Politics: औरत सरपंच से मुख्यमंत्री तक पतियों का बोलबाला

Politics: औरतों की लीडरशिप पर सवाल उठाता एक विवाद दिल्ली में पिछले दिनों तब शुरू हुआ, जब दिल्ली की मुख्यमंत्री रह चुकीं आतिशी ने दिल्ली की वर्तमान मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता के पति मनीष गुप्ता का एक वीडियो ‘एक्स’ पर पोस्ट कर के लिखा कि ‘इस फोटो को ध्यान से देखिए. जो व्यक्ति एमसीडी (दिल्ली नगरनिगम), डीजेबी (दिल्ली जल बोर्ड), पीडब्ल्यूडी (लोक निर्माण विभाग) और डीयूएसआईबी (दिल्ली शहरी आश्रय सुधार बोर्ड) के अफसरों की मीटिंग ले रहा है, वह दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता के पति मनीष गुप्ता हैं.’

आतिशी ने आगे लिखा कि देश के इतिहास में यह पहली बार हुआ होगा कि एक महिला के सीएम बनने के बाद उन के पति सरकारी कामकाज संभाल रहे हैं. क्या रेखा गुप्ता को काम संभालना नहीं आता? इस वजह से दिल्ली में रोज लंबेलंबे पावर कट हो रहे हैं. प्राइवेट स्कूलों की फीस बढ़ रही है.

आम आदमी पार्टी के नेता सौरभ भारद्वाज ने भी भाजपा प्रदेश अध्यक्ष वीरेंद्र सचदेवा से सवाल किया कि सीएम रेखा गुप्ता के पति मनीष गुप्ता दिल्ली सरकार में किस पद पर हैं, जो वे सरकारी अधिकारियों के साथ मीटिंग कर रहे हैं?

इस तरह की राजनीति करना दिल्ली की 2 करोड़ जनता का अपमान है. उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि सीएम रेखा गुप्ता केवल ‘रबड़ स्टैंप’ मुख्यमंत्री है. मगर दिल्ली कोई ‘फुलेरा’ की पंचायत नहीं है.

इस पोस्ट के बाद तो जैसे भूचाल सा आ गया और महिलाओं के नेतृत्व को ले कर एक नया राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया. भाजपा के नेता अपनी खीज उतारने के लिए आम आदमी पार्टी के मुखिया अरविंद केजरीवाल की पत्नी को भी निशाना बनाते सुनाई दिए, जो केजरीवाल के जेल में बंद रहने के दौरान जनता और मीडिया से वार्ता करते दिखाई दी थीं.

यह कोई नई बात नहीं है, जब औरत को आगे रख कर उस के सारे हक मर्द ने अपने हाथों में ले लिए. देश की पंचायतों में तो यह आम बात है कि जब कोई महिला सरपंच बनती है, तो वह महज ‘रबड़ स्टैंप’ ही होती है, कामकाज तो सारा उस के पति, ससुर या बेटे ही चलाते हैं.

हां, देश की राजधानी में ऐसी तसवीर पहली बार नजर आई, जब मुख्यमंत्री के पति जो किसी भी सरकारी पोस्ट पर नहीं हैं, इतने बड़ेबड़े विभागों के अधिकारियों के साथ मीटिंग कर रहे हैं यानी रेखा गुप्ता, जिन की काबिलीयत पर भरोसा कर के दिल्ली की जनता ने दिल्ली की उन्हें कमान सौंपी थी, जनता के हित से जुड़े फैसले वे नहीं, बल्कि उन के पति ले रहे हैं.

मनीष गुप्ता अगर सरकार में होते तो भी कोई बात नहीं थी, मगर न तो वे सरकार में हैं और न कोई अधिकारी हैं. ऐसे में विपक्ष द्वारा सवाल उठाना गलत नहीं है.

लखनऊ, उत्तर प्रदेश में भी मेयर सुषमा खर्कवाल से ज्यादा उन के बेटे मयंक खर्कवाल शासन का काम संभालते हैं. किसी को अगर सुषमा खर्कवाल से फोन पर बात करनी हो, तो उन का फोन उन के बेटे के पास ही रहता है. मजबूरी में लोगों को अपनी समस्या उन्हीं को सुनानी पड़ती है और फिर उन की मरजी पर होता है कि किस का काम होगा और किस का नहीं.

मध्य प्रदेश में पंचायत चुनाव में महिलाओं को 50 फीसदी आरक्षण दिया गया है, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि चुनाव जीतते ही उन के पति ही पंचायत औफिस में नजर आते हैं.

मनरेगा, गौठान निर्माण, नाली निर्माण, खड़ंजा रोड, स्कूल समेत दूसरे कामों में महिला सरपंच की जगह उन के पति काम कराते हैं. गांव वाले जब अपने काम से पंचायत दफ्तर पहुंचते हैं, तो वहां सरपंच के बजाय सरपंच पति ही मिलता है और सरपंच एक हाथ लंबा घूंघट कर घर में चूल्हा फूंक रही होती है.

ग्राम पंचायतों में महिलाओं की आरक्षित सीट पर मर्द चुनाव नहीं लड़ सकते, इसलिए वे अकसर अपनी पत्नी को चुनाव में खड़ा कर देते हैं. पत्नी के जीतने के बाद अपना दबदबा कायम रखते हैं और पत्नी को मोहरे के रूप में इस्तेमाल करते हैं.

महिला सरपंच घर में बच्चे पालती है, चूल्हाचौका करती है, सासससुर की सेवा करती है और सरपंच पति पंचायत भवन में सरकारी कामकाज चलाता है. गांव के भले के लिए आने वाले सरकारी पैसे में कैसे कितना हिस्साबांट करना है, कितनी सड़कें कागजों पर बनवानी हैं, कितने हैंडपंप कागजों पर लगवाने हैं, कितने स्कूलों की मरम्मत की खानापूरी होनी है, कहां लाइट लगवानी है, ये सारी डीलिंग सरपंच पति ही करता है.

महिला सरपंच किसी कठपुतली की तरह होती है, जिस की डोर पति, देवर, ससुर, बेटे की उंगलियों में फंसी होती है. उस से कब, किस कागज पर दस्तखत करवाने हैं, कब कितने पैसे बैंक खाते से निकलवाने हैं, यह सब मर्दों की जमात ही तय करती है.

दरअसल, मर्दों से दब कर और डर कर रहना धर्म के नाम पर महिलाओं को उन के जन्म लेने के बाद घुट्टी में घोल कर पिलाया जाता है, जिस के असर से वे जिंदगीभर निकल नहीं पाती हैं. वे कितनी भी ऊंची कुरसी पर क्यों न बैठ जाएं, अपनी मरजी से कोई काम नहीं कर पाती हैं.

एक शादीशुदा, बच्चों वाली महिला कई बार ट्रांसफर, प्रमोशन लेने से इनकार कर देती है, क्योंकि ऊंचे पद पर ज्यादा जिम्मेदारी और ज्यादा समय देना पड़ता है. ऐसी औरतें फील्ड वर्क भी करने से बचती हैं, क्योंकि फील्ड वर्क में सारा दिन दौड़ना पड़ता है और घर लौटने का कोई तय समय नहीं होता है.

शादीशुदा औरत को शाम के 6 बजते ही घर लौटने की चिंता सताने लगती है. रात के खाने में क्या पकना है, सुबह बच्चों और पति के टिफिन में क्या देना है, इन्हीं विचारों में घिरी वह तेजी से घर की तरफ भागती नजर आती है. जरा सी देर हो गई, तो सास बखेड़ा खड़ा कर देगी, घर में महाभारत मच जाएगा, पति भी डांटेगा और बच्चे भी बोलने से नहीं चूकेंगे, यह डर चेहरे पर ?ार्रियों की संख्या में इजाफा करता चला जाता है.

धर्म को रचने वाला मर्द है. कभी किसी औरत ने धर्मग्रंथों की रचना की हो, ऐसा सुनने को नहीं मिला. तो जो ग्रंथ मर्दों ने रचे हैं, उन में उन्होंने औरत को काबू में रखने के लिए अनेकानेक नियम बनाए. सारे धार्मिक कामों को पूरा करने की जिम्मेदारी उन के सिर पर रख दी. न करने पर दंड की व्यवस्था भी रखी. नरक का डर भी दिखाया.

लिहाजा, औरत जिंदगीभर इन्हीं धार्मिक कर्मकांडों में घिरी रहती है, उसे सोचनेविचारने का समय ही नहीं मिलता कि धर्मग्रंथों की जो बातें बचपन से घुट्टी की तरह पिलाई गईं, वे ठीक भी हैं या नहीं. अविवाहित होने पर पिता उस को धर्म के नाम पर डराए रखता है और शादी के बाद पति. उस का खुद का नेतृत्व और विचार तो कभी उभरता ही नहीं है.

लिहाजा, औरतों को अगर खुद के बलबूते कुछ करना है, तो उसे किसी तरह मर्दों के बनाए गए नियमों से खुद को आजाद करना होगा.

Bollywood Update: ‘अंदाज अपना अपना’ पर झगड़ा

फिल्म ‘लाल सिंह चड्ढा’ के पिट जाने के बाद आमिर खान फिलहाल टैलीविजन के इश्तिहारों में ज्यादा दिखाई दे रहे हैं, पर हाल ही में उन्होंने मीडिया से कहा था, ‘‘हम सभी चाहते हैं कि फिल्म ‘अंदाज अपनाअपना 2’ बने. हम ने राजजी (राजकुमार संतोषी) से स्क्रिप्ट पर काम करने को कहा है. जैसे ही उन की स्क्रिप्ट तैयार होगी, सलमान खान और मैं निश्चित रूप से उस पर काम करना चाहेंगे.’’

पर यह बात कुछ लोगों को पसंद नहीं और इस फिल्म पर कोई भी काम शुरू होने से पहले ही विवाद खड़ा हो गया. दरअसल, इस फिल्म के प्रोड्यूसर विनय कुमार सिन्हा के बच्चों ने कहा है कि वे कभी भी आमिर को फिल्म के राइट्स नहीं बेचेंगे. उन्होंने यह भी कहा कि फिल्म ‘अंदाज अपनाअपना’ के राइट्स न तो आमिर के पास हैं और न ही डायरैक्टर राजकुमार संतोषी के पास. सिर्फ उन के पिता विनय कुमार सिन्हा ही राइट्स के असली मालिक हैं.

शरवरी वाघ को मिली बड़ी सफलता

कई साल पहले फरहान अख्तर ने ‘डौन’ फिल्म को दोबारा बनाया था. इस में शाहरुख खान ने वही किरदार निभाया था, जो कभी अमिताभ बच्चन ने किया था. फिर ‘डौन 2’ आई. उस में भी शाहरुख खान ही हीरो थे. पर अब फरहान अख्तर की अपकमिंग फिल्म ‘डौन 3’ में रणवीर सिंह हीरो होंगे और उन के साथ शरवरी वाघ रोमांस करने आ रही हैं.

बता दें कि पहले इस फिल्म की हीरोइन कियारा आडवाणी थीं, पर अब उन्होंने इस फिल्म को अपनी प्रेग्नेंसी की वजह से ‘बाय’ कह दिया है, जिस के बाद शरवरी वाघ को यह रोल मिला है.

काजोल ने खोले बीते कल के राज

काजोल को एक बेहतरीन हीरोइन और बिंदास औरत के रूप में जाना जाता है. हाल ही में उन्होंने एक इंटरव्यू में बताया कि वे कैसे अजय देवगन से मिली थीं और कैसे उन दोनों में प्यार पनपा था.

काजोल ने अपने कल के राज खोलते हुए बताया कि वे पहली बार अजय देवगन से एक फिल्म के सैट पर मिली थीं और उस समय दोनों किसी और के साथ रिलेशनशिप में थे, पर समय के साथ, जैसेजैसे हालात बदले तो दोनों ने अपनेअपने रिश्ते खत्म किए, फिर उन की दोस्ती गहरी होती गई और आखिरकार उन का यह रिश्ता प्यार में बदल गया.

काजोल ने यह भी बताया कि एक समय कैसे लोग उन्हें उन के रंग, वजन और चश्मे के आधार पर आंकते थे. पर इन नैगेटिव कमैंट के बावजूद वे लड़खड़ाई नहीं और अडिग रहीं, क्योंकि उन्हें अपने टैलेंट पर भरोसा था.

आलिया को बताया ‘पानी कम चाय’

महेश भट्ट ने 2 शादियां की थीं. उन के पहली पत्नी से 2 बच्चे पूजा भट्ट और राहुल भट्ट हैं और दूसरी पत्नी से आलिया भट्ट और शाहीन भट्ट. इन चारों बच्चों में से पूजा भट्ट और आलिया भट्ट ने हीरोइन बन कर फिल्मों में काफी नाम कमाया है.

पर जब राहुल भट्ट से पूछा गया कि पूजा भट्ट और आलिया भट्ट में से कौन बेहतर है, तो उन्होंने सीधेतौर पर बोला, ‘‘मेरी राय में वह (आलिया भट्ट) मेरी सगी बहन पूजा की आधी भी नहीं है. न टैलेंट में, न रूप में और न ही सैक्सी होने के मामले में. मेरी बहन के सामने वह ‘पानी कम चाय’ है. भाईबहनों में सब से टैलेंटेड पूजा हैं. पूजा ने मेरे पिता की विरासत को आगे बढ़ाया. मैं ने उन का स्टारडम देखा है. वे उस समय देश की सब से बड़ी सैक्स सिंबल थीं.’’

Indian Constitution: अंबेडकर को पूजिए नहीं, संविधान को मानिए

Indian Constitution: देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 14 अप्रैल को ‘अंबेडकर जयंती’ के मौके पर डाक्टर भीमराव अंबेडकर की जिस मूर्ति की पूजा कर रहे थे, उस पर फूलमाला चढ़ा रहे थे, उस मूर्ति के हाथ में संविधान है. इस का मतलब यह होता है कि अंबेडकर के साथसाथ हम संविधान की भी पूजा कर रहे हैं.

नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बनने के बाद जब पहली बार संसद में जा रहे थे, तो संसद की सीढि़यों के सामने लेट कर नतमस्तक हुए थे. इस के बाद संविधान के प्रति अपनी आस्था को दिखाने के लिए ‘संविधान दिवस’ भी मनाना शुरू किया.

साल 2024 के लोकसभा चुनाव के जब नतीजे आए, तो यह साफ संकेत मिल गया था कि संविधान के मुद्दे पर ही भाजपा को हार का सामना करना पड़ा था. इस के बाद भाजपा संविधान और डाक्टर अंबेडकर को
ले कर सचेत हो गई.

11 जनवरी से 26 जनवरी के बीच ‘संविधान गौरव अभियान’ चलाया गया.

‘अंबेडकर जयंती’ पर इसी रणनीति के तहत भाजपा बड़ी संख्या में कार्यक्रम करा रही है. सवाल उठता है कि क्या केवल पूजा और सम्मान से बात बन जाएगी?

डाक्टर भीमराव अंबेडकर ने कहा था कि भले ही संविधान कितना ही अच्छा हो, उसे लागू करने वाले लोग अच्छे नहीं हैं, तो वह भी बुरा साबित हो सकता है. अब सुप्रीम कोर्ट का फैसला न केवल तमिलनाडु, बल्कि सभी राज्यों के लिए एक संवैधानिक चेतावनी भी है कि राज्यपालों को लोकतंत्र के पहरेदार की भूमिका में रहना चाहिए.

केंद्र सरकार को डाक्टर अंबेडकर की पूजा करने से बेहतर है कि वह उन के बनाए संविधान पर चले. आज संविधान और डाक्टर अंबेडकर जैसी ही हालत में महिलाएं भी पहुंच गई हैं. वैसे तो उन को लक्ष्मी बता कर पूजा जाता है, लेकिन अधिकार उन को नहीं दिए जाते हैं. संविधान ने लड़कियों को पिता की संपत्ति में बराबर का हक दिया है.

देश के कितने परिवारों ने अपने घर की महिलाओं को यह हक दिया? क्या सरकार ने कोई पहल की?

आज भी लड़कियों को पिता की संपत्ति अधिकार नहीं दिया जाता है. घर की मालकिन उस को कहा जाता है, पर मकान और बिजनैस पर नाम पुरुष के अधिकार में होता है स्टैंप डयूटी बचाने के लिए महिला के नाम रजिस्ट्री भले हो जाए, पर जमीन और मकान पर असल अधिकार आदमी का ही होता है.

जिस तरह से लक्ष्मी के रूप में औरतों को पूजा जाता है, उसी तरह से अंबेडकर और संविधान की पूजा तो होती है, लेकिन उस के बताए रास्ते पर चलते नहीं हैं.

समाज में दलितों की हालत अभी भी बहुत सोचने वाली है. उन को घोड़ी पर चढ़ने से रोका जाता है. मूंछें नहीं रखने दी जाती हैं. बारबार ‘मनुस्मृति’ का हवाला दिया जाता है. दलित इस समाज का हिस्सा नहीं हैं, यह जताने की कोशिश होती है. वह अंबेडकर की पूजा कर सकते हैं, लेकिन मंदिर में मूर्ति की पूजा करने से रोका जाता है.

इतना ही नहीं, दलितों के खिलाफ अत्याचार के मामलों में भाजपा शासित राज्य उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान और बिहार सब से ऊपर है. अनुसूचित जाति के खिलाफ साल 2022 में अत्याचार के सभी मामलों में से तकरीबन 97.7 फीसदी मामले 13 राज्यों में दर्ज किए गए, जिन में उत्तर प्रदेश, राजस्थान और मध्य प्रदेश में सब से ज्यादा अपराध दर्ज किए गए.

अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत नवीनतम सरकारी रिपोर्ट के अनुसार, अनुसूचित जनजाति (एसटी) के खिलाफ ज्यादातर अत्याचार भी इन 13 राज्यों में केंद्रित थे, जहां साल 2022 में सभी मामलों में से 98.91 फीसदी मामले इन 13 राज्यों में से सामने आए.

उत्तर प्रदेश, राजस्थान, और मध्य प्रदेश में सब से ज्यादा मामले सामने आए.

