बेलगाम बहू के अवैध संबंध

कुछ आहट हुई तो दलजीत सिंह बिस्तर पर उठ कर बैठ गए. बैड पर बैठेबैठे ही उन्होंने अपने चारों ओर नजर दौड़ा कर देखा, वहां कोई नहीं था. अलबत्ता बाहर से कुत्तों के भौंकने की आवाजें लगातार आ रही थीं. वह उठ कर कमरे से बाहर आए तो उन्होंने एक परछाईं को अपनी बहू मनिंदर कौर के कमरे से बाहर निकल कर दीवार फांद कर भागते हुए देखा.

‘कौन था वह? क्या कोई चोर या कोई दुश्मन…’ मन ही मन दलजीत सिंह ने अपने आप से सवाल किया. फिर असमंजस की स्थिति में वह बहू के कमरे के पास पहुंचे तो कमरे का दरवाजा खुला हुआ था.
उन्होंने मनिंदर को जगा कर डांटते हुए कहा, ‘‘यह दरवाजा खुला छोड़ कर क्यों सो रही है. जानती है कोठी में कोई घुस आया था?’’

‘‘गलती हो गई पापाजी, बच्चों को सुलाते हुए न जाने कब मेरी भी आंख लग गई. आइंदा मैं ध्यान रखूंगी.’’ मनिंदर ने अपने ससुर से कहा. बहू का जवाब सुन दलजीत सिंह संतुष्ट हो गए और अपने कमरे में जा कर दोबारा सो गए.

दलजीत सिंह मूलत: जिला टांडा के गांव जग्गोचक के मूल निवासी थे. 65 वर्षीय दलजीत सिंह करीब 12 साल पहले सेना से रिटायर हुए थे. खुद सेना में थे, इसलिए उन्होंने अपने बेटे ओंकार सिंह को भी सेना में भरती करवा दिया था. इन दिनों ओंकार सिंह अपनी रेजीमेंट के साथ श्रीनगर में तैनात था.
दलजीत सिंह की पत्नी का कई साल पहले निधन हो चुका था. बेटे को सेना में भरती करवाने के बाद दलजीत सिंह ने 7 साल पहले उस का विवाह मनिंदर कौर के साथ कर दिया था. ओंकार और मनिंदर कौर के 2 बच्चे हुए. इन की बड़ी बेटी जैसमिन 5 साल की हो चुकी थी.

दलजीत सिंह इस से पहले गांव बहरामपुर में रहते थे. वहां उन की कोठी बनी हुई है, लेकिन ओंकार की शादी के बाद मनिंदर के बारबार कहने पर उन्होंने गुरदासपुर के थाना तिब्बड़ के अंतर्गत आने वाले गांव कोठे घराला बाइपास स्थित कालोनी में एक और कोठी बनवा ली थी. इस कोठी में उन्होंने 2 साल पहले ही शिफ्ट किया था.

दलजीत सिंह का परिवार खातापीता परिवार था. उन के पास खेती की भी जमीन थी. रिटायरमेंट के बाद उन्हें अच्छीखासी पेंशन भी मिलती थी. ओंकार का वेतन भी अच्छा था.

घर में किसी चीज की कमी नहीं थी. उन के परिवार की दिनचर्या भी सामान्य थी, दलजीत सिंह का अधिकांश समय गुरुद्वारे में या घर पर वाहेगुरु का नाम जपते गुजरता था. बहू मनिंदर कौर सुबहसुबह घर का काम निपटा कर दिन भर बच्चों के साथ लगी रहती थी.

मनिंदर कौर के पास वैसे तो किसी चीज की कमी नहीं थी, पर लंबे समय तक पति से दूर रहने की वजह से उस की रातें तनहाई में गुजरती थीं. इसी दौरान उस के पैर बहक गए. लगभग 2 साल पहले उस के संबंध एक 18 वर्षीय युवक राहुल उर्फ ननु के साथ बन गए थे. दूर के रिश्ते में मनिंदर ननु की मामी लगती थी.
ननु बहरामपुर की मंडी कोहलू वाली निवासी रमन शर्मा का बेटा था. रमन शर्मा की मौत के बाद उस की पत्नी स्नेहलता ने ननु को अपने भाई से गोद लिया था. स्नेहलता पंजाब पुलिस में सबइंसपेक्टर है और इन दिनों थाना मुकेरिया में तैनात है.

मां के ड्यूटी पर चले जाने के बाद ननु अकेला रहता था और इसी कारण वह छोटी उम्र से ही गलत संगत में पड़ गया था. जिस समय उस के मनिंदर कौर के साथ अवैध संबंध बने थे, उस वक्त उस की उम्र केवल 16 साल थी.

बहरहाल, मनिंदर और ननु के बीच संबंध बिना किसी रोकटोक के चलते रहे. उन के संबंधों की किसी को कानोंकान खबर नहीं थी. इस की वजह शायद यह थी कि दोनों के बीच मामीभांजे का रिश्ता था और दोनों की उम्र में भी खासा अंतर था.

ननु का दलजीत के घर काफी आनाजाना था. दलजीत को कभी इस बात का संदेह नहीं हुआ कि मामीभांजे के रिश्ते की आड़ में उन के घर क्या खेल चल रहा है. दलजीत सिंह को बहरामपुर वाली कोठी बदलने के लिए भी मनिंदर ने ही मजबूर किया था.

दरअसल, उस इलाके के लोगों को मनिंदर और ननु के अवैध रिश्तों का पता चल गया था. इसीलिए अपने ससुर और पति से जिद कर के मनिंदर ने वह कोठी बदलने के लिए दबाव डाला था.
दूसरी कोठी नई आबादी में थी. यहां दूरदूर आबादी होने के कारण उसे कोई रोकटोक नहीं थी. धीरेधीरे मनिंदर निडर होती चली गई. अब उस ने अपने ससुर की मौजूदगी में ही अपना खेल खेलना शुरू कर दिया था. उन की मौजूदगी में वह अपने प्रेमी ननु के साथ दूसरे कमरे में बंद हो जाया करती थी.

एक दिन दलजीत को अहसास हुआ कि मनिंदर और ननु के बीच मामीभांजे के रिश्ते के अलावा कुछ और भी है. इस के बाद उन्होंने दोनों पर नजर रखनी शुरू कर दी. इस का नतीजा यह हुआ कि जल्द ही उन के सामने दोनों के रिश्तों की हकीकत खुल गई. उन्होंने एक दिन मनिंदर और ननु को आपत्तिजनक हालत में देख लिया. उन्हें गुस्सा तो बहुत आया. ज्यादा शोरशराबा करने से उन की बदनामी ही होनी थी.

लिहाजा उन्होंने बहू को फटकार लगाने के साथ ननु को भी हिदायत दे दी कि वह उन के यहां न आए. उन्होंने ननु का अपने घर आनाजाना बंद करवा दिया था. दलजीत ने इस बात का जिक्र अपने बेटे ओंकार से भी किया था.

पत्नी की इस हरकत पर ओंकार को बहुत गुस्सा आया. वह छुट्टी ले कर घर आ गया और मनिंदर को प्यार से समझाते हुए कहा, ‘‘मनिंदर, ऐसी बातें तुम्हें शोभा नहीं देतीं. तुम एक अच्छे परिवार की बेटी और बहू हो. अगर यह बात घर से बाहर जाएगी तो समझ सकती हो कितनी बदनामी होगी.’’
मनिंदर ने भी भविष्य में ऐसी कोई गलती न करने का वादा किया. पर पति के नौकरी पर लौटते ही वह सब कुछ भूल गई. उस ने फिर से ननु से मिलना शुरू कर दिया.

बात घटना से करीब डेढ़ महीने पहले की है. दलजीत सिंह ने ननु का अपने घर आना एकदम से बंद करवा दिया था. इतना ही नहीं, वह दिन भर घर पर रह कर खुद ही पहरेदारी करने लगे थे. इस बात से गुस्साए ननु ने एक रात दलजीत के घर आ कर खिड़कियों और गाड़ी पर पथराव किया, जिस से खिड़कियों और गाड़ी के शीशे टूट गए.

दलजीत सिंह ने राहुल उर्फ ननु के खिलाफ थाना तिब्बड़ में रिपोर्ट दर्ज करवाई. दूसरी तरफ मनिंदर ने ननु को घर आने की खुली छूट दे दी. यानी वह ससुर का विरोध करने पर उतर आई. ननु मनिंदर के पास बेरोकटोक जाने लगा. इस बीच ओंकार सिंह छुट्टी पर घर आया था. उस के आने के बाद ननु ने मनिंदर के पास आना बंद कर दिया था.

छुट्टियां पूरी कर के ओंकार 15 जून, 2018 को वापस अपनी ड्यूटी पर चला गया तो मनिंदर ने ननु को फोन कर अपने घर बुला लिया. जिस वक्त ननु वहां पहुंचा, उस समय दलजीत घर पर नहीं थे. जब वह वापस घर आए तो उन्हें ननु के आने का पता चला. पर वह चाह कर भी कुछ नहीं कर पा रहे थे. इस के बाद ननु ने मनिंदर के साथ उसी के कमरे में रहना शुरू कर दिया. यह बात दलजीत को बड़ी नागवार गुजरी. उन्होंने जब इस बेशर्मी का विरोध किया तो मनिंदर ने ससुर से लड़नाझगड़ना शुरू कर दिया. बेबसी की हालत में पूर्व फौजी दलजीत सिंह ने अपने बेटे ओंकार को फोन कर के पूरी बात बताई. फोन कर के उन्होंने यह बात अपने रिश्तेदारों और मनिंदर के मायके वालों को भी बता दी.

16 जून की रात ननु को ले कर मनिंदर और दलजीत के बीच काफी झगड़ा हुआ, जो देर रात तक चलता रहा. 17 जून, 2018 की सुबह दलजीत सिंह ने गुरदासपुर के गांव किला नाथूसिंह के रहने वाले अपने साले तरसेम सिंह के बेटे किरपाल सिंह को फोन कर के कहा कि उन की बहू मनिंदर उन के साथ लड़ाईझगड़ा कर रही है. वह आ कर उसे समझाए.

उस समय किरपाल अपने खेतों में पानी लगा रहा था. अपने फूफा का फोन सुनने के बाद उस ने कहा, ‘‘फूफाजी, आप चिंता न करें. थोड़ा सा काम बचा है, उसे निपटा कर मैं जल्द पहुंच जाऊंगा.’’
कहने को तो किरपाल ने अपने फूफा से ऐसा कह दिया था पर वह अपने काम में ऐसा व्यस्त हुआ कि वह फूफा के फोन वाली बात भूल गया.

17 जून की शाम को करीब 4 बजे ओंकार सिंह ने अपने पिता दलजीत सिंह को फोन किया. फोन की घंटी बजती रही, पर उन्होंने फोन नहीं उठाया. ओंकार ने पिता को कई बार फोन किया, हर बार घंटी बजती रही. इस के बाद उस ने पत्नी को फोन किया. वह भी फोन नहीं उठा रही थी.

वह परेशान हो गया कि ऐसी क्या बात है जो दोनों में से कोई भी फोन नहीं उठा रहा. उस की चिंता लगातार बढ़ती जा रही थी.

काफी देर परेशान होने के बाद ओंकार ने अपने ममेरे भाई किरपाल सिंह को फोन कर के बताया, ‘‘किरपाल, तुम घर जा कर देखो, पापा और मनिंदर कहां हैं. उन दोनों में से कोई भी फोन नहीं उठा रहा.’’
किरपाल सिंह ने उसी समय ओंकार को बताया कि सुबह उस के पास दलजीत फूफा का फोन आया था. उन्होंने मनिंदर के साथ झगड़ा होने की बात बताई थी. बहरहाल, किरपाल ने ओंकार को आश्वासन दिया कि वह अभी जा कर देखता है और फूफाजी से उस की बात करवाता है.

