जावेद अख्तर बने भारतीय म्यूजिक इंडस्ट्री के “पर्सन औफ द ईयर”

‘आई एम आई’ यानी कि भारतीय संगीत उद्योग ’द्वारा आयोजित ‘‘डायलॉग इंडियन म्यूजिक कौन्क्लेव’’ के भव्य समारोह में प्रसिद्ध लेखक, गीतकार, कवि और ‘आई पी आर एस’ के अध्यक्ष जावेद अख्तर को भारतीय संगीत उद्योग के ‘‘पर्सन औफ द ईयर’ पुरस्कार से सम्मानित किया गया. जावेद अख्तर को यह पुरस्कार ‘सोनी म्यूजिक इंडिया’ के अध्यक्ष श्रीधर सुब्रमण्यम और आईएमआई के चेयरमैन सेगुर स्टेन, को- फाउंडर चेयरमैन सिरे रिकॉर्ड्स के हाथों दिया गया.

इस भव्य समारोह में जावेद अख्तर के संबंध में औस्कर विजेता संगीतकार ए आर रहमान व फिल्म निर्माता करण जोहर सहित कई हस्तियां के संदेश ‘औडियो वीज्यूअल्स’ के माध्यम से उपस्थिति लोगों को सुनाया गया.

इसी समारोह में ‘सारेगामा’ के मैनेंजग डायरेक्टर विक्रम मेहरा और ‘युनिवर्सल म्युजिक ग्रुप इंडिया’ के दक्षिण एशिया के मैनेजिंग डायरेक्टर व सीईओ देवराज सान्याल ने फिल्म निर्माताओं और संगीत जगत को एक साथ इकट्ठा करने के लिए जावेद अख्तर को पुल का काम करने के लिए उनकी प्रशंसा करते हुए कहा कि, ‘‘उद्योग की सफलता और सुधार के लिए एक साथ काम करने के प्रयास में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण रही है. उनके प्रयासों से लेखकों की संगीत जगत में भूमिका सुनिश्चित हुई.’’

bollywood javed akhtar receives person of the year award

आई एम आई के अध्यक्ष श्रीधर सुब्रमण्यम ने कहा कि, ‘‘यह पुरस्कार जावेद साहब के उत्कृष्ट नेतृत्व को सम्मानित करता है, जो उद्योग को अब बड़ी चुनौतियों पर ध्यान केंद्रित करने और विस्तार करने के लिए अनुमति देगा.’’

पुरस्कार गृहण करते हुए जावेद अख्तर ने कहा- ‘‘निर्माता संगीत उद्योग का एक अनिवार्य हिस्सा था और रचनाकारों की शक्ति संगीत उद्योग की ताकत का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हो सकती है. प्रौधोगिकी द्वारा उत्पन्न चुनौतियां गंभीर हैं. यह पुरस्कार न केवल मेरी पहचान है, बल्कि यह उद्योग में सभी हितधारकों के लिए एक मान्यता है.’’

टाइम्य म्यूजिक और आईपीआरएस के सीओओ मंदार ठाकुर ने कहा- ‘‘जावेद साहब का नेतृत्व केवल ‘आईपीआरएस’ तक ही सीमित नहीं है, बल्कि पूरा फिल्म उद्योग उसे स्वीकार करता है. बेहद सकारात्मक और निर्माणवादी भूमिका के परिणास्वरूप सभी हितधारकों को एक जगह इकट्ठा करने का जो सफल प्रयास जावेद साहब ने किया है, उसी को मान्यता देने के तहत उन्हें ‘म्यूजिक पर्सन ऑफ द इयर पुरस्कार’ से सम्मनित किया गया.’’

‘युनिवर्सल म्यूजिक ग्रुप औफ़ इंडिया’ के दक्षिण एशिया के एमडी व सीईओ देवराज सान्याल ने कहा- ‘‘जावेद साहब के अनुकरणीय नेतृत्व के चलते संगीत क्षेत्र के सभी हितधारकों को बेहद सकारात्मक बिंदु पर लाया गया. भारतीय संगीत उद्योग को इस महान तालमेल का लाभ उठाना चाहिए.’’

ज्ञातव्य है कि ‘आईएमआई’ (इंडियन म्यूजिक इंडस्ट्री) शीर्ष संगीत उद्योग संघ और आईएफपीआइ (इंटरनेशनल फेडरेशन औफ फोनोग्राम इंडस्ट्रीज) और भारत में प्रमुख रिकॉर्ड संगीत उद्योग निकाय का एक सहयोगी है.

जबकि ‘आईपीआरएस’ भारत की एकमात्र पंजीकृत कौपीराइट सोसायटी है, जो साहित्यिक कार्यों और संगीत कार्यों के संबंध में व्यापार करने और लाइसेंस देने के लिए अधिकृत है. जिसमें साउंड रिकौर्डिंग या सिनेमैटोग्राफ फिल्मों के हिस्से के रूप में इन कार्यों को देखा जाता है.

नरेंद्र मोदी, नोटबंदी और जीएसटी

अब रिजर्व बैंक ने भी मान लिया है कि नरेंद्र मोदी के तुगलकी नोटबंदी का और जीएसटी लागू करने के फैसलों से छोटे और मझोले उद्योगों को बेहद असर पड़ा है. आज लाखों गृहिणियां परेशान हैं कि 36 व्यापारों के उद्योगों को चलाने वाले उन के पति हर समय चिंतित और तनाव में रहते हैं. इन दोनों बेवकूफी भरे फैसलों से व्यापारों की रेलगाडि़यों को पटरियों से उतरना पड़ गया. सैकड़ों तरह के व्यापार ही बंद हो गए हैं और सैकड़ों को अपने व्यापार के सारे गुर अपने ही कर्मचारियों या टैक्स कंसलटैंटों को बताने पड़े हैं. बाजार में पूंजी की कमी हो गई है और बहुतों पर कर एकत्र करने का बोझ भी आ गया है.

हिंदू धर्म की सुरक्षा के नाम पर जमा की गई वोटों से बनी सरकार ने अपने ही मुल्यों को एक छोटे से दौर में बारबार प्रहार कर इतना कमजोर कर दिया कि लाखों लोगों का जोश उन किसानों की तरह हो गया जो कभी सूखे की मार सहते हैं तो कभी बाढ़. अगर पति का व्यापार ठीक न चले पत्नियों के लिए आफत होता है क्योंकि घर का रंगढंग महीनों में बदल जाता है.

इस सरकार का मानना है कि हर जना टैक्स चोर है. ठीक वैसे ही जैसे हर धर्म मानता है कि उस का हर अनुयायी पापा है. धर्म पाप के प्रायश्चित के लिए कृत, त्याग, दान, कष्ठ की बात करता है तो धार्मिक सरकार भी ऐसे ही कानून बना रही है कि चोरों को पकड़ने के लिए सभी हर मुकदमा लगा दो. हरेक अपनी सफाई देता रहे कि माई बाप मैं ने कुछ नहीं किया, ले दे कर मुझे बख्श दो. चूंकि धर्म ने उसे यह आदत डाल रखी है, उसे यह करने में कुछ अजीब भी नहीं लगता.

6.3 करोड़ इकाइयों में लगे 11 करोड़ लोगों के इस सरकारी धर्म टैक्स और पापबंदी से बेहद नुकसान हुआ है.

हल्ला इसलिए नहीं मच रहा कि लोग जाओ और समझते हैं कि उन्होंने ही आगे बढ़चढ़ कर हिंदू धर्म की रक्षा के नाम पर सरकार को भरमार जीत दिलाई थी कि एक बार राम राज आया नहीं कि उन का उद्धार होगा. उन्हें शायद मालूम नहीं कि  राम राज के बाद सीता को बेघर होना पड़ा, लक्ष्मण को आत्महत्या करनी पड़ी थी. महाभारत युद्ध के बाद कौरब तो मरे ही पांडव भी खुश नहीं रख पाए थे.

सदियों तक सभी समाजों में धर्म पर आधारित सरकारें रही हैं और इन सभी में आम नागरिकों को गुलामी सी सहने पड़ी थी. यह केवल पिछले 500 सालों में हुआ कि सरकार और धर्म अलग हुए थे. यूरोप, अमेरिका, जापान, कोरिया, चीन ने इस का लाभ उठाया और वहां औरतें भी बराबर का सम्मान पा सकीं हैं और व्यापार भी चमके.

इस्लामी देशों में सब से बुरी हालत हैं क्योंकि वहां धर्म लोगों को 7वीं सदी से आगे निकलने ही नहीं दे रहा. नोटबंदी और जीएसटी हमारे यहां सरकारी यज्ञों में मेहनत और सूझबूझ की आहूतियों के लिए कराए गए थे. मौज तो या तो सरकारी पुरोहितों की है या फिर पुरोहितों को पालने वाले राज्यनुमा सेठों की.

क्या आदित्य के निर्देशन में ‘कमांडो 3’ सफल होगी?

निर्माता विपुल शाह ने 2013 में विद्युत जामवाल को लेकर एक सफल फिल्म ‘‘कमांडो : ए वन मैन आर्मी’’ का निर्माण किया था, जिसका निर्देशन दिलीप घोष ने किया था. मगर बाद में विपुल शाह और दिलीप घोष के रास्ते अलग हो गए. विपुल शाह ने इस सफल फिल्म की फ्रेंचाइजी को भुनाने के लिए अपने मित्र व थिएटर के जमाने से दोस्त रहे देवेन भोजानी के निर्देशन में इसका सिक्वअल ‘‘कमांडो 2ः द ब्लैक मनी टेल’’ लेकर आए. इस फिल्म में विद्युत जामवाल तो थे, पर बाकी कलाकार बदल गए थे.

अफसोस इस फिल्म की बाक्स आफिस पर बड़ी दुर्गति हुई. मगर इससे विपुल शाह ने कोई सबक नहीं सीखा. वह भूल गए कि हर फिल्म का सिक्वअल नही बन सकता. बहरहाल, अब ‘‘कमांडो’ फ्रेंचाइजी के तीसरे सिक्वअल ‘‘कमांडो 3’’ का निर्माण विपुल शाह कर रहे हैं. इस बार इस फिल्म के निर्देशन की जिम्मेदारी फिल्म ‘‘टेबल 21’’ और वेब सीरीज ‘‘करणजीत कौर’’ के निर्देशक आदित्य दत्त को सौंपी गयी है.

इस एक्शन व रोमांच से भरी फिल्म में विद्युत जामवाल के अलावा अदा शर्मा, अंगीरा धर व गुलशन देवैय्या भी होंगे. फिल्म की शूटिंग सितंबर माह के अंत में शुरू होगी. अब यह समय ही बताएगा कि ‘‘कमांडो 3’’को आदित्य दत्त कितना सफल बना पाते हैं.

शक के कफन में दफन हुआ प्यार

उत्तर प्रदेश के जिला गाजीपुर के थाना बहरियाबाद क्षेत्र में एक गांव है बघांव. पेशे से अध्यापक दीपचंद राम अपने परिवार के साथ इसी गांव में रहता था. उस के परिवार में पत्नी सुमन के साथसाथ 2 बेटे थे सुरेश और सुरेंद्र तथा 2 बेटियां थीं चंदना और वंदना. चंदना सब से बड़ी, समझदार और खूबसूरत लड़की थी. वह दीपचंद और सुमन की लाडली थी.

16 मार्च, 2018 की सुबह करीब 9-10 बजे चंदना मां से खेतों पर जाने को कह कर घर से बाहर निकली तो दोपहर के 1 बजे तक घर नहीं लौटी. दीपचंद और सुमन को चिंता हुई. सयानी बेटी के इस तरह से गायब हो जाने से मांबाप परेशान हो गए. उन्होंने अड़ोसपड़ोस में चंदना को ढूंढा, लेकिन उस का कोई पता नहीं चला. उन की समझ में नहीं आ रहा था कि चंदना रहस्यमय तरीके से कहां लापता हो गई.

मामला जवान बेटी से जुड़ा था, इसलिए संवेदनशील दीपचंद ने यह सोच कर इस बारे में किसी को नहीं बताया कि व्यर्थ में अंगुलियां उठने लगेंगी. धीरेधीरे शाम ढलने लगी, लेकिन चंदना घर नहीं लौटी. ऐसे में दीपचंद और सुमन की घबराहट और बेचैनी बढ़नी स्वाभाविक ही थी.

दोनों बेटी के बारे में सोचसोच कर परेशान थे. उन की बेचैनी और चंदना को ढूंढने की वजह से कुछ लोगों ने अनुमान लगा लिया था कि चंदना गायब है. फलस्वरूप धीरेधीरे यह बात पूरे गांव में फैल गई थी. गांव वाले चंदना को ले कर तरहतरह की बातें करने लगे थे. जब शाम तक चंदना का कहीं पता नहीं चला तो दीपचंद गांव के कुछ लोगों को साथ ले कर बहरियाबाद थाने पहुंचा.

थानाप्रभारी शमीम अली सिद्दीकी थाने में ही मौजूद थे. जब दीपचंद अन्य लोगों के साथ थाने पहुंचा तब तक अंधेरा घिर आया था. थानाप्रभारी ने दीपचंद से रात में थाने आने का कारण पूछा तो दीपचंद ने उन्हें पूरी बात बता दी.

मामला गंभीर था. दीपचंद की बातें सुन कर थानाप्रभारी सिद्दीकी ने लिखने के लिए एक सादा पेपर दीपचंद की ओर बढ़ा दिया और तहरीर लिख कर देने के लिए कहा. दीपचंद ने तहरीर लिख कर दे दी. पुलिस ने दीपचंद की तहरीर पर चंदना की गुमशुदगी की सूचना दर्ज कर के जरूरी काररवाई शुरू कर दी.

