मनपसंद: मेघा ने परिवार के प्रति कौनसा निभाया था फर्ज- भाग 1

मेघा सही स्थिति का आकलन कर पाने की स्थिति में नहीं है. मां को देखती है तो कलेजा कट के रह जाता है वहीं रिश्तेदारों की चाशनी में लिपटी बेतुकी सलाहें सुनती है तो कटे कलेजे को सिल कर ढाल बनाने को जी चाहता है उस का.

मेघा के लिए आने वाली परिस्थितियां आसान नहीं होंगी, इस का एहसास उसे बखूबी है. लेकिन इन से पार पाने की कोई रणनीति उस के दिमाग में अभी नहीं आ रही है. उस की मां तो साधारण घरेलू महिला रही हैं, पेट के रास्ते से पति के दिल में उतरने की कवायद से आगे कभी कुछ सोच ही नहीं पाईं. पता नहीं वे खुद नहीं सोच पाई थीं या फिर समाज ने इस से अधिक सोचने का अधिकार उन्हें कभी दिया ही नहीं था. जो कुछ भी हो, अच्छीभली गृहस्थी की गाड़ी लुढ़क रही थी. कोई भी कहां जानता था कि ऊंट कभी इस करवट भी बैठ सकता है. लेकिन अब तो बैठ ही चुका है. और यही सच है.

राहत की बात यह थी कि पिता सरकारी कर्मचारी थे और सरकार की यही अदा सब को लुभाती भी है कि चाहे परिस्थितियां कितनी भी प्रतिकूल हो जाएं लेकिन सरकार अपने सेवारत कर्मचारी और उस के बाद उस के आश्रितों का अंतिम समय तक साथ निभाती है. लिहाजा, परिवार के किसी एक सदस्य को अनुकंपा के आधार पर नौकरी मिल ही जाएगी. और यही नौकरी उन के आगे की लंगड़ाती राह में लकड़ी की टेक बनेगी.

15 बरस की छुटकी माला और 20 साल की मेघा. मां को चूंकि दुनियादारी की अधिक समझ नहीं थी और माला ने अभी अपनी स्कूली पढ़ाई भी पूरी नहीं की है, इसलिए यह नौकरी मेघा ही करेगी, यह तय ही था लेकिन मेघा जानती थी कि परिवार की जिम्मेदारी लेना बिना पैरों में चप्पल पहने कच्ची सड़क पर चलने से कम नहीं होगा.

अनुकंपा की नौकरी दोधारी तलवार होती है. एक तो यह एहसास हर वक्त कचोटता है कि यह नौकरी आप को अपनी मेहनत और काबिलीयत की बदौलत नहीं, बल्कि किसी आत्मीय की मृत्यु की कीमत पर मिली है और दूसरे हर समय एक अपराधबोध सा घेरे रहता है कि जाने कर्तव्य ठीक से निभ भी रहे हैं या नहीं. खुद को अपराधबोध न भी हो, तो कुछ नातेरिश्तेदार होते ही इसलिए हैं. उन का परम कर्तव्य होता है कि समयसमय पर सूखने की कोशिश करते घाव को कुरेद कर उसे हरा बनाए रखें. और वे अपना कर्तव्य पूरी निष्ठा से निभाते हैं.

6 महीने बीततेबीतते उतरती हुई गाड़ी फिर से पटरी पर आने लगी थी. एक परिवार ने अपने मुखिया के बिना जीने की कोशिशें शुरू कर दी थीं. मेघा को भी पिता की जगह उन के औफिस में नौकरी मिल गई. जिंदगी ने ढर्रा पकड़ लिया.

फ़िल्मी और किताबी बातों से परे मेघा बहुत ही व्यावहारिक लड़की है. भविष्य को ले कर उस का दृष्टिकोण बिलकुल स्पष्ट था. वह भलीभांति जानती थी कि माला और मां उस की जिम्मेदारी हैं लेकिन इन जिम्मेदारियों के बीच भी वह खुद अपने लिए भी जीने की चाह पाले हुए थी. बीस की हवाई उम्र में उस के भी कुछ निजी सपने थे जिन्हें पूरा करने के लिए वह बरसों इंतजार नहीं करना चाहती थी. उसे पता था कि उम्र निकलने के बाद सपनों का कोई मोल नहीं रहता.

नौकरी के दरमियान ही मंगल उस की जिंदगी में आया जिसे मेघा ने आदर्शों का रोना रोते हुए जाने नहीं दिया बल्कि खुलेदिल से उस का स्वागत किया. मंगल उस का सहकर्मी. मंगल की एकएक खूबी का विस्तार से बखान करने के बजाय मेघा एक ही शब्द में कहती थी- ‘मनपसंद.’ मनपसंद यानी इस एक विशेषण के बाद उस की शेष सभी कमियां नजरअंदाज की जा सकती हैं.

इधर लोगों ने फिल्में और टैलीविजन के धारावाहिक देखदेख कर मेघा की भी त्याग की मूर्ति वाली तसवीर बना ली थी और वे उसे उसी सांचे में फिट देखने की लालसा भी रखते थे. त्याग की मूर्ति यानी पहले छुटकी को पढ़ाएलिखाए. उस का कैरियर बनाए. उस का घर बसाए. तब कहीं जा कर अपने लिए कुछ सोचे. इन सब के बीच मां की देखभाल करना तो उस का कर्त्तव्य है ही. लोगों का दिल ही टूट गया जब उस ने मंगल से शादी करने की इच्छा जताई.

“अभी कहां वह बूढी हो रही थी. पहले छोटी का बंदोबस्त कर देती, फिर अपना सोचती. अब देखना तुम, पैसेपैसे की मुहताज न हो जाओ तो कहना.” यह कह कर कइयों ने मां को भड़काया भी. मां तो नहीं भड़कीं लेकिन मेघा जरूर भड़क गई.

“आप अपना बंदोबस्त देख लीजिए, हमारा हम खुद देख लेंगे,” यह कहने के साथ ही मेघा ने हर कहने वाले मुंह को बंद कर दिया. लेकिन इस के साथ मेघा को बदतमीज और मुंहफट का तमगा मिल गया.

एक मौका और दीजिए : बहकने लगे सुलेखा के कदम – भाग 1

नीलेश शहर के उस प्रतिष्ठित रेस्टोरेंट में अपनी पत्नी नेहा के साथ अपने विवाह की दूसरी सालगिरह मनाने आया था. वह आर्डर देने ही वाला था कि सामने से एक युगल आता दिखा. लड़की पर नजर टिकी तो पाया वह उस के प्रिय दोस्त मनीष की पत्नी सुलेखा है. उस के साथ वाले युवक को उस ने पहले कभी नहीं देखा था.

