घातक निकली बीवी नंबर 2

3 जुलाई, 2018 की बात है. शाम 6 बजे थाना सजेती का मुंशी अजय पाल रजिस्टर पर दस्तखत कराने थाना परिसर स्थित दरोगा पच्चालाल गौतम के आवास पर पहुंचा. दरोगाजी के कमरे का दरवाजा बंद था, लेकिन कूलर चल रहा था. अजय पाल ने सोचा कि दरोगाजी शायद सो रहे होंगे. यही सोचते हुए उस ने बाहर से ही आवाज लगाई, ‘‘दरोगाजी…दरोगाजी.’’

अंदर से कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई तो उस ने दरवाजे को अंदर की ओर धकेला. दरवाजा अंदर से बंद नहीं था, हलके दबाव से ही खुल गया. अजय पाल ने कमरे के अंदर पैर रखा तो उस के मुंह से चीख निकल गई. कमरे के अंदर दरोगा पच्चालाल की लाश पड़ी थी. किसी ने उन की हत्या कर दी थी.

बदहवास सा मुंशी अजय पाल थाना कार्यालय में आया और उस ने यह जानकारी अन्य पुलिसकर्मियों को दी. यह खबर सुनते ही थाना सजेती में हड़कंप मच गया. घबराए अजय पाल की सांसें दुरुस्त हुईं तो उस ने वायरलैस पर दरोगा पच्चालाल गौतम की थाना परिसर में हत्या किए जाने की जानकारी कंट्रोल रूम को और वरिष्ठ अधिकारियों को दे दी.

सूचना पाते ही एसपी (ग्रामीण) प्रद्युम्न सिंह, एसपी (क्राइम) राजेश कुमार यादव, सीओ आर.के. चतुर्वेदी, इंसपेक्टर दिलीप बिंद तथा देवेंद्र कुमार दुबे थाना सजेती पहुंच गए. पुलिस अधिकारी पच्चालाल के कमरे में पहुंचे तो वहां का दृश्य देख सिहर उठे.

कमरे के अंदर फर्श पर 58 वर्षीय दरोगा पच्चालाल गौतम की खून से सनी लाश पड़ी थी. अंडरवियर के अलावा उन के शरीर पर कोई कपड़ा नहीं था. खून से सना चाकू लाश के पास पड़ा था. खून से सना एक तौलिया बैड पर पड़ा था. हत्यारों ने दरोगा पच्चालाल का कत्ल बड़ी बेरहमी से किया था.

पच्चालाल की गरदन, सिर, छाती व पेट पर चाकू से ताबड़तोड़ वार किए गए थे. आंतों के टुकड़े कमरे में फैले थे और दीवारों पर खून के छींटे थे. दरोगा पच्चालाल के शरीर के घाव बता रहे थे कि हत्यारों के मन में उन के प्रति गहरी नफरत थी और वह दरोगा की मौत को ले कर आश्वस्त हो जाना चाहते थे. बैड से ले कर कमरे तक खून ही खून फैला था.

छींटों के अलावा दीवार पर खून से सने हाथों के पंजे के निशान भी थे. इन निशानों में अंगूठे का निशान नहीं था. घटनास्थल को देख कर ऐसा लग रहा था, जैसे दरोगा पच्चालाल गौतम ने हत्यारों से अंतिम सांस तक संघर्ष किया हो.

पुलिस अधिकारी घटनास्थल का निरीक्षण कर ही रहे थे कि आईजी आलोक सिंह तथा एसएसपी अखिलेश कुमार भी थाना सजेती आ गए. वह अपने साथ फोरैंसिक टीम और डौग स्क्वायड को लाए थे. दोनों पुलिस अधिकारियों ने घटनास्थल का निरीक्षण किया तो उन के माथे पर बल पड़ गए.

बेरहमी से किए गए इस कत्ल को अधिकारियों ने गंभीरता से लिया. फोरैंसिक टीम ने चाकू और कमरे की दीवार से फिंगरप्रिंट उठाए. डौग स्क्वायड ने घटनास्थल पर डौग को छोड़ा. डौग लाश व कमरे की कई जगहों को सूंघ कर हाइवे तक गया और वापस लौट आया. वह ऐसी कोई हेल्प नहीं कर सका, जिस से हत्यारे का कोई सूत्र मिलता.

कारण नहीं मिल रहा था बेरहमी से किए गए कत्ल का

मृतक पच्चालाल के आवास की तलाशी ली गई तो पता चला, हत्यारे उन का पर्स, घड़ी व मोबाइल साथ ले गए थे. किचन में रखे फ्रिज में अंडे व सब्जी रखी थी. कमरे में शराब व ग्लास आदि नहीं मिले, जिस से स्पष्ट हुआ कि हत्या से पहले कमरे में बैठ कर शराब नहीं पी गई थी.

अनुमान लगाया गया कि हत्यारा दरोगा पच्चालाल का बेहद करीबी रहा होगा, जिस से वह आसानी से आवास में दाखिल हो गया और बाद में उस ने अपने साथियों को भी बुला लिया.

आईजी आलोक सिंह तथा एसएसपी अखिलेश कुमार यह सोच कर चकित थे कि थाना कार्यालय से महज 20 मीटर की दूरी पर दरोगा पच्चालाल का आवास था. कमरे में चाकू से गोद कर उन की निर्दयतापूर्वक हत्या कर दी गई और उन की चीखें थाने के किसी पुलिसकर्मी ने नहीं सुनीं, इस से पुलिसकर्मी भी संदेह के घेरे में थे.

लेकिन इस में यह बात भी शामिल थी कि दरोगा पच्चालाल गौतम के आवास में 2 दरवाजे थे. एक दरवाजा थाना परिसर की ओर खुलता था, जबकि दूसरा हाइवे के निकट के खेतों की ओर खुलता था. पता चला कि पच्चालाल के करीबी लोगों का आनाजाना हाइवे की तरफ खुलने वाले दरवाजे से ज्यादा होता था. हाइवे पर ट्रकों की धमाचौकड़ी मची रहती थी, जिस की तेज आवाज कमरे में भी गूंजती थी. संभव है, दरोगा की चीखें ट्रकों और कूलर की आवाज में दब कर रह गई हो और किसी पुलिसकर्मी को सुनाई न दी हो.

एसएसपी अखिलेश कुमार ने थाना सजेती के पुलिसकर्मियों से पूछताछ की तो पता चला कि दरोगा पच्चालाल गौतम मूलरूप से सीतापुर जिले के थाना मानपुरा क्षेत्र के रामकुंड के रहने वाले थे.

उन्होंने 2 शादियां की थीं. पहली पत्नी कुंती की मौत के बाद उन्होंने किरन नाम की युवती से प्रेम विवाह किया था. पहली पत्नी के बच्चे रामकुंड में रहते थे, जबकि दूसरी पत्नी किरन कानपुर शहर में सूर्यविहार (नवाबगंज) में अपने बच्चों के साथ रहती थी.

पारिवारिक जानकारी मिलते ही एसएसपी अखिलेश कुमार ने दरोगा पच्चालाल की हत्या की खबर उन के घर वालों को भिजवा दी. खबर मिलते ही दरोगा की पत्नी किरन थाना सजेती पहुंच गई. पति की क्षतविक्षत लाश देख कर वह दहाड़ मार कर रोने लगी. महिला पुलिसकर्मियों ने उसे सांत्वना दे कर शव से अलग किया.

कुछ देर बाद दरोगा के बेटे सत्येंद्र, महेंद्र, जितेंद्र व कमल भी आ गए. पिता का शव देख कर वे भी रोने लगे. पुलिसकर्मियों ने उन्हें धैर्य बंधाया और पंचनामा भर कर शव पोस्टमार्टम के लिए लाला लाजपतराय चिकित्सालय भेज दिया. आलाकत्ल चाकू को परीक्षण हेतु सील कर के रख लिया गया.

4 जुलाई, 2018 को मृतक पच्चालाल के शव का पोस्टमार्टम हुआ. पोस्टमार्टम के बाद शव को पुलिस लाइन लाया गया, जहां एसएसपी अखिलेश कुमार, एसपी (ग्रामीण) प्रद्युम्न सिह व अन्य पुलिस अधिकारियों ने उन्हें सलामी दे कर अंतिम विदाई दी.

इंसपेक्टर देवेंद्र कुमार, दिलीप बिंद व सजेती थाने के पुलिसकर्मियों ने पच्चालाल के शव को कंधा दिया. इस के बाद पच्चालाल के चारों बेटे शव को अपने पैतृक गांव  रामकुंड, सीतापुर ले गए, जहां बड़े बेटे सत्येंद्र ने पिता की चिता को मुखाग्नि दे कर अंतिम संस्कार किया. अंतिम संस्कार में किरन व उस के बच्चे शामिल नहीं हुए.

दरोगा पच्चालाल की हत्या की खबर कानपुर से लखनऊ तक फैल गई थी. यह बात एडीजे अविनाश चंद्र के संज्ञान में भी थी. इसी के मद्देनजर एसएसपी अखिलेश कुमार ने दरोगा हत्याकांड को बेहद गंभीरता से लिया और इस के खुलासे के लिए एक विशेष पुलिस टीम गठित की.

जांच के लिए बनी स्पैशल टीम

इस टीम में उन्होंने क्राइम ब्रांच और सर्विलांस सेल तथा एसएसपी की स्वान टीम के तेजतर्रार व भरोसेमंद पुलिसकर्मियों को शामिल किया. क्राइम ब्रांच से सुनील लांबा तथा एसओजी से राजेश कुमार रावत, सर्विलांस सेल से शिवराम सिंह, राहुल पांडे, सिपाही बृजेश कुमार, मोहम्मद आरिफ, हरिशंकर और सीमा देवी तथा एसएसपी स्वान टीम से संदीप कुमार, राजेश रावत तथा प्रदीप कुमार को शामिल किया गया.

इस के अलावा वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों के बेहतरीन जासूस कहे जाने वाले 3 इंसपेक्टरों देवेंद्र कुमार दुबे, दिलीप बिंद, मनोज रघुवंशी तथा सीओ (घाटमपुर) आर.के. चतुर्वेदी को शामिल किया गया.

पुलिस टीम ने सब से पहले घटनास्थल का बारीकी से निरीक्षण किया. साथ ही पोस्टमार्टम रिपोर्ट का भी अध्ययन किया. रिपोर्ट में पच्चालाल के शरीर पर 19 गहरे जख्म बताए गए थे जो सिर, गरदन, छाती, पेट व हाथों पर थे. इस टीम ने उन मामलों को भी खंगाला, जिन की जांच पच्चालाल ने की थी. लेकिन ऐसा कोई मामला नहीं मिला, जिस से इस हत्या को जोड़ा जा सकता. इस से साफ हो गया कि क्षेत्र के किसी अपराधी ने उन की हत्या नहीं की थी.

पुलिस टीम ने थाना सजेती में लगे सीसीटीवी फुटेज भी देखे, मगर उस में दरोगा के आवास में कोई भी आतेजाते नहीं दिखा. इस का मतलब हत्यारे पिछले दरवाजे से ही आए थे और हत्या को अंजाम दे कर उसी दरवाजे से चले गए.

टीम ने कुछ दुकानदारों से पूछताछ की तो शराब के ठेके के पास नमकीन बेचने वाले दुकानदार अवधेश ने बताया कि 2 जुलाई को देर शाम उस ने दरोगा पच्चालाल के साथ सांवले रंग के एक युवक को देखा था. उस युवक के साथ दरोगाजी ने ठेके से अंगरेजी शराब की बोतल खरीदी थी. साथ ही उस की दुकान से नमकीन का पैकेट भी लिया था.

पैसे दरोगाजी ने ही दिए थे. अवधेश ने बताया कि ऐसा पहली बार हुआ था, जब दरोगाजी ने पैसे दिए थे. इस के पहले दरोगाजी के साथ वाला व्यक्ति ही पैसे देता था. युवक की बातचीत से लगता था कि वह दरोगाजी का बेहद करीबी है.

दुकानदार अवधेश ने जो बताया, उस से साफ हो गया कि दरोगा पच्चालाल के साथ जो युवक था, वह उन का काफी करीबी था. इस जानकारी के बाद टीम ने दरोगा के खास करीबियों पर ध्यान केंद्रित किया. इस में उस की पत्नी किरन, दरोगा के 4 बेटे और कुछ अन्य लोग शामिल थे. पच्चालाल के बेटों से पूछताछ करने पुलिस टीम रामकुंड, सीतापुर पहुंची.

पूछताछ में सत्येंद्र, महेंद्र, जितेंद्र व कमल ने बताया कि उन के पिता का न तो किसी से विवाद था और न ही जमीनजायदाद का कोई झगड़ा था. सौतेली मां किरन से भी जमीन या मकान के बंटवारे पर कोई विवाद नहीं था. सौतेली मां किरन अपने बच्चों के साथ कानपुर में रहती थी.

पच्चालाल दोनों परिवारों का अच्छी तरह पालनपोषण कर रहे थे. चारों बेटों को उन्होंने कभी किसी चीज की कमी नहीं होने दी थी. सत्येंद्र ने यह भी बताया कि 6 महीने पहले पिता ने उस की शादी धूमधाम से की थी.

शादी में सौतेली मां किरन भी खुशीखुशी शामिल हुई थीं. शादीबारात की सारी जिम्मेदारी उन्होंने ही उठाई थी. शादी में बहू के जेवर, कपड़ा व अन्य सामान पिता के सहयोग से उन्होंने ही खरीदा था. किरन से उन लोगों का कोई विवाद नहीं था.

जितेंद्र और किरन आए संदेह के घेरे में

मृतक दरोगा पच्चालाल के बेटों से पूछताछ कर पुलिस टीम कानपुर लौट आई. इस के बाद यह टीम थाना नवाबगंज के सूर्यविहार पहुंची, जहां दरोगा की दूसरी पत्नी किरन किराए के मकान में रहती थी. पुलिस को देख कर किरन रोनेपीटने लगी. पुलिस ने उसे सांत्वना दी. बाद में उस ने बताया कि दरोगा पच्चालाल ने उस से तब प्रेम विवाह किया था, जब वह बेनीगंज थाने में तैनात थे. दरोगा से किरन को 3 संतानें हुई थीं, एक बेटा व 2 बेटियां.

किरन रो जरूर रही थी, लेकिन उस की आंखों से एक भी आंसू नहीं टपक रहा था. उस के रंग, ढंग और पहनावे से ऐसा नहीं लगता था कि उस के पति की हत्या हो गई है. घर में किसी खास के आनेजाने के संबंध में पूछने पर वह साफ मुकर गई. लेकिन पुलिस टीम ने जब किरन के बच्चों से पूछताछ की तो उन्होंने बताया कि जितेंद्र अंकल घर आतेजाते हैं, जो पापा के दोस्त हैं.

पुलिस टीम ने जब किरन से जितेंद्र उर्फ महेंद्र यादव के बारे में पूछताछ की तो उस का चेहरा मुरझा गया. उस ने घबराते हुए बताया कि जितेंद्र उस के दरोगा पति का दोस्त था. वह रोडवेज बस चालक है और रोडवेज कालोनी में रहता है. पूछताछ के दौरान पुलिस टीम ने बहाने से किरन का मोबाइल ले लिया.

पुलिस टीम में शामिल सर्विलांस सेल के प्रभारी शिवराम सिंह ने किरन के मोबाइल फोन की काल डिटेल्स निकलवाई तो पता चला कि दरोगा की हत्या के पहले व बाद में किरन की एक नंबर पर बात हुई थी.

उस मोबाइल नंबर की जानकारी जुटाई गई तो पता चला वह नंबर जितेंद्र उर्फ महेंद्र का था. पच्चालाल के मोबाइल नंबर की काल डिटेल्स में भी जितेंद्र का नंबर था.

दूसरी पत्नी बनी हत्या की वजह

जितेंद्र शक के घेरे में आया तो पुलिस टीम ने देर रात उसे रोडवेज कालोनी स्थित उस के घर से हिरासत में ले लिया और थाना सजेती ले आई. उस से दरोगा पच्चालाल की हत्या के संबंध में पूछताछ की गई तो उस ने हत्या से संबंधित कोई जानकारी होने से इनकार कर दिया.

हां, उस ने दोस्ती और दरोगा के घर आनेजाने की बात जरूर स्वीकार की. जब पुलिस ने अपने अंदाज में पूछताछ की तो जितेंद्र ज्यादा देर तक टिक नहीं पाया और उस ने दरोगा पच्चालाल की हत्या का जुर्म कबूल कर लिया.

जितेंद्र उर्फ महेंद्र यादव ने बताया कि किरन से उस के नाजायज संबंध बन गए थे. दरोगा पच्चालाल को जानकारी हुई तो वह किरन को प्रताडि़त करने लगा. पच्चालाल प्यार में बाधक बना तो उस ने और किरन ने मिल कर उस की हत्या की योजना बनाई.

योजना बनाने के बाद उन्होंने एक लाख रुपए में दरोगा की हत्या की सुपारी निजाम अली को दे दी, जो विधूना का रहने वाला है. निजाम अली ने उसे पसहा, विधूना निवासी राघवेंद्र उर्फ मुन्ना से मिलवाया. इस के बाद तीनों ने मिल कर 2 जुलाई की रात दरोगा की हत्या कर दी और फरार हो गए.

पुलिस टीम ने जितेंद्र की निशानदेही पर विधूना से निजाम अली तथा पसहा गांव से राघवेंद्र उर्फ मुन्ना को गिरफ्तार कर लिया. इन तीनों को थाना सजेती की हवालात में डाल दिया गया. इस के बाद पुलिस टीम सूर्यविहार, नवाबगंज पहुंची और यह कह कर किरन को साथ ले आई कि दरोगा पच्चालाल के हत्यारे पकड़े गए हैं.

किरन थाना सजेती पहुंची तो उस ने अपने प्रेमी जितेंद्र तथा उस के साथियों को हवालात में बंद देखा. उन्हें देखते ही वह सब कुछ समझ गई. अब उस के लिए पुलिस को गुमराह करना मुमकिन नहीं था. उस ने पति की हत्या में शामिल होने का जुर्म कबूल कर लिया. जितेंद्र ने दरोगा पच्चालाल का लूटा गया पर्स, घड़ी व मोबाइल भी बरामद करा दिए, जिन्हें उस ने घर में छिपा कर रखा था.

चूंकि दरोगा पच्चालाल के हत्यारों ने अपना जुर्म स्वीकार कर लिया था, इसलिए पुलिस ने मुंशी अजयपाल को वादी बना कर भादंवि की धारा 302, 201, 394 तथा 120बी के तहत जितेंद्र उर्फ महेंद्र, निजाम अली, राघवेंद्र उर्फ मुन्ना तथा किरन के विरुद्ध मुकदमा दर्ज कर लिया.

7 जुलाई को एसएसपी अखिलेश कुमार ने प्रैस कौन्फ्रैंस की, जिस में उन्होंने हत्या का खुलासा करने वाली टीम को 25 हजार रुपए देने की घोषणा की. उन्होंने गिरफ्तार किए गए दरोगा के हत्यारों को पत्रकारों के सामने भी पेश किया, जहां हत्यारों ने अवैध रिश्तों में हुई हत्या का खुलासा किया.

पच्चालाल गौतम सीतापुर जिले के थाना मानपुरा क्षेत्र के गांव रामकुंड के रहने वाले थे. उन के परिवार में पत्नी कुंती देवी के अलावा 4 बेटे सत्येंद्र, महेंद्र, जितेंद्र व कमल थे. पच्चालाल पुलिस विभाग में दरोगा के पद पर तो तैनात थे ही, उन के पास खेती की जमीन भी थी, जिस में अच्छी पैदावार होती थी. कुल मिला कर उन की आर्थिक स्थिति अच्छी थी. घर में किसी तरह की कोई कमी नहीं थी.

पच्चालाल की पत्नी कुंती देवी घरेलू महिला थीं. वह ज्यादा पढ़ीलिखी तो नहीं थीं, लेकिन स्वभाव से मिलनसार थीं. कुंती पति के साथसाथ बच्चों का भी ठीक से खयाल रखती थीं. पच्चालाल भी कुंती को बेहद चाहते थे, उन की हर जरूरत को पूरा करते थे. लेकिन बीतते समय में इस खुशहाल परिवार पर ऐसी गाज गिरी कि सब कुछ बिखर गया.

सन 2001 में कुंती देवी बीमार पड़ गईं. पच्चालाल ने पत्नी का इलाज पहले सीतापुर, लखनऊ व कानपुर में अच्छे डाक्टरों से कराया. पत्नी के इलाज में दरोगा ने पानी की तरह पैसा बहाया, लेकिन काल के क्रूर हाथों से वह पत्नी को नहीं बचा सके. पत्नी की मौत से पच्चालाल खुद भी टूट गए और बीमार रहने लगे.

जैसेजैसे समय बीतता गया, वैसेवैसे पत्नी की मौत का गम कम होता गया. पच्चालाल ड्यूटी और बच्चों के पालनपोषण पर पूरा ध्यान देने लगे. पच्चालाल का दिन तो सरकारी कामकाज में कट जाता था, लेकिन रात में पत्नी की कमी खलने लगती थी. पत्नी के बिना वह तनहा जिंदगी जी रहे थे. अब उन्हें अहसास हो गया था कि पत्नी के बिना आदमी का जीवन कितना अधूरा होता है.

सन 2002 में दरोगा पच्चालाल को हरदोई जिले के थाना बेनीगंज की कल्याणमल चौकी में तैनाती मिली. इस चौकी का चार्ज संभाले अभी 2 महीने ही बीते थे कि पच्चालाल की मुलाकात एक खूबसूरत युवती किरन से हुई. किरन अपने पति नरेश की प्रताड़ना की शिकायत ले कर चौकी आई थी.

किरन के गोरे गालों पर बह रहे आंसू, दरोगा पच्चालाल के दिल में हलचल मचाने लगे. उन्होंने सांत्वना दे कर किरन को चुप कराया तो उस ने बताया कि उस का पति नरेश, शराबी व जुआरी है. नशे में वह उसे जानवरों की तरह पीटता है. वह पति की प्रताड़ना से निजात चाहती है.

खूबसूरत किरन पहली ही नजर में दरोगा पच्चालाल के दिलोदिमाग पर छा गई. उन्होंने किरन के पति नरेश को चौकी बुलवा लिया और किरन के सामने ही उस की पिटाई कर के हिदायत दी कि अब वह किरन को प्रताडि़त नहीं करेगा. दरोगा की पिटाई और जेल भेजने की धमकी से नरेश डर गया और किरन से माफी मांग ली.