लहूलुहान हालत में मिली चंदना की लाश

अगली सुबह यानी 17 मार्च को बघांव का रहने वाला लल्लन यादव गांव के बाहर अपने खेत में पंपिंग सेट देखने पहुंचा. उस ने अपने खेत में पंपिंग सेट लगा रखा था. पैसा ले कर वह दूसरों के खेतों की सिंचाई किया करता था. खेतों में पहुंच कर लल्लन की नजर गेहूं की फसल पर पड़ी तो उसे कुछ अजीब सा लगा. खेत के बीच में काफी दूर तक फसल रौंदी पड़ी थी. ऐसा लग रहा था जैसे किसी जानवर ने खेत में घुस कर उत्पात मचाया हो.

पड़ताल करने के लिए लल्लन अंदर पहुंच गया. उस की नजर जब बरबाद हुई गेहूं की फसल पर पड़ी तो वह वहां का नजारा देख घबरा गया. वह वहां से भागा तो सीधा दीपचंद के घर ही जा कर रुका.

दीपचंद जिस बेटी को 24 घंटे से तलाश कर रहा था, उस की अर्द्धनग्न लाश लल्लन यादव के खेत में पड़ी थी. किसी ने उस के गले और पेट पर चाकू से अनगिनत वार कर के मौत के घाट उतार दिया था.

चंदना की लाश मिलते ही दीपचंद के घर में कोहराम मच गया. दीपचंद और गांव के तमाम लोग लल्लन के खेत पर जा पहुंचे, जहां चंदना की रक्तरंजित लाश पड़ी थी. चंदना की लाश देख कर गांव वालों ने अनुमान लगाया कि हत्यारों ने दुष्कर्म करने के बाद अपनी पहचान छिपाने के लिए उस की निर्ममतापूर्वक हत्या कर दी होगी. लोगों ने घटनास्थल देख अनुमान लगाया कि हत्यारों की संख्या 2-3 से कम नहीं रही होगी, क्योंकि काफी दूरी तक गेहूं की फसल रौंदी हुई थी.

भीड़ में से किसी ने 100 नंबर पर फोन कर के घटना की सूचना पुलिस कंट्रोलरूम को दे दी. कंट्रोलरूम से वायरलैस सेट पर यह सूचना बहरियाबाद थाने को दे दी गई. इस घटना से गांव वाले काफी गुस्से में थे. उन लोगों ने चंदना की लाश ले कर बहरियाबाद-चिरैयाकोट मार्ग (गाजीपुर-मऊ मार्ग) पर जाम लगा दिया.

कंट्रोलरूम से दी गई सूचना के आधार पर बहरियाबाद थानाप्रभारी शमीम अली सिद्दीकी पुलिस टीम के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए. उन की टीम में एसआई विपिन सिंह, प्रशांत कुमार चौधरी, विकास श्रीवास्तव, संजय प्रसाद, दिनेश यादव शामिल थे. पुलिस को देखते ही ग्रामीणों का गुस्सा फूट पड़ा. वे पुलिस प्रशासन के खिलाफ नारे लगाने लगे.

शमीम अली सिद्दीकी ने स्थिति की नजाकत को समझते हुए कप्तान सोमेन वर्मा को फोन कर के फोर्स भेजने का आग्रह किया. पुलिस कप्तान ने तत्काल सीओ (सैदपुर) मुन्नीलाल गौड़, सीओ (भुड़कुड़ा) प्रदीप कुमार, सीओ (जखनिया) आलोक प्रसाद सहित जिले के कई थानों के थानाप्रभारियों को मौके पर पहुंचने का आदेश दिया. वह खुद भी मौके पर पहुंच गए.

कुछ ही देर में बहरियाबाद-चिरैयाकोट मार्ग पर खाकी वरदी ही वरदी नजर आने लगीं. पुलिस ने पंचनामा के लिए चंदना की लाश लेने की कोशिश की तो प्रदर्शनकारियों ने पुलिस को लाश देने से मना कर दिया. उन की 2 मांगें थीं, पहली यह कि घटनास्थल पर डौग स्क्वायड को बुलवाया जाए और दूसरी यह कि हत्यारों को जल्द से जल्द गिरफ्तार किया जाए.

गांव वालों का विरोध प्रदर्शन

पुलिस कप्तान सोमेन वर्मा ने लोगों की पहली मांग पूरी करने में असमर्थता जताई, क्योंकि जिले में डौग स्क्वायड की कोई व्यवस्था नहीं थी. अलबत्ता उन्होंने प्रदर्शनकारियों की दूसरी मांग पूरी करने का भरोसा देते हुए वादा किया कि हत्यारों को 24 घंटे के अंदर गिरफ्तार कर लिया जाएगा.

पुलिस की 5 घंटे की कड़ी मशक्कत के बाद एसपी वर्मा के आश्वासन पर गांव वाले शांत हुए. पुलिस ने जल्दीजल्दी पंचनामा भर कर लाश पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल भिजवा दी. इस के साथ ही अज्ञात हत्यारों के खिलाफ भादंवि की धारा 302, 201 के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया गया. घटना की तफ्तीश की जिम्मेदारी थानाप्रभारी शमीम अली सिद्दीकी को सौंपी गई.

चंदना की हत्या किस ने और क्यों की, पुलिस के लिए यह गुत्थी सुलझाना आसान नहीं था. थानाप्रभारी ने सब से पहले घटनास्थल का दौरा किया और फिर मृतका चंदना के घर जा कर उस के पिता दीपचंद से पूछताछ की. दीपचंद ने थानाप्रभारी को बताया कि उस की या उस की बेटी चंदना की किसी से कोई अदावत नहीं थी. वैसे भी चंदना अपने काम से मतलब रखती थी. वह किसी के घर भी ज्यादा नहीं उठतीबैठती थी.

चंदना हत्याकांड की गुत्थी काफी उलझी हुई थी. जांच अधिकारी के लिए यह मामला काफी चुनौतीपूर्ण था. उधर चंदना की पोस्टमार्टम रिपोर्ट भी आ गई थी. रिपोर्ट में बताया गया कि उस के साथ दुष्कर्म नहीं हुआ था. उस की मौत का कारण अत्यधिक खून बहना बताया गया था.

थानाप्रभारी शमीम अली ने चंदना हत्याकांड का खुलासा करने के लिए कई मुखबिर लगा दिए थे. इसी बीच जांच के दौरान उन्हें पता चला कि चंदना अपने पास मोबाइल फोन रखती थी और सब से छिपछिपा कर किसी से अकसर बातें करती थी. यह बात वंदना के अलावा कोई नहीं जानता था.

वंदना काफी छोटी थी. थानाप्रभारी शमीम ने सोचा अगर उस से डराधमका कर पूछताछ की गई तो वह डर जाएगी और फिर शायद ही कुछ बता पाए. इसलिए उस से बड़े प्यार और मनोवैज्ञानिक तरीके से बात करनी जरूरी थी. क्या करना है, यह फैसला कर के वह दीपचंद के घर जा पहुंचे.

पुलिस के हत्थे लगा चंदना का मोबाइल फोन

उन्होंने वंदना के सिर पर बड़े प्यार से हाथ फेरते हुए पूछा, ‘‘बेटा, तुम्हारा नाम क्या है?’’

‘‘वंदना.’’ वंदना ने डरते हुए जवाब दिया.

‘‘किस क्लास में पढ़ती हो?’’

‘‘चौथी क्लास में.’’ उस ने उत्तर दिया.

‘‘क्या तुम्हें पता है कि तुम्हारी दीदी अपने पास एक मोबाइल रखती थी? वह मोबाइल कहां है?’’

‘‘जी सर, मुझे पता है दीदी अपने पास एक मोबाइल फोन रखती थी. यह भी पता है कि वह उसे कहां छिपा कर रखती थी.’’ वंदना ने कांपते स्वर में उत्तर दिया.

‘‘तो बताओ वह मोबाइल कहां छिपा कर रखती थी?’’ थानाप्रभारी ने बडे़ प्यार से उस के सिर पर हाथ फेरते हुए पूछा.

‘‘मैं अभी लाती हूं.’’ वंदना ने जवाब दिया. फिर वह भागती हुई कमरे में गई और बक्से से मोबाइल फोन निकाल कर ले आई. उस ने मोबाइल थानाप्रभारी के हाथों में दे दिया. यह देख कर दीपचंद और उस की पत्नी भौचक्के रह गए. उन्हें पता ही नहीं था कि उन की बेटी उन की नाक के नीचे क्या गुल खिला रही थी. घर वालों को पता ही नहीं था कि छोटी बेटी भी उस के साथ मिली हुई थी. मांबाप माथा पकड़ कर बैठ गए.

‘‘बेटा, क्या तुम्हें पता है कि तुम्हारी बहन चंदना किस से बात करती थी?’’ जांच अधिकारी ने वंदना से अगला सवाल किया.

‘‘सर, मुझे उस का नाम तो नहीं पता लेकिन मैं इतना जानती हूं कि दीदी छिपछिप कर किसी से बात करती थी. मैं ने उसे कई बार बातें करते हुए देखा था.’’

‘‘ठीक है बेटा, तुम जा सकती हो. इस के आगे का पता मैं खुद लगा लूंगा.’’ उन्होंने कहा और चंदना का मोबाइल फोन ले कर चले गए.

थानाप्रभारी शमीम अली सिद्दीकी के पास हत्या की गुत्थी सुलझाने के लिए मोबाइल ही आखिरी सहारा था. उन्होंने चंदना के मोबाइल नंबर की काल डिटेल्स निकलवाई. काल डिटेल्स से पता चला कि घटना वाले दिन यानी 16 मार्च की सुबह चंदना के फोन पर साढ़े 9 बजे के करीब आखिरी काल आई थी.

मोबाइल से पहुंची कातिल तक पुलिस

उस के बाद उस का मोबाइल स्विच्ड औफ हो गया था. जिस नंबर से चंदना को आखिरी काल आई थी, उस नंबर के बारे में पता लगाया गया तो पता चला कि वह नंबर मऊनाथ भंजन जिले के मुहम्मदाबाद गोहना थाना क्षेत्र के गांव उमनपुर निवासी विवेक कुमार चौहान का था. उस नंबर पर चंदना की काफी लंबीलंबी बातें होती थीं. पुलिस को यह समझते देर नहीं लगी कि मामला प्रेम प्रसंग का था. इसी प्रेम प्रसंग के चक्कर में उस की हत्या हुई थी.

जांच अधिकारी शमीम अली ने दीपचंद को थाने बुलवा कर विवेक कुमार चौहान के बारे में पूछताछ की तो दीपचंद विवेक का नाम सुन कर चौंक गया. उस ने बताया कि विवेक उस के पड़ोस में रहने वाले रामधनी का नाती है. वह अकसर अपने नानानानी से मिलने ननिहाल आता रहता था. वह जब भी यहां आता था, मेरे घर पर भी सब से मिल कर जरूर जाता था. वह बहुत सीधासादा लड़का है.

काल डिटेल्स के आधार पर विवेक शक के दायरे में आ चुका था. घटना वाले दिन से उस का भी फोन बंद था. लेकिन घटना वाले दिन उस के सेलफोन की लोकेशन घटनास्थल पर ही थी. इसी वजह से विवेक शक के दायरे में आ गया.

19 मार्च, 2018 को थानाप्रभारी शमीम अली गाजीपुर से पुलिस फोर्स ले कर मऊनाथ भंजन पहुंचे. मुहम्मदाबाद गोहना थाने की पुलिस की मदद से उन्होंने उमनपुर स्थित विवेक के घर पर दबिश दी. संयोग से विवेक घर पर ही था. पुलिस उसे हिरासत में ले कर गाजीपुर ले आई. फिर पुलिस ने उसे बहरियाबाद थाने ले जा कर उस से कड़ाई से पूछताछ की.

सख्ती से घबरा कर उस ने सब कुछ बता दिया. अपना जुर्म कबूलते हुए उस ने पुलिस को बताया कि चंदना उस की प्रेमिका थी और उसी ने चाकू से गोद कर उस की हत्या की थी. उस ने यह भी बताया कि उस ने हत्या में प्रयुक्त चाकू छिपा दिया था.

विवेक ने सिलसिलेवार पूरी कहानी बता दी. थानाप्रभारी ने विवेक की निशानदेही पर लल्लन के खेत से चाकू बरामद कर लिया. आरोपी विवेक से पूछताछ के बाद कहानी कुछ इस तरह पता चली.

चंदना विवेक से लड़ा बैठा था नैना

21 वर्षीय चंदना खूबसूरत तो थी ही, ऊपर से चंचल भी थी. चंदना के पड़ोस में रामधनी चौहान का घर था. रामधनी भले ही दीपचंद की जाति के नहीं थे, लेकिन रामधनी के घर से दीपचंद के परिवार जैसे प्रगाढ़ संबंध थे. रामधनी के घर जब भी कोई मेहमान आता था तो दीपचंद उसे बुला कर अपने घर ले आता और जम कर स्वागत करता. दीपचंद के मेहमाननवाजी से मेहमानों का दिल खुश रहता था.

रामधनी की बेटी का एक बेटा था जिस का नाम विवेक कुमार चौहान था. 21-22 वर्षीय विवेक कभीकभार नानानानी के घर बघांव आया करता था. वह मऊनाथ भंजन जिले के उमनपुर गांव में अपने मांबाप के साथ रहता था. उस के पिता का नाम था विजय बहादुर चौहान. वह सरकारी नौकरी में थे. उसी से 5 सदस्यों वाले परिवार का भरणपोषण होता था. विवेक ने स्नातक तक पढ़ाई कर के नौकरी करने का मन बना लिया था.

