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Hindi Story: और भी हैं नोट छापने की मशीनें

Hindi Story: कुदरतउल्लाह ऐसा आदमी था, जिसे कहीं भी पहचाना जा सकता था. लंबे कद और दुबलेपतले शरीर वाले कुदरतउल्लाह की आंखें छोटीछोटी थीं और गालों की हड्डियां उभरी हुईं. उन उभरी हड्डियों के बीच में एक काला मस्सा था, जो किसी तालाब के टापू की तरह उभरा था, लेकिन माथा काफी ऊंचा था. उस की गरदन काफी छोटी, जो लंबे कद पर बड़ी विचित्र लगती थी. चपटी नाक के नीचे घनी मूछों की वजह से उस का चेहरा आम चेहरों से अलग लगता था. वह हुलिया भी ऐसा बनाए रहता था कि दूर से पहचान में आ जाता था.

कुल मिला कर उस का डीलडौल ऐसा था कि उस से मिलने आने वालों को उस के बारे में किसी से पूछने की जरूरत नहीं पड़ती थी. निसार चौधरी भी बिना किसी से कुछ पूछे उस के पास जा पहुंचे थे. कुदरतउल्लाह ने उन्हें नीचे से ऊपर तक देखते हुए पूछा, ‘‘आप की तारीफ?’’

‘‘मुझे निसार चौधरी कहते हैं.’’ निसार ने बिना इजाजत लिए सामने रखी कुरसी खींच कर बैठते हुए कहा, ‘‘आप के बारे में मुझे सब पता है. फरजंद अली ने मुझे सब बता दिया था.’’

‘‘मैं भी आप का ही इंतजार कर रहा था.’’ कुदरतउल्लाह ने अपने पतले होंठों पर मुसकराहट सजाने की नाकाम कोशिश करते हुए कहा, ‘‘फरजंद अली ने मुझे भी आप के बारे में सब बता दिया था.’’

‘‘इधरउधर की बातों में समय बेकार करने के बजाए सीधे काम की बात करनी चाहिए,’’ निसार ने कुदरतउल्लाह से चाय मंगाने का इशारा करते हुए कहा, ‘‘मुझे इस कारोबार में आए अभी 2 साल ही हुए हैं. वैसे तो मेरे पास अभी 4 मशीनें हैं, लेकिन उन में एक ही मशीन ऐसी है, जो ठीकठाक प्रोडेक्शन देती है. मैं ने यह बात फरजंद अली से कही तो उन्होंने आप के बारे में बताया कि आप के यहां तैयार मशीनें और कारखाने में तैयार मशीनों से अच्छा काम करती हैं.’’

‘‘मुझे जानने वालों का यही खयाल है.’’ कुदरतउल्लाह ने कहा, ‘‘इस समय मेरे पास 3 मशीनें हैं, जिन्हें मैं एक साथ बेचना चाहता हूं. जो आदमी तीनों मशीनें एक साथ खरीदेगा मैं उसी को बेचूंगा.’’

‘‘ऐसा क्यों?’’ निसार ने हैरानी से कहा, ‘‘भई मुझे तो 2 ही मशीनें चाहिए.’’

‘‘बाकी बची एक मशीन का मैं क्या करूंगा? दरअसल मैं अपना कारखाना कहीं और शिफ्ट करना चाहता हूं.’’

‘‘क्यों…? लोग बाहर से आ कर यहां कारखाने लगाते हैं और आप यह शहर छोड़ कर कहीं और जा रहे हो. मशीनें तैयार करने के लिए यहां जैसा कच्चा माल शायद कहीं और नहीं मिलेगा?’’

‘‘कच्चा माल तो वाकई यहां बड़ी आसानी से और सस्ता मिल जाता है, लेकिन यहां के कच्चे माल से तैयार की गई मशीनें जल्दी बिकती नहीं. लोग इन्हें कम ही खरीदते हैं. वजह शायद यह है कि यहां की मशीनें उन के दिल में नहीं उतरतीं.’’

‘‘खैर, यह लंबी बहस का विषय है,’’ निसार ने कहा, ‘‘चूंकि मैं पहली बार आप के यहां आया हूं, इसलिए मुझे मालूम नहीं कि आप की मशीनों की कीमत क्या है. अगर आप बताए तो…’’

‘‘कीमत मशीन के हिसाब से होती हैं. इस समय मेरे पास जो मशीनें हैं, उन में से केवल एक 20 हजार रुपए की है, बाकी की 2 मशीनें 50-50 हजार की हैं.’’

‘‘कीमत कुछ ज्यादा नहीं हैं?’’

‘‘ज्यादा नहीं हैं भाई, मैं बहुत कम बता रहा हूं.’’

‘‘इतनी रकम वसूलने में ही सालों लग जाएंगे. उस के बाद फायदे का नंबर आएगा.’’ निसार ने कहा, ‘‘मेरे पास जो मशीनें हैं, वे 10-15 हजार से ज्यादा की नहीं हैं.’’

‘‘इसीलिए तुम ऐसी बात कर रहे हो,’’ कुदरतउल्लाह ने कहा, ‘‘मेरी मशीनें ऐसी हैं, जिन के प्रोडेक्शन पर लोग गर्व करते हैं. 3-4 महीने में ही लाभ देने लगती हैं. मेरे साथ जो कारीगर काम करते हैं, उन्हें मेरी मशीनों का बहुत अच्छा अनुभव है.’’

‘‘मैं ने यह तो नहीं कहा कि तुम्हारी मशीनें फायदा नहीं देंगी.’’ निसार ने दबे लहजे में कहा, ‘‘लेकिन मेरे पास उतनी रकम नहीं हैं, जितनी तुम मांग रहे हो. तीनों मशीनों की कीमत एक लाख 20 हजार रुपए होती है ऊपर से आप तीनों मशीनें एक साथ बेचना चाहते हैं.’’

‘‘इस कारोबार में उधार बिलकुल नहीं चलता. वैसे भी मैं यह शहर ही छोड़ कर जा रहा हूं, इसलिए पैसे भी नकद चाहिए.’’

‘‘क्या तुम मुझे मशीनें दिखा सकते हो?’’

‘‘कारखानों में ले जा कर दिखाना तो मुश्किल है, क्योंकि कारखाना दिखाना हमारे उसूल के खिलाफ है.’’ कुदरतउल्लाह ने कहा, ‘‘मेरे पास मशीनों की तसवीरें हैं, उन्हें देख कर आप को अंदाजा हो जाएगा कि मेरे कारीगरों ने इन पर कितनी मेहनत की हैं.’’

निसार चौधरी कुदरतउल्लाह से तसवीरें ले कर एकएक कर के ध्यान से देखने लगा. वाकई उन मशीनों को तैयार करने में काफी मेहनत की गई थी. निसार ने तसवीरों को उस की ओर बढ़ाते हुए कहा, ‘‘ऐसा नहीं हो सकता कि अभी आप मुझ से 70 हजार रुपए ले लें और बाकी की रकम बाद में.’’

‘‘मेरी एक बात मानोगे?’’ कुदरतउल्लाह ने कहा.

‘‘एक नहीं, आप की 10 बातें मानूंगा.’’ निसार ने खुशदिली से कहा.

‘‘फरजंद अली आप का दोस्त है न?’’

‘‘हां, मेरे उन से बहुत अच्छे संबंध हैं.’’

‘‘तो ऐसा करो कि उधार करने के बजाए बाकी रकम उस से उधार ले कर दे दो.’’

‘‘भाई साहब, वह ऐसे ही रुपए नहीं देता, मोटा ब्याज लेता है. जबकि मैं ब्याज पर रकम ले कर कारोबार करना ठीक नहीं समझता. क्योंकि जो कमाई होगी, वह ब्याज अदा करने में ही चली जाएगी.’’

‘‘फिर तो आप का आना बेकार गया,’’ कुदरतउल्लाह ने कहा.

निसार चौधरी उठने ही वाले थे कि उस ने कुछ सोचते हुए कहा, ‘‘अच्छा, आप एक काम करो, 30 हजार रुपए का इंतजाम कर के एक लाख रुपए में सौदा कर लो. उस के बाद मुझे बता दो कि मशीनें कहां पहुंचानी है.’’

‘‘ठीक है कोशिश करता हूं. इस वक्त मेरे पास 50 हजार रुपए हैं, इन्हें रख लीजिए.’’ निसार ने 5 सौ रुपए की एक गड्डी निकाल कर कुदरतउल्लाह की ओर बढ़ाते हुए कहा, ‘‘बाकी रुपए मैं कल पहुंचा दूंगा.’’

‘‘आप शायद मेरी मजबूरी का फायदा उठाने की कोशिश कर रहे हैं?’’ कुदरतउल्लाह ने गड्डी जेब में रखते हुए कहा, ‘‘वैसे मशीनें कहां पहुंचानी होंगी?’’

‘‘बंदर रोड पर त्रिभुवनलाल जगमल का जो बोर्ड लगा है, उस के सामने वाली गली में मशीनें पहुंचानी हैं.’’ निसार ने कहा, ‘‘बाकी पैसे भी मैं वहीं दे दूंगा.’’

‘‘मशीनें कल रात 11 बजे पहुंच जाएंगी. लेकिन रुपए आप को दिन में देने होंगे. दोटांकी के पास एक शानदार कैफे है. कल दोपहर को मैं वहां पहुंच जाऊंगा. वहीं आ जाना.’’

‘‘क्या आप को मुझ पर विश्वास नहीं है.’’

‘‘यहां विश्वास की बात नहीं है. कारोबार के अपने नियम होते हैं. हमारा कारोबार परचून की दुकान नहीं है कि बेच कर पैसे अदा कर दोगे. इस कारोबार में लेनदेन का अपना अलग नियम है.’’ कुदरतउल्लाह ने एकएक शब्द पर जोर दे कर कहा, ‘‘अभी आप की मशीनें कहां लगी हैं?’’

‘‘मेरी मशीनें अच्छी जगहों पर लगी हैं. बड़ी मुश्किल से उन जगहों को मैं ने पगड़ी की मोटी रकम दे कर हासिल किया था. मुंबई में आजकल जगह की बड़ी कमी है. लोगों ने पहले से ही अच्छी जगहों पर कब्जा जमा रखा है.’’

‘‘मेरे पास अपनी एक जगह भी है, अगर आप वहां अपनी मशीन लगाना चाहें तो…?’’

‘‘उस जगह के भी आप मुंहमांगे दाम लेंगे?’’

‘‘नहीं, ऐसी बात नहीं है,’’ कुदरतउल्लाह ने मुसकराने की कोशिश करते हुए कहा, ‘‘अगर आप चाहें तो मैं उसे किराए पर भी दे सकता हूं. किराया आप मेरे घर पहुंचा दिया करना.’’

‘‘जगह की बात मैं अभी नहीं कर सकता. इस बारे में फरजंद अली से मेरी बात चल रही है. उस के पास भी अच्छी…’’

‘‘अगर फरजंद अली से आप की बात चल रही है तो ठीक है.’’ कुदरतउल्लाह ने निसार की बात काटते हुए कहा, ‘‘चलो, अब चला जाए. सौदा तय हो ही गया है.’’

दोनों कमरे से बाहर आए तो उन का स्वागत ट्रैफिक के शोर ने किया. वे दोनों फुटपाथ पर आ कर खडे हो गए. निसार ने कहा, ‘‘आप  कहां से बस पकड़ोगे?’’

‘‘मुझे तो उस सामने के चौराहे से बस मिल जाएगी.’’ कुदरतउल्लाह ने सामने इशारा करते हुए कहा, ‘‘और आप को?’’

‘‘चलिए पहले आप को बस पर बैठा दूं.’’

‘‘इस की कोई जरूरत नहीं है. मैं चला जाऊंगा.’’ कुदरतउल्लाह ने लालबत्ती की ओर देखते हुए कहा.

‘‘इंसानियत के भी कुछ फर्ज होते हैं जनाब,’’ निसार चौधरी ने गंभीरता से कहा.

फुटपाथ के दाईं ओर एक पतली सी गली के नुक्कड़ पर एक जूस की दुकान के जगमग करते बोर्ड के पास वाले खंभे पर पोलियो से सुरक्षित रखने के संदेश वाला बोर्ड टंगा था. कुदरतउल्लाह उसे ध्यान से पढ़ने लगा, इसलिए उस ने निसार को जवाब में कुछ नहीं कहा. दोनों खामोशी से आगे बढ़ने लगे. जैसे ही वे चौराहे पर पहुंचे तो मसजिद में अजान की आवाज सुनाई दी.

‘‘मेरा खयाल है, कहीं आसपास ही मसजिद है?’’ कुदरतउल्लाह ने निसार की ओर देखते हुए कहा.

‘‘हम लोग जहां जा रहे हैं, उसी चौराहे के दाईं ओर मसजिद है.’’

‘‘तो पहले वहीं चलें…’’

तभी दर्द में डूबी एक आवाज सुनाई दी, ‘‘अल्लाह के नाम पर कुछ दे दे बाबा.’’

‘‘चलो हरी बत्ती हो गई है.’’ चौधरी ने आगे बढ़ते हुए कहा तो कुदरतउल्लाह का ध्यान भंग हुआ.

कुदरतउल्लाह रुक गया. उस के सामने थोड़ी दूर पर 10-11 साल का एक लड़का चौराहे के कोने में गंदे से कपड़े पर लेटा था. उस के दोनों पैर घुटनों से नीचे लकड़ी की तरह सूखे हुए थे. बायां हाथ भी लकड़ी जैसा हो गया था.

उस मासूम का ऊपरी होंठ आधे से अधिक कटा हुआ था, जिस से उस के पीलेपीले दांत नजर आ रहे थे. उस की एक आंख का पपोटा कटा हुआ था, जिस से उस की आंख बड़े भयानक अंदाज में बाहर निकली हुई थी. उसे देख कर घृणा और दया के भाव गड्डमड्ड हो रहे थे.

कुदरतउल्लाह ने उस लड़के की ओर अंगुली से इशारा करते हुए कहा, ‘‘इसे देख रहे हो चौधरी?’’

‘‘हां हां, देख रहा हूं.’’

‘‘यह मेरे कारखाने की तैयार की हुई मशीन हैं.’’ कुदरतउल्लाह ने गर्व से सीना फुलाते हुए कहा, ‘‘यह मशीन पिछले साल मैं ने ही फरजंद अली को बेची थी. यह सुबह से देर रात तक बड़ी आसानी से हजार 2 हजार रुपए छाप लेती है. तुम्हें जो 2 मशीन दे रहा हूं वे भी इस मशीन से किसी भी तरह कम नहीं हैं. अगर तुम उन्हें अच्छी जगह फिट कर दोगे तो वे भी इसी तरह नोट छापेंगी.’’ Hindi Story

Best Hindi Story: तलाक – जाहिरा को शादाब ने क्यों छोड़ दिया

Best Hindi Story: रात का सारा काम निबटा कर जब जाहिरा बिस्तर पर जा कर सोने की कोशिश कर रही थी, तभी उस के मोबाइल फोन की घंटी शोर करने लगी. जाहिरा बड़बड़ाते हुए बिस्तर से उठी, ‘‘सारा दिन काम करते हुए बदन थक कर चूर हो जाता है. बेटा अलग परेशान करता है. ननद बैठीबैठी और्डर जमाती है… न दिन को चैन, न रात को आराम…’’ फिर वह मोबाइल फोन पर बोली, ‘‘हैलो, कौन?’’ ‘मैं शादाब, तुम्हारा शौहर,’ उधर से आवाज आई.‘‘जी…’’ कहते हुए जाहिरा खुशी से उछल पड़ी, ‘‘जी, कैसे हैं आप?’’ ‘मैं ठीक हूं. मेरी बात ध्यान से सुनो. मैं तुम्हें तलाक दे रहा हूं. आज से मेरातुम्हारा मियांबीवी का रिश्ता खत्म. मैं यह बात अम्मी और खाला के सामने बोल रहा हूं. तुम आज से आजाद हो. मेरे घर में रहने का तुम्हें कोई हक नहीं है. बालिग होने पर मेरा बेटा मेरे पास आ जाएगा,’ कह कर शादाब ने मोबाइल फोन काट दिया.

‘‘सुनिए… सुनिए…’’ जाहिरा ने कई बार कहा, पर मोबाइल फोन बंद हो चुका था.

जाहिरा ने नंबर मिला कर बात करनी चाही, पर शादाब का मोबाइल फोन बंद मिला. जाहिरा को अपने पैरों के नीचे की जमीन खिसकती नजर आई. आंसुओं की झड़ी लग गई. बिस्तर पर उस का एक साल का बेटा बेसुध सोया था. उसे देख कर जाहिदा के आंसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे.

जाहिरा दौड़ीदौड़ी अपने ससुर हसन मियां के कमरे में पहुंची. उस की सास शादाब के पास दुबई में थीं. जाहिरा ने दरवाजे के बाहर से आवाज दी, ‘‘अब्बू, दरवाजा खोलिए…’’

‘‘क्या बात है? क्यों चीख रही है?’’ शादाब के अब्बू हसन मियां ने कहा.

‘‘अब्बू…’’ लड़खड़ाते हुए जाहिरा ने कहा ‘‘शादाब ने मुझे फोन पर तलाक दे दिया है,’’ इतना कह कर वह रो पड़ी.