मनीष के सभी मित्रों और रिश्तेदारों से नीलेश परिचित था. पड़ोसी होने के कारण वे बचपन से एकसाथ खेलेकूदे और पढ़े थे. यह भी एक संयोग ही था कि उन्हें नौकरी भी एक ही शहर में मिली. कार्यक्षेत्र अलग होने के बावजूद उन्हें जब भी मौका मिलता वे अपने परिवार के साथ कभी डिनर पर चले जाते तो कभी किसी छुट्टी के दिन पिकनिक पर. उन के कारण उन दोनों की पत्नियां भी अच्छी मित्र बन गई थीं.

मनीष का टूरिंग जाब था. वह अपने काम के सिलसिले में महीने में लगभग 10-12 दिन टूर पर रहा करता था. इस बार भी उसे गए लगभग 10 दिन हो गए थे. यद्यपि उस ने फोन द्वारा शादी की सालगिरह पर उन्हें शुभकामनाएं दे दी थीं किंतु फिर भी आज उसे उस की कमी बेहद खल रही थी. दरअसल, मनीष को ऐसे आयोजनों में भाग लेना न केवल पसंद था बल्कि समय पूर्व ही योजना बना कर वह छोटे अवसरों को भी विशेष बना दिया करता था.

मनीष के न रहने पर नीलेश का मन कोई खास आयोजन करने का नहीं था किंतु जब नेहा ने रात का खाना बाहर खाने का आग्रह किया तो वह मना नहीं कर पाया. कार्यक्रम बनते ही नेहा ने सुलेखा को आमंत्रित किया तो उस ने यह कह कर मना कर दिया कि उस की तबीयत ठीक नहीं है पर उसे इस समय देख कर तो ऐसा नहीं लग रहा है कि उस की तबीयत खराब है. वह उस युवक के साथ खूब खुश नजर आ रही है.

नीलेश को सोच में पड़ा देख नेहा ने पूछा तो उस ने सुलेखा और उस युवक की तरफ इशारा करते हुए अपने मन का संशय उगल दिया.

‘‘तुम पुरुष भी…किसी औरत को किसी मर्द के साथ देखा नहीं कि मन में शक का कीड़ा कुलबुला उठा…होगा कोई उस का रिश्तेदार या सगा संबंधी या फिर कोई मित्र. आखिर इतनेइतने दिन अकेली रहती है, हमेशा घर में बंद हो कर तो रहा नहीं जा सकता, कभी न कभी तो उसे किसी के साथ की, सहयोग की जरूरत पड़ेगी ही,’’ वह प्रतिरोध करते हुए बोली, ‘‘न जाने क्यों मुझे पुरुषों की यही मानसिकता बेहद बुरी लगती है. विवाह हुआ नहीं कि वे स्त्री को अपनी जागीर समझने लगते हैं.’’

‘‘ऐसी बात नहीं है नेहा, तुम ही तो कह रही थीं कि जब तुम ने डिनर का निमंत्रण दिया था तब सुलेखा ने कह दिया कि उस की तबीयत ठीक नहीं है और अब वह इस के साथ यहां…यही बात मन में संदेह पैदा कर रही है…और तुम ने देखा नहीं, वह कैसे उस के हाथ में हाथ डाल कर अंदर आई है तथा उस से हंसहंस कर बातें कर रही है,’’ मन का संदेह चेहरे पर झलक ही आया.

‘‘वह समझदार है, हो सकता है वह दालभात में मूसलचंद न बनना चाहती हो, इसलिए झूठ बोल दिया हो. वैसे भी किसी स्त्री का किसी पुरुष का हाथ पकड़ना या किसी से हंस कर बात करना सदा संदेहास्पद क्यों हो जाता है? फिर भी अगर तुम्हारे मन में संशय है तो चलो उन्हें भी अपने साथ डिनर में शामिल होने का फिर से निमंत्रण दे देते हैं…दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा.’’

नेहा ने नीलेश का मूड खराब होने के डर से बीच का मार्ग अपना लेना ही श्रेयस्कर समझा.

‘‘हां, यही ठीक रहेगा,’’ किसी के अंदरूनी मामले में दखल न देने के अपने सिद्धांत के विपरीत नीलेश, नेहा की बात से सहमत हो गया. दरअसल, वह उस उलझन से मुक्ति पाना चाहता था जो उस के दिल और दिमाग को मथ रही थी. वैसे भी सुलेखा कोई गैर नहीं, उस के अभिन्न मित्र की पत्नी है.

वे दोनों उठ कर उन के पास गए. उन्हें इस तरह अपने सामने पा कर सुलेखा चौंक गई, मानो वह समझ नहीं पा रही हो कि क्या कहे.

‘‘दरअसल सुलेखा, हम लोग यहां डिनर के लिए आए हैं. वैसे मैं ने सुबह तुम से कहा भी था पर उस समय तुम ने कह दिया कि तबीयत ठीक नहीं है पर अब जब तुम यहां आ ही गई हो तो हम चाहेंगे कि तुम हमारे साथ ही डिनर कर लो. इस से हमें बेहद प्रसन्नता होगी,’’ नेहा उसे अपनी ओर आश्चर्य से देखते हुए भी सहजता से बोली.

‘‘पर…’’ सुलेखा ने झिझकते हुए कुछ कहना चाहा.

‘‘पर वर कुछ नहीं, सुलेखाजी, मनीष नहीं है तो क्या हुआ, आप को हमेंकंपनी देनी ही होगी…आप भी चलिए मि…आप शायद सुलेखाजी के मित्र हैं,’’ नीलेश ने उस अजनबी की ओर देखते हुए कहा.

‘‘यह मेरा ममेरा भाई सुयश है,’’ एकाएक सुलेखा बोली.

‘‘वेरी ग्लैड टू मीट यू सुयश, मैं नीलेश, मनीष का लंगोटिया यार, पर भाभी, आप ने कभी इन के बारे में नहीं बताया,’’ कहते हुए नीलेश ने बडे़ गर्मजोशी से हाथ मिलाया.

‘‘यह अभी कुछ दिन पूर्व ही यहां आए हैं,’’ सुलेखा ने कहा.

‘‘ओह, तभी हम अभी तक नहीं मिले हैं, पर कोई बात नहीं, अब तो अकसर ही मुलाकात होती रहेगी,’’ नीलेश ने कहा.

अजीब पसोपेश की स्थिति में सुलेखा साथ आ तो गई पर थोड़ी देर पहले चहकने वाली उस सुलेखा तथा इस सुलेखा में जमीनआसमान का अंतर लग रहा था…जितनी देर भी साथ रही चुप ही रही, बस जो पूछते उस का जवाब दे देती. अंत में नेहा ने कह भी दिया, ‘‘लगता है, तुम को हमारा साथ पसंद नहीं आया.’’

‘‘नहीं, ऐसी बात नहीं है. दरअसल, तबीयत अभी भी ठीक नहीं लग रही है,’’ झिझकते हुए सुलेखा ने कहा.