3 साल पहले यानी सन 2015 में बात तब की है जब विवेक इंटरमीडिएट में पढ़ रहा था. उन्हीं दिनों उस के ननिहाल बघांव में शादी थी. परिवार के साथ विवेक भी बघांव आया था. वहां उसे मामा के घर सप्ताह भर रहना था.

घर वालों के साथ चंदना भी शादी में शामिल हुई. चंदना खूबसूरत तो थी ही, जब वह सफेद रंग के कपड़े पहन लेती थी तो और भी सुंदर लगती थी. उस दिन भी चंदना ने सफेद रंग की पोशाक पहनी थी. इस पोशाक में वह सब से अलग और बहुत खूबसूरत लग रही थी. अचानक उस पर विवेक की नजर पड़ गई तो वह उसे कुछ देर अपलक निहारता रह गया. थोड़ी देर बाद चंदना उस की नजरों के सामने से ओझल हो गई तो उस की आंखें उसे इधरउधर ढूंढने लगीं. लेकिन वह कहीं नहीं दिखी.

प्यार में दोनों हो गए दीवाने

पहली ही नजर में चंदना विवेक के दिल में घर कर गई थी. उस दिन के बाद से विवेक चंदना के करीब जाने के लिए बेताब रहने लगा. वैसे भी उस के लिए दीपचंद के घर आनेजाने की पूरी छूट थी. जब भी मौका मिलता, वह दीपचंद के घर चला जाता और घंटों चंदना के साथ बिताता.

चूंकि चंदना के पिता दीपचंद अध्यापक थे, इसलिए उन का दिन स्कूल में ही बीतता था. बच्चे स्कूल चले जाते थे. चंदना की पढ़ाई पूरी हो चुकी थी इसलिए वह और उस की मां सुमन घर पर ही रहती थी. सुमन को विवेक के चंदना से मिलने पर कोई ऐतराज नहीं था. वह सोचती थी कि विवेक बहुत सीधासादा और नेकदिल युवक है. वह कोई ऐसा कदम नहीं उठाएगा, जिस से दोनों परिवारों की बदनामी हो.

विवेक जब भी चंदना के पास बैठता था, उसे दीवानगी भरी नजरों से निहारता था. चंदना को विवेक का ऐसा देखना अच्छा लगता था. उस के मन के भीतर एक अजीब सी गुदगुदी होती थी. धीरेधीरे चंदना भी विवेक को प्यार भरी नजरों से देखने लगी थी.

आंखों के रास्ते दोनों ने एकदूसरे के दिलों में अपना मुकाम बना लिया था. यह भी कह सकते हैं कि दोनों एकदूसरे को अपना दिल दे बैठे थे. जब दिलों की बातें हुईं तो मौका देख कर दोनों ने अपने प्यार का इजहार भी कर लिया. एक हफ्ते बाद विवेक अपने परिवार के साथ घर लौट गया.

विवेक अपने घर तो लौट आया, लेकिन उस का दिल, उस का चैन, उस का करार सब कुछ चंदना के पास रह गया था. चंदना के बगैर विवेक का मन नहीं लग रहा था. वह उस से मिलने के लिए तड़प रहा था. विवेक यही सोच रहा था कि चंदना से कैसे मिले, कैसे बातें करे. उधर चंदना का भी यही हाल था. विवेक के लिए वह तड़प रही थी. चंदना के पास सेलफोन भी नहीं था जो फोन कर के विवेक से बात कर लेती.

मोहब्बत की आग दोनों तरफ बराबर लगी हुई थी. दोनों विरह की अग्नि में जल रहे थे. विवेक से जब चंदना की जुदाई बरदाश्त नहीं हुई तो वह मांबाप से झूठ बोल कर नानानानी से मिलने के बहाने बघांव चला आया. बघांव आते हुए रास्ते में उस ने चंदना को उपहार में देने के लिए एक मोबाइल फोन खरीदा. उस ने सोचा कि चंदना के पास सेलफोन होगा तो बात करने में आसानी रहेगी.

ननिहाल जाने के बहाने मिलता था प्रेमिका से

विवेक बघांव पहुंचा तो उसे देख कर नाना रामधनी खुश हुए. उन्हें क्या पता था कि उन का नाती उन से नहीं, अपनी प्रेमिका चंदना से मिलने आया है. नानानानी से मिलना तो एक बहाना था. नानानानी से मिलने के बाद विवेक चंदना से मिलने उस के घर गया.

घर में चंदना और उस की मां ही थीं. विवेक को देखते ही चंदना का चेहरा खिल उठा. वह उसे हसरत भरी नजरों से देखती रही. विवेक से वह कहना तो बहुत कुछ चाहती थी, लेकिन मां के डर की वजह से कुछ नहीं बोल पाई.

मुंह से भले ही न सही पर इशारोंइशारों में दोनों के बीच काफी बातें हुईं. वैसे भी जब दो प्रेमी दिल की गहराई से एकदूसरे को प्यार करते हों तो उन्हें अपनी बात कहने के लिए शब्दों की जरूरत नहीं होती.

नाश्ता वगैरह करने के बाद विवेक जब घर से निकलने लगा तो चंदना उसे विदा करने कमरे से बाहर आई. तभी उस ने झटके में मोबाइल फोन उस के हाथों में थमा दिया और बोला, ‘‘यह तुम्हारे लिए गिफ्ट है.’’ चंदना ने झट से फोन अपनी समीज के अंदर रख लिया ताकि कोई देख न सके. उस रात विवेक नाना के घर पर ही रुक गया. अगली सुबह वह अपने घर मऊनाथ भंजन लौट आया.

फोन मिल जाने से दोनों के बीच की दूरियां मिट गईं. भले ही वे एकदूसरे की सूरत देख नहीं पा रहे थे, लेकिन प्यार भरी मीठीमीठी बातें कर के अपने दिल को तसल्ली दे लेते थे. एक दिन चंदना की छोटी बहन वंदना ने उसे मोबाइल पर किसी से बात करते सुन लिया.

उस ने जब इस बारे में बहन से पूछा तो वह घबरा गई. उस ने वंदना को इस बारे में किसी से कुछ भी न बताने को कहा तो वह मान गई. वंदना ने वाकई किसी से कुछ नहीं बताया. हां, चंदना ने उसे यह नहीं बताया था कि वह किस से और क्यों बातें करती थी. धीरेधीरे दोनों का प्रेम जवां होता रहा.

वे अपने प्यार को ले कर भविष्य के सुनहरे सपने संजोने लगे. रेत के ढेर पर ख्वाबों का आशियाना बनाने लगे. इसी बीच इन प्रेमियों के साथ एक नई घटना घट गई. पता नहीं दोनों के प्यार को किस की नजर लग गई थी.

अचानक बदल गया चंदना का व्यवहार

विवेक ने महसूस किया कि चंदना अब उसे पहले जैसा प्यार नहीं कर रही है. पता नहीं क्यों वह उस से कटने लगी थी. पहले वह विवेक के फोन की घंटी बजते ही काल रिसीव कर लेती थी, पर अब लगातार फोन की घंटियां बजती रहती थीं. न तो चंदना काल रिसीव करती थी और न ही मिस्ड काल करती थी.

चंदना के इस व्यवहार पर विवेक को गुस्सा आता था. हद तो तब हो गई जब विवेक चंदना को काल करता तो वह अकसर दूसरी काल पर व्यस्त मिलती थी.

विवेक का शक पुख्ता हो गया था कि चंदना का किसी और के साथ संबंध बन चुका है. इसीलिए वह उस से कटीकटी सी रहने लगी है. इस बात को ले कर चंदना और विवेक के बीच विवाद हो गया. विवेक ने उसे बहुत भलाबुरा कहा. उस के बाद चंदना ने विवेक से बात करनी बंद कर दी.

बाद में विवेक ने किसी तरह चंदना को मना लिया और उस से माफी मांग ली. उस ने वादा किया कि अब दोबारा उस से ऐसी गलती नहीं होगी. चंदना से माफी मांग कर विवेक ने एक पैंतरा चला था. उस ने सोच लिया था कि अगर चंदना उस की नहीं हुई तो किसी और की भी नहीं होगी.

इसीलिए उस ने चंदना से माफी मांग कर उसे विश्वास में लिया ताकि कभी बुलाने पर वह उस की बात सुन ले. प्यार में अंधी चंदना को इस बात का तनिक भी भान नहीं था कि विवेक उस के पीठ पीछे क्या षडयंत्र रच रहा है.

विवेक ईर्ष्या की आग में जल रहा था. वह दिनरात इसी सोच में डूबा रहता था कि चंदना उस की नहीं हुई तो किसी और की भी नहीं होगी. आखिर विवेक ने उस की हत्या की योजना बना डाली. योजना बनाने के बाद विवेक बाजार जा कर एक फलदार चाकू खरीद लाया और उसे अपने बैग में छिपा दिया.

16 मार्च की सुबह विवेक मां से नानी के घर जाने को कह कर घर से निकला और बस स्टैंड जा पहुंचा. वहां से वह गाजीपुर जाने वाली एक सरकारी बस में बैठ गया. गाजीपुर पहुंचने के बाद उस ने चंदना को फोन कर के बताया कि वह मिलने आ रहा है. गांव के बाहर लल्लन यादव के खेत के पास पहुंचो, कुछ जरूरी बातें करनी हैं.

विवेक का फोन आने के बाद चंदना मां से खेतों पर जाने की बात कह कर विवेक के बताए स्थान पर जाने के लिए चल दी. चंदना को क्या पता था कि जो उस से मिलने आ रहा है, वह उस का वफादार प्रेमी नहीं बल्कि मौत है.

साढ़े 9 बजे के करीब चंदना लल्लन यादव के खेत पर पहुंच गई. वहां खेत के चारों ओर कोई नहीं था. तब तक विवेक भी वहां पहुंच गया. प्रेमिका को देख कर विवेक हौले से मुसकराया तो चंदना ने भी उसी अंदाज में मुसकरा कर जवाब दिया. फिर चंदना ने उस से बुलाने की वजह पूछी तो विवेक गुस्से से लाल हो गया और उसे भद्दीभद्दी गालियां देते हुए बोला, ‘‘मैं ने तुम्हारे लिए खुद को बरबाद कर दिया. तुम पर पानी की तरह पैसे बहाए. तुम ने बदले में मुझे क्या दिया बेवफाई. मेरे प्यार को ठुकरा कर दूसरों की बाहों में रंगरलियां मना रही हो. ऐसा मैं हरगिज होने नहीं दूंगा. अगर तुम मेरी नहीं हुई तो तुम्हें किसी और की भी होने नहीं दूंगा.’’

विवेक ने किया चाकू से वार

चंदना कुछ समझ पाती, इस से पहले ही विवेक ने बैग से फलदार चाकू निकाला और उस की गरदन पर जोरदार वार कर दिया. चंदना हवा में लहराती हुई जमीन पर जा गिरी. उस के बाद विवेक तब तक उस के पेट और गरदन पर वार करता रहा, जब तक उस के प्राणपखेरू नहीं उड़ गए. चंदना की निर्मम हत्या करने के बाद विवेक उस की लाश घसीटते हुए गेहूं के खेत में ले गया और लाश को ठिकाने लगा कर आराम से घर लौट आया.

विवेक ने जिस चालाकी और सफाई से काम किया था, उसे देख कर उसे लगा था कि पुलिस उस तक कभी नहीं पहुंच सकती. लेकिन पुलिस ने उस की सोच पर पानी फेर दिया. जिस शक की आग में वह जल रहा था, उसी शक की आग ने उसे खाक में मिला दिया.

प्यार का ये मतलब नहीं होता कि किसी की निर्मम तरीके से हत्या कर दे. विवेक अगर समझदारी से काम लेता तो चंदना भी इस दुनिया में सांस ले रही होती. लेकिन एक शक की चिंगारी ने सब कुछ तहसनहस कर दिया.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

मेजर का खूनी इश्क

मेजर अमित द्विवेदी की पोस्टिंग दिल्ली में आर्मी की इंजीनियरिंग विंग में थी. वहां से करीब 3 किलोमीटर दूर उन्हें दिल्ली कैंट की औफिसर्स कालोनी में सरकारी आवास मिला हुआ था. उन का घर से औफिस आनाजाना सरकारी जिप्सी से होता था. घर से औफिस का रास्ता केवल 20 मिनट का था. 23 जून, 2018 को अमित द्विवेदी अपने औफिस से दोपहर करीब 2 बजे घर पहुंचे.

मेजर द्विवेदी घर पहुंचे तो उन की पत्नी शैलजा दिखाई नहीं दी. उन्होंने अपने 6 वर्षीय बेटे अयान से शैलजा के बारे में पूछा. अयान ने बताया कि मौम अभी अस्पताल से नहीं लौटी हैं. शैलजा को अस्पताल में इतनी देर नहीं लगनी चाहिए थी, इसलिए मेजर अमित को थोड़ी चिंता हुई.

दरअसल, शैलजा की एड़ी में दर्द रहता था, जिस का इलाज आर्मी के बेस अस्पताल में चल रहा था. दर्द की वजह से वह कई दिनों तक अस्पताल में भरती भी रही थीं. बाद में उन्हें फिजियोथेरैपी के लिए रोजाना अस्पताल जाना पड़ता था. हर रोज वह पति के औफिस जाते समय उन की जिप्सी से अस्पताल चली जाती थीं. फिजियोथेरैपी के बाद वह पति के ड्राइवर पवन को फोन कर देती थीं. पवन जिप्सी ले कर अस्पताल पहुंच जाता था और वहां से शैलजा को घर छोड़ने के बाद औफिस लौट जाता था.