अनुसूचित जाति (एससी) के खिलाफ कानून के तहत साल 2022 में दर्ज किए गए 51,656 मामलों में से उत्तर प्रदेश में 12,287 के साथ कुल मामलों का 23.78 फीसदी हिस्सा था. इस के बाद राजस्थान में 8,651 (16.75 फीसदी) और मध्य प्रदेश में 7,732 (14.97 फीसदी) थे.

अनुसूचित जाति के खिलाफ अत्याचार के मामलों की ज्यादा संख्या वाले अन्य राज्यों में बिहार 6,799 (13.16 फीसदी), ओडिशा 3,576 (6.93 फीसदी) और महाराष्ट्र 2,706 (5.24 फीसदी) थे. इन 6 राज्यों में
कुल मामलों का तकरीबन 81 फीसदी हिस्सा है.

साल 2022 के दौरान भारतीय दंड संहिता के साथसाथ अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत पंजीकृत अनुसूचित जाति के सदस्यों के खिलाफ अत्याचार के अपराधों से संबंधित कुल मामलों (52,866) में से 97.7 फीसदी (51,656) मामले 13 राज्यों में हैं.

इसी तरह एसटी के खिलाफ अत्याचार के ज्यादातर मामले 13 राज्यों में केंद्रित थे. इस के तहत दर्ज 9,735 मामलों में से मध्य प्रदेश में सब से ज्यादातर 2,979 (30.61 फीसदी) मामले दर्ज किए गए.

राजस्थान में 2,498 (25.66 फीसदी) के साथ दूसरे सब से ज्यादा मामले थे, जबकि ओडिशा में 773 (7.94 फीसदी) दर्ज किए गए. ज्यादा संख्या में मामलों वाले अन्य राज्यों में 691 (7.10 फीसदी) के साथ महाराष्ट्र और 499 (5.13 फीसदी) के साथ आंध्र प्रदेश भी शामिल हैं.

कोर्ट से ले कर अपराध के आंकड़े तक बता रहे हैं कि कानून और संविधान का कितना पालन हो रहा है. ऐसे में केवल दिखावे के लिए डाक्टर अंबेडकर की मूर्ति पूजा से बदलाव नहीं आएगा.

देश में बदलाव तब आएगा जब दलित हो या औरतें उन को सही तरह से हक दिए जाएं. घरों में लड़कियों को आज भी खराब स्कूल में पढ़ने भेजा जाता है. उन के कैरियर को बढ़ाने के लिए पैसे खर्च करते समय घर वाले कई बार सोचते हैं.

शादीब्याह के मसलों में भी लड़कियों के हक न के बराबर हैं. औरत कितने बच्चे पैदा करेगी, यह तय करने का काम मर्द करता है. संविधान महिलाओं को पूरी आजादी देता है. समाज अभी भी छोटी सोच का परिचय देता है.

संविधान निर्माता डाक्टर भीमराव अंबेडकर को सच्ची श्रद्वांजलि वह होगी, जब सरकार उन के बनाए संविधान पर चले. उन की मूर्ति पर फूल चढ़ाने से कोई फायदा नहीं होने वाला है.

Fashion Tips: युवाओं में धोती आउटफिट – फैशन बना पैशन

Fashion Tips: पुरुषों में धोती पहले पारंपरिक परिधान था, लेकिन आज यह फैशन ट्रैंड बन गया है. इसे विभिन्न अवसरों पर युवाओं को पहने हुए देखा जा सकता है जैसे शादी, त्योहार, सांस्कृतिक कार्यक्रम या किसी पार्टी में भी एक अलग लुक देने के लिए यूथ इसे पहनना पसंद कर रहे हैं.

आजकल धोती को कुरता, अंगवस्त्रम या वैस्टर्न टौप्स के साथ भी पहनने पर व्यक्ति भीड़ में सब की आकर्षण का केंद बनता है. यही वजह है कि कई अवसरों पर आज के यूथ धोती आउटफिट के साथ नजर आते हैं.

रौयल लुक

पिछले दिनों 25वें लैक्मे फैशन वीक के समर कलैक्शन में डिजाइनर अभिषेक रौय के लिए, जब जानेमाने अभिनेता प्रोसेनजित चैटर्जी ब्लैक बंगाली धोतीकुरता और ब्लैक जैकेट पहन कर मंदमंद मुसकान बिखेरते हुए रैंप पर उतरे, तो सब की निगाहें उन पर केंद्रित रही, क्योंकि उस आउटफिट में वे बहुत ही आकर्षक दिख रहे थे.

यही वजह है कि आज के यूथ किसी भी अवसर पर धोती आउट्फिट को पहनने से कतराते नहीं. बौलीवुड भी किसी क्लासिक मौडर्न फिल्मों के लिए धोती आउटफिट को अपनाते हैं.

आरामदायक परिधान

असल में धोती पैंट, क्लासिक धोती का समकालीन रूप है, जिस ने भारतीय पुरुषों के परिधानों में अपना एक अलग क्लासिक रूप दिखाया है. क्लासिक आकर्षण और आधुनिक व्यावहारिकता का मिश्रण, ये हाइब्रिड बौटम्स, स्टाइल के दीवाने भारतीय फैशन पसंद पुरुषों के लिए एक अच्छा विकल्प माना जा रहा है। इसे पहनने की एक खास वजह आराम और स्टाइल का मेल होना भी है.

यह उन युवाओं के लिए भी खास है, जो सांस्कृतिक जुड़ाव और समकालीन फैशन दोनों चाहते हैं. विभिन्न विकल्पों के साथ यह बहुमुखी धोती किसी भी पुरुष को आरामदायक रहते हुए अपने व्यक्तित्व को व्यक्त करने की पूरी आजादी देता है.

स्पैशल लुक

डिजाइनर अभिषेक रौय कहते हैं कि मैं सालों से डिजाइनिंग के क्षेत्र में हूं और जब इस बार लैक्मे के 25वीं वर्षगांठ पर मुझे धोती क्रिऐशंस को दिखाने का मौका मिला, तो यह मेरे लिए स्पैशल बात रही, क्योंकि यह मेरा डैब्यू शो था. फैशन के क्षेत्र में आने की इच्छा मुझे हमेशा से रही है, क्योंकि इस में मेरा पैशन है. मैं ने शांतिनिकेतन से टैक्सटाइल में पढ़ाई पूरी की है और फैशन में नईनई चीजों को क्रिऐट करना बहुत पसंद रहा है.

वे कहते हैं कि पहले मैं कौस्टयूम डिजाइनर बना और उस के बाद मैं ने अपना ब्रैंड रौयल कोलकाता शुरू किया. मेरे काम में मेरे परिवार का हमेशा सहयोग रहा है। ऐसे में, मैं ने जो काम करना चाहा कर रहा हूं. मैं ने लाइफ के लिए कोई प्लान कभी नहीं किया। मैं हमेशा फ्लो में जाता हूं और आज यहां तक पहुंचा हूं, लेकिन डिजाइन करते समय अपने रूटस और ट्रैडिशन पर हमेशा ध्यान देता हूं.

फिल्मी सितारों की खास पसंद

डिजाइनर कहते हैं कि मैं ने जब एक दीवाली पर सैफ अली खान के साथ काम किया, तो वह प्लांड नहीं था, लेकिन सैफ की धोती पंजाबी लुक सब को आकर्षित किया और सभी ने इसे किसी खास मौके पर पहनना जरूरी समझा.

अभिनेत्री रेखा मेरी फैशन दिवा हैं। वे आज भी जिस तरह से फैशन को कैरी करती हैं, वह काबिलेतारीफ है. नई जैनरेशन में अभिनेता रणवीर सिंह की स्टाइल सैंस बहुत अच्छी है, क्योंकि वे किसी भी पोशाक को बहुत ही खूबसूरती से कैरी करते हैं. उन की पसंद भी धोती आउटफिट है.

कौंटेंपररी स्टाइल स्टैटमेंट

कुछ लोग धोती कुरते के पहनावे को गांवदेहात का मानते हैं, जबकि यह एक रौयल पहनावा है. डिजाइनर अभिषेक कहते हैं कि धोती कभी भी गांवदेहात का पहनावा नहीं रहा है, यह एक रौयल इंडियन लुक है. सिर्फ बंगाल ही नहीं, जितने भी रौयल फैमिली को मैं ने देखा है, उन के लिए धोती एक रौयल्टी है. धोती रौयल लुक को प्रदर्शित करता है.

सैफ अली खान को जब मैं ने दीवाली पर धोती पहनाया था, तो उन का लुक इतना वायरल हुआ कि काफी लोगों ने इस के बाद से धोती को खास अवसर पर अपना आउटफिट बनाया.

डिजाइनर कहते हैं कि धोती पहनने का तरीका नई जैनरेशन को पता नहीं है, उन्हे मैं परिचय करवा रहा हूं और धोती को मौडर्न लुक दे रहा हूं, ताकि वे भी इस पोशाक को ऐडौप्ट करें, इस के बारे में जानें. इसलिए मैं ने कई सारे मौडल्स धोती आउटफिट के साथ उतारे हैं, जिस में आइकन प्रोसेनजीत चैटर्जी के साथ आइकन टैनिस खिलाड़ी लिएंडर पेस को भी उतारा, जिस से आज के यूथ को यह बहुत पसंद आया. इस तरह से मैं धोती के पहनावे को एक नया स्टाइल स्टैटमेंट बनाना चाहता हूं.

धोती पैंट का विकास

आज की तारीख में धोती पैंट एक गेम चेंजर के रूप में उभरे हैं, जो पैंट के रूप में स्ट्रक्चर्ड फिट के साथ पहना जाता है. इलास्टिक वाले कमरबंद और सुविधाजनक जेबें उन की पहनने की क्षमता को और बढ़ा देती हैं, जिस से वे कई अवसरों के लिए उपयुक्त बन जाते हैं. डिजाइनर धोती पैंट को समकालीन रूप देने के लिए डिजाइनरों ने नएनए कपड़ों, पैटर्न और सिलवेट के साथ प्रयोग किया जा रहा है.

धोती को स्टाइल करने का सब से लोकप्रिय तरीका कुरता के साथ पहनना है, जिसे आधुनिक धोती कुरता पहनावा कहा जाता है.

आरामदायक और परिष्कृत लुक के लिए मिट्टी के रंग या पेस्टल रंगों में कौटन या लिनन जैसे हलके कपड़े चुनें.

धोती पहनने के तरीके

धोती एक वर्सैटाइल पोशाक है। इसे ट्रैडिशन में कुरते के साथ पहनें तो ठीक रहता है, लेकिन धोती शर्ट या कुरते के साथ जैकेट डाल कर या किसी वैस्टर्न वियर के साथ भी पहन सकते हैं, जो किसी भी पार्टी में सब की आकर्षण का केंद्र बनता है.

डिजाइनर बताते हैं कि मैं इसे अधिक मौडर्न बना कर नई जैनरेशन तक पहुंचाने की कोशिश लगातार कर रहा हूं, जिसे यूथ पसंद कर रहे है. मेरे पोशाक केवल देश में नहीं, बल्कि विदेशों में भी काफी प्रचलित हैं.

इस के अलावा इसे अलगअलग कुरता स्टाइल के साथ पहना जा सकता है, जैसे अंगरखा या साइडस्लिट डिजाइन, जो विशेषरूप से चलन में हैं. यह आधुनिक धोती कुरता लुक है, जो क्लासिक और आधुनिक शैलियों का मिश्रण होता है.

फैब्रिक की बात करें तो सिल्क, कौटन, ब्रोकेड आदि का प्रयोग डिजाइनर अधिक करता है. फैब्रिक कोई भी हो, धोती का मुख्य आकर्षण इस के फौल का सही होना होता है. इसलिए जिस में फौल अच्छा आता है, उसी फैब्रिक का प्रयोग डिजाइनर अभिषेक करते हैं.

पहनना बहुत आसान

सब से अच्छी बात इस पोशाक में यह है कि इसे पहनना बहुत आसान होता है। यह रैडी टू वियर पोशाक है. पैंट या पजामा की तरह ही इसे पहना जा सकता है. इसे केवल फैस्टिवल में ही नहीं, डेली वियर में भी धोती के साथ एक शर्ट पहन कर कहीं भी जा सकते हैं.

इसे समर वियर के रूप में कौटन धोती और कौटन शर्ट बहुत ही आरामदायक और स्मार्ट लुक देता है और यह आप का स्टीलर स्टैटमेंट भी बन सकता है.

बंगाल कौटन है बैस्ट

डिजाइनर आगे कहते हैं कि मेरे कारीगर बंगाल के फुलिया, वर्धमान, शांतिनिकेतन, कोलकाता आदि कई जगहों पर हैं, जो मेरे टैक्सटाइल और उन पर कढ़ाई का काम करते हैं. बंगाल के टैक्सटाइल काफी अच्छी क्वालिटी की है, जिस से और अधिक ऐक्स्प्लोर करना जरूरी है.

सैफ अली खान के बाद यूथ ने धोती को पहनना शुरू कर दिया है. आगे कई फिल्मों में भी धोती आउटफिट को पहचान मिलने की उम्मीद है.

धोती के साथ ऐक्सैसरीज

जब आधुनिक धोती कुरते के साथ ऐक्सैसरीज की बात आती है, तो काम अकसर ज्यादा होता है. मिनिमलिस्टिक लोफर्स शूज या जूतियों की एक जोड़ी आसानी से आउटफिट को बेहतर बना सकती हैं. शाही अंदाज के लिए, कंट्रास्टिंग वैस्टकोट या दुपट्टा पहनने पर इस का लुक रौयल हो जाता है.

आज के यूथ परंपरा और आधुनिकता के बीच संतुलन बनाने में विश्वास रखते है, जिस में धोती आउटफिट उन के बीच काफी पौपुलर हो चला है, क्योंकि इस से उन की व्यक्तिगत शैली निखर कर सामने आती है.

Hindi Story: एक अंबर सूना सा

Hindi Story: ‘‘अंबर, क्या कह रहे हो तुम… बहू को तलाक चाहिए… पर अभी तुम्हारी शादी को तो सिर्फ 4 महीने ही हुए हैं,’’ मां ने हैरान होते हुए कहा.

‘‘आप लोगों के कहने पर मैं ने शादी कर ली थी, पर अब दिल्ली की एक लड़की यहां इस छोटे से शहर में खुश नहीं रह पा रही है, तो मैं क्या करूं,’’ अंबर ने झल्लाते हुए कहा.

‘‘ठीक है, मैं बहू से बात करती हूं… देखती हूं कि माजरा क्या है,’’ मां ने कहा और अंदर चली गईं.

दिल्ली से 800 किलोमीटर की दूरी पर तराई के इलाके में बसा हुआ यह छोटा सा शहर था. यहां पर गन्ने की फसल ज्यादा होने के चलते लोग इसे ‘चीनी का कटोरा’ भी कहते थे.

इस जगह पर आज से 20 साल पहले देव रायजादा ने एक इंगलिश मीडियम स्कूल की स्थापना की थी और इसी जगह को अपनी कर्मभूमि भी बनाया था.

अच्छे स्कूलों की कमी के चलते देव रायजादा का ‘स्टार इंटरनैशनल स्कूल’ खूब चलने लगा था और देव रायजादा ने इस छोटी सी जगह पर अच्छा मुकाम हासिल कर लिया था.

देव रायजादा के 2 बेटे थे. बड़े बेटे का नाम अंबर और छोटे बेटे का नाम धीरज था. दोनों की पढ़ाईलिखाई नैनीताल में हुई थी. जब बड़ा बेटा अंबर नैनीताल में मैनेजमैंट का कोर्स पूरा कर के आया, तो देव रायजादा ने अपना स्कूल का बिजनैस उसे सौंपने में जरा भी देर नहीं की.

इस के बाद अंबर ने स्कूल में कई मौडर्न बदलाव किए. पहले से बेहतर स्टाफ बहाल किया और कुछ दिनों में ही ‘स्टार इंटरनैशनल स्कूल’ की गिनती शहर के ही नहीं, बल्कि पूरे जिले के अच्छे स्कूलों में होने लगी.

स्कूल चलने लगा, तो देव रायजादा निश्चिंत हो गए और अंबर की शादी के लिए लड़की तलाशने लगे. अब अगर लड़का अच्छी पढ़ाई कर के आया है, तो लड़की भी पढ़ीलिखी और ऊंचे घराने की होनी चाहिए.

अंबर ने शादी के लिए बहुत नानुकर भी की, पर देव रायजादा को अपने बेटे की शादी कराने की बड़ी हसरत थी, इसलिए अंबर भी कुछ कह न सका.

अंबर की शादी दिल्ली से हुई थी. लड़की विद्या भी बड़े घराने से थी. विदाई के बाद वह ससुराल आ गई.

जहां ससुराल आने के बाद लड़की के चेहरे पर चमक आनी चाहिए, वहां विद्या का चेहरा मुरझाने लगा.

सभी घर के लोगों ने भी इस बात पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया, क्योंकि शादी के बाद पहली बार ससुराल आने पर थोड़ाबहुत एडजस्ट करने में समय तो लगता ही है.

पर आज अचानक से बहू के द्वारा तलाक दिए जाने की बात ने सब को हिला कर रख दिया था, पर अंबर अब भी सामान्य ही दिख रहा था.

मां ने जब बहू से तलाक की वजह जाननी चाही, तो उस ने नपेतुले शब्दों में उन से यह कह दिया, ‘‘तलाक के पीछे की वजह आप अपने बेटे से ही पूछिएगा,’’ कह कर विद्या अपने मायके जाने की तैयारी करने लगी.

सब को लग रहा था कि हो सकता है कि पतिपत्नी में कोई ?ागड़ा हुआ हो और बहुत मुमकिन है कि विद्या वापस आ जाए, पर काफी समय बीतने के बाद भी विद्या तो नहीं आई, अलबत्ता तलाक के लिए उस के वकील का फोन जरूर आ गया.

तलाक देने के लिए अंबर भी उत्सुक दिखा. इस तरह अंबर और विद्या में तलाक हो गया.

