


युद्ध पर केंद्रित फिल्में बनाने में महारत रखने वाले फिल्मकार जे पी दत्ता इस बार पाकिस्तान की बजाय भारत व चीन सीमा पर हुए 1965 के युद्ध पर फिल्म ‘‘पलटन’’लेकर आए हैं. जे पी दत्ता का दावा है कि उन्होंने यह फिल्म सिक्किम सीमा पर स्थित नाथू ला दर्रे के उस घटनाक्रम पर बनायी है, जो कि इतिहास के पन्नों में दर्ज नहीं है. इस तरह वह अपनी फिल्म के माध्यम से इतिहास में नया अध्याय जोड़ने का काम कर रहे हैं.
फिल्म की कहानी 1965 के नाथू ला पास दर्रे की है. जब चीनी सेना की भारतीय सेना के साथ छोटी सी झड़प हुई थी, पर भारतीय सेना के जवानों ने चीनी सेना के छक्के छुड़ा दिए थे.
जे पी दत्ता ने फिल्म को वास्तविक लोकेशन पर जाकर फिल्माया है. कास्ट्यूम आदि पर काफी मेहनत की है. मगर पटकथा के स्तर पर इस बार वह काफी चूके हैं, जबरनठूंसी गयी आधी अधूरी अतीत की कहानियों के चलते फिल्म बोझिल होने के साथ साथ काफी लंबी खिंच गयी है. फिल्म में इमोशन की कमी है. जिन लोगों को युद्ध के दृश्य व एक्शन देखने का शौक है या जिन्हे तकरार देखना पसंद है, उन्हे यह फिल्म ठीक लग सकती है. सिद्धांत कपूर के पास करने को कुछ था ही नहीं.
जहां तक अभिनय का सवाल है, तो सोनाक्षी सिन्हा के भाई लव सिन्हा सर्वाधिक निराश करते हैं. जैकी श्राफ, अर्जुन रामपाल व सोनू सूद ने ठीक ठाक अभिनय किया है.
दो घंटे 34 मिनट की अवधि वाली फिल्म ‘‘पलटन’’ के निर्माता, लेखक व निर्देशक जे पी दत्ता हैं. संगीतकार अनु मलिक, कैमरामैन शैलेष ए बी अवस्थी और निगम बोमजान तथा कलाकार हैं-जैकी श्राफ, अर्जुन रामपाल, सोनू सूद, गुरमीत चौधरी, लव सिन्हा, अभिलाष चौधरी, नागेंद्र चौधरी, ईषा गुप्ता, सोनल चौहान, दीपिका कर व अन्य.
‘‘लैला मजनूं’’ की प्रेम कहानी सदियों पुरानी है, मगर फिल्मकार इम्तियाज अली और साजिद अली ने उसे आधुनिक जामा पहनाते हुए बंटाधार करके रख दिया है.
फिल्म की कहानी कश्मीर में रह रहे मसूद की लड़की लैला (तृप्ति डिमरी) से शुरू होती है, जो कि कौलेज में पढ़ती है. वह कौलेज पढ़ने नहीं बल्कि लड़कों के साथ फ्लर्ट करने, उन्हे अपने पीछे दीवाना बनाने के लिए जाती है. उसे इसी में आनंद की अनुभूति होती है. इसी दौरान लैला की मुलाकात कैस बट (अविनाश तिवारी) से होती है. दोनों के पिता शहर के अति अमीर व्यक्ति हैं. मसूद का आरोप है कि कैस बट के पिता ने वर्तमान सरकार की मदद से उनकी जमीन पर कब्जा कर शालीमार नामक बड़ा होटल बना लिया है.

जबकि बट का कहना है कि वह व्यापारी हैं और उन्होने सरकार से जमीन खरीदी है. मसूद का झगड़ा सरकार से है, उनसे नहीं. पर एक नेता के बहकावे में आकर मसूद ने कैस के परिवार को अपना दुश्मन मान लिया है. अब लैला व कैस का प्यार परवान चढ़ता है. कैस, लैला को खुश करने के लिए पूरे कश्मीर में लैला के जन्मदिन के नाम पर उपहार बांटता है. पूरे कश्मीर में इसकी चर्चा शुरू हो जाती है. उधर इस आग में घी डालने का काम लैला का फुफेरा भाई इबान (सुमित कौल) करता रहता है. इबान को नेता ने आश्वासन दिया है कि वह लैला के पति को एमएलए बनवा देगा.
बहरहाल, इबान व लैला की शादी हो जाती है. लैला, इबान व दूसरों की बातों में आकर कैस बट को घर से बेइज्जत कर भगा देती है. फिर कहानी चार वर्ष बाद शुरू होती है, जब कैस के पिता की मौत हो जाती है. पता चलता है कि इबान एमएलए बन गया है. वह शराब में डूबा रहता है. अपनी सरकार के चलते इबान ने ही कैस के परिवार पर जुल्म ढाते हुए कैस के पिता की संपत्ति छीनकर उन पर कई मुकदमे चलवा रखे हैं. इसी वजह से चार साल से शालीमार होटल भी बंद पड़ा है.

