नेतागिरी के नशे में अपहरण

40  वर्षीय दीपकमणि त्रिपाठी उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले के कोतवाली थाना क्षेत्र के देवरिया खास (नगर) मोहल्ले का रहने वाला था. देवरिया खास में उस की अपनी आलीशान कोठी है. फिर भी वह भटनी में किराए का कमरा ले कर अकेला रहता था. उस के परिवार में बड़ी बहन डा. शालिनी शुक्ला के अलावा कोई नहीं है. दीपक ने शादी नहीं की थी.

सालों पहले दीपक के पिता मंगलेश्वरमणि त्रिपाठी का उस समय रहस्यमय तरीके से कत्ल कर दिया गया था, जब वह घर में अकेले सो रहे थे. अपनी जांच के बाद पुलिस ने दीपक को पिता की हत्या का आरोपी बनाया था. पिता की हत्या के आरोप में वह कई साल तक जेल में रहा. इन दिनों वह जमानत पर जेल से बाहर था. कहा जाता है कि दीपक को दांवपेंच खेल कर एक गहरी साजिश के तहत पिता की हत्या के आरोप फंसाया गया था.

शादीशुदा डा. शालिनी की ससुराल छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में है. वह अपनी ससुराल में परिवार के साथ रहती हैं. उन्हें दीपक की चिंता रहती है. वैसे भी बहन के अलावा दीपक का कोई और सहारा नहीं था. इसलिए कोई भी बात होती थी तो वह बहन और बहनोई को बता देता था.

20 मार्च, 2018 को मुकदमे की तारीख थी. दीपक को तारीख पर पेश होना था. उधर उस की एमएसटी टिकट की तारीख भी बढ़वानी थी. उस ने सोचा एमएसटी की डेट बढ़वा कर कचहरी चला जाएगा. इसलिए सुबह उठ कर वह सभी कामों से फारिग हो कर करीब 10 बजे एमएसटी की तारीख बढ़वाने भटनी स्टेशन चला गया.

एमएसटी बनवा कर दीपक वहीं से सलेमपुर कचहरी पहुंच गया. भटनी से सलेमपुर कुल 20-22 किलोमीटर दूर है. सलेमपुर पहुंचने में उसे कुल आधे घंटे का समय लगा होगा. सलेमपुर जाते समय उस ने बहन शालिनी को फोन कर के बता दिया था कि वह मुकदमे की तारीख पर पेश होने सलेमपुर जा रहा है. कचहरी से लौटने के बाद मुकदमे की स्थिति बताएगा.

धीरेधीरे शाम ढलने को आ गई. शालिनी भाई के फोन का इंतजार कर रही थी. जब उस का फोन नहीं आया तो उन्होंने खुद ही भाई के नंबर पर काल की. लेकिन दीपक का मोबाइल स्विच्ड औफ था.

शालिनी ने 3-4 बार दीपक के फोन पर काल की. हर बार उन्हें एक ही जवाब मिल रहा था, ‘उपभोक्ता के जिस नंबर पर आप काल कर रहे हैं वो अभी बंद है.’ शालिनी ने सोचा कि हो सकता है, दीपक के फोन की बैटरी डिस्चार्ज हो गई हो इसलिए फोन बंद है. रात में फिर से फोन कर के बात कर लेंगी.

रात में 10 साढ़े 10 बजे के करीब शालिनी ने फिर दीपक के मोबाइल पर काल की. लेकिन तब भी उस का फोन स्विच्ड औफ था. यह बात शालिनी को कुछ अटपटी सी लगी, क्योंकि दीपक अपना फोन इतनी देर तक कभी बंद नहीं रखता था. उस ने यह बात जब अपने पति को बताई तो वह भी चौंके. दीपक को ले कर किसी अनहोनी की आशंका से दोनों चिंता में पड़ गए.

रात काफी गहरा चुकी थी. शालिनी ने सोचा कि इतनी रात में किसी से बात करने से कोई फायदा नहीं होगा. अगले दिन ही कुछ हो सकता था. अगले दिन सुबह होते ही शालिनी ने अपने नातेरिश्तेदारों के यहां फोन कर के दीपक के बारे में पता किया, लेकिन दीपक का कहीं कुछ पता नहीं चला.

वैसे भी वह किसी नातेरिश्तेदार के यहां जाना पसंद नहीं करता था, सिवाय शालिनी को छोड़ कर. शालिनी की समझ में यह बात नहीं आ रही थी कि दीपक गया तो गया कहां? कहीं उस के साथ कोई दुर्घटना तो नहीं घट गई, यह सोच कर शालिनी परेशान हो रही थीं.

धीरेधीरे एक सप्ताह बीत गया लेकिन दीपक का कहीं कोई पता नहीं चला. अपने स्तर पर शालिनी ने भाई का हर जगह पता लगा लिया था, उन्हें हर जगह से निराशा ही मिली थी.

दीपक करोड़ों की संपत्ति का इकलौता वारिस था. सालों से बदमाश उसे जान से मारने की धमकी दे रहे थे. इसीलिए वह गांव की कोठी छोड़ कर भटनी कस्बे में किराए का कमरा ले कर रहता था ताकि चैन और सुकून से जी सके. लेकिन बदमाशों ने यहां भी उस का पीछा नहीं छोड़ा था.

यह बात डाक्टर शालिनी शुक्ला भी जानती थीं, इसीलिए वह भाई के लिए फिक्रमंद थीं. शहर के कुछ नामचीन बदमाश और भूमाफिया उस की करोड़ों की संपत्ति को हथियाने की कोशिश में लगे हुए थे.

10 दिन बीत जाने के बाद भी जब दीपक का कहीं कोई पता नहीं चला तो डाक्टर शालिनी सक्रिय हुईं. शालिनी ने 10 अप्रैल, 2018 को बिलासपुर से ही भाई के अपहरण की शिकायत पुलिस अधीक्षक रोहन पी. कनय और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को रजिस्टर्ड डाक व ईमेल के माध्यम से भेज दीं. दीपक की गुमशुदगी की सूचना मिलते ही पुलिस महकमे में खलबली मच गई.

दीपक करोड़ों की संपत्ति का इकलौता वारिस था. उसे गायब हुए करीब 20 दिन बीत चुके थे. उस के गायब होने के बारे में पुलिस को भनक तक नहीं लगी थी. डा. शालिनी शुक्ला की शिकायत पर सदर कोतवाली में भादंवि की धारा 365 के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया गया.

खैर, एक सप्ताह बाद भी कोई काररवाई न होने पर 17 अप्रैल, 2018 को उन्होंने फिर शिकायत की. 17 अप्रैल को ही पुलिस अधीक्षक रोहन पी. कनय को एक चौंका देने वाली सूचना मिली. सूचना यह थी कि नियमों को दरकिनार कर के गायब हुए व्यक्ति से एक ही दिन में कई बैनामे कराए गए थे.

इस में 2 बैनामे जिला पंचायत अध्यक्ष रामप्रवेश यादव उर्फ बबलू के नाम से, तीसरा उस की मां मेवाती देवी, चौथा भाई अमित कुमार यादव और 5वीं रजिस्ट्री मधु देवी पत्नी ब्रह्मानंद चौहान निवासी खोराराम के नाम से हुई थी.

बैनामे के साथ ही बड़े पैमाने पर स्टांप की भी चोरी हुई थी. पुलिस अधीक्षक रोहन सकते में आ गए और उन्होंने तत्काल पूरे मामले से जिलाधिकारी को अवगत करा दिया. बैनामा किसी और के द्वारा नहीं बल्कि कई दिनों से लापता दीपकमणि त्रिपाठी के द्वारा कराया गया था.

इस का मतलब था कि दीपकमणि त्रिपाठी जिंदा था और बदमाशों के कब्जे में था. बदमाशों ने दीपक को कहां छिपा रखा था, ये कोई नहीं जानता था. एसपी रोहन ने दीपक को बदमाशों के चंगुल के सहीसलामत छुड़ाने के लिए कमर कस ली. उन्होंने सीओ सदर सीताराम के नेतृत्व में एक पुलिस टीम का गठन किया.

इस टीम में सीओ सदर के अलावा सदर कोतवाली के प्रभारी निरीक्षक प्रभतेश श्रीवास्तव, प्रभारी स्वाट टीम सीआईयू सर्विलांस अनिल यादव, स्वाट टीम के कांस्टेबल घनश्याम सिंह, अरुण खरवार, धनंजय श्रीवास्तव, प्रशांत शर्मा, मेराज खान, सर्विलांस सेल के राहुल सिंह, विमलेश, प्रद्युम्न जायसवाल, कांस्टेबल सूबेदार विश्वकर्मा, रमेश सिंह और सौरभ त्रिपाठी शामिल थे.

उधर डा. शालिनी ने तीसरी बार 23 अप्रैल को मुख्यमंत्री के जन सुनवाई पोर्टल पर शिकायत की. उन्हें पता चला था कि मुख्यमंत्री के वाट्सऐप नंबर पर शिकायत करने के 3-4 घंटे के भीतर काररवाई हो जाती है.

उन की यह सोच सही साबित हुई. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ तक शिकायत पहुंचने के बाद जिले की पुलिस सक्रिय हो गई और एसपी रोहन पी. कनय मामले में विशेष रुचि लेने लगे.

इधर बदमाशों की सुरागरसी में सीओ सदर सीताराम ने मुखबिर लगा दिए थे. इस बीच पुलिस को जिला पंचायत अध्यक्ष रामप्रवेश यादव और उस के भाई अमित यादव का मोबाइल नंबर मिल गया था. दोनों नंबरों को पुलिस ने सर्विलांस पर लगा दिया.

आखिरकार पुलिस की मेहनत रंग लाई. 2 मई, 2018 को पुलिस को पता चल गया कि बदमाशों ने अपहृत दीपकमणि त्रिपाठी को देवरिया शहर के निकट अमेठी मंदिर, स्थित पूर्व सांसद व सपा के राष्ट्रीय महासचिव रमाशंकर विद्यार्थी के कटरे में रखा था.

सूचना पक्की थी. सीओ सदर सीताराम ने कुछ चुनिंदा पुलिसकर्मियों की टीम बनाई और इस मिशन को गोपनीय रखा ताकि मिशन कामयाब रहे. वे बदमाशों को किसी भी तरह  भागने का मौका नहीं देना चाहते थे, इसलिए उन्होंने पूरी तैयारी के साथ सपा नेता रमाशंकर विद्यार्थी के अमेठी आवास स्थित कटरे पर दबिश दी.