कितने नाजों से अंबर की शादी कराई थी देव रायजादा ने और शादी के बाद इतनी जल्दी बेटे का तलाक हो जाने से देव रायजादा और उन की पत्नी बहुत दुखी हो रहे थे. पूरे कसबे में उन की किरकिरी हो रही थी.

अपनी पूरी जिंदगी में देव रायजादा ने औरतों को दोयम दर्जे की निगाह से ही देखा था और अपने स्कूल में
काम करने वाली हर औरत का जिस्मानी और दिमागी शोषण करने में भी देव रायजादा का कोई सानी नहीं था.

स्कूल के होस्टल में महिला वार्डन के पद पर जो भी महिला आती, देव रायजादा उस से पहले तो बहुत शालीनता से पेश आते, फिर धीरेधीरे उस से हंसीठिठोली और मजाक का मौका देख कर उसे अपनी हवस का शिकार बना लेते.

अगर महिला वार्डन को अपना जिस्मानी शोषण कराना मंजूर होता, तो वह चुपचाप काम करती रहती और अगर कोई इस के खिलाफ आवाज उठाती तो देव रायजादा उस पर ?ाठे आरोप लगा कर उसे नौकरी से ही निकाल देते थे.

कुछ इस तरह की नजर देव रायजादा रखते थे अपने महिला स्टाफ पर और आज उसी का लड़का ऐसा नकारा निकेलगा, जिस से अपनी एक खूबसूरत बीवी भी नहीं संभाली जाएगी, यह बात देव रायजादा के लिए बहुत बेइज्जती वाली थी.

एक तरफ तो देव रायजादा कसबे के एक इज्जतदार आदमी के रूप में अपनेआप को दिखाते थे, तो वहीं दूसरी तरफ उन का असली चेहरा एक ऐयाश का था, पर उन की बीवी मालिनी उतनी ही अंधविश्वासी और तंत्रमंत्र में यकीन करने वाली थीं. अपने विशाल भवन में वास्तु के आधार पर कुछ न कुछ तोड़फोड़ कराना व साधु और तांत्रिकों को अनुष्ठान के नाम पर घर पर बुलवाना और कुछ न कुछ देते रहना देव रायजादा के परिवार का पसंदीदा काम था.

‘‘देखो, हमारा अंबर कितना हैंडसम है. शादी में घोड़ी पर बैठा हुआ कितना बांका जवान लग रहा था. मैं तो कहती हूं कि हो न हो, उसे किसी की बुरी नजर लग गई है,’’ मालिनी ने अपने पति देव रायजादा से चिंता जाहिर की, तो उन की हां में हां मिलाते हुए देव रायजादा भी सोच में पड़ गए.

‘‘आप कहें तो हम एक तांत्रिक को बुला कर अंबर की बुरी नजर उतरवा दें, ताकि उस की जिंदगी भी दोबारा पटरी पर आ सके?’’ मालिनी ने कहा, तो देव रायजादा भी उन का खुल कर विरोध नहीं कर सके. उस दिन सुबह से ही मालिनी और देव रायजादा ज्यादा जोश में नजर आ रहे थे. होते भी क्यों न, आज उन के यहां एक बड़े तांत्रिक जो आने वाले थे… स्वर्णकांत महाराज.

इन तांत्रिक का रुतबा और अहमियत इसलिए भी बढ़ जाती थी, क्योंकि ये एक ‘पुण्यात्मा’ नाम के टैलीविजन चैनल पर आते थे और देखने वालों को तंत्रमंत्र की जानकारी देते थे.

पूरे घर में स्वर्णकांत महाराज के लिए खास इंतजाम किए गए थे. गुरुजी के लिए फूस की एक कुटिया बना दी गई थी, पर उन्हें गरमी न लग जाए, इसलिए उसी कुटिया में एक एयरकंडीशनर लगा दिया गया था और नौकरचाकरों को भी उन की सेवा में रहने के लिए आदेश दे दिया गया था.

ये कोई ऐसे तांत्रिक नहीं थे, जो हवनकुंड के सामने बैठ कर धुएं में कुछ नशीली चीज मिला कर लोगों को ठगते हों, बल्कि तांत्रिक स्वर्णकांत का लोगों को ठगने का तरीका कुछ मौडर्न सा था.

तांत्रिक स्वर्णकांत लोगों का हाथ पकड़ते, उन से कुछ सवाल पूछते और उस के बारे में सबकुछ जान लेने का दावा करते थे. अंबर को भी आज शाम को उन के पास लाया जाना था.

अपनी फूस की झांपड़ी में आंखों को बंद किए हुए स्वर्णकांत महाराज बैठे हुए थे. रायजादा दंपती अपने बेटे अंबर को ले कर आए और तांत्रिक को प्रणाम करते हुए अंबर को उन के पास जाने को कहा.

तांत्रिक स्वर्णकांत ने अंबर की ओर देखा, उस का दायां हाथ अपने हाथ में पकड़ा और कुछ देर तक बुदबुदाने का नाटक किया और रायजादा दंपती की ओर देख कर बोले, ‘‘अंबर कुछ परेशान है. इसे कुछ समय चाहिए. मैं इसे कुछ क्रियाएं बता दूंगा, जिन्हें करने से इसे आराम मिलेगा.’’

‘‘पर स्वामीजी, शादी के 4 महीने बाद ही बहू का इस तरह मेरे बेटे से मोह भंग हो जाना कैसे हुआ?’’ देव रायजादा ने हाथ जोड़ते हुए पूछा.

‘‘कुलटा थी वह…’’ स्वर्णकांत ने थोड़ा गुस्सा होते हुए कहा, ‘‘किसी दूसरे मर्द के चक्कर में थी तेरी बहू… वह भी एक शादीशुदा मर्द के साथ, इसीलिए तेरे इस राजमहल जैसे घर में भी उसे अच्छा नहीं लगा और वह भाग गई.’’

अपनी बहू के बारे में ऐसी बातें सुन कर रायजादा दंपती सन्न रह गए और दांतों तले उंगली दबाने लगे.

‘‘चलो, अच्छा हुआ, जो ऐसी लड़की से पिंड छूट गया,’’ मालिनी ने धीरे से कहा.

तकरीबन एक हफ्ते तक तांत्रिक स्वर्णकांत ‘रायजादा हाउस’ में रुके और उन की तमाम तरह की समस्याओं का कुछ न कुछ हल बताते रहे. जाते समय पूरे 5 लाख रुपए का चैक देव रायजादा ने स्वर्णकांत महाराज के चरणों में अर्पित कर दिया.

स्वर्णकांत महाराज ने जातेजाते यह भी बताया कि ‘रायजादा हाउस’ में पौजिटिव ऊर्जा की कमी है, इसीलिए उन पर आएदिन कुछ न कुछ संकट आता रहता है. इस पौजिटिव एनर्जी को बढ़ाने के लिए अपने घर के बीचोंबीच एनर्जी बढ़ाने वाले लाल रंग के बड़ेबड़े पत्थर लगवाने होंगे, जो सिर्फ स्वर्णकांत के आश्रम में ही अभिमंत्रित किए जाते हैं.

स्वर्णकांत ने यहां से पहुंचते ही उन पत्थरों को तैयार कर के देव रायजादा को भेजने की बात कह दी और स्वर्णकांत के एक चेले ने उन पत्थरों को अभिमंत्रित कर के यहां तक भेजने का खर्चा साढ़े 3 लाख रुपए बताया, जिस का भुगतान भी बड़ी ही श्रद्धा के साथ चैक के रूप में देव रायजादा ने तुरंत ही कर दिया था.

अगले कुछ महीनों में देव रायजादा ने अंबर के अंदर कुछ पौजिटिव से बदलाव होते देखे. अब अंबर ने अपनी जिंदगी को थोड़ा संवारने की कोशिश की थी और अपनेआप को स्कूल के कामकाजों में बिजी कर लिया था.

अंबर के पापा को उस का यह बदला हुआ रूप देख कर बहुत अच्छा लग रहा था और वे मन ही मन एक बार फिर से अंबर की शादी बड़े ही धूमधाम से कराने की बात सोच रहे थे.

देव रायजादा इस बार एक ऐसी बहू लाना चाहते थे, जो कम पैसे वाली हो, ताकि इस घर में अपना मुंह न खोल सके और हर हाल में रहने को तैयार रहे.

इस बाबत उन्होंने सब से पहले अपने गुरुजी से बात की और उन्हें बताया कि वे अंबर के लिए एक लड़की ढूंढ़ रहे हैं.

इतना सुनते ही तांत्रिक स्वर्णकांत ने उन्हें तुरंत अपने एक भक्त की लड़की के बारे में बताते हुए कहा कि वे उस के पूरे परिवार को जानते हैं और लड़की व परिवार बहुत शालीन है और अंबर के साथ जोड़ी एकदम परफैक्ट रहेगी.

अंबर को लड़की की तसवीर दिखाई गई, पर वह अब भी शादी करने के लिए राजी नहीं था. देव रायजादा ने समझा कि एक बार शादी नाकाम हो जाने के चलते बेटा दोबारा शादी करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा है, पर धीरेधीरे नई बहू सब सही कर देगी, ऐसा मान कर स्वर्णकांत द्वारा बताई गई लड़की के साथ शादी की बात आगे बढ़ानी शुरू कर दी गई.

ठीक उसी दौरान देश में कोरोना की दूसरी लहर आई, जिस में लौकडाउन लगा दिया गया और शादी जैसे कार्यक्रमों में भीड़ के जमा होने पर भी रोक लगा दी गई.

देव रायजादा इस बात से परेशान हो उठे, क्योंकि वे अपने लड़के की शादी बड़े ही धूमधाम से करना चाहते थे. उन की यह परेशानी दूर करते हुए स्वर्णकांत ने कहा कि वरवधू एक सादा समारोह में तंत्र विद्या से शादी कर लेंगे और तांत्रिक स्वर्णकांत के चारों ओर फेरे ले लेंगे तो शादी हो जाएगी.

तांत्रिक के रंग में रंगे हुए रायजादा दंपती को भला इस से अच्छी बात और क्या लग सकती थी. स्वर्णकांत के बताए मुताबिक ही अंबर की शादी रूही नाम की लड़की से हो गई. इस शादी में घर के लोगों को छोड़ कर और किसी को न्योता नहीं दिया गया था.

शादी के बाद देव रायजादा ने अंबर और रूही से हनीमून पर जाने को कहा, तो रूही तपाक से बोल पड़ी, ‘‘पापाजी, ये हनीमून वगैरह तो अंगरेजों के चोंचले हैं. हमें तो यहां रह कर आप लोगों की सेवा करनी है बस.’’

नईनवेली बहू के इस तरह से प्यार जताने पर रायजादा दंपती बहुत खुश हुए.

रूही दूसरी बहुओं की तरह शरमा कर घर के अंदर बैठने वाली नहीं थी, बल्कि उस ने तो स्कूल के कामों में बढ़चढ़ कर हिस्सा लेना भी शुरू कर दिया था और बहुत जल्दी ही वह सारा कामकाज भी समझ गई थी.

रूही की लगन और टैलेंट को देख कर देव रायजादा ने उसे स्कूल का मैनेजिंग डायरैक्टर बना दिया था.

इस दौरान कई बार तांत्रिक स्वर्णकांत भी अपनी मरजी से ‘रायजादा हाउस’ में आता और अपनी एसी वाली कुटिया में कई दिन तक रहता. देव रायजादा खुश थे कि गुरुजी का आशीर्वाद भी उन्हें भरपूर मिल रहा है.

अंबर की दूसरी शादी हुए तकरीबन 7 महीने बीत गए थे. रात के 11 बजे होंगे. अंबर अपने मम्मीपापा के पास आया. वह बहुत परेशान सा लग रहा था. उस ने अपने पापा की ओर देखा और बताया, ‘‘पापा, वह बात ऐसी है कि रूही पेट से हो गई है.’’

‘‘अरे वाह, यह तो बड़ी खुशी की बात है,’’ देव रायजादा अंबर को गले लगाने के लिए आगे बढ़े, तो अंबर दो कदम पीछे हट गया, ‘‘पर पापा, दिक्कत वह नहीं है.’’

‘‘अरे, इस में दिक्कत की क्या बात है, मेरा शेर आज पापा बन गया है. यह तो खुशी की बात है.’’

‘‘नहीं पापा, मैं इस बच्चे का बाप नहीं हूं, बल्कि मैं तो बाप बन ही नहीं सकता, क्योंकि मैं गे हूं,’’ कह कर अंबर ने अपना सिर नीचे ?ाका लिया था और उस का स्वर भी एकदम धीमा पड़ गया था.

‘‘तो फिर उस बच्चे का बाप कौन है? तुम ने यह बात मुझे पहले क्यों नहीं बताई?’’ देव रायजादा ने पूछा, तो अंबर ने उन्हें बताया कि वह तो पहले ही उन्हें सब सच बताना चाहता था, पर आप ने सुनने की कोशिश ही नहीं की. अपनी पहली बीवी को जिस दिन अंबर ने यह राज बताया था, वह उसी दिन उसे छोड़ कर चली गई थी.

‘‘पर, गुरुजी तो कह रहे थे कि वह कुलटा है,’’ मां ने कहा.

गुरुजी का नाम आने पर अंबर ने कहना शुरू किया, ‘‘दरअसल, आप लोग जब उस दिन मुझे गुरुजी के सामने ले कर गए थे और उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा था, तभी मैं ने अपने बारे में उन्हें सब सचसच बता दिया था, जिस को सुनने के बाद उन्होंने मुझे निश्चिंत करते हुए कहा था कि मैं चिंता नहीं करूं, वे अपनी शक्ति से मुझे सही कर देंगे और जैसा वे कहते हैं, मैं वैसा ही करता चलूं,’’ कहते हुए अंबर की आंखों में आंसू तैरने लगे थे.

‘‘फिर तो तुम्हारे गे होने की बात गुरुजी को हम लोगों को भी बतानी चाहिए थी. शायद हम लोग तुम पर दूसरी शादी का दबाव ही नहीं डालते,’’ पापा ने कहा.

‘‘हमें अभी चल कर गुरुजी से इन सारी बातों और समस्याओं का हल पूछना होगा और फिर यह भी जानना होगा कि जब वह बच्चा तुम्हारा नहीं है, तो भला किस का है?’’ मां ने कहा.

वे तीनों स्वर्णकांत महाराज की कुटिया की ओर चल दिए, पर कुटिया के पास पहुंच कर उन्हें ठिठक जाना पड़ा, क्योंकि अंदर से रूही की आवाज आ रही थी, ‘‘मान गई तुम को… कितनी आसानी से इन पढ़ेलिखे और पैसे वाले लोगों को अंधविश्वास के चक्कर में फंसा कर बेवकूफ बनाते हो…

‘‘मैं ने अंबर के बैंक अकाउंट को खाली कर दिया है. जल्दी बताओ, अब हमें और क्या करना है?’’

बाहर खड़े रायजादा परिवार के कान यह सुनते ही सन्न रह गए थे.

‘‘करना क्या है मेरी मैना… यहां से सबकुछ बटोर कर किसी और मुरगे को तलाशना है, जो पैसे वाला भी हो और अंधविश्वासी भी. आखिर तुम्हें मेरे होने वाले बच्चे के लिए पैसे भी तो चाहिए,’’ स्वर्णकांत के बोलने का लहजा एकदम बदला हुआ था.

इतना सब सुनने के बाद अब और सहन कर पाने की ताकत देव रायजादा में नहीं थी. वे अंदर घुस गए और अपनी पिस्तौल स्वर्णकांत पर तान कर बोले, ‘‘मैं सब समझ गया. यह सब तुम दोनों का बनाबनाया खेल है. मैं अभी पुलिस को बुलाता हूं और तुम दोनो का गंदा खेल खत्म कराता हूं.’’

देव रायजादा कुछ और बोलते, इस से पहले ही स्वर्णकांत उलटा उन्हें ही धमकी देते हुए बोला कि अगर वे पुलिस को बुलाएंगे तो उन की ही बदनामी होगी कि उन का लड़का गे है और उन की बहू के पेट में एक तांत्रिक का बच्चा पल रहा है.

स्वर्णकांत महाराज की इस बात पर देव रायजादा खामोश ही रहे. इतना ही नहीं, अपनी इज्जत बचाने के लिए देव रायजादा को 10 लाख रुपए और देने पड़े.

Hindi Story: सवा किलो चांदी

Hindi Story, लेखक – सी. दुबे

आएदिन की कलह से ग्यारसीबाई तंग आ गई. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करे और क्या न करे. अपने घर वाले को वह पचासों बार समझा चुकी थी, मगर वह सवा किलो चांदी को भूल ही नहीं पाता था. जब देखो, तब ग्यारसीबाई को ताना मारता रहता था, ‘‘चिराग ले कर ढूंढ़ने पर भी ऐसे अक्लमंद कहीं नहीं मिलेंगे. सवा किलो चांदी अपने हाथ से उतार कर दे दी. चोरडाकू को भी लोग इतने सस्ते में नहीं निबटाते.’’

ऐसे तानों से तिलमिला कर ग्यारसीबाई ने बारबार कैफियत दी थी, ‘‘मुझे क्या पता था कि मां जाया सगा भाई ही मुझे लूट लेगा. मैं ने तो भोलेपन में अपने बदन के सारे गहने उतार कर उसे दे दिए थे.

‘‘उस ने कहा था, ‘बाई, तेरे ये गहने मैं जल्दी ही छुड़वा दूंगा. अभी मेरे गले की यह फांसी तू निकलवा दे.

इन गहनों को गिरवी रख कर बैंक का कर्ज जमा कर देने दे, नहीं तो घर पर कुर्की आ जाएगी. घर, जमीन सब नीलाम हो जाएंगे. बापदादा की लाज अब तेरे हाथ में है.’

‘‘मैं ने बाप के घर की लाज रखने को उस मुए को सारे गहने दे दिए थे. मुझे क्या पता था कि वक्त निकल जाने पर वह तोते की तरह आंखें फेर लेगा. मैं ने आफत जान कर भाई के गले की फांसी निकाली. मुसीबत के वक्त एकदूसरे की मदद करते ही हैं. मुझे क्या पता था कि होम करते हाथ जलेंगे?

