या में थिएटर मिलना भी है. भारत में जहां बड़ी से बड़ी फिल्म अमूमन 4-5 हजार स्क्रीन्स पर रिलीज होती है वहीं चीन में दुनिया में सर्वाधिक करीब 40,917 से भी ज्यादा स्क्रीन्स हैं. चीन की आबादी भारत से ज्यादा तो है लेकिन अंतर ज्यादा नहीं है. बात विकास की हो तो यह अंतर ज्यादा दिखाई देता है. इन दोनों में फिल्मी स्क्रीन्स का अंतर हजारों में है.

अंतर की यह खाई और भी चौड़ी होने को है, क्योंकि चीन ने भारत समेत दुनियाभर के फिल्म निर्माताओं के लिए आकर्षक बाजार के रूप में उभरने के साथ ही 2020 तक दुनिया का सब से बड़ा फिल्म बाजार बनने का लक्ष्य रखा है.

इस के लिए 2020 तक 60 हजार से अधिक स्क्रीन्स बनाने का लक्ष्य तय किया गया है. बढ़ती स्क्रीन्स के अलावा टिकट की कीमतें भी अहम कारक हैं. भारत के मुकाबले चीन में सामान्य टिकट की कीमत लगभग 800 रुपए है जबकि भारत में इन के दाम 50-60 रुपए से शुरू हो कर औसतन 500 रुपए तक सीमित रहते हैं. जाहिर है आने वाले समय में भारत में इन फिल्मों की कमाई का औसत चीन से पीछे ही रहेगा.

आमिर का मार्केटिंग मंत्र

अगर मनोरंजन जगत में कोई बिजनैस के नए उसूल और ट्रैंड बना रहा है तो वे आमिर खान हैं. गौरतलब है कि बौलीवुड में उन्होंने ही अपनी फिल्मों से 100-200 और 500 करोड़ क्लब की शुरुआत की है. फिल्मों के प्रचार को ले कर वे अनोखे तरीके अपनाते हैं और मीडिया से दूरी भी बनाते हैं. ‘गजनी’ फिल्म के दौरान उन्होंने अलगअलग शहरों में प्रचार के लिए कुछ लोगों के बाल काटे तो कभी प्रचार के लिए उन्होंने भेष बदल कर देश का दौरा किया.

जब विदेशों में फिल्म रिलीज और प्रचार करने की बारी आई तो फिल्म ‘लगान’ के सर्वश्रेष्ठ विदेशी फिल्म के औस्कर नामांकन के बाद अमेरिका में फिल्म लौबीज के साथ वे महीनों प्रचार करते रहे.

इसी तरह चीन में उन की फिल्मों ‘थ्री इडियट्स’, ‘पीके’, ‘दंगल’, ‘सीक्रेट सुपरस्टार’ ने अब तक सब से ज्यादा कमाई की हैं तो इस में उन की अपनी फिल्मों के प्रचार को ले कर अपनाई गई विशेष रणनीति की भूमिका रही है.

आमिर अपनी फिल्मों में प्रचार के लिए चीन के कई प्रमुख शहरों में घूमे, स्थानीय पकवान खाते दिखे, वहां की स्थानीय सोशल मीडिया साइट्स वीवो (चाइना का ट्विटर कह सकते हैं) के माध्यम से वहां के नागरिकों से संवाद किया, एजुकेशनल हब्स में विजिट किया. इतना ही नहीं, पहली बार वे चीन के फेमस टीवी शो ‘बाइट मी’ में भी टैलीकास्ट हुए. वहां की आधिकारिक मीडिया से भी उन्हें निमंत्रण मिला. ट्विटर पर उन का चीनी फैन क्लब भी सक्रिय रहा. इस तरह से उन्होंने खुद और फिल्मों के जरिए आम चीनियों से सीधा संवाद रखा.

नतीजतन, आज चीन में हर फिल्मप्रेमी आमिर खान के नाम और चेहरे से अच्छी तरह वाकिफ है. साल 2009 में फिल्म ‘थ्री इडियट्स’ से चीन में डैब्यू करने वाले आमिर आज वहां वही सितारा हैसियत रखते हैं जो कभी रूस में राज कपूर की थी.

चीन बनाम हौलीवुड

भारत ने भले ही चीनी बौक्सऔफिस में सेंध लगानी अभी शुरू की हो लेकिन हौलीवुड यह काम अरसे से कर रहा है. इस बात का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि चीन के फिल्म बाजार में पिछले साल हौलीवुड फिल्मों की कमाई का प्रतिशत 45.5 फीसदी था.

फिल्म ट्रेड ऐक्सपर्ट मानते हैं कि चीन उत्तरी अमेरिका (अमेरिका और कनाडा) के फिल्म बाजार को पछाड़ कर दुनिया का सब से बड़ा फिल्म बाजार बन जाएगा. हालांकि चीन हौलीवुड की फिल्मों की घुसपैठ रोकने के लिए खुद बड़े बजट की फिल्में अमेरिका व अन्य यूरोपीय देशों में रिलीज कर रहा है लेकिन अभी भी उस का बाजार, बड़ी आबादी, सर्वाधिक स्क्रीन्स चीन को मेगा मार्केट के तौर पर स्थापित करते हैं.

पिछले वर्ष जहां चीन में सर्वाधिक कमाई करने वाली शीर्ष-10 फिल्मों में 5 फिल्में हौलीवुड की थीं, वहीं इस वर्ष इस सूची में सिर्फ 3 फिल्में ‘फ्यूरियस-7’, ‘एवेंजर्स- एज औफ अल्ट्रौन’, ‘जुरासिक वर्ल्ड’ ही जगह बना पाईं. चीन में इस वर्ष सर्वाधिक कमाई करने वाली फिल्म ‘मौंस्टर हंट’ रही, जिस ने कुल 38.11 करोड़ डौलर की कमाई की. वहीं ‘फ्यूरियस-7’  37.9 करोड़ डौलर की कमाई के साथ दूसरे स्थान पर रही.

हालांकि हौलीवुड ने चालाकी दिखाते कुछ सालों से प्रायोजित तरीके से अपनी फिल्मों में कुछ अहम चीनी  किरदारों को तवज्जुह दी, लेकिन जब बात नहीं बनी तो अब कई हौलीवुड स्टूडियोज लोकल चीनी फिल्म निर्माण कंपनियों से साझेदारी में फिल्म निर्माण कर रहे हैं. मसलन, ‘फ्यूरियस-7’ को चाइनीज फिल्म कौर्प्स ने फंड किया था, जबकि अमेरिकी यूनिवर्सल स्टूडियो ने शंघाई में बाकायदा दफ्तर खोला है.

इतना ही नहीं, चीनी ईकौमर्स कंपनी अलीबाबा और औनलाइन गेम्स ग्रुप टेंसेंट भी हौलीवुड में पैसा लगा रहे हैं. ‘मिशन इंपौसिबल’, ‘स्टार ट्रेक’, ‘निंजा सीरीज’ जैसी बड़ी फिल्में ही चीनी फंड के साथ कोपार्टनरशिप में बनी हैं. अलीबाबा तो हौलीवुड के दिग्गज फिल्मकार स्टीवन स्पीलबर्ग के साथ साझेदारी घोषित कर चुका है. अगर यही हाल रहा तो नौर्थ अमेरिका, जो अब तक फिल्म उद्योग का सब से बड़ा बाजार था, चीन से पीछे रह जाएगा.

ज्यादा खुश न हो बौलीवुड

आज हिंदी की 4-5 फिल्में अगर चीन में कमाई कर रही हैं तो इस में बहुत ज्यादा खुश होने की बात नहीं है, क्योंकि यह काम हौलीवुड सालों से कर रहा है और चीन की फिल्में भारत में कई सालों से प्रदर्शित होती रही हैं. सिर्फ सिनेमाघरों में ही नहीं, बल्कि डीवीडी और सीडी फौर्मेट में चीन और हौलीवुड की फिल्में भारत में मोटी कमाई करती रही हैं. इस लिहाज से बौलीवुड अभी शैशव अवस्था में ही है.

आज जिस तरह से बौलीवुड नृत्य, गीतों पर हजारों चीनी सिनेमाघरों में नाचतेगाते दिख रहे हैं, वह अच्छा लग रहा है लेकिन आने वाले समय में यह भारत की नहीं, चीन की जीत होगी क्योंकि थोड़ी और कमाई बढ़ती देख चीन हौलीवुड वाला फार्मूला भारतीय फिल्ममेकर्स के साथ भी अपनाएगा और भारत के साथ फिल्में बना कर अपने देश में खुद रिलीज करेगा. इस फार्मूले से फिल्म की कमाई के मुनाफे में हिस्सा, डिस्ट्रीब्यूशन, एक्जिबिशन, सैटेलाइट और डिजिटल राइट्स भी चीन की जेब में रहेंगे.

इस के साथ ही भारत में सिनेमाघरों-स्क्रीन्स की कम तादाद और घटी दर वाली टिकट कीमतों के चलते मुनाफा चीन में मिलेगा, भारत में नहीं. ऐसे में हमें सबक लेने की जरूरत है चीन से, जिस तरह उस ने आर्थिक, सामाजिक और मनोरंजन जैसे हर मोरचे पर विकास किया है, अपनी आबादी और संसाधनों का सही इस्तेमाल कर आगे बढ़ा है, हमें भी वही करना होगा, वरना जिस तरह से आज भारतीय बाजार चीनी सामानों से लदे हैं और घरेलू लघु उद्योग खत्म हो रहे हैं, फिल्म उद्योग भी हौलीवुड व चीनी कौर्पोरेट कंपनियों की पकड़ में आ कर दम तोड़ देगा. ऐसे में मनोरंजन उद्योग को बिना टैक्निकल अपग्रेड के चलाना मुश्किल होगा.

हमारे पास नैटफ्लिक्स, अमेजौन जैसा कोई बड़ा स्ट्रीमिंग डिजिटल विकल्प नहीं है. इसलिए थोड़ी सी कमाई देख कर अपनी पीठ थपथपाने से बेहतर है चीन जैसा फिल्म उद्योग विकसित किया जाए और हौलीवुड लैवल का फिल्म डिस्ट्रीब्यूशन स्ट्रक्चर. तब जा कर बौलीवुड चीन और हौलीवुड के समकक्ष टिक पाएगा.