पुलिस टीम ने कटरे को चारों ओर से घेर लिया. उसी कटरे के एक कमरे में बदमाशों ने दीपकमणि त्रिपाठी को हाथपैर बांध कर रख रखा था. उस वक्त वह अर्द्धविक्षिप्तावस्था में था. बदमाशों ने उसे काबू में रखने के लिए नशे का इंजेक्शन लगा रखा था.

पुलिस ने दीपकमणि त्रिपाठी को बदमाशों के चंगुल से सकुशल मुक्त करा लिया. पुलिस ने दबिश के दौरान मौके से 4 बदमाशों को गिरफ्तार किया. पूछताछ में चारों बदमाशों ने अपना नाम अमित यादव, धर्मेंद्र गौड़, मुन्ना चौहान और ब्रह्मानंद बताए.

पुलिस चारों बदमाशों और उन के कब्जे से मुक्त कराए गए दीपकमणि त्रिपाठी को ले कर सदर कोतवाली लौट आई. सूचना  पा कर पुलिस अधीक्षक रोहन पी. कनय बदमाशों से पूछताछ करने कोतवाली पहुंच गए. इस पूछताछ में पता चला कि दीपक अपहरणकांड का मास्टरमाइंड कोई और नहीं, जिला पंचायत अध्यक्ष रामप्रवेश यादव था.

दीपक का अपहरण 10 करोड़ की जमीन का बैनामा कराने के लिए किया गया था. बदमाशों ने शहर में स्थित दीपकमणि की 40 करोड़ से अधिक की बची हुई जमीन का बैनामा बाद में कराने की योजना बनाई थी. लेकिन पुलिस ने उन की योजना पर पानी फेर दिया.

बदमाशों से पूछताछ में पता चला कि अमित यादव इस मामले के मास्टरमाइंड रामप्रवेश का सगा भाई था. धर्मेंद्र गौड़ जिला पंचायत अध्यक्ष रामप्रवेश का वाहन चालक था. मुन्ना चौहान और ब्रह्मानंद रामप्रवेश यादव के गांव के रहने वाले थे और उस के सहयोगियों में से थे. खैर, बदमाशों के पकड़े जाते ही जिला पंचायत अध्यक्ष रामप्रवेश यादव भूमिगत हो गया.

दीपकमणि त्रिपाठी को सकुशल बरामद करने के बाद एसपी रोहन पी. कनय ने पुलिस लाइंस में एक पत्रकार वार्ता का आयोजन किया. उन्होंने पत्रकारों के सामने दीपक को पेश किया. दीपक ने अपहरण की पूरी घटना सिलसिलेवार बता दी कि उस के साथ क्याक्या हुआ था?

बाद में पुलिस ने चारों अभियुक्तों अमित यादव, धर्मेंद्र गौड़, मुन्ना चौहान और ब्रह्मानंद को अदालत में पेश कर के जेल भेज दिया. अभियुक्तों के बयान के आधार पर पुलिस ने इस केस में धारा 365 के साथ धारा 467, 471, 472 व 120 बी भी जोड़ दीं. भगोड़े नेता रामप्रवेश यादव पर 10 हजार रुपए का इनाम घोषित कर दिया गया.

पुलिस ने दीपक अपहरणकांड की जांच आगे बढ़ाई तो कई और चौंकाने वाले तथ्य खुल कर सामने आए. जांच के दौरान पुलिस को पता चला कि दीपकमणि से जमीन का बैनामा करवाने में आरोपी रामप्रवेश यादव का साथ रजिस्ट्री विभाग के फूलचंद यादव निवासी अब्दोपुर, थाना चिरैयाकोट, जनपद मऊ (उप निबंधन अधिकारी), रामशरन सिंह निवासी अंसारी रोड, थाना कोतवाली, देवरिया (वरिष्ठ सहायक निबंधन अधिकारी) ने भी दिया था.

इन के अलावा बैनामा कराने में शोभनाथ राव निवासी राघवनगर, चंदेल भवन, थाना कोतवाली, देवरिया (वरिष्ठ सहायक निबंधन अधिकारी), शोएब चिश्ती निवासी करैली, थाना करैली, इलाहाबाद (कंप्यूटर आपरेटर), कौशलकिशोर निवासी रामगुलाम टोला, थाना कोतवाली, देवरिया और विनोद तिवारी उर्फ मंटू तिवारी निवासी विशुनपुर, थाना भटनी, देवरिया ने भी पूरा सहयोग दिया था.

पुलिस ने रजिस्ट्री विभाग के उक्त 6 कर्मियों को भी कानून के शिकंजे में जकड़ लिया. 5 मई, 2018 को इन 6 आरोपियों को गिरफ्तार कर के जेल भेज दिया. अब तक कुल 10 आरोपी गिरफ्तार किए जा चुके थे. लेकिन रामप्रवेश का कहीं पता नहीं चल पा रहा था. इस बीच पुलिस ने उस पर ईनाम बढ़ा कर 25 हजार कर दिया था. पुलिस रामप्रवेश यादव की तलाश में दिनरात एक किए हुए थी.

आखिर पुलिस की मेहनत रंग लाई, उसे रामप्रवेश के मोबाइल नंबर की लोकेशन मिल गई. सर्विलांस के जरिए पता चला कि वह नेपाल में था.

इधर यादव की गिरफ्तारी के लिए पुलिस पर भारी दबाव बनने लगा था. शासन के आदेश के बाद आईजी जोन निलाब्जा चौधरी ने रामप्रवेश यादव का ईनाम बढ़ा कर 50 हजार रुपए कर दिया.

ईनाम बढ़ने के साथसाथ पुलिस की जिम्मेदारी भी बढ़ गई थी. जब से पुलिस को रामप्रवेश के नेपाल में छिपे होने की बात पता चली थी, पुलिस उसे गिरफ्तार करने के लिए बेचैन थी. चूंकि मामला दूसरे देश से जुड़ा था, इसलिए उसे नेपाल में गिरफ्तार करना पुलिस के लिए टेढ़ी खीर साबित हो रहा था.

पुलिस ने भारतनेपाल के सोनौली बौर्डर पर अपने मुखबिरों का जाल बिछा दिया था. ऐसा इसलिए कि रामप्रवेश यादव जैसे ही नेपाल से निकल कर भारत की सीमा सोनौली में प्रवेश करे, मुखबिर सूचित कर दें.

आखिरकार 25 मई, 2018 को पुलिस को बड़ी सफलता मिल ही गई. मुखबिर की सूचना पर रामप्रवेश यादव को देवरिया पुलिस ने भारतनेपाल बौर्डर के सोनौली से गिरफ्तार कर लिया. वहां से उसे कोतवाली सदर थाना लाया गया.

पूछताछ में रामप्रवेश ने खुद को बचाते हुए पैतरा चला. उस ने पुलिस के सामने कबूल किया कि दीपकमणि त्रिपाठी से उस के वर्षों से घरेलू संबंध रहे हैं. दीपक का उस के घर खानेपीने से ले कर परेशानी के समय दवा तक का इंतजाम होता था. उस पर अपहरण का आरोप लगाया जाना विपक्षियों की चाल है. उसे किसी ने फंसाने के लिए जानबूझ कर जाल बिछाया है.

लेकिन पुलिस के सामने उस की दाल नहीं गली, उसे झुकना ही पड़ा. रामप्रवेश ने अपना जुर्म कबूल करते हुए बताया कि दीपकमणि त्रिपाठी अपहरण कांड के पीछे असल हाथ उसी का था. उसी ने लालच में उस के अपहरण की पटकथा लिखी थी.

रामप्रवेश यादव के इकबालिया बयान के बाद पुलिस ने उसे अदालत के सामने पेश किया. अदालत ने रामप्रवेश यादव को न्यायिक हिरासत में जेल भेजने का आदेश दिया. उसे हिरासत में ले कर देवरिया जेल भेज दिया गया. आरोपियों से की गई गहन पूछताछ और अपहृत दीपकमणि त्रिपाठी के बयान से अपहरण की पूरी कहानी सामने आ गई—

यूं तो दीपकमणि त्रिपाठी उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले के देवरिया खास का रहने वाला था. उस के पास पैसे की खूब रेलमपेल थी, लेकिन वह अकेला था. शहर की अलगअलग जगहों पर उस की 50 करोड़ से अधिक की संपत्ति थी. इस के साथ ही गांव में भी उस की काफी जमीन थी.

पिता की हत्या के बाद वह सारी जायदाद का एकलौता वारिस था. कुछ लोगों ने दीपक से शहर के सीसी रोड और चीनी मिल के पीछे की जमीन वर्षों पहले खरीद ली थी. इस के बाद भी शहर के राघव नगर, सीसी रोड, परशुराम चौराहा, देवरिया खास, सुगर मिल के पास उस की करोड़ों की संपत्ति थी. इस के साथ ही गांव रघवापुर, लिलमोहना समेत कई जगहों पर उस की जमीनें थीं.

पिता मंगलेश्वरमणि त्रिपाठी की हत्या के बाद से दीपक अकेला रह रहा था. उस की एकमात्र बहन डाक्टर शालिनी शुक्ला छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में रहती थी. वह बराबर फोन कर के भाई का हालचाल लेती रहती थी. वह जानती थी कि इस जमाने में सीधेसादे लोगों का जीना आसान नहीं है, वह तो वैसे भी करोडों की संपत्ति का मालिक था. यह करोड़ों की संपत्ति ही दीपक की जान के लिए आफत बनी हुई थी.

उस की संपत्ति को ले कर कुछ लोग पहले ही दीपक पर जानलेवा हमला कर चुके थे. इसलिए वह शहर को छोड़ कर भटनी कस्बे में किराए पर कमरा ले कर रहता था. वहीं से वह पिता की हत्या के मुकदमे की पैरवी करता था. उस की संपत्ति पर 2011 से रामप्रवेश यादव की भी नजर गड़ी हुई थी.

40 वर्षीय रामप्रवेश यादव देवरिया जिले के रजला गांव का रहने वाला था. 2 भाइयों में वह बड़ा था. उस के छोटे भाई का नाम अमित यादव था. रामप्रवेश शादीशुदा था. रजला गांव में उस की बडे़ रसूख वालों में गिनती होती थी. रामप्रवेश का ईंट भट्ठे की व्यवसाय था.