इस के बाद दरोगा पच्चालाल हालचाल जानने के बहाने अकसर किरन के घर आनेजाने लगे. वह किरन से मीठीमीठी बातें करते थे. किरन भी उन की रसीली बातों में आनंद का अनुभव करने लगी थी. किरन का पति नरेश घर आने पर ऐतराज न करे, यह सोच कर पच्चालाल ने उस से दोस्ती गांठ ली. दोनों की नरेश के घर पर ही शराब की महफिल जमने लगी. पच्चालाल उस की आर्थिक मदद भी करने लगे.

घर आतेजाते पच्चालाल ने किरन को अपने प्रेम जाल में फंसा कर उस से नाजायज संबंध भी बना लिए. बाद में पच्चालाल ने किरन को ऐसे सब्जबाग दिखाए कि वह उस की पत्नी बनने को राजी हो गई. किरन राजी हुई तो पच्चालाल ने मंदिर में जा कर उस से प्रेम विवाह कर लिया.

विवाह के समय किरन 20-22 साल की थी, जबकि पच्चालाल 43 साल के. नरेश को किरन की बेवफाई का पता चला तो उस ने माथा पीट लिया. शराबी और जुआरी नरेश इतना सक्षम नहीं था कि दरोगा का मुकाबला कर पाता, लिहाजा वह चुप हो कर बैठ गया.

प्रेम विवाह करने के बाद किरन पच्चालाल की पत्नी बन कर हरदोई में रहने लगी. कुछ समय बाद दरोगा पच्चालाल का ट्रांसफर कानपुर हो गया. कानपुर में पच्चालाल ने नवाबगंज थाना क्षेत्र के सूर्यविहार में किराए पर एक मकान ले लिया और किरन के साथ रहने लगे. बाद में दरोगा पच्चालाल और किरन एक बेटे अमन तथा 2 बेटियों अर्चना व पारुल के मातापिता बने.

कुंती के चारों बेटों ने पिता द्वारा किरन से प्रेम विवाह करने का कोई विरोध नहीं किया था. इस की वजह यह भी थी कि पिता के अलावा उन्हें संरक्षण देने वाला कोई नहीं था. इस तरह दरोगा पच्चालाल 2 परिवारों का पालनपोषण करने लगे. पहली पत्नी के बच्चे गांव में तथा दूसरी पत्नी किरन और उस के बच्चे कानपुर शहर में रहते रहे. पच्चालाल को जब छुट्टी मिलती तो गांव चले जाते और बच्चों से मिल कर लौट आते.

किरन 3 बच्चों की मां जरूर बन गई थी, लेकिन अब भी यौवन से भरपूर थी. वह हर रात पति का संसर्ग चाहती थी, लेकिन इस से वंचित थी. दरोगा पच्चालाल अब तक 50 की उम्र पार कर चुके थे. उन की सैक्स में रुचि भी कम हो गई थी. पहल करने पर भी वह किरन से देह संबंध नहीं बनाते थे.

दरअसल, ड्यूटी करने के बाद पच्चालाल इतने थक जाते थे कि पीने और खाना खाने के बाद बैड पकड़ लेते थे. किरन रात भर तड़पती रहती थी.

उन्हीं दिनों किरन की निगाह जितेंद्र यादव पर पड़ी. जितेंद्र यादव औरैया जिले के सहायल थाना क्षेत्र में आने वाले पुरवा अहिरमा का रहने वाला था. कानपुर में वह नवाबगंज की रोडवेज कालोनी में रहता था और रोडवेज की बस का ड्राइवर था. पच्चालाल और जितेंद्र यादव गहरे दोस्त थे. दोनों का एकदूसरे के घर आनाजाना था. दोनों की महफिल एकदूसरे के घरों में अकसर जमती रहती थी.

किरन की निगाह थी जितेंद्र पर

जितेंद्र यादव शरीर से हृष्टपुष्ट और किरन का हमउम्र था. किरन को लगा कि वह उस की अधूरी ख्वाहिशों को पूरा कर सकता है. अत: उस ने जितेंद्र को लिफ्ट देनी शुरू कर दी. दोनों के बीच देवरभाभी का नाता था.

जबतब दोनों हंसीमजाक भी करने लगे. किरन अपने सुघड़ अंगों का प्रदर्शन कर के जितेंद्र को ललचाने लगी. किरन के हावभाव से जितेंद्र समझ गया कि किरन सैक्स की भूखी है, पहल की जाए तो जल्द ही उस की बांहों में समा जाएगी.

जितेंद्र यादव जब भी किरन के घर आता, बच्चों के लिए फल, मिठाई ले कर जाता. किरन से वह मीठीमीठी बातें करते हुए उसे ललचाई हुई नजरों से देखता. ऐसे ही एक रोज जितेंद्र आया, तो किरन को घर में अकेली देख कर उस से पूछा, ‘‘दरोगा भैया अभी तक नहीं आए?’’

किरन ने बेफिक्री से कहा, ‘‘सरकारी काम से बाहर गए हैं, 1-2 रोज बाद लौटेंगे.’’

जितेंद्र की बांछें खिल गईं. उस ने किरन के चेहरे पर नजरें गड़ाते हुए शरारत की, ‘‘भाभी, आप की रात कैसे कटेगी?’’

‘‘तुम जो हो.’’ किरन ने भी उसी अंदाज में जवाब दे दिया. किरन के खुले आमंत्रण से जितेंद्र का हौसला बढ़ गया. वह बोला, ‘‘तो मैं रात को आऊं?’’

‘‘मैं ने कब मना किया है.’’ किरन ने मादक अंगड़ाई ली.

रात गहराई तो जितेंद्र किरन के दरवाजे पर पहुंच गया. उस ने दरवाजा धकेला तो खुल गया. अंदर नाइट बल्ब जल रहा था. किरन पलंग पर लेटी थी. वह फुसफुसाई, ‘‘दरवाजा बंद कर के सिटकनी लगा दो.’’

जितेंद्र ने ऐसा ही किया और पलंग पर आ कर बैठ गया. दोनों के बीच बातों का सिलसिला जुड़ा तो तभी थमा जब दोनों एकदूसरे की बांहों में समा गए. उस दिन किरन और जितेंद्र के बीच की सारी दूरियां मिट गईं.

किरन और जितेंद्र एक बार देह के दलदल में समाए तो समाते ही चले गए. दोनों को जब भी मौका मिलता, एकदूसरे में सिमट जाते. एक रोज पच्चालाल ड्यूटी के लिए घर से निकले ही थे कि जितेंद्र आ गया. आते ही उस ने किरन को बांहों में भर लिया.

दोनों अभी एकदूसरे से लिपटे ही थे कि पच्चालाल की आवाज सुन कर घबरा गए. किरन ने कपड़े दुरुस्त कर के दरवाजा खोल दिया. घर के अंदर जितेंद्र मौजूद था. बिस्तर कुछ पल पहले गुजरे तूफान की चुगली कर रहा था. पच्चालाल सब समझ गए. उन्होंने किरन को धुनना शुरू किया तो जितेंद्र चुपके से खिसक लिया.

इस घटना के बाद किरन और जितेंद्र ने दरोगा पच्चालाल से माफी मांग ली और आइंदा गलती न करने का वादा किया. पच्चालाल ने दोनों को माफ तो कर दिया, लेकिन जितेंद्र के साथ शराब पीनी बंद कर दी. उस के घर आने पर भी पाबंदी लगा दी. लेकिन देह की लगी ने पाबंदियों को नहीं माना. कुछ दिन दोनों दूरदूर रहे, फिर चोरीछिपे शारीरिक रूप से मिलने लगे.

जितेंद्र बना पच्चालाल की मौत का परवाना  जनवरी, 2018 में दरोगा पच्चालाल का ट्रांसफर कानपुर देहात के थाना सजेती में हो गया. सजेती थाना कानपुर से 50 किलोमीटर दूर है. वहां से रोज घर आनाजाना संभव नहीं था. दरोगा पच्चालाल को थाना परिसर में ही आवास मिल गया. अब वह हफ्ता 10 दिन में ही किरन से मिलने घर जा पाते थे.

पच्चालाल जब भी घर आते थे, किरन से गालीगलौज और मारपीट जरूर करते थे. दरअसल उन्हें शक था कि जितेंद्र के अलावा भी किरन के किसी से नाजायज संबंध हैं. जैसेजैसे समय बीत रहा था, घर में कलह और प्रताड़ना बढ़ती जा रही थी. पति की प्रताड़ना से आजिज आ कर किरन ने अपने प्रेमी जितेंद्र की मदद से पच्चालाल को रास्ते से हटाने की योजना बनाई.

जितेंद्र ने किरन को पच्चालाल की हत्या से फायदे भी बताए. जितेंद्र ने कहा कि पति की हत्या के बाद तुम्हारे बेटे अमन को मृतक आश्रित कोटे से सरकारी नौकरी मिल जाएगी और तुम्हें पेंशन मिलने लगेगी. इस के अलावा प्रेम संबंध का रोड़ा भी हट जाएगा.

किरन और जितेंद्र ने पच्चालाल की हत्या के लिए रुपयों का इंतजाम किया. फिर जितेंद्र ने विधूना निवासी टेलर निजाम अली से बातचीत की. एक लाख रुपए में सौदा तय हुआ. जितेंद्र ने एक लाख रुपया निजाम अली के खाते में ट्रांसफर कर दिया.

इस के बाद निजाम अली ने जितेंद्र को पसहा (विधूना) निवासी राघवेंद्र उर्फ मुन्ना से मिलवाया. राघवेंद्र रिटायर दरोगा हरिदत्त सिंह का अपराधी प्रवृत्ति का बेटा था. निजाम अली ने 20 हजार रुपए एडवांस दे कर उसे इस योजना में शामिल कर लिया.

2 जुलाई, 2018 की देर शाम जितेंद्र यादव राघवेंद्र और निजाम अली को साथ ले कर सजेती पहुंचा और हाइवे से दरोगा के आवास की पहचान कराई. इस के बाद जितेंद्र यादव बाजार गया, जहां उस की मुलाकात दरोगा पच्चालाल से हो गई. जितेंद्र ने झुक कर दरोगा के पैर छुए. पच्चालाल ने उसे रात को वहीं रुक जाने को कहा.

थोड़ी देर की बातचीत के बाद दरोगा पच्चालाल ने अंगरेजी शराब की बोतल और नमकीन खरीदी. दुकानदार को नमकीन के पैसे पच्चालाल ने ही दिए. इस के बाद होटल पर बैठ कर दोनों ने शराब पी और खाना खाया. इस के बाद दोनों पच्चालाल के आवास पर आ गए. दरोगा पच्चालाल ने कपड़े उतारे और कूलर चला कर पलंग पर पसर गए.

कुछ देर बाद जब पच्चालाल सो गए तो जितेंद्र ने आवास का पीछे का दरवाजा खोल कर निजाम अली व राघवेंद्र को अंदर बुला लिया, जो कुछ दूर हाइवे किनारे बैठे थे. साथियों के आते ही जितेंद्र ने पच्चालाल को दबोच लिया. दरोगाजी की आंखें खुलीं तो प्राण संकट में देख वह संघर्ष करने लगे. लेकिन नफरत से भरे जितेंद्र ने पच्चालाल के शरीर को चाकू से गोदना शुरू किया तो गोदता ही चला गया.

हत्या के दौरान खून के छींटे व हाथ के पंजे का निशान एक दीवार पर भी पड़ गया. हत्या के बाद जितेंद्र व उस के साथी दरोगा का मोबाइल, पर्स व घड़ी लूट कर फरार हो गए. जितेंद्र ने मोबाइल से फोन कर के पच्चालाल की हत्या की जानकारी किरन को दे दी थी.

3 जुलाई की शाम 6 बजे मुंशी अजयपाल जब रजिस्टर पर दस्तखत कराने दरोगा पच्चालाल के आवास पर पहुंचा तो हत्या की जानकारी हुई. 7 जुलाई, 2018 को पुलिस ने हत्यारोपी किरन, जितेंद्र, निजाम अली व राघवेंद्र को कानपुर देहात की माती अदालत में रिमांड पर मजिस्ट्रैट के समक्ष पेश किया, जहां से सब को जेल भेज दिया गया.

–  पुलिस सूत्रों पर आधारित

मैं 21 वर्षीय अविवाहिता हूं. मेरे स्तनों का आकार लगातार बढ़ता जा रहा है. मेरे निप्पल का आकार भी ठीक नहीं है. बताएं क्या करूं.

सवाल
मैं 21 वर्षीय अविवाहिता हूं. मेरे स्तनों का आकार लगातार बढ़ता जा रहा है. मेरे निप्पल का आकार भी ठीक नहीं है. इस कारण मैं हीनभावना से ग्रस्त रहती हूं. मेरा वजन 52 किलोग्राम और लंबाई 5 फुट 6 इंच है. बताएं क्या करूं?

जवाब
घबराने की जरूरत नहीं है. शादी के बाद जब बच्चा होगा और आप उसे फीडिंग कराएंगी तब निप्पल ठीक हो जाएंगे.

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जब करें इनरवियर का चुनाव

फैशनेबल दिखने के लिए इनरवियर्स का सही चुनाव बहुत जरूरी है, क्योंकि इनरवियर्स ही ड्रैस की फिटिंग को उभारते हैं. यदि सही इनरवियर्स नहीं होंगे तो बौडी शेप भी खराब दिखेगी. लेकिन इनरवियर किसे दिखाने हैं, यह सोच कर लड़कियां अकसर सस्ते इनरवियर खरीद लेती हैं और यहीं हो जाती है उन से फैशन मिस्टेक. जबकि आजकल बाजार में हर ड्रैस के लिए तरहतरह के इनरवियर्स उपलब्ध हैं.

आइए, जानते हैं किस ड्रैस के साथ कौन सा इनरवियर पहनना चाहिए:

– मिनिमाइजर ब्रा स्लिम फिट टौप के लिए है यदि आप अपनी हैवी ब्रैस्ट का साइज कम दिखाना चाहती हैं तो यह ब्रा आप के लिए परफैक्ट है.

– टी शर्ट पहन रही हैं तो टीशर्ट ब्रा ही पहनें. यह ब्रा आप की ब्रैस्ट को सही आकार देगी और टीशर्ट की फिटिंग भी सही आएगी.

– पैडेड ब्रा उन ड्रैसेज के लिए है, जो बहुत ही महीन फैब्रिक मसलन सिल्क, कौटन और लिनेन से बनी होती हैं.

– यदि डीपनैक ड्रैस पहनने जा रही हैं तो डैमी ब्रा पहनना न भूलें. यह ब्रा औफशोल्डर और ट्यूब टौप के नीचे भी पहनी जा सकती है.

– हाल्टरनेक ब्रा को ढीलेढाले स्पोर्टवियर के नीचे पहनना चाहिए. यह न केवल ब्रैस्ट को स्थाई रखती है, बल्कि पसीने को भी सोखती है. यह पसीने को आप के आउटरवियर पर नहीं आने देती.

फैशन ऐक्सपर्ट विनीता कहती हैं, ‘‘ब्रैस्ट और बंप्स महिलाओं के शरीर के बहुत ही अहम हिस्से होते हैं. ये दोनों ही हिस्से महिलाओं को अच्छी फिगर देते हैं और ड्रैस को अच्छी शेप. यदि किसी महिला की ब्रैस्ट का साइज कम है तो उसे आर्टिफिशियली बढ़ाने के लिए पैडेड ब्रा पहनी जा सकती है. ब्रा की ही तरह बंप्स को बढ़ाने के लिए पैडेड पैंटीज भी मिलती हैं.’’

टीनऐजर्स के इनरवियर

दरअसल, आज की युवा पीढ़ी में इनरवियर्स से जुड़ी सही जानकारी का ज्ञान होना बहुत जरूरी है खासतौर पर जब हम टीनऐजर्स की बात करते हैं, तब यह और भी महत्त्वपूर्ण विषय बन जाता है.

वर्तमान समय में कई तरह के पर्यावरण बदलाव हो रहे हैं, जिन का सीधा असर हमारे शरीर पर पड़ता है. इन बदलावों का ही असर है, जो आज लड़कियों में बहुत से शारीरिक बदलाव देखे जा रहे हैं.

इस की एक बड़ी वजह आजकल का खानपान भी है. मासिकधर्म शुरू होने पर लड़कियों के शारीरिक अंगों में विकास होता है. स्तनों का विकास भी मासिकधर्म पर निर्भर करता है.

इस तरह कम उम्र से ही लड़कियों को ब्रा पहननी होती है. यह एक ऐसी उम्र होती है जब अधिकतर लड़कियों को इस बात का आभास भी नहीं होता कि उन के स्तनों में उभार आ रहा है और वे आकार ले रहे हैं. ऐसे में एक मां ही अपनी बेटी को ब्रैस्ट केयर और ब्रा के सही चुनाव की जानकारी दे सकती है.

पेश है, कुछ खास जानकारी जो मां को अपनी बढ़ती बेटी को जरूर देनी चाहिए:

जब बेटी के स्तन आकार लेने लगें, तो तुरंत अपनी बेटी को इस बदलाव के बारे में समझाएं और उसे ट्रेनिंग या स्पोर्ट ब्रा खरीद कर पहनने को दें.

– विकसित होते स्तन कभीकभी लड़कियों को अवसाद में ले जाते हैं. इस बदलाव को लड़कियां आसानी से स्वीकार नहीं कर पातीं. दरअसल, खुद के शारीरिक अंगों में हो रहे बदलाव के बारे में दूसरों के मुंह से सुनती हैं, तो उन्हें यह परिस्थिति अटपटी लगती है, साथ ही विकसित होते स्तनों की बनावट भी अटपटी सी ही होती है. ऐसे में बेटी को कप्ड ब्रा पहनने का सुझाव दें. ऐसी ब्रा स्तनों के आकार को पौइंटेड दिखाने की जगह गोल आकार देती है. इस ब्रा में लगे अंडरवायर भी स्तनों को अच्छी सपोर्ट देते हैं.

– स्कूल में बहुत सारी ऐक्टिविटीज होती हैं, जिन में शारीरिक क्षमता का बहुत प्रयोग करना होता है. इन गतिविधियों में इस उम्र की लड़कियों को भी हिस्सा लेना होता है. मगर इस से पहले मां का फर्ज बनता है कि वह बेटी को समझाए कि उसे विकसित होते स्तनों का ध्यान रखना है और इस का ध्यान वह एक अच्छी स्पोर्ट ब्रा पहन कर ही रख सकती है. स्पोर्ट ब्रा पहनने से स्तनों के टिशूज पर प्रभाव नहीं पड़ता. इसलिए इस ब्रा को किसी स्पोर्ट में हिस्सा लेते या व्यायाम करते वक्त बेटी को पहनने को कहें.

– सवाल होते हैं. मसलन, फिटिंग, साइज और ब्रा पहनने के बाद कितना सहज महसूस हो सकता है. बेटी के मन में चल रही इस उथलपुथल को एक अच्छी फिटेड ब्रा के साथ मां ही खत्म कर सकती है.

– बेटी को डार्क कलर की ब्रा की जगह हलके रंग, हो सके तो स्किन टोन से मैच करते रंग की ब्रा पहनने की सलाह दें. दरअसल, डार्क रंग की ब्रा कपड़ों पर फ्लांट हो सकती है, लेकिन स्किन टोन कलर की ब्रा में यह दिक्कत नहीं आती.

 

 

बेरोजगारी के लिए सरकारी नीतियां हैं जिम्मेदार : अक्षय हुंका

क्या रोजगार युवाओं का अधिकार है, इस सवाल से भी ज्यादा कठिन इस सवाल के जवाब का मिलना है कि क्या सभी बेरोजगार युवाओं, खासतौर से शिक्षितों, को रोजगार मुहैया कराना सरकार की ही जिम्मेदारी है. बेरोजगारी हर दौर में समस्या रही है, जिसे दूर करने का वादा आजादी के बाद की कांग्रेसी सरकारों से ले कर मौजूदा एनडीए सरकार अपनी बातों व भाषणों में करती रही है. युवाओं के हिस्से में लज्छेदार बातों और लुभावने वादों के सिवा कुछ नहीं आया.

नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र की एनडीए सरकार के साल 2014 के चुनाव में जीतने की एक बड़ी वजह युवा बेरोजगार थे जो तब की यूपीए सरकार से निराश हो चले थे. नरेंद्र मोदी ने एक करोड़ नौकरियां हर साल देने का वादा किया तो बेरोजगार युवाओं ने उन्हें भी मौका देने में हर्ज नहीं समझा. नरेंद्र मोदी देश के प्रधानमंत्री तो बन गए लेकिन उन्होंने वादा नहीं निभाया. नतीजतन, अब बेरोजगारी चरम पर है और सरकार के प्रति युवाओं का गुस्सा फूट रहा है. युवा भड़ास का सामना करने से कतरा रही सरकार कैसेकैसे बहाने बना कर बगलें झांक रही है, यह बात भी अब छिपी नहीं रह गई है.

पिछले 4 सालों में बेरोजगार युवाओं के कई संगठन देश के विभिन्न राज्यों में बने हैं. इन्होंने सड़कों पर आ कर सरकार का विरोध करते अपनी बात कही है और अभी भी कह रहे हैं. ऐसा ही एक संगठन है बेरोजगार सेना, जिस के अध्यक्ष भोपाल के एक शिक्षित युवा अक्षय हुंका हैं. गठन के बाद बेरोजगार सेना से लगभग 50 हजार बेरोजगार युवा सक्रिय रूप से जुड़ चुके हैं. मध्य प्रदेश के मंडला जिले के रहने वाले अक्षय ने विदिशा के सम्राट अशोक अभियांत्रिकी संस्थान से एमसीए किया है. पढ़ाई के बाद उन्होंने देशविदेश की कई नामी कंपनियों में अच्छे पैकेज पर नौकरियां कीं और फिर भोपाल में अपनी सौफ्टवेयर कंपनी खोल ली. अपनी कंपनी के जरिए 7 वर्षों में वे एक हजार से भी ज्यादा बेरोजगारों को रोजगार दे चुके हैं. यहां प्रस्तुत हैं अक्षय हुंका से की गई बातचीत के प्रमुख अंश :

क्या नौकरियां देना सिर्फ सरकार की ही जिम्मेदारी है? आज धारणा यह बन गई है कि यह सरकार की जिम्मेदारी नहीं कि वह सभी को नौकरी दे. बड़े जोर से पूछा और कहा यह जाता है कि क्या सबकुछ सरकार ही करेगी, जबकि नौकरी तो योग्यता से मिलती है.

