जब सलाखों के पीछे पहुंचा मृतक

कमरे में गहरा सन्नाटा पसरा था. कमरे में सिर्फ 3 लोग बैठे थे, एसपी (देहात) डा. ईरज राजा के सामने लोनी सर्किल के सीओ रजनीश कुमार उपाध्याय और लोनी बौर्डर थाने के थानाप्रभारी सचिन कुमार थे. पिछले 24 घंटे में उस पेचीदा मामले ने 3 अफसरों के दिमाग को हिला कर रख दिया था.

कत्ल की उस वारदात में कई ऐसे पेंच थे, जिस ने सवालों का अंबार खड़ा कर दिया था. उन्हीं उलझी हुई कडि़यों को जोड़ने के लिए तीनों अधिकारी माथापच्ची कर रहे थे. लेकिन अभी तक कोई ऐसा क्लू हाथ नहीं आ रहा था, जिस से कत्ल की इस वारदात का अंतिम सिरा हाथ आ सके.

20 नवंबर को लोनी के ए-105 इंद्रापुरी में रहने वाले मनीष त्यागी ने लोनी बौर्डर थाने में आ कर सूचना दी कि उस के घर के सामने खाली प्लौट में एक लाश पड़ी है.

इस सूचना पर लोनी बौर्डर थानाप्रभारी सचिन कुमार जब अपनी टीम के साथ वहां पहुंचे तो देखा कि वह किसी पुरुष की लाश थी. लाश बुरी तरह से जली हुई थी. खासकर लाश का चेहरा इतनी बुरी तरह तरह जला हुआ था कि उसे देख कर मरने वाले की पहचान कर पाना भी मुमकिन नहीं था.

पुलिस ने सब से पहले आसपास रहने वाले लोगों को बुला कर लाश की पहचान कराने की कोशिश की. लोगों से यह भी पूछा गया कि किसी घर से कोई लापता तो नहीं है.

लोगों ने लाश के कपड़ों व कदकाठी से उस की पहचान करने की कोशिश की, मगर पुलिस को इस काम में कोई सफलता नहीं मिली.

लाश की सूचना मिलने पर लोनी क्षेत्र के सीओ रजनीश कुमार उपाध्याय और एसपी (देहात) डा. ईरज राजा भी घटनास्थल पर पहुंच चुके थे.

सभी ने एक खास बात नोट की थी कि हत्यारे ने लाश के चेहरे व ऊपरी भाग को ही जलाने का प्रयास किया था. धड़ से नीचे का हिस्सा व उस पर पहने हुए कपड़े सहीसलामत थे.

लाश को पोस्टमार्टम के लिए भेजने से पहले पुलिस ने जब उस के पहने हुए कपड़ों की तलाशी ली तो आश्चर्यजनक रूप से उस में से डेढ़ सौ रुपए तथा एक आधार कार्ड बरामद हुआ.

आधार कार्ड मिलने के बाद पुलिस वालों की आंखें चमक उठीं. मृतक की जेब से जो आधार कार्ड मिला था, उस के मुताबिक मृतक 40 वर्षीय सुदेश कुमार पुत्र रामपाल था, जिस के निवास का पता मकान नंबर 331, गली नंबर 4, फेस -4 शिवविहार, करावल नगर, पूर्वी दिल्ली था.

एसपी (देहात) के आदेश पर एसएसआई प्रदीप शर्मा के नेतृत्व में पुलिस की एक टीम को उत्तरपूर्वी दिल्ली के करावल नगर में उक्त पते पर भेजा.

पुलिस को वहां सुदेश की पत्नी अनुपमा मिली. पुलिस ने जब अनुपमा से उस के पति के बारे में पूछताछ की तो उस ने बताया कि उस के पति एक दिन पहले किसी काम से बाहर गए हैं और अब तक लौट कर नहीं आए.

आशंकित अनुपमा ने जब पुलिस से इस पूछताछ का कारण जानना चाहा तो पुलिस को बताना पड़ा कि उन्हें लोनी बौर्डर के इंद्रापुरी इलाके में एक जली हुई लाश मिली है जिस की जेब में वह आधार कार्ड मिला है जिस की वजह से वो उनके घर पहुंची है.

‘‘हांहां, लाश उन्हीं की होगी, क्योंकि वह आधार कार्ड हमेशा अपनी जेब में रखते थे.’’ कहते हुए अनुपमा ठीक उसी तरह दहाड़ें मार कर रोने लगी, आमतौर पर जैसे एक औरत अपने पति की मौत के बाद विलाप करती है.

‘‘देखिए, आप रोना बंद कीजिए क्योंकि मरने वाले की जेब से जो आधार कार्ड मिला है वह आप के पति का है इसलिए पहले आप लाश की पहचान कर दीजिए. …हो सकता है जो शव मिला है वह आप के पति का न हो,’’ कहते हुए दिलासा दे कर एसएसआई प्रदीप शर्मा अनुपमा व उस के बेटे को अपने साथ ले गए.

तब तक थानाप्रभारी सचिन कुमार, एसपी (देहात) डा. ईरज राजा व सीओ उपाध्याय के कहने पर शव का पंचनामा तैयार कर उसे पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया था. एसएसआई प्रदीप शर्मा अनुपमा व उस के बेटे को ले कर वहीं पहुंच गए.

उन्होंने जब अनुपमा को जली हुई अवस्था में मिला शव दिखाया तो अनुपमा का विलाप और भी बढ़ गया, क्योंकि उस ने शव देखते ही हृदयविदारक ढंग से रोना शुरू कर दिया था.

अब जबकि लाश की पहचान सुदेश कुमार के रूप में हो चुकी थी और उस की पत्नी ने ही पहचान की थी, इसलिए पुलिस ने शव पोस्टमार्टम के लिए डाक्टरों के सुपुर्द कर दिया. उसी दिन शव का पोस्टमार्टम हो गया और पुलिस ने सुदेश का शव उस की पत्नी अनुपमा के सुपुर्द कर दिया. अनुपमा ने उसी शाम अपने परिजनों व जानपहचान वालों की मौजूदगी में शव का अंतिम संस्कार भी कर दिया.

सवाल था कि सुदेश की हत्या क्यों और किस ने की है और शव को इतनी दूर ले जा कर ठिकाने लगाने व उस की पहचान मिटाने का काम किस ने किया है? इस गुत्थी को सुलझाने के लिए गहन जांचपड़ताल की जरूरत थी.

इसलिए डा. ईरज राजा ने सीओ रजनीश कुमार उपाध्याय के नेतृत्व में एक टीम गठित कर दी. टीम में थानाप्रभारी सचिन कुमार, एसएसआई प्रदीप शर्मा, एसआई अमरपाल सिंह, ब्रजकिशोर गौतम, कृष्ण कुमार, हैडकांस्टेबल उदित कुमार, राजीव कुमार, अरविंद कुमार, महिला कांस्टेबल कविता, एसओजी के हैडकांस्टेबल अरुण कुमार, नितिन कुमार, पंकज शर्मा व अनिल सिंह आदि को शामिल किया गया.

पुलिस ने जांचपड़ताल शुरू कर दी थी, इस के लिए सब से पहले पुलिस टीम ने सुदेश कुमार की जन्म कुंडली खंगालनी शुरू की. क्योंकि आमतौर पर जब कातिल गुमनाम हो तो कत्ल का सुराग मरने वाले की जन्म कुंडली में ही छिपा होता है.

पुलिस की टीम ने सुदेश कुमार की पत्नी, उस के बेटे व आसपड़ोस के लोगों से जा कर पूछताछ शुरू की तो चौंकाने वाली जानकारी सामने आई. दरअसल, जिस सुदेश के कातिल को पुलिस तलाश कर रही थी, उस के बारे में जानकारी मिली कि वो तो खुद एक कातिल है और इस समय पैरोल पर है.

दरअसल अपने घर में ही परचून की दुकान चलाने वाले सुदेश के परिवार में पत्नी अनुपमा के अलावा 2 बच्चे थे. 17 साल का बड़ा बेटा सुनील और 13 साल की एक बेटी वंशिका. लेकिन बेटी इलाके के खराब माहौल के कारण गंदी सोहबत का शिकार हो गई और कम उम्र में ही उस के इलाके के किशोर लड़कों से प्रेम संबध बन गए.

सुदेश व उस की पत्नी ने बेटी को कई बार डांटफटकार कर उसे समझाना चाहा, लेकिन उस पर कोई असर नहीं हुआ. एक दिन ऐसा हुआ कि सुदेश की बेटी इलाके के एक युवक के साथ घर से भाग गई.

इस के कारण इलाके में उन की बहुत बदनामी हुई. काफी भागदौड़ के बाद बेटी घर तो वापस आ गई, लेकिन अपमान का घूंट सुदेश से पिया नहीं गया.

उस ने इस घटना के बाद मार्च 2018 में वंशिका की हत्या कर उस के शव को मंडोला में आवासविकास कालोनी के पास खाली जमीन में फेंक दिया. इस के बाद उस ने करावल नगर थाने में बेटी की गुमशुदगी की भादंवि की धारा 363 के तहत मुकदमा दर्ज करा दिया.