‘‘उस मुए के पेट में ‘पाप’ था. वह कुछ सालों तक मुझे झांसा देता रहा. कहता रहा कि इस साल हाथ तंग है, फसल बिगड़ गई. आते साल तेरे गहने छुड़ा दूंगा. आते साल भी उस ने ऐसा ही बहाना कर दिया. इसी तरह 3-4 साल निकल गए. बाद में उस ने कह दिया कि तेरे गहने तो साहूकार के यहां डूब गए, ब्याज ही ब्याज में गल गए.

‘‘मैं ने तकाजा किया कि डूब गए तो दूसरे बनवा कर दे. मुझे तो अपनी सवा किलो चांदी चाहिए. तब मुए ने हाथ खड़े कर दिए. वह बोला, ‘सवा किलो चांदी तो 100 बरस में भी मुझ से नहीं दी जाएगी.’

‘‘तो क्या बाप के दिए गहने तू खा जाएगा? तब मुए ने बेशरम की तरह जवाब दे दिया था, ‘मैं ने कहां खाए? तेरे गहने तो साहूकार खा गया.’

‘‘मैं ने जब ज्यादा ही तकाजा शुरू किया, तो उस ने साफ कह दिया था, ‘गहनों का नाम मत ले. समझ ले, दादा ने दिए ही नहीं थे.’

‘‘उस के इन छक्केपंजों से मैं समझ गई थी कि उस की नीयत खराब है, इसलिए मैं ने भी साफसाफ कह दिया था, ‘देख बाबू, मेरी सवा किलो चांदी तो तुझे हर हालत में देनी होगी. मेरे घर वाले मेरी नाक में दम कर रहे हैं.’

‘‘मगर, उस बेशरम के पास तो बस एक ही जवाब था, ‘नहीं हैं मेरे पास. जब होंगे, तब दे दूंगा.’

‘‘मैं खूब रोई, गिड़गिड़ाई, मांबाप की बेइज्जती होने की बात कही, मगर वह बेईमान टस से मस न हुआ. मेरी भौजाई ने तो मुझे धक्के दे कर घर से बाहर निकाल दिया.

‘‘जिस भाई को ‘बीरबीर’ कह के इतराती रही, वह मुआ देखता रहा. अपनी औरत को उस ने नहीं टोका. जिस भाई के लिए मैं ने ‘मनौतियां’ मानी, उसी ने मुझे चालबाजी से लूट लिया.

‘‘तब सारी बात मेरी समझ में आ गई. दुनिया के छलकपट मैं समझने लगी. मगर ब्याह के बाद के उन शुरुआती सालों में तो पीहर ही प्यारा लगता था, इसीलिए ठगी गई. उस समय भाई और भौजाई की पढ़ाई पट्टी में मैं आ गई. अभी जैसा समय होता तो मैं उन बेईमानों को चांदी की सलाई भी न देती.

‘‘उन बेईमानों ने मेरी सवा किलो चांदी भी हड़प ली और नाता भी तोड़ लिया. बोलना ही बंद कर दिया. पीहर का मेरा रास्ता बंद कर दिया. मेरा इस में क्या कुसूर है?’’

ग्यारसीबाई की ऐसी कैफियतों का उस के घर वाले पर कोई असर नहीं होता था. वह बस एक ही बात की रट लगाए था, ‘‘सवा किलो चांदी ला.’’

ग्यारसीबाई झुंझला कर पूछती थी, ‘‘कहां से लाऊं?’’

घर वाला तपाक से कह देता था, ‘‘कहीं से भी ला. तेरे मांबाप ने जमाने के सामने तो बड़ा नाम कर दिया कि सवा किलो चांदी दी बेटी को. मगर, ससुराल वालों को उस में से छल्ला भी नहीं मिला.’’

फूटफूट कर रोती हुई ग्यारसीबाई विलाप करने लगती थी, ‘‘अगर मेरे मांबाप जिंदा होते, तो मैं उन के पास फरियाद ले कर जाती. उस मुए राक्षस से कहकह कर मैं तो हार गई. फरियाद कहां ले जाऊं?’’

ग्यारसीबाई के आदमी को इन बातों से कोई मतलब नहीं था. वह तो बस एक ही बात जानता था, ‘सवा किलो चांदी’. इसलिए घर में आएदिन कलह मची रहती थी.

ग्यारसीबाई को अपने घर वाले का यह तकाजा गलत नहीं लगता था. वह मानती थी कि उन की सवा किलो चांदी की रट ठीक है, क्योंकि उस पर उन का भी हक है. शादी में नातेरिश्ते वालों ने और जातबिरादरी वालों ने सवा किलो चांदी देखी थी.

वह चांदी के गहने पहन कर ससुराल आई थी. वे अगर चाहते तो सारे गहने यहीं उतरवा लेते, बिना गहनों के पीहर भेजते. किंतु दोनों घरों की इज्जत के लिए उन्होंने ऐसा नहीं किया.

जब भी वह ससुराल से पीहर गई, तो गहनों से सजीधजी ही गई. भाई की कारिस्तानी से ही वह पीहर से बिना गहनों के आई. फिर भी इन लोगों ने धीरज रखा. सोचा कि मुसीबत में ऐसा होता है.

मगर जब भाई ने हाथ ही ऊंचे कर दिए, तो इन का धीरज कैसे कायम रह सकता था? इन के हक की चीज उस बेईमान ने छीन ली. दूसरे कोई होते तो मारे जूतों के उस को ठीक कर देते. मगर ये तो अभी भी शरीफों की तरह ही तकाजा कर रहे थे. वही मुआ बदमाशी पर उतर आया था. लड़नेझगड़ने को तैयार था.

किंतु ग्यारसीबाई को इसी बात का दुख होता था कि उस का घरवाला उस की मजबूरी क्यों नहीं समझ रहा है. उस ने अपने आदमी को अगर धोखा दिया होता, तो वह अपनेआप को दोषी मानती. किंतु यहां तो धोखा उस के खुद के साथ ही हुआ था. फिर भी घरवाला उसी को टोंचता रहता. वह सोचती कि ऐसा ही है तो वह अपने साले से जा कर झगड़े. बीवी से झगड़ने में क्या तुक है.

ऐसी सलाह देने पर बात हमेशा बढ़ जाती थी. ग्यारसीबाई इस सवाल का जवाब देने के बजाय सवाल ही करती थी, ‘‘तुम और मैं क्या अलगअलग हैं?’’

‘‘अलगअलग भले ही नहीं हैं… मगर, भाईबहन के बीच में मैं कभी नहीं बोलूंगा.’’

‘‘क्यों नहीं बोलोगे? तुम उस से डरते हो क्या?’’

‘‘उस जैसे चार को पानी पिला सकता हूं मैं. उस से कम नहीं हूं.’’

‘‘नहीं हो… तभी तो कहती हूं कि जाओ, उस ठग को जूते मारो और अपनी सवा किलो चांदी ले आओ. बिना जूतों के वह खाक भी नहीं देगा.’’

‘‘नहीं, यह मुझ से नहीं होगा.’’

‘‘क्यों नहीं होगा?’’

‘‘उस ने कभी कुछ ऐसीवैसी बात कह दी, तो मामला बढ़ सकता है?’’

‘‘बढ़ सकता है तो बढ़ने दो. उस की लाश गिरा दोगे तो भी मैं उस के नाम ले कर नहीं रोऊंगी.’’

‘‘हां… तू तो यही चाहती है कि तेरी सवा किलो चांदी के लिए मैं फांसी पर चढ़ जाऊं?’’

‘‘तो चुपचाप बैठो. उठतेबैठते मुझे सुइयां क्यों चुभोते हो?’’

‘‘तुझे तो सुइयां चुभाऊंगा ही, क्योंकि तू ने ही यह बखेड़ा खड़ा किया है. सवा किलो चांदी कोई कम होती है? भाव मालूम है चांदी का? इतनी चांदी होती तो कई रुके काम पूरे हो जाते. मगर तू बैरिन बन गई. तू ने मुंह का कौर छीन लिया.’’

‘‘मैं ने छीना?’’

‘‘और नहीं तो किस ने छीना? हो सकता है कि यह सब भाईबहन की मिलीभगत हो?’’

अपने आदमी की यही तोहमत ग्यारसीबाई को जला देती थी. ऐसे में उस की मंशा होती थी कि कुछ खा कर सो जाए या किसी कुएं या नदी में छलांग लगा दे. किंतु आंचल से बंधी 3 औलादों की वजह से वह ऐसा नहीं कर पा रही थी. ऐसा इरादा करते ही उसे यह खयाल आ जाता था कि उन के न रहने से उस की औलाद यतीम हो जाएगी. घरवाले को तो दूसरी बीवी मिल जाएगी. वह सौत इन बच्चों की जिंदगी जहर बना देगी.

इसी खयाल से ग्यारसीबाई अपनी जिंदगी को खत्म नहीं कर पा रही थी. घर में घुसे कलह को वह बरदाश्त किए जा रही थी. अपने आदमी के तानों से उस का दिल छलनी सा हो गया था, फिर भी वह सहती जा रही थी.

एक रोज बात बहुत बढ़ जाने पर ग्यारसीबाई के घरवाले ने गुस्से में बावला सा हो कर उस की चोटी पकड़ कर दरवाजे के बाहर धकेलते हुए साफ कह दिया, ‘‘जा, सवा किलो चांदी ले कर आ, नहीं तो भाग यहां से.’’

‘फटाक’ से दरवाजा बंद हो जाने पर बच्चे फूटफूट कर रोने लगे. उन का बाप उन्हें डांटते हुए चुप कराने लगा. बच्चे जब चुप नहीं हुए तो वह उन्हें पीटने लगा. बाहर सीढि़यों पर बैठी ग्यारसीबाई से यह बरदाश्त नहीं हुआ.

उस ने अपने कानों में उंगलियां दे लीं. फिर वह भागने लगी. उस के पैर आगे नहीं बढ़ रहे थे, फिर भी वह अपनेआप को धकेलती हुई सी बढ़ती रही. गांव से बाहर पंचायती कुएं के पास जा कर उस ने सोचा कि इस में छलांग लगा दे और छुटकारा पा ले. बच्चे अपनी जिंदगी खुद भोगेंगे.

वह कुएं में छलांग लगाने ही वाली थी कि उसे खयाल आया कि सारे गांव के पानी को जहर बनाने से तो यही अच्छा होगा कि पीहर की देहरी पर जान दे दे. उस मुए पर जगत थूकेगा तो सही. यहां जान देने से तो उस पर आंच भी नहीं आएगी.

यही सोच कर ग्यारसीबाई ने अपनी बाट पकड़ ली. यादों का ज्वार सा उस के भीतर उठने लगा. उसे याद आया कि इसी राह से वह दुलहन बन कर ससुराल आई थी. उस समय इस राह को वह मुड़मुड़ कर देखती रही थी.

इसी राह ने उसे मौका मिलते ही पीहर की ओर दौड़ाया था. हर बार पीहर से लौटते समय वह आंसू बहाती हुई ससुराल लौटी थी. ससुराल में रहते हुए भी पीहर की याद उसे आती रहती थी.

बच्चे होने के बाद भी पीहर के प्रति उस का लगाव कम नहीं हुआ था. भाई ने मिठास में अगर खटाई नहीं घोली होती तो वह इस राह की दीवानी अभी भी रहती. भाई ने इस मनभावन राह पर कांटे बिछा दिए थे.

पर उस वक्त उस राह पर चलते हुए ग्यारसीबाई को यही लग रहा था कि जैसे वह कांटों पर चल रही है और उस के पैर लहूलुहान हो रहे हैं.

अपने पीहर के घर के पास आ कर ग्यारसीबाई ठिठक गई. वह आंखें फाड़फाड़ कर उस घर को देखने लगी.

उसे इस भरी दोपहरी में ऐसा लगा, जैसे उस के मांबाप खपरैल वाली छत पर बैठे हुए हाथ हिलाहिला कर
उसे बुला रहे हैं, ‘आ, ग्यारसी.’

ग्यारसीबाई ललक कर बढ़ी, तभी उस के भाई बाबू की तीखी आवाज गूंजी, ‘‘आगे कदम न बढ़ाना… नहीं तो टांगें तोड़ दूंगा.’’

ग्यारसीबाई ने गुस्से भरी आवाज में कहा, ‘‘तोड़.’’

बाबू ने राह रोकते हुए कहा, ‘‘देख, वापस हो जा, नहीं तो सच में…’’

‘‘मेरी चांदी दे दे… मैं अभी चली जाऊंगी.’’

‘‘कौन सी चांदी…? चांदी नहीं है मेरे पास.’’

‘‘क्यों नहीं है?’’

‘‘बस नहीं है.’’

‘‘नहीं देगा तो मैं इस देहरी पर धरना दूंगी. यहीं पर जान दे दूंगी.’’

‘‘तू यहां धरना देगी, तो मैं लात मार कर भगा दूंगा.’’

‘‘भगा… तू अगर ‘कंस’ है, तो यह भी कर ले,’’ कहते हुए ग्यारसीबाई देहरी की ओर बढ़ने लगी.

बाबू ने उस का हाथ थाम लिया और उसे खींचते हुए घर से दूर ले जाने लगा. ग्यारसीबाई जमीन पर बैठ गई और जोरजोर से चिल्लाने लगी, ‘‘बचाओ रे, बचाओ, यह ‘कंस’ मेरे गहने खा गया और अब मुझे यहां मरने भी नहीं दे रहा है.’’

शोर सुन कर आसपास के लोग आ गए. बाबू की बीवी और उस के बच्चे भी आ गए. वे ग्यारसीबाई का दूसरा हाथ पकड़ कर घसीटने लगे. लोगों ने बीचबचाव कर के उस के हाथ छुड़वाए.

उन लोगों ने बाबू को समझाया, ‘औरत जात पर हाथ मत उठा, नहीं तो फंस जाएगा. तू अपना दरवाजा बंद कर ले. यह कब तक बैठेगी? मरना आसान नहीं है. तू बेकार में परेशान न हो.’

ग्यारसीबाई को भी लोगों ने सलाह दी, ‘बाई, घर जा. इन तिलों में तेल नहीं है. यह समझ ले कि गहने चोरी
हो गए.’

ग्यारसीबाई अपना रोना रोने लगी. बाबू और उस के घर के लोग पड़ोसियों का कहना मान कर घर में चले गए और भीतर से दरवाजा बंद कर लिया.

ग्यारसीबाई को दिलासा देदे कर लोग अपनेअपने काम में लग गए. अब वह अपने मांबाप का नाम लेले कर स्यापा करने लगी. भाई को कोसने लगी.

तभी ‘धड़ाम’ से दरवाजा खुला और ग्यारसीबाई की भौजाई झाड़ू लिए बाहर आई. अपनी ननद को झाड़ू से पीटते हुए वह गरजी, ‘‘मेरे दरवाजे पर यह नाटक मत कर. भाग यहां से.’’

ग्यारसीबाई ने झाड़ू पकड़ते हुए भौजाई को कस कर लात जमा दी. वह धड़ाम से गिर पड़ी.

ग्यारसीबाई उस की छाती पर चढ़ कर गरजी, ‘‘तू ने ही मेरे भाई को बिगाड़ा है. मैं तेरा खून पी जाऊंगी.’’

ऐसा कहते हुए ग्यारसीबाई अपनी भौजाई का गला दबाने लगी. बरसों का रुका गुस्सा तब फट पड़ा. उस पल उस में इतनी ताकत आ गई कि वह अपने से तगड़ी भौजाई को दबाए रही.

गला दबाने पर भौजाई चीखी, ‘‘बचाओ… बचाओ…’’

घर में से बाबू और उस के दोनों बच्चे दौड़े आए. वे ग्यारसीबाई के हाथों को खींचखींच कर उस की पकड़ ढीली करने के लिए जूझने लगे. मगर ग्यारसीबाई पर तो जैसे पागलपन सवार हो गया था. वह इन तीनों के काबू में नहीं आ रही थी.

वे लातघूंसे जमा रहे थे, फिर भी वह भौजाई को छोड़ नहीं रही थी. उस का गला दबाते हुए गरज रही थी, ‘‘तू ने मेरी जिंदगी में जहर घोल दिया. सवा किलो चांदी के लिए ही तू ने बेईमानी कर ली.’’

बाबू ने पूरी ताकत लगा कर ग्यारसीबाई को खींचा. उस की बेटी ने ग्यारसीबाई के हाथ में काट लिया, तब कहीं उस के हाथों की कैंची छूटी. भौजाई की चीखें अब बंद हो गईं. वह फुरती से उठी और ग्यारसीबाई पर लातघूंसों की बरसात सी करने लगी. तभी ग्यारसीबाई के 15 और 13 बरस के दोनों बेटे दौड़े हुए आए और अपनी मां पर ढाल की तरह पसरते हुए बोले, ‘‘मत मारो हमारी मां को.’’

ग्यारसीबाई की भौजाई ने दांत पीसते हुए कहा, ‘‘मेरा गला घोंट रही थी, तब तुम ढाल बनने नहीं आए? अब आ गए तुम भी? लो प्रसाद.’’

भौजाई और उस के बेटेबेटी उन दोनों पर लातघूंसे जमाने लगे. ग्यारसीबाई गरजी, ‘‘इन पर हाथ उठाओगे, तो मैं तुम्हारी बोटीबोटी काट डालूंगी.’’

भाई से हाथ छुड़ाने की कोशिश करते हुए ग्यारसीबाई बेटों को बचाने झपटी. हाथ छुड़ा पाने पर वे लातें
चलाने लगीं.

आसपास के लोग बीचबचाव की कोशिश करने लगे. जैसेतैसे वे दोनों तरफ के लोगों को अलगअलग कर पाए. ग्यारसीबाई और उस के दोनों बेटों को खींच कर घर से दूर ले जा कर वे बोले, ‘जाओ अब.’

मगर ग्यारसीबाई वापस जाने को राजी न हुई. वह बोली, ‘‘मैं तो यहीं मरूंगी.’’