लेकिन यह बेहद गलत धारणा है जिसे मैं स्पष्ट कर देना चाहता हूं. देश में कितनी नौकरियां पैदा होंगी, यह सरकार की नीतियों से तय होता है. कहने को तो हम मिश्रित अर्थव्यवस्था में रहते हैं लेकिन सरकारी नीतियां पूंजीपतियों के हिसाब से बनती हैं. नीतियां ऐसी हों जिन से एक व्यक्ति को बहुत अधिक लाभ की जगह अधिक से अधिक लोगों को रोजगार मिलें. बढ़ते एफडीआई और पूंजीपतियों के दबाव से स्वरोजगार पर खतरा मंडरा रहा है. उदाहरण खिलौनों का लें तो देश में खिलौनों की लाखों दुकानें हैं, लेकिन धीरेधीरे बड़ी विदेशी कंपनियां देश में पैर पसार रही हैं जो आने वाले दिनों में इन दुकानदारों को खत्म कर देंगी. ऐसा लगभग हर सैक्टर में हो रहा है.

पर कहा तो यह जाता है कि बढ़ती जनसंख्या बेरोजगारी की वजह है? हमारे देश का यह कल्चर हो गया है कि विदेश में जो है वही विकास मान लिया जाता है. पश्चिमी देशों के लिए यह ठीक भी है जहां जनसंख्या कम है. इसीलिए वहां कई काम मशीनों से किए जाते हैं, लेकिन हमारे देश में जनसंख्या ज्यादा है, इसलिए मशीनों पर निर्भरता कम होनी चाहिए. बेरोजगार सेना और मैं कोई तकनीक या विकास विरोधी नहीं हैं. लेकिन हम मानते हैं कि मशीनों का उपयोग सिर्फ इसलिए नहीं होना चाहिए क्योंकि उस का आविष्कार हो चुका है. कहा जा सकता है कि बढ़ती जनसंख्या नहीं, बल्कि बढ़ता अंधाधुंध अनुपयोगी मशीनीकरण बेरोजगारी का जिम्मेदार है.

सरकारी नीतियों और जनसंख्या पर बात स्पष्ट करेंगे क्या? देखिए, पहले कहा जाता था कि पढ़ोगेलिखोगे तो बनोगे नवाब, लेकिन अब तो इंजीनियरिंग और एमबीए जैसी पढ़ाई करने वालों को भी नौकरियां नहीं मिल रही हैं. आमतौर पर यह धारणा बना दी गई है कि केवल शिक्षा व्यवस्था ही इस की जिम्मेदार है. यह भी आधा सच है कि बेरोजगारी सिर्फ इसलिए है कि शिक्षित ज्यादा हैं और नौकरियां कम हैं.

यह एक नीतिगत मुद्दा है कि सरकार के ऊपर कोई कानूनी दबाव नहीं है कि वह नौकरियां दे ही, इसलिए कोई भी नीति वह पूंजीपतियों के लिए बनाती है जिस में हल्ला यह मचाया जाता है कि इतने हजार करोड़ रुपयों का निवेश होगा. यह नहीं कहा जाता कि कितने हजार लोगों को नौकरियां मिलेंगी. सरकार देश में मनरेगा की तरह शिक्षित युवा रोजगार गारंटी कानून लाए, तभी बात बनेगी. इस से उस पर दबाव बनेगा और वह रोजगारोन्मुखी नीतियां बनाएगी. राष्ट्रीय स्तर पर बेरोजगारी का परिदृश्य कैसा देखते हैं आप?

लंबे समय से बेरोजगारी देश की बड़ी समस्या रही है. साल 2014 के लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने प्रतिवर्ष एक करोड़ नौकरियां देने का वादा किया था. इस वादे पर ही युवाओं ने न केवल उन्हें वोट दिया था बल्कि उन का प्रचारप्रसार भी किया था. अब वही युवा खुद को ठगा सा महसूस कर रहे हैं क्योंकि नई नौकरियां मिलना तो दूर की बात है, पुराने लोगों की भी नौकरियां जा रही हैं. कांग्रेस सरकार में ‘जौबलैस ग्रोथ’ थी पर अब मोदी सरकार में ‘जौबलौस ग्रोथ’ है.

क्या इस बाबत बेरोजगार सेना का कोई राजनीतिक एजेंडा है? नहीं, हमारा कोई राजनीतिक एजेंडा नहीं है. हां, हम यह जरूर चाहते हैं कि चुनाव धर्म या जाति, जो युवाओं को गुमराह करते हैं, के बजाय बेरोजगारी के मुद्दे पर लड़े जाएं. हम यह भी नहीं कह रहे कि कांग्रेस के जमाने में रोजगार बरसता था लेकिन तब युवा इतना तरसता नहीं था. यह जरूर तय है कि हम रोजगार छीनने वाली सरकार को वोट नहीं देंगे.

पिछले दिनों मध्य प्रदेश सरकार ने रोजगार केंद्र ठेके पर दिए. बेरोजगारों के लिहाज से इस के क्या माने हैं? यह एकदम गलत फैसला है. इस के जरिए सरकार अपनी जिम्मेदारी से भाग रही है. सीधे कहूं तो यह एक महत्त्वपूर्ण सरकारी संस्था की सुनियोजित हत्या है.

रोजगार कार्यालय पिछले कई सालों से प्रभावी तरीके से काम नहीं कर रहे हैं, लेकिन उन्हें दुरुस्त करने के बजाय सरकार उन्हें निजी हाथों में दे कर अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ने की कोशिश कर रही है. पुणे की यशस्वी नाम की एक संस्था का उदाहरण मैं यहां देना चाहूंगा जिसे एक लाख नौकरियां देने का जिम्मा सौंपा गया है. इस कंपनी को क्वालिटी फंड के नाम पर 19 करोड़ रुपए दिए जाएंगे, लेकिन यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि अगर वह एक लाख नौकरियां नहीं दे पाई तो उस पर क्या ऐक्शन लिया जाएगा. यह कैसा निजीकरण है जिस में कंपनी काम करे न करे, उसे भुगतान किया ही जाएगा.

मध्य प्रदेश की बात करें तो 52 रोजगार कार्यालयों की जगह कंपनी केवल 15 स्थानों पर ही अपने सैंटर खोलेगी. इस से छोटे जिलों में बहुत समस्या आएगी.

इस का मतलब बेरोजगार युवा दोबारा भाजपा को मौका या वोट नहीं देंगे? आप बताइए क्यों दें हम ऐसी सरकारों को वोट जो युवाओं को रोजगार नहीं दे पा रही हैं. बेरोजगार सेना देशप्रदेश में व्याप्त बेरोजगारी का समाधान ढूंढ़ रही है. हमें कांग्रेस से भी खास उम्मीदें नहीं, और न ही दूसरे किसी राजनीतिक दल से रखते हैं, पर विरोध जताने के लिए बेरोजगार और क्या करें. दरअसल, राजनीतिक स्तर पर देश में असली विपक्ष संसद या विधानसभा में नहीं, बल्कि सड़कों पर आंदोलनरत युवा है.

बेरोजगार दूध के जले हैं, अब वे छाछ भी फूंकफूंक कर पिएंगे और किसी राजनीतिक झांसे में नहीं आने वाले. हम राजनीतिक विकल्प की तलाश में हैं और उम्मीद है कि जल्द उसे ढूंढ़ भी लेंगे. क्या स्वरोजगार के लिए बेरोजगार युवाओं को आसानी से कर्ज मिल रहा है?

बिलकुल नहीं, आसानी से तो क्या, कठिनाई से भी नहीं मिल रहा. स्वरोजगार की सभी योजनाएं मुख्यमंत्री स्वरोजगार योजना, मुख्यमंत्री युवा उद्यमी योजना और वैंचर कैपिटलिस्ट फंड ये सब केवल नाम और झूठे प्रचार के लिए हैं, आंकड़ेबाजी के लिए हैं. कई योजनाओं के लिए सरकार ने घोषणा की है कि बैंक लोन के लिए गारंटी की जरूरत नहीं, लेकिन बिना गारंटी के कोई बैंक कर्ज देने को तैयार नहीं. सरकार चाहे तो मेरी यह चुनौती स्वीकार करे कि वीसी फंड के नाम पर 4 साल में 100 करोड़ रुपए का जो फंड रखा हुआ है, उस से किसी प्रोजैक्ट को पैसे क्यों नहीं मिले.

क्या बेरोजगार सेना का ध्यान गांव, देहातों और कसबों के बेरोजगारों पर भी है? जी हां, बराबर है. वहां तो हालात और भी बदतर हैं. मैं यह नहीं कहता कि गांवदेहातों की बेरोजगारी शहर आ गई है, बल्कि वहां के हालात कुछ उदाहरणों द्वारा बताना चाहूंगा.

अब अच्छी बात यह है कि सभी वर्गों के युवा ज्यादा से ज्यादा पढ़ रहे हैं लेकिन नौकरियों की कमी है. ऐसे में गांवों में परंपरागत और पैतृक व्यवसायों का खत्म होते जाना चिंता की बात है. मोची, धोबी, माली, बढ़ई, कुम्हार वगैरह के काम अब कोई नहीं कर रहा, तो यह स्वाभाविक बात है क्योंकि समाज इन के व्यवसायों को प्रतिष्ठित स्थान नहीं देता, दूसरे, ऊपर जैसे मैं ने कहा, अंधाधुंध मशीनीकरण की मार भी इन व्यवसायों पर पड़ रही है. मिसाल जूतेचप्पलों की लें, तो हर कोई यह जान कर हैरान रह जाता है कि मोचियों की दुकानें अब पहले की तरह हर कहीं नहीं दिखतीं. अब हर कोई महंगे व ब्रैंडेड जूतेचप्पल पहन रहा है जो सालोंसाल नहीं टूटते और जब टूट जाते हैं तो उन्हें फेंक दिया जाता है. यही

बात कपड़ों और बरतनों पर भी लागू होती है. साफ है कि गांवदेहातों के युवा शिक्षित हो कर दोहरी मार झेल रहे हैं. स्किल डैवलपमैंट जैसी योजनाएं इसी वजह से नहीं चल पा रहीं कि पढ़ेलिखे युवाओं को परंपरागत व्यवसायों में अब कोई संभावना नहीं दिखती.

क्या आरक्षण का बेरोजगारी से कोई संबंध है? बिलकुल नहीं है. वजह आरक्षण से यह तय नहीं होता कि कितनी नौकरियां आएंगी, बल्कि यह तय होता है कि जो नौकरियां हैं वे कैसे बंटेंगी.

दरअसल, आरक्षण जातिगत भेदभाव मिटाने के लिए बनाया गया था जो खुशी की बात है कि कम से कम शहरी इलाकों में तो कम हो रहा है. हालात अब 70 साल पहले जैसे नहीं रह गए हैं, इसलिए इस गंभीर और संवेदनशील मुद्दे पर दोबारा नए सिरे से सोचे जाने की वकालत मैं करता हूं और यह भी स्पष्ट कर देना चाहता हूं कि बेरोजगारी की मूल समस्या से इस का कोई लेनादेना नहीं है. बेरोजगारी पर मीडिया की भूमिका पर क्या कहेंगे?

मैं मीडिया का आभारी हूं जो हर समय बेरोजगारी का मुद्दा तरहतरह से उठाता रहा है. उसी के दबाव में पकौड़े तलने जैसी सलाह सामने आई और मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को चुनावी साल में 80 हजार नौकरियां देने की बात करनी पड़ी. जबकि हर कोई जानता है कि यह चुनावी लौलीपौप है. मीडिया से संबंधित एक बात जरूर मैं आप से साझा करना चाहता हूं कि सभी न्यूज चैनल्स ने बेरोजगार सेना की बात उठाई. पत्रपत्रिकाओं ने भी इसे छापा लेकिन जबरदस्त रिस्पौंस हमें सरस सलिल पत्रिका से मिला. मेरे लिए यह एक दिलचस्प अनुभव था. इस पत्रिका के मुखपृष्ठ पर बेरोजगार सेना के सदस्यों का प्रदर्शन करते एक फोटो छपा था जिस में सदस्य बनने के लिए एक मोबाइल नंबर पर मिस्डकौल देने को दिया गया था.

मेरे पास हजारों फोन आए और अभी भी आते हैं, तब मुझे समझ आया कि इस पत्रिका की अहमियत और पहुंच कितनी अहम है. लेकिन देशभर में हजारों बेरोजगारों के फोन आना गर्व की नहीं, बल्कि शर्म की बात है. देश में इतनी बेरोजगारी आखिर क्यों है.

गीता : गुमनामी से स्वयंवर तक

गीता एक ऐसी गुत्थी का नाम है, जो सुलझाने की कोशिशों में इतनी उलझती जा रही है कि कभीकभी  तो लगता है, कहीं इंसानियत के नाम पर हम उस पर जुल्म तो नहीं ढा रहे हैं.

हालांकि इस बात से इत्तफाक रखने वालों की तादाद न के बराबर ही होगी क्योंकि हर किसी की आदत किसी भी घटना या व्यक्ति को मीडिया और सरकारी नजरिए से देखने की पड़ती जा रही है. गीता इसी नजरिए की कैद में छटपटाती आज भी अपनी पहचान की मोहताज है. इस की जिम्मेदारी लेने के लिए किसी न किसी को आज नहीं तो कल सामने आना ही होगा.

कौन है गीता, क्या है उस की कहानी और क्यों रचा गया था उस के स्वयंवर का ड्रामा, यह सब जानने से पहले गीता की कहानी को जानना जरूरी है. गीता के अतीत को 2 भागों में बांट कर देखा जाना सहूलियत वाली बात होगी.

उस की जिंदगी का दूसरा अतीत जो ज्ञात है, वह साल 2003-04 से शुरू होता है, जिस की ठीकठाक तारीख किसी को नहीं मालूम. इस के पहले गीता क्या थी, यह वह खुद भी नहीं जानती. चूंकि उस का पहला अतीत अज्ञात है, इसलिए स्वाभाविक रूप से वह रहस्यरोमांच से भरा है. जिस के चक्रव्यूह में खुद गीता अभिमन्यु की तरह फंसी हुई है.

ईधी फाउंडेशन ने बेटी की तरह पाला गीता को

भारत और पाकिस्तान के संबंध विभाजन के बाद से बारूद के ढेर पर सुलगते रहे हैं, जिन में से कभी दोस्ती की महक नहीं आई. दोनों देशों के लोग एकदूसरे को कट्टर दुश्मन मानते हैं. इस धर्मांधता और कट्टरवाद से इतर इत्तफाक से यहीं कुछ लोग ऐसे भी हैं जो वाकई मानवता के लिए जीतेमरते हैं.

ऐसे ही एक पाकिस्तानी शख्स थे अब्दुल सत्तार ईधी, जिन का नाम न केवल पाकिस्तान में बल्कि पूरी दुनिया में इज्जत से लिया जाता है. पाकिस्तान में उन्हें लोग गौडफादर, फरिश्ता और गांधी तक कहते हैं तो इस की कई वजहें और प्रमाण भी हैं.

ईधी फाउंडेशन के संस्थापक अध्यक्ष अब्दुल सत्तार के नाम के पहले अब्बा संबोधन भी लगाया जाता है. मानवतावादी अब्दुल सत्तार का जन्म गुजरात के ऐतिहासिक शहर जूनागढ़ में हुआ था. भारतपाक बंटवारा हुआ तो वह पाकिस्तान चले गए.

अब्दुल सत्तार की जिंदगी कई संघर्षों से भरी है, जिन्होंने उन्हें मानवतावादी बना दिया. मानवता के क्षेत्र में उन के और ईधी फाउंडेशन के नाम ढेरों उपलब्धियां और काम दर्ज हैं. अब्दुल सत्तार को साल 1996 में रेमन मैगसेसे पुरस्कार से नवाजा गया था. लेनिन शांति पुरस्कार भी उन्हें प्रदान किया गया था.

दुनिया की सब से बड़ी एंबुलेंस उन के ईधी फाउंडेशन के पास है. यह बात गिनीज बुक औफ वर्ल्ड रिकौर्ड्स में भी दर्ज है. जुलाई, 2016 में उन की मौत के बाद से ईधी फाउंडेशन की जिम्मेदारी उन की बेगम बिल्कीस संभाल रही हैं.

society

सन 2003-04 में कभी गीता नाम की एक भारतीय लड़की बेहद फिल्मी अंदाज में पाकिस्तान पहुंच गई थी. गीता न तो बोल सकती है और न ही सुन सकती है, यानी मूकबधिर है. लावारिस हालत में गीता समझौता एक्सप्रैस के द्वारा पाकिस्तान पहुंची थी.

पाकिस्तानी बौर्डर अथौरिटी ने गीता पर दया खा कर उसे ईधी फाउंडेशन पहुंचा दिया था. सत्तार दंपति ने एक तरह से गीता को गोद ले लिया और सगी बेटी की तरह उस की परवरिश और देखभाल की. गीता के पास तब कोई सामान नहीं था, बस एक फोटो थी जिस में वह अपने परिवारजनों के साथ दिख रही थी.

गीता का तब कोई नाम नहीं था और जो था उसे वह बता नहीं सकती थी. चूंकि वह समझौता एक्सप्रैस में मिली थी, इसलिए उसे अंदाजे के आधार पर भारतीय हिंदू मानते हुए सत्तार दंपति ने गीता नाम दे दिया, जो हिंदुओं का धर्मग्रंथ है. अब्दुल सत्तार ने अपने यतीमखाने में गीता के लिए एक मंदिर भी बनवा दिया था, जिस में तरहतरह के हिंदू देवीदेवताओं की तसवीरें लगा दी गई थीं. गीता इस मंदिर में रोज पूजापाठ करती थी.

गीता चाहती थी भारत आना

एक लावारिस भारतीय लड़की के यूं मिलने की पाकिस्तानी मीडिया में तब खासी चर्चा रही थी. पाकिस्तान सरकार ने औपचारिक रूप से भारत सरकार और भारतीय दूतावास को गीता के मिलने की सूचना दी थी पर भारत की ओर से कोई पहल नहीं हुई तो गीता पाकिस्तान और ईधी फाउंडेशन की हो कर रह गई.

गीता एक महफूज जगह पर इंसानियत के पुजारियों की सरपरस्ती में थी, इसलिए उसे कोई परेशानी पेश नहीं आई. नहीं तो हर कोई जानता है कि जानेअनजाने में नाजायज तरीके से पाकिस्तान में दाखिल हो गए ऐसे भारतीयों के साथ पाकिस्तानी सेना और पुलिस क्या सलूक करती है.

वक्त गुजरते गीता बच्ची से युवती हो गई लेकिन जिंदगी के इस अहम और नाजुक सफर में सत्तार दंपति ने उसे मांबाप की और किसी दूसरे किस्म की कमी महसूस नहीं होने दी और पूरी ईमानदारी से इंसानियत का जज्बा निभाया.

दुबलीपतली, सांवली रंगत और आकर्षक नैननक्श वाली गीता ईधी फाउंडेशन में रह रहे मुसलिम बच्चों में जल्द ही घुलमिल गई लेकिन अपने घर और देश की याद उसे अकसर सताती रहती थी. बिलकीस बेगम से भी उसे खासा लगाव हो गया था, जो चाहती थीं कि गीता अपने देश और घर पहुंच जाए, जिस की इच्छा वह अकसर जताती रहती थी.

देश लौटने की आस में गिनगिन कर दिन काट रही गीता के साथ एक और अच्छी बात यह हुई कि उस पर भारतीय जासूस होने का शक नहीं किया गया, क्योंकि इस की कोई मुकम्मल वजह भी नहीं थी. एकदो साल पाकिस्तानी मीडिया में गीता की चर्चा रही लेकिन जब किसी स्तर पर भी वापसी की कोई पहल नहीं हुई तो लोग उसे भूलने लगे.

जब अपनों को याद कर गीता उदास होती थी तो सत्तार परिवार उस का जी बहलाता था. बिलकीस बेगम अकसर उसे खरीदारी कराने ले जाती थीं. यानी गीता को कैद कर के नहीं रखा गया था. वह भले ही सुन, बोल नहीं सकती थी लेकिन सारे हालात तो समझती थी.

वतनवापसी की भूमिका

उस वक्त गीता की दिमागी हालत क्या रही होगी, इस का सहज अंदाजा लगाया जा सकता है कि वह एक ऐसी लड़की थी जिस की कोई पहचान नहीं थी. ईधी फाउंडेशन में उसे किसी बात की कमी नहीं थी और जो थी, उसे वक्त ही पूरा कर सकता था जिस का दूरदूर तक कोई अतापता नहीं था.

फिर रिलीज हुई अभिनेता सलमान खान की बहुचर्चित सुपरडुपर हिट फिल्म ‘बजरंगी भाईजान’, जिस के चलते गीता की कहानी विदेश मंत्री सुषमा स्वराज की जानकारी में आई.

सुषमा स्वराज को लगा कि गीता की भारत वापसी की कोशिश की जाए. उसे अगर उस के घर वालों से मिलवा दिया गया तो यह वाकई एक नेक काम होगा. गीता से संबंधित तमाम जानकारियां जुटाई गईं तो शुरुआती दौर में परिणाम उत्साहजनक रहे और लोगों ने उन की इस अनूठी पहल की जम कर तारीफ की.

गीता के घरवालों की तलाश

हालांकि यह कोई आसान काम नहीं था क्योंकि गीता के परिवारजनों का कोई अतापता नहीं था. इस के लिए गीता की एकलौती जायदाद उस के पास मौजूद फोटो का सहारा लिया गया. कूटनीतिक लिहाज से पाकिस्तान उस वक्त तक गीता को भारत को सौंपने के लिए बाध्य नहीं था, जब तक उस के परिवारजनों का पता नहीं चल जाता. और बिना पहचान मिले उसे भारत भेज भी दिया जाता तो होता इतना भर कि वह एक यतीमखाने से निकल कर दूसरे यतीमखाने में आ जाती,जो कहने को अपने देश का होता.

बहरहाल, इस अंजाम की परवाह किए बगैर सुषमा स्वराज और विदेश मंत्रालय ने गीता का फोटो मीडिया और सोशल मीडिया के जरिए वायरल किया तो परिणाम उत्साहजनक रहे. इस फोटो को देख कर देश भर के विभिन्न राज्यों के कोई दरजन भर अभिभावकों ने गीता को अपनी बेटी बताया.