घोंसले का तिनका (अंतिम भाग)

पूर्व कथा

घर में अकेला टोनी कौफी बना कर पी रहा होता है कि इतने में मिशैल आ जाती है और उस से अपने लिए कौफी बींस लाने के बारे में पूछती है तो वह भूल जाने की बात कहता है. बातोंबातों में वह टोनी की तारीफ करने लगती है. वह अतीत की यादों में खो जाता है.

टोनी अपने एक दोस्त के साथ जरमनी आता है और यहीं का हो कर रह जाता है. एक भारतीय औपचारिक सम्मेलन में उस की मुलाकात मिशैल से होती है और वह शादी कर लेते हैं.

मिशैल की आवाज सुन कर वह अतीत से बाहर निकलता है. मिशैल उस से हैनोवर इंटरनेशनल फेयर में जाने की बात कहती है.

न चाहते हुए भी टोनी मिशैल के आग्रह पर वहां जाता है. समारोह में हैंडीक्राफ्ट का सामान देखते हुए जरमनवासी भारतीय सभ्यता, संस्कृति की खूब प्रशंसा करते हैं. अगले 3 दिन तक टोनी वहां जाता है और भारतीयों के बीच हिलमिल जाता है. उन से मिल कर उसे अपने देश की याद सताने लगती है.

एक दिन मिशैल उसे भारत चलने के लिए कहती है तो टोनी आनाकानी करने लगता है. लेकिन अंतत: जाने के लिए तैयार हो जाता है.

और अब आगे…

हमारा प्रोग्राम 3 दिन दिल्ली रुकने के बाद आगरा, जयपुर और हरिद्वार होते हुए वापस जाने का तय हो गया था. मिशैल के मन में जो कुछ देखने का था वह इसी प्रोग्राम से पूरा हो जाता था.

जैसे ही मैं एअरपोर्ट से बाहर निकला कि एक वातानुकूलित बस लुधियाना होते हुए अमृतसर के लिए तैयार खड़ी थी. मेरा मन कुछ क्षण के लिए विचलित सा हो गया और थोड़ा कसैला भी. मेरा अतीत इन शहरों के आसपास गुजरा था. इन 5 वर्षों में भारत में कितना बदलाव आ गया था. आज सबकुछ ठीक होता तो सीधा अपने घर चला जाता. मैं ने बड़े बेमन से एक टैक्सी की और मिशैल को साथ ले कर सीधा पहाड़गंज के एक होटल में चला गया. इस होटल की बुकिंग भी मिशैल ने की थी.

मैं जिन वस्तुओं और कारणों से भागता था, मिशैल को वही पसंद आने लगे. यहां के भीड़भाड़ वाले इलाके, दुकानों में जा कर मोलभाव करना, लोगों का तेजतेज बोलना, अपने अहं के लिए लड़ पड़ना और टै्रफिक की अनियमितताएं. हरिद्वार और ऋषिकेश में गंगा के तट पर बैठना, मंदिरों में जा कर घंटियां बजाना उस के लिए एक सपनों की दुनिया में जाने जैसा था.

जैसेजैसे हमारे जाने के दिन करीब आते गए मेरा मन विचलित होने लगा. एक बार घर चला जाता तो अच्छा होता. हर सांस के साथ ऐसा लगता कि कुछ सांसें अपने घर के लिए भी तैर रही हैं. अतीत छाया की तरह भरमाता रहा. पर मैं ने ऐसा कोई दरवाजा खुला नहीं छोड़ा था जहां से प्रवेश कर सकूं. अपने सारे रास्ते स्वयं ही बंद कर के विदेश आया था. विदेश आने के लिए मैं इतना हद दर्जे तक गिर गया था कि बाबूजी के मना करने के बावजूद उन की अलमारी से फसल के सारे पैसे, बहन के विवाह के लिए बनाए गहने तक मैं ने नहीं छोड़े थे. तब मन में यही विश्वास था कि जैसे ही कुछ कमा लूंगा, उन्हें पैसे भेज दूंगा. उन के सारे गिलेशिक वे भी दूर हो जाएंगे और मैं भी ठीक से सैटल हो जाऊंगा. पर ऐसा हो न सका और धीरेधीरे अपने संबंधों और कर्तव्यों से इतिश्री मान ली.

शाम को मैं मिशैल के साथ करोल बाग घूम रहा था. सामने एक दंपती एक बच्चे को गोद में उठाए और दूसरे का हाथ पकड़ कर सड़क पार कर रहे थे. मिशैल ने उन की तरफ इशारा कर के मुझ से कहा, ‘‘टोनी, उन को देखो, कैसे खुशीखुशी बच्चों के साथ घूम रहे हैं,’’ फिर मेरी तरफ कनखियों से देख कर बोली, ‘‘कभी हम भी ऐसे होंगे क्या?’’

किसी और समय पर वह यह बात करती तो मैं उसे बांहों में कस कर भींच लेता और उसे चूम लेता पर इस समय शायद मैं बेगानी नजरों से उसे देखते हुए बोला, ‘‘शायद कभी नहीं.’’

‘‘ठीक भी है. बड़े जतन से उन के मातापिता उन्हें बड़ा कर रहे हैं और जब बडे़ हो जाएंगे तो पूछेंगे भी नहीं कि उन के मातापिता कैसे हैं…क्या कर रहे हैं… कभी उन को हमारी याद आती है या…’’ कहतेकहते मिशैल का गला भर गया.

मैं उस के कहने का इशारा समझ गया था, ‘‘तुम कहना क्या चाहती हो?’’ मेरी आवाज भारी थी.

‘‘कुछ नहीं, डार्लिंग. मैं ने तो यों ही कह दिया था. मेरी बातों का गलत अर्थ मत लगाओ,’’ कह कर उस ने मेरी तरफ बड़ी संजीदगी से देखा और फिर हम वापस अपने होटल चले आए.

उस पूरी रात नींद पलकों पर टहल कर चली गई थी. सूरज की पहली किरणों के साथ मैं उठा और 2 कौफी का आर्डर दिया. मिशैल मेरी अलसाई आंखों को देखते हुए बोली, ‘‘रात भर नींद नहीं आई क्या. चलो, अब कौफी के साथसाथ तुम भी तैयार हो जाओ. नीचे बे्रकफास्ट तैयार हो गया होगा,’’ इतना कह कर वह बाथरूम चली गई.

दरवाजे की घंटी बजी. मैं ने मिशैल को बाथरूम में ही रहने को कहा क्योंकि वह ऐसी अवस्था में नहीं थी  कि किसी के सामने जा सके.

दरवाजा खोलते ही मैं ने एक दंपती को देखा तो देखता ही रह गया. 5 साल पहले मैं ने जिस बहन को देखा था वह इतनी बड़ी हो गई होगी, मैं ने सोचा भी न था. साथ में एक पुरुष और मांग में सिंदूर की रेखा को देख कर मैं समझ गया कि उस की शादी हो चुकी है. मेरे कदम वहीं रुक गए और शब्द गले में ही अटक कर रह गए. वह तेजी से मेरी तरफ आई और मुझ से लिपट गई…बिना कुछ कहे.

मैं उसे यों ही लिपटाए पता नहीं कितनी देर तक खड़ा रहा. मिशैल ने मुझे संकेत किया और हम सब भीतर आ गए.

‘‘भैया, आप को मेरी जरा भी याद नहीं आई. कभी सोचा भी नहीं कि आप की छोटी कैसी है…कहां है…आप के सिवा और कौन था मेरा,’’ यह कह कर वह सुबकने लगी.

मेरे सारे शब्द बर्फ बन चुके थे. मेरे भीतर का कठोर मन और देर तक न रह सका और बड़े यत्न से दबाया गया रुदन फूट कर सामने आ गया. भरे गले से मैं ने पूछा, ‘‘पर तुम यहां कैसे?’’

‘‘मिशैल के कारण. उन्होंने ही यहां का पता बताया था,’’ छोटी सुबकियां लेती हुई बोली.

तब तक मिशैल भी मेरे पास आ चुकी थी. वह कहने लगी, ‘‘टोनी, सच बात यह है कि तुम्हारे एक दोस्त से ही मैं ने तुम्हारे घर का पता लिया था. मैं सोचती रही कि शायद तुम एक बार अपने घर जरूर जाओगे. मैं तुम्हारे भीतर का दर्द भी समझती थी और बाहर का भी. तुम ने कभी भी अपने मन की पीड़ा और वेदना को किसी से नहीं बांटा, मेरे से भी नहीं. मैं कहती तो शायद तुम्हें बुरा लगता और तुम्हारे स्वाभिमान को ठेस पहुंचती. मुझ से कोई गलती हो गई हो तो माफ कर देना पर अपनों से इस तरह नाराज नहीं होना चाहिए.’’

‘‘मां कैसी हैं?’’ मैं ने पूछा.

‘‘मां तो रही नहीं…तुम्हें बताते भी तो कहां?’’ कहतेकहते छोटी की आंखें नम हो गईं.

‘‘कब और कैसे?’’

‘‘एक साल पहले. हर पल तुम्हारा इंतजार करती रहती थीं. मां तुम्हारे गम में बुरी तरह टूट चुकी थीं. दिन में सौ बार जीतीं सौ बार मरतीं. वह शायद कुछ और साल जीवित भी रहतीं पर उन में जीने की इच्छा ही मर चुकी थी और आखिरी पलों में तो मेरी गोद में तुम्हारा ही नाम ले कर दरवाजे पर टकटकी बांधे देखती रहीं और जब वह मरीं तो आंखें खुली ही रहीं.’’

यह सब सुनना और सहना मेरे लिए इतना कष्टप्रद था कि मैं खड़ा भी नहीं हो पा रहा था. मैं दीवार का सहारा ले कर बैठ गया. मां की भोली आकृति मेरी आंखों के सामने तैरने लगी. मुझे एकएक कर के वे क्षण याद आते रहे जब मां मुझे स्कूल के लिए तैयार कर के भेजती थीं, जब मैं पास होता तो महल्ले भर में मिठाइयां बांटती फिरतीं, जब होलीदीवाली होती तो बाजार चल कर नए कपड़े सिलवातीं, जब नौकरी न मिली तो मुझे सांत्वना देतीं, जब राखी और भैया दूज का टीका होता तो इन त्योहारों का महत्त्व समझातीं और वह मां आज नहीं थीं.

