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पहेली : कौन था नव्या का कातिल? – भाग 2

इसी उधेड़बुन में वे नव्या के मायके पहुंचे. नव्या के मांबाप फिर मुकुल का नाम ले कर शोर मचाने लगे. राघव ने उन को समझाया.

‘‘देखिए हम मुलजिम को जरूर पकड़ेंगे लेकिन जल्दबाजी किसी निर्दोष को फंसा सकती है, इसलिए हमारा सहयोग कीजिए.’’

नव्या के पिता ये सुन कर शांत हुए. उन्होंने हर तरह से सहयोग देने की बात कही.

राघव ने पूछा, ‘‘नव्या का मुकुल के अलावा किसी से कोई विवाद था?’’

‘‘नहीं इंसपेक्टर साहब.’’ नव्या के पिता बोले, ‘‘उस की तो सब से दोस्ती थी, बैंक में भी सब उस से खुश रहते थे.’’

‘‘और विमल से उस का क्या रिश्ता था?’’ राघव ने उन के चेहरे पर गौर से देखते हुए सवाल किया. वे इस पर थोड़ा अचकचा गए.

‘‘व…वो…वो…दोस्ती थी उस से भी… मुकुल बेकार में शक किया करता था उन के संबंध पर.’’

राघव ने इस समय इस से ज्यादा कुछ पूछना ठीक नहीं समझा. वो वहां से निकल गए. अगले कुछ दिन इधरउधर हाथपैर मारते बीते. उन्होंने नव्या के बैंक जा कर उस के बारे में जानकारियां जुटाईं. सब ने साधारण बातें ही बताई. कोई नव्या और विमल के रिश्तों के बारे में कुछ कहने को तैयार नहीं था.

राघव ने नव्या के उस शाम बैंक से निकलते समय की सीसीटीवी फुटेज निकलवा कर देखी. वह अकेली ही अपनी कार में बैठती दिख रही थी. राघव की अन्य कर्मचारियों से तो बात हुई, लेकिन विमल से मुलाकात नहीं हो सकी, क्योंकि वह नव्या की मौत के बाद से ही छुट्टी पर चला गया था.

उन्होंने उस का पता निकलवाया और अपनी टीम के साथ उस के घर जा धमके. वह उन को देख कहने लगा, ‘‘इंसपेक्टर साहब, मैं खुद बहुत दुखी हूं नव्या के जाने से, पागल जैसा मन हो रहा मेरा, मुझे परेशान मत करिए.’’

विमल की हकीकत क्या थी?

‘‘हम भी आप के दुख का ही निवारण करने की कोशिश में हैं विमल बाबू.’’ राघव ने अपना काला चश्मा उतारते हुए कहा, ‘‘आप भी मदद करिए, हम दोषियों को जल्द से जल्द सलाखों के पीछे डालना चाहते हैं.’’

‘‘पूछिए, क्या जानना चाहते हैं आप.’’ वो सोफे पर निढाल होता बोला. सवालजवाब का दौर चलने लगा. विमल ने बताया कि उस ने उस दिन नव्या को औफिस के बाद अपने घर बुलाया था. लेकिन उस ने मना कर दिया कि पति से झगड़ा और बढ़ जाएगा. वह अपनी कार से निकल गई थी. उस ने अगले दिन किसी पारिवारिक कारण से औफिस न आने की बात की थी. हां, विमल ने भी ये नहीं स्वीकारा कि नव्या से उस की बहुत अच्छी दोस्ती से ज्यादा कोई नाता था.

‘‘ठीक है, विमल बाबू.’’ राघव ने उठते हुए कहा, ‘‘आप का धन्यवाद. फिर जरूरत होगी तो याद करेंगे… बस आप ये शहर छोड़ कर कहीं मत जाइएगा.’’

‘‘जी जरूर.’’

राघव की जीप वहां से चल दी. अब तक इस केस में कुछ भी ऐसा हाथ नहीं लग पाया था जिस से तसवीर साफ हो. उन्होंने अपने मुखबिरों के माध्यम से भी पता लगाना चाहा कि नव्या की हत्या के लिए क्या किसी लोकल गुंडे ने सुपारी ली थी. लेकिन ऐसा भी कुछ मालूम नहीं हो सका. किसी गैंग की भी ऐसी कोई सुपारी लेने की बात सामने नहीं आ पा रही थी.

शाम को राघव घर जाने के लिए निकलने ही वाले थे कि सिपाही ने एक लिफाफा ला कर दिया और बोला, ‘‘साब, ये अभी आया डाक से… लेकिन भेजने वाले का कोई नाम, पता नहीं लिखा.’’

राघव ने लिफाफे को खोला. उस में एक सीडी और चिट्ठी थी. उन्होंने उसे पढ़ना शुरू किया. उस में लिखा था, ‘‘इंसपेक्टर साहब, आप को नव्या के बैंक में जो सीसीटीवी फुटेज दिखाई गई, वो पूरी नहीं थी. विमल ने उस में पहले ही एडिटिंग करा दी थी. नव्या की मौत वाली शाम विमल उस के साथ उस की ही कार में निकला था. आप को इस बात का सबूत इस सीडी में मिल जाएगा.’’

चिट्ठी पढ़ते ही राघव की आंखों में चमक आ गई. उन्होंने जल्दी से उसे अपने लेपटौप पर लगाया. वाकई वीडियो में विमल उस शाम नव्या की कार में अंदर बैठता दिख रहा था. राघव को अपना काम काफी हद बनता लगा. वे सिपाहियों के साथ सीधे विमल के घर पहुंचे. देखा कि वह कहीं जाने के लिए पैकिंग कर रहा था. राघव पुलिसिया अंदाज में उस से बोले, ‘‘कहां चले विमल बाबू? आप को शहर से बाहर जाने को मना किया था न?’’

वो उन्हें वहां पा कर घबरा गया और हकलाने लगा.

‘‘म…मैं क…कहीं नहीं जा रहा. बस सामान सही कर रहा था.’’

‘‘इस की जरूरत अब नहीं पड़ेगी.’’ राघव ने फिर कहा, ‘‘चल थाने, वहीं सब सामान मिलेगा तुझे.’’

विमल कसमसाता रहा, खुद को निर्दोष बताता रहा लेकिन सिपाहियों ने उसे जीप में डाल लिया. लौकअप में राघव के थप्पड़ विमल को चीखने पर मजबूर कर रहे थे. वह किसी तरह बोला, ‘‘सर, मैं ने कुछ नहीं किया, हां मैं उस के साथ निकला जरूर था लेकिन रास्ते में उतर गया था, वो आगे चली गई थी.’’

‘‘तो हम से ये बात छिपाई क्यों?’’ राघव ने उसे कड़कदार 2 थप्पड़ और लगाते हुए पूछा.

‘‘म्म्म मैं घब…घबरा गया था साहब कि कहीं मेरा नाम शक के दायरे में न आ जाए.’’

राघव ने उस के सैंपल लैब में भिजवा दिए जिस से नव्या के गुप्तांगों और कपड़ों पर मिले वीर्य से उस का मिलान करा के जांच की जा सके. रिपोर्ट तीसरे दिन ही आ गई. सचमुच नव्या के जिस्म से जितने लोगों के वीर्य मिले थे, उन में एक विमल से मैच कर गया.

राघव ने मारमार के विमल की देह तोड़ दी. उन्होंने उस से पूछा, ‘‘बोल, बोल तूने नव्या को क्यों मारा?’’

विमल ने खोला भेद, लेकिन अधूरा

‘‘साब मैं ने कुछ नहीं किया.’’ वो जोरजोर से रोते हुए बोला, ‘‘हां मैं ने कार में उस के साथ जिस्मानी संबंध जरूर बनाए थे लेकिन उस को मारा नहीं… मैं सैक्स कर के उतर गया था उस की गाड़ी से.’’

‘‘स्साला.’’ राघव का गुस्सा बढ़ता जा रह था. वे उस पर गरजे, ‘‘रुकरुक के बातें बता रहा है. जैसेजैसे भेद खुलता जा रहा है वैसेवैसे रंग बदल रहा है. तू मुझ से करेगा होशियारी?’’

उन्होंने फिर से मुक्का ताना लेकिन विमल बेहोश होने लगा था. वे उसे वहीं छोड़ कर बाहर निकले.

‘‘इस को तब तक कुरसी से मत खोलना जब तक ये पूरी बात न बता दे.’’ शर्ट पहनतेपहनते उन्होंने सिपाही को आदेश दिया. वहां नव्या के मायके वाले भी आए हुए थे. विमल के बारे में जान कर उन्हें मुकुल पर लगाए अपने आरोपों पर बहुत पछतावा हो रहा था.

‘‘इस ने अपना जुर्म कबूल किया क्या इंसपेक्टर साहब?’’ नव्या के पिता ने जानना चाहा.

‘‘नहीं, अभी तक अपनी बेगुनाही का रोना रो रहा है. चालू चीज लगता है ये.’’ राघव ने लौकअप की ओर देख के उत्तर दिया. नव्या के मांबाप सीधे मुकुल के घर पहुंचे.

‘‘बेटा, हम को माफ कर देना, हम ने आप पर शक किया.’’ नव्या की मां उस से बोली. मुकुल ने धीरे से मुसकरा के सिर हिलाया. तब तक उस की मां चायपानी ले आई थी. कुछ दिन बीत गए. राघव ने विमल से सच जानने के लिए पूरा जोर लगा रखा था लेकिन वह यही दोहराता रहता कि वो निर्दोष है. उस के वकील के आ जाने से अब उस पर सख्ती करना भी मुश्किल लग रहा था.

पहेली : कौन था नव्या का कातिल? – भाग 3

एक रोज राघव थाने में बैठे मोबाइल पर यों ही दोस्तों की पोस्ट्स देख रहे थे कि तभी उन की साली का फोन आया.

‘‘जीजू, मैं ने जिस लड़के के बारे में बताया था आप को, उस के साथ मेरी वीडियो सैल्फी देखी आप ने? आज ही अपलोड की मैं ने.’’