‘‘तो मैं क्या करूं…? यह तुम मियांबीवी के बीच का मामला है. तुम जानो और तुम्हारा शौहर…’’ कह कर हसन मियां ने दरवाजा बंद कर लिया. जाहिरा रोतेरोते अपने कमरे में आ गई.

रात यों ही बीत गई. सुबह जाहिरा ने उठ कर देखा कि रसोईघर के दरवाजे पर ताला लटक रहा था. वह परेशान हो गई और पड़ोसियों को पूरी बात बताई. पर पड़ोसी हसन मियां के पक्ष में थे. वह मन मार कर लौट आई. पड़ोस में रहने वाली विधवा चाची ने जाहिरा को समझाया, ‘‘बेटी, तू फिक्र न कर. मसजिद के हाफिज के पास जा. शायद, वहां इस मसले का कोई हल निकले.’’

उस इलाके की मसजिद के सारे खर्चे माली मदद से चलते थे. हसन मियां मसजिद के सदर थे. हाफिज के पास जाहिरा की शिकायत बेकार साबित हुई. उन्होंने कहा कि शौहर ने तलाक दे दिया है, अब कुछ नहीं हो सकता.

जाहिरा ने कहा, ‘‘हाफिज साहब, फोन पर दिया गया तलाक नाजायज है. मेरी कोई गलती नहीं है. न शौहर से कोई अनबन, अचानक मुझे तलाक…’’ कह कर वह रो पड़ी, ‘‘मेरी गोद में उन का ही बच्चा है. इस की परवरिश कैसे होगी? मेरा क्या कुसूर है? ‘‘शरीअत में ऐसा कुछ नहीं है. आप एक औरत पर जुल्म ढा रहे हैं. मर्द की हर बात अगर जायज है, तो औरत की भी जायज मानो.’’

जाहिरा मौलवी को खूब खरीखोटी सुना कर वापस आ गई और शौहर के खिलाफ कोर्ट में जाने का मन बना लिया. घर आ कर जाहिरा ने देखा कि घर के बाहर दरवाजे पर ताला लटक रहा था. बिना कुछ कहे वह अपने बेटे को मायके ले कर आ गई. घर पर मांबाप को सारी बात बता कर उस ने तलाक के खिलाफ आवाज उठाने का मन बना लिया

और फिर समाज के उन मुल्लाहाफिजों के खिलाफ मोरचा खोल दिया, जो शरीअत के नाम पर लोगों पर दबाव बनाते हैं. ‘‘देहात की गंवार औरत को तुम्हारे गले से बांध दिया था. कहां तुम पढ़ेलिखे खूबसूरत जवान, कहां वह देहातीगंवार… ज्वार के दाने में उड़द का बीज…’’ कह कर शादाब की खाला खिलखिला उठीं.

‘‘शादाब और रेहाना की जोड़ी लगती ठीक है. पढ़ीलिखी बीवी कम से कम अंगरेजी में बात तो कर सकेगी. क्यों आपा, ठीक कह रही हूं न मैं?’’

शादाब की खाला ने अपनी बेटी के कसीदे पढ़ने चालू किए. शादाब की मां ने भी उन की हां में हां मिलाई. शादाब की मां हमीदा बानो की छोटी बहन नूर अपनी बेटी रेहाना को ले कर पिछले 2 महीने से दुबई आई थीं. उन्हें 3 महीने का वीजा मिला था. रेहाना एमए की छात्रा थी. वह अपने मांबाप की एकलौती औलाद थी, जिसे लाड़प्यार से पाला गया था.

चुलबुली, खूबसूरत रेहाना ने अपनी मां की शह पा कर शादाब पर डोरे डालने शुरू किए थे, यह जानते हुए भी कि वह शादीशुदा है. ‘‘पर अम्मी, शादाब तो एक बच्चे का बाप है. मैं उस से निकाह कैसे करूंगी?’’ रेहाना ने अपनी अम्मी से पूछा.

‘‘तू फिक्र मत कर. अगर शादाब तेरा शौहर बन गया, तो तू मजे करेगी. विदेश में रहेगी. तू हवाईजहाज से आनाजाना करेगी. ‘‘तू मालामाल हो जाएगी और हमारी गरीबी भी दूर हो जाएगी. बड़ी नौकरी है शादाब की. उस की जायदाद हमारी. तू किसी न किसी तरह उसे अपने वश में कर ले,’’ रेहाना की अम्मी ने समझाया.

और फिर उन्होंने ऐसा जाल बिछाया कि उस में मांबेटा उलझ कर रह गए. ‘‘रेहाना, अम्मी कहां हैं?’’ एक दिन दफ्तर से लौट कर शादाब ने पूछा. ‘‘वे पड़ोस में गई हैं. देर रात तक लौटेंगी. वहां उन की दावत है. मेरी अम्मी भी साथ गई हैं.’’

‘‘तुम क्यों नहीं गईं?’’

‘‘आप की वजह से नहीं गई.’’

रेहाना चाय ले कर शादाब के कमरे में पहुंची, जहां वह लेटा हुआ था. आज रेहाना ने ऐसा सिंगार कर रखा था कि शादाब उसे देख कर सुधबुध खो बैठा. चाय दे कर वह उस के करीब बैठ गई. इत्र की भीनीभीनी खुशबू से महकती रेहाना ने रोमांस भरी बातें करना शुरू किया. शादाब भी उस की बातों का लुत्फ लेने लगा. उस ने रेहाना को अपने सीने से लगाना चाहा, तो बगैर किसी डर के वह शादाब की बांहों में सिमट गई. फिर वे दोनों हवस के गहरे समुद्र में डुबकी लगाने लगे. जब जी भर गया, तो एकदूसरे को देख कर शरमा गए.

जब तक रेहाना वहां रही, शादाब उसे महंगे से महंगा सामान दिलाने लगा. जवानी के जोश में वह सबकुछ भूल गया. अब उसे सिर्फ रेहाना दिखती थी. वह अपनी बीवी को तलाक दे कर रेहाना को बीवी बनाने के सपने देखने लगा था. वक्त तेजी से गुजर रहा था. रेहाना के वीजा की मीआद खत्म होने वाली थी. शादाब ने रेहाना से जल्द निकाह करने का वादा किया.

रेहाना अपनी अम्मी के साथ दुबई में रहने के सपने संजोए भारत वापस आ गई. शादाब ने खाला से 2 महीने के अंदर रेहाना से निकाह करने की अपनी मंशा जाहिर की, तो खाला ने भी खुशीखुशी अपनी रजामंदी जाहिर की.

कुछ वक्त बीत जाने पर जाहिरा ने शहर की बड़ी मसजिद में शादाब के द्वारा दिए गए तलाक के बारे में शिकायत पेश की, जिस की सुनवाई आज होनी थी. जाहिरा ने कमेटी के सामने, जहां काजी, आलिम, हाफिज, बड़ेबड़े मौलाना सदस्य थे, अपनी बात रखी. उन्होंने बड़े गौर से जाहिरा की फरियाद सुनी.

इस से पहले शादाब को मांबाप के साथ कमेटी के सामने हाजिर होने की इत्तिला भेजी गई थी, पर वे नहीं आए. अपने रसूख का इस्तेमाल करते हुए उन्होंने कमेटी पर दबाव डालना चाहा था. वे तकरीबन 6 महीने तक कमेटी को चकमा देते रहे थे, बारबार के बुलावे पर भी नहीं आए थे. इस बात को ध्यान में रख कर कमेटी ने कड़ा फैसला लिया और उन्हें जमात से बेदखल करने के साथ कानूनी कार्यवाही करने का फैसला लिया.

आज मसजिद में काफी गहमागहमी थी. कार्यवाही शुरू हुई. शादाब, उस के अब्बू व दूसरे रिश्तेदार हाजिर थे. कमेटी के सदर ने शादाब से पूछा, ‘‘किस वजह से तुम ने अपनी बीवी जाहिरा को तलाक दिया है?’’

‘‘इस के अंदर शहर में रहने की काबिलीयत नहीं है. यह पढ़ीलिखी भी नहीं है. अंगरेजी नहीं जानती है. इसे ढंग से खाना बनाना तक नहीं आता है.’’

‘‘बेटी, तुम बताओ कि शादाब मियां जोकुछ कह रहे हैं, वह सही है या गलत?’’ सदर ने पूछा.

‘‘बिलकुल झूठ है. हमारी शादी को 3 साल हो गए हैं. मैं एक बच्चे की मां बन गई हूं. मैं इन की हर बात मानती हूं. मैं ने पूरी 7 जमात पढ़ी है. ‘‘इन के मांबाप व रिश्तेदार मुझे पसंद कर के लाए थे. हम ने भरपूर दहेज दिया था. अभी तक सब ठीकठाक चल रहा था, पर अचानक इन्होंने मुझे फोन पर तलाक दे दिया.’’

‘‘फोन पर तलाक…?’’ कमेटी के सभी सदस्य जाहिरा की यह बात सुन कर सकते में आ गए. उन्होंने आपस में सोचविचार कर के फैसला दिया, ‘यह तलाक नाजायज है. न तलाक देने की ठोस वजह है, न ही तलाक आमनेसामने बैठ कर दिया गया है. एकतरफा तलाक जायज नहीं है.

‘शादाब मियां के तलाक को गैरकानूनी मान कर खारिज किया जाता है. जाहिरा आज भी उन की बीवी हैं. उन्हें अपनी बीवी को सारे हक देने पड़ेंगे. साथ में रखेंगे. कोई तकलीफ नहीं देंगे, वरना यह कमेटी इन पर तलाक के बहाने औरत पर जुल्म करने का मामला दायर करेगी…’ इतना फरमान सुना कर जमात उठ गई. Best Hindi Story

Family Story in Hindi: सौतेला बरताव – चंपा क्यों बनी देहधंधे वाली

Family Story in Hindi: चंपा को देह धंधा करने के आरोप में जेल हो गई. वह रंगे हाथ पकड़ी गई थी. वह जेल की सलाखों में उदास बैठी हुई थी. चंपा के साथ एक अधेड़ औरत भी बैठी हुई थी. थोड़ी देर पहले पुलिस उसे भी इस बैरक में डाल गई थी. चंपा जिस होटल में देह धंधा करती थी, उसी होटल में पुलिस ने छापा मारा था और उसे रंगे हाथ पकड़ लिया था. आदमी तो भाग गया था, मगर पुलिस वाला उसे दबोचते हुए बोला था, ‘चल थाने.’ ‘नहीं पुलिस बाबू, मुझे माफ कर दो…’ वह हाथ जोड़ते हुए बोली थी, ‘अब नहीं करूंगी यह धंधा.’ ‘वह आदमी कौन था?’ पुलिस वाला उसी अकड़ से बोला था. ‘मुझे नहीं मालूम कि वह कौन था?’ वह फिर हाथ जोड़ते हुए बोली थी. ‘झूठ बोलती है. चल थाने, सारा सच उगलवा लूंगा.’ ‘मुझे छोड़ दीजिए.’‘हां, छोड़ देंगे. लेकिन तू ने उस ग्राहक से कितने पैसे लिए हैं?’ ‘कुछ भी नहीं दे कर गया.’‘झठ कब से बोलने लगी? चल थाने?’ ‘छोड़ दीजिए, कहा न कि अब कभी नहीं करूंगी यह धंधा.’

‘करेगी… जरूर करेगी. अगर करना ही है, तो लाइसैंस ले कर कोठे पर बैठ. फिर हम तुझ से कुछ नहीं कहेंगे…’ हवलदार थोड़ा नरम पड़ते हुए बोला था, ‘तुझे छोड़ सकता हूं, मगर अंटी में जितने पैसे हैं, निकाल कर मुझे दे दे.’

‘साहब, आज तो मेरी अंटी में कुछ भी नहीं है,’ वह बोली थी.

‘ठीक है, तब तो एक ही उपाय है… जेल,’ फिर वह पुलिस वाला उसे पकड़ कर थाने ले गया था.

चंपा दीवार के सहारे चुपचाप बैठी हुई थी. वह अधेड़ औरत न जाने कब से उसे घूर रही थी. आखिरकार वह अधेड़ औरत बोली, ‘‘ऐ लड़की, तू कौन है?’’

तब चंपा ने अपना चेहरा ऊपर कर उस अधेड़ औरत की तरफ देखा, मगर जवाब कुछ नहीं दिया.

वह अधेड़ औरत जरा नाराजगी से बोली, ‘‘सुना नहीं? बहरी है क्या?’’

‘‘हां, पूछो?’’ चंपा ने कहा.

‘‘क्या अपराध किया है तू ने?’’

‘‘मैं ने वही अपराध किया है, जो तकरीबन हर औरत करती है?’’

‘‘क्या मतलब है तेरा? गोलमोल बात क्यों कर रही है, सीधेसीधे कह न,’’ वह अधेड़ औरत गुस्से से बोली.

‘‘मुझे देह धंधा करने के आरोप में पकड़ा गया है.’’

‘‘शक तो मुझे पहले से ही था. अरे, जिस पुलिस वाले ने तुझे पकड़ा है, उस के मुंह पर नोट फेंक देती.’’

‘‘अगर मेरे पास पैसे होते, तो उस के मुंह पर मैं तभी फेंक देती.’’

‘‘तुम ने यह धंधा क्यों अपनाया?’’

‘‘क्या करोगी जान कर?’’

‘‘मत बता, मगर मैं सब जानती हूं.’’

‘‘क्या जानती हैं आप?’’

‘‘औरत मजबूरी में ही यह धंधा अपनाती है.’’

‘‘नहीं, गलत है. मैं मजबूरी में वेश्या नहीं बनी, बल्कि बनाई गई हूं.’’

‘‘कैसे? अपनी कहानी सुना.’’

‘‘हां सुना दूंगी, मगर आप इस उम्र में जेल में क्यों आई हो?’’

‘‘मेरी बात छोड़, मेरा तो जेल ही घर है,’’ उस अधेड़ औरत ने कहा.

‘‘आप आदतन अपराधी हैं?’’

‘‘यही समझ ले…’’ उस अधेड़ औरत ने गहरी सांस ले कर कहा, ‘‘फिर भी सुनना चाहती है तो सुन. मैं अफीम की तस्करी करती थी. अब सुना तू अपनी कहानी.’’

चंपा की कहानी कुछ इस तरह थी:

चंपा के पिता मजदूर थे. उन का नाम मांगीलाल था. उन्होंने रुक्मिणी नाम की औरत से शादी की थी.

शादी के 2 साल गुजर गए थे. एक दिन पिता मांगीलाल को पता चला कि रुक्मिणी मां बनने वाली है. उन की खुशियों का ठिकाना न रहा.

रुक्मिणी को बांहों में भरते हुए वे बोले थे, ‘पहला बच्चा लड़का होना चाहिए…’

‘यह मेरे हाथ में है क्या?’ रुक्मिणी उन्हें झिड़कते हुए बोली थी.

9 महीने बाद जब चंपा पैदा हुई, तो 4 दिन बाद उस की मां मर गई. पिता के ऊपर सारी जवाबदारी आ पड़ी. रिश्तेदार कहने लगे कि पैदा होते ही यह लड़की मां को खा गई. तब मौसी ने उसे पाला.

मां के मरने पर पिता टूट गए थे. वे उदासउदास से रहने लगे थे. तब अपना गम भुलाने के लिए वे शराब पीने लगे थे. रिश्तेदारों और उन के बड़े भाई ने खूब कहा कि दोबारा शादी कर लो, मगर वे तैयार नहीं हुए थे.

धीरेधीरे चंपा मौसी की गोद में बड़ी होती गई. जब वह 5 साल की हो गई, तब उसे स्कूल में भरती करा दिया गया. पिता को दोबारा शादी के प्रस्ताव आने लगे. चारों तरफ से दबाव भी बनने लगा.

एक दिन पिता के बड़े भाई भवानीराम और उन की पत्नी तुलसाबाई आ धमके. आते ही भवानीराम बोले, ‘ऐसे कैसे काम चलेगा मांगीलाल?’

‘क्या कह रहे हैं भैया?’ मांगीलाल ने पूछा.

‘सारी जिंदगी यों ही बैठे रहोगे?’ भवानीराम ने दबाव डालते हुए कहा.

‘आप कहना क्या चाहते हो भैया?’

‘अरे देवरजी…’ तुलसाबाई मोरचा संभालते हुए बोली, ‘देवरानी को गुजरे 6-7 साल हो गए हैं. अब उस की याद में कब तक बैठे रहोगे? चंपा भी अब बड़ी हो रही है.’

‘भाभी, मेरा मन नहीं है शादी करने का,’ मांगीलाल ने साफ इनकार कर दिया था.

‘मैं पूछती हूं कि आखिर मन क्यों नहीं है?’ दबाव डालते हुए तुलसाबाई बोली, ‘यों देवरानी की याद करने से वह वापस तो नहीं आ जाएगी. फिर शादी कर लोगे, तो देवरानी के गम को भूल जाओगे.’

‘नहीं भाभी, मैं ने कहा न कि मुझे शादी नहीं करनी है.’

‘क्यों नहीं करनी है? हम तेरी शादी के लिए आए हैं. और हां, तेरी हां सुने बगैर हम जाएंगे नहीं,’ भैया भवानीराम ने हक से कहा, ‘हम ने तेरे लिए लड़की भी देख ली है. लड़की इतनी अच्छी है कि तू रुक्मिणी को भूल जाएगा.’