पिता के जनाजे को कंधा देने कैस लंदन से वापस आता है. यह खबर पाते ही लैला को नई शक्ति मिल जाती है. पति के विरोध के बावजूद वह कैस से मिलती है और अपने प्यार का पुनः इजहार करती है. अब लैला अपने शराबी पति की चार वर्ष से सहन कर रही प्रताड़ना के खिलाफ विद्रोह कर देती है. उसे अदालत में जाने की धमकी के साथ जनता के सामने इबान को बेनकाब करने की बात करती है. इसी गम में ज्यादा शराब पीकर इबान मर जाता है. लैला के पिता को अपनी गलती का अहसास होता है. वह लैला से कहते हैं कि पति की मौत के बाद की रस्म पूरी होने के बाद कैस से धूमधाम के साथ शादी कर सकती है. लैला, कैस से तब तक इंतजार करने के लिए कहती है. पर इस इंतजार के ही दौरान मजनूं बने कैस पागल हो जाते हैं.
कैस की हालत जानकर लैला को सदमा लगता है और उसकी मौत हो जाती है. कैस कब्रिस्तान जाता है और लैला की कब्र पर लगे पत्थर से चोटिल होकर वहीं मौत के मुंह में समा जाता है.
कथानक व पटकथा के स्तर काफी कमियां है. यह न पूरी तरह से बौलीवुड फिल्म बन पायी और न ही क्लासिक प्रेम कहानी वाली फिल्म ही बन पायी. लैला व कैस के बीच जुनूनी प्यार की बजाय एकतरफा प्यार ही नजर आता है और यह एकतरफा प्यार भी महज उसी वक्त परदे पर उभरता है, जब लैला व कैस आमने सामने होते हैं. यह फिल्म की बजाय किसी सीरियल के कुछ एपीसोड नजर आते हैं. फिल्म कश्मीर में है, तो वहां पर बहुत कुछ कहानी का केंद्र बन सकता था. मगर फिल्मकार ने राजनीतिक दुश्मनी को ही चुना और उसे भी ठीक से पेश नहीं कर पाए.
फिल्म में उबाउपना ज्यादा है. फिल्म में जिस तरह से कैस व उनके पिता के बीच के रिश्ते दिखाए गए हैं और जिस तरह से कैस अपने पिता को मूर्ख बनाकर उन्हे लैला के पिता के पास गिड़गिड़ाने के लिए राजी करता है, वह सब अस्वाभाविक व अति नकली नजर आता है. इस सीन को देखकर लेखक की दिमागी सोच पर हंसी आती है. इतना ही नहीं कई जगह इसे एडीटिंग टेबल पर ठीक किया जा सकता था, पर वह भी नहीं हुआ. फिल्म का गीत संगीत भी आकर्षित नहीं करता.
कश्मीर की खूबसूरत वादियों का नयनसुख लेने के लिए भले ही इस फिल्म को देखा जा सकता है. पूरी फिल्म में लैला भारी भरकम या यूं कहें कि अर्ध दुल्हन के मेकअप में ही नजर आती है. पर कैस उर्फ मजनूं शानदार जैकेट पहने हुए नजर आते हैं. पर जहां तक अभिनय का सवाल है तो लैला के किरदार में तृप्ति डिमरी को अभी मेहनत करने की जरुरत है. कैस उर्फ मजनूं के किरदार में अविनाश तिवारी ने सहज अभिनय किया है. इस फिल्म से अविनाश तिवारी को अवश्य फायदा मिलेगा.
दो घंटे बीस मिनट की अवधि वाली फिल्म ‘‘लैला मजनूं’’ का निर्माण इम्तियाज अली व एकता कपूर ने किया है. फिल्म के लेखक इम्तियाज अली, गीतकार इरशाद कामिल, निर्देशक साजिद अली, कैमरामैन सयक भट्टाचार्य, संगीतकार निलाद्री कुमार, जोई बरूआ व अलिफ तथा कलाकार हैं-अविनाश तिवारी, तृप्ति डिमरी, सुमित कौल, मीर सरवर, रूचिका कूपर , साहिबा बाली व अन्य.
तापसी पन्नू के अभिनय क्षमता की विजय पताका इतनी तेजी से फैल रही है कि फिल्मकार तापसी को अपनी फिल्म का हिस्सा बनाने के लिए फिल्म की पटकथा में बदलाव तक कर रहे हैं. यह महज कपोल कल्पित कथा नहीं, बल्कि हकीकत है.
पिछले एक वर्ष से चर्चा रही है कि फिल्म निर्माता शैलेश एस. सिंह पुलिस अफसर के किरदारों से युक्त अति नाटकीय फिल्म का निर्माण कर रहे हैं, जिसमें ऐश्वर्या राय बच्चन और अभिषेक बच्चन होंगे. लेकिन इस फिल्म को लेकर कोई प्रगति सुनाई नहीं दे रही थी. कुछ दिन पहले अभिषेक बच्चन ने दावा किया कि यह फिल्म बंद हो चुकी है. फरवरी माह के बाद इस फिल्म को लेकर कोई काम नहीं हुआ. मगर बौलीवुड से जुड़े सूत्र दावा कर रहे हैं कि फिल्म में अब ऐश्वर्या राय बच्चन की जगह तापसी पन्नू होंगी. तथा हीरो के लिए किसी अन्य कलाकार के नाम पर विचार किया जा रहा है.