बात आईगई हो गई. एक दिन नीलेश शौपिंग मौल के सामने गाड़ी पार्क कर रहा था कि वे दोनों फिर दिखे. उन के हाथ में कुछ पैकेट थे. शायद शौपिंग करने आए थे. आजकल तो मनीष भी यही हैं, फिर वे दोनों अकेले क्यों आए…मन में फिर संदेह उपजा, फिर यह सोच कर उसे दबा दिया कि वह उस का ममेरा भाई है, भला उस के साथ घूमने में क्या बुराई है.

मनीष के घर आने पर एक दिन बातोंबातों में नीलेश ने कहा, ‘‘भई, तुम्हारा ममेरा साला आया है तो क्यों न इस संडे को कहीं पिकनिक का प्रोग्राम बना लें. बहुत दिनों से दोनों परिवार मिल कर कहीं बाहर गए भी नहीं हैं.’’

‘‘ममेरा साला, सुलेखा का तो कोई ममेरा भाई नहीं है,’’ चौंक कर मनीष ने कहा.

‘‘पर सुलेखा भाभी ने तो उस युवक को अपना ममेरा भाई बता कर ही हम से परिचय करवाया था, उसे सुलेखा भाभी के साथ मैं ने अभी पिछले हफ्ते भी शौपिंग मौल से खरीदारी कर के निकलते हुए देखा था. क्या नाम बताया था उन्होंने…हां सुयश,’’ नीलेश ने दिमाग पर जोर डालते हुए उस का नाम बताते हुए पिछली सारी बातें भी उसे बता दीं.

‘‘हो सकता है, कोई कजिन हो,’’ कहते हुए मनीष ने बात संभालने की कोशिश की.

‘‘हां, हो सकता है पर पिकनिक के बारे में तुम्हारी क्या राय है?’’ नीलेश ने फिर पूछा.

‘‘मैं बाद में बताऊंगा…शायद मुझे फिर बाहर जाना पडे़,’’ मनीष ने कहा.

नीलेश भी चुप लगा गया. वैसे नीलेश की पारखी नजरों से यह बात छिप नहीं पाई कि उस की बात सुन कर मनीष परेशान हो गया है. ज्यादा कुछ न कह कर मनीष कुछ काम है, कह कर उस के पास से हट गया. उस दिन उसे पहली बार महसूस हुआ कि दोस्ती चाहे कितनी भी गहरी क्यों न हो पर कुछ बातें ऐसी होती हैं जिन्हें व्यक्ति किसी के साथ शेयर नहीं करना चाहता.

जानें आगे क्या हुआ कहानी के अगले भाग में…

कर्णफूल : क्यों अपनी ही बहन पर शक करने लगी अलीना-भाग 1

जब मैं अपने कमरे के बाहर निकली तो अन्नामां अम्मी के पास बैठी उन्हें नाश्ता करा रही थीं. वह कहने लगीं, ‘‘मलीहा बेटी, बीबी की तबीयत ठीक नहीं हैं. इन्होंने नाश्ता नहीं किया, बस चाय पी है.’’

मैं जल्दी से अम्मी के कमरे में गई. वह कल से कमजोर लग रही थीं. पेट में दर्द भी बता रही थीं. मैं ने अन्नामां से कहा, ‘‘अम्मी के बाल बना कर उन्हें जल्द से तैयार कर दो, मैं गाड़ी गेट पर लगाती हूं.’’

अम्मी को ले कर हम दोनों अस्पताल पहुंचे. जांच में पता चला कि हार्टअटैक का झटका था. उन का इलाज शुरू हो गया. इस खबर ने जैसे मेरी जान ही निकाल दी थी. लेकिन यदि मैं ही हिम्मत हार जाती तो ये काम कौन संभालता? मैं ने अपने दर्द को छिपा कर खुद को कंट्रोल किया. उस वक्त पापा बहुत याद आए.

वह बहुत मोहब्बत करने वाले, परिवार के प्रति जिम्मेदार व्यक्ति थे. एक एक्सीडेंट में उन का इंतकाल हो गया था. घर में मुझ से बड़़ी बहन अलीना थीं, जिन की शादी हैदराबाद में हुई थी. उन का 3 साल का एक बेटा था. मैं ने उन्हें फोन कर के खबर दे देना जरूरी समझा, ताकि बाद में शिकायत न करें.

मैं आईसीयू में गई, डाक्टरों ने मुझे काफी तसल्ली दी, ‘‘इंजेक्शन दे दिए गए हैं, इलाज चल रहा है, खतरे की कोई बात नहीं है. अभी दवाओं का असर है, सो गई हैं. इन के लिए आराम जरूरी है. इन्हें डिस्टर्ब न करें.’’

मैं ने बाहर आ कर अन्नामां को घर भेज दिया और खुद वेटिंगरूम में जा कर एक कोने में बैठ गई. वेटिंगरूम काफी खाली था. सोफे पर आराम से बैठ कर मैं ने अलीना बाजी को फोन मिलाया. मेरी आवाज सुन कर उन्होंने रूखे अंदाज में सलाम का जवाब दिया.मैं ने अपने गम समेटते हुए आंसू पी कर अम्मी के बारे में बताया तो सुन कर वह परेशान हो गईं. फिर कहा, ‘‘मैं जल्द पहुंचने की कोशिश करती हूं.’’

मुझे तसल्ली का एक शब्द कहे बिना उन्होंने फोन कट कर दिया. मेरे दिल को झटका सा लगा. अलीना मेरी वही बहन थीं, जो मुझे बेइंतहा प्यार करती थीं. मेरी जरा सी उदासी पर दुनिया के जतन कर डालती थीं. इतनी चाहत, इतनी मोहब्बत के बाद इतनी बेरुखी… मेरी आंखें आंसुओं से भर आईं.

पापा की मौत के थोड़े दिनों बाद ही मुझ पर कयामत सी टूट पड़ी थी. पापा ने बहुत देखभाल कर मेरी शादी एक अच्छे खानदान में करवाई थी. शादी हुई भी खूब शानदार थी. बड़े अरमानों से ससुराल गई. मैं ने एमबीए किया था और एक अच्छी कंपनी में जौब कर रही थी. जौब के बारे में शादी के पहले ही बात हो गई थी.

उन्हें मेरे जौब पर कोई ऐतराज नहीं था. ससुराल वाले मिडिल क्लास के थे, उन की 2 बेटियां थीं, जिन की शादी होनी थी. इसलिए नौकरी वाली बहू का अच्छा स्वागत हुआ. मेरी सास अच्छे मिजाज की थीं और मुझ से काफी अच्छा व्यवहार करती थीं.

कभीकभी नादिर की बातों में कौंप्लेक्स झलकता था. आखिर 2-3 महीने के बाद उन का असली रंग खुल कर सामने आ गया. उन के दिल में नएनए शक पनपने लगे. नादिर को लगता कि मैं उस से बेवफाई कर रही हूं. जराजरा सी बात पर नाराज हो जाता, झगड़ना शुरू कर देता.