ओंकार सिंह को बच्चों और पिता की चिंता थी. किरपाल के आश्वासन देने के बाद भी वह संतुष्ट नहीं हुआ. उस ने अपने घर के पास बने गुर्जर के डेरे पर फोन कर कहा कि वह उन के घर जा कर देखें कि वहां क्या हो रहा है.

गुर्जर जिस समय दलजीत के घर पहुंचा, उसी समय किरपाल भी वहां पहुंच चुका था. किरपाल और गुर्जर ने दलजीत के कमरे में जा कर देखा तो सामने का दृश्य देख उन के पैरों तले से जमीन खिसक गई. सामने बैड पर दलजीत सिंह का खून से लथपथ शव पड़ा हुआ था.

उन के सिर और दूसरी जगहों पर चोटें लगी थीं, जिन में से खून रिस कर बिस्तर पर जम गया था. पास वाले कमरे में मनिंदर और उस के बच्चे बैठे थे. किरपाल ने मनिंदर से इस बारे में पूछा तो उस ने यह कह कर बात खत्म कर दी थी कि उसे कुछ पता नहीं है.

यह बड़ी हैरानी की बात थी कि घर में इतना बड़ा कांड हो गया और मनिंदर को कुछ पता ही नहीं चला. बहरहाल, किरपाल ने सब से पहले घटना की सूचना थाना तिब्बड़ पुलिस को दी और बाद में अपने भाई ओंकार सिंह को सूचित कर दिया.

सूचना मिलते ही थाना तिब्बड़ के थानाप्रभारी राजकुमार शर्मा, एसआई अमरीक चांद, एएसआई सरबजीत सिंह, मसीह, हवलदार विजय सिंह को साथ ले कर मौके पर पहुंच गए. दलजीत की लाश अपने कब्जे में ले कर उन्होंने काररवाई शुरू कर दी.

घटना का मुआयना करने के बाद थानाप्रभारी को लगा कि यह काम घर के किसी सदस्य या जानने वाले का हो सकता है. क्योंकि हत्या का मकसद केवल दलजीत की हत्या करना था. लूटपाट या अन्य किसी तरह के वहां कोई सबूत नहीं थे.

थानाप्रभारी ने डौग स्क्वायड और फिंगरप्रिंट एक्सपर्ट को भी घटनास्थल पर बुला लिया था. घटना की खबर मिलते ही एसपी हरचरण सिंह भुल्लर, एसपी (देहात) विपिन चौधरी और डीएसपी (स्पैशल ब्रांच) गुरबंस सिंह बैंस भी मौकामुआयना करने वहां पहुंच गए थे. पुलिस ने जरूरी काररवाई कर दलजीत का शव पोस्टमार्टम के लिए सिविल अस्पताल भेज दिया.

मनिंदर कुछ बताने को तैयार नहीं थी. तब थानाप्रभारी ने वहां मौजूद मनिंदर की 5 वर्षीय बेटी जैसमिन को अपने विश्वास में ले कर पूछताछ की तो उस ने सच बताते हुए कहा कि मम्मी और ननु अंकल ने ही दादा को मारा है.

थानाप्रभारी के लिए यह जानकारी महत्त्वपूर्ण थी. उन्होंने उसी समय मनिंदर से सख्ती से पूछताछ की तो उस ने अपना अपराध स्वीकार करते हुए बताया कि झगड़े के बाद उस ने और उस के प्रेमी ननु ने मिल कर दलजीत सिंह की हत्या की थी. उस ने बताया कि उस ने अपने ससुर से झगड़े के बाद उन के सिर पर लोहे की रौड से हमला किया था.

चश्मदीद गवाह जैसमिन के बयान और मनिंदर द्वारा अपना अपराध स्वीकार करने के बाद थानाप्रभारी ने भादंवि की धारा 302/34 के तहत मनिंदर और राहुल उर्फ ननु के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर मनिंदर को गिरफ्तार कर लिया.

पुलिस ने उसे अदालत में पेश कर 2 दिन के पुलिस रिमांड पर लिया. साथ ही फरार ननु की तलाश में छापेमारी शुरू कर दी. ननु को पुलिस ने 20 जून, 2018 को गिरफ्तार कर लिया. उसे भी अदालत में पेश कर के रिमांड पर लिया गया.

रिमांड के दौरान पूछताछ में ननु ने बताया कि मनिंदर के साथ उस के अवैध संबंध पिछले काफी समय से थे और मृतक दलजीत सिंह इस का विरोध करते थे. इतना ही नहीं वह उसे और मनिंदर को बातबात पर जलील कर के धमकाते भी थे.

ननु ने बताया कि 17 जून को जब वह मनिंदर के घर आया तो दलजीत सिंह ने विरोध करना शुरू कर दिया. वह उसे देखते ही गालीगलौज करने लगे. इसी बात को ले कर मनिंदर और दलजीत का आपस में झगड़ा होने लगा, जिस के बाद आरोपी ने मनिंदर के साथ मिल कर दलजीत सिंह के ऊपर तेज धार हथियार और लोहे की रौड से हमला कर के उन्हें मौत के घाट उतार दिया.

रिमांड के दौरान पुलिस ने दोनों आरोपियों की निशानदेही पर उन के घर से लोहे की रौड भी बरामद कर ली, जिस से उन्होंने दलजीत की हत्या की थी. पुलिस काररवाई पूरी कर के थानाप्रभारी राजकुमार ने दोनों आरोपियों को पुन: अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. कथा लिखने तक दोनों आरोपी जेल में बंद थे.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

दलित और स्त्री पर पौराणिक सोच का शिकंजा

बिहार में खगडि़या के जिला जज द्वारा अंतर्जातीय प्रेमविवाह करने पर घर में नजरबंद रखी गई बेटी को पटना हाईकोर्ट ने पुलिस को सुरक्षित पेश करने का आदेश दिया है. हाईकोर्ट ने यह आदेश लीगल पोर्टल ‘बार ऐंड बैंच’ में प्रकाशित खबर पर संज्ञान लेते हुए दिया है.

जिला जज सुभाष चंद्र चौरसिया की बेटी यशस्विनी ने सुप्रीम कोर्ट के वकील सिद्धार्थ बंसल से प्रेमविवाह किया. दिल्ली जुडीशियल सर्विसेज की परीक्षा देने आई बेटी को मां ने होटल के बाहर सिद्धार्थ के साथ देख लिया. मां ने फिर दोनों को मिलने नहीं दिया और बेटी को होटल से बाहर नहीं निकलने दिया. यहां तक कि यशस्विनी परीक्षा तक नहीं दे पाई. इस तरह परीक्षा दिलाए बिना  वे बेटी यशस्विनी को ले कर चली गईं.

कुछ समय बाद सिद्धार्थ के पास यशस्विनी के परिजनों के फोन आए जिन में वे सिद्धार्थ को धमका रहे थे. युवती की मां का फोन भी आया, उन्होंने सिद्धार्थ को यशस्विनी से दूर रहने की हिदायत दी.

उत्तर प्रदेश के बागपत के अहीर गांव में हिंदू धर्म के छुआछूत व ऊंचनीच के बरताव से तंग आ कर करीब आधा दर्जन दलित परिवारों ने बौद्ध धर्म अपना लिया. इन परिवारों का कहना है कि उन्हें बातबात पर तंग किया जाता है, उन से भेदभाव बरता जाता है, जातिसूचक शब्दों से अपमानित किया जाता है. बौद्ध धर्म से आए भंते महाराज ने हमारे परिवारों को बौद्ध धर्म की दीक्षा दिलवाई और उन्होंने बौद्ध धर्र्म में शामिल होने का लिखित पत्र दिया.

मध्य प्रदेश के टीकमगढ़ में 21 जून को दलित दयाराम अहीरवार को सरपंच के घर के सामने से मोटरसाइकिल ले जाने पर मारापीटा गया. दयाराम मोटरसाइकिल से अपने घर जा रहा था. उस के घर की तरफ जाने वाली सड़क सरपंच के घर के आगे से निकलती है. आरोप है कि सरपंच हेमंत कुर्मी और उस के भाइयों ने उस के बाल पकड़ कर थप्पड़ मारे और खूब पिटाई की.

भेदभाव के मारे ये बेचारे

देश में दलितों और स्त्रियों में लगातार भय का माहौल बढ़ता जा रहा है. सिर्फ दलित उत्पीड़न की घटनाओं को देखा जाए तो पिछले 3-4 वर्षों में दलितों पर हिंसा और सामाजिक बहिष्कार की अनगिनत घटनाएं हुई हैं. यौनशोषण की वारदातों का सिलसिला कम होने के बजाय बढ़ता जा रहा है.

देशभर में आएदिन दलितों द्वारा हिंदू धर्म त्याग कर बौद्ध धर्म ग्रहण करने की खबरें सुर्खियों में रहती हैं. उन पर भेदभाव, हिंसा की घटनाएं रोज होती हैं. 2016 में जातिगत भेदभाव के 40 हजार मामले दर्ज हुए थे. एक रिपोर्ट के अनुसार, हर 18 मिनट पर एक दलित के साथ अपराध घटित होता है.

society

48 प्रतिशत गांवों में पानी के स्रोतों पर दलितों के जाने की मनाही है. 40 प्रतिशत सरकारी स्कूलों में दलित बच्चों को

कतार से अलग बैठ कर भोजन करना पड़ता है. 54 प्रतिशत बच्चे कुपोषित हैं. प्रति एक हजार दलित परिवारों में 83 बच्चे जन्म के एक साल के भीतर मर जाते हैं. 45 प्रतिशत बच्चे निरक्षर रह जाते हैं.

समाज में महिलाओं के साथ अपराध की तसवीर भयावह है. यौन अपराध, घरेलू हिंसा के आंकड़े चौंकाने वाले हैं. नैशनल अपराध रिकौर्ड ब्यूरो के अनुसार, रोज 60 बलात्कार के मामले सामने आते हैं. हर घंटे महिलाओं से छेड़छाड़ की 15 घटनाएं दर्ज की जाती हैं.

पिछली सरकारें भी दलितों और स्त्रियों पर होने वाले अपराधों पर अंकुश नहीं लगा पाईं, जबकि उन की नीतियां उदार थीं. भाजपा के केंद्र में आने के बाद इन तबकों पर अपराध की घटनाओं में बढ़ोतरी हुई है क्योंकि भाजपा के सक्रिय नेता पौराणिकवादी हैं और संतोंमहंतों के छलफरेब में पड़े रहते हैं. पार्र्टी ने 2014 के घोषणापत्र में दलितों के लिए सामाजिक न्याय और खुशहाली की प्रतिबद्धता जताई थी. दावा था कि सत्ता में आने के बाद

पार्र्टी दलितों का शिक्षा, रोजगार, स्किल डैवलपमैंट के जरिए उत्थान करेगी. दलितों पर हो रहे अत्याचारों को रोकने पर भी जोर दिया गया था पर सत्ता में आने के बाद भाजपापरस्त धार्मिक ताकतें शक्तिशाली हो गईं और वे चारगुना दम से दलितों व स्त्रियों पर जुल्म के लिए टूट पड़ीं.

धर्म की कट्टरता

देशभर में हो रही घटनाओं के पीछे जो कारण उभर कर सामने आ रहे हैं उन से जाहिर है कि धर्म के रखवाले आज भी इन तबकों को धर्म के अमानवीय कायदों के शिकंजे में कस कर रखना चाहते हैं. आज भी समाज में पुरानी मानसिकता कायम है.

भारत में दलित और स्त्रियों में चेतना के उभार के बीच इन पर अत्याचार के किस्से भी भयावह होते जा रहे हैं. दलितों और स्त्रियों में जागृति आ रही है पर उन पर नए तरह के हमले भी हो रहे हैं.