बाद में वंशिका का शव बरामद होने के बाद पुलिस ने जांचपड़ताल के बाद सुदेश को अपनी बेटी की हत्या के आरोप में जेल भेज दिया था. तभी से सुदेश मंडोली जेल में बंद था.

लेकिन 2021 को कोरोना की दूसरी लहर में जब सरकार ने विचाराधीन कैदियों को पैरोल पर छोड़ने का फैसला किया तो 21 मई को सुदेश को भी अंतरिम जमानत पर रिहा कर दिया गया था. उसी वक्त से सुदेश अपने बच्चों के बीच था.

21 नवंबर को सुदेश की पैरोल अवधि खत्म हो गई थी. वह जेल में पेश होने के लिए गया, मगर वहां किसी कानूनी अड़चन के कारण उसे जेल में नहीं लिया गया और उसे 22 दिसंबर, 2021 दूसरी डेट पर जेल में पेश होने के लिए कहा गया.

लेकिन इसी बीच किसी ने बेदर्दी से सुदेश की हत्या कर दी. ऐसा कौन था, जिस से सुदेश की ऐसी दुश्मनी थी कि वह उस की इतनी बेदर्दी के साथ हत्या कर देगा.

यह सब जानने के लिए पुलिस ने सुदेश की पत्नी व उस के जानपहचान वालों से खूब कुरेद कर पूछताछ की, मगर सुदेश की हत्या का कारण व उस के कातिल का कोई सुराग नहीं मिल सका.

पुलिस को न तो किसी से सुदेश की दुश्मनी का सुराग मिल रहा था, न ही किसी से लेनदेन के विवाद की खबर मिल रही थी. लेकिन एक ऐसी बात जरूर थी, जिस के कारण जांच की कवायद से जुड़े एसपी देहात डा. ईरज राजा, सीओ रजनीश उपाध्याय और थानाप्रभारी सचिन कुमार उस पर घंटों से माथापच्ची कर रहे थे.

दरअसल, गहराई से पड़ताल करने के बाद कुछ ऐसे सवाल उभरे थे जिन का पुलिस को जवाब ढूंढना था. पुलिस को लाश की जेब से सुदेश कुमार का आधार कार्ड तो मिल गया था, लेकिन जो एक बात हैरान कर रही थी, वह यह कि लाश बेशक बुरी तरह जली हुई थी, लेकिन जेब में पड़ा आधार कार्ड बिलकुल सहीसलामत था, जिसे देखने से लगता था कि शायद यह कार्ड किसी ने आग बुझने के बाद लाश की जेब में डाल दिया हो.

बस यही बात थी जो पुलिस को लगातार खटक रही थी. क्योंकि अगर किसी ने सुदेश की हत्या करने के बाद उस के चेहरे को इसलिए जलाया था कि उस की पहचान न हो सके तो भला वह कातिल उस की जेब में आधार कार्ड क्यों छोड़ेगा.

दोनों ही बातें एकदम विरोधाभासी लग रही थीं और शक पैदा कर रही थीं. शक का एक दूसरा कारण और भी था. क्योंकि सुदेश की मौत के बाद जब उस के शव का पोस्टमार्टम हो गया तथा उस का अंतिम संस्कार हो गया तो 3 दिन बाद से ही उस की पत्नी लोनी बौर्डर थाने में आ कर पुलिस से सुदेश की मौत का डेथ सर्टिफिकेट देने की मांग करने लगी.

जिस महिला के पति की मौत होती है वह तो महीनों तक अपने गम व सदमे से उबर नहीं पाती, लेकिन दूसरी तरफ अनुपमा हर रोज थाने आ कर पुलिस से अपने पति की मौत का सर्टिफिकेट देने की मांग कर रही थी.

पुलिस के लिए उस का व्यवहार बड़ा अटपटा था. पुलिस ने जब उस से कारण पूछा तो वह कहने लगी कि उसे मंडोली जेल में सर्टिफिकेट देना है और उन्हें सुदेश के सरेंडर करने की डेट से पहले यह बताना है कि उस की मौत हो चुकी है.

अनुपमा का यह रवैया भी हैरान कर रहा था. इसलिए एसपी देहात ने इस केस की तफ्तीश को आगे बढ़ाने के लिए टैक्निकल सर्विलांस टीम के साथसाथ मुखबिरों की मदद लेने का फैसला किया. क्योंकि उन्हें लगने लगा था कि सुदेश की हत्या के पीछे कोई गहरी साजिश हो सकती है.

सीओ उपाध्याय के निर्देश पर पुलिस की एक टीम ने गोपनीय ढंग से सुदेश के घर के आसपास लगे सीसीटीवी फुटेज को खंगालने का काम शुरू किया ताकि पता लगाया जा सके कि वारदात से पहले सुदेश कब और किस के साथ घर से गया था और उस ने कौन से कपड़े पहने थे.

संयोग से सुदेश के घर से कुछ ही दूर लगे एक सीसीटीवी कैमरे में ऐसी फुटेज मिल गई, जिस ने पूरे केस की तसवीर ही बदल दी.

सीसीटीवी कैमरे में 19 नवंबर, 2021 की रात को एक संदिग्ध शख्स नजर आया. यह शख्स एक साइकिल पर एक बड़ी सी बोरी ले कर जा रहा था. पुलिस ने सीसीटीवी में दिख रहे इस शख्स की पहचान पता करने की कोशिश की और मुखबिरों को भी यह तसवीर दिखाई. तब आसपास के लोगों ने पुलिस को बताया कि वह शख्स कोई और नहीं बल्कि खुद सुदेश कुमार था.

इस का मतलब था कि सुदेश कुमार मरा नहीं, बल्कि अब भी जिंदा है. तो फिर उस की साइकिल पर जो बोरी लदी थी, उस में वह क्या ले कर जा रहा था?

सीसीटीवी में सब से हैरान करने वाली बात यह दिखी कि आखिरी बार देर रात को करीब 11 बजे अपने घर से निकले सुदेश के शरीर पर वह कपड़े भी नहीं थे जो इंद्रापुरी में जली हालत में मिली लाश के शरीर पर थे, जिसे अनुपमा ने अपने पति की बताया था.

राज बहुत गहरा था. इसीलिए इस की तह में जाने के लिए पुलिस की टीम ने आसपास में रहने वाले कुछ लोगों को अपने विश्वास में ले कर सुदेश के घर पर नजर रखने के लिए लगा दिया.

पुलिस को 1-2 दिन में ही जानकारी मिली कि सुदेश वाकई मरा नहीं जिंदा है और अकसर देर रात में अपने घर चोरीछिपे आता है ताकि किसी को भनक न लग सके.

इतनी जानकारी मिलने के बाद पुलिस समझ गई कि यह एक बड़ी साजिश है इसीलिए पुलिस ने अब सुदेश की पत्नी के मोबाइल को सर्विलांस पर लगा दिया.

पुलिस को फोन की सर्विलांस लगाने का फायदा मिला और एक ऐसा संदेश मिला जिस से पता चला कि सुदेश न सिर्फ जिंदा है बल्कि चोरीछिपे अपने परिवार से भी मिलता है.

इसी क्रम में वह 10 दिसंबर, 2021 की रात को अपने घर आया था और आसपास जाल बिछा कर खड़ी पुलिस टीम ने सुदेश को दबोच लिया. पुलिस ने उस की पत्नी अनुपमा को भी हिरासत में ले लिया.

दोनों को थाने ला कर उच्चाधिकारियों के सामने जब पूछताछ शुरू हुई तो एक ऐसे हत्याकांड की ऐसी कहानी सामने आई, जिस में मृतक मान कर पुलिस उस के कातिल को पकड़ने के लिए दिनरात एक कर रही थी लेकिन पता चला वह न सिर्फ जिंदा है बल्कि उस ने खुद को मरा साबित करने के लिए किसी और की हत्या कर उसे अपनी पहचान दे दी थी. और इस काम में उस की पत्नी ने उस की पूरी मदद की थी.

सुदेश व उस की पत्नी से पूछताछ में पता चला कि 22 दिसंबर को इसे वापस जेल जाना था. जब वह जेल में था तो उसे साथी कैदियों ने बताया था कि जिस तरीके के सबूत उस के खिलाफ हैं, उस के मुताबिक उसे सजा मिलनी तय थी और कम से कम उसे उम्रकैद की सजा मिलेगी.

जब 21 नवंबर को उसे जेल में नहीं लिया गया तो उस ने सोचा कि शायद ऊपर वाला भी नहीं चाहता कि वह जेल जाए. इस के बाद से ही उस ने इस बात पर दिमाग लगाना शुरू कर दिया कि कैसे जेल जाने से बचा जाए. कई दिन तक खूब दिमाग लगाया, लेकिन कोई तरकीब नहीं सूझी.

अचानक एक दिन टीवी पर एक फिल्म देख कर आइडिया मिल गया, जिस में जेल से भागे एक कैदी ने किसी आदमी की हत्या कर उसे अपने कपड़े पहना कर उस के चेहरे को जला दिया और पुलिस ने मान लिया कि कैदी मारा गया है.

यह आइडिया आते ही सुदेश ने दिमाग लगाना शुरू कर दिया कि वह खुद को इसी तरह जेल जाने से बचा सकता है. सुदेश ने जब अपनी पत्नी को दिल की बात बताई तो थोड़ी नानुकुर के बाद अनुपमा को भी यह बात पसंद आ गई. वैसे भी कौन पत्नी नहीं चाहेगी कि उस का पति जेल जाने से बच जाए.