दोनों देशों के बीच गीता को ले कर खूब खतोकिताबत हुई तो देश भर का ध्यान गीता पर गया. हर किसी को उस से सहानुभूति हुई और हर कोई यह दुआ मांगने लगा कि इस मूकबधिर और अनाथ युवती को उस के मांबाप और घर वाले मिल जाएं. यह दीगर बात है कि इन पंक्तियों के लिखे जाने तक किसी की दुआ कबूल नहीं हुई थी.

अब तक गीता को पाकिस्तान में रहते हुए तकरीबन 13 साल हो गए थे. रेगिस्तान में पानी की उम्मीद उस वक्त नजर आई, जब यह बात लगभग तय हो गई कि गीता के मांबाप मिल गए हैं और उसे भारत भेजने के लिए दोनों देशों के बीच सहमति बन चुकी है. हुआ इतना भर था कि भारतीय उच्चायोग ने पाकिस्तान को उन कुछ लोगों की तसवीरें भेजी थीं, जिन्होंने गीता पर अपना हक जताया था. इन में से एक को गीता ने पहचान लिया तो सभी की बांछें खिल उठीं.

लेकिन गीता की कहानी शायद इतने सहज ढंग से खत्म होने के लिए नहीं थी. जिस परिवार को उसने अपना होने की संभावना व्यक्त की थी, उस के मुखिया बिहार के सहरसा जिले के एक गांव के जनार्दन महतो हैं. उन की बेटी लगभग उसी वक्त गुम हुई थी, जिन दिनों गीता पाकिस्तान जा पहुंची थी. जनार्दन महतो को गीता की तसवीर हूबहू अपनी लापता बेटी जैसी लगी थी और गीता भी एकदम इस बात से इनकार नहीं कर रही थी कि जनार्दन महतो उस के पिता नहीं हैं.

यह एक अच्छी खबर थी, जिस के चलते तय हुआ कि गीता 26 अक्तूबर, 2015 को पाकिस्तान से भारत भेज दी जाएगी. उस की वापसी की खासी तैयारियां भी की गईं. अब्दुल सत्तार ईधी के बेटे फैजल ईधी के दिल में न जाने क्यों गीता को ले कर यह खटका था कि वह महज भारत जाने के लिए जनार्दन महतो को पिता मान रही है.

रहस्य बनने लगी गीता के मांबाप की कहानी

बात इस मुकाम तक आ पहुंची थी कि अगर फैजल ऐतराज जताते तो और हल्ला मचता. खामोश तो वह नहीं रहे और इशारों में उन्होंने यह कह ही डाला कि जिस गीता की बात जनार्दन महतो के गांव वाले कर रहे हैं, उन के मुताबिक गीता की शादी बहुत कम उम्र में उमेश महतो नाम के शख्स से हो चुकी थी. उमेश से गीता को एक बेटा भी है, जिस की उम्र अब लगभग 12 साल है.

फैजल ने माना था कि अब मामला जटिल हो गया है, क्योंकि गीता इस बात से मना कर रही है कि वह शादीशुदा है. बकौल फैजल उन्होंने इस बात का पता करने की कोशिश की थी कि कहीं गीता उन्हें गुमराह तो नहीं कर रही है या फिर कुछ छिपा तो नहीं रही है.

इधर भारत में गीता की वापसी का इतना हल्ला मचने लगा था कि फैजल की बात उस शोरशराबे में दब कर रह गई. गीता की घर वापसी सन 2015 की खास घटनाओं में से एक थी. ‘बजरंगी भाईजान’ फिल्म का हवाला देते हुए किसी ने गीता को भाईचारे और भारतपाक की एकता की मिसाल बताया तो किसी ने उस की अनूठी कहानी को चमत्कार से कम नहीं माना.

भारतीय मीडिया और सरकार ने गीता के स्वागत में पलकपांवड़े बिछा दिए, जिस के चलते वह रातोंरात सेलिब्रिटी बन गई या बना दी गई, बात एक ही है. एयरपोर्ट पर उस का स्वागत करने के लिए अधिकारियों की फौज खड़ी कर दी गई. गीता के साथ बिलकीस बेगम और फैजल ईधी भी थे. यह फैजल की ही जिद या शर्त थी कि गीता की वतनवापसी हर्ज की बात नहीं है, लेकिन किसी भी दावेदार मांबाप को उसे सौंपने से पहले उन का डीएनए मैच करा लेना चाहिए. भारत सरकार ने भी इस पर हामी भरी थी.

विख्यात हो गई गीता

भारत आ कर गीता को तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल से मिलवाया गया. इस देश में सेलिब्रिटी होना इतना ही काफी होता है. सुषमा स्वराज तो साए की तरह गीता के साथ ही रहीं.

इन हस्तियों से मिलते वक्त गीता के चेहरे पर कोई डर या संकोच नहीं था. यह शायद इसलिए भी नहीं होगा कि वह तब जानतीसमझती ही नहीं थी कि राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री क्या बला होते हैं. वह तो विदेश मंत्रालय के अधिकारियों के इशारों पर नाच रही गुडि़या थी.

तब इस सवाल ने सिर उठाया कि अगर कहीं खुदा न खास्ता गीता का डीएनए जनार्दन महतो से नहीं मिला तो क्या होगा. इस सवाल के जवाब में विदेश मंत्रालय की तरफ से कहा गया कि ऐसी सूरत में गीता को किसी सुरक्षित जगह भेजे जाने का फैसला लिया जा चुका है. जब तक उस के मांबाप नहीं मिल जाते, तब तक गीता वहीं रहेगी.

दिल्ली में कई नामचीन राजनैतिक हस्तियों से मिल कर गीता इंदौर के स्कीम नंबर 71 स्थित मूक बधिर संस्थान भेज दी गई, जिस की कर्ताधर्ता शहर की मशहूर समाजसेवी मोनिका पंजाबी हैं. इस संस्थान में रह रहे दिव्यांगों ने गीता के आने पर दीवाली सा त्यौहार मनाया. हैरत और दिलचस्पी की बात गीता का उन से इतने आत्मीय ढंग से मिलना रहा, जैसे वह उन्हें बरसों से जानती हो.

देश आ कर खुद को बेहद खुश और जज्बाती बता रही गीता के पांव वाकई ऐसा स्वागतसत्कार देख कर जमीन पर नहीं पड़ रहे थे. उसे अपनी अहमियत का अहसास हो चला था कि वह वाकई कुछ खास है.

जनार्दन महतो और गीता का डीएनए नहीं मिला तो सुषमा स्वराज की नेक कोशिशों को झटका लगा. साथ ही विदेश मंत्रालय के उन होनहार और अतिउत्साही अधिकारियों के चेहरे धुल गए, जिन्होंने एक मामूली सी यह बात सोचने की भी जहमत नहीं उठाई थी कि जिस गीता की बात सहरसा के गांव के लोग कर रहे हैं, उस का पति अगर पंजाब में रहता है, जिस ने गीता के मामले में कोई पहल नहीं की थी.

फिर एक के बाद एक गीता के कई कथित मांबाप आए और उन्होंने उसे अपनी बिछड़ी बेटी बताया पर किसी का डीएनए गीता से मैच नहीं हुआ और न ही किसी को गीता ने बतौर मांबाप पहचाना.

धीरेधीरे गीता के असल मांबाप के मिलने की उम्मीदें धूमिल होती गईं. अब तक गीता का इतना प्रचारप्रसार हो चुका था कि अगर उस के मांबाप किसी घने जंगल में भी रह रहे होते तो उन्हें खबर लग जाती कि गीता करांची से इंदौर वापस आ चुकी है, लिहाजा उसे घर ले आना चाहिए.

अपने मांबाप की बाट जोह रही गीता को इंदौर में रहते भी लंबा वक्त बीत गया था. इंदौर स्थानीय मीडिया में अकसर वह सुर्खियों में रही. उस का खानापीना और उठनाबैठना तक खबर बनने लगा था तो इस की वजह प्रशासन की सतर्कता थी जो पूरी तरह विदेश मंत्रालय के दिशानिर्देशों पर काम कर रहा था और आज भी कर रहा है.

पेचीदा हुई गीता की रहस्यमय कहानी

जब दरजनों मांबाप दावेदारी ले कर आए और मुंह लटका कर लौट गए तो इंदौर प्रशासन से ले कर विदेश मंत्रालय के गलियारों तक में गीता को ले कर घबराहट फैलने लगी. सुषमा स्वराज कब गीता की खैरियत पूछ बैठें, इस खयाल से ही अधिकारी कांपने लगे थे. जल्दबाजी में गीता के मांबाप को ढूंढने वाले को एक लाख रुपए का इनाम देने की घोषणा कर दी गई. लेकिन उस से कोई फायदा नहीं हुआ.

अब तक यह बात भी साबित हो चुकी थी कि गीता के मांबाप अगर मिल जाएं तो उन की चांदी हो जाना तय है. क्योंकि सरकार उस पर मेहरबान है. यह मामला ऐसा था कि इस में कोई कुछ नहीं कर सकता था. सुषमा स्वराज भी अकसर गीता को ले कर ट्वीट करती रहीं कि वह देश आ कर खुश है और उस के मांबाप को ढूंढने की पूरी कोशिशें की जा रही हैं.

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पर गीता खुश नहीं थी. पिछले साल जुलाई के पहले सप्ताह में अचानक वह मूकबधिर केंद्र से लापता हो गई. इस के बाद तो इंदौर से ले कर दिल्ली और करांची तक हड़कंप मच गया. गीता की गुमशुदगी की खबर कुछ देर के लिए ही सही, आग की तरह फैली और उसे ले कर तरहतरह की वे बातें हुईं जो नहीं होनी चाहिए थीं.

इंदौर के 3 थानों की पुलिस गीता की खोज में जुट गई और कुछ देर बाद रात होने से पहले उसे रणजीत हनुमान मंदिर से पकड़ लिया गया. चंदननगर थाने की पुलिस जब गीता को सहीसलामत मूकबधिर केंद्र छोड़ गई, तब कहीं जा कर प्रशासन और केंद्र की संचालिका मोनिका पंजाबी की जान में जान आई.

गीता मूकबधिर केंद्र से गायब क्यों और कैसे हुई थी, इन 2 सवालों का जवाब आज तक किसी ने नहीं दिया, खासतौर से यह जवाबदेही केंद्र की संचालिका मोनिका पंजाबी की बनती थी. इन सवालों का जवाब मांगने के लिए जब कुछ मीडियाकर्मी मूकबधिर केंद्र पहुंचे तो वहां की एक महिला कर्मचारी ने उन से बदतमीजी करते हुए उन्हें कैमरे बंद कर दरवाजे के बाहर चले जाने का फरमान सुना दिया.

पुलिस की तरफ से भी कोई संतोषजनक जवाब नहीं मिला था. एडीशनल एसपी रूपेश द्विवेदी ने यह कहते हुए पल्ला झाड़ लिया कि मूकबधिर केंद्र के संचालन पर बात करना पुलिस के कार्यक्षेत्र से बाहर है.

बात आईगई हो गई लेकिन समझदारों को यह इशारा जरूर कर गई कि गीता बोझ नहीं तो सरकार के गले का ढोल जरूर बनती जा रही है, जिसे खुद जोशजोश में सरकार ने अपने गले में बांधा था. मूकबधिर संस्थान को गीता के खर्चे के लिए 30 हजार रुपए दिए जा रहे थे.

बात पहुंच गई शादी तक

यहां पर एक बात यह उठी कि गीता को संस्थान में पर्याप्त सुविधाएं मिल भी रही थीं या नहीं, जिस से उसे वहां घुटन महसूस होने लगी थी. ऐसे सवाल जब सुषमा की जानकारी में आए तो उन्हें चिंता हुई. उन्होंने अपने भोपाल प्रवास के दौरान गीता की शादी के संकेत दिए. चूंकि बात सुषमा स्वराज की थी, इसलिए मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान भी भागेभागे इंदौर पहुंच गए और गीता से मिल कर बोले कि मांबाप नहीं मिले तो क्या हुआ, मामा तो है. गौरतलब है कि शिवराज सिंह को खुद को मामा कहलवाना अच्छा लगता है.

एकाएक ही इसी साल फरवरी के महीने में गीता को लगा कि अब उसे शादी कर घर बसा लेना चाहिए. उस ने सुषमा स्वराज को अपनी यह इच्छा बताई तो गीता के मामले में एक बार फिर उबाल आ गया. सरकार ने उस के स्वयंवर की तैयारियां शुरू कर दीं.

स्वयंवर का यह ड्रामा कैसे परवान चढ़ा और फिर कैसे औंधे मुंह लुढ़का, यह जानने से पहले ज्ञानेंद्र पुरोहित नाम के शख्स से रूबरू होना जरूरी है, जो गीता की जिंदगी में सत्तार परिवार और सुषमा स्वराज के बाद आए तीसरे अहम किरदार हैं.

ज्ञानेंद्र की दास्तां भी किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं है. वह उस वक्त महज 21 साल के थे, जब 1997 में उन के बड़े भाई 26 वर्षीय आनंद पुरोहित की भोपाल के नजदीक एक रेल हादसे में मौत हो गई थी. ज्ञानेंद्र आनंद के काफी चहेते थे. उम्र में छोटे होते हुए भी वह बड़े भाई की सेवा करते थे क्योंकि आनंद मूकबधिर थे. जाहिर है मूकबधिरों की परेशानियों और दुख का अंदाजा उन्हें बचपन से ही था.

बड़े भाई की एक्सीडेंट में दर्दनाक मौत ज्ञानेंद्र के लिए एक बहुत बड़ा सदमा थी. तब ज्ञानेंद्र सीए कर रहे थे लेकिन उन्होंने पढ़ाई छोड़ कर मूकबधिरों की सेवा करने की ठान ली. परिवारजनों और दोस्तों ने हर तरह से समझाया लेकिन बेचैन ज्ञानेंद्र के मन की छटपटाहट ने किसी की एक नहीं सुनी.

मूकबधिरों के मसीहा ज्ञानेंद्र

मूकबधिरों पर ज्ञानेंद्र ने जितना काम किया, उतना शायद ही देश में किसी और ने किया होगा. सन 1997 से ले कर 1999 तक वह देशविदेश घूमे. इस दौरान ज्ञानेंद्र ने शिद्दत से महसूस किया कि देश में मूकबधिर बेहद दयनीय हालत में रह रहे हैं. उन की कहीं कोई सुनवाई नहीं होती और उन से सरकारी या सामाजिक हमदर्दी एक दिखावा और छलावा भर है. सांकेतिक भाषा यानी साइन लैंग्वेज तो वह पहले से ही जानते थे लिहाजा दुनिया घूमने के दौरान उन्हें कई करुण अनुभव हुए.

आस्ट्रेलिया के पर्थ शहर में हुई वर्ल्ड डैफ कौन्फ्रैंस में ज्ञानेंद्र का प्रस्तुतीकरण इतना प्रभावी था कि उन्हें वहीं की एक संस्था वेस्टर्न डैफ सोसायटी ने अच्छे पैकेज पर नौकरी की पेशकश कर डाली. लेकिन सिर्फ पैसे कमाना या विदेश में रहने की शान बघारना ज्ञानेंद्र की जिंदगी का मकसद नहीं था. अपना मकसद पूरा करने के लिए उन्होंने बड़े भाई के नाम पर आनंद सर्विस सोसायटी बना ली थी.

सन 2001 में ज्ञानेंद्र ने मोनिका पुरोहित से शादी कर ली, जो खुद मूकबधिरों के लिए काम करती थीं. पुरोहित दंपति ने मूकबधिरों के लिए अपनी जिंदगी झोंक दी जो एक असामान्य काम था. इसी दौरान ज्ञानेंद्र ने अपनी अधूरी पढ़ाई शुरू की और एक खास मकसद से एलएलबी के बाद एलएलएम भी किया. ज्ञानेंद्र मूकबधिरों के मुकदमे मुफ्त में लड़ने लगे तो उन की चर्चा इंदौर के बाहर भी शुरू हो गई.

ज्ञानेंद्र की पहल पर ही इंदौर के तुकोगंज इलाके में पहला मूकबधिर थाना खोला गया. बड़े पैमाने पर चर्चा में वह तब आए जब उन्होंने राष्ट्रगान का सांकेतिक भाषा में न केवल अनुवाद किया बल्कि राष्ट्रगान को सांकेतिक भाषा में मान्यता दिलवाने का काम भी किया. लंबी कानूनी अड़चनों को लांघते हुए उन्होंने मूकबधिरों के लिए राष्ट्रगान की सरकारी मान्यता हासिल की. सन 2001 में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी सरकार ने ज्ञानेंद्र के इस जज्बे की कद्र भी की थी.

आज सरकारी नौकरियों में मूकबधिरों के लिए जो आरक्षण मिला हुआ है, वह भी ज्ञानेंद्र की ही एक अहम उपलब्धि है जिस के बाबत उन्होंने लंबी कानूनी लड़ाई लड़ते हुए आंदोलन भी छेड़ा था. अब ज्ञानेंद्र की नई कोशिश या लड़ाई इस बात की है कि सांकेतिक भाषा को संवैधानिक भाषा का दरजा मिले.

वह ज्ञानेंद्र पुरोहित ही थे, जिन्होंने न केवल गीता की खोज में अहम रोल निभाया बल्कि उस की हर मुश्किल आसान करने में उस की पूरी मदद भी की. जब गीता के भारत आने की बात चली तो ज्ञानेंद्र ने औनलाइन उस से सांकेतिक भाषा में बात की और बताया था कि गीता भारत आ कर सलमान खान से मिलना चाहती है और सहरसा के जनार्दन महतो को अपना पिता होना बता रही है.

गीता जब इंदौर आई तो ज्ञानेंद्र ने उसे सांकेतिक भाषा सिखाई. गीता और बाकी दुनिया के बीच उन्होंने दुभाषिए और मध्यस्थ का काम किया. ईधी फाउंडेशन भी चाहता था कि भारत जा कर गीता ज्ञानेंद्र के संरक्षण में रहे ताकि उस की बातें लोगों को ठीक तरह से समझ आ सकें और उस का सच सामने आए.

ज्ञानेंद्र के मुताबिक पाकिस्तान में रहते गीता ठीक से सांकेतिक भाषा नहीं जानती थी. गीता ने खुद ही अपने इशारे बना रखे थे, जिन में बाद में ज्ञानेंद्र ने सुधार किया और देखते ही देखते गीता सांकेतिक भाषा सीख गई.

आगे बढ़ी शादी की बात

गीता ने जब शादी की इच्छा व्यक्त की तो एक बार फिर मीडिया उस के रंग में रंग गया. विदेश मंत्रालय ने गीता के लिए उपयुक्त वर ढूंढने की कोई कसर नहीं छोड़ी. फेसबुक पर खासतौर से एक पेज बनाया गया, जिस के जरिए गीता से शादी करने के इच्छुक युवकों से विवाह प्रस्ताव कुछ शर्तों पर मांगे गए. मीडिया और सोशल मीडिया पर भी गीता के स्वयंवर की जम कर चर्चा हुई.

सरकार ने घोषणा कर डाली कि जिसे गीता जीवनसाथी के रूप में चुनेगी, उसे सरकारी नौकरी, मकान और दूसरी सहूलियतें दी जाएंगी. पर्याप्त प्रचारप्रसार के बाद भी गीता के स्वयंवर में युवक मधुमक्खियों की तरह नहीं टूटे.

सरकारी दहेज का तगड़ा लालच भी जातपात, नाथअनाथ और धर्म की दीवार नहीं भेद पाया. फिर भी गीता के लिए कुछ प्रस्ताव आए. इस में भी ज्ञानेंद्र ने पूरी सहायता की. आखिर में विदेश मंत्रालय की सहमति के बाद 14 युवकों के प्रस्ताव गीता के पास भेजे गए.

यह कोई त्रेता या द्वापर युग का स्वयंवर नहीं था, जिस में उम्मीदवार को धनुष तोड़ना हो या फिर घूमती मछली की आंख पर निशाना साधना हो. यह लोकतांत्रिक कागजी स्वयंवर था, जिस में अंतिम फैसला गीता को लेना था. गीता से शादी करने के लिए कर्मकांडी पंडित से ले कर लेखक तक आगे आए तो एक बार लगा कि बात बन जाएगी. मांबाप भले ही न मिले हों लेकिन उपयुक्त जीवनसाथी चुन कर गीता पति के साथ बाकी जिंदगी चैन, सुकून और आराम से गुजारेगी.

7 जून को जिन 6 उम्मीदवारों को इंदौर बुलाया गया था, उन में से केवल 4 ही पहुंचे. चुनिंदा लोगों की मौजूदगी में स्वयंवर की प्रक्रिया शुरू हुई, जिस में गीता को इन युवाओं से सवालजवाब करने की आजादी मिली हुई थी. यह छूट उम्मीदवारों को भी दी गई थी ताकि वे गीता से सवाल कर सकें.

इंदौर शहर का माहौल तो गीता के इस अनूठे स्वयंवर को ले कर गर्म था ही लेकिन देश भर के लोग दिलचस्पी से टीवी स्क्रीन के सामने टकटकी लगाए देख रहे थे कि कब गीता के स्वयंवर वाली खबर दिखाई जाती है.

स्वयंवर में गीता की शर्तें

उस दिन दोपहर ठीक साढ़े 12 बजे गीता नीले रंग के सलवारसूट में मूकबधिर संस्थान के हौल में आई तो खूब फब रही थी. यह मालवांचल की आबोहवा का ही असर था कि कल तक दुबलीपतली और हमेशा घबराई सी दिखने वाली गीता भरीपूरी और आत्मविश्वास से लबरेज दिख रही थी. उस ने भरपूर नजरों से उम्मीदवारों की तरफ देखा और इशारे से स्वयंवर के पहले चरण को शुरू करने का इशारा कर दिया.

प्रथम ग्रासे मच्छिका वाली कहावत उस समय लागू हुई, जब इंदौर के ही एक उम्मीदवार 21 वर्षीय सचिन पाल ने गीता की इस शर्त को मानने से इनकार कर दिया कि उस के भावी पति को सांकेतिक भाषा आनी चाहिए और नहीं आती है तो सीखनी होगी.

अलबत्ता पेशे से मोल्डिंग मशीन औपरेटर सचिन ने गीता को हर हाल में खुश रखने की शर्त मानी लेकिन गीता की दूसरी इस अहम शर्त से वह मुकर गया कि वह गीता के मांबाप को ढूंढने में मदद करेगा. उस का यह कहना व्यवहारिक बात थी कि अब गीता के मांबाप को ढूंढना वक्त और पैसे की बरबादी है.