‘नहीं भैया, मैं चंपा के लिए सौतेली मां नहीं लाऊंगा,’ एक बार फिर इनकार करते हुए मांगीलाल बोला.

‘कैसी बेवकूफों जैसी बातें कर रहा है. जिन की औरत भरी जवानी में ही चली जाती है, तब वे दोबारा शादी नहीं करते हैं क्या?’

‘अरे देवरजी, यह क्यों भूल रहे हो कि चंपा को मां मिलेगी. कब तक मौसी उस की देखरेख करती रहेगी? इस बात को दिमाग से निकाल फेंको कि हर मां सौतेली होती है. जिस के साथ हम तुम्हारी शादी कर रहे हैं, वह ऐसी नहीं है. चंपा को वह अपनी औलाद जैसा ही प्यार देगी?’

‘भाभी, आप लोग क्यों मेरे पीछे पड़े हुए हो?’

‘बिना औरत के आदमी का घर नहीं बसता है और हम तेरा घर बसाना चाहते हैं. लड़की हम ने देख ली है. एक बात कान खोल कर सुन ले, हम तेरी शादी करने के लिए आए हैं. इनकार तो तुम करोगे नहीं. बस, तैयार हो जाओ,’ कह कर भवानीराम ने बिना कुछ सुने फैसला सुना दिया.

मांगीलाल को भी हार माननी पड़ी. भैयाभाभी ने जो लड़की पसंद की थी, उस का नाम कलावती था. मान न मान मैं तेरा मेहमान की तरह कलावती के साथ उस की शादी कर दी गई.

जब तक कलावती की पहली औलाद न हुई, तब तक उस ने चंपा को यह एहसास नहीं होने दिया कि वह उस की सौतेली मां है. मगर बच्चा होने के बाद वह चंपा को बातबात पर डांटने लगी. उस का स्कूल छुड़वा दिया गया. वह उस से घर का सारा काम लेने लगी.

पिता भी नई मां पर ज्यादा ध्यान देने लगे. इस तरह नई मां ने पिता को अपने कब्जे में कर लिया. धीरेधीरे चंपा बड़ी होने लगी. लड़के उसे छेड़ने लगे.

कलावती भी उसे देख कर कहने लगी, ‘लंबी और जवान हो गई है. कब तक हमारे मुफ्त के टुकड़े तोड़ती रहेगी. कोई कामधंधा कर. कामधंधा नहीं मिले, तो किसी कोठे पर जा कर बैठ जा. तेरी जवानी तुझे कमाई देगी.’

चंपा के पिता जब शादी की बात चलाते, तब सौतेली मां कहती, ‘कहां शादी के चक्कर में पड़ते हो. चंपा अब बड़ी हो गई है. साथ ही, जवान भी. रूप भी ऐसा निखरा है कि अगर इसे किसी कोठे पर बिठा दो, तो खूब कमाई देगी.’

तब पिता विरोध करते हुए कहते, ‘जबान से ऐसी गंदी बात मत निकालना. क्या वह तुम्हारी बेटी नहीं है?’

‘‘मेरी पेटजाई नहीं है वह. आखिर है तो सौतेली ही,’ कलावती उसी तरह जवाब देती.

पिता को गुस्सा आता, मगर वह उन्हें भी खरीखोटी सुना कर उन की जबान बंद कर देती थी. इस गम में पिता ज्यादा शराब पीने लगे. रातदिन की चकचक से तंग आ कर चंपा ने कोई काम करने की ठान ली. मगर सौतेली मां तो उस से देह धंधा करवाना चाहती थी.

आखिर में चंपा ने भी अपनी सौतेली मां की बात मान ली. जिस होटल में वह धंधा करती थी, वहीं सौतेली मां ग्राहक भेजने लगी. ग्राहक से सारे पैसे सौतेली मां झटक लेती थी.

चंपा ने उस अधेड़ औरत के सामने अपना दर्द उगल दिया.

थोड़ी देर के सन्नाटे के बाद वह अधेड़ औरत बोली, ‘‘तेरी कहानी बड़ी दर्दनाक है. आखिर सौतेली मां ने अपना सौतेलापन दिखा ही दिया.’’

चंपा कुछ नहीं बोली.

‘‘अब क्या इरादा है? तेरी सौतेली मां तुझे छुड़ाने आएगी?’’ उस अधेड़ औरत ने पूछा.

‘‘नहीं, मैं तो अब जेल में ही रहना चाहती हूं. उस सौतेली मां की सूरत भी नहीं देखना चाहती हूं.’’

‘‘तू भले ही मत देख, मगर तेरी सौतेली मां तुझ से पैसा कमाएगी, इसलिए तुझे छुड़ाने जरूर आएगी,’’ अपना अनुभव बताते हुए वह अधेड़ औरत बोली.

‘‘मगर, अब मैं घर छोड़ कर भाग जाऊंगी?’’

‘‘भाग कर जाएगी कहां? यह दुनिया बहुत बड़ी है. यह मर्द जात तुझे अकेली देख कर नोच लेगी. मैं कहूं, तो तू किसी अच्छे लड़के से शादी कर ले.’’

‘‘कौन करेगा मुझ से शादी? बस्ती के सारे बिगड़े लड़के मुझ से शादी नहीं मेरा जिस्म चाहते हैं. वैसे भी मैं बदनाम हो गई हूं. अब कौन करेगा शादी?’’

‘‘हां, ठीक कहती हो…’’ कह कर वह अधेड़ औरत खामोश हो गई. कुछ पल सोच कर वह अधेड़ औरत बोली, ‘‘हम औरतों के साथ यही परेशानी है. देख न मुझे भी मेरी जवानी का फायदा उठा कर तस्करी का काम दिया, ताकि औरत देख कर कोई शक नहीं करे. मगर जब पैसे मिलने लगे, तब धंधा मुझे रास आ गया. इस का नतीजा देख रही हो, आज मैं जेल में हूं.’’

फिर दोनों के बीच काफी देर तक सन्नाटा पसरा रहा. तभी एक पुलिस वाले ने ताला खोलते हुए कहा, ‘‘बाहर निकल. तेरी मां ने जमानत दे दी है.’’

चंपा ने देखा कि उस की मां कलावती खड़ी थी. वह गुस्से में बोली, ‘‘तू चुपचाप धंधा करती रही और मुझे बदनाम कर दिया. सारी बस्ती वाले मुझ पर थूक रहे हैं. आखिर मैं तेरी सौतेली मां हूं न, बदनाम तो होना ही है. वैसे भी सौतेली मां तो बदनाम ही रहती है.

‘‘चल, निकल बाहर. अब कभी धंधा किया न, तो तेरी खाल खींच लूंगी. मां हूं तेरी, भले ही सौतेली सही. मैं ने जमानत दे दी है.’’

चंपा कुछ नहीं बोली. वह अपनी सौतेली मां के साथ हो ली. वह जानती थी कि यह केवल लोकलाज का दिखावा है. अब यह कैसी साहूकार बन रही है. उलटा चोर कोतवाल को डांट कर. Family Story in Hindi

Hindi Kahani: मुट्ठीभर बेर – माया ने मन में क्या ठान रखा था

Hindi Kahani: घने बादलों को भेद, सूरज की किरणें लुकाछिपी खेल रही थीं. नीचे धरती नम होने के इंतजार में आसमान को ताक रही थी. मौसम सर्द हो चला था. ठंडी हवाओं में सूखे पत्तों की सरसराहट के साथ मिली हुई कहीं दूर से आ रही हुआहुआ की आवाज ने माया को चौकन्ना कर दिया. माया आग के करीब ठिठक कर खड़ी हो गई. घने, उलझे बालों ने उस की झुकी हुई पीठ को पूरी तरह से ढक रखा था. उस के मुंह से काले, सड़े दांत झांक रहे थे. वह पेड़ के चक्र से बाहर देखने की कोशिश करने लगी, लेकिन उस की आंखों को धुंधली छवियों के अलावा कुछ नहीं दिखाई दिया. कदमों की कोई आहट न आई. शिकारियों की टोली को लौटने में शायद वक्त था. उस ने अपने नग्न शरीर पर तेंदुए की सफेद खाल को कस कर लपेट लिया. इस बार ठंड कुछ अधिक ही परेशान कर रही थी. ऐसी ठंड उस ने पहले कभी नहीं महसूस की. गले में पड़ी डायनासोर की हड्डियों की माला, जनजाति में उस के ऊंचे दर्जे को दर्शा रही थी. कोई दूसरी औरत इस तरह की मोटी खाल में लिपटी न थी, सिवा औलेगा के.

औलेगा की बात अलग थी. उस का साथी एक सींग वाले प्राणी से लड़ते हुए मारा गया था. पूरे 2 पूर्णिमा तक उस प्राणी के गोश्त का भोज चला था. फिर औलेगा मां भी बनने वाली थी. उस भालू की खाल की वह पूरी हकदार थी जिस के नीचे वह उस वक्त लेट कर आग ताप रही थी. पर सिर्फ उस खाल की, माया ने दांत भींचते हुए सोचा.

आग बिना जीवन कैसा था, यह याद कर माया सिहर गई. आग ही थी जो जंगली जानवरों को दूर रखती थी वरना अपने तीखे नाखूनों से वे पलभर में इंसानों को चीर कर रख देते. झाड़ियों से उन की लाल, डरावनी आंखें अभी भी उन्हें घूरती रहतीं.

माया ने झट अपने 5 बच्चों की खोज की. उस से बेहतर कौन जानता था कि बच्चे कितने नाजुक होते हैं. सब से छोटी अभी चल भी नहीं पाती थी. वह भाइयों के साथ फल कुतर रही थी. सभी 3 दिनों से भूखे थे. आज शिकार मिलना बेहद जरूरी था. आसमान से बादल शायद सफेद फूल बरसाने की फिराक में थे. फिर तो जानवर भी छिप जाएंगे और फल भी नहीं मिलेंगे. ऊपर से जो थोड़ा बहुत मांस माया ने बचा कर रखा था, वह भी उस के साथी ने बांट दिया था.

माया परेशान हो उठी. तभी उस की नजर अपने बड़े बेटे पर पड़ी. वह एक पत्थर को घिस कर नुकीला कर रहा था, पर उस का ध्यान कहीं और था. माकौ-ऊघ टकटकी लगा कर औलेगा को देख रहा था सामक-या के धमकाने के बावजूद. क्या उसे अपने पिता का जरा भी खौफ नहीं? पिछले दिन ही इस बात पर सामक-या ने माकौ-ऊघ की खूब पिटाई की थी. माकौ-ऊघ ने बगावत में आज शिकार पर जाने से इनकार कर दिया और सामक-या ने जातेजाते मांस का एक टुकड़ा औलेगा को थमा दिया. वही टुकड़ा जो माया ने अपने और बच्चों के लिए छिपा कर रखा था. माया जलभुन कर रह गई थी.

एक सरदार के लिए सामक-या का कद खास ऊंचा नहीं था. पर उस से बलवान भी कोई नहीं था. एक शेर को अकेले मार डालना आसान नहीं. उसी के दांत को गले में डाल कर वह सरदार बन बैठा. और जब तक वह माया पर मेहरबान था, माया को कोई चिंता नहीं. ऐसा नहीं कि सामक-या ने किसी और औरत की ओर कभी नहीं देखा, पर आखिरकार वापस वह माया के पास ही आता. माया भी उसे भटकने देती, बस, ध्यान रखती कि सामक-या की जिम्मेदारियां न बढ़ें. नवजात बच्चे आखिर बहुत नाजुक होते हैं. कुछ भी चख लेते हैं, जैसे जहरीले बेर.

माया की इच्छा हुई एक जहरीला बेर औलेगा के मुंह में भी ठूंस दे, पर अभी उस के कई रखवाले थे, उस का अपना बेटा भी. पूरी जनजाति उस के पीछे पड़ जाएगी. खदेड़खदेड़ कर उसे मार डालेगी.

कुछ रातों बाद…

बर्फ एक सफेद चादर की भांति जमीन पर लेटी हुई थी. कटा हुआ चांद तारों के साथ सैर पर निकला था. मैमौथ का गोश्त खा कर मर्द और बच्चे गुफा के भीतर सो चुके थे. औरतें एकसाथ आग के पास बैठी थीं. कुछ ऊंघ रही थीं तो कुछ की नजर बारबार बाहर से आती कराहने की आवाज की ओर खिंच जाती. सुबह सूरज उगने से पहले ही औलेगा छोटी गुफा में चली गई थी और अभी तक लौटी नहीं थी. रात गहराती गई. चांद ने अपना आधा सफर खत्म कर लिया. पर औलेगा की तकलीफ का अंत न हुआ. अब औरतें भी सो चली थीं, सिवा माया के.

कदमों की आहट ने उस का ध्यान आकर्षित किया. औलेगा के साथ बैठी लड़की पैर घसीटते हुए भीतर घुसी. वह धम्म से आग के सामने बैठ गई और थकी हुई, घबराई हुई आंखों से माया को देखने लगी. तभी औलेगा की तेज चीख सुनाई दी. माया झट से उठी और मशाल ले कर चल पड़ी. दूसरी मुट्ठी में उस ने बेरों पर उंगलियां फेरीं.

औलेगा का नग्न शरीर गुफा के द्वार पर, आग के सामने लेटा, दर्द से तड़प रहा था. बच्चा कुछ ही पलों की दूरी पर था. और थोड़ी ही देर में एक नन्ही सी आवाज गूंज उठी. पर औलेगा का तड़पना बंद नहीं हुआ. शायद वह मरने वाली थी. माया मुसकरा बैठी और बच्चे को ओढ़ी हुई खाल के अंदर, खुद से सटा लिया. भूखे बच्चे ने भी क्या सोचा, वह माया का दूध चूसने लगा.

अचंभित माया के हाथ से सारे बेर गिर गए. वह कुछ देर भौचक्की सी बैठी रही, औलेगा को कराहते हुए देखती रही. उस की नजर सामने की झाडि़यों से टिमटिमाती लाल आंखों पर पड़ी. बस, आग ने ही उन्हें रोक रखा था. और आग ही ठंड से राहत भी दे रही थी. औलेगा की आंखें बंद हो रही थीं. माया ने आव देखा न ताव, मुट्ठीभर मिट्टी आग पर फेंकी, बच्चे को कस कर थामा, मशाल उठाई और चलती बनी. न औलेगा की आखिरी चीखें और न ही एक और बच्चे की पहली सिसकी उसे रोक पाई. Hindi Kahani

Hindi Story: पवित्र पापी – अमृता बाबा के गलत इरादों को क्यों बढ़ावा देती थी?

Hindi Story: अमृता इसी आश्रम में ब्याह कर आई थी. आश्रम बहुत बड़ी जमीन पर फैला हुआ था. आश्रम के नाम पर बहुत बड़ी जमींदारी थी. गांवों में जमीनें थीं. खूब चढ़ावा आता था. कई जगह मंदिर थे जिन में पुजारियों को तनख्वाह मिलती थी. अमृता का ससुर पंडित मोहनराम आश्रम की जमींदारी संभालता था. यहीं पर ही वह रहता था. उस का अलग से मकान इसी आश्रम के पिछवाडे़ में बना हुआ था.

बडे़ महाराज का नाम दूरदूर के गांवों में था. उन्होंने कई किताबें लिखी थीं. बहुत बडे़बडे़ कार्यक्रम यहीं होते थे. तब स्वरूपानंदजी काशी से पढ़ कर आए थे. पहले वह ब्रह्मचारी ही रहे, बाद में बडे़ महाराज ने उन्हें अपना शिष्य बना लिया था और मरने के  बाद स्वरूपानंद ने जब गद्दी संभाली तो आश्रम को नया होना ही था.

तब अमृता बाबा स्वरूपानंद की महिला शाखा की  कर्ताधर्ता थी. उसी ने हर बार स्वरूपानंद की शोभायात्रा भी निकाली थी. वसंत पंचमी पर जो फूल- डोल का कार्यक्रम होता था उस में अमृता सैकड़ों महिलाओं के साथ वसंती कपडे़ पहन कर बाबा स्वरूपानंद के साथ गुलाल उछलवाती थी. बाबा की गाड़ी हमेशा इत्र की खुशबू से महकती रहती.

अमृता का पति रामस्वरूप हमेशा या तो भांग पिए रहता या बाबा की जमींदारी में गया होता और अमृता मानो खुद ही आश्रम की हो कर रह गई हो. कभी मंदिर में कभी भंडार में, कभी अतिथिशाला में, भागतेदौड़ते अमृता को देख यही लगता था मानो आश्रम का सारा भार उसी पर हो.

कब बेटा हुआ, कब बड़ा हुआ, उसे पता नहीं. हां, बेटा होने पर बाबा ने उसे 20 तोला सोना दिया था. मकान पक्का कराया, फ्रिज दिया, उसे वह सबकुछ याद है.

उस रात जब वह मंदिर के पट बंद कर नीचे आ रही थी तब बाबा स्वरूपानंद ने अचानक उस का हाथ पकड़ा और उसे बांहों में भींच लिया. उसे तब लगा कि जैसे उस का रोमरोम जल रहा हो. बाबा की उंगलियां उस की पीठ पर रेंग रही थीं. उस की आंखें बंद होने लगीं. फिर क्या उसे याद नहीं. वह तो बाबा की बांहों में एक नशे में थी.