राघव झल्लाए, लेकिन उस से जान छुड़ाने के लिए उस का प्रोफाइल पेज खोला. जैसे ही उन्होंने उस की सैल्फी देखी, उस की बैकग्राउंड पर नजर जाते ही मानो वे उछल पड़े.

यहां मुकुल के घर नए रिश्ते वाले आए थे. लड़की का पिता बोल रहा था.

‘‘चलिए, जो हुआ सो हुआ आप के साथ. अब एक नई जिंदगी शुरू कीजिए.’’

तभी एक मजबूत आवाज गूंजी “जिंदगी भी क्याक्या दिखा देती है भाईसाहब,” सब ने आवाज की दिशा में देखा. इंस्पैक्टर राघव मुसकराते हुए खडे़ थे. अचानक उन्हें यहां पा कर सभी चौंक उठे. मुकुल ने पूछा.

‘‘विमल ने अपना जुर्म कबूल लिया क्या सर?’’

‘‘उसी सिलसिले में बात करने आया हूं,’’ राघव ने मुसकराते हुए कहा. मुकुल के पिता ने एक प्लेट उन की ओर बढ़ाई, ‘‘जी जरूर, लीजिए मुंह मीठा कीजिए आप भी.’’

‘‘धन्यवाद,’’ राघव ने विनम्रता से मना कर दिया और बोले.

‘‘देखिए मुकुलजी, मैं ने बहुत कोशिश की लेकिन विमल ने अपना जुर्म कबूल नहीं किया.’’

‘‘तो अब क्या होगा?’’ मुकुल के चेहरे पर दुविधा के भाव साफ दिखने लगे. राघव आगे बोले, ‘‘होगा वही जो होना है. मैं ने अभीअभी अपनी साली की भेजी हुई एक वीडियो सैल्फी देखी, संयोगवश ये उसी दिन की है, जिस दिन नव्या का खून हुआ था.’’

‘‘तो? उस से इस केस का क्या लेना?’’ इस बार मुकुल की मां बोल पड़ी.

‘‘जी वही बता रहा हूं.’’ राघव ने कहा, ‘‘वह सैल्फी उस ने अपने पुरुष दोस्त के साथ मल्लिका स्टोर के सामने खड़ी हो कर बनाई थी और मजे की बात ये कि पीछे का एक बेहद जरूरी दृश्य उस में अनायास ही कैद हो गया.’’

‘‘कैसा दृश्य?’’ मुकुल ने पूछा.

‘‘सुनिए तो…’’ राघव ने फिर कहा, ‘‘मेरी तब तक की पूरी जांच के अनुसार यह समय वही था जब नव्या औफिस से घर लौट रही थी और विमल उस की गाड़ी से उतर चुका था. एक आदमी ने मल्लिका स्टोर के सामने नव्या की कार रुकवाई और उस में बैठ गया. कहने की जरूरत नहीं कि उसी आदमी का संग नव्या के लिए कातिल साबित हुआ.’’

‘‘कौन था वह आदमी?’’ मुकुल को देखने आए लड़की के पिता ने उत्सुकता से पूछा.

“मिल गया हत्यारा, जिस ने बलात्कार भी कराया. वह आदमी…’’ राघव के इतना कहतेकहते मुकुल बिजली की तेजी से उठा और दरवाजे की ओर भागा.

राघव चिल्लाए, ‘‘पकड़ो इस को जल्दी.’’

सिपाहियों ने मुकुल को दबोच लिया. वह छटपटाने लगा. सब लोग हैरान थे. मुकुल खुद को छुड़ाने की कोशिश कर रहा था लेकिन राघव के जोरदार पुलिसिया थप्पड़ ने उसे दिन में तारे दिखा दिए. वह सोफे पर गिर पड़ा और सिसकते हुए कहने लगा, ‘‘हां, मैं ने उस शाम मोटरसाइकिल से नव्या का पीछा किया, क्योंकि वह अगले दिन वकील को बुला कर मुझ पर तलाक के लिए दबाव डलवाने वाली थी. इसी कारण उस ने औफिस से भी छुट्टी ले ली थी.’’

सभी हैरानी से उस की बातें सुन रहे थे. वह कहता गया, ‘‘हालांकि मैं ने सोचा था कि एक बार फिर प्यार से उसे समझाऊंगा, लेकिन जब मैं ने उसे विमल के साथ संबंध बनाते देख लिया तो मेरा शक यकीन में बदल गया. मैं ने उस से पहले ही मल्लिका स्टोर के सामने पहुंच उस की कार रुकवाई और कहा कि मेरी बाइक खराब हो गई है. उस ने अनमने भाव से मुझे अंदर बिठाया. जब वो कुछ सामान लेने उतरी तो इसी बीच मैं ने अपने साथ लाई नींद की गोलियां उस की कोल्डड्रिंक की बोतल में मिला दीं, जो उस ने विमल के साथ आधी ही पी थी.’’

‘‘लेकिन उस के साथ सामूहिक बलात्कार किन से कराया तुम ने?’’ राघव को अभी तक इस सवाल का उत्तर नहीं मिल सका था.

मुकुल बोला, ‘‘मैं अपने घरेलू तनाव में डूबा एक दिन उसी जंगल में बैठा था. मैं ने देखा कि कुछ नशेड़ी वहां गप्पें मारते हैं, वे रोज वहां उसी जगह आते. मैं ने उस शाम नव्या के बेहोश जिस्म को वहीं रख दिया और उन का इंतजार करने लगा. जब वे वहां आए तो मैं ने पत्थर मार के उन का ध्यान नव्या की ओर दिला दिया, वे नशे की हालत में उस पर टूट पडे़…’’

‘‘और तुम ने सोचा कि यह मामला बलात्कार और हत्या का मान लिया जाएगा,’’ राघव ने उसे बीच में ही टोकते हुए कहा, ‘‘तभी मैं कहूं कि ऐसा हत्या का केस मैं ने पहले कभी कैसे नहीं देखा. वे नशेड़ी बलात्कार कर वहां से भाग गए और दोबारा नहीं लौटे. वैसे हम उन को भी ढूंढ़ निकालेंगे. मानता हूं कि नव्या ने तुम्हारे साथ गलत किया लेकिन हत्या तो हत्या है. तुम्हें सजा मिलेगी ही.’’

राघव के चेहरे पर विश्वास साफ झलक रहा था. वे मुकुल को गिरफ्तार कर वहां से चल पड़े.

विधायक को जवाब : निशा किस वारदात से डरी हुई थी- भाग 1

निशा दोपहर की वारदात से बहुत ज्यादा डरी हुई थी, पर उस में बहुत हिम्मत बाकी थी. वह उदास सी कच्चे मकान की तीसरी मंजिल पर पलंग पर लेटी हुई थी. उसे हलका बुखार था. माथा दर्द से फटा जा रहा था. कभीकभी तो निशा अपने दोनों हाथों से सिर को इस तरह पकड़ लेती मानो उसे दबा कर निचोड़ देना चाहती हो. उस के बाल इधरउधर बिखर गए थे. वह बहुत बेचैन थी. उसे कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करे. अचानक निशा ने अपने दिल की आवाज सुनी, ‘निशा, तू इस शहरगांव, देश को छोड़ दे,’ और उस ने मरने की ठान ली. उस का चेहरा धीरेधीरे सख्त होने लगा. अचानक वह उठ कर बैठ गई. मगर जैसे ही उस ने उठना चाहा, बगल वाले टूटे पलंग पर लेटे पिता पर उस की नजर पड़ गई.

निशा ने जब गौर से पिता की नंगी पीठ देखी, तो उस के कानों में एमएलए कृपाल सिंह के आदमियों के डंडों की सरसराहट और पिता की चीखें गूंजने लगीं. उसे लगा मानो एमएलए की धमकी भरी तेज आवाज से उस का घर चरमरा कर गिर पड़ेगा. उस की आंखों से आंसू बहने लगे. वह अपने दोनों हाथों से चेहरा छिपा कर रोने लगी. निशा और राजन एकसाथ कोचिंग क्लासों में मिले थे. निशा के पास कुछ नहीं था, पर उस के हर ऐग्जाम में 98 फीसदी मार्क्स आते थे. राजन ने दोस्ती का हाथ बढ़ाया. राजन पहले मौजमस्ती वाला लड़का था, पर निशा के पढ़ाने पर कोचिंग के मौक टैस्टों में अब वह भी 90 फीसदी मार्क्स लाने लगा था. मार्क्स ही नहीं मिले, दिल भी मिले और बदन भी. अब दोनों को अलग करना मुश्किल था. अचानक निशा के दिल ने फिर आवाज दी, ‘धीरज रखो निशा, सब ठीक हो जाएगा. अगर तुम भाग जाओगी तो पिता का क्या होगा? उस राजन का क्या होगा, जो तुम्हारे प्यार में अपना सबकुछ छोड़ने को तैयार है? तुम्हारे प्यार को ही वह अपनी मंजिल मानता है.