भट्ठे की कमाई से पैसा आया तो वह राजनीति की गलियों में पहुंच कर बड़ा नेता बनने का ख्वाब देखने लगा. रामप्रवेश यादव ने गंवई राजनीति से अपनी राजनीतिक पारी खेलनी शुरू की. एक नेता के जरिए उस ने समाजवादी पार्टी की सदस्यता ले ली.

समाजवादी पार्टी की राजनीति करने के साथ ही वह जिला पंचायत सदस्य के लिए चुनाव में कूद पड़ा और जिला पंचायत सदस्य की कुर्सी हासिल कर ली. जिला पंचायत सदस्य बनने के बाद उस के सपा मुखिया अखिलेश यादव व मुलायम सिंह यादव से अच्छे संबंध बन गए.

अखिलेश यादव से संबंधों के चलते उसे पार्टी की ओर से जिला पंचायत अध्यक्ष के चुनाव में टिकट मिल गया. इस में वह जीता और जिला पंचायत अध्यक्ष बन गया.

जिला पंचायत अध्यक्ष बनते ही रामप्रवेश यादव की गिनती बड़े नेताआें में होने लगी. पार्टी के बडे़बड़े नेताओं के बीच उठतेबैठते उस के पैर जमीन पर नहीं टिकते थे. कुछ ही दिनों में आगे का सफर तय करते हुए उस ने लोगों के बीच अपनी अच्छी छवि बना ली.

सपा पार्टी की सदस्यता ग्रहण करने के बाद 2011 से ही रामप्रवेश की निगाह दीपकमणि त्रिपाठी की करोड़ों की संपत्ति पर जम गई थी. उसे हथियाने के लिए वह साम दाम दंड भेद सभी तरीके अपनाने के लिए तैयार था, लेकिन दीपक तक उस की पकड़ नहीं बन पा रही थी. दीपक को अपने चंगुल में फांसने के लिए उस ने अपने खास सिपहसालार ब्रह्मानंद चौहान को उस के पीछे लगा दिया.

ब्रह्मानंद चौहान के जरिए दीपक को वह अपने नजदीक लाने में कामयाब रहा. रामप्रवेश यादव जानता था कि दीपक अकेला है. उस के आगेपीछे कोई नहीं है. वह जैसा चाहेगा, उसे अपनी धारा में मोड़ लेगा. सीधासादा दीपक रामप्रवेश के मन क्या चल रहा है, नहीं समझ पाया और उस की राजनीतिक यारी का कायल हो कर रह गया.

दीपक की एक बड़ी संपत्ति कुछ दबंगों के हाथों में चली गई थी, जहां वह कुछ नहीं कर पा रहा था. यह बात रामप्रवेश को पता थी. वह इसी बात का फायदा उठा कर दीपक के दिल में जगह बनाना चाहता था और उस ने ऐसा ही किया भी.

दीपक की जमीन से कब्जा हटवा कर रामप्रवेश ने उस के दिल में जगह बना ली. रामप्रवेश यादव दीपक से इस एहसान का बदला उस की बेनामी संपत्तियों को अपने नाम बैनामा करवा कर लेना चाहता था. उस ने अपनी मंशा दीपक के सामने रख भी दी थी कि वह कुछ संपत्ति का उस के नाम बैनामा कर दे. फिर उस की ओर आंख उठा कर देखने की किसी की हिम्मत नहीं होगी.

यह रामप्रवेश के तरकश का पहला तीर था. उस का तर्क था कि एक बार दीपक थोड़ी सी जमीन उस के नाम बैनामा कर दे तो बाकी संपत्ति को वह धीरेधीरे हथिया लेगा. इसलिए वह दीपक का खास ख्याल रखता था. इसी गरज से उस ने दीपक को अपने यहां पनाह दी थी. उस का खूब सेवासत्कार किया था.

देखने में दीपक भले ही सीधासादा था, पर कम चालाक नहीं था. वह रामप्रवेश की मंशा भांप गया था. एक दिन बातोंबातों में रामप्रवेश ने उस के सामने प्रस्ताव रखा कि वह अपनी कुछ जमीन का बैनामा उस के नाम कर दे, बदले में वह उस की देखभाल करता रहेगा. लेकिन दीपक इस के लिए तैयार नहीं हुआ.

उसे लगा कि रामप्रवेश ताकतवर राजनेता है. वो उस की जमीन का बैनामा करा लेगा. उस के बाद से दीपक ने रामप्रवेश का साथ छोड़ दिया. यही नहीं अपनी जानमाल की सुरक्षा के दृष्टिकोण से उस ने देवरिया की धरती ही छोड़ दी और भटनी में जा कर किराए का कमरा ले कर रहने लगा.

रामप्रवेश यादव की मंशा पर दीपक ने पानी फेर दिया था. उसे यह बात गंवारा नहीं थी कि कमजोर सा दिखने वाला दीपक उसे हरा दे. उस के इनकार कर देने से रामप्रवेश यादव तिलमिला कर रह गया. लेकिन वह बैकफुट पर जाने के लिए तैयार नहीं था.

जब उस ने देखा कि अब सीधी अंगुली से घी नहीं निकलने वाला तो उस ने अंगुली टेढ़ी कर दी. रामप्रवेश ने दीपक का अपहरण करने और जबरन बैनामा करने की योजना बनाई.

इस योजना में उस ने अपने छोटे भाई अमित यादव सहित ड्राइवर धर्मेंद्र गौड़, मुन्ना चौहान और ब्रह्मानंद चौहान को शामिल कर लिया. रामप्रवेश यादव को सुरक्षा में एक सरकारी गनर मिला हुआ था. अपहरण की योजना को अंजाम देने से 2 दिन पहले उस ने गनर को यह कह कर वापस भेज दिया था कि अभी उसे उस की जरूरत नहीं है. आवश्यकता पड़ने पर वह खुद ही उसे वापस बुला लेगा.

इस की जानकारी उस ने कप्तान रोहन पी. कनय को दे दी थी ताकि कोई बात हो तो वह खुद को सुरक्षित बचा सके. ऐसा उस ने इसलिए किया था, ताकि उस की योजना विफल न हो जाए. गनर के साथ रहते हुए वह योजना को अंजाम नहीं दे सकता था.

दीपक के क्रियाकलापों से रामप्रवेश यादव वाकिफ था. 20 मार्च, 2018 को मुकदमे की तारीख थी. मुकदमे की पेशी के लिए दीपक भटनी से सलेमपुर कोर्ट पहुंचा. रामप्रवेश को ये बात पता थी. उस ने दीपक का अपहरण करने के लिए अमित, धर्मेंद्र, मुन्ना और ब्रह्मानंद को उस के पीछे लगा दिया.

कोर्ट जाते समय इन चारों को मौका नहीं मिला, लेकिन शाम ढलने के बाद अदालत से घर लौटते समय इन लोगों ने दीपक को सलेमपुर चौराहे पर हथियारों के बल पर घेर लिया और कार में बैठा कर फरार हो गए.

40 दिनों तक जिला पंचायत अध्यक्ष रामप्रवेश यादव दीपकमणि त्रिपाठी को शहर के विभिन्न स्थानों पर रखे रहा. इस दौरान बदमाश उसे नशीला इंजेक्शन लगा कर काबू में करते रहे, उसे शारीरिक यातनाएं देते रहे. साथ ही दबाव बनाने के लिए उसे मारतेपीटते भी रहे.

उस से कहा गया कि अगर वह शहर की 50 करोड़ की संपत्ति नेताजी के नाम पर बैनामा कर दे तो उसे जिंदा छोड़ दिया जाएगा. नहीं तो ऐसे ही यातना दी जाएगी. दीपक अपनी बात पर अडिग रहा कि उसे चाहे जो सजा दे दो, लेकिन वह संपत्ति का बैनामा नहीं करेगा.

जमीन का बैनामा कराने से पहले ही रामप्रवेश ने दीपक के ओरियंटल बैंक के खाते में साढ़े 4 लाख रुपए का आरटीजीएस भी किया था. बाद में 17 अप्रैल को जमीन का बैनामा कराने के बाद उस ने उस रुपए को निकालने के लिए दीपक से उस के चेक पर हस्ताक्षर करा कर बैंक भिजवाया. लेकिन दीपक ने खाता खोलने के दिन से ही शाखा प्रबंधक से कह दिया था कि कभी भी बिना उस की जानकारी के कोई बड़ी रकम उस के खाते से नहीं निकाली जानी चाहिए.

इसलिए वह उस के खाते से रुपए नहीं निकल पाया. ये मात्र साढ़े 4 लाख रुपए जिला पंचायत अध्यक्ष ने जमीन के लिए दिए थे और फिर दिए गए रुपए को वह साजिश रच कर वापस पाना चाहता था. लेकिन उस का इरादा कामयाब नहीं हुआ. पुलिस ने रामप्रवेश के कब्जे से वह चैक भी बरामद कर लिया.

रामप्रवेश यादव ने आस्तीन का सांप बन कर दीपक को डंसा. उस ने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि रामप्रवेश उस के साथ ऐसी घिनौनी हरकत करेगा. नेताजी के कुकृत्यों में साथ दे कर रजिस्ट्री विभाग के कर्मचारियों ने अपने पैरों पर खुद ही कुल्हाड़ी मार ली और नाहक जेल की हवा खानी पड़ी.

नेता रामप्रवेश यादव कभी डीएम और एसपी की कुर्सी के बीच बैठ कर शेखी बघारता था. लेकिन जब पुलिस ने उसे हथकड़ी पहनाई तो उस की सारी हेकड़ी धरी रह गई. कथा लिखे जाने तक सभी 11 आरोपी जेल में बंद थे. बुरी तरह डरा हुआ दीपक कुछ दिनों के लिए अपनी बहन शालिनी के पास छत्तीसगढ़ चला गया था.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

सवाल : ‘नव हिंदुत्व’ से कैसे निबटेंगे

साल 2009 के लोकसभा चुनाव में बहुजन समाज पार्टी ने ‘दलितब्राह्मण’ समीकरण को सामने रख कर चुनाव लड़ा था. तब उसे मनचाही कामयाबी नहीं मिली थी. 2019 के लोकसभा चुनाव में बसपा अपने पुराने मुद्दों पर वापस जाती दिख रही है.