हिंदू धर्म दलितों और स्त्रियों के खिलाफ अपना दबदबा बनाए रखने के लिए पूरी ताकत के साथ जुटा हुआ है. दलित और स्त्री के जो काम धर्मग्रंथों में बताए गए हैं, धर्म के रखवाले उसे कायम रखने के प्रयास कर रहे हैं. नजर रखी जा रही है कि स्त्री और दलित वर्ग अपनेअपने धर्म से च्युत न हो जाएं. धर्म के बेरहम डंडे से अब भी इन्हें हांकने की कोशिशें जारी हैं.

धर्म में जातीय आधार पर भेदभाव व असमानता तो है ही, लिंग के आधार पर भी गैरबराबरी है. संविधान में समानता का अधिकार मिलने के बावजूद दलितों और स्त्रियों के प्रति सदियों पुरानी सड़ीगली पौराणिक सोच हावी है. इन के प्रति अपराध कम होने का नाम नहीं ले रहे.

भारतीय संस्कृति और धार्मिक वातावरण में लगातार घटती घटनाओं  से स्पष्ट है कि धर्म के धंधेबाज धर्म के नियमकायदों के नाम पर भय बनाए रखना चाहते हैं. धर्म का यह अमानवीय पक्ष है जो समानता का दुश्मन तो है ही, मानवता का संहारक भी है.

देश कितनी भी तरक्की का डंका पीटे, पढ़ाईलिखाई का जश्न मना ले, पर वैचारिक रूप से अभी भी रूढि़वादी जकड़नों से बाहर नहीं निकल पाया है. यहां की धार्मिक वर्णव्यवस्था की संरचना में जातिवादी दुराग्रह और वर्चस्ववादी पूर्वाग्रह धंसे हुए हैं.

स्त्रियों का मजाक

दुनिया के सभी धर्म और समाज स्त्रियों पर अत्याचार के लिए हमेशा दोषी रहे हैं. वे मध्ययुगीन सोच से ऊपर नहीं उठ पाए हैं. अरब देशों में स्त्रियों की हालत खराब है. सऊदी अरब में महिलाएं धर्र्म के शिकंजे से मुक्ति के लिए जद्दोजेहद कर रही हैं. हालांकि नए युवा शासक सुलतान बिन सलमान महिलाओं की स्वतंत्रता के लिए कुछ करना चाहते हैं, पर कट्टरपंथियों के आगे उन्हें जूझना पड़ रहा है.

सऊदी अरब में अब भी महिलाओं को पुरुष की गार्जियनशिप में रहना पड़ता है. पुरुष की इच्छा के विरुद्ध वे शादी नहीं कर सकतीं. विदेश नहीं जा सकतीं. गैरपुरुष से मित्रता नहीं कर सकतीं. न ही उस के साथ कहीं जा सकती हैं. सार्वजनिक स्थल पर महिलाओं का लंबे व ढीले वस्त्रों के अलावा हिजाब पहनना जरूरी है. महिला डाक्टर पुरुष डाक्टर की अनुमति के बगैर पुरुषों का इलाज नहीं कर सकती. महिलाएं अकेले घूम नहीं सकतीं. ऐसा करने से रोकने के लिए धार्मिक पुलिस उन पर निगरानी रखती है.

भारत में भी स्त्री की आजादी को ले कर तरहतरह के फतवे जारी किए जाते हैं. ये फतवे कुछ उसी तरह के होते हैं जो धर्मग्रंथों में लिखे हैं. हिंदू धर्र्म में महिलाओं और दलितों को पशुओं से भी नीच समझा गया है.

हिंदुओं के पूजनीय आदिशंकराचार्य ने स्त्री को नरक का द्वार बताया था.

याज्ञवल्क्य स्मृति में लिखा है, उस स्त्री के सारे अधिकार छीन लेने चाहिए जो अपना सतीत्व खुद खोए. इन में उसे जिंदा रहने लायक भोजन देने, उस की उपेक्षा करने, जमीन पर सोने, गंदे कपड़े पहनने की सजा शामिल है.

मजे की बात यह है कि ऐसी सजा चरित्रहीन पुरुष के लिए नहीं है.

हिंदू समाज में जहां पति को परंपरा और धर्मग्रंथों में परमेश्वर का दर्जा प्राप्त है वहीं पत्नी को तरहतरह के व्रतपूजा करनी होती है. अगर ऐसा नहीं होता तो लंबी उम्र की कामना केवल पत्नी न करती, पति भी पत्नी के लिए ऐसी कामना करता.

मनुस्मृति-9-3 में लिखा है,

‘‘स्त्री सदा किसी न किसी के अधीन रहती है, क्योंकि वह स्वतंत्र रहने के योग्य नहीं है.’’

मनुस्मृति-9-45 में इस तरह दर्ज है-

‘‘स्त्रियां स्वभाव से ही परपुरुषों पर रीझने वाली, चंचल और अस्थिर अनुराग वाली होती हैं.’’

चाणक्य नीति-16-2 में कहा गया है,

‘‘झूठ, दुसाहस, मूर्खता, लालच, अपवित्रता और निर्दयता स्त्रियों के स्वाभाविक दोष हैं.’’

मैत्रायणी संहिता में फरमाया गया है,

‘‘नारी अशुभ है. यज्ञ के समय नारी, कुत्ते और शूद्र को देखना नहीं चाहिए.’’

हिंदू धर्मग्रंथों में वर्णित इस तरह की सीखें आज भी समाज के जेहन में गहरी जड़ें जमाए हुए हैं. दलित हिंदुओं की मानसिक गुलामी की जकड़न से निकलने की कोशिश तो कर रहा है पर वह खुद अपने बनाए किसी दूसरे धार्मिक जाल में फंस रहा है.

आरक्षण और संविधान द्वारा प्रदत्त अधिकारों ने दलितों के प्रति ऊंची जातियों में नफरत भर दी है. उन्हें लगता है कि दलित उन के अवसरों को हथिया रहे हैं.

अच्छी बात यह है कि दलितों और स्त्रियों के खिलाफ जितना शोषण, अत्याचार हो रहा है और उन्हें दबाने, कुचलने के प्रयास हो रहे हैं, ये वर्ग अब उतना ही प्रतिरोध करते दिखाई दे रहे हैं. आएदिन महिलाएं और दलित संगठन हिंदू रूढि़वादी सोच का खुल कर विरोध करने लगे हैं. भारत सहित दुनियाभर की महिलाएं ‘मी टू’ जैसा अभियान चला कर पुरुषों की भोगवादी सोच का भंडाफोड़ कर दकियानूसी समाज की आंखें खोल रही हैं. दलित युवा छुआछूत, भेदभाव, हिंसा जैसे मुद्दों को ले कर संघर्षरत नजर आते हैं.

दलित और स्त्री पर धर्र्म की अमानवीय प्रथाओं का अंत तो तभी होगा जब ये वर्ग धर्म का त्याग करने का साहस दिखाएंगे.

सीनियर सिटिजनों में लिव इन

संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष और अंतर्राष्ट्रीय हैल्प पेज ने संयुक्तरूप से 2012 में जो रिपोर्ट जारी की थी उस में अनुमान लगाया था कि 2050 तक भारत व चीन में दुनिया की लगभग 80 प्रतिशत जनसंख्या बुजुर्गों की होगी. वर्तमान में भारत की लगभग 12.7 प्रतिशत जनसंख्या की आयु 60 वर्ष से अधिक है.

स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता में जो सुधार आ रहे हैं उस से मानव के जीवनकाल में वृद्धि हुई है लेकिन साथ ही, सेवानिवृत्ति और अपने जीवनसाथी को खोने के बाद या जवानी में एकल रहने के बाद बुजुर्ग अवस्था में स्त्रीपुरुष के पास समय की तो अधिकता हो जाती है, लेकिन मिलनेजुलने वाले व आपसी दुखदर्द बांटने वालों की कमी रहती है. इस उम्र में यौन संबंधों पर बात करना तो अपराध जैसा है.

अब समय बदल रहा है. 60 साल के बुजुर्ग भी यौन संबंधों में रुचि दिखा रहे हैं. लंदन स्थित कालेज औफ नर्सिंग में बुजुर्गों के स्वास्थ्य सलाहकार डौनी गैरट का कहना है कि शारीरिक स्पर्श और सैक्स मनुष्य की बुनियादी जरूरतें हैं.

लंदन की जानीमानी कलाकार लुई वीबर अपनी कला के माध्यम से बढ़ती उम्र और सैक्स के मसले को उठाती हैं. उन का कहना है, ‘‘31 प्रतिशत उम्रदराज पुरुष और 20 प्रतिशत उम्रदराज महिलाएं अपने साथी को बारबार चूमती हैं या प्यार जताती हैं.’’ वे आगे कहती हैं, ‘‘हो सकता है कि कोई बुजुर्ग लंबे समय से सैक्स से दूर रहा हो, लेकिन वह अभी मरा तो नहीं. उस की कल्पनाएं बची हुई हैं, हास्यबांध बचा हुआ है.’’

लिवइन का चलन

यही कारण है कि अब भारत के बुजुर्गों में भी लिवइन रिलेशनशिप का क्रेज बढ़ता जा रहा है. इस का श्रेय हमारे स्वास्थ्य में हुए तमाम गुणात्मक सुधारों तथा बेहतर हुई आर्थिक स्थितियों को जाता है. शिक्षा और सोच का दायरा भी बढ़ा और उदार हुआ है. अब 60 साल के स्त्रीपुरुष भी अपनी इच्छाओं व आकांक्षाओं के अनुकूल जीवन जीने लगे हैं. इन सीनियर सिटिजनों की इच्छाओं और आकांक्षाओं का सम्मान करते हुए मैचमैकिंग सर्विस नामक संस्था द्वारा सीनियर सिटिजन लिवइन रिलेशनशिप सम्मेलन की शुरुआत की गई. पहला सम्मेलन वर्ष 2011 में किया गया था, जिस में आधा दर्जन जोड़ों ने एकदूसरे का साथ चुना था. दूसरा सम्मेलन 22 नवंबर 2015 को हुआ था जिस में एकदूसरे का साथ चुनने वालों की संख्या 2 दर्जन से अधिक थी.

इसी प्रकार ग्लासगो कैलेडोनियाई यूनिवर्सिटी में मनोविज्ञान में पीएचडी करने वाले टेलरजेन पिलन और उस के सहयोगी एलन जेग्रो का बुजुर्गों पर किया गया एक अध्ययन एज ऐंड एजिंग जर्नल में वर्ष 2015 के अंत में प्रकाशित हुआ था. इस के अनुसार यह प्रमाणित हुआ था कि जो बुजुर्ग यौन गतिविधियों को महत्त्व देते हैं उन का सामाजिक जीवन और मनोवैज्ञानिक स्वास्थ्य बेहतर रहता है. उन के यौन व्यवहार से जुड़ी बातों का उन के बेहतर जीवन स्तर से भी गहरा और सकारात्मक रिश्ता पाया गया.

एम राजेश्वरी, दामोदर राव के लिए पिछले 2 वर्ष से एक उपयुक्त साथी की तलाश कर रही थीं. एम राजेश्वरी ने अध्यापिका के पद से सेवानिवृत्त होेने

के बाद बतौर समाजसेवा एकल या जीवनसाथी खो चुके बुजुर्गों के लिए साथी खोजने के लिए थोडूनीडा नामक एक एजेंसी की शुरुआत की थी. 64 वर्षीय दामोदर राव साथी की तलाश में राजेश्वरी की एजेंसी से मदद ले रहे थे. जब इस सिलसिले में राजेश्वरी ने उन से पूछा कि आप को कैसी साथी चाहिए, तो राव ने उन्हें बताया कि वे स्वतंत्र व उत्साही पार्टनर की तलाश में हैं, जिस की शिक्षा में दिलचस्पी हो.