और जब तुम ही नहीं रहोगी तो वह कहां जाएगा? तब शायद वह भी मर जाएगा.’ राजन की बातें निशा के कानों में गूंजने लगीं, ‘नहीं निशा, तुम्हें कुछ नहीं होगा. मुझ पर यकीन करो. मैं इस ऊंचनीच की दीवार को तोड़ कर एक दिन इस सारी बस्ती की क्या सारे शहर के सामने तेरी मांग में सिंदूर भरूंगा. मरने की बात मत करो. अगर तुम्हें कुछ हो गया, तो मैं खुद को आग लगा दूंगा.’ निशा बड़बड़ाने लगी, ‘‘मुझे कुछ नहीं होगा राजन… मैं तुम्हारे साथ हूं… मैं भी लड़ूंगी इस समाज से भी, पुलिस से भी, मैं भी लड़ूंगी…’’ अचानक निशा ने देखा कि उस के पिता उसी की तरफ आ रहे हैं. वह आंखें बंद कर के सोने का नाटक करने लगी. मगर पिता तो पिता होता है, वे बेटी की हर हरकत को भांप चुके थे. वे उस के टूटे से पलंग पर बैठ गए. उस के गालों पर आंसू देख कर पहले तो सहमे, फिर प्यार से उस के सिर पर हाथ फेरते हुए बोले, ‘‘तेरा बाप हूं… तेरी हालत को मैं जानता हूं. मगर मैं ऐसा बाप हूं,

जो तेरी इच्छा को जानते हुए भी तेरे लिए कुछ नहीं कर पा रहा हूं. मैं बेसहारा हूं. ‘‘बेटी, मेढ़क अगर चांद के पास जाना चाहे तो वह फुदकफुदक कर जान दे देगा, फिर भी वह चांद तक नहीं पहुंच पाएगा. हम उसी मेढ़क की तरह हैं. बेटी, भूल जा राजन को. ‘‘मैं मानता हूं कि प्यार करना कोई जुर्म नहीं है. मगर तुम्हारा सब से बड़ा जुर्म यह है कि तुम मेरी बेटी हो… एक हरिजन की बेटी. राजन इस इलाके के एमएलए के बेटे हैं, राजपूत खानदान के एकलौते वारिस हैं. वे ऊंची जाति वाले लोग हम हरिजनों को अपने आंगन में बैठा कर खाना तक नहीं खिलाते… अपना बेटा कहां से देंगे? ‘‘यह दुनिया फूलों की सेज नहीं है बेटी, बहुत कांटे हैं इस में. अपनी जिंदगी बचा लो, भूल जाओ राजन को. पोंछ लो आंसू… पत्थर आंसुओं से कभी नहीं पिघला करते. पत्थरों से सिर टकराने से अपना ही सिर फूटता है बेटी.’’ निशा जो अब तक चुप थी, फफक कर रो पड़ी. उस ने अपने पिता के सीने में अपना चेहरा छिपा लिया. कुछ देर तक बापबेटी एकदूसरे की बांहों में सुबकते रहे. फिर किसी तरह अपनेआप को संभालते हुए पिता बोले, ‘‘बेटी, इतना याद रखो कि हम हरिजन हैं… छोटी जाति के हैं. तुम…’’ बात को बीच में ही काटते हुए निशा बोली, ‘‘मगर बापू, आज जमाना बदल गया है. आप भी जानते हो और राजन भी जानता है कि यह कच्ची बस्ती का मकान हम जल्दी छोड़ देंगे. मुझे जरा इंजीनियरिंग करने दो, मैं लाखों कमाऊंगी. अब कोई हमारे रास्ते को जाति के नाम पर नहीं रोक सकता.

‘‘पर जब मेरे नंबर पता चलते हैं, तो चकरा जाते हैं, इसीलिए राजन इस फर्क को नहीं मानता.’’ ‘‘मैं जानता हूं बेटी, राजन का दिल साफ है. मगर जातपांत और ऊंचनीच की दीवारों को तोड़ना आसान नहीं है. विधायक कृपाल सिंह और वह भी सत्ताकद पार्टी का, किसी भी शर्त पर एक हरिजन की बेटी को अपनी बहू बनाना कबूल नहीं करेगा. यह बात दूसरी है कि वोट मांगने वह घरों में घुसता हो, पर बहू मांगने इस मकान में कभी नहीं आएगा.’’ कुछ देर बाद पिता उठे और अपने पलंग पर जा कर लेट गए. निशा चुपचाप बुत बनी वहीं बैठी रही. उसे कुछ सूझ नहीं रहा था. एक तरफ राजन का प्यार था, तो वहीं दूसरी तरफ जातपांत की दीवार थी. आखिर वह क्या करे? धीरे से निशा भी लेट गई और राजन के बारे में सोचने लगी. राजन तो दिल का राजा था. आज के जमाने में ऊंचनीच और जातपांत को न मानने वाला वह नौजवान सचमुच दिल का बादशाह था. यही वजह थी कि एक हरिजन की बेटी को वह अपना दिल दे बैठा था. उसे उस के कुछ दोस्तों ने कहा था कि नंबरों पर मत जा, औकात देख. निशा को एक दिन की बात याद आ गई, जब राजन उसे अपनी मोटरसाइकिल पर बैठा कर शहर से काफी दूर निकल गया था.

मोटरसाइकिल पर पीछे बैठी निशा ने राजन को कस कर पकड़ा हुआ था कि कहीं वह गिर न जाए. कभीकभी राजन जब अचानक ब्रेक लगा देता, तो निशा पूरी तरह उस पर झुक जाती. तब शरमाते हुए वह सिर्फ इतना ही कह पाती, ‘ठीक से चलाओ न.’ जब दोनों काफी दूर निकल आए तो निशा से नहीं रहा गया और पूछ बैठी कि वे कहां जा रहे हैं? मगर राजन मुसकरा कर बारबार अनसुनी कर देता. आखिर निशा अचानक जोर से बोली, ‘गाड़ी रोकिए.’ राजन मोटरसाइकिल रोक कर निशा की तरफ मुड़ा और मुसकराते हुए बोला कि वह एक रिजौर्ट में पूरा दिन बिताने ले जा रहा?है. पहले तो वह मना करती रही, मगर राजन की बात को ठुकरा नहीं पाई थी. वह निशा को पहली बार इतने शानदार रिजौर्ट में ले कर आया था. निशा ने छक कर खाया. दोनों ने बाद में एक कमरे में पूरा दिन बिताया. राजन निशा की गोद में सिर रख कर लेट गया. तब निशा प्यार से उस के माथे पर हाथ फेरते हुए बोली थी, ‘थक गए क्या?’ राजन भी निशा की आंखों में झांकते हुए प्यार से बोला था,

‘नहीं निशा, इस समय मुझे ऐसा लग रहा है, जैसे मुझे दुनियाभर की खुशियां मिल गई हैं.’ निशा कुछ नहीं बोली, तो राजन ने कहा, ‘चुप क्यों हो?’ ‘डरती हूं.’ ‘क्यों?’ हिचकिचाते हुए निशा ने कहा, ‘आप विधायक के बेटे, ऊंची जाति के…’ ‘और तुम एक हरिजन की बेटी… यही कहना चाहती हो न तुम?’ राजन थोड़े गुस्से से बोला था. निशा खामोश ही रही. फिर बड़े प्यार से राजन ने अपने दोनों हाथों से उस का चेहरा सामने करते हुए कहा, ‘मैं तुम से कितनी बार कह चुका हूं कि इस तरह की बातें मत किया करो. मैं जो कुछ भी हूं सिर्फ तुम्हारा हूं और तुम मेरी होने वाली पत्नी हो.

मैं तो इतना ही जानता हूं कि अगर तुम नहीं तो मैं भी नहीं.’ निशा अपने बीते हुए दिनों में खोई हुई थी कि अचानक पीछे की छोटी सी खिड़की से कोई कूदा. वह डर गई. घबराते हुए वह पलंग से उठने लगी. फिर जैसे ही बोलने के लिए उस ने मुंह खोलना चाहा, उस साए ने उस का मुंह बंद कर दिया और धीरे से कहा, ‘‘मैं हूं निशा, राजन, तुम्हारा राजन.’’ निशा राजन की बांहों में समा गई. उस के सीने में अपना चेहरा छिपा कर सुबकने लगी. राजन ने उस के बालों पर हाथ फेरते हुए कहा, ‘‘मुझे सब मालूम हो गया निशा, लेकिन अब सब ठीक हो जाएगा.

Raksha Bandhan: कितने अजनबी- क्या भाईबहन के मतभेद खत्म हो पाए?

हम 4 एक ही छत के नीचे रहने वाले लोग एकदूसरे से इतने अजनबी कि अपनेअपने खोल में सिमटे हुए हैं.

मैं रश्मि हूं. इस घर की सब से बड़ी बेटी. मैं ने अपने जीवन के 35 वसंत देख डाले हैं. मेरे जीवन में सब कुछ सामान्य गति से ही चलता रहता यदि आज उन्होंने जीवन के इस ठहरे पानी में कंकड़ न डाला होता.

मैं सोचती हूं, क्या मिलता है लोगों को इस तरह दूसरे को परेशान करने में. मैं ने तो आज तक कभी यह जानने की जरूरत नहीं समझी कि पड़ोसी क्या कर रहे हैं. पड़ोसी तो दूर अपनी सगी भाभी क्या कर रही हैं, यह तक जानने की कोशिश नहीं की लेकिन आज मेरे मिनटमिनट का हिसाब रखा जा रहा है. मेरा कुसूर क्या है? केवल यही न कि मैं अविवाहिता हूं. क्या यह इतना बड़ा गुनाह है कि मेरे बारे में बातचीत करते हुए सब निर्मम हो जाते हैं.

अभी कल की ही बात है. मकान मालकिन की बहू, जिसे मैं सगी भाभी जैसा सम्मान देती हूं, मेरी नईनवेली भाभी से कह रही थी, ‘‘देखो जलज, जरा अपनी बड़ी ननद से सावधान रहना. जब तुम और प्रतुल कमरे में होते हो तो उस के कान उधर ही लगे रहते हैं. मुझे तो लगता है कि वह ताकझांक भी करती होगी. अरी बहन, बड़ी उम्र तक शादी नहीं होगी तो क्या होगा, मन तो करता ही होगा…’’  कह कर वह जोर से हंस दी.

मैं नहीं सुन पाई कि मेरी इकलौती भाभी, जिस ने अभी मुझे जानासमझा ही कितना है, ने क्या कहा. पर मेरे लिए तो यह डूब मरने की बात है. मैं क्या इतनी फूहड़ हूं कि अपने भाई और भाभी के कमरे में झांकती फिरूंगी, उन की बातें सुनूंगी. मुझे मर जाना चाहिए. धरती पर बोझ बन कर रहने से क्या फायदा?

मैं अवनि हूं. इस घर की सब से छोटी बेटी. मैं बिना बात सब से उलझती रहती हूं. कुछ भी सोचेसमझे बिना जो मुंह में आता है बोल देती हूं और फिर बाद में पछताती भी हूं.