मगर सूत्रों का दावा है कि शैलेश एस. सिंह ने यह फिल्म बंद नही की है. बल्कि शैलेश सिंह और उनकी लेखकीय टीम ने आपस में शादी कर चुके दो आईपीएस अफसरों की कहानी वाली इस फिल्म की पटकथा में काफी बदलाव कर दिए हैं. अब इसमें ह्यूमर को ज्यादा तवज्जो दी गयी है. इतना ही नहीं सूत्र दावा कर रहे हैं कि निर्माता ने इस फिल्म में ऐश्वर्या राय बच्चन की जगह तापसी पन्नू को लेने का मन बना लिया है. यह बहुत ही ज्यादा सशक्त किरदार है. सूत्र दावा कर रहे हैं कि उन्होंने इस फिल्म को लेकर तापसी पन्नू से बात कर ली और बहुत जल्द तापसी पन्नू को यह पटकथा सुनाई जाएगी. पर फिलहाल इस फिल्म को लेकर तापसी पन्नू चुप रहना चाहती हैं.
लंबे समय तक ‘टीसीरीज’ के साथ जुड़े रहे अजय कपूर अब स्वतंत्र रूप से फिल्म निर्माण कर रहे हैं. उन्होंने सबसे पहले जौन अब्राहम के साथ फिल्म ‘परमाणु’ का निर्माण किया. तो वहीं विशाल भारद्वाज के संग अजय कपूर निर्मित फिल्म ‘‘पटाखा’’ 28 सितंबर को प्रदर्शित होने वाली है.
अब वह ‘रोमियो अकबर वाल्टर’ के अलावा दक्षिण भारत की चर्चित फिल्म ‘‘किरिक पार्टी’’ का हिंदी रीमेक बना रहे हैं. इस फिल्म में अभिनय करने के लिए उन्होंने जैकलीन फर्नाडिश के साथ ‘सोनू के टीटू की स्वीटी’ फेम अभिनेता कार्तिक आर्यन को अनुबंधित किया है. फिल्म का निर्देशन ‘बे यार’ और ‘केवी रिते जैश’’ जैसी गुजराती भाषा की फिल्मों के निर्देशक अभिषेक जैन करेंगे.
प्रेम कहानी प्रधान इस फिल्म की चर्चा करते हुए अजय कपूर कहते हैं- ‘‘जी हॉ! ‘किरिक पार्टी’ के हिंदी रीमेक में कार्तिक आर्यन और जैकलीन फर्नाडिश होंगे. दोनों पहली बार एक साथ नजर आएंगे, इससे दर्शकों को नयापन मिलेगा.’’
मनोवैज्ञानिक रोमांचक फिल्म ‘‘गली गुलियां’’ इंसान द्वारा अपने अंदर के अंधेरे से लड़ने का रूपक है. यह संघर्ष भावनात्मक आरोप प्रत्यारोप, अकेलापन, एकता, पाप, अपराध, स्वतंत्रता व उम्मीदों का है. इस फिल्म को अब तक 27अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोहों में पुरस्कृत किया जा चुका है.
फिल्म की कहानी शुरू होती है पुरानी दिल्ली की कई गलियों में से एक गली के अंदर बने मकान से. जहां तमाम कम्प्यूटर, जो कि आसपास की गलियों व कई मकानों में चोरी से लगाए गए सीसीटीवी कैमरों से जुड़े हुए हैं के सामने बैठे पेशे से इलेक्ट्रीशियन खुद्दोस से. उलझे व तितर बितर बाल, बढ़ी दाढ़ी वाले खुद्दोस (मनोज बाजपेयी) व उसकी हरकतों को देखकर कुछ लोग उसे मनोरोगी भी समझ सकते हैं. वह कई माह तक घर से नहीं निकलता. गणेशी (रणवीर शोरी) के अलावा उसका अपना कोई दोस्त नहीं.
खुद्दोस (मनोज बाजपेयी) अपनी रहस्यमयी दुनिया में अकेलेपन की जिंदगी जी रहे हैं. वह अपने द्वारा दूसरों के घरो के अंदर या गली में लगाए गए कैमरों में उनके घरों के अंदर हो रहे घटनाक्रमों को लेकर उनकी कहानियां समझ रहा है. इस तरह अजनबियों के घरों की कहानी देखते हुए वह खुद को व्यस्त रखता है. खुद्दोस का दोस्त गणेशी (रणवीर शोरी) कई बार उसे वहां से निकलने के लिए कहता रहता है. अचानक उसे एक दिन बच्चे इदरीस (ओम सिंह) के पीटे जाने व उसके रोने की आवाजें आती हैं, तो वह विचलित हो उठता है. खुद्दोस बिना किसी सुराग के उस बालक को बचाना चाहता है, मगर उसने जितने कैमरे लगा रखे हैं, उनमें से किसी भी घर के अंदर वह बालक नहीं है. अब खुद्दोस उस बालक की तलाश शुरू करता है, जिसे उसने देखा तक नहीं है. अब उस बालक की तलाश का खुद्दोस की संघर्ष पूर्ण यात्रा शुरू होती है. पर एक मोड़ पर आकर वह कहता है- ‘‘मैं कहां खो गया हूं.’’