सुबह जब इत्र से भीगी बाबा की गद्दी पर उस की आंखें खुलीं तो वह खुद अपनी देह को देख कर लजा गई थी. लगा, पंखडि़यां अब खिल गई हैं. उस की आस पूरी हुई. पूरी औरत हो गई है वह. उस ने देखा स्वरूपानंद की धोती खुली पड़ी थी. उस ने ठीक की तो बाबा को मुसकराते देखा और चुपचाप नीचे उतर गई.

बाबा का अंश उस के गर्भ में था. वह अपनी साधना यात्रा पर गतिशील रही. उस का परिवार फलताफूलता रहा. रामस्वरूप अस्वस्थ हो गया. अधिक भांग का नशा और अस्तव्यस्त जीवन के चलते रोगों ने उसे जकड़ लिया था. बाबा ने उस का इलाज करवाया, अस्पताल में भरती भी कराया पर बिगड़ी तबीयत सुधरी ही नहीं और एक दिन वह भी चल बसा. तब उस का काम धर्मस्वरूप ने संभाला. बाबा ने उसे एक मोटरसाइकिल भी दिला दी थी. वह पढ़ालिखा था. उस का विवाह भी कर दिया.

बाबा ने जब से मंगला को अमृता के साथ देखा तभी से उन्हें लग रहा था मानो आंखों के सामने हजार बिजलियां कौंध गई हों. जब मंगला ब्याह कर आई थी तब पतलीदुबली थी. चेहरा भी मलीन हुआ रहता था पर अमृता का प्यार और उस की देखभाल तथा आश्रम के तर भोजन से उस की देह भर आई थी. जब उस के बेटा हुआ तो अमृता ने पूरे आश्रम वालों को भोजन पर बुलाया था.

उस रात बाबा ने अमृता का हाथ पकड़ कर कहा था, ‘‘मंगला तो गदरा गई है.’’

‘‘चुप, चुप करो, तुम्हारी बहू है.’’

‘‘मेरी,’’ बाबा हंसा, ‘‘जोगीअवधूत किसी के नहीं होते.’’

‘‘तुम यह किस से कह रहे हो?’’

‘‘तुझ से, तू ने मेरा बहुत माल खाया है.’’

‘‘मैं ने तुझे अपना शरीर भी तो दिया है. मुफ्त में कोई किसी को कुछ नहीं देता.’’

‘‘बहुत बोलने लग गई है.’’

‘‘याद रखना, मंगला मेरी ही नहीं तेरी भी बहू है. उस पर निगाह डाली तो आंखें नोच लूंगी.’’

‘‘यह तू कह रही है.’’

‘‘हांहां,’’ उस ने अपनी साड़ी को ठीक करते हुए कहा, ‘‘तेरा मुझ से मन भर गया है यह तो मुझे तभी पता लग गया था जब उस सेठ की लुगाई को मैं ने यहां देखा था, पर मैं तुझे यह बता देना चाहती हूं कि मेरा मुंह मत खुलवाना. सब धरा रह जाएगा…यह नाम, यह इज्जत, यह शोहरत. कइयों का बाप है तू, यह मैं जानती हूं,’’ इतना कह कर अमृता जोरों से हंसी. उस की उस हंसी में भय नहीं था एक उद्दाम अट्टहास था.

बाबा स्वरूपानंद अवाक्रह गया, फिर धीरे से बोला, ‘‘चुप कर, तेरा मुंह बंद कर दूंगा. बोल, क्या चाहिए तुझे? इतना दिया है पर तेरा मन नहीं भरा है.’’

‘‘सवाल मन का नहीं, मेरे घर का है. मंगला मेरी बहू है. शर्म कर…’’

उस रात जो तनातनी हुई थी वह बढ़ती ही जा रही थी. अमृता आश्रम में आती, अपना काम करती, मंदिर की पहले की तरह सफाई का पूरा ध्यान रखती और अपना सारा काम कर घर चली जाती.

अब फूलडोल का महोत्सव आ गया था. कई दिन से तैयारियां हो रही थीं. ठाकुरजी का शृंगार होता था. महात्मा लोग प्रवचन करने आते थे. भास्करानंद भी तभी वहां आए हुए थे. बडे़ महाराज के ये प्रिय शिष्य थे. बाद में जब स्वरूपानंदजी गद्दी पर बैठे तो वह उनियारा चले गए थे. वहां भी आश्रम था. वह वहां की गद्दी संभालते थे.

उन दिनों स्वामी मृगयानंद के आश्रम से 2 छोटे बालक भी आश्रम में आए हुए थे. कम उम्र में ही दोनों ने आश्रम में प्रवेश ले लिया था. भास्करानंद उन्हें धर्मशास्त्र पढ़ाया करते थे. उन की देखभाल अमृता के जिम्मे थी.

उस दिन जब वह रात को भंडारगृह में ताला लगवा कर लौट रही थी कि तभी रसोइया नानकचंद दूध का गिलास ले कर आ गया.

‘‘अरे, तू कहां जा रहा है?’’ वह बोली.

‘‘भास्करानंदजी ने दूध मंगवाया है.’’

‘‘वे दोनों छोटे महाराज कहां हैं?’’

‘‘एक तो कमरे में है, दूसरे को महाराज ने पढ़ने के लिए बुलाया था.’’

वह नानकचंद के साथ भास्करानंद के कक्ष की तरफ बढ़ गई.

उधर कक्ष में भास्करानंद ने बालक दीर्घायु को अपने बहुत पास बैठा लिया था और रजिस्टर पर कुछ संस्कृत में लिख कर उसे पढ़ने को दे रहे थे.

‘‘इधर देखो,’’ और उन्होंने बालक दीर्घायु का हाथ पकड़ कर अपनी दोनों जांघों के बीच खींच लिया था. वह लड़खड़ाया और तेजी से उस का मुंह उन की गोदी में आ गिरा था. जब तक बालक दीर्घायु संभलता उन्होंने उसे भींचते हुए चूमना शुरू कर दिया था.

उस के गले से निकली हलकी सी चीख को सुन कर अमृता उधर ही दौड़ी. पीछेपीछे नानकचंद भी दूध को संभालता हुआ दौड़ रहा था. अमृता दौड़ती हुई उस कक्ष के दरवाजे तक पहुंच गई और जोर का धक्का दे कर दरवाजा खोल दिया.

दरवाजा खुलने के साथ ही भास्करानंद सकपका कर दूर सरक गया था और बालक दीर्घायु घबराया हुआ अमृता के पास आ गया.

‘‘क्या कर रहा था नीच? अरे अधर्मी, तुझे शर्म नहीं आती. तेरा पुराना चिट््ठा सब को याद है. यहां ज्ञान चर्चा करने आया है…’’

‘‘तू चुप रह, तू कौन सी दूध की धुली है. यहां तुझे कौन नहीं जानता कि तू स्वरूपानंद की रखैल है.’’

‘‘चुप कर वरना मुंह नोच लूंगी.’’

तब तक स्वरूपानंद भी वहां पहुंच गया. उस ने भास्करानंद को चुप रहने का आदेश दिया और बालक दीर्घायु को ले कर वह उस के कक्ष की तरफ चला गया.

नानकचंद रसोई की तरफ और अमृता जीने से नीचे उतर कर अपने घर की तरफ बढ़ गई.

रास्ते में बाबा ने उस के कदमों की आवाज पहचान कर खंखारा. वह ठिठकी.

‘‘क्या है?’’

‘‘बहुत नाराज हो?’’

वह चुप रही.

‘‘धर्मस्वरूप को एक एसटीडी, पीसीओ खुलवा देते हैं. बाहर सड़क पर उस की दुकान बनवा देंगे.’’

सुन कर अमृता सकपकाई.

‘‘और बहू तो अपनी है, कुछ सोना उस के लिए खरीदा है, ले जाना.’’

अमृता ने सुना और आगे बढ़ गई.

धर्मस्वरूप खाना खा कर अपने कमरे में चला गया था. मंगला भी रसोई का काम पूरा कर सोने चली गई. अमृता नीचे के कमरे में पलंग पर लेटी रही पर आंखों में नींद नहीं थी. घंटे भर बाद जब अंधेरा और बढ़ गया तो वह पलंग से उठी तथा आंगन से होती हुई पीछे की गली में चल कर जीने से होती हुई सीधी आश्रम के पिछवाडे़ में पहुंच गई.

बाबा स्वरूपानंद के कमरे में हलकी रोशनी थी. यहीं पर मोगरे की टोकरी भी रखी हुई थी. चारों ओर खुशबू फैल रही थी.

‘‘आओ…’’ बाबा ने मुसकरा कर अमृता का स्वागत किया क्योंकि आज उस ने कुछ और ही सोच रखा था. बड़ा बोरा मंगवा रखा था. बंद गाड़ी की चाबी आज उसी के पास थी. तालाब के किनारे बडे़ पत्थर भी रखवा लिए थे. यानी अमृता की जल समाधि का पूरा इंतजाम हो चुका था. बाबा सोच रहा था कि अमृता बहुत बोलने लगी है, इस को भी मुक्ति मिल जाएगी.

‘‘तू तो अब पूरी पराई हो चली है,’’ बाबा ने उसे बांहों में भरते हुए कहा, ‘‘ले, यह सोने का बड़ा सा हार बहू के लिए है.’’

‘‘बहू? यह तुम कह रहे हो?’’

‘‘हां,’’ बाबा का स्वर धीमा था.

बाबा उठे, बाहर का दरवाजा बंद कर दिया. हलकी सी रोशनी थी. अमृता उन के साथ बिस्तर पर थी. साड़ी मेज पर पड़ी थी. अचानक बाबा मुडे़ और तकिया उठा कर उस की गर्दन के ऊपर रख दिया.

अमृता का गला भिंच गया था. सांस नहीं ले पा रही थी. बाबा लगातार तकिए पर दबाव डालता रहा. वह उस के ऊपर आ कर बैठ गया.

वह निढाल हो गई थी. कुछ ही देर में उस की सांसें उखड़ जातीं, पर उस के पहले ही उस ने पूरी ताकत से बाबा को एक धक्का दिया. बाबा संभलता इस के पहले उस ने पास में रखा चिमटा पूरी ताकत से स्वरूपानंद के सिर पर दे मारा. वह तेजी से उठी और पास टंगी बाबा की तलवार उतार कर पूरी ताकत से बाबा की गरदन पर दे मारी. बाबा खून से लथपथ चीख रहा था.

शोर मच गया. वह तेजी से पिछवाडे़ के जीने से होती हुई नीचे उतर गई.

पुलिस आई. बाबा के बयान लिए गए. वह बोला, ‘‘मैं सो रहा था, तब किसी ने मुझ पर हमला किया. मेरे चीखने पर वह भाग गया.’’

अमृता के लिए वह कुछ नहीं बोला था. जानता था, एक शब्द भी बोला तो बदनामी उसी की होगी.

अमृता उस रात के बाद वहां नहीं दिखी. जब तक बाबा स्वरूपानंद अस्पताल से आश्रम लौटते वह उस के पहले बहुत दूर अपने परिवार के साथ जा चुकी थी. उस के घर के दरवाजे पर बहुत बड़ा ताला लटका हुआ था. Hindi Story

Hindi Kahani: कुआं ठाकुर का – आखिर झुमकी को क्यों अपराध करना पड़ा?

Hindi Kahani: “तुम्हारे कष्टों का हल तब ही मिलेगा, जब तुम हमारे साथ भाग कर शहर चलोगी, वरना रोज़ रात की यही कहानी रहेगी तुम्हारे साथ,” कलुआ ने झुमकी को बांहों में लेते कहा.

“हां रे, मन तो हमारा भी यही कहता है कि अब हम वापस घर न जाएं लेकिन अगर न गए तो हमारा बाप हमारी मां को भूखा मार डालेगा,” झुमकी ने एक सर्द आह भरते हुए कहा.

“तेरा बाप, छी, मुझे तो घिन आती है तेरे बाप के नाम से. भला कोई बाप अपनी बीवी और बेटी से ऐसा काम भी करा सकता है? वह कम्बख्त मर जाए तो ही अच्छा है,” कलुआ ने गुस्से से कहा.

“ऐसा मत कहो. वह मेरा बाप है. मेरी मां उसी के नाम का सिंदूर लगाती है. और तुम क्या समझते हो, अगर अम्मा या मैं ने उस की बात मानने से इनकार किया तो, पहले तो वह गालीगलौच करता है और फिर कहता है कि हम लोग ने नीच जाति वाले घर में पैदा हो कर गलती कर दी है और अब ये सब करना तो हमारे करम में लिखा है. हम जब तक जिंदा रहेंगे तब तक हमें ये ही सब करना पड़ेगा,” सिसक उठी थी झुमकी.

झुमकी के बदन पर नोचनेखसोटने के निशान बने हुए थे. उन्हें प्यार से सहलाते हुए कलुआ  बोला, “हां, हम तुम्हारी इतनी मदद कर सकते हैं कि तुम्हें यहां  से खूब दूर अपने साथ शहर ले जाएं और वहां हम दोनों मजदूरी कर के अपना पेट पालें. तभी तुम इस नरक से मुक्ति पा सकती हो,” झुमकी को बांहों में समेट लिया  था कलुआ ने.

झुमकी की उम्र 20 बरस थी. छरहरी काया, पतली नाक और चेहरे का रंग ऐसा जैसे कि तांबा और सोना आपस में  घोल कर उस के चेहरे पर लगा दिया गया हो.

झुमकी के बाप को शराब की लत लग गई थी. गांव के पंडित और ठाकुर उसे शराब पिलाते और  बदले में वह अपनी पत्नी को इन लोगों का बिस्तर गरम करने के लिए भेज देता. दिनभर दूसरों के खेत और अपने घर के चूल्हेचौके में जान खपाने के बाद जब झुमकी की मां ज़रा आराम करने जा रही होती, तभी नशे में धुत हो कर झुमकी का बाप आता और झुमकी की अम्मा  को इन रसूखदार लोगों के यहां जाने को कहता. विरोध करने पर उन्हें उन की नीची जाति का हवाला देता और कहता कि ऐसा करना तो उन के समय में ही लिखा है. इसलिए उन्हें ये सब तो करना ही पड़ेगा. झुमकी की अम्मा समझ जाती कि उस की इज़्ज़त को तो पहले ही शराब पी कर  बेच आया है, इसलिए मन मार कर उन लोगों के बिस्तर पर रौंदी जाने के लिए चली जाती.

झुमकी जैसे ही 13 साल की हुई, तो ठाकुर ने तुरंत ही अपनी गिद्ध दृष्टि उस पर जमा दी और झुमकी के बाप से मांग करी कि आज के बाद वह अपनी पत्नी को नहीं, बल्कि झुमकी को उस के पास भेजा करेगा  और झुमकी को खुद ठाकुर के पास पहुंचा कर आया था झुमकी का बाप.

एक बार ऐसा हुआ, तो फिर तो मानो यह चलन हो गया. जब भी ठाकुरबाम्हन लोगों का मन होता, बुलवा भेजते झुमकी को और रातरातभर रौंदते उस के नाज़ुक जिस्म को.

वह तो उस दिन झुमकी ने गांव की नदी में डूब कर आत्महत्या ही कर ली   होती, अगर उस मल्लाह के लड़के कलुआ ने उसे सही समय पर बचाया न होता. कलुआ ने जान बचाने के बाद जब जरा डांट और जरा पुचकार से झुमकी से ऐसा करने का कारण पूछा तो कलुआ के प्यार के आगे उस की आंसू की धारा बह निकली और रोरो कर  सब बता दिया कलुआ को.

“हम नीच जात के हैं, तो भला इस में हमारा का दोष है. और अगर वे लोग बाम्हन और ठाकुर हैं तो वे हमारे साथ जो चाहे, कर सकते हैं का?” झुमकी के इस सवाल का कोई जवाब नहीं था कलुआ के पास.

झुमकी को कलुआ से थोड़ा  स्नेह मिला और इस स्नेह में उसे वासना के कीड़े नहीं दिखाई दिए. तो, मन ही मन वह उसे अपना सबकुछ मान बैठी थी. कलुआ भी तो झुमकी पर ही जान न्योछावर किए रहता था. पर उसे ऐसे झुमकी का बाह्मन और ठाकुर द्वारा शोषण किया जाना पसंद नहीं था और इसीलिए वह शहर जाने की ज़िद करता था पर हर बार झुमकी अपनी मां की दुहाई दे कर बात टाल जाती थी.

लेकिन, कल जब झुमकी दालान में बैठी अपने शरीर पर रात में आई खरोंचों पर कड़वा तेल का लेप लगा रही थी, तभी झुमकी की अम्मा आई और बोली, “बिटिया, हम तुम को जने हैं, इसलिए तुम्हारा दर्द सब से अच्छी तरह जानते हैं. और यह भी जानते हैं कि वह कलुआ तुम्हें पसंद करता है. तुम अगर यहां गांव में ही रह गई, तो इसी तरह  पिसती रहोगी. शायद, नीच जाति में पैदा होना ही हमारा कुसूर बन गया है. पर अगर सच में ही जीना चाहती तो यहां से कहीं और भाग जाओ और हमारी  चिंता मत करो. हम तो बस काट ही लेंगे अपना जीवन. पर तुम्हारे सामने अभी पूरा जीवन है, तू यहां रह गई तो ये मांस के भेड़िए तुझे रोज़ रात में नोचेंगे. इसलिए चली जा यहां से, चली जा…”

अभी  झुमकी की मां उसे समझा ही रही थी कि झुमकी का बाप अंदर आ गया. उस ने सारी बातें सुन ली थीं, बोला, “हां, झुमकी ज़रूर जाएगी पर कलुआ के साथ नहीं, बल्कि संजय कुमार के साथ. मैं ने  इस की शादी संजय कुमार के साथ तय कर दी है. चल री झुमकी, जल्दी तैयार हो जा. तेरा दूल्हा  बाहर बैठा हुआ है.”