भोपाल से गए राजकुमार स्वर्णकार और उन के साथ गए मांबाप को गीता की हर शर्त मंजूर थी. राजकुमार भोपाल में ई-रजिस्ट्री कराने और स्टांप पेपर बेचने का काम करता है. यह परिवार किसी भी कीमत पर गीता को अपनी बहू बनाने के लिए तैयार दिखा. राजकुमार के पिता प्रेमनारायण स्वर्णकार ने बताया कि गीता की खुशी के लिए उन का पूरा परिवार ही सांकेतिक भाषा सीखने को तैयार है.

अहमदाबाद से आया 26 वर्षीय रितेश पटेल तो गीता को ले कर काफी उत्साहित नजर आया. रट्टू तोते की तरह उस ने भी गीता को खुश रखने का वचन दोहराया. टीकमगढ़ से आया 30 वर्षीय अरुण नामदेव आबकारी विभाग में नौकरी करता था. अरुण का नजरिया यह था कि गीता एक फेमस और सेलिब्रिटी है, जिसे जीवनसाथी बना कर उसे अच्छा लगेगा. अरुण ने गीता के मांबाप को ढूंढने का वादा भी किया.

जब गीता के पूछने की बारी आई तो उस ने इधरउधर के बजाय मुद्दे की यह बात उम्मीदवारों से पूछी कि उन की आर्थिक और पारिवारिक हैसियत क्या है. इस के बाद स्वयंवर में दरबारियों की हैसियत से बैठे लोगों के चेहरे पर निराशा के भाव नजर आने लगे. क्योंकि गीता ने वह रिस्पौंस नहीं दिया, जिस की उन्हें उम्मीद थी. मूकबधिर संस्था की कर्ताधर्ता मोनिका और ऊषा पंजाबी के अलावा ज्ञानेंद्र पुरोहित और उन की पत्नी मोनिका पुरोहित भी स्वयंवर में मौजूद थे.

फजीहत बना स्वयंवर

स्वयंवर के दूसरे दिन 8 जून को आमंत्रित 7 में से मात्र 2 ही उम्मीदवार पहुंचे तो साफ लगने लगा था कि शायद ही बात बने. इस दिन पिछले दिन के मुकाबले गीता काफी आक्रामक मूड में नजर आई और उस ने मथुरा और जयपुर से आए युवकों पर सवालों की बौछार लगा दी तो दोनों घबरा गए.

गीता ने एक परिपक्व और दुनियादारी देख चुकी लड़की की तरह इन दोनों से पूछा कि वे जहां रहते हैं, वह शहर है या गांव. वे खुद के मकान में रहते हैं या किराए के मकान में? कार है या नहीं और शादी के बाद क्या वह इंदौर में रहेंगे? गीता ने यह भी जोर दे कर पूछा कि आप मांबाप को ढूंढने में मेरी मदद करोगे या नहीं. युवकों की पढ़ाईलिखाई की जानकारी भी उस ने ली.

ये युवक दुम दबा कर चले गए तो स्वयंवर का यह ड्रामा भी खत्म हो गया. गीता ने इन पंक्तियों के लिखे जाने तक कोई नाम फाइनल नहीं किया था, उलटे वह और उम्मीदवारों से मिलने की बात कर रही थी. इधर स्वयंवर के आयोजक पहले से ही अपना सिर धुन रहे थे कि जैसेतैसे बायोडाटा छांटछांट कर 14 लोगों को बुलाया था, उन में से भी केवल 6 ही आए और वे भी गीता की कसौटी पर खरे नहीं उतरे.

इस के बाद यह खबर आई कि गीता ने अपने हमदर्द और मददगार ज्ञानेंद्र पुरोहित की यह कहते हुए जम कर क्लास लगाई कि वह उस की तसवीरें और जानकारी मीडिया में लीक कर रहे हैं. और तो और एक बार तो उस ने ज्ञानेंद्र को पहचानने तक से इनकार कर दिया.

अब यह किसी की समझ में नहीं आ रहा था कि गीता आखिरकार चाहती क्या है. एक कयास यह भी लगाया गया कि वह सरकारी इमदाद और मूकबधिर संस्था छोड़ने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही है तो दूसरा अंदाजा यह लगाया कि कहीं सचमुच में गीता शादी कर घर बसाना चाहती है या फिर उस ने सरकारी दबाव में आ कर स्वयंवर रचाने की सहमति दे दी थी.

अब आगे जो भी हो, लेकिन गीता को ले कर कई सवाल और शक स्वाभाविक रूप से उठ रहे हैं. इन में पहला यह है कि क्या वह सचमुच भारतीय ही है. सवाल नाजुक है लेकिन है अहम, वजह गीता को भारत वापस आते तो सभी ने देखा लेकिन मांबाप से बिछुड़ते किसी ने नहीं देखा था.

सवालों के चक्रव्यूह में गीता

उच्चायोग और विदेश मंत्रालय ने ईधी फाउंडेशन के कहने भर से कैसे मान लिया कि वह अब से कोई 14 साल पहले समझौता एक्सप्रैस में मिली थी. मुमकिन तो यह भी है कि वह पाकिस्तान की ही हो. ईधी फाउंडेशन को क्या जरूरत थी कि गीता द्वारा हिंदू देवीदेवताओं की पूजापाठ करती तसवीरें वायरल करे.

दरजन भर लोगों की डीएनए जांच हुई लेकिन इन में से कोई गीता का मांबाप नहीं निकला तो महज इस उम्मीद व अंदाजे की बिना पर गीता को भारत क्यों लाया गया कि आज नहीं तो कल उस के मांबाप मिल ही जाएंगे. सवाल यह भी है कि गीता संस्थान से भागी क्यों थी? और आखिर में उस ने स्वयंवर में आए उम्मीदवारों को रिजेक्ट क्यों कर दिया? जब उसे शादी नहीं करनी थी तो इस ड्रामे की क्या जरूरत थी?

सरकार के गले की हड्डी बन चुकी गीता की कहानी एक नाजुक मसला है, जिसे हलके में लेने की चूक सरकार कर चुकी है. उस की शादी कर पल्ला झाड़ने या छुटकारा पाने की आखिरी कोशिश भी बेकार गई तो लगता है गीता या तो किसी मनोविकार जैसे अवसाद की शिकार हो गई है और उस ने जानबूझ कर ज्ञानेंद्र पुरोहित को लताड़ लगाई.

लाख टके का सवाल यह भी है कि अगर उस के मांबाप नहीं मिले और अब शादी के लिए कोई आगे नहीं आया तो सरकार क्या करेगी? गीता की देखरेख और शाही आवभगत में करीब 6 लाख रुपए प्रतिवर्ष से भी ज्यादा का खर्च आ रहा है. सरकार कब तक यह खर्च उठाएगी और क्यों उठाएगी, जबकि गीता के भारतीय होने की पुष्टि अभी तक नहीं हुई है?

मान भी लिया जाए कि गीता भारतीय है और सच बोल रही है तो उस का भविष्य क्या है? सरकार कैसे उस का पुनर्वास करेगी और भविष्य में कभी गीता फिर भागने की कोशिश नहीं करेगी, इस बात की गारंटी कौन ले रहा है?

मनोहर कहानियां से खास बातचीत में ज्ञानेंद्र पुरोहित ने यह आशंका जताई कि गीता इन दिनों अवसाद में है और इसी के चलते कोई आत्मघाती कदम भी उठा सकती है. लिहाजा उस पर विशेष ध्यान दिया जाना जरूरी है.

11 लोगों द्वारा सामूहिक आत्महत्या : अंधविश्वास की पराकाष्ठा

सुबह के साढ़े 7 बज चुके थे, पर ललित की दुकान अभी तक बंद थी. जबकि रोजाना साढ़े 6 बजे ही दुकान खुल जाती थी. दुकान बंद देख कर पड़ोस में रहने वाले गुरचरण सिंह को आश्चर्य हुआ. क्योंकि उन के घर का मुख्य दरवाजा खुला था. जबकि अमूमन होता उलटा था, दुकान खुली होती थी और घर का दरवाजा बंद होता था.

संतनगर, बुराड़ी की गली नंबर 2 में रहने वाले गुरचरण सिंह का घर ललित के पड़ोस में ही था. ललित के घर का मुख्य दरवाजा खुला देख गुरचरण सिंह उन के घर के भीतर चले गए. अंदर का दृश्य देख कर वह हक्केबक्के रह गए. छत पर लगी लोहे की ग्रिल से घर के सारे सदस्य फांसी के फंदे पर लटके हुए थे. यह खौफनाक दृश्य देख गुरचरण सिंह उल्टे पांव वापस लौट आए और पड़ोस के लोगों को इकट्ठा कर अंदर की जानकारी दी. साथ ही उन्होंने पुलिस को भी सूचना दे दी. गली नंबर 2 में रहने वाले जिस किसी ने भी घर में जा कर देखा, हैरान रह गया. घर के सभी 11 लोगों के फांसी के फंदे पर झूलने की बात सुन कर कुछ ही देर में वहां लोगों की भीड़ जुट गई.

कुछ ही देर में बुराड़ी थाने की पुलिस भी आ गई. यह बात पहली जुलाई 2018 की सुबह की थी. एक ही घर के 11 लोगों की मौत बहुत बड़ी घटना थी. सूचना पा कर थोड़ी देर में पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों ने भी घटनास्थल पर पहुंचना शुरू कर दिया था.

पुलिस आयुक्त के आदेश पर क्राइम ब्रांच के कई अधिकारी भी घटनास्थल पर पहुंच गए. फौरेंसिक और क्राइम इन्वैस्टीगेशन टीमें भी मौके पर पहुंच कर जांच में जुट गईं. मरने वालों में 4 पुरुष और 7 महिलाएं थीं. जांच के दौरान घर की बाहरी दीवार पर 11 पाइप लगे मिले. इन में से 4 पाइप बडे़ और सीधे थे, जबकि 7 अन्य पाइपों का मुंह नीचे की ओर था.

घर की मुखिया नारायणी देवी की लाश नीचे फर्श पर पड़ी थी. उन के 2 बेटों भुवनेश और ललित, उन की पत्नियां सविता और टीना, नारायणी की विधवा बेटी प्रतिभा और प्रतिभा की बेटी प्रियंका की लाशें जाल में बंधी चुन्नियों से लटकी थीं.

भुवनेश के 3 बच्चे नीतू, मेनका व ध्रुव और ललित के बेटे शिवम की लाशें भी चुन्नी के सहारे जाल से लटकी हुई थीं. सभी लाशें प्रथम तल पर थीं. यह पूरा परिवार भोपाल सिंह भाटिया का था. भोपाल सिंह की मौत करीब 11 साल पहले हो गई थी.

प्रथम तल पर जाने वाली सीढ़ी के दोनों दरवाजे खुले थे. घर में कोई सुसाइड नोट नहीं मिला. न ही लूटपाट के कोई निशान थे. संभवतया देश भर में यह अपनी तरह की पहली घटना थी. पुलिस ने जरूरी काररवाई कर के 11 लाशों को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया.

नारायणी देवी का एक बेटा दिनेश सिविल कौंट्रेक्टर है जो अपने परिवार के साथ राजस्थान के चित्तौड़गढ़ में रहता है और उन की एक बेटी सुजाता पानीपत में रहती है. पुलिस ने इन दोनों भाईबहनों के पास भी सूचना भिजवा दी.

सामूहिक आत्महत्या की देश की सब से बड़ी घटना

मामले की जांच क्राइम ब्रांच ने शुरू कर दी. ज्योंज्यों तफ्तीश आगे बढ़ी मामला साफ होता गया. शुरू में हत्या और सामूहिक आत्महत्या, दोनों एंगल से जांच शुरू की गई. भाटिया परिवार के बचे सदस्यों ने यह हत्या का मामला बताया. भोपाल सिंह की बेटी सुजाता ने कहा कि उन का परिवार आत्महत्या नहीं कर सकता. उन की योजनाबद्ध तरीके से किसी ने हत्या की है. परिवार धार्मिक जरूर था पर अंधविश्वासी नहीं था.

पुलिस की जांच में 11 लोगों की मौत का खुलासा हुआ तो अंधविश्वास की एक ऐसी खौफनाक कहानी सामने आई जिसे सुन कर हर कोई दंग रह गया. अंधविश्वास के दलदल में फंस कर समूचा परिवार मौत के मुंह में समा गया. अंधविश्वास से जुड़ी यह विरल घटना थी, जिसे जान कर हर कोई हैरान और सन्न रह गया. टीवी चैनलों पर दिनभर भाटिया परिवार की मौत की सनसनीखेज खबरें प्रसारित होने लगीं.

अंधविश्वास की इस घटना ने तमाम वैज्ञानिक और शैक्षिक तरक्की को अंगूठा दिखा दिया. इस घटना ने समाज के उस अंधकार को उजागर किया, जिस के भीतर सदियों से डूबा यह देश परमात्मा, आत्मा, स्वर्ग, नरक, मुक्ति और मोक्ष को तलाशता रहा है.

पुलिस जांच में सामने आया कि घर की मुखिया जिन नारायणी देवी की लाश फर्श पर पड़ी मिली, उन्हें गला घोंट कर मारा गया था. बाकी सभी के शव जाल से लटके मिले. उन की आंखों पर पट्टी बंधी थी, मुंह में कपड़ा ठूंसा हुआ था. हाथ बंधे हुए थे.

पुलिस को मकान से जो डायरी मिली उस से पता चला कि यह सब मौतें अंधविश्वास की वजह से हुई थीं. डायरी में लिखी बातों से पता लगा कि ललित पिता के अलावा परिवार से जुड़े 5 अन्य सदस्यों की आत्मा को भी मोक्ष दिलाना चाहता था. डायरी में 9 जून को लिखा था, ‘अभी 7 आत्माएं मेरे साथ भटक रही हैं. क्रिया में सुधार करोगे तो गति बढ़ेगी. मैं इस चीज के लिए भटक रहा हूं. ऐसे ही सज्जन सिंह, हीरा, दयानंद, कर्मानंद, राहुल, गंगा और जमुना देवी मेरे सहयोगी बने हुए हैं.’

ललित ने जिन लोगों का जिक्र किया है उन में सज्जन सिंह ललित का ससुर यानी उस की पत्नी टीना का पिता, हीरा प्रतिभा का पति, दयानंद और गंगा देवी ललित की बहन सुजाता के ससुराल पक्ष के लोग थे, जो कुछ समय पहले मरे थे.

संयुक्त आयुक्त क्राइम ब्रांच आलोक कुमार के मुताबिक तफ्तीश में जितने भी सबूत मिले, उस से साफ हो गया कि परिवार के सभी सदस्यों ने अंधविश्वास के चलते सामूहिक आत्महत्या की थी. ऐसा करने के लिए पूरे परिवार को ललित ने मजबूर किया था.

शुरू में इन लोगों की हत्या का संदेह जताया गया पर बाद में सबूतों और पूछताछ के आधार पर एक ऐसे परिवार की कहानी सामने आई, जो अंधविश्वास के ऐसे खौफनाक अंधकार में फंसा हुआ था कि किसी में विवेक नाम की जरा भी शक्ति नहीं बची थी. अंधविश्वास के दलदल में फंसे इस परिवार की भयावह हकीकत जान कर हर कोई सन्न रह गया.

अंधविश्वास का अंधकूप

तलाशी के दौरान पुलिस को छानबीन में घर से कई डायरियां मिलीं, इन डायरियों में परिवार के सदस्यों की इन मौतों की पूरी पटकथा लिखी थी. पुलिस ने कडि़यां जोड़ीं तो इस परिवार द्वारा मृत पिता भोपाल सिंह की ‘आत्मा’ के आदेश पर ‘परमात्मा’ से मिल कर वापस लौट आने का झूठा भ्रम फैलाया गया था.

भाटिया परिवार के मझले बेटे ललित के सिर में कुछ साल पहले चोट लगी थी. जिस की वजह से वह बोल नहीं पाता था. चोट से उस के दिमाग पर बुरा असर पड़ा था. उस का 3 साल तक इलाज चला. इस के बाद वह थोड़ाथोड़ा बोलने लगा था. इसे वह चमत्कार मानता था.

ललित ने दावा करना शुरू कर दिया था कि उस पर उस के पिता भोपाल सिंह की आत्मा आती है और वह परिवार को सुखी रखने और दुख दूर करने के उपाय बताती है. बाद में उस ने डायरी लिखनी शुरू की जिस में धार्मिक आदेशात्मक बातें लिखता था.

पुलिस के अनुसार ललित ने अंधविश्वासी क्रियाएं जुलाई, 2007 से शुरू कीं. ललित पूजापाठ से परिवार की समस्याएं दूर करता था. पड़ोसी बताते हैं कि इस काम में ललित की पत्नी टीना भी मदद करती थी. वह पूरी धार्मिक हो गई थी.

भाटिया परिवार हदे से परे तक धार्मिक प्रवृत्ति का था और पूजापाठ में डूबा रहता था. साथ ही वह घोर अंधविश्वासी भी था. पूरा परिवार सुबह, दोपहर और शाम यानी 3 टाइम पूजापाठ करता था. क्राइम ब्रांच को 5 जून, 2013 से 30 जून, 2018 तक की तारीखों में लिखी 11 डायरियां मिलीं.

इन डायरियों में अलगअलग तरह की लिखावट थी. ज्यादातर लिखावट प्रियंका की थी. ललित पर जब पिता का साया आता था और वह जो बोलता था उसे प्रियंका ही नोट करती थी.

भाटिया परिवार को भरोसा था कि दिवंगत पिता की आत्मा परिवार की मदद कर रही है. यह विश्वास इसलिए बढ़ा क्योंकि घर के बाहर दोनों भाइयों की 2 दुकानें अच्छी चल रही थीं. भुवनेश की बेटी मेनका भी स्कूल में टौपर बच्चों में से थी. भुवनेश की किराने की दुकान थी और ललित की प्लाईवुड की.

भाइयों के बच्चे भी अच्छे नंबरों से पास होते थे. इन के अलावा ललित की भांजी प्रियंका को मांगलिक बताया गया था. इस के बावजूद उस का रिश्ता तय हो गया था. 17 जून, 2018 को ही प्रियंका की सगाई नोएडा के एक इंजीनियर लड़के से तय हो गई थी और परिवार ने सगाई का कार्यक्रम बड़ी खुशीखुशी किया था.

इस से पहले ललित ने प्रियंका का रिश्ता न होने पर उसे मांगलिक मान कर घर में हवनपूजा की थी. जिस में उस ने दावा किया था कि उस के पिता की आत्मा भी मौजूद है. प्रियंका के मांगलिक होने पर ललित ने उज्जैन जा कर भी पूजापाठ कराया था. ललित तंत्रमंत्र क्रियाएं भी कराता रहता था.

जांच के दौरान घर की बाहरी दीवार पर 11 पाइप लगे मिले. यह पाइप भी ललित ने ही लगवाए थे. इन की वहां जरूरत भी नहीं थी. पुलिस को यह पता नहीं लगा कि ललित ने ये पाइप किसलिए लगवाए थे.

पढ़ेलिखे बेवकूफ

पूरा भाटिया परिवार पढ़ालिखा था. 32 साल की प्रियंका ने एमबीए किया था. वह दिल्ली में ही पढ़ीलिखी थी. इस समय प्रियंका नोएडा की सीपीएम ग्लोबल कंपनी में नौकरी करती थी. इस से पहले वह एक नामी सौफ्टवेयर कंपनी में थी.

प्रियंका की भी धर्म, ज्योतिष और धर्मगुरुओं के प्रति रुचि थी. वह सोशल मीडिया पर सक्रिय रहती थी. जन्म के 2 साल बाद ही प्रियंका के पिता हीरा की मृत्यु हो गई थी. इस के बाद वह अपनी मां के साथ राजस्थान से आ कर संतनगर, बुराड़ी में रहने लगी थी. प्रियंका की मां प्रतिभा घर पर बच्चों को ट्यूशन पढ़ाती थी.

प्रियंका का रिश्ता हो जाने पर ललित ने अपने पिता और भगवान का शुक्रिया करने के लिए 24 से 30 जून तक 7 दिन की पूजा साधना क्रिया का प्रोग्राम तय किया था, जिस में पूरे परिवार को शामिल होना था. इस बात की तस्दीक डायरी में लिखी बातों से होती है.

डायरी में एक सप्ताह पहले लिखा गया था कि इस पूजा का उद्देश्य भगवान को धन्यवाद देना था, क्योंकि पूरे परिवार का मानना था कि भगवान उन पर आशीर्वाद बनाए हुए हैं. कुछ वर्षों के दौरान ललित अपने परिवार को यह समझाने में सफल हो गया था कि पिता की आत्मा की वजह से उन का परिवार आर्थिक रूप से मजबूत हुआ है.

डायरी में परिवार के सदस्यों की मौत का पूरा बयौरा लिखा गया था. डायरी में एक जगह लिखा था, ‘सभी सदस्य मोक्ष प्राप्त करने के बाद भगवान से मिल कर वापस धरती पर आ जाएंगे. इस के लिए तैयार रहना.’

आगे लिखा था, ‘बड़ पूजा क्रिया की जाएगी. यानी बड़ वृक्ष के नीचे लटकी जड़ों की तरह सब को लटकने की क्रिया करनी होगी. यह पूजा पूरी लगन और श्रद्धा से लगातार 7 दिन करनी है. पूजा के समय अगर कोई घर में आ जाए तो पूजा अगले दिन से शुरू होगी.’

एक जगह लिखा था, ‘9 सदस्यों के लिए भगवान का रास्ता जाल (घर में लगा लोहे का जाल) से शुरू होता है. बेबी (प्रतिभा) मंदिर के निकट स्टूल पर खड़ी होगी. 10 बजे भोजन का और्डर किया जाएगा. मां रोटी खिलाएंगी. क्रिया 1 बजे होगी. गीला कपड़ा मुंह में रखना होगा. टेप से हाथों को बांधना होगा और कानों को रूई से बंद करना होगा.’ आगे लिखा था, ‘पट्टियां अच्छे से बांधनी हैं. उस समय शून्य के अलावा कुछ भी नहीं दिखना चाहिए.’

यह भी लिखा था, ‘एक कप पानी का रखा जाएगा और जब पानी का रंग बदल जाएगा तब समझना कि पिता की आत्मा प्रकट हो चुकी है और वही आत्मा सब को बचा लेगी.’

ललित ने एक जगह लिखा था, ‘झूठ की जिंदगी से दूर रहना होगा. ऐसा करने से तुम्हारा जीवन आगे नहीं बढ़ेगा. मैं चाहता हूं कि आप ऐसा काम करो जिस से आप को कम मेहनत करनी पड़े और खुशहाल जिंदगी जी सको.’