बातचीत के दौरान एम राजेश्वरी व दामोदर राव की आंखें मिलीं और दोनों को उसी पल एहसास हो गया कि वे दोनों एक ही चीज की तलाश में हैं. दामोदर राव को एम राजेश्वरी जैसी साथी की ही तलाश थी. राजेश्वरी का कहना है, ‘‘दिसंबर 2010 में जब मैं ने यह एजेंसी शुरू की थी तब मुझे यह उम्मीद नहीं थी कि मैं अपने लिए ही साथी तलाश कर बैठूंगी. मैं 50 वर्ष से ऊपर के लगभग 250 लोगों के लिए साथी की तलाश कर चुकी हूं और इन में से लगभग 95 प्रतिशत लोग मेरी तरह लिवइन रिलेशनशिप को प्राथमिकता देते हैं बजाय औपचारिक विवाह के.’’

अकेलेपन का एहसास

एम राजेश्वरी अपनेआप में एक उदाहरण हैं. जब वे 13 वर्ष की थीं तो उन का विवाह 21 वर्षीय युवा के साथ परंपरागत ढंग से कर दिया गया था. लेकिन विवाह के 17 साल बाद उन दोनों का तलाक हो गया था. राजेश्वरी अपने 3 बच्चों के साथ अपने मातापिता के पास लौट आईं. उन्होंने फिर से अपनी शिक्षा आरंभ की और अंत में अध्यापिका की नौकरी हासिल कर ली.

सेवानिवृत्ति के बाद वे अपने बड़े बेटे के साथ रहने लगीं, लेकिन उन्हें अकेलेपन का एहसास होने लगा. इसी कारण वे उन लोगों के बारे में भी सोचने लगीं जिन्हें जीवन के आखिरी पड़ाव पर एक साथी की जरूरत महसूस होती है. वे हैदराबाद लौट आईं और बुजुर्ग लोगों की मुलाकात कराने के लिए थोडूनीडा नामक एजेंसी की शुरुआत की.

एजेंसी के कार्यालय के लिए उन्होंने एक हौल किराए पर लिया. लेकिन उस का किराया चुकाने के लिए उन के पास पैसा नहीं था. उन्होंने किराया चुकाने हेतु प्रत्येक व्यक्ति से 300 रुपए लेने शुरू कर दिए. एक स्थानीय समाचारपत्र ने उन की एजेंसी द्वारा बुजुर्गों की मुलाकात के संदर्भ में खबर प्रकाशित की तो राजेश्वरी आश्चर्यचकित रह गईं. एजेंसी की पहली ही मीटिंग में 80 बुजुर्गों ने भाग लिया. कुछ बुजुर्ग तो 400 किलोमीटर तक का फासला तय कर के आए थे.

पहली मीटिंग में 35 महिलाएं थीं जो लज्जा व शर्म की गठरी बनी हुई थीं, क्योंकि वे इस उम्र में नए सिरे से एक साथी की तलाश कर रही थीं. राजेश्वरी को उन्हें समझाना पड़ा कि साथी का मतलब सिर्फ सैक्स से नहीं है बल्कि भावनात्मक जरूरतों को पूरा करने से भी है. इस मीटिंग में मजदूर से ले कर उद्योगपति तथा चपरासी से ले कर डाक्टर तक मौजूद थे. उन में से कइयों को तो अपनी पसंद का साथी मिल भी गया. जिन्होंने शादी के बजाय साथसाथ रहने का फैसला किया.

इस संबंध में दामोदर राव का कहना था कि बुजुर्गों को भी साथी की जरूरत होती है. इस नए संबंध में खुद को तय करना होता है कि आप के भोजन की प्राथमिकताएं क्या हैं, सोने की आदत कैसी है. एकदूसरे की प्राइवेसी में हस्तक्षेप न किया जाए. वैसे हर जोड़ा साथ रहने के लिए अपने नियम खुद तय कर लेता है.

तालमेल है जरूरी

इस उम्र में जोड़ा बनाते समय भी शारीरिक आकर्षण की अपनी भूमिका होती है, लेकिन अधिकतर लोग मानसिक तालमेल और हमदर्दी को प्राथमिकता देते हैं. इसी प्रकार एक सीनियर सिटिजन हैं, मराठी फिल्मों की नायिका सुहासिनी मुले. इन्होंने अपनी जिंदगी का अधिकतर समय अपने पैशन और कैरियर को समर्पित कर दिया. लेकिन 60 साल की उम्र में ये शादी के बंधन में बंध गईं. इस उम्र में इन्हें एक ऐसा शख्स मिला जिस के साथ अपनी बाकी जिंदगी बिताना सही लगा. इन्होंने 2011 में भौतिक विज्ञान के जानकार

प्रो. अतुल गुरतु से शादी की. इन का कहना है कि इस के पूर्व मुझे ऐसा कभी नहीं लगा कि कोई ऐसा इंसान है जिस के साथ पूरी जिंदगी गुजारी जा सके, लेकिन प्रोफैसर साहब से मिलने के बाद मुझे एहसास हुआ कि इस व्यक्ति के साथ जिंदगी गुजारी जा सकती है और मैं ने शादी का फैसला कर लिया. सुहासिनी को अतुल गुरतु का एक आर्टिकल पढ़ कर उन से लगाव हुआ था. इस के बाद दोस्ती हुई और आखिर में बात शादी तक पहुंच गई.

सुहासिनी मुले एक सशक्त अभिनेत्री तो हैं ही, साथ ही वे एक डौक्यूमैंट्री फिल्म निर्माता भी हैं. वे 4 बार अपनी डौक्यूमैंट्री फिल्मों के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार भी प्राप्त कर चुकी हैं. सुहासिनी का यह फैसला इस उम्र में एकल जीवन जी रही कवयित्री महिलाओं को प्रेरणा प्रदान करेगा.

मुंबई निवासी कवयित्री जाने भंडारी का कहना है, ‘‘मेरे जीवन के छठे दशक में जब मेरे पति की मृत्यु हुई तो सामाजिक विचाराधारा के अनुसार मुझे अपनी बाकी जिंदगी विधवा बन कर ही गुजारनी थी, लेकिन जब मेरे जीवन में दोबारा जीवनसाथी का प्रवेश हुआ तो वह क्षण मेरे लिए अविश्वसनीय था. हमारे 5 साल के प्रेम संबंधों का अंत आखिरकार भव्य शादी में हुआ जिस में मेरे बच्चे व पोतेपोतियां भी शामिल थे. उस समय मेरी उम्र 68 साल तथा मेरे नए जीवनसाथी कमलेशपुरी की उम्र 69 वर्ष थी.

भारत के प्रसिद्ध यौनरोग व प्रेम संबंधों के सलाहकार डा. महेंद्र वत्स, जोकि 60 के बाद भी जीवनसाथी खोजने का पूरा समर्थन करते हैं, का विचार है कि मानव साहचर्य और यौन अंतरंगता का उम्र से कोई संबंध नहीं है. यह एक इच्छा है जिसे जिंदा रखने की आवश्यकता है या फिर हमें हालात को कुदरत पर छोड़ देना चाहिए जैसा कि विधवा बहू या अन्य गृहिणी को कुदरत के भरोसे छोड़ दिया जाता है और परिवार उन की ओर से आंखें मूंद लेता है.

डा. वत्स एक रोचक तथ्य प्रस्तुत करते हुए कहते हैं, ‘‘उम्र बढ़ने पर यौन इच्छा में भले ही कमी आ सकती है लेकिन यौन कुशलता बेहतर हो जाती है.’’ पुरुष व स्त्री दोनों को दीर्घ अवधि तक मर्दन की आवश्यकता होती है, जोकि यौन संबंधों में अधिक घनिष्ठता व आनंद लाता है. वे ब्रिटिश सर्वेक्षण का हवाला देते हुए कहे हैं कि उम्रदराज व्यक्ति संभोग के  कारक होते हैं क्योंकि उन का शीघ्र शृंखलन नहीं होता. इसी कारण वे जवान व्यक्ति की अपेक्षा स्त्री को अधिक यौन संतुष्ट रखते हैं.

दकियानूसी सोच

अफसोसजनक बात यह है कि हमारे समाज की दकियानूसी विचारधारा बुढ़ापे में यौन संबंधों को पूरी तरह दुत्कार देती है. संयुक्त परिवार में अगर कोई विधवा दादीमां औनलाइन जा कर जीवनसाथी की तलाश करे तो उसे बहुत ही गिरी नजरों से देखा जाता है.

बदलती मानसिकता व नई विचारधारा के साथ डिग्निटी फाउंडेशन भारत के सब से पुराने वरिष्ठ नागरिक सहायता समूहों में से एक है. यह समूह अपने सदस्यों का एकाकीपन दूर करने तथा जीवनसाथी खोजने हेतु हर तरह की सहायता करता है. समूह द्वारा एकदूसरे को जानने व खुली चर्चा हेतु हर वर्ष जीवनसाथी परिचय सम्मेलन का आयोजन भी किया जाता है.

डिग्निटी की सक्रिय कार्यकर्ता भौलु श्रीनिवासन का कहना है कि हमारी संस्था नियमित रूप से वरिष्ठ नागरिकों के जीवनसाथी हेतु विभिन्न पत्रपत्रिकाओं में वैवाहिक विज्ञापन जारी करती रहती है. हाल ही में हम ने एक कहानी प्रकाशित कराई है जिस में 70 वर्ष की महिला ने 78 वर्ष के सेवानिवृत्त एक वायुसेना अफसर से शादी की है. इस शादी में महत्त्वपूर्ण भूमिका उन के बच्चों ने निभाई है. अगर बच्चे ही खिलाफ हो जाएं तो मातापिता अपनी भावना व मित्रता दोनों ही छिपाने लगते हैं. इसलिए नौजवानों को भी प्रगतिशील मानसिकता अपनाने की जरूरत है.

जहां तक अधिक उम्र में विवाह से लाभहानि का सवाल है, तो निश्चित ही इस के लाभ अधिक और हानि कम है. विवाह से स्त्रीपुरुष दोनों की ही सक्रियता बढ़ जाती है, वे अपने स्वास्थ्य पर अधिक ध्यान देने लगते हैं तथा उन का एकाकीपन दूर हो जाता है. लेकिन ज्यादा बुजुर्ग जोड़े शादी के बजाय लिवइन रिलेशनशिप को प्रमुखता दे रहे हैं. कुछ जोड़े तो आर्थिक जिम्मेदारी को भी आधाआधा बांट रहे हैं, लेकिन ज्यादातर मामलों में आर्थिक जिम्मेदारी को पुरुष ही निभा रहे हैं. कुछ बुजुर्ग पुरुष परिजनों के साथ समझौता कर लेते हैं जिस से उन की मृत्यु के बाद महिला साथी को काफी हद तक आर्थिक सहयोग मिल जाता है. अधिकतर बच्चे भी अब अपने बुजुर्गों के फैसले का स्वागत करने लगे हैं.

अनुष्का के बाद वरुण पर बने मीम्स हो रहे वायरल

जबसे फिल्म सुई धागा का ट्रेलर रिलीज हुआ है, अनुष्का शर्मा पर बने मीम्स सोशल मीडिया पर ट्रेंड हो रहे हैं. अदाकरा अनुष्का के लुक्स का काफी मजाक उड़ाया जा रहा है. लोग उनपर तरह तरह के मीम्स बना रहे हैं. अनुष्का के बाद अब मीम्स क्रिएटर्स ने वरुण धवन की क्लास लेनी शुरू कर दी है. खुद एक्टर ने इंस्टा पर एक वीडियो शेयर किया है, जिसमें उनका मजाक उड़ाया जा रहा है.

वीडियो में सुई धागा के ट्रेलर से वरुण का एक सीन दिखाया गया है. जिसमें वे कुत्ते की एक्टिंग कर रहे हैं. वीडियो मीम के बैकग्राउंड में ग्रैमी अवार्ड सौन्ग Who Let the Dogs out चल रहा है. वीडियो इतना मजेदार है कि वरुण भी इसे शेयर करने से खुद को रोक नहीं पाए.