यह कैसी  शादी थी, न बरात, न धूम, न नाच, न गाना.

झुमकी और उस की मां समझ गई थीं कि झुमकी का सौदा कर डाला गया है. पर झुमकी के लिए आगे कुंआ और पीछे खाई जैसी हालत थी. फिर भी उस के मन में एक दूल्हे के नाम से यह उम्म्मीद जगी कि यहां रोज़रोज़ इज़्ज़त नीलाम होने से तो कुछ सही ही रहेगा कि किसी एक मर्द से बंध कर रहे.

और इसी उम्मीद में झुमकी उस आदमी के साथ चली गई. जाते समय झुमकी का मन तो भारी  था पर इतनी खुशी ज़रूर थी कि उसे बेचने के बदले में उस के पिता को जो पैसे मिल जाएंगे उन के बदले वह कुछ दिन आराम से शराब पी सकेगा.

और इस तरह बिहार के एक गांव से चल कर झुमकी उत्तर प्रदेश के लखनऊ शहर में पहुंच गई.

“यह रहा हमारा कमरा,” संजय ने एक छोटे से कमरे में घुसते हुए कहा.

उस कमरे में कोई भी बिस्तर नहीं था, सिर्फ एक गद्दे पर चादर डाल कर उसे लेटने की जगह में तबदील कर दिया गया था. और इस समय उस गददे पर  2 आदमी बैठे हुए झुमकी को फाड़खाने की नज़रों से देख रहे थे.

“अरे, इन से शरमाने की ज़रूरत नहीं है. ये दोनों हमारे बड़े भाई हैं- विजय भैया और मनोज भैया. हम लोग  मजदूरी करते हैं और ये दोनों भी हमारे साथ इसी कमरे में रहते हैं. और एक बात बता  दें तुम्हें कि तुम्हें हमारे साथसाथ इन का भी ध्यान रखना होगा,” संजय कुमार ने ज़मीन पर बैठते हुए कहा.

“हम भाइयों ने दिन बांट रखे हैं. हफ्ते के पहले 2 दिन तुम को बड़े भैया के साथ सोना होगा और उसके बाद के 2 दिन तुम  मझले भैया के साथ सोओगी और मैं सब से छोटा हूं, इसलिए सब से बाद में मेरा नंबर आएगा.  तुम को शर्म न आए, इस के लिए हम बीच में एक परदा डाल लेंगे,” संजय ने बड़ी सहजता से ये सारी बातें कह डाली थीं.

“क….क्या मतलब,” चौंक उठी थी झुमकी.

“यही कि हम 3 भाई हैं और हमारे आगेपीछे माईबाप कोई नहीं हैं जो हम लोगों का ब्याह करवा सके  और न ही हम लोगों के पास इतना पैसा है कि हम लोग अलगअलग रहें और अपने लिए अलगअलग बीवी रख सकें. इसीलिए हम ने 3 भाइयों के बीच में एक ही बीवी खरीद कर रखने का प्लान  बनाया.”

संजय कुमार की बात सुन कर जब झुमकी ने 3 पतियों की बीवी बनने से इनकार किया

तो तीनों ने उस के पिता को पूरे पैसे देने की बात कह कर बारीबारी से झुमकी के साथ मुंह काला किया और बाद में तृप्त हो कर गहरी नींद में सो गए और जब वे तीनों  आधी रात के बाद नींद की आगोश में थे, तब झुमकी दबेपांव वहां से भाग निकली और ढूंढतेढांढते पुलिस स्टेशन पहुंची और थानेदार को पूरी कहानी बताई.

“अरे, तो इस में बुराई ही क्या थी. और फिर, तुम्हें तो गांव में भी ऊंची जाति के लोगों के साथ सोने की आदत थी ही. यहां भी तीनों को खुश कर के रहतीं, तो वे सब रानी बना कर रख़ते. तुम छोटी जाति वालों के साथ यही समस्या है कि ज़रा सी बात में ही शोर मचाने लगते हो. अब रात के 3 बजे तू यहां आई है और मैं ने तेरी रिपोर्ट  भी लिख ली है. अब अगर बदले में तू मुझे थोड़ा खुश कर देगी, तो तेरा कुछ घिस थोड़े ही जाएगा,” यह कह कर थानेदार ने मेज़ पर ही झुमकी को लिटा दिया और उस का बलात्कार कर डाला.

रोती रही झुमकी. आज उसे कलुआ बहुत याद आ रहा था. उस ने एक नज़र थानेदार पर डाली

जो अपनी शर्ट और पैंट को संभालने की कोशिश कर रहा था.

सुबह हो रही थी. झुमकी भारी मन से उठी और बाहर निकल गई. कमज़ोरी, थकान और अपने ऊपर हुए जुल्मों के कारण उस से चला भी न जा रहा था. झुमकी किसी तरह सड़क तक पहुंची और सड़क पर ही गिर कर बेहोश हो गई.

झुमकी को होश आया, तो उस ने अपनेआप को बिस्तर पर पाया और उस की आंखों के सामने एक युवक खड़ा मुसकरा रहा था.

युवक की आंखों पर हलके लैंस का चश्मा और चेहरे पर घनी दाढ़ी थी.

“घबराओ नहीं, तुम सुरक्षित जगह हो. तुम सड़क पर बेहोश हो गई थीं. संयोग से मैं वहीं से गुज़र रहा था. तुम्हें देखा, तो यहां ले आया.” वह युवक इतना बोल कर चुप हो गया.

झुमकी अब भी उस को प्रश्नवाचक नज़रों से देख रही थी.

“मैं एक समाजसेवक हूं. मेरा नाम मलय है  और तुम जैसे गरीब व पिछड़े लोगों की मदद करना ही मेरा काम है. थोड़ा आराम कर लो और फिर मैं तुम से पूछूंगा कि तुम्हारी यह हालत किस ने कर दी है.”

वह मुसकराता हुआ वहां से चला गया और झुमकी की देखभाल के लिए एक नर्स वहां आ गई. कुछ घंटों बाद जब मलय वहां आया तो झुमकी अपनेआपको तरोताज़ा महसूस कर रही थी और पहली बार उसे ऐसा लग रहा था कि वह सुरक्षित हाथों में है.

झुमकी ने अपने साथ बीती हुई सारी बातें मलय को बता दीं. सुन कर मलय काफी दुखी हुआ और उस को न्याय दिलाने का वादा किया.

झुमकी की सेहत भी अब ठीक हो रही थी और अब भी वह मलय के सर्वेंटरूम में ही रह रही थी.

एक रात को 10 बजे मलय उस सर्वेंटरूम में आया. वह अपने साथ एक बाम ले कर आया था.

“मेरे सिर में बहुत दर्द है, ज़रा बाम तो लगा दो झुमकी, ” मलय ने झुमकी के बिस्तर पर लेटे हुए कहा.

झुमकी बाम लगाने लगी मलय के माथे पर. मलय उसे लगातार घूरे जा रहा था. अचानक कुछ अच्छा नहीं लगा  झुमकी को.

“मैं सोच रहा हूं कि भले ही तुम नीच जाति की हो, तुम्हारे साथ इतने लोगों ने बलात्कार किया, तो ज़रूर तुम में कोई कशिश रही होगी और मुझे लगता है कि उन्होंने कोई गलती नहीं करी,” कह कर मलय चुप हो गया.

झुमकी ने बाम लगाना बंद कर दिया और दूर जाने लगी.

तभी पीछे से उस ने अपनी पीठ पर मलय का हाथ महसूस किया. वह कुछ बोल पाती, इस से पहले ही मलय ने झुमकी को पकड़ कर बिस्तर पर गिरा दिया और उस का बलात्कार कर दिया.

झुमकी एक बार फिर उस नरक के अनुभव से गुज़र रही थी. लेकिन इस बार वह सहेगी नहीं,

वह बदला लेगी. पर कैसे?

गुस्से में झुमकी ने कोने में पड़ा हुआ एक छोटा सा चाकू उठाया और पूरी ताकत से मलय पर वार कर दिया. मलय के हाथ पर हलाकि सी खरोंच आई. मलय नशे में तो था ही, खरोंच लगने से उसे और क्रोध आ गया और उस ने अपने दोनों हाथ झुमकी के गरदन पर कस दिए और अपना दबाव बढ़ाता गया. एक समाजसेवक  बलात्कारी के साथसाथ खूनी भी बन गया था.

और झुमकी, जो एक गांव में जन्म ले कर शहर तक आई, पिता से ले कर उस के जीवन में जो भी आया उसे झुमकी में सिर्फ वासनापूर्ति का साधन दिखाई दिया. यह उस के एक औरत होने की सज़ा थी या एक गरीब होने की या एक दलित महिला होने की एक प्रश्नचिन्ह अब भी बाकी है??? Hindi Kahani

Hindi Family Story: चौथा कंधा – सोनू की कालगर्ल भाभी

Hindi Family Story: अन्य पिछड़ा वर्ग का दीना कोलकाता के एक उपनगर संतरागाछी में रहता था. वहीं एक गली में उस की झोंपड़ी थी. उसी झोंपड़ी के आगे उस की छोटी सी दुकान थी, जहां उस ने एक सिलाई मशीन लगा रखी थी. दुकान में वह रैक्सीन के साथसाथ कपड़ों के बैग भी तैयार करता था. साथ में कुछ चप्पलें भी बनाता था.

दीना की पत्नी मीरा महल्ले में मजदूरी का काम करती थी या फिर गल्ले की दुकानों में चावल, गेहूं, मसाले की सफाई करती थी. बदले में नकद मजदूरी या अनाज मिल जाता था.

दीना के 4 बेटे थे, सब से बड़ा बेटा गोलू, उस के बाद पिंकू, टिंकू और सब से छोटा सोनू. चारों बेटे स्कूल जाते थे. बीचबीच में दोनों बड़े बेटे शहर जा कर सामान बेचा करते थे. परिवार की गुजरबसर हो जाती थी.

एक दिन दीना ने अपनी पत्नी मीरा से कहा, ‘‘हम दोनों कितने भाग्यवान हैं. हमारी मौत पर कंधा देने वाले चारों बेटे हैं. बाहरी कंधे की जरूरत नहीं पड़ेगी.’’

देखतेदेखते गोलू और पिंकू दोनों बीए पास कर गए. इत्तिफाक से राज्य के नए मुख्यमंत्री भी अन्य पिछड़ा वर्ग से थे. उन्होंने फरमान जारी किया कि अन्य पिछड़ा वर्ग के कोटे के खाली पदों पर फौरन बहाली कर ऐक्शन टेकन रिपोर्ट सरकार को सौंपी जाए.

दीना के दोनों बेटों को राज्य सरकार में आरक्षण के बल पर क्लर्क की नौकरी मिल गई थी. एक की पोस्टिंग बर्दवान थी और दूसरे की आसनसोल में हो गई.

कुछ साल तक वे दोनों परिवार की माली मदद करते रहे और बीचबीच में अपने घर भी आया करते थे.

टिंकू और सोनू भी अपनी पढ़ाई में लग गए थे. मीरा ने अब बाहर का काम करना बंद कर दिया था.

इधर दोनों बड़े बेटों ने अपनी मरजी से शादी कर ली. वे अपनीअपनी गृहस्थी में बिजी रहने लगे. घर में पैसे भेजना बंद कर दिया था.

टिंकू बीए फाइनल में था और सोनू मैट्रिक पास था. दीना को खांसी और दमे की पुरानी बीमारी थी. अब उस से काम नहीं होता था.

एक दिन सोनू ने पिता से कहा, ‘‘टिंकू भैया तो कुछ दिनों में बीए पास कर लेगा. उसे कुछ न कुछ काम जरूर मिल जाएगा. तब तक भैया को पढ़ने दें, आप का काम मैं संभाल लूंगा. भैया को नौकरी मिलते ही मैं अपनी पढ़ाई फिर से शुरू कर दूंगा.’’

दुकान का काम अब मीरा देखती थी. सोनू रोज कुछ बैग और चप्पलें ले कर बेचने निकल जाता था.

रोज की तरह सोनू उस दिन भी दोनों कंधों पर एकएक थैला लिए था. एक थैले में कुछ जोड़ी चप्पलें थीं, कुछ जैट्स और कुछ लेडीज. दूसरे कंधे पर भी थैला होता था, जिस में रैक्सीन और कपड़े के बैग थे.

अकसर प्लैनेटोरियम इलाके से थोड़ा आगे सड़क के किनारे एक सुंदर लड़की उसे दिखती थी. जब भी उसे देखता, वह पूछता ‘‘दीदी, कुछ लोगी?’’

वह मना करते हुए बोलती, ‘‘मुझे कुछ नहीं चाहिए, तुम अपना समय बरबाद न करो.’’

एक छुट्टी के दिन सोनू फिर उस लड़की के सामने रुक कर बोला, ‘‘दीदी, कुछ चाहिए आज? आप की चप्पलें काफी घिसी हुई लगती हैं.’’

लड़की ने अपनी साड़ी खींच कर नीचे कर चप्पलों को ढक लिया, फिर वह बोली, ‘‘कुछ नहीं चाहिए, पर तुम रोजरोज मुझ से ही क्यों पूछते हो? यहां तो थोड़ीथोड़ी दूरी पर हर खंभे पर लड़कियां खड़ी हैं, तुम उन से क्यों नहीं पूछते?’’

‘‘दीदी, आप मुझे अच्छी लगती हो. बस रुक कर दो पल आप से बात कर लेता हूं, बिक्री हो न हो.’’

‘‘अच्छा, अपना नाम बताओ?’’

‘‘मैं सोनू… और आप?’’

‘‘मैं पारो.’’

‘‘और, आप का देवदास कौन है?’’

‘‘सारा शहर मेरा देवदास है. चल भाग यहां से… बित्ते भर का छोकरा और गजभर की जबान,’’ पारो बोली.

सोनू हंसते हुए आगे बढ़ गया और पारो भी हंसने लगी थी.

अगले दिन फिर सोनू की मुलाकात पारो से हुई. उस ने पूछा, ‘‘दीदी, आप रोज यहां खड़ीखड़ी क्या करती हो?’’

‘‘मैं भी कुछ बेचती हूं.’’

‘‘क्या?’’

‘‘तुम नहीं समझोगे,’’ बोल कर पारो ने आगे वाले खंभे के पास खड़ी लड़की की तरफ दिखा कर कहा, ‘‘देख, जो वह करती है, मैं भी वही करती हूं.’’

सोनू ने देखा कि उस लड़की के पास एक लड़का आया और उस के साथ

2 मिनट बात की, फिर वे दोनों एक टैक्सी में बैठ कर निकल गए.

अगले दिन सोनू फिर उसी जगह पारो से मिला. दोनों ने आपस में एकदूसरे के परिवार की बातें कीं.

सोनू ने कहा, ‘‘मैं काम कर के घर का खर्च और बड़े भाई की पढ़ाई का खर्च जुटाने की कोशिश करता हूं.’’

पारो बोली, ‘‘तू तो बड़ा अच्छा काम कर रहा है. मैं भी अपने छोटे भाई

को पढ़ा रही थी. वह बीए पास कर

चुका है. कुछ जगह नौकरी की अर्जी

दी है. उसे काम मिलने के बाद मैं यहां नहीं मिलूंगी.’’

कुछ दिनों तक ऐसे ही चलता रहा था. सोनू की अकसर पारो से मुलाकात होती रहती थी. टिंकू बीए पास कर चुका था. नौकरी के लिए उस ने भी अर्जी दे रखी थी. पर साहब को रिश्वत चाहिए थी, इसलिए औफर लैटर रुका हुआ था.

पिछले 2-3 दिनों से सोनू सामान बेचने नहीं निकल सका था. उस के पिता की तबीयत ज्यादा खराब थी. उन्हें सरकारी अस्पताल में भरती किया गया था. उन की हालत में कोई सुधार नहीं था. टिंकू पिता के पास अस्पताल में था.

आज सोनू बाजार निकला था. पारो ने सोनू को आवाज दे कर कहा, ‘‘तू कहां था? मैं तुझे खुशखबरी देने के लिए ढूंढ़ रही थी. मेरे भाई को नौकरी मिल गई है आसनसोल के कारखाने में. सोमवार को उसे जौइन करना है. बस, अब 2-4 दिन बाद मैं यहां नहीं मिलूंगी.’’

‘‘मुबारक हो दीदी, तो मिठाई नहीं खिलाओगी? मेरे पिता अस्पताल

में भरती हैं, इसलिए मैं नहीं आ सका था.’’

‘‘घबराओ नहीं, सब ठीक हो जाएगा,’’ बोल कर पारो ने मिठाई उस के मुंह में डाल दी.