‘‘उन के पार्थिव शरीर के अंतिम दर्शन भी शायद मेरी तकदीर में नहीं थे,’’ कह कर मैं फूटफूट कर रोने लगा. छोटी ने मेरे कंधे पर हाथ रख कर मुझे इस अपमान और संवेदना से निकालने का प्रयत्न किया.

छोटी ने ही मेरे पूछने पर मुझे बताया था कि मेरे घर से निकलने के अगले दिन ही पता लग चुका था कि मैं विदेश के लिए रवाना हो चुका हूं. शुरू के कुछ दिन तो वह मुझे कोसने में लगे रहे पर बाद में सबकुछ सहज होने लगा. छोटी ही उन दिनों मां को सांत्वना देती रहती और कई बार झूठ ही कह देती कि मेरा फोन आया है और मैं कुशलता से हूं.

छोटी का पति उस की ही पसंद का था. दूसरी जाति का होने के बावजूद मांबाबूजी ने चुपचाप उसे शादी की सहमति दे दी. मेरे विदेश जाने में मेरी बातों का समर्थन न देने का अंजाम तो वे देख ही चुके थे.

अपने पति के साथ छोटी ने मुझे ढूंढ़ने की कोशिश भी की थी पर सब पुराने संपर्क टूट चुके थे. अब अचानक मिशैल के पत्र से वह खुश हो गई और बाबूजी को बताए बिना यहां तक आ पहुंची थी.

‘‘बाबूजी कैसे हैं?’’ मैं ने बड़ी धीमी और सहमी आवाज में पूछा.

‘‘ठीक हैं. बस, जी रहे हैं. मां के मरने के बाद मैं ने कई बार अपने साथ रहने को कहा था पर शायद वह बेटी के घर रहने के खिलाफ थे.’’

इस से पहले कि मैं कुछ कहता, मिशैल बोली, ‘‘टोनी, यह देश तो तुम्हारे लिए पराया हो गया है पर मांबाप तो तुम्हारे अपने हैं. तुम अपने फादर को मिल लोगे तो उन्हें भी अच्छा लगेगा और तुम्हारे बेचैन मन को शांति मिलेगी…फिर न जाने तुम्हारा आना कब हो,’’  उस के स्वर की आर्द्रता ने मुझे छू लिया.

मिशैल ठीक ही कह रही थी. मेरे पास समय बहुत कम था. मैं बिना कोई समय गंवाए उन से मिलने चला गया.

बाबूजी को देखते ही मेरी रुलाई फूट पड़ी. पर वह ठहरे हुए पानी की तरह एकदम शांत थे. पहले वाली मुसकराहट उन के चेहरे पर अब नहीं थी. उन्होंने अपनी बूढ़ी पनीली आंखों से मुझे देखा तो मैं टूटी टहनी की तरह उन की गोद में जा गिरा और उन के कदमों में अपना सिर सटा दिया. बोला, ‘‘मुझे माफ कर दीजिए बाबूजी. मां की असामयिक मौत का मैं ही जिम्मेदार हूं.’’

मैं ने नजर उठा कर घर के चारों तरफ देखा. एकदम रहस्यमय वातावरण व्याप्त था. बीता समय बारबार याद आता रहा. बाबूजी ने मुझे उठा कर सीने से लगा लिया. आज पहली बार महसूस हुआ कि शांति तो अपनी जड़ों से मिल कर ही मिलती है. मैं उन्हें साथ ले जाने की जिद करता रहा पर वह तो जैसे वहां से कहीं जाना ही नहीं चाहते थे.

‘‘तू आ गया है बस, अब तेरी मां को भी शांति मिल जाएगी,’’ कह कर वह भीतर मेरे साथ अपने कमरे में आ गए और मां की तसवीर के पीछे से लाल कपड़ों में बंधी मां की अस्थियों को मुझे दे कर कहने लगे, ‘‘देख, मैं ने कितना संभाल कर रखा है तेरी मां को. जातेजाते कुरुक्षेत्र में प्रवाहित कर देना. बस, यही छोटी सी तेरी मां की इच्छा थी,’’ बाबूजी की सरल बातें मेरे अंतर्मन को छू गईं.

मां की अस्थियां हाथ में आते ही मेरे हाथ कांपने लगे. मां कितनी छोटी हो चुकी थीं. मैं ने उन्हें कस कर सीने में भींच लिया, ‘‘मुझे माफ कर दो, मां.’’

2 दिन बाद ही मैं, छोटी, उस के पति और पापा के साथ दिल्ली एअरपोर्र्ट रवाना हुआ. मिशैल बड़ी ही भावुक हो कर सब से विदा ले रही थी. भाषा न जानते हुए भी उस में अपनी भावनाओं को जाहिर करने की अभूतपूर्व क्षमता थी. बिछुड़ते समय वह बोली, ‘‘आप सब लोग एक बार हमारे पास जरूर आएं. मेरा आप के साथ कोई रिश्ता तो नहीं है पर मेरी मां कहती थीं कि कुछ रिश्ते इन सब से कहीं ऊपर होते हैं जिन्हें हम समझ नहीं सकते.’’

‘‘अब कब आओगे, भैया?’’ छोटी के पूछने पर मेरी आंखों में आंसू उमड़ आए. मैं कोई भी उत्तर न दे सका और तेजी से भीतर आ गया. उस का सवाल अनुत्तरित ही रहा. मैं ने भीतर आते ही मिशैल से भरे हृदय से कहा, ‘‘मिशैल, आज तुम न होतीं तो शायद मैं…’’

सच तो यह था कि मेरा पूरा शरीर ही मर चुका था. मैं फूटफूट कर रोने लगा. मिशैल ने फिर से मेरे कंधे पर हाथ रख कर मुझे पास ही बिठा दिया और बड़े दार्शनिक स्वर में बोली, ‘‘सच, दुनिया तो यही है जो तुम्हारा तिलतिल कर इंतजार करती रही और करती रहेगी, और तुम अपनी ही झूठी दुनिया में खोए रहना चाहते हो. तुम यहां से जाना चाहते हो तो जाओ पर कितनी भी ऊंचाइयां छू लो जब भी नीचे देखोगे स्वयं को अकेला ही पाओगे.

‘‘मेरी मानो तो अपनी दुनिया में लौट जाओ. चले जाओ…अब भी वक्त है…लौट जाओ टोनी, अपनी दुनिया में.’’

मिशैल ने बड़ा ही मासूम सा अनुरोध किया. मेरे सोए हुए जख्म भीतर से रिसने लगे. मेरे सोचने के सभी रास्ते थोड़ी दूर जा कर बंद हो जाते थे. मैं ने इशारे से उस से सहमति जतलाई.

मैं उस से कस कर लिपट गया और वह भी मुझ से चिपक गई.

‘‘बहुत याद आओगे तुम मुझे,’’ कह कर वह रोने लगी, ‘‘पर मुझे भूल जाना, पता नहीं मैं पुन: तुम्हें देख भी पाऊंगी या नहीं,’’ कह कर वह तेज कदमों से जहाज की ओर चली गई.

आज सोचता हूं और सोचता ही रह जाता हूं कि वह कौन थी…अपना सर्वस्व मुझे दे कर, मुझे रास्ता दिखा कर वह न जाने अब वहां कैसे रह रही होगी.

आईना (अंतिम भाग) : कैसा था अनुज का व्यवहार

पूर्व कथा

अनुज पत्नी सूजन के साथ अपने पिता तरुण के पास विदेश लौटने के लिए विदा लेने आता है. बेटेबहू के जाने से दुखी तरुण अपने अतीत में खो जाते हैं.

बचपन में स्कूल छोड़ते समय अनुज अपने पापा को वहां अकेला न छोड़ने के लिए कहता है. और आज वही अनुज बरसों बाद उसे छोड़ कर हमेशा के लिए अमेरिका चला जाता है. तरुण के कानों में वही शब्द, वही संवाद गूंजने लगते हैं जो अनुज ने उन से कहे थे पर तब वह उन के दर्द को नहीं समझ पाए थे.

बड़े चाव से तरुण के मातापिता उन का विवाह आधुनिक, सुंदर, नौकरीपेशा सुमी से कराते हैं. तेजतर्रार सुमी जल्दी ही अपने रंगढंग दिखाने लगती है. पैसा और शोहरत कमाने की दौड़ में युवा तरुण सुमी की खामियों को नजरअंदाज कर अपने मातापिता के साथ जबानदराजी करने लगता है. बेटे की उद्दंडता से दुखी हो कर वह गांव जाने का निर्णय लेते हैं. तरुण उन्हें रोकने का प्रयास करता है पर सफल नहीं होता.

उन के चले जाने के बाद सुमी और तरुण को उन की अहमियत का एहसास होने लगता है.

और अब आगे…

सुमी ने कई बार सोचा भी कि अपनी हठधर्मी छोड़ कर वह स्वयं क्षमायाचना कर सासससुर को वापस लाने का प्रयास करे, किंतु मानव स्वभाव की फितरत इतनी आसानी से कहां बदलती है. बड़ों की स्नेहिल छाया से अधिक उसे अपनी आजादी प्यारी थी. न चाहते हुए भी आएदिन की तकरार की परिणति आखिर उन लोगों के अलगाव मेें ही हुई. इस का सब से गहरा असर बढ़ती वय के किशोर अनुज पर पड़ा जो अपने दादादादी से बेहद हिलामिला हुआ था. उन लोगों के जाने से अनुज वक्त से पहले ही गंभीर हो चला था. मातापिता की व्यस्तता व घर का एकाकीपन अकसर ही छुट्टियों में उसे दादादादी के पास खींच ले जाता.

आखिर इंटर पास करते ही मेडिकल कालिज में चयन हो जाने पर वह अपनी शिक्षा की व्यस्तता में खोता चला गया पर छुट्टियां वह अब भी ज्यादातर दादादादी के पास ही बिताना पसंद करता.

सुमी को अकसर पेट में दर्द रहने लगा था. शुरू में टेबलेट्स लेने से ठीक रहा पर गिरती सेहत व एक बार भयंकर दर्द उठने पर जब पूर्ण जांच कराई गई तो गालब्लेडर ट्यूमर निकला. आपरेशन कोई बहुत जटिल तो नहीं था किंतु औषधीय प्रतिक्रिया के कारण आपरेशन के मध्य ही उस की तबीयत बिगड़ती गई और डाक्टरों के अथक प्रयास के बाद भी उसे बचाया न जा सका.