खुद्दोस की इस यात्रा के समांनांतर इदरीस की कहानी चलती रहती है. इदरीस के क्रूर स्वभाव के पिता लियाकत (नीरज काबी) बूचड़ खाना चलाते हैं और वह चाहते हैं कि इदरीस भी बूचड़खाने पर बैठे, पर वह नहीं बैठना चाहता. खुद्दोस गणित में तेज है और उसका दोस्त इंग्लिश में तेज है, दोनों एक दूसरे की मदद करते रहते हैं. दोनों अक्सर एक साथ दूसरों के घरों में खिड़कियों से ताक झांक करते रहते हैं. इदरीस की लापवरवाही के चलते लियाकत अक्सर उसकी पिटाई करते रहते हैं. पिता की पिटाई से तंग आकर इदरीस जब अपने पिता का पीछा करता है, तो उसे पता चलता है कि उसके पिता का एक अन्य औरत से संबंध हैं, जो कि उसकी मां सायरा (शहाना गोस्वामी) नही है. एक दिन इदरीस अपनी मां से कहता है कि हमें यह जगह छोड़कर कहीं दूर चले जाना चाहिए. पर मां तैयार नही है. एक दिन इदरीस पिता की मार का विरोध करते हुए अपने पिता पर ही हाथ उठा देता है और घर से भागकर चला जाता है. अपने दोस्त से कहकर वह अपने घर में छिपाए गए पैसे मंगवाता है. इदरीस अपने दोस्त का रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म पर इंतजार कर रहा होता है. उसका दोस्त इदरीस के पिता लियाकत के साथ पहुंचता है. अब पिता के साथ इदरीस को घर जाना पड़ता है. फिर पिटाई होती है, पर भावनाओं में बहकर इदरीस अपनी मां से वादा करता है कि वह उन्हें व इस घर को छोड़कर कभी नहीं जाएगा. पर उसका गुस्सा कम नही हुआ है. रात में वह अपने पिता की हत्या कर देता है.

जब फिल्म का अंत होता है, तो वह दर्शकों को सोचने पर मजबूर कर देती है. पुरानी दिल्ली की संकरी व भूल भुलैय्या वाली गलियों में रहने को बेबस, मानसिक संकीर्णता व पूर्वाग्रह से ग्रसित एकाकी जीवन जी रहे इंसान के इर्द गिर्द सिनेमा का निर्माण करना हिम्मत व जुनून ही कहा जाएगा और इस जुनूनी व हिम्मती काम के लिए फिल्मकार दीपेश जैन तथा अभिनेता मनोज बाजपेयी बधाई के पात्र हैं.
कहानी व पटकथा के स्तर पर दीपेश जैन ने काफी प्रशंसनीय काम किया है. फिल्म में मनोवैज्ञानिक अलगाव के साथ पालकों का अपने बच्चों के साथ खंडित होते रिश्ते पर भी रोशनी डाली गयी है, जो कि वर्तमान परिस्थितियों में चिंता का विषय है. फिल्म इस बात को भी रेखांकित करती है कि किस तरह माता पिता अपने बच्चों को अपना अनुकरण करने के लिए बाध्य करते हुए अपने अंदर के रहस्य व अपराध जाने अनजाने उनमें भी भर देते हैं.
कथानक के स्तर पर रोजमर्रा की पिटाई का बाल मस्तिष्क पर जो असर दिखाया गया है, वह काफी विचलित करने के साथ ही सोचने पर मजबूर करती है. अति डार्क मनोवैज्ञानिक फिल्म ‘‘गली गुलियां’’ विचलित जरुर करती है, पर इस तरह की कहानी कही जानी चाहिए.
इस अति डार्क फिल्म में आशा की किरण तो शहाना गोस्वामी का किरदार सायरा ही है. सायरा ने हालात से समझौता कर लिया है, पर उसे अपने बच्चों को लेकर काफी उम्मीदें हैं. इस मनोवैज्ञानिक फिल्म की कहानी ऐसे इंसान की है,जिसकी आत्मा दुर्व्यवहार और त्रासदी की जड़ों से गहराई के साथ जुड़ी हुई है. अफसोस एडीटिंग कमी के कमियों के चलते कई दृश्यों व विचारों का दोहराव फिल्म को कई जगह कमजोर करते हैं.
मगर यह फिल्म उन दर्शकों के लिए नहीं है, जिन्हे सपाट कहानी व नाच गाने की दरकार होती है. मनोरंजन की आस लेकर जाने वालों के लिए भी यह फिल्म नहीं है. यह अति डार्क फिल्म है. यूं कहें कि यह फिल्म आम दर्शकों के लिए नहीं है, तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी. यह फिल्म फिल्म समाराहों में फिल्म देखने के शौकीनों को ही पसंद आ सकती है.
जहां तक अभिनय का सवाल है, तो खुद्दोस का किरदार काफी जटिल है. यह किरदार शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक और मनोवैज्ञानिक स्तर पर काफी फंसा हुआ जटिल व कठिन किरदार है. इस किरदार को निभाने के लिए मनोज बाजपेयी की जितनी प्रशंसा की जाए, उतनी कम है. खुद्दोस को अभिनय से साकार करने वाले अभिनेता मनोज बाजपेयी के करियर का यह अति जटिल व कठिन किरदार रहा, जिसे निभाते हुए उन्होंने शानदार अभिनय किया है. खुद्दोस की बौडी लैंगवेज, उसकी बारीकियों को पेश कर मनोज बाजपेयी काफी प्रभावित करते हैं. कम संवादों के बावजूद अपने हाव भाव व चाल से वह दर्शकों से काफी कुछ कह जाते हैं.