इसे मैं उस का कौंप्लेक्स समझ कर टालती रहती, निबाहती रही. लेकिन एक दिन तो हद ही हो गई. उस ने मुझे मेरे बौस के साथ एक मीटिंग में जाते देख लिया. शाम को घर लौटी तो हंगामा खड़ा कर दिया. मुझ पर बेवफाई व बदकिरदारी का इलजाम लगा कर गंदेगंदे ताने मारे.

कई लोगों के साथ मेरे ताल्लुक जोड़ दिए. ऐसे वाहियात इलजाम सुन कर मैं गुस्से से पागल हो गई. आखिर मैं ने एक फैसला कर लिया कि यहां की इस बेइज्जती से जुदाई बेहतर है.

मैं ने सख्त लहजे में कहा, ‘‘नादिर, अगर आप का रवैया इतना तौहीन वाला रहा तो फिर मेरा आप के साथ रहना मुश्किल है. आप को अपने लगाए बेहूदा इलजामों की सच्चाई साबित करनी पड़ेगी. एक पाक दामन औरत पर आप ऐसे इलजाम नहीं लगा सकते.’’

मम्मीपापा ने भी समझाने की कोशिश की, लेकिन वह गुस्से से उफनते हुए बोला, ‘‘मुझे कुछ साबित करने की जरूरत नहीं है, सब जानता हूं मैं. तुम जैसी आवारा औरतों को घर में नहीं रखा जा सकता. मुझे बदचलन औरतों से नफरत है. मैं खुद ऐसी औरत के साथ नहीं रह सकता. मैं तुझे तलाक देता हूं, तलाक…तलाक…तलाक.’’

और कुछ पलों में ही सब कुछ खत्म हो गया. मैं अम्मी के पास आ गई. सुन कर उन पर तो जैसे आसमान टूट पड़ा. मेरे चरित्र पर चोट पड़ी थी. मुझ पर लांछन लगाए गए थे. मैं ने धीरेधीरे खुद को संभाल लिया. क्योंकि मैं कुसूरवार नहीं थी. यह मेरी इज्जत और अस्मिता की लड़ाई थी.

गुप्त रोग: रूबी और अजय के नजायज संबंधों का कैसे हुआ पर्दाफाश – भाग 1

‘अब छोड़ो भी, जाने दो मुझे. मेरे पति रणबीर का फोन आता ही होगा,” रूबी ने अजय सिंह की बांहों में कसमसाते हुए कहा.

”अच्छा… तो अपने पति के वापस आते ही मुझ से नखरे दिखाने लगी हो तुम,” अजय सिंह ने रूबी के सीने पर हाथ का दबाव बढ़ाते हुए कहा.

“क्या बताऊं, जब से मेरा मरद गुजरात से कमाई कर के लौटा है, तब से वह सैक्स का भूखा भेड़िया बन गया है. रात में भी मुझे सोने नहीं देता,” रूबी ने एक मादक अंगड़ाई लेते हुए कहा.

“तो तुम भी सैक्स के मजे लो, इस में परेशानी की क्या बात है भला?” एक भद्दी सी मुसकराहट के साथ अजय सिंह ने कहा.

”रात में उस का बिस्तर गरम करूं और दिन में तुम्हारे जोश को ठंडा करूं, अरे, मैं एक औरत हूं, कोई ‘सैक्स डौल’ नहीं, और फिर मैं प्यार तो तुम से करती हूं न, मेरा वह तोंद वाला मोटा पति मुझे कतई पसंद नहीं,” यह कह कर रूबी ने अजय सिंह को अपनी बांहों में भर लिया.

तीखे नैननक्श और भरे बदन वाली रूबी पर महल्ले के मनचलों की नजर रहती थी. जब रूबी नाभि प्रदर्शना ढंग से साड़ी पहन कर बाहर निकलती तो लोग फटी आंखों से उसे घूरते रह जाते. अपनी इस खूबसूरती का अच्छी तरह एहसास भी था रूबी को और मौका पड़ने पर वह इस का फायदा उठाने से भी नहीं चूकती थी.

रूबी इस मकान में अकेली रहती थी, जबकि उस के पति को गुजरात में काम के सिलसिले में कई महीनों तक बाहर रुकना पड़ जाता था.

रूबी को अपने पति के मोटे होने से चिढ़ थी, इसलिए उस ने कई बार रणबीर से खुल कर कहा भी, पर उस के पति को पैसे से इतना प्यार था कि वह अपने शरीर पर बिलकुल ध्यान नहीं देता था.

अपने पति की गैरमौजूदगी में जब भी रूबी की तबीयत कुछ खराब होती तो  वह  महल्ले के नुक्कड़ पर बने अस्पताल में दवा लेने चली जाती थी.

तनहाई की मारी हुई जवान और खूबसूरत रूबी की जानपहचान जल्दी ही उस अस्पताल में काम करने वाले कंपाउंडर अजय सिंह से हो गई.

रूबी और अजय सिंह एकदूसरे से प्यार करने लगे. रूबी को एक आदमी का सहारा मिला, तो वह और भी निखर गई.

अजय सिंह का डाक्टर जब कभी भी अस्पताल से बाहर कहीं जाता, तो अजय सिंह रूबी को फोन कर के अस्पताल में बुला लेता. दोनों साथ में ही खातेपीते और अस्पताल में ही जिस्मानी सुख का मजा भी लेते.

दोनों की जिंदगी मजे से गुजर रही थी, पर इसी बीच रूबी के पति रणबीर के गुजरात से वापस लौट आने से उस की आजादी पर ब्रेक सा लग गया था.

अगले दिन रूबी ने भरे गले से अजय सिंह को फोन कर के बताया कि वह अब उस से मिलने नहीं आ पाएगी, क्योंकि उस का पति रणबीर उसे ले कर हमेशा ही बिस्तर पर पड़ा रहता है और पोर्न फिल्में दिखा कर अपनी ‘सैक्स फैंटेसी’ पूरी करने के लिए उस पर दबाव डालता रहता है.

रूबी को उस का पति परेशान कर रहा था, यह बात अजय सिंह को अच्छी नहीं लग रही थी. रूबी का पति उसे एक दुश्मन की तरह लग रहा था.

एक तो रूबी से दूरी अजय सिंह को सहन नहीं हो रही थी, ऊपर से ये बातें सुन कर अजय सिंह को गुस्सा आ रहा था, इसलिए मन ही मन अजय सिंह रूबी के पति को उस से दूर रखने के लिए कुछ ऐसा प्लान सोचने लगा, जिस से सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे.

फिर एक दिन अजय सिंह ने रूबी को अस्पताल में बुलाया. अस्पताल आते ही रूबी ने कहा, ”बड़ी मुश्किल से आ पाई हूं, जल्दी से बताओ कि क्या बात है?”