आसपास वालों ने ग्यारसीबाई को समझाया, ‘बाई, तू जान भी दे देगी तो भी ये तेरी चांदी नहीं देंगे. इसलिए समझ ले कि चांदी चोर ले गए. ये बच्चे खालिस चांदी हैं. इन्हें संभाल.’

ग्यारसीबाई को समझाते हुए वे उस के बच्चों से बोले, ‘अपनी मां को ले जाओ.’

बच्चे तो यह चाहते ही थे. इसीलिए मां को धकेलते से वे ले चले.

घर आ कर उन दोनों ने अपने पिता से कहा, ‘‘अब सवा किलो चांदी का कभी नाम मत लेना. मां का यह कर्ज हम ने अपने सिर पर ले लिया है. उस सवा किलो चांदी के बदले हम ढाई किलो चांदी तुम को देंगे. हमारी मां से अब इस बाबत में एक लफ्ज भी मत कहना.’’

ग्यारसीबाई, उस का घरवाला और बड़ी बेटी इन उगते सूरज जैसे लड़कों को टकटकी लगा कर देखने लगे. हर चेहरा खुशियों और उम्मीदों के मीठे रस में डूब सा गया था.

Hindi Story: अनोखा मिलन

Hindi Story: शाम का समय था. मैं ग्राहकों की भीड़ में उलझ हुआ था कि अचानक एक लाल रंग की चमचमाती कार मेरी दुकान के सामने आ कर रुकी. मैं ने ग्राहकों को पिज्जा देते हुए जब उस गाड़ी पर नजर डाली, तो मेरी आंखें कुछ देर के लिए वहां टिकी रह गईं.

मेरी नजरें वहां टिकती भी क्यों न, उस गाड़ी में से 3 लड़कियां जींसटीशर्ट में बाहर निकली थीं, तो वहीं एक खूबसूरत हसीना सलवारसूट पहने उन के साथ मेरी दुकान की तरफ बढ़ती हुई आ रही थी.

उस लड़की की बड़ीबड़ी नीले रंग की आंखें, लहराते हुए सुनहरे घने लंबे बाल, सुर्ख गाल और पतलेपतले गुलाबी होंठ देख कर तो मैं पागल ही हो गया था.

यों तो मेरी दुकान पर रोजाना दर्जनों लड़कियां पिज्जा खाने आती रहती थीं, पर उन के चेहरे पर मैं ने कभी ऐसी कशिश नहीं देखी थी, जो इस लड़की के चेहरे में थी.

लाल रंग के सलवारसूट में तो वह लड़की कयामत ही ढा रही थी. उस ने भले ही अपने उभारों पर दुपट्टा डाल रखा था, पर उस की उठी हुई मदमस्त छाती उस के हुस्न पर चार चांद लगा रही थी.

मैं ने अपनी जिंदगी में इतनी हसीन और कमसिन लड़की आज तक नहीं देखी थी. उसे देख कर ऐसा लग रहा था मानो आसमान से कोई हूर उतर कर जमीन पर आ गई हो.

मैं न चाहते हुए भी उस के ऊपर से अपनी नजरें नहीं हटा पा रहा था. मैं अभी उसे एकटक देख ही रहा था कि अचानक उस लड़की ने बड़ी मीठी आवाज में कहा, ‘‘ऐ मिस्टर, जरा 4 तीखी चटनी वाले पिज्जा जल्दी से दो.’’

जैसे वह लड़की खूबसूरती की मलिका थी, उस से कहीं ज्यादा उस की मीठी आवाज थी.

मैं उस लड़की की खूबसूरती और मीठी आवाज में इतना खो गया था कि मुझे ध्यान ही नहीं रहा कि कब मेरा हाथ ओवन के चिमटे से टकरा गया और मैं ने ‘आह’ करते हुए अपना हाथ झटका.

तभी वह खूबसूरती की मलिका हंसते हुए बोली, ‘‘ऐ मिस्टर, जितना ध्यान तुम मेरे ऊपर दे रहे हो, उतना ध्यान अगर अपने काम पर देते तो यह हाथ नहीं जलता.’’

हंसते हुए उस लड़की के मोती जैसे दांत उस की खूबसूरती में चार चांद लगा रहे थे.

मैं तो पहली ही नजर में उस का दीवाना हो गया था. अब उस की हंसी ने मुझे और भी उस का दीवाना बना दिया था.

उस लड़की ने मुझ से क्या कहा था, मुझे इस का कोई होश ही नहीं रहा था.

मैं अपने काम में बिजी हो कर भी उसे अपनी तिरछी नजरों से देख रहा था, जो अपनी सहेलियों से हंसहंस कर बातें कर रही थी.

तभी वह लड़की उठी और मेरे पास आई और बोली, ‘‘ऐ मजनू की औलाद, पहले कभी लड़की नहीं देखी क्या?’’

मैं शरमा कर कर बोला, ‘‘जी मैडम, देखी तो बहुत हैं, पर आप जैसी खूबसूरत आज तक देखने को नहीं मिली. आप को देख कर तो ऐसा लग रहा है जैसे परियों के देश से कोई परी जमीन पर उतर कर मेरी दुकान में आ गई हो.’’

तभी वह लड़की गुस्से में बोली, ‘‘मैं कोई परीवरी नहीं हूं और न ही मेरा नाम मैडम है. हिना नाम है मेरा… हिना… समझे…’’

हिना के गुस्से में भी मुसकराहट शामिल थी. मैं ने भी मुसकरा कर कहा, ‘‘जी हिनाजी, नाम बताने का शुक्रिया…’’

‘‘मैं नाम बताने नहीं आई हूं. हमारा और्डर दो जल्दी… मुझे बहुत तेज भूख लगी है.’’

मैं ने फौरन 4 पिज्जा बनाए और उन में कुछ ज्यादा ही मक्खन डाल कर फौरन उन की टेबल पर सर्व कर दिया.

वे चारों पिज्जा खाने लगीं और आपस में मेरे बनाए पिज्जा की तारीफ करती रहीं.

हिना पिज्जा खा रही थी और अपनी तिरछी निगाहों से मुझे देख रही थी. जब भी मेरी निगाह उस से टकराती, मैं मुसकरा कर उसे अपने प्यार का इजहार करने की कोशिश करता.

कुछ देर बाद हिना अपनी एक सहेली के साथ उठ कर मेरे पास आई और बोली, ‘‘कितना पैसा हुआ मिस्टर?’’

मैं हंसते हुए बोला, ‘‘हिनाजी, मेरा नाम मिस्टर नहीं, बल्कि शान है. आप मुझे इसी नाम से पुकारें.’’
हिना ने कहा, ‘‘अच्छा शानजी, कितना पैसा हुआ?’’

मैं ने हंसते हुए कहा, ‘‘400 रुपए.’’

हिना ने पर्स से 500 का नोट निकाला और बोली, ‘‘रख लो… तुम्हारे पिज्जा का तो जवाब ही नहीं… यह हमें बहुत पसंद आया.’’

मैं बोला, ‘‘शुक्रिया. पर, मैं वही कीमत लेता हूं, जो मेरा हक है. ये लीजिए आप के 100 रुपए.’’

जब मैं ने हिना के हाथ में 100 रुपए दिए, तो उस के नाजुक हाथ की छुअन पा कर मेरी खुशी का ठिकाना न रहा. दूध की तरह सफेद हाथ… इतने कोमल कि दिल किया चूम लूं.

जब हिना अपनी गाड़ी में बैठ रही थी, तो उस ने एक नजर फिर से मेरे ऊपर डाली, तो मैं ने मुसकराते हुए अपने उस हाथ को चूम लिया.

यह देख कर हिना भी मुसकराते हुए गाड़ी में बैठ कर चली गई.

रातभर हिना का खूबसूरत चेहरा मेरी आंखों के सामने घूमता रहा. मैं नींद से कोसों दूर करवट बदलता रहा और इस उम्मीद में सुबह होने का इंतजार करता रहा कि आज फिर हिना मेरी दुकान पर पिज्जा खाने जरूर आएगी, पर सुबह से शाम हो गई और मैं हिना का इंतजार करता रहा, पर वह नहीं आई.

मैं उदास हो कर एक तरफ बैठ गया. न जाने क्यों आज दुकान पर ग्राहकी भी कम थी और मेरा मन भी दुकान पर नहीं लग रहा था.

मैं हिना के बारे में सोचसोच कर मायूस हो रहा था कि तभी हिना की गाड़ी मेरी दुकान के सामने आ कर रुकी.

मैं खुशी से झूम उठा और खड़े हो कर हिना का गाड़ी से बाहर निकलने का इंतजार करने लगा.

तभी कुछ देर बाद हिना गुलाबी रंग का सलवारसूट पहन कर मेरे सामने आई और बोली, ‘‘मुझे 3 पिज्जा जल्दी से पार्सल कर दो.’’

हिना के कहते ही मैं पिज्जा बनाने में लग गया. तब तक वह मेरे काउंटर के सामने खड़ी रही.

कुछ देर बाद वह खुद ही बोली, ‘‘लगता है कि आज रात तुम सो नहीं पाए. तुम्हारी आंखें सूजी हुई सी लग
रही हैं.’’

मैं हंसते हुए बोला, ‘‘क्या बताऊं हिनाजी… जब से तुम्हें देखा है, चारों तरफ तुम्हारा ही चेहरा दिखाई देता है.

मैं ने पूरी रात करवट बदलते हुए गुजारी है.’’

हिना ने धीरे से पूछा, ‘‘ऐसा क्या है मेरे चेहरे में…?’’

मैं बोला, ‘‘क्या नहीं है आप के चेहरे में… जिस ने मुझे आप का दीवाना बना दिया है. आप जैसी खूबसूरत

हसीन लड़की मैं ने अपनी जिंदगी में नहीं देखी है. मैं तो आप के हुस्न का दीवाना हो गया हूं.’’
हिना हंसते हुए बोली, ‘‘तुम पागल हो गए हो…’’

मैं ने कहा, ‘‘आप ने मुझे पागल बना दिया है. आप की आवाज, आप की खूबसूरती, आप का हुस्न… आप को देख कर ऐसा लगता ही नहीं कि आप कोई इनसान हो. मुझे तो आप परी देश से आई हुई कोई परी लगती हो.’’

हिना हंसते हुए बोली, ‘‘आप की बातों को सुन कर तो यहां से जाने का ही दिल नहीं करता.’’

मैं ने भी फौरन जवाब देते हुए कहा, ‘‘आप मत जाओ. मेरे दिल में तो बस चुकी हो, मेरी जिंदगी में भी आ जाओ.’’

हिना ने कहा, ‘‘अच्छा, तो आप मुझे अपनी जिंदगी में शामिल करना चाहते हो… पर, उस के लिए तुम्हें मुझ से निकाह करना पड़ेगा… समझे?’’

‘‘मैं आप से निकाह करने को तैयार हूं. बस, आप की हां का इंतजार था.’’

‘‘ठीक है, मैं सोच कर बताती हूं.’’

मैं ने हिना का मोबाइल नंबर ले लिया. अब हम दोनों घंटों प्यारभरी बातें करते, शादी के सपने देखते और खूब घूमतेफिरते.

मेरी और हिना की प्रेम कहानी खूब चल रही थी, फिर एक दिन वह वक्त भी आ गया, जब हमारे प्यार की खबर हिना के अब्बू को लग गई.

हिना के अब्बू उस इलाके के अमीर लोगों में शुमार थे और वे किसी भी कीमत पर हिना की शादी मुझ से करने को तैयार नहीं थे.

हिना मुझ से बहुत मुहब्बत करती थी, इसलिए उस ने मुझ से वादा किया कि वह शादी करेगी तो सिर्फ मुझ से, वरना अपने अब्बू का घर छोड़ कर मेरे पास आ जाएगी.

आज हिना अपने अब्बू से हमारी शादी की बात करने वाली थी. मेरा दिल बहुत घबरा रहा था, क्योंकि हिना के अब्बू कभी भी मुझ जैसे गरीब लड़के से अपनी बेटी की शादी के लिए राजी न होते और हिना उन का सामना कैसे करेगी, यह सोच कर मैं बहुत परेशान था.

मुझे हिना और उस के अब्बू के बीच क्या बात हुई, इस का तो कुछ पता न चला, पर 3 दिन बाद हिना के अब्बू ने दुकान मालिक से कह कर मेरी दुकान जरूर खाली करा दी और मेरा कामधंधा बंद हो गया.

उस के कुछ दिन बाद हिना के अब्बू एक सुनसान जगह पर 4-5 लोगों के साथ आए और मुझ से बोले, ‘‘तेरी भलाई इसी में है कि तू यह शहर छोड़ कर कहीं दूसरी जगह चला जा.’’

मैं ने इनकार किया, तो उन के साथ आए लोगों ने मेरी जम कर पिटाई की, फिर वे बोले, ‘‘देख, हिना ने अपनी मरजी से शादी कर ली है.’’

वे मुझे हिना की शादी का फोटो दिखाते हुए बोले, ‘‘अब उसे भूल जा और उस की जिंदगी से दूर चला जा. वैसे भी तुझे इस एरिया में कोई दुकान नहीं देगा और तू ने अगर हिना से मिलने की कोशिश की तो तेरे लिए अच्छा नहीं होगा.’’

हिना की शादी की तसवीर देख कर मैं पूरी तरह टूट चुका था. मैं हताश हो कर अपने एक दोस्त के पास दूसरे शहर चला गया और उस के कमरे पर रहने लगा.

मेरा अब कुछ काम करने में दिल नहीं लगता था. जिंदगी थम सी गई थी. न किसी से बोलना, न कोई काम और न हंसी… सब गायब हो चुका था.

मेरे दोस्त ने मुझे काफी समझाया और कहा, ‘‘अगर तुम यों ही अपनी जिंदगी बरबाद करते रहोगे, तो फिर
कैसे चलेगा…

‘‘मेरे दोस्त, हिम्मत मत हारो. जिंदगी में तो सुखदुख लगा ही रहता है. अगर तुम्हारा यहां काम करने को मन नहीं करता, तो मेरा एक दोस्त दुबई में रहता है. तुम उस के पास चले जाओ. मैं सब इंतजाम कर देता हूं. तुम अपनी मुहब्बत को अब भूल जाओ. वह अब किसी और की अमानत बन चुकी है.’’

उस की ये बातें सुन कर मेरी आंखों से खुद ब खुद आंसू बहने लगे और मैं ने उस से कहा, ‘‘ठीक है, मैं दुबई चला जाता हूं, पर मेरे दोस्त, मुझे मेरी मुहब्बत को भूलने के लिए मत कहो.’’

मेरे दोस्त ने मेरे लिए अपने एक खास दोस्त से बातचीत कर ली. उस का दुबई में होटल था, जहां उस ने मेरी नौकरी की बात पक्की कर ली.

दुबई के लिए एक हफ्ते बाद की टिकट हो चुकी थी. मैं ने अब दुबई जाना ही बेहतर समझा.

अगले दिन मैं जब सो कर उठा, तो मेरे दोस्त को तेज बुखार था. मैं उसे सहारा दे कर पास के दवाखाने पर ले गया. डाक्टर ने कुछ जांच करने के बाद मेरे दोस्त को एक हफ्ता आराम करने की हिदायत दी.

हम दवा ले कर घर आ गए. अभी एक दिन ही हुआ था कि उस की तबीयत में कुछ सुधार हुआ, तो वह काम पर जाने के लिए उठा. यह देख कर मैं ने उसे काम पर जाने से रोक लिया और बोला, ‘‘तुम्हारी हालत सही नहीं है. तुम अभी आराम करो.’’

मेरा दोस्त बोला, ‘‘यार, अगर मैं काम पर नहीं जाऊंगा, तो उस से मेरे ग्राहक तो टूटेंगे ही, साथ ही एक बेवा, जो अपने एक साल के बेटे के साथ टूटेफूटे घर में रहती है, उस की भी कमाई नहीं होगी.’’

मैं हैरान हो कर बोला, ‘‘क्या मतलब…? कौन बेवा…?’’

‘‘अरे भाई, यहां पास की ही एक बस्ती में एक बेवा घर पर खाना बना कर औनलाइन बेचती है, जिस की डिलीवरी मैं करता हूं.’’

मैं उस से बोला, ‘‘ठीक है, आज मैं डिलीवरी करता हूं. बस, तुम अच्छी तरह से आराम करो.’’

मैं ने उस से वह पता लिया, जहां से मुझे खाना लेना था और जहां खाना पहुंचाना था.

मैं जब खाना लेने वाले पते पर पहुंचा और कुंडी खटखटाई तो अंदर से एक औरत फटेपुराने कपड़े पहने बाहर आई और बोली, ‘‘जी, आप कौन…?’’

मैं ने जैसे ही उस औरत पर नजर डाली, मैं हैरान रह गया. वह औरत कोई और नहीं, मेरी हिना थी.

हिना ने भी मुझे पहचान लिया था और बोली, ‘‘शान, तुम यहां कैसे…? आओ, अंदर आओ.’’

मैं हिना के साथ उस के घर के अंदर पहुंच गया और उस से पूछने लगा, ‘‘तुम ने तो अपनी मरजी से किसी अमीर लड़के से शादी कर ली थी, फिर तुम्हारी यह हालत कैसे हुई?’’

हिना ने रोते हुए बताया, ‘‘मैं तुम से शादी करने के लिए अपने अब्बू से लड़ कर जैसे ही घर से बाहर निकली कि अचानक उन के सीने में तेज दर्द शुरू हो गया और वे ‘धड़ाम’ से जमीन पर गिर पड़े.

‘‘मैं ने जल्दी से उन्हें उठाया और एंबुलैंस बुला कर उन्हें अस्पताल ले गई, जहां डाक्टर ने कुछ देर उन का ट्रीटमैंट करने के बाद मुझे बताया, ‘तुम्हारे अब्बू को हार्टअटैक आया है. इन की तबीयत काफी नाजुक है.

हालांकि, अब वे खतरे से बाहर हैं, पर यह ध्यान रखना कि उन्हें किसी भी तरह की कोई तकलीफ न हो और न ऐसी बात करना, जिसे सोच कर उन की तबीयत फिर से खराब हो जाए. वैसे, आप उन से मिल सकती हैं.’