मेरी हर बात से यही जाहिर होता है कि मैं इस व्यवस्था का विरोध कर रही हूं जबकि खुद ही इस व्यवस्था का एक हिस्सा हूं.

मैं 32 साल की हो चुकी हूं. मेरे साथ की लड़कियां 1-2 बच्चों की मां  बन चुकी हैं. मैं उन से मिलतीजुलती हूं पर अब उन के साथ मुझे बातों में वह मजा नहीं आता जो उन की शादी से पहले आता था.

अब उन के पास सासपुराण, पति का यशगान और बच्चों की किचकिच के अलावा कोई दूसरा विषय होता ही नहीं है. मैं चिढ़ जाती हूं. क्या तुम लोग  इतना पढ़लिख कर इसी दिमागी स्तर की रह गई हो. वे सब हंसती हुई कहती हैं, ‘‘बन्नो, जब इन चक्करों में पड़ोगी तो जानोगी कि कितनी पूर्णता लगती है इस में.’’

‘क्या सच?’ मैं सोचती हूं एक स्कूल की मास्टरी करते हुए मुझे अपना जेबखर्च मिल जाता है. खूब सजधज कर जाती हूं. अच्छी किस्म की लिपस्टिक लगाती हूं. बढि़या सिल्क की साडि़यां पहनती हूं. पैरों में ऊंची हील की सैंडिल होती हैं जिन की खटखट की आवाज पर कितनी जोड़ी आंखें देखने लगती हैं. पर मैं किसी को कंधे पर हाथ नहीं रखने देती.

क्या मुझ में पूर्णता नहीं है? मैं एक परफैक्ट महिला हूं और मैं ऐसा प्रदर्शित भी करती हूं, लेकिन जब कोई हंसताखिलखिलाता जोड़ा 2 छोटेछोटे भागते पैरों के पीछे पार्क में दौड़ता दिख जाता है तो दिल में टीस सी उठती है. काश, मैं भी…

मैं जलज हूं. इस घर के इकलौते बेटे की पत्नी. अभी मेरी शादी को मात्र 6 महीने हुए हैं. मेरे पति प्रतुल बहुत अच्छे स्वभाव के हैं. एकांत में मेरे साथ ठीक से रहते हैं. हंसतेमुसकराते हैं, प्यार भी जताते हैं और मेरी हर छोटीबड़ी इच्छा का ध्यान रखते हैं लेकिन अपनी दोनों बहनों के सामने उन की चुप्पी लग जाती है.

सारे दिन मुझे बड़ी दीदी रश्मि की सूक्ष्मदर्शी आंखों के सामने घूमना पड़ता है. मेरा ओढ़नापहनना सबकुछ उन की इच्छा के अनुसार होता है. अभी मेरी शादी को 6 महीने ही हुए हैं पर वह मुझे छांटछांट कर हलके रंग वाले कपड़े ही पहनाती हैं. जरा सी बड़ी बिंदी लगा लो तो कहेंगी, ‘‘क्या गंवारों की तरह बड़ी बिंदी और भरभर हाथ चूडि़यां पहनती हो. जरा सोबर बनो सोबर. अवनि को देखो, कितनी स्मार्ट लगती है.’’

मैं कहना चाहती हूं कि दीदी, अवनि दीदी अविवाहित हैं और मैं सुहागिन, लेकिन कह नहीं सकती क्योंकि शादी से पहले प्रतुल ने मुझ से यह वादा ले लिया था कि दोनों बड़ी बहनों को कभी कोई जवाब न देना.

मैं अपने मन की बात किस से कहूं. घुटती रहती हूं. कल रश्मि दीदी कह रही थीं, ‘‘भाभी, भतीजा होगा तो मुझे क्या खिलाओगी.’’

मैं ने भी हंसते हुए कहा था, ‘‘दीदी, आप जो खाएंगी वही खिलाऊंगी.’’

चेहरे पर थोड़ी मुसकराहट और ढेर सारी कड़वाहट भर कर अवनि दीदी बीच में ही बोल पड़ीं, ‘‘भाभी, हमें थोड़ा सल्फास खिला देना.’’

मैं अवाक् रह गई. क्या मैं इन्हें सल्फास खिलाने आई हूं.

अगर भाभी के बारे में सोच ऐसी ही थी तो फिर अपने भाई की शादी क्यों की?

मैं 3 भाइयों की इकलौती बहन हूं. मातापिता मेरे भी नहीं हैं इसलिए इन बहनों का दर्द समझती हूं. ऐसा बहुतकुछ मेरे जीवन में भी गुजरा है. जब मैं इंटर पास कर बी.ए. में आई तो महल्लापड़ोस वाली औरतें मेरी भाभियों को सलाह देने लगीं, ‘‘अरे, बोझ उतारो अपने सिर से. बहुत दिन रख लिया. अगर कुछ ऊंचनीच हो गई तो रोती फिरोगी. भाई लाड़ करते हैं इसलिए नकचढ़ी हो गई है.’’

सच में मैं नकचढ़ी थी लेकिन बड़ी भाभी मेरी मां बन गई थीं. उन्होंने कहा था, ‘‘आप लोग अपनाअपना बोझ संभालो. मेरे घर की चिंता मत करो. जब तक पढ़लिख कर जलज किसी काबिल नहीं हो जाती और कोई सुपात्र नहीं मिल जाता, हम शादी नहीं करेंगे.’’

और सचमुच भाभी ने मुझे एम.ए., बी.एड. करवाया और अच्छे रिश्ते की खोज में लग गईं. यद्यपि प्रतुल और मुझ में 10 साल का अंतर है लेकिन इस रिश्ते की अच्छाई भाभी ने यह समझी कि अपनी जलज, बिन मांबाप की है. भाईभाभियों के बीच रह कर पलीबढ़ी है. बिना मांबाप की बच्चियों का दर्द खूब समझेगी और प्रतुल को सहयोग करेगी.

मैं नहीं जानती थी कि मुझे ऐसा माहौल मिलेगा. इतनी कुंठा से ग्रस्त ननदें होंगी. अरे, अगर शादी नहीं हुई या नहीं हो रही है तो क्या करने को कुछ नहीं है. बहुतकुछ है.

एक बार मैं ने यही बात अवनि दीदी से धीरे से कही थी तो किचन के दरवाजे पर हाथ अड़ा कर लगभग मेरा रास्ता रोकते हुए वह बड़ी क्रूरता से कह गई थीं, ‘आज आप की शादी हो गई है इसलिए कह रही हैं. अगर न होती और भाईभाभी के साथ जीवन भर रहना पड़ता तो पता चलता.’ बताइए, मैं 6 महीने पुरानी विवाहिता आज विवाहित होने का ताना सुन रही हूं.

मैं प्रतुल हूं. इस घर का इकलौता बेटा और बुजुर्ग भी. मेरी उम्र 40 वर्ष है. मेरे पिता की मृत्यु को अभी 5 वर्ष हुए हैं. इन 5 सालों में मैं बहुत परिपक्व हो गया हूं. जब मेरे पिता ने अंतिम सांस ली उस समय मेरी दोनों बहनें क्रमश: 30 और 27 वर्ष की थीं. मेरी उम्र 35 वर्ष की थी. उन्होंने हम में से किसी के बारे में कुछ नहीं सोचा. पिताजी की अच्छीखासी नौकरी थी, परंतु जितना कमाया उतना गंवाया. केवल बढि़या खाया और पहना. घर में क्या है यह नहीं जाना. अम्मां उन से 5 वर्ष पहले मरी थीं. यानी 10 साल पहले भी हम भाईबहन इतने छोटे नहीं थे कि अपनाअपना घर नहीं बसा सकते थे. मेरे दोस्तों के बच्चे लंबाई में उन के बराबर हो रहे हैं और यहां अभी बाप बनने का नंबर भी नहीं आया.

नौकरी पाने के लिए भी मैं ने खूब एडि़यां घिसीं. 8 सालों तक दैनिक वेतनभोगी के रूप में रहा. दोस्त और दुश्मन की पहचान उसी दौर में हुई थी. आज भी उस दौर के बारे में सोचता हूं तो रोंगटे खड़े हो जाते हैं.

अम्मां सोतेउठते एक ही मंत्र फूंका करती थीं कि बेटा, इन बहनों की नइया तुझे ही पार लगानी है. लेकिन कैसे? वह भी नहीं जानती थीं.

मैं ने जब से होश संभाला, अम्मां और पिताजी को झगड़ते ही पाया. हर बहस का अंत अम्मां की भूख हड़ताल और पिताजी की दहाड़ पर समाप्त होता था. रोतीकलपती अम्मां थकहार कर खाने बैठ जातीं क्योंकि पिताजी पलट कर उन्हें पूछते ही नहीं थे. अम्मां को कोई गंभीर बीमारी न थी. एक दिन के बुखार में ही वह चल बसीं.

रिटायरमेंट के बाद पिताजी को गांव के पुश्तैनी मकान की याद आई. सबकुछ छोड़छाड़ कर वह गांव में जा बैठे तो झक मार कर हम सब को भी जाना पड़ा. पिछले 15 सालों में गांव और शहर के बीच तालमेल बैठातेबैठाते मैं न गांव का गबरू जवान रहा न शहर का छैलछबीला.

बहनों को पढ़ाया, खुद भी पढ़ा और नौकरी की तलाश में खूब भटका. उधर गांव में पिताजी की झकझक अब रश्मि और अवनि को झेलनी पड़ती थी. वे ऊटपटांग जवाब देतीं तो पिताजी उन्हें मारने के लिए डंडा उठा लेते. अजीब मनोस्थिति होती जब मैं छुट्टी में घर जाता था. घर जाना जरूरी भी था क्योंकि घर तो छोड़ नहीं सकता था.

पिताजी के बाद मैं दोनों बहनों को शहर ले आया. गांव का मकान, जिस का हिस्सा मात्र 2 कमरों का था, मैं अपने चचेरे भाई को सौंप आया. उस का परिवार बढ़ रहा था और वहां भी हमारे घर की तरह ‘तानाशाह’ थे.

