अब तनुश्री ने अक्षय, शाहिद और रजनीकांत पर साधा निशाना

बौलीवुड अभिनेत्री तनुश्री दत्ता ने नाना पर 10 साल पहले यह आरोप लगाया था कि फिल्म के गाने की शूटिंग के दौरान नाना ने उन्हें गलत ढंग से छूने की कोशिश की और बाद में बदतमीजी भी की. अब एक बार फिर तनुश्री इस मामले पर खुलकर अपनी बात कह रही हैं.

जब यह मामला तेजी से खबरों में आया तो तनुश्री ने फिर से एक प्रेस कौन्फ्रेंस कर अपना गुस्सा उतारा और बौलीवुड के तमाम बड़े स्टार्स का नाम लेकर कहा कि जो लोग किसी भी लड़की के साथ गलत व्यवहार करते हैं, उन बड़े सितारों को बैन कर देना चाहिए. तनुश्री ने कहा, मेरे साथ हुई शर्मनाक घटना के बाद भी नाना पाटेकर और गणेश आचार्य के साथ आज भी बौलीवुड के बड़े-बड़े स्टार्स रजनीकांत, अक्षय कुमार और शाहिद कपूर जैसे सितारे काम कर रहे हैं. ऐसा करने से नाना जैसे लोगों का मनोबल और बढ़ता है.ऐसा नहीं होना चाहिए.

मेरा कहना यह है कि एक महिला के साथ बदतमीजी और गुंडे भेजकर अटैक करवाने वाले व्यक्ति को इन बड़े-बड़े स्टार्स का सपौर्ट नहीं मिलना चाहिए.’ तनुश्री ने कहा, ‘नाना पाटेकर, गणेश आचार्य, निर्माता सामी सिद्दीकी और निर्देशक राकेश सारंग ने मिलकर मेरी जिंदगी नरक जैसी बना दी थी. आजतक फिल्म इंडस्ट्री की ओर से उनको कोई सजा नहीं मिली है.

पटाखा : कहानी और किरदार अविश्वसनीय

साहित्यिक कहानियां व उपन्यासों और देहाती व देसी पृष्ठभूमि की कहानियों पर फिल्में बनाने में माहिर विशाल भारद्वाज ने इस बार राजस्थान के लेखक चरन सिंह पथिक की एक छह पन्नों की कहानी ‘दो बहनों’ पर फिल्म ‘‘पटाखा’’ बनायी है. मगर इस बार वह असफल रहे हैं. ‘‘पटाखा’’ न साहित्यिक फिल्म बन पायी और न ही काल्पनिक. इतना ही नहीं यह माना जाता है कि फिल्म का निर्देशक ऐसा जादूगर होता है, जो कि फिल्म के हर पात्र व घटनाक्रम को इस तरह पेश करता है कि दर्शक के लिए वह पात्र व कहानी विश्वसनीय लगने लगे. इस तर्क के धरातल पर भी विशाल भारद्वाज असफल हैं. क्योंकि दो बहनों के बीच के युद्ध को उन्होंने भारत व पाकिस्तान के बीच के युद्ध की संज्ञा देते हुए जिस अंदाज में पेश किया है, उससे कम से कम भारतीय इत्तफाक नहीं रखते. मगर विशाल भारद्वाज का दावा है कि लेखक चरन सिंह पथिक ने यह कहानी वास्तविक बहनों पर लिखी है. इस बार विशाल भारद्वाज मनोरंजक फिल्म नहीं बना पाए. ‘पटाखा’ देखकर नहीं लगता कि यह फिल्म ‘मकबूल’, ‘ओंकारा’या ‘कमीने’ जैसी फिल्मों के फिल्मकार की फिल्म है.

फिल्म की कहानी राजस्थान के एक गांव की है, जहां अपनी पत्नी की मौत के बाद शांतिभूषण (विजय राज) अपनी दो बेटियों चंपा कुमारी उर्फ बड़की (राधिका मदान) और गेंदा कुमारी उर्फ छुटकी (सान्या मल्होत्रा) के साथ रहता है. शांति भूषण ने अपनी पत्नी से वादा किया था कि वह दोनों बेटियों की अच्छी परवरिश करेंगे, उन्हें किसी चीज की कमी नहीं होने देंगे. इसी के चलतेउन्होंने दूसरी शादी नहीं की. मगर बड़की और छुटकी एक दूसरे को फूटी आंख भी देखना पसंद नहीं करती.

इनमें बीड़ी पीने से लेकर दंबगई करने और एक दूसरे से निरंतर झगड़ते रहने की आदत है. गाली गलौज के बीच एक दूसरे को थप्पड़ रसीद करने, एक दूसरे की लात घूंसे से पिटाई करने, मिट्टी से लेकर गोबर तक में एक दूसरे को सबसे बड़े दुश्मन की तरह पीटते हुए युद्ध करती रहती हैं. इन दोनों के बीच लड़ाई से सबसे ज्यादा मनोरंजन डिप्पर (सुनील ग्रोवर) को मिलता है. इसलिए वह इन दोनों के कान भरकर एक दूसरे से लड़वाता रहता है.

बड़की का सपना बहुत बड़ी दूध की डेरी खोलकर व्यापार करना है. जबकि छुटकी का सपना शिक्षक बनना है. इधर गांव का एक अमीर युवक पटेल (सानंद वर्मा) इनमें से किसी के भी संग शादी करने के लिए लालायित है. इसीलिए वह शांति भूषण को अपने खदान को बचाए रखने के लिए चार लाख रूपए भी देता है. मगर ऐन शादी से एक दिन पहले बड़की अपने प्रेमी जगन (नमित दास) के साथ भाग जाती है. अब पटेल, छुटकी के साथ शादी करना चाहता है, पर जब पटेल बारात लेकर पहुंचता है, तो पता चलता है कि छुटकी भी अपने प्रेमी विष्णु (अभिषेक दुहान) के साथ भाग गयी. विष्णु सेना में है, जबकि जगन जूनियर इंजीनियर है. मजेदार बात यह है कि इन्हे भागने में डिप्पर ही मदद करता है. पर दोनों शादी करके एक ही घर पहुंचती हैं. क्योंकि जगन व विष्णु सगे भाई हैं. इनके बीच अटूट प्यार है.

अब पटेल, शांति भूषण के खिलाफ गांव की पंचायत बुलाता है, जहां डिप्पर तर्क देकर पटेल का मुंह बंद करा देता है, पर जगन व विष्णु को मिलकर चार लाख रूपए चुकाने पड़ते हैं.

शादी के बाद बड़की व छुटकी अपने पिता की कसम खाकर  वादा करती हैं कि वह नहीं झगड़ेंगी. दोनों की जिंदगी सकून मेंबीतने लगती है. समय के साथ दोनों एक एक बेटी की मां भी बन जाती हैं. लगभग छह सात वर्ष बाद डिप्पर पुनः इनकी जिंदगी में पहुंचता है और इन्हे अपने सपने याद दिला कर इनके बीच की आग भड़काता है. बड़की व छुटकी अपने अपने पतियों के कान भर घर का बंटवारा कर खेत बिकवा कर अपने अपने सपनों को पूरा करती हैं.

बड़की को डेरी उद्योग और छुटकी को शिक्षक के रूप में पुरस्कार मिलता है. यह बात दोनों को बर्दाश्त नहीं होती. एक दिन बड़की की आवाज और छुटकी की देखने की शक्ति चली जाती है. डाक्टर के अनुसार कोई कमी नहीं है. तब डिप्पर के कहने परशांति भूषण मरने का नाटक करते हैं, बड़की व छुटकी ठीक होकर एक दूसरे पर पिता को मार डालने का आरोप लगाकर लड़नाशुरू करती हैं. शांतिभूषण उठकर बड़की व छुटकी से बात करते हैं. दोनों बहने गले मिलती हैं.

यदि हम पात्रों व कहानी की विश्वसनीयता को नजरंदाज कर दें, तो भी पटकथा के स्तर पर भी काफी कमियां हैं. कमजोर पटकथा व कमजोर चरित्र चित्रण के चलते दर्शक फिल्म के साथ खुद को जोड़ नहीं पाता. फिल्म में सुनील ग्रोवर के किरदार को स्थापित करने में असफल रहे हैं. फिल्म में बड़की डेरी उद्योग को स्थापित कर पुरस्कार जीतती है. छुटकी पहले पढ़ाई करती है,फिर शिक्षक बनती है और पुरस्कार जीतती है.

परिणामतः कुछ वर्ष गुजरते हैं, मगर इनकी बेटियों की उम्र में कोई अंतर नहीं आता. यह है विशाल भारद्वाज की कल्पनाशक्ति…इतना ही नहीं फिल्म को बेवजह काफी लंबा खींचा गया है. कई सीन अति अविश्वसनीय लगते हैं. एडीटिंग टेबल पर फिल्म को कसने की आवश्यकता थी. सुनील ग्रोवर का नारद मुनि जैसा डिप्पर का किरदार गले नहीं उतरता है. फिल्म का क्लायमेक्स व अंत तो बहुत ही बेकार है. कुल मिलाकर फिल्म मनोरंजन करने की बजाय बोर ही करती है.

फिल्म ‘‘पटाखा’’ की खूबसूरती यही है कि विशाल भारद्वाज ने  राजस्थानी गांवों को सजीव रूप में उकेरा है. इसके लिए फिल्म के कैमरामैन रंजन पलित बधाई के पात्र हैं. मगर विशाल भारद्वाज ने जिस तरह से बड़े दांत, गंदे उलझे हुए बाल, कुरूप चेहरे के साथ गांव की लड़कियों की कल्पना की है, वह तो महज मजाक लगता है. क्योंकि आज की तारीख में शहरी लड़कियों के मुकाबले गांव की लड़कियां ज्यादा फैशन परस्त हो चुकी हैं.

फिल्म का गीत संगीत प्रभावित नहीं करता. पार्श्वसंगीत जरुरत से ज्यादा लाउड है.

जहां तक अभिनय का सवाल है तो राधिका मदान व सान्या मल्होत्रा ने बेहतरीन अभिनय किया है. मगर इंटरवल से पहले सान्या मल्होत्रा राजस्थानी की बजाय हिंदी भाषा में ही संवाद अदायगी करती हैं. विजय राज, सुनील ग्रोवर, सानंद वर्मा,नमित दास आदि ने भी ठीक ठाक काम किया है.

दो घंटे 17 मिनट की अवधि वाली फिल्म ‘‘पटाखा’’ का निर्माण विशाल भारद्वाज, रेखा भारद्वाज, अजय कपूर, धीरज वाधवान,इशान सक्सेना ने किया है. लेखक निर्देशक व संगीतकार विशाल भारद्वाज, कहानीकार चरण सिंह पथिक, कैमरामैन रंजित पलित व कलाकार हैं – सान्या मल्होत्रा, राधिका मदान, विजय राज, सानंद वर्मा, नमित दास, सुनील ग्रोवर व अन्य.

सौतिया डाह में पत्नी ने लिया बदला

62 वर्षीय रामविलास साह जिला सीतामढ़ी के डुमरा थाना क्षेत्र में आने वाले गांव बनचौरी में अपने परिवार के साथ रहता था. उस के परिवार में दूसरी पत्नी सुनीता के अलावा 2 बेटे थे. पहली पत्नी मनतोरिया से उस के 6 बच्चे थे. लेकिन मनतोरिया अपने बच्चों के साथ दूसरे मकान में रहती थी.

एक तरह से उस का पति रामविलास से कोई संबंध नहीं था. रामविलास के पास खेती की अच्छीखासी जमीन थी. डुमरा इलाके में वह बड़े काश्तकारों में शुमार था. रामविलास के दिन बड़ी खुशहाली में कट रहे थे. अपने नियमानुसार वह सुबह 5 बजे बिस्तर त्याग देता था.

4 जून, 2018 को सुबह के 9 बजे गए थे. उस दिन न तो रामविलास उठा और न ही उस की पत्नी सुनीता और न ही उस के दोनों बेटे. घर में भी कोई हलचल नहीं हो रही थी. यह देख कर पड़ोस में रहने वाले रामविलास के भतीजे श्रवण को बड़ा अजीब लगा. इस के पहले ऐसा कभी नहीं हुआ था कि चाचा या चाची इतनी देर तक सोते रहे हों.

यह देख कर श्रवण से नहीं रहा गया तो वह चाचाचाची को आवाज लगाते हुए उन के घर के अंदर दाखिल हो गया. घर का मुख्य दरवाजा यूं ही भिड़ा हुआ था, हलका सा धक्का देते ही किवाड़ खुल गई. श्रवण आवाज देते हुए चाचाचाची के कमरे में पहुंच गया.

कमरे में जा कर उस की नजर बिस्तर पर पड़ी तो उस का दिल दहल गया. बिस्तर पर रामविलास साह और उस की पत्नी सुनीता देवी की रक्तरंजित लाशें पड़ी थीं. श्रवण चिल्लाते हुए उलटे पांव बाहर आ गया.

उस के चीखने की आवाज सुन कर आसपड़ोस के लोग भी वहां आ गए. जब वे लोग रामविलास के घर में गए तो पतिपत्नी की लाशें देख कर हैरत में रह गए. उन के दोनों बच्चे घर में दिखाई नहीं दे रहे थे. लोगों ने जब दूसरे कमरे में देखा तो उन के दोनों बेटों नवल और राहुल की लाशें भी खून से लथपथ पड़ी मिलीं.

हत्यारों ने चारों की हत्या बड़ी बेरहमी से गला रेत कर की थी. थोड़ी देर में ही 4-4 लाशें पाए जाने की खबर बनचौरी गांव में ही नहीं बल्कि पूरे डुमरा क्षेत्र में फैल गई. जिस ने भी सुना दौड़ा चला आया.

देखतेदेखते वहां भारी भीड़ जमा हो गई थी. इसी बीच किसी ने घटना की सूचना थाना डुमरा को दे दी थी. एक ही परिवार के 4 लोगों की हत्या की सूचना मिलते ही थानाप्रभारी विकास कुमार सिंह तुरंत पुलिस टीम के साथ बनचौरा के लिए रवाना हो गए. जब वह घटनास्थल पर पहुंचे तो रामविलास के घर के बाहर लोगों का हुजूम लगा था.

उच्चाधिकारियों को घटना की सूचना देने के बाद थानाप्रभारी घटनास्थल का निरीक्षण करने लगे. घटना की सूचना मिलते ही एसपी विकास बर्मन, एएसपी संदीप कुमार नीरज, डीएसपी (सदर) कुमार वीर वीरेंद्र, डीएसपी राजवंश सिंह, नगर थाने के इंसपेक्टर मुकेश चंद कुंवर, एसआई शशि भूषण सिंह आदि घटनास्थल पर पहुंच गए.

छानबीन के दौरान पुलिस अधिकारियों ने पाया कि हत्यारों ने चारों को गोली मारी थी. बाद में उन्होंने सब के गले रेते थे. ऐसा काम वही कर सकता था, जो उन से सख्त नफरत करता हो. मतलब यह कि हत्यारा नहीं चाहता था कि उन में से कोई भी जिंदा बचे. वह उन्हें आखिरी सांस तक मरते देखना चाहता था.

छानबीन के दौरान पुलिस ने मौके से 4 खोखे बरामद किए. हत्यारों ने घर में रखे किसी भी सामान को हाथ नहीं लगाया था, कमरे का सारा सामान अपनी जगह रखा था. इस से साफ जाहिर हो रहा था कि हत्यारों का मकसद सिर्फ हत्या करना था.

इस का मतलब रामविलास साह और उस के परिवार की हत्या किसी साजिश के तहत की गई थी. निश्चित रूप से हत्यारे परिचित रहे होंगे, जिन्हें घर के कोने की जानकारी थी. तभी वह बड़ी आसानी से अपना काम कर के निकल गए और किसी को कानोंकान भनक तक नहीं लगी.

घटना की सूचना मृतक रामविलास के साले यानी सुनीता के भाई बिरजू साह को मिली तो वह भी बनचौरी पहुंच गया. बहनोई और भांजों की लाशें देख वह दहाड़ मार कर रोने लगा. उस की बहन के घर में कोई दीया जलाने वाला तक नहीं बचा था.

पड़ोसियों, गांव वालों आदि से बात करने के बाद पुलिस ने मौके की काररवाई निपटा कर चारों लाशें पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल भिजवा दीं. पुलिस ने मृतका सुनीता के भाई बिरजू को थाने बुलवा कर पूछताछ की तो उस ने इस सामूहिक नरसंहार के लिए अपने बहनोई की पहली बीवी मनतोरिया देवी और उस के 3 बेटों बिटटू कुमार, विक्रम कुमार उर्फ पप्पू और रोहित कुमार को जिम्मेदार मानते हुए नामजद रिपोर्ट दर्ज करा दी.

बिरजू साह की तहरीर पर पुलिस ने नामजद लोगों के खिलाफ भादंवि की धारा 302, 120बी, 34 और 27 आर्म्स एक्ट के तहत केस दर्ज कर लिया.

घटना की मौनिटरिंग एसपी विकास बर्मन खुद कर रहे थे. उन्होंने सदर डीएसपी कुमार वीर वीरेंद्र को निर्देश दिया कि पुलिस की एक टीम बना कर आरोपियों को जल्द से जल्द गिरफ्तार करें ताकि वे भाग न सकें.

डीएसपी कुमार वीर वीरेंद्र ने आरोपियों की गिरफ्तारी के लिए एक स्पैशल टीम गठित की, जिस में तेजतर्रार और विश्वासपात्र पुलिसकर्मियों को शामिल किया गया. नामजद चारों आरोपी गांव बनचौरी के ही रहने वाले थे. पुलिस को मुखबिर के जरिए सूचना मिली कि आरोपी गांव में ही छिपे हैं और भाग निकलने का मौका ढूंढ रहे हैं.

मुखबिर की सूचना पर पुलिस अविलंब बनचौरी पहुंची और रामविलास की पत्नी मनतोरिया के घर दबिश दी. घर खुला हुआ था लेकिन वहां कोई नहीं मिला. तभी पुलिस को पता चला कि चारों आरोपी अभीअभी घर छोड़ कर फरार हुए हैं.

आरोपियों को पकड़ने के लिए पुलिस गांव के बाहर पहुंची. पुलिस को देखते ही आरोपी बिट्टू, विक्रम और रोहित भागने लगे. पुलिस ने दौड़ कर तीनों आरोपियों को पकड़ लिया. ये तीनों भाई थे.

इन की मां मनतोरिया उन के साथ नहीं थी. शायद वह किसी दूसरे रास्ते से निकल गई थी. पुलिस तीनों आरोपियों को थाने ले आई. थानाप्रभारी विकास कुमार सिंह ने आरोपियों की गिरफ्तारी की सूचना डीएसपी कुमार वीर वीरेंद्र सिंह और एसपी विकास बर्मन को दे दी.

दोनों अधिकारी थाने पहुंच गए. एसपी और डीएसपी के समक्ष थानाप्रभारी ने तीनों आरोपियों से चौहरे हत्याकांड के संबंध में पूछताछ की तो उन्होंने बिना किसी झिझक के अपना जुर्म कबूल कर लिया. चारों की हत्या किए जाने का उन्हें कोई मलाल नहीं था.

उन के चेहरों पर कोई अफसोस नहीं दिख रहा था बल्कि उन की आंखों में मृतकों के प्रति नफरत की चिंगारी फूट रही थी. पुलिस ने जब उन से हत्याओं की वजह पूछी तो उन्होंने विस्तार से कहानी सुनाई. पता चला कि इस खूनी कहानी की काली दास्तान पारिवारिक रंजिश की बुनियाद पर लिखी जा गई थी.

तीनों आरोपियों को गिरफ्तार करने के बाद एसपी विकास वर्मन ने पुलिस लाइंस में पत्रकार वार्ता का आयोजन किया. तीनों आरोपियों ने पत्रकारों के सामने अपने पिता, सौतेली मां और दोनों सौतेले भाइयों की हत्या किए जाने का जुर्म कबूल किया.

इस के बाद पुलिस ने उन्हें कोर्ट में पेश कर न्यायिक हिरासत में भेज दिया. इस खूनी कहानी को विस्तार से जानने के लिए हमें 30 साल पीछे जाना होगा, जब इस कहानी की बुनियाद रखी गई.

रामविलास साह अपने पिता के साथ खेतीकिसानी का काम करता था. करीब 40 साल पहले उस के पिता ने उस का विवाह मनतोरिया के साथ कर दिया था. रामविलास की जिंदगी में मनतोरिया बहार बन कर छा गई. समय के साथ मनतोरिया 6 बच्चों की मां बनी. जिन में 3 बेटे और 3 बेटियां थीं.

करीब 30 साल पहले रामविलास साह ने सुनीता से दूसरी शादी रचा ली थी. पति के इस फैसले पर मनतोरिया आगबबूला हो गई. बच्चे भी पिता की दूसरी शादी से खुश नहीं थे, उन्होंने सुनीता को मां मानने से इनकार कर दिया. यहीं से रामविलास साह के जीवन में महाभारत की शुरुआत हो गई. रामविलास ने सुनीता से किस विवशता अथवा मजबूरी के तहत शादी की थी, इसे रामविलास ही जानता होगा.

हालांकि रामविलास दोनों पत्नियों को बराबर प्यार देता था. पहली पत्नी के बच्चों को वही दुलार देता था जो उन्हें देता आया था. बच्चों के साथ उस ने कभी भेदभाव नहीं किया. लेकिन बच्चे पिता से नाखुश रहते थे और अपनी मां का ही साथ देते थे.

खैर, आगे चल कर सुनीता भी 2 बच्चों नवल कुमार उर्फ भोलू और राहुल कुमार की मां बन गई. नवल और राहुल के पैदा होने के बाद तो घर में कलह और बढ़ गई. पहली पत्नी मनतोरिया और उस के बच्चे रामविलास पर दबाव बना रहे थे कि वह सुनीता से संबंध तोड़ दे. लेकिन रामविलास ने मनतोरिया और बच्चों से दो टूक कह दिया था कि चाहे कुछ भी हो जाए वह सुनीता से कभी अलग नहीं हो सकता. पति का यह जवाब सुन कर मनतोरिया मन मसोस कर रह गई.

आखिर रामविलास ने इस कलह से निबटने के लिए अपनी संपत्ति 2 बराबर भागों में बांट दी. एक हिस्सा मनतोरिया के नाम लिख दिया और दूसरा हिस्सा सुनीता के नाम. यही नहीं उस ने पुस्तैनी मकान भी पहली पत्नी को दे दिया और उसी गांव में घर से थोड़ी दूरी पर एक नया घर बना कर सुनीता और दोनों बच्चों के साथ रहने लगा.

लेकिन उस का यह पूरा खेल उल्टा पड़ गया. मनतोरिया और उस के तीनों बच्चों को ये सब इसलिए नागवारा गुजरा कि रामविलास ने सौतेली मां को अपनी जायदाद में से हिस्सा क्यों दिया. उन्होंने पिता से कहा कि वह सौतेली मां का हिस्सा उन्हें दे दें, नहीं तो इस का अंजाम बुरा हो सकता है. लेकिन रामविलास ने पत्नी और बच्चों की बातों पर ध्यान नहीं दिया.

बात इसी साल मार्चअप्रैल महीने की है. मनतोरिया और उस के तीनों बेटों बिट्टू, विक्रम और रोहित के मन में लालच आ गया. उन्होंने धोखे से सुनीता के हिस्से की 12 कट्ठे जमीन में से 4 कट्ठा जमीन 4 लाख रुपए में बनचौरी गांव के पवन साह को बेच  दी. पवन साह के नाम जमीन का बैनामा होने तक सुनीता या रामविलास को कानोंकान खबर तक नहीं हुई.

लेकिन यह बात छिपने वाली नहीं थी. आखिरकार रामविलास को पता चल ही गया कि मनतोरिया ने धोखे से सुनीता के हिस्से की 4 कट्ठा जमीन गांव के पवन साह को बेच दी है. इस बात को ले कर मनतोरिया और सुनीता के बीच विवाद छिड़ गया.

रामविलास सुनीता का ही साथ दे रहा था. उस ने मनतोरिया को इस के लिए खूब खरीखोटी सुनाई. इस पर मनतोरिया के सब से छोटे बेटे रोहित ने पिता को भलाबुरा कह दिया. बेटे की बात रामविलास के दिल में चुभ गई. उस ने आव देखा न ताव, उस के गाल पर 2 थप्पड़ रसीद कर दिया.

बेटे पर हाथ उठाने वाली बात न तो मनतोरिया को अच्छी लगी और न ही बिट्टू और विक्रम को. 2 थप्पड़ों से उस के सीने में धधक रही नफरत की आग ज्वाला बन गई. यह बात तीनों बेटों को नागवार गुजरी कि पिता ने कैसे हाथ उठाया. उन्होंने ठान लिया कि इस का परिणाम उन्हें भुगतना ही होगा. सुनीता जब तक जिंदा रहेगी तब तक उन्हें चैन नहीं मिलेगा.

उस रोज के बाद से तीनों भाइयों के सिर पर खून सवार हो गया. वह पिता, सौतेली मां और उस के दोनों बेटों को मौत के घाट उतारने की योजना बनाने लगे. बिट्टू और विक्रम ने रुपयों का बंदोबस्त कर के आर्म्स सप्लायर वीरेंद्र ठाकुर से 25 हजार रुपए में 2 पिस्टल और कारतूस खरीद लिए. उस के बाद बेटों ने मां को बता कर उसे भी अपनी योजना में शामिल कर लिया.

मनतोरिया तो चाहती ही थी कि उस की सौतन सुनीता उस के रास्ते से हट जाए. उस ने बच्चों को डांटने के बजाए उन की पीठ थपथपाई. मां के योजना में शामिल हो जाने से बेटों के हौसले बुलंद हो गए. बिट्टू और रोहित ने साथ देने के लिए खोया गांव में रहने वाले ममेरे भाई रामकृत साह और सियाराम साह को भी योजना में शामिल कर लिया.

अब वह जल्द से जल्द अपनी योजना को अंजाम देना चाहते थे. आखिर इस के लिए उन्होंने 3 जून, 2018 की रात तय की. योजना को अंजाम देने से पहले तीनों भाइयों ने रात में शराब पी. 3-4 जून, 2018 की रात करीब 12 बजे बिट्टू, विक्रम और रोहित हथियार ले कर अपने पिता रामविलास साह के घर की ओर बढ़े. बिट्टू और विक्रम ने खिड़की से भीतर झांक कर देखा तो रामविलास और सुनीता गहरी नींद में सोए थे. दूसरे कमरे में नवल और राहुल भी सो रहे थे.

बिट्टू और विक्रम के मुख्य शिकार नवल और राहुल ही थे. उन्होंने पहले उन्हीं की हत्या करने की योजना बनाई थी. विक्रम ने खिड़की से ही नवल और राहुल के सीने में 1-1 गोली उतार दी, जबकि बिट्टू ने पिता रामविलास और सौतेली मां सुनीता को गोली मारी, रोहित बाहर खड़ा पहरा दे रहा था.

गोली मारने के बाद बिट्टू और विक्रम घर में घुस गए और दोनों ने फलदार चाकू से चारों के गले रेत दिए. इस के बाद इन लोगों ने सीने पर ताबड़तोड़ वार कर अपने आक्रोश को ठंडा किया. जब उन्हें विश्वास हो गया कि चारों के जिस्म ठंडे पड़ गए हैं, तो उन्हें तसल्ली हुई.

इस खूनी खेल को अंजाम देने में उन्हें केवल आधा घंटा लगा. इस के बाद वे अपने घर पहुंचे और खून से सने अपने हाथपैर धोए. फिर मां को बता दिया कि उन्होंने उन चारों को मौत के घाट उतार दिया. अब उन के रास्ते का कांटा सदा के लिए हट गया है.

उसी रात उन्होंने अपनी मां को ममेरे भाई रामकृत साह और सियाराम साह के साथ भेज दिया. वहां से दोनों मनतोरिया को कहां ले गए अब तक पता नहीं चला. 4 जून, 2018 को ही तीन आरोपी गिरफ्तार कर लिए. मनतोरिया कथा लिखने तक पुलिस की गिरफ्त से दूर थी.

पुलिस ने बिट्टू कुमार, विक्रम और रोहित की निशानदेही पर हत्या में प्रयुक्त पिस्टल और चाकू भी बरामद कर लिए. इस के अलावा उन्हें पिस्टल और कारतूस उपलब्ध कराने वाले बिट्टू के ममेरे भाई रामकृत साह और सियाराम साह को 6 जून, 2018 को गिरफ्तार किया गया. पुलिस ने तीनों आरोपियों से पूछताछ कर के उन्हें जेल भेज दिया.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

भोगनाथ का भोग : क्या पूरे हो पाए अरमान

कड़ाके की सर्दी हो और ऊपर से बरसात हो जाए तो सर्दी के तेवर और भी भयावह हो जाते हैं. रोज की तरह दोपहर को भोगनाथ बिट्टू के घर पहुंचा तो वह रजाई में लिपटी बैठी थी. दोनों एकदूसरे को देख कर मुसकराए, फिर हथेलियां रगड़ते हुए भोगनाथ बोला, ‘‘आज तो गजब की सर्दी है.’’

‘‘इसीलिए तो रजाई में दुबकी बैठी हूं,’’ बिट्टू बोली, ‘‘रजाई छोड़ने का मन ही नहीं कर रहा, लेकिन तुम इतनी ठंड में कहां घूम रहे हो?’’

‘‘घूम नहीं रहा, सुबह से तुम्हें देखा नहीं था, इसलिए रोज की तरह तुम से मिलने चला आया,’’ भोलानाथ ने जवाब दिया, ‘‘सोचा था, तुम आग ताप रही होगी तो मैं भी हाथ सेंक लूंगा, लेकिन यहां तो हालात दूसरे ही है. लगता है मुझ से ज्यादा तुम्हें गर्मी की जरूरत है. दूसरे तरीके से हाथ सेंक कर मुझे तुम्हारी ठंड दूर करनी होगी.’’  कहने के बाद भोगनाथ ने बिट्टू का चेहरा अपने हाथों में ले लिया.

बिट्टू ने एक झटके से अपना चेहरा अलग कर लिया और ठंडे हो गए गालों पर हथेलियां मलते हुए बोली, ‘‘हटो भी, कितने ठंडे हैं तुम्हारे हाथ, एकदम बर्फ जैसे.’’

‘‘बिट्टू, कुछ चीजें ठंडी जरूर लगती हैं, लेकिन उन की तासीर बड़ी गर्म होती है,’’ भोगनाथ ने चुहल की, ‘‘मेरी बात पर विश्वास न हो तो आजमा कर देख लो. 2 मिनट में मेरे हाथ तुम्हें गर्म तो लगने ही लगेंगे, खुद भी इतनी गर्म हो जाओगी कि रजाई शरीर से उतार फेंकोगी.’’

भोगनाथ के कथन का आशय समझ कर बिट्टू के गाल सुर्ख हो गए. वह उसे मीठी फटकार लगाते हुए बोली, ‘‘मैं तुम से कई बार कह चुकी हूं कि इस तरह की बातें मत किया करो. लेकिन तुम हो कि मानते ही नहीं.’’

भोगनाथ ने थोड़ा आगे की ओर झुक कर बिट्टू की आंखों में झांका, ‘‘तो फिर कैसी बातें किया करूं?’’

‘‘वैसी ही अच्छीअच्छी बातें, जैसे दूसरे प्रेमी करते हैं.’’

‘‘प्रेमियों की बात कहीं से भी शुरू हो, जिस्म पर ही पहुंच कर खत्म होती है.’’

‘‘भोग, अभी हमारी शादी नहीं हुई है.’’

‘‘शादी भी जल्दी हो जाएगी.’’

‘‘तब जो मन में आए, बातें कर लेना.’’

‘‘बातें तो अभी भी कर रहा हूं. शादी के बाद तो कुछ और करूंगा.’’

बिट्टू को उस की बातों में रस आने लगा. मुसकरा कर उस ने पूछा, ‘‘शादी के बाद क्या करोगे?’’

‘‘कह कर बताऊं या कर के?’’

‘‘फिर शुरू हो गए.’’

‘‘उकसा तो तुम ही रही हो,’’ भोगनाथ मुसकराया, ‘‘लगता है तुम्हारा मन डोल रहा है.’’

जवाब में मुंह खोलने के लिए बिट्टू ने मुंह खोला ही था कि तभी हवा का तेज झोंका बरसात की ठंडी फुहारों को खुले दरवाजे के भीतर तक ले आया. ठंड से बिट्टू और भोगनाथ दोनों के बदन सिहर उठे. बिट्टू ने रजाई को और मजबूती से लपेट लिया, ‘‘उफ! यह बारिश और यह ठंड आज किसी की जान ले कर ही मानेगी.’’

‘‘किसी की क्या, फिलहाल तो मेरी जान पर ही बनी हुई है.’’

‘‘वो कैसे?’’

‘‘तुम ने तो सर्दी से अपना बचाव कर रखा है, मैं खुले दरवाजे के सामने खड़ा ठंड से कांप रह हूं.’’

‘‘तो दरवाजा भेड़ कर तुम भी रजाई ओढ़ लो.’’ बिट्टू के मुंह से अनायास निकल गया. यह बात उस ने कैसे कह दी. वह खुद ही नहीं समझ पाई.

भोगनाथ को शायद इसी पल की प्रतीक्षा थी. बिट्टू ने उस से दरवाजा भेड़ने को कहा था, पर उस ने दरवाजा बंद कर के सिटकनी लगा दी. उस के पास आ कर बिटटू की रजाई में घुसने लगा, ‘‘बिट्टू, तुम कितनी गर्म हो. अपने जैसा मुझे भी गर्म कर दो न?’’

‘‘मेरी रजाई में तुम कहां घुसे आ रहे हो,’’ बिट्टू ने हड़बड़ा कर कहा, ‘‘कोई आ जाए तो मैं मुफ्त में बदनाम हो जाऊंगी.’’

‘‘इश्क की दुनिया में उन का ही नाम होता है, जो बदनाम होते हैं.’’

‘‘समझने की कोशिश करो भोग,’’ बिट्टू ने प्रतिरोध किया, ‘‘तुम लड़के हो, तुम्हारा कुछ नहीं बिगड़ेगा लेकिन मैं किसी को मुंह दिखाने लायक नहीं रहूंगी.’’

‘‘मैं चाहता भी नहीं हूं कि कोई तुम्हारा मुंह देखे. तुम्हारा मुंह देखने के लिए मैं हूं न.’’ भोगनाथ ने रजाई के साथसाथ बिट्टू को भी जकड़ लिया. बिट्टू के बदन में ठंड की सिहरन दौड़ी तो पुरुष स्पर्श की मादक अनुभूति भी हुई.

गर्म रजाई और बिट्टू के तन की गरमी से भोगनाथ का शरीर सुलगने लगा. रजाई के भीतर से ही उस ने बिट्टू की कमर में हाथ डाल दिया. बिट्टू के तनमन में चिंगारियां सी चटखने लगीं. आनंद की उठती लहरों से उस की पलकें मुंदने लगीं और सांसों की रफ्तार तेज हो गई.

दोनों चुप थे, लेकिन उन की शारीरिक गतिविधियां एकदूसरे से बहुत कुछ कह रही थीं. मस्ती में भर कर वह भोगनाथ को अपने ऊपर खींचने लगी. बिट्टू की देह को मस्त और बहकते देख कर भोगनाथ ने उसे निर्वस्त्र किया, फिर स्वयं भी निर्वस्त्र हो गया. इस के बाद दोनों एकदूसरे में समा गए.

कुछ देर में जब दोनों के तन की आग ठंडी हुई तो दोनों एकदूसरे की बांहों से आजाद हुए. उस के बाद ही बिट्टू को पता चला कि पुरुष संसर्ग कितना आनंददायक होता है.

उत्तर प्रदेश के जिला सीतापुर के पिसावां थाना क्षेत्र के गांव सरवाडीह में भगौती रहता था. उस के परिवार में उस की पत्नी रामश्री और 2 बेटियां बिट्टू, सीमा और एक बेटा शोभित था. भगौती पिसावां कस्बे में एक दुकान पर लोहे की ग्रिल बनाने का काम करता था. भगौती को मिलने वाली मजदूरी से घर का खर्च बड़ी मुश्किल से चल पाता था. घर की आर्थिक स्थिति काफी खराब थी.

घर में बिट्टू भाईबहनों में सब से बड़ी थी. बात उस समय की है, जब बिट्टू की उम्र 16 साल थी. यौवन की दहलीज पर बिट्टू की खूबसूरती निखर गई थी.

भगौती के मकान से कुछ दूरी पर केदार रहता था. उस के परिवार में पत्नी जयरानी और 3 बेटों भोगनाथ, पिंटू और शिवा के अलावा 1 बेटी सविता थी. केदार मेहनतमजदूरी कर के  परिवार का भरणपोषण करता था. दोनों के घरों में काफी मेलजोल था और एकदूसरे के घर भी आनाजाना था.

आनेजाने के दौरान जवान होती बिट्टू पर भोगनाथ की नजर पड़ी तो उस की मदमस्त काया देख कर उस की नजरें उस पर जम गईं. जैसी लड़की की चाहत उस के दिल में थी, बिट्टू ठीक वैसी थी. बिट्टू का हसीन चेहरा उस की आंखों के रास्ते उस के दिल में उतरता चला गया.

घर के रास्ते पहले से खुले हुए थे. भोगनाथ की बिट्टू से खूब पटती थी. उस का कारण भी था, बिट्टू भी दिल ही दिल में भोगनाथ को पसंद करने लगी थी. धीरेधीरे वह भी उस की तरफ खिंचती चली गई. दोनों एकदूसरे से दिल ही दिल में प्यार करते थे. अपने प्यार का इजहार करने के लिए उन के पास पर्याप्त अवसर थे. इसलिए उन्हें न मोहब्बत के इजहार में वक्त लगा न इश्क के इकरार में.

गांव में मकान एक लाइन से बने थे. उन की छतें भी आपस में मिली हुई थीं. भोगनाथ अपने मकान से कई मकानों की छत फांद कर बिट्टू के पास पहुंच जाता था और छत पर बने कमरे में उस के साथ घंटों प्यार की मीठीमीठी बातें करता था.

प्रेम के हिंडोले में झूमती हुई बिट्टू कहती, ‘‘भोग, दिल तो मैं ने तुम्हें दे दिया है, पर तुम भी उस की लाज रखना. देखना कभी भूले से मेरा दिल न टूटे.’’

‘‘कैसी बात करती हो बिट्टू, तुम्हारा दिल अब मेरी जान है और कोई अपनी जान को यूं ही जाने देता है क्या?’’

‘‘इसी भरोसे पर तो मैं ने तुम से प्यार किया है. मनआत्मा से तुम्हें वरण कर के मैं 7 जन्मों के लिए तुम्हारी हो चुकी. देखना है कि तुम किस हद तक प्यार निभाओगे.’’

‘‘प्यार निभाने की मेरी कोई हद नहीं है. प्यार निभाने के लिए मैं किसी भी हद तक जा सकता हूं.’’

बिट्टू ने इत्मीनान से सांस ली, ‘‘पता नहीं, वह दिन कब आएगा, जब मैं तुम्हारी पत्नी बनूंगी.’’

‘‘विश्वास रखो बिट्टू, हमारे प्यार को मंजिल मिलेगी.’’ बिट्टू का हाथ अपने हाथों में ले कर भोगनाथ बोला, ‘‘वैसे भी हमारी शादी में कोई अड़चन तो है नहीं, हमारा धर्म और जाति एक है. हमारा सामाजिकआर्थिक स्तर एक जैसा है. सब से बड़ी बात यह कि हम दोनों प्यार करते हैं.’’

भोगनाथ की बात तो बिट्टू को यकीन दिलाती ही थी, उसे खुद भी पूरा भरोसा था कि दोनों की शादी कोई अड़चन नहीं आएगी. इसलिए उसे अपने प्रेम व भविष्य के प्रति कभी नकारात्मक विचार नहीं आते थे. उसे पलपल भोगनाथ का इंतजार रहता था. भोगनाथ के आते ही वह खुली आंखों से भविष्य के सुनहरे सपने देखने लगती थी.

तन्हाई, दो जवां जिस्म और किसी के आने का कोई डर नहीं. यही भावनाओं के बहकने का पूरा वातावरण होता था. कभीकभी बिट्टू और भोगनाथ के दिल बहकने लगते थे, लेकिन बिट्टू जल्द ही संभल जाती और भोगनाथ को भी बहकने से रोक लेती थी. लेकिन एक वर्ष पूर्व कड़कड़ाती ठंड में वह सब तनहाई में हो गया, जो बिट्टू नहीं चाहती थी.

उस दिन दोपहर को बने शारीरिक संबंध में बिट्टू को ऐसा आनंद आया कि वह बारबार उस आनंद को पाने के लिए उतावली रहने लगी. भोगनाथ भी कम मतवाला नहीं था.

इसी दौरान एक दिन इत्तफाक से बिट्टू की अनस नाम के एक युवक से बात हुई. उस के बाद इन दोनों की प्रेम कहानी में एक नया मोड़ आ गया.

सीतापुर की सीमा से सटे हरदोई जनपद के टडि़यावां थाना क्षेत्र के कस्बा गोपामऊ में नवी हसन रहते थे. नवी हसन के परिवार में पत्नी नाजिमा के अलावा 3 बेटे थे- साबिर, अनस और असलम.

नबी हसन की कस्बे में ही खाद की दुकान थी, जिस पर उस के साथ उस के बेटे अनस और असलम बैठते थे. साबिर किसी फैक्ट्री में काम करता था. अनस काफी खूबसूरत नौजवान था, साथ ही अविवाहित भी. उसे दोस्तों के साथ मौजमस्ती करने में काफी मजा आता था.

एक दिन सुहानी सुबह अनस उठ कर छत पर चला आया. छत की मुंडेर पर बैठ कर वह आसमान की तरफ निहार रहा था कि अचानक उस का मोबाइल बज उठा इतनी सुबह फोन करने वाला कोई दोस्त ही होगा, सोच कर अनस मोबाइल स्क्रीन पर बिना नंबर देखे ही बोला, ‘‘हां बोल?’’

‘‘जी, आप कौन बोल रहे हैं?’’ दूसरी ओर से किसी युवती की आवाज सुनाई दी तो अनस चौंक पड़ा. उसे अपनी गलती का एहसास हुआ. उस ने तुरंत ‘सौरी’ कहते हुए कहा, ‘‘माफ करना, दरअसल मैं समझा इतनी सुबह कोई दोस्त ही फोन कर सकता है, इसलिए… वैसे आप को किस से बात करनी है, आप कौन बोल रही हैं?’’

‘‘मैं बिट्टू बोल रही हूं. मुझे भी अपनी दोस्त से बात करनी थी, लेकिन गलत नंबर डायल हो गया.’’

‘‘कोई बात नहीं, आप को अपनी दोस्त का नंबर सेव कर के रखना चाहिए. ऐसा करने से दोबारा गलती नहीं होगी.’’

‘‘आप पुलिस में हैं क्या?’’

‘‘नहीं तो, क्यों?’’

‘‘पूछताछ तो पुलिस वालों की तरह कर रहे हैं. 25 सवाल और सलाह भी.’’ कह कर बिट्टू जोर से हंसी.

‘‘अरे नहीं, मैं ने तो वैसे ही बोल दिया. दोस्त आप की, फोन भी आप का. आप चाहें नंबर सेव करें या न करें.’’

‘‘तो आप दार्शनिक भी हैं?’’ बिट्टू ने फिर छेड़ा.

‘‘नहीं नहीं, आम आदमी हूं.’’

‘‘किसी के लिए तो खास होंगे?’’

‘‘आप बहुत बातें करती हैं.’’

‘‘अच्छी या बुरी?’’

‘‘अच्छी.’’

‘‘क्या अच्छा है मेरी बातों में?’’

अब हंसने की बारी अनस की थी. वह जोर से हंसा, फिर बोला, ‘‘माफ करना, मैं आप से नहीं जीत सकता.’’

‘‘और मैं माफ न करूं तो?’’

‘‘तो आप ही बताएं, मैं क्या करूं?’’ अनस ने हथियार डाल दिए.

‘‘अच्छा जाओ, माफ किया.’’

दरअसल बिट्टू ने अपनी सहेली से बात करने के लिए नंबर मिलाया था, लेकिन गलत नंबर डायल होने से अनस का नंबर मिल गया था. लेकिन अनस की आवाज उसे भा गई थी. इस के बाद उस के दिल में फिर से अनस से बात करने की इच्छा हुई, लेकिन संकोचवश वह अपने आप को रोक लेती थी.

फिर एक दिन उस से रहा नहीं गया तो उस ने अनस का नंबर फिर मिला दिया. इस बार अनस भी जैसे उस के फोन का इंतजार कर रहा था. उसे इस बात का एहसास था कि बिट्टू उसे फिर से फोन जरूर करेगी. इस बार जब दोनों की बात हुई तो काफी देर तक चली.

बिट्टू ने अपने बारे में बताया तो अनस ने भी अपने बारे में सब कुछ बता दिया. दोनों के बीच कुछ ऐसी बातें हुईं कि दोनों एकदूसरे के प्रति अपनापन सा महसूस करने लगे. यह दिसंबर 2017 की बात है.

फिर उन के बीच बराबर बातें होने लगीं. एक दिन दोनों ने रूबरू मिलने का फैसला कर लिया. दोनों मिले तो एकदूसरे को सामने पा कर काफी खुश हुए. बिट्टू काफी खुश थी.

उस ने भोगनाथ और अनस की तुलना की तो पाया कि भोगनाथ और अनस का कोई मुकाबला नहीं है. अनस भोगनाथ से ज्यादा खूबसूरत था और उस की आर्थिक स्थिति भी भोगनाथ से लाख गुना अच्छी थी. इसलिए वह भोगनाथ से दूरी बना कर अनस से नजदीकियां बढ़ाने लगी.

अनस अपने आप चल कर आए मौके को भला कैसे गंवा देता. उसे भी बैठेबिठाए एक खूबसूरत युवती का साथ मिला तो वह भी बिट्टू का हो गया. समय के साथ दोनों की नजदीकियां इतनी बढ़ीं कि तन की दूरियां भी खत्म हो गईं. एक दिन दोनों के बीच शारीरिक रिश्ता भी कायम हो गया.

13 मई की शाम साढ़े 7 बजे भोगनाथ घर में बैठा खाना खा रहा था कि तभी उस के मोबाइल पर किसी की काल आई. वह पूरा खाना खाए बिना घर से चला गया. काफी रात होने पर भी वह नहीं लौटा तो घर वाले चिंता में पड़ गए. सुबह होने पर उस की काफी तलाश की गई लेकिन उस का कहीं पता नहीं चला.

16 मई की सुबह किसी राहगीर ने पिसावां थाने में डीह कबीरा बाबा के जंगल में किसी अज्ञात युवक की लाश पड़ी होने की सूचना दी. सूचना पा कर थानाप्रभारी दिनेश सिंह पुलिस टीम के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए.

मृतक की उम्र 24-25 वर्ष रही होगी. उस के मुंह व गले पर कस कर अंगौछा बांधा गया था, जिस से दम घुटने से उस की मृत्यु हो गई थी. घटनास्थल पर काफी भीड़ एकत्र थी. थानाप्रभारी दिनेश सिंह ने उस की शिनाख्त कराई तो पता चला वह गांव सरवाडीह का भोगनाथ है.

घटनास्थल सरवाडीह गांव के बाहर ही था. इसलिए गांव के लोग भी वहां पहुंच गए थे. उन्होंने ही लाश की शिनाख्त की थी. पता चलते ही भोगनाथ का पिता केदार भी घर के अन्य सदस्यों के साथ वहां आ गया. भोगनाथ की लाश देख कर सब रोनेबिलखने लगे.

थानाप्रभारी दिनेश सिंह ने केदार से कुछ आवश्यक पूछताछ की और फिर लाश पोस्टमार्टम के लिए मोर्चरी भिजवा दी. केदार को साथ ले कर वह थाने आ गए. केदार की लिखित तहरीर पर उन्होंने अज्ञात के विरुद्ध भादंवि की धारा 302, 201 के तहत मुकदमा दर्ज करा दिया.

भोगनाथ के पास मोबाइल था, जो उस के पास से नहीं मिला था. केदार से भोगनाथ का मोबाइल नंबर ले कर थानाप्रभारी दिनेश सिंह ने उसे सर्विलांस पर लगा दिया. इस के अलावा भोगनाथ के मोबाइल नंबर की काल डिटेल्स भी निकलवाई.

भोगनाथ को बुलाने के लिए जिस नंबर से काल की गई थी, उस नंबर की जब विस्तृत जानकारी जुटाई गई तो वह नंबर सरवाडीह निवासी बिट्टू का निकला.

इस के बाद थानाप्रभारी दिनेश सिंह ने बिट्टू को हिरासत में ले कर महिला सिपाही की उपस्थिति में उस से सख्ती से पूछताछ की. उस ने भोगनाथ की हत्या का जुर्म स्वीकार करते हुए अपने 3 साथियों के नाम भी बता दिए.

इस के बाद बिट्टू के प्रेमी अनस को गिरफ्तार कर लिया गया. अनस के 2 दोस्त गोपामऊ निवासी विपिन और मोनू भी इस अपराध में शामिल थे. इस के बाद एसपी महेंद्र चौहान ने प्रैसवार्ता कर बिट्टू और अनस को मीडिया के सामने पेश किया.

जब भोगनाथ ने बिट्टू को अपने से दूरी बनाते देखा तो उस ने पता किया. जल्द ही उसे पता चल गया कि बिट्टू उस से किए गए सारे वादे, रिश्तेनाते तोड़ कर उस से दूर होना चाहती है तो वह तिलमिला गया. ऐसे मौके के लिए ही उस ने अपने मोबाइल से बिट्टू के साथ अंतरंग पलों के फोटो खींच रखे थे.

भोगनाथ ने बिट्टू से मिल कर उसे धमकाया कि वह उस से दूर हुई तो उस के अश्लील फोटो सब को भेज देगा. फोटो के बल पर भोगनाथ उसे ब्लैकमेल कर के उस के साथ संबंध बनाने लगा. बिट्टू उस के हाथ का खिलौना बनने के लिए मजबूर थी. इसी बीच उस के घर वालों ने हरदोई जनपद के पिहानी थाना क्षेत्र के एक युवक से उस की शादी तय कर दी. शादी 29 जून को होनी थी.

भोगनाथ की हरकतों से आजिज आ कर बिट्टू ने अनस से बात की. उस से कहा कि उस की जिंदगी में आने से पहले उस का एक दोस्त भोगनाथ था. भोगनाथ के पास उस के कुछ अश्लील फोटो हैं, जिन के सहारे वह उसे ब्लैकमेल करता है.

वैसे भी उस की शादी तय हो गई है. वह उस की शादी में अड़चन डाल सकता है. बिट्टू ने अनस से कहा कि भोगनाथ को ठिकाने लगाना पड़ेगा. इस के लिए मैं तुम्हारी हर बात मानने को तैयार हूं.

बिट्टू ने अनस से यह भी कहा कि भले ही उस की शादी हो रही हो, लेकिन उस के साथ संबंध हमेशा बने रहेंगे. अनस ने बिट्टू की परेशानी को हमेशा के लिए खत्म करने का फैसला कर लिया. उस ने अपने जिगरी दोस्तों विपिन और मोनू से मदद मांगी तो दोस्ती की खातिर दोनों अनस का साथ देने को तैयार हो गए. इस के बाद भोगनाथ को मारने की योजना बनाई गई.

योजनानुसार 13 मई को अनस ने एक मारुति वैगनआर कार बुक की. कार मालिक को उस ने बताया कि उसे दोस्तों के साथ एक तिलक समारोह में जाना है. कार में बैठ कर अनस अपने दोस्तों के साथ चल दिया.

दूसरी ओर बिट्टू ने शाम साढ़े 7 बजे के करीब भोगनाथ को मिलने के लिए डीह कबीरा बाबा के जंगल में बुलाया. भोगनाथ उस समय खाना खा रहा था, लेकिन अपनी प्रेमिका के बुलाने पर वह खाना बीच में छोड़ कर तुरंत वहां पहुंच गया. वहां उसे बिट्टू मिली. योजना के अनुसार बिट्टू उसे अपनी प्यार भरी बातों में उलझाए रही.

दूसरी ओर अनस ने चुनी गई जगह से कुछ पहले हडियापुर गांव के पास ड्राइवर से यह कह कर कार रुकवा दी कि आगे का रास्ता खराब है. वह वहीं खड़ा हो कर उन के आने का इंतजार करे. इस के बाद अनस और उस के दोस्त पैदल ही कबीरा बाबा के जंगल पहुंचे. वहां पहुंच कर उन्होंने बिट्टू के साथ मौजूद भोगनाथ को दबोच लिया.

फिर उस के गले में पड़े अंगौछे को रस्सी की तरह बना कर उस के मुंह में दबाते हुए उस के गले में फंदा बना कर कस दिया, इस से भोगनाथ चिल्ला न सका और गले पर कसाव बढ़ते ही उस का दम घुटने लगा. वह कुछ देर छटपटाया, फिर उस का शरीर शिथिल पड़ गया.

भोगनाथ को मौत के घाट उतारने के बाद बिट्टू छिपतेछिपाते हुए घर चली गई. अनस भी दोनों दोस्तों के साथ भागते हुए कार तक पहुंचा और ड्राइवर से बोला कि वह तेजी से कार चलाए जहां वह लोग गए थे, वहां उन का झगड़ा हो गया है. ड्राइवर ने यह सुन कर कार की गति बढ़ा दी. गोपामऊ पहुंच कर सब लोग अपने घर चले गए.

लेकिन अपने आप को ये लोग कानून की गिरफ्त में आने से नहीं बचा सके. उन के पास से भोगनाथ का मोबाइल और हत्या की साजिश में प्रयुक्त 2 मोबाइल फोन पुलिस ने उन से बरामद कर लिए.

29 मई, 2018 को पुलिस ने विपिन और मोनू को भी गिरफ्तार कर लिया. सभी अभियुक्तों को न्यायालय में पेश करने के बाद जेल भेज दिया गया.

– साथ में मोहित शुक्ला

चाइनीज मांझा बन रहा जानलेवा

पतंगबाजी दुनियाभर में मशहूर है. कई देशों में अलगअलग तरह के पतंगबाजी महोत्सव मनाए जाते हैं, जो वहां के पर्यटन को बढ़ावा देते हैं. एकदूसरे की पतंग काट कर जीत का जो मजा मिलता है वह पतंगबाजों के लिए अद्भुत होता है. पतंग काटने में हवा का रुख और पतंग की कलाबाजी के साथसाथ पतंग उड़ाने में इस्तेमाल होने वाली डोर यानी मांझा का भी खास महत्त्व होता है. पतंग में आगे की ओर अलगअलग तरह के मांझे और लोहे के तार तक का प्रयोग होता है. पतंग के साथ लगे मांझे के बाद एक अलग किस्म की डोर लगाई जाती है. पतंग के साथ लगा मांझा ही दूसरी पतंग के मांझे को रगड़ता है और उसे काट देता है. मांझा दूसरी पतंग की डोर को काट सके, इस के लिए मांझे में कांच और लोहे का बुरादा लगाया जाता है. देश में कौटन के धागे से तैयार पतंग की डोर बनाई जाती है.

हाल के कुछ सालों में चीन से नायलौन से तैयार की गई डोर बाजार में आने लगी है. नायलौन की यह डोर आसानी से टूटती नहीं है. उस के ऊपर जब लोहे और कांच का बुरादा चढ़ाया जाता है तो यह कौटन वाले भारतीय मांझे से उड़ रही पतंग की डोर को आसानी से काट देती है. चाइनीज मांझे से पतंग के साथसाथ उड़ाने वाले के हाथ भी कटने लगे. सब से खतरनाक काम तो तब होता है जब कटी हुई पतंग किसी साइकिल या मोटरसाइकिल सवार के गले, मुंह या हाथ में लिपट जाती है. इस से कई बार गले की नसें तक कट जाती हैं. इस तरह की कई घटनाएं देश में घट चुकी हैं. इस कारण देश में चाइनीज मांझे को नैशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल यानी एनजीटी ने प्रतिबंधित कर रखा है. नायलौन के साथ सिंथैटिक मैटेरियल से तैयार दूसरे मांझे बेहद खतरनाक होते हैं.

कानून के अनुसार इस तरह के मांझे से केवल पतंग उड़ाना ही गुनाह नहीं, इस मांझे को बेचना भी अपराध है. ऐनवायरनमैंट प्रोटैक्शन एक्ट 1986 की धारा 5 के अंतर्गत इस के इस्तेमाल पर 5 साल की सजा और एक लाख रुपए तक का जुर्माना या फिर दोनों का प्रावधान है. यह निजी फर्म, कंपनी, अथवा सरकारी कर्मचारियों पर भी लागू होता है. कैसे तैयार होता है

चाइनीज मांझा उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में नवाबीकाल से ही पतंगबाजी होती आई है. समय के साथ यहां पतंगबाजी का स्वरूप भी बदला है. शहर में पतंग बेचने की 100 से अधिक दुकानें हैं. ज्यादातर दुकान लखनऊ के पुराने महल्ले

जैसे चौक, अमीनाबाद, सआदतगंज, मौलवीगंज, खालाबाजार, टुडियागंज, ठाकुरगंज, हुसैनगंज में हैं. वैसे तो अब पतंगबाजी का शौक कम होता जा रहा है. इस के बाद भी दीवाली, मकरसंक्रांति, 15 अगस्त, रक्षाबंधन और दूसरे कुछ छुट्टी वाले दिनों में खूब पतंगबाजी होती है. एक अनुमान के अनुसार लखनऊ में पतंगबाजी का करीब 3 करोड़ का सालाना कारोबार है. केवल चाइनीज मांझे का ही कारोबार एक करोड़ से ऊपर का है. पतंगबाजी में मांझे का प्रमुख उपयोग होता है. उत्तर प्रदेश के बरेली जिले में देशी मांझा तैयार किया जाता है. देशी मांझा कौटन के धागे से तैयार होता है.

मांझा तैयार करने के लिए कौटन के धागे को एक छोर से दूसरे छोर पर टाइट कर के बांधा जाता है. इस के बाद चावल के मांड को धागे पर घिस कर लगाया जाता है. चावल का मांड कौटन के धागे पर पूरी तरह से चढ़ जाता है. एक बार सूखने के बाद कई बार उस को लगा कर सुखाया जाता है. इस के बाद उस को घिस कर धागे को चिकना किया जाता है, जिस से यह तेज हो जाता है. मांझा तैयार करने में कांच के पिसे हुए टुकड़ों का इस्तेमाल किया जाने लगा है. कांच लगने से मांझा काफी तेजी से दूसरे धागे को काट देता है. कांच के साथ अब लोहे का बुरादा भी इस में प्रयोग होने लगा है जिस से मांझे की धार और तेज हो जाती है. कौटन के धागे में यह परेशानी थी कि वह लोहे के बुरादे का प्रयोग होने से जल्दी टूट जाता था.

कांच और लोहे के बुरादे का होता है प्रयोग इस बीच, भारत में चाइनीज नायलौन के धागे की खपत शुरू हो गई. अब चाइनीज नायलौन के धागे पर मांझा तैयार करना सरल हो गया है. कांच और लोहे के बुरादे को जब चावल के मांड के साथ इस पर लगाया जाने लगा तो यह कौटन के धागे की तरह टूटता नहीं है. जल्दी न टूटने के कारण यह पतंग उड़ाने वालों के लिए भी खास हो गया. इस से अब दूसरी पतंग को काटना आसान हो गया है. इस कारण चाइनीज नायलौन से तैयार मांझा पतंगबाजी की पहली पसंद बन गया है.

केवल उपयोगिता में ही नहीं, कीमत में यह धागा सस्ता भी पड़ता है. ऐसे में इस का इस्तेमाल बढ़ने लगा और बाजार में चाइनीज मांझे के नाम से यह बिकने लगा. इस ने कौटन के धागे को पछाड़ दिया. पतंग जब कटने लगी और यह धागा लोगों की गरदन में फंसने लगा तो इस की शिकायत होने लगी. पर्यावरण के लिहाज से यह धागा उचित नहीं था. इस कारण इस के इस्तेमाल पर पूर्णरूप से कानूनी प्रतिबंध लग गया है. कानूनी रूप से बंद होने के बाद भी चाइनीज मांझे का इस्तेमाल आज भी हो रहा है. देश में बेईमानी इस कदर हावी है कि यहां पर कानून के विपरीत काम करना सरल है. हर आदमी थोड़े से मुनाफे के लिए सिस्टम को तोड़ लेता है. पतंगबाज अपनी छोटी सी खुशी और थोड़ी सी बचत के आगे देशी कौटन के मांझे के विपरीत चाइनीज मांझे का प्रयोग कर रहे हैं. प्रतिबंधित चाइनीज मांझा दिल्ली के रास्ते लखनऊ तक पहुंचता है. चाइनीज मांझे का कोई तय मूल्य नहीं होता. डिलिवरी करने वाले को ही मुंहमांगी कीमत मिल जाती है. फुटकर बाजार में यह मांझा ज्यादा डिमांड में है, ऐसे में यह चोरीछिपे खूब बिकता है.

देह पवित्रता : अग्निपरीक्षा युवती के लिए ही क्यों

कुछ समय पहले एक दैनिक अखबार में खबर छपी थी जिस का शीर्षक था, ‘बेवजह पत्नी को जान से मार डाला’ और फिर उस समाचार का ब्योरा था कि उस स्त्री का किसी से संबंध था. और फिर किसी फिल्मी कहानी की तरह घटना चलती है. अखबार के भीतरी पृष्ठ के एक कोने में छपा यह एक छोटा सा समाचार था, जबकि यह घटना इतनी छोटी नहीं थी. एक पूरी की पूरी पृष्ठभूमि, सामाजिक आर्थिक संरचना भी उस के साथसाथ चलती है. वह संरचना है समाज द्वारा बनाए गए नियमों की, जिस की गिरफ्त में महिलाएं जकड़ी होती हैं. युवती सात फेरे लगवा कर पत्नी तो बन जाती है लेकिन क्या कोई उस से यह जाननेपूछने की कोशिश करता है कि क्या वह उस पुरुष के साथ जीवनभर बंधने को तैयार है?

देह जब नर देह या मादा देह होती है तो संसार के माने बदल जाते हैं. नर और मादा के इस विभेदीकरण के साथसाथ ही सोच के भी सारे समीकरण बदल जाते हैं, मान्यताओं की सीमारेखाएं बदल जाती हैं, नियमों के बंधन बदल जाते हैं. व्यक्तिगत, समाजगत, संसारगत मान्यताओं व अवधारणाओं में यह परिवर्तन तब तो और भी लक्षित होता है जब यह देह नारीदेह के रूप में परिभाषित होती है.

युवती नहीं सराय या धर्मशाला हो

देह का सब से ज्यादा सरलीकरण पौराणिक काल से ले कर अब तक नगरवधुओं, देवदासियों और अब वेश्याओं के रूप में किया जा चुका है, जहां उसे सार्वजनिक उपभोग की वस्तु बना दिया गया है, मानो वह युवती नहीं, सराय या धर्मशाला हो जहां हर कोई अपना पड़ाव डाल सके. उस पर सभी का अधिकार है, पर उस का किसी पर हक नहीं. इस भोग और उपभोग से उत्प्रेरित समाज आज इतना विकृत हो चुका है कि इन युवतियों के अंदर भी कोई युवती होती है जिस की अपनी इच्छाआकांक्षा होती होगी, यह कोई भी सोचना तक नहीं चाहता.

शास्त्रोंपुराणों में स्त्रियों की व्याख्या इस श्रेणी की औरतों की स्थितियां अलग से बहस का विषय हैं. उन औरतों की स्थिति के बारे में देखें जो घर की चारदीवारी में जन्मती हैं, पलती हैं, बढ़ती हैं, एक दहलीज लांघ कर दूसरी दहलीज में प्रवेश करती हैं और अपनी दहलीज समरूप होने तक वहां रहती हैं.

शास्त्रों व पुराणों में महिलाओं की अलगअलग तरह से व्याख्या की गई है. नायिका के रूप में वह मुग्धा, प्रौढ़ा है तो इस से इतर वह देवी, मां, सहचरी, प्राण है. वह बेटी से ले कर मां तक के बीच की यात्रा करती है और इस यात्राक्रम के अपने विभिन्न रूपों बहन, पत्नी आदि के कर्तव्यों का निर्वाह करती चलती है. हमारे शास्त्रों में भी इस धर्मनिर्वाह की चर्चा है, जिस का अभिप्राय है कि महिला को खिलाते समय मां का, स्नेह करते समय बहन का और शयन के समय रंभा का रूप धारण करना चाहिए. यह भी कि पति, पिता, पुत्र आदि के लिए निर्धारित किए गए धर्मों का पालन करने वाली महिलाएं सदा खुशहाल रहती हैं और उन का घरपरिवार धनधान्य से परिपूर्ण रहता है.

महिला से की जाती है वंशवृद्धि की अपेक्षा ध्यान देने योग्य बात यह है कि धनधान्य की यह समृद्धि उन के घरपरिवार के लिए है. यह किसी ने भी नहीं सोचा कि उस परिवार में उस महिला की भी कोई पहचान है जो अपनी कोख व सिंदूर को बनाए रखने की भीख मांगती रहती है, जो व्रतत्योहार के नाम पर यज्ञ की सूखी समिधा सी चिटकती होम होती रहती है. जो महिला घर में खुद जूठा और बासी भोजन कर घर के पुरुषों को ताजा भोजन करवाती है, उस की गिनती कहीं नहीं होती. महिला को वंशवृद्धि के लिए भी याद किया जाता है.

नियमों की गिरफ्त में युवतियां युवती पत्नी बन कर पत्नी के सारे कर्तव्य निभाती है, घर के हर सदस्य खासकर पति की हर इच्छा को सर्वोपरि मान कर चलती है, लेकिन उस से यह पूछना कतई आवश्यक नहीं समझा जाता कि क्या वह अपनी इस स्थिति से संतुष्ट है. दूसरा, अगर समझा भी तो सरसरी तौर पर पूछ लिया, ‘खुश तो हो या सब ठीकठाक है न.’ यह बिलकुल उस औपचारिक रूप के तहत होता है जहां हम पहले से ही मान कर चलते हैं कि सबकुछ ठीकठाक ही होगा.

युवती से तृप्ति की बात खुद पति ही नहीं पूछता

हमारे समाज में संबंधों को विकृत बना कर पेश किया जाता है, जहां युवतियों से बात पूछी ही नहीं जाती. इस कथा में आज तक सिर्फ नायक जिंदा होता है, नायिका तो बस देहभर होती है. देह से ऊपर उठ कर इच्छा के द्वार पर आते ही वह शूर्पणखा हो जाती है.

घर के बुजुर्ग या दूसरे लोगों के लिए यह विषय वर्जनीय है तो हमउम्र के लिए ठिठोली या चुहल का एक गंभीर विषय. युवतियों से तृप्ति की बात स्वयं पति ही नहीं पूछता, अन्यों से तो आशा ही बेकार है.

देहपवित्रता की कसौटी सिर्फ शरीर

आज अगर चुटकुलों का इतिहास उलट कर देखें तो हम पाएंगे कि आधे से ज्यादा चुटकुले पतिपत्नी से ही संबंधित होते हैं, जिन में पति पीडि़त और पत्नीपीड़क दिखाया जाता है, जबकि वस्तुस्थिति एकदम उलटी है. पढ़ीलिखी युवती हो या फिर अनपढ़गंवार, उस की इस स्थिति में कोई फर्क नहीं रहता, बल्कि अनपढ़गंवार युवतियां तो एक माने में इसलिए भी अच्छी होती हैं कि वे रो कर, चिल्ला कर, गालियां बक कर, अपने मन का क्रोध कुछ तो हलका कर लेती हैं जबकि पढ़ीलिखी युवतियां खुद के पढ़ेलिखे होने के चलते खामोश ही रहती हैं.

इतिहास साक्षी है कि मात्र रावण द्वारा हर लेने भर से ही सीता को अग्निपरीक्षा से गुजरना पड़ा और लांछन पा कर वनवास झेलना पड़ा, यानी चरित्र मापन में पवित्रता की कसौटी सिर्फ उस का शरीर ही है वरना कौन नहीं जानता कि रावण के यहां रह कर भी सीता तनमन से अपने पति को समर्पित रही.

उचित नहीं युवकयुवती की मनोवैज्ञानिक व्याख्या

यहां तो विडंबना यह है कि ब्याह होने से ही वह पति से प्रेम करने को बाध्य कर दी जाती है. यह बात वैसे तो पुरुषों पर भी लागू होती है मगर उन के लिए विकल्प छोड़ दिए गए हैं. दरअसल, पवित्रता का संबंध पुरुष देह से है ही नहीं, उसे तो औरतों को ढोना होता है. इसलिए पुरुष अपनी पत्नी को अपनी दासियों, प्रेमप्रसंगों की चर्चा बड़े मजे ले कर सुनाता है, पर पत्नी मजाक में भी ऐसा कुछ कह दे तो भूचाल आ जाता है. वह भूल जाता है कि जिन युवतियों के बारे में पत्नी से चर्चा कर रहा है, वे भी किसी न किसी की पत्नी बनी होंगी और उन के पति भी उन से ऐसी ही अपेक्षा रखते होंगे जैसी वह रख रहा है. पिछली खबर को ही लें. उस का पति यह बरदाश्त न कर पाया कि उस की पत्नी के किसी अन्य से संबंध हो सकते हैं. जाहिर है उस की हत्या लोगों के मन में संतोष और पति के प्रति सहानुभूति प्रकट करेगी. पर क्या उस युवकयुवती की मनोवैज्ञानिक व्याख्या उचित नहीं. संभव है, पति उसे पैर की जूती समझ कर व्यवहार करता हो जिस से उस का दिल आहत होता रहा हो. सामाजिक मान्यताओं के अनुसार ही शब्द और संबंध प्रचलित होते हैं.

भारतीय समाज में कुलटा, बदचलन जैसे शब्द हैं और सती, रखैल जैसे भी. जाहिर है कि ये सब के सब युवतियों के लिए महफूज हैं. इसलिए ये नियम सिर्फ उन्हीं के लिए बने. मर्दों के लिए इन के समानार्थी शब्दों की जैसे दरकार ही नहीं. जरूरत है आज बेवफा जैसे शब्दों की पुनर्व्याख्या करने की ताकि लांछन की सजा मात्र युवती ही नहीं, युवक भी भोगे.

दिखा परिणीती का रेड हौट बिकिनी अवतार

बौलीवुड अदाकारा परिणीति चोपड़ा पहले से काफी हौट हो गई हैं. तभी वो अक्सर अपनी हौट तस्वीरें इंस्टा पर शेयर करती रहती हैं. बताते चलें, जैसे-जैसे परिणीति की हौटनेस का जलवा बढ़ा है वैसे ही उनकी फैन फौलोइंग भी बढ़ी है. इंस्टा पर परिणीति को 15.5 मिलियन लोग फौलो कर रहे हैं.

बता दें कि कुछ समय पहले ही जब परिणीति औस्ट्रेलिया में छुट्टियां बिताने गईं थीं. वहां से उन्होंने कई हौट फोटोज पोस्ट की थी. अब एक बार फिर परिणीति इंस्टाग्राम पर हौटनेस का तड़का लगा रही हैं. परिणीती ने हाल ही में रेड हौट बिकिनी में अपनी तस्वीरें और वीडियो इंस्टाग्राम पर शेयर की हैं. इन तस्वीरों में वे पूल में स्विम करती नजर आ रही हैं.

 

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परिणीति चोपड़ा की ये तस्वीरें फिल्मफेयर मैग्जीन के कवर पेज के लिए हैं. खुद परिणीति ने फिल्मफेयर कवर पेज के साथ अपनी ये तस्वीरें पोस्ट कर बताया कि ये मेरा टैलेंट है कि मैं फोटोशूट के लिए इस तरह फ्लोट कर रही हूं.

इस फोटोशूट के अलावा परिणीति कुछ समय पहले ही अर्जुन कपूर के साथ फिल्म नमस्ते इंग्लैंड की शूटिंग करके वापिस लौटी हैं. परिणीति आजकल अपनी इसी फिल्म के प्रमोशन में भी व्यस्त‍ हैं. इसीलिए अक्सर फिल्म के कुछ सींस की फोटो और गाने की वीडियो अपने सोशल मीडिया पर पोस्ट करती रहती हैं.

वीडियो : भोजपुरी सुपरस्टार खेसारी लाल निकले गर्लफ्रेंड की तलाश पर

भोजपुरी सिनेमा के सुपरस्टार खेसारी लाल यादव का एक नया गाना यूट्यूब पर आते ही छा गया है. इसकी एक खास वजह है खेसारी का लुक, जो इसमें काफी अलग है. दरअसल इस वीडियो में खेसारी गले में सोने की चेन पहने हुए नजर आ रहे हैं. लेकिन सबकुछ होते हुए भी वह काफी उदास लग रहे हैं. इस उदासी की वजह है अकेलापन.

ऐसा इसलिए क्योंकि इस गाने में उन्हें प्रेमिका नहीं मिल रही है. अरे-अरे इसमें कनफ्यूजन की कोई बात नहीं है. दरअसल इस गाने के बोल ही ऐसे हैं. ‘प्रेमिका ना मिलल’ नाम से आया ये गाना इतना पसंद किया जा रहा है कि इसे 12 लाख से ज्यादा लोग देख चुके हैं. इस गाने को जी म्यूजिक भोजपुरी के आफीशियल यूट्यूब चैनल पर शेयर किया गया है.

इस गाने को खेसारी लाल यादव ने गाया है. इसका म्यूजिक आशीष वर्मा ने दिया है. जबकि इसके बोल आजाद सिंह और प्यारे लाल कवि जी ने लिखे हैं. इससे पहले भी उनके गाने काफी पौपुलर हुए हैं. गानों से अलग अगर खेसारी की फिल्मों की बात करें तो वह ‘बलम जी आई लव यू’, ‘अब होई प्रेम युद्ध’ और ‘बबुआ बवाली’ जैसी फिल्मों में नजर आने वाले हैं.

सावधान : लोकतंत्र और व्यापार दोनों खतरे में हैं

घरघर सामान पहुंचाने का पीढ़ियों का काम अब एक नया रूप ले रहा है. एक जमाने में जब औरतों के लिए घर से बाहर निकलने पर पाबंदियां थीं, दुकानदार खुद तरहतरह का सामान ले कर घर भर पहुंचते थे.

अमेरिका में सेल्समैन खास बने संदूक में घर भर के लिए उपयोगी सामान 100 किलोग्राम तक पीठ पर लाद कर मीलों चल कर पहुंचाते थे. फिर दुकानें खुलने लगीं. मौल बने और अब मोबाइल और ई कौमर्स का जमाना आ गया है.

अब शौपिंग सामान देख कर नहीं ब्रैंड का नाम और दामों में छूट देख कर की जा रही है और उत्पादक और ग्राहक के बीच केवल बिचौलिया ई कौमर्स कंपनियां रह गई हैं, जो अपने सौफ्टवेयर के बल पर अरबोंखरबों कमा रही हैं. अब व्यापारियों की कडि़यां कम होने लगी हैं. थोक व्यापारी और खुदरा सामान बेचने वाले दुकानदारों का वजूद अब खतरे में है. खास सामान खास दुकानों में ही मिलेगा की जगह अब ई कौमर्स कंपनियां हर चीज बेचने लगी हैं, सूई से ले कर लहंगे तक और हथौड़े से ले अलमारियों तक.

भारत सरकार देशी और विदेशी ई कौमर्स कंपनियों को ज्यादा प्रोत्साहन दे रही है, क्योंकि उसे लगता है इस से काले धन में कमी आएगी. पर असल में हो यह रहा है कि जो ब्लैक इकौनौमी के हिस्से थे वे ही समाप्त होने लगे हैं. नई सरकार इस तरह कैशलैस व्यापार पर तुली है कि वह नुक्कड़ के स्टोरों से ले कर थोक मंडियों तक को समाप्त करने में लगी है.

इस से हो सकता है कि बड़ी कंपनियों को लाभ मिले और उन के शेयरों के दाम आसमान को छूने लगें पर लाखों घरों का दिवाला निकल जाएगा. कल तक जो छोटामोटा व्यापार कर रहे थे वे बेकार हो जाएंगे और नई नौकरियां पीठ पर सामान लाद कर घरघर पहुंचाने वालों को ही मिलेंगी. अमेरिका में ब्रिक ऐंड मोर्टार स्टोर्स अब बंद होने लगे हैं, क्योंकि वे दामों में ई कौमर्स का मुकाबला नहीं कर पा रहे.

लाखों छोटे मझोले व्यापारी तो समाप्त होंगे ही साथ ही औरतों के शौपिंग के बहाने मिलने वाले घूमने के अवसर भी समाप्त हो जाएंगे. भारत जैसे देश में यह बदलाव सरकार जनता पर जबरन नोटबंदी और जीएसटी के सहारे थोप रही

है. सरकारी नोटबंदी एक तरह से आज भी जारी है क्योंकि जबतब नोटों की कमी हो जाती है. सैकड़ों तरह के भुगतान अब केवल कंप्यूटर की मारफत किए जा सकते हैं और जो कंप्यूटर में महारत नहीं उसे सरकार काले कुएं में धकेल रही है. व्यापारियों को भी रिटर्न अब औनलाइन भरनी होती है जो जटिल है.

अब नई नौकरियां या नए व्यापार केवल कंप्यूटरों के इर्दगिर्द होंगे और इन पर सरकारों और बड़ी कंपनियों का राज होगा. बड़ी कंपनियां अब ईस्ट इंडिया कंपनी की तरह देशों के राजाओं को बदलेंगी.

शेयर बाजार की कंपनियां लोकतंत्र में दखल दे कर व्यापारी डोनाल्ड ट्रंप जैसे को राजपाट दे देंगी. वह लोकतंत्र जिस में हर घर स्वतंत्र हो सकता था, अपने फैसले कर सकता था अब गायब होने की कगार पर है.

अब जब आदमी फिर गुलाम बनने वाले हों तो औरतों को कौन पूछेगा? उन के शरीर पर भी और मन पर भी हमला होगा ही. उड़ते तिनकों को ध्यान से देखिए. उन पर कल की कहानी लिखी है.

फेसबुक खंडे ट्विटर द्वीपे : लड़ाई हट के होनी चाहिए

दिनरात मेरे जैसे जिस भी लिच्चड़ को जहां भी देखो, जब भी देखो, कोई सपने से लड़ रहा है तो कोई अपने से लड़ रहा है. कोई धर्म से लड़ रहा है तो कोई सत्कर्म से लड़ रहा है. कोई प्रेम के  चलते खाप से लड़ रहा है तो कोईकोई जेबखर्च के लिए बाप से लड़ रहा है. फौजी बौर्डर पर लड़ रहा है तो मौजी संसद में लड़ रहा है. कोई ईमानदारी से लड़ रहा है तो कोई अपनी लाचारी से लड़ रहा है. कोई बीमारी से लड़ रहा है तो कोई अपनी ही खुमारी से लड़ रहा है.

आप जैसा हाथ में फटा नोट लिए महंगाई से लड़ रहा है तो मोटा आदमी अपनी बीजी फसल की कटाई से लड़ रहा है. कुंआरा पराई लुगाई से लड़ रहा है तो शादीशुदा उस की वफाई से लड़ रहा है. मतलब हरेक अपने को लड़ कर व्यस्त रखे हुए है. जिस की बाजुओं में दम है वह बाजुओं से लड़ रहा है. जिस की बाजुओं में दम नहीं वह नकली बट्टेतराजुओं से लड़ रहा है.

लड़ना हर जीव का मिशन है. लड़ना हर जीव का विजन है. मेरे जैसे जीव की क्लास का वश चले तो वह मरने के बाद भी लड़ता रहे.

मित्रो, हर दौर में कुछ करना हमारा धर्म रहा हो या न रहा हो, पर लड़ना हम मनुष्यों का धर्म जरूर रहा है. लड़ना हमारा कर्म रहा है. लड़ना हमारे जीवन का मर्म रहा है. लड़ना हमारे जीवन के लक्ष्य का चरम रहा है. लड़ना सब से बड़ा सत्कर्म रहा है. हम लड़तेलड़ते पैदा होते हैं और लड़तेलड़ते मर जाते हैं.

मेरे बाप के दौर की अपनी लड़ाई थी. निहायत शरीफ किस्म की. पर गया अब वह जमाना जब बंदा रोटी से लड़ता था. गया अब वह जमाना जब बंदा लंगोटी से लड़ता था. गया अब वह जमाना जब बंदा धोती से लड़ता था. गया अब वह जमाना जब बंदा खेत से लड़ता था. गया अब वह जमाना जब बंदा पेट से लड़ता था.

कुल मिला कर हम सभी अपनेअपने समय में अपनेअपने साहसदुसाहस के हिसाब से लड़ते रहे हैं. हमारे हाल देख कर उम्मीद की जानी चाहिए कि आगे भी हमजैसे कारणअकारण दिलोजान से लड़ते रहेंगे.

अब उन्हें ही देखिए, वे बूढ़े हो गए. पर उन का लड़ना नहीं गया. मुंह में एक असली दांत तक नहीं, पर दूसरे के जिस्म में दांतों का गड़ना नहीं गया. हम महल्ले में पानी की बाल्टी के लिए लड़े तो वे कुरसी के लिए संसद में, जिस में जितनी ताकत उस ने उतनी बड़ी कुरसी एकदूसरे पर दे मारी. जिस के बाजुओं में कम ताकत, उस ने फाइल ही उन के मुंह पर दे मारी. कुरसी लड़ाई में टूट गई बेचारी, पर उन्होंने लड़ने की हिम्मत न हारी.

बंधुओ, हम सांस लिए बिना रह सकते हैं, पर लड़े बिना नहीं रह सकते. अगर हम एक मिनट को लड़ना बंद कर दें तो दूसरे ही पल हमारा दम घुट जाए. हमारा जिंदा रहने के लिए लड़ना बहुत जरूरी है. तभी तो हर आदमी अपनी हिम्मत के हिसाब से लड़ रहा है.

पर अब समय तेजी से बदल रहा है, भाईसाहब. सो, लड़ने के तरीके भी बदल रहे हैं. कुछ ज्ञानजीवी कहते हैं कि हम महामानव होने के युग में प्रवेश कर गए हैं. हम सभ्य हैं, ऐडवांस हैं, साहब. सो, अब हम लड़ते नहीं, भिड़ते हैं. लड़ने के परंपरागत तरीके, माफ कीजिएगा, अब तथाकथित सभ्यों ने छोड़ दिए हैं.

आप आज भी जो परंपरागत ढंग से लड़ रहे हो तो अपने को पिछड़ा मान लीजिए, प्लीज. मन को लड़ते हुए भी शांति मिलेगी. इस से पहले कि कोई आप को आप के मुंह पर ही पिछड़ा, गंवार, जाहिल और जो भी मन में आए बक कर मदमाता चला जाए, आप अपने लड़ने के तौरतरीके को जरा मौडर्न बना लें. खुद जाहिल ही रहें तो कोई बात नहीं. आज की तारीख में बंदा इंसानियत से कम, लड़नेभिड़ने के तरीकों से अधिक जानापहचाना जाता है.

आज के तथाकथित सभ्य अपने हाथपांव की उंगलियों के नाखून हाथपांव की उंगलियों में दिखाते नहीं, उन्हें दिमाग में सजाते हैं. आज के स्वयंभू सभ्य बड़ी सफाई से लड़ते हैं, बड़ी गहराई से लड़ते हैं, बड़ी चतुराई से लड़ते हैं. किसी को दिखता नहीं. पर मत पूछो वे लड़तेलड़ते कैसेकैसे आपस में भिड़ते हैं. अपनों की रहनुमाई में अपनों से ही मौका हाथ लगते ही पूरी ईमानदारी से सारे रिश्तेनाते भुला मन की गहराइयों से भिड़ते हैं. पर आमनेसामने हो कर नहीं, छिप कर. छिप कर लड़ना संभ्रांतों की प्रिय कला हो गई है. कमबख्त तकनीक ने कुछ और सिखाया हो या न हो, पर छिपछिप कर एकदूसरे से लड़ना कम, भिड़ना बड़े सलीके से जरूर सिखाया है.

आज के लड़ने में सिद्धहस्त, धुरंधर लड़ाके फेसबुक पर लड़ते हैं, बच्चों की तरह ट्विटर पर भिड़ते हैं. फेसबुक के घोड़े, ट्विटर के रथ पर चढ़ कर एकदूसरे पर अचूक वार करते हैं. पर जब एकदूसरे के आमनेसामने होते हैं तो ऐसे गले मिलते हैं कि न ही पूछो तो भला.

वे लड़ने के लिए बाजुओं, टांगों का नहीं, तकनीक का दुरुपयोग करते हैं. इधर से वे ट्विटर पर शब्दभेदी बाण चलाते हैं तो उधर से वे ट्विटर के माध्यम से ही उन के बाण को धूल चटाते हैं. इधर से वह शब्द उन के मुंह पर मारता है तो उधर से वह चार शब्दों का तमाचा ट्विटर पर रसीद कर देता है. तमाचा पढ़ने वाला तिलमिला उठता है तो तमाचा लिखने वाला खिलखिला उठता है. आज के लड़ाके ट्विटर पर एकदूसरे से भिड़े होते हैं, हालांकि ऐसे तो मेरे गांव के मेले में आपस में झोटे भी नहीं भिड़ते थे.

देखते ही देखते ट्विटर पर, फेसबुक पर बेमसला तीसरा विश्वयुद्ध शुरू हो जाता है. एक अपने को जीत का श्रेय ले अपने को ट्विटर का सब से बड़ा नायक बता खुद ही अपनी पीठ थपथपाता है तो दूसरा उस को कायर बता कर अपने दिमाग को खुद ही बहलाताफुसलाता है.

इसलिए ज्ञान के युग में शान से जीना है तो हे दोस्त, तू भी लड़नेभिड़ने के नए तरीके अपना मौडर्न हो जा. अपनों से फेसबुक, ट्विटर पर लड़तेभिड़ते परमपद पा. चल उठ, देश के लिए नहीं, फेसबुक, ट्विटर के लिए शहीद हो जा. आने वाली पीढि़यां तेरे गुणगान गाएंगी. तुझ में अपने समय का अवतार पाएंगी.

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