 

View this post on Instagram

 

A post shared by Varun Dhawan (@varundvn) on

उन्होंने वीडियो शेयर करते हुए कैप्शन लिखा- ”Who let the dogs out. #suidhaagamadeinindia. किसी ने मुझे ये भेजा और मैं इसे शेयर करे बिना नहीं रह सका.”

बता दें, ट्विटर, इंस्टाग्राम पर वायरल हो रहे इन मीम्स से मूवी का अच्छा खासा प्रमोशन हो रहा है. अनुष्का ने एक इंटरव्यू में कहा था, ”मुझे खुद पर बने मीम्स बेहद फनी लगे, यहां तक कि मैंने उन्हें दोस्तों के साथ भी शेयर किया. इसके अलावा वरुण धवन और शरत कटारिया को भी ये मीम्स शेयर कीं.”

फिल्म 28 सितंबर को सिनेमाघरों में रिलीज हो रही है. सुई धागा में वरुण-अनुष्का मौजी-ममता के रोल में दिखेंगे. अनुष्का पहली बार नौन ग्लैमरस लुक में दिख रही हैं. यशराज बैनर तले बनी ये फिल्म एक फ्रेश स्टोरी के साथ परदे पर आ रही है. इसे मनीष शर्मा ने प्रोड्यूस किया है.

व्हाट्सएप ग्रुपों से भी भयभीत हो रही है सरकार

सरकार अब व्हाट्सएप ग्रुपों में उतनी ही भयभीत नजर आ रही है जितनी समाचारपत्रों और न्यूज चैनलों से है. ललितपुर जिले के डिस्ट्रीक्ट मजिस्ट्रेट मानवेंद्र सिंह का तुगलकी आदेश कि न्यूज चैनलों व पत्रकारों द्वारा चलाए जा रहे व्हाट्सएप ग्रुपों को अब रजिस्टर कराना पड़ेगा और 31 अगस्त 2018 के बाद उस में कोई नंबर नहीं जोड़ा जाएगा.

ग्रुप एडमिन को अपना नाम, परिचयपत्र, आधारकार्ड, फोटो, घर का पता, दफ्तर का पता आदि फार्म में भर कर देना होगा. कहने को तो यह सांप्रदायिक सौहार्द के लिए किया जा रहा है पर साफ है कि सरकार समाचारपत्रों की तरह व्हाट्सएप गु्रपों से भी डर रही है. इसी तरह की बंदिशें जिला अधिकारियों ने देशभर के भाषाई समाचारपत्रों पर जानबूझ कर लगा रखी है जबकि संबंधित प्रैस एवं रजिस्ट्रेशन औफ बुक्स एक्ट 1807 में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है.

कठिनाई यह है कि हमारा देश का आम नागरिक और यहां तक कि पत्रकार, विचारक, इतिहासकार स्वत: ही अपने को सरकार का गुलाम मानते हैं. सरकारी प्रक्रियाएं चाहे जितनी कठिन हों, उन का अवैधानिक व असंवैधानिक होने पर भी विरोध करने की जगह सिफारिशें लगा कर प्रक्रिया पूरी करने में लग जाते हैं.

पुलिस व प्रशासन को आदत पड़ जाती है कि चाहे जैसे कदम वे उठा लेंगे, 90-95 प्रतिशत लोग तो उन की बात पत्थर की लकीर मान कर सहज मान लेंगे. कुछ ले दे कर सिफारिश लगा कर हर तरह की प्रक्रिया पूरी कर डालेंगे चाहे उस से उन की मौलिक स्वतंत्रताएं गिरभी हो जाएं.

आम नागरिक पर लगाई जाने वाली बंदिशों के आदी हो चुके प्रशासन के अफसर आमतौर पर मान कर चलते हैं कि वे राजा हैं, कानूनों के ऊपर है. पूना का प्रकरण उसी का नमूना है. ललितपुर का भी मामला ऐसा ही है. यह पक्का है. अवैधानिक होते हुए भी कुछ तो सिर आंखों पर ले लेंगे.

हाय रे पर्यटन : शर्मा परिवार की पर्यटन यात्रा

आजकल पर्यटन पर खास जोर है. जि parytanसे देखो वही कहीं न कहीं जा रहा है. कोई शिमला, कोई मनाली, कोई ऊटी. पत्नी भी कहां तक सब्र रखती, आखिर एक दिन कह ही दिया, ‘‘देखो, बहुत हो गया. इतने साल हो गए हमारी शादी को, आप कहीं नहीं ले जाते. ले दे कर पीहर और रिश्तेदारों के अलावा आप की डायरी में दूसरी कोई जगह ही नहीं है. अब तो किटी में भी लोग मुझ से पूछते हैं, ‘मिसेज शर्मा, आप कहां जा रही हो.’ अब मैं क्या जवाब दूं. मैं ने भी उन से कह दिया कि हम भी इस बार हिल स्टेशन जा रहे हैं.

‘‘इस बार आप पक्की तरह सुन ही लो. हमें इस बार किसी न किसी हिल स्टेशन पर जाना ही है, चाहे लोन ही क्यों न लेना पड़े. मेरी नाक का सवाल है,’’ यह कह कर वह कोपभवन में चली गईं.

हमारे जैसे शादीशुदा लोग पत्नी के कोप से अच्छी तरह परिचित हैं. वे जानते हैं कि एक बार निर्णय लेने के बाद पत्नियों को कोई नहीं समझा सकता, सो मैं ने समझौतावादी नीति अपनाई और उन्हें बातचीत के लिए आमंत्रित किया. एकतरफा बातचीत के बाद मैं ने मान लिया कि इस बार शिमला जाना ही हमारी नियति है.

रेलवे टाइमटेबिल में से कुछ गाडि़यां नोट कर मैं रिजर्वेशन कराने रेलवे के आरक्षण कार्यालय पहुंचा. कार्यालय बिलकुल खाली पड़ा था. मैं मन ही मन खुश हो उठा कि चलो अच्छा हुआ, अभी 5 मिनट में रिजर्वेशन हो जाएगा.

चंद मिनटों में मेरा नंबर भी आ गया.

‘‘लाइए,’’ यह कहते हुए आरक्षण क्लर्क ने मेरा फार्म पकड़ा और उस पर अपनी पैनी नजर फिरा कर मुझे वापस पकड़ा दिया.

‘‘क्या हुआ?’’ मैं ने चौंक कर पूछा, ‘‘आप ने फार्म वापस क्यों दे दिया?’’

वह क्लर्क हंस कर बोला, ‘‘भाईसाहब, गाड़ी में नो रूम है यानी कि अब जगह नहीं है.’’

‘‘तो कोई बात नहीं, दूसरी गाड़ी में दे दीजिए.’’

‘‘इस समय इस ओर जाने वाली किसी भी गाड़ी में कोई जगह नहीं है.’’

‘‘कैसी बात करते हैं. सारे काउंटर खाली पड़े हैं और आप हैं कि…’’

‘‘ऐसा है, आप तैश मत खाइए. सारी गाडि़यां 2 महीने पहले ही बुक हो गई हैं. अब कहें तो जुलाई का दे दें.’’

एकाएक मुझे खयाल आया कि मैं भी कैसा बेवकूफ हूं. नहीं मिला तो अच्छा ही हुआ. अब कम से कम इस बहाने जाने से तो बचा जा सकता है.

मैं खुशीखुशी घर लौट आया और जैसे ही घर में प्रवेश किया तो यह देख कर हैरान रह गया कि वहां महल्ले की किटी कार्यकारिणी की सभी महिला पदाधिकारी अपने बच्चों सहित मौजूद थीं.

‘‘भाईसाहब, बधाई हो, आप ने शिमला का निर्णय ठीक ही लिया, पर लगे हाथ कुल्लूमनाली भी हो आइएगा,’’ मिसेज वर्मा बोलीं.

‘‘अरे, जब वहां जा रहे हैं तो कुल्लूमनाली को कैसे छोड़ देंगे,’’ श्रीमतीजी चहक कर बोलीं.

‘‘और भाईसाहब, रिजर्वेशन ए.सी. में ही करवाइएगा, नहीं तो आप पूरे रास्ते परेशान हो जाएंगे.’’

‘‘अरे भाभीजी, हमारे साहब के स्वभाव में तकलीफ उठाना तो बिलकुल नहीं है. हम ने तो ए.सी. में ही रिजर्वेशन करवाया है. इन्होंने तो होटल में भी ए.सी. रूम ही बुक करवाए हैं.’’

मुझे काटो तो खून नहीं. केवल स्टेटस सिंबल के लिए श्रीमतीजी झूठ पर झूठ बोलती जा रही थीं.

चायनाश्ते के दौर के बाद जब महिला ब्रिगेड विदा हुई तो मैं धम से सोफे पर पड़ गया.

उन्हें छोड़ कर वे अंदर आईं तो मेरा हाल देख कर घबरा गईं, ‘‘क्या हो गया, तुम्हारी तबीयत तो ठीक है न.’’

मैं ने श्रीमतीजी को रिजर्वेशन की असलियत बताई तो वह बिफर उठीं, ‘‘तुम कैसे आदमी हो, तुम से एक रिजर्वेशन नहीं हुआ. मैं नहीं जानती. मुझे इस बार शिमला जरूर जाना है. अब तो मेरी नाक का सवाल है,’’ कह कर वह अंदर चली गईं.

बेटी, मां की बात सुन कर मुसकराई, ‘‘देखो पापा, मम्मी की नाक का सवाल बहुत बड़ा होता है. इस सवाल में अच्छेअच्छों के कान भी कट जाते हैं. ऐसा करते हैं, गाड़ी कर के चलते हैं.’’

अब इस फैसले को मानने के अलावा मेरे पास कोई चारा नहीं था.

सीने पर पत्थर रख कर मैं गाड़ी की बात करने गया. गाड़ी का रेट सुन कर मेरे होश उड़ गए, पर क्या करता, श्रीमतीजी की नाक का सवाल सब से बड़ा था. मुझे लगा, जितने पैसे में घूम कर आ जाते, उतना तो गाड़ी ही खा जाएगी, लेकिन अब कुछ नहीं हो सकता था.

देखतेदेखते वह दिन भी आ गया. सोसायटी की सभी महिलाएं विदा करने आईं. श्रीमतीजी फूली नहीं समा रही थीं. वह मेरी तरफ ऐसे देख रही थीं जैसे कह रही हों, देखो, मेरी इज्जत. हां, बात करतेकरते सभी महिलाएं अपने लिए शिमला से कुछ न कुछ लाने की फरमाइश कर रही थीं, जिसे श्रीमतीजी सहर्ष स्वीकार करती जा रही थीं. इन फरमाइशों की सूची सुन कर मेरा दिल घबराने लगा था.

अंतत: गाड़ी रवाना हुई तो श्रीमतीजी ने प्रधानमंत्री की तरह हाथ हिला कर सोसायटी वालों से विदा ली. थोड़ी देर में सूरज सिर पर आ गया. लू के थपेड़े चलने लगे. गाड़ी बुरी तरह तप रही थी. जहां हाथ लगाओ वहीं ऐसा लगता था जैसे गरम सलाख दाग दी गई हो. कुछ देर में पत्नी, फिर बेटी धराशायी हो गई.

बेटा मां से लड़ने लगा, ‘‘यह कौन सा हिल स्टेशन है? हम सहारा मरुस्थल में चल रहे हैं क्या?’’

श्रीमतीजी कराहती हुई बोलीं, ‘‘अरे बेटा, यह तेरे पापा की कंजूसी से ऐसा हुआ है. मैं ने तो ए.सी. गाड़ी लाने को कहा था.’’

जवाब में बेटा और बेटी अपने कलियुगी पिता को घूरने लगे. मैं क्या करता, मैं ने निगाहें नीचे कर लीं.

दवाइयां खाते, उलटियां करते जैसेतैसे कर के शिमला तक पहुंचे. शिमला तक का रास्ता आलोचनाओं में अच्छी तरह कटा. उन की आलोचनाओं का केंद्र मैं जो था.