काफी विचारविमर्श के बाद सुदेश व अनुपमा ने इस काम के लिए एक मजदूर का इंतजाम करने के लिए अपनी छत को ठीक कराने का बहाना बनाया. इस के लिए सुदेश 18 नवंबर, 2021 को लेबर चौक गया और अपनी कदकाठी के एक मजदूर, जिस का नाम दोमन रविदास था और वह बिहार के गया जिले के अतरी का रहने वाला था, को ले आया.

18 नवंबर को सुदेश ने पहले दिन अपनी छत की स्लैब डलवाई. मजदूर रविदास के कपडे़ काफी पुराने व फटी हालत में थे लिहाजा सुदेश ने उसे अपना ट्रैकसूट पहनने के लिए दे दिया जिस की जर्सी कौफी कलर की थी और लोअर नीले रंग का था.

अगले दिन भी काम होना था, इसलिए सुदेश ने रविदास को अगले दिन फिर आने के लिए कहा.

19 नवंबर को दोमन रविदास उसी के कपड़े पहन कर फिर काम पर आया. शाम होतेहोते जब काम खत्म हो गया तो शाम को दारू पार्टी के बहाने रोक लिया. दोनों ने शराब पीनी शुरू कर दी. इस दौरान सुदेश खुद कम शराब पीता रहा जबकि उस ने रविदास को बड़ेबड़े पैग पिलाने शुरू कर दिए.

रात करीब 9 बजे रविदास को खूब नशा हो गया. इस दौरान सुदेश और उस अनुपमा ने पहले ही तय कर लिया था कि उन्हें क्या करना है. इस दौरान उन्होंने चारपाई के पाये से रविदास के सिर पर ताबड़तोड़ वार कर हत्या कर दी.

यह बात बेटे सुनील को पता नहीं चले इसलिए उस ने सुनील को अपनी परचून की दुकान पर बैठने के लिए भेज दिया था.

सुदेश ने पहले ही तय कर लिया था कि वे रविदास की हत्या कर उसे सुदेश के रूप में अपनी पहचान देगा. इसीलिए एक दिन पहले उस ने अपना ट्रैकसूट रविदास को पहनने के लिए दिया था. खुद को वह दुनिया की निगाहों में मुर्दा करार दे सके, इस के लिए भी उस ने पूरी प्लानिंग कर ली थी.

सुदेश व अनुपमा को जब इत्मीनान हो गया कि रविदास की मौत हो चुकी है तो कमरे को पानी से साफ कर उस के शव को पहले एक पन्नी में लपेटा. उस के बाद उसे बोरी में भर दिया.

रात को करीब 11 बजे जब इलाके में सन्नाटा पसर गया और उस का बेटा भी सो गया तो सुदेश बोरे में भरे रविदास के शव को साइकिल पर रख कर लोनी बौर्डर थाना क्षेत्र की इंद्रापुरी कालोनी में खाली प्लौट में ले गया.

वहां शव को बोरी से निकाल कर उस के चेहरे और शरीर के ऊपरी हिस्से पर अखबार के कागज व टाट की बोरी रख कर जला दिया ताकि शव की पहचान न हो सके.

शव की पहचान सुदेश के रूप में कराने के लिए उस ने अपना आधार कार्ड रविदास की जेब में रख दिया था. पहले से तय योजना के मुताबिक सुदेश अपने घर गया और पत्नी को आ कर बताया कि जब पुलिस उस से रविदास के शव की शिनाख्त कराए तो वह उस की पहचान कर ले.

सुदेश की पूरी प्लानिंग थी कि वह रविदास को सुदेश साबित कर दे, इसलिए पत्नी के साथ बनी योजना के तहत वह इस के बाद चोरीछिपे देर रात में ही घर आता और इस के अलावा इधरउधर छिप कर अपना वक्त बिताता था.

10 दिसंबर को सुदेश ने अपनी पत्नी को फोन कर के कहा कि वह रात को घर आएगा घर की लाइट जला कर रखना. यदि सब कुछ ठीक हो तो गेट पर सफेद कपड़ा डाल देना. यह बात पुलिस ने सर्विलांस के दौरान सुन ली और पुलिस पहले से आरोपी की तलाश में उस के घर पहुंच गई और लाइट जला कर गेट पर सफेद कपड़ा डाल दिया.

सुदेश के पहुंचते ही पुलिस ने आरोपी व उस की पत्नी को दबोच लिया.

पूछताछ में सुदेश ने बताया कि जेल और सजा से बचने के लिए उस ने खौफनाक घटना को अंजाम दिया था. जेल जाने से बचने के लिए उस ने अपनी पत्नी के साथ मिल कर यह साजिश रची थी. लेकिन उस ने पहली भूल यह कर दी कि काफी प्रयास के बाद भी अपने ही कदकाठी के मजदूर को नहीं तलाश सका था.

सुदेश और अनुपमा की साजिश यह थी कि इस साजिश के पूरा होने पर वे दिल्ली छोड़ कर चले जाएंगे, लेकिन आखिरकार उस के बिना जले आधार कार्ड, सीसीटीवी कैमरे की तसवीरों और दूसरे सबूतों ने उस की खौफनाक साजिश का खुलासा कर दिया.

इस दौरान पुलिस ने करावल नगर थाने और मंडोली जेल से रिकौर्ड निकलवा कर पता कर लिया था कि सुदेश की हाइट 5 फुट 6 इंच है जबकि इंद्रापुरी इलाके में जो शव मिला था, उस की हाइट 5 फुट 3 इंच थी यानी 3 इंच कम.

इसी के बाद पुलिस ने सुदेश के घर की निगरानी शुरू की. उस की पत्नी के फोन को सर्विलांस पर लगाया और वह पुलिस की गिरफ्त में आ गया.

पुलिस ने सुदेश के साथ उस की पत्नी को भी डोमन रविदास की हत्या के आरोप में गिरफ्तार कर हत्या में प्रयुक्त चारपाई का पाया व शव को ठिकाने लगाने वाली साइकिल बरामद कर ली.

सुदेश व अनुपमा की गिरफ्तारी के बाद मुकदमे में भादंवि की धारा 201, 419, 420 व 120बी जोड़ कर उन्हें अदालत में पेश कर दिया, जहां से दोनों को जेल भेज दिया गया.

दूसरी तरफ लोनी बौर्डर पुलिस ने मृतक मजूदर डोमन रविदास की करावल नगर थाने में दर्ज गुमशुदगी को अपने यहां ट्रांसफर करवा ली. रविदास के साथियों के साथ जा कर रविदास के बेटे ने थाना करावल नगर दिल्ली में जा कर घटना के 3 दिन बाद गुमशुदगी दर्ज कराई थी.

—कथा पुलिस की जांच और आरोपियों तथा पीडि़त परिवार से बातचीत पर आधारित

शोला बनी जवानी की आग

गीता की शादी शिवराज पाल से हो जरूर गई थी, लेकिन वह उस की जवानी की आग को बुझा नहीं पाता था. जब यह आग शोला बन कर भड़की तो…

उस दिन तारीख थी 10 मई, 2021. सुबह के 8 बज रहे थे. जालौन जिले के थाना रामपुरा प्रभारी इंसपेक्टर जे.पी. पाल थाने में ही मौजूद थे. उसी समय एक युवक ने थाने में प्रवेश किया. उस के बाल बिखरे थे और चेहरा तमतमाया हुआ था.  हाथ भी खून से सने थे. उसे उस हालत में देख कर जे.पी. पाल ने पूछा, ‘‘कहां से आए हो और तुम्हारे हाथ में यह खून कैसा?’’

‘‘ साहब, मैं रामपुरा कस्बा के सुभाष नगर में रहता हूं. मेरा नाम शिवराज पाल है. मैं ने अपनी पत्नी गीता का कत्ल कर दिया है. उस की लाश घर में पड़ी है. मैं अपना गुनाह कुबूल करने थाने आया हूं. आप मुझे गिरफ्तार कर लें.’’

कत्ल का नाम सुनते ही थानाप्रभारी चौंक पड़े. उन्होंने तत्काल उसे कस्टडी में ले लिया. फिर उस से पूछा, ‘‘तुम ने अपनी पत्नी का कत्ल क्यों किया?’’

‘‘साहब, वह बदचलन थी. हवस का भूत उस पर सवार रहता था. उस ने घर की इज्जत को दांव पर लगा दिया था. बीती शाम मैं पड़ोस के गांव में गया था. वहां रिश्तेदार के घर शादी थी. सुबह 4 बजे घर आया तो घर का दरवाजा अंदर से बंद था. कुंडी खटखटाई और आवाज लगाई. लेकिन पत्नी ने दरवाजा नहीं खोला.

‘‘बारबार कुंडी खटखटाने पर भी जब उस ने दरवाजा नहीं खोला तो मुझे उस पर शक हुआ. आधे घंटे बाद उस ने दरवाजा खोला, तो उस के चेहरे की रंगत उड़ी हुई थी. उस के बाल बिखरे थे. मैं समझ गया कि यार के साथ रंगरलियां मना रही थी. मैं ने उस से सवालजवाब किया तो वह मुझ से ही भिड़ गई. तब गुस्से में मैं ने उसे चापड़ से काट डाला.’’