इदरीस के किरदार में बाल कलाकार ओम सिंह ने जबरदस्त अभिनय किया है. एक भी दृश्य में वह इस बात का अहसास नहीं होने देता कि यह उसकी पहली फिल्म है. उसमें एक मंजे हुए अभिनेता की तरह अपने किरदार को निभाया है. रणवीर शोरी की प्रतिभा को जाया किया गया है. नीरज काबी और शहाना गोस्वामी ने भी बेहतरीन अभिनय किया है.
कैमरामैन ने अपने काम को काफी अच्छे ढंग से अंजाम दिया है. एक घंटे 54 मिनट की अवधि वाली फिल्म ‘‘गली गुलियां’’ का निर्माण दिपेश जैन व सुचि जैन ने किया है. लेखक व निर्देशक दीपेश जैन, संगीतकार दना नियू, कैमरामैन कई मैडेनड्राप और कलाकार हैं- मनोज बाजपेयी, बाल कलाकार ओम सिंह, नीरज काबी, रणवीर शोरी, शहाना गोस्वामी व अन्य.
वक्त वक्त की बात है. वक्त कब बदल जाए, कहा नही जा सकता. एक वक्त वह था जब एक फिल्मकार ने तापसी पन्नू को अपनी फिल्म से जोड़ने से यह कह कर मना कर दिया था कि वह ‘मार्केटेबल’नहीं हैं. पर अब वक्त बदल चुका है. अब बौलीवुड में उन्हें एक सफल अदाकारा माना जाता है. अब ‘पिंक’के बाद अमिताभ बच्चन के साथ दूसरी फिल्म ‘बदला’कर रही अदाकारा तापसी पन्नू के साथ हर कलाकार व फिल्मकार काम करने को आतुर है.
हाल ही में जब तापसी पन्नू से हमारी मुलाकात हुई, तो पता चला कि तापसी पन्नू को वह वक्त याद है, जब एक निर्माता ने यह कहकर उन्हें अपनी फिल्म में नहीं लिया था कि वह ‘‘मार्केटेबल नहीं हैं’. उस फिल्मकार को याद करते हुए वह खुद कहती हैं- ‘‘उसके बाद मैं कभी उस फिल्मकार से नहीं मिली. भविष्य में उससे मुलाकात होगी या नहीं, यह नहीं जानती. मगर मैं उम्मीद करती हूं कि मैं मार्केटेबल हो गयी हूं. आपको जानकर अचरज होगा कि फिल्म ‘मुल्क’ बनाते समय भी लोग कंफ्यूज थे कि मैं मार्केटेबल हूं या नहीं. अनुभव सिन्हा को लग रहा था कि इसमें अभिनय क्षमता है और यह अपना किरदार निभा लेगी. पर लोगों को मेरे फिल्म के चयन पर सौ प्रतिशत भरोसा नहीं था. पर अब मुझ पर भरोसा बढ़ गया. मैं चाहती हूं कि हर फिल्मकार को लगे कि मैं अच्छा काम कर सकती हूं. मेरे करियर का मकसद यही है कि जिस दिन दर्शक तापसी पन्नू के नाम पर फिल्म की टिकट खरीदेगी, उसी दिन मेरी सफलता होगी. उसी दिन मैं खुद को स्टार मान लूंगी. मैं यह नहीं मानती कि मुझे लगातार फिल्में मिलती जाएंगी. मुझे अभी भी संघर्ष करना पड़ेगा. मैं हर दिन भगवान से यही मनाती हूं कि मुझे हर दिन अच्छी फिल्में मिलती रहें और हर फिल्म सफल होती रहे. एक फिल्म के असफल होते ही मामला बिगड़ जाता है. अभी भी मुझे इस बात का डर है. ‘पिंक’के बाद मेरे प्रति दर्शकों की सोच भी बदली है. पर उससे पहले तो किसी को कोई फर्क नहीं पड़ रहा था कि मैं क्या कर रही हूं क्या नहीं? पर अभी भी लोग मेरे नाम पर अंधे होकर पैसा नहीं लगाएंगे.’’
पर वह स्थिति कब आएगी कि जब लोग अंधे होकर आपके उपर पैसे लगाएं? इस पर तापसी ने कहा- ‘‘उसके लिए स्टारडम पाना जरूरी है. फिल्म को अच्छी ओपनिंग मिलना जरुरी है. फिल्म की ओपनिंग के नंबर तय करते हैं कि आप स्टार हैं या नहीं. आप बिकाउ हैं या नहीं. मैं मानती हूं कि वर्तमान समय में पागलपन वाला स्टारडम किसी भी कलाकार के पास नहीं है. पर अभी भी कुछ कलाकारों को स्टारडम मिली हुई है. देखिए, कुछ फिल्में ट्रेलर के आधार पर लोग देखना पसंद करते हैं. तो कुछ फिल्मों को दर्शक कलाकार या निर्देशक के नाम पर यकीन करके देखने जाते हैं. मैं भी फिल्म देखने का निर्णय किसी निर्देशक या कलाकार के नाम पर ही करती हूं.’’