शिमला पहुंच कर सब ने चैन की सांस ली. ड्राइवर ने सड़क के एक ओर गाड़ी लगा दी.

बेटा अचानक गाड़ी को रुकते देख बोला, ‘‘क्यों पापा, होटल आ गया?’’

‘‘हां, बेटा, तेरे पापा ने फाइव स्टार होटल बुक करा रखा है,’’ श्रीमतीजी व्यंग्य से बोलीं.

ड्राइवर भी हैरान रह गया, ‘‘क्या साहब, आप ने होटल भी बुक नहीं करवाया? सीजन का टाइम है. क्या पहली बार घूमने आए हो?’’

‘‘हां, भैया, पहली बार ही आए हैं. हमारी तकदीर में बारबार घूमने आना कहां लिखा है,’’ श्रीमतीजी लगातार वार पर वार कर रही थीं, ‘‘जा बेटा, उठ और होटल ढूंढ़, मेरे तो बस की नहीं है.’’

फिर बेटे और बेटी को ले कर गलीगली घूमने लगा. ज्यादातर होटल भरे हुए थे, हार कर एक बहुत महंगा होटल कर लिया. अब सब बहुत खुश थे.

उस दिन आराम किया. शाम को माल रोड घूमने निकले. मैं उन्हें बता रहा था, ‘‘देखो, रेलिंग के नीचे घाटी कितनी सुंदर लग रही है,’’ पर घाटी को निहारने के बाद अपना सिर घुमाया तो पाया मैं अकेला था. ये तीनों अलगअलग दुकानों में घुसे हुए थे.

थोड़ी देर बाद बेटी आई और हाथ पकड़ कर दुकान में ले गई, ‘‘देखो पापा, कितनी सुंदर ड्रेस है.’’

‘‘अच्छा भई, कितने की है?’’ लाचारी में मुझे पूछना पड़ा.

‘‘बस सर, सस्ती है. आप को डिस्काउंट में दे देंगे. मात्र 2 हजार रुपए.’’

मुझे मानो करंट लगा, ‘‘अरे भई, तुम तो दिन दहाड़े लूटते हो. यह डे्रस तो कोटा में 300-400 से ज्यादा की नहीं मिलती है.’’

दुकानदार ने डे्रस मेरे हाथ से छीन ली, ‘‘कोई दूसरी दुकान देखिए साहब, हमारा टाइम खराब मत कीजिए.’’

बेटी को भारी धक्का पहुंचा. बाहर निकलते ही वह रोने लगी, ‘‘आप भी बस पापा, कितना अपमान करवाते हैं.’’

तभी श्रीमतीजी भी बेटे के साथ आ गईं. बेटी को रोते देख उन्होंने मेरी जो क्लास ली कि मेरी जेब का अच्छाखासा पोस्टमार्टम हो गया.

दूसरे दिन कूफरी घूमने का प्रोग्राम बना. कूफरी में घोड़े वाले पीछे पड़ गए कि साहब, ऊपर पहाड़ी पर चलें. मुझे घुड़सवारी में कोई दिलचस्पी नहीं है और फिर रेट इतने कि मैं ने साफ मना कर दिया.

‘‘तुम ऊपर चले चलोगे तो बच्चों का मन बहल जाएगा. बच्चों का मन रखने के लिए क्या इतना भी नहीं कर सकते.’’

‘‘नहीं, बिलकुल नहीं कर सकता,’’ मुझे पत्नी पर गुस्सा आ गया, ‘‘एक बार घर वालों का मन रखने के लिए घोड़ी पर चढ़ा था जिस का मजा आज तक भोग रहा हूं… अब और रिस्क नहीं ले सकता.’’

मेरे इस व्यंग्य को सुन कर श्रीमतीजी ने रौद्र रूप धारण कर लिया. फिर क्या था, मुझे सपरिवार घोड़े की सवारी करनी ही पड़ी. लेकिन जिस बात का डर था, वही हुआ. घोड़े पर से उतरते वक्त मैं संतुलन खो बैठा और धड़ाम से नीचे जा गिरा. मेरे पांव में मोच आ गई. मेरा उस दिन का सफर गाड़ी में बैठेबैठे ही पूरा हुआ. वे बाहर घूमतेफिरते, मजे करते रहे और मैं अंदर बैठाबैठा कुढ़ता रहा.

शाम को वहीं एक डाक्टर को दिखाया. उस ने कहा, ‘‘कोई चिंता की बात नहीं है. एकदो दिन आराम करोगे तो ठीक हो जाएगा.’’

दूसरे दिन सुबह मैं पलंग पर लेटा रहा. तीनों सदस्य अर्थात श्रीमतीजी, पुत्र व पुत्री तैयार होते रहे. थोड़ी देर बाद वे तीनों एकसाथ आ कर मेरे सामने बैठ गए.

मैं बोला, ‘‘कोई बात नहीं. चोट लग गई तो लग गई. तुम लोग परेशान मत हो. जा कर घूम आओ.’’

‘‘हम क्यों परेशान होंगे. हम तो पैसे के लिए बैठे हैं.’’

पैसे ले कर तीनों सुबह के निकले तो रात तक ही लौट कर आए. उन्होंने इतना सामान लाद रखा था कि बड़ी मुश्किल से उठा पा रहे थे.

धीरेधीरे उन्होंने एकएक सामान का रेट बताना शुरू किया तो मेरा दिल बैठ गया. मैं ने खर्च का हिसाब लगाया तो सिर्फ इतने ही रुपए बचे थे कि बस होटल का बिल चुका कर हम जैसेतैसे घर पहुंच सकें.

रात को बैठ कर सारी पैकिंग की गई. कुल्लूमनाली न जाने की बाबत अफसोस जाहिर किया गया और यह चिंता जतलाई गई कि अब श्रीमतीजी घर पहुंच कर कैसे मुंह दिखाएंगी.

दूसरे दिन उदासी भरे चेहरों को ले कर वे शिमला से रवाना हुए और साथ में मुझे लेना भी नहीं भूले.

कुछ घंटों बाद जब हमारी कार पहाड़ों को छोड़ कर मैदानों में पहुंची तो गरमी अपना विकराल रूप दिखाने लगी. लू के थपेड़े खाते हुए जब हम घर पहुंचे तो श्रीमतीजी के आगमन पर पूरा महल्ला इकट्ठा हो गया. श्रीमतीजी रास्ते की थकान भूल गईं.

वह बढ़ाचढ़ा कर शिमला का बखान सुनाने लगीं. सब लोग धैर्य से सुनते रहे. फिर समापन के समय वस्तुवितरण समारोह हुआ. श्रोताओं का धैर्य टूट गया. वे सामानों की आलोचना करने लगे.

‘‘अरे, मिसेज शर्मा, यह शाल थोड़ा आप हलका ले आई हैं.’’

‘‘हां, कपड़े भी ठीक नहीं आए. फुटपाथ से लेने में क्वालिटी हलकी आ ही जाती है.’’

‘‘मिसेज शर्मा, आप ने तो बस घूमने का नाम ही किया, कुल्लूमनाली हो कर आतीं तो कुछ बात भी थी.’’

थोड़ी देर बाद सब चले गए. घर की 3 सदस्यीय ज्यूरी के सामने मैं अपराधी बैठा था. अपराध सिद्ध करने के लिए महल्ले के सभी गवाह पर्याप्त थे.

मुझे दोषी माना गया और सजा दी गई कि अब क्रिसमस की छुट्टियों में गोवा घूमने चलेंगे, जिस का सब इंतजाम बेटा पहले से ही कर लेगा और मुझे सिर्फ एक काम करना होगा, एक भारी राशि का चेक साइन करना होगा ताकि सबकुछ अच्छी तरह से निबट सके.

रोज करें सेक्स और कैंसर के खतरे को रखें दूर

एक शोध के मुताबिक, प्रतिदिन ऑर्गज्म करने से एक आदमी 20 प्रतिक्षत तक प्रोस्टेट कैंसर का रिस्क कम कर सकता है. शोध के मुताबिक जो मर्द नियमित रुप से वीर्यपात करते हैं उन्हें मुश्किल से ही इस तरह का कैंसर होता है.

हालांकि हारवर्ड मेडीकल स्कूल के शोधकर्ताओं ने कोई साफ वजह नहीं दी है कि ऐसा करने से  कैंसर का रिस्क कैसे कम होता है लेकिन पहले दी गई थ्योरी में ये बताया गया है कि लगातार ऑर्गज्म करने से प्रोस्टेट में कैंसर पैदा करने वाले कैमिकल्स बाहर निकल जाते है.

वहीं दूसरी थ्योरी में ये बताया गया है कि लगातार ऑर्गेज्म करने से पुराने सेल्स, जिनसे कैंसर का खतरा रहता है, वो बाहर निकल जाते है और नए सेल्स को पनपने में आसानी होती है.

प्रोस्टेट एक छोटे आकार की ग्रंथी होती हो जो आदमी के लिंग और मूत्राशय के बीच पाई जाती है. इसका काम गाड़ा सफेद तरल पदार्थ पैदा करना होता है जो अंडकोष से पैदा किए गए शुक्राणु से मिलकर वीर्य बनाता है.

शोधकर्ताओं के मुताबिक 40-49 की उम्र के मर्द अगर प्रति माह 21 या इससे ज्यादा बार वीर्यपात करते है तो उनमें प्रोस्टेट कैंसर का रिस्क 22 प्रतीक्षत कम होता है.

इसकी तुलना उन मर्दो से की गई थी जो एक महीने में 4 से 7 बार वीर्यपात करते है.

गायत्री की खूनी जिद

उत्तर प्रदेश के जिला फिरोजाबाद में एक कस्बा है एटा इस कस्बे में थाना भी है. एटा कस्बे से कुछ दूर एक गांव है  नगलाचूड़. सोनेलाल अपने परिवार के साथ इसी गांव में रहता था. सोनेलाल के 3 बेटे थे गोपाल, कुलदीप और संजीव. इन के अलावा 2 बेटियां भी थीं. सोनेलाल के पास खेती की जमीन थी, जिस से उस के घरपरिवार का गुजारा बडे़ आराम से हो जाता था. सोनेलाल के बड़े बेटे गोपाल और एक बेटी की शादी हो चुकी थी.

शादी के बाद गोपाल अपने परिवार के साथ काम के लिए पंजाब गया था. वहां से वह कभीकभी ही घर आता था. सोनेलाल की एक बेटी और बेटा कुलदीप अपनी पढ़ाई कर रहे थे. जबकि संदीप अपने पिता के साथ खेती के कामों में हाथ बंटाता था. घर की व्यवस्था सोनेलाल की पत्नी सरला के जिम्मे थी. सरला चाहती थी कि संजीव का भी घर बस जाए इसलिए वह 24 साल के संजीव के लिए कोई लड़की देखने लगी.

इसी सिलसिले में रिजौर निवासी छबिराम नाम के एक रिश्तेदार ने रिजौर के ही रामबाबू शाक्य की बेटी गायत्री के बारे में बताया. छबिराम की मार्फत सोनेलाल ने रामबाबू से बात की.

उन्हें रामबाबू की बेटी गायत्री अपने बेटे संजीव के लिए सही लगी. दोनों ओर से चली बातचीत के बाद संजीव और गायत्री का रिश्ता तय कर के जल्द ही दोनों की शादी कर दी गई. यह लगभग डेढ़ साल पहले की बात है.

खूबसूरत गायत्री से शादी कर के संजीव ही नहीं बल्कि उस के घर वाले भी बहुत खुश थे. लेकिन यह कोई नहीं जानता था कि आगे चल कर यही खूबसूरत दुलहन कितनी बड़ी मुसीबत बनने वाली है.