चूंकि मामला जवान महिला की हत्या का था, अत: थानाप्रभारी जे.पी. पाल ने कत्ल की सूचना पुलिस अधिकारियों को दी. उस के बाद कातिल शिवराज पाल को साथ ले कर उस के सुभाष नगर स्थित घर पहुंचे.  उस समय वहां भीड़ जुटी थी. घर के बाहर निर्माणाधीन मकान में मृतका गीता की लाश पड़ी थी. उस का कत्ल बड़ी बेरहमी से किया गया था. गरदन, पेट व पीठ पर 3 जख्म थे, जिस से खून रिस रहा था. मृतका की उम्र 33 साल के आसपास थी और उस का शरीर स्वस्थ था. शव के पास ही खून सना चापड़ पड़ा था, जिस से गीता की हत्या की गई थी. पुलिस ने आलाकत्ल चापड़ सुरक्षित कर लिया.

इंसपेक्टर जे.पी. पाल घटनास्थल का निरीक्षण कर ही रहे थे कि सूचना पा कर जालौन के एसपी यशवीर सिंह, एएसपी राकेश सिंह तथा डीएसपी विजय आनंद आ गए. पुलिस अधिकारियों ने घटनास्थल का बारीकी से निरीक्षण किया तथा कातिल शिवराज से पूछताछ की. इस के अलावा पड़ोसियों तथा घर के अन्य लोगों से भी जानकारी ली. निरीक्षण तथा पूछताछ के बाद पुलिस अधिकारियों ने थानाप्रभारी जे.पी. पाल को आदेश दिया कि वह शव का पंचनामा भर कर तत्काल पोस्टमार्टम भेजें तथा कातिल के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर जेल भेजें.

आदेश पाते ही थानाप्रभारी ने मृतका गीता के शव का पंचनामा भरा, खून आलूदा मिट्टी का नमूना रासायनिक परीक्षण हेतु सुरक्षित किया और फिर शव को पोस्टमार्टम हेतु जालौन के जिला अस्पताल भिजवा दिया. चूंकि पत्नी के कातिल शिवराज पाल ने हत्या का जुर्म कुबूल कर लिया था और आला कत्ल चापड़ भी बरामद हो गया था.  अत: थानाप्रभारी जे.पी. पाल ने स्वयं वादी बन कर भादंवि की धारा 302 के तहत शिवराज पाल के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कर ली तथा उसे न्याय सम्मत गिरफ्तार कर लिया. पुलिस जांच में पति द्वारा बदचलन पत्नी की हत्या करने की सनसनीखेज घटना प्रकाश में आई.

उत्तर प्रदेश के जनपद जालौन के कालपी कस्बा निवासी राजेश पाल की सब से छोटी बेटी थी गीता. गीता से बड़ी 2 बहनें थीं, उन का ब्याह हो चुका था. गीता अपनी दोनों बहनों से ज्यादा खूबसूरत थी.  युवावस्था में कदम रखते ही उस की सुंदरता में गजब का निखार आ गया था. यौवन के बोझ से लदी जब वह घर से गुजरती तो युवक उस की अदाओं पर मर मिट जाते थे.

18 बसंत पार करने के बाद राजेश पाल ने गीता की शादी जालौन जिले के कस्बा रामपुरा के मोहल्ला सुभाषनगर निवासी सूरज पाल के बेटे शिवराज पाल के साथ कर दी. शिवराज पाल औसत कदकाठी का सामान्य युवक था. शिवराज भी पिता के साथ खेतीबाड़ी करता था. सामान्य युवक को अगर चांद सी खूबसूरत बीवी मिल जाए तो उस के पैर जमीन पर नहीं पड़ते. गीता को पा कर शिवराज भी फूला नहीं समा रहा था. सुहागरात को उस ने बीवी का घूंघट उठाया तो गीता का हसीन चेहरा अपलक निहारता रह गया.

सांचे में ढला गीता का शरीर इतना मादक था कि शिवराज सब्र न रख सका. वह बीवी के नाजुक अंगों को इस तरह चूमने लगा, जैसे अंधे के हाथ बटेर लग गई हो. फिर वह बिना बीवी की भावनाओं को जगाए उस के शबाब के सागर में उतर गया. जल्दबाजी का परिणाम यह हुआ कि गीता को अभी कामना के झोंकों ने छुआ ही था कि शिवराज के यौवन के पेड़ से झरझरा कर पत्ते गिर गए. गीता के सारे सपने रेत के महल की तरह ढह गए. शिवराज तो तृप्त हो गया, लेकिन गीता अतृप्त ही रह गई.

आने वाली अगली रातों में भी ऐसा ही होता रहा. गीता का बदन शीतल ही पड़ा रहता और शिवराज तब तक हांफ चुका होता. इस से गीता समझ गई कि पति उस के तन की प्यास बुझाने के काबिल नहीं है. समय धीरेधीरे आगे बढ़ने लगा. शिवराज की बांहों में गीता खुद को आधाअधूरा ही पाती थी. इसी तरह दिन बीतने लगे. इस बीच एक के बाद एक गीता ने 2 बेटों अनुज और वरुण को जन्म दिया. बच्चों के जन्म के बाद घर का खर्च बढ़ा तो शिवराज को उन के पालनपोषण की चिंता सताने लगी.  वह कस्बे में रह कर वह खेतीबाड़ी करता था. उस की आमदनी बहुत कम थी. खेतीकिसानी के बलबूते वह मनचाही जिंदगी नहीं जी सकता था. वह चाहता था कि कस्बे के अन्य युवकों की तरह वह भी शहर जा कर पैसा कमाए.

शिवराज पाल का एक रिश्तेदार राजू दिल्ली स्थित मदर डेयरी में काम करता था. एक बार राजू जब घर आया तो शिवराज ने उस से अपनी नौकरी लगवाने की बात कही. राजू अपने साथ उसे ले गया और मदर डेयरी में मजदूर के तौर पर उस की नौकरी लगवा दी.

शिवराज 10 हजार रुपए महीने में कमा लेता था. अपना खर्चा निकाल कर 5 हजार रुपए हर महीने बचा लेता था. यह पैसा वह गीता के हाथ पर रख देता था. इन पैसों से गीता बच्चों की पढ़ाई तथा घर का खर्च चलाती थी. गीता भी अब खुश थी. लेकिन उसे यह आधीअधूरी खुशी महीने 2 महीने में सिर्फ 2-3 दिन ही मिलती थी. शिवराज महीने 2 महीने में 2-3 दिन के लिए ही घर आता था. वे 2-3 रातें ही गीता को पति की बांहों में मचलने को मिलती थी. उन रातों में भी शिवराज ठीक से उस के शरीर को शीतल नहीं कर पाता था.

एक तो पति से मिलने वाला आधाअधूरा सुख, दूसरा लंबी जुदाई. गीता का मन बहकने लगा. वह अपनी देह की ख्वाहिशें पूरी करना चाहती थी. उस ने इस बारे में गहराई से विचार किया तो यह निर्णय लिया कि उसे अपनी कामनाओं का साथी किसी ऐसे युवक को बनाना चाहिए, जो एक तो उम्र में उस से छोटा हो, दूसरा उन के रिश्ते पर कोई शक न कर सके. गीता ने इधरउधर नजर दौड़ाई तो अजय उस की नजरों में चढ़ गया.

अजय शिवराज का चचेरा भाई था. पड़ोस में ही रहता था. वह अविवाहित होने के साथ शरीर से हृष्टपुष्ट था. अजय गीता का बहुत सम्मान करता था और उस का कोई भी काम बिन कहे ही कर देता था. शिवराज के घर उस का बेधड़क आनाजाना था. 25 वर्षीय अजय दूध का व्यवसाय करता था. वह दूध डेयरी पर बैठता था और दूध की खरीदफरोख्त करता था. इस व्यवसाय से उसे अच्छी कमाई थी. वह बनसंवर कर रहता था और खूब खर्च करता था. गीता के बच्चे भी उस के साथ हिलमिल गए थे.

गीता की नजरों में देवर चढ़ा तो वह उस के साथ खूब हंसीमजाक करने लगी. अजय भी चंचल भाभी की बातों में खूब रस लेता. कभीकभी गीता हंसीमजाक में ऐसी बात कह देती, जिस से अजय झेंप जाता.  गीता के मन में पाप समाया तो वह अजय से कुछ ज्यादा ही खुलती चली गई. भाभी की आंखों में एक अजीब सी प्यास देख अजय भी समझ गया कि वह उस से कुछ चाहती है.

गीता ने उस की नजरों की भाषा पढ़ी तो नारी तन के गूढ़ रहस्य को जानने को उतावले अजय को बहाने से वह अपने शबाब की झलक दिखाने लगी.  कभी आंचल गिरा कर वक्षों की दूधिया घाटियां दिखा देती तो कभी गोरीगोरी रानें. जवानी का पहला फल चखने को उत्साहित अजय भाभी के शबाब की झलक देखता तो उस की आंखें सुलग उठतीं. गीता यही तो चाहती थी कि देवर की देह में आग भड़के.