शहर आ कर अवनि को मैं ने टाइप स्कूल में दाखिला दिलवा दिया लेकिन उस का मन उस में नहीं लगा. वह गांव के स्कूल में पढ़ाती थी इसलिए यहां भी वह पढ़ाना ही चाहती थी. मेरे साथ काम करने वाले पाठकजी की बेटी अपना स्कूल चलाती है, वहीं अवनि पढ़ाने लगी है. जितना उसे मिलता है, पिताजी की तरह अपने ऊपर खर्च करती है. बातबात में ताने देती है. बोलती है तो जहर उगलती है लेकिन मैं क्या करूं? पिताजी के बाद जो खजाना मुझे मिला वह केवल उन की 1 महीने की पेंशन थी. जिस शहर में रहने का ताना ये दोनों मुझ को देती थीं वही शहर हमारी सारी कमाई निगल रहा है.

40 बरस की आयु में आखिर परिस्थितियों से ऊब कर मैं ने शादी कर ली. जलज अच्छी लड़की है. शांत स्वभाव और धैर्य वाली. उस की बड़ीबड़ी आंखों में दुख के बादल कुछ क्षण मंडराते तो जरूर हैं लेकिन फिर छंट भी बहुत जल्दी जाते हैं. जलज ने आज तक मेरी बहनों के बारे में मुझ से किसी प्रकार की कोई शिकायत नहीं की. क्या करूं, मेरे प्रारब्ध से जुड़ कर उसे भी सबकुछ सहन करना पड़ रहा है.

माना कि बहनें छोटी हैं लेकिन कहने वाले कब चूकते हैं, ‘‘खुद की शादी कर ली और बहनों को भूल गया. बहनें भी तड़ से कहती हैं, ‘‘तुम अपनी जिंदगी देखो, हम को कब तक संभालोगे या तुम्हारे पास इतना पैसा कहां है कि हमें बैठा कर खिला सको.’’

पिताजी ने अपनी जिम्मेदारी नहीं निभाई. खुद खायापिया और मौज उड़ाई. इस में मेरा कुसूर क्या है? मैं कब कहता हूं कि बहनों का ब्याह नहीं करूंगा. अपनी जिम्मेदारी से मुंह नहीं मोड़ता पर मैं सब से कहता हूं, समय तो आने दो, धैर्य तो रखो.

एक तो कहीं बात नहीं बनती और कहीं थोड़ीबहुत गुंजाइश होती भी है तो ये दोनों मना करने लगती हैं. यह लड़का अच्छा नहीं है. गांव में शादी नहीं करेंगे. वास्तव में दोनों में निरंकुशता आ गई है. मुझे कुछ समझती ही नहीं. हैसियत मेरी बुजुर्ग वाली है लेकिन ये दोनों मुझे बच्चा समझ कर डपटती रहती हैं. मेरे साथ जलज भी डांट खाती है.

अम्मां पिताजी के उलझाव ने इन दोनों के स्वभाव में अजीब सा कसैलापन ला दिया है. पापा से उलझ कर अम्मां मुंह फुला कर लेट जातीं और यह तक न देखतीं कि रश्मि और अवनि क्या कर रही हैं, कैसे बोल रही हैं.

मैं अपनी दोनों बहनों और पत्नी के बीच सामंजस्य बैठाने की कोशिश में अपने ही खोल में सिमटता जा रहा हूं.

न जाने कब समाप्त होगा हमारा अजनबीपन.

मनपसंद: मेघा ने परिवार के प्रति कौनसा निभाया था फर्ज

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Raksha bandhan- सांप सीढ़ी: प्रशांत के साथ क्या हुआ था?

जब से फोन आया था, दिमाग ने जैसे काम करना बंद कर दिया था. सब से पहले तो खबर सुन कर विश्वास ही नहीं हुआ, लेकिन ऐसी बात भी कोई मजाक में कहता है भला.

फिर कांपते हाथों से किसी तरह दिवाकर को फोन लगाया. सुन कर दिवाकर भी सन्न रह गए.

‘‘मैं अभी मौसी के यहां जाऊंगी,’’ मैं ने अवरुद्ध कंठ से कहा.

‘‘नहीं, तुम अकेली नहीं जाओगी. और फिर हर्ष का भी तो सवाल है. मैं अभी छुट्टी ले कर आता हूं, फिर हर्ष को दीदी के घर छोड़ते हुए चलेंगे.’’

दिवाकर की बात ठीक ही थी. हर्ष को ऐसी जगह ले जाना उचित नहीं था. मेरा मस्तिष्क भी असंतुलित हो रहा था. हाथपैर कांप रहे थे, मन में भयंकर उथलपुथल मची हुई थी. मैं स्वयं भी अकेले जाने की स्थिति में कतई नहीं थी.

पर इस बीतते जा रहे समय का क्या करूं. हर गुजरता पल मुझ पर पहाड़ बन कर टूट रहा था. दिवाकर को बैंक से यहां तक आने में आधा घंटा लग सकता था. फिर दीदी का घर दूसरे छोर पर, वहां से मौसी का घर 5-6 किलोमीटर की दूरी पर. उन के घर के पास ही अस्पताल है, जहां प्रशांत अपने जीवन की शायद आखिरी सांसें गिन रहा है. कम से कम फोन पर खबर देने वाले व्यक्ति ने तो यही कहा था कि प्रशांत ने जहर इतनी अधिक मात्रा में खा लिया है कि उस के बचने की कोई उम्मीद नहीं है.

जिस प्रशांत को मैं ने गोद में खिलाया था, जिस ने मुझे पहलेपहल छुटकी के संबोधन से पदोन्नत कर के दीदी का सम्मानजनक पद प्रदान किया था, उस प्रशांत के बारे में इस से अधिक दुखद मुझे क्या सुनने को मिलता.

उस समय मैं बहुत छोटी थी. शायद 6-7 साल की जब मौसी और मौसाजी हमारे पड़ोस में रहने आए. उन का ममतामय व्यक्तित्व देख कर या ठीकठीक याद नहीं कि क्या कारण था कि मुझे उन्हें देख कर मौसी संबोधन ही सूझा.

यह उम्र तो नामसझी की थी, पर मांपिताजी के संवादों से इतना पता तो चल ही गया था कि मौसी की शादी हुए 2-3 साल हो चुके थे, और निस्संतान होने का उन्हें गहरा दुख था. उस समय उन की समूची ममता की अधिकारिणी बनी मैं.

मां से डांट खा कर मैं उन्हीं के आंचल में जा छिपती. मां के नियम बहुत कठोर थे. शाम को समय से खेल कर घर लौट आना, फिर पहाड़े और कविताएं रटना, तत्पश्चात ही खाना नसीब होता था. उतनी सी उम्र में भी मुझे अपना स्कूलबैग जमाना, पानी की बोतल, अपने जूते पौलिश करना आदि सब काम स्वयं ही करने पड़ते थे. 2 भाइयों की एकलौती छोटी बहन होने से भी कोई रियायत नहीं मिलती थी.

उस समय मां की कठोरता से दुखी मेरा मन मौसी की ममता की छांव तले शांति पाता था.

मौसी जबतब उदास स्वर में मेरी मां से कहा करती थीं, ‘बस, यही आस है कि मेरी गोद भरे, बच्चा चाहे काला हो या कुरूप, पर उसे आंखों का तारा बना कर रखूंगी.’

मौसी की मुराद पूरी हुई. लेकिन बच्चा न तो काला था न कुरूप. मौसी की तरह उजला और मौसाजी की तरह तीखे नाकनक्श वाला. मांबाप के साथसाथ महल्ले वालों की भी आंख का तारा बन गया. मैं तो हर समय उसे गोद में लिए घूमती फिरती.

प्रशांत कुशाग्रबुद्धि निकला. मैं ने उसे अपनी कितनी ही कविताएं कंठस्थ करवा दी थीं. तोतली बोली में गिनती, पहाड़े, कविताएं बोलते प्रशांत को देख कर मौसी निहाल हो जातीं. मां भी ममता का प्रतिरूप, तो बेटा भी उन के स्नेह का प्रतिदान अपने गुणों से देता जा रहा था. हर साल प्रथम श्रेणी में ही पास होता. चित्रकला में भी अच्छा था. आवाज भी ऐसी कि कोई भी महफिल उस के गाने के बिना पूरी नहीं होती थी. मैं उस से अकसर कहती, ‘ऐसी सुरीली आवाज ले कर किसी प्रतियोगिता के मैदान में क्यों नहीं उतरते भैया?’ मैं उसे लाड़ से कभीकभी भैया कहा करती थी. मेरी बात पर वह एक क्षण के लिए मौन हो जाता, फिर कहता, ‘क्या पता, उस में मैं प्रथम न आऊं.’

‘तो क्या हुआ, प्रथम आना जरूरी थोड़े ही है,’ मैं जिरह करती, लेकिन वह चुप्पी साध लेता.

बोलने में विनम्रता, चाल में आत्मविश्वास, व्यवहार में बड़ों का आदरमान, चरित्र में सोना. सचमुच हजारों में एक को ही नसीब होता है ऐसा बेटा. मौसी वाकई समय की बलवान थीं.

मां के अनुशासन की डोरी पर स्वयं को साधती मैं विवाह की उम्र तक पहुंच चुकी थी. एमए पास थी, गृहकार्य में दक्ष थी, इस के बावजूद मेरा विवाह होने में खासी परेशानी हुई. कारण था, मेरा दबा रंग. प्रत्येक इनकार मन में टीस सी जगाता रहा. पर फिर भी प्रयास चलते रहे.

और आखिरकार दिवाकर के यहां बात पक्की हो गई. इस बात पर देर तक विश्वास ही नहीं हुआ. बैंक में नौकरी, देखने में सुदर्शन, इन सब से बढ़ कर मुझे आकर्षित किया इस बात ने कि वे हमारे ही शहर में रहते थे. मां से, मौसी से और खासकर प्रशांत से मिलनाजुलना आसान रहेगा.