”यह लो, यह एक किस्म का तेल है, जिस में मैं ने कई तरह की दवाएं मिला रखी हैं… इस तेल को तुम्हें अपने पति के प्राइवेट पार्ट यानी अंग पर मलना है,” अजय सिंह ने एक छोटी सी शीशी रूबी की ओर बढ़ाते हुए कहा.

अजय सिंह की बातें सुन कर रूबी चौंक पड़ी थी.

”पर, इस से भला क्या होगा?” रूबी ने पूछा.

”मैं ने इस तेल में कुछ ऐसे कैमिकल मिलाए हैं, जिन का पीएच मान बहुत कम होता है और यदि कम पीएच मान वाली चीजों को चमड़ी पर 2-4 दिन तक लगाया जाए, तो चमड़े पर हलका घाव या इंफैक्शन हो सकता है,” अपनी आंखों को शरारती अंदाज में दबाते हुए अजय सिंह ने कहा.

”ओह, इस का मतलब है कि इसे लगाते ही रणबीर को इंफैक्शन हो जाएगा और फिर वह मुझे सैक्स के लिए तंग नहीं करेगा. पर, फिर यह तेल मेरे हाथ पर भी घाव बना सकता है न,” रूबी ने अपनी घबराहट दिखाई.

”वैरी स्मार्ट, यह काम तुम दस्ताने पहन कर करोगी, ये लो ग्लव्स.”

”पर, इस तरह से तो रणबीर को मुझ पर शक हो जाएगा,” रूबी ने शक जाहिर करते हुए पूछा, तो अजय सिंह खीज उठा, “उफ्फ, बहुत ही नासमझ हो. तुम्हें मोटे पति के साथ न सोना पड़े, इस का एकमात्र यही रास्ता था… अब आगे का सफर कैसे तय करना है, वह सब तुम्हें सोचना है.”

”ठीक है बाबा… मैं ही कुछ सोचती हूं,” कहते हुए रूबी ने तेल की शीशी अपने बैग में रख ली.

रोज रात की तरह रणबीर फिर से रूमानी होने लगा, तो रूबी ने महीना होने का झूठ बोला. इस पर रणबीर ने बुरा सा मुंह बना लिया.

”अरे, अब तुम नाराज मत हो, मेरे पास तुम्हें खुश करने के और भी बहुत से तरीके हैं, मैं तुम्हारे पैरों में तेल से मसाज कर देती हूं, तुम्हें अच्छी नींद आ जाएगी,” कह कर रूबी ने रणबीर की आंखों पर एक दुपट्टा बांध दिया.

रणबीर मन ही मन कल्पना के गोते लगाने लगा कि न जाने उस की पत्नी उस के साथ क्या करने जा रही है. इस समय वह अपनेआप को किसी इंगलिश फिल्म का हीरो समझ रहा था.

रणबीर को लिटा कर रूबी ने हाथों में ग्लव्स पहन लिए और उस की टांगों पर चढ़ कर बैठ गई. रणबीर के पैरों और घुटनों में सादा यानी बिना मिलावट वाला तेल लगाया, जबकि अजय सिंह के द्वारा दिए गए तेल को रणबीर के प्राइवेट अंग में लगा कर धीरधीरे मालिश करने लगी.

रणबीर आंखें बंद कर के आनंद के सागर में गोते लगा रहा था, क्योंकि इस मसाज से एक अजीब सा असर हो रहा था उसे.

”रूबी, तुम ने कल जिस तेल से मसाज की थी… मुझे बहुत अच्छी लगी. तुम आज भी ठीक वैसी ही मसाज देना,” रणबीर ने सुबह उठते ही कहा, जिस पर रूबी मुसकरा कर रह गई.

रणबीर ने 3-4 दिन ये मसाज करवा कर मजा लिया, पर उस बेचारे को क्या पता था कि उस के साथ क्या होने

वाला है.

एक दिन सुबह जब रणबीर सो कर उठा, तो उस के अंग में हलकी सी जलन हो रही थी. उस ने ध्यान दिया कि अंग पर लाललाल दाने हैं, जिस में खुजली भी हो रही थी. दानों को खुजला भी दिया था रणबीर ने, जिस के चलते ऊपर की चमड़ी से हलका सा खून निकलने लगा था.

”रूबी, जब से तुम ने मेरे अंग पर मसाज की है, तब से वहां एलर्जी सी हो गई है, देखो तो क्या हाल हो गया है मेरा,” रणबीर ने शिकायती लहजे में रूबी से कहा.

”देखिए, इस में मेरी कोई गलती नहीं है, आप महीनों घर से बाहर रहते हैं. पत्नी का साथ आप को नसीब नहीं होता. ऐसे में धंधेबाज औरतों से संबंध भी आप जरूर ही बनाते होंगे, आप को किसी भी तरह का गुप्त रोग होना तो लाजिमी ही है,” रूबी ने नाकभौं सिकोड़ते हुए उपेक्षित लहजे में कहा.

अपनी पत्नी से रणबीर को हमदर्दी की उम्मीद थी, पर उसे तो नफरत मिल रही थी.

15 अगस्त स्पेशल: फौजी के फोल्डर से एक सैनिक की कहानी – भाग 1

कैप्टन राघव सर्जिकल स्ट्राइक को ले कर टैलीविजन पर चल रही बहस और श्रेय लेने की होड़ से ऊब कर, अपना लैपटौप खोल कर बैठ गए. महीनेभर की भागादौड़ी से फुरसत पा कर, आज यह शाम का समय मिला है कि वे कुछ अपने मन की करें. उड़ी आतंकवादी घटना के बाद से ही मन विचलित हो गया था. मगर यह पूरा माह अत्यंत व्यस्त था, इसलिए जागते समय तो नहीं, किंतु सोते समय अवश्य उन मित्रों के चेहरे नजरों के सामने तैरने लगते थे जो इस साल आतंकियों से लोहा लेते शहीद हो गए थे. आज वे लैपटौप में उस पिक्चर फोल्डर को खोल कर बैठ गए जो उन्होंने एनडीए में ट्रेनिंग के दौरान फोटोग्राफर से लिया था. उस फोटोग्राफर को भी केवल खास मौकों पर अंदर आ कर फोटो लेने की इजाजत मिलती थी, वरना वहां कैमरा और मोबाइल रखने की किसी भी कैडेट को इजाजत नहीं थी.

12वीं की परीक्षा के बाद जहां उस के सहपाठी इंजीनियरिंग और मैडिकल कालेज के परिणामों का इंतजार कर रहे थे वहीं वह बेसब्री से एनडीए के परिणाम का इंतजार कर रहा था. हालांकि मां की खुशी के लिए यूपीटीयू के अलावा उस ने और भी अन्य प्रतियोगी परीक्षाएं भी दी थीं मगर इंतजार एनडीए के परिणाम का ही था. यदि लिखित में पास हो गया तो फिर एसएसबी (साक्षात्कार) के लिए तो वह जीजान लगा देगा.