‘‘क्या ठीक होगा, टिंकू भैया की नौकरी रुकी है. वैसे, आरक्षण कोटे में औफर तो मिलना है, पर साहब ने घूस के लिए अभी तक लैटर इशू नहीं किया है.’’

‘‘तुम उस साहब का पता बताओ, मैं उन से रिक्वैस्ट करूंगी.’’

‘‘कोई फायदा नहीं, हम लोगों ने बहुत नाक रगड़ी उन के सामने, वह बिना रिश्वत लिए मानने वाला नहीं है.’’

‘‘अरे, तुम बताओ तो सही. हो सकता है कि कोई पहचान वाला हो और काम बन जाए.’’

‘‘ठीक है. बताता हूं, पर घूस की बात वह घर पर करता है.’’

‘‘ठीक है, घर पर ही मिल लूंगी.’’

उस दिन शाम को पारो उस साहब के घर पर मिली. एक काली मोटी सी औरत ने कहा, ‘‘मैं साहब की पत्नी हूं. कहो, क्या काम है?’’

पारो बोली, ‘‘मुझे भाई की नौकरी के सिलसिले में उन से बात करनी है.’’

‘‘ठीक है, तुम यहीं रुको. मैं उन्हें भेजती हूं,’’ बोल कर वह अंदर चली गई.

साहब आए, तो पारो को ऊपर से नीचे तक गौर से देखते रह गए.

पारो ने अपने आने की वजह बताई, तो वे बोले, ‘‘तुम लोगों को पता होना चाहिए कि दफ्तर का काम मैं घर पर नहीं करता हूं.’’

पारो ने सीधे मुद्दे पर आते हुए धीमी आवाज में कहा, ‘‘सर, मैं ज्यादा रुपए तो नहीं दे सकती हूं, हजार डेढ़ हजार रुपए से काम हो जाता, तो बड़ी मेहरबानी होगी.’’

साहब ने धीरे से कहा, ‘‘मैं तुम से ज्यादा लूंगा भी नहीं. बस जो तुम्हारे पास है, उतने से मैं काम कर दूंगा. तुम कल शाम को इस होटल में मिलना. याद रहे, अकेले में प्राइवेट मीटिंग होगी,’’ और उन्होंने होटल और कमरा नंबर पारो को बता दिया.

अगले दिन साहब ने दफ्तर जाते समय पत्नी से कहा, ‘‘लंच के बाद मुझे बर्दवान जाना है. एक जरूरी मीटिंग है. आतेआते रात के 12 बज जाएंगे.’’

दूसरे दिन पारो सोनू को रोज वाली जगह पर नहीं मिली. वह तो साहब के साथ होटल के कमरे में मीटिंग में थी. रात के 12 बजे तक साहब ने पारो के साथ इस उम्र में खूब मौजमस्ती की.

पारो ने पूछा, ‘‘मेरा काम तो हो जाएगा न सर?’’

साहब बोले, ‘‘मैं इतना बेईमान नहीं हूं. तुम ने मेरा काम कर दिया, तो समझो तुम्हारा काम हो चुका है. और्डर मैं ने आज साइन कर दिया है. मेरे ही दराज में है. कल सुबह भाई को अपना आईडी प्रूफ ले कर दफ्तर भेज देना. डाक से पहुंचने में कुछ दिन लग जाएंगे. सरकारी तौरतरीके तो जानती ही हो.’’

‘‘जी सर, मैं भाई को भेज दूंगी,’’ साड़ी लपेटते हुए पारो बोली.

अगले दिन सुबहसुबह पारो सोनू के घर पहुंची. सोनू और टिंकू घर पर ही थे. उन की मां अस्पताल में थीं.

पारो ने टिंकू से दफ्तर जा कर बहाली का और्डर लेने को कहा.

सोनू बोला, ‘‘कितनी घूस देनी पड़ी?’’

पारो बोली, ‘‘मेरे पास ज्यादा कुछ था भी नहीं. थोड़े में ही मान गए वे.’’

‘‘ओह दीदी, तुम कितनी अच्छा हो,’’ बोल कर सोनू उस के पैर छूने को ?ाका, तो पारो ने उसे रोक कर गले लगाया.

टिंकू ने दफ्तर से और्डर ले कर उसी दिन जौइन भी कर लिया. दीना को यह खुशखबरी सोनू ने दे दी थी.

दीना बोला, ‘‘अब मैं चैन से मर सकूंगा. टिंकू अपनी मां और छोटे भाई की देखभाल करेगा.’’

उसी शाम को दीना चल बसा, इत्तिफाक से पारो और उस का भाई

तपन उस दिन अस्पताल में दीना से मिलने गए थे. सोनू ने दोनों बड़े भाइयों को पिता की मौत की खबर उसी समय दे दी और कहा कि दाहसंस्कार कल सुबह होना है.

बड़ा बेटा गोलू तो 2 घंटे की दूरी पर बर्दवान में था. वह बोला, ‘‘मैं तो नहीं आ सकूंगा, बहुत जरूरी काम है, तेरहवीं के दिन आने की कोशिश करूंगा.’’

दूसरा बेटा पिंकू आसनसोल से उसी रात आ गया, पर उस की पत्नी नहीं आई. सुबह अर्थी उठने वाली थी. पारो भी अपने भाई के साथ आई थी.

टिंकू ने सोनू से कहा, ‘‘हम तीन भाई तो हैं ही. जा कर पड़ोस से किसी को बुला ला, कंधा देने के लिए.’’

पारो आगे बढ़ कर बोली, ‘‘चौथा कंधा मेरा भाई तपन देगा.’’

मीरा अपने पति की अंतिम विदाई के समय फूटफूट कर रो रही थी. उसे पति की कही बात याद आ गई. कितने फख्र से कहते थे कि मरने पर मेरे चारों बेटे हैं ही कंधा देने के लिए.

कुछ दिनों बाद सोनू का घर सामान्य हो चला था. पारो अकसर आती रहती थी. सोनू अपनी पढ़ाई में लग गया.

एक दिन मीरा ने पारो से कहा, ‘‘बेटी, तुम ने बड़े एहसान किए हैं हम लोगों पर. एक और एहसान कर सकोगी?’’

‘‘मां, मैं ने कोई एहसान नहीं किया है. आप बोलिए, मैं क्या कर सकती हूं?’’

‘‘सोनू को अपना देवर बना लो, वह तुम्हारी बड़ी तारीफ करता है. हां, अगर टिंकू तुम्हें ठीक लगे तो…’’

टिंकू भी उस समय घर में था, उस ने खामोश रह कर स्वीकृति दे दी थी और पारो की ओर देख कर उस के जवाब का इंतजार कर रहा था.

पारो बोली, ‘‘आप लोगों को मैं अंधेरे में नहीं रखना चाहती हूं. मैं कुछ दिन पहले तक कालगर्ल थी. पता नहीं, टिंकू मुझे पसंद करेंगे या नहीं.’’

‘‘कौन सी गर्ल, वह क्या होता है?’’ मां ने पूछा.

‘‘कुछ नहीं मां. सेल्स गर्ल समझो. सोनू इस के बारे में मुझे सब बताया करता था. पारो बहुत अच्छी लड़की है. अब फैसला इसे करने दो.’’

सोनू पारो के पास आ कर बोला, ‘‘मान जाओ न दीदी… नहीं भाभी.’’

पारो ने नजरें झका लीं. उस ने सिर पर पल्लू रख कर मां के पैर छुए. Hindi Family Story

Hindi Romantic Story: वर्जित फल – जेठ को देख कर क्या फिसली मालती?

Hindi Romantic Story: मालती ने जिस साल बीए का का इम्तिहान पास किया था, उसी साल से उस के बड़े भाई ने उस के लिए लड़का देखना शुरू कर दिया था.

इस सिलसिले में राकेश का पता चला, जो इंटर कालेज, चंपतपुर में अंगरेजी पढ़ाता है. वे 2 भाई हैं. उन के पास 8 एकड़ जमीन है, जिस पर राकेश का बड़ा भाई खेती करता है.

राकेश के घर वालों ने मालती को देखते ही शादी के लिए हां कह दी और शादी की तारीख तय करने के लिए कहा. उन की बात सुन कर मालती की मां ने कहा, ‘‘बहनजी,

अभी लड़के ने तो लड़की देखी नहीं है. उन्हें भी लड़की दिखा दी जाए. आखिर जिंदगी तो उन दोनों को ही एकसाथ गुजारनी है.’’

इस पर राकेश की मां ने जवाब दिया, ‘‘हमारा राकेश बहुत सीधा और संकोची स्वभाव का है. हम ने उस से लड़की देखने के लिए बारबार कहा, मगर

उस ने हर बार यही कहा, ‘‘आप लोग पहले लड़की देख लीजिए. जो लड़की आप को पसंद होगी, वही मुझे भी  पसंद होगी.’’

उन की बात सुन कर सभी लोग राकेश की तारीफ करने लगे, केवल मालती ही मन मसोस कर रह गई. उसे इस बात पर गुस्सा आ रहा था कि  क्या केवल लड़के को ही हक है कि वह अपना जीवनसाथी पसंद करे, लड़की को इस का हक नहीं है? उसे इतना भी हक नहीं है कि उसे जिस  के साथ जिंदगी बितानी है, उसे शादी  के पहले एक झलक देख ले.

शादी की तारीख तय होने के साथ ही परिवार में त्योहार का सा माहौल बन गया और देखते ही देखते बरात मालती के दरवाजे पर आ गई.

मालती की सखियां उसे सजा कर जयमाल के लिए सजाए गए मंच की ओर ले कर पहुंचीं. मालती हाथों में वरमाला लिए सखियों के साथ जब मंच पर पहुंची, तो वर पर नजर पड़ते ही वह सन्न रह गई. हड्डियों का ढांचा सिर पर मौर धरे उस के सामने खड़ा था.

मालती का चेहरा अपने वर को देख कर उतर गया. उस की इच्छा हुई कि  वह जयमाल को तोड़  कर फेंक दे और वहां से भाग जाए.

कैसेकैसे सपने देखे थे उस ने अपने जीवनसाथी के बारे में और यह कैसा जोड़ मिला है.

मालती यह सब सोच ही रही थी, तभी उस की बड़ी बहन ने उस का हाथ कस कर दबा दिया. उस की चेतना लौटी और उस ने बुझे मन से राकेश के गले में जयमाल डाल दी.

वर को देख कर हर कोई उस पर टिप्पणी कर रहा था. उन की बात सुन कर कुछ जिम्मेदार औरतों ने हालात संभालते हुए कहा, ‘कुछ लोगों की सेहत शादी के बाद सुधर जाती है. जब पत्नी के हाथ का भोजन करेगा, तो उस की सेहत सुधर जाएगी.

शादी के बाद मालती जब ससुराल पहुंची, तो घर की अच्छी हालत देख कर उसे कुछ तसल्ली हुई. ससुराल में उस के रूपरंग की खूब तारीफ हुई. उस की ननद और जेठानी ने उस की सुहागरात के लिए फूलों की सेज तैयार कराई और रात के साढ़े 9 बजे वे दोनों मालती के साथ हंसीमजाक करते हुए उस के कमरे में छोड़ आईं.

रात 10 बजे राकेश ने कमरे में प्रवेश किया, तो उस का दिल तेजी से धड़कने लगा. राकेश ने उस का घूंघट उठाया, तो मालती का खूबसूरत चेहरा देख कर उस की खुशी का ठिकाना नहीं रहा. वह देर तक मालती का मुंह चूमता रहा और उस के शरीर को प्यार से सहलाता रहा.

जब राकेश ने पहली बार संबंध बनाया, तो वह एक मिनट भी नहीं टिक सका. इस के बाद उस रात को उस ने 2 बार संबंध बनाया, पर दोनों बार वह एक मिनट से आधे मिनट के अंदर ही पस्त हो गया. मालती सारी रात प्यासी मछली की तरह छटपटाती रही.

मालती 5 दिन तक ससुराल में रही और हर रात उसे ऐसे ही दुखदायी हालात से गुजरना पड़ा.

मालती जब अपने मायके पहुंची, तो अपनी मां और भाभी के गले लग कर खूब रोई. उस की भाभी द्वारा रोने की वजह बारबार पूछे जाने पर उस ने सारी बात उन्हें बता दी.

2 महीने बाद राकेश बड़े भाई सुरेश के साथ ससुराल गया और मालती को विदा करा कर ले आया.

घर में परदा प्रथा होने के चलते भयंकर गरमी में भी मालती को राकेश के साथ बंद कमरे में ही सोना पड़ता था. उस के कमरे के आगे बने बरामदे में उस के जेठजेठानी सोते थे और उस के सासससुर छत पर सोते थे.

एक रात जब राकेश एक मिनट में अपनी मर्दानगी दिखा कर खर्राटे भर रहा था और मालती काम की आग में जलते हुए सोने की कोशिश कर रही थी, तभी बरामदे में चारपाई के चरमराने और औरत के सीत्कार की आवाज उसे सुनाई दी. यह आवाज तकरीबन 20 मिनट तक उस के कानों में गूंजती हुई उस की तड़प को बढ़ाती रही.

अगले दिन फुरसत के पलों में मालती ने अपनी जेठानी को बातों ही बातों में आभास करा दिया कि कल रात जब वह जेठजी के साथ धमाचौकड़ी मचा रही थी, तो वह जाग रही थी.

मालती की जेठानी यह सुन कर शर्म से पानीपानी हो गई, फिर सफाई देते हुए बोली, ‘‘क्या करूं, रात में भोजन करने के बाद उन्हें होश ही नहीं रहता है. मेरे शरीर को तो वे रूई की तरह धुन कर रख देते हैं. उस समय इन के शरीर में बिजली जैसी फुरती और घोड़े जैसी ताकत आ जाती है. घंटों छोड़ते ही नहीं. मैं तो बेदम हो जाती हूं और अगले दिन घर का काम निबटाने में भी मुश्किल हो जाती है.’’

जेठानी की बात सुन कर मालती का मन हुआ कि वह अपनी छाती पीट ले, मगर उस ने हंस कर कहा, ‘‘तुम जेठजी को मनमानी करने दो, घर का काम मैं संभाल लूंगी.’’

इस चर्चा का नतीजा यह हुआ कि उस रात मालती की जेठानी बरामदे में न लेट कर अपने कमरे में जा कर लेट गई. रात में जब उस के जेठ ने अपनी पत्नी से कहा, ‘‘वहां क्यों गरमी में सड़ रही हो. यहां बाहर ठंडी हवा में क्यों  नहीं लेटती?’’

‘‘आज मैं कमरे में ही लेटूंगी. तुम्हें वहां लेटना हो तो लेटो,’’ जेठानी ने कमरे से ही जवाब दिया.

मालती अपने कमरे में लेटी उन दोनों की बातचीत सुन रही थी. राकेश  मालती को कुछ क्षणों में अपनी मर्दानगी दिखा कर हांफता हुआ एक तरफ को लुढ़क गया और जल्दी ही गहरी नींद में सो गया. मगर मालती को आधी रात तक नींद ही नहीं आई. इस बीच वह अपने कमरे से बाहर निकली. बरामदे में उस के जेठ खर्राटे भर रहे थे.

बाथरूम से जब वह वापस लौटी,  तो जेठ की चारपाई के पास आ कर उस के पैर ठिठक गए. उस ने एक क्षण रुक कर पूरे घर का जायजा लिया. घोर सन्नाटा पसरा हुआ था. उसे इतमीनान हो गया कि सभी लोग गहरी नींद में सो रहे हैं. वह हिम्मत कर के सुरेश की चारपाई पर उस से चिपक कर लेट गई.

नशे में चूर सुरेश की नींद जल्दी ही खुल गई और उस ने मालती को दबोच कर संबंध बनाना शुरू कर दिया. जल्दी ही मालती की झिझक दूर हो गई और वह भी सुरेश का साथ देने लगी.

जब सुरेश की पकड़ धीमी पड़ी, तब तक मालती संतुष्ट हो चुकी थी. पसीने से लथपथ सुरेश ने जब उसे छोड़ा, तभी उस की नजर मालती के चेहरे पर पड़ी. उस ने चौंक कर कहा, ‘‘तुम…?’’

तभी मालती ने सुरेश के मुंह पर हाथ रख कर कहा, ‘‘आप ने एक प्यासी की आज प्यास बुझाई है. आप के भाई तो किसी लायक हैं नहीं, मजबूरन मुझे अपनी प्यास बुझाने के लिए आप के पास आना पड़ा.’’

मालती चुपचाप अपने कमरे में आ कर सो गई.

इस के बाद से तो वह हर दूसरेतीसरे दिन रात को उठ कर सुरेश के पास जा कर अपनी प्यास बुझाने लगी.

सुरेश ने 2-3 बार तो संकोच का अनुभव किया, मगर फिर वह भी हर रात को मालती का इंतजार करने लगा. उस की अपनी पत्नी तो बच्चे पालने में ही परेशान रहती थी, फिर उम्र के साथ ही उस का जोश भी कम होता जा  रहा था.

सर्दियों में मालती ने सुरेश से नींद की गोलियां मंगवा लीं और रोजाना खाने में नींद की गोलियां डाल कर राकेश और अपनी जेठानी को देने लगी.

सुरेश अब दिनभर चौपाल में पड़ा सोता रहता और रात में राकेश के सोने के बाद उस के कमरे में घुस जाता और मालती के साथ मजे लेता.