जब गीता को लगा कि देवर भाभी की वासना का चूल्हा फूंकने को तैयार है तो उस ने एक प्लान बनाया. एक दोपहर जब बच्चे बुआ के घर गए थे और वह घर में अकेली थी तो उस ने अजय को फोन कर के घर बुलाया.  अजय भाभी के घर पहुंचा तो पाया वह चादर ओढ़े बैड पर लेटी है. अजय के अंदर आते ही गीता ने कहा, ‘‘अजय दरवाजा अंदर से बन्द कर दो.’’

अजय ने दरवाजा बंद किया और धड़कते दिल से भाभी के बगल में बैठ गया. गीता ने प्यार से अजय का हाथ पकड़ा और फिर प्यासे स्वर में बोली, ‘‘अजय, तुम्हारे भाई ने मेरी जिंदगी बरबाद कर दी. जमीन की प्यास तभी बुझती है, जब उस पर हल चले और बरसात की तेज फुहारें पड़ें. तुम्हारे भाई से कुछ नहीं होता. मैं ब्याहता हो कर भी आधीअधूरी ही हूं. वह आग तो लगा देते हैं, लेकिन बुझा नहीं पाते. इसलिए तुम्हारी मदद मांग रही हूं.’’

अजय हतप्रभ था. भाभी इस अंदाज में पेश आएगी, उसे उम्मीद न थी. वह कुछ सोच पाता उस के पहले ही गीता फुसफुसाई, ‘‘देखो तो मेरे पास क्या नहीं है. लेकिन तुम्हारे भैया कभी भी मेरी प्यास नहीं बुझा सके. बताओ, मैं कहां जाऊं. घर की बात घर में ही रहेगी. इसलिए अपना दर्द तुम्हें सुना रही हूं.’’ कहने के साथ गीता अजय से लिपट गई.

जवानी के पायदान पर कदम रख चुके अजय के लिए तो यह सुनहरा मौका था. वह उस वक्त कुछ भी सोचने की स्थिति में नहीं था. एक प्यासी जवान देह उस से लिपटी हुई थी और कामनाओं की भीख मांग रही थी.  उस से भी रहा नहीं गया. अजय ने भी उसे बांहों में भर लिया. फिर तो कमरे में सीत्कार की आवाजें गूंजने लगीं और पूर्ण तृप्ति के बाद ही दोनों एकदूसरे से अलग हुए.

उस रोज के बाद देवरभाभी पाप की राह पर चलने लगे. गीता खेलीखाई थी तो अजय नौजवान. बिस्तर पर वह उसे जैसे नचाती थी, वह वैसा ही नाचता था. लगभग 2 साल तक दोनों का वासना का खेल बिना बाधा के चलते रहा.  कहते हैं पाप ज्यादा दिन छिपता नहीं है. गीता और अजय के साथ भी ऐसा ही हुआ. गीता को दिन में अजय का साथ पाने का मौका कम मिलता था, अत: वह रात को उसे घर बुला लेती थी.

एक रोज जेठानी सरला ने रात में अपनी छत से गीता और अजय को आपत्तिजनक स्थिति में देख लिया. उस ने यह बात अपने पति मनोज तथा घर की अन्य महिलाओं को बताई. औरतों में कानाफूसी हुई तो कलयुगी भाभी की पापलीला की चर्चा पूरे मोहल्ले में होने लगी. शिवराज पाल को जब बीवी की बेहयाई पता चली तो उस ने गीता से जवाब तलब किया. उस ने त्रिया चरित्र का सहारा लिया, ‘‘जिन के पति परदेश में होते हैं, उन की पत्नियों को इसी तरह बदनाम किया जाता है. अजय घर आताजाता है, हमारा छोटामोटा काम कर देता है, मुझ से हंसबोल लेता है. बस जलने वालों के दिल पर सांप लोट गया और तुम्हारे कान भर दिए. वह मेरा रिश्ते में देवर है. क्या मुझे रिश्तों की समझ नही है?’’

शिवराज के पास कोई ठोस प्रमाण नहीं था. उसे बीवी की बात सुन कर चुप रह जाना पड़ा. लेकिन शक ऐसी चीज है, जो एक बार पैदा हो गई तो फिर मन को मथती रहती है. शिवराज ने भी बीवी और चचेरे भाई के रिश्ते की असलियत जानने की ठान ली.  वह बीवी पर निगरानी रखने लगा. वह दोनों को रंगेहाथ पकड़ना चाहता था. इसलिए जल्दीजल्दी घर आने लगा. घर आने की सूचना वह बीवी को नहीं देता था.

एक रोज शिवराज पाल ने गीता और अजय को अमर्यादित स्थिति में पकड़ लिया. शिवराज ने दोनों की खूब पिटाई की और उन्हें धमकी दी कि भविष्य में यदि दोनों ने यह दोहराया तो वह दोनों को चापड़ से काट देगा. उस वक्त जान बचाने के लिए दोनों ने माफी मांगते हुए शिवराज को वचन दिया कि वे आइंदा गलती नहीं करेंगे. वासना की लत ऐसी लत है जिस के लिए इंसान किसी अंजाम की परवाह नहीं करता. शिवराज पाल की इस धमकी का न तो गीता पर असर पड़ा और न ही अजय पर. हां, इतना जरूर हुआ कि अब दोनों मिलन में सावधानी बरतने लगे.

दिन के वक्त अजय ने गीता के घर जाना बंद कर दिया था, ताकि पासपड़ोस के लोगों को शक न हो. रात में जब सब सो जाते, तब गीता अजय के मोबाइल पर मिस्ड काल दे देती, जो इस बात का संकेत होता कि आज की रात मस्ती का मौका मिस नहीं करना है. अजय दबे पांव भाभी के घर में पहुंच जाता, फिर सारी रात भाभी की वासना का चूल्हा फूंकता रहता.

इसी बीच गीता के जेठ मनोज को भी उस की बदचलनी की जानकारी हो गई. उस ने अजय के पिता को समझाया कि वह बेटे पर नजर रखे. अपने छोटे भाई शिवराज से भी कहा कि अगर बीवी को सुधारना है तो वह नौकरी छोड़ कर घर आ जाए या गीता को अपने साथ दिल्ली ले जाए. आग और फूस साथ रहेंगे तो अनीति की आग लगेगी ही.  लेकिन शिवराज की मजबूरी यह थी कि न वह नौकरी छोड़ सकता था, न बीवी को साथ ले जा सकता था. वह समझ चुका था कि गीता ने देवर से अपनी यारी नहीं छोड़ी है.

अत: जब भी वह घर आता, बीवी का मोबाइल चैक करता. उस में उसे अजय की काल या मैसेज नजर आ जाते. गुस्से में आ कर एक रोज शिवराज ने बीवी का मोबाइल ही तोड़ कर फेंक दिया. फिर उसे साफ शब्दों में चेतावनी भी दे डाली, ‘‘सुधर जा, वरना अंजाम अच्छा न होगा.’’  जेठ तथा पति की पाबंदियां बढ़ीं तो गीता का प्रेमी से मिलना बंद हो गया. वह मिलन के लिए छटपटाने लगी. उधर अजय भी भाभी की बांहों में बंधने को तरसने लगा था. वह भी तड़प रहा था.

अब तक शिवराज के दोनों बेटे 8 और 10 साल के हो चुके थे. शिवराज बच्चों को बेहद प्यार करता था. दोनों बेटे कस्बे के स्कूल में पढ़ने भी लगे थे. बड़ा बेटा तेज दिमाग का था. वह पिता को घर में आनेजाने वालों के बारे में जानकारी देता रहता था. बड़े बेटे ने शिवराज को जानकारी दी थी कि अजय चाचा अकसर घर आते हैं. आते ही वह हमें घर के बाहर भेज देते हैं. जाने से वह इनकार करता है तो पैसों का लालच दे कर घर के बाहर कर देते हैं और दरवाजा बंद कर लेते हैं. बच्चे तो अनजान थे. लेकिन शिवराज जानता था कि बंद दरवाजे के भीतर गीता और अजय क्या गुल खिलाते थे.

2 मई, 2021 को शिवराज पाल एक हफ्ते की छुट्टी ले कर दिल्ली से अपने घर आ गया. दरअसल पड़ोसी गांव रैपुरा में शिवराज पाल के रिश्तेदार संजय पाल की बेटी रोशनी की 9 मई को बारात आनी थी. इसी शादी में उसे शामिल होना था. वह छुट्टी ले कर घर आ गया था. शिवराज के आ जाने से गीता और अजय का मिलन बंद हो गया था. यहां तक कि उन की मोबाइल फोन पर भी बात नहीं हो पाती थी. गीता पति की सेवा में ऐसी जुटी रहती थी, जैसे वह बहुत बड़ी पतिव्रता हो. हालांकि मन ही मन वह पति से कुढ़ती थी. उसे शादी के एक सप्ताह पहले पति का घर आना अच्छा नहीं लगा था.