‘‘मैं जैसे ही अपने अब्बू से मिली, उन्होंने मुझे देख कर मुंह फेर लिया. मैं सम?ा गई कि मेरी ही वजह से उन की यह हालत हुई है. उन्हें खुश रखने के लिए मैं ने उन से कहा कि आप नाराज मत होना, मैं वही करूंगी जो आप कहोगे.

‘‘मेरी बात सुन कर उन का चेहरा खिल उठा और मुसकराते हुए वे बोले, ‘तो फिर मैं जहां तुम्हारी शादी करूंगा, तुम्हें मंजूर होगा.’

‘‘मैं ने ‘हां’ में सिर हिला दिया और अपनी खुशी को अपने अब्बू की खुशी की खातिर बलिदान कर दिया.

‘‘उस के कुछ ही दिन बाद मेरे अब्बू ने मेरी शादी इस उम्मीद में कर दी कि बड़े घराने में उन की बेटी को सारी खुशियां मिलेंगी.

‘‘पर, उन का ऐसा सोचना गलत साबित हुआ. शादी के एक साल बाद ही एक हादसे में मेरे शौहर इस दुनिया से चल बसे.

‘‘सुसराल वालों ने यह कह कर मुझे और मेरे मासूम बेटे को घर से निकाल दिया कि इस मनहूस औरत की वजह से ही उन के जवान बेटे की मौत हुई है.

‘‘वहां से निकाले जाने के बाद मैं ने अपने अब्बू के घर जाना बेहतर नहीं समझा, क्योंकि मेरी बरबादी की वजह कुछ हद तक वे ही थे, जिन्होंने पैसे के लालच में मेरे प्यार को मुझ से जुदा कर दिया था.

‘‘उस के बाद मैं ने यह घर किराए पर ले लिया और जोकुछ बचत थी, उस से खाने का छोटा सा औनलाइन बिजनैस शुरू कर लिया.’’

मुझे हिना की बातें सुन कर बहुत दुख हुआ. तभी उस का छोटा सा बेटा मेरी गोद में आ कर बैठ गया, जिसे मैं प्यार करने लगा. यह देख कर हिना की आंखों के आंसू रुक गए और उस के चेहरे पर एक मुसकान दिखाई दी.

फिर हिना ने मुझ से पूछा, ‘‘तुम कहां थे इतने दिन और शादी वगैरह की या नहीं? कितने बच्चे हैं तुम्हारे?’’

मैं ने मुसकराते हुए कहा, ‘‘तुम्हारे सिवा मैं भला किसी और से शादी कैसे कर सकता था? मेरे रोमरोम में तो तुम बसी थी.’’

‘‘तुम्हारी शादी के बाद तुम्हारे अब्बू ने मेरी पिज्जा की दुकान बंद करा दी और अपनी ताकत के बल पर मुझे वहां कोई दुकान न लेने दी. उन का इस पर भी पेट न भरा, तो उन्होंने कुछ गुंडों से मेरी पिटाई कराई और तुम्हारा शादी का फोटो दिखाते हुए मु?ो यह शहर छोड़ कर जाने की धमकी दे डाली.

‘‘उस के बाद मैं इस शहर में अपने एक दोस्त के पास आ गया. कामधंधा करने को मन नहीं करता था, बस यों ही घर में पड़ा रहता और तुम्हें याद करता रहता, तुम्हारी यादों में तड़पता रहता था.

‘‘इसी तरह 2 साल निकल गए. मेरे दोस्त ने दुबई में मेरे लिए काम तलाश लिया और अब मैं ने वहां जाने का इरादा कर लिया है.

‘‘पिछले 2 दिन से उस दोस्त की तबीयत कुछ ज्यादा ही खराब थी. उसे डाक्टर ने आराम के लिए बोला था, पर वह जबरदस्ती काम पर आना चाहता था, तो मैं ने उसे आराम करने के लिए कहा और खुद उस के काम के लिए निकल पड़ा.

‘‘आज पहली बार मैं काम के लिए निकला, तो मेरी मुलाकात तुम से हो गई और हमारा यह मिलन एक अनोखा मिलन बन गया.’’

मैं ने हिना का हाथ अपने हाथ में पकड़ते हुए कहा, ‘‘अब तो तुम भी गरीब हो गई हो, अब तुम भी मेरे जैसी बन गई हो, अब तो तुम से शादी करने से मुझे कोई नहीं रोक सकेगा. अब हमारे बीच की अमीरी की दीवार ढह गई है.’’

इतना सुनते ही हिना मेरे गले से लग गई और बोली, ‘‘वाकई, यह मिलन एक अनोखा मिलन है.’’

मैं ने उसे अपनी बांहों में भरते हुए कहा, ‘‘अब तुम्हारी और तुम्हारे बेटे की जिम्मेदारी मेरी हुई.’’

यह सुन कर हिना की आंखों में आंसू आ गए और वह मेरे गले से लगते हुए बोली, ‘‘शादी के बाद तुम्हें मेरे लिए पिज्जा बनाना पड़ेगा… समझे?’’ कहते हुए हिना हंसने लगी.

हिना की बात सुन कर मुझे भी हंसी आ गई. मैं ने उस से कहा, ‘‘मैं तुम्हारे लिए पिज्जा की पूरी दुकान ही खोल लूंगा.’’

इस तरह हिना का और मेरा अनोखा मिलन हो गया और हम दोनों ने शादी कर ली.

Hindi Story: मोची का बेटा

Hindi Story: ‘‘कहो राजप्रसाद, कैसे हो?’’

‘‘आओ दिनेश भैया, बैठो. इस बार तो बहुत दिनों के बाद आए हो. बताइए भैया, कैसे आना हुआ?’’ राजप्रसाद ने मुसकराते हुए पूछा.

मैं ने उस की सामान की पेटी पर बैठते हुए कहा, ‘‘राजप्रसाद, तुम्हारे पास कोई किस काम के लिए आ सकता है? देखना, जरा इस सैंडल पर पौलिश कर देना.’’

राजप्रसाद ने सैंडल ले ली और मु झे पहनने के लिए चप्पल दे दी.

‘‘बस भैया, ये जूते टांक दूं और फिर मैं आप की सैंडल पर पौलिश करता हूं.’’

‘‘हां, राजप्रसाद, मु झे कोई जल्दी नहीं है. आराम से कर देना,’’ मैं ने सहजता से कहा.

राजप्रसाद उस जूते को गांठने में लग गया और मैं अपने विचारों में खो गया.

राजप्रसाद को मैं कई सालों से जानता था. वह न जाने कितने सालों से सड़क के किनारे इसी नीम के पेड़ के नीचे बैठा अपना मोची का काम करता आ रहा है.

बिना दीवारों और बिना छत की पेड़ की छांव ही उस की खुली दुकान है. इस दुकान पर कोई भी बिना रोकेटोके आ सकता है.

पेड़ की छांव पृथ्वी की घूर्णन गति से घूमती हुई सुबह से शाम तक अपना पाला बदल देती है, इसलिए राजप्रसाद ने एक लोहे की छड़ को धरती के सीने में गाड़ रखा है और उस पर एक बड़ी छतरी को बांध कर अपनी दुकान का शामियाना तान रखा है. चेहरे पर हरदम मुसकान उस की खुशहाल जिंदगी की गवाह है.

मेहनत के पसीने से भीगी उस की बनियान उस की श्रमशक्ति की खास पहचान है. उस की ईमानदारी और मेहनत देख कर मन में अपनेआप ही इज्जत का भाव पैदा होता है.

थोड़ी देर के बाद दिनेश ने पूछा, ‘‘राजप्रसाद, यहां बैठते हुए तुम्हें कितने साल हो गए?’’

‘‘अरे भैया, बस ये ही तकरीबन 30-35 साल.’’

‘‘एक लंबा अरसा हो गया फिर तो राजप्रसाद. तुम ने तो यहां की दुनिया को खूब बदलते देखा होगा, क्यों?’’

‘‘हां भैया, इतने अरसे में तो यहां की पूरी दुनिया ही बदल गई. सामने एकमंजिला दुकानें थीं, अब देखो, यहां बहुमंजिला इमारत खड़ी है. किराएदार, मकान मालिक, दुकान मालिक सब बदल गए.

‘‘पहले यह दुकान अखबारों और पत्रिकाओं की दुकान हुआ करती थी. यहां नौकरी के फार्म खूब बिका करते थे. जब से चीजें औनलाइन हुई हैं, यह दुकान स्टेशनरी और स्कूल की किताबों की दुकान बन कर रह गई.’’

दुनियादारी की बातों से हट कर कुछ सोचते हुए मैं ने कहा, ‘‘अच्छा राजप्रसाद, अगर बुरा न मानो तो एक बात पूछ लूं तुम से…’’

‘‘अरे भैया, बुरा क्यों मानेंगे? आप एक नहीं, दो बातें पूछो,’’ राजप्रसाद ने बड़े विश्वास के साथ कहा.
तब मैं ने थोड़ा हिचकिचाते हुए पूछा, ‘‘क्या इस मोचीगीरी के काम से तुम्हारा घरखर्च निकल जाता है?’’

‘‘अरे भैया, आप खर्चे की बात कर रहे हो, इसी की आमदनी से मैं ने अपना मकान बना लिया है. 2 बेटियों को पढ़ालिखा कर उन की अच्छे परिवारों में शादी कर दी है.

‘‘मेरी एक बेटी तो सरकारी मास्टरनी है, सरकारी. दूसरी बेटी भी शादी के बाद पीएचडी कर रही है.’’

‘‘अरे वाह राजप्रसाद. तुम ने तो कमाल कर दिया. मैं तो सोचता था कि इस काम से तुम्हारे घर का खर्चा भी बड़ी मुश्किल से निकलता होगा.’’

‘‘नहीं भैया, ऐसा कुछ नहीं है. मोचीगीरी में इतना काम है कि संभाले नहीं संभलता. लोग तो यह सम झते हैं कि हमारे पास केवल जूतेचप्पल टांकने और उन पर पौलिश करने का काम भर है, लेकिन हमारे पास इस के अलावा भी किसानों, दुकानदारों और यहां तक कि फैक्टरियों तक से चमड़े का सामान सिलाई के लिए आता है.’’

‘‘ये सब चीजें तो राजप्रसाद हम जैसों के खयाल में ही नहीं आती हैं,’’ दिनेश बोला.

‘‘भैया, दुनिया की सोच बदलने में जमाने गुजर जाते हैं. आज भी हमें सदियों पुराने मोची की ही नजर से देखा जाता है. वही फटेपुराने कपड़ों वाला, टूटेफूटे मकान में रहने वाला,’’ राजप्रसाद की बात को सुन कर मैं भी सोच में पड़ गया.

मैं ने भी वही सदियों पुरानी सोच पाल रखी थी. मैं ने सच स्वीकारते हुए कहा, ‘‘राजप्रसाद, तुम ने तो आज मेरी भी सोच बदल दी. मेरी सोच भी दूसरों की ही तरह थी. अच्छा, तुम्हारे क्या कोई बेटा भी है?’’

‘‘हां भैया, एक बेटा भी है. उस ने कुछ दिन पहले ही एमबीए किया है और नोएडा में एक कंपनी में उस की नईनई नौकरी लगी है. अभी उस का 3 लाख रुपए से कुछ ज्यादा का सालाना पैकेज है. इतना तो मैं यहां बैठेबैठे कमा लेता हूं.’’

‘‘तो फिर राजप्रसाद, तुम ने अपने बेटे को इसी काम में क्यों नहीं लगाया?’’

‘‘अब देखो भैया, मैं तुम्हें पहले ही बता चुका हूं, हमारे यहां कामधंधे को ले कर लोगों की सोच बड़ी खराब है. मोचीगीरी के काम को सब छोटा काम सम झते हैं. खुद मैं भी इसी सोच का शिकार हूं.

‘‘वह कंपनी में नौकरी कर रहा है, तो उस की इज्जत है. लेकिन दुनिया वाले नहीं सम झते हैं कि वह दूसरों की नौकरी ही कर रहा है. मैं खुद के धंधे का मालिक हूं, लेकिन मेरा कोई सम्मान नहीं. भैया, मैं तो बस मोची हूं, मोची.’’

राजप्रसाद की बात सच्ची, पर दमदार थी. उस की पते की बात पर मैं ने कहा, ‘‘राजप्रसाद, तुम बिलकुल सही कहते हो. कोई कुछ भी कहे, अपना काम अपना होता है और दूसरों की नौकरी बजाने से लाख बेहतर होता है.’’

‘‘है न भैया, मैं ने तो अपने बेटे से भी यही कहा था कि इसी जमेजमाए काम को संभाल ले. अगर यहां बैठने में लाज आती है, तो दुकान खुलवाए देता हूं, वहीं 2 लड़के रख लेना.’’

‘‘तो फिर उस ने क्या जवाब दिया राजप्रसाद?’’

‘‘कहने लगा, पापा, आप भी कैसी बातें करते हो? मैं एमबीए कर के दूसरों की जूतियां टांकूंगा क्या? आज छोटी पोस्ट पर हूं, कल बड़ी पोस्ट मिलेगी. आज छोटा पैकेज है, कल बड़ा पैकेज मिलेगा. मु झे भी लगा, बेटा कह तो सही रहा है.’’

‘‘हां, राजप्रसाद. तुम्हारे बेटे ने एमबीए किया है, उस की भी अपनी सोच, अपना स्वाभिमान है.’’

अब तक राजप्रसाद ने मेरी सैंडल पौलिश कर दी थी. मैं ने उस से विदा ली.

फिर बहुत लंबे समय तक उधर जाना नहीं हुआ. इस के बाद जब एक दिन उधर जाना हुआ तो मु झे अचानक से राजप्रसाद की याद आई. उस से मिलने को न जाने क्यों मन आतुर था. बहाना वही पुराना, लेकिन इस बार सैंडल नहीं जूतों पर पौलिश कराना था.

लेकिन आज नीम अकेला था. कुछ उदास. उस के नीचे की दुनिया गायब थी. उस जगह को देख कर लगता था, यहां से कोई बहुत पहले अपना तंबू उखाड़ कर ले जा चुका है.

एकबारगी लगा कि कहीं ऐसा तो नहीं कि राजप्रसाद इस दुनिया से ही चला गया हो. आज की दुनिया में इस शरीर और सड़क हादसों पर कोई भरोसा नहीं… कब क्या हो जाए.

अब तो दिल की धड़कनों के साथ जिज्ञासा भी बढ़ गई. सामने वाले दुकानदार से पता किया तो उस ने अपने चमकीले दांतों से मुसकान बिखेरते हुए बड़े सम्मान के साथ कहा, ‘‘अच्छा, आप राजप्रसादजी के बारे में पूछ रहे हो.’’

उस के मुंह से ‘राजप्रसाद’ की जगह ‘राजप्रसादजी’ सुन कर तो मैं भी कुछ अचकचाया.

मैं ने सोचा कि कोई गलतफहमी न हो, इसलिए कहा, ‘‘हां, वह राजप्रसाद मोची ही है.’’

‘‘हां जी, हां. मैं भी उन्हीं की बात कर रहा हूं. अब तो उन की जिंदगी बदल चुकी है. वह देखो, वह रहा उन का शोरूम, जिस पर लिखा है ‘राजप्रसाद बूट्स ऐंड शूज’. अब वे वहीं बैठते हैं मालिक बन कर.’’

मैं ने हैरानी से कांच का दरवाजा खोल कर जैसे ही शोरूम में प्रवेश किया, तो मेरी नजर सामने रखे चमचमाते जूतों और चप्पलों पर पड़ी. तभी काउंटर से किसी जानीपहचानी आवाज ने पुकारा, ‘‘अरे भैया, इधर आओ. कितने दिनों के बाद दिखाई दिए हो. आओ बैठो. अरे गुड्डू जाओ, जरा भैया के लिए चाय बोल कर आओ.’’

‘‘अरे नहीं, राजप्रसादजी,’’ मैं उन का रुतबा और शानोशौकत देख कर उन के नाम में ‘जी’ लगाने से खुद को रोक नहीं पाया.

‘‘अरे भैया, हम कोई ‘जी’ नहीं हैं. हम वही पुराने वाले राजप्रसाद हैं. हमें ‘राजप्रसाद’ ही बोलिए, आप के मुंह से सुन कर अच्छा भी लगता है और प्रेम की मिठास भी आती है. पुराने दिन याद आते हैं.’’

मैं ने सोफे पर बैठते हुए कहा, ‘‘लेकिन, यह तो बताओ कि यह सब हुआ कैसे?’’

‘‘भैया, यह सब तो बेटा देव ही बताएगा. उसी की जबान से सुनना. बड़ा मजा आएगा. बड़ी रोचक कहानी है. बस, कुछ ही देर में वह आने वाला है.’’

यह सुन कर मैं उस रोचक किस्से को सुनने के लिए उतावला हो उठा.

कुछ ही देर बाद उस शोरूम के सामने एक चमचमाती कार आ कर रुकी. उस में से बनाठना एक स्मार्ट नौजवान उतरा. वही हमारे मोची का बेटा था. ऐसा लगता था कुदरत ने जैसे उसे फुरसत के पलों में गढ़ा था, बेहद हैंडसम.

राजप्रसाद ने उस का और मेरा परिचय कराया. उस ने पैर छू कर मेरा आशीर्वाद लिया.

तब राजप्रसाद ने उस से कहा, ‘‘बेटा देव, ये मेरे बहुत पुराने परिचित हैं, लेखक भी हैं. ये तुम से कुछ जानना चाहते हैं. इन से कुछ भी मत छिपाना.’’

देव मुझे अपने केबिन में ले गया. तब उस ने मुझे अपना रोचक किस्सा सुनाना शुरू किया.

‘‘जी अंकल, एमबीए करने के बाद मेरी नौकरी एक बड़ी कंपनी में लग गई. जब मैं पहले दिन अपने औफिस गया, तो वहां बेला को देख कर चौंक गया.’’

‘‘यह बेला कौन है बेटा?’’ मैं ने पूछा.