मां को तो पूरा विश्वास था कि वह इस में पास नहीं हो सकता, इसलिए उन्होंने उस परीक्षा को एक बार में ही पास करने की शर्त रख दी थी. उस दिन नीमा मौसी ने मां से बोला भी था, ‘तुम अपने इकलौते बेटे के सेना में जाने से रोकती क्यों नहीं?’ और मां ने कहा, ‘अरे, परीक्षा दे कर उसे अपना शौक पूरा कर लेने दो. परीक्षा में लाखों बच्चे बैठते हैं, लेकिन सिलैक्शन तो 3-4 सौ का ही हो पाता है. कौन सा इस का हो ही जाएगा. मैं तो यही सोच कर खुश हूं कि इसे ही लक्ष्य मान परीक्षा की तैयारियां तो करता है वरना यह भी सड़क पर अन्य नवयुवकों के संग बाइक ले कर स्टंट करता घूमता.’

मौसी चुप हो गईं. मां व मौसी की ये बातें सुन कर मैं जीजान से तैयारी में जुट गया कि कहीं पहली बार में पास नहीं कर पाया तो फिर मां को बहाना मिल जाएगा सेना में न भेजने का. मां हमेशा फुसलातीं, ‘बेटा, सरकारी इंजीनियरिंग कालेज न मिले तो कोई बात नहीं, तुम यहीं लखनऊ के ही किसी प्राइवेट इंजीनियरिंग कालेज में ऐडमिशन ले लेना, घर से ही आनाजाना हो जाएगा.’ मैं कहता, ‘मां, मुझे इंजीनियरिंग करनी ही नहीं, आप समझती क्यों नहीं.’

सोमेश भी तो यही कहता था. यहां आने वाले हर दूसरे कैडेट की यही कहानी है. किस की मां अपने कलेजे के टुकड़े को गोलियों की बौछार के आगे खड़ा कर खुश होगी. सोमेश तो अपने मातापिता की इकलौती औलाद था. उस की मां तो एनडीए में ऐडमिशन के समय साथ ही आई थी. एक हफ्ते पुणे में रुकी रही कि शायद सोमेश का मन बदल जाए तो वे उसे अपने साथ ले कर वापस लौट जाएंगी. भले ही अब जुर्माना भी क्यों न भरना पड़े पर सोमेश न लौटा और उस की मां ही लौट गईं. उस दिन वे कितना रो रही थीं, शायद उन के मन को आभास हो गया था.

मैं और सोमेश एक ही हाउस में थे. शुरू के 3 महीने तो सब से कठिन समय था. कब आधी रात को दौड़ना पड़ जाए, कब तपतपाती गरमी में सड़क पर बदन को रोल करना पड़ जाए, कब दसियों बार रस्सी पर अपडाउन करने का फरमान आ जाए और कब किस समय कौन सा कानून भंग हो जाए, पता ही नहीं चलता था. मगर सजा देने वाले सीनियर के पास पूरा हिसाब रहता और उस सीनियर को सजा देने का हक उस के सीनियर का रहता. हर 6 महीने में एक नया बैच जौइन करता और उसी के साथ अगला बैच सीनियर बन जाता और सब से पुराना बैच, 3 साल पूरे कर पासिंगआउट परेड कर रवाना हो जाता आर्मी गु्रप आइएमए उत्तराखंड के देहरादून में, नेवी ग्रुप अलगअलग अपने जहाज में और एयरफोर्स ग्रुप एयरफोर्स एकेडमी, बेंगलुरु में. बस, यहीं से सभी कैडेट जैंटलमैन में बदल अपनी अलग औफिसर ट्रेनिंग के लिए एकदूसरे से विदा लेते.

प्रवेश के प्रांरभिक 3 महीने सब से कठिन होते. उस समय में जो कैडेट एनडीए में टिक गया, वह फिर जिंदगीभर अपने कदम पीछे नहीं कर सकता. मां की सहेली का भाईर् यहां से महीनेभर में ही वापस चला गया था. तभी से उन के मन में एक भयंकर तसवीर बन गई थी, उसी कठोर प्रशिक्षण के बारे में सुन कर ही वे मुझे यहां नहीं भेजना चाहती थीं. पर वैसे भी, किस की मां खुशीखुशी भेजती है.

सोमेश ने बताया था कि जब वह पहले सैमेस्टर के बाद घर गया तो मां के सामने शर्ट नहीं उतारता था कि वे कहीं पीठ पर बने निशान न देख लें जो डामर रोड पर रोलिंग करने से बन गए थे, वरना वे फिर से हायतौबा मचा कर मुझे वापस ही न आने देतीं. यही हाल मेरी मां का भी था. हर वक्त यही कहती थीं, ‘कितना चुप रहने लगा है, कुछ बताता क्यों नहीं वहां की बात. पहले तो बहुत बोलता था, अब क्या हुआ?’ क्या बोलता मैं, अगर यहां की कठिन दिनचर्या बताता तो फिर वे मुझे भूल कर भी वापस न आने देतीं.

बहन सुनीति बोली थी, ‘मैं ने सुना, 3 साल में आप को वहां से जेएनयू की डिगरी मिलेगी,’

‘हां, तो,’ मैं ने लापरवाही से कहा.

‘वाह, पुणे में रहते हुए, आप को जेएनयू की डिगरी मिल जाएगी, दिल्ली भी जाना नहीं पड़ेगा,’ सुनीति चहकी थी.

‘हां, हम जेएनयू नहीं, बल्कि जेएनयू हमारे पास आएगा,’ मैं ने उसे चिढ़ाया था.

‘अजी, मजे हैं आप के भाई,’ सुनीति बोली.

‘तू भी आ जा, तुझे भी मिल जाएगी,’ मैं ने कहा.

‘न भाई न, मेरे अंदर इतना स्टैमिना नहीं है कि मैं मीलों दौड़ लगाऊं. वह भी पीठ पर वजन लाद कर. न सोने का ठिकाना, न खाने का. इस के बजाय मैं अपनी डिगरी मौज काटते हुए ले लूंगी. आप की तरह मुझे अपने शरीर को कष्ट नहीं देना. इस से कई गुना मस्त हमारी यूनिवर्सिटी है जहां सालभर नारेबाजी, धरना, प्रदर्शन और फैशन परेड ही चलती रहती है.’

बहन और भाई के रिश्ते में प्यार है, तकरार भी. एक को कुछ कष्ट हो तो  दूसरे को बरदाश्त नहीं हो पाता. वह मेरी कठिन ट्रेनिंग से हमेशा विचलित हो जाती. जब मैं ने उस से कहा, ‘अब मैं कमांडो ट्रेनिंग पर भी जाऊंगा,’ तो गुस्सा हो गई. ‘क्या जरूरत है इतनी कठिन ट्रेनिंग पर जाने की, आप शांति से अपनी जौब करते रहो, अब और कहीं जाने की जरूरत नहीं.’