मगर, एक रात सुरेश की मां जब आंगन में शौचालय जा रही थीं, तभी सुरेश को मालती के कमरे से निकल कर अपने कमरे में जाते हुए देख लिया. वे दबे पैर मालती के कमरे में गईं, राकेश खर्राटे भर रहा था.

उन्होंने मालती को बाल पकड़ कर उठाया और बोलीं, ‘‘वर्जित फल खाते हुए शर्म नहीं आई तु?ो कुलच्छिनी?’’

मालती चोरी पकड़े जाने पर पहले तो सकपकाई, मगर फिर संभल कर बोली, ‘‘भूख पर एक सीमा तक ही काबू रखा जा सकता है अम्मां. वर्जित फल स्वाद के लिए नहीं, मजबूरी में खाती हूं. तुम्हारे बेटे को तो औरत की जरूरत  ही नहीं है.  मैं उन के सहारे नहीं रह सकूंगी अम्मां.’’

उन दोनों की बातचीत सुन कर राकेश भी जाग गया था. उसे अपनी कमजोरी का अहसास तो था ही, इसीलिए वह चुपचाप सिर झुका कर कमरे के बाहर निकल गया. Hindi Romantic Story

Hindi Family Story: दूसरी भूल – अनीता की कशमकश

Hindi Family Story: अनीता बाजार से कुछ घरेलू चीजें खरीद कर टैंपू में बैठी हुई घर की ओर आ रही थी. एक जगह पर टैंपू रुका. उस टैंपू में से 4 सवारियां उतरीं और एक सवारी सामने वाली सीट पर आ कर बैठ गई.जैसे ही अनीता की नजर उस सवारी पर पड़ी, तो वह एकदम चौंक गई और उस के दिल की धड़कनें बढ़ गईं.

इस से पहले कि अनीता कुछ कहती, सामने बैठा हुआ नौजवान, जिस का नाम मनोज था, ने उस की ओर देखते हुए कहा, ‘‘अरे अनीता, तुम?’’

‘‘हां मैं,’’ अनीता ने बड़े ही बेमन से जवाब दिया.

‘‘तुम कैसी हो? आज हम काफी दिन बाद मिल रहे?हैं,’’ मनोज के चेहरे पर खुशी तैर रही थी.

‘‘मैं ठीक हूं.’’

‘‘मुझे पता चला था कि यहां इस शहर में तुम्हारी शादी हुई है. जान सकता हूं कि परिवार में कौनकौन हैं?’’

‘‘मेरे पति, 2 बेटियां और एक बेटा,’’ अनीता बोली.

‘‘तुम्हारे पति क्या करते हैं?’’

‘‘कार मेकैनिक हैं.’’

‘‘क्या नाम है?’’

‘‘नरेंद्र कुमार.’’

‘‘मैं यहां अपनी कंपनी के काम से आया था. अब काम हो चुका है. रात की ट्रेन से वापस चला जाऊंगा,’’ मनोज ने अनीता की ओर देखते हुए कहा, ‘‘घर का पता नहीं बताओगी?’’

‘‘क्या करोगे पता ले कर?’’ अनीता कुछ सोचते हुए बोली.

‘‘कभी तुम से मिलने आ जाऊंगा.’’

‘‘क्या करोगे मिल कर? देखो मनोज, अब मेरी शादी हो चुकी?है और मुझे उम्मीद है कि तुम ने भी शादी कर ली होगी. तुम्हारे घर में भी पत्नी व बच्चे होंगे.’’

‘‘हां, पत्नी और 2 बेटे हैं. तुम मुझे पता बता दो. वैसे, तुम्हारे घर आने का मेरा कोई हक तो नहीं है, पर एक पुराने प्रेमी नहीं, बल्कि एक दोस्त के रूप में आ जाऊंगा किसी दिन.’’

‘‘शिव मंदिर के सामने, जवाहर नगर,’’ अनीता ने कहा.

कुछ देर बाद टैंपू रुका. अनीता टैंपू से उतरने लगी.

‘‘अनीता, अब तो रात को मैं वापस आगरा जा रहा हूं, फिर किसी दिन आऊंगा.’’

अनीता ने कोई जवाब नहीं दिया. घर पहुंच कर उस ने देखा कि उस की बड़ी बेटी कल्पना, छोटी बेटी अल्पना और बेटा कमल कमरे में बैठे हुए स्कूल का काम कर रहे थे.

अनीता ने कल्पना से कहा, ‘‘बेटी, मैं जरा आराम कर रही हूं. सिर में तेज दर्द है.’’

‘‘मम्मी, आप को डिस्प्रिन की दवा या चाय दूं?’’ कल्पना ने पूछा.

‘‘नहीं बेटी, कुछ नहीं,’’ अनीता ने कहा और दूसरे कमरे में जा कर लेट गई.

अनीता को तकरीबन 11 साल पहले की बातें याद आने लगीं. जब वह 12वीं जमात में पढ़ रही थी. कालेज से छुट्टी होने पर वह एक नौजवान को अपने इंतजार में पाती थी. वह मनोज ही था. उन दोनों का प्यार बढ़ने लगा. अनीता जान चुकी थी कि मनोज किसी प्राइवेट कंपनी में नौकरी कर रहा है.

मनोज के पिताजी का अपना कारोबार था और अनीता के पिताजी का भी. वे दोनों शादी करना चाहते थे, पर अनीता के पापा को यह रिश्ता बिलकुल मंजूर नहीं था.

लिहाजा, अनीता और मनोज ने घर से भागने की ठान ली. घर से 50 हजार रुपए नकद व कुछ जेवर ले कर अनीता मनोज के साथ जयपुर जाने वाली ट्रेन में बैठ गई थी.

जयपुर पहुंच कर वे 8-10 दिन होटल में रहे. पता नहीं, पुलिस को कैसे पता चल गया और उन दोनों को पकड़ लिया गया. अनीता के पापा को आगरा से बुलाया गया. मनोज को पुलिस ने नहीं छोड़ा. नाबालिग लड़की को भगाने के अपराध में जेल भेज दिया गया.

पापा को अनीता से बहुत नफरत हो गई थी, क्योंकि उस ने कहना नहीं माना था.

अनीता ने आगे पढ़ाई करने को कहा था, पर पापा ने मना कर दिया था और उस की शादी करने की ठान ली थी. उस के लिए रिश्ते ढूंढ़े जाने लगे.

सालभर इधरउधर धक्के खाने के बाद पापा को एक रिश्ता मिल ही गया था. विधुर नरेंद्र की उम्र 35 साल थी. उस की पत्नी की एक हादसे में मौत हो चुकी थी. उस की 2 बेटियां थीं. एक 5 साल की और दूसरी 3 साल की.

नरेंद्र एक कार मेकैनिक था. उस की अपनी वर्कशौप थी. पापा ने नरेंद्र से जब शादी की बात की, तो उसे सब सच बता दिया था. नरेंद्र ने सब जान कर भी मना नहीं किया था.

अनीता शादी कर के नरेंद्र के घर आ गई थी. अब वह 2 बेटियों की मां बन गई थी.

एक दिन नरेंद्र ने कहा था, ‘देखो अनीता, मुझे तुम्हारी पिछली जिंदगी से कोई मतलब नहीं. तुम भी वह सब भुला दो. इस घर में आने का मतलब है कि अब तुम्हें एक नई जिंदगी शुरू करनी है. अब तुम अल्पना और कल्पना की मम्मी हो… तुम्हें इन दोनों को पालना है.’

‘जी हां, मैं ऐसा ही करूंगी. अब कल्पना और अल्पना आप की ही नहीं, मेरी भी बेटियां हैं,’ अनीता ने कहा था.

एक साल बाद अनीता ने एक बेटे को जन्म दिया था. बेटा पा कर नरेंद्र बहुत खुश हुआ था. बेटे का नाम कमल रखा गया था.

अनीता नरेंद्र को पति के रूप में पा कर खुश थी और उस ने भी कभी शिकायत का मौका नहीं दिया था. पापामम्मी भी अपना गुस्सा भूल कर अब उस से मिलने आने लगे थे.

आज दोपहर अनीता की अचानक मनोज से मुलाकात हो गई. उसे मनोज को घर का पता नहीं देना चाहिए था.

उस के दिल में एक अनजाना सा डर बैठने लगा. वह आंखें बंद किए चुपचाप लेटी रही.

अगले दिन सुबह के तकरीबन 11 बजे अनीता रसोई में खाना तैयार कर रही थी. कालबेल बज उठी. उस ने दरवाजा खोला, तो सामने मनोज खड़ा था.

‘‘तुम…’’ अनीता के मुंह से अचानक ही निकला,’’ तुम तो कह रहे थे कि मैं रात की गाड़ी से आगरा जा रहा हूं.’’

‘‘अनीता, मुझे रात की गाड़ी से ही आगरा जाना था, पर टैंपू में तुम से मिलने के बाद मेरा दिल दोबारा मिलने को बेचैन हो उठा. होटल में रातभर नींद नहीं आई. तुम्हारे बारे में ही सोचता रहा. तुम नहीं जानती अनीता कि मैं आज भी तुम को कितना चाहता हूं,’’ मनोज ने कहा.

अनीता चुपचाप खड़ी रही. उस ने कोई जवाब नहीं दिया.

‘‘अनीता, अंदर आने के लिए नहीं कहोगी क्या? मैं तुम से केवल 10 मिनट बातें करना चाहता हूं.’’

‘‘आओ,’’ न चाहते हुए भी अनीता के मुंह से निकल गया.

कमरे में सोफे पर बैठते हुए मनोज ने इधरउधर देखते हुए पूछा, ‘‘कोई दिखाई नहीं दे रहा है… सभी कहीं गए हैं क्या?’’

‘‘बच्चे स्कूल गए हैं और नरेंद्र वर्कशौप गए हैं,’’ अनीता बोली.

तभी रसोई से गैस पर रखे कुकर से सीटी की आवाज सुनाई दी.

‘‘जो कहना है, जल्दी कहो. मुझे खाना बनाना है.’’

‘‘अनीता, तुम अब पहले से भी ज्यादा खूबसूरत हो गई हो. दिल करता है कि तुम्हें देखता ही रहूं. क्या तुम्हें जयपुर के होटल के उस कमरे की याद आती है, जहां हम ने रातें गुजारी थीं?’’

‘‘क्या यही कहने के लिए तुम यहां आए हो?’’

‘‘अनीता, मैं तुम्हारे पति को सब बताना चाहता हूं.’’

‘‘तुम उन्हें क्या बताओगे?’’ अनीता ने घबरा कर पूछा.

‘‘मैं नरेंद्र से कहूंगा कि जयपुर में मैं अकेला ही नहीं था. मेरे 2 दोस्त और भी थे, जिन के साथ अनीता ने खूब मस्ती की थी.’’

‘‘झठ, बिलकुल झूठ,’’ अनीता गुस्से से चीखी.

‘‘यह झूठ है, पर इसे मैं और तुम ही तो जानते हैं. तुम्हारा पति तो सुनते ही एकदम यकीन कर लेगा,’’ मनोज ने अनीता की ओर देखते हुए कहा.

अनीता ने हाथ जोड़ कर पूछा, ‘‘तुम आखिर चाहते क्या हो?’’

‘‘मैं चाहता हूं कि आज दोपहर बाद तुम मेरे होटल के कमरे में आ जाओ.’’

‘‘नहीं मनोज, मैं नहीं आऊंगी. अब मैं अपनी जिंदगी में जहर नहीं घोलूंगी. नरेंद्र मुझ पर बहुत विश्वास करते हैं. मैं उन से विश्वासघात नहीं करूंगी,’’ अनीता ने मनोज से घूरते हुए कहा.

‘‘तो ठीक है अनीता, मैं नरेंद्र से मिलने जा रहा हूं वर्कशौप पर,’’ मनोज ने कहा.

‘‘वर्कशौप जाने की जरूरत नहीं है. मैं यहीं आ गया हूं,’’ नरेंद्र की आवाज सुनाई पड़ी.

यह देख अनीता और मनोज बुरी तरह चौंक उठे. अनीता के चेहरे का रंग एकदम पीला पड़ गया.

‘‘यहां क्यों आया है?’’ नरेंद्र ने मनोज को घूरते हुए पूछा, ‘‘तुझे इस घर का पता किस ने दिया?’’

‘‘अनीता ने. कल यह मुझे बाजार में मिली थी,’’ मनोज बोला.

अनीता ने घबराते हुए नरेंद्र को पूरी बात बता दी.

‘‘अबे, तुझे अनीता ने पता क्या इसलिए दिया था कि तू घर आए और उसे ब्लैकमेल करे. मैं ने तुम दोनों की बातें सुन ली हैं. अब तू यहां से दफा हो जा. फिर कभी इस घर में आने की कोशिश की, तो पुलिस के हवाले कर दूंगा,’’ नरेंद्र ने मनोज की ओर नफरत से देखते हुए गुस्साई आवाज में कहा.

मनोज चुपचाप घर से निकल गया.अनीता को रुलाई आ गई. वह सुबकते हुए बोली, ‘‘मुझे माफ कर दो. मुझ से बहुत बड़ी भूल हो गई, जो मैं ने मनोज को घर का पता दे दिया था.’’

‘‘हां अनीता, यह तुम्हारी जिंदगी की दूसरी भूल है, जो तुम ने अपने दुश्मन को घर में आने दिया. मनोज तुम्हारा प्रेमी नहीं, बल्कि दुश्मन था. सच्चे प्रेमी कभी भी अपनी प्रेमिका को घर से रुपएगहने वगैरह ले कर भागने को नहीं कहते.’’

अनीता की आंखों से आंसू बहते रहे. नरेंद्र ने उस के चेहरे से आंसू पोंछते हुए कहा, ‘‘अनीता, मुझे तुम पर बहुत विश्वास था, पर आज की बातें सुन कर यह विश्वास और बढ़ गया है. वैसे तो मनोज अब यहां नहीं आएगा और अगर आ भी गया, तो मुझे फोन कर देना. मैं उसे पुलिस के हवाले कर दूंगा.’’

नरेंद्र की यह बात सुन कर अनीता के मुंह से केवल इतना ही निकला, ‘‘आप कितने अच्छे हैं…’ Hindi Family Story

Story In Hindi: आखिर कितना घूरोगे – बौस को हड़काने वाली दब्बू लड़की

Story In Hindi: काली, कजरारी, बड़ीबड़ी मृगनयनी आंखें भला किस को खूबसूरत नहीं लगतीं? मगर उन से भी ज्यादा खूबसूरत होते हैं उन आंखों में बसे सपने कुछ बनने के, कुछ करने के. सपने लड़कालड़की देख कर नहीं आते. छोटाबड़ा शहर देख कर नहीं आते.

फिर भी अकसर छोटे शहर की लड़कियां उन सपनों को किसी बड़े संदूक में छिपा लेती हैं. उस संदूक का नाम होता है- कल. कारण वही पुराना. अभी हमारे देश के छोटे शहरों और कसबों में सोच बदली कहां है? घर की इज्जत है लड़की, जल्दी शादी कर उसे घर भेजना है, वहां की अमानत बना कर मायके में पाली जा रही है. इसीलिए लड़कियों के सपने उस कभी न खुलने वाले संदूक में उन के साथसाथ ससुराल और अर्थी तक की यात्रा करते हैं पर कुछ लड़कियां बचपन में ही खोल देती हैं उस संदूक को, उन के सपने छिटक जाते हैं.

इस से पहले बीन पाएं बड़ी ही निर्ममता से कुचल दिए जाते हैं उन के अपनों द्वारा, समाज द्वारा. विरली ही होती हैं, जो सपनों की पताका थाम कर आगे बढ़ती हैं. यहां भी उन की राह आसान नहीं होती. बारबार उन की स्त्रीदेह उन की राह में बाधक होती है. अपने सपनों को अपनी शर्त पर जीने के लिए उन्हें चट्टान बन कर हर मुश्किल से टकराना होता है. ऐसी ही एक लड़की है वैशाली.

हर शहर की एक धड़कन होती है. वह वहां के निवासियों की सामूहिक सोच से बनती है. दिल्लीमुंबई में सब पैसे के पीछे भागते मिलेंगे. वाहन सब दौड़ रहे हैं. एक मिनट भी जाया करना जैसे अपराध है. छोटे शहरों में इत्मीनान दिखता है. ‘‘हां भैया, कैसे हो?’’ के साथ छोटे शहरों में हालचाल पूछने में ही लोग 2 घंटे रुक जाते हैं. देवास की हवाओं में जीवन की सादगी और भोलेपन की धूप की खुशबू मिली हुई थी जब बाजारवाद ने पूरे देश के छोटेबड़े शहरों में अपनी जड़ें जमा दी थीं.

देवास अभी भी शैशव अवस्था में था. कहने का तात्पर्य यह है कि शहर का असर हमारी वैशाली पर भी था. इन मासूम हवाओं ने ही तो उसे बेहिचक इधरउधर घूमतीफिरती बेफिक्र वैशाली में बदल दिया था. उम्र हर साल एक सीढ़ी चढ़ जाती पर बचपना था कि दामन छुड़ाने का नाम ही नहीं लेता.