उस दिन शैलजा को अस्पताल में अपना एमआरआई कराना था, जिस के लिए उन्हें देर से अस्पताल जाना था. उस दिन वह पति के साथ नहीं गई थीं. बाद में उन्होंने ड्राइवर पवन को बुला लिया था. रोजाना की तरह उस दिन वह जिप्सी को अस्पताल के अंदर न ले जा कर अस्पताल के गेट पर ही उतर गई थीं. ड्राइवर वहीं से वापस चला गया था.crime story in hindi major ka khooni ishq

मेजर अमित बेटे अयान से पत्नी के बारे में पूछ ही रहे थे कि तभी घर के अर्दली ने बताया, ‘‘सर, मेमसाहब ने घर पर फोन कर के बताया था कि उन्हें लौटने में देर हो सकती है. साहब और अयान को लंच सर्व कर देना.’’

मेजर अमित ने सोचा कि हो सकता है, शैलजा के एमआरआई की रिपोर्ट मिलने में देर हो रही हो, इसलिए घर फोन कर के देर से लौटने को कहा है. मेजर द्विवेदी ने बेटे के साथ लंच कर के पत्नी का मोबाइल नंबर मिलाया. शैलजा का फोन स्विच्ड औफ था. उन्होंने सोचा कि वह डाक्टर के रूम में होगी, कोई डिस्टर्ब न हो, इसलिए फोन बंद कर लिया होगा. वैसे भी शैलजा तेजतर्रार और सुलझी हुई महिला थीं.

लापता हुईं शैलजा

आधे घंटे बाद मेजर अमित द्विवेदी ने फिर से पत्नी का नंबर मिलाया. शैलजा का फोन अब भी स्विच्ड औफ था. तब तक दोपहर के 3 बज चुके थे. अस्पताल के सभी डाक्टर 3 बजे से पहले ही ओपीडी के सभी मरीजों को देख चुके होते हैं. एक बार अमित द्विवेदी ने सोचा कि शैलजा कहीं और चली गई होगी, लेकिन ऐसा होता तो वह घर फोन जरूर करतीं.

मेजर अमित का मन नहीं माना तो उन्होंने आर्मी अस्पताल में फोन कर के शैलजा के बारे में पूछा. वहां से पता चला कि जो डाक्टर शैलजा का इलाज कर रहे थे, शैलजा उन के पास पहुंची ही नहीं थी. यह जान कर मेजर अमित का चिंतित होना स्वाभाविक था. वैसे भी उस दिन ड्राइवर पवन ने शैलजा को अस्पताल के गेट पर उतारा था.

इस से मेजर अमित की परेशानी बढ़ गई. वह सेना की जिस इंजीनियरिंग विंग में थे, उस विंग को उन्होंने पत्नी की गुमशुदगी की सूचना दे दी. शैलजा के गायब होने की बात सुन कर मेजर अमित के साथ काम करने वाले सेना के कई अधिकारी उन के घर पहुंच गए. अमित ने उन्हें पूरी बात बता दी. इस बीच अमित ने कई बार पत्नी का फोन भी मिलाया, लेकिन वह स्विच्ड औफ ही था.

मेजर अमित के साथियों ने इस संबंध में पुलिस को सूचना देने की सलाह दी. उसी दिन यानी 23 जून को पश्चिमी दिल्ली के थाना नारायणा को पुलिस कंट्रोल रूम से दोपहर करीब डेढ़ बजे सूचना मिली थी कि बरार स्क्वायर की मुख्य सड़क पर किसी महिला का एक्सीडेंट हो गया है.

पुलिस कंट्रोल रूम को यह जानकारी एक औटो चालक दीपक ने दी थी. एक्सीडेंट की खबर मिलते ही थानाप्रभारी सुनील चौहान पुलिस टीम के साथ बरार स्क्वायर पहुंच गए.

एक्सीडेंट की जगह बरार स्क्वायर मैट्रो स्टेशन से करीब 400 मीटर दूर थी. पुलिस ने देखा वहां सड़क पर 30-35 साल की एक महिला कुचली पड़ी थी. सड़क पर दूर तक खून फैला था. उस जगह किसी कार के टायरों के निशान भी थे.

थानाप्रभारी सुनील चौहान ने टायरों के निशानों को गौर से देखा तो उन्हें मामला संदिग्ध लगा. टायरों के निशान से साफ पता चल रहा था कि उस महिला पर जानबूझ कर कई बार कार चढ़ाई गई थी.

मृतका कौन है और कहां की रहने वाली है, जानने के लिए महिला कांस्टेबल ने तलाशी ली तो मृ़तका के पास ऐसी कोई चीज नहीं मिली, जिस से उसे पहचाना जाता. पहनावे से मृतका किसी उच्च परिवार की लग रही थी.

थानाप्रभारी ने लाश का निरीक्षण किया तो मृतका के गले पर किसी पतले और तेजधार हथियार से काटने का घाव मिला. गले का घाव देख कर पुलिस को पूरा यकीन हो गया कि मामला दुर्घटना का नहीं, बल्कि हत्या का है. हत्यारा संभवत: शातिर दिमाग था, जिस ने हत्या को एक्सीडेंट का रूप देने की कोशिश की थी. चौहान ने इस की जानकारी उच्च अधिकारियों को दे दी.

कुछ ही देर में एसीपी सोमेंद्र पाल त्यागी भी वहां आ गए. उन्होंने भी घटनास्थल का निरीक्षण किया. वहां मौजूद लोगों में से कोई भी मृतका को नहीं पहचान सका. मौके पर क्राइम इनवैस्टीगेशन और फोरैंसिक टीमों को भी बुलवा लिया गया था. दोनों टीमों ने घटनास्थल से सबूत जुटाए. पुलिस ने जरूरी काररवाई कर के लाश को हरिनगर स्थित दीनदयाल उपाध्याय अस्पताल की मोर्चरी में रखवा दिया.

अस्पताल की काररवाई निपटा कर थानाप्रभारी सुनील चौहान थाने लौटे ही थे, तभी मेजर अमित द्विवेदी अपने साथियों के साथ नारायणा थाने पहुंच गए. सेना के अधिकारियों को एक साथ आया देख सुनील चौहान समझ गए कि मामला गंभीर है.

शैलजा मिली तो पर लाश के रूप में

मेजर अमित द्विवेदी ने थानाप्रभारी को अपनी पत्नी शैलजा के गायब होने की बात बताई. उन्होंने बताया कि वह सुबह बेस अस्पताल गई थी, उस के बाद घर नहीं लौटी. अमित द्विवेदी ने उन्हें पत्नी का हुलिया आदि भी बता दिया. उन की बात सुन कर थानाप्रभारी के दिमाग में उस युवती की लाश का चित्र घूम गया, जिसे वह कुछ देर पहले ही दीनदयाल उपाध्याय की मोर्चरी में रखवा कर आए थे.

वजह यह थी कि मेजर द्विवेदी ने अपनी पत्नी का जो हुलिया बताया था, वह लाश से मिलताजुलता था. इत्मीनान से मेजर की बात सुन कर थानाप्रभारी ने कहा, ‘‘आज ही बरार स्क्वायर के पास एक महिला की लाश मिली है. मृतका का गला काटने के बाद किसी ने लाश को कार से कुचला था. उस की डैडबौडी दीनदयान उपाध्याय अस्पताल की मोर्चरी में रखी है.’’

सुनील चौहान ने मेजर द्विवेदी को लाश के फोटो भी दिखाए, जिन्हें मेजर द्विवेदी ने गौर से देखा. वह उन की पत्नी शैलजा ही थी. मेजर अमित की आंखों से आंसू टपकने लगे. उन्होंने इंसपेक्टर चौहान से डेडबौडी देखने को कहा.

थानाप्रभारी मेजर अमित द्विवेदी और उन के साथियों को दीनदयाल अस्पताल ले गए, वहां उन्होंने मेजर को वह लाश दिखाई जो बरार स्क्वायर की मुख्य सड़क पर मिली थी. लाश देखते ही मेजर द्विवेदी रोने लगे. उन्होंने लाश की शिनाख्त अपनी पत्नी शैलजा द्विवेदी के रूप में कर दी.

लाश की शिनाख्त हो जाने के बाद थानाप्रभारी ने राहत की सांस ली. मेजर द्विवेदी जब अस्पताल से निकल कर पार्किंग की ओर जा रहे थे तो उन्होंने पार्किंग में मेजर निखिल हांडा को अपनी कार के पास खड़े देखा.

मेजर हांडा वैसे तो अमित द्विवेदी का दोस्त था, लेकिन किसी वजह से अब उन के बीच पहले जैसे संबंध नहीं रहे थे. हांडा ने मेजर द्विवेदी और उन के साथियों को देख लिया था, इस के बावजूद उन के पास नहीं आया, बल्कि नजरें चुराने लगा. मेजर द्विवेदी ने मन ही मन सोचा जरूर कि हांडा यहां क्यों आया है? लेकिन इस बात को महत्त्व नहीं दिया.

मेजर अमित ने उस से बात नहीं की और सुनील चौहान के साथ थाने लौट आए. पुलिस पहले ही अज्ञात हत्यारे के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कर चुकी थी. थानाप्रभारी ने मेजर द्विवेदी से पूछा कि क्या उन्हें इस हत्या को ले कर किसी पर कोई शक है. लेकिन मेजर ने इस बात से इनकार कर दिया.

मामला हाईप्रोफाइल था, इसलिए डीसीपी विजय कुमार ने इसे सुलझाने के लिए एसीपी (विकासपुरी) सोमेंद्र पाल त्यागी एसीपी (पंजाबी बाग) सुरेंद्र कुमार, आनंद सागर, थानाप्रभारी (नारायणा) सुनील चौहान, थानाप्रभारी (पंजाबी बाग) राजीव भारद्वाज, थानाप्रभारी (कीर्तिनगर) अनिल शर्मा, थानाप्रभारी (इंद्रपुरी) राममेहर, स्पैशल स्टाफ के इंसपेक्टर जयप्रकाश और साइबर सैल के इंसपेक्टर मनोज कुमार को अपने औफिस बुलवा कर उन के साथ मीटिंग की.

मीटिंग में उन्होंने यह भी कहा कि जिस जगह शैलजा की लाश मिली है, वहां पोस्टमार्टम करने वाले डाक्टरों को बुला कर सीन औफ क्राइम रिक्रिएट किया जाए. साथ ही हत्या की हर पहलू से जांच की जाए. डीसीपी ने अलगअलग पुलिस अधिकारियों के नेतृत्व में 6 पुलिस टीमें बना कर उन्हें अलगअलग काम सौंप दिए.

पुलिस आई पूरे ऐक्शन में

इंसपेक्टर मनोज कुमार ने शैलजा के फोन नंबर की काल डिटेल्स निकलवा कर जांच शुरू कर दी. पता चला कि शैलजा की एक फोन नंबर पर बहुत बात होती थी. पिछले 3 महीने में उस नंबर से शैलजा के मोबाइल पर 6 हजार काल्स आई थीं. जाहिर है इतनी काल्स वही कर सकता था जो शैलजा का ज्यादा नजदीकी हो.

घटना वाले दिन सुबह भी करीब साढ़े 8 बजे उसी नंबर से शैलजा के फोन पर काल आई थी. उस फोन नंबर के बारे में पुलिस ने मेजर अमित द्विवेदी से पूछा तो उन्होंने बताया कि यह नंबर मेजर निखिल हांडा का है.

पुलिस ने उन से मेजर निखिल हांडा के बारे में पूछताछ की तो उन्होंने बताया कि काफी पहले वह उन का दोस्त था, लेकिन अब उस से बोलचाल नहीं है. इंसपेक्टर मनोज कुमार ने बोलचाल न होने की वजह पूछी तो उन्होंने बताया कि मेजर निखिल हांडा दोस्ती कर के उन की पत्नी शैलजा को परेशान करता था, इसलिए उन्होंने उस से संबंध खत्म कर दिए थे.

मेजर अमित की बात सुन कर इंसपेक्टर मनोज कुमार को स्थिति कुछकुछ साफ होती दिखी. यह जानकारी उन्होंने डीसीपी को दे दी. जांच के लिए थानाप्रभारी सुनील चौहान के नेतृत्व में एक टीम आर्मी के बेस अस्पताल भेजी गई. टीम के साथ मेजर द्विवेदी भी थे. पुलिस ने उस डाक्टर से भी पूछताछ की, जो शैलजा का उपचार कर रहा था.

डाक्टर ने बताया कि शैलजा द्विवेदी आई तो थीं, लेकिन फिजियोथेरैपी कराए बिना ही चली गई थीं. सुनील चौहान के दिमाग में यह बात घर कर गई कि जब शैलजा ने अस्पताल जा कर फिजियोथेरैपी नहीं कराई तो अस्पताल आने का उन का मकसद क्या था.

पुलिस ने अस्पताल के सीसीटीवी कैमरों की फुटेज देखी तो पता चला कि शैलजा पूर्वाह्न 11 बजे अस्पताल के बाहर रुकी सफेद रंग की होंडा सिटी कार में बैठ कर चली गई थीं. गाड़ी कौन चला रहा था, यह तो पता नहीं चल सका लेकिन पुलिस को उस कार का नंबर जरूर मिल गया. नंबर था डीएल3सी सीके7882. जांच करने पर पता चला कि यह होंडा सिटी दक्षिणी दिल्ली के साकेत के जी-96 में रहने वाले ए.आर. हांडा के नाम पर रजिस्टर्ड थी.

यह पता चलते ही तुरंत एक पुलिस टीम साकेत के पते पर भेजी गई. वहां जा कर पता चला कि ए.आर. हांडा रिटायर्ड कर्नल थे. उन्होंने बताया कि होंडा सिटी कार उन के नाम पर रजिस्टर्ड जरूर है, लेकिन उसे ज्यादातर उन का बेटा मेजर निखिल राय हांडा इस्तेमाल करता है.