शुरुआत में सोमेश तो फिर भी बहुत स्ट्रौंग था पर मोहित अकसर उदास हो जाता था. उस की स्थिति डावांडोल होने लगी थी. एक दिन कहता, ‘घर जाना है’ तो दूसरे ही दिन, ‘यहीं रहना है,’ का राग अलापता. सोमेश उसे समझाबुझा कर मना ही लेता. फिर तो हम तीनों की बहुत अच्छी जमने लगी थी. मोहित हमारा जूनियर था, मगर मौका पा हमारे रूम में झांक ही जाता, ‘सर, कुछ लाना तो नहीं, मैं कैंटीन जा रहा हूं?’

एक दिन आ कर बोला, ‘सर, आ की राखी आ गई?’

‘नहीं, अभी तो बहुत दिन हैं राखी आने के, आ जाएगी, क्यों परेशान हो?’

जानें आगे की कहानी अगले भाग में…

हवस की मारी : रेशमा और विजय की कहानी

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बेरुखी : पति को क्यों दिया ऐश्वर्या ने धोखा

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शिकस्त : शाफिया-रेहान के रिश्ते में दरार क्यों आने लगी

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शिकस्त-भाग 4: शाफिया-रेहान के रिश्ते में दरार क्यों आने लगी

2 दिनों बाद मैं वक्त पर तैयार हो कर बाहर निकली. रेहान को लैटर मिल चुका था. उन्होंने कार का दरवाजा खोला. मैं ने कहा, ‘रेहान, जब रास्ते अलग हो रहे हैं तो फिर साथ जाने का कोई मतलब नहीं है. आप जाइए, मेरी टैक्सी आ रही है, मैं कोर्ट पहुंच जाऊंगी.’

कोर्ट में जज ने हम दोनों की बात ध्यान से सुनी. ‘खुला’ की वजह मेरे मुंह से जान कर जज ने हिकारतभरी नजर रेहान पर डाली और कहा, ‘रेहान साहब, जो कुछ आप कह रहे हैं वह ठीक नहीं है. 11-12 साल की खुशगवार जिंदगी को एक गलत ख्वाहिश के पीछे बरबाद कर रहे हैं. मैं आप दोनों को सोचने के लिए एक हफ्ते का टाइम देता हूं. दूसरी पेशी पर फैसला हो जाएगा.’ रेहान ने सिर झुका लिया.

कोर्ट से आ कर मैं ने टेबल पर बेहतरीन खाना लगाया जो मैं पका कर गई थी. मैं बच्चों से बातें करती रही, फिर गेस्टरूम में आई. पूरे वक्त हमारे बीच खामोशी रही. आबी कुछ कहना चाहती, तो मैं वहां से हट जाती. हफ्ताभर मैं एक से बढ़ कर एक मजेदार खाने बना कर खिलाती रही. रेहान के चेहरे पर फिक्र की लकीरें गहरी हो रही थीं. आखिरी दिन मुझे रोक कर बोले, ‘शाफी, मुझे तुम से कुछ बात करनी है.’ रेहान ठहरे हुए गंभीर लहजे मेें आगे बोले, ‘देखो शाफी, हमारा इतना दिनों का साथ है, मैं तुम्हें तनहा नहीं छोड़ना चाहता. तुम गेस्टरूम में रहो या मैं अलग घर का इंतजाम करवा दूंगा. बच्चों पर मेरा हक है पर तुम चाहो तो अपने साथ रखना. पर हम लोगों से दूर मत जाओ, करीब रहो.’

मैं ने दिल में सोचा, बच्चों की जिम्मेदारी मुझ पर डाल कर तुम दोनों ऐश करो. मैं ने गंभीर लहजे में कहा, ‘रेहान, मैं पहले भी कह चुकी हूं, मुझे आप के किसी एहसान की जरूरत नहीं है. और मैं आप का हक भी नहीं छीनना चाहती. आप के बच्चे आप के पास रहेंगे क्योंकि मैं उन्हें वह ऐशोआराम नहीं दे सकती जो आप के पास मिलेगा. मैं सिर्फ आप के घर, आप की जिंदगी से दूर हो जाऊंगी. मैं क्या करूंगी, कहां रहूंगी, इस की आप फिक्र न करें. यह मेरा सिरदर्द है.’

बेइंतहा ताज्जुब से सब मेरा चेहरा देख रहे थे जिस पर कोई जज्बात न थे, एकदम सपाट व बेजान. बेटा असद बोल उठा, ‘मम्मी, आप के जाने के बाद अच्छेअच्छे खाने कौन बनाएगा?’ असद भी बाप की तरह मतलबी था. उसे खाने की पड़ी थी, मां की परवा न थी. मैं ने कहा, ‘आप की नई मां बनाएगी और खिलाएगी.’ शीरी फौरन बोल पड़ी, ‘पर मम्मी, उन्हें तो कुछ पकाना नहीं आता है.’

मैं ने कहा, ‘तुम्हारे पापा की मोहब्बत में सब सीख जाएगी.’ असद को फिर परेशानी हुई. वह भी बाप की तरह लापरवाह और कामचोर था, आज तक अपने कपड़े उठा कर न रखे थे, न प्रैस किए थे, न अलमारी जमाई थी, न कमरा साफ किया था. सारे काम मैं ही करती थी. वह कह उठा, ‘मम्मी, हमारे सब काम कौन करेगा?’

‘तुम्हारी नई मम्मी करेगी. वह सब संभाल लेगी. वह संभालने में ऐक्सपर्ट है, जैसे आप के पापा को संभाल लिया.’

आज मुझे कोई लिहाज नहीं रहा था. दोनों के चेहरे शर्म से झुके हुए थे. फिर मैं ने बच्चों से कहा, ‘आप दोनों जैसी जिंदगी जीने के आदी हो वह आप के पापा ही बरदाश्त कर सकते हैं, मैं नहीं. पर आप दोनों जब चाहो, मुझ से मिलने आ सकते हो.’

दूसरे दिन सुबह ही सोहा कार ले कर आ गई. उसे देख कर मुझे एक साहस मिल गया. फोन पर रोज बात होती थी. हम दोनों साथ ही कोर्ट गए. आधा घंटे समझाइश व नसीहत के बाद खुला मंजूर हो गया. ज्यादा वक्त इसलिए नहीं लगा क्योंकि दोनों पक्ष पूरी तरह सहमत थे. और रहीम साहब भी कोशिश में साथ थे.

मैं ने घर पहुंच कर रेहान को मुबारकबाद दी. मैं ने अपना सामान पहले ही तैयार कर लिया था. सामान ले कर नीचे उतरी. जेवर के 2 डब्बे रेहान को देते हुए कहा, ‘ये दोनों सैट आप की तरफ से मिले थे. आप की नईर् बीवी को देने के काम आएंगे. आप रखिए, आप का दिया सब छोड़ कर जा रही हूं. मां की तरफ से मिली चीजें ले ली हैं. आप से एक गुजारिश है, अगर किसी मोड़ पर हम मिल जाएं तो मुझे आवाज मत देना.’ मैं ने बच्चों को प्यार किया, गले लगाया, दिल अंदर से बिलख रहा था पर मैं पत्थर बनी रही. आबी आगे बढ़ी. मैं ने उसे नजरअंदाज किया और सोहा के साथ बाहर आ गई.