पत्नी की असामयिक मौत से तरुण और भी अकेले हो गए थे. मांबाप तो अब गांव में ही रम गए थे. वे शहर आ कर बेटे के पास रहने के लिए तनिक भी इच्छुक नहीं थे. साल में दोचार बार तरुण ही जा कर मिल लेते थे या उन की पैतृक हवेली व अब उन के मातापिता की भी देखभाल करने वाले रघु काका शहर आते तो तरुण से भी मिल कर सब हालचाल ले लेते.

गांव की शुद्ध निर्मल आबोहवा व तनावरहित जीवन से शशिधर व रमादेवी का स्वास्थ्य भी पहले से बेहतर हो गया था. शशिधर अपने हमउम्र दोस्तों के साथ व बाकी समय अपनी वैद्यकी से गरीब मरीजों के उपचार करने में व्यस्त हो गए थे. हवेली का एक हिस्सा उन्होंने किराए पर उठा दिया था. किरायेदार का एक छोटा सा बच्चा था. शीघ्र ही उन लोगों के साथ रमादेवी के संबंध मकानमालिक व किरायेदार के न रह कर आत्मीय से हो गए थे.

पति के आफिस जाते ही आवश्यक कार्य पूरा कर सुकन्या बच्चे के साथ रमादेवी के पास आ जाती. दोनों का समय एकदूसरे के साथ बडे़ आराम से निकल जाता.

हवेली के पीछे की खाली भूमि में माली ने फलफूल के कई पेड़ लगा दिए थे. अब वहां सब्जियां भी लगवा दी गई थीं. इस किचनगार्डेन में ही इतनी पैदावार हो जाती कि आवश्यकतानुसार रखने व जरूरतमंदों को बांटने के बाद मंडी में भी बिकने भेजनी पड़ती, जिस से आय का स्रोत भी बढ़ गया था.

शशिधर व रमादेवी के सरल स्वभाव से अभिभूत पूरा गांव हर पल उन के लिए कुछ भी करने को तत्पर रहता था. बेटेबहू से मिली पीड़ा पर इस अपनत्व व इज्जत ने मरहम का काम किया था. शशिधर को मिल रही पेंशन, किराया व सब्जियों, फलों की बिक्री से उन लोगों को कोई आर्थिक चिंता न थी. फिर भी कभीकभी बेटे व पोते की याद उन्हें भावविह्वल कर देती. बेटी- दामाद के बहुत इसरार करने पर भी वे लोग स्थायी रूप से उन के साथ रहने को सहमत नहीं हुए. अत: बीचबीच में श्रेया सपरिवार मातापिता से मिलने पहुंच जाती. कभी वे लोग उस के यहां जा कर मिल लेते थे.

भारत में मेडिकल की पढ़ाई पूरी होने पर अनुज पोस्टग्रेजुएशन करने के लिए अमेरिका चला गया था और अपनी शैक्षिक योग्यता पूरी कर वह भारत वापस आया, पर अकेला नहीं, अपनी विदेशी पत्नी सूजन  के साथ. अमेरिका में साफ्टवेयर इंजीनियर सूजन के घर में पेइंग गेस्ट बन कर रह रहे अनुज को उस का हमसफर बनते अधिक समय नहीं लगा था.

विदेशी सभ्यता के खुलेपन ने उसे अपने आकर्षण में कुछ इस तरह बांधा कि भारत लौटने से पहले ही उस ने परिजनों को सूचित किए बिना ही कोर्टमैरिज कर ली. बेटे के इस दुस्साहसिक कदम से तरुण तिलमिला गए थे पर एअरपोर्ट पर अवसर की नजाकत भांप कर कोई नाराजगी दर्शाए बिना बहू का भी खुले दिल से स्वागत किया.

धक्का तो उन्हें तब लगा जब उन के सारे सपनों को धराशायी करते हुए अनुज ने अगले हफ्ते ही वापस लौट कर अमेरिका में ही रह कर प्रैक्टिस करने का निर्णय सुनाया. पिता का अकेलापन या भारत में फैली प्रापर्टी का दायित्व अनुज के इरादों को विचलित न कर सका. 2 वर्षों के अमेरिका प्रवास ने उस की संपूर्ण सोच को ही जैसे बदल कर रख दिया था. अब भारत उसे निहायत पिछड़ा व गंदा लगने लगा था. हां, अपने दादादादी के प्यार की डोर से बंधा अनुज, सूजन को उन लोगों से मिलाने उत्साहपूर्वक गांव जरूर पहुंचा. आशा से कहीं अधिक प्यार व आवभगत से अभिभूत वे लोग अमेरिका लौटने से एक दिन पहले अपना सामान पैक करने तरुण के पास लौटे थे. तरुण ने एक बार फिर बेटे को रोकने की चेष्टा की.

‘बेटे, एक बार फिर सोच लो…क्या तुम वहां खुश रह सकोगे?’

‘डैड, जिंदगी में आगे बढ़ने के लिए पिछले कदम के नीचे की जमीन का मोह तो छोड़ना ही पड़ता है.’

‘पर यह भी तो सच है कि अपनी जड़ों से कट कर कोई वृक्ष फलफूल नहीं पाता. कहीं न कहीं कमी रह ही जाती है. मैं तो सोचता था कि पढ़ाई खत्म होने के बाद तुम यहीं मेरे साथ प्रैक्टिस करोगे.’

‘ओ नो डैड…इंडिया में फ्यूचर ब्राइट नहीं है. वापस तो मुझे जाना ही है.  सूजन को भी एक हफ्ते की छुट्टी मिली है. मैं ने वहां ग्रीनकार्ड के लिए आवेदन कर दिया था, लौटते ही मिल जाएगा. मैं तो वहीं पर अपना नर्सिंग होम खोलना चाहता हूं…जिस के लिए मुझे 20-25 लाख रुपए तो चाहिए ही. अगर आप अभी दे देते तो…’

‘20-25 लाख…’ तरुण जैसे आसमान से गिरे, ‘इतने रुपए कहां हैं. अभी तुम्हारे लिए यहां नर्सिंग होम सेट करने में ही काफी खर्च हो चुका है. फिर इस नर्सिंग होम में 4-5 पार्टनर्स भी तो हैं. कई चीजों का अभी भी हर महीने लोन कटता है…’

उन की बात बीच में ही काटता अनुज थोड़ी बेरुखी से बोला, ‘एक्सक्यूज मी डैड, आप ने जो कुछ भी, जब भी किया, सिर्फ अपने लिए ही किया है. मेरे लिए आप ने क्या किया है?’

‘क्यों, तुम्हारी पढ़ाई का इतना खर्च क्या कोई और दे गया?’ अनुज के उत्तर से हैरान व क्रोधित होते तरुण बोले.

‘वह तो आप का फर्ज था. आप नहीं देते तो कौन देता, मेरे लिए कुछ खास तो नहीं कर दिया आप ने…कुछ ऐसा ही आप ने दादाजी से कहा था न एक बार…उस रात मैं दादी के पास ही सोया था. आंसू भरी दादाजी की आंखें व निशब्द रोती दादी का रहरह कर कांप उठता शरीर आज भी मेरे शरीर में सिहरन सी भर देता है. वह सबकुछ उन का फर्ज था तो क्या आप का कुछ भी कर्तव्य नहीं था?

‘उस दिन पहली बार मुझे आप व मां पर बहुत गुस्सा आ रहा था, पर तब मैं बहुत छोटा था. हां, शायद जीवन का पहला पाठ आप से यही सीखा कि जिंदगी में केवल अपने लिए सोचना चाहिए. वे आप से क्या चाहते थे…केवल आप का कुछ समय ही न, जो आप उन्हें नहीं दे सके. आप आत्मावलोकन करें तो समझेंगे कि आप ने क्या खोया क्या पाया है और रुपए की जरूरत तो मुझे आज है…बाद में तो मैं ही आप को हर माह कमा कर भेज दिया करूंगा.’

तरुण सन्न से हो कर वहीं सोफे पर बैठे रह गए. बेटे की कही बातें वह सुन कर भी समझ नहीं पा रहे थे, बस, एकटक बेटे का मुंह देखते रहे. वह उन्हें अपना बेटा अनुज नहीं बल्कि अमेरिका रिटर्न संवेदनहीन मात्र डा. अनुज लग रहा था. बेटे के आने की खुशी तो पहले ही उस के वापस लौटने के फैसले से ही तिरोहित हो चुकी थी. अब उस से बातचीत के बाद तो तरुण बिलकुल ही मौन हो गए थे. आज उन्हें महसूस हो रहा था कि जीवनसंध्या में इनसान को पैसों की चकाचौंध नहीं बल्कि अपनों के साथ व अपनेपन की चाह होती है. पैसा जरूरत तो हो सकता है पर खुशियों का पर्याय नहीं.

बाहर पोर्टिको में कार रुकने की आवाज आई थी, जो अभीअभी एअरपोर्ट से वापस लौटी थी. और इसी के साथ तरुण भी वर्तमान में लौट आए. लान से उठ कर वह अंदर कमरे की तरफ बढ़ गए. हाल में प्रवेश करते ही सामने टंगी मातापिता की तसवीर आज उन्हें नवीन अंदाज में मंदमंद मुसकराती अपने पास बुलाती सी लगी. वह भावुक हो बडे़ प्यार व सम्मान से उस तसवीर पर हाथ फेरने लगे, मानो इसी माध्यम से उन का स्नेहिल स्पर्श महसूस करना चाहते हों. न मालूम कितनी ही भूलीबिसरी घडि़यां आज उन्हें याद आती रहीं. बुखार से तपते माथे पर ठंडे पानी की पट्टियां रखती, रातरात भर जागती मां, उन के बाजार घूमने को मचलने पर थकेहारे होने पर भी गोद में ले कर घुमाने ले जाते पिता, घर में ढेरों खिलौने होने पर भी हर नए खिलौने की जिद करता तरुण तो कभी रूठने पर मनुहार करकर के खाना खिलाती मां, भाईबहन की मीठी नोकझोंक, चुहल- बाजी, दिल ही दिल में अपने अमर्यादित आचरण पर शर्मिंदा आंखों में पश्चात्ताप के अश्रु भरे तरुण बड़ी देर तक उसे निहारता रहा.