लखनऊ के कार्यकर्ता सम्मेलन में बसपा नेताओं ने कहा, ‘मंदिरों में ताकत होती तो लोग मंदिर छोड़ कर मुख्यमंत्री नहीं बनते. ताकत केवल राजनीति में होती है, इसलिए अपनी ताकत पहचानो और उस का इस्तेमाल करो. उमा भारती और दूसरी साध्वी राजनीति कर रही हैं और हम को कहा जा रहा है कि मंदिर जाओ. हमारी पार्टी की मुखिया मायावती ही जीवित देवी हैं. हमारा रिजर्वेशन कांशीराम और मायावती के चलते ही सुरक्षित है.’ ये मुद्दे 2007 से पहले बसपा उठाती रही है.

दलित चिंतक चौधरी जगदीश पटेल कहते हैं, ‘‘बसपा ने दलित मुद्दों से पार्टी को अलग कर दिया था. वह ब्राह्मणों के दबाव में आ गई थी. पार्टी ने रूढि़वादी विचारधारा की आलोचना बंद कर दी थी. इस का फायदा उठा कर भाजपा ने दलितों को नवहिंदुत्व का पाठ पढ़ाना शुरू किया, जिस से पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा को बड़ी तादाद में दलितों के वोट मिले थे.

‘‘सपा की मुश्किल यह है कि एक तरफ हिंदुत्व की आलोचना खुल कर नहीं कर पा रही है, वहीं दूसरी तरफ दलितों को मंदिर और पूजापाठ से दूर भी रखना चाहती है. ये दोनों काम एकसाथ मुमकिन नहीं हैं. धार्मिक कट्टरपन पहले से ज्यादा बढ़ गया है. ऐसे में बसपा दोराहे पर खड़ी है. वह पहले की तरह मनुवाद की आलोचना नहीं कर पा रही है.

‘‘अगर दलित हिंदुत्व की राह पर रहे हैं तो वे भाजपा से दूर नहीं हो पाएंगे. जब तक दलित हिंदुत्व से दूर नहीं होंगे तब तक धर्म के नाम पर उन को भाजपा से अलग करना मुमकिन नहीं है.

‘‘बसपा मनुवाद की बुराई कर के हिंदुत्व को नाराज करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही है.’’

रिटायर्ड आईपीएस और उत्तर प्रदेश स्वराज समिति के सदस्य आरएस दारापुरी  कहते हैं, ‘‘बसपा के समय में ही दलित आंदोलन कमजोर हो गया था. बाबा साहब हमेशा कहते थे कि हिंदू राष्ट्र समाज के लिए घातक होगा. यहां पर शंबूक और बाली की तरह लोगों के वध होंगे. सीता की तरह औरत के साथ नाइंसाफी होगी.

‘‘बाबा साहब हमेशा देश में हिंदू राष्ट्र की स्थापना का विरोध करते थे. कांशीराम आंदोलन की जगह पर उस तरह काम करते थे जिस में दलित कमजोर बन कर उन के पीछेपीछे चलता रहे. इस वजह से आज भी दलित मुखर हो कर अपनी बात नहीं कह पा रहा है.

‘‘आज वह फिर से बसपा का साथ छोड़ ऊंची जातियों की अगुआई करने वालों के पीछे खड़ा हो गया है. इस के साथ भाजपा ने दलित नेताओं को अपने पक्ष में कर लिया इसलिए दलित चुप है. उस को समझ नहीं आ रहा कि वह क्या करे?’’

बसपा ‘दलितमुसलिम’ गठजोड़ का भी इस्तेमाल करना चाहती है. यहां भी उस की मजबूरी यह है कि मुसलिम के साथ नवहिंदुत्व का शिकार दलित खड़ा होगा या नहीं.

2017 के विधानसभा चुनाव में बसपा ने ‘दलितमुसलिम’ गठजोड़ का जो प्रयोग किया वह बैकफायर कर गया था. ऐसे में बसपा लोकसभा चुनाव में इसे आजमाने का खतरा उठाने से डर रही है.

उत्तर प्रदेश में सपा और कांग्रेस व उत्तर प्रदेश के बाहर कांग्रेस से बसपा समझौता कर सकती है, जिस तरह से कर्नाटक चुनाव के बाद सरकार बनाने में मायावती ने अहम भूमिका निभाई और कांग्रेस के करीब आई. इस से यह बात मजबूत होती है कि लोकसभा चुनाव में मायावती की अहमियत बढे़गी.

एज डिफरैंस लव नहीं रहा टैबू

बंगलादेश की विवादित लेखिका तस्लीमा नसरीन का मानना है कि जब भी वे यह कहती हैं कि प्यार में उम्र कोई माने नहीं रखती तो इस का अर्थ यह निकाला जाता है कि वे 60 वर्ष के बुजुर्ग और 20 वर्षीय लड़की के बीच प्रेमप्रसंग की बात को जायज ठहरा रही हैं, जबकि उन के इस कथन को दूसरे माने के साथ भी समझा जा सकता है जिस की ओर कभी किसी का ध्यान ही नहीं जाता, यानी प्यार जब होता है तो उस समय उम्र का हिसाबकिताब नहीं लगाया जाता है. सच यह है कि  प्यार सोचसमझ कर शायद ही कभी किया जाता हो.

बिहार के जमुई जिले के गिद्धौर प्रखंड के धोवनघाट निवासी, 77 साल के प्रवासी भारतीय शत्रुघ्न प्रसाद सिंह कोलकाता से इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने के बाद जरमनी में नौकरी की और वहीं हैम्बर्ग क्रोनेनबर्ग में बस गए. कई वर्षों तक नौकरी करने के बाद वे कुछ साल पहले रिटायर हो गए. इसी बीच उन की पत्नी की मृत्यु हो गई.

पत्नी के गुजर जाने के सदमे और अकेलेपन से निकलने की कोशिश में फेसबुक के जरिए उन की दोस्ती जरमनी की 75 वर्षीय इडलटड्र हबीब से हुई. इडलटड्र हैमबर्ग की रहने वाली हैं. उन के पति की मृत्यु हो चुकी थी. फेसबुक पर हुई दोस्ती धीरेधीरे प्यार में बदल गई और फिर उन दोनों ने साथ जिंदगी गुजारने का फैसला कर लिया.

फिल्म अभिनेता व अभिनेत्रयों की जिंदगियों पर गौर करें तो ऐसे रिश्तों की भरमार है और उन का आज तक का सफल वैवाहिक जीवन दर्शाता है कि प्यार के लिए आपसी सामंजस्य, समझदारी, समर्पण व सम्मान जरूरी है न कि उम्र.

ऐसा नहीं है कि यदि आप को अपने से दोगुनी उम्र की लड़की या लड़के से प्यार हुआ है और आप उसे अपने भावी पार्टनर के रूप में देखते हैं तो आप मोह या इन्फैचुरेशन से ग्रस्त हैं. हां, कभीकभी यह मोह या इन्फैचुरेशन हो भी सकता है पर समय के साथ आप समझ जाते हैं कि यह प्यार नहीं, बल्कि मात्र आकर्षण है. किंतु जब इस प्रकार के रिश्ते तमाम दिक्कतों व चुनौतियों को पार कर और सचाई को स्वीकार कर के भी अटूट बंधन में बंधने की इच्छा रखते हैं तब वह सच्चा प्यार कहलाता है. दरअसल, आसक्ति यानी मन का लगाव व प्यार में बहुत बारीक सा फर्क होता है, जिसे एज डिफरैंस वाले रिश्तों में समझदारी से संभालना जरूरी होता है.

बौलीवुड और हौलीवुड में ऐसे कई जोड़े

हिंदी फिल्मों के ट्रैजिडी किंग दिलीप कुमार ने जब अभिनेत्री सायरा बानो से विवाह किया था तो उन की उम्र 45 साल व सायरा बानो की 22 थी. 1966 में ये दोनों परिणयसूत्र में बंधे पर 1980 में इन के रिश्ते की डोर कुछ समय के लिए टूटी लेकिन जो प्यार व विश्वास इन के रिश्ते में था, उस ने इन्हें एक बार फिर हमेशा के लिए जोड़ दिया और तब से अब तक इन का रिश्ता बेहद मजबूत व मधुरता से चल रहा है.

हेमा मालिनी व धर्मेंद्र की जोड़ी भी एज गैप रिलेशन की सफलता बयान करती है. ‘शोले’ फिल्म की शूटिंग के दौरान धर्मेंद्र को हेमा से प्यार हुआ और तब वे हेमा से 13 साल सीनियर थे. साथ ही पहले से शादीशुदा. पर बताने की जरूरत नहीं कि इन का वैवाहिक जीवन आज भी कायम है और ईशा व अहाना नाम की 2 बेटियां उस रिश्ते की परिणति हैं.

ऐसा ही संजय दत्त व मान्यता का रिश्ता है. संजय मान्यता से 19 साल बड़े हैं. पर इस का प्रभाव कहीं भी इन के रिश्ते पर पड़ा नहीं दिखता. करीना कपूर ने भी अपने से 11 साल बड़े सैफ अली खान से शादी की. हालांकि सैफ अली खान के लिए एज गैप रिलेशन कोई नई बात नहीं थी. उन की पहली पत्नी अमृता सिंह शादी के समय 33 साल की थीं जबकि सैफ 21 के. 13 साल तक इन का रिश्ता चला पर फिर टूट गया. हालांकि रिश्ता टूटने का कारण उम्र कतई नहीं थी.

इसी तरह बौलीवुड दिग्गज अभिनेता कबीर बेदी ने अपनी दोस्त परवीन दुसांज से चौथी शादी की. कबीर जहां 70 पार कर चुके हैं वहीं परवीन 41 पार कर चुकी हैं.

हाल ही में मौडल व ऐक्टर 53 वर्षीय मिलिंद सोमण ने अपनी गर्लफ्रैंड अंकिता कुंवर से शादी रचा ली. 27 वर्ष की अंकिता असम की रहने वाली हैं जबकि मिलिंद मराठी हैं. बता दें अंकिता एक एयरलाइन में केबिन क्रू एग्जिक्यूटिव थीं.

इमरान खान जैसे पाकिस्तानी लोकप्रिय क्रिकेट खिलाड़ी के बारे में जब खबर आई कि उन्होंने 21 साल की लड़की के साथ ब्याह रचा लिया तो दक्षिण एशिया सहित दुनियाभर के देशों के समाजों ने दांतों तले उंगली दबा ली थी. अमेरिका के प्रैसिडैंट डोनाल्ड ट्रंप और उन की पत्नी मेलानिया की उम्र में 24 साल का अंतर है.