9 मई, 2021 की शाम 5 बजे शिवराज पाल सजधज कर शादी में शामिल होने पड़ोसी गांव रैपुरा चला गया. पति के जाने के बाद गीता ने घर का काम निपटाया फिर रगड़रगड़ कर स्नान किया. इस के बाद सजसंवर कर उस ने अजय को फोन किया, ‘‘देवरजी, आज मौजमस्ती करने का अच्छा मौका है. तुम्हारे भैया शादी में शामिल होने रैपुरा गांव गए हैं. अब वह कल ही आ पाएंगे. आज की पूरी रात हमारी है. हम दोनों बिस्तर पर खूब धमाल मचाएंगे. रात 10 बजे तक घर जरूर आ जाना.’’

‘‘ठीक है भाभी. मैं जरूर आ जाऊंगा. तुम्हारी बांहों में मचलने के लिए मैं कई हफ्तों से तड़प रहा था.’’

गीता की ननद शिवानी सुभाष नगर मोहल्ले में ही अपने पति के साथ रहती थी. बच्चे मिलन में बाधा न बनें, इसलिए वह अनुज व वरुण को उन की बुआ के घर छोड़ आई. बहाना बनाया कि उस की तबियत खराब है. उस ने खाना नहीं बनाया और बच्चे भूखेप्यासे हैं.

रात 10 बजे अजय बनसंवर कर गीता के घर पहुंच गया. गीता उस का ही इंतजार कर रही थी. मौका अच्छा देख कर अजय गीता से छेड़खानी करने लगा फिर उसे कमरे में ले आया. दोनों के पास अच्छा मौका था.  अजय ने दरवाजा बंद किया फिर गीता को बांहों में भर लिया. दोनों कई सप्ताह से मिलन नहीं कर पाए थे. अत: गीता लता की भांति अजय से लिपट गई. चरम सुख प्राप्त कर दोनों निढाल हो कर सो गए.

इधर शिवराज पाल को सवारी का साधन मिल गया तो वह उस से सुबह 4 बजे ही घर आ गया. उस ने दरवाजे की कुंडी खटखटाई तो गीता ने दरवाजा नहीं खोला. कई बार कुंडी खटखटाने के बाद भी जब दरवाजा नहीं खुला तो शिवराज समझ गया कि गीता अपने यार के साथ रंगरलियां मना रही है.

वह दरवाजा तोड़ने ही जा रहा था कि भड़ाक से दरवाजा खुला. सामने पति को देख कर गीता का चेहरा पीला पड़ गया. वह बोली, ‘‘आप कुंडी खटखटा रहे थे. मैं तो गहरी नींद में थी.’’

‘‘गहरी नींद सो रही थी या फिर यार के साथ रंगरलियां मना रही थी.’’ शिवराज ने गुस्से से पूछा.

‘‘कैसी बात कर रहे हो. शक का कीड़ा तुम्हारे दिमाग में हर समय कुलबुलाता है.’’ गीता भी ऊंची आवाज में बोली.  शिवराज गीता को परे ढकेल कर घर के अंदर पहुंचा. उस ने घर का कोनाकोना छान मारा, लेकिन घर में कोई दूसरा न था. शिवराज समझ गया कि गीता ने पहले अजय को भगाया, उस के बाद ही दरवाजा खोला है.  वैसे भी गीता की घबराहट, उस के बिखरे बाल और तख्त के बिस्तर की सिलवटें चुगली कर रही थीं कि रात में बिस्तर पर वासना का खेल खेला गया था. बच्चों के विषय में पूछा तो गीता ने बताया कि बच्चे बुआ के घर हैं.

इस के बाद तो शिवराज को समझते देर नहीं लगी कि गीता ने मिलन में बाधा न पडे़, इसलिए बच्चों को बुआ के घर भेज दिया था. शिवराज गीता से सच्चाई कुबूलवाना चाहता था, लेकिन गीता सच्चाई पर परदा डाल रही थी. इसी बात को ले कर दोनों में झगड़ा होने लगा. झगड़े के दौरान गीता ने शिवराज से ऐसी बात कह दी, जिसे वह बरदाश्त न कर सका. गुस्से में कमरे में रखा चापड़ उठा लिया और गीता की ओर लपका.

पति के रूप में साक्षात मौत को देख कर गीता दरवाजे की ओर भागी. लेकिन शिवराज ने उसे बरामदे में ही पकड़ लिया और चापड़ के वार से उसे वहीं ढेर कर दिया. कुछ देर तक शिवराज बीवी के शव के पास ही बैठा रहा. फिर वह थाना रामपुरा पहुंचा और थानाप्रभारी जे.पी. पाल के सामने आत्मसमर्पण कर दिया. पुलिस जब घटनास्थल पर पहुंची तब मोहल्ले के लोग वहां जुटे थे.

11 मई, 2021 को पुलिस ने शिवराज पाल को जालौन कोर्ट में पेश किया, जहां से उसे जिला जेल भेज दिया गया. मां की मौत और पिता के जेल जाने से उस के दोनों बच्चे गुमसुम हैं. वह अपनी बुआ रोशनी के संरक्षण में थे.

—कथा पुलिस सूत्रोंं पर आधारित

चसका पराई औरत का

नंदू का अपने गांव की विधवा कमला से जिस्मानी संबंध अब लोगों में चर्चा की बात बन चुका है. नंदू की बीवी तारा इस वजह से अपने बच्चों को ले कर 2 महीने से मायके में बैठी हुई है.

सारा समाज नंदू की इस हरकत पर थूथू कर रहा है, लेकिन नंदू है कि विधवा कमला से अपने जिस्मानी संबंध तोड़ने को तैयार नहीं है.

मायके जाने से पहले नंदू की बीवी तारा भी कमला को समझाने और पति नंदू से जिस्मानी रिश्ता तोड़ लेने की गुहार लगाने कमला के पास गई थी, लेकिन कमला ने उस की एक नहीं सुनी और कहा, ‘‘तू अपने मर्द को बांध कर रख ले. मैं उस के पास नहीं जाती, वही मेरे पास आता है.’’

शबनम की शादीशुदा जिंदगी भी बुरी तरह गुजर रही है. वजह, शबनम का शौहर शब्बीर अपने चाचा की बीवी तनाज की जवानी में खोया रहता है. शब्बीर अपने घर न रह कर अकसर चाचा के घर ही पड़ा रहता है और वहां तनाज के जिस्मानी रूप का जाम पीता रहता है. चाचा की रोकटोक नहीं होने और तनाज की हामी के चलते शब्बीर की ये करतूतें मजे से चल रही हैं.

शब्बीर ने अपनी सारी दौलत तनाज को खुश करने में लुटा रखी है. तनाज की अदाओं के सामने शब्बीर अपनी बीवी को भी भुला बैठा है.

शब्बीर ने समाज के बंधनों को भी ताक पर रख दिया. बस, तनाज और उस के जिस्मानी रिश्तों को वह अपनी जिंदगी मानने लगा है और तनाज है कि शब्बीर को बेवकूफ बना कर उसे दोनों हाथों से लूट रही है.

दूसरे की औरत सभी मर्दों को अच्छी लगती है. पराई बीवी में मर्द को जवानी और जोश का सैलाब दिखता है. पराई औरत को भोगने की इच्छा तकरीबन सभी मर्दों में पाई जाती है. इस के लिए वे इज्जत को ताक पर रख जिस्मानी मजा लेने के लिए उतावले हो जाते हैं.

कुछ मर्दों को दूसरे की बीवी के ब्लाउज से झाकते उभार पसंद आते हैं, तो किसी को उस के हिलते हुए कूल्हे. कोई गैर की बीवी के कसे हुए जिस्म पर मरता है, तो कोई उस की नशीली अदाओं का शिकार हो जाता है.

ऐसा दर्शन पा कर उस पर लट्टू मर्द को अपनी बीवी बेकार लगने लगती है. उसे तब अपनी बीवी में न जवानी दिखती है और न ही सैक्सी अदाएं नजर आती हैं.

बदमाश किस्म की औरतें ऐसे मर्दों की तलाश में रहती हैं, जो उन के हुस्न पर पैसा लुटाए और जरूरत पड़ने पर उन की जिस्मानी प्यास को भी बुझाए.

इन औरतों का अपना कोई दीनईमान नहीं होता है. जब तक उन्हें पराए मर्द से पैसा मिलता है, तब तक वे उन के करीब रहती हैं. कंगाल मर्द को वे दूध में पड़ी मक्खी की तरह निकाल कर बाहर फेंक देती हैं.

सच यही है कि दूसरे की बीवी के चक्कर में पड़ने के बाद वह अपनी बीवी और समाज की नजर में गिर जाता है. बीवी भी अपने मर्द को दिल से माफ नहीं कर पाती है.

पराई औरत से जिस्मानी रिश्तों के चक्कर में ऐसे मर्दों को आखिर में बदनामी ही मिलती है. उन्हें हमेशा गलत नजर से देखने की जो आदत पड़ जाती है, वह भी आसानी से नहीं छूटती है.

दूसरे की बीवी से जिस्मानी रिश्ता बनाने के चलते मर्दों को कई अंदरूनी बीमारियों का शिकार होते भी देखा गया है. अनजाने में उस मर्द की बीवी भी शिकार हो जाती है. बीमारी के बढ़ने पर ही पता चलता है, लेकिन तब तक देर हो चुकी होती है.