‘‘अंकल, बेला से मेरी जानपहचान बचपन से थी. वह मेरे ही महल्ले में रहती थी. बेला को पहले से ही पता था कि मेरी नौकरी वहां लगने वाली है.

‘‘जैसे ही मैं अपने औफिस में पहुंचा, बेला खटाक से वहां आई और बोली, ’’आ गया चिकने. क्या तु झे पता नहीं था कि मैं यही पर हूं? चल, अब देखती हूं तुझे.’’

‘‘अरे बाप रे, कोई लड़की ऐसे बोलती है क्या?’’ मैं ने हैरानी से कहा.

‘‘अंकल, उस की बात मत पूछो. वह बचपन से ही मुंह भरभर कर गालियां बका करती थी. जैसे उस का मुंह न हो, गालियों की खान हो. मांबहन की गालियां तो हरदम उस के होंठों पर ही रहती थीं.

‘‘खैर, उस समय तो बेला वहां से चली गई, लेकिन मेरे दिल में सिहरन पैदा कर गई, क्योंकि वह क्या कर सकती है, इस का अंदाजा लगाना भी मुश्किल था.’’

‘‘अरे देव, ऐसा क्यों कहते हो? क्या बेला इतनी बुरी थी?’’

‘‘अंकल, आप आगे का किस्सा सुनो, फिर आप ही फैसला करना कि वह कैसी थी.’’

‘‘अच्छा सुनाओ, अब तो तुम ने इस किस्सागोई में मेरी दिलचस्पी और बढ़ा दी. आखिर कैसी थी बेला, यह जानने को मैं उतावला हो उठा हूं.’’

‘‘अंकल, मु झे भी अपना बचपन याद आ गया, जब बेला और मैं बचपन में साथसाथ खेला करते थे. जैसेजैसे हमारा बचपन पीछे छूटा और हमें लड़कालड़की के फर्क का पता चला, तो धीरेधीरे हमारा साथसाथ खेलनाकूदना भी छूट गया.

‘‘वह कदकाठी में भी मेरे से बड़ी लगती थी. आप को तो मालूम ही होगा कि लड़कियां लड़कों से पहले बड़ी हो जाती हैं.’’

‘‘हां बेटा, आगे सुनाओ.’’

‘‘अंकल, बेला अलग ही मिजाज की थी. उसे लड़कों से दोस्ती करना खूब पसंद था. जवानी की दहलीज पर कदम रखते ही उस ने कई बौयफैं्रड बना लिए थे. बातबात पर आंख मारना उस की आदत बन गई थी.

वह मु झे भी अपना बौयफ्रैंड बनाना चाहती थी, लेकिन मु झे तो पढ़नेलिखने से ही फुरसत नहीं थी.’’

इस कहानी में मुझे रस आ रहा था. मैं ने कहा, ‘‘देव, बड़ी अजीब और रसीली लड़की थी बेला.’’

‘‘हां अंकल, वह ऐसी ही थी रोमांटिक टाइप. बेला ने 12वीं क्लास तक आतेआते सारी हदें पार कर दी थीं.

वह अपने यारों के साथ खूब इधरउधर घूमा करती थी. उस के बारे में बहुतकुछ सुनने को मिलने लगा था.

‘‘ऐसा लगता था कि अब वह खुल कर खेलने लगी है. लेकिन एक दिन मेरे साथ कुछ अलग हुआ.’’

‘‘क्या हुआ था देव? क्या तुम ने उसे रंगे हाथों पकड़ लिया था?’’

‘‘नहीं अंकल, मै इन बातों में था ही नहीं. हुआ यह कि एक दिन बेला ने मु झे किसी लड़की से बातें करते देख लिया.’’

‘‘तो इस में कौन सी बड़ी बात थी. आजकल तो यह बड़ी सामान्य सी बात है.’’

‘‘अंकल, यह किसी और के लिए सामान्य बात हो सकती थी, लेकिन बेला के लिए नहीं. अगले दिन कालेज से लौटते वक्त बेला ने मु झे एक सुनसान सी जगह पर रोक लिया और छूटते ही गाली दे कर बोली, ‘क्यों बे, बहन के… चिकने. उस लौंडिया से बहुत हंसहंस कर बातें कर रहा था. मु झ से बातें करते हुए तेरी… में आग लग जाती है. तु झे मजा चाहिए तो यह ले…’ कह कर उस ने मु झे दोनों हाथों से पकड़ लिया और जबरदस्ती मेरे होंठ और गाल चूम लिया.

मैं अपनेआप को उस से छुड़ा कर जाने लगा, तो वह मुसकराई और कहा, ‘जा बेटा, आज तो सड़क पर था छोड़ दिया, लेकिन तू बचने वाला नहीं. और अगर आज के बाद किसी और लौंडियाफौंडिया से बात की, तो फिर देख लेना…’’

‘‘अरे देव, बेला की इतनी हिम्मत?’’

‘‘अंकल, मेरे मन में बेला ने दहशत पैदा कर दी थी. इस के बाद किसी लड़की से बात करने से पहले मैं हजार बार सोचता था और पहले चारों तरफ नजरें घुमा कर देख लेता था कि कहीं आसपास बेला तो नहीं है.’’

‘‘ओह, पर वह लड़की थी ही ऐसी. न शर्म, न लिहाज.’’

‘‘लेकिन अंकल, वह पढ़ाई में भी बहुत काबिल थी, तभी तो औफिस में भी वह मेरे से ऊंचे ओहदे पर थी. फिर भी मैं सबकुछ भूल कर अपने काम में लग गया.

‘‘बाद में बेला के बारे में बहुतकुछ सुनने को मिलने लगा था. लेकिन औफिस में दिखावे के लिए बड़ी सतीसावित्री बनी घूमती थी और अपने काम में कोई चूक नहीं होने देती थी.’’

‘‘फिर भी देव, वह चैन से तो न बैठी होगी…’’

‘‘अंकल, कुछ दिन तो वह ऐसे ही मु झ से मिलने की नाकाम कोशिश करती रही, लेकिन बेला जैसी लड़की ऐसी अनदेखी को बरदाश्त नहीं कर पाती है. एक दिन बेला सीधे मेरे औफिस में पहुंच गई और उस ने दरवाजा अंदर से बंद कर लिया. मु झे उस के इरादे का जरा सा भी अहसास नहीं था.’’

‘‘आखिर क्या था उस का इरादा देव?’’ मैं ने पूछा.

‘‘अंकल, मु झे बताते हुए भी शर्म आती है. पहले वह मेरे पास आ कर मु झ से सट कर खड़ी हुई. मैं ने बचने की कोशिश की, तो मेरे गालों पर चिकोटी काटते हुए गंदी गाली दे कर बोली, ‘बच कर कहां भागता है. ले ले न तू भी जवानी के मजे.’

‘‘अंकल, तभी मैं ने उसे डपटते हुए कहा, ‘बेला, तुम पागल हो गई हो क्या? दूर हटो.’

‘‘लेकिन, ऐसा लगता था, जैसे वह आज हवस की पुजारिन बन कर आई हो. उस ने अपनी शर्ट के ऊपर के
2 बटन खोले, अपनी ब्रा ऊपर की और बोली, ‘ले ले जवानी का मजा.’’’

‘‘ओह देव, यह तो हद हो गई. कोई लड़की ऐसा करती है भला. यह तो सीधेसीधे जबरदस्ती की कोशिश थी.’’

‘‘अंकल, मैं ने खुद को बचाते हुए उसे जोर से धक्का दिया. उस का सिर दीवार में जा कर लगा. वह चिल्लाई, ‘बाहर जा कर बताऊंगी सब को. तू मु झ से जबरदस्ती करने की कोशिश कर रहा था. आज भी दुनिया ऐसे मामलों में औरतों की बातों पर यकीन करती है मर्दों की नहीं.’

‘‘वह तो अपने कपड़े ठीक कर के मेरे औफिस से बाहर चली गई, लेकिन उस की बात सुन कर मैं घबरा गया. तभी मेरी नजर सामने सीसीटीवी कैमरे पर पड़ी.

कुछ देर के लिए मु झे तसल्ली हुई कि दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा. फिर भी अपना शक दूर करने के लिए चपरासी को बुला कर पूछा कि सीसीटीवी कैमरा काम कर रहा है कि नहीं. उस ने बताया कि यह खराब है और इस को बदला जाना है. अब मेरा पक्ष रखने वाला कोई नहीं था.’’

‘‘फिर तो तुम्हारे साथ बहुत बुरा हुआ होगा?’’

‘‘हां अंकल, मु झे बहुत जलील कर के औफिस से निकाला गया. मेरी एक न सुनी गई. तब मु झे समाज में ऐसे मामलों में आदमी और औरत के होने का फर्क सम झ में आया.’’

‘‘क्या कोई पुलिस कंप्लैंट हुई तुम्हारे खिलाफ?’’

‘‘बस अंकल, यही एक मेहरबानी हुई. कंपनी ने किसी बखेड़े में न पड़ते हुए मु झे नौकरी से बरखास्त कर दिया. जब मैं कंपनी के औफिस से बाहर निकल रहा था, तब बेला के कड़वे करेले से शब्द मेरे कानों में पड़े, ‘मोची का बेटा है, मोची का बेटा ही रहेगा. अब जिंदगीभर उस नीम के पेड़ के नीचे बैठ कर दूसरों की जूतियां गांठ…’

‘‘मैं बेला के इन कड़वे शब्दों को सुन कर तिलमिला उठा.’’

‘‘यह सुन कर कोई भी तिलमिला जाता देव. यह तुम्हारा सब्र और सम झदारी थी, जो तुम ने इस जहर के प्याले को पी लिया. कोई और होता तो बखेड़ा खड़ा कर देता… फिर?’’

‘‘इस घटना के बाद मेरा मन नौकरी से भी उचट गया. मैं ने पापा से बात की, तो उन्होंने मु झे घर बुला लिया और मोची की दुकान खोलने की बात कही. लेकिन मेरे मन में कुछ और ही चल रहा था.

‘‘मैं जूतों का एक शोरूम खोलने के मूड में था. कुछ पैसा पापा के पास था, कुछ बैंक से लोन लिया और कानपुर की एक जूता कंपनी 20 फीसदी रकम पहले देने पर शोरूम के लिए माल उठवाने के लिए तैयार हो गई. बाकी पापा का अनुभव और मेरी मेहनत थी. बस, यही मेरी कहानी थी अंकल.’’

‘‘लेकिन देव, मेरी नजर में तो कहानी अभी अधूरी है. आखिर बेला का क्या हुआ?’’

तब देव ने हंसते हुए कहा, ‘‘अंकल, आप ने भी कैसा सवाल पूछ लिया? वह जो चाहती थी, उसे वह मिला. मैं जो चाहता था, मुझे वह मिला.’’

‘‘मतलब…?’’ मैं ने हैरानी से पूछा. मु झे लगा कि कहानी में अभी भी कोई मोड़ है.

‘‘मतलब यह कि कंपनी को जल्दी ही बेला की असलियत पता चल गई. सुनने में आया कि उसे कंपनी से धक्के मार कर बाहर निकाला गया. उस की गंदी हरकतों की वजह से उस का अपने परिवार से पहले ही नाता टूट चुका था, किसी और ने भी उस का साथ नहीं दिया. उस का जोड़ा हुआ पैसा कब तक चलता?’’

‘‘फिर, क्या किया उस ने?’’

‘‘फिर उसे कहीं नौकरी न मिली. उस ने शहर तक बदले, लेकिन अपनी हरकतें न बदलीं. उस के बदनाम किस्से उस से पहले दूसरी जगह पहुंच जाते. वह जलील होती और उसे बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता.

काश, उस ने कंपनी और शहर बदलने के बजाय अपनी हरकतें बदली होतीं.’’

‘‘अब कहां पर है वह देव?’’

‘‘अंकल सुना है कि वह अब मेरठ की बदनाम गली का हिस्सा बन चुकी है. वही दलदल, जिस में गिर कर कभी कोई औरत बाहर नहीं आती.’’

मेरी कहानी पूरी हो चुकी थी. मैं चाय पी कर और बापबेटे से विदा ले कर बाहर आया. मैं एक नजर कामयाबी की उस सीढ़ी पर डालने से खुद को रोक न सका, जिस पर एक मोची के बेटे का फलसफा लिखा था ‘राजप्रसाद बूट्स ऐंड शूज’.

Hindi Story: नाटक छोटा सा

Hindi Story: आसमानी रंग की प्लेन साड़ी में कितनी खूबसूरत लग रही थी वह. उस की खुली हुई काली जुल्फें बारबार चेहरे पर गिरी जा रही थीं, जिन्हें वह बड़े नाज से फिर से संवारने की नाकाम कोशिश करती थी. खिड़की से अंदर आती हुई धूप की चमक से उस का सांवला चेहरा सुनहरी आभा से चमक उठता था.

अपने ही काम में तल्लीन वह 40 साल की औरत आज औफिस में सब की नजरों का केंद्र बनी हुई थी. लंचटाइम में मैनेजर साहब ने आ कर स्टाफ के सभी लोगों से उस का परिचय कराया था.

‘‘इन से मिलिए, ये हैं काजल. आज से ये भी हमारे साथ ही काम करेंगी और आप सब इन का सपोर्ट कीजिए,’’ बौस ने इशारोंइशारों में यह भी बता दिया था कि काजल के पति की पिछले साल एक सड़क हादसे में मौत हो गई थी और इसीलिए अब काजल को नौकरी करने की जरूरत पड़ रही है.

बौस के चले जाने के बाद सभी लोग काजल से ‘हायहैलो’ करने लगे थे. इन में सब से आगे समीर था, जो अपनी तीखी नजरों से काजल के जिस्म का अच्छी तरह मुआयना कर रहा था काजल का रंग भले ही सांवला था, पर उस के नैननक्श बहुत तीखे थे, जो उस की खूबसूरती को और भी बढ़ा देते थे. वह समीर को पहली ही नजर में जंच गई थी. वैसे भी समीर की दिलफेंक नजरों को तो हर लड़की और हर औरत जंच ही जाती है.

समीर का पूरा नाम समीर सिंह था. वह अपनी जाति को बड़ा बताता था और सामने वाले की जाति में कमियां निकालना उस का फेवरेट काम था. वह नौकरी में रिजर्वेशन के भी खिलाफ था.

उस के मुताबिक, ऊंची जाति का हक दलितों ने छीन लिया है, इसीलिए ज्यादातर अगड़े आज बेरोजगार हैं. अपने सोशल मीडिया प्रोफाइल पर उस ने ‘कट्टर क्षत्रिय’ वाली तसवीर लगा रखी थी.

समीर की उम्र 28 साल थी और उस के घर में सिर्फ उस की मां और 20 साला बहन रुचि थी, जो अभी पढ़ाई कर रही थी.

रात को समीर बिस्तर पर लेटा, तो उस से उम्र में पूरे 12 साल बड़ी, पर बेहद आकर्षक काया वाली काजल की याद सता रही थी.

औफिस में अगले दिन से ही समीर ने काजल पर डोरे डालने शुरू कर दिए थे. कभी वह काजल के पास जा कर काम के बारे में कुछ बात करता, तो कभी उस की तारीफ करने लगता.

काजल भी समीर को एक अच्छा इनसान सम झ बैठी थी. तभी तो उस दिन जब काजल औफिस का काम निबटा कर थके कदमों से रोड के किनारे खड़ी हो कर कैब का इंतजार कर रही थी कि तभी समीर अपनी बाइक ले कर आ गया और ठीक काजल के सामने आ कर खड़ी कर दी.

‘‘आइए, मैं आप को छोड़ देता हूं,’’ समीर ने यह बात इतने नाटकीय अंदाज में कही थी कि काजल कुछ कह नहीं सकी और मुसकराते हुए उस की बाइक पर बैठ गई.

थोड़ी देर के बाद ‘सिल्वेस्टर कैफे’ के सामने समीर ने अपनी बाइक रोक दी और काजल की तरफ देखते हुए कहा, ‘‘यह शहर का फेमस कैफे है, इसलिए एक कौफी पीना तो बनता ही है.’’

काजल ने भी कोई एतराज नहीं जताया और दोनों जा कर कौफी टेबल पर बैठ गए.

समीर ने अपनी कौफी में थोड़ी ऐक्स्ट्रा शुगर ली, जबकि काजल ने शुगर फ्री कौफी लेना ही पसंद किया.

कौफी के घूंट भरते समय समीर काजल को जीभर कर देख रहा था, पर जैसे ही काजल ने नजर उठाई तो समीर फिर से मासूम बनने का दिखावा सा करने लगा और इधरउधर की बातें करने लगा.

कौफी पीने के बाद समीर ने काजल को उस के अपार्टमैंट्स की बिल्डिंग के बाहर छोड़ दिया. काजल शालीमार अपार्टमैंट्स के फ्लैट नंबर 102 में अपने 22 साल के भाई गौतम के साथ रहती थी.

अगले दिन औफिस में लंच के समय समीर के एक दोस्त राघव ने चुटकी लेते हुए कहा, ‘‘तू तो अपनेआप को ‘कट्टर क्षत्रिय’ कहता है, पर फिर इस दलित जाति वाली काजल पर क्यों डोरे डाल रहा है?’’

काजल दलित जाति की है, यह बात तो समीर अच्छी तरह जानता ही था. वह मुसकराया और उस ने राघव से फुसफुसाते हुए कहा, ‘‘अरे, तु झे क्या पता कि ये दलित जाति की औरतें तो बिस्तर पर बहुत मजा देती हैं और अगर दलित औरत विधवा हो तो फिर तो कहने ही क्या?

‘‘और फिर इन के साथ मजे लेने से कोई दिक्कत नहीं है, क्योंकि दलित औरतें और तंबाकू वाली चिलम कभी जूठी नहीं होती.’’

समीर के चेहरे पर एक जहरीली मुसकराहट अब भी दौड़ रही थी. उस दिन पता नहीं क्यों, पर समीर औफिस में चुपचाप था. उस की चुप्पी काजल को अच्छी नहीं लगी, तो उस ने समीर की चुप्पी की वजह पूछी.