उन लोगों के सामने एक आंसू आंख से गिरने न दिया, यह मेरी आन और खुद्दारी की हार होती. मैं सोहा के कंधे पर सिर रख बिलख पड़ी. सोहा ने कहा, ‘शाफी, आज जीभर कर रो लो. इस के बाद उस बेवफा इंसान के लिए मैं तुम्हें एक आंसू नहीं बहाने दूंगी.’

सोहा के शौहर राहिल बेहद नेक इंसान थे. उन की मां ने मुझे सगी मां की तरह अपनी आगोश में समेट लिया. उन्हीं के कमरे में मुझे सुकून मिलता. सोहा व उस का बेटा भी खूब खयाल रखते. मोहब्बत और अपनेपन के साए में 4 महीने गुजर गए. राहिल मेरी नौकरी और घर की तलाश में लगे रहे. रकम तो मेरे पास काफी थी. चाचा ने अम्मी का घर बेच कर आधी रकम मेरे खाते में डाल दी थी. सोहा की मल्टीस्टोरी बिल्ंिडग में मुझे सैकंड फ्लोर पर एक अच्छा फ्लैट मिल गया. मैं उस में शिफ्ट हो गई. मेरी कौन्वैंट की पढ़ाई काम आई. मुझे एक अच्छे इंग्लिश मीडियम स्कूल में जौब मिल गई. जिंदगी सुकून से गुजरने लगी. धीरेधीरे जख्म भरने लगे. सोहा की फैमिली का बड़ा साथ था. अम्मा काफी वक्त मेरे पास बितातीं. मुझे एक अच्छी औरत काम के लिए मिल गई. मैं ने उसे घर में रख लिया.

उस दिन छुट्टी थी. मैं बूआ के साथ काम में लगी थी कि डोरबैल बजी. दरवाजा खोला. राहिल के साथ रेहान खड़े थे. मैं हैरान रह गई. अंदर आने को कहा. राहिल रेहान को छोड़ कर लौट गए. मैं ने रेहान को देखा. 2 साल में काफी फर्क आ गया था. चेहरे पर थकान, उम्र व बेजारी साफ झलक रही थी. कुछ बाल उड़ गए थे. बूआ पानी ले आईं. रेहान टूटे लहजे में बोले, ‘शाफी, मैं अपने किए पर बेहद शर्मिंदा हूं. मुझे अपने गलत काम की खूब सजा मिल रही है. बस, मुझे अब माफ कर दो.’

‘क्यों, ऐसा क्या हो गया. आप ने बड़े शौक से, बड़े अरमान से आबी से शादी की थी.’

‘हां, की थी. भूल थी मेरी, अब पछता रहा हूं. आबी बेहद फूहड़, कामचोर और निकम्मी है. काम से तो उस की जान जाती है. कुछ कहो तो कहती है ‘मैं तो पहले से ऐसी हूं तभी तो आप ने मुझ से इश्क किया. सुघड़, सलीकेमंद और घर संभालने वाली तो शाफी आपा थीं. आप ने उन्हें छोड़ कर मुझे क्यों अपनाया? आप तो मेरे ऐब जानते थे. शाफी आपा के सामने आप ही मुझे काम करने से रोकते थे. आप ही मेरे नाजनखरों और अदाओं पर फिदा थे.’

‘शाफी, जब तुम बेहतरीन खाने खिलाती थीं, घर संभालती थीं, सब की खिदमत करती थीं, इश्क एक शगल की तरह लगता. सारी जरूरतें पूरी होते हुए एक नखरीली महबूबा किसे बुरी लगती है? आज ये तल्ख हकीकत खुली कि तुम्हारे बिना घर जहन्नुम है. सारे काम नौकरों के भरोसे हैं. ज्यादातर होटल से खाना आता है. हम ने अपने ऐश की खातिर बच्चों को भी खूब सिर चढ़ाया. अब बेहद बदतमीज हो गए. बहुत ज्यादा मुंहफट. पूरे वक्त आबी से झगड़े होते रहते हैं. मुझे भी काम करने की आदत न थी. जब चीजें तैयार नहीं मिलतीं तो गुस्सा आता है. फिर आबी से लड़ाई हो जाती है. वह भी बराबरी से जबान चलाती है. चीखतीचिल्लाती है. शाफी, जिंदगी अजाब बन गई है. तुम मुझ पर रहम करो. मैं आबी को तलाक दे दूंगा. तुम मेरी जिंदगी में वापस आ जाओ. मैं तुम्हारे बिना नहीं रह सकता.’

मुझे यह एहसास था कि ऐसा होगा. आबी मेरी बहन थी, मैं उस के सारे ऐबों से वाकिफ थी. मैं ने सोचा था कालेज करने के बाद उसे घर के काम की बाकायदा ट्रेनिंग दूंगी. उस के पहले ही उस ने सब तहसनहस कर दिया. मैं ने रेहान की तरफ देखा. वह बेहद थका, टूटा हुआ इंसान लग रहा था.

मैं ने कहा, ‘रेहान, अब यह मुमकिन नहीं. आप से खुला लेने के बाद, आप का बेवफा रूप देखने के बाद मेरे दिल में आप के लिए जरा सी मोहब्बत नहीं है, न ही कोई इज्जत है.

‘मैं किसी कीमत पर आप की जिंदगी में दोबारा नहीं आ सकती. बच्चे एक बार रहीम चाचा के साथ मिलने आए थे. उन्हें मिलने भेज देना, मेहरबानी होगी. आप को अब आने की जरूरत नहीं है.’

नम आखें, झुके कंधे और लड़खड़ाते कदमों से रेहान लौट गए. अपने किए गए गुनाह के अजाब उन्हें ही समेटने थे. उन की बरबाद जिंदगी की खबरें मिलती रहती थीं. बच्चे आ कर मुझ से मिल जाते थे. रेहान को वापस गए भी 7-8 साल हो गए.

मैं 3 दिन पहले सोहा के भाई की बेटी की शादी में उस के साथ गई थी. वह वहीं रुक गई, मैं वहां से लौट रही थी कि आज बरसों बाद आबी को देखा. उसी ट्रेन के उसी कोच में वह भी सफर कर रही थी. उसे देख कर दुख हुआ पर मेरी उस से मिलने या बात करने की जरा भी ख्वाहिश न थी. जब मैं अपने स्टेशन पर उतरी, वह दूसरे गेट पर खड़ी मुझे देख रही थी. उस की आंखों से आंसू बह रहे थे. इन आंसुओं को पोंछने का हक वह मुझ से छीन चुकी थी.

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