गैर की बीवी गैर की ही होती है. सबकुछ लुटा देने के बाद भी वह गैर की रहती है. ऐसे में उस के लिए अपना घरपरिवार और जिंदगी बरबाद करना समझदारी वाली बात नहीं है. जो सुख पराई बीवी देती है, उस से कहीं ज्यादा मजा खुद की बीवी दे सकती है, फिर क्यों घर से बाहर दूसरे की बीवी में जिस्मानी सुख तलाशा जाए?

अच्छी बात तो यह होगी कि दूसरे की बीवी को अपनी बांहों में भरने की गलत आदत को छोड़ें. अपनी बीवी को प्यार करें, ताकि बीवी तो खुश रहे ही, घरपरिवार में भी सुख बना रहे.

जिस्मानी रिश्तों को अपनी जिंदगी से ज्यादा अहमियत न दें. दूसरे की बीवी अगर गलत इरादे से करीब आना चाहे, तो उस से दूरी बना कर रखें.

पटना ट्रिपल मर्डर, कैसे बना वह हथौड़े वाला हत्यारा

सुबह के 10 बज रहे थे. 50 साला अलीना सिंह अपनी दोनों बेटियों को स्कूल और कालेज भेज कर घर का काम निबटा रही थीं. उस समय घर में उन का सौतेला बेटा देवेश कुमार उर्फ रिंटू ही मौजूद था. अचानक देवेश कुमार ने अलीना के चेहरे पर कपड़ा लपेट दिया और सिर पर हथौड़ा मारमार कर उन्हें जान से मार डाला.

11 बजे अलीना की 11 साला छोटी बेटी पूर्णिमा स्कूल से घर आई, तो देवेश ने दरवाजा खोला. उस के बाद उस ने पूर्णिमा के सिर पर भी चादर लपेट कर हथौड़ा मारमार उस की जान ले ली.

दोपहर 1 बजे अलीना की 18 साला मझली बेटी सोनाली कालेज से घर लौटी और डोरबैल बजाई. देवेश ने दरवाजा खोला और उस का भी वही हाल किया, जो अलीना और पूर्णिमा का किया था.

15 दिसंबर को पटना के इंद्रपुरी महल्ले के जीरो नंबर रोड पर एक के बाद एक 3 कत्ल करने के बाद देवेश कुमार अपने पिता गोपाल शरण सिंह के पास पहुंचा.

दरअसल, देवेश ने ही गोपाल को सुबह 8 बजे उन के दोस्त धर्मपाल महतो के घर भेज दिया था.

देवेश ने गोपाल से कहा कि दिल्ली चलना है. जल्दी तैयार हो जाइए. उस के बाद दोनों पटना जंक्शन पहुंचे. देवेश ने किसी तरह से पटनादिल्ली राजधानी ऐक्सप्रैस ट्रेन में टिकट का इंतजाम किया और दोनों दिल्ली की ओर चल पड़े.

जब ट्रेन कानपुर के पास पहुंची, तो देवेश ने अपने पिता से कहा कि उस ने अपनी सौतेली मां समेत दोनों बहिनों को मार डाला.

गोपाल को तो पहले बेटे की इस हैवानियत पर यकीन नहीं हुआ, लेकिन जब सारा मामला उन्हें समझ में आया, तो वे जोरजोर से रोने लगे.

देवेश ने अपने हाथों से उन का मुंह दबा कर कहा कि वे रोएं नहीं, वरना वह पकड़ा जाएगा. इस के बाद देवेश ट्रेन से नीचे उतर गया.

ट्रेन जब दिल्ली पहुंची, तो गोपाल अपने छोटे बेटे ओंकार सिंह उर्फ चिंटू के कालकाजी इलाके में बने घर पहुंचे और उसे सारा माजरा बताया.

दिल्ली से ही गोपाल ने पटना में अपने पड़ोसी जोगिंदर को फोन कर के कहा कि वह उन के घर जा कर देखें कि वहां कुछ गड़बड़ तो नहीं है, क्योंकि घर में कोई भी फोन नहीं उठा रहा है.

जोगिंदर जब गोपाल के घर पहुंचा, तो चारों तरफ सन्नाटा पसरा हुआ था. गेट खोल कर वह अंदर गया, तो कमरे में पड़ी 3 लाशों को देख कर वह सन्न रह गया.

हड़बड़ी में वह भाग कर बाहर निकला और गोपाल को फोन कर सारा माजरा बताया. इस के बाद उस ने महल्ले वालों से बात कर पाटलीपुत्र थाने में खबर दी.

पटना के एसएसपी अमृतराज ने बताया कि हत्या करने का क्रूर तरीका बता देता है कि हत्यारा अलीना, सोनाली और पूर्णिमा से काफी नफरत करता था. हत्या को लूट का रंग देने के लिए उस ने कमरे में रखे बक्सों को उलटपुलट कर रख दिया था. इस मर्डर केस की जड़ में जायदाद का झगड़ा ही है.

रिटायर्ड क्लर्क गोपाल शरण सिंह का पटना के इंद्रपुरी महल्ले में डेढ़ कट्ठा यानी तकरीबन 2 हजार वर्ग फुट जमीन पर मकान बना हुआ है, जिस की कीमत तकरीबन 80 लाख रुपए है. इस के अलावा कटिहार के राजपूताना इलाके में 55 कट्ठा जमीन भी है, जिस की कीमत भी करोड़ों रुपए की आंकी गई है.

देवेश चाहता था कि पिता गोपाल शरण सिंह अपनी जायदाद का बंटवारा कर दें. पिता गोपाल बंटवारे को तैयार थे, पर अलीना इस के लिए तैयार नहीं थीं. वे चाहती थीं कि सोनाली और पूर्णिमा की शादी के बाद ही जायदाद का बंटवारा हो.

अलीना ने जमीन और मकान के सारे कागजात अपने कब्जे में कर रखे थे. इस मामले को ले कर अकसर घर में हल्लाहंगामा होता रहता था.

गोपाल के पड़ोसी बताते हैं कि गोपाल की पहली बीवी की मौत 20-22 साल पहले हो गई थी. इस के बाद उन्होंने अलीना से दूसरी शादी की. अलीना से उन की 3 बेटियां हुईं, जबकि पहली बीवी से 2 बेटे थे.

अलीना जब ब्याह कर घर आईं, तो उसी समय से उन्होंने गोपाल के बेटों को परेशान करना शुरू कर दिया. इस को ले कर अलीना और गोपाल में अकसर बकझक होती रहती थी. हार कर गोपाल ने अपने दोनों बेटों को हौस्टल में भेज दिया था. शुरुआती पढ़ाई करने के बाद गोपाल ने दोनों बेटों को पढ़ने के लिए दिल्ली भेज दिया था. दोनों भाई पिछले 12 सालों से दिल्ली में रह रहे थे.

कई पड़ोसियों ने बताया कि अलीना काफी सख्त मिजाज की औरत थीं और गोपाल उन के सामने घुटने टेके रहते थे. अलीना ने दोनों बेटों की शादी में भी गोपाल को नहीं जाने दिया था.

सौतेली मां और 2 बेटियों की हत्या करने में हैवानियत की हद पार कर देवेश फरार है. उस की शादी हो चुकी है और पिछले महीने ही वह बाप बना था.

मनोविज्ञानी अनिल पांड्या कहते हैं कि अपने परिवार के लोगों का कत्ल कर के देवेश हैवानियत की तमाम हदें पा कर गया. इस से पता चलता है कि उस के मन में अलीना को ले कर इस कदर नफरत थी कि वह उस की बेटियों को भी नहीं देखना चाहता होगा.

घरेलू झगड़ों के बढ़ते मामलों के बीच परिवार वालों को देखना समझना होगा कि ऐसे झगड़ों को तूल न पकड़ने दें और न ही ऐसे मामलों को लटका कर रखें.

valentine Special- तू आए न आए : शफीका का प्यार और इंतजार

मैं इंगलैंड से एमबीए करने के लिए श्रीनगर से फ्लाइट पकड़ने को घर से बाहर निकल रहा था तो मुझे विदा करने वालों के साथसाथ फूफीदादी की आंखों में आंसुओं का समंदर उतर आया. अम्मी की मौत के बाद फूफीदादी ने ही मुझे पालपोस कर बड़ा किया था. 2 चाचा और 1 फूफी की जिम्मेदारी के साथसाथ दादाजान की पूरी गृहस्थी का बोझ भी फूफीदादी के नाजुक कंधों पर था. ममता का समंदर छलकाती उन की बड़ीबड़ी कंटीली आंखों में हमारे उज्ज्वल भविष्य की अनगिनत चिंताएं भी तैरती साफ दिखाई देती थीं. उन से जुदाई का खयाल ही मुझे भीतर तक द्रवित कर रहा था.

कार का दरवाजा बंद होते ही फूफीदादी ने मेरा माथा चूम लिया और मुट्ठी में एक परचा थमा दिया, ‘‘तुम्हारे फूफादादा का पता है. वहां जा कर उन्हें ढूंढ़ने की कोशिश करना और अगर मिल जाएं तो बस, इतना कह देना, ‘‘जीतेजी एक बार अपनी अम्मी की कब्र पर फातेहा पढ़ने आ जाएं.’’

फूफीदादी की भीगी आवाज ने मुझे भीतर तक हिला कर रख दिया. पूरे 63 साल हो गए फूफीदादी और फूफादादा के बीच पैसिफिक अटलांटिक और हिंद महासागर को फैले हुए, लेकिन आज भी दादी को अपने शौहर के कश्मीर लौट आने का यकीन की हद तक इंतजार है.