हाल ही में आतिफ असलम ने अपकमिंग फिल्म ‘मित्रों’ के एक गाने में अपनी आवाजा दी है. यह गाना फिल्म ‘पाकीजा’ से सदाबहार गीत ‘चलते-चलते’ का है, जिसका असल ट्रैक पुराने जमाने की बड़ी अदाकारा रहीं मीना कुमारी पर फिल्माया गया था. गाने के बोल कैफी आजमी ने दिए थे. अब इसे रीमेक कर दर्शकों के सामने एक बार फिर से परोसा गया है. इस गाने के कवर वर्जन के लिए लिरिक्स और म्यूजिक दोनों तनिष्क बाग्ची ने दिए हैं. इस गाने को दर्शकों की मिली जुली प्रतिक्रिया मिल रही है. कई लोगों को यह गाना पसंद आया तो कई ने इसे सिरे से नाकारा है.
ऐसे में महान गायिका लता मंगेश्कर से जब इस गाने पर रिएक्शन मांगा गया तो उन्होंने कहा कि उन्होंने ये गाना अभी तक नहीं सुना है. लता जी कहती हैं, ‘और मैं सुनना भी नहीं चाहती. आज कल जो पुराने गानों को नया बना कर चलाने का रिवाज है वह गाने मुझे बेहद दुखी करते हैं. अब क्रिएटीविटी कहां हैं? गानों में वह सादगी कहां हैं. मैंने हमेशा सुना है कि रीमिक्स गानों में लिरिक्स बदल दिए जाते हैं. पर किसकी सहमति से?’ लता मंगेश्कर आगे कहती हैं, ‘ओरिजनल कंपोजर और कवियों ने वह लिखा जो उनके पास था. किसी को अधिकार नहीं है कि वह उसे बदले. उसकी क्रिएटीविटी को बदले.
बॉलीवुड में अब तक पुराने गानों की तर्ज पर कई सुपरहिट गानों को रीमेक किया गया है. हाल ही में फिल्म ‘सत्यमेव जयते’ में गाना ‘दिलबर-दिलबर’ सामने आया था. यह गाना फिल्म ‘सिर्फ तुम’ का था जिसे अल्का याज्ञनिक ने अपनी आवाज दी थी. नए ‘दिलबर दिलबर’ गाने के सामने आने के बाद सिंगर अल्का से जब गाने पर रिएक्शन मांगा गया, तो उन्होंने कहा था, ‘वह नया गाना क्यों नहीं बना सकते. वह एक नया सुपरहिट गाना बना कर हिट क्यों नहीं कर सकते? बजाय कि पुराना गाना जो कि पहले से ही हिट है उसे दोबारा हिट कराने की क्या आवश्यकता. उसे दोबारा कुछ भी बना कर रिलीज करना और कहना कि देखो- गाना कितना पौपुलर हो गया है. अजब है.’
‘राहुल गांधी कभी प्रधानमंत्री नहीं बन सकते क्योंकि वे अपने पिता राजीव गांधी से ज्यादा विदेशी मूल की अपनी मां सोनिया गांधी की तरह दिखते हैं.’
यह बयान इस दफा किसी भाजपाई ने नहीं, बल्कि बहुजन समाज पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष जयप्रकाश सिंह ने दिया था. यह बयान हैरान कर देने वाला इस लिहाज से था कि नैशनल लैवल पर कांग्रेस और बसपा महागठबंधन और सीटों के तालमेल की बात कर रही हैं और बसपा के एक जिम्मेदार नेता राहुल गांधी और सोनिया गांधी के खिलाफ भाजपाइयों सरीखी बयानबाजी कर रहे हैं.
इस से पहले कि जयप्रकाश सिंह का बयान कोई सियासी गुल खिला पाता, बसपा सुप्रीमो मायावती ने उन्हें तुरंत ही पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा कर यह साफ कर दिया कि कांग्रेस और सोनिया व राहुल गांधी के खिलाफ ऐसी कोई बयानबाजी बरदाश्त नहीं की जाएगी, जिस से इस गठबंधन पर फर्क पड़े.
मायावती की नजरें सिर्फ 2019 के लोकसभा चुनाव पर ही नहीं हैं, बल्कि इस साल के आखिरी में होने जा रहे 3 अहम राज्यों के विधानसभा चुनावों पर भी हैं, जहां भाजपा का सफाया करने में वे कांग्रेस से हाथ मिलाने का इशारा कर चुकी हैं. इस बाबत दोनों दलों में 2 दौर की बातचीत भी हो चुकी है.
मध्य प्रदेश पर ज्यादा जोर
उत्तर प्रदेश से बाहर अगर किसी राज्य में बसपा की जड़ें आज भी गहरे तक जमी हैं, तो वह मध्य प्रदेश है जहां साल 2013 के विधानसभा चुनाव में बसपा 4 सीटें ले गई थी और 11 सीटों पर दूसरे नंबर पर रही थी. इस के अलावा तकरीबन 30 सीटों पर उस ने 10 फीसदी के आसपास वोट हासिल कर भाजपा की जीत आसान कर दी थी.
जैसे ही कर्नाटक के नतीजों के बाद सोनिया गांधी और मायावती बेंगलुरु में बिछड़ी बहनों की तरह गले मिली थीं उस से साफ हो गया था कि अब वे दोनों मिल कर चुनाव लड़ेंगी.