आज उसे पिता के कहे शब्द याद आ रहे थे, ‘बेटे, दूसरे की पीड़ा का एहसास तब होता है जब स्वयं पर चोट पड़ती है.’

तरुण ने निश्चय कर लिया कि वह अपने मातापिता से क्षमायाचना कर उन्हें मना कर या तो यहीं ले आएंगे अथवा यहां की सारी प्रापर्टी समेट कर गांव में ही चिकित्सालय खोल कर उन की सेवा करते हुए अपनी गलती का प्रायश्चित करेंगे. भुक्तभोगी तरुण को विश्वास था कि मांबाप का विशाल हृदय उन की गलतियों को अवश्य क्षमा कर देगा.

अश्रुपूर्ण निगाहों से तरुण ने फोटो में देखा तो चौंक गए. वहां उन्हें अनुज का चेहरा दिख रहा था. अतीत के संबंधों के खालीपन ने मानो फोटो फ्रेम के शीशे के पीछे भी शून्यता भर दी थी, जिस से आज उस शीशे की सतह पर यादों का प्रकाश पड़ते ही वह तसवीर आईना बन उठी थी और उसे अपना नहीं बल्कि अनुज का चेहरा दिखा रही थी जो शायद उन के मन का भ्रम व अवचेतन का प्रारूप ही था, क्योंकि जब उन्होंने पीछे पलट कर देखा तो हाल खाली था और वह अकेले.

ये छात्र क्यों बनना चाहते हैं सेक्स वर्कर..!

अगर ब्रिटेन के स्वांसी विश्वविद्यालय द्वारा करवाए गए एक ताजा अध्ययन के विश्वास करे तो ब्रिटेन के 20 फीसदी से भी अधिक छात्र यौनकर्म अपनाने के बारे में सोच रहे हैं. समाचार पत्र ‘एशियन लाइट’ में प्रकाशित रपट में अध्ययन के हवाले से कहा गया है कि वास्तव में उनमें से पांच फीसदी छात्र पहले ही यौनकर्म में संलिप्त रहे हैं तथा छात्राओं की अपेक्षा छात्रों का रुझान इस ओर ज्यादा है.

गौरतलब है कि यौनकर्म के अंतर्गत स्ट्रीपिंग (नाचते हुए कपड़े उतारना), फोन पर उत्तेजक बातचीत, उत्तेजक नृत्य और यौनाचार शामिल हैं. इसमें एस्कॉर्ट के रूप में कार्य भी शामिल है. इसके अलावा बिना किसी के संपर्क में आए वेबकैम के जरिए एवं ग्लैमर मॉडलिंग के जरिए भी छात्र यौनकर्म से कमाई करने के इच्छुक हैं.

स्वांसी विश्वविद्यालय के आपराधिक न्याय एवं अपराध विज्ञान विभाग ने यह अध्ययन किया तथा इस अध्ययन के लिए बिग लॉटरी फंड ने आर्थिक मदद दी. ब्रिटेन के विभिन्न इलाके से तकरीबन 6,750 विद्यार्थियों ने इस ऑनलाइन सर्वेक्षण में हिस्सा लिया.

अध्ययन के अनुसार, विद्यार्थियों के यौनकर्म अपनाने या उसकी ओर उन्मुख होने का सबसे बड़ा कारण आर्थिक तंगी है, क्योंकि छात्रों को 9,000 पाउंड प्रति वर्ष का शुल्क वहन करने में परेशानी हो रही है. स्नातक तक की शिक्षा पूरी करने वाले अधिकांश विद्यार्थियों पर 50,000 पाउंड तक का कर्ज पाया गया.

अध्ययन में पाया गया कि जहां दो तिहाई विद्यार्थी जीवनशैली के स्तर को बेहतर करने के लिए यौनकर्म की ओर जाना चाहते हैं, वहीं 45 फीसदी के लगभग विद्यार्थी अपने कर्ज को चुकाने के लिए इस ओर जाने के बारे में विचार कर रहे हैं.

अध्ययन में हिस्सा लेने वाले 59 फीसदी विद्यार्थियों का मानना है कि वे इस कार्य में लुत्फ उठाएंगे, 54 फीसदी इसे लेकर जिज्ञासु हैं, 45 फीसदी छात्र देह कारोबार में काम करना चाहते हैं तथा 44 फीसदी छात्र यौन सुख की चाह में देह व्यापार अपनाना चाहते हैं. देह कारोबार में काम कर चुके विद्यार्थियों में आधे छात्रों ने छह महीने से भी कम समय के लिए इसे अपनाया या सप्ताह में पांच घंटे काम किया.

देह व्यापार में काम कर चुके विद्यार्थियों में से 76 फीसदी विद्यार्थियों ने काम करते हुए खुद को सुरक्षित महसूस किया, जबकि सीधे-सीधे देह व्यापार में लिप्त 49 फीसदी विद्यार्थी यौनाचार के दौरान मारपीट होने को लेकर संशकित रहे.

अध्ययन की सह-नेतृत्वकर्ता ट्रेसी सगर के अनुसार, देह व्यापार में आम धारणा के विपरीत पुरुषों का अधिक लिप्त होना इस अध्ययन से मिला महत्वपूर्ण तथ्य है.

ट्रेसी ने कहा, “देह व्यापार काफी व्यापक है, लेकिन लोगों की इसके प्रति एक गलत धारणा है कि इसमें अधिकांशत: महिलाएं ही संलिप्त हैं.”

कांग्रेस : युवा जोश के साथ तजुर्बे को तरजीह

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी किसी जल्दबाजी में नहीं है. संगठन में कोई बदलाव करने से पहले वह उसके नफा-नुकसान का पूरा गणित लगाते हैं. वह जानते हैं कि मौजूदा राजनीतिक स्थितियों का मुकाबला करने के लिए युवा जोश के साथ तजुर्बे की भी जरूरत होगी. इसलिए, वह वरिष्ठ नेताओं के अनुभवों का भी पूरा लाभ लेने की रणनीति पर अमल कर रहे हैं.

वरिष्ठ नेता अहमद पटेल को पार्टी कोषाध्यक्ष की जिम्मेदारी सौंपना इसी रणनीति का हिस्सा है. वर्ष 2019 का लोकसभा चुनाव कांग्रेस के लिए बहुत अहम है. ऐसे में पार्टी अध्यक्ष होने के नाते राहुल गांधी कोई जोखिम नहीं लेना चाहते हैं. वह जानते हैं कि भाजपा के खिलाफ विपक्ष को एकजुट करने के लिए वरिष्ठ नेताओं के अनुभव की जरुरत होगी. इसके साथ चुनाव लड़ने के लिए पार्टी के खजाने में भी इजाफा करना होगा. इसलिए, राहुल गांधी युवा और तजुर्बेकार नेताओं में संतुलन बनाकर आगे बढ़ रहे हैं.

राहुल गांधी ने अपनी टीम में जहां राजीव सातव, गौरव गोगई, सुष्मिता देव और भंवर जितेंद्र सिंह को जगह दी है, वहीं उन्होंने पार्टी के सबसे वरिष्ठ नेता मोतीलाल वोरा को भी साथ रखा है. पार्टी महाधिवेशन में अध्यक्ष के तौर पर राहुल गांधी खुद कह चुके हैं कि युवा कांग्रेस को आगे ले जाएंगे, पर यह काम वरिष्ठ नेताओं के बिना नहीं हो सकता.

दरअसल, राज्यसभा के चुनाव में अहमद पटेल ने बेहद मुश्किल मुकाबले में जीत दर्ज कर यह साबित कर दिया था कि नई पीढ़ी के नेताओं को अभी बहुत कुछ सीखना है. कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने अपनी टीम में जिम्मेदारियां भी बहुत सोच-समझ कर दी हैं. वहीं, गुजरात, गोवा, झारखंड और बिहार का प्रभार युवा नेताओं को दिया है. इससे साफ है कि राहुल गांधी युवाओं को जगह देने के लिए जल्दबाजी में निर्णय करने के बजाए गुणा-गणित कर फैसले कर रहे हैं.

आनंद शर्मा विदेश विभाग के प्रमुख

वरिष्ठ नेता आनंद शर्मा को कांग्रेस के विदेश मामलों के विभाग का प्रमुख नियुक्त किया गया है. अभी तक यह जिम्मेदारी वरिष्ठ नेता डॉ. कर्ण सिंह संभाल रहे थे. पार्टी महासचिव बनाए गए लुईिजन्हो फलेरो के पास असम के अलावा सभी पूर्वोत्तर राज्यों का प्रभार होगा. अभी यह जिम्मेदारी संभाल रहे वरिष्ठ नेता सीपी जोशी को संगठन की जिम्मेदारियों से मुक्त कर दिया गया है. वहीं, पूर्व लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार कार्यसमिति में स्थाई आमंत्रित सदस्य बनी हैं.

महासचिव की भूमिका में मोतीलाल वोरा

वरिष्ठ कांग्रेस नेता मोतीलाल वोरा की जिम्मेदारियों में भी बदलाव किया गया है. करीब 18 सालों तक पार्टी के कोषाध्यक्ष पद को संभालने वाले वोरा अब महासचिव की भूमिका में होंगे. उन्होंने मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री का पद संभालने के अलावा उत्तर प्रदेश के राज्यपाल पद को भी संभाला था. नईपारी के तहत वह प्रशासन में भूमिका निभाएंगे.

गहलोत संगठन प्रभारी बने

अशोक गहलोत जमीनी नेता है. वह कार्यकर्ताओं की भावनाओं को समझते हैं, इसलिए उन्हें संगठन प्रभारी बनाया है. आंध्र प्रदेश, असम और महाराष्ट्र मुश्किल राज्य है. ऐसे में इन राज्यों की जिम्मेदारी भी वरिष्ठ नेताओं को सौंपी गई है. जादू और घूमने-फिरने के शौकीन अशोक गहलोत वर्ष 1984 में पहली बार जोधपुर से सांसद बने और दो बार राजस्थान का मुख्यमंत्री पद संभाला.

योगासनों की वास्तविकता

योग वाले अपने संभावित ग्राहक को अभिभूत करने के लिए आमतौर पर 2 रास्तों का सहारा लेते हैं. एक तो वे इस की अति प्राचीनता की दुहाई देते हैं, दूसरे, इस के आसनों के परिमाण की बहुलता का भारी प्रचार करते हैं.