उन्होंने यह भी बताया कि उन का पोता यानी निखिल का बेटा आयुष्मान सेना के बेस अस्पताल में भरती है. उस की मां नलिनी (परिवर्तित नाम) अस्पताल में उस के पास रहती है. बेटे को देखने निखिल अस्पताल के चक्कर लगाता रहता है.

इस के बाद मेजर निखिल हांडा पर पुलिस का शक बढ़ गया. पुलिस ने अस्पताल में हांडा की पत्नी नलिनी से मुलाकात की. नलिनी ने बताया कि उस दिन वह सुबह 10 बजे बेटे को देखने आए थे और कुछ देर बाद चले गए थे. दोपहर डेढ़ पौने 2 बजे वह फिर अस्पताल आए. लेकिन आधा घंटा रुकने के बाद लौट गए. इस के बाद न वह आए और न ही उन्होंने फोन किया.

अब तक की जांच में जो जानकारी पुलिस को मिली थी, उस से यह बात पुख्ता हो रही थी कि शैलजा द्विवेदी की हत्या मेजर निखिल हांडा ने की होगी. पुलिस टीमों ने जांच रिपोर्ट डीसीपी विजय कुमार के सामने रख दी. टीमों का काम देखने के बाद डीसीपी इस बात से संतुष्ट हो गए कि जांच टीमें सही दिशा में काम कर रही हैं.

मेजर निखिल हांडा की तलाश

अब मेजर निखिल हांडा का पुलिस के सामने मौजूद होना आवश्यक था ताकि उस से पूछताछ के बाद स्थिति साफ हो सके. इसलिए डीसीपी ने पुलिस टीमों को मेजर निखिल हांडा को तलाश करने के निर्देश दिए.

सर्विलांस टीम निखिल के मोबाइल नंबर पर नजर रखे हुई थी. निखिल अपने मोबाइल को स्विच्ड औफ किए हुए था. 23-24 जून की रात को उस ने 58 सैकेंड के लिए फोन औन कर के किसी से बात की थी. उस समय उस की लोकेशन दिल्ली के अक्षरधाम मंदिर के पास थी.

फिर सुबह होने पर उस ने कुछ देर के लिए मोबाइल खोला. उस लोकेशन के आधार पर पता चला कि वह दिल्ली से मेरठ की तरफ गया है. लिहाजा पुलिस की टीमें मेरठ के लिए रवाना कर दी गईं.

दिल्ली में बैठी सर्विलांस टीम को मेजर निखिल हांडा की जो भी लोकेशन पता चलती, वह उसे मेरठ में मौजूद टीमों को बता देती थी. इस तरह दिल्ली पुलिस मेजर निखिल का पीछा करती रही. आखिर 24 जून की दोपहर को उसे दौराला के पास टोल प्लाजा से हिरासत में ले लिया. पुलिस उसे ले कर दिल्ली लौट आई.

पुलिस ने उस की होंडा सिटी कार की तलाशी ली तो उस में एक चाकू मिला. इस के अलावा उस के टायरों पर भी खून के निशान थे. इस से पुलिस को यकीन हो गया कि शैलजा का हत्यारा वही है. मेजर निखिल हांडा को गिरफ्तारी की बात सुन कर डीसीपी विजय कुमार भी नारायणा थाने पहुंच गए.

पुलिस अधिकारियों की मौजूदगी में थानाप्रभारी सुनील चौहान ने मेजर निखिल हांडा से शैलजा द्विवेदी की हत्या के बारे में पूछताछ की तो उस ने अनभिज्ञता जाहिर की. उस से जब उस के टायरों पर लगे खून के निशान के बारे में पूछा तो उस ने बताया कि उस की कार से सड़क पार कर रहे एक कुत्ते का एक्सीडेंट हो गया था.

चूंकि निखिल हांडा सेना का अधिकारी था, इसलिए पुलिस उस के साथ सख्ती भी नहीं कर सकती थी. लिहाजा पुलिस अधिकारियों ने सेना के बेस अस्पताल के सीसीटीवी से मिली फुटेज और शैलजा की काल डिटेल्स दिखाते हुए उस से मनोवैज्ञानिक तरीके से पूछताछ की तो वह पुलिस के सवालों में उलझ गया.

आखिर उस ने हत्या की बात स्वीकार कर ली. उस ने बताया कि काफी समझाने के बाद भी शैलजा ने उस की बात नहीं मानी तो उस के सामने ऐसे हालात बन गए कि उसे शैलजा की हत्या करने के लिए मजबूर होना पड़ा. उस से पूछताछ के बाद शैलजा द्विवेदी की हत्या की जो कहानी सामने आई, इस प्रकार निकली.

शैलजा मूलरूप से अमृतसर, पंजाब के पुतलीघर की रहने वाली थी. उस का सरनेम कालिया था. शैलजा के परिवार में मातापिता के अलावा एक भाई सुकर्ण कालिया हैं, जो अमृतसर में वकालत करते हैं. शैलजा कालिया की पढ़ाई अमृतसर में ही हुई थी. डीएवी कालेज से ट्रैवल ऐंड टूरिज्म में ग्रैजुएशन करने के बाद शैलजा ने गुरु नानकदेव विश्वविद्यालय से भूगोल और टाउन प्लानिंग में पोस्टग्रैजुएशन किया. शिक्षा पूरी करने के बाद उस का रुझान अध्यापन की तरफ हुआ. उस ने एक संस्थान में 5 साल तक लेक्चरर के पद पर नौकरी की.

पढ़ाई पूरी कर के शैलजा कालिया अपने पैरों पर खड़ी हो गई थी. मातापिता उस की शादी के लिए उपयुक्त लड़का देखने लगे ताकि उस की शादी कर के अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हो सकें.

किसी परिचित ने कालिया दंपति को उत्तर प्रदेश के फर्रुखाबाद जिले के रहने वाले मेजर अमित द्विवेदी के बारे में बताया. उन्होंने छानबीन की तो अमित उन की बेटी शैलजा के लिए उपयुक्त लगे. दोनों पक्षों के बीच हुई बातचीत के बाद यह रिश्ता तय हो गया और सन 2009 में शैलजा और अमित की शादी हो गई.

पति ही नहीं घरपरिवार भी अच्छा मिला शैलजा को

अमित स्वभाव से सीधे और शरीफ इंसान थे. खूबसूरत शैलजा से शादी कर के वह बहुत खुश थे. शैलजा भी अमित से शादी कर के खुद को खुशनसीब समझती थी. उच्चशिक्षित शैलजा ने शादी के बाद लेक्चरर की नौकरी छोड़ दी थी. उन्हें डांसिंग, कुकिंग, सिंगिंग आदि का शौक था. इस के अलावा वह बातें इतनी प्रभावशाली करती थीं कि उन के साथ रहने वाला कोई भी बोर नहीं होता था. अपनी बातों और चुटकुलों से वह सभी को प्रभावित कर देती थीं. कुल मिला कर शैलजा बहुमुखी प्रतिभा वाली थी.

एक दिन पति के ड्यूटी पर जाने के बाद शैलजा अपने ड्राइंगरूम में अकेली बैठी थी. तभी उस के दिमाग में एक बात घूमी कि शादी से पहले जब वह अपने घर पर थी तो उस की पहचान उस के मांबाप से होती थी और शादी के बाद वह पति के नाम से जानी जाती है. यानी उच्चशिक्षा हासिल करने के बाद भी समाज में उस की अपनी कोई पहचान नहीं है. वह कुछ ऐसा करना चाहती थीं जिस से उन की अलग पहचान बन सके.

अपने मन की बात उन्होंने पति को बताई तो मेजर अमित द्विवेदी ने कह दिया कि वह जो करना चाहती हैं, करें. उन्होंने पत्नी का हरसंभव सहयोग करने का भरोसा दिया. पति की यह बात सुन कर शैलजा बहुत खुश हुईं. इस के बाद उन्होंने पुणे में रह कर एक इंस्टीट्यूट से मौडलिंग और पर्सनैलिटी डेवलपमेंट का कोर्स किया.

कोर्स करने के दौरान वह कैच ऐंड केयर नाम के एनजीओ से जुड़ कर समाजसेवा करने लगीं. वह एनजीओ के बच्चों को नि:शुल्क पढ़ाती थीं. इंस्टीट्यूट से जब भी समय मिलता, वह पति के पास जाती रहती थीं.

इसी दौरान शैलजा ने एक बेटे को जन्म दिया, जिस का नाम अयान रखा गया. बेटे के जन्म के बाद घर में खुशियां और बढ़ गईं. शैलजा अपनी पहचान के लिए जो उड़ान भरना चाह रही थीं, बेटा पैदा होने पर वह रुक गई. उन्होंने सोचा कि जब बेटा कुछ बड़ा हो जाएगा तो वह फिर से अपने कैरियर के लिए जुट जाएंगी. वह पूरी तरह से बेटे की परवरिश में लगी रहीं.

अयान जब मां के बगैर रहने लायक हो गया तो शैलजा ने फिर से अपने बारे में सोचना शुरू किया. बेटा पैदा होने के बाद शैलजा की फिगर खराब हो गई थी, लिहाजा वह उसे मेंटेन करने में जुट गईं. उन्होंने जिम जाना शुरू कर दिया. इस के अलावा वह योगा भी करती थीं. अपनी मेहनत से उन्होंने शरीर को फिट कर के आकर्षक बना लिया.

चूंकि शैलजा ने मौडलिंग का कोर्स किया था, इसलिए उन का झुकाव भी उसी क्षेत्र की ओर हो गया. धीरेधीरे उन्होंने ग्लैमर वर्ल्ड की तरफ कदम बढ़ाए. उन्होंने कई उत्पादों के लिए मौडलिंग भी की. सौंदर्य प्रतियोगिताओं में भी वह हिस्सा लेती रहीं. इस के बाद शैलजा की ऐसी पहचान बढ़ी कि जुलाई 2017 में ‘मिसेज इंडिया अर्थ’ पत्रिका ने शैलजा को कवर पेज पर छापा.

इस पत्रिका में फोटो छपने के बाद शैलजा की खुशी का ठिकाना नहीं रहा. उन के पति मेजर अमित द्विवेदी की पोस्टिंग उस समय दीमापुर में थी. मौडलिंग आदि के काम से वह कभीकभी दिल्ली आती रहती थीं. शैलजा सोशल साइट्स पर काफी सक्रिय रहती थीं. फेसबुक पर अच्छे लोगों से दोस्ती करना उन का शौक था.

फेसबुक के जरिए सन 2015 में उन की दोस्ती निखिल राय हांडा से हुई. निखिल ने खुद को दिल्ली का व्यापारी बताया तो शैलजा ने भी झूठ बोलते हुए खुद को एक बैंक औफिसर की पत्नी बताया.

फेसबुक पर झूठ से शुरू हुई दोस्ती

जबकि सच्चाई यह थी कि निखिल सेना में मेजर था और उस समय उस की पोस्टिंग जम्मूकश्मीर में थी. निखिल वैसे मूलरूप से दिल्ली का रहने वाला था. उस की परवरिश फौजी परिवेश में हुई थी. उस के पिता ए.आर. हांडा सेना में कर्नल थे.

पिता की तरह निखिल भी सैन्य अधिकारी बनना चाहता था. इस के लिए उस के पिता उस का मार्गदर्शन करते रहे. ग्रैजुएशन के बाद पिता ने निखिल का विवाह नलिनी से कर दिया था. नलिनी एक सीधीसादी युवती थी जबकि तेजतर्रार निखिल को अल्ट्रा मौडर्न लड़कियां पसंद थीं.

विवाह के बाद निखिल ने नैशनल डिफेंस एकेडमी (एनडीए) की परीक्षा दी. उस परीक्षा में वह पास हो गया. एनडीए की पढ़ाई करने के बाद उसे अशोक की लाट के साथ सेना की वरदी मिली. उस की पहली पोस्टिंग मेरठ इन्फ्रैंट्री में हुई. इस के बाद उस का तबादला जम्मूकश्मीर हो गया था.

मेजर निखिल राय हांडा की शादी नलिनी से हो जरूर गई थी, लेकिन वह उसे दिल से नहीं चाहता था. उस ने फेसबुक पर 2 एकाउंट बनाए. एक में उस ने खुद को दिल्ली का बिजनैसमैन बताया तो दूसरे में सेना का मेजर. उसे मौडर्न लड़कियों से दोस्ती करने का शौक था.

निखिल और शैलजा द्विवेदी के बीच करीब 6 महीने तक फेसबुक और वाट्सऐप के जरिए बात होती रही. कभीकभी वे फोन पर भी बातें कर लेते थे. दोनों के बीच नजदीकियां बढ़ने लगीं तो दोनों ही मुलाकात के लिए बेचैन होने लगे. शैलजा मौडलिंग के सिलसिले में दीमापुर से दिल्ली आती रहती थी. एक बार मेजर निखिल हांडा भी छुट्टी ले कर दिल्ली आ गया.

दोनों की मुलाकात एक रेस्टोरेंट में हुई. पहली मुलाकात में ही निखिल हांडा शैलजा को दिल दे बैठा. उस ने शैलजा की खूबसूरत छवि को अपने दिल में बसा लिया. उसी दिन निखिल ने उन्हें बता दिया कि वह वास्तव में सेना में मेजर है. शैलजा ने भी अपनी सच्चाई बता दी कि उस के पति भी सेना में मेजर हैं और इस समय उन की पोस्टिंग दीमापुर में है. यह बात सुन कर निखिल खुश हुआ. बाद में दोनों की फोन के जरिए बातचीत जारी रही. निखिल अपने साथ पत्नी को नहीं रखता था पर समयसमय पर अपने परिवार से मिलने दिल्ली आता रहता था.