पर मेरी शादी के बाद मेरी मां और पिताजी बड़े भैया के पास भोपाल रहने चले गए, इसलिए उन से मिलना तो होता, पर कम.

मौसी अलबत्ता वहीं थीं. उन्होंने शादी के बाद सगी मां की तरह मेरा खयाल रखा. मुझे और दिवाकर को हर त्योहार पर घर खाने पर बुलातीं, नेग देतीं.

प्रशांत का पीईटी में चयन हो चुका था. वह धीरगंभीर युवक बन गया था. मेरे दोनों सगे भाई तो कोसों दूर थे. राखी व भाईदूज का त्योहार इसी मुंहबोले छोटे भाई के साथ मनाती.

स्कूटर की जानीपहचानी आवाज आई, तो मेरी विचारशृंखला टूटी. दिवाकर आ चुके थे. मैं हर्ष की उंगली पकड़े बाहर आई. कुछ कहनेसुनने का अवसर ही नहीं था. हर्ष को उस की बूआ के घर छोड़ कर हम मौसी के घर जा पहुंचे.

घर के सामने लगी भीड़ देख कर और मौसी का रोना सुन कर कुछ भी जानना बाकी न रहा. भीतर प्रशांत की मृतदेह पर गिरती, पछाड़ें खाती मौसी और पास ही खड़े आंसू बहाते मौसाजी को सांत्वना देना सचमुच असंभव था.

शब्द कभीकभी कितने बेमानी, कितने निरर्थक और कितने अक्षम हो जाते हैं, पहली बार इस बात का एहसास हुआ. भरी दोपहर में किस प्रकार उजाले पर कालिख पुत जाती है, हाथभर की दूरी पर खड़े लोग किस कदर नजर आते हैं, गुजरे व्यक्ति के साथ खुद भी मर जाने की इच्छा किस प्रकार बलवती हो उठती है, मुंहबोली बहन हो कर मैं इन अनुभूतियों के दौर से गुजर रही थी. सगे मांबाप के दुख का तो कोई ओरछोर ही नहीं था.

रहरह कर एक ही प्रश्न हृदय को मथ रहा था कि प्रशांत ने ऐसा क्यों किया? मांबाप का दुलारा, 2 वर्ष पहले ही इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी की थी. अभी उसे इसी शहर में एक साधारण सी नौकरी मिली हुई थी, पर उस से वह संतुष्ट नहीं था. बड़ी कंपनियों में नौकरी के लिए आवेदन कर रहा था. अपने दोस्त की बहन उसे जीवनसंगिनी के रूप में पसंद थी. मौसी और मौसाजी को एतराज होने का सवाल ही नहीं था. लड़की उन की बचपन से देखीपरखी और परिवार जानापहचाना था. तब आखिर कौन सा दुख था जिस ने उसे आत्महत्या का कायरतापूर्ण निर्णय लेने के लिए मजबूर कर दिया.

सच है, पासपास रहते हुए भी कभीकभी हमारे बीच लंबे फासले उग आते हैं. किसी को जाननेसमझने का दावा करते हुए भी हम उस से कितने अपरिचित रहते हैं. सन्निकट खड़े व्यक्ति के अंतर्मन को छूने में भी असमर्थ रहते हैं.

अभी 2 दिन पहले तो प्रशांत मेरे घर आया था. थोड़ा सा चुपचुप जरूर लग रहा था, पर इस बात का एहसास तक न हुआ था कि वह इतने बड़े तूफानी दौर से गुजर रहा है. कह रहा था, ‘दीदी, इंटरव्यू बहुत अच्छा हुआ है. चयन की पूरी उम्मीद है.’

सुन कर बहुत अच्छा लगा था. उस की महत्त्वाकांक्षा पूरी हो, इस से अधिक भला और क्या चाहिए.

और आज? क्यों किया प्रशांत ने ऐसा? मौसी और मौसाजी से तो कुछ पूछने की हिम्मत ही नहीं हुई. मन में प्रश्न लिए मैं और दिवाकर घर लौट आए.

धीरेधीरे प्रशांत की मृत्यु को 5-6 माह बीत चुके थे. इस बीच मैं जितनी बार मौसी से मिलने गई, लगा, जैसे इस दुनिया से उन का नाता ही टूट गया है. खोईखोई दृष्टि, थकीथकी देह अपने ही मौन में सहमी, सिमटी सी. बहुत कुरेदने पर बस, इतना ही कहतीं, ‘इस से तो अच्छा था कि मैं निस्संतान ही रहती.’

उन की बात सुन कर मन पर पहाड़ सा बोझ लद जाता. मौसाजी तो फिर भी औफिस की व्यस्तताओं में अपना दुख भूलने की कोशिश करते, पर मौसी, लगता था इसी तरह निरंतर घुलती रहीं तो एक दिन पागल हो जाएंगी.

समय गुजरता गया. सच है, समय से बढ़ कर कोई मरहम नहीं. मौसी, जो अपने एकांतकोष में बंद हो गई थीं, स्वयं ही बाहर निकलने लगीं. कई बार बुलाने के बावजूद वे इस हादसे के बाद मेरे घर नहीं आई थीं. एक रोज उन्होंने अपनेआप फोन कर के कहा कि वे दोपहर को आना चाहती हैं.

जब इंसान स्वयं ही दुख से उबरने के लिए पहल करता है, तभी उबर पाता है. दूसरे उसे कितना भी हौसला दें, हिम्मत तो उसे स्वयं ही जुटानी पड़ती है.

मेरे लिए यही तसल्ली की बात थी कि वे अपनेआप को सप्रयास संभाल रही हैं, समेट रही हैं. कभी दूर न होने वाले अपने खालीपन का इलाज स्वयं ढूंढ़ रही हैं.

8-10 महीनों में ही मौसी बरसों की बीमार लग रही थीं. गोरा रंग कुम्हला गया था. शरीर कमजोर हो गया था. चेहरे पर अनगिनत उदासी की लकीरें दिखाई दे रही थीं. जैसे यह भीषण दुख उन के वर्तमान के साथ भविष्य को भी लील गया है.

मौसी की पसंद के ढोकले मैं ने पहले से ही बना रखे थे. लेकिन मौसी ने जैसे मेरा मन रखने के लिए जरा सा चख कर प्लेट परे सरका दी. ‘‘अब तो कुछ खाने की इच्छा नहीं रही,’’ मौसी ने एक दीर्घनिश्वास छोड़ा.

मैं ने प्लेट जबरन उन के हाथ में थमाते हुए कहा, ‘‘खा कर देखिए तो सही कि आप की छुटकी को कुछ बनाना आया कि नहीं.’’

उस दिन हर्ष की स्कूल की छुट्टी थी. यह भी एक तरह से अच्छा ही था क्योंकि वह अपनी नटखट बातों से वातावरण को बोझिल नहीं होने दे रहा था.

प्रशांत का विषय दरकिनार रख हम दोनों भरसक सहज वार्त्तालाप की कोशिश में लगी हुई थीं.

तभी हर्ष सांपसीढ़ी का खेल ले कर आ गया, ‘‘नानी, हमारे साथ खेलेंगी.’’ वह मौसी का हाथ पकड़ कर मचलने लगा. मौसी के होंठों पर एक क्षीण मुसकान उभरी शायद विगत का कुछ याद कर के, फिर वे खेलने के लिए तैयार हो गईं.

बोर्ड बिछ गया.

‘‘नानी, मेरी लाल गोटी, आप की पीली,’’ हर्ष ने अपनी पसंदीदा रंग की गोटी चुन ली.

‘‘ठीक है,’’ मौसी ने कहा.

‘‘पहले पासा मैं फेंकूंगा,’’ हर्ष बहुत ही उत्साहित लग रहा था.

दोनों खेलने लगे. हर्ष जीत की ओर अग्रसर हो रहा था कि सहसा उस के फेंके पासे में 4 अंक आए और 99 के अंक पर मुंह फाड़े पड़ा सांप उस की गोटी को निगलने की तैयारी में था. हर्ष चीखा, ‘‘नानी, हम नहीं मानेंगे, हम फिर से पासा फेंकेंगे.’’

‘‘बिलकुल नहीं. अब तुम वापस 6 पर जाओ,’’ मौसी भी जिद्दी स्वर में बोलीं.

दोनों में वादप्रतिवाद जोरशोर से चलने लगा. मैं हैरान, मौसी को हो क्या गया है. जरा से बच्चे से मामूली बात के लिए लड़ रही हैं. मुझ से रहा नहीं गया. आखिर बीच में बोल पड़ी, ‘‘मौसी, फेंकने दो न उसे फिर से पासा, जीतने दो उसे, खेल ही तो है.’’

‘‘यह तो खेल है, पर जिंदगी तो खेल नहीं है न,’’ मौसी थकेहारे स्वर में बोलीं.

मैं चुप. मौसी की बात बिलकुल समझ में नहीं आ रही थी.

‘‘सुनो शोभा, बच्चों को हार सहने की भी आदत होनी चाहिए. आजकल परिवार बड़े नहीं होते. एक या दो बच्चे, बस. उन की हर आवश्यकता हम पूरी कर सकते हैं. जब तक, जहां तक हमारा वश चलता है, हम उन्हें हारने नहीं देते, निराशा का सामना नहीं करने देते. लेकिन ऐसा हम कब तक कर सकते हैं? जैसे ही घर की दहलीज से निकल कर बच्चे बाहर की प्रतियोगिता में उतरते हैं, हर बार तो जीतना संभव नहीं है न,’’ मौसी ने कहा.

मैं उन की बात का अर्थ आहिस्ताआहिस्ता समझती जा रही थी.