यद्यपि पतंजलि ने अपने योगसूत्रों में स्थिर हो कर सुखपूर्वक बैठने को ही ‘आसन’ कहा है और किसी भी आसन विशेष का न उल्लेख किया है न वर्णन फिर भी उस के प्राचीनतम भाष्य (व्यासभाष्य) में 11 आसनों का उल्लेख मिलता है.

तद्यथा पद्मासनं वीरासनं भद्रासनं स्वस्तिकं दण्डासनं सोपाश्रयं पर्यंकं, क्रौंचनिषदनं,

हस्तिनिषदनमुष्ट्रनिषदनं समसंस्थानं स्थिरसुखं यथासुखं चेत्येवमादीनि.

(योगसूत्र 2/46 पर व्यासभाष्य)

[पद्मासन, वीरासन, भद्रासन, स्वस्तिक, दंडासन, सोपाश्रय, पर्यंकासन, क्रौंचासन, हस्तिनिषदन (हाथी आसन) उष्ट्रनिषदन (ऊंट आसन) और समसंस्थान-ये आसन स्थिर करने वाले तथा सुख देने वाले हैं.]

वैसे यदि योगसूत्रों के अलावा विशाल योगसाहित्य पर एक नजर डालें तो पता चलेगा कि किसी ग्रंथ में एक आसन का वर्णन है तो किसी में 2 का. एक ग्रंथ में 32 आसनों का वर्णन है. जैसे, त्रिशिखब्राह्मणोपनिषद् में एक आसन का; योगचूडामणि उपनिषद में 2 आसनों का; योगकुंडल्युपनिषद् व अमृतनाद उपनिषद् में 3 आसनों का; ध्यानबिंदु उपनिषद्, योगतत्त्व उपनिषद् और शिवसंहिता में 4 आसनों का; शांडिल्य उपनिषद् में 8 आसनों का; दर्शन उपनिषद्  में 9 आसनों का; वाराह उपनिषद् में 11 आसनों का, हठयोगप्रदीपिका में 15 आसनों का; त्रिशिख ब्राह्मण उपनिषद् (मंत्रभाग) में 17 आसनों का और घेरंड संहिता में 32 आसनों का वर्णन है.

इस विवरण से स्पष्ट है कि व्यासभाष्य, वाराह उपनिषद् तक के 10 ग्रंथों के रचे जाने के बाद लिखा गया, तभी उस में 11 आसनों का उल्लेख  है.

ध्यान रहे, ये ‘उपनिषद्’ गं्रथ प्राचीन उपनिषदों की अपेक्षा अर्वाचीन ग्रंथ हैं. इन्हें प्राचीन दर्शाने के उद्देश्य से इन के पीछे ‘उपनिषद्’ शब्द जोड़ दिया गया है.

इन ग्रंथों के बाद जो योग विषयक ग्रंथ रचे गए, उन में से कइयों ने न केवल आसनों को सीधे शिव से प्राप्त करने की बात की है बल्कि उन की संख्या भी चौरासी लाख बताई है :

आसनानि समस्तानि यावत्यो जीवयोनय:,

चतुरशीतिलक्षाणि शिवेन कथितानि तु.

(श्रीधर्मकल्पद्रुम, खंड 4, पृ. 13)

(कुल आसन 84 लाख हैं, जितनी कि जीवों की योनियां हैं. उन सब आसनों का ज्ञान शिव द्वारा दिया गया है.)

यह अतिशयोक्तिपूर्ण संख्या निरा झूठ प्रतीत होती है, क्योंकि किसी प्राचीन ग्रंथ में जैसे जीवों की 84 लाख योनियों का विवरण नहीं मिलता, उसी तरह 84 लाख आसनों का भी कहीं विवरण उपलब्ध नहीं होता, न किसी प्राचीन ग्रंथ में, न किसी अर्वाचीन ग्रंथ में.

दूसरा यह प्रश्न भी पैदा होता है कि शिव ने 84 लाख आसन बताए थे तो बाकी कहां चले गए? स्पष्ट है कि 84 लाख की संख्या एक मिथ के तौैर पर लोगों को अभिभूत करने के लिए गढ़ी गई है, जबकि वास्तविकता यह है कि पहले आसन एक था. फिर 2,3,4,8,9, 11,15,17 और 32 बने. इस वास्त- विकता पर परदा डालने के लिए योग वालों ने फिर यह कहना शुरू कर दिया कि 84 लाख आसनों में 84 आसन विशेष हैं और मृत्युलोक में 33 आसन मंगलजनक हैं :

तेषां मध्ये विशिष्टानि षोडशोनं शतं कृतम्,

आसनानि त्रयस्त्रिंशन्मर्त्यलोके शुभानि वै.

(श्रीधर्मकल्पद्रुम, खंड 4, पृ. 13)

भावार्थ यह है कि 84 लाख की बात निरी गप है, तभी तो उन में से 84 को विशेष कहा गया है. यह 84 का आंकड़ा भी काल्पनिक प्रतीत होता है. तभी तो मृत्युलोक में 33 आसनों के मंगलजनक होने की बात कही गई है. घेरंड संहिता (2/2) में तो 33 के स्थान पर भी 32 आसनों के ही मंगलजनक होने की बात कही गई है : तेषां मध्ये मर्त्यलोके द्वात्रिंशदासनं शुभम् (इन में भी 32 आसन मृत्युलोक के निवासियों के लिए शुभ अर्थात कल्याणदायक हैं).

इन दोनों ग्रंथों में एक आसन का अंतर है. बद्धपद्मासन नामक आसन श्रीधर्मकल्पद्रुम में अतिरिक्त है.

यहां कई बातें विचारणीय हैं. यदि मृत्युलोक के लिए 32/33 आसन ही मंगलजनक अथवा कल्याणकारक हैं, तब 84 या 84 लाख किस के लिए हैं? तब 8300068 फालतू आसनों का क्या औचित्य है? वे क्या किसी ‘दूसरी’ दुनिया के लोगों के लिए हैं या निरर्थक हैं? उन निरर्थक आसनों को बनाने वाले की क्या महानता है?

यह एक विडंबना है कि 84 लाख आसनों की डींग हांकने वाले 32 आसनों के बाद के आसनों के नाम व विवरण देने में अपने को एकदम असमर्थ पाते हैं. इन 32 आसनों को भी शिव द्वारा सिखाए हुए नहीं माना जा सकता, क्योंकि इन में से 2 आसन तो 13वीं शताब्दी के 2 योगियों द्वारा गढ़े हुए हैं. इसीलिए उन के नाम भी उन्हीं के नाम पर हैं.

पहला है, मत्स्येन्द्र आसन. मत्स्येन्द्र नाथ कामरूप (असम) के एक मछुआरे मीनपा के पुत्र थे और 13वीं शताब्दी में हुए. इसी तरह दूसरा आसन है गोरक्षासन. गोरक्षनाथ तिब्बती जनश्रुति के अनुसार बौद्ध बाजीगर थे. विद्वान इन्हें 13वीं शताब्दी में मानते हैं. कुछ इन का समय संवत 1250 बताते हैं, तो कुछ 1257. गोरक्षनाथ मत्स्येन्द्रनाथ का शिष्य था.

अब यदि 13वीं शताब्दी के मत्स्येन्द्रनाथ और गोरक्षनाथ द्वारा गढ़े गए आसन मिला कर कुल 32 बनते हैं तो स्पष्ट है कि आसन अभी कल तक नए गढ़े जाते रहे हैं. इन का शिव से कुछ लेनादेना नहीं है. उस का नाम केवल तथाकथित अति प्राचीनता से लोगों को अभिभूत करने के लिए किया जाता है.

इन आसनों का प्रयोजन क्या है? क्यों ये विविध रोगों की चिकित्सा के उद्देश्य से गढ़े गए हैं? इन का उद्देश्य न तो कभी बीमारियों का इलाज करना रहा है और न किसी आयुर्वेदीय गं्रथ ने ही इलाज के तौर पर कहीं इन का उल्लेख किया है. योगशास्त्रीय गं्रथों ने भी इन्हें चिकित्साशास्त्रीय चीजें नहीं माना है. उन्होंने इन्हें मन की चंचलता को रोकने के लिए इस्तेमाल में लाने की ही बात की है.

कुर्यात्तदासनं स्थैर्यमारोग्यं चांगला- घवम््.

(हठयोगप्रदीपिका 1/17)

(आसन मन की स्थिरता व आरोग्य लाता है और शरीर के भारीपन को दूर करता है.)

अभ्यासाद्यस्य देहोऽयं योगौपयिकतां व्रजेत्,

मनश्च स्थिरतामेति प्रोच्यते तदिहासनम्.

(श्रीधर्मकल्पद्रुम, खंड 4, पृ. 12)

(जिस के अभ्यास से शरीर योग के उपयुक्त और मन स्थिर हो जाता है, उस का नाम आसन है.)

योगेन चित्तस्य मलं शरीरस्य तु वैद्यकेन.

(योगवार्तिक/योगसूत्रभोजवृत्ति)

(योग से चित्त (मन) के मल दूर होते हैं और वैद्यक (आयुर्वेद) से शरीर के.)

जायते येन येनेह विहितेन स्थिरं मन:,

तत्तदेव विधातव्यमासनं ध्यान- साधनम्.

(योगशास्त्र 4/134)

(जिस आसन के करने से मन स्थिर हो, वही आसन करना चाहिए, क्योंकि आसन ध्यान का साधन होता है.)

इन उद्धरणों से स्पष्ट है कि योगासनों का उद्देश्य केवल मन को स्थिर व काबू में करना है. यदि किसी आसन से कोई अन्य लाभ होता है तो वह गौण है, उस का मुख्य उद्देश्य नहीं. यही कारण है कि जिन 32 आसनों का घेरंडसंहिता में वर्णन है, उन में से 22 आसनों का शारीरिक दृष्टि से कोई भी लाभ नहीं बताया गया है. उन के केवल लक्षण दिए हैं कि इस आसन को इस प्रकार करें, बस, मन को संयम में करने में मिलने वाली कथित सहायता ही इन का लाभ है.