हवाई खयालों में जीता था ललित

28 जून को डायरी में लिखी गई बात को पढ़ने से साफ हो जाता है कि परिवार का मरने का कोई इरादा नहीं था क्योंकि इस में अगले महीने तक की प्लानिंग लिखी थी. डायरी में लिखा था, ‘भूपी (भुवनेश) बैंक से पैसा निकालेगा. इस पैसे को दुकान में लगाया जाएगा. घर में इस पैसे का इस्तेमाल कदापि नहीं होगा.’

पुलिस ने दरवाजे के बाहर लगे सीसीटीवी कैमरे की फुटेज देखी तो 30 जून की सुबह प्रतिभा और प्रियंका मौर्निंग वाक पर जाती दिखीं. भुवनेश सुबह 5:40 बजे मंदिर गया और 5:51 बजे घर वापस आ गया. 10 बजे ललित अपनी दुकान पर गया.

दोपहर में उस ने मोबाइल की एक दुकान से अपना फोन रिचार्ज करवाया. रात 10 बजे सीसीटीवी में घर की 2 महिलाएं स्टूल ले कर आती दिखीं. कुछ देर बाद बच्चे नीचे दुकान से तार ले जाते दिखे. 10:40 बजे डिलीवरी बौय खाना दे कर गया. खाने में केवल 20 रोटियां थीं.

मुंह पर चिपकाने के लिए टेप और अलगअलग रंग की चुन्नियां खरीदी गई थीं. इस से स्पष्ट है कि यह सब ललित के दिमागी पागलपन की निर्धारित योजना के तहत था.

वास्तव में ललित मनोरोगी था. परिवार के किसी सदस्य को इस बात का पता नहीं चला. परिवार यही सोचता था कि जब ललित पर पिता की आत्मा सवार हो जाती है उस समय ललित के मुंह से पिता भोपाल की भाषा शैली में ही आवाज निकलती है. उस समय ललित जो कुछ बोलता था, पूरा परिवार ध्यान से सुन कर उस पर अमल करता था.

डायरी में लिखे गए आदेशों के अनुसार 30 जून, 2018 की रात को पूरे परिवार ने 11 बजे के बाद मोक्ष की क्रिया शुरू की. रात को 10बजे के करीब बाहर से रोटी मंगाई गई. परिवार के पास एक कुत्ता था, जिसे छत के ऊपर जाल में बांध दिया गया और फिर परिवार के सभी 11 सदस्य फंदे बना कर लटक गए. घर का दरवाजा इसलिए खुला रखा गया ताकि ‘पिता की आत्मा’ दरवाजे से प्रवेश कर सके.

ललित ने घर वालों को बताया था कि मोक्ष के लिए उन्हें 7 दिन तक मोक्ष क्रिया करनी होगी और जब यह क्रिया पूरी कर लेंगे तब पिता की आत्मा ही उन्हें बचाएगी. ईश्वर और पिता से मिलने के बाद वे वापस लौट आएंगे.

भाटिया परिवार के सदस्य मरना नहीं चाहते थे और उन्हें जरा भी मालूम नहीं था कि ईश्वर से मिलने के लिए वे जो क्रिया कर रहे हैं, उस से वे सचमुच मौत को गले लगाने जा रहे हैं. उन्हें पूरा भरोसा था कि उन्हें पिताजी बचा लेंगे.

डायरी में लिखे मौत के रहस्य

डायरी में फंदे पर कैसे लटकना है, इस का तरीका भी लिखा था. ‘7 दिन लगातार पूजा करनी है. थोड़ी श्रद्धा और लगन से. बेबी खड़ी नहीं हो सकतीं तो वह अलग कमरे में लेट सकती हैं. पट्टियां अच्छे से बांधनी हैं. हाथ प्रार्थना की मुद्रा में होने चाहिए.गले में सूती चुन्नी या साड़ी का ही प्रयोग करना है.’

आगे लिखा था, ‘सब की सोच एक जैसी हो. पहले से ज्यादा दृढ़. स्नान की जरूरत नहीं है, मुंहहाथ धो कर ही काम चल सकता है. इस से तुम्हारे आगे के काम होने शुरू होंगे. ढीलापन और अविश्वास नुकसानदायक होते हैं. श्रद्धा में तालमेल और आपसी सहयोग जरूरी होता है. मंगल, शनि, वीर, इतवार को फिर आऊंगा. मध्यम रोशनी का प्रयोग करना है. हाथों की पट्टी बचेगी. उसे डबल कर के आंखों पर बांधना है. मुंह की पट्टी को भी रूमाल बांध कर डबल कर लेनी है. जितनी दृढ़ता और श्रद्धा दिखाओगे, उतना ही उचित फल मिलेगा. जिस दिन यह प्रयोग करो उस दिन फोन कम से कम प्रयोग करना.’

एक पेज पर लिखा था, ‘धरती कांपे या आसमान हिले लेकिन तुम घबराना मत. मैं आऊंगा और सब को बचा लूंगा.’

मनोचिकित्सकों का मानना है कि असल में ललित मनोरोगी था. उस का रोग धार्मिक मान्यता और अंधविश्वास से जुड़ा हुआ था. ऐसे में पीडि़त व्यक्ति को किसी अदृश्य शक्ति के वश में होने का अहसास होता है और अपने अस्तित्व को कुछ देर के लिए भूल जाता है. मनोचिकत्सक इसे ‘शेयर्डसाइकोथिक डिसऔर्डर’ कहते हैं. पूरा परिवार इस बीमारी का शिकार था. ललित जो भी बात बताता था, पूरा परिवार उसे उस का आदेश मानता था.

आज पूरे देश में जिस तरह के धार्मिक अंधविश्वास का माहौल बना हुआ है, उसे देखते हुए संतनगर की यह घटना कोई ताज्जुब वाली बात नहीं है. क्योंकि सारा देश ही अंधविश्वास के जंजाल में बुरी तरह उलझा नजर आता है.

मौजूदा समय में लोगों में समस्याओं के समाधान के लिए पूजापाठ, हवनयज्ञ, तंत्रमंत्र, टोनेटोटकों का चलन चरम पर है. कदमकदम पर परेशानियां दूर करने वाले पंडेपुजारी, ज्योतिषी, तांत्रिक, साधु या गुरु अंधविश्वास का डेरा जमाए बैठे हैं.

हर नुक्कड़ पर समस्याओं का समाधान करने का दावा करने वाले तथाकथित मार्गदर्शक बैठे हैं जो बदले में दानदक्षिणा, चढ़ावा मांगते हैं.

धर्मगुरु, पंडेपुजारी अंधविश्वास के अंधेरे को बढ़ावा दे रहे हैं. मीडिया ऐसे पाखंडियों का प्रचार करने में लगा हुआ है. भाग्यवाद, लोकपरलोक, स्वर्ग, नरक, पुनर्जन्म, मोक्ष, पूर्वजन्म के कर्मों का फल, 33 करोड़ देवीदेवता, 84 लाख योनियां, मोहमाया त्याग कर ईश्वर की शरण में चले जाने जैसी मूर्खता की बातें इंसान को बरगलाने, मानसिक रूप से कमजोर करने के लिए काफी हैं.

अंधविश्वास का जाल अब गांवों के दायरे से निकल कर शहरों, महानगरों में शिक्षित युवाओं और विदेशों तक पहुंच चुका है. आज लोग विज्ञान से ज्यादा टोनेटोटकों, अंधविश्वास और तंत्रमंत्र में अपनी परेशानियों का समाधान तलाश रहे हैं. अंधविश्वास का यह कारोबार खूब फलफूल रहा है.

11 लोगों की मौत की घटना किसी दूरदराज के इलाके में नहीं बल्कि देश की राजधानी दिल्ली में घटित हुई जो शिक्षा, विज्ञान, सामाजिक सभ्यता और तथाकथित आध्यात्मिकता व प्रगति संबंधी नीति निर्माण का केंद्र बिंदु है. यहां सामाजिक, आर्थिक और वैज्ञानिक विकास के बड़ेबड़े दावे किए जाते हैं.

ज्योंज्यों शिक्षा का विस्तार और वैज्ञानिक उपलब्धियों का प्रसार हो रहा है, लोग उतने ही अंधविश्वास की गर्त में धंसते जा रहे हैं. अंधविश्वास तार्किक, उदार और स्वतंत्र विचारों पर हावी है. वैज्ञानिक और तार्किक विचारों की बात करने वालों पर हमले किए जाते हैं. ऐसे में संतनगर की घटना समूचे समाज के माथे पर कलंक है. यह घटना अंधविश्वास की इंतहा है.

हजारीबाग में भी हुआ बुराड़ी जैसा सुसाइड कांड

दिल्ली के बुराड़ी आत्महत्या कांड को अभी लोग भूले भी नहीं थे कि झारखंड में इस से मिलतीजुलती दिल हिला देने वाली घटना सामने आ गई. हजारीबाग जिले में एक ही परिवार के 6 लोगों ने कथित तौर पर खुदकुशी कर ली. इस घटना से शहर के लोग स्तब्ध हैं. जिस घर में खुदकुशी हुई, वहां से पुलिस को एक सुसाइड नोट मिला है.

पुलिस को पता चला है कि यह परिवार कर्ज के बोझ तले दबा हुआ था. वैसे पुलिस दूसरे ऐंगल से भी मामले की जांच कर रही है. परिवार में कुल 6 सदस्य थे. इन में से 5 लोगों ने फांसी लगा के फंदे से झूल कर आत्महत्या कर ली, जबकि एक सदस्य ने छत से कूद कर जान दे दी. मरने वालों में मातापिता, बेटाबहू और पोतापोती शामिल थे. पुलिस को कमरे में 3 सुसाइड नोट और कुछ लीगल दस्तावेज भी मिले हैं.

हजारीबाग के महावीर स्थान चौक पर महावीर माहेश्वरी की ड्राई फ्रूट्स की होलसेल की दुकान है. महावीर माहेश्वरी के परिवार में पत्नी किरण माहेश्वरी, एकलौता बेटा नरेश अग्रवाल, बहू प्रीति अग्रवाल, पोता यमन, पोती यान्वी थे.

घटनास्थल पर महावीर अग्रवाल, उन की पत्नी किरण की बौडी फंदे पर,बहू प्रीति पलंग पर, पोती यान्वी सोफे पर मृत मिले. वहीं अमन का गला कटा हुआ था. नरेश अग्रवाल की बौडी अपार्टमेंट के सामने मिली है. पांचवें तल की छत पर रेलिंग के पास एक कुरसी मिली है. इस से अनुमान लगाया गया कि उन्होंने कूद कर खुदकुशी की थी.

पुलिस को कमरे से एक लिफाफा मिला, जिस पर एक तरह से सुसाइड नोट लिखा हुआ था. इस में लिखा है कि अमन को लटका नहीं सकते थे इसलिए हत्या की गई. आगे खुदकुशी को गणित के सूत्र के तौर पर समझाते हुए लिखा गया है, ‘बीमारी+दुकान बंद+दुकानदारों का बकाया न देना+बदनामी +कर्ज = तनाव और मौत.’

नरेश अग्रवाल के चचेरे भाई देवेश का कहना है कि पूरा परिवार काफी सीधा और स्वाभिमानी था. व्यवसाय काफी फैला हुआ था. लेकिन काफी दिनों से मार्केट में पैसा फंसा था. बताया जाता है कि उन का करीब 50 लाख से एक करोड़ रुपए तक की रकम बाजार में फंसी थी. बाजार से रिटर्न नहीं मिलने की वजह से व्यवसायी परिवार पेमेंट नहीं कर पा रहा था.

फिर लीक हुआ सारा खान का प्राइवेट वीडियो

टीवी सीरियल ‘बिदाई’ से पौपुलर होने वाली और बिग बौस की कंटेस्टेंट रह चुकीं अभिनेत्री सारा खान ने एक बार फिर से सोशल मीडिया पर हलचल मचा दी है. वैसे को सारा खान आए दिनों अपनी हौट तस्वीरों की वजह से सुर्खियों में रहती हैं. लेकिन इस बार उनका एक वीडियो सामने आया है. आपको बता दें कि सारा खान का यह वीडियो पहली बार लीक नहीं हुआ है. इससे पहले भी सारा ने नशे की हालत में अपनी बाथटब वीडियो वायरल कर दिया था. जिसे बाद में डिलीट करते हुए उन्होंने सफाई देते हुए नशे की बात कबूल की थीं. अब सारा का नया वीडियो सामने आया है. इस वीडियो में सारा के साथ टीवी एक्टर अंगद हसीजा भी नजर आ रहे हैं.

 

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बता दें कि सारा खान का एक म्यूजिक वीडियो जल्द ही सामने आने वाला है. जिसमें एक बेडरुम सीन दिखाया जाएगा. लीक हुआ वीडियो इस म्यूजिक वीडियो का एक हिस्सा है. जो सोशल मीडिया पर जमकर वायरल हो रहा है. आपको बता दें कि इससे पहले सारा खान ने सोशल मीडिया पर कई सारी अपनी बिकिनी फोटो पोस्ट की थीं. इस फोटो पर यूजर्स ने उन्हें काफी ट्रोल भी किया था. लेकिन सारा ट्रोलर्स को इग्नोर करती रहीं.

 

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सारा ‘बिदाई’ के अलावा ‘प्यार तूने क्या किया’, ‘जुनून: ऐसी नफरत तो कैसा इश्क’, ‘एनकाउंटर’, ‘सावधान इंडिया’, ‘ससुराल सिमर का’, ‘भाग्यलक्ष्मी’ और ‘वो अपना सा’ आदि पौप्युलर टीवी सीरियलों में नजर आ चुकी हैं.

पैंसठ पार का सफर (भाग-1)

टेलीविजन का यह विज्ञापन उन्हें कहीं  बहुत गहरे सहला देता है, ‘झूठ बोलते हैं वे लोग जो कहते हैं कि उन्हें डर नहीं लगता. डर सब को लगता है, प्यास सब को लगती है.’ अगर वे इस विज्ञापन को लिखतीं तो इस में कुछ वाक्य और जोड़तीं, प्यास ही नहीं, भूख भी सब को लगती है…हर उम्र में…इनसान की देह की गंध भी सब को छूती है और चाहत की चाहत भी सब में होती है.

उम्र 65 की हो गई है. मौत का डर हर वक्त सताता है. यह जानते हुए भी कि मौत तो एक दिन सब को आती है. फिर उस से डर क्यों? नहीं, गीता की आत्मा वाली बात में उन की आस्था नहीं है कि आत्मा को न आग जला सकती है, न मौत मार सकती है, न पानी गला सकता है…सब झूठ लगता है उन्हें. शरीर में स्वतंत्र आत्मा का कोई अस्तित्व नहीं लगता और शरीर को यह सब व्यापते हैं तो आत्मा को भी जरूर व्यापते होंगे. धर्मशास्त्र आदमी को हमेशा बरगलाया क्यों करते हैं? सच को सच क्यों नहीं मानते, कहते? वे अपनेआप से बतियाने लगती हैं, दार्शनिकों की तरह…

चौथी मंजिल के इस फ्लैट में सारे सुखसाधन मौजूद हैं. एक कमरे में एअरकंडीशनर, दूसरे में कूलर. काफी बड़ी लौबी. लौबी से जुडे़ दोनों कमरे, किचन, बाथरूम. बरामदे में जाने का सिर्फ एक रास्ता, बरामदे में 3 दूसरे फ्लैटों के अलावा चौथा लिफ्ट का दरवाजा है.

इस विशाल इमारत के चारों तरफ ऊंची चारदीवारी, पक्का फर्श, गेट पर सुरक्षा गार्ड. गार्ड रूम में फोन. गार्ड आगंतुक से पूछताछ करते हैं, दस्तखत कराते हैं. फोन से फ्लैट वाले से पूछा जाता है कि फलां साहब मिलने आना चाहते हैं, आने दें?

इस फ्लैट मेंऐसा क्या है जो पति उन्हें न दे कर गए हों? मौत से पहले उन्होंने उस के लिए सब जुटा दिया और एक दिन हंसीहंसी में कहा था उन्होंने, ‘आराम से रहोगी हमारे बिना भी.’

तब वह कु्रद्ध हो गई थीं, ‘ठीक है कि मुझे धर्मकर्म के ढोंग में विश्वास नहीं है पर मैं मरना सुहागिन ही चाहूंगी…मेरी अर्थी को आप का कंधा मिले, हर भारतीय नारी की तरह यह मेरी भी दिली आकांक्षा है.’ पर आकांक्षाएं और चाहतें पूरी कहां होती हैं?

उन के 2 बेटे हैं. एक ने आई.आई.टी. में उच्च शिक्षा पाई तो दूसरे ने आई.आई.एम. में. लड़की ने रुड़की से इलेक्ट्रोनिक इंजीनियरिंग में शिक्षा पाई. तीनों में से कोई भी अपने देश में रुकने को तैयार नहीं हुआ. सब को आज की चकाचौंध ने चौंधिया रखा था. सब कैरियर बनाने विदेश चले गए और उन की चाहत धरी की धरी रह गई. पति से बोली भी थीं, ‘लड़की को शादी के बाद ही जाने दो बाहर…कोई गलत कदम उठ गया तो बदनामी होगी,’ पर लड़की का साफ कहना था, ‘वहीं कोई पसंद आ गया तो कर लूंगी शादी. अपने जैसा ही चाहिए मुझे, सुंदर, स्मार्ट, पढ़ालिखा, वैज्ञानिक दृष्टि वाला.’

लड़कों ने भी उन की नहीं सुनी. पहले कैरियर बाद में शादी, यह कह कर विदेश गए और बाद में शादी कर ली पर बाप से पूछना तक मुनासिब नहीं समझा.

इस फ्लैट में अकेले वे दोनों ही रह गए. उस रात अचानक पति के सीने में दर्द उठा. वह घबराईं, डाक्टर को फोन किया. अस्पताल से एंबुलेंस आए उस से पहले ही उन्होंने अंतिम सांस ले ली. बच्चों को फोन किया तो दोनों ने फ्लाइट्स न मिलने की बात कही और बताया कि आने  में एक सप्ताह लगेगा, सबकुछ खुद ही निबटवा लें किसी तरह. उन्होंने पूछा भी था कि कैसे और किस से कराएं दाहसंस्कार? पर कोई उत्तर नहीं मिला उन्हें.

बच्चे आए. बाकी के कर्मकांड जल्दी से निबटाए और फिर एक दिन बोले, ‘पापा लापरवाह आदमी थे. इस उम्र में तेल, घी छोड़ देना चाहिए था, पर वह तो हर वक्त यहां दीवान पर लेटेलेटे या तो किताबें, अखबार पढ़ते या फिर टीवी पर खबरें सुनते रहते. उन्होंने तो कहीं आनाजाना भी छोड़ दिया था. ऐसे लाइफ स्टाइल का यही हश्र होना था. वह तो सब्जीभाजी तक नौकरानी से मंगाते. इस्तेमाल की चीजें दुकानों से फोन कर के मंगवा लेते. कहीं इस तरह जीवन जिया जाता है?’

कहते तो ठीक थे बच्चे पर उन के अपने तर्क होते थे. वह कहते, ‘यह महानगर है, सुरभि. यहां बेमतलब कोई न किसी से मिलता है न मिलना पसंद करता है. किसे फुर्सत है जो ठलुओं से बतियाए?’

‘ठलुए’ शब्द उन्हें बहुत खलता. आखिर उन के अपने दफ्तर के भी तो लोग हैं. उन में  भी 2-3 रिटायर व्यक्ति हैं. उन्हीं के पास जा बैठें. अगर ये ठलुए हैं तो वे कौन सा पहाड़ खोद रहे होंगे?

कहा तो बोले, ‘सब ने कोई न कोई पार्ट टाइम जौब पकड़ लिया है. किसी को फुर्सत नहीं है.’

‘तो आप भी ऐसा कुछ करने लगिए,’ सुरभि ने कहा था.

‘नहीं करना. अपने पास अब सब है. पेंशन तुम्हें भी मिलती है, मुझे भी. बच्चे सब बड़े हो गए. विदेश जा बसे. उन्हें हमारे पैसे की जरूरत नहीं है. अपने पास कोई कमी नहीं है, फिर क्यों इस उम्र में अपने से काफी कम उम्र के लोगों की झिड़कियां सुनें?’

जबरन ही कभीकभी शाम को खाने के बाद सुरभि पति को अपने साथ लिवा जातीं. सड़क पार एक बड़ा पार्क था, उस में चहलकदमी करते. वहां बच्चों का हुल्लड़ उन्हें पसंद न आता. खासकर वे जिस तरह धौलधप्प करते, गेंद खेलते, भागदौड़ में गिरतेपड़ते. कभीकभी उन की गेंद उन तक आ जाती या उन्हें लग जाती तो झुंझला उठते, ‘यह पार्क ही रह गया है तुम लोगों को हुल्लड़ मचाने के लिए?’

वह पति की कोहनी दबा देतीं, ‘तो कहां जाएं बेचारे खेलने? सड़क पर वाहनों की रेलपेल, घरों में जगह नहीं, स्कूल दूर हैं. कहां खेलें फिर?’

‘भाड़ में,’ वह चीख से पड़ते. यह उन का तकिया कलाम था. जब भी, जिस पर भी वह गुस्सा होते, उन के मुंह से यही शब्द निकलता.

आखिर उन की बात सच निकली… बच्चे हम से बहुत दूर, विदेश के भाड़ में चले गए और स्वयं भी वह चिता के भाड़ में और जीतेजी वह भी इस फ्लैट में अकेली भाड़ में ही पड़ी हुई हैं.

शाम को जब बर्तन मांजने वाली बर्तन साफ कर जाती तो वह अकसर सामने के पार्क में चली जातीं…इस भाड़ से कुछ देर को तो बाहर निकलें.

घूमतीटहलती जब थक जातीं तो सीमेंट की बेंच पर बैठ जातीं. एक दिन बैठीं तो एक और वृद्धा उन के निकट आ बैठी. इस उम्र की औरतों का एकसूत्री कार्यक्रम होता है, बेटेबहुओं की आलोचना करना और बेटियों के गुणगान, अपने दुखदर्द और बेचारगी का रोना और बीमारियों का बढ़ाचढ़ा कर बखान करना. यह भी कि बहू इस उम्र में उन्हें कैसा खाना देती है, उन से क्याक्या काम कराती है, इस का पूरा लेखाजोखा.