मेजर निखिल हांडा की शैलजा के प्रति दीवानगी बढ़ती जा रही थी. वह चाहता था कि वह शैलजा के नजदीक रहेगा तो उस से रोजाना मुलाकात हो सकेगी. यही सोच कर उस ने सेना के अधिकारियों से अनुरोध कर के अपना तबादला दीमापुर करवा लिया.

अब तक वह 2 बच्चों का पिता बन चुका था. उस ने कोशिश कर के दीमापुर में शैलजा के घर के पास ही आवास ले लिया. एक दिन अपने घर आयोजित जन्मदिन की पार्टी में शैलजा ने मेजर निखिल को भी आमंत्रित किया. उसी दौरान उस की मेजर अमित द्विवेदी से मुलाकात हुई.

शैलजा अमित को केवल दोस्त समझती थी, जबकि अमित उसे चाहने लगा था. दीमापुर में रहते ही मेजर अमित का संयुक्त राष्ट्र शांति अभियान पर सूडान जाने के लिए चयन हो गया. उन्हें प्रतिनियुक्ति पर सूडान जाना था. वहां जाने से पहले उन्हें दिल्ली में 2 महीने की ट्रेनिंग करनी थी. अमित ने उसी समय शैलजा के साथ प्लान बना लिया था कि वह पूरे परिवार को भी सूडान व अन्य देशों की यात्रा कराएंगे. चूंकि अमित को ट्रेनिंग करनी थी, इसलिए वह परिवार सहित दिल्ली आ गए.

उधर शैलजा की निखिल से फोन पर बातचीत होती रहती थी. अकसर शैलजा के फोन पर लगे रहने पर अमित ने शैलजा को समझाया कि यह स्वास्थ्य के लिए ठीक नहीं है. एक दिन अमित ने पत्नी को निखिल से वीडियो काल करते देख लिया तो उन्हें अच्छा नहीं लगा. उन्होंने पत्नी से कहा कि निखिल उन्हें पसंद नहीं है, इसलिए वह उस से बात न किया करें.

बढ़ती गई निखिल की दीवानगी

इस के बाद शैलजा ने निखिल से दूरी बनानी शुरू कर दी. निखिल को यह जानकारी मिल चुकी थी कि मेजर अमित सूडान जा रहे हैं. वह इसी का फायदा उठाते हुए शैलजा से नजदीकियां बढ़ाना चाहता था. लेकिन शैलजा के रुख को वह समझ नहीं पाया. निखिल छुट्टी ले कर 2 जून को शैलजा से मिलने दिल्ली आ गया. दिल्ली आ कर उसे पता चला कि शैलजा अमृतसर में अपने मायके में है तो वह अमृतसर पहुंच गया. अचानक निखिल को देख कर शैलजा चौंक गईं.

निखिल के अनुरोध पर शैलजा उस के साथ एक रेस्टोरेंट चली गई. तभी मेजर निखिल ने उस के सामने अपना प्यार जाहिर कर दिया. लेकिन शैलजा ने साफ कह दिया कि वह उसे केवल अपना दोस्त समझती है, इस के आगे कुछ नहीं.

निखिल ने यहां तक कह दिया कि वह अपनी पत्नी को तलाक दे देगा. शैलजा ने उसे समझाया कि वह अपने दिल से गलतफहमी निकाल दे और अपने बीवीबच्चों को देखें, यही ठीक रहेगा. तब निखिल मुंह लटका कर घर आ गया.

2-4 दिन बाद शैलजा भी दिल्ली आ गई. एक दिन शैलजा की एड़ी में दर्द हुआ तो वह सेना के बेस अस्पताल पहुंचीं, जहां उन्हें भरती कर लिया गया. यह बात मेजर निखिल को पता लगी तो वह भी उसी अस्पताल में माइग्रेन का दर्द होने का बहाना बना कर अस्पताल में भरती हो गया.

उस दौरान वह शैलजा से भी मिला पर उस ने निखिल को लिफ्ट नहीं दी. शैलजा ने अपनी छुट्टी कराई तो निखिल भी घर आ गया. बाद में वह फिजियोथेरैपी कराने के लिए अस्पताल जाती रहती थी.

निखिल शैलजा के प्यार में पागल हो चुका था. उस ने शैलजा को मनाने की कोशिश जारी रखी. उसे पता चला कि शैलजा अभी भी बेस अस्पताल जाती रहती हैं तो उस ने अपने बेटे को पेट दर्द की बात बता कर अस्पताल में भरती करा दिया. वह अस्पताल में शैलजा से मिलने की कोशिश करता रहता था.

उस की सनक को देखते हुए शैलजा ने उस से दूरी बना ली. बेटे की तीमारदारी के लिए निखिल ने अपनी पत्नी नलिनी को अस्पताल में छोड़ दिया था. 22 जून, 2018 को भी मेजर निखिल हांडा ने शैलजा से मिलने की इच्छा जाहिर की. उन्होंने मना कर दिया तो वह विनती करने लगा कि आखिरी बार मिल लो. इस के बाद मैं परेशान नहीं करूंगा.

आखिर दीवानगी में बन गया हत्यारा

शैलजा मान गई और उन्होंने 23 जून को अस्पताल में मिलने के लिए कह दिया. निखिल अब एक दिलजला आशिक बन गया था. उस ने तय कर लिया था कि यदि इस बार भी शैलजा ने उस की बात नहीं मानी तो वह उसे जिंदा नहीं छोड़ेगा. इस के लिए उस ने सर्जिकल ब्लेड भी खरीद लिया था.

23 जून को सुबह करीब साढ़े 8 बजे निखिल ने शैलजा को फोन किया तो उस ने कह दिया कि वह कुछ देर में अस्पताल पहुंच रही है. रोजाना मेजर अमित ही औफिस जाते समय पत्नी को अस्पताल छोड़ देते थे लेकिन उस दिन शैलजा ने उन के साथ जाने से यह कह कर मना कर दिया कि वह आज अस्पताल देर से जाएगी. बाद में उस ने पति के सरकारी ड्राइवर को फोन कर के बुला लिया और ड्राइवर ने शैलजा को अस्पताल के गेट पर उतार दिया.

मेजर निखिल को उस दिन शैलजा से मिलने का बेसब्री से इंतजार था. अस्पताल में भरती बेटे को देखने के बाद वह अस्पताल के गेट पर पहुंचा और वहां से शैलजा को अपनी कार में बैठा लिया. इस के बाद वह अस्पताल कैंपस से बाहर निकल गया. निखिल ने फिर से शैलजा को समझाने की कोशिश की. उधर शैलजा भी उसे समझा रही थी कि वह फालतू की बातें न करे. तबाही के अलावा इन से कुछ हासिल नहीं होगा.

उधर मेजर निखिल की पत्नी नलिनी को भी शक हो गया था कि उस का पति शैलजा के पीछे दीवाना बन गया है. उसी समय नलिनी का निखिल के मोबाइल पर फोन आया. निखिल ने फोन का स्पीकर औन कर उस से बात की. नलिनी उस के और शैलजा के बारे में बात कर रही थी. निखिल ने पत्नी को डांटते हुए काल डिसकनेक्ट कर दी. फिर वह शैलजा से बोला, ‘‘तुम्हारे लिए मैं पत्नी से लड़ रहा हूं और उसे तलाक देने को तैयार हूं लेकिन तुम बात समझने की कोशिश ही नहीं कर रहीं.’’

‘‘निखिल, यह तुम्हारी बेकार की जिद है. तुम अस्पताल में अपनी बीवीबच्चे के पास जाओ.’’ शैलजा ने सलाह दी.

निखिल को लगा कि अब यह नहीं मानेगी तो उस ने गाड़ी के डैशबोर्ड से सर्जिकल ब्लेड निकाला. उस समय कार बरार स्क्वायर में थी और सड़क सुनसान थी. इस से पहले कि शैलजा कुछ समझ पाती, उस ने सर्जिकल ब्लेड बराबर की सीट पर बैठी शैलजा के गले पर चला दिया. कार में खून फैलने लगा तो उस ने साइड का दरवाजा खोल कर शैलजा को धक्का दे कर सड़क पर गिरा दिया. इस के बाद उस ने तड़पती हुई शैलजा के ऊपर

2-3 बार कार चढ़ा दी, जिस से उस की मौके पर ही मौत हो गई. यह उस ने इसलिए किया ताकि मामला दुर्घटना का लगे.

शैलजा का फोन कार में ही गिर गया था, जिस का सिम निकाल कर उस ने तोड़ दिया और फोन भी पत्थर से कुचल दिया. उस की गाड़ी के अंदर और टायरों पर खून लगा था जो उस ने एक जगह धुलवा दिया लेकिन टायरों का खून पूरी तरह साफ नहीं हुआ था.

इस के बाद वह अस्पताल में अपने बेटे को देखने गया. वहां से चितरंजन पार्क में रहने वाले अपने चाचा राघवेंद्र के पास गया और उन से 20 हजार रुपए लिए. फिर उस ने भाई रजत के साथ बीयर पी.

गाड़ी में कोई सबूत न रहे, इस के लिए वह उस के टायर बदलवाना चाहता था या उस की अच्छी तरह धुलाई करवाना चाहता था. मेरठ में पोस्टिंग के दौरान उस की कुछ गैराज वालों से पहचान हो गई थी, इसलिए वह दिल्ली से मेरठ चला गया, जहां पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया.

मेजर निखिल से पूछताछ के बाद पुलिस ने उसे 25 जून को पटियाला हाउस कोर्ट में महानगर दंडाधिकारी मनीषा त्रिपाठी की अदालत में पेश कर के 96 घंटे के लिए पुलिस रिमांड पर लिया. रिमांड अवधि में उस की निशानदेही पर एक कूड़ेदान से शैलजा का कुचला हुआ मोबाइल बरामद किया गया. लेकिन पुलिस हत्या में प्रयुक्त सर्जिकल ब्लेड, आरोपी के खून सने कपड़े, शैलजा का पर्स, छाता, कार से खून साफ करने वाला तौलिया बरामद नहीं कर सकी.

आरोपी मेजर निखिल राय हांडा से विस्तार से पूछताछ के बाद उसे फिर से न्यायालय में पेश किया गया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया.

– कथा पुलिस सूत्रों और जनचर्चा पर आधारित

आखिर क्यों : प्यार किया तो डर के किया

धर्म और जाति की बिना पर प्यार से नाकभौं सिकोड़ते रहने वाले लोग अगर एक दफा ईमानदारी से अपने दिमाग से नफरत का कूड़ा निकाल कर प्यार करने वालों की बातों, जो वे दिल से करते हैं, को सुन लें तो तय है उन का नजरिया प्यार और प्यार करने वालों के हक में बदल जाएगा. जिस समाज में हम रहते हैं उस पर उन लोगों का दबदबा है जिन्हें धर्म ने रटा दिया है कि प्यार करना बुरी बात है और धर्म के उसूलों के खिलाफ है, इसलिए जहां भी किसी को प्यार करते देखो, तुरंत एतराज जताओ, उन्हें धर्मजाति के अलावा घर की मानमर्यादाओं के नाम पर परेशान करो और इतना परेशान करो कि वे मरने तक कि सोचने लगें. यह हर्ज की बात नहीं क्योंकि धर्म जिंदा रहना चाहिए, वही जीवन का सार है.

इस कट्टरवादी सोच के तले हमेशा से ही इश्क करने वाले हारते आए हैं. वे आज भी कायदेकानूनों, रीतिरिवाजों और उसूलों के नाम पर अपनी हंसतीखेलती जिंदगी व हसीन ख्वाबों की बलि चढ़ा रहे हैं. पर प्यार में जान देने वालों की जिम्मेदारी लेने को कोई आगे नहीं आता तो यह महसूस होना कुदरती बात है कि हमें एक ऐसा समाज और माहौल चाहिए जिस में प्यार करने की आजादी हो, नौजवानों को अपनी मरजी से शादी करने का हक हो, नहीं तो प्रेमी यों ही डरडर कर जीते रहेंगे और इन में से कुछ मरते रहेंगे.

एकदूजे के लिए

भोपाल के बाग मुगालिया इलाके  में रहने वाले 19 वर्षीय रंजीत को अपने ही महल्ले में रहने वाली 17 वर्षीया काजल साहू से प्यार हो गया. एक सुनहरी जिंदगी का ख्वाब उन की आंखों ने देखा. लेकिन उन की नजरें दुनियादारी नहीं देख पाईं. जल्दी ही उन के हौसलों ने घर, समाज, जाति और धर्म के आगे घुटने टेक दिए.

पेशे से मैकेनिक रंजीत ठीकठाक कमा लेता था. उस की जिंदगी की कहानी औरों से हट कर है. एक साल पहले ही उस के पिता की मौत हुई तो मां ने दूसरी शादी कर ली थी. जब मां अपने दूसरे शौहर के यहां चली गई तो वह अपने मामा अरविंद के यहां रहने चले आया. जवानी में विधवा हो गई मां को अगर दूसरा सहारा मिल गया था तो यह कतई हर्ज की बात नहीं थी.

लेकिन एक साल के अंतर से हुई इन 2 घटनाओं ने रंजीत की जिंदगी में एक खालीपन ला दिया, जिसे पूरा किया कमसिन और खूबसूरत काजल ने जो उस के दिल का दर्द समझने लगी थी.

19 फरवरी की दोपहर में रंजीत घर आया और खुद को कमरे में बंद कर फांसी लगा ली. जैसे ही मामा अरविंद ने भांजे को फांसी के फंदे पर झूलते देखा, तुरंत पुलिस को खबर दी. पुलिस आई, कानूनी कार्यवाही व पूछताछ की और फिर रंजीत की लाश को पोस्टमौर्टम के लिए भेज दिया. सारे महल्ले में इस खुदकुशी की चर्चा थी कि क्यों सीधेसादे रंजीत, जिस का अपने रास्ते आनाजाना था, ने बुजदिलों की तरह अपनी जान, भरी जवानी में दे दी जबकि उस के सामने तो पूरी जिंदगी पड़ी थी.