जिन 10 आसनों के लाभ बताए गए हैं वे भी इस ढंग के हैं कि उन का चिकित्साशास्त्रीय दृष्टि से कोई विशेष अर्थ नहीं बनता. 5 आसनों के लाभ इस तरह बताए गए हैं :

एतद् व्याधिविनाशकारणपरं पद्मासनं प्रोच्यते.

(घेरंड संहिता 2/8)

(यह सब व्याधियों का विनाशक कहा जाता है.)

भद्रासनं भवेदेतत् सर्वव्याधि- विनाशकम्.

(घेरंड संहिता 2/10)

(भद्रासन नामक आसन सब व्याधियों का विनाशक है.)

सिंहासनं भवेदेतत् सर्वव्याधि- विनाशकम्.

(घेरंड संहिता 2/15)

(सिंहासन नामक आसन सब व्याधियों का विनाशक है.)

मत्स्यासनं तु रोगहा.

(घेरंड संहिता 2/21)

(मत्स्यासन रोगों को दूर करने वाला है.)

सर्वरोगविनाशनम् भुजंगासनम्.

(घेरंड संहिता 2/42)

(भुजंगासन समस्त रोगों का नाश करता है.)

यदि कभी चिकित्साशास्त्रीय दृष्टि से इन आसनों की प्रामाणिकता सिद्ध भी हो जाए तो भी स्पष्ट है कि इन पांचों में से एक ही काफी होगा, शेष 4 एकदम व्यर्थ हैं; क्योंकि जब एक ही आसन ‘सब रोगों का निवारक’ है तो फिर अलगअलग बीमारियों के लिए अलगअलग आसन बताने वाले क्या केवल दुकानदारी नहीं कर रहे हैं?

अगले एक आसन के बारे में कहा गया है कि इस से थकावट दूर होती है:

शवासनं श्रमहरम्.

(घेरंड संहिता 2/19)

(शवासन थकावट को दूर करता है.)

क्या पूर्वोक्त ‘सर्वव्याधिहर आसन’ थकावट को दूर करने में असमर्थ है, जो इसे विशेषत: श्रमहर बताया गया है?

इसी तरह अगले मकरासन के बारे में कहा गया है कि यह शरीर की अग्नि को प्रज्वलित करता है :

देहाग्निकरं मकरासनं तत्.

(घेरंड संहिता 2/39)

क्या पहले कहे हुए ‘सर्वव्याधि नाशक’ आसन यह काम नहीं करते जो इस के लिए पृथक् से मकरासन की कल्पना की गई है? यदि वे नहीं करते तो फिर उन्हें ‘सर्वव्याधि नाशक’ कहने का क्या औचित्य है?

इसी तरह अगले 3 आसनों को सिद्धि देने वाले कहा गया है :

मुक्तासनं तु सिद्धिदम्.

(घेरंड संहिता 2/11)

(मुक्तासन सिद्धियों को देने वाला है.)

वज्रासनं भवेदेतत् योगिनां सिद्धिदायकम्.

(घेरंड संहिता 2/12)

(वज्रासन योगियों के लिए सिद्धियां प्रदान करने वाला है.)

गोरक्षासनमित्याहु : योगिनां सिद्धि- कारणम्.

(घेरंड संहिता 2/26)

(गोरक्षासन योगियों को सिद्धि प्रदान करने वाला है.)

क्या इन 3 आसनों को छोड़ कर शेष 29 आसन सिद्धि देने में असमर्थ हैं. यदि वे असमर्थ हों तो भी इन 3 विशेष आसनों के अस्तित्व का क्या औचित्य है? तीनों एक ही काम करते हैं. कथित सिद्धियां प्रदान करने का यह काम तो एक आसन ही कर सकता है. ऐसे में 2 आसनों को तो बेकार ही घोषित करना होगा. साथ ही शेष 29 आसन भी निरर्थक सिद्ध होंगे, क्योंकि वे तो सिद्धि देने में असमर्थ ही रहेंगे. इस दृष्टि से तो केवल 1 आसन काफी है. जब वह सिद्धि प्रदान करने में समर्थ है, तब स्पष्ट है कि वह सर्वव्याधियों को विनष्ट करने में भी समर्थ होगा. ऐसे में 32 आसनों का ही औचित्य सिद्ध करना कठिन हो जाएगा, 84 या 84 लाख की तो बात ही छोड़ो.

घेरंड संहिता ने मत्स्येन्द्र आसन, पश्चिमतान आसन और मयूर आसन का कोई लाभ विशेष नहीं बताया है. परंतु हठयोगप्रदीपिका ने इन के भी लाभ गिना दिए हैं :

मत्स्येन्द्रपीठं जठरप्रदीप्तिं प्रचंडरुग्मंडलखंडनास्त्रम्.

(हठयोग-प्रदीपिका 1/27)

[मत्स्येंद्र आसन जठराग्नि (पाचनशक्ति) को तेज करता है और प्रचंड रोगों के समूह को नष्ट करता है.]

इति पश्चिमतानमासनम्,

उदयं जठरानलस्य कुर्यादुदरे कार्श्यमरोगतां च पुंसाम्.

(हठयोगप्रदीपिका 1/29)

(पश्चिमतान आसन जठराग्नि को प्रदीप्त करता है, उदर को मध्य से कृश करता है और रोगों से मुक्त करता है.)

हरति सकलरोगानाशु गुल्मो- दरादीनभिभवति च दोषानासनं श्रीमयूरम्,

बहु कदशनभुक्तं भस्म कुर्यादशेषं जनयति जठराग्ंिन जारयेत्कालकूटम्.

(हठयोगप्रदीपिका 1/31)

[मयूरासन गुल्म, जलोदर आदि सब रोगों को नष्ट करता है, खाए हुए ज्यादा या कुत्सित अन्न को पचाता है, जठराग्नि को बढ़ाता है और कालकूट (विष) के प्रभाव को भी खत्म करता है.]

यहां यह विचारणीय है कि जो चीजें घेरंड संहिता को मालूम नहीं वे हठयोगप्रदीपिका को कैसे मालूम हो गईं? क्या ‘शिव’ इस के लेखक के कानों में फूंक मार गए थे या ऐसे ही मनमाने ढंग के इन 3 आसनों के गुण कल्पित कर लिए गए?

तीनों सब रोगों को दूर करते बताए गए हैं, तीनों जठराग्नि को प्रदीप करने वाले कहे गए हैं. यदि तीनों को एक सा काम ही करना है तो फिर इन तीनों का औचित्य ही क्या रह जाता है?

दूसरे, मयूरासन को विष को भी पचा जाने वाला किस आधार पर कहा गया है? यह एक आम धारणा है कि मयूर (मोर) सांप को खा जाता है, विष को पचा लेता है. उसी आधार पर यह कल्पना की गई है कि मयूरासन से विष को पचाया जा सकता है. यह बहुत स्थूलबुद्धि की बात है. स्पष्ट है, मयूर के शरीर की नकल करने वाला आसन, मयूरासन लगाने पर व्यक्ति के अंदर उस पक्षी के अंदरूनी सिस्टम सा कोई सिस्टम काम करना शुरू नहीं कर सकता.

स्पष्टत: इन आसनों के कथित लाभ कपोलकल्पित हैं : जो बात एक गं्रथ में थी, बाद के ग्रंथकार ने उसे और ज्यादा लुभावना व आकर्षक बनाने के लिए अपने ग्रंथ में अपनी ओर से और मिर्च मसाला लगा कर प्रस्तुत कर दिया. जिन आसनों के कथित लाभों की बाबत योगीराज घेरंड चुप थे, हठयोगप्रदीपिका के लेखक ने उन में से कइयों के लाभ अपनी ओर से जोड़ कर अपने ग्रंथ को ज्यादा लोकप्रिय बना लिया और अपना योगीराजत्व ज्यादा श्रेष्ठ घोषित करवा लिया.

यहां यह भी विचारणीय है कि क्या किसी योगी ने इन योगासनों से कभी पाचन शक्ति बढ़ाई है? क्या किसी ने विष खा कर इन की सहायता से कभी अपनी जान बचाई है? क्या इन के कारण कोई रोग से मुक्त हुआ है? क्या इन के कोई प्रामाणिक उदाहरण हैं?

मेरा खयाल है, हम आधुनिक योगियों के उदाहरण न ले कर प्राचीन व प्रामाणिक उदाहरण ही लें. 1883 ई. में आर्यसमाज के संस्थापक योगीराज स्वामी दयानंद सरस्वती को विष दे दिया गया था. वे योगाभ्यास व योगासन किया करते बताए जाते हैं. परंतु कोई भी आसन उन्हें विष के घातक प्रभाव से नहीं बचा सका.

गौतम बुद्ध को भी योगीराज बताया जाता है. इसीलिए कई लोग तो बुद्धधर्म का अर्थ ही योग/विपश्यना बताते हैं. पालि त्रिपिटक में आता है कि पावा नगरी में बुद्ध ने शूकरमार्दव खाया था और फलत: उन्हें खून गिरने की बीमारी लग गई थी. इस (शूकरमार्दव) के लोगों ने भिन्नभिन्न अर्थ किए हैं. पहला और प्रसिद्ध अर्थ तो ‘एक वर्ष के सूअर का मांस’ है.

दूसरे इस का अर्थ ‘नर्म चावल को 5 गोरस से पकाने पर बना खाद्य पदार्थ’ बताते हैं और तीसरे इसे ऐसा रसायन बताते हैं जिस से मृत्यु पर विजय प्राप्त होती है. पहला अर्थ कई लोगों को इसलिए नहीं पचता कि इस से बुद्ध के मांसाहारी होने की बात सिद्ध होती है. दूसरा अर्थ उन्हें मांसाहारी के स्थान पर शाकाहारी सिद्ध करने के लिए किया जाता है. यहां हमारा उद्देश्य इस विवाद में पड़ना नहीं है कि वे मांसाहारी थे या शाकाहारी, बल्कि यह बताना मात्र है कि उन की पाचनशक्ति गड़बड़ा गई, वह बीमार पड़ गए.

तीसरा अर्थ आत्मविरोधी है, क्योंकि जो रसायन मृत्यु पर विजय प्राप्त करने के उद्देश्य से आयुर्वेद व रसायन शास्त्र के अनुसार तैयार किया व करवाया गया था, वही बुद्ध की मृत्यु का कारण बना. यह अर्थ तो आयुर्वेद व रसायनशास्त्र के ढोल की पोल ही खोलता दिखाई देता है.