‘‘तुम ने गौतम बुद्ध की कहानी तो सुनी होगी न, उन के मातापिता ने उन के कोमल, भावुक और संवेदनशील मन को इस तरह सहेजा कि युवावस्था तक उन्हें कठोर वास्तविकताओं से सदा दूर ही रखा और अचानक जब वे जीवन के 3 सत्य- बीमारी, वृद्धावस्था और मृत्यु से परिचित हुए तो घबरा उठे. उन्होंने संसार का त्याग कर दिया, क्योंकि संसार उन्हें दुखों का सागर लगने लगा. पत्नी का प्यार, बच्चे की ममता और अथाह राजपाट भी उन्हें रोक न सका.’’

मौसी की आंखों से अविरल अश्रुधार बहती जा रही थी, ‘‘पंछी भी अपने नन्हे बच्चों को उड़ने के लिए पंख देते हैं. तत्पश्चात उन्हें अपने साथ घोंसलों से बाहर उड़ा कर सक्षम बनाते हैं. खतरों से अवगत कराते हैं और हम इंसान हो कर अपने बच्चों को अपनी ममता की छांव में समेटे रहते हैं. उन्हें बाहर की कड़ी धूप का एहसास तक नहीं होने देते. एक दिन ऐसा आता है जब हमारा आंचल छोटा पड़ जाता है और उन की महत्त्वाकांक्षाएं बड़ी. तब क्या कमजोर पंख ले कर उड़ा जा सकता है भला?’’

मौसी अपनी रौ में बोलती जा रही थीं. उन के कंधे पर मैं ने अपना हाथ रख कर आर्द्र स्वर में कहा, ‘‘रहने दो मौसी, इतना अधिक न सोचो कि दिमाग की नसें ही फट जाएं.’’

‘‘नहीं, आज मुझे स्वीकार करने दो,’’ मौसी मुझे रोकते हुए बोलीं, ‘‘प्रशांत को पालनेपोसने में भी हम से बड़ी गलती हुई. बचपन से खेलखेल में भी हम खुद हार कर उसे जीतने का मौका देते रहे. एकलौता था, जिस चीज की फरमाइश करता, फौरन हाजिर हो जाती. उस ने सदा जीत का ही स्वाद चखा. ऐसे क्षेत्र में वह जरा भी कदम न रखता जहां हारने की थोड़ी भी संभावना हो.’’ मौसी एक पल के लिए रुकीं, फिर जैसे कुछ सोच कर बोलीं, ‘‘जानती हो, उस ने आत्महत्या क्यों की? उसे जिस बड़ी कंपनी में नौकरी चाहिए थी, वहां उसे नौकरी नहीं मिली. भयंकर बेरोजगारी के इस जमाने में मनचाही नौकरी मिलना आसान है क्या? अब तक सदा सकारात्मक उत्तर सुनने के आदी प्रशांत को इस मामूली असफलता ने तोड़ दिया और उस ने…’’

मौसी दोनों हाथों में मुंह छिपा कर फूटफूट कर रो पड़ीं. मैं ने उन का सिर अपनी गोद में रख लिया.

मौसी का आत्मविश्लेषण बिलकुल सही था और मेरे लिए सबक. मां के अनुशासन तले दबीसिमटी मैं हर्ष के लिए कुछ ज्यादा ही उन्मुक्तता की पक्षधर हो गई थी. उस की उचित, अनुचित, हर तरह की फरमाइशें पूरी करने में मैं धन्यता अनुभव करती. परंतु क्या यह ठीक था?

मां और पिताजी ने हमें अनुशासन में रखा. हमारी गलतियों की आलोचना की. बचपन से ही गिनती के खिलौनों से खेलने की, उन्हें संभाल कर रखने की आदत डाली. प्यार दिया पर गलतियों पर सजा भी दी. शौक पूरे किए पर बजट से बाहर जाने की कभी इजाजत नहीं दी. सबकुछ संयमित, संतुलित और सहज. शायद इस तरह से पलनेबढ़ने से ही मुझ में एक आत्मबल जगा. अब तक तो इस बात का एहसास भी नहीं हुआ था पर शायद इसी से एक संतुलित व्यक्तित्व की नींव पड़ी. शादी के समय भी कई बार नकारे जाने से मन ही मन दुख तो होता था पर इस कदर नहीं कि जीवन से आस्था ही उठ जाए.

मैं गंभीर हो कर मौसी के बाल, उन की पीठ सहलाती जा रही थी.

हर्ष विस्मय से हम दोनों की इस अप्रत्याशित प्रतिक्रिया को देख रहा था. उसे शायद लगा कि उस के ईमानदारी से न खेलने के कारण ही मौसी को इतना दुख पहुंचा है और उस ने चुपचाप अपनी गोटी 99 से हटा कर 6 पर रख दी और मौसी से खेलने के लिए फिर उसी उत्साह से अनुरोध करने लगा.

गुप्त रोग: रूबी और अजय के नजायज संबंधों का कैसे हुआ पर्दाफाश

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एक मौका और दीजिए : बहकने लगे सुलेखा के कदम

मनपसंद: मेघा ने परिवार के प्रति कौनसा निभाया था फर्ज- भाग 3

साल बीतने को आया. मेघा को लगने लगा था कि इस अदृश्य दुश्मन पर अब जीत हासिल हो ही गई है. लेकिन कांटों के झाड़ से लहंगा बचा कर रखने के तमाम प्रयासों के बावजूद भी यह अनहोनी हो ही गई. किसी शायर के कहे अनुसार, यह नाव भी किनारे आ कर ही डूबी.

अब जबकि वैक्सीन के आने की सुगबुगाहट के बीच लोग जरा बेफिक्र हुए ही थे और कोरोना शायद इसी लापरवाही का इंतजार कर रहा था. एक दिन अचानक सोम को हलका बुखार आया और अगले दिन उसे खांसी शुरू हो गई. टैस्ट करवाया तो कोरोना पौजिटिव आया. हालांकि अब मृत्युदर काफी कम थी लेकिन फिर भी खतरा तो था ही. आखिर जिस का डर था, वही हुआ. इंफैक्शन बढ़ने के बाद सोम हौस्पिटल गया तो फिर बौडी के रूप में ही वापस आया.

सबकुछ बहुत ही आकस्मिक रहा. महज 3 साल के वैवाहिक जीवन के बाद ही माला की रंगीन साड़ी सफेद हो गई. मां पर तो मानो वज्रपात ही हुआ था. मेघा को भी लगा जैसे कि जिंदगी ट्रेडमिल पर ही चल रही थी. चले तो खूब लेकिन पहुंचे कहीं भी नहीं.

मन बदलने के लिए मेघा ने माला को कुछ दिनों के लिए मां के पास भेज दिया. इस के बाद भी माला अकसर मां के पास ही रहने लगी. मेघा और मंगल उस के भविष्य के लिए फिर से फिक्रमंद होने लगे.

इधर अचानक कुछ दिनों से माला बुझीबुझी सी लग रही थी. सोम की यादों को कारण मान कर मेघा ने उस पर अधिक ध्यान नहीं दिया. मेघा ने महसूस तो किया कि आजकल माला अपने जीजा मंगल से भी कुछ खिंचीखिंची सी रहती है लेकिन यह भी कोई अधिक गौर करने वाली बात नहीं थी. मन खराब हो, तो कुछ भी अच्छा कहां लगता है.

माला पिछले एक माह से मां के पास ही है. आज लंच के बाद मेघा ने भी मां से मिलने का सोचा और स्कूटर ले कर उधर ही चल दी. तभी खयाल आया कि इस समय तो मां सो रही होंगी.

‘कोई बात नहीं, माला तो है न. यों उस से मन की दो बात किए हुए भी समय बीत गया. बेचारी, अभी कुछ भी तो नहीं देखा जिंदगी में, मन ही मन यह सोच कर व्यथित होती मेघा बढ़ी चली जा रही थी. घर के बाहर खड़ी मंगल की मोटरसाइकिल देख कर मेघा चौंक गई.

दरवाजे प‘इन्हें तो इस समय औफिस में होना चाहिए. यहां किस कारण से हैं,’ सोचती हुई मेघा घर के मुख्य दरवाजे तक आ गई. र लगी डोरबैबेल बजातेबजाते अचानक उस के हाथ रुक गए. अंदर से आते हैरान करने वाले वार्त्तालाप ने उसे रुकने को मजबूर कर दिया. “र्मैं ने कह दिया न, मैं यह सब नहीं करने वाली. आप नहीं मानेंगे तो मजबूरन मुझे दीदी को बताना पड़ेगा,” माला की आवाज थी जो गुस्से में लग रही थी.

“यह भी कर के देख लो. लेकिन सोच लेना, कहीं उसे भी तुम्हारी तरह मायके आ कर रहना न पड़ जाए,” मंगल के बेशर्मीभरे इस स्वर की धमकी ने मेघा के सामने सारी स्थिति खोल कर रख दी. उसे माला के उखड़े मन का कारण समझ में आ गया. वह यकीन नहीं कर पा रही थी कि मंगल इतनी कमीनी हरकत कर सकता है. मेघा बिना आहट के ही वहां से लौट आई.

मंगल घर लौटा तो सबकुछ सामान्य था. नन्हा अपने दाद के पास खेल रहा था. मां टीवी देख रही थी. मेघा रसोई में थी. मेघा ने चाय बना कर सासससुर को थमाई और अपना कप ले कर मंगल के पास आ गई. दोनों साथसाथ पीने लगे.

“मैं कुछ दिनों के लिए मां के पास जा रही हूं,” मेघा ने कहा.

“और यहां कौन देखेगा?” मंगल के स्वर में इनकार सा था.

“सोम के बिना भी तो सब चल रहा है न. कुछ दिन मेरे बिना भी चल जाएगा,” मेघा पति के इनकार को खारिज करते हुए मायके जाने की तैयारी करने लगी. बेटी को यों अचानक आया देख कर मां हैरान तो हुईं लेकिन खुश भी थीं. घर में रौनक हो गई.

“मंगल तुझ से क्या चाह रहा है?” एक दिन एकांत में मेघा ने माला से पूछा. माला बहन का प्रश्न सुन कर अचकचा गई. फिर धीरेधीरे सब विस्तार से बताती गई.