शादी के बाद गायत्री की शिकायत

गायत्री ससुराल आ तो गई थी पर उस के तेवर किसी की समझ में नहीं आ रहे थे. संजीव की मां सरला ने सोचा था कि बहू घर आ जाएगी तो सब कुछ ठीक हो जाएगा. घर की जिम्मेदारी बहू के हवाले कर के वह आराम करेगी, क्योंकि बड़ी बहू शादी के कुछ दिनों बाद ही गोपाल के साथ पंजाब चली गई थी. पर सरला का यह सपना अधूरा रहा. क्योंकि गायत्री पूरे दिन अपने कमरे में बैठी टीवी देखती रहती थी.

टीवी से फुरसत मिल जाती तो वह मोबाइल पर लग जाती. वह काफीकाफी देर तक किसी से बातें करती रहती थी. कुछ दिन तक तो सरला ने गायत्री से कुछ नहीं कहा. लेकिन जब पगफेरे के लिए उस का भाई टीटू उसे लेने आया तो सरला ने टीटू से कहा, ‘‘अपनी बहन को समझाओ. वह ससुराल में रहने का सलीका सीखे. यह इस घर की बहू है, इसे यहां बहू की तरह ही रहना होगा.’’

बहन की शिकायत सुन कर टीटू के माथे पर शिकन आ गई. उस ने घूर कर गायत्री की तरफ देखा लेकिन उस से कहा कुछ नहीं. टीटू के पिता बीमार रहते थे, इसलिए वह ही सब्जी की दुकान चलाता था. भाई के साथ गायत्री अपने मायके आ गई. घर पहुंचते ही टीटू ने अपनी मां रामश्री से कहा, ‘‘संभालो अपनी लाडली को, यह हमें जीने नहीं देगी.’’

गायत्री अपने कमरे में चली गई. इस के बाद रामश्री और टीटू देर तक बातें करते रहे. रामबाबू कुछ देर बाद घर आया तो उसे भी पता चल गया कि गायत्री के ससुराल वाले उस से खुश नहीं हैं. वह गुस्से में बोला, ‘‘हम ने तो सोचा था कि गायत्री शादी के बाद सुधर जाएगी, पर लगता है ये लड़की उन लोगों को भी नहीं जीने देगी.’’

दरअसल शादी के पहले से ही रामबाबू के घर में तनाव था. इस की वजह यह थी कि गायत्री संजीव से शादी करने से इनकार कर रही थी. पर घर वालों के सामने उस की एक नहीं चली. रामबाबू और रामश्री इस बात को ले कर बहुत चिंतित थे कि कहीं गायत्री की वजह से वह लोग किसी नई परेशानी में न पड़ जाएं.
रिजौर में ही रामबाबू के घर से कुछ दूरी पर किशनलाल का घर था. उस के बेटे रंजीत ने भी अपने घर वालों को परेशान कर रखा था. यूं तो किशनलाल के 4 बेटे थे, जिन में से 3 पढ़ेलिखे थे पर छोटे बेटे रंजीत का पढ़ाई में मन नहीं लगता था. वह सारे दिन गांव में अपने दोस्तों के साथ गपशप करता रहता था. वह अपने पिता के खेती के काम में भी हाथ नहीं बंटाता था.

रंजीत की जिंदगी में आई गायत्री

एक दिन अचानक रंजीत की नजर गायत्री से टकराई और वह उस की ओर खिंचता चला गया. वह उस से बात करने के लिए मौके की तलाश में था. एक दिन मोबाइल की दुकान पर उसे मौका मिल गया, जहां गायत्री अपना मोबाइल रीचार्ज कराने आई थी. उस से बात की शुरुआत करने का कोई बहाना चाहिए था. लिहाजा उस ने गायत्री से कहा, ‘‘गायत्री, देखें तुम्हारा मोबाइल किस कंपनी का है.’’

गायत्री ने उस के हाथ में मोबाइल दे दिया. रंजीत हाथ में मोबाइल ले कर देखते हुए बोला, ‘‘यह मोबाइल तो तुम्हारी तरह ही स्मार्ट है.’’

गायत्री ने उसे घूर कर देखा फिर खिलखिला कर हंसते हुए बोली, ‘‘तुम भी काफी स्मार्ट लगते हो.’’
सुन कर रंजीत की हिम्मत और बढ़ गई. गायत्री वहां से चलने लगी तो रंजीत ने कहा, ‘‘अगर आप बुरा न मानो तो मैं बाइक से तुम्हें तुम्हारे घर छोड़ दूंगा.’’

गायत्री मुसकराई और उस की बाइक पर बैठ गई. रंजीत बहुत खुश हुआ. पहली बार किसी लड़की ने उस की दोस्ती कबूल की थी.

‘‘रंजीत वैसे तुम आजकल क्या कर रहे हो.’’ गायत्री ने पूछा.

‘‘इंटरमीडिएट पास कर के घर पर ही मौज कर रहा हूं. वैसे भी तुम्हें तो पता ही है कि घर में किसी चीज की कमी तो है नहीं. जब जिम्मेदारी आ जाएगी, देखा जाएगा’’ रंजीत बोला, ‘‘गायत्री, क्या तुम अपना मोबाइल नंबर दे सकती हो?’’

‘‘हांहां क्यों नहीं, तुम मुझे अपना मोबाइल नंबर बताओ, मैं मिस्ड काल कर देती हूं.’’ गायत्री बिना किसी झिझक के बोली. बाइक चलातेचलाते रंजीत ने उसे अपना मोबाइल नंबर बता दिया. गायत्री ने तुरंत उस के नंबर पर मिस्ड काल दे दी. गायत्री ने अपने घर से कुछ पहले ही मोटरसाइकिल रुकवा ली और बाइक से उतर कर पैदल अपने घर चली गई ताकि कोई घर वाला उसे बाइक पर बैठे न देख ले. उसे उतार कर रंजीत भी मुसकराता हुआ अपने घर चला गया.

अगले दिन रंजीत ने अपने मोबाइल पर किसी अनजान नंबर की घंटी सुनी. जैसे ही उस ने हैलो कहा तो दूसरी तरफ से लड़की की आवाज सुनाई दी. वह बोला, ‘‘कौन, किस से बात करनी है.’’
‘‘ओह हम ने तो सोचा था कि तुम काफी स्मार्ट हो, पर तुम तो जीरो निकले मि. स्मार्ट.’’ कहते हुए लड़की हंसने लगी.

रंजीत समझ गया कि वह गायत्री है. रंजीत मन ही मन बहुत खुश हुआ. वह सफाई देते हुए वह बोला, ‘‘सौरी गायत्री, मैं समझा किसी और का फोन है. अब मैं तुम्हारा फोन नंबर मोबाइल में सेव कर लूंगा.’’
‘‘हां, समझदार दिखते हो. सुनो, आज मुझे 2 घंटे के बाद एटा जाना है. तुम मोड़ पर मिलो.’’ गायत्री ने कहा.
रंजीत निर्धारित समय से पहले ही वहां पहुंच गया. उस के कुछ देर बाद गायत्री भी आ गई. उस दिन से रंजीत और गायत्री के बीच नजदीकियां बढ़ने लगीं. दोनों ही लोगों की नजरों से छिप कर मिलने लगे. लेकिन लाख छिपाने पर भी ऐसी बातें छिप नहीं पातीं. गांव के किसी आदमी ने गायत्री को रंजीत की बाइक पर बैठे देखा तो उस ने रामबाबू को यह बात बता दी.

घर वालों की परेशानी बढ़ाई गायत्री ने

रामबाबू परेशान हो गया. घर आ कर उस ने गायत्री से पूछताछ की तो उस ने इस बात से इनकार कर दिया. रामबाबू ने सोचा कि शायद पड़ोसी को कोई गलतफहमी हो गई होगी.

लेकिन अब गायत्री सतर्क हो गई थी. उस का और रंजीत का प्यार परवान चढ़ने लगा था. अपनी मुलाकातों के दौरान प्रेमी युगल भविष्य के सपने बुनने लगा था. हालांकि दोनों की जाति एक थी पर रंजीत न तो कोई कामधंधा करता था और न ही उस की छवि अच्छी थी. गायत्री अच्छी तरह जानती थी कि घर वाले उस के इस रिश्ते को स्वीकार नहीं करेंगे.

दूसरी ओर दोनों के इश्क की खबरें लोगों तक पहुंचने लगी थीं. लोग दोनों के बारे में खुसुरफुसुर करने लगे. कई लोगों ने रामबाबू से शिकायत की कि उसे अपनी बेटी पर कंट्रोल करना चाहिए. लोगों की बातें सुन कर वह परेशान हो गया था. जबकि गायत्री यही कहती कि लोगों को तो बातें बनाने की आदत होती है. फालतू में उसे बदनाम कर रहे हैं.

लेकिन एक दिन गायत्री और रंजीत ने रात को मिलने का फैसला किया. गायत्री के घर के सभी लोग सो चुके थे. देर रात को रंजीत उस के यहां पहुंच गया. गायत्री बाहरी गेट खोल कर उसे अंदर ले आई, पर वह दिन उन की मुलाकात के लिए ठीक नहीं रहा.

उस रात गायत्री के भाई टीटू की तबीयत ठीक नहीं थी. वह टौयलेट जाने को उठा तो देखा, मेन गेट की कुंडी खुली हुई है. उसे कुछ शक हुआ तो उस ने गायत्री के कमरे में झांक कर देखा, गायत्री वहां नहीं थी. वह टौयलेट जाने के बजाए तेजी से गेट खोल कर बाहर आया. तभी कोई व्यक्ति छत से कूद कर भाग गया. टीटू भाग कर अंदर आया तो देखा, गायत्री कमरे में थी.

‘‘तू कहां गई थी?’’ टीटू ने उस से पूछा.

‘‘मैं तो यहीं थी भैया, क्यों क्या हुआ आप कुछ परेशान से दिख रहे हैं?’’ गायत्री ने कहा.

टीटू की समझ में नहीं आ रहा था कि सच क्या है. कुछ देर पहले गायत्री कमरे में नहीं थी. किसी के छत से कूदने की आवाज भी उस ने सुनी थी, पर देखा किसी को नहीं था. क्या उसे भ्रम हुआ था. पर बाहरी दरवाजे की कुंडी भी खुली हुई थी. उस की समझ में कुछ नहीं आ रहा था. वह वहां से चुपचाप चला गया.

गुपचुप खेला जाने लगा खेल

गायत्री ने राहत की सांस ली. वह जानती थी कि अगर भाई ने रंजीत को देख लिया होता तो उस की खैर नहीं थी. अगले दिन उस ने रंजीत को फोन पर सारी बात बताई और सतर्क रहने को कह दिया. इधर टीटू को लगने लगा था कि कुछ तो है जो वह देख नहीं पा रहा, जबकि लोग देख रहे हैं. बहन पर उस का शक पक्का होने लगा था.

अब वह गायत्री पर गहरी नहर रखने लगा. गायत्री भी मन ही मन डर गई थी. इधर टीटू ने एक दिन मां से कहा कि वह बहन को ले कर काफी चिंतित है. अगर कोई ऊंचनीच हो गई तो कहीं के नहीं रहेंगे. लेकिन मां ने कहा, ऐसी कोई बात नहीं है, गायत्री ऐसी लड़की नहीं है.

एक दिन टीटू ने खुद गायत्री को रंजीत के साथ देख लिया. वह उस के साथ बाइक पर थी. टीटू जब घर आया तो उस ने देखा गायत्री घर पर ही थी. उस ने उस से पूछा कि अभी कुछ देर पहले वह कहां थी.
गायत्री ने कहा मैं तो अपनी सहेली के घर गई थी. टीटू को लगा कि वह झूठ बोल रही है. लिहाजा उस ने उस की पिटाई कर दी और कहा, ‘‘आइंदा अगर मैं ने तुझे किसी के साथ देखा तो जान से मार दूंगा.’’

मां को भी लगने लगा कि गायत्री कुछ तो गड़बड़ कर रही है. जब देखो तब बाहर भागने की कोशिश करती है. इसलिए मां ने भी उस से कहा, ‘‘आज से तेरा घर से बाहर जाना बंद, अब घर का काम सीख, वरना ससुराल जा कर हमारी बेइज्जती कराएगी.’’