हौलीवुड में अपने से बड़ी उम्र की महिला से प्यार व शादी का ट्रैंड शुरू करने का श्रेय डैमी मूर व एशन कूचर को जाता है. जब पौप सिंगर मडोना ने ऐक्टर गाय रिची से शादी की तब वो उन से 10 साल छोटा था. ये तमाम उदाहरण बताते हैं कि उम्र के बड़े फासलों को लांघ कर लोग परिणय बंधन में बंध रहे हैं और विवाह नामक संस्था की परिभाषा को बदल रहे हैं.

महत्त्व रखता है मैच्योर होना

मशहूर उपन्यासकार मार्क ट्वेन ने कहा था, ‘‘उम्र कोई विषय होने के बजाय दिमाग की उपज है. अगर आप इस पर ज्यादा सोचते नहीं हैं तो यह माने भी नहीं रखती.’’ शायद यही वजह है कि आज 21वीं सदी के समाज के लिए एज डिफरैंस बहुत बड़ी बात नहीं रह गई है. पर हां, आज भी इस प्रकार के संबंधों के लिए राह चुनौतीपूर्ण है. वहीं हमउम्र साथी के साथ रिश्ते में बंधना भी कम चुनौतीपूर्ण नहीं है.

कंप्रोमाइज और अंडरस्टैंडिंग वहां भी चाहिए होती है. वैसे भी एक सफल रिश्ते के लिए किसी एक का मैच्योर होना महत्त्व रखता है, रूप से नहीं दिमाग से, ताकि रिश्ता पूरी समझदारी व धैर्य से निभाया जा सके. वहीं, हमउम्र कपल्स में अकसर ईगो प्रौब्लम ज्यादा देखी गई है कि वह नहीं झुकता तो मैं क्यों झुकूं. बस, यहीं से शुरू होती है रिश्तों में दरार. लेकिन एक मैच्योर साथी धैर्य से रिश्ते की कमजोरियों पर गौर करता है. आप का प्यार, आपसी सामंजस्य, विश्वास एकदूसरे की परवा व समझदारी. इन की नींव से खड़ा रिश्ता जिंदगी के आखिरी पड़ाव में भी आप का हाथ थामे रखता है. चूंकि उस की बुनियाद उम्र नहीं, आप का सच्चा प्यार होता है.

जिंदगी में यदि ऐसा कोई आप को मिलता है जिस से मिलने के बाद आप खुद को पूरा समझने लगते हैं. आप का माइंडसैट, नेचर, बिहेवियर, खूबियां व खामियां सब वह अच्छे से समझता है या कहें कि आप को लगता है कि उस के साथ सब मैच करता है, पर अगर कुछ मैच नहीं करता है तो वह है आप दोनों की उम्र. यदि इस को ले कर आप पसोेपेश में हैं तो यकीन मानिए कि मात्र इस आधार पर आप अपना सच्चा हमसफर खो रहे हैं.

क्या है वजह

अकसर देखा गया है कि पुरुष 60 वर्ष की उम्र तक पहुंचतेपहुंचते कम उम्र की औरत के साथ प्यार में पड़ जाते हैं या पत्नी के गुजर जाने के बाद वे साथी की तलाश करने लगते हैं, बेशक चाहे वह एक दोस्त के रूप में ही क्यों न हो, ताकि उस के साथ वे अपनी छोटीबड़ी बातें शेयर कर अपने मन के बोझ को हलका कर सकें. जब यह साथ उन्हें भाने लगता है तो वे विवाह करने का फैसला ले लेते हैं.

काफी एज गैप होने के बावजूद स्त्री और पुरुष साथ जिंदगी गुजारने का फैसला क्यों लेते हैं, यह सवाल लोगों को चौंकाता रहा है. इस का जवाब लगातार ढूंढ़ा भी जा रहा है. कुछ लोग मानते हैं कि स्त्रियां अपने लिए आर्थिक सुरक्षा चाहती हैं और इसलिए वे उम्र के अंतर को नजरअंदाज कर देती हैं जबकि कुछ यह कहने से नहीं चूकते कि अधिक उम्र में पुरुष के मन में आकर्षण पक्ष जोर मारता है. बहरहाल, कोई सही रिजल्ट नहीं निकल सकता है क्योंकि हर इंसान की भावनात्मक जरूरतें अलगअलग होती हैं और इसलिए निर्णय का आधार भी अलग ही होता है.

मनोवैज्ञानिक पल्लवी शाह मानती हैं कि संबंधों में उम्र का फर्क  न के बराबर होता है. 60 वर्ष के बाद बहुत सी महिलाओं को ठोस व मजबूत सहारे के साथ जिस्मानी चाहत भी शादी के लिए प्रेरित करती है. स्त्री जिस शारीरिक संतुष्टि की चाह को युवावस्था में दबा लेती है वह उम्र बढ़ने के साथ स्त्रीग्रंथि के उभरने से तीव्र हो जाती है. ऐसा ही कुछ पुरुषों के साथ भी होता है. अधेड़ावस्था में पुरुष फिर से किशोर हो उठते हैं और वे शादी जैसी संस्था का सहारा ढूंढ़ते हैं.

आप मशहूर प्लेबैक सिंगर आशा भोंसले की 16 वर्ष की उम्र में अपने 31 वर्षीय प्रेमी गणपत राव भोंसले के साथ घर से पलायन कर, पारिवारिक इच्छा के खिलाफ शादी करने को क्या कहेंगे? गणपत राव लता मंगेशकर के यहां ड्राइवर थे. 1960 के आसपास इस विवाह का दुखांत हो गया. 1980 में आशा भोंसले ने राहुल देव बर्मन (आरडी बर्मन) से शादी की.

सायरा बानो कहती हैं, ‘‘हम दोनों ने उम्र के फर्क को कभी महसूस ही नहीं किया. उलटा, अब मुझे यह लगने लगा है कि दिलीप साहब मुझ से छोटे हैं. उम्र के इस पड़ाव पर आ कर एक बीवी होने के साथसाथ मैं उन की एक मां की तरह भी देखभाल करने लगी हूं.’’

क्यों हो आपत्ति

बड़ी सरलता और सहजता के साथ प्रेम की परिभाषा को परिवर्तित कर यह मान लिया जाता है कि प्रेम भावनाओं पर कभी कोई रोक नहीं लगाई जा सकती. प्यार किसी उम्र का मुहताज नहीं होता. हालांकि इस का सीधा अर्थ यह है कि हम उम्र के किसी भी मुकाम पर पहुंचने के बाद अपने साथी से उतना ही प्रेम और लगाव रख सकते हैं जितना हम संबंध के शुरुआती दौर में रखते थे.

एक वक्त था जब कपल्स में एज डिफरैंस एक टैबू माना जाता था. मैट्रो सिटीज को छोड़ दें तो काफी हद तक छोटे शहरों में आज भी इस बात को सुन कर परिवार व समाज की भौंहें तन जाती हैं. पर देखने में आया है कि एज गैप का प्यार भी बहुत बार सफल हुआ है. हालांकि आज भी समाज एक बार लड़के का उम्र में बड़ा होना तो स्वीकार कर लेता है पर लड़की का उम्र में बड़ा होना उस की नाराजगी का सबब बन ही जाता है.

समय आ गया है कि सारी वर्जनाओं को तोड़ते हुए, बस, इतना समझ लिया जाए कि प्यार एक ऐसा खूबसूरत एहसास है जो 2 लोगों को बहुत गहराई से आपस में जोड़ता है.

अगर कोई बड़ी उम्र का पुरुष या स्त्री किसी के प्रति अपनी भावनाओं का इजहार करता है या उसे अपने प्रेम का एहसास करवाता है तो हमें उन की आपसी भावनाओं का सम्मान करना चाहिए. बूढ़ा होने, चेहरे पर झुर्रियां पड़ने और बाहरी सुंदरता खो जाने के बाद भी अगर वे एकदूसरे के लिए प्यार महसूस करते हैं तो निश्चित ही उन का प्रेम सच्चा है और फिर ऐेसे में उम्र तो वैसे भी माने नहीं रखती.

बेटियों को ही नहीं बेटों को भी संभालें

मेरी सहेली ने एक बार मुझे एक वाकेआ सुनाया. जब वह अपनी 8 वर्षीया बेटी रिचा को अकेले में ‘गुड टच’ और ‘बैड टच’ के बारे में बता रही थी, तब बेटी ने उस से कहा था, ‘मम्मी, ये बातें आप भैया को भी बता दो ताकि वह भी किसी के साथ बैड टचिंग न करे.’

सहेली आगे बताती है, ‘‘बेटी की कही इस बात को तब मैं महज बालसुलभ बात समझ कर भूल गई. मगर जब मैं ने टीवी पर देखा कि प्रद्युम्न की हत्या में 12वीं के बच्चे का नाम सामने आया है तो मैं सहम उठी. इस से पहले निर्भया कांड में एक नाबालिग की हरकत दिल दहला देने वाली थी. अब मुझे लगता है कि 8 वर्षीया रिचा ने बालसुलभ जो कुछ भी कहा, आज के बदलते दौर में बिलकुल सही है. आज हमें न सिर्फ लड़कियों के प्रति, बल्कि लड़कों की परवरिश के प्रति भी सजग रहना होगा. 12वीं के उस बच्चे को प्रद्युम्न से कोई दुश्मनी नहीं थी. महज पीटीएम से बचने के लिए उस ने उक्त घटना को अंजाम दिया.’’

आखिर उस वक्त उस की मानसिक स्थिति क्या रही होगी? वह किस प्रकार के मानसिक तनाव से गुजर रहा था जहां उसे अच्छेबुरे का भान न रहा. हमारे समाज में ऐसी कौनकौन सी बातें हैं जिन्होंने बच्चों की मासूमियत को छीन लिया है. आज बेहद जरूरी है कि बच्चों की ऊर्जा व क्षमता को सही दिशा दें ताकि उन की ऊर्जा व क्षमता अच्छी आदतों के रूप में उभर कर सामने आ सकें.