समीर ने उसे बताया कि उसे जुकाम है और सिर में भी दर्द हो रहा है. यह बात सुन कर काजल ने उसे दवा लेने की सलाह दी.

रोज की तरह ही औफिस से निकलते हुए समीर ने अपनी बाइक पर काजल को बिठाया और शालीमार अपार्टमैंट्स के सामने उतार दिया.

जैसे ही काजल आगे बढ़ी, तो समीर ने कहा, ‘‘कम से कम अपने फ्लैट पर बुला कर इस बीमार को एक कप चाय तो पिला दीजिए.’’

समीर की इस बात पर काजल थोड़ा सोच में पड़ गई थी, क्योंकि आज उस का भाई किसी सिलसिले में शहर सेबाहर गया हुआ था और ऐसे में वह किसी गैरमर्द को फ्लैट में बुलाना तो नहीं चाहती थी, पर समीर के चेहरे का भोलापन देख कर काजल ने मुसकराते हुए उसे अपने फ्लैट की तरफ चलने का इशारा किया.

काजल 2 कप चाय ले आई. अपनी चाय सिप करते ही समीर ने बुरा सा मुंह बनाया और काजल से चाय में और ज्यादा चीनी डाल कर लाने को कहा.

काजल किचन की ओर चीनी लेने गई, इतनी देर में समीर ने काजल के कप में नशे की गोली डाल दी.

काजल को कुछ पता नहीं चला. चाय पीने के बाद समीर बहाने से फोन करने लगा. काजल पर धीरेधीरे नशा हावी होने लगा था और कुछ देर बाद वह गहरी नींद के आगोश में चली गई.

समीर को इसी बात का इंतजार था. उस ने काजल को बिस्तर पर लिटाया और उस के जरूरी कपड़े हटा दिए और बेहोशी की सी हालत में काजल का रेप किया और एक वीडियो भी बना लिया.

जब काजल को होश आया, तो उस की दुनिया लुट चुकी थी. एक बार फिर दलित विधवा किसी ऊंची जाति वाले की हवस का शिकार हुई थी.

समीर जा चुका था. अपने साथ हुआ जुल्म काजल से सहन नहीं हो रहा था. वह बहुत रोई. अपनी जिंदगी को खत्म तक करने के बारे में सोचा, पर मर जाना किसी समस्या का हल तो नहीं और फिर उस का भाई भी तो उसे चरित्रहीन ही समझेगा.

काजल इसी उधेड़बुन में थी. जब कुछ सम झ नहीं आया, तो वह शावर के नीचे जा कर खड़ी हो गई. जब वह बाहर आई, तो खुद को तरोताजा महसूस करने लगी.

काजल की सम झ में इतना तो आ ही गया था कि हो न हो, बात इतने पर ही खत्म नहीं होगी और यही हुआ भी.

अगले दिन ही समीर का फोन आया. कांपते हाथों से काजल ने फोन रिसीव तो कर लिया, पर कुछ बोल न सकी.

उधर से समीर ने ही काजल को उस के पोर्न वीडियो के उस के मोबाइल में होने की बात बताई और दोबारा जिस्मानी संबंध बनाने की मांग की. ऐसा न करने पर वीडियो इंटरनैट पर और काजल के भाई और औफिस के लोगों के बीच वायरल कर देने की धमकी दे दी. अपनी इज्जत इस तरह से तारतार हो जाने की बात सोच कर काजल डर गई थी.

बेचारी काजल एक दलित जाति की ऐसी विधवा औरत थी, जिस को अपने भाई का कैरियर बनाना था. काजल के लिए नौकरी करना भी जरूरी था और फिर उसे तो समाज का भी डर था.

इसी तरह से न जाने कितनी बार समीर ने काजल को ब्लैकमेल कर के उस की इज्जत लूटी. पर उस दिन तो हद हो गई, जब समीर अपने साथ एक दोस्त को भी ले आया. वे दोनों काजल के साथ जिस्मानी संबंध बनाना चाहते थे, पर अब काजल का सब्र जवाब दे गया था.

इस तरह तो समीर उसे पूरी दुनिया में बदनाम कर देगा और न जाने कितने दिनों तक उसे यह सब सहना पड़ेगा, इसलिए आज वह नहीं झुकेगी. यह तय करते ही काजल ने अपना बैग उठाया और कमरे से बाहर निकल गई.

उसे जाता देख समीर बेफिक्र था, क्योंकि वह जानता था कि काजल के बेहूदा वीडियो उस के पास होने के चलते काजल को फिर से मजबूर करना मुश्किल नहीं होगा, पर यह सिर्फ उस का सोचना भर था. अगले कई दिनों तक काजल औफिस नहीं आई और काजल का फोन भी स्विच औफ आता रहा.

समीर बेचैन हो रहा था. हाथ आई एक मस्त दलित औरत, जिस के साथ वह जब चाहे मजे कर सकता था, पर अब तो उस का कोई अतापता नहीं था. अब वह क्या करता. उसे यही लगा था कि या तो काजल ने खुदकुशी कर ली है या वह शहर छोड़ कर बहुत दूर चली गई है.

यह सोच कर समीर मन मसोस कर रह जाता था, पर अब उसे और दुखी नहीं रहना पड़ेगा, क्योंकि काजल तो आज औफिस आ गई थी और यही नहीं, अब तो वह पहले से भी ज्यादा तरोताजा दिख रही थी और सब से मुसकरा कर बात भी कर रही थी.

समीर ने भी उस से बात करनी चाही तो भी काजल ने सामान्य ढंग से उस की बातों का जवाब दिया. समीर सम झ गया था कि यह चिडि़या तो अब पूरी तरह से उस के कब्जे में है ही, क्योंकि काजल एक सम झदार औरत है, जो समाज के सामने कभी बदनाम नहीं होना चाहेगी.

यही बात सोच कर शाम को औफिस से निकलते हुए समीर ने बेशर्मी दिखाते हुए काजल से कहा, ‘‘अरे मैडम, न जाने कहां चली गई थीं तुम. चलो, अब तो तुम आ ही गई हो, तो क्यों न आज रात रंगीन कर लें.’’

इस सवाल के बदले में काजल ने आंखें झुका लीं और समीर ने तुरंत ही अपनी बाइक काजल के सामने खड़ी कर दी. काजल बड़ी खामोशी से उस की पिछली सीट पर बैठ गई थी.

वे दोनों एक होटल के कमरे में थे. समीर महंगी वाली शराब की बोतल अपने साथ लाया था, जिसे खोल कर वह काजू की नमकीन के साथ पीने लगा और काजल को कपड़े उतारने का इशारा करने लगा.

काजल ने कहा कि वह कपड़े तो बाद में उतारेगी, पर पहले अपना मूड तो बना लिया जाए और इस के लिए काजल ने खुद ही एक पोर्न मूवी एलईडी की स्क्रीन पर चला दी.

समीर तो पहले से ही कहता था कि दलित औरतें बहुत गरम होती हैं, पर काजल को भी पोर्न देखने का शौक है, यह जान कर समीर को मजा ही आ गया था.

‘अब आज नए अंगरेजी ढंग से काजल के साथ रात गुजारूंगा…’ अभी समीर सोच ही रहा था कि स्क्रीन पर एक पोर्न मूवी के सीन आनेजाने लगे, जिन्हें देख कर समीर जोश से पागल हुआ जा रहा था. समीर ने काजल को फिर से पकड़ने की कोशिश की, पर तभी सामने की एलईडी स्क्रीन पर सीन बदल गया था.

समीर ने स्क्रीन पर देखा कि एक भारतीय लड़की बिस्तर पर बैठी हुई है और तभी एक लड़के ने बिस्तर पर आ कर उसे बांहों में जकड़ लिया और दोनों एकदूसरे को चूमने लगे और दोनों के हाथ एकदूसरे के जिस्म पर फिसलने लगे थे.

समीर अभी इस वीडियो में मजा ढूंढ़ ही रहा था कि उस की नजर लड़की के चेहरे पर गई, तो वह बुरी तरह चौंक गया. वह लड़की कोई और नहीं, बल्कि उस की सगी बहन रुचि ही तो थी.

समीर ने आंखें फाड़फाड़ कर देखा, पर उसे कुछ सम झ नहीं आया कि उस की बहन का यह वीडियो कैसे बना और यह लड़का कौन है.

समीर झुं झला गया था. उस ने काजल के चेहरे की ओर देखा, जो खड़ी मुसकरा रही थी और उस के हाथ में एक मोबाइल था.

समीर गुस्से में भर कर उसे मारने दौड़ा, तो काजल ने उसे हाथ के इशारे से रोकते हुए अपने मोबाइल की ओर इशारा किया और धमकी देते हुए कहा कि उस की एक क्लिक में उस की बहन का यह वीडियो अभी पूरे इंटरनैट पर वायरल हो जाएगा, इसलिए अब आगे से वह उसे ब्लैकमेल करना छोड़ दे और उस का वह वीडियो डिलीट कर दे.

समीर जहां का तहां रुक गया था. आखिरकार उस की बहन की इज्जत का मामला था और अपनी बहन को बदनामी से बचाने के लिए उस ने काजल की सारी बातें भी मान ली थीं.

काजल की आंखों में बदले की भावना थी. उस की आंखें मानो कह रही थीं कि एक दलित विधवा अब और शोषण नहीं सहेगी.

काजल वहां से तुरंत बाहर की ओर चल दी और कैब ले कर एक होटल में पहुंची, जहां पहले से ही उस का भाई और समीर की बहन रुचि काजल का इंतजार कर रहे थे.

काजल ने रुचि को गले लगा कर उस का धन्यवाद कहा, क्योंकि गौतम और रुचि के इस प्लान और खेले गए इस नाटक ने ही तो समीर के चंगुल से उसे बाहर निकालने में मदद की थी.

जब बारबार समीर के द्वारा ब्लैकमेल किए जाने के कारण काजल बिलकुल टूट गई थी, तो उस ने शर्म और हिचक छोड़ कर अपने भाई गौतम को ब्लैकमेलिंग वाली बात बता दी थी, तो गौतम ने आव देखा न ताव और समीर को मारने पहुंच गया.

पर जब समीर के साथ उस ने उस की सुंदर बहन को देखा, तो गौतम का प्लान बदल गया और अगले दिन से ही रुचि के कालेज जा कर उस के साथ प्यार का झूठा नाटक खेलने लगा, उस के इर्दगिर्द डोल कर प्यार की पेंगें बढ़ाने लगा.

सीधीसादी रुचि जल्दी ही गौतम की बातों में आ गई और रुचि ने भी अपने प्यार का इजहार गौतम से कर दिया.

गौतम रुचि के साथ सैक्स वीडियो बना कर उसे छोड़ देना चाहता था, ताकि अपनी बहन का बदला ले सके, पर गौतम को भी अब तक रुचि से सचमुच का प्यार हो गया था, इसलिए एक दिन गौतम ने रुचि को सारी बात बता दी.

रुचि नाराज नहीं हुई, बल्कि उस ने अपने भाई समीर को ही गलत ठहराते हुए एक प्लान बनाया, जो काजल को और ज्यादा ब्लैकमेल होने से बचा सके.

तभी रुचि और गौतम ने एकदूसरे के साथ किसी फिल्म हीरोहीरोइन के जैसी ऐक्टिंग की जो देखने में एकदम बेहूदा एमएमएस की तरह लगे और इस में रुचि के चेहरे को साफ दिखाया गया था, ताकि समीर जल्दी से उसे पहचान ले और यह ट्रिक काम कर गई. इस एक छोटे से नाटक ने समीर को उस की औकात दिखा दी थी.

अभी समीर इस सारे मामले से उबर भी नहीं पाया था कि उस के मोबाइल पर रुचि का वीडियो काल आया, जिस में वह समीर से कह रही थी कि समीर ने एक दलित विधवा के साथ जो कुकर्म किया है, वह जानने के बाद अब वह उस के साथ नहीं रह सकती, इसलिए वह घर से जा रही है और वैसे भी उस ने अपना जीवनसाथी चुन लिया है और वह कोई और नहीं, बल्कि काजल का भाई गौतम था.

वीडियो काल पर काजल के साथ गौतम को देख कर समीर ने अपना माथा पीट लिया था. एक विधवा को गलत ढंग से ब्लैकमेल करने का इतना बुरा अंजाम भुगतना पड़ेगा, यह तो उस ने कभी सोचा ही नहीं था.

समीर अब कुछ नहीं कर सकता था. उस ने भारी मन से काजल का वीडियो डिलीट कर दिया था और अब उस की सोशल मीडिया प्रोफाइल से ‘कट्टर क्षत्रिय’ नामक शब्द उसे लगातार मुंह चिढ़ा रहे थे.

Hindi Romantic Story: गरम सांसों की सरगम

Hindi Romantic Story, लेखिका – डा. आरती मंडलोई

शहर की हलचल से कोसों दूर पहाड़ों के बीच बसा हुआ यह रिसौर्ट किसी सपने की तरह लग रहा था. हरियाली से ढके ऊंचऊंचे पहाड़, हलकीहलकी बारिश और ठंडी हवा में घुली ताजगी… सबकुछ जैसे किसी पुराने रोमांटिक गीत की धुन में बंधा हुआ था.

अनिका बालकनी में खड़ी थी. उस के लंबे घने गीले बाल उस की पीठ पर लहरों की तरह बिखरे हुए थे. हलकी हवा उस के चेहरे को छू कर गुजर रही थी, लेकिन उस की बेचैनी कम नहीं हो रही थी.

यह वीकैंड उस ने बहुत सोचसम झ कर चुना था. कुछ दिनों के लिए खुद से मिलने के बहाने, लेकिन कहीं न कहीं वह जानती थी कि असल में यह वक्त आरव के साथ बिताने के लिए था.

आरव… उस की जिंदगी में किसी गहरी नदी की तरह उतरा था. उन का रिश्ता बहुत साधारण तरीके से शुरू हुआ था. एक कौरपोरेट औफिस में साथी मुलाजिम के रूप में. शुरुआत में काम के सिलसिले में बातचीत हुई, फिर हलकीफुलकी दोस्ती और धीरेधीरे यह दोस्ती एक अलग एहसास में ढल गई थी.

पहली बार जब वे दोनों बारिश में भीगे थे, तो अनिका ने महसूस किया था कि आरव की नजरें उसे बस यों ही नहीं देख रहीं. वह पहली बार उस के इतने करीब आया था कि उस की सांसों की गरमाहट तक महसूस हो रही थी. अब वह यहां थी आरव के साथ, इस पहाड़ी रिसौर्ट में.

तभी दरवाजे पर दस्तक हुई.

अनिका ने दरवाजा खोला. सामने वही था, जिस की आहट तक उसे पहचानने लगी थी.

आरव भीगा हुआ था. सफेद टीशर्ट उस के बदन से चिपकी हुई थी. बालों से पानी टपक रहा था और आंखों में वही पुरानी बेचैनी थी, जो हर बार उसे बेचैन कर देती थी.

‘‘बहुत तेज बारिश हो रही है,’’ आरव ने मुसकराते हुए कहा.

‘‘हां…’’ अनिका ने बड़ी ही धीमी आवाज में जवाब दिया.

आरव कमरे में भीतर आ गया था और अंदर से दरवाजा बंद कर दिया. कमरे में मोमबत्तियों की हलकी रोशनी फैली हुई थी. बाहर बारिश तेज हो गई थी और खिड़की के शीशों पर पानी की बूंदें धीमेधीमे फिसल रही थीं.

आरव ने जैकेट उतारी और उसे पास की कुरसी पर रख दिया. उस की नजरें अनिका पर टिकी थीं.

अनिका हलके नीले रंग की साटन की ड्रैस में थी, जो उस के बदन को छू कर फिसल रही थी.

‘‘क्या सोच रही हो?’’ आरव ने धीमे से पूछा.

‘‘कुछ नहीं,’’ अनिका ने मुसकरा कर कहा, लेकिन उस की आंखें कुछ और ही कह रही थीं.

आरव उस के करीब आया. उस की उंगलियां धीरे से अनिका की कलाई पर टिकीं. यह छुअन कोई नई नहीं थी, लेकिन फिर भी हर बार की तरह इस में कुछ नया था.

‘‘तुम्हें ठंड लग रही होगी,’’ अनिका ने कहा, लेकिन उस की आवाज में हलकी कंपकंपी थी.

आरव ने उस की उंगलियों को थाम लिया. उस की पकड़ थोड़ी हलकी थी, लेकिन फिर भी उस में एक अनदेखी ताकत थी.

‘‘मु झे ठंड नहीं लगती… लेकिन, तुम्हारे करीब आने की चाह जरूर लगती है,’’ उस के शब्द जैसे किसी गरम लहर की तरह अनिका के जिस्म को छू गए.

आरव ने धीरे से उस के चेहरे को अपनी हथेलियों में लिया. उस की उंगलियां उस के गालों को छू रही थीं. अनिका की पलकों में हलकी कंपन थी.

कमरे में हलकी धुंध थी. बारिश की खुशबू हवा में घुल गई थी. आरव ने धीरे से उस की हथेलियां फिर अपने हाथों में लीं. उन की उंगलियां आपस में उल झ गईं. जैसे बारिश की बूंदें पत्तों से लिपट जाती हैं. जैसे नदी किसी किनारे से मिल कर उस में समा जाना चाहती है.

आरव और करीब आया. उस की सांसों की गरमी अब अनिका की गरदन पर महसूस हो रही थी. अनिका ने अपनी आंखें बंद कर लीं.

आरव के होंठों की हलकी छुअन उस की कनपटी से होते हुए उस के गालों तक उतर आई. अनिका का दिल तेजी से धड़कने लगा था.

बाहर बरसात और भी तेज हो गई थी. आरव ने धीरेधीरे अपनी उंगलियां उस की पीठ पर फिराईं. उस के रेशमी बालों में अपनी उंगलियां उल झा दीं. फिर जैसे दो बेचैन लहरें आपस में समा गईं.

बरसात की बूंदें खिड़की से टकरा रही थीं. मोमबत्तियों की लौ भी कांप रही थी. अब दो धड़कनें एक लय में बंध रही थीं. उस रात बारिश बहुत देर तक यों ही बरसती रही.

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