यह बात उत्तर प्रदेश के गोरखपुर, फूलपुर और बाद में कैराना लोकसभा के चुनावी नतीजों से जाहिर भी हो गई थी कि अगर विपक्ष एकजुट हो कर लड़े तभी भाजपा की मुश्कें कसी जा सकती हैं, नहीं तो उसे वोटों के बंटवारे का खमियाजा भुगतने के लिए तैयार रहना चाहिए.
मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में बसपा खासा वोट और सीटें ले जाती रही है. मध्य प्रदेश के चंबल और विंध्य इलाके उस के मजबूत गढ़ हैं. इन इलाकों की दलित बहुल सीटों पर थोक में हाथी के निशान पर वोट पड़ते हैं.
2013 के विधानसभा चुनाव में मध्य प्रदेश में कांग्रेस को 36.38 और बसपा को 6.29 फीसदी वोट मिले थे जबकि भाजपा ने 44.87 फीसदी वोट हथियाए थे. अब हालात बदले हैं. राज्य में सत्ता विरोधी लहर है और खुद दलित समुदाय चाहता है कि बसपा और कांग्रेस मिल कर चुनाव लड़ें. इस के लिए चाहे वे गठबंधन करें या फिर कुछ सीटों पर तालमेल करें.
यह ऊंची जाति वालों के कहर और दबदबे से हैरानपरेशान दलितों का ही दबाव है कि मायावती को कांग्रेस और कांग्रेस को मायावती की तरफ बढ़ने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है.
इस जुगलबंदी से बौखलाई भाजपा को अभी समझ नहीं आ रहा है कि वह इस दूध में कैसे नीबू निचोड़े जिस से दोनों के बीच खटास पैदा हो. गाय के इस दूध का दही जमाने के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में भी लगातार सोचविचार हो रहा है और भाजपा आलाकमान भी कांग्रेस और बसपा की मेलमुलाकातों पर नजर रखे हुए है.
मध्य प्रदेश में बात सीटों पर अटकी हुई है. बसपा चाहती है कि उस के हिस्से में वे सभी 40 सीटें आएं जिन पर वह अब तक अलगअलग चुनावों में ही सही जीती है. यह आंकड़ा कांग्रेस को ज्यादा लग रहा है. वजह, इन में से कई सीटों पर बसपा अपना असर खो चुकी है. मौजूदा 4 विधायकों वाली सीटों और साल 2013 में 11 सीटों पर दूसरे नंबर पर रही बसपा को 15 सीटें देने में उसे कोई नुकसान नहीं दिख रहा लेकिन बाकी 25 सीटों पर दावेदारी उस से छोड़ी नहीं जा रही है.
हर कोई यह मान कर चल रहा है कि चूंकि बसपा और कांग्रेस हाथ मिलाने का मन बना चुकी हैं इसलिए बसपा 25 से ले कर 30 सीटों पर राजी हो जाएगी.
कांग्रेस की मंशा यह है कि सब से बड़ा विपक्षी दल होने के नाते वह 230 विधानसभा सीटों वाले मध्य प्रदेश में 200 से ज्यादा सीटों पर चुनाव लड़े और अपने दम पर बहुमत की 115 सीटों पर जीत हासिल करे. इतनी सीटें अगर नहीं मिलती हैं तो वह बसपा के जीते उम्मीदवारों की मदद से सरकार बना सकती है.
बसपा भी यही सोच रही है कि अगर 25-30 सीटों पर दमदार तरीके से चुनाव से लड़ा जाए तो पिछले तमाम रिकौर्ड तोड़ते हुए 15 के लगभग सीटें हासिल करते हुए सत्ता में भागीदारी हासिल की जा सकती है. यह गुणाभाग बसपा सुप्रीमो मायावती और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ को भी समझ आ रहा है. लिहाजा यह तो तय है कि वे साथ मिल कर भाजपा से लड़ेंगे, इस बाबत 2-4 सीटें दोनों दल कुरबान करने को तैयार हैं.
गठबंधन या तालमेल में इन दोनों पार्टियों को ही फायदा नजर आ रहा है जिस की अपनी अहम वजहें भी हैं.
230 में से तकरीबन 80 सीटों पर बसपा 10 हजार तक वोट ले जाती है जिन का समझौते के बाद कांग्रेस के खाते में जाना तय माना जा रहा है.
मुमकिन है कि मध्य प्रदेश में भी वोट शिफ्टिंग का फार्मूला अपनाया जाए जो उत्तर प्रदेश लोकसभा चुनावों में काफी कारगर साबित हुआ था. इस बाबत दोनों ही पार्टियों के रणनीतिकार हिसाबकिताब लगा रहे हैं कि इस में कोई जोखिम तो नहीं और भाजपा इस हालत में क्या करेगी. वजह, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश की सियासत में जमीनआसमान का फर्क है. पिछड़े वोटों पर वोट शिफ्टिंग का असर नहीं पड़ेगा क्योंकि मध्य प्रदेश में अगड़ों के बाद भाजपा का तगड़ा वोट बैंक पिछड़ों का ही है.
ये भी हैं तैयार
अकेली बसपा ही नहीं, बल्कि सपा समेत भाजपा विरोधी तमाम छोटे दल भी कांग्रेस का साथ देने के लिए तैयार हो रहे हैं तो इस के अपने अलग माने हैं. सपा मुखिया अखिलेश यादव 19 जुलाई, 2018 को भोपाल आए और साफ किया कि वे गठबंधन के लिए तैयार हैं और कमलनाथ से उन के अच्छे ताल्लुकात हैं.