आज मीडिया का दायरा इतना बढ़ गया है कि हर वर्ग के लोग इस दायरे में सिमट कर रह गए हैं. ऐसे में यह जरूरी हो गया है कि हम अपने बच्चों को मीडिया की अच्छाई व बुराई दोनों के बारे में बताएं. एक जमाना था जब टैलीविजन पर समाचार पढ़ते हुए न्यूजरीडर का चेहरा भावहीन हुआ करता था. उस की आवाज में भी सिर्फ सूचना देने का भाव होता था. मगर आज समय बदल गया है. आज हर खबर को मीडिया सनसनी और ब्रेकिंग न्यूज बना कर परोस रहा है. खबर सुनाने वाले की डरावनी आवाज और चेहरे की दहशत हमारे रोंगटे खड़े कर देती है.

घटनाओं की सनसनीभरी कवरेज युवाओं पर हिंसात्मक असर डालती है. कुछ के मन में डर पैदा होता है तो कुछ लड़के ऐसे कामों को अंजाम देने में अपनी शान समझने लगते हैं. अफसोस तो इस बात का भी होता है कि मीडिया घटनाओं का विवरण तो विस्तारपूर्वक देती है परंतु उन से निबटने का तरीका नहीं बताती.

कुछ मातापिता हैलिकौप्टर पेरैंट बन कर अपने बच्चों पर हमेशा कड़ी निगाह रखे रहते हैं. हर वक्त हर काम में उन से जवाबतलब करते रहते हैं. इसे आप भले ही अपना कर्तव्य समझते हों परंतु बच्चा इसे बंदिश समझता है. कई शोधों में यह सामने आया है कि बच्चे सब से ज्यादा बातें अपने मातापिता से ही छिपाते हैं, जबकि हमउम्र भाईबहनों या दोस्तों से वे सबकुछ शेयर करते हैं.

आज के बच्चे वर्चुअल वर्ल्ड यानी आभासी दुनिया में जी रहे हैं. वे वास्तविक रिश्तों से ज्यादा अपनी फ्रैंड्सलिस्ट, फौलोअर्स, पोस्ट, लाइक, कमैंट आदि को महत्त्व दे रहे हैं. वे किसी भी परेशानी का हल मातापिता से पूछने के बजाय अपनी आभासी दुनिया के मित्रों से पूछ रहे हैं. वे अंतर्मुखी होते जा रहे हैं, साथ ही, उन का आत्मविश्वास भी वर्चुअल इमेज से ही प्रभावित हो रहा है. बच्चों को यदि सोशल मीडिया तथा साइबर क्राइम से संबंधित सारी जानकारी होगी और अपने मातापिता पर पूर्ण विश्वास होगा, तो शायद वे ऐसी हरकत कभी नहीं करेंगे.

एकल परिवारों में बच्चे सब से ज्यादा अपने मातापिता के ही संपर्क में रहते हैं. ऐसे में वे अपने अभिभावक की नकल करने की कोशिश भी करते हैं. बच्चों में देख कर सीखने का गुण होता है. ऐसे में अभिभावक उन्हें अपनी बातों द्वारा कुछ भी समझाने के बजाय अपने आचरण से समझाएं तो यह उन पर ज्यादा असर डालेगा. उदाहरणस्वरूप, नीता अंबानी अपने छोटे बेटे अनंत को मोटापे से छुटकारा दिलाने के लिए उस के साथसाथ खुद भी व्यायाम तथा डाइटिंग करने लगी थीं.

प्रौढ़ होते मातापिता अपने किशोर बेटों से बात करते समय उन से बिलकुल भी संकोच न करें. मित्रवत उन से लड़कियों के प्रति उन की भावनाओं को पूछें. रेप के बारे में वे क्या सोचते हैं, यह भी जानने की कोशिश करें. यदि कोई लड़की उन्हें ‘भाव’ नहीं दे रही है तो वे इस बात को कैसे स्वीकार करते हैं, यह जानने की अवश्य चेष्टा करें.

आमतौर पर यदि खूबसूरत लड़की किसी लड़के को भाव नहीं देती तो लड़का इसे अपनी बेइज्जती समझता है और इस बारे में जब वह अपने दोस्तों से बात करता है तो वे सब मिल कर उसे रेप या एसिड अटैक द्वारा उक्त लड़की को मजा चखाने की साजिश रचते हैं. एसिड अटैक के मामलों में 90 प्रतिशत यही कारण होता है. इसलिए, ‘लड़कियां लड़कों के लिए चैलेंज हैं’ ऐसी बातें उन के दिमाग में कतई न डालें.

निर्भया कांड में शामिल नाबालिग युवक या प्रद्युम्न हत्याकांड में शामिल 12वीं के छात्र का उदाहरण दे कर बच्चों को समझाने का प्रयास करें कि रेप और हत्या करने वाले को समाज कभी भी अच्छी नजर से नहीं देखता. कानून के शिकंजे में फंसना मतलब पूरा कैरियर समाप्त. सारी उम्र मानसिक प्रताड़ना व सामाजिक बहिष्कार का भी सामना करना पड़ता है.

मातापिता अपने बच्चों को अच्छा व्यक्तित्व अपनाने के लिए कई बार समाज या परिवार की इज्जत की दुहाई देते हुए उन पर एक दबाव सा बना देते हैं, जो बच्चों के मन में बगावत पैदा कर देता है. मनोवैज्ञानिक फ्रायड के अनुसार, ‘‘जब हम किसी को भी डराधमका कर या भावनात्मक दबाव डाल कर अपनी बात मनवाना चाहते हैं तो यह एक प्रकार की हिंसा है.’’

बच्चे में किसी भी तरह की मानसिक कमियां हैं तो अभिभावक उसे छिपाएं नहीं, बल्कि स्वीकार करें और उसी के अनुसार उस की परवरिश करते हुए उस के व्यक्तित्व को संवारें. दिल्ली के निकट गुरुग्राम के रायन इंटरनैशनल स्कूल के प्रद्युम्न की हत्या करने वाला 12वीं का छात्र अपराधी नहीं था, बल्कि एक साइकोपैथ था. यह एक ऐसा बच्चा है जिसे सही मौनिटरिंग व सुपरविजन की जरूरत है यानी उसे परिवार के प्यार व मातापिता के क्वालिटी टाइम की जरूरत है. समय रहते यदि उस की मानसिक समस्याओं का निवारण किया गया होता तो शायद प्रद्युम्न की जान बच सकती थी. जिस तरह शरीर की बीमारियों का इलाज जरूरी है उसी तरह मानसिक बीमारियों की भी उचित इलाज व देखभाल की आवश्यकता होती है. इसे ले कर न ही मातापिता कोई हीनभावना पालें और न ही बच्चों को इस से ग्रसित होने दें.

धरना देने का हक और सुप्रीम कोर्ट का फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक नए फैसले में दिल्ली के जंतरमंतर के पास और राजपथ पर वोट क्लब पर जलसे करने और सरकार का ध्यान खींचने के लिए प्रदर्शन करने के हक को बहाल किया है. कांग्रेस और भाजपा सरकारों ने इन प्रदर्शनों और धरनों को कानून व व्यवस्था के नाम पर बंद करा दिया था.

सरकार व शासन ही नहीं, कंपनियों, मंदिरमठों, मसजिदों, स्कूलों, कालेजों, व्यापारियों के खिलाफ भी बोलने की न सिर्फ आजादी चाहिए, वह सुविधा भी होनी चाहिए जिस से आजादी का इस्तेमाल किया जा सके. आप को बोलने की आजादी हो पर लाउडस्पीकर लगाने की इजाजत न हो तो यह बोलने की आजादी बेकार है. आप अपनी बात लोगों को कहना चाहते हैं पर जगह ही नहीं हो जहां लोगों को जमा करा जा सके तो क्या फायदा होगा. यह तो बंद कमरे में भड़ास निकालना होगा.

भाजपा सरकार ने तो बोलने की आजादी पर बहुत सी रोकें लगा दी हैं. टीवी लाइसैंसों पर चलते हैं और उन के कान मरोड़ना बहुत आसान हो गया है. समाचारपत्रों को सरकारी विज्ञापन दे कर अपने खिलाफ बोलने से रोका जा सकता है. खरीखरी कहने वाले के खिलाफ देशभर में जगहजगह मुकदमे कर के मुंह बंद करा जा सकता है. आजकल तो सरेआम पिटाई भी हथियार बन गया है जैसा स्वामी अग्निवेश के साथ किया गया.

जंतरमंतर और वोट क्लब पर धरनों और प्रदर्शनों की इजाजत दे कर सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया है कि लोकतंत्र सिर्फ वोटतंत्र नहीं कि वोट दिए और मामला खत्म. यह आजादी तो हमारे जीवन के तारतार में होनी चाहिए.

हमारे देश में गरीबों पर जुल्म होते हैं इसीलिए होते हैं कि वे अपना दुख जता नहीं सकते. वे हरदम डरे रहते हैं और इसीलिए जुल्म को सहते हैं. इसी वजह से वे पूरा काम नहीं कर पाते. वे पढ़ नहीं पाते. वे पैसा जमा नहीं कर पाते और गरीब के गरीब बने रहते हैं. गरीबी और लोकतंत्र में सीधा संबंध है. जो देश जितना तानाशाह है उतना गरीब है. अफ्रीका के कई देश तानाशाही झेल रहे हैं और इसीलिए गरीब हैं.

बोलने और दुख दिखाने की आजादी ही सब से बड़ा हथियार है गरीबी से लड़ाई का. आज दलितों और मुसलमानों को खासतौर पर डरा कर चुप इसीलिए कराया जा रहा है ताकि वे गरीब बने रहें और सस्ते में काम करते रहें. अगर उन्हें बोलने का मौका मिलता, जगह मिलती, तरीका मिलता तो वे कब के गरीबी के जंजाल से निकल चुके होते.

हां, जंतरमंतर कोई ऐसी जगह नहीं कि जहां के दर्शन किए और मुसीबतें छूमंतर हो गईं. वहां से तो मौका मिलता है. यह लोगों पर है कि वे गरीबी के चक्कर में फंसे रहना चाहते हैं या मंत्रोंहवनों में.

बौलीवुड में एंट्री करेंगी अरबाज खान की गर्लफ्रेंड जार्जिया ?