बहुत जल्दी ऊब जाती हैं वह इन बुढि़यों की एकरस बातों से. सुरभि उठने को ही थीं कि वह वृद्धा बोली, ‘आजकल मैं सुबह टेलीविजन पर योग और प्राणायाम देखती हूं. पहले सुबह यहां घूमने आती थी, पर जब से चैनल पर यह कार्यक्रम आने लगा, आ ही नहीं पाती. आप को भी जरूर देखना चाहिए. सारे रोगों की दवा बताते हैं. अब आसन तो इस उमर में हो नहीं पाते मुझ से, पर हाथपांव को चलाना, घुटनों को मोड़ना, प्राणायाम तो कर ही लेती हूं.’

‘फायदा हुआ कुछ इन सब से आप को?’ न चाहते हुए भी सुरभि पूछ बैठीं.

‘पहले हाथ ऊपर उठाने में बहुत तकलीफ होती थी. घुटने भी काम नहीं करते थे. यहां पार्क में ज्यादा चलफिर लेती तो टीस होने लगती थी पर अब ऐसा नहीं होता. टीस कम हो गई है, हाथ भी ऊपर उठने लगे हैं, जांघों का मांस भी कुछ कम हो गया है.’

‘सब प्रचार है बहनजी. दुकानदारी कहिए,’ वह मुसकराती हैं, ‘कुछ बातें ठीक हैं उन की, सुबह उठने की आदत, टहलना, घूमनाफिरना, स्वच्छसाफ हवा में अपने फेफड़ों में सांस खींचना…कुछ आसनों से जोड़ चलाए जाएंगे तो जाम होने से बचेंगे ही. पर हर रोग की दवा योग है, यह सही नहीं हो सकता.’

पास वाली बिल्डिंग के तीसरे माले पर एक बूढ़े दंपती रहते थे. उन्होंने 15-16 साल का एक नौकर रख रखा था. बच्चे विदेश से पैसा भेजते थे. नौकर ने एक दिन देख लिया कि पैसा कहां रखते हैं. अपने एक सहयोगी की सहायता से नौकर ने रात को दोनों का गला रेत दिया और मालमता बटोर कर भाग गए. पुलिस दिखावटी काररवाई करती रही. एक साल हो गया, न कोई पकड़ा गया, न कुछ पता चला.

सुरभि और उन के पति ने तब से नियम बना रखा था कि पैसा और जेवर कभी नौकरों के सामने न रखो, जरूरत भर का ही बैंक से वह पैसा लाते थे. खर्च होने पर फिर बैंक चले जाते थे. किसी को बड़ी रकम देनी होती तो हमेशा यह कह कर दूसरे दिन बुलाते थे कि बैंक से ला कर देंगे, घर में पैसा नहीं रहता.

मौत सचमुच बहुत डराती है उन्हें. पति के जाने के बाद जैसे सबकुछ खत्म हो गया. क्या आदमी जीवन में इतना महत्त्व रखता है? कई बार सोचती हैं वह और हमेशा इसी नतीजे पर पहुंचती हैं. हां, बहुत महत्त्वपूर्ण, खासकर इस उम्र में, इन परिस्थितियों में, ऐसे अकेलेपन में…कोई तो हो जिस से बात करें, लड़ेंझगड़ें, बहस करें, देश और दुनिया के हालात पर अफसोस करें.

इसी इमारत में एक अकेले सज्जन भाटिया साहब अपने फ्लैट में रहते हैं, बैंक के रिटायर अफसर. बेटाबहू आई.टी. इंजीनियर. बंगलौर में नौकरी. बूढ़े का स्वभाव जरा खरा था. देर रात तक बेटेबहू का बाहर क्लबों में रहना, सुबह देर से उठना, फिर सबकुछ जल्दीजल्दी निबटा, दफ्तर भागना…कुछ दिन तो भाटिया साहब ने बरदाश्त किया, फिर एक दिन बोले, ‘मैं अपने शहर जा कर रहूंगा. यहां अकेले नहीं रह सकता. कोई बच्चा भी नहीं है तुम लोगों का कि उस से बतियाता रहूं.’

‘बच्चे के लिए वक्त कहां है पापा हमारे पास? जब वक्त होगा, देखा जाएगा,’ लड़के ने लापरवाही से कहा था.

भाटिया साहब इसी बिल्ंिडग के अपने  फ्लैट में आ गए.

भाटिया साहब के फ्लैट का दरवाजा एकांत गैलरी में पड़ता था. किसी को पता नहीं चला. दूध वाला 3 दिन तक दूध की थैलियां रखता रहा. अखबार वाला भी रोज दूध की थैलियों के नीचे अखबार रखता रहा. चौथे दिन पड़ोसी से बोला, ‘भाटिया साहब क्या बाहर गए हैं? हम लोगों से कह कर भी नहीं गए. दूध और अखबार 3 दिन से यहीं पड़ा है.’

पड़ोसी ने आसपास के लोगों को जमा किया. दरवाजा खटखटाया. कोई जवाब नहीं. पुलिस बुलाई गई. दरवाजा तोड़ा गया. भाटिया साहब बिस्तर पर मृत पड़े थे और लाश से बदबू आ रही थी. पता नहीं किस दिन, किस वक्त प्राण निकल गए. अगर भाटिया साहब की पत्नी जीवित होतीं तो यों असहाय अवस्था में न मरते.

ऐसी मौतें सुरभि को भी बहुत डराती हैं. कलेजा धड़कने लगता है जब वह टीवी पर समाचारों में, अखबारों या पत्रिकाओं में अथवा अपने शहर या आसपास की इमारतों में किसी वृद्ध को ऐसे मरते या मारे जाते देखती हैं. उस रात उन्हें ठीक से नींद नहीं आती. लगता रहता है, वह भी ऐसे ही किसी दिन या तो मार दी जाएंगी या मर जाएंगी और उन की लाश भी ऐसे ही बिस्तर पर पड़ी सड़ती रहेगी. पुलिस ही दरवाजा तोड़ेगी, पोस्टमार्टम कराएगी, फिर अड़ोसीपड़ोसी ही दाहसंस्कार करेंगे. बेटेबहू या बेटीदामाद तो विदेश से आएंगे नहीं. इसी डर से उन्होंने अपने तीनों पड़ोसियों को बच्चों के पते और टेलीफोन नंबर तथा मोबाइल नंबर दे रखे हैं…घटनादुर्घटना का इस उम्र में क्या ठिकाना, कब हो जाए?

अखबार के महीन अक्षर पढ़ने में अब इस चश्मे से उन्हें दिक्कत होने लगी है. शायद चश्मा उतर गया है. बदलवाना पड़ेगा. पहले तो सोचा कि बाजार में चश्मे वाले स्वयं कंप्यूटर से आंख टेस्ट कर देते हैं, उन्हीं से करवा लें और अगर उतर गया तो लैंस बदलवा लें. पर फिर सोचा, नहीं, आंख है तो सबकुछ है. अगर अंधी हो गईं तो कैसे जिएंगी?

पिछली बार जिस डाक्टर से आंख टेस्ट कराई थी उसी से आंख चैक कराना ठीक रहेगा. खाने के बाद वह अपनी कार से उस डाक्टर के महल्ले में गईं. काफी भीड़ थी. यही तो मुसीबत है अच्छे डाक्टरों के यहां जाने में. लंबी लाइन लगती है, घंटों इंतजार करो. फिर आंख में दवा डाल कर एकांत में बैठा देते हैं. फिर बहुत लंबे समय तक धुंधला दिखाई देता है, चलने और गाड़ी चलाने में भी कठिनाई होती है.

वह लंबी बैंच थी जिस के कोने में थोड़ी जगह थी और वह किसी तरह ठुंसठुंसा कर बैठ सकती थीं. खड़ी कहां तक रहेंगी? शरीर का वजन बढ़ रहा है.

बैठीं तो उन का ध्यान गया, बगल में कोई वृद्ध सज्जन बैठे थे. उन की आंखों में शायद दवा डाली जा चुकी थी, इसलिए आंखें बंद थीं और चेहरे को सिर की कैप से ढक लिया.

‘पटाखा’ से पर्दे पर लौटीं मलाइका, आया आइटम सौन्ग ‘हेलो हेलो..’

डायरेक्टर विशाल भारद्वाज की कौमेडी से सराबोर फिल्म ‘पटाखा’ जल्द ही सिनेमाघरों में रिलीज होगी. इन दिनों फिल्म का पूरा स्टारकास्ट इसके प्रमोशन में बिजी है. हाल ही में इस मूवी का पहला गाना ‘बलमा…’ और ट्रेलर रिलीज हुआ है. इस गाने में आपको जबरदस्त देसी तड़का देखने को मिलेगा. वहीं दूसरी तरफ रिलीज हुए फिल्म के आइटम सौन्ग ‘हैलो हैलो…’ में मलाइका आइटम नंबर करती हुई नजर आ रही हैं. आपको बता दें, इसमें मलाइका के जबरदस्त हौट अंदाज देखने को मिल रहे हैं.

लंबे समय बाद मलाइका फिल्म ‘पटाखा’ में फिर से उसी अंदाज में नजर आ रही हैं जिसमें उन्हें हमने ‘मुन्नी बदनाम’ में देखा था. मलाइका बौलीवुड ‘छैय्या छैय्या’, ‘मुन्नी बदनाम हुई’ और ‘अनारकली डिस्‍को चली’ जैसे कई आइटम नंबर कर चुकी हैं. यह शायद पहली बार ही है कि मलाइका मखमली आवाज की जादूगर रेखा भारद्वाज के गाने पर आइटम नंबर करती नजर आ रही हैं. हालांकि इस गाने में आपको मलाइका का कौस्‍ट्यूम देखकर फिर से ट्रेन की छत पर शाहरुख खान के साथ नाचती मलाइका जरूर याद आ जाएंगी. इस गाने में उनके डांस के कौरियोग्राफर गणेश आचार्य हैं.

अगर फिल्म ‘पटाखा’ की कहानी की बात की जाए तो इसमें दो ऐसी सगी बहनें नजर आएंगी, जो एक-दूसरे से हमेशा लड़ती झगड़ती नजर आती हैं लेकिन एक-दूसरे के बिना वह रह भी नहीं सकती हैं. इसमें ‘दंगल गर्ल’ सान्‍या मल्‍होत्रा और टीवी एक्‍ट्रेस राधिका मदान दोनों बहनों के किरदार में नजर आने वाली हैं. इनके अलावा सुनील ग्रोवर भी इसमें आपको एंटरटेन करते हुए नजर आएंगे. बता दें कि यह फिल्म 28 सितम्बर को सिनेमाघरों में दस्तक देगी.

भारतीय जनता पार्टी और उस के उग्र रक्षक

ऐसा लगता है कि भारतीय जनता पार्टी ने 2014 के लोकसभा चुनावों और बाद में कई विधानसभाओं में मिली जीतों के इनाम में अपने वर्करों को हुड़दंग मचाने और पीटने का हक दे दिया है. हर उस राज्य में जहां भाजपा सरकार है, रक्षकों की एक फौज पैदा हो गई है जो कभी गाय, कभी लव जेहाद, कभी देशभक्ति, कभी भारत माता, कभी वैलेंटाइन डे के विरोध में तो कभी पूजा करने या न करने के हक को ले कर खुलेआम पीटपीट कर किसी को भी मार तक सकती है. कानून इस कदर अंधा हो गया है कि पीटने वालों को आमतौर पर पकड़ा नहीं जाता. जिन पर आरोप लगते भी हैं, उन का तो मंत्री तक हार पहना कर सम्मान करते हैं.

वर्करों को कुछ देना बहुत जरूरी होता है ताकि वे पार्टी के साथ बने रहें. कांग्रेस ने 1947 के बाद अपने वर्करों को स्वतंत्रता सेनानी के नाम पर सुविधाएं, पैंशन, सम्मान दिए थे. कम्यूनिस्टों ने हड़ताल कराने के हक अपने वर्करों को दिए थे. कांग्रेस ने अपने वर्करों को सरकारी कंपनियों में नौकरियां भी दिलवाई थीं.

भाजपा के पास न नौकरियां हैं, न पीटने वालों को पैंशनें दी जा सकती हैं इसलिए उस ने शायद उन्हें पीटने का बिना कहे लाइसैंस दे दिया है. कुकुरमुत्तों की तरह देशभर में भगवा दुपट्टाधारी लिंचिंग करने लगे हैं और पुलिस इस लिंचिंग का मत लेती है. अलवर में एक मुसलिम गौ व्यापारी को पीटपीट कर मारने की ताजा घटना है. इसी के 2 दिन बाद गाजियाबाद में एक मुसलिम युवक को हिंदू लड़की से शादी करने की कोशिश में पीटा गया.

भाजपा सोच रही?है कि यह जोरजबरदस्ती विरोधियों का मुंह बंद रखेगी. पर यह छूट असल में खतरनाक होती है. अब गैंग बनने लगे हैं जो हिंदू धर्म की रक्षा के नाम पर हर तरह की दंगई करने को तैयार हैं पर पैसा ले कर हिफाजत भी देने लगे हैं. आखिर इन रक्षकों को मौजमस्ती के लिए पैसा चाहिए.

वैसे यह पुराने हिंदू राजाओं का टैक्स वसूलने और फौज बनाए रखने का पुराना तरीका रहा है. मुगल राजाओं ने तो हिसाबकिताब रखा था पर हिंदू राजा जो अनपढ़ होते थे, डाकुओं को इलाके ठेके पर दे देते थे. उन्हें लूटने पर राजा को हिस्सा देना होता था. अब भक्तों को गुंडई के ठेके दिए जाने लगे हैं और इस का खमियाजा और ज्यादा गरीबों, किसानों, मजदूरों को भुगतना पड़ रहा है. दलितों, मुसलमानों को कमजोर मान कर उन पर रोब जमा कर हर तरह का जुल्म करने का लाइसैंस दिया गया है और यह बीमारी सारे देश में फैल गई है.

हां, अनि : रोजी ने ठुकराया सुनील का प्यार

सीमा के संदर्भ में मैं ने एक कविता संग्रह ‘आओ, इस जर्जर घड़ी को बदल डालें’ शीर्षक से लिखा था, जिस की याद अब मुझे आ रही है और अनिता अक्षरश: उसे सुनाने लगी. मेरे अपने ही शब्द आज मुझे कितने भोथरे महसूस हो रहे हैं.

‘‘जितनी जल्दी हो सके…आओ इस जर्जर घड़ी को बदल डालें. वरना हरगिज माफ नहीं करेंगी हमें…आने वाली हमारी नस्लें…’’

सीमा, यानी अनिता की पुरानी सहेली, इतनी जल्दी वह घर आ धमकेगी, वह भी मेरी गैरमौजूदगी में, यह तो बिलकुल न सोचा था. कल शाम को बाजार में शौपिंग करते हुए अचानक वह मिल गई तो मैं चौंक उठा, जबकि उस के चेहरे पर ऐसा कोई भाव न उभरा था.

‘‘सुनील, यह सीमा है,’’ अनिता ने परिचय दिया, ‘‘मेरी प्रिय सखी.’’

‘‘बड़ी खुशी हुई आप से मिल कर,’’ औपचारिकता के नाते कहना पड़ा. कड़वा सच एकदम से उगला भी तो नहीं जाता.

‘‘किसी हसीन लड़की से साली का रिश्ता जुड़ जाने पर भला कौन खुश नहीं होगा,’’ निसंकोच सीमा ने कहा और हंस पड़ी. वही 3 साल पुराना चेहरा, वही रूपरंग, कातिल अदा, मोतियों से चमकते दांत, कुदरती गुलाबी होंठ और उसी तरह गालों को चूमती 2 आवारा लटें, कुछ भी तो न बदली थी वह. हां, उस का यह नाम जरूर पहली बार सुना और अपनी बात पर स्वयं ही खिलखिला उठना कतई न सुहाया. मन में दबी नफरत की चिंगारी भड़क उठी और ‘साली का संबोधन’ अंगारे की तरह अंदर जलाता चला गया.

‘‘अच्छा, मैं चलूं, अनिता,’’ सहसा वह बोली.

मैं उस से पूछना चाहता था कि इतना कह देने भर से ही क्या तुम छूट जाओगी और मेरी यादों के कैनवास पर से तुम्हारे चरित्र के दाग मिट जाएंगे?

‘‘ऐसी भी क्या जल्दी है,’’ अनिता ने कहा, ‘‘इतने बरसों बाद तो मिली हो, घर चलो, आराम से बैठ कर बातें करेंगे.’’

‘‘फिर कभी आऊंगी, अभी जल्दी में हूं, अपना पता दे दो.’’

अनिता ने उसे अपना विजिटिंग कार्ड थमा दिया था.

रात भर मैं यही सोचता रहा कि उस ने अनिता के सामने ऐसा क्यों जताया कि हम पहली बार मिले हैं. क्या वह मुझे उस पत्र से ब्लैकमेल करना चाहती है, जिस में प्रेम के साथसाथ मैं ने उस से विवाह करने की इच्छा भी जाहिर की थी? ऐसी लड़कियों का भरोसा ही क्या? आज सारा दिन आफिस में भी दिमाग अशांत रहा. शाम को थकाहारा घर लौटा तो अनिता ने ठंडे पानी के साथ गरमागरम खबर दी, ‘‘दोपहर में सीमा आई थी.’’

सुनते ही मैं सोफे पर से उछल पड़ा, कई सवाल दिमाग में कौंधे…क्यों वह मेरे शांत व सुखी घरेलू जीवन में तूफान लाने पर तुली है अनिता, अब तक मां नहीं बन सकी तो क्या हुआ, दोनों में अच्छा तालमेल तो है.

‘‘रहने की तलाश में है बेचारी,’’ अनिता ने बताया, ‘‘अपने पड़ोस में खाली पड़ा मकान तय करवा दिया है और कह रही थी, प्लीज जीजाजी से सिफारिश कर के कहीं काम पर रखवा देना.’’

मैं बोला, ‘‘देखूंगा.’’

‘‘देखूंगा नहीं,’’ अनिता ने जोर दिया, ‘‘उसे सर्विस दिलानी है, वह आप की बहुत प्रशंसा कर रही थी.’’

‘‘क्या कह रही थी?’’

‘‘ऐसा नेक पति भाग्य से मिलता है,’’ पत्नी के होंठों पर मंदमंद मुसकान देख…मेरा चोर मन बोला कि निश्चय ही यह सबकुछ जान कर…अब मजा ले रही है.

‘‘शोख और चंचल है ना, इसलिए मजाक भी कर रही थी.’’

‘‘क्या?’’

‘‘जानेमन, शादी से पहले अगर जनाब को देख लेती तो तुम्हारी जगह आज मैं होती,’’ शुक्र है, लेकिन तभी अनिता ने यह कह कर मुझे फिर झटका दिया, ‘‘मैं देख रही हूं…कल शाम से आप कुछ अपसेट हैं?’’

‘‘नहीं, मैं ठीक हूं,’’ स्वयं को संभालते हुए मैं ने कहा, ‘‘एक बात कहूं अनि, मानोगी?’’

‘‘कहो.’’

‘‘सीमा से अब तुम्हारा मेलजोल बढ़ाना ठीक नहीं.’’

‘‘क्यों?’’ वह सकपका गई, ‘‘क्या दोष है उस में?’’

दोष, यह पूछो, क्या दोष नहीं है उस में? पर इतना कह न पाते हुए मैं बोला, ‘‘हमारा स्तर उस से…’’

‘‘यह तो कोई बात न हुई,’’ अनिता ने एकदम से कहा, ‘‘आखिरकार वह मेरी पुरानी दोस्त है.’’

इस विषय को बदलने के लिए मैं कपड़े बदल कर हाथ में रिमोट ले कर टीवी खोलता हूं, पर यह क्या? हर चैनल पर सीमा मौजूद है. झल्ला कर रिमोट, मेज पर रखते हुए अपनी एक पत्रिका उठा लेता हूं, उस के पन्नों पर भी वही चेहरा दिखता है तो हार कर पत्रिका मेज पर पटक देता हूं और अपने दोनों पैर मेज पर फैला कर व सिर सोफे पर टिकाते हुए पलकें मूंद लेता हूं, तो सीमा, नहींनहीं, रोजी का चेहरा सजीव होने लगता है.

मुंबई के ‘प्रिंस’ होटल की रजत जयंती का मौका था. उस रात होटल में नृत्य का एक विशेष कार्यक्रम आयोजित हुआ था. कार्यक्रम शुरू होने में अभी कुछ देर थी. मैं डिनर ले कर अपनी मेज पर अकेला ही काफी पीने लगा. सहसा 2 नारी स्वरों ने चौंका दिया. कनखियों से उधर देखा तो बस, देखता ही रह गया. वहां 2 नव- युवतियां एक मेज पर बैठी नजर आईं, उन में एक सांवली सी गदराए बदन की बिल्लौरी आंखों वाली सामान्य लड़की थी, जिस ने कत्थई रंग की मैक्सी पहन रखी थी.

दूसरी, पहली बार में ही असामान्य लगी. गुलाबी साड़ीब्लाउज में सजासंवरा उस का मदमस्त यौवन लोगों के दिलों पर कहर ढा रहा था. कुछेक क्षणों के लिए तो मेरा दिल भी थम सा गया. यों लगा मानो वह नृत्य प्रोग्राम के बजाय, किसी सौंदर्य प्रतियोगिता में भाग लेने आई हो.

बीयर के जाम पर नाचती हुई उस की उंगलियां देख कर किसी नाजुक टहनी पर अधखिली कलियों के मंदमंद हवा में हिलने का भ्रम हुआ. उस ‘गुलाबी सुंदरी’ को अपनी सखी के साथ इस तरह अकेले बीयर पीते देख मैं ने उसे किसी बड़े घराने की माडर्न लड़की ही समझा. वह जितनी सुंदर उतनी ही चंचल लगी. मेरा ध्यान  अब तक उधर क्यों नहीं गया? इस का अफसोस तो हुआ ही, साथ में यह ताज्जुब भी कि वे दोनों डांस में मुझे अपना पार्टनर बनाने को आतुर हैं.

प्रोग्राम शुरू होने जा रहा है, जिन के पास निजी पार्टनर नहीं हैं, वे हाल में बैठे लोगों में से  अपना मनपसंद पार्टनर ढूंढ़ने लगे. कत्थई मैक्सी वाली को एक मनचले युवक ने आमंत्रित कर लिया, ‘गुलाबी रूपसी’ को उस का आफर ठुकराते देख मुझे एक अनजानी खुशी महसूस हुई.