वैसे भी वह अपने मांबाप की एकलौती बेटी होने के कारण बहुत प्यार में पली थी. जो इच्छा करती झट से पूरी हो जाती. यों छोटीमोटी इच्छाओं के अलावा एक इच्छा जो वैशाली बचपन से अपने मन में पाल रही थी वह थी आत्मनिर्भर होने की. वह जानती थी कि इस मामले में मातापिता को मनाना जरा कठिन है, पर उस ने मेहनत और उमीद नहीं छोड़ी. वह हर साल अपने स्कूल में अच्छे नंबर ला कर पास होती रही. मातापिता की इच्छा थी कि पढ़लिख जाए तो फिर जल्दी ब्याह कर दें और गंगा नहाएं.

एक दिन उस ने मातापिता के सामने अपनी इच्छा जाहिर कर दी कि वह नौकरी कर के अपने पंखों को विस्तार देना चाहती है. शादी उस के बाद ही. काफी देर मंथन करने के बाद आखिरकार उन्होंने इजाजत दे दी. वैशाली तैयारी में जुट गई. आखिरकार उस की मेहनत रंग लाई और दिल्ली की एक बड़ी कंपनी में नौकरी मिल गई.

वैशाली की खुशी जैसे घर की हवाओं में अगरबत्ती की तरह महकने लगी. मातापिता भी उस की खुशी में शामिल थे पर अंदरअंदर डर था इतनी दूर दिल्ली में अकेली कैसे रहेगी.

आसपास के लोगों ने भी बहुत डराया, ‘‘दिल्ली है… भाई दिल्ली, लड़कियां सुरक्षित नहीं हैं. जरा देखभाल के रहने का इंतजाम कराना.’’

वे खुद भी तो आए दिन अखबारों में दिल्ली की खबरें पढ़ते रहते थे. यह अलग बात है कि छोटेबड़े कौन से शहर लड़कियों के लिए सुरक्षित हैं पर खबर तो दिल्ली की ही बनती है.

दिल्ली देश की ही नहीं खबरों की भी है. आम आदमी तो खबरें पढ़पढ़ कर वैसे ही घबराया रहता है जैसे सारा अपराध बस दिल्ली में ही होते हो. जितना हो सकता था उन्होंने वैशाली को ऊंचनीच सम झाई भी. फिर भी डर था कि जाने का नाम नहीं ले रहा था. दिल्ली में निवास करने वाले अड़ोसपड़ोस के दूरदराज के रिश्तेदारों के पते लिए जाने लगे. न जाने कितने नंबर इधरउधर के परिचितों के ले कर वैशाली के मोबाइल की कौंटैक्ट लिस्ट में जोड़े जाने लगे.

तसल्ली बस इतनी थी कि किसी गाढ़े वक्त में बेटी फोन मिला देगी तो कोई मना थोड़ी न कर देगा. आखिर इतनी इंसानियत तो बची ही है जमाने में. उन्हें क्या पता कि दिल्ली घड़ी की नोंक पर चलती है.

आखिरकार लक्ष्मीनगर में एक गर्ल्स पीजी किराए पर ले लिया. खानानाश्ता मिल ही जाएगा. औफिस बस 2 मैट्रो स्टेशन दूर था. यहां सब लड़कियां ही थीं. पिता निश्चिंत हुए कि उन की लड़की सुरक्षित है.

वैशाली अपना रूम एक और लड़की से शेयर करती थी. उस का नाम था मंजुलिका. मंजुलिका वैस्ट बंगाल से थी. जहां वैशाली दबीसिकुड़ी सी थी वहीं मंजुलिका तेजतर्रार हाईफाई. कई सालों से दिल्ली में रह रही थी. चाहे आप इसे आबोहवा कहें या वक्त की जरूरत, दिल्ली की खास बात है कि वह लड़कियों को अपनी बात मजबूती से रखना सिखा ही देती है. मंडे की जौइनिंग थी. मातापिता चले गए थे.

अब शनिवार, इतवार पीजी में ही काटने थे. बड़ा अजीब लग रहा था… इतनी तेजतर्रार लड़की के साथ दोस्ती करना पर जरूरत ने दोनों में दोस्ती करा दी. शुरुआत मंजुला ने ही करी. पर जब उस ने अपने लोक के किस्सों का पिटारा खोला तो खुलता ही चला गया.

वैशाली रस लेले कर सुनती रही. उस के लिए यह एक अजीब दुनिया थी. अपना लोक याद आने लगा जहां लोगों के पास इतना समय होता था कि कभी भी, कहीं भी महफिलें जम जातीं. लोग चाचा, मामा, फूफा होते…मैडम और सर नहीं. देर तक बातें करने के बाद दोनों रात की श्यामल चादर ओढ़ कर सो गईं.

औफिस का पहला दिन था. वैशाली ने अपनी जींस और लूज शर्ट पहन ली. गीले बालों पर कंघी करती हुई वह बाथरूम से बाहर निकली ही थी कि मंजुलिका ने सीटी बजाते हुए कहा कि पटाखा लग रही हो, क्या फिगर है तुम्हारी. वह भी हंस दी.

वैसे जींसटौप तो कभीकभी देवास में भी पहना करती थी. कभी ऐसा कुछ अटपटा महसूस ही नहीं हुआ था. उस ने ध्यान ही कहां दिया था अपनी फिगर पर. उस का ऊपर का हिस्सा कुछ ज्यादा ही भारी है यह उसे आज महसूस हुआ जब औफिस पहुंचने पर बौस सन्मुख ने उसे अपने चैंबर में बुलाया और उस से बात करते हुए पूरे 2 मिनट तक उस के ऊपरी भाग को घूरते रहे.

वैशाली को अजीब सी लिजलिजी सी फीलिंग हुई जैसे सैकड़ों चींटियां उस के शरीर को काट रही हों. उस ने जोर से खांसा. बौस को जैसे होश आया. उसे फाइल पकड़ा कर काम करने को कहा.

फाइल ले कर वैशाली अपनी टेबल पर आ गई. संज्ञाशून्य सी. देवास में भी ने लफंगे टाइप के लड़के देखे थे पर शायद हर समय मां या पिताजी के साथ रहने या फिर सड़क पर घूमने वाले बड़ों का लिहाज था, इसलिए किसी की इतनी हिम्मत नहीं हुई थी. उफ, कैसे टिकेगी वह यहां? उसे पिताजी की याद आने लगी. जब शीशे के पार कैबिन में बैठे हुए उस ने सन्मुख को देखा तो पिता की ही तरह लगे थे. 50 के आसपास की उम्र, हलके सफेद बाल, शालीन सा चेहरा. बड़ा सुकून हुआ था कि बौस के रूप में उसे पिता का संरक्षण मिल गया है.

क्यों एक पुरुष अपनी बेटी की उम्र की लड़कियों के लिए बस पुरुष ही होता है. अपने विचारों को झटक कर वैशाली ने अपना ध्यान काम पर लगाने का मन बनाया. आखिर वह यहां काम करने ही तो आई है. कुछ बनने आई है. सारी मेहनत, सारा संघर्ष इसीलिए तो था. वह हिम्मत से काम लेगी और अपना पूरा ध्यान अपने सपनों को पूरा करने में लगाएगी. मगर जितनी बार भी उसे बौस के औफिस में जाना पड़ता उस का संकल्प हिल जाता. अब तो बौस और ढीठ होते जा रहे थे. उस के खांसने का भी उन पर कोई असर नहीं पड़ रहा था.

पीजी में लौटने के बाद वैशाली खुद को बहुत समझाती रही कि उसे बस अपने सपनों पर ध्यान देना है, पर उस लिजलिजी एहसास का वह क्या करे जो उसे अपनी देह पर महसूस होता, चींटियां सी चुभतीं, घिन आती. घंटों साबुन रगड़ कर नहाई पर वह फीलिंग निकलने का ही नहीं ले रही थी. काश,मैल साबुन से धोए जा सकते. आज उसे अपने शरीर से नफरत हो रही थी. पर क्यों? उस की तो कोई गलती नहीं थी. अफसोस, यह एक दिन का किस्सा नहीं था. आखिर रोजरोज उन काट खाने वाली नजरों से खुद को कैसे बचाती.

हफ्तेभर में वैशाली जींसटौप छोड़ कर सलवारकुरते में आ गई. 10 दिन बाद दुपट्टा भी पूरा खोल कर लेने लगी और 15वें दिन तक दुपट्टे में इधरउधर कई सेफ्टी पिन लगाने लगी. मगर बौस की ऐक्सरे नजरें हर दुपट्टे हर सेफ्टी पिन के पास पहुंच ही जातीं. आखिर वह इस से ज्यादा कर ही क्या सकती थी?

वह समझ नहीं पा रही थी कि इस समस्या का सामना कैसे करे. 1-1 दिन कर के 1 महीना बीता. पहली पगार उस के हाथ में थी. पर वह खुशी नहीं थी जिस की उस ने कल्पना की थी.

मंजुलिका ने टोका, ‘‘आज तो पगार मिली है, पहली पगार. आज तो पार्टी बनती है.’’

वैशाली खुद को रोक नहीं पाई और जितना दिल में भरा था सब उड़ेल दिया.

मंजुलिका दांत भींच कर गुस्से में बोली, ‘‘उस की मां की बहन नहीं हैं क्या? उन्हें जा के घूरे जितना घूरना है… और भी कुछ हरकत करता है क्या? ’’

‘‘नहीं, बस गंदे तरीके से घूरता है. ऐसा लगता है, ऐसा लगता है कि…’’ कुछ कहने के लिए शब्द खोजने में असमर्थ वैशाली की आंखें क्रोध, नफरत और दुख से डबडबा गईं.

‘‘अब समझी तू जींसटौप से सूट पर क्यों आई. अरे, तेरी गलती थोड़ी है न. देख तब भी उस का घूरना तो बंद हुआ नहीं. कहां तक सोचेगी. इग्नोर कर… हम लोग कहां परवाह करते हैं. जो मन आया पहनते हैं, ड्रैस, शौर्ट्स, जैगिंग… अरे जब ऐसे लोगों की आंखों में ऐक्सरे मशीन फिट रहती ही है तो वे कपड़ों के पार देख ही लेंगे, तो अपनी पसंद के कपड़ों के लिए क्यों मन मारें? जरूरी है हम अपना काम करें. परवाह न करें.

“वह कहावत सुनी है न कि हाथी चला बाजार कुत्ते भूंकें हजार. अब आगे बढ़ना है तो इन सब की आदत तो डालनी ही होगी. ठंड रख कुछ दिन बाद नया शिकार ढूंढ़ लेंगे,’’ मंजुलिका किसी अनुभवी बुजुर्ग की तरह उसे शांत करने की कोशिश करने लगी.

‘‘मैं सोच रही हूं, नौकरी बदल लूं…’’ वैशाली ने धीरे से कहा.

उस की बात पर मंजुलिका ने ठहाका लगा कर कहा, “नौकरी बदल कर जहां जाएगी वहां ऐसे ही घूरने वाले मिलेंगे बस नाम और शक्ल अलग होगी. कहा न इग्नोर कर.’’

‘‘इग्नोर करने के अलावा भी कोई तो तरीका होगा न…’’

वैशाली अपनी बात पूरी कर भी नहीं पाई कि मां का फोन आ गया. मांबाबूजी उस की पहली तनख्वाह की खुशी को उस के साथ बांटना चाहते थे. सब बधाई दे रहे थे कि उन की बहादुर बेटी अकेले अपने सपनों के लिए संघर्ष कर रही है.

‘आखिरकार महिला सशक्तीकरण में उन का भी कुछ योगदान है, सोच वह ‘ओह मां,’ ‘ओह पिताजी,’ इतना ही कह पाई पर अंदर तक भीग गई वह इन स्नेहभरे शब्दों से.

वैशाली सारी रात रोती रही. कहां उस के मातापिता उस पर इतना गर्व कर रहे हैं और कहां वह नौकरी छोड़ कर वापस जाने की तैयारी कर रही है और वह भी किसी और के अपराध की सजा खुद को देते हुए. मंजुलिका कहती है, इग्नोर कर… वही तो कर रही थी, वही तो हर लड़की करती है बचपन से ले कर बुढ़ापे तक. पर यह तो समस्या का हल नहीं है. इस से वह लिजलिजी वाली फीलिंग नहीं जाती.

सारी रात वैशाली सोचती रही. अगले दिन लंच पर उस ने अपनी बात साथ में काम करने वाली निधि को बताई. फिर तो जैसे बौस की इस हरकत का पिटारा ही खुल गया. कौन सी ऐसी महिला थी जो उस की इस हरकत से परेशान न होती हो.

निधि ने कहा, ‘‘हाथ पकड़े तो तमाचा भी लगा दूं. पर इस में क्या करूं? मुकर जाएगा.’’

समस्या विकट थी. बात केवल सन्मुख की नहीं थी, ऐसे लोग नाम और रूप बदल कर हर औफिस में हैं, हर जगह हैं. आखिर इन का इलाज क्या हो? और इग्नोर भी कब तक? नहीं वह जरूर इस समस्या का कोई न कोई हल खोज के रहेगी.

घर आने के बाद वैशाली का मन नहीं लगा रहा था. ड्राइंग फाइल निकाल कर स्कैचिंग करने लगी. यही तो करती है हमेशा जब मन उदास होता है.

तभी मामा के लड़के का फोन आ गया. गांव में रहने वाला 10 साल का ममेरा भाई जीवन उसे बहुत प्यारा है. अकसर फोन कर अपने किस्से सुनाता रहता है कि दीदी यह बात, दीदी वह बात… और शुरू हो जाते दोनों के ठहाके.

आज भी उस के पास एक किस्सा था, ‘‘दीदी, सुलभ शौचालय बनने के बाद भी गांव के लोग उस का इस्तेमाल नहीं करते. बस यहांवहां जहां जगह मिलती, बैठ जाते हैं. टीवी में विज्ञापन देख कर हम भी घंटी खरीद लाए. अब गांव में घूमते हुए जहां कोई फारिग होता मिल जाता तो बस घंटी बजा देते हैं.

“सच्ची दीदी, बहुत खिसियाता है. कपड़े समेट कर उठ खड़ा होता है. उस की झेंप देखने लायक होती है. उसे गलत काम का एहसास होता है. देखना एक दिन ये सब लोग शौचालय का इस्तेमाल करने लगेंगे.’’

बहुत देर तक वह इस बात पर हंसती रही फिर न जाने कब नींद ने उसे अपने आगोश में ले लिया. आंख सीधे सुबह ही खुली. घड़ी देखी, देर हो रही थी. सीधे बाथरूम की तरफ भागी.

आज उस ने जींसटौप ही पहना. बढ़ती धड़कनों को काबू कर पूरी हिम्मत के साथ औफिस गई और अपनी सीट पर बैठ कर फाइलें निबटाने लगी.

तभी बौस ने उसे कैबिन में बुलाया. उसे देख उन के चेहरे पर मुसकराहट तैर गई. आंखें अपना काम करने लगीं.

‘‘एक मिनट सर,’’ वैशाली ने जोर से कहा. सन्मुख हड़बड़ा कर उस के चेहरे की ओर देखने लगे. वैशाली ने फिर से अपनी बात पर वजन देते हुए कहा, ‘‘एक मिनट सर, मैं यहां बैठ जाती हूं फिर 5 मिनट तक आप मुझे जितना चाहिए घूरिए और यह हर सुबह का नियम बना लीजिए. पर बस एक बार ताकि जितनी भी लिजलिजी फीलिंग मुझे होनी है वह एक बार हो जाए. उस के बाद अपनी सीट पर जा कर मैं काम करना शुरू करूं तो मुझे यह डर न लगे कि अभी आप फिर बुलाएंगे, फिर घूरेंगे और मैं फिर उसी गंदी फीलिंग से और अपने शरीर के प्रति उसी अपराधबोध से गुजरूंगी… जिस दिन से औफिस में आई हूं ये सब झेल रही हूं,’’ मन में आया कि पूछे कि क्या आप की मांबहन नहीं हैं क्या? जितना घूरना है उन्हें घूरो. पर फिर मन में आया कि नहीं, यह नहीं कहेगा, क्योंकि वह जानती है कि आप नहीं कोई और निश्चित तौर पर आप की मां, बहन को घूर रहा होगा. अपनी मांबहन, पत्नीबेटी सब से कह दीजिएगा कि वे भी घूरने का टाइम फिक्स कर दें. दोनों का समय और तकलीफ बचेगी.

‘‘जी सर, हमारा भी टाइम फिक्स कर दीजिए,’’ वैशाली के पीछे आ कर खड़ी हुई निधि व अन्य महिलाओं ने समवेत स्वर में कहा.

वैशाली अंदर आते समय जानबूझ कर गेट खुला छोड़ आई और उस के पीछे थी इस साहस पर तालियां बजाते पुरुष कर्मचारियों की पंक्ति.

बौस शर्म से पानीपानी हो रहे थे. फिर उस दिन के बाद सन्मुख कभी किसी किसी महिला को घूरते नहीं पाए गए.

चाहे आप इसे आबोहवा कहें या वक्त की जरूरत, दिल्ली की खास बात है कि वह लड़कियों को अपनी बात मजबूती से रखना सिखा ही देती है.

‘‘अगले दिन लंच पर उस ने अपनी बात साथ में काम करने वाली निधि को बताई. फिर तो जैसे बौस की इस हरकत का पिटारा ही खुल गया…’’ Story In Hindi

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