बौलीवुड स्टार्स अक्सर ही अपनी लव लाइफ को लेकर काफी लाइमलाइट में रहते हैं. इन दिनों अभिनेता अरबाज खान विदेशी हसीना जार्जिया के साथ रिलेशन को लेकर काफी सुर्खियां बटोर रहे हैं. अरबाज खान अपनी पत्नी मलाइका अरोरा से अलग होने के बाद गर्लफ्रेंड जार्जिया एंड्रियानी के साथ वक्त बिताते नजर आ रहे हैं. हाल ही में वह जार्जिया के साथ लंच डेट पर नजर आए. उनके साथ उनके बेटे अरहान भी साथ थे.

खबर है कि जार्जिया बौलीवुड में आना चाहती हैं. अरबाज उनकी इसमें मदद कर रहे हैं. अरबाज उन्हें बौलीवुड के एक प्रोड्यूसर से मिलवा रहे हैं. उम्मीद है कि उन्हें कोई फिल्म औफर की जाए. यह भी कयास लगाए जा रहे हैं कि जार्जिया अरबाज के बैनर वाली दबंग 3 का हिस्सा भी हो सकती हैं.

ऐसे में ये देखना दिलचस्प होगा कि यदि मलाइका भी इस फिल्म का हिस्सा होंगी तो उनकी जार्जिया के साथ कैसी केमिस्ट्री होगी. चर्चा है कि अरबाज खान जल्द जार्जिया संग अपने रिश्ते को ऑफिशि‍यल करने की तैयारी में हैं.

बता दें कि अरबाज और मलाइका ने पिछले साल मई में तलाक ले लिया था. लेकिन अभी भी दोनों दोस्तों की तरह मेलजोल बनाए हुए हैं. 18 साल का रिश्ता टूटने के बाद भी मलाइका और अरबाज फैमिली हौलिडे पर साथ नजर आते रहे हैं.

जब दिशा पटानी ने इनके साथ मटकाई कमर

बौलीवुड अदाकारा दिशा पटानी जितनी एक्टिव फिल्मों में हैं, उतनी ही सोशल मीडिया की दुनिया में भी हैं. दिशा अकसर अपने एक्शन और डांस वीडियो इंस्टाग्राम पर डालती रहती हैं. दिशा ने ऐसा ही एक नया वीडियो अपने इंस्टाग्राम एकाउंट पर डाला है जो वायरल हो रहा है. दिशा पटानी के वीडियो उतने ही जबरदस्त हैं, जितने उनके बेस्ट फ्रेंड टाइगर श्रौफ के होते हैं. टाइगर श्रौफ खुद भी डांस और एक्शन के वीडियो सोशल मीडिया पर डालते हैं. कभी-कभी तो ऐसा लगता है कि दोनों आपस में ही कम्पीट कर रहे हों.

दिशा पटानी का ये वीडियो भी कुछ ऐसा ही है. जिसमें दिशा पटानी अपने कोरियोग्राफ के साथ जमकर डांस कर रही हैं. दिशा पटानी के मूव्ज बीट्स के मुताबिक है. दिशा पटानी इंटरनेशनल सिंगर क्रिस ब्राउन के सौन्ग पर डांस में हाथ आजमा रही हैं. दिशा पटानी का लुक और उनके मूव्ज दोनों ही बहुत शानदार लग रहा है. इस वीडियो को 1 करोड़ से ज्यादा बार देखा जा चुका है.\

 

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गौरतलब है कि दिशा पटानी की टाइगर श्रौफ के साथ ‘बागी 2’ आई थी, और फिल्म सुपरहिट रही थी. टाइगर-दिशा की जोड़ी को खूब पसंद किया गया था. टाइगर ने फिल्म में हैरतअंगेज एक्शन दिखाया था. दिशा पटानी की अगली फिल्म सलमान खान के साथ है. दिशा ‘भारत’ फिल्म में खूब स्टंट भी करती नजर आएंगी. ‘भारत’ में दिशा के डांस मूव्ज और स्टंट दोनों का कौकटेल देखने को मिल सकता है.

सपनों से सस्ता सिंदूर

31 वर्षीय कल्पना बसु कर्नाटक के जिला बेलगांव में आने वाले तालुका माहेर की रहने वाली थी. उस का जन्म एक मध्यवर्गीय किसान परिवार में हुआ था. उस के जन्म के कुछ दिनों पहले ही पिता का निधन हो गया था. मां ने मेहनतमजदूरी कर उसे पालापोसा. पारिवारिक स्थिति ठीक नहीं होने के कारण वह ज्यादा पढ़ाईलिखाई भी नहीं कर पाई थी.

कल्पना खूबसूरत होने के साथसाथ महत्त्वाकांक्षी भी थी. वह चाहती थी कि उसे ऐसा जीवनसाथी मिले जो उस की तरह हैंडसम हो और उस की भावनाओं की कद्र करते हुए सभी इच्छाओं को पूरा करे. लेकिन उस के इन सपनों पर पानी तब फिर गया जब उस की शादी एक ऐसे मामूली टैक्सी ड्राइवर बसवराज बसु के साथ हो गई, जो उस के सपनों के पटल पर कहीं भी फिट नहीं बैठता था.

38 वर्षीय बसवराज बसु उसी तालुका का रहने वाला था, जिस तालुका में कल्पना रहती थी. प्यार तो उसे बचपन से ही नहीं मिला था. उस के पैदा होने के बाद ही मांबाप दोनों की मौत हो गई थी. उसे नानानानी ने पालपोस कर बड़ा किया था. नानानानी की आर्थिक स्थिति अच्छी न होने के कारण वह भी पढ़लिख नहीं सका. जिंदगी का बोझ उठाने के लिए जैसेतैसे वह टैक्सी ड्राइवर बन गया था. ड्राइविंग का लाइसैंस मिलने पर वह माहेर शहर आ कर कैब चलाने लगा. जब वह अपने पैरों पर खड़ा हो गया तो नातेरिश्तेदारों ने उस की शादी कराने की सोची. आखिरकार उस की शादी कल्पना से हो गई.

खुले विचारों वाली कल्पना से शादी कर के वह खुश था. लेकिन कल्पना उस से खुश नहीं थी. ड्राइवर के साथ शादी हो जाने से उस की सारी ख्वाहिशों और सपनों पर जैसे पानी फिर गया था. पति के रूप में एक मामूली टैक्सी ड्राइवर को पा कर उस के सारे सपने कांच की तरह टूट कर बिखर गए थे.

कुल मिला कर बसवराज बसु और कल्पना का कोई मेल नहीं था, लेकिन मजबूरी यह थी कि वह करती भी तो क्या. बसवराज बसु अपनी आमदनी के अनुसार पत्नी की जरूरतों को पूरी करने की कोशिश करता था, पर पत्नी की ख्वाहिशें कम नहीं थीं. उस की आकांक्षाएं ऐसी थीं, जिन्हें पूरा करना बसवराज के वश की बात नहीं थी. लिहाजा वह अपनी किस्मत को ही कोसती रहती.

समय अपनी गति से चलता रहा. कल्पना 2 बच्चों की मां बन गई. इस के बाद कल्पना की जरूरतें और ज्यादा बढ़ गई थीं, जिन्हें बसवराज बसु पूरा नहीं कर पा रहा था. ऐसी स्थिति में कल्पना की समझ में नहीं आ रहा था कि वह करे तो क्या करे. उस का पति जब घर से टैक्सी ले कर निकलता था तो तीसरेचौथे दिन ही घर लौट कर आता था. घर आने के बाद भी वह कल्पना का साथ नहीं दे पाता था. ऐसे में कल्पना जल बिन मछली की तरह तड़प कर रह जाया करती थी.

उड़ान के लिए कल्पना को लगे पंख

कल्पना खूबसूरत और जवान थी. बस्ती में ऐसे कई युवक थे, जो उस को चाहत भरी नजरों से देखते थे. एक दिन कल्पना के मन में विचार आया कि क्यों न ऐसे युवकों से लाभ उठाया जाए. इस से उस के सपने तो पूरे हो ही सकते हैं, साथ ही शरीर की जरूरत भी पूरी हो जाएगी.

यही सोच कर कल्पना ने उन युवकों को हरी झंडी दे दी. कई युवक उस के जाल में फंस गए. बच्चों के स्कूल और पति के काम पर जाने के बाद वह मौका देख कर उन्हें घर बुला कर मौजमस्ती करने लगी, साथ ही उन से मनमुताबिक पैसे भी लेने लगी.

कल्पना का रहनसहन और घर के बदलते माहौल को पहले तो बसवराज समझ नहीं सका, लेकिन जब सच्चाई उस के सामने आई तो उस के पैरों तले से जमीन खिसक गई. उस ने कभी कल्पना भी नहीं की होगी कि जिस पत्नी को वह अपनी जान से भी ज्यादा चाहता है, जिस के लिए वह रातदिन मेहनत करता है, उस के पीठ पीछे वह इस तरह का काम करेगी. उस ने यह भी नहीं सोचा कि दोनों बच्चों पर इस का क्या असर पड़ेगा.

मामला काफी नाजुक था. मौका देख कर बसवराज बसु ने जब कल्पना को समझाना चाहा तो वह उस पर ही बरस पड़ी. उस ने पति को घुड़कते हुए कहा कि तुम्हारे और बच्चों के स्कूल चले जाने के बाद अगर मैं अकेली रहती हूं. ऐसे में अगर मैं किसी से दोचार बातें कर लेती हूं तो इस में बुरा क्या है. तुम्हें यह अच्छा नहीं लगता तो मैं आत्महत्या कर लेती हूं.

कल्पना का बदला व्यवहार और माहौल देख कर बसवराज बसु यह बात अच्छी तरह से समझ गया कि कल्पना को समझानेबुझाने से कोई फायदा नहीं होगा. इसलिए उस ने उस जगह को छोड़ देना ही सही समझा. वह पत्नी और बच्चों को ले कर बेलगांव शहर चला गया.

वहां बसवराज कुड़चड़े थाने के अंतर्गत आने वाले अनु अपार्टमेंट में किराए का फ्लैट ले कर रहने लगा. उस ने टैक्सी चलानी बंद कर दी और किसी की निजी कार चलाने लगा. उसे विश्वास था कि बेलगांव में रह कर पत्नी के आशिक छूट जाएंगे और वह सुधर जाएगी.

लेकिन बसवराज की यह सोच गलत साबित हुई. कल्पना चतुर और स्मार्ट महिला थी. बेलगांव आ कर वह और भी आजाद हो गई. यहां उसे न समाज का डर था और न गांव का. उस ने उसी अपार्टमेंट में रहने वाले पंकज पवार नाम के युवक को फांस लिया. पंकज एक निजी कंपनी में डाटा एंट्री औपरेटर था. वह मडगांव का रहने वाला था.