बुद्ध की वह बीमारी किसी भी योगासन से ठीक नहीं हो पाई. यदि वह योगी थे तो उन्होंने इन का आश्रय अवश्य लिया होगा. फलत: इसी बीमारी के कारण उन की मृत्यु हो गई.

इसी प्रकार महावीर स्वामी के बारे में भगवतीसूत्र के 15वें शतक में आता है कि उन्हें गोशाल के शाप के कारण अत्यंत पीड़ाकारी पित्त ज्वर का दाह उत्पन्न हो गया था व खूनी दस्त आने लगे थे. इस पर उन्होंने योगासन नहीं किए, कोई योगाभ्यास नहीं किया, बल्कि उन्होंने ‘कुक्कुट मांस’ का प्रयोग किया. ‘जैन धर्मदर्शन’ (1999) नामक पुस्तक में, जो राजस्थान और उत्तर प्रदेश की सरकारों द्वारा पुरस्कृत है, डा. मोहनलाल मेहता लिखते हैं, ‘‘सिंह अनगार के आने पर महावीर ने उन्हें आश्वासन देते हुए कहा, ‘मैं अभी नहीं मरूंगा, किंतु 16 वर्ष तक और ‘जिन’ के रूप में विचरण करूंगा. अत: तू मेंढिक ग्राम में रेवती गृहपत्नी के यहां जा.

उस ने मेरे लिए 2 कपोतशरीर (कबूतर) उपस्कृत कर, तैयार कर रखे हैं, किंतु उन का मुझे प्रयोजन नहीं है. उस के यहां बासी (कल का) मार्जारकृत कुक्कुट मांस (बिल्ली द्वारा मारे गए मुर्गे का मांस) है, वह ले आ. उस का मुझे प्रयोजन है.’ सिंह अनगार रेवती गृहपत्नी के यहां गए एवं महावीर की आज्ञानुसार कुक्कुट मांस लाए. महावीर ने उस का सेवन किया, जिस से उन का पीड़ाकारी रोग शांत हुआ.’’

(जैन धर्मदर्शन, पृष्ठ 39-40)

यहां भी ‘कुक्कुट मांस’ शब्द के अर्थ बदल कर शाकाहारी बनाने के यत्न किए गए हैं परंतु डा. मेहता लिखते हैं, ‘‘मांसाहारपरक शब्दों को शाकाहारपरक अर्थ कर के इस दोष को दूर करने का प्रयत्न किया जाता है किंतु इस से चिंतक को संतोषप्रद समाधान प्राप्त नहीं होता. जिन अमुक शब्दों का प्रयोग इस शतक में किया गया है, जिन का कि शाकाहारपरक अर्थ किया जाता है, उन शब्दों का प्रयोग आगमिक साहित्य में अन्यत्र जहां कहीं हुआ है, साधारण प्रचलित अर्थ में ही हुआ है, अर्थात उन का झुकाव मांसाहारपरक अर्थ की ओर ही है.

(पृष्ठ 31-32)

हम यहां इस विवाद में नहीं पड़ना चाहते कि कुक्कुट मांस का मांसाहारी अर्थ ठीक है या शाकाहारी, हमारा उद्देश्य केवल यह बताना है कि वह जब बीमार पड़े, तब उन्होंने योगासन नहीं किए, योगाभ्यास नहीं किया, बल्कि उस बीमारी को शांत करने में समर्थ वस्तुओं/औषधियों का प्रयोग किया और फलत: 16 वर्ष जीवित रहे.

ये तीनों उदाहरण प्रसिद्ध व मान्य योगियों के हैं. इन से योगासनों के दावों की पोल ही खुलती नजर आती है. स्वामी दयानंद योगी होने के बावजूद मृत्यु को प्राप्त हुए; कोई योगासन काम नहीं आया; कोई विष के प्रभाव को नष्ट नहीं कर सका. गौतम बुद्ध की भी योगासनों से न बीमारी ठीक हुई, न पाचनशक्ति बढ़ पाई और वह मृत्यु को प्राप्त हुए. महावीर की बीमारी भी ठीक हो जाती है और वह 16 वर्ष तक बाद में जीते भी हैं; क्योंकि वे रोगनाशक औषधि का प्रयोग करते हैं, न कि योगासनों का, योगाभ्यास का.

इन उदाहरणों में बहुत कुछ छिपा है. हमें इन से शिक्षा ग्रहण करनी होगी और आसनों के यौगिक मकड़जाल से निकल कर औषधि की शरण ग्रहण करनी होगी.

हठयोग प्रदीपिका ने 84 आसनों का सार केवल 4 आसन बताए हैं.

चतुरशीत्यासनानि शिवेन कथितानि च,

तेभ्यश्चतुष्कमादाय सारभूतं ब्रवीम्यहम्.

सिद्धं पद्मं तथा सिंहं भद्रं चेति चतुष्टयम्.

(हठयोगप्रदीपिका 1/33-34)

(शिव ने जो 84 आसन कहे हैं, उन के सारभूत 4 आसन हैं – सिद्धासन, पद्मासन, सिंहासन और भद्रासन.)

हठयोगप्रदीपिका में इन में से 2 पद्मासन और भद्रासन को ही सर्वव्याधि विनाशक कहा गया है. सिंहासन को उस ने सर्वव्याधि विनाशक के पद से च्युत कर दिया है, हालांकि घेरंड संहिता इसे भी सर्वव्याधि विनाशक घोषित करती है. (देखें, घेरंड संहिता 2/15). लेकिन हठयोग- प्रदीपिका इसे योगियों द्वारा पूज्य और सब आसनों में उत्तम बताती है :

सिंहासनं भवेदेतत्पूजितं योगिपुंगवै:,

बंधत्रितयसंधानं कुरुते चासनोत्तमम्.

(हठयोगप्रदीपिका 1/52)

(सिंहासन श्रेष्ठ योगियों द्वारा पूजित, मूलबंध आदि तीनों बंधों को संनिधान करने वाला और सब आसनों में उत्तम है.)

अब यदि यह सब में उत्तम है, तो यह सर्वव्याधि विनाशक क्यों नहीं हो सकता? जब दूसरे सर्वव्याधि विनाशक आसन विद्यमान हैं, तब यह उस गुण से रहित होते हुए भी सब में उत्तम कैसे हो सकता है? लगता है, अपना श्रेष्ठत्व प्रतिपादित करने के लिए घेरंड की कुछ बातों को तोड़नामरोड़ना या बदलना जरूरी समझा गया. यह ईर्ष्याजनित मनमानापन क्या वैज्ञानिकता है?

इस चक्कर में विभिन्न योगीराजों को यह भी दिखाई नहीं देता कि वे परस्पर विरोधी बातें कर रहे हैं और अपनी ही बातों को काटे जा रहे हैं.

हठयोगप्रदीपिका के लेखक स्वात्माराम योगींद्र सिद्धासन को भी सब से उत्तम आसन घोषित करते हुए कहते हैं :

नासनं सिद्धसदृशम्.

(हठयोगप्रदीपिका 1/43)

(सिद्धासन के समान अन्य कोई आसन नहीं है.)

अब यदि सिंहासन सब में उत्तम है, तो सिद्धासन लासानी (अनुपम) कैसे हो सकता है?

जो उत्तम है, वह अनुपम (लासानी, अद्वितीय) क्यों नहीं और जो लासानी (अनुपम) है, वह उत्तम क्यों नहीं? क्या योगीराज ने झोंक में लिखा है या होश में? होश में तो ऐसा लिखना संभव नहीं, फिर झोंक के लिखे को कोई होशवाला व्यक्ति कैसे प्रामाणिक व सत्य बात के रूप में स्वीकार कर सकता है?

योगीराज इसी सिद्धासन की प्रशंसा करते हुए लिखते हैं :

किमन्यैर्बहुभि: पीठै: सिद्धे सिद्धासने सति,

प्राणानिले सावधाने बद्धे केवलकुंभके.

(हठयोगप्रदीपिका 1/41)

(सिद्धासन के सिद्ध होने पर दूसरे बहुत से आसनों का क्या लाभ? इस सिद्धासन से केवलकुंभक प्राणायाम बंधने पर दूसरे सब आसन वृथा समझने चाहिए).

यहां स्वात्माराम योगींद्र ने केवल एक आसन पर आ कर शेष को व्यर्थ घोषित कर दिया है. यह वही निष्कर्ष है जिसे हम पहले ही प्रतिपादित कर चुके हैं, ‘इस दृष्टि से तो केवल एक आसन काफी है. ऐसे में 32 आसनों का ही औचित्य सिद्ध करना कठिन है, 84 या 84 लाख की तो बात ही छोड़ो.’

जब स्वयं योग के ग्रंथ ही एक आसन को छोड़ कर सब को वृथा घोषित करते हैं, जब विभिन्न ग्रंथों के माहात्म्यों पर तार्किक दृष्टि से विचार करने के बाद आम आदमी भी इसी निष्कर्ष पर पहुंचता है कि एक के सिवा शेष सब आसन व्यर्थ हैं, तब योग वालों का बीसियों योगासनों को भिन्नभिन्न रोगों, दर्दों, विकृतियों आदि के इलाज के लिए मनमाने रूप में, बिना किसी वैज्ञानिक व प्रामाणिक आधार के, परोसते फिरना क्या अर्थ रखता है? इन की बड़ीबड़ी सजी दुकानों, इन के बड़ेबड़े कारोबारों को देख कर मनुस्मृति में प्रयुक्त ‘योग’ शब्द का स्मरण हो आता है, जिस का अर्थ सभी भाष्यकारों के अनुसार ‘छल’ है.

संक्षेप में हम कह सकते हैं कि यदि योगासनों का चिकित्सा शास्त्रीय दृष्टि से कोई महत्त्व है, यदि इन से वास्तव में रोग दूर होते हैं तो इस काम के लिए एक ही ‘सर्वव्याधि विनाशक’ आसन पर्याप्त है. शेष सारी उठापटक एकदम फालतू है. विडंबना यही है कि इस एक आसन का भी कोई संतोषजनक व प्रामाणिक चिकित्साशास्त्रीय आधार उपलब्ध नहीं है. अत: योगा वालों के जंजाल से बचने में ही भला है.

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