हालांकि सपा का कोई खास वोट बैंक अब मध्य प्रदेश में नहीं रहा है लेकिन बुंदेलखंड इलाके की यादव बहुल 6 सीटों पर वह मजबूत है. मुमकिन है कि गठबंधन का ऐलान होतेहोते कांग्रेस 2-4 सीटें सपा को भी देने के लिए तैयार हो जाए.
ग्वालियरचंबल संभाग में जमीन तैयार कर चुका बहुजन संघर्ष दल भी कांग्रेस की छतरी के नीचे आने के लिए बेताब है. इस पार्टी के अध्यक्ष फूलसिंह बरैया ने भोपाल की एक बड़ी रैली में कहा था कि वे भाजपा के सफाए के लिए कांग्रेस से समझौता करने के लिए तैयार हैं.
प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ गठबंधन और तालमेल के मसले पर फूंकफूंक कर अपने कदम रख रहे हैं. आदिवासियों की पार्टी गोंंडवाना गणतंत्र पार्टी को भी वे 2-4 सीटें दे सकते हैं.
हालात छत्तीसगढ़ के
गोंडवाना गणतंत्र पार्टी का असर छत्तीसगढ़ की भी चुनिंदा सीटों पर है. यहां भी कांग्रेस उस से सौदेबाजी कर सकती है. इस के पीछे उस का मकसद पूर्व कांग्रेसी मुख्यमंत्री अजीत जोगी की पार्टी जनता कांग्रेस को पछाड़ना होगा.
छत्तीसगढ़ में बसपा भी कुछ सीटों पर मजबूत है. 2013 के विधानसभा चुनाव में उस ने एक सीट जीती थी और तकरीबन 4.5 फीसदी वोट हासिल किए थे. 10 सीटों पर तगड़े वोटों के साथ वह तीसरे नंबर पर रही थी. मायावती तीनोें राज्यों में तालमेल इसीलिए चाहती हैं कि मध्य प्रदेश में कुछ ढील दे कर छत्तीसगढ़ में ज्यादा सीटें हासिल कर सकें. बसपा यहां 90 में से 10 सीटें चाह रही है जबकि कांग्रेस 6 से ज्यादा सीटें देने के लिए तैयार नहीं है.
गौरतलब है कि बसपा के संस्थापक कांशीराम ने अपनी चुनावी राजनीति की शुरुआत इसी राज्य की जांजगीर सीट से की थी.
छत्तीसगढ़ के बिलासपुर संभाग में बसपा मजबूत हालत में है और यहां की 8 सीटों पर वह 10 हजार से ज्यादा वोट ले कर भाजपा की राह आसान करती रही है. साल 2013 के चुनावी नतीजे साफ बताते हैं कि अगर वह चुनाव बसपा और कांग्रेस ने मिल कर लड़ा होता तो इस गठबंधन को 51 सीटें मिलतीं जिन में 39 सीटें कांग्रेस पार्टी की और 12 सीटें बसपा की होतीं.
मुश्किल में भाजपा
मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह चौहान और छत्तीसगढ़ में रमन सिंह की नींद कांग्रेसबसपा के गठजोड़ को ले कर उड़ी हुई है. जन आशीर्वाद यात्रा के दौरान शिवराज सिंह चौहान अपनी तकलीफ यह कहते हुए कम कर कहते हैं कि जो भी दल कांग्रेस से गठबंधन करता है वह मिट जाता है.
दरअसल, शिवराज सिंह चौहान बसपा के कार्यकर्ताओं को भड़काने का काम कर रहे हैं लेकिन बसपा इस बात से बेफिक्र है क्योंकि पार्टी में मायावती का दबदबा किसी सुबूत का मुहताज नहीं है.
रमन सिंह को भी समझ आ रहा है कि अगर यह गठबंधन हुआ तो भाजपा को 35 सीटों का आंकड़ा छूने में पसीने छूट जाने हैं. राज्य की 8 सीटों पर बसपा 10 हजार से 30 हजार तक वोट ले जाती है जिस से भाजपा का उम्मीदवार आसानी से जीत जाता है. लेकिन इस दफा ऐसा होता नहीं दिखाई दे रहा है.
दूसरी तरफ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की चिंता विधानसभा चुनाव के बाद लोकसभा चुनाव की भी है. अगर बसपाकांग्रेस गठबंधन कायम रहा तो साफ दिख रहा है कि बसपा को मध्य प्रदेश में 4 सीटें रीवां, सतना, भिंड और मुरैना की मिल सकती हैं. इन सीटों पर उसे हर चुनाव में खासा वोट मिलते रहे हैं और 1-1 दफा उस के उम्मीदवार जीते भी हैं.
यही हाल छत्तीसगढ़ में जांजगीर और बिलासपुर सीटों का है जिन पर कांग्रेस अगर बसपा का साथ दे तो भाजपा की जीत मुश्किल हो जाएगी. इस सौदे के एवज में कांग्रेस को मध्य प्रदेश में 25 और छत्तीसगढ़ में 7 लोकसभा सीटों पर बसपा के वोट मिलने से भाजपा की मुश्किलें और बढ़ जाएंगी.