कुछ ही लोगों को समझ आया कि माजरा क्या हो सकता है लेकिन वे कुछ नहीं बोले. बोलने से अब कोई फायदा भी नहीं था कि रंजीत दरअसल काजल से प्यार करता था और शादी करना चाहता था लेकिन उस के घर वाले तैयार नहीं हो रहे थे. शायद, इसलिए उस ने जान दे दी. रंजीत कोई सुसाइड नोट नहीं छोड़ गया था.

जैसे ही रंजीत की खुदकुशी की खबर काजल को लगी तो उस ने बगैर वक्त गंवाए फैसला ले लिया. यह फैसला दरअसल रंजीत के साथ जीनेमरने की कसमें और वादे निभाने का था. रंजीत की मौत की खबर जिस वक्त काजल को मिली, उस वक्त वह पड़ोस की एक शादी में गई थी. वह घर आई और शाम का खाना बनाया, फिर अपने कमरे में चली गई.

इस वक्त काजल की दिमागी हालत क्या रही होगी, इस का सहज अंदाजा हर कोई नहीं लगा सकता. जिस का प्यार उस से कभी छिन गया हो वही समझ सकता है कि काजल पर क्या गुजर रही होगी. रात कोई साढ़े 8 बजे काजल भी रंजीत की तरह फांसी पर झूल गई. मरने से पहले सुसाइड नोट में उस ने खुद के और रंजीत के प्यार का जिक्र किया.

अपनों द्वारा विरोध

शुरू हुआ चर्चाओं का दौर, हरेक की अपनी अलग राय थी. कुछ ऐसे लोग भी थे जिन्होंने यह कहा कि रंजीत को काजल के बालिग होने तक इंतजार करना चाहिए था. बात सच थी लेकिन ऐसा कहने वाले लोग यह नहीं सोच पाए कि आखिर क्या वजहें थी जिन के चलते रंजीत और काजल को इंतजार करना भी बेकार लगने लगा था. यह बात 10वीं में पढ़ने वाली काजल भी जानतीसमझती थी कि नाबालिग की शादी कानूनन जुर्म होती है.

दरअसल, ये दोनों इंतजार करने को तैयार थे पर इन का प्रेमप्रसंग घरवालों को रास नहीं आ रहा था. रंजीत और काजल का प्यार कोई ढकीमुंदी बात नहीं रह गई थी. जानने वालों को यह भी मालूम था कि कुछ दिनों पहले ही काजल के घरवाले शादी के लिए तैयार हो गए थे पर फिर बाद में मुकर गए थे. यह बात रंजीत के मामा अरविंद ने मानी कि दोनों में प्यार था.

इस वाकए ने अनायास ही फिल्म ‘एक दूजे के लिए’ की याद दिला दी जिस में हीरो कमल हासन और हीरोइन रति अग्निहोत्री थे. ये दोनों भी एकदूसरे से टूटकर प्यार करते थे पर घरवाले अलगअलग धर्मों, जाति और इलाकों के थे, इसलिए विवाह के लिए तैयार नहीं थे. सपना और वासु पर उन्होंने तरहतरह की बंदिशें व शर्तें लाद रखी थीं जिन पर वे खरे भी उतर रहे थे पर इस के बाद भी बात नहीं बनी तो दोनों ने एकएक कर खुदकुशी कर ली थी.

यह फिल्म जबरदस्त हिट हुई थी. आज भी प्रेमियों के बीच इस के किरदारों सपना और वासु की मिसाल दी जाती है और यह आज भी इस लिहाज से मौजूं है कि प्यार के मामले में भारतीय समाज की सोच और संकरापन ज्यों का त्यों 35 साल और उस से भी पहले जैसा है. 35 साल में कितने प्रेमियों ने अपनी जान दी होगी, इस की कोई गिनती नहीं, लेकिन कुछ चर्चित मामले जरूर हैं.

जुदाई का डर

भोपाल के हमीदिया रोड स्थित होटल अमरदीप के एक कमरे में इसी साल 5 जनवरी को ही मनीषा लोवंशी और शुभम पटेल नाम के प्रेमियों ने खुदकुशी कर ली थी. इन दोनों ने जुदाई के डर से बाकायदा योजना बना कर साथ मरने की कसम निभाई थी. 24 वर्षीया मनीषा ने इस दिन दोपहर को एक होटल में कमरा किराए पर लिया था. थोड़ी देर बाद शुभम भी होटल के कमरे में आ गया. दोनों ने साथ मिल कर खाना खाया.

खाना खाने के बाद उन्होंने जो बातें की होंगी, वो तो उन के साथ गईं पर उन की खुदकुशी कुछ सवाल जरूर छोड़ गई. दोनों ने होटल के कमरे में सल्फास की गोलियां खा लीं.

मनीषा इंदौर की रहने वाली थी जो अकसर भोपाल आया करती थी. यहां उस की जानपहचान अपनी उम्र से 4 साल छोटे शुभम से हो गई. दोनों ने तय कर लिया कि अब साथ जिएंगे और साथ नहीं जी पाए तो मर तो साथ सकते हैं.

इस हादसे पर भी खूब सनसनी मची थी जिस में एक बात यह सामने आई थी कि मनीषा की मामीमामा को उस का शुभम से मिलनाजुलना पसंद नहीं था क्योंकि अगर वह शुभम से शादी करती तो इस का असर उन की 3 लड़कियों की शादी पर भी पड़ता यानी गैरबिरादरी के कम उम्र के लड़के से शादी करने पर पूरे घर की बदनामी होती.

ये दोनों बालिग थे, चाहते तो शादी कर सकते थे पर इन्हें चिंता और डर जाति व समाज का था. क्यों? इस सवाल का जवाब साफ है कि प्यार करने वाले इस मोड़ पर उसूलों और ख्वाहिशों की चक्की में पिस रहे होते हैं जिस से बाहर निकलने में इन की मदद के लिए कोई न आगे आता है और न ही सही राह दिखाता है.

फिर क्या करें? रंजीतकाजल और मनीषाशुभम जैसे प्रेमी. यह सवाल हमेशा से ही मुंहबाए खड़ा है. लेकिन हारते प्यार करने वाले ही हैं जिन का गुनाह सिर्फ इतना सा होता है कि उन्होंने प्यार किया. यह प्यार आज भी चोरी और या गुनाह माना जाता है तो इस के असल जिम्मेदार धर्म के ठेकेदार हैं जो नहीं चाहते कि नौजवान अपनी मरजी से शादी करें, अगर करेंगे तो इन के खोखले उसूल, कायदे, कानून और रीतिरिवाज ताश के पत्तों की तरह ढह जाएंगे जो इन की रोजीरोटी का तो बड़ा जरिया हैं ही, साथ ही समाज पर इन का दबदबा भी बनाए रखते हैं.

बीती 18 दिसंबर को मध्य प्रदेश के शिवपुरी में एक और ऐसा ही हादसा हुआ था जिस में 20 वर्षीया माशूका आरती कुशवाह ने अपने 22 वर्षीय आशिक महावीर रजक के खुदकुशी करने के बाद खुद भी आत्महत्या कर ली. महावीर चूंकि छोटी जाति का था और आरती ऊंची जाति की, इसलिए इन दोनों की शादी के लिए इन के घर वाले राजी नहीं हो रहे थे. ये दोनों बैराड़ गांव से शिवपुरी पढ़ने आए थे और एकदूसरे को बेइंतहा चाहने लगे थे.

महावीर और आरती ने धर्म द्वारा बनाए और फैलाए गए जातिवाद की सजा अपनी जानें दे कर भुगतीं तो किसी ने कुछ नहीं कहा, न ही सोचा कि आखिर इन मासूमों का इस में कुसूर क्या था. कुल मिला कर साबित यह हुआ कि वाकई प्यार करने वाले धर्म, जाति और ऊंचनीच वगैरा कुछ नहीं देखते और ऐसा होना तभी मुमकिन है जब दिलों में प्यार का एहसास जाग जाए.

पर इन्हें सजा क्यों

2 बालिग जब प्यार करते हैं तो सही मानो में उन्हें जिंदगी के माने समझ आते हैं. प्रेमियों को सारी दुनिया हसीन लगती है और उन का कुछ करगुजरने का जज्बा भी सिर उठाने लगता है. उन्हें अपने वजूद का एहसास होता है, जिंदगी का मकसद मिलता है और एक सुकूनभरी जिंदगी गुजारने के लिए वे एकदूसरे के साथ जीनेमरने की कसमें खाने लगते हैं. धर्म, जाति और उम्र के बंधन तोड़ने पर ये उतारू हो जाते हैं. लेकिन हकीकत से जब टकराते हैं तो इन की हिम्मत जवाब देने लगती है.

यह हकीकत है कि ये प्यार करने वाले धर्म के ठेकेदारों और समाज के पैराकारों के बिछाए सदियों पुराने जाल में फड़फड़ा कर परिंदों की तरह दम तोड़ देते हैं. किसी का दिल नहीं पसीजता, उलटे प्रचार यह किया जाता है कि देख लो, प्यार करने का अंजाम.

कई मामलों में प्रेमी बालिग होते हैं और हर लिहाज से काबिल भी होते हैं लेकिन उसूल तोड़ कर अपने सपनों का आशियाना बनाने की हिम्मत वे नहीं जुटा पाते. इस की वजह सिर्फ यह है कि वे एक बुजदिल बेडि़यों में जकड़े समाज और दुनिया में जीने के बजाय साथ मर जाना बेहतर समझते हैं.

कहने का मतलब यह नहीं कि खुदकुशी करना कोई बहादुरी वाली बात है बल्कि यह है कि प्रेमियों को अपनेआप में दुनिया, धर्म और समाज से लड़ने की हिम्मत जुटानी चाहिए क्योंकि अपनी मरजी के मुताबिक शादी करना और जिंदगी जीना हर किसी का हक है. जिंदगी को बेकार के रीतिरिवाजों व नियमों की बलि चढ़ा कर ये लोग प्यार को कमजोर साबित कर जाते हैं.

आ रहा है बदलाव

एकसाथ खुदकुशी कर मर जाने वालों को समाज में आ रहे बदलावों को भी गौर से देखना चाहिए. आजकल पढ़ेलिखे, खातेपीते घरों में 60 फीसदी शादियां दूसरी जाति में हो रही हैं और हैरत की बात यह है कि राजीखुशी हो रही हैं. मांबाप खुद बच्चों की मरजी से शादी कराने के लिए आगे आ रहे हैं. थोड़ी तकलीफ हालांकि उन्हें भी होती है पर बच्चे खुद को अच्छा पतिपत्नी साबित कर दें, तो वक्त रहते वह तकलीफ भी दूर  हो जाती है.

दरअसल, फर्क शिक्षा और माहौल का है जिसे बदलने के लिए जरूरी है कि पहले कैरियर बना कर खुद के पैरों पर खड़ा हुआ जाए, दुनियाजमाने की परवा न की जाए.  इस के लिए जरूरी है कि आशिक और माशूका साथ जीने की कसम खाएं, साथ मरने की बात तो उन्हें सोचनी ही नहीं चाहिए क्योंकि कानून उन के साथ है. धीरेधीरे लोगों का नजरिया भी बदल रहा है पर उस का दायरा अभी सिमटा है, तो जाहिर है नौजवानों के विरोध, गैरत और अच्छे कैरियर से ही और बढ़ेगा.

इन्होंने जीती जंग

 नए साल की शुरुआत प्यार के मामले में ठीकठाक नहीं हुई थी. 3 जनवरी की सुबह भोपाल के कलैक्ट्रेट में बजरंग दल के कार्यकर्ताओं का जमावड़ा था और उन के इरादे नेक नहीं लग रहे थे. लिहाजा, भारी तादाद में पुलिस बल यहां तैनात था जिसे देख हर कोई हैरत में था कि आखिर यहां कौन सा पहाड़ टूटने वाला है.

दरअसल, इस दिन बैंक की एक मुलाजिम रितु अपने प्रेमी विशाल से कोर्टमैरिज करने वाली थी. विशाल चूंकि ईसाई धर्म को मानने वाला है, यह भनक लगते ही कि एक हिंदू लड़की क्रिश्चियन लड़के से शादी करने जा रही है वह भी अपने घरवालों की मरजी के खिलाफ, तो बजरंगियों ने अपना रंग दिखाना शुरू कर दिया था.

ये लोग रितु और विशाल की शादी न होने देने पर आमादा थे तो इन दोनों ने दृढ़ कर रखा था कि कुछ भी हो जाए, प्यार के इन दुश्मनों के सामने सिर नहीं झुकाना है. शादी से रोकने के लिए रितु के घरवालों ने उसे मारापीटा भी था. इस से साबित हो गया था कि ऐसा गांवदेहातों के अनपढ़ कहे जाने वाले लोगों में ही नहीं, बल्कि पढ़ेलिखे शहरी भी जातपांत, धर्म और ऊंचनीच की गिरफ्त में हैं.

खूब हंगामा हुआ लेकिन ये दोनों अपने फैसले से टस से मस नहीं हुए और रजिस्ट्रार के यहां शादी की दरख्वास्त लगा दी. शादी के दिन भारी गहमागहमी के बीच एडीएम रत्नाकर झा ने रितु को कोर्ट में बुला कर पूछा कि कहीं विशाल और उस के घरवाले तुम्हें बहलाफुसला कर तो शादी नहीं कर रहे हैं और मुमकिन है शादी के बाद तुम्हारा धर्मपरिवर्तन भी करा दें. जवाब में पूरे भरोसे के साथ रितु ने कहा कि वह विशाल से ही शादी करना चाहती है. एडीएम के यह पूछने पर कि तुम्हारे घरवाले नहीं चाहते कि तुम किसी दूसरे लड़के से शादी करो तो रितु ने कहा कि विशाल और मैं ने एकसाथ जीनेमरने की कसम खाई है और इसे मैं उम्रभर निभाऊंगी.