सहसा तभी होटल मैनेजर ने स्टेज पर ताली बजाते हुए लोगों का ध्यान खींचा और माइक में बोला, ‘लेडीज एंड जेंटल मैन, जैसा कि आप सब जानते हैं, आज हम इस पिं्रस होटल की सिल्वर जुबली मनाने जा रहे हैं. पिछले अनेक सालों से निरंतर हमें आप का जो अपार स्नेह व भरपूर सहयोग मिलता रहा है, उस के लिए यह होटल आप सब का आभारी है, और आशा नहीं, पूर्ण विश्वास है कि भविष्य में भी हमें आप सब का इसी तरह सहयोग मिलता रहेगा.

‘आज के स्पेशल डांस प्रोग्राम में सर्वप्रथम आप बाल रूम डांस का लुत्फ उठाएंगे, फिर टैब डांस का और अंत में आर्केस्ट्रा की धुन में तेजी आ जाएगी, जो हर पल बढ़ती ही रहेगी. आखिर तक इस तीव्र धुन पर नाचने वाला जोड़ा, आज के डांस प्रोग्राम का विनर प्राइज हासिल करेगा.’

हाल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा.

नृत्य आरंभ हो गया. आर्केस्ट्रा की धीमी व मीठी धुन हाल में रस घोलने लगी. चारों तरफ एक अजीब सा उन्माद छा गया. जवान क्या, बूढे़ भी एकदूसरे की कमर में बांहें डाल थिरकते हुए डांसिंग फ्लोर पर आ गए, धीमी गति के नृत्य का मधुर समां देखते ही बनता था.

रात के उस दौर में शराब और शबाब का अनूठा मेल पा कर मेरा सूफी मन भी उस में डूब जाने को मचल उठा. उस ‘गुलाबी प्रिया’ को यथावत बैठी देख मैं प्रसन्नता से झूमता चला गया.

‘आई एम सुनील कुमार,’ नाम बताते हुए उस से बोला, ‘क्या आप मेरे साथ डांस करेंगी?’

‘श्योर,’ वह मुसकरा दी, ‘मुझे रोजी कहते हैं.’

‘वेरी गुड,’ मैं चहका, ‘आप के पेरेंट्स ने बहुत सोचसमझ कर यह नाम रखा होगा?’

‘नहीं, ऐसा नहीं है,’ रोजी पुन: मुसकराने लगी और उठ कर अपना खूबसूरत एवं नाजुक हाथ बढ़ाते हुए बोली, ‘आइए, डांस करें.’

कहीं फिर न चूक जाऊं, इसलिए प्यार से उस का हाथ पकड़ते हुए मैं ने ‘थैंक्यू’ कहा. नृत्य में वह इस कदर खुल कर पेश आई मानो हम पहले से एकदूसरे को जानते हों. खैर, उस रात विशेष डांस प्रोग्राम में रोजी के साथ मुझे ही ‘ताजमहल’ मिला, लेकिन विदा होते समय जब उसे प्राइज सौंपा तो वह उदास लगी, मानो उस की उम्मीदों पर मैं खरा नहीं उतरा.

इस के बाद रोजी कई बार क्लब, होटल, सिनेमा, समंदर के किनारे आदि जगहों पर मिली लेकिन वह हमेशा जल्दी में होती जबकि मैं निरंतर महसूस करता कि वह जानबूझ कर ऐसा करती है. उस की चेष्टा कतरा जाने में रहती है. अचानक ही सामने आ जाने से उस के चेहरे पर नागवारी के जो भाव उभरते उन्हें आसानी से मैं पढ़ लेता. उसे मानो मेरा मिलना अखरता हो.

वह मेरे होशोहवास पर इस तरह छा गई कि मैं एकांत में छटपटा उठता और तब मुझे ऐसा लगता कि उस के बगैर वजूद अधूरा है. प्राय: मैं सोचता, ज्यों ही वह मिलेगी तो फौरन उस के आगे पे्रम का इजहार कर दूंगा, लेकिन रोजी की व्यस्तता और जल्दबाजी…कुछ कहने का मौका न देती.

एक दिन सोचा कि बात ऐसे नहीं बनेगी, अत: रोजी के वास्ते मैं ने एक पत्र लिखा, जिस में प्रेम के साथसाथ उस से विवाह रचाने की इच्छा भी प्रकट की और अब वह पत्र सदा जेब में रहता, ताकि मिलते ही उसे थमा दूं.

सहसा एक दिन शाम को वह सड़क पर भीड़ में जाती दिखाई दी. मैं ने जोर से नाम ले कर उसे पुकारा. उस ने चौंक कर पीछे देखा. मैं ने झट से गाड़ी फुटपाथ के साथ ले जा कर रोक दी तो उसे नजदीक आना ही पड़ा.

‘हाय, रोजी.’

‘हाय…’ मुसकराने के बावजूद उस के चेहरे पर बेरुखी उभर आई. सफेद पैंट और टौप पर खुली केश राशि में वह बिजलियां गिराती नजर आई.

मैं कह उठा, ‘आओ, जुहू पर टहलें.’

‘सौरी, आज फिर बिजी हूं,’ खेद भरे स्वर में वह बोली.

‘आओ तो सही, जहां कहोगी वहां उतार दूंगा.’

दिल की बात कहने के लिए इतना सफर ही बहुत होगा.

‘बेकार आप को परेशान…’

‘मैं फुरसत में हूं,’ उतावलेपन से मैं उस की बात बीच में काटते हुए बोला तो उस से इनकार करते न बन पड़ा.

कार का अगला गेट खोलते हुए वह चुपचाप मेरी बाजू में आ कर बैठ गई. उस के बदन का मधुर स्पर्श पाते ही बात कहां से शुरू करूं समझ में न आया और कुछेक क्षण यों ही निकल गए.

‘मुझे यहीं उतरना है,’ रोजी ने कहा.

‘ठहरो रोजी.’

जातेजाते वह पलटी. मैं ने पत्र निकाल कर उसे देते हुए भारी स्वर में कहा, ‘एकांत में इसे जरूर पढ़ लेना.’

रोजी उसे ले कर भीड़ में समा गई. मैं ने देखा, वह क्लब के सामने उतरी है.

अगली मर्तबा मिलते ही रोजी खिलखिला कर हंस पड़ी.

मैं अवाक् सा मोतियों की भांति चमकते उस के दांत देखता रह गया. हंसतेहंसते उस की आंखें नम हो गईं. थोड़ी देर बाद अपनी हंसी पर काबू पाते हुए वह बोली, ‘बस, इतनी सी बात के लिए कागज रंग डाला. कितनी बार तो मिली हूं? कभी भी कह दिया होता.’

‘तुम्हारी व्यस्तता और जल्दबाजी ने मौका ही कब दिया?’

एकाएक रोजी गंभीर हो गई. माथा सिलवटों से भर गया. मानो किसी उलझन में फंस गई हो…हां…कहेगी या ना? सोचते हुए मैं ने उसे टोका, ‘जवाब दो, रोजी.’

उस की चंचलता पुन: लौट आई और वह अपने आंसू इतनी सफाई से पी गई कि मैं देख कर दंग रह गया. ‘बेकार शादी के लफड़े में क्यों पड़े हो?’ जबरन हंसते हुए उस ने कहा, ‘मैं तो यों ही तुम्हारी बन जाने को तैयार हूं, चलो, कहां ले जाना चाहते हो मुझे?’

रोजी, अश्लीलता की सारी हदें पार कर गई थी. निर्लज्जता से भरा यह निमंत्रण पा कर मन में आया कि एक जोरदार थप्पड़ उस के गाल पर जड़ दूं, लेकिन कुछ सोचते हुए दुख, आश्चर्य व क्रोध से कसमसा कर रह गया.

‘मुझे तुम से यह उम्मीद नहीं थी, रोजी.’

‘गलती की, जो एक सेक्स वर्कर से आप कोई दूसरी उम्मीद कर बैठे.’

रोजी ने मानो पिघला हुआ शीशा कानों में उड़ेल दिया हो. सहज ही उस के शब्दों पर विश्वास न हुआ और मैं पागलों की भांति उसे देखता रह गया. यह खूबसूरत लड़की…बाजारू माल कैसे हो सकती है? नहीं…नहीं…पर जो पहले से था, उस पर यकीन करना ही पड़ा. उस के मुख से यह कड़वा सच सुन प्यार के साथसाथ अब उस के प्रति सहानुभूति भी उमड़ आई. जीवन में इस अंधेरी राह पर जाने के पीछे अवश्य कोई मजबूरी रही होगी. उसे जानने की इच्छा से ही मैं कातर स्वर में बोला, ‘इतनी सुंदर, पढ़ीलिखी और समझदार हो कर भी तुम ने यह लाइन क्यों पकड़ी, रोजी?’

‘अरे, तुम तो भावुक हो गए,’ वह उपहास उड़ाते हुए खिलखिला उठी, जबकि मैं उसे अपनी आंतरिक वेदना पर हंसी का लबादा ओढ़ते हुए साफसाफ देख रहा था.

‘मजाक नहीं रोजी, मैं अब भी तुम्हें अपना जीवनसाथी बनाना चाहता हूं,’ सचमुच भावुकता के वेग में मैं बहता ही चला गया, ‘तुम्हारे अतीत से मुझे कोई सरोकार नहीं…और न ही भविष्य में कभी कुछ पूछूंगा, मैं तो सिर्फ…तुम्हें इस अंधेरे से उजाले में ले जा कर एक नए जीवन की शुरुआत करना चाहता हूं, जहां हम दोनों और हमारी खुशियां होंगी.’

‘तुम्हारे विचार और भावनाओं की मैं कद्र करती हूं, सुनील,’ वह यथार्थ के कठोर धरातल से चिपकी रह कर ही बोली, ‘मगर अफसोस, तुम्हारा औफर ठुकराने पर मजबूर हूं, मेरे हालात ऐसे हैं कि लाख चाहने पर भी मैं उन के खिलाफ कोई फैसला नहीं ले सकती.’

‘मुझ पर भरोसा करो, रोजी,’ मैं ने तहे दिल से कहा, ‘हम हर मुश्किल आसान कर लेंगे, प्लीज, बताओ तो सही.’

‘यह नामुमकिन है, सुनील,’ कह कर उस ने एक गहरी सांस ली और फिर अपनी कलाई पर बंधी घड़ी देख कर बोली, ‘अच्छा, मैं अब चलूं.’

लेकिन जातेजाते ठहर गई. उसी कातिल अदा से पलट कर देखा और हंस कर बोली, ‘यों रास्ते में अचानक ही घेर कर मेरा धंधा खराब मत किया करो. पहले दिन भी तुम्हें अपना ग्राहक समझा था मैं ने और मेरी वह रात बेकार गई. खैर, कोई बात नहीं, तुम से मुझे न जाने क्यों अजीब सा लगाव हो गया है और उसे मैं कोई नाम नहीं देना चाहती. हां, अगर तुम चाहो तो हफ्ते में एक नाइट तुम्हारे साथ मुफ्त गुजार दिया करूंगी.’

‘‘रोजी…’’

‘‘क्या हुआ?’’ अनिता किचन से बाहर आ गई, ‘‘क्यों चिल्ला रहे हो? तबीयत ठीक तो है?’’

‘‘हां, मैं ठीक हूं,’’ कह कर माथे से पसीना पोंछते हुए बोला, ‘‘आज चाय नहीं दोगी?’’

‘‘एक मिनट, अभी लाई,’’ और वह लौट गई.

मैं फिर रोजी के बारे में सोचने लगा.

रोजाना आफिस आतेजाते सड़कों पर या जहांजहां उस के मिलने की संभावना थी वे सारे ठिकाने देख डाले पर रोजी नहीं मिली. फिर अचानक एक दिन भीड़ में वह नजर आ गई. फौरन कार फुटपाथ के एक ओर रोक कर मैं पैदल ही उस के पीछे हो लिया.

‘रोजी…’ हांफते हुए मैं ने पुकारा. पर वह अनजान सी आगे बढ़ती रही. मुझ से रहा न गया तो दौड़ कर उसे पकड़ लिया और फुटपाथ पर खींच लिया.

‘आखिर तुम चाहते क्या हो?’ पलटते ही वह एकदम गुर्राई, ‘क्यों हाथ धो कर मेरे पीछे पड़े हो?’

‘आई लव यू, रोजी.’

उस ने सहम कर इधरउधर देखा, फिर बोली, ‘देखो, मैं चिल्ला उठी तो यहां लोग जमा हो जाएंगे और वे सब तुम्हें इश्क का मतलब समझा देंगे, पुकारूं?’

मैं यह सोच कर सिर से पांव तक सिहर गया कि वह मेरे साथ ऐसा भी कर सकती है. उस की बांह पर कसा मेरा हाथ दूसरे ही क्षण ढीला पड़ता चला गया.

‘आइंदा यह हरकत मत करना, वरना…’ चेतावनी देते हुए उस ने हाथ छुड़ाया और भीड़ में खो गई, मैं पागलों की तरह खड़ा रह गया.

उस के बाद रोजी कभी नहीं मिली और न ही मन में कभी उस से मिलने का खयाल आया. जब कभी उसे ले कर मन घृणा से भरता तो मैं कविता के सहारे उसे हलका कर लेता.

काशीपुर में दीदी की ससुराल है. वह अकसर फोन करती रहतीं कि तेरे लिए एक लड़की देखी है, कभी आ कर हां, ना बता जा. मातापिता के बरसों पहले गुजर जाने के बाद इस जहान में वही तो हैं, उन की यह बात न रखी तो वह भी मुंह मोड़ लेंगी. सो, मैं एक माह की छुट्टियां ले कर काशीपुर आ गया.

कांता दीदी ने मेरी पसंद को ध्यान में रखा था. लड़की देखते ही रिश्ता पक्का हो गया. जीजाजी तो मानो पहले से ही पूरी तैयारियां किए बैठे थे. अनिता के साथ चट मंगनी, पट ब्याह होते ही मैं अनिता को ले कर हनीमून मनाने के लिए नैनीताल जा पहुंचा. ऊंचीऊंची पर्वत श्रेणियों से घिरा नैनीताल का सुंदर इलाका, सुंदरतम झील और हरीभरी वादियों में पता ही न चला कि छुट्टियां कब गुजर गईं. हम दोनों एक दूसरे के इतने करीब आ गए, जैसे बचपन से साथ रहे हों. नैनीताल से काशीपुर, 2 दिन दीदी के यहां रह कर हम मुंबई आ गए.

उन्हीं दिनों की बात है, जब गुप्ता इंटरप्राइजेज ने पुणे में भी अपनी शाखा खोली. चूंकि कंपनी के मालिक मेरी कार्यकुशलता व ईमानदारी से पूरी तरह संतुष्ट थे. इसलिए यहां की जिम्मेदारी भी मुझे ही सौंपी गई. यहां मुंबई के मुकाबले मुझे ज्यादा सुविधाएं मिलीं.

अनिता के साथ पिता न बन पाने के बावजूद चैन से हूं. उस की बच्चेदानी में इंफैक्शन है. डाक्टर का कहना है, शीघ्र ही उसे आपरेशन द्वारा निकाला नहीं गया तो अनिता की जान को खतरा हो सकता है.

कल शाम से सीमा ने हमारे दांपत्य जीवन में हलचल मचा दी. समझ में नहीं आ रहा कि आखिर वह चाहती क्या है? ऐसी बाजारू लड़कियों का भरोसा ही क्या? अपनी इज्जत तो नीलाम करती ही हैं, दूसरे की भी मिट्टी में मिला देती हैं. सीमा अगर अनि से कह दे कि 3 साल पहले मैं ने उसे न केवल पत्नी बनाना चाहा था, बल्कि उस के द्वारा विवाह का प्रस्ताव ठुकरा देने पर बुरी तरह अपमानित भी हुआ था, तो क्या मैं उस की निगाह में ठहर पाऊंगा? अगर सीमा ने कहीं अनिता को वह पत्र दिखा दिया तो क्या जवाब दूंगा? अगर उस ने यह भेद छिपाने की कीमत मांग ली तो कैसे अदा करूंगा? उफ.

‘‘बेशर्म, कमीनी,’’ क्रोध में मैं बड़बड़ा उठा.

‘‘किसे विभूषित किया जा रहा है, महोदय?’’ चायनाश्ता टे्र में लाते हुए अनिता ने पूछा तो मैं हड़बड़ा गया, मानो रंगेहाथों चोर पकड़ा गया हो.

‘‘क्षमा करें, बंदी से भूल हो गई,’’ अपने खास लहजे में उस ने चोट की.

‘‘सौरी.’’

‘‘भविष्य में ध्यान रहे,’’ वह महारानियों की तरह मुसकराई.

चाय से पहले, मुंह में चिप्स डाला तो मन में यह खयाल आया कि क्यों न अनिता को अपने अतीत के बारे में बता दूं और अपराधबोध से मुक्त हो जाऊं? यह तो मुझे अच्छी तरह समझती है. मेरी कविताओं की सहृदय पाठक ही नहीं, बल्कि समालोचक भी है. हां, इसी के सहयोग व प्रेरणा से तो ‘कायर नहीं हैं हम’ और ‘आओ, इस जर्जर घड़ी को बदल डालें’ कविता संग्रहों का प्रकाशन हुआ है.

‘‘सीमा को तुम कब से जानती हो, अनि?’’ रहस्योद्घाटन से पहले टोह लेना चाहा.

‘‘बचपन से,’’ उस ने बताया, ‘‘बाजपुर में उस का परिवार हमारे पड़ोस में ही रहता था, 9वीं में वह अपने मम्मीपापा के साथ वाराणसी चली गई थी. कुछ समय तक हमारे बीच फोन पर बातचीत होती रही, फिर वे लोग, भैया की शादी में नहीं आए, तो फोन आना बंद हो गया. उस के बाद वह कल शाम ही मिली, क्यों?’’

‘‘उसे नौकरी पर लगवाने के लिए पूछ रहा हूं. उस की योग्यता क्या है?’’

‘‘अंगरेजी से बी.ए. फाइनल नहीं कर सकी थी.’’

‘‘क्यों?’’

‘‘हीरोइन बनने की गरज से अपने प्रेमी के साथ मुंबई भाग आई थी, फिर स्टूडियो के चक्कर लगातेलगाते हताश हो कर उस ने घर लौट जाने का फैसला कर लिया था. उस का वह प्रेमी उस के गहने व रुपए ले कर चंपत हो गया और जातेजाते उसे लड़कियों से जबरन धंधा कराने वाले एक गिरोह के एजेंट को बेच गया जिस के बौस के पास कई पुरुषों के साथ बेहोशी में शूट की गई उस की ब्लू फिल्म थीं.’’

‘‘कंप्यूटर तो जानती होगी?’’

‘‘हां, प्लीज…कोई जगह खाली हो तो उसे रख लो,’’ अनिता ने आग्रह किया.

‘‘मैं हंसा,’’ वह भी फ्री में…

‘‘उस के पास देने को है भी क्या?’’

‘‘है, जो हमारे पास नहीं है.’’

‘‘मतलब?’’ अनिता चौंकी थी.

‘‘कोख.’’

वह भी हंसी, ‘‘तो पापा बनने को व्याकुल हो. मैं जानती हूं.’’

‘‘अनि…क्या तुम उसे स्वीकार कर सकोगी. कहीं वह मुझ पर अधिकार न जता ले?’’

‘‘‘सीमा के संदर्भ में’ आओ, इस जर्जर घड़ी को बदल डालें, संग्रह की शीर्षक कविता याद आ रही है मुझे,’’ और वह अक्षरश: उसे सुनाने लगी.

दीवार घड़ी में थरथर कांप कर, आगे बढ़ती हुई सुइयों को निहारते हुए चुपचाप मैं सुनता रहा…उस की आवाज…और अंत में बोला, ‘‘स्पष्ट करो.’’

‘‘सीमा एक सेक्स वर्कर है, यह जान कर भी आप उसे अपनाने को तैयार हो गए थे, तो…’’

मैं दंग रह गया, ‘‘यानी…’’ मुख से बमुश्किल निकला.

‘‘हां, आज दोपहर सीमा…सबकुछ बता गई.’’

अपराधबोध से मैं दब गया.

‘‘लेकिन उस ने आप को ठुकरा  दिया क्यों? कभी सोचा आप ने.’’

‘‘हां, कई बार सोचा था,’’ पर किसी नतीजे पर न पहुंच सका.

‘‘दरअसल, वह आप से बेहद प्रभावित हुई थी,’’ अनिता बोली, ‘‘उसे एक अजीब सा लगाव हो गया था आप से, जिसे वह कोई नाम नहीं देना चाहती थी. एक और बात थी कि आप की भलाई भी उस के पांव की जंजीर बन गई.’’

अनिता ने एक नया रहस्य खोला तो मैं बोला, ‘‘उसे और स्पष्ट करो.’’

‘‘लड़कियों की नजरबंदी के लिए तैनात सुरक्षा गार्ड, अगर आप को सीमा के इर्दगिर्द ज्यादा समय तक देख लेते तो आप की जान चली जाती और इसीलिए जानबूझ कर सीमा ने आप के मन में अपने प्रति नफरत भर दी ताकि आप उस से दूर हो जाएं.’’

मैं आश्चर्य से भर कर पत्नी को देखने लगा तो वह आगे बोली.

‘‘यह तो समूचा विपक्ष एक हो जाने पर पिछले दिनों सरकार को उन दरिंदों के खिलाफ काररवाई करने के लिए पुलिस को सख्त आदेश देने पड़े. तब कहीं वह मुक्त हो पाई और घर जा सकी.

‘‘अंकल, सीमा के भाग जाने का आघात बरदाश्त न कर पाते हुए पहले ही चल बसे थे. उस पर बदनामी का दंश…बेचारी कब तक झेलती रहती? छोटे भाईबहन और बीमार मां के साथ तंग आ कर आखिर में वह वाराणसी से पूना चली आई.’’

‘‘पगली, इतना बड़ा त्याग कर डाला, सिर्फ मेरे लिए? क्या लगता हूं मैं उस का? मैं तो आज तक उस से घृणा करता रहा…उसे गलत समझता रहा… छि…छि…छि…’’

‘‘अब तो यही हो सकता है कि हम कुछ करें, सीमा जैसी लड़कियों के लिए,’’ अनिता ने मानो अंदर झांक लिया हो.

‘‘हां, अनि,’’ ये दो शब्द अनंत गहराइयों से निकले पर मुझे नहीं मालूम था कि यह फैसला सही है या गलत. अगर बच्चा हो गया तो क्या उसे अनिता स्वीकार करेगी. और क्या सीमा वास्तव में बच्चे को और मुझे छोड़ कर जाएगी. मैं ने गहरी सांस ली और सब कुछ अनिता पर छोड़ दिया.

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