बसवराज की सोच हुई गलत साबित

31 वर्षीय पंकज पवार की शादी हो चुकी थी. उस के 2 बच्चे भी थे. लेकिन वह कल्पना के लटकोंझटकों से बच नहीं सका. कल्पना से संबंध बन जाने के बाद पंकज पवार उस के फ्लैट पर आनेजाने लगा. एक दिन पंकज कल्पना से मुलाकात कराने के लिए अपने 3 दोस्तों सुरेश सोलंकी, अब्दुल शेख और आदित्य को भी साथ ले आया. पहली ही मुलाकात में ही कल्पना ने उस के तीनों दोस्तों पर ऐसा जादू किया कि वे भी उस के मुरीद हो गए. उन तीनों से भी कल्पना के संबंध बन गए.

कुछ ही दिनों में कल्पना के यहां आने वाले युवकों की संख्या बढ़ने लगी. धीरेधीरे कल्पना के कारनामों की जानकारी इलाके भर में फैल गई. उस की वजह से बसवराज बसु की ही नहीं, बल्कि पूरे मोहल्ले की बदनामी होने लगी. ऐसे में बसवराज का वहां रहना मुश्किल हो गया. दोनों बच्चे अब काफी बड़े हो गए थे. बसवराज बसु ने अपने बच्चों के भविष्य के मद्देनजर कल्पना को काफी समझाया, लेकिन अपनी मौजमस्ती के आगे उस ने बच्चों को कोई अहमियत नहीं दी.

कल्पना पर जब पति के समझाने का कोई असर नहीं हुआ तो वह उसे छोड़ कर वहीं पर जा कर रहने लगा, जहां वह नौकरी करता था. इस के बावजूद वह अपनी पूरी पगार ला कर कल्पना को दे जाता था.
हालांकि कल्पना के पास पैसों की कोई कमी नहीं थी. बसवराज बसु के जाने के बाद वह और भी आजाद हो गई थी. वह अपने चारों दोस्तों के साथ बारीबारी से घूमतीफिरती और मौजमजा करती. इस के अलावा वह उन से अच्छीखासी रकम भी ऐंठती थी. वह पूरे समय अपने रूपयौवन को सजानेसंवारने में लगी रहती थी. यहां तक कि अब वह घर पर खाना तक नहीं बनाती थी. खाना पकाने के लिए उस ने अपने प्रेमी अब्दुल शेख की पत्नी सिमरन शेख को सेवा में रख लिया था.

2 अप्रैल, 2018 को बसवराज बसु की जिंदगी का आखिरी दिन था. एक दिन पहले उसे जो पगार मिली थी, उसे पत्नी को देने के लिए वह 2 अप्रैल को दोपहर में फ्लैट पर पत्नी के पास पहुंचा. घर का जो माहौल था, उसे देख कर उस का खून खौल उठा. कल्पना ने बेशरमी की हद कर दी थी. वहां पर सुरेश सोलंकी, आदित्य और अब्दुल शेख जिस अवस्था में थे, उसे देख कर साफ लग रहा था कि कल्पना उन के साथ क्या कर रही थी. यह देख कर बसवराज का खून खौल गया.

वह पत्नी को खरीखोटी सुनाते हुए बोला, ‘‘मैं तुम्हें खर्चे के लिए पैसे देने के लिए आता हूं. लेकिन तुम्हारा यह घिनौना रूप देख कर तुम्हें पैसा देने और यहां आने का मन नहीं होता. लेकिन बच्चों के लिए यह सब करना पड़ता है.’’

बसवराज की मौत आई रस्सी में लिपट कर

पति की बात सुन कर कल्पना डरी नहीं बल्कि वह भी उस पर हावी होते हुए बोली, ‘‘तो मत आओ. मैं ने तुम्हें कब बुलाया और पैसे मांगे. तुम क्या समझते हो, मेरे पास पैसे नहीं हैं? तुम कान खोल कर सुन लो, मैं जिस ऐशोआराम से रह रही हूं, वह तुम्हारे पैसों से नहीं मिल सकता. तुम्हारी पूरी पगार से तो मेरा शैंपू ही आएगा. रहा सवाल बच्चों का तो उन की चिंता तुम छोड़ दो.’’

कल्पना की यह बात सुन कर बसवराज बसु को जबरदस्त धक्का लगा. इस के बाद पतिपत्नी के बीच झगड़ा बढ़ गया. तभी गुस्से में आगबबूला कल्पना ने अपने तीनों प्रेमियों को इशारा कर दिया. कल्पना का इशारा पाते ही उस के तीनों प्रेमियों ने मिल कर बसवराज बसु को पीटपीट कर बेदम कर दिया.
शारीरिक रूप से कमजोर बसवराज बसु बेहोश हो कर जमीन पर गिर गया. उसी समय अब्दुल शेख की बीवी सिमरन भी वहां आ गई. तभी कल्पना के घर के अंदर बंधी नायलौन की रस्सी खोल कर बसवराज के गले में डाल कर पूरी ताकत से उस का गला कस दिया, जिस से उस की मौत हो गई. यह देख कर सिमरन सहम गई.

टुकड़ों में बंट गया पति

अब्दुल शेख और कल्पना ने सिमरन को धमकी दी कि अपना मुंह बंद रखे. अगर मुंह खोला तो उस का भी यही हाल होगा. डर की वजह से सिमरन चुप रही. कल्पना और उस के प्रेमियों का गुस्सा शांत हुआ तो वे बुरी तरह घबरा गए. हत्या के समय पंकज वहां नहीं था.

थोड़ी देर सोचने के बाद कल्पना और उस के प्रेमियों ने बसवराज बसु की लाश ठिकाने लगाने का फैसला ले लिया. कल्पना ने शव ठिकाने लगवाने के मकसद से पंकज को फोन कर के बुला लिया. लेकिन पंकज को जब हत्या का पता चला तो वह घबरा गया. पहले तो पंकज ने इस मामले से अपना हाथ खींच लिया, लेकिन अपनी प्रेमिका कल्पना को मुसीबत में घिरी देख कर वह उस का साथ देने के लिए तैयार हो गया.
चारों ने मिल कर बसवराज बसु के शव को बाथरूम में ले जा कर उस के 3 टुकड़े किए और उन टुकड़ों को कपड़ों में लपेट कर प्लास्टिक की 3 बोरियों में भर दिया. मौका देख कर उसी रात 12 बजे इन लोगों ने तीनों बोरियों को अब्दुल शेख की कार की डिक्की में रख दिया. इस के बाद ये लोग कुड़चड़े महामार्ग के अनमोड़ घाट गए और उन बोरियों को एकएक किलोमीटर की दूरी पर घाट की घाटियों में दफन कर के लौट आए.

जैसेजैसे समय बीत रहा था, वैसेवैसे इस हत्याकांड के सभी अभियुक्त बेखबर होते गए. उन का मानना था कि इस हत्याकांड से कभी परदा नहीं उठेगा और उन का राज राज ही रह जाएगा. लेकिन वे यह भूल गए थे कि उन के इस राज की साक्षी अब्दुल शेख की बीवी सिमरन शेख थी, जिस की आंखों के सामने बसवराज बसु की हत्या का सारा खेल खेला गया था. वह इस राज को अपने सीने में छिपाए हुए थी.
पता नहीं क्यों सिमरन को हत्या में शामिल लोगों से डर लगने लगा था. यहां तक कि अपने पति से भी उस का विश्वास नहीं रहा. उसे ऐसा लगने लगा जैसे उस की जान को खतरा है. वे लोग अपना पाप छिपाने के लिए कभी भी उस की हत्या कर सकते हैं. इस डर की वजह से सिमरन शेख बेलगांव की जानीमानी पत्रकार ऊषा नाईक देईकर से मिली और उस ने बसवराज बसु हत्याकांड की सारी सच्चाई बता दी.

आखिर राज खुल ही गया

बसवराज बसु की हत्या की सच्चाई जान कर ऊषा नाईक के होश उड़ गए. उन्होंने सिमरन शेख को साहस और सुरक्षा का भरोसा दे कर मामले की सारी जानकारी बेलगांव कुड़चड़े पुलिस थाने के थानाप्रभारी रवींद्र देसाई और उन के वरिष्ठ अधिकारियों को दी. वरिष्ठ अधिकारियों के निर्देशन में थानाप्रभारी रवींद्र देसाई ने अपनी जांच तेजी से शुरू कर दी.

उन्होंने 24 घंटे के अंदर बसवराज बसु हत्याकांड में शामिल कल्पना बसु के साथ पंकज पवार, अब्दुल शेख और सुरेश सोलंकी को गिरफ्त में ले कर वरिष्ठ अधिकारियों के सामने पेश किया, जहां सीपी अरविंद गवस ने उन से पूछताछ की. पुलिस गिरफ्त में आए चारों आरोपी कोई पेशेवर अपराधी नहीं थे, इसलिए उन्होंने अपना अपराध स्वीकार कर लिया था.

9 मई, 2018 को उन्हें गिरफ्तार कर पुलिस अनमोड़ घाट की उस जगह पर ले कर गई, जहां उन्होंने बसवराज बसु के शव के टुकड़े दफन किए थे. उन की निशानदेही पर पुलिस ने शव के तीनों टुकड़ों को बरामद कर लिया. घटना के समय बसवराज जींस पैंट पहने हुए था. उस की पैंट की जेब में उस का ड्राइविंग लाइसेंस मिला, जिस से यह बात सिद्ध हो गई कि शव बसवराज का ही था. शव को कब्जे में लेने के बाद उसे पोस्टमार्टम के लिए मडगांव के बांबोली अस्पताल भेज दिया.

पुलिस द्वारा गिरफ्तार किए गए कल्पना बसु, पंकज पवार, सुरेश सोलंकी और अब्दुल शेख से विस्तृत पूछताछ कर के उन के विरुद्ध भांदंवि की धारा 302, 201 के तहत मुकदमा दर्ज किया गया. फिर चारों को मडगांव मैट्रोपौलिटन मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक इस हत्याकांड का एक आरोपी आदित्य गुंजर फरार था, जिस की पुलिस बड़ी सरगरमी से तलाश कर रही थी.

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