रितु का यह भी कहना था कि वह बालिग है और अपना भलाबुरा बखूबी समझती है. अपने घरवालों के एतराज से उसे कोई सरोकार या लेनादेना नहीं है. उधर, विशाल ने पूरी सख्ती के साथ कहा कि भले ही रितु के मांबाप गुस्सा हों लेकिन वह उन्हें अपने मांबाप की तरह इज्जत देगा और जिंदगीभर रितु का खयाल रखेगा. एडीएम ने बाहर हिंदूवादियों के  जमावड़े की परवा न करते हुए इन दोनों की शादी पर कानूनी मुहर लगा दी.

इस मामले से सबक यह मिलता है कि अगर प्रेमी प्यार के दुश्मनों से लड़ने की ठान लें, तो कोई उन का कुछ नहीं बिगाड़ सकता. फिर मरने की बात सोचने का तो सवाल ही नहीं उठता.

क्या करें

प्यार करना गुनाह नहीं है पर उस में साथसाथ या फिर अलगअलग किसी एक का खुदकुशी कर लेना, वह भी डर से, जरूर गुनाह है जिस से इस तरह बचा जा सकता है –

–       शादी का फैसला बालिग होने पर ही लें.

–       शादी से पहले काबिल बनें यानी अपने पैरों पर खड़े हों.

–       कोई भी फैसला लेने से पहले घर वालों को मनाने की हर मुमकिन कोशिश करें.

–       घरवाले न मानें तो रिश्तेदारों और दोस्तों का साथ लेने की कोशिश करें.

–       अगर कोई भी साथ न दे तो कोर्टमैरिज करें और अलग रहें.

बिलाशक ये बातें कहनेसुनने में आसान लगती हैं लेकिन इन पर अगर आसानी से अमल किया जा सकता तो बड़े पैमाने पर प्रेमी खुदकुशी करते ही क्यों? पर मुहब्बत की जंग जीतने के लिए जरूरी है अपनेआप में हिम्मत पैदा की जाए. इस के लिए जरूरी है कि घरपरिवार, जाति और धर्म को ले कर ज्यादा जज्बाती न हुआ जाए और यह भी न सोचा जाए कि अगर अपने घरवालों की मरजी के खिलाफ शादी कर ली तो उन पर क्या गुजरेगी.

सोचें यह कि जब हम एकदूसरे के बगैर वाकई नहीं रह सकते तो हम पर क्या गुजरेगी. खुदकुशी करना आसान काम है, पर इस से सपने पूरे नहीं होते, न खुद के और न ही घरवालों के जो धर्म व जाति के चक्रव्यूह में फंसे अपने बच्चों का भला भी नहीं सोच सकते.

अपने लिवर को जानें और स्वस्थ रहें

शरीर के सब से महत्त्वपूर्ण अंगों में शुमार होता है लिवर. यह शरीर का सब से बड़ा भीतरी अंग है जो स्वस्थ शरीर के अस्तित्व के लिए जरूरी कई रासायनिक क्रियाओं के लिए जिम्मेदार है. लिवर एक ग्रंथि भी है क्योंकि यह ऐसे रसायनों का स्राव भी करता है जिस का इस्तेमाल शरीर के अन्य अंग करते हैं. अपने अलगअलग तरह के कार्यों के कारण यह एक अंग और ग्रंथि दोनों में शुमार होता है. यह शरीर के सामान्य ढंग से काम करने के लिए जरूरी रसायनों का निर्माण करता है. यह शरीर में बनने वाले तत्त्वों को छोटेछोटे हिस्सों में तोड़ता है और जहरीले तत्त्वों को खत्म करता है. साथ ही, यह स्टोरेज यूनिट की तरह भी काम करता है. हेप्टोसाइट्स (हेपट-लिवर+ साइट-सेल) शरीर में कई प्रकार के  प्रोटीन के  निर्माण के लिए जिम्मेदार होते हैं जिन की अलगअलग कार्यों के लिए जरूरत होती है. इन में ब्लड क्लौटिंग और एल्बुमिन शामिल हैं जिन की सर्कुलेशन सिस्टम  के भीतर फ्लुइड बनाए रखने के लिए जरूरत होती है.

लिवर कोलैस्ट्रौल और ट्रिग्लीसेराइड्स बनाने के लिएजिम्मेदार होते हैं. कार्बोहाइड्रेट्स का निर्माण भी लिवर में होता है और यह अंग ग्लूकोज को ग्लूकोजेन में बदलने के लिए जिम्मेदार है जिन्हें लिवर में और मांसपेशियों की कोशिकाओं में स्टोर किया जा सकता है.

लिवर बाइल भी बनाता है जो खाना पचाने में मदद करते हैं. लिवर शरीर में उपापचयी प्रक्रिया के सहउत्पाद अमोनिया को यूरिया में बदल कर शरीर को जहरीले तत्त्वों से मुक्त करने में अहम भूमिका निभाता है जिसे किडनी द्वारा पेशाब मार्ग से शरीर से बाहर निकाल दिया जाता है. यह अल्कोहल समेत दवाओं को भी तोड़ता है और यह शरीर में इंसुलिन व दूसरे हार्मोंस को तोड़ने के लिए भी जिम्मेदार होता है.

लिवर की सामान्य बीमारियां

जीवनशैली और खानपान की आदतों में होने वाले बदलावों के कारण आज जिस अंग पर सब से अधिक प्रभाव पड़ा है वह है लिवर. लिवर को नुकसान पहुंचाने वाले कारकों में विषाणु, नुकसानदायक भोजन और अल्कोहल का इस्तेमाल भी हो सकता है. हेपेटाइटिस ए, बी और सी जैसे विषाणु लिवर को नुकसान पहुंचा सकते हैं.

आज अल्कोहालिक पेय का अत्यधिक कोलैस्ट्रौल वाले जंक फूड के साथ उपभोग किया जाना एक नित्य जीवनशैली सी बन गया है, यह भी लिवर की बीमारियों का एक प्रमुख कारण है. इस से बीएमआई यानी बौडी मास इंडैक्स का स्तर बढ़ जाता है जो टाइप 2 डायबिटीज के बढ़ते जोखिम से संबंधित है और जो लिवर की गंभीर बीमारी से भी संबंधित है. अत्यधिक बीएमआई के बढ़ते जोखिम की वजह से जीवन के  बाद के हिस्से में गंभीर लिवर बीमारी होने का खतरा कम उम्र से ही बना रहता है. लगातार अधिक वजन बने रहने और मोटापे ने भी दुनियाभर में लिवर की बीमारियों को बढ़ाने में भूमिका निभाई है.

लिवर को नुकसान पहुंचाने वाला एक अन्य कारक मोटापा है. मोटापा आज के समय में दुनियाभर की समस्या है और विकासशील देशों में भी वयस्कों एवं बच्चों दोनों में मोटापे की समस्या की वजह से यह एक बड़ी सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या बन गया है. उपलब्ध अध्ययनों से मोटापे से विभिन्न प्रकार के कैंसर पैदा होने की जानकारी मिली है. खासतौर पर मोटापे और लिवर कैंसर के बीच मजबूत संबंध है.

इस के अलावा नौन अल्कोहालिक फैटी लिवर डिजीज (एनएएफएलडी) और अधिक गंभीर नौन अल्कोहालिक स्टियोहैपेटाइटिस (एनएएसएच) जैसी अन्य बीमारियों का भी खतरा है. एनएएसएच को लिवर के चरबीदार होने और जलन होने से पहचाना जाता है और माना जाता है कि इस से फाइब्रोसिस और सिरौसिस भी हो सकता है. सिरौसिस को लिवर कैंसर के जोखिम के कारण के तौर पर जाना जा सकता है. दरअसल, अधिक लोगों के मोटापे से पीडि़त होने की वजह से यह हेपेटाइटिस विषाणु की वजह से होने वाले संक्रमण के मुकाबले हैप्टोसैल्यूलर कार्सिनोमा की अहम वजह हो सकता है.

अत्यधिक मात्रा में अल्कोहल का इस्तेमाल करने की वजह से लिवर को गंभीर नुकसान हो सकता है. जब कोई व्यक्ति अत्यधिक मात्रा में अल्कोहल का इस्तेमाल करता है तो लिवर के सामान्य कामकाज में बाधा पैदा होती है. जिस से शरीर में रासायनिक असंतुलन हो सकता है. लिवर की कोशिकाएं बरबाद हो सकती हैं.

लिवर कैंसर के लक्षण

लिवर कैंसर के लक्षण प्रत्येक व्यक्ति में अलगअलग होते हैं और इन में से कोई लक्षण दूसरे लक्षण की वजह से हो सकता है.

–       वजन में कमी.

–       बुखार आना.

–       पेट में सूजन.

–       उबकाई और उलटी होना.

–       भूख में कमी या थोड़ा खाना खाने के बाद ही पेट भरा महसूस होना.

–       सामान्य कमजोरी लगातार थकान बनी रहना.

–       दायीं तरफ पेट के ऊपरी हिस्से में या दाएं कंधे में होना वाला दर्द.

–       लिवर का बड़ा आकार (हैप्टोमीगली) पसलियों के नीचे दायीं तरफ एक बनावट की तरह महसूस होता है.

–       स्प्लीन का बड़ा आकार पसलियों के नीचे बायीं तरफ एक बनावट की तरह महसूस होता है.

–       पीलिया जो त्वचा व आंखों में पीलेपन के तौर पर दिखाई देता है. पीलिया तब होता है जब लिवर अच्छी तरह काम नहीं करता है.

चिकित्सकीय प्रौद्योगिकी के आधुनिकीकरण के साथ गंभीररूप से खराब हो चुके लिवर वाले मरीज लिवर प्रत्यारोपण का विकल्प चुन सकते हैं. उन के लिए इस की आधारभूत प्रक्रिया को समझना जरूरी है.

देखभाल करने के लिहाज से लिवर सरल अंग है लेकिन उसे वह महत्त्व नहीं मिलता जिस का वह हकदार है. अपने विभिन्न प्रकार के कार्यों की वजह से इस पर विषाणुओं, जहरीले पदार्थों, खाने और पानी में मौजूद मिलावट व बीमारियों का असर पड़ता है. लेकिन यह परेशानी में होने के बाद भी शिकायत करने के लिहाज से सुस्त होता है क्योंकि यह शरीर का एक मजबूत और सख्त हिस्सा है.

अकसर लिवर की समस्याओं से पीडि़त लोगों को किसी गड़बड़ी का पता नहीं चलता क्योंकि उन्हें कुछ या न के बराबर ही लक्षण देखने को मिलते हैं.

हालांकि लिवर की बीमारियों के उपचार का महत्त्वपूर्ण आधुनिकीकरण तरीका उपलब्ध है लेकिन संपूर्ण सामाधन नहीं है. इसलिए लिवर को नुकसान से बचाने के लिए सेहतमंद जीवनशैली अपनानी बेहद महत्त्वपूर्ण है और लिवर की बीमारियां पैदा करने वाले विषाणुओं के खिलाफ जरूरी टीके लेने जरूरी हैं.

(डा. गौरदास चौधरी, लेखक गुरुग्राम स्थित फोर्टिस मैमोरियल रिसर्च इंस्टिट्यूट के निदेशक हैं.)

पहले से तय थी वाड्रा और हुड्डा की घेराबंदी

सोनिया गांधी के दामाद रॉबर्ड वाड्रा और हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा की घेराबंदी तय थी. सीनियर आईएएस अधिकारी डा. अशोक खेमका ने वाड्रा की कंपनी की जिस जमीन का म्यूटेशन (इंतकाल) रद किया था, उसी को मुद्दा बनाकर भाजपा हरियाणा में सत्ता पर काबिज हुई. हुड्डा और वाड्रा की घेराबंदी के लिए राज्य सरकार ने जस्टिस एसएन ढींगरा के नेतृत्व में आयोग का भी गठन किया. आयोग की रिपोर्ट लीकेज के बाद माना जाने लगा था कि सरकार कभी भी हुड्डा व वाड्रा पर शिकंजा कस सकती है. इसके लिए माकूल समय का इंतजार था.

चार साल से सत्ता में भाजपा पर राष्ट्रीय व राज्य स्तर पर इस मुद्दे को लेकर खासा दबाव था. दरअसल, हुड्डा को फंसाने के लिए भाजपा ने कूटनीतिक दांव खेला है. हुड्डा के विरुद्ध किसी भी तरह की कार्रवाई में भाजपा जल्दबाजी के मूड में नहीं थी. सत्ता में आते ही घेराबंदी की जाती तो कांग्रेस यह कहकर सहानुभूति जुटाने की कोशिश करती कि बदले की भावना से कार्रवाई की जा रही है. अब चुनाव के लिए एक साल ही बचा है और हुड्डा इस समय काफी सक्रिय हैं. वह जनक्रांति रथयात्रओं के जरिये पूरा प्रदेश नापने की तैयारी में हैं.

हुड्डा तेज चलें, इससे पहले उनकी घेराबंदी कर भाजपा ने एक तीर से दो निशाने साधने का काम किया है. भाजपा ने जहां वादा पूरा किया, वहीं प्रदेश की जनता को भी यह संदेश दे दिया कि उसने जो कहा, वह करके दिखाया है. हालांकि इस कार्रवाई के बाद अब हुड्डा समर्थक एकजुट होंगे, लेकिन हाईकमान में उनकी दबाव की राजनीति कितना काम आएगी, यह देखने वाली बात होगी.

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