“जीजाजी चाहते हैं कि मैं उन्हें सोम की जगह दे दूं. यदि मैं ने ऐसा नहीं किया तो वे तुम्हें छोड़ देने की धमकी देते हैं.” इस के आगे माला ने जो बताया उसे सुन कर मेघा सफेद हो गई. फिर मन ही मन एक निश्चय कर लिया.

“देख माला, अभी तुम्हारी उम्र कुछ भी नहीं है. स्नातक तो तुम हो ही, किसी प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी करो. मन लगा कर करोगी तो तुम्हें विधवा कोटे में नौकरी मिल ही जाएगी. एक बार जिंदगी सही रास्ते पर चल पड़ेगी तो मंजिल मिलने में देर नहीं होगी,” मेघा ने समझाया.

“लेकिन मेरा आधा दिमाग तो जीजाजी ने खराब कर रखा है. हर तीसरे दिन धमक जाते हैं. उन से बचने के लिए ही तो मैं यहां मां के पास रहती हूं. यहां भी चैन से नहीं रहने देते. मेरी जिंदगी को तो आम रास्ता समझ लिया है. कहते हैं कि सोम से पहले भी तो किसी की हो चुकी हो, अब क्या डर है. ऐसे में तैयारी क्या खाक करूंगी,” माला निराश थी.

“तू फिक्र मत कर. तू यहां से दूर जा कर किसी इंस्टिट्यूट में तैयारी कर. मंगल को मैं संभाल लूंगी,” मेघा के सुझाव में दम था.

माला राजी हो गई. माला को दिल्ली के एक बहुत अच्छे इंस्टिट्यूट में बैंकपीओ की तैयारी करने के लिए एडमिशन दिला दिया गया. माला वहीँ होस्टल में रहने चली गई. मंगल को पता चला, तो उस ने बहुत बवाल मचाया.

“इतना बड़ा फैसला अकेले ही कर लिया? पति हूं तुम्हारा. और उस का जीजा भी व जेठ भी. क्या मुझ से पूछना भी जरूरी नहीं लगा तुम्हें?” मंगल ने चिल्लाते हुए कहा. मंगल जाल में फंसने से पहले ही चिड़िया के उड़ने से खिन्न था.

“तुम ने कौन सा जीजा और जेठ की जिम्मेदारी निभाई है. मेरा मुंह न खुले, इसी में तुम्हारी इज्जत है. खुल गया तो पत्नी से भी हाथ धो बैठोगे,” मेघा ने दांत चबा कर पति की आंखों में आंखें डाल कर कहा.

शब्दों की तल्खी से मंगल जान गया था कि मेघा को सब पता चल गया है. वह उन आंखों का सामना नहीं कर सका और तुरंत मेघा के सामने से हट गया.

मेघा को लग रहा था मानो आज उस ने बहन, मां और परिवार के प्रति अपना एक और कर्तव्य निभाया है.

मनपसंद: मेघा ने परिवार के प्रति कौनसा निभाया था फर्ज- भाग 2

इस तरह की बातें बिना पंख ही उड़ती हैं. मेघा की मुंहजोरी की बातें मंगल के घर तक पहुंचीं तो मंगल की मम्मी सतर्क हुई. मंगल को तुरंत लाइनहाजिर किया गया और मेघा के स्वभाव के बारे में पूछताछ की गई. अपनी संतुष्टि के लिए मंगल की मां ने सालभर का समय मांगा ताकि वह मंगल की जीवनसंगिनी बनने के लिए मेघा की उम्मीदवारी को परख सके.

कौन जाने इस बीच मंगल के लिए कोई बेहतर रिश्ता ही मिल जाए. या, हो सकता है कि दोनों के बीच खटास ही आ जाए. मां इसी आस पर सालभर निकाल देना चाहती थी. लेकिन कहते हैं न कि करम तो जहां फूटने को लिखे हैं वहीं फूटते हैं. सालभर बाद भी न तो मंगल को कोई मिली और न ही मेघा को.

सालभर बाद दोनों इस सहमति और शर्त के साथ एक बंधन में बंध गए कि मेघा अपने परिवार की जिम्मेदारी पहले की तरह ही उठाती रहेगी और अपनी तनख्वाह भी पूर्ववत उसी परिवार पर खर्च करती रहेगी. लेकिन मनपसंद साथी का नशा किसी भी अन्य नशे से किसी भी प्रकार कम नहीं होता. मेघा भी प्रेम के नशे में आकंठ डूब गई. वह अपनी तनख्वाह बेशक अपनी मां और बहन पर खर्च करती थी लेकिन अब उस के पास उन पर खर्च करने के लिए समय कम पड़ने लगा था. छुट्टी वाले दिन किसी तरह भागती सी मायके जाती और जाते ही वापसी के लिए घड़ी देखने लगती. साल बीततेबीतते नन्हा गोदी में आ गया तो बचेखुचे समय पर उस का कब्जा हो गया.

इधर माला स्कूल खत्म कर के कालेज में आ गई थी. कालेज का खुलापन, घर में पिता के कठोर अनुशासन की कमी और बहन का बिना जरूरत पैसों से पर्स भरते रहना… किशोर लड़की के राह भटकने के लिए इतने कारण काफी होते हैं.

किसी तरह गिरतेपड़ते माला अपना कालेज कर रही थी. एक दिन पता चला कि माला के पांव गलत पगडंडी पर मुड़ गए. मां ने मेघा और मंगल को बुला कर चर्चा की. सब ने ठंडे दिमाग से सोच कर तय किया कि कालेज खत्म होते ही माला की शादी कर दी जाए.

लेकिन कालेज तो 6 महीने में खत्म हो जाएगा और इतनी जल्दी अच्छा लड़का कहां से तलाश किया जाए. दोतीन महीने खोजने के बाद भी बात बनती दिखाई नहीं दी तो मेघा को अपने देवर सोम का खयाल आया. उस ने मंगल के सामने अपनी बात रखी. मंगल उस का प्रस्ताव सुनते ही उखड़ गया.

“दिमाग खराब हो गया क्या तुम्हारा? जिंदा मक्खी निगलने के लिए तुम्हें सोम ही दिखाई दिया,” मंगल ने गुस्से से कहा.

“बच्चों से गलतियां हो जाती हैं. हम बड़े हैं, हमें ही समझदारी दिखानी होगी. तुम ने मुझ से जिम्मेदारी बांटने का वादा नहीं किया था? तुम्हारी अपनी बहन होती तब भी क्या तुम ऐसे ही तेवर दिखाते?” जैसे कई प्रश्नों के साथ मेघा ने पति पर पलटवार किया.

“हां, तो कर रहे हैं न प्रयास. मिल जाएगा कोई न कोई लड़का. इन सब में सोम को सूली पर टांगने की कहां जरूरत है?” मंगल ने प्रतिरोध किया. लेकिन स्त्री के हठ से भला कौन जीत सका है जो आज मंगल जीत पाता. मेघा के प्रयास रंग लाए और मंगल की नापसंदगी तथा खुद माला की लाख नानुकुर के बाद भी माला सोम के साथ विवाह वचनों से बंधी अपनी बड़ी बहन की देवरानी बन गई.

समय में बहुत शक्ति होती है. बड़े से बड़े घाव भी समय के साथ भर जाते हैं. खरोचों के निशान हलके पड़तेपड़ते एक दिन अदृश्य हो जाते हैं. माला के साथ भी यही हुआ. जवानी के उफनते झरने पर सोम के प्रेम का बांध बनते ही वह शांत नदी सी बहने लगी. अब उसे गृहस्थी में रस आने लगा था. मेघा खुश थी कि उस ने बिगड़ती बात को संभाल लिया था. बहन के घर आने से अब बच्चे की देखभाल के लिए उसे हलकान नहीं होना पड़ता. चौकाचूल्हा भी माला देख लेती है.

थके शरीर को बिस्तर मिलते ही व्यक्ति पहले जरा आराम से लेटता है, फिर आंखें बंद कर दिमाग को शांत करता है और आखिरकार सो जाता है. माला के आने के बाद भी यही हुआ. धीरेधीरे घर की सारी जिम्मेदारी माला पर डाल कर मेघा निश्चिंत हो गई. माला भी खुश थी. दोनों बहनें बारीबारी से मां और सासससुर दोनों की देखभाल कर रही थीं. अपने वादे के अनुसार मेघा आज भी अपनी तनख्वाह का तीसरा हिस्सा ही अपने पास रखती है. शेष 2 हिस्से मां और माला को देती है. इस एक हिस्से से माला और सोम का जेबखर्च निकल आता है. बाकी के खर्चे मंगल और ससुरजी देखते ही हैं.

मेघा ने इतनी तरल जिंदगी की तो कल्पना भी नहीं की थी लेकिन हकीकत को भी भला कैसे झुठलाया जा सकता है. शायद जिंदगी अपनी पिछली गलतियों का पश्चात्ताप कर रही थी. इतने कांटों के बाद कुछ फूलों पर भी हक़ तो बनता ही है.

देखते ही देखते दो हजार बीस का साल आ गया. यह बरस तो मनहूसियत के साथ ही अवतरित हुआ था. चारों तरफ कोरोनाकोरोना का ही तांडव मच रहा था. हर कोई डर के साए में जी रहा था. कौन जाने मौत का अगला शिकार कौन हो. एकएक दिन भारी बीत रहा था.

‘आज तो ठीक है, कल पता नहीं क्या हो.’ हर स्वस्थ व्यक्ति यही सोच रहा था. किसी को जरा सी भी छींक या खांसी आने पर लोग उसे संदिग्ध दृष्टि से देखने लगते. कोई अपना मास्क सही करने लगता तो कोई दो फुट दूर सरक लेता. व्यक्ति से व्यक्ति के बीच अविश्वास की खाई बन गई.

मेघा भी अपने परिवार की सुरक्षा के लिए पूरी तरह सतर्क थी और फिलहाल अभी तक इस महामारी की चपेट में आने से सभी बचे हुए थे.

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