‘‘मैं क्या कोई कैदी हूं मां, जो मुझे बांध कर रखोगी. आखिर मैं ने किया क्या है.’’ गायत्री ने कहा तो टीटू ने उसे कस कर तमाचा जड़ दिया, ‘‘तू क्या समझती है, हम अंधे हैं.’’

गायत्री रोती हुई कमरे में चली गई और उस ने मौका देख कर रंजीत को सारी बात बता दी. उस ने कहा कि जल्दी कुछ सोचो, वरना ये लोग हमें अलग कर देंगे.

अगले दिन टीटू ने रंजीत को रास्ते में रोक कर कहा, ‘‘तू गायत्री का पीछा करना छोड़ दे वरना बुरा होगा.’’ रंजीत ने टीटू को समझाने की कोशिश की कि उसे शायद कोई गलतफहमी हुई है.

गायत्री और रंजीत की हकीकत आई सामने

इधर रंजीत ने प्रेमिका से मिलने का एक उपाय खोज लिया. उस ने कैमिस्ट से नींद की गोलियां खरीद कर गायत्री को देते हुए कहा कि वह रात के खाने में कुछ गोलियां मिला दिया करे. फिर दोनों बेखौफ हो कर मिला करेंगे. गायत्री ने अब रात का खाना बनाने की जिम्मेदारी ले ली. इस के बाद वह जब अपने प्रेमी से मिलने का प्रोग्राम बना लेती तो खाने में नींद की गोलियां मिला देती. पूरा परिवार गोलियों के असर से गहरी नींद में सो जाता लेकिन सुबह जब वे लोग उठते तो सब का सिर भारी होता.

एक दिन गायत्री की मां रामश्री की रात को नींद खुल गई. उस दिन मां ने गायत्री और रंजीत को रंगे हाथों पकड़ लिया. इस पर घर वालों ने गायत्री की पिटाई कर दी. इस के बाद गायत्री के लिए रिश्ते की तलाश होने लगी. आखिर उन्होंने गायत्री की शादी संजीव से कर के राहत की सांस ली. हालांकि गायत्री ने इस शादी का विरोध किया था लेकिन घर वालों ने उस की एक नहीं सुनी थी.

बेटी की शादी के बाद सब निश्चिंत थे, लेकिन शादी के बाद भी गायत्री के नाजायज संबंध रंजीत से बने रहे. एक दिन रंजीत उस की ससुराल भी पहुंच गया. गायत्री ने उसे अपना दूर का रिश्तेदार बताया. ससुराल वालों ने भी मान लिया, लेकिन बाद में दूर के इस रिश्तेदार का कुछ ज्यादा ही आनाजाना होने लगा तो ससुराल वालों ने आपत्ति जताई.

गायत्री नहीं चाहती थी कि यह बात मायके वालों तक जाए. अत: उस ने अब अपना पुराना फारमूला अपनाया. वह ससुरालियों को भी रात के खाने में नींद की गोलियां देने लगी. इस तरह वह ससुराल में भी बेखौफ इश्क लड़ाती रही. गायत्री यह जानती थी कि ऐसा हमेशा नहीं चल सकता.

अब संजीव को भी उस पर शक होने लगा था. उस ने साफ शब्दों में कहा कि अगर अब कभी उस ने रंजीत को घर में देखा तो बुरा होगा. गायत्री पर ससुराल में भी लगाम लगनी शुरू हो गई तो वह परेशान हो उठी. उसे अपना पति ही दुश्मन लगने लगा.

एक दिन गायत्री ने तय किया कि संजीव से छुटकारा पाने के बाद ही वह प्रेमी से बेखौफ मिल सकती है. इस बारे में उसे रंजीत से बात की. दोनों ने तय किया कि संजीव को ठिकाने लगा कर वे कहीं दूर जा कर दुनिया बसा लेंगे.

गायत्री को शादी के डेढ़ साल बाद भी बच्चा नहीं हुआ था. गायत्री ने एक दिन अपनी सास से कहा कि एटा में एक अच्छा डाक्टर है. उस के इलाज से कई औरतों को बच्चा हुआ है. गायत्री ने सास से अपना इलाज उसी डाक्टर से कराने की बात कही. सास ने सोचा, अगर बच्चा हो गया तो गायत्री का मन भी घर में रमने लगेगा. अत: उस ने एटा के डाक्टर से इलाज कराने की इजाजत दे दी. गायत्री को कोई इलाज वगैरह नहीं कराना था, बल्कि यह उस का पति को ठिकाने लगाने का एक षड्यंत्र था.

लिखी जाने लगी हत्या की पटकथा

अब गायत्री का खुराफाती दिमाग काम करने लगा. उस ने पति के नाम मौत का वारंट जारी कर दिया और इस के लिए 13 मई, 2018 का दिन भी तय कर दिया. मौत की इस दस्तक से पूरा परिवार बेखबर था. पूरे घटनाक्रम की कहानी मोबाइल पर तय हो गई थी.

अपने इस काम में रंजीत ने रिजौर के ही रहने वाले अपने दोस्त राजेश उर्फ पप्पू को भी मिला लिया.

13 मई को गायत्री अपने पति संजीव के साथ बाइक नंबर यूपी 83एएल 6985 से एटा के लिए निकली. उस ने प्रेमी रंजीत को अपने एटा जाने की सूचना दे दी. रंजीत अपने दोस्त राजेश के साथ रिजौर से एटा पहुंच गया. इस के बाद न तो बहू और न ही बेटा घर वापस लौटे.

शाम तक जब दोनों घर नहीं लौटे तो पूरा परिवार चिंतित हो गया. उन्होंने एका थाने के थानाप्रभारी जितेंद्र सिंह भदौरिया को सूचना दे दी और अपने सभी रिश्तेदारों से भी फोन द्वारा पूछा. उन्होंने गायत्री के घर वालों को भी बता दिया था.

दोनों का फोन भी स्विच्ड औफ था. रोरो कर घर वालों का बुरा हाल था. इधर मायके वाले परेशान थे कि कहीं गायत्री ने ही तो कुछ नहीं कर डाला. गायत्री और संजीव के गुम होने की सूचना अन्य थानों को भी दे दी गई थी.

18 मई, 2018 को रिजौर के चौकीदार रमेश को किसी ने बताया कि कुरीना दौलतपुर मोड़ के पास जैन फार्महाउस के खेत में एक युवक की लाश पड़ी हुई है. चौकीदार ने तुरंत इस की सूचना रिजौर के थानाप्रभारी जितेंद्र सिंह भदौरिया को दी. थानाप्रभारी तुरंत मौके पर पहुंचे.

उन्हें वहां एक युवक की लाश मिली, जिस की गला रेत कर हत्या की गई थी. मौके पर काफी भीड़ इकट्ठा हो गई थी लेकिन शव को कोई नहीं पहचान पाया. कुछ दूरी पर पुलिस को एक मोबाइल फोन मिला जिस में मिले नंबर पर काल की गई तो पता चला कि मोबाइल रंजीत नाम के व्यक्ति का है. लेकिन उस के परिवार वालों ने जब लाश देखी तो कहा कि वह उन का बेटा नहीं है.

रंजीत और गायत्री की हकीकत आई सामने

जब लाश रंजीत की नहीं थी तो उस का मोबाइल वहां क्यों मिला. यह बात कोई नहीं समझ पा रहा था. इसी बीच सोशल मीडिया पर लाश का फोटो वायरल हो गया तो सोनेलाल ने एका थाने से संपर्क किया. पता चला कि जैन फार्महाउस रिजौर में मिलने वाली लाश उन के बेटे संजीव की है. संजीव के घर वाले समझ गए कि जरूर इस हत्या में गायत्री का हाथ है. उन्होंने रिजौर थानाप्रभारी को सारी बात बता दी.
गायत्री का भाई और पिता भी रिजौर आ गए. उन्हें विश्वास ही नहीं हो रहा था कि गायत्री ऐसा कर सकती है. मौके पर संजीव की बाइक भी बरामद हो गई थी, लेकिन गायत्री का कोई अतापता नहीं था.

रिजौर थानाप्रभारी ने मुखबिरों का जाल फैला दिया. पुलिस को गायत्री और रंजीत के प्रेम संबंधों का भी पता चल चुका था. रंजीत भी घर से गायब था. अत: अब पुलिस उन दोनों की तलाश में लग गई. अगले दिन संजीव की पोस्टमार्टम रिपोर्ट आ गई. जिसे देख कर पुलिस चौंक गई. पोस्टमार्टम रिपोर्ट में पाया गया कि युवक ने नशे का सेवन किया था. पूछताछ करने पर पता चला कि संजीव तो नशा करता ही नहीं था.

इसी बीच 18 मई, 2018 को मुखबिर की सूचना पर पुलिस ने प्रेमी युगल को बख्शीपुर तिराहे से गिरफ्तार कर लिया. दोनों किसी वाहन का इंतजार कर रहे थे. थाने ला कर गायत्री और रंजीत से पूछताछ की गई. गायत्री ने बताया कि वह तो रंजीत से प्यार करती थी. उसे जबरन प्रेमी से दूर कर के संजीव के गले बांध दिया गया. इसलिए उस ने उस से छुटकारा पाने का निश्चय कर किया. उस ने बताया कि उस ने रंजीत से पूर्व में शादी कर ली थी लेकिन पुलिस को वह शादी की कोई साक्ष्य नहीं दे पाई.

रंजीत ने भी अपना गुनाह कबूल करते हुए कहा कि पिछले 2-3 सालों से वह और गायत्री एकदूसरे से प्यार करते थे और शादी भी करना चाहते थे लेकिन गायत्री के घर वाले इस के लिए राजी नहीं हुए. गायत्री की शादी के बाद भी वे दोनों अलग नहीं रह पाए और आखिर संजीव को रास्ते से हटाने का फैसला कर लिया.

गायत्री के प्यार की भेंट चढ़ा संजीव

उस दिन जब गायत्री अपने पति के साथ एटा पहुंची तो रास्ते में उस ने बाइक रुकवाई. मौका पा कर वह बोतल में भरे पानी में नींद की गोलियां मिला चुकी थीं. वही पानी उस ने पति संजीव को पीने को दिया. जिस जगह पर बैठ कर उस ने पानी पिया था कुछ ही देर में वह वहीं पर बेहोश हो गया.

तभी रंजीत अपने दोस्त के साथ वहां पहुंच गया. राजेश ने संजीव की बाइक संभाली और वह और गायत्री बेहोश हो चुके संजीव को आटो में डाल कर कुरीला गांव के पास दौलतपुर मोड़ पर ले आए. आटो वाले को पैसे दे कर उन्होंने वापस भेज दिया.

तभी राजेश भी वहां आ गया, फिर वे लोग संजीव को जैन फार्म हाउस के खेतों में ले आए. जहां गायत्री ने खुद चाकू से अपने पति का गला रेत दिया. इस के बाद राजेश अपने घर चला गया और वह दोनों एटा घूमते रहे. दोनों दिल्ली भाग जाना चाहते थे पर पैसों का इंतजाम करना था, इस से पहले कि वे एटा छोड़ पाते पुलिस के हत्थे चढ़ गए.

गायत्री के मायके वालों को जब पता चला कि उन की बेटी ने खुद अपना सुहाग मिटा डाला है तो वे हैरान रह गए. उन्होंने कहा कि अब गायत्री से उन का कोई संबंध नहीं है. उसे उस की करनी की सजा मिलनी ही चाहिए.

संजीव के घर वाले दुखी हैं, उन्होंने तो सोचा तक नहीं था कि वह अपने सीधेसादे बेटे को खो देंगे. पुलिस ने भादंवि की धारा 302, 120बी के अंतर्गत तीनों को गिरफ्तार कर न्यायालय में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक उन की जमानत नहीं हुई थी.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें