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Hindi Story: मेहनत का फल

Hindi Story: घर आते ही सलीम सिर पकड़ कर पलंग पर बैठ गया. उस के चेहरे की हालत देख कर सईदा का माथा ठनका. उस की हालत बता रही थी कि कोई ऐसी बात जरूर हुई है, जिस ने उसे परेशान कर दिया है.

‘‘क्या बात है, बहुत परेशान दिखाई दे रहे हो?’’ सईदा सलीम की बगल में जा बैठी और धीरे से बोली.

बीवी की आवाज सुन कर सलीम चौंका. उस ने उसे देखा और बोला, ‘‘ऐसा लगता है, परेशानियां हमारा पीछा नहीं छोड़ेंगी.’’

‘‘क्या मतलब? बात क्या है? आप बताते क्यों नहीं?’’ यह सुन कर सईदा भी परेशान हो गई.

‘‘और क्या हो सकता है… काम से निकाल दिया गया हूं,’’ सलीम ने कहा, तो निकाले जाने की वजह पूछने की सईदा की हिम्मत ही नहीं हुई.

साल में यह तीसरा मौका था, जब सलीम काम से निकाला गया था. दरअसल, सईदा को लगता था कि अगर सलीम ऐसे ही नौकरी में रहा तो उम्रभर उस के साथ यही होता रहेगा.

सलीम शादी से पहले ही छोटीबड़ी दुकानों में काम करता था. वह अपने काम में होशियार था. मालिक भी उस के काम से बहुत खुश रहता था, पर इस के बावजूद किसी भी छोटीमोटी भूल पर कभीकभी बिना वजह ही उसे काम से निकाल दिया जाता था. इस में सलीम का कोई कुसूर नहीं होता था, कुसूर होता था मालिक की नीयत का.

मालिकों को यह डर रहता था कि एक खास मुद्दत तक काम करने के बाद सलीम पक्का मुलाजिम बन जाएगा और फिर उसे पक्की नौकरी की सारी सहूलियतें देनी पड़ेंगी, इसलिए इस मुसीबत को गले बांधने से पहले ही उसे काम से निकाल दिया जाता था.

मालिकों के दिल में यह डर सलीम की लियाकत और पढ़ाई को देख कर पैदा होता था. उन्हें लगता था कि कम पढ़ेलिखे आदमी को अगर वे 10 साल तक अपने यहां नौकर रखें और सारी सहूलियतें न भी दें, तब भी वह उन का कुछ नहीं बिगाड़ पाएगा. पर सलीम के मामले में ऐसा मुमकिन नहीं था, यह सोच कर वे उसे पक्का होने से पहले ही निकाल देते थे.

‘‘ठीक है…’’ सईदा ने प्यार से सलीम के बालों में हाथ फेरते हुए कहा, ‘‘अब चिंता छोडि़ए… जो होना है, वही होगा. हर बार जो हुआ, इस बार भी वही होगा, इसलिए चिंता करने की क्या जरूरत है. चलिए, खाना खा लीजिए.’’

बीवी सईदा की बात सुन कर सलीम उठा और हाथ धोने के लिए चला गया.

हर बार कोई अलग बात नहीं होती थी. हफ्ता 10 दिन या कभीकभी एकाध महीना सलीम को बेकार रहना पड़ता था, फिर नया काम ढूंढ़ना पड़ता था. काम मिल ही जाता था.

इस बात को एक हफ्ता हो गया था. रोज सवेरे नौकरी की तलाश में सलीम बाहर जाता और शाम को थकहार कर वापस आ जाता.

‘‘एक बात कहूं,’’ एक दिन सईदा सलीम से बोली.

‘‘हां, बोलो.’’

‘‘ऐसा कब तक चलता रहेगा? जोकुछ आप के साथ होता है, लगता है कि उम्रभर होता रहेगा. आखिर इस नौकरीनुमा गुलामी से क्या फायदा, जिस में हर पल नौकरी जाने का डर बना रहता है. आप ऐसा कोई काम क्यों नहीं करते, जो गुलामी की जंजीरों को हमेशा के लिए तोड़ दे और हमारे मन से ऐसा डर भी निकाल दे?’’

‘‘ऐसा क्या काम हो सकता है?’’

‘‘आप अपना ही कोई छोटामोटा कारोबार शुरू कर दो.’’

‘‘कारोबार शुरू करने के लिए हमारे पास पैसे कहां हैं?’’ सलीम सईदा की आंखों में झांकने लगा.

‘‘पैसे तो नहीं हैं, पर 15-20 हजार रुपए में भी तो काम शुरू किया जा सकता है.’’

‘‘ऐसा कौन सा धंधा हो सकता है?’’

‘‘आप कपड़ों की दुकानों पर काम कर चुके हैं. आप को तो यह अच्छी तरह मालूम है.’’

‘‘हां,’’ सलीम ने कुछ सोचते हुए सईदा से कहा.

‘‘अगर आप कटपीस कपड़े ला कर बेचें, तो उस में हमें इतने पैसे मिल जाया करेंगे कि हमारी गुजरबसर हो जाए…’’

‘‘खयाल बुरा नहीं है. पर कपड़े बेचेंगे कहां? कोई दुकान तो नहीं है…’’

‘‘धंधा फुटपाथ से भी शुरू किया जा सकता है.’’

सईदा की बात सुन कर सलीम सोच में डूब गया.

दूसरे दिन सलीम एक ऐसी दुकान पर पहुंचा, जहां कमीजों के कटपीस मिलते थे. 10,000 रुपयों में अच्छाखासा कपड़ा आ गया. उसे 60 रुपया प्रति टुकड़ा पड़ा था. शाम को एक भीड़ भरे रास्ते के किनारे वह दुकान लगा कर बैठ गया.

‘‘100 रुपए में कमीज का कपड़ा है भाई, 100 रुपए में,’’ सलीम आवाज लगाता रहा.

सलीम की आवाज सुन कर आनेजाने वाले रुकते और कपड़े देखते. पसंद नहीं आता तो आगे बढ़ जाते. पसंद आता तो मोलभाव करने लगते. पर वह अपनी कीमत पर अड़ा रहता, तो ग्राहक पैसा दे कर कपड़ा ले लेते.

रात को जब सलीम कपड़ों की गठरी उठा कर आया, तो सईदा उसे देख कर हैरान रह गई, ‘‘यह सब क्या है?’’

‘‘तुम ने जो रास्ता बताया था, उसी पर चल रहा हूं. अपना छोटा सा धंधा शुरू कर दिया है… और यह आज की कमाई,’’ कहते हुए उस ने 500 रुपए सईदा के हाथ में रख दिए.

‘‘500 रुपए,’’ सईदा हैरानी से बोली.

‘‘जी हां…’’ सलीम हंस कर बोला, ‘‘शुरुआत तो अच्छी है, आगे देखो…’’

दूसरे दिन जब सलीम उसी जगह पर दुकान लगाने लगा, तो एक आदमी ने रोक दिया, ‘‘तू इधर दुकान नहीं लगा सकता.’’

‘‘क्यों?’’ सलीम ने पूछा.

‘‘इधर मेरी दुकान लगती है.’’

‘‘तुम्हारी दुकान यहां नहीं, सामने लगती है.’’

‘‘मतलब वही है. एक जगह 2 दुकानें नहीं लग सकतीं.’’

‘‘एक जगह 10 दुकानें भी लग सकती हैं… ग्राहक माल उसी दुकान से खरीदेगा, जहां उसे पसंद आएगा या सस्ता मिलेगा.’’

‘‘तू जाता है यहां से या मजा चखाऊं,’’ वह आदमी हाथापाई पर उतर आया. सलीम को भी गुस्सा आ गया. मारपीट में दोनों को चोंटें लगीं. राह चलते लोगों ने बीचबचाव किया. सामने वाला कमजोर पड़ रहा था, इसलिए यह कहता हुआ चला गया, ‘‘मैं तुझे देख लूंगा.’’

उस दिन भी सलीम ने 400 रुपए कमाए. पर उसे यह अच्छा नहीं लगा कि उसे इस काम के लिए किसी से झगड़ा करना पड़ा.

दूसरे दिन जब सलीम दुकान लगाने लगा, तो एक दादा किस्म के आदमी ने उसे रोक दिया, ‘‘तू यहां दुकान नहीं लगाएगा.’’

‘‘क्यों, आप को क्या परेशानी है?’’

‘‘बोल दिया न… यहां दुकान नहीं लगाएगा का मतलब है… नहीं लगाएगा. यह मंगल दादा का हुक्म है. यहां पहले से अपना एक आदमी दुकान लगाता है. तू बहुत दादा बनता है क्या? हमारे आदमी को धमकी देता है… इस शहर में रहना है या नहीं?’’

‘‘लेकिन मंगल दादा, मेरी दुकान लगाने से उस के धंधे पर कोई…’’

‘‘फिर होशियारी बताई,’’ कहते हुए मंगल ने उसे एक घूंसा लगाया, तो उसे भी गुस्सा आ गया. उस ने भी मंगल दादा को घूंसा लगा दिया. मार खा कर मंगल दादा को गुस्सा आ गया. वह उस पर टूट पड़ा.

सलीम ने भी बराबरी का जवाब दिया. मंगल दादा कमजोर पड़ जाता, लेकिन उस के 4-5 साथी आ गए और वे सब उस से उलझ गए.

सलीम को बुरी तरह चोटें आईं.

‘‘जा, आज तुझे माफ कर दिया… अब जिंदगी में मंगल के मुंह नहीं लगना,’’ कहता हुआ वह चला गया.
सलीम कराहता हुआ घर आया. उस की हालत देख कर सईदा रोने लगी, ‘‘इस सब की जिम्मेदार मैं ही हूं. मैं ने ही आप को यह धंधा शुरू करने की सलाह दी थी.’’

2 दिन तक सलीम घर से बाहर नहीं निकल सका. दोस्त, रिश्तेदार मिलने आते तो सलीम को सारी कहानी सुनानी पड़ती.

‘‘क्या मंगल दादा और उस के साथियों ने आप को मारा?’’ सलीम के साले फारुख ने सुना, तो गुस्से से बोला,’’ मैं उसे देखता हूं… जो हुआ, भूल जाइए. आप फिर दुकान लगाइए. कोई भी आप को नहीं रोकेगा.’’

तीसरे दिन सलीम फिर वहां पहुंच गया और दुकान लगा दी.

थोड़ी देर बाद मंगल दादा आया और बोला, ‘‘अरे सलीम भाई, आप ने पहले क्यों नहीं बताया कि आप फारुख के जीजा हैं, वरना बात यहां तक पहुंचती ही नहीं. मैं ने जोकुछ किया, उस की माफी चाहता हूं.

‘‘फारुख मेरा बचपन का दोस्त है. मेरी वजह से फारुख के जीजा को दुख हुआ, मेरे लिए यह बड़े शर्म की बात है. आज के बाद कोई भी आप की ओर आंख उठा कर नहीं देखेगा. मैं ने उस आदमी को भी भगा दिया है, जो पहले वहां दुकान लगाता था.’’

‘‘नहीं दादा, उसे मत भगाइए… उसे भी धंधा करने दीजिए.’’ सलीम बोला.

अब सलीम का धंधा खूब चलने लगा. उसे अच्छी आमदनी होने लगी. जितनी तनख्वाह उसे नौकरी से मिलती थी, उतनी तो वह कभीकभी 7-8 दिन में ही कमा लेता था.

एक दिन नगरपालिका की गाड़ी आई और सलीम का सामान उठा कर ले गई.

फुटपाथ पर दुकान लगाने का जुर्माना भी अदा करना पड़ा और उस का आधा माल ही वापस मिल सका.

उस के बाद तो हफ्ते में एकाध बार नगरपालिका की गाड़ी जरूर आती और सड़क के किनारे लगी दुकानों को उठा ले जाती. गाड़ी के आते ही जो दुकानदार अपनी दुकानें ले कर भाग जाते, वे बच जाते, वरना सारा माल नगरपालिका वाले उठा ले जाते.

कभी सलीम गाड़ी के आते ही अपनी दुकान का माल उठा कर भाग जाता और कभी उस का माल पकड़ा जाता, जिस से उसे काफी नुकसान उठाना पड़ता.

इस नई मुसीबत से वह काफी परेशान हो गया था. डर यहां भी बना हुआ था. पूरी हिफाजत तो उसे दुकान ही दे सकती थी और दुकान किराए पर लेने और पगड़ी वगैरह देने के लिए उस के पास 40-50 हजार रुपए नहीं थे.

सलीम जहां दुकान लगाता था, उस के पास ही एक पान की दुकान थी, जो अशोक नामक एक आदमी की थी. आसपास और भी पान की दुकानें थीं, इसलिए उस का धंधा नहीं होता था.

अशोक अकसर ही सलीम से कहता था, ‘‘बस, अब बहुत हो गया सलीम भाई, मैं यह दुकान किसी और को किराए पर दे देता हूं और कोई धंधा शुरू करता हूं… यह तो चलती ही नहीं.’’

अशोक की बात सुन कर एक बात सलीम के दिमाग में आई. अगर वह इस दुकान को किराए कर ले ले, तो छोटी सी ही सही, वह यहां भी कपड़े की दुकान डाल सकता है. इस तरह नगरपालिका वालों की ओर से जो डर बना रहता है, उस से भी छुटकारा मिल जाएगा.

सलीम ने अशोक से बात की, तो वह 20,000 रुपए पगड़ी और 1,000 रुपए महीना किराए पर दुकान देने को तैयार हो गया.

सलीम के पास इतने पैसे तो नहीं थे, पर जब यह बात सईदा को मालूम हुई, तो उस ने अपने जेवर उसे दे दिए, ‘‘आप इन्हें बैंक में रख कर कर्ज उठा लीजिए और किसी भी तरह उस दुकान को किराए पर ले लीजिए.’’

आखिर सलीम ने वह दुकान किराए पर ले ही ली. थोड़ी सी रद्दोबदल के बाद उस ने कपड़े की अपनी छोटी सी दुकान शुरू कर दी.

दुकान के बाहर सलीम कटपीस रखता था और अंदर थान. वह वाजिब दाम लेता था. जब लोगों को मालूम हुआ कि उस के पास दूसरी दुकानों से काफी सस्ते कपड़े मिलते हैं, तो लोग उसी से कपड़े खरीदने लगे. इस तरह उस का धंधा खूब चल निकला. दुकान पर हमेशा भीड़ सी लगी रहती.

शहर में कपड़े सस्ते दामों पर कहां मिलते हैं, सलीम को यह बखूबी पता था. पर साथ ही साथ वह सीधे मिलों से भी कपड़ा मंगवाने लगा.

थोक दुकानदारों से भी सलीम की अच्छीखासी जानपहचान हो गई थी, इसलिए कभीकभी वे उसे उधारी पर भी माल दे देते थे. धंधा अच्छा होता था, इसलिए उसे पैसों की कमी भी महसूस नहीं होती थी. जितने का धंधा होता था, वह उतने ही पैसों का और माल ले आता था.

सलीम का धंधा बढ़ता जा रहा था. मिलने वाला मुनाफा भी धंधे में लग रहा था, इसलिए पैसा भी बढ़ता जा रहा था. अब उसे इस बात का अहसास हो रहा था कि अब उसे बड़ी दुकान ले लेनी चाहिए. उस का नाम भी हो गया था और लोग उस पर इतना यकीन भी करने लगे थे.

सलीम की दुकान के पास ही एक दुकान खाली हुई थी, पर मालिक 50,000 रुपए पगड़ी के मांग रहा था. सलीम के पास इतने पैसे नहीं थे. पर उतने पैसों से ज्यादा का माल उस के पास था. वह सोचने लगा कि अगर वह माल बेच कर उन पैसों से पगड़ी दे दे, तो दुकान में माल नहीं रहेगा, वह खालीखाली दिखाई देगी.

आखिर में सलीम ने यही फैसला किया कि माल तो बाद में भी भरा जा सकता है. पर इस वक्त जो दुकान मिल रही है, वह बाद में नहीं मिल सकती. उस ने नया माल खरीदना बंद कर दिया और पैसे जमा करने शुरू कर दिए. जब 50,000 रुपए जमा हो गए, तो उस ने दुकान किराए पर ले ली.

दुकान को सजाने में भी 10,000 रुपए लग गए, पर उस का धंधा पहले की तरह चल रहा था, इसलिए उसे पैसों की कमी महसूस नहीं हो रही थी.

नई दुकान इतनी बड़ी थी कि कई लाख रुपए का माल भरने के बाद वह खालीखाली दिखाई दे, जबकि सलीम चाहता था कि जब वह यह दुकान शुरू करे तो वह भरी हुई हो, इसलिए वह दुकान शुरू करने में हिचकिचा रहा था. पर ऐसे मौके पर थोक दुकानदारों ने उस का साथ दिया, उस की खूब मदद की.
अब सलीम अकेले नहीं संभाल सकता था, इसलिए उस ने 2 नौकर भी रख लिए.

आखिर वह दिन भी आ ही गया, जिस दिन सलीम की दुकान का उद्घाटन था. उस के पुराने ग्राहकों ने भी साथ दिया. उन्हें सलीम पर यकीन था कि वह सस्ता और अच्छा कपड़ा ही बेचेगा, इसलिए उसी की दुकान से कपड़ा खरीदने लगे.

सलीम ने भी उन के यकीन को कायम रखा था. उस की दुकान उसी तरह से चलने लगी, जैसे शहर की दूसरी बड़ीबड़ी दुकानें चलती थीं.

काउंटर पर बैठा सलीम कभी ग्राहकों को देखता तो कभी अपने नौकरों को, जो ग्राहकों को कपड़े दिखा रहे होते थे. तब उसे बीते दिन याद आते थे, जब वह भी उन्हीं की तरह एक नौकर था और हर 3-4 महीनों के बाद काम से निकाल दिया जाता था.

पर सईदा ने सलीम को एक राह दिखाई. उस ने भी उस राह पर चलने की ठानी और उस के लिए मेहनत करनी शुरू कर दी. उस की मेहनत का ही यह फल था कि वह मालिक के रूप में उस दुकान में बैठा था.

लेखक – एम. मुबीन

Hindi Story: पहली तारीख – रेखा अपने पति के सरप्राइज से क्यों हैरान हो गई?

Hindi Story: डोरबैल बजी तो रेखा ने दरवाजा खोला. न्यूजपेपर वाला हाथ में पेपर लिए किसी से फोन पर बात कर रहा था. रेखा ने उस के हाथ से अखबार ले दरवाजा बंद किया ही था कि फिर से डोरबैल बजी. जैसे ही रेखा ने दरवाजा खोला तो अखबार वाला बोला, ‘‘मैडम, यह हिंदी का अखबार. आप के घर हिंदी और अंगरेजी 2 पेपर आते हैं.’’

‘‘अरे, फिर तभी क्यों नहीं दे दिया?’’

‘‘जब तक देता, आप ने दरवाजा ही बंद कर दिया,’’ अखबार वाला बोला.

‘‘अच्छा, ठीक है,’’ कह रेखा ने अखबार ले कर दरवाजा बंद कर दिया. तभी विपुल यानी रेखा के पति का शोर सुनाई दिया.

‘‘अरे भई कहां हो?’’ रेखा के पति विपुल की आवाज आई.

तभी डोरबैल भी बजती है. रेखा परेशान सी दरवाजा खोलने चल दी. दरवाजा खोला तो सामने वही अखबार वाला खड़ा था. अब रेखा ने गुस्से से पूछा, ‘‘अब क्या है?’’

‘‘मैडम, वह अखबार का बिल,’’ अखबार वाला बोला.

‘‘पहले नहीं दे सकते थे?’’ गुस्से से कह रेखा ने दरवाजा बंद कर दिया.

उधर विपुल आवाज पर आवाज लगाए जा रहा था, ‘‘रेखा, तौलिया तो दे दो, मैं नहा चुका हूं. कब से आवाजें लगा रहा हूं.’’

रेखा ने तौलिया पकड़ाया ही था कि फिर से डोरबैल बजी. दरवाजा खोलते ही रेखा गुस्से में चीखी, ‘‘क्यों बारबार बैल बजा रहे हो?’’

‘‘मैडम, यह गृहशोभा.’’

‘‘नहीं चाहिए,’’ कह रेखा दरवाजा बंद करने लगी.

तभी अखबार वाला बोला, ‘‘अरे, आप ने ही तो कल मैगजीन लाने को बोला था.’’

‘‘क्या ये सब काम एक बार में नहीं कर सकते?’’ कह रेखा ने जोर से दरवाजा बंद कर दिया.

‘‘इतनी देर लगती है क्या तौलिया देने में?’’ विपुल बोला.

‘‘मैं क्या करती, घंटी पर घंटी बजाए जा रहा था, तुम्हारा पेपर वाला.’’

‘‘लगता है तुम्हें पसंद करता है,’’ विपुल हंसते हुए बोला.

‘‘विपुल, मैं मजाक के मूड में नहीं हूं.’’

तभी फिर डोरबैल बजती है. रेखा गुस्से से दरवाजा खोल कर बोली, ‘‘अब क्या है?’’

सामने दूध वाला था. बोला, ‘‘मैडम दूध.’’

रेखा ने थोड़ा शांत हो दूध ले लिया.

‘‘अरे भई नाश्ता लगाओ. देर हो रही है. औफिस जाना है,’’ विपुल की आवाज आई.

रेखा आंखें तरेरते हुए विपुल को देख किचन में चली गई. विपुल किसी से फोन पर बात कर रहा था.

फिर डोरबैल बजी. रेखा ने झल्लाते हुए दरवाजा खोला.

‘‘मैडम, दूध का बिल,’’ दूध वाला बोला.

‘‘क्या परेशानी है तुम सब को? क्या यह बिल दूध के साथ नहीं दे सकते थे?’’ गुस्से में बोल रेखा ने बिल ले लिया.

‘‘क्या खिला रही हो नाश्ते में?’’ विपुल बोला.

रेखा बोली, ‘‘अपना सिर… घंटी पर घंटी बज रही… ऐसे में क्या बन सकता है? ब्रैडबटर से काम चला लो.’’

‘‘अरे, तुम्हारे हाथों से तो हम जहर भी खा लेंगे,’’ विपुल ने कहा.

‘‘देखो, मैं इतनी भी बुरी नहीं हूं,’’ रेखा बोली.

तभी फिर से डोरबैल बज उठी. रेखा गुस्से से बोली, ‘‘विपुल, दरवाजा खोलो… फिर मत कहना मुझे औफिस को देर हो रही है.’’

विपुल ने फोन पर बात करते हुए ही दरवाजा खोला. दूध वाला ही खड़ा था.

दूध वाला बोला, ‘‘साहब, हम कल दूध देने नहीं आएंगे.’’

‘‘जब दूध दिया था तब नहीं बता सकते थे?’’ विपुल ने डांटा.

‘‘सर, भूल गया था.’’

विपुल औफिस चला गया. औफिस पहुंच कर उस ने रेखा को फोन किया. तभी फिर घंटी बज उठी. रेखा जब दरवाजा खोलने पर पेपर वाले को देखती है, तो उस का गुस्सा 7वें आसमान को छू जाता है. विपुल फोन लाइन पर ही था. अत: बोला, ‘‘अरे, रेखा अब कौन है?’’

‘‘वही तुम्हारा पेपर वाला.’’

‘‘यह क्या बना रखा है… क्या सारा दिन दरवाजे पर ही बैठे रहें एक चौकीदार की तरह?’’

‘‘अब क्या लेने आए हो?’’ रेखा तमतमाते हुए बोली.

‘‘सुबह के 50 दे दो… फिर से नहीं आऊंगा,’’ पेपर वाला बोला.

‘‘कोई 50 नहीं मिलेंगे. चले जाओ यहां से,’’ रेखा ने कहा.

इस बीच फोन कट गया था. वह नहाने जा ही रही थी कि फिर से डोरबैल की आवाज पर भिन्ना गई. दरवाजा खोला तो सामने केबल वाला खड़ा था.

‘‘मैडम, केबल का बिल,’’ वह बोला.

‘‘कुछ और देना है तो वह भी दे दो.’’

‘‘मैडम, समझा नहीं,’’ वह बोला.

‘‘कुछ नहीं,’’ रेखा ने जोर से दरवाजा बंद कर दिया और फिर नहाने चली गई.

तभी उसे कुछ शोर सुनाई देता है. ध्यान से सुनने पर, ‘मैडमजी, मैडमजी,’ एक लड़की की आवाज सुनाई दी.

नहा कर दरवाजा खोला तो सामने नौकरानी की लड़की खड़ी थी.

रेखा ने पूछा, ‘‘क्या चाहिए?’’

‘‘मैडमजी, मम्मी आज काम पर नहीं आएंगी. शाम को जिस औफिस में सफाई करती हैं, वहां पगार लेने गई हैं… वहां लंबी लाइन लगी है.’’

रेखा गुस्से में बोली, ‘‘अच्छाअच्छा, ठीक है.’’

‘इसे भी आज ही…’ रेखा मन ही मन बड़बड़ाई और फिर सोचने लगी कि आज खाने में बनेगा क्या… इतनी देर हो गई है… घड़ी की तरफ देखा 1 बज चुका था. अभी सोच ही रही थी कि फिर घंटी बजी. वह चुपचाप यह सोच बैठी रही कि अब दरवाजा नहीं खोलेगी. 2… 3… 4… बार घंटी बजी पर वह नहीं उठी.

तभी फोन बजा. विपुल बोला, ‘‘अरे भई, क्या हम यहीं खड़े रहेंगे… दरवाजा तो खोलो.’’

रेखा मन ही मन सोचती कि इतनी जल्दी कैसे आ गए? क्या बात है? फिर जल्दी से दरवाजा खोला.

‘‘क्या मैं अंदर आ सकता हूं?’’ विपुल बोला.

‘‘अरे, आप इतनी जल्दी कैसे आ गए?’’

‘‘कैसे आ गए. तुम सुबह से परेशान थीं. सोचा, चलो आज लंच बाहर ही करते हैं.’’

रेखा सवाल भरी निगाहों से विपुल की तरफ देखने लगी तो वह बोला, ‘‘अरे बावली, आज पहली तारीख है.’’

Short Story: रहने दो रिपोर्टर

अतीत के काले पन्नों को भूल कर विमल और गंगा ने नई गृहस्थी की शुरुआत की. दोनों अपने जीवन से संतुष्ट थे लेकिन रिपोर्टर द्वारा दुनिया वालों के सामने उसी अतीत की जो धूल फिर उड़ी उस ने सबकुछ मटियामेट कर दिया.

वह आज पूरी तरह छुट्टी मनाने के मूड में था. सुबह देर से उठा, फिर धीरेधीरे चाय पीते हुए अखबार पढ़ता रहा था. अखबार पूरी तरह से चाटने के बाद उस का ध्यान घर में छाए सन्नाटे की तरफ गया. आज न पानी गिरने की आवाज, न बरतनों की खटरपटर, न झाड़ूपोंछे की सरसराहट, जबकि घर में कुल 2 छोटेछोटे कमरे हैं. वह एकाएक ही किसी आशंका से पीडि़त हो उठा. गंगा इतनी शांति से क्या कर रही है, वह उसे चौंकाने के विचार से ही नहीं उठा था.

बरामदे में पैर रखते ही वह सहम सा गया. गंगा वाशबेसिन के पास चुपचाप बैठी हुई थी और सामने रखी बोतल को ध्यान से देख रही थी.

‘‘गंगा, वह तेजाब की बोतल है,’’  उस ने आशंकित स्वर में कहा, ‘‘मैं बाथरूम साफ करने के लिए लाया था. काई जमी हुई है न, रोज तुम रगड़ती रहती हो. देखना, इसे जरा सा डाल कर रगड़ने से एकदम साफ हो जाएगा…किंतु तुम उसे नहीं छूना.’’

‘‘अच्छा,’’ उस ने कहा लेकिन अभी भी जैसे वह सोच में डूबी हुई थी.

‘‘क्या सोच रही हो, गंगा?’’ उस ने कंधा पकड़ कर उसे झकझोर दिया.

‘‘सोच रही हूं कि इस के लगाने से चेहरा बदल जाएगा, तब कोई

मुझे पहचान नहीं पाएगा, पहचान भी

ले तो…लेकिन तुम्हारी भावनाएं क्या होंगी?’’

‘‘मेरी भावनाओं का आदर करती हो तो अब से कभी यह विचार मन में न लाना.’’

‘‘पता नहीं क्यों, भय लगता है.’’

‘‘तुम भयभीत क्यों होती हो? मैं ने सबकुछ जानने के बाद ही तुम से विवाह किया है, हमारा विवाह कानूनसम्मत है, कोई हमें अलग नहीं कर सकता, समझीं.’’

तभी दरवाजे पर आहट हुई. विमल ने द्वार खोला. पड़ोसी जोशीजी की छोटी बेटी लतिका थी. बाहर से ही बोली, ‘‘काकी, आज हमारे घर में हलदी- कुमकुम होना है. मां ने  तुम को बुलाया है.  दिन में 2 से 5 बजे तक जरूर आ जाना. अच्छा, मैं जाती हूं. मुझे बहुत घरों में बोलने जाना है.’’

गंगा ने प्रश्न भरी आंखों से पति की ओर देखा, जैसे पूछ रही हो कि आज जोशीजी के घर क्या है?

‘‘सुहागिन महिलाओं को घर बुलाते हैं. टीका करने के बाद नाश्तापानी, गानाबजाना होता है. मेरे घर तो आज पहली बार इस तरह का बुलावा आया है और पहले आता भी कैसे, सुहागिन तो अभी आई है.’’

गंगा मुसकराई फिर गंभीर हो उठी. विमल ने बनावटी गुस्सा दिखाते हुए कहा, ‘‘सोचा था दिनभर साथसाथ घूमते रहेंगे… जोशीजी को भी आज का ही दिन मिला.’’

‘‘मैं अपनी हाजिरी लगा कर शीघ्र ही आ जाऊंगी.’’

‘‘नहींनहीं, जब सब उठें तभी तुम भी उठना. पहली बार बुलाया है उन्होंने, मेरी चिंता न करो, तुम्हारे वापस आने तक मैं सोता रहूंगा.’’

‘‘कैसा रहा आज,’’ जोशी के घर से वापस आने पर विमल ने गंगा से पूछा.

‘‘बहुत अच्छा. बड़े अच्छे लोग हैं, मैं तो अभी किसी से मिली ही नहीं थी. आसपास की सभी महिलाएं आई थीं और सभी ने मुझ से खूब प्यार से बातें कीं..’’

‘‘अच्छा, सब की बोली समझ में आई?’’

‘‘हां, थोड़ीबहुत तो समझ में आ ही जाती है. वैसे मुझ से तो हिंदी में ही बोल रही थीं.’’

मेलमुलाकात का सिलसिला चल निकला तो बढ़ता ही रहा. विमल खुश था कि गंगा का मन बहल गया है.

अब वह पहले जैसी सहमीसहमी नहीं रहती बल्कि अब तो वह अपनी नईनई गृहस्थी की सुखद कल्पनाओं में खोई रहती है.

एक दिन बेहद खुश हो कर गंगा ने  विमल से कहा, ‘‘सुनो, मैं भी सब को हलदीकुमकुम का बुलावा दे रही हूं. जोशी काकी ने कहा है कि वह सब तैयारी करवा देंगी. मैं ने सामान की सूची बना ली है.’’

‘‘ठीक है, हम कल शाम को बाजार चल कर सब सामान ले आएंगे.’’

बाजार में जाते हुए विमल फूलों की वेणी वाले को देख कर रुक गया. गंगा वेणी लगाने में सकुचाती थी. विमल ने हंस कर कहा, ‘‘अब तुम अपनी सहेलियों की तरह वेणी लगाया करो. हलदीकुमकुम करोगी, वेणी नहीं लगाओगी?’’

तभी विमल को  किसी ने टोकते हुए कहा, ‘‘नमस्ते, साहब. ऐसा लगता है, आप को कहीं देखा है…’’

‘‘मुझे…जी, मैं ने आप को पहचाना नहीं.’’

‘‘आप वही विमल साहब हैं न जिन्होंने अपना नाम समाचारपत्र में देने से मना किया था.’’

‘‘जी, जी…मैं आप को नहीं पहचानता,’’ और गंगा का हाथ पकड़ कर सामने से आते रिकशे को रोक कर उस पर बैठते हुए विमल ने कहा, ‘‘चलो गंगा, घर चलते हैं.’’

दूसरे दिन सुबह चाय का प्याला लिए विमल अपनी बालकनी में बैठा धूप की गरमाहट महसूस कर ही रहा था कि द्वार पर आहट हुई.

‘‘नमस्कार, मैं जयंत हूं.. आप जो समाचारपत्र पढ़ रहे हैं, मैं उसी का एक अदना सा रिपोर्टर हूं.’’

विमल का चेहरा बुझ गया. अनमने मन से स्वागत कर उन के लिए चाय मंगाई.

जयंत कहे जा रहा था, ‘‘कहते हैं कि बड़े लोग विनम्र होते हैं, आप तो साक्षात विनम्रता के अवतार लगते हैं. इतने उदार, समाज सुधारक, अभिमान तो नाम को नहीं…’’

विमल ने प्रतिवाद किया, ‘‘ऐसा लगता है आप किसी भ्रम में हैं. मुझे गलत समझ रहे हैं, मैं वह नहीं हूं जो आप समझ रहे हैं.’’

‘‘तभी तो मैं कह रहा हूं कि आप जैसा महान व्यक्ति प्रचार से दूर रहना चाहता है पर आप ने जो कुछ किया उसे जान कर मुझे गर्व का अनुभव हुआ.’’

‘‘मैं ने क्या किया…मैं तो किसी प्रशंसा के लायक नहीं…’’

‘‘आप संकोच न करें, गुप्ताजी ने मुझे सब बता दिया है. अरे, वही गुप्ताजी जो कल आप से मिले थे. आप ने उन्हें नहीं पहचाना हो पर वह तो आप को पहचान गए हैं. आप की पत्नी उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले की हैं न?’’

विमल मना न कर सका. रसोई के दरवाजे पर खड़ी गंगा का चेहरा उतरा हुआ था.

‘‘देखिए, मेरा कोई स्वार्थ नहीं,’’ रिपोर्टर जयंत ने कहा, ‘‘कोई लांछन का उद्देश्य नहीं, आप की इज्जत जितनी है वह आप को नहीं मिल रही है. मैं तो केवल इसलिए आप को प्रकाश में लाना चाहता हूं कि लोगों को आप से सबक मिले. ऐसा समाज सुधारक छिप कर नहीं बैठता है. इसलिए मैं आप को प्रकाश में लाना चाहता हूं कि लोगों को आप से प्रेरणा मिले. लोग जानेंगे कि पाप से घृणा करो पापी से नहीं, प्यार आदमी को बदल देता है.

‘‘यह चित्र विवाह के बाद का है न,’’ कमरे में कोने की मेज पर गंगा का चित्र रखा हुआ देख कर उस ने उठा लिया, ‘‘मैं अभी आप को दे जाऊंगा, यह सिगरेट लीजिए न, विदेशी है…मेरा पेशा ही ऐसा है भाई, लोग बहुत आवभगत करते हैं समाचारपत्र में अपना नाम देखने के लिए. मेरा रुतबा ही

इतना है…भाभी, आप का एक चित्र

लेना है, रसोई में काम करते हुए…लोग देखेंगे. वह, कैसी सुघड़ गृहिणी हैं,

कैसी सुंदर गृहस्थी है…हां, तो आप ने जानकी को गंगा नाम दिया. बहुत

ठीक, गंगा तो पवित्र है, गंगा मैली थोड़े होती है.

‘‘अच्छा, धन्यवाद, मैं चलता हूं,’’ वह कागजकलम समेट कर उठ गया. विमल नीचे तक पहुंचा कर आया तो गंगा वैसे ही दीवार से सटी खड़ी थी. मौन,  चिंतित, भयाक्रांत, प्रशंसा के मद से मस्त. विमल को देर हो रही थी, ध्यान नहीं दिया.

शाम को उस ने हलदीकुमकुम के लिए सामान लाने को कहा तो गंगा ने मना कर दिया, ‘‘अभी ठहर कर लाऊंगी.’’

तीसरे दिन समाचारपत्र के तीसरे पेज पर वही चित्र था जो उन के घर की मेज पर रखा था. दूसरा चित्र गंगा का रसोई में काम करते हुए. साथ में संक्षेप से उस की यातना की कहानी के साथ ही विमल की महानता की कहानी छपी थी.

विमल को उठने में देर हो गई थी. समाचारपत्र ऊपरऊपर से देख कर वह काम पर जाने के लिए तैयार होने लगा कि उस से मिलने वाले एकएक कर आने लगे. फ्लैट के सभी लोग आए और उस के उदार नजरिए पर बधाई दी.

‘‘प्रचारप्रसार से इतनी दूर कि आज का समाचार- पत्र तक नहीं देखा, जबकि अपने बारे में आप को छपने की आशा थी.’’

‘‘वाह, आप धन्य हैं. आप दोनों सुखी रहें, हमारी कामना है.’’

गंगा भोजन तैयार न कर सकी और न नाश्ते का डब्बा ही. वह अपने अंदर एक अज्ञात भय महसूस कर रही थी.

विमल तैयार हो कर आया तो बोला, ‘‘मैं वहीं कुछ खा लूंगा. तुम अपना ध्यान रखना.’’

पुरुषों के जाने के बाद महिलाओं की बारी आई. एकएक कर सब गंगा का हाल पूछने पहुंच गईं. सब में यह बताने की होड़ लगी थी कि सब से पहले किस ने समाचारपत्र देखा और कैसे एकदूसरे को जानकारी दी. फिर सभी ने एक स्वर से कहा कि हमें नहीं पता था कि आप का नाम जानकी है. वैसे नाम तो हम लोग भी पतिगृह का दूसरा रखते हैं. आप के गांव में ऐसा नहीं होता क्या?

‘‘जानकी तो पतिव्रता स्त्री का

नाम था,’’ एक के मुंह से निकला तो दूसरी ने कहा, ‘‘बेचारी औरत का क्या दोष.’’

इस तरह सभी ने गंगा से सहानुभूति दिखाई. खाली चौका देख कर कई घरों से खाना आ गया. जबरन कौरकौर खिलाया और आंसू पोंछे. अपने प्रति कोमल भावनाएं देख कर गंगा को लगा कि उस की आशंका निर्मूल थी, वह व्यर्थ ही इतनी भयभीत हो रही थी कि उस का अतीत जान कर कहीं लोग उस से घृणा न करने लगें, फिर भी वह आश्वस्त न हो पाई.

विमल ने सुबह कहा था कि शाम को तैयार रहना, डाक्टर को दिखाना है और बाजार भी जाना है. किंतु शाम को वह कहीं नहीं गई. 3 दिन हो गए वह घर से निकली ही नहीं.

काशी बाई 2 दिन बाद आई तो बाहर से ही बोली, ‘‘बाई, मेरी पगार जितनी बनती है दे दो.’’

गंगा चकित हो उस से काम न करने का कारण पूछने ही वाली थी कि तभी सुना, ‘‘जूठा साफ करते हैं तो क्या, हमारा धरमईमान तो बना है. छि:, ऐसी बाई के घर कौन काम करेगा.’’

कूड़ा फेंकने वाली मीनाबाई ने भी कहा, ‘‘गंदा साफ करते हैं तो क्या हुआ, हमारा भी धरम है, अपने मरद के लिए तो मैं सच्ची हूं.’’

भाजी वाला आया था. गंगा साहस कर के नीचे उतरी ताकि कुछ सब्जीभाजी खरीद ले. गोभी, मटर का भाव पूछते ही वह मुसकराया, ‘‘अजी, आप जो चाहे दे दें…’’

गंगा ने यथार्थ समझ लिया था. अंदर ही अंदर घुटती रही. एक घर से गीतों का बुलावा आया हुआ था. विमल ने कहा, ‘‘दिन में थोड़ी देर को चली जाना और शगुन दे देना.’’

गंगा कहीं जाने को तैयार नहीं थी. विमल समझाता रहा, ‘‘देखो, हमें कमजोर नहीं पड़ना है. हम ने कोई बुरा काम तो किया नहीं है. मजबूरी ने जो करा दिया उस के लिए लज्जित क्यों हों? तुम अवश्य जाओ और सब के बीच में मिलोजुलो अन्यथा लोग हमें गलत समझेंगे, दोषी समझेंगे, उन के घर लड़की का विवाह है. तुम को गीतों में बुलाया है. नहीं जाओगी तो कहीं वे लोग बुरा न मान जाएं कि पास में रह कर नहीं आई.

गंगा दुविधा में थी. जोशी काकी के मुख से सुन ही लिया था और लोग भी ऐसा ही कहें तब…उधर विमल का कहा भी मन में गूंजता रहा तो वह बड़ा साहस जुटा कर वहां गई थी.

गाना चल रहा था. कुछ महिलाएं नृत्य कर रही थीं. हंसीखुशी का वातावरण था, उसे देखते ही नृत्य थम गया, गाना बंद हो गया और सब की नजर उस की ओर थी. उसे याद आया जब पहले वह जोशी काकी के घर गई थी तो वहां भी गाना हो रहा था किंतु उस के जाते ही सब ने उस का स्वागत किया था और उन नजरों में कौतूहल था पहचान का, परिचय का किंतु स्नेह का भाव भी था.

आज पहले तो सब एकदूसरे की ओर देख कर मुसकराईं, घर की मालकिन ने उसे बैठने का संकेत किया तो पास की महिलाएं इस तरह सरक कर बैठीं जैसे उस के स्पर्श से बच रही हों.

परस्पर फुसफुसाहट हुई, पर उस से न बोलने की चुप्पी  का प्रहार इतना मुखर था कि गंगा अधिक देर वहां बैठ न सकी. शगुन का लिफाफा हाथ में ही रह गया. वह उठी तब भी उस से किसी ने बैठने को न कहा, न जल्दी जाने का कारण पूछा.

कुहराम मचा हुआ था. गंगा ने स्नान घर में मिट्टी का तेल छिड़क कर अपने को जला लिया था. विमल के नाम एक पत्र रखा था जिस में लिखा था :

‘‘औरत पर कलंक लग जाए तो कलंक के साथ ही जीना होता है. आप पुरुष हैं दूसरा विवाह कर लेंगे किंतु मेरे साथ रह कर आप भी कलंकित ही रहेंगे. मैं इस लांछन को सह भी लेती पर मैं मां बनने वाली हूं. बेटा होगा तो वह भी कलंक का टीका ले कर, बेटी होगी तो और भी विडंबना होगी.

‘‘आत्महत्या कर के मैं पाप कर रही हूं पर आप को इन सब से मुक्ति दे रही हूं.

‘‘मुझे क्षमा करना. समाचारपत्र वाले फिर पूछने आएंगे. उन्हें यह पत्र दे देना, शायद मेरा चित्र लेना चाहें तो ले लेंगे.’’

विमल से पढ़ा नहीं जा रहा था. पत्र हाथ से छूट गया, क्या लिखा है…क्या कारण है, कई लोग पत्र पढ़ चुके थे. अब पत्र पकड़ते हुए जिसे देखा, विमल आक्रोश से फट पड़ा.

‘‘तसवीर भी ले लो न, वह भी…’’

रिपोर्टर ने सहम कर देखा…पत्र उस के हाथ से छूट गया.

Short Story, लेखक- नारायणी

Short Story: जरूरत है एक कोपभवन की

Short Story: आजकल के इंजीनियर और ठेकेदार यह बात अपने दिमाग से बिलकुल ही बिसरा बैठे हैं कि घर में एक कोपभवन का होना कितना जरूरी है. इसीलिए तो आजकल मकान के नक्शों में बैठक, भोजन करने का कमरा, सोने का कमरा, रसोईघर, सोने के कमरे से लगा गुसलखाना, सभी कुछ रहता है, अगर नहीं रहता है तो बस, कोपभवन.

सोचने की बात है कि राजा दशरथ के राज्य में वास्तुकला ने कितनी उन्नति की थी कि हर महल में कोप के लिए अलग से एक भवन सुरक्षित रहता था. शायद इसीलिए वह काल इतिहास में ‘रामराज्य’ कहलाया, क्योंकि उस काल में महिलाएं बजाय राजनीति के अखाड़े में कूदने के अपना सारा गुबार कोपभवनों में जा कर निकाल लेती थीं और इसीलिए समाज में इतनी शांति और अमनचैन छाया रहता था.

ठीक ही तो था. राजा दशरथ के काल की यह व्यवस्था कितनी अच्छी थी. पति अपनी पत्नियों को समान अधिकार देते थे. वे जानते थे कि कोप सरेआम, हाटबाजार में या कोई कोर्टकचहरी में करने की चीज नहीं है. इस के  लिए तो घर में ही अलग से कोपभवन का होना बहुत जरूरी है.

भला यह भी कोई बात हुई कि कुपिता हो कर बीवी बेचारी दिन भर मुंह फुलाए अपने 2 कमरों के छोटे से घर में काम करती रहे, पति को खाना खिलाए, बच्चों को स्कूल भेजे, शाम को फिर सभी को खिलापिला कर, बच्चों को सुला कर खुद भी अपना तकिया ले कर मुंह फेर कर लेट जाए.

पति के पास तो व्यस्तता का बहाना रहता है जिस के कारण वह जान ही नहीं पाता कि आज पत्नी अवमानिनी बनी हुई, कोप मुद्रा में दर्शन दे रही है या फिर वह इतना चतुर होता है कि जब तक हो सके, जानबूझ कर पत्नी के रूठने से अनजान बने रहने की ही कोशिश करता रहता है. तब क्या पत्नी खुद आ कर कहे कि सुनोजी, मैं रूठी हुई हूं, आप मुझे आ कर मना लीजिए.

पति अगर मनाने आ भी जाए तो आप क्या समझते हैं कि पत्नी ने कोई कच्ची गोलियां खेली हैं जो अपना रूठना छोड़ कर इतनी आसानी से मान जाएगी? रूठी पत्नी को मनाना इतना आसान काम नहीं है जितना आप समझ रहे हैं. न जाने कितने पापड़ बेलने पड़ते हैं उसे मनाने के लिए. यदि कोई कुंआरा व्यक्ति वह दृश्य देख ले तो शादी के नाम से ही तौबा कर ले. राजा दशरथ समझदार थे कि इस के लिए उन्होंने एक कोपभवन का निर्माण करा रखा था, ताकि जब भी उन की तीनों पत्नियों में से किसी को भी रूठना होता था वह कोपभवन में चली जाती थी और राजा दशरथ भी झट अपना राजपाट छोड़ कर रूठी पत्नी को मनाने दौड़ पड़ते थे.

यह स्वर्ण अवसर देखते ही पत्नी चटपट 2-4 वर मांग लेती थी, उस का कोप भंग हो जाता था और पतिपत्नी सारा मनमुटाव भूल कर हंसतेगाते कोपभवन से बाहर आ जाते थे और किसी को कानोंकान खबर भी नहीं होती थी. उन दिनों लोग पत्नी को तो सम्मान देते ही थे, साथ ही उस के कोप का भी भरपूर सम्मान करते थे.

अब तो हाल यह है कि तूफान के पहले की शांति देखते ही मेरे अबोध बच्चे कोप के आगमन की आशंका से ही सहम जाते हैं. सहमी हुई बबली मचल रहे गुड्डू को एक कोने में ले जा कर इशारे से समझाती है, ‘‘गुड्डू…मेरे भैया, देख, चुपचाप दूध गटक जा, आज मां का मूड ठीक नहीं है.’’ कोप के लक्षण देखते ही पतिदेव भी थाली में जो कुछ परोस दिया उसी को जल्दीजल्दी पेट में डाल कर भीगी बिल्ली की तरह दफ्तर भाग खड़े होते हैं और अतिरिक्त काम का बहाना बना कर रात को भी मेरे कोप के डर से देर से ही घर लौटते हैं.

मैं सांस रोके प्रतीक्षा करती हूं कि शायद अब वह मुझे मनाएंगे. यह जानते हुए भी कि मैं जाग रही हूं, मुझे सोई हुई समझने में अपनी खैरियत समझ कर वह खुद भी चुपचाप सो जाते हैं.

यह देख कर तो मुझे ही खिसिया कर रह जाना पड़ता है कि कौन सी कुघड़ी में रूठने का विचार मन में आया था. अलग से एक कोपभवन न होने के कारण ही तो कई बार कोप का कार्यक्रम स्थगित रखना पड़ता है. कितना अच्छा होता अगर आज भी कोपभवनों का अस्तित्व होता. कल्पना कीजिए, पत्नी रूठ कर कोपभवन में जा बैठी है.

अब पतिदेव को सुबह बिस्तर से उठते ही चाय नहीं मिलेगी तो कड़कड़ाती ठंड में उनींदी आंखों से मुंहअंधेरे उठ कर दूध वाले से दूध लेने और स्टोव से मगजमारी करने में ही उन महाशय को नानी और दादी दोनों साथ ही याद आ जाएंगी. यही नहीं वह बच्चों को स्कूल के लिए तैयार करने, उन का टिफन जमाने और स्वयं नहाधो, खापी कर दफ्तर के लिए तैयार होने की कल्पना से ही सिहर कर झटपट अपनी पत्नी को कोपभवन में जा कर मना लेने में ही अपना भला समझेंगे. कोपभवनों के अभाव में ही पत्नियों को एक अटैची हमेशा तैयार रखनी पड़ती है ताकि कुपित होते ही उस में कपड़े ठूंस कर पति को गाहेबगाहे मायके जाने की धमकी दी जा सके.

कितना अच्छा होता अगर आज भी कोपभवन होते तो पति की गाढ़ी मेहनत की कमाई रेलभाड़े में खर्च कर के पत्नी को मायके जाने की नौबत ही क्यों आती? पत्नी को अपने रूठने का इतना मलाल नहीं होता जितना मलाल पति द्वारा न मनाए जाने से होता है. पति का न मनाना कोप की आग में घी का काम करता है.

वह तो चाहती है कि पति कोपभवन में आ कर उस के चरणों में गिर कर गिड़गिड़ाए, ‘‘हे प्रियतमे, तुम अब मान भी जाओ, तुम्हारा चौकाचूल्हा संभालना मेरे बस की बात नहीं है. अब कान पकड़ कर कह रहा हूं जब तुम दिन कहोगी तो मैं भी दिन ही कहूंगा, तुम रात कहोगी तो मेरे लिए भी रात हो जाएगी.’’

इस के बाद पहली तारीख को तनख्वाह मिलते ही साड़ी लाने का वादा होता, शाम को फिल्म देखने जाने का कार्यक्रम बनता, पत्नी के अलावा किसी दूसरी सुंदरी की ओर आंख भी उठा कर न देखने की कसम खाई जाती और इस तरह पत्नी किसी फटेपुराने वस्त्र की तरह अपना कोप वहीं त्याग कर प्रसन्नवदना हो कर कोपभवन से बाहर आ जाती.

राम राज्य से ले कर इस 20वीं शताब्दी तक विज्ञान ने इतनी उन्नति कर ली है कि अब तो कोपभवन साउंड प्रूफ (जिस में बाहर की आवाज अंदर न आ सके और अंदर की आवाज बाहर न जा सके) भी बन सकते हैं. फिर चाहे पति कोपभवन में दरवाजा बंद कर के पत्नी के सामने कान पकड़े या दंडबैठक लगाए या पत्नी के कोमल चरणों में साष्टांग दंडवत कर के अपने आंसुओं से उस के चरण कमल क्यों न पखारे और बदले में पत्नी उस से नाकों चने ही क्यों न चबवा दे, वहां उन्हें देखने वाला कोई न होगा.

पत्नी चाहे जितनी गरजेगी, बरसेगी मंथरा टाइप महरी या घर के नौकरचाकर कान लगा कर नहीं सुन सकेंगे और न उन के अबोध बच्चों की मानसिकता पर कोई बुरा प्रभाव पड़ेगा. तलाक की दर निश्चित रूप से कम हो जाएगी. आखिर पतिपत्नी का मामला है. कोपभवन में जा कर सुलझ जाएगा. उस में कोर्टकचहरी की दखलंदाजी क्यों हो?

लेखक- डॉ. अरुना शास्त्री 

Hindi Story: काशी वाले पंडाजी – बेटियों ने बचाया परिवार

Hindi Story: रबी की फसल तैयार होने के बाद काशी वाले पंडाजी का इलाके में आना हुआ. लेकिन इस बार पंडाजी के साथ एक पहलवान चेला भी था, जिस की उम्र तकरीबन 35 साल के आसपास थी. पर देखने में वह 21-22 साल का ही लगता था. हाथ में कई अंगूठियां, छोटेछोटे काले बाल, प्रैस की हुई खादी की धोती और पैर में कोल्हापुरी चप्पल उस पर खूब फबती थी. पंडाजी बांस की बनी एक छोटी डोलची ले कर चलते थे. डोलची के हैंडिल के सहारे 2 छोटीछोटी गोल रंगीन शीशियां बंधी रहती थीं.

पंडाजी बड़ी सावधानी से शीशी खोलते और बहुत ही थोड़ा जल निकाल कर यजमान के बरतन में डालते. इस के बाद पहलवान चेला शुरू हो जाता, ‘‘यह प्रयाग का गंगाजल है. पंडाजी ने नवरात्र के समय मंदिर में इसे कठिन साधना के साथ मंत्रों से पढ़ा है. ‘‘इस गंगाजल में शुद्ध जल मिला कर घर के चारों तरफ छिड़क दें. इस के बाद सारा उपद्रव शांत हो जाएगा. बालबच्चे खुश रहेंगे और यजमान का कल्याण होगा.’’

उस पहलवान चेले की बात खत्म होते ही लाल और पीले धागे वाले 2 तावीज वह पंडाजी की ओर बढ़ा देता और कुछ क्षण बाद तावीजों को ले कर यजमान के हाथों में रखते हुए कहता, ‘‘पंडाजी बता रहे हैं कि लाल धागे वाला तावीज यजमान बाएं हाथ में मंगलवार को पहनें और पीले धागे वाला तावीज बुधवार को यजमान दाहिने हाथ में पहनें. इस के बाद सब तरह की बाधा दूर हो जाएगी और हर काम में तरक्की होगी.’’

यजमान दोनों हथेलियों पर 2 रंगों वाले तावीजों को इस तरह देखने लगता, मानो वह तावीज नहीं, कुबेर के खजाने की कुंजी और दवा हो. चेला दक्षिणा उठा कर गिनता. अगर वह 51 रुपए होती, तो चुपचाप पंडाजी की दाहिनी जेब से पर्स निकाल कर उस में रख देता और अगर पैसा इस से कम होता, तो कहता, ‘‘यह तो नवरात्र का खर्च भी नहीं है. लौट कर भी तो अनुष्ठान करना होगा.’’

तब यजमान कुछ रुपए निकाल कर चेले को बढ़ा देता. चेला नोटों की गिनती किए बिना पर्स के हवाले कर देता. पंडाजी यजमानों द्वारा दी गई दक्षिणा के हिसाब से ही अपना कीमती समय देते थे. पर वे माई के घर पर घंटों आसन जमाते. माई बहुत दिनों तक परदेश में रही थीं और उन की तीनों कुंआरी बेटियां भी देखने में खूबसूरत थीं.

पंडाजी के गांव में पधारते ही माई के दरवाजे पर उन के आसन का इंतजाम हो गया था. तीनों बेटियां भी अच्छी तरह सजसंवर कर तैयार हो चुकी थीं. पंडाजी के पहुंचते ही माई ने उन की आवभगत की. पंडाजी आसन पर बैठने ही वाले थे कि एक लड़की ने आ कर उन के पैर छुए. उन्होंने पूछा, ‘‘हां, क्या नाम है?’’

‘‘जी… संजू.’’ ‘‘कुंभ राशि. कन्या के लक्षण तो अति विलक्षण हैं. यह तो पिछले जन्म में राजकन्या थी. कुछ चूक हो जाने के चलते इसे इस कुल में आना पड़ा, तभी तो यह इतनी सुंदर और चंचला है.’’

सुंदर और चंचला शब्द सुनते ही संजू के गाल और भी लाल हो उठे और वह रोमांचित हो कर पंडाजी के और करीब होने लगी. तभी दूसरी लड़की रंजू ने कहा, ‘‘पंडाजी, इस को घरवर कैसा मिलेगा? इस की शादी कब तक होगी? हम तो इसी चिंता में परेशान रहते हैं. इस साल ही इस के हाथ पीले होने का कोई जतन बताइए न.’’

रंजू की बातें सुन कर पंडाजी चेले की ओर देखने लगे. संजू के यौवन में भटकता चेला अचकचा कर पंडाजी की ओर देखता हुआ कुछ पल चुप रहने के बाद बोला, ‘‘बीते सावन में इस के हाथ से जो सांप मर गया, वह कुलदेवता था. कुलदेवता इस पर बहुत गुस्सा हैं. इस के लिए मंत्र और तंत्र दोनों की साधनाएं करनी होंगी. ‘‘अच्छा है कि आज मंगलवार है. आज रात यह अनुष्ठान हो जाए, तो सब बिगड़ा काम बन सकता है.’’

चेले का यह सुझाव माई को डूबते को तिनके का सहारा जैसा लगा. सभी समस्याओं का समाधान निकल आने से माई की जान में जान आई. ठीक 5 बजे अनुष्ठान शुरू करने की बात कह कर पंडाजी चेले के साथ कैथीटोला गांव की ओर चल पड़े.

रात 9 बजे से माई के आंगन में अनुष्ठान का काम पंडाजी और चेले ने शुरू किया. हर तरह से सजीसंवरी तीनों बहनें भी आ कर लाइन से बैठ गईं. कुछ देर तक मंत्र पढ़ने के बाद आग जला कर उन्होंने माई के साथसाथ संजू, रंजू और मंजू को भभूत मिला प्रसाद खाने को दिया. इस के बाद चेले ने वहां मौजूद पासपड़ोस के लोगों को बाहर जाने का इशारा किया.

इशारा पाते ही सभी वहां से चले गए. फिर उस के बाद रात में क्या हुआ, गांव वालों को इस का क्या पता… अगली सुबह माई के घर में हाहाकार मचा हुआ था. माई और उस की छोटी बेटी मंजू छाती पीटपीट कर चिल्ला रही थीं, ‘‘कोई हमारी संजू… रंजू को वापस ला दो. वह पंडा पुरोहित नहीं, ठग था.

‘‘हम दोनों को बेहोश कर के पंडा और चेला मेरी दोनों बेटियों को उठा कर कहां ले गए… कुछ मालूम नहीं. हमारी बेटियों को वापस ला दो. उन्हें बचा लो.’’

गांव वालों को माजरा समझते देर नहीं लगी. राजमणि काका ने तुरंत रेलवे स्टेशन और बसस्टैंड के लिए कुछ लोगों को भेजा, लेकिन वे सभी खाली हाथ निराश लौट आए. तब पुलिस में मामले को ले जाया गया. लेकिन नतीजा वही ढाक के तीन पात.

माई के पास कलेजे पर पत्थर रख कर संजू और रंजू को भूलने के अलावा कोई चारा नहीं था. इधर उन दोनों बहनों ने समझदारी से काम लिया. पंडा और चेले की गलत मंसा भांपते हुए चालाकी से संजू ने पंडाजी से और रंजू ने चेले से ब्याह कर मौजमस्ती से जिंदगी बिताने का प्रस्ताव रखा.

पंडा और चेला इस प्रस्ताव को सुन कर बहुत खुश हुए. रंजू ने कहा, ‘‘लेकिन, इस के लिए जरूरी है कि हमारे घरपरिवार, गांव के लोग आगे आएं. कोई कानूनी दांवपेंच नहीं लगाएं और हमें पुलिस के चक्कर में नहीं पड़ना पड़े, सो हम लोग बिना समय गंवाए कोर्ट मैरिज कर लें.’’ संजू और रंजू के रूपजाल में फंसे पंडा और चेला कोर्ट मैरिज के कागजात के साथ अदालत में जज के सामने हाजिर हुए.

जब जज ने संजू और रंजू से उन की रजामंदी के बारे में पूछा, तो संजू कहने लगी, ‘‘जज साहब, ये दोनों हमारे गांव में पंडापुजारी बन कर आए थे. भोलेभाले गांव वालों के सामने तंत्रमंत्र का मायाजाल फैला कर इन ढोंगियों ने उन्हें खूब लूटा. ‘‘हम तीनों बहनों पर तो ये लट्टू बने थे. माई को घरपरिवार पर देवी का प्रकोप बता कर तांत्रिक अनुष्ठान कराने के लिए इन दोनों ने इसलिए मजबूर किया, ताकि उस की आड़ में हमें भोग सकें.

‘‘इन की खराब नीयत को भांप कर हम दोनों बहनों ने आपस में विचार किया और इन दोनों को कानून के हवाले करने के लिए यह नाटक खेला है, ताकि कानून इन ढोंगियों को ऐसी सजा दे, ताकि फिर कभी इस तरह की घटना न होने पाए.’’ संजू और रंजू के बयान को दर्ज करते हुए अदालत ने पंडा और चेले को जेल भेजने का आदेश दिया.

संजू और रंजू ने जब गांव वालों को यह दास्तान सुनाई, तो सभी कहने लगे, ‘सचमुच, तुम्हारी दोनों बेटियां बड़ी बहादुर हैं माई. इन दोनों ने वह कर दिखाया है, जो बहुत कम लोग ही कर पाते हैं. पूरे गांव को इन पर नाज है.’ माई की आंखों में भी खुशी और संतोष के आंसू छलछला रहे थे.

Hindi Story: सौतेला बरताव – जिस्म बेचने को मजबूर एक बेटी

Hindi Story: चंपा को देह धंधा करने के आरोप में जेल हो गई. वह रंगे हाथ पकड़ी गई थी. वह जेल की सलाखों में उदास बैठी हुई थी. चंपा के साथ एक अधेड़ औरत भी बैठी हुई थी. थोड़ी देर पहले पुलिस उसे भी इस बैरक में डाल गई थी. चंपा जिस होटल में देह धंधा करती थी, उसी होटल में पुलिस ने छापा मारा था और उसे रंगे हाथ पकड़ लिया था. आदमी तो भाग गया था, मगर पुलिस वाला उसे दबोचते हुए बोला था, ‘चल थाने.’

‘नहीं पुलिस बाबू, मुझे माफ कर दो…’ वह हाथ जोड़ते हुए बोली थी, ‘अब नहीं करूंगी यह धंधा.’

‘वह आदमी कौन था ’ पुलिस वाला उसी अकड़ से बोला था.

‘मुझे नहीं मालूम कि वह कौन था ’ वह फिर हाथ जोड़ते हुए बोली थी.

‘झूठ बोलती है. चल थाने, सारा सच उगलवा लूंगा.’

‘मुझे छोड़ दीजिए.’

‘हां, छोड़ देंगे. लेकिन तू ने उस ग्राहक से कितने पैसे लिए हैं ’

‘कुछ भी नहीं दे कर गया.’

‘झूठ कब से बोलने लगी  चल थाने ’

‘छोड़ दीजिए, कहा न कि अब कभी नहीं करूंगी यह धंधा.’

‘करेगी… जरूर करेगी. अगर करना ही है, तो लाइसैंस ले कर कोठे पर बैठ. फिर हम तुझ से कुछ नहीं कहेंगे…’ हवलदार थोड़ा नरम पड़ते हुए बोला था, ‘तुझे छोड़ सकता हूं, मगर अंटी में जितने पैसे हैं, निकाल कर मुझे दे दे.’

‘साहब, आज तो मेरी अंटी में कुछ भी नहीं है,’ वह बोली थी.

‘ठीक है, तब तो एक ही उपाय है… जेल,’ फिर वह पुलिस वाला उसे पकड़ कर थाने ले गया था. चंपा दीवार के सहारे चुपचाप बैठी हुई थी. वह अधेड़ औरत न जाने कब से उसे घूर रही थी.आखिरकार वह अधेड़ औरत बोली, ‘‘ऐ लड़की, तू कौन है ’’

तब चंपा ने अपना चेहरा ऊपर कर उस अधेड़ औरत की तरफ देखा, मगर जवाब कुछ नहीं दिया.

वह अधेड़ औरत जरा नाराजगी से बोली, ‘‘सुना नहीं  बहरी है क्या ’’

‘‘हां, पूछो ’’ चंपा ने कहा.

‘‘क्या अपराध किया है तू ने ’’

‘‘मैं ने वही अपराध किया है, जो तकरीबन हर औरत करती है ’’

‘‘क्या मतलब है तेरा गोलमोल बात क्यों कर रही है, सीधेसीधे कह न,’’ वह अधेड़ औरत गुस्से से बोली.

‘‘मुझे देह धंधा करने के आरोप में पकड़ा गया है.’’

‘‘शक तो मुझे पहले से ही था. अरे, जिस पुलिस वाले ने तुझे पकड़ा है, उस के मुंह पर नोट फेंक देती.’’

‘‘अगर मेरे पास पैसे होते, तो उस के मुंह पर मैं तभी फेंक देती.’’

‘‘तुम ने यह धंधा क्यों अपनाया ’’

‘‘क्या करोगी जान कर ’’

‘‘मत बता, मगर मैं सब जानती हूं.’’

‘‘क्या जानती हैं आप ’’

‘‘औरत मजबूरी में ही यह धंधा अपनाती है.’’

‘‘नहीं, गलत है. मैं मजबूरी में वेश्या नहीं बनी, बल्कि बनाई गई हूं.’’

‘‘कैसे अपनी कहानी सुना.’’

‘‘हां सुना दूंगी, मगर आप इस उम्र में जेल में क्यों आई हो ’’

‘‘मेरी बात छोड़, मेरा तो जेल ही घर है,’’ उस अधेड़ औरत ने कहा.

‘‘आप आदतन अपराधी हैं ’’

‘‘यही समझ ले…’’ उस अधेड़ औरत ने गहरी सांस ले कर कहा, ‘‘फिर भी सुनना चाहती है तो सुन. मैं अफीम की तस्करी करती थी. अब सुना तू अपनी कहानी.’’

चंपा की कहानी कुछ इस तरह थी: चंपा के पिता मजदूर थे. उन का नाम मांगीलाल था. उन्होंने रुक्मिणी नाम की औरत से शादी की थी.

शादी के 2 साल गुजर गए थे. एक दिन पिता मांगीलाल को पता चला कि रुक्मिणी मां बनने वाली है. उन की खुशियों का ठिकाना न रहा.

रुक्मिणी को बांहों में भरते हुए वे बोले थे, ‘पहला बच्चा लड़का होना चाहिए…’

‘यह मेरे हाथ में है क्या ’ रुक्मिणी उन्हें झिड़कते हुए बोली थी. 9 महीने बाद जब चंपा पैदा हुई, तो 4 दिन बाद उस की मां मर गई. पिता के ऊपर सारी जवाबदारी आ पड़ी. रिश्तेदार कहने लगे कि पैदा होते ही यह लड़की मां को खा गई. तब मौसी ने उसे पाला. मां के मरने पर पिता टूट गए थे. वे उदासउदास से रहने लगे थे. तब अपना गम भुलाने के लिए वे शराब पीने लगे थे. रिश्तेदारों और उन के बड़े भाई ने खूब कहा कि दोबारा शादी कर लो, मगर वे तैयार नहीं हुए थे. धीरेधीरे चंपा मौसी की गोद में बड़ी होती गई. जब वह 5 साल की हो गई, तब उसे स्कूल में भरती करा दिया गया. पिता को दोबारा शादी के प्रस्ताव आने लगे. चारों तरफ से दबाव भी बनने लगा. एक दिन पिता के बड़े भाई भवानीराम और उन की पत्नी तुलसाबाई आ धमके. आते ही भवानीराम बोले, ‘ऐसे कैसे काम चलेगा मांगीलाल ’

‘क्या कह रहे हैं भैया ’ मांगीलाल ने पूछा.

‘सारी जिंदगी यों ही बैठे रहोगे ’ भवानीराम ने दबाव डालते हुए कहा.

‘आप कहना क्या चाहते हो भैया ’

‘अरे देवरजी…’ तुलसाबाई मोरचा संभालते हुए बोली, ‘देवरानी को गुजरे 6-7 साल हो गए हैं. अब उस की याद में कब तक बैठे रहोगे. चंपा भी अब बड़ी हो रही है.’ ‘भाभी, मेरा मन नहीं है शादी करने का,’ मांगीलाल ने साफ इनकार कर दिया था. ‘मैं पूछती हूं कि आखिर मन क्यों नहीं है ’ दबाव डालते हुए तुलसाबाई बोली, ‘यों देवरानी की याद करने से वह वापस तो नहीं आ जाएगी. फिर शादी कर लोगे, तो देवरानी के गम को भूल जाओगे.’

‘नहीं भाभी, मैं ने कहा न कि मुझे शादी नहीं करनी है.’

‘क्यों नहीं करनी है  हम तेरी शादी के लिए आए हैं. और हां, तेरी हां सुने बगैर हम जाएंगे नहीं,’ भैया भवानीराम ने हक से कहा, ‘हम ने तेरे लिए लड़की भी देख ली है. लड़की इतनी अच्छी है कि तू रुक्मिणी को भूल जाएगा.’

‘नहीं भैया, मैं चंपा के लिए सौतेली मां नहीं लाऊंगा,’ एक बार फिर इनकार करते हुए मांगीलाल बोला.

‘कैसी बेवकूफों जैसी बातें कर रहा है. जिन की औरत भरी जवानी में ही चली जाती है, तब वे दोबारा शादी नहीं करते हैं क्या ’

‘अरे देवरजी, यह क्यों भूल रहे हो कि चंपा को मां मिलेगी. कब तक मौसी उस की देखरेख करती रहेगी  इस बात को दिमाग से निकाल फेंको कि हर मां सौतेली होती है. जिस के साथ हम तुम्हारी शादी कर रहे हैं, वह ऐसी नहीं है. चंपा को वह अपनी औलाद जैसा ही प्यार देगी ’ ‘भाभी, आप लोग क्यों मेरे पीछे पड़े हुए हो ’

‘बिना औरत के आदमी का घर नहीं बसता है और हम तेरा घर बसाना चाहते हैं. लड़की हम ने देख ली है. एक बात कान खोल कर सुन ले, हम तेरी शादी करने के लिए आए हैं. इनकार तो तुम करोगे नहीं. बस, तैयार हो जाओ,’ कह कर भवानीराम ने बिना कुछ सुने फैसला सुना दिया. मांगीलाल को भी हार माननी पड़ी. भैयाभाभी ने जो लड़की पसंद की थी, उस का नाम कलावती था. मान न मान मैं तेरा मेहमान की तरह कलावती के साथ उस की शादी कर दी गई. जब तक कलावती की पहली औलाद न हुई, तब तक उस ने चंपा को यह एहसास नहीं होने दिया कि वह उस की सौतेली मां है. मगर बच्चा होने के बाद वह चंपा को बातबात पर डांटने लगी. उस का स्कूल छुड़वा दिया गया. वह उस से घर का सारा काम लेने लगी. पिता भी नई मां पर ज्यादा ध्यान देने लगे. इस तरह नई मां ने पिता को अपने कब्जे में कर लिया. धीरेधीरे चंपा बड़ी होने लगी. लड़के उसे छेड़ने लगे.

कलावती भी उसे देख कर कहने लगी, ‘लंबी और जवान हो गई है. कब तक हमारे मुफ्त के टुकड़े तोड़ती रहेगी. कोई कामधंधा कर. कामधंधा नहीं मिले, तो किसी कोठे पर जा कर बैठ जा. तेरी जवानी तुझे कमाई देगी.’ चंपा के पिता जब शादी की बात चलाते, तब सौतेली मां कहती, ‘कहां शादी के चक्कर में पड़ते हो. चंपा अब बड़ी हो गई है. साथ ही, जवान भी. रूप भी ऐसा निखरा है कि अगर इसे किसी कोठे पर बिठा दो, तो खूब कमाई देगी.’ तब पिता विरोध करते हुए कहते, ‘जबान से ऐसी गंदी बात मत निकालना. क्या वह तुम्हारी बेटी नहीं है ’

‘‘मेरी पेटजाई नहीं है वह. आखिर है तो सौतेली ही,’ कलावती उसी तरह जवाब देती. पिता को गुस्सा आता, मगर वह उन्हें भी खरीखोटी सुना कर उन की जबान बंद कर देती थी. इस गम में पिता ज्यादा शराब पीने लगे. रातदिन की चकचक से तंग आ कर चंपा ने कोई काम करने की ठान ली. मगर सौतेली मां तो उस से देह धंधा करवाना चाहती थी. आखिर में चंपा ने भी अपनी सौतेली मां की बात मान ली. जिस होटल में वह धंधा करती थी, वहीं सौतेली मां ग्राहक भेजने लगी. ग्राहक से सारे पैसे सौतेली मां झटक लेती थी. चंपा ने उस अधेड़ औरत के सामने अपना दर्द उगल दिया. थोड़ी देर के सन्नाटे के बाद वह अधेड़ औरत बोली, ‘‘तेरी कहानी बड़ी दर्दनाक है. आखिर सौतेली मां ने अपना सौतेलापन दिखा ही दिया.’’

चंपा कुछ नहीं बोली.

‘‘अब क्या इरादा है  तेरी सौतेली मां तुझे छुड़ाने आएगी ’’ उस अधेड़ औरत ने पूछा.

‘‘नहीं, मैं तो अब जेल में ही रहना चाहती हूं. उस सौतेली मां की सूरत भी नहीं देखना चाहती हूं.’’

‘‘तू भले ही मत देख, मगर तेरी सौतेली मां तुझ से पैसा कमाएगी, इसलिए तुझे छुड़ाने जरूर आएगी,’’ अपना अनुभव बताते हुए वह अधेड़ औरत बोली.

‘‘मगर, अब मैं घर छोड़ कर भाग जाऊंगी ’’

‘‘भाग कर जाएगी कहां  यह दुनिया बहुत बड़ी है. यह मर्द जात तुझे अकेली देख कर नोच लेगी. मैं कहूं, तो तू किसी अच्छे लड़के से शादी कर ले.’’ ‘‘कौन करेगा मुझ से शादी बस्ती के सारे बिगड़े लड़के मुझ से शादी नहीं मेरा जिस्म चाहते हैं. वैसे भी मैं बदनाम हो गई हूं. अब कौन करेगा शादी ’’ ‘‘हां, ठीक कहती हो…’’ कह कर वह अधेड़ औरत खामोश हो गई. कुछ पल सोच कर वह अधेड़ औरत बोली, ‘‘हम औरतों के साथ यही परेशानी है. देख न मुझे भी मेरी जवानी का फायदा उठा कर तस्करी का काम दिया, ताकि औरत देख कर कोई शक नहीं करे. मगर जब पैसे मिलने लगे, तब धंधा मुझे रास आ गया. इस का नतीजा देख रही हो, आज मैं जेल में हूं.’’ फिर दोनों के बीच काफी देर तक सन्नाटा पसरा रहा. तभी एक पुलिस वाले ने ताला खोलते हुए कहा, ‘‘बाहर निकल. तेरी मां ने जमानत दे दी है.’’ चंपा ने देखा कि उस की मां कलावती खड़ी थी. वह गुस्से में बोली, ‘‘तू चुपचाप धंधा करती रही और मुझे बदनाम कर दिया. सारी बस्ती वाले मुझ पर थूक रहे हैं. आखिर मैं तेरी सौतेली मां हूं न, बदनाम तो होना ही है. वैसे भी सौतेली मां तो बदनाम ही रहती है.

‘‘चल, निकल बाहर. अब कभी धंधा किया न, तो तेरी खाल खींच लूंगी. मां हूं तेरी, भले ही सौतेली सही. मैं ने जमानत दे दी है.’’ चंपा कुछ नहीं बोली. वह अपनी सौतेली मां के साथ हो ली. वह जानती थी कि यह केवल लोकलाज का दिखावा है. अब यह कैसी साहूकार बन रही है. उलटा चोर कोतवाल को डांट कर.

Hindi Story: दुआ मांगो सब ठीक हो जाएगा-सुगमा की कशमकश

Hindi Story: वह पेट से थी. कोख में किस का बच्चा पलबढ़ रहा था, ससुराल वाले समझ नहीं पा रहे थे. सब अंदर ही अंदर परेशान हो रहे थे.

पिछले 2 साल से उन का बड़ा बेटा जुबैर अपने बूढ़े मांबाप को 2 कुंआरे भाइयों के हवाले कर अपनी बीवी सुगरा को छोड़ कर खाड़ी देश कमाने गया था. शर्त के मुताबिक उसे लगातार 2 साल नौकरी करनी थी, इसलिए घर आने का सवाल ही नहीं उठता.

इसी बीच जुबैर की बीवी सुगरा कभी मायके तो कभी ससुराल में रह कर समय काट रही थी. 2 साल बाद उस के शौहर का भारत आनाजाना होता रहेगा, यही बात सोच कर वह खुश थी.

सुगरा जब भी मायके आती तो हर जुमेरात शहर के मजार जाती. उस मजार का नाम दूरदूर तक था. कई बार तो वह वहां अकेली आतीजाती थी.

एक शहर से दूसरे शहर में ब्याही गई सुगरा ज्यादा पढ़ीलिखी नहीं थी. उस ने शहर के एक मदरसे में तालीम पाई थी. सिलाईकढ़ाई और पढ़ाई सीखतेसीखते मदरसे के हाफिज से उस की जानपहचान हो गई थी. वह हाफिज से हंसतीबोलती, पर प्यार मुहब्बत से अनजान थी.

मदरसे में पढ़तेपढ़ते सुगरा के अम्मीअब्बू ने रिश्तेदारी में अच्छा रिश्ता पा कर उस की शादी करने की सोची.

‘सुनोजी, रिश्तेदारी में शादी करने से आपस में बुराई होती है. हालांकि वह हमारी खाला का बेटा है. रोजगार की तलाश में है. जल्द लग नौकरी जाएगी,  पर…’ सुगरा की मां ने कहा था.

‘पर क्या?’ सुगरा के अब्बू ने पूछा था.

‘कल को कोई मनमुटाव हो गया या लड़के को लड़की पसंद न आई तो…’ सुगरा की अम्मी बोली थीं.

‘सुना है कि लड़का खाड़ी देश में कमाने जा रहा है. नौकरी वाले लड़के मिलते ही कहां हैं,’ सुगरा के अब्बू ने कहा था.

दोनों परिवारों में बातचीत हुई और उन का निकाह हो गया. पर मदरसे के हाफिज को सुगरा अब भी नहीं भुला पाई थी.

आज मुर्शिद मियां का परिवार जश्न मना रहा था. एक तो उन के बेटे जुबैर की नौकरी खाड़ी देश में लग गई थी, दूसरी उन के घर खूबसूरत सी बहू आ गई.

‘सुगरा, तुम जन्नत की परी जैसी हो. तुम्हारे आने से हमारा घर नूर से जगमगा गया,’ कह कर जुबैर ने सुगरा को अपने सीने से लगा लिया था.

उन दोनों के बीच मुहब्बत की खुशियों ने डेरा जमा लिया था. पूरा परिवार खुश था.

एक महीने का समय कब बीत गया, पता ही नहीं चला. जुबैर खाड़ी देश जाने की तैयारी करने लगा. सुगरा को उदासी ने घेर लिया था. उस के दिल से आह निकलती कि काश, जुबैर उसे छोड़ कर न जाता.

‘सिर्फ 2 साल की ही तो बात है,’ कह कर जुबैर सुगरा को आंसू और प्यार के बीच झलता छोड़ कर नौकरी करने खाड़ी देश चला गया था.

सुगरा की मायूसी देख उस की सास ने अपने शौहर से कहा था, ‘इन दिनों सुगरा घर से बाहर नहीं निकलती है. बाबा के मजार पर हाजिरी देने के लिए उसे देवर रमजान के साथ भेज दिया करें, ताकि उस का मन बहला रहे.’

वे हंसे और बोले, ‘जुबैर के गम में परेशान हो रही होगी. भेज दिया करो. जमाना बदल रहा है. आजकल के बच्चे घर में कैद हो कर नहीं रहना चाहते,’ अपनी बात रखते हुए सुगरा के ससुर मुर्शिद मियां ने इजाजत दे दी थी.

सुगरा मजार आने लगी थी. उस की खुशी के लिए देवर रमजान उस से हंसताबोलता, मजाक करता था, ताकि वह जुबैर की याद भुला सके.

जुबैर को गए 2 महीने हो गए थे लेकिन सासससुर की खुली छूट के बाद भी सुगरा की जिंदगी में कोई खास बदलाव नहीं आया था.

इसी बीच सुगरा के अब्बू आए और उसे कुछ दिनों के लिए घर ले गए. सुगरा ने अम्मी से आगे पढ़ने की बात कही, ताकि उस का मन लगा रहे और वह तालीम भी हासिल कर सके.

मायके में सुगरा के मामा के लड़के को तालीम देने के लिए बुलाया गया. अब सुगरा घर पर ही पढ़ने लगी थी.

एक दिन मजार पर हाफिज ने सुगरा की खूबसूरती की तारीफ क्या कर दी, उस के दिल में हाफिज के लिए मुहब्बत पैदा हो गई.

शादीशुदा सुगरा जवानी का सुख भोग चुकी थी. वह खुद पर काबू नहीं रख पाई और हाफिज की तरफ झाकने लगी.

‘कल मजार पर मिलते हैं…’ आजमाने के तौर पर हाफिज ने कहा था, ‘शाम 7 बजे.’

यह सुन कर सुगरा शरमा गई.

‘ठीक है,’ सुगरा ने कहा था.

ठीक 7 बजे सुगरा मजार पर पहुंच गई. दुआ मांगने के बाद वह हाफिज के साथ गलियारे में बैठ कर बातें करने लगी.

हाफिज ने सुगरा को बताया कि मजार पर दुआ मांगने से दिल को सुकून मिलता है, मनचाही मुराद मिलती है.

अब वे दोनों रोजाना शाम को मजार पर मिलने लगे थे. उन के बीच के फासले कम होने लगे थे.

तकरीबन 4 महीने का समय बीत गया. एक दिन ससुराल से देवर आया और सुगरा की मां को अपनी अम्मी की तबीयत खराब होने की बात कह कर सुगरा को अपने साथ ले गया.

ससुराल में सुगरा जुबैर की याद में डूबी रहने के बजाय हाफिज की दीवानी हो गई थी. वह उस से मिलने को बेकरार रहने लगी थी.

धीरेधीरे सुगरा की सास ठीक हो गईं. सुगरा अब शहर के मजार पर जा कर हाफिज से मिलने की दुआ मांगती थी.

समय की चाल फिर बदली.

‘मैं कालेज में एक पीरियड में हाजिरी लगा कर आता हूं, तब तक तुम मजार पर रुकना,’ कह कर सुगरा को छोड़ उस का देवर कालेज चला गया.

इसी बीच सुगरा ने फोन पर हाफिज को मजार पर बुलाया. उन की मुलाकात दोबारा शुरू हो गई.

देवर के जाने के बाद मजार के नीचे पहाड़ी पर सुगरा अपनी जवानी की प्यास बुझाती और लौट कर मजार से दूर जा कर बैठ जाती. ससुराल में रह कर हाफिज से अपनी जवानी लुटाती सुगरा की इस हरकत से कोई वाकिफ नहीं था.

शहर की मसजिद में हाफिज को बच्चों को तालीम देने की नौकरी मिल जाने से अब सुगरा और उस के बीच की दूरियां मिट गईं. सुगरा को भी सासससुर से सिलाई सैंटर जा कर सिलाई सीखने की इजाजत मिलने की खुशी थी.

जुबैर को खाड़ी देश गए सालभर से ऊपर हो गया था.

‘तकरीबन 4-5 महीने की बात है,’ उस की अम्मी ने सुगरा से कहा था.

‘हां अम्मी, तब तक वे आ जाएंगे,’ सुगरा बोली थी.

पर सुगरा को अब जुबैर की नहीं हाफिज की जरूरत थी. सुगरा और हाफिज के बीच अब कोई दीवार नहीं थी. हाफिज की मसजिद वाली कोठी में वे बेफिक्री से मिलते थे.

सुगरा भी दिल खोल कर हाफिज के साथ रंगरलियां मनाने लगी थी और नतीजा…

सुगरा की तबीयत अचानक खराब होने पर उस की सास उसे अस्पताल ले कर गईं.

डाक्टर ने बताया, ‘आप की बहू मां बनने वाली है.’

घर लौट कर सास मायूसी के साए में डूब गईं. सोचा कि जब जुबैर डेढ़ साल से सुगरा से नहीं मिला तो फिर बहू के पैर भारी कैसे हो गए?

सुगरा ने जुबैर को फोन पर पूरी बात बताई.

जुबैर ने कहा, ‘दुआ मांगो सब ठीक हो जाएगा.’

जुबैर समझ गया था कि मामला क्या है, पर वह यह भी जानता था कि हल्ला मचाने पर वही बदनाम होगा. उसे अभी कई साल खाड़ी देश में काम करना था. एक बच्चा उस के नाम से रहेगा तो उसे ही अब्बा कहेगा न.

Hindi Story: स्वयंसिद्धा – दादी ने कैसे चुनी नई राह

Hindi Story: रात 1 बजे नीलू के फोन की घंटी घनघना उठी. दिल अनजान आशंकाओं से घिर गया. बेटा विदेश में है. बेटी पुणे के एक होस्टल में रहती है. किस का फोन होगा, मैं सोच ही रही थी कि पति ने तेज कदमों से जा कर फोन उठा लिया. पापा का देहरादून से फोन था, मेरी दादी नहीं रही थीं. यह सुनते ही मैं रो पड़ी. इन्होंने मुझे चुप कराते हुए कहा, ‘‘देखो मधु, दादी अपनी उम्र के 84 साल जी चुकी थीं, आखिर एक न एक दिन तो यह होना ही था. तुम जानती ही हो कि जन्म और मृत्यु जीवन के 2 अकाट्य सत्य हैं.’’

उन्होंने मुझे पानी पिला कर कुछ देर सोने की हिदायत दी और कहा, ‘‘सवेरे 4 बजे निकलना होगा, तभी अंतिमयात्रा में शामिल हो पाएंगे.’’

मैं लेट गई पर मेरी अश्रुपूरित आंखों के सामने अतीत के पन्ने उलटने लगे…

मेरी दादी शांति 16 वर्ष की आयु में ही विधवा हो गई थीं. 2 महीने का बेटा गोद में दे कर उन का सुहाग घुड़सवारी करते समय अचानक दुर्घटनाग्रस्त हो कर इस दुनिया से हमेशा के लिए विदा हो गया.

वैधव्य की काली घटाओं ने उन की खुशियों के सूरज को पूर्णतया ढक दिया. गोद में कुलदीपक होने के बावजूद उन पर मनहूस का लेबल लगा उन्हें ससुरालनिकाला दे दिया गया.

ससुराल से निर्वासित हो कर दादी ने मायके का दरवाजा खटखटाया. मायके के दरवाजे तो उन के लिए खुल गए पर सासससुर की लाचारी का फायदा उठा कर उन की भाभी ने उन्हें एक अवैतनिक नौकरानी से ज्यादा का दर्जा न दिया.

मायके में दिनरात सेवा कर उन्होंने अपने बेटे के 10 साल के होते ही मायके को भी अलविदा कह दिया.

देहरादून में बरसों पहले ब्याही बचपन की सहेली का पता उन के पास था. बस, सहेली के आसरे ही वे देहरादून आ पहुंचीं.

सहेली तो मिली ही, साथ ही वहां एक कमरे का आश्रय भी मिल गया. सहेली और उस के पति दोनों उदार व दयालु थे. उन्होंने उन के बेटे यानी हमारे पापा का दाखिला भी एक नजदीकी स्कूल में करवा दिया.

दादी स्वेटर बुनने और क्रोशिए व धागे से विभिन्न तरह की चीजें बनाने में सिद्धहस्त थीं. स्वेटर पर ऐसे सुंदर नमूने डालतीं कि राह चलने वाला एक बार तो गौर से अवश्य देखता. उन के  बुने स्वेटरों और क्रोशिए के काम की धूम पूरे महल्ले में फैल गई. देखते ही देखते उन्हें खूब काम मिलने लगा. दिनरात मेहनत कर के वे आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हो गईं. उन्होंने सहेली को तहेदिल से धन्यवाद दिया और उसी के घर के पास 2 कमरों का मकान ले कर रहने लगीं, पर सहेली का उपकार कभी नहीं भूलीं.

पापा भी 16-17 वर्ष के हो चुके थे. उन्हें भी किसी जानकार की दुकान पर काम सीखने भेजने लगीं. पापा होनहार थे, बड़ी मेहनत और लगन से वे काम सीखने लगे. मायका छोड़ते समय भाभी की नजर से बचा उन की मां ने एक गहने की छोटी सी पोटली उन्हें थमा दी थी. उन्होंने उसे लेने से स्पष्ट इनकार कर दिया था पर उन की मां ने अपनी कसम दे दी थी. अपनी मां की बेबसी और डबडबाई आंखें देख उन्हें वह पोटली लेनी पड़ी. दादी अपनी मां की निशानी बड़ी जतन से संभाल कर रखती आई थीं. कठिनतम परिस्थितियों में भी कभी उसे नहीं छुआ पर आज अपने होनहार बेटे का कारोबार जमाने की खातिर उस निशानी का भी मोलभाव कर दिया.

आज मैं स्वयं को और इस नई पीढ़ी को देखती हूं तो चारों और असहिष्णुता व आक्रोश फैला देखती हूं. छोटीछोटी बातों में गुस्सा, तुनकमिजाजी देखने को मिलती है. सारी सुखसुविधाएं होते हुए भी असंतुष्टता दिखाई देती है, पर दादी के जीवन में तो 16 वर्ष के बाद ही पतझड़ ने स्थायी डेरा जमा लिया था. जीवन में कदमकदम पर अपमान, अभाव व धोखे खाए थे पर इन सब ने उन में गजब की सहनशीलता भर दी थी. हम ने कभी घर में उन्हें गुस्सा करते, चिल्लाते नहीं देखा. अपनी मौन मुसकान से ही वे सब के दिलों पर राज करती थीं. मम्मीपापा को उन से कोई शिकायत न थी. वे उन को मां बन कर सीख भी देतीं और दोस्त बना कर हंसीमजाक भी करतीं.

दादीजी के बारे में सोचतेसोचते कब सवेरा हो गया, पता ही नहीं चला. पति टैक्सी वाले को फोन करने लगे. मैं ने जल्दी से 2 कप चाय बना ली. हम चल दिए दादी की अंतिमयात्रा में शामिल होने.

टैक्सी में बैठते ही मैं ने आंखें मूंद लीं. दादी की यादों के चलचित्र की अगली रील चलने लगी…

दादी स्वयं पुराने जमाने की थीं लेकिन पासपड़ोस और महल्ले की औरतों की आजादी के लिए उन्होंने ही शंखनाद किया. ससुराल में घूंघट से त्रस्त कई महिलाओं को उन्होंने घूंघट से आजादी दिलवाई. घरों के बड़ेबुजुर्गों को समझाया कि सिर पर ओढ़नी, आंखों और दिल में बुजुर्गों के लिए आदरसेवा यही सबकुछ है. हाथभर का घूंघट निकाल कर बड़ेबूढ़ों का अपमान करना, उन की मजबूरी और लाचारी

में उन्हें कोसना गलत है. घूंघटों से बेजार महिलाओं को जीवन में बड़ी राहत मिल गई थी. दादी की बातें लोगों के दिलोजेहन में ऐसे उतरतीं जैसे धूप व प्यास से खुश्क गलों में मीठा शरबत उतरता.

दादी स्वयं पढ़ीलिखी न थीं. पर उन्होंने मम्मी के बीए की अधूरी पढ़ाई को पूरा करवाने का बीड़ा उठाया. घरपरिवार की जिम्मेदारी अपने ऊपर ले कर मम्मी को कालेज भेजा. मुख्य विषय संगीत था, इसलिए हारमोनियम मंगवाया. शाम के समय मां सुर लगातीं तो दादी मंत्रमुग्ध हो कर आंखें बंद कर बैठ जातीं और 2-3 गाने सुने बिना न उठती थीं.

हमारे भाई का जन्मदिन भी वे बड़े निराले तरीके से मनवातीं. न तो पार्टी न डांस, बस, मां का बनाया मिल्ककेक काटा जाता. दोपहर को बड़ेबड़े कड़ाहों और पतीलों में जाएकेदार कढ़ीचावल और शुद्ध देशी घी में हलवा बनवाया जाता. विशेष मेहमान होते अनाथाश्रम के प्यारेप्यारे बच्चे जो अपने आश्रय का सुरीला बैंड बजाते हुए पंक्तिबद्ध हो कर आते और बड़े ही चाव से कढ़ीचावल व हलवे के भोजन से तृप्त होते थे.

साथ ही, रिटर्नगिफ्ट के रूप में एकएक जोड़ी कपड़े ले कर जाते थे. उस के बाद होता था महल्ले के सभी लोगों का महाभोज. एक बड़े से दालान में बच्चेबड़े सभी भोजन करते थे. हम सब घर वाले तब तक पंगत से नहीं उठते थे जब तक सब तृप्त न हो जाते. हलकेफुलके हंसी के माहौल में भोज होता मानो एक विशाल पिकनिक चल रही हो.

मैं तब 10वीं कक्षा में थी. स्कूल से घर आई तो देखा दीदी रो रही हैं और मम्मी पास ही में रोंआसी सी खड़ी हैं. दीदी ने आगे पढ़ने के लिए जो विषय लिया था, उस के लिए उन्हें सहशिक्षा कालेज में दाखिला लेना था. पर पापा आज्ञा नहीं दे रहे थे. दादी उन दिनों हरिद्वार गई हुई थीं. दीदी ने चुपके से उन्हें फोन कर दिया.

दादी ने आते ही एक बार में ही पापा से हां करवा ली. उन्होंने पापा को सिर्फ एक बात कही, मीरा को हम सब ने मिल कर संस्कार दिए हैं. उन में क्या कुछ कमी रह गई है जो मीरा को उस कालेज में जाने से तू रोक रहा है. हमें अपनी मीरा पर पूरा भरोसा है. वह वहां पर लगन से पढ़ कर अच्छे अंक लाएगी और हमारा सिर ऊंचा करेगी. परोक्षरूप से उन्होंने मीरा दीदी को भी हिदायत दे दी थी और वास्तव में दीदी ने प्रथम रैंक ला कर घरपरिवार का नाम रोशन कर दिया. इसी क्षण टैक्सी के हौर्न की आवाज ने हमें यादों के झरोखों से बाहर निकाला.

टैक्सी रफ्तार पकड़े हुए थी. शीघ्र ही हम देहरादून पहुंच गए. घर में प्रवेश करते ही दादी के पार्थिव शरीर को देखते ही यत्न से दबाई हुई हिचकी तेज रुदन में बदल गई. सभी पहुंच चुके थे. बस, मेरा इंतजार हो रहा था. पापा ने मेरी पीठ पर हाथ फेरते हुए कहा, ‘‘मधु बेटी, इस प्रकार रो कर तुम अपनी दादी को दुखी कर रही हो. वे तो संसार के मायाजाल से मुक्त हुई हैं. एक 16 साल की विधवा का, साथ में एक दूधमुंहे बच्चे के साथ, इस संसाररूपी सागर को पार करना बहुत ही कठिन था. मुझे अपनी मां पर गर्व है. उन्होंने अपने आत्मसम्मान व इज्जत को गिरवी रखे बिना इस सागर को पार किया. वे तो स्वयंसिद्धा थीं. उन्होंने समाज की खोखली रूढि़यों, पाखंडों से दूर रह कर अपने रास्ते खुद बनाए. जो उन्हें अच्छा और सही लगा उसे ग्रहण किया और व्यर्थ की मान्यताओं को उन्होंने अपने मार्ग से हटा दिया. उन के मुक्तिपर्व को शोक में मत बदलो.’’

कुछ देर बाद दादी की अंतिमयात्रा आरंभ हो गई. बहुत बड़ी संख्या में लोग साथ थे. दादी की मृत्यु प्रक्रिया उन की इच्छानुसार की गई. न तो ब्राह्मण भोज हुआ न पुजारीपंडों को दान दिया गया. लगभग 200 गरीबों को भरपेट भोजन कराया गया और 1-1 कंबल उन्हें दानस्वरूप दिए गए. पापा ने दादी की इच्छानुसार अनाथाश्रम, महिला कल्याण घर और अस्पताल में 2-2 कमरे बनवा दिए.

देखतेदेखते दादी हम से बहुत दूर चली गईं. वे अपने पीछे छोड़ गईं संघर्षों का ऐसा अनमोल खजाना जो सभी नारियों के लिए एक सबक है कि कैसे कठिन से कठिनतम परिस्थितियों में भी अपने मानसम्मान व इज्जत को बचाते हुए आगे बढ़ें. वे इस युग की ऐसी महिला थीं जिस ने अपनी मृतप्राय जीवनबगिया को नवीन विचारों, दृढ़संकल्पों, कर्मठता व मेहनत के बलबूते फिर से हरीभरी बना दिया. वास्तव में वे स्वयंसिद्धा थीं.

Hindi Story: आत्मनिर्णय – आखिर आन्या ने अपनी मां की दूसरी शादी क्यों करवाई

Hindi Story, लेखक- मीरा जगनानी

मैंने आन्या के पापा को उस के पैदा होने के महीनेभर बाद ही खो दिया था. हरीश हमारे पड़ोसी थे. वे विधुर थे और हम एकदूसरे के दुखसुख में बहुत काम आते थे. हरीश से मेरा मन काफी मिलता था. एक बार हरीश ने लिवइन रिलेशनशिप का प्रस्ताव मेरे सामने रखा तो मैं ने कहा, ‘यह मुमकिन नहीं है.

आप के और मेरे दोनों के बच्चों पर बुरा असर पड़ेगा. पति को तो खो ही चुकी हूं, अब किसी भी कीमत पर आन्या को नहीं खोना चाहती. हम दोनों एकदूसरे के दोस्त हैं, यह काफी है.’ उस के बाद फिर कभी उन्होंने यह बात नहीं उठाई.

धीरेधीरे समय का पहिया घूमता रहा और आन्या अपनी पढ़ाई पूरी कर के नौकरी करने लगी. उसे बस से औफिस पहुंचने में करीब सवा घंटा लगता था. एक दिन अचानक आन्या ने आ कर मुझ से कहा, ‘‘मम्मी, बहुत दूर है. मैं बहुत थक जाती हूं. रास्ते में समय भी काफी निकल जाता है. मैं औफिस के पास ही पीजी में रहना चाहती हूं.’’

एक बार तो उस का प्रस्ताव सुन कर मैं सकते में आ गई, फिर मैं ने सोचा कि एक न एक दिन तो वह मुझ से दूर जाएगी ही. अकेले रह कर उस के अंदर आत्मविश्वास पैदा होगा और वह आत्मनिर्भर रह कर जीना सीखेगी, जोकि आज के जमाने में बहुत जरूरी है. मैं ने उस से कहा, ‘‘ठीक है बेटा, जैसे तुम्हें समझ में आए, करो.’’

3-4 महीने बाद उस ने मुझे फोन कर के अपने पास आने के लिए कहा तो मैं मान गई, और जब उस के दिए ऐड्रैस पर पहुंच कर दरवाजे की घंटी बजाई तो दरवाजे पर एक सुदर्शन युवक को देख कर भौचक रह गई. इस से पहले मैं कुछ बोलूं, उस ने कहा, ‘‘आइए आंटी, आन्या यहीं रहती है.’’

यह सुन कर मैं थोड़ी सामान्य हो कर अंदर गई. आन्या सोफे पर बैठ कर लैपटौप पर कुछ लिख रही थी. मुझे देखते ही वह मुझ से लिपट गई और मुसकराते हुए बोली, ‘‘मम्मी, यह तनय है, मैं इस से प्यार करती हूं. इसी से मुझे शादी करनी है. पर अभी ससुराल, बच्चे, रीतिरिवाज किसी जिम्मेदारी के लिए हम मानसिक, शारीरिक और आर्थिक रूप से परिपक्व नहीं हैं.

अलग रह कर रोजरोज मिलने पर समय और पैसे की बरबादी होती है. इसलिए हम ने साथ रह कर समय का इंतजार करना बेहतर समझा है. मैं जानती हूं अचानक यह देख कर आप को बहुत बुरा लग रहा है, लेकिन आप मुझ पर विश्वास रखिए, आप को मेरे निर्णय से कभी शिकायत का मौका नहीं मिलेगा.

‘‘और मैं यह भी जानती हूं, आप पापा के जाने के बाद बहुत अकेला महसूस कर रही हैं. आप हरीश अंकल से बहुत प्यार करती हैं. आप भी उन के साथ लिवइन में रह कर अपने अकेलेपन को दूर करें. फिर मुझे भी आप की ज्यादा चिंता नहीं रहेगी.’’

यह सब सुनते ही एक बार तो मुझे बहुत झटका लगा, फिर मैं ने सोचा कि आज के बच्चे कितने मजबूत हैं. मैं तो कभी आत्मनिर्णय नहीं ले पाई, लेकिन जीवन का इतना बड़ा निर्णय लेने में उस को क्यों रोकूं. तनय बातों से अच्छे संस्कारी परिवार का लगा. अब समय के साथ युवा बदल रहे हैं, तो हमें भी उन की नई सोच के अनुसार उन की जीवनशैली का स्वागत करना चाहिए.

उन पर हमारा निर्णय थोपने का कोई अर्थ नहीं है. और यह मेरी परवरिश का ही परिणाम है कि वह मुझ से दूसरे बच्चों की तरह छिपा कर कुछ नहीं करती. मैं ने तनय को अपने गले से लगाया कि उस ने आन्या के भविष्य की जिम्मेदारी अपने ऊपर ले कर मुझे मुक्त कर दिया है. मैं संतुष्ट मन से घर लौट आई और आते ही मैं ने हरीश के प्रस्ताव पर मुहर लगा दी.

Short Story: औरत का दर्द

Short Story, लेखक- सुधारानी श्रीवास्तव

‘‘मैडम, मेरा क्या कुसूर है जो मैं सजा भुगत रही हूं?’’ रूपा ने मुझ से पूछा. रूपा के पति ने तलाक का केस दायर कर दिया था. उसी का नोटिस ले कर वह मेरे पास केस की पैरवी करवाने आई थी.

उस के पति ने उस पर चरित्रहीनता का आरोप लगाया था. रूपा की मां उस के साथ आई थी. उस ने कहा कि रूपा के ससुराल वालों ने बिना दहेज लिए विवाह किया था. उन्हें सुंदर बहू चाहिए थी.

रूपा नाम के अनुरूप सुंदर थी. जब रूपा छोटी थी तब उस की मां की एक सहेली ने रूपा के गोरे रंग को देख कर शर्त लगाई थी कि यदि तुम्हें इस से गोरा दामाद मिला तो मैं तुम्हें 1 हजार रुपए दूंगी. उस ने जब पांव पखराई के समय रूपेश के गुलाबी पांव देखे तो चुपचाप 1 हजार रुपए का नोट रूपा की मां को पकड़ा दिया.

रूपेश का परिवार संपन्न था. वे ढेर सारे कपड़े और गहने लाए थे. नेग भी बढ़चढ़ कर दिए थे. रूपा के घर से उन्होंने किसी भी तरह का सामान नहीं लिया था. रूपा के मायके वाले इस विवाह की भूरिभूरि प्र्रशंसा कर रहे थे. रूपा की सहेलियां रूपा के भाग्य की सराहना तो कर रही थीं पर अंदर ही अंदर जली जा रही थीं.

हंसीखुशी के वातावरण में रूपा ससुराल चली गई. रूपा अपने सुंदर पति को देखदेख कर उस से बात करने को आकुल हुई जा रही थी, पर रूपेश उस की ओर देख ही नहीं रहा था. ससुराल पहुंच कर ढेर सारे रीतिरिवाजों को निबटातेनिबटाते 2 दिन लग गए. रूपा अपनी सास, ननद व जिठानियों से घिरी रही. उस के खानेपीने का खूब ध्यान रखा गया. फिर सब ने घूमने का कार्यक्रम बनाया. 10-12 दिन इसी में लग गए. इस बीच रूपेश ने भी रूपा से बात करने की कोई उत्सुकता नहीं दिखाई.

घूमफिर कर पूरा काफिला लौट आया. रूपा की सास ने वहीं से रूपा के पिता को फोन कर दिया था कि चौथी की रस्म के अनुसार रूपा को मायके ले जाएं. जैसे ही ये लोग लौटे, रूपा के पिता आ कर रूपा को ले गए. रूपा कोरी की कोरी मायके लौट आई. सास ने उस के पिता को कह दिया था कि वे लोग पुरानी परंपरा में विश्वास रखते हैं, दूसरे ही दिन शुक्र अस्त हो रहा है इसलिए रूपा शुक्रास्त काल में मायके में ही रहेगी.

रूपा 4 माह मायके रही. उस की सास और ननद के लंबेलंबे फोन आते. उन्हीं के साथ रूपेश एकाध बात कर लेता.

4 महीने बाद रूपेश के साथ सासननद आईं और खूब लाड़ जता कर रूपा को बिदा करा कर ले गईं. ननद ने अपना घर छोड़ दिया था और उस का तलाक का केस चल रहा था. वह मायके में ही रहती थी. इस बार रूपेश के कमरे में एक और पलंग लग गया था. डबल बेड पर रूपा अपनी ननद के साथ सोती थी व रूपेश अलग पलंग पर सोता था. रूपेश को उस की मां व बहन अकेला छोड़ती ही नहीं थीं जो रूपा उस से बात कर सके.

1-2 माह तक तो ऐसा ही चला. फिर ननद के दोस्त प्रमोद का घर आनाजाना बढ़ने लगा. धीरेधीरे सासननद ने रूपा को प्रमोद के पास अकेला छोड़ना शुरू कर दिया. रूपेश का तो पहले जैसा ही हाल था.

एक दिन जब रूपा प्रमोद के लिए चाय लाई तो उस ने रूपा का हाथ पकड़ कर अपने पास यह कह कर बिठा लिया, ‘‘अरे, भाभी, देवर का तो भाभी पर अधिकार होता है. मेरे साथ बैठो. जो तुम्हें रूपेश नहीं दे सकता वह मैं तुम्हें दूंगा.’’

रूपा किसी प्रकार हाथ छुड़ा कर भागी और उस ने सास से शिकायत की. सास ने प्रमोद को तो कुछ नहीं कहा, रूपा से ही बोलीं, ‘‘तो इस में हर्ज ही क्या है. देवरभाभी का रिश्ता ही मजाक का होता है.’’

रूपा सन्न रह गई. वह आधुनिक जरूर थी पर उस का परिवार संस्कारी था. और यहां तो संस्कार नाम की कोई चीज ही नहीं थी. प्रमोद की छेड़खानी बढ़ने लगी. उसे सास व ननद का प्रोत्साहन जो था. एक दिन रूपा ने चुपके से पिता को फोन कर दिया. मां की बीमारी का बहाना बना कर वे रूपा को मायके ले आए. रूपा ने रोरो कर अपनी मां जैसी भाभी को सबकुछ बता दिया तो परिवार वालों को संपन्न परिवार के ‘सुदर्शन सुपुत्र’ की नपुंसकता का ज्ञान हुआ. चूंकि यह ऐसी बात थी जिस से दोनों परिवारों की बदनामी थी, इसलिए वे चुप रहे. 1 माह बाद सासननद रूपेश को ले कर रूपा को लेने आईं तो रूपा की मां व भाभी ने उन्हें आड़े हाथों लिया. सास तमतमा कर बोलीं, ‘‘तुम्हारी लड़की का ही चालचलन ठीक नहीं है, हमारे लड़के को दोष देती है.’’

रूपा की मां बोलीं, ‘‘यदि ऐसा ही है तो अपने लड़के की यहीं डाक्टरी जांच करवाओ.’’

इस पर सासननद ने अपना सामान उठाया और गाड़ी में बैठ कर चली गईं. इस बात को लगभग 8-10 माह गुजर गए. रूपा के विवाह को लगभग 2 वर्ष हो चुके थे कि रूपेश की ओर से तलाक का केस दायर कर दिया गया था. रूपा के प्रमोद के साथ संबंधों को आधार बनाया गया था और प्रमोद को भी पक्षकार बनाया था, ताकि प्रमोद रूपा के साथ अपने संबंधों को स्वीकार कर रूपा को बदचलन सिद्घ कर सके.

मेरे लिए रूपा का केस नया नहीं था. इस प्रकार के प्रकरण मैं ने अपने साथी वकीलों से सुने थे और कई मामले सामाजिक संगठनों के माध्यम से सुलझाए भी थे. इस प्रकार के मामलों में 2 ही हल हुआ करते हैं या तो चुपचाप एकपक्षीय तलाक ले लो या विरोध करो. दूसरी स्थिति में औरत को अदालत में विरोधी पक्ष के बेहूदा प्रश्नों को झेलना पड़ता है. मैं ने रूपा से नोटिस ले लिया और उसे दूसरे दिन आने को कहा.

मैं ने प्रत्येक कोण से रूपा के केस पर सोचविचार किया. रूपा का अब ससुराल में रहना संभव नहीं था. वह जाए भी तो कैसे जाए. पति से ही ससुराल होती है और पति का आकर्षण दैहिक सुख होता है. इसी से वह नई लड़की के प्रति आकृष्ट होता है. जब यह आकर्षण ही नहीं तो वह रूपा में क्यों दिलचस्पी दिखाएगा. इसलिए रूपा को तलाक तो दिलवाना है किंतु उस के दुराचरण के आधार पर नहीं. औरत हूं न इसीलिए औरत के दर्द को पहचानती हूं.

सोचविचार कर मैं इस निष्कर्ष पर पहुंची कि अलग से नपुंसकता के आधार पर केस लगाने के बजाय मैं इसी में प्रतिदावा लगा दूं. हिंदू विवाह अधिनियम में इस का प्रावधान भी है. दोनों पक्षकार हिंदू हैं और विवाह भी हिंदू रीतिरिवाजों के अनुसार संपन्न हुआ है.

दूसरे दिन रूपा, उस की मां व भाभी आईं तो मैं ने उन्हें समझा दिया कि हम लोग उन के प्रकरण का विरोध करेंगे. साथ ही उसी प्रकरण में रूपेश की नपुंसकता के आधार पर तलाक लेंगे. इसलिए पहले रूपा की जांच करा कर डाक्टरी प्रमाणपत्र ले लिया जाए.

पूरी तैयारी के साथ मैं ने पेशी के दिन रूपा का प्रतिदावा न्यायालय में प्रस्तुत कर दिया. साथ ही एक आवेदन कैमरा प्रोसिडिंग का भी लगा दिया, जिस में सुनवाई के समय मात्र जज और पक्षकार ही रहें और इस प्रक्रिया का निर्णय कहीं प्रकाशित न हो.

जब प्रतिदावा रूपा की सासननद को मिला तो वे बहुत बौखलाईं. उन्हें अपने लड़के की कमजोरी मालूम थी. प्रमोद को इसीलिए परिचित कराया गया था ताकि रूपा उस से गर्भवती हो जाए तो रूपेश की कमजोरी छिप जाए और परिवार को वारिस मिल जाए.

मैं ने न्यायालय से यह भी आदेश ले लिया कि रूपेश की जांच मेडिकल बोर्ड से कराई जाए. इधरउधर बहुत हाथपैर मारने पर जब रूपा की सासननद थक गईं तो समझौते की बात ले कर मेरे पास आईं. रूपा के पिता भी बदनामी नहीं चाहते थे इसलिए मैं ने विवाह का पूरा खर्च व अदालत का खर्च उन से रूपा को दिलवा कर राजीनामा से तलाक का आवेदन लगवा दिया. विवाह होने से मुकदमा चलने तक लगभग ढाई वर्ष हो गए थे. रूपा को भी मायके आए लगभग डेढ़ वर्ष हो गए थे. इसलिए राजीनामे से तलाक का आवेदन स्वीकार हो गया. दोनों पक्षों की मानमर्यादा भी कायम रही.

इस निर्णय के लगभग 5-6 माह बाद मैं कार्यालय में बैठी थी. तभी रूपा एक सांवले से युवक के साथ आई. उस ने बताया कि वह उस का पति है, स्थानीय कालिज में पढ़ाता है. 2 माह पूर्व उस ने कोर्ट मैरिज की है. उस की मां ने कहा कि हिंदू संस्कार में स्त्री एक बार ही लग्न वेदी के सामने बैठती है इसलिए दोनों परिवारों की सहमति से उन की कोर्ट मैरिज हो गई. रूपा मुझे रात्रि भोज का निमंत्रण देने आई थी.

उस के जाने के बाद मैं सोचने लगी कि यदि मैं ने औरत के दर्द को महसूस कर यह कानूनी रास्ता न अपनाया होता तो बेचारी रूपा की क्या हालत होती. अदालत में दूसरे पक्ष का वकील उस से गंदेगंदे प्रश्न पूछता. वह उत्तर न दे पाती तो रूपेश को उस के दुराचारिणी होने के आधार पर तलाक मिल जाता. फिर उसे जीवन भर के लिए बदनामी की चादर ओढ़नी पड़ती. सासननद की करनी का फल उसे जीवन भर भुगतना पड़ता. जब तक औरत अबला बनी रहेगी उसे दूसरों की करनी का फल भुगतना ही पड़ेगा. समाज में उसे जीना है तो सिर उठा कर जीना होगा.

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