इंगलैंड पहुंच कर ऐडमिशन की प्रक्रिया पूरी करतेकरते मैं फूफीदादी के हुक्म को पूरा करने का वक्त नहीं निकाल पाया, लेकिन उस दिन मैं बेहद खुश हो गया जब मेरे कश्मीरी क्लासफैलो ने इंगलैंड में बसे कश्मीरियों की पूरी लिस्ट इंटरनैट से निकाल कर मेरे सामने रख दी. मेरी आंखों के सामने घूम गया 80 वर्षीय फूफीदादी शफीका का चेहरा.

मेरे दादा की इकलौती बहन, शफीका की शादी हिंदुस्तान की आजादी से ठीक एक महीने पहले हुई थी. उन के पति की सगी बहन मेरी सगी दादी थीं. शादी के बाद 2 महीने साथ रह कर उन के शौहर डाक्टरी पढ़ने के लिए लाहौर चले गए. शफीका अपने 2 देवरों और सास के साथ श्रीनगर में रहने लगीं.

लाहौर पहुंचने के बाद दोनों के बीच खतों का सिलसिला लंबे वक्त तक चलता रहा. खत क्या थे, प्यार और वफा की स्याही में डूबे प्रेमकाव्य. 17 साल की शफीका की मुहब्बत शीर्ष पर थी. हर वक्त निगाहें दरवाजे पर लगी रहतीं. हर बार खुलते हुए दरवाजे पर उसे शौहर की परछाईं होने का एहसास होता.

मुहब्बत ने अभी अंगड़ाई लेनी शुरू ही की थी कि पूरे बदन पर जैसे फालिज का कहर टूट पड़ा. विभाजन के बाद हिंदुस्तान और पाकिस्तान के बीच खतों के साथसाथ लोगों के आनेजाने का सिलसिला भी बंद हो गया.

शफीका तो जैसे पत्थर हो गईं. पूरे 6 साल की एकएक रात कत्ल की रात की तरह गुजारी और दिन जुदाई की सुलगती भट्टी की तरह. कानों में डाक्टर की आवाजें गूंजती रहतीं, सोतीजागती आंखों में उन का ही चेहरा दिखाई देता था. रात को बिस्तर की सिलवटें और बेदारी उन के साथ बीते वक्त के हर लमहे को फिर से ताजा कर देतीं.

अचानक एक दिन रेडियो में खबर आई कि हिंदुस्तान-पाकिस्तान के बीच क्रिकेट मैच होगा. इस मैच को देखने जाने वालों के लिए वीजा देने की खबर इक उम्मीद का पैगाम ले कर आई.

शफीका के दोनों भाइयों ने रेलवे मिनिस्टर से खास सिफारिश कर के अपने साथसाथ बहन का भी पाकिस्तान का 10 दिनों का वीजा हासिल कर लिया. जवान बहन के सुलगते अरमानों को पूरा करने और दहकते जख्मों पर मरहम लगाने का इस से बेहतरीन मौका शायद ही फिर मिल पाता.

पाकिस्तान में डाक्टर ने तीनों मेहमानों से मिल कर अपने कश्मीर न आ सकने की माफी मांगते हुए हालात के प्रतिकूल होने की सारी तोहमत दोनों देशों की सरकारों के मत्थे मढ़ दी. उन के मुहब्बत से भरे व्यवहार ने तीनों के दिलों में पैदा कड़वाहट को काई की तरह छांट दिया. शफीका के लिए वो 9 रातें सुहागरात से कहीं ज्यादा खूबसूरत और अहम थीं. वे डाक्टर की मुहब्बत में गले तक डूबती चली जा रही थीं.

उधर, उन के दोनों भाइयों को मिनिस्टरी और दोस्तों के जरिए पक्की तौर पर यह पता चल गया था कि अगर डाक्टर चाहें तो पाकिस्तान सरकार उन की बीवी शफीका को पाकिस्तान में रहने की अनुमति दे सकती है. लेकिन जब डाक्टर से पूछा गया तो उन्होंने अपने वालिद, जो उस वक्त मलयेशिया में बड़े कारोबारी की हैसियत से अपने पैर जमा चुके थे, से मशविरा करने के लिए मलयेशिया जाने की बात कही.

साथ ही, यह दिलासा भी दिया कि मलयेशिया से लौटते हुए वे कश्मीर में अपनी वालिदा और भाईबहनों से मिल कर वापसी के वक्त शफीका को पाकिस्तान ले आएंगे. दोनों भाइयों को डाक्टर की बातों पर यकीन न हुआ तो उन्होंने शफीका से कहा, ‘बहन, जिंदगी बड़ी लंबी है, कहीं ऐसा न हो कि तुम्हें डाक्टर के इंतजार के फैसले पर पछताना पड़े.’

‘भाईजान, तलाक लेने की वजह दूसरी शादी ही होगी न. यकीन कीजिए, मैं दूसरी शादी तो दूर, इस खयाल को अपने आसपास फटकने भी नहीं दूंगी.’ 27 साल की शफीका का इतना बड़ा फैसला भाइयों के गले नहीं उतरा, फिर भी बहन को ले कर वे कश्मीर वापस लौट आए.

वापस आ कर शफीका फिर अपनी सास और देवरों के साथ रहने लगीं. डाक्टर की मां अपने बेटे से बेइंतहा मुहब्बत करती थीं. बहू से बेटे की हर बात खोदखोद कर पूछती हुई अनजाने ही बहू के भरते जख्मों की परतें उधेड़ती रहतीं.

शफीका अपने यकीन और मुहब्बत के रेशमी धागों को मजबूती से थामे रहीं. उड़तीउड़ती खबरें मिलीं कि डाक्टर मलयेशिया तो पहुंचे, लेकिन अपनी मां और बीवी से मिलने कश्मीर नहीं आए. मलयेशिया में ही उन्होंने इंगलैंड मूल की अपनी चचेरी बहन से निकाह कर लिया था. शफीका ने सुना तो जो दीवार से टिक कर धम्म से बैठीं तो कई रातें उन की निस्तेज आंखें, अपनी पलकें झपकाना ही भूल गईं. सुहागिन बेवा हो गईं, लेकिन नहीं, उन के कान और दिमाग मानने को तैयार ही नहीं थे.

‘लोग झूठ बोल रहे हैं. डाक्टर, मेरा शौहर, मेरा महबूब, मेरी जिंदगी, ऐसा नहीं कर सकता. वफा की स्याही से लिखे गए उन की मुहब्बत की शीरीं में डूबे हुए खत, उस जैसे वफादार शख्स की जबान से निकले शब्द झूठे हो ही नहीं सकते. मुहब्बत के आसमान से वफा के मोती लुटाने वाला शख्स क्या कभी बेवफाई कर सकता है? नहीं, झूठ है. कैसे यकीन कर लें, क्या मुहब्बत की दीवार इतनी कमजोर ईंटों पर रखी गई थी कि मुश्किल हालात की आंधी से वह जमीन में दफन हो जाए? वो आएंगे, जरूर आएंगे,’ पूरा भरोसा था उन्हें अपने शौहर पर.

शफीका के दिन कपड़े सिलते, स्वेटर बुनते हुए कट जाते लेकिन रातें नागफनी के कांटों की तरह सवाल बन कर चुभतीं. ‘जिन की बांहों में मेरी दुनिया सिमट गई थी, जिन के चौड़े सीने पर मेरे प्यार के गुंचे महकने लगे थे, उन की जिंदगी में दूसरी औरत के लिए जगह ही कहां थी भला?’ खयालों की उथली दुनिया के पैर सचाई की दलदल में कईकई फुट धंस गए. लेकिन सच? सच कुछ और ही था. कितना बदरंग और बदसूरत? सच, डाक्टर शादी के बाद दूसरी बीवी को ले कर इंगलैंड चला गया. मलयेशिया से उड़ान भरते हुए हवाईजहाज हिमालय की ऊंचीऊंची प्रहरी सी खड़ी पहाडि़यों पर से हो कर जरूर गुजरा होगा? शफीका की मुहब्बत की बुलंदियों ने तब दोनों बाहें फैला कर उस से कश्मीर में ठहर जाने की अपील भी की होगी. मगर गुदाज बीवी की आगोश में सुधबुध खोए डाक्टर के कान में इस छातीफटी, दर्दभरी पुकार को सुनने का होश कहां रहा होगा?

शफीका को इतने बड़े जहान में एकदम तनहा छोड़ कर, उन के यकीन के कुतुबमीनार को ढहा कर, अपनी बेवफाई के खंजर से शफीका के यकीन को जख्मी कर, उन के साथ किए वादों की लाश को चिनाब में बहा दिया था डाक्टर ने, जिस के लहू से सुर्ख हुआ पानी आज भी शफीका की बरबादी की दास्तान सुनाता है.

शफीका जारजार रोती हुई नियति से कहती थी, ‘अगर तू चाहती, तो कोई जबरदस्ती डाक्टर का दूसरा निकाह नहीं करवा सकता था. मगर तूने दर्द की काली स्यायी से मेरा भविष्य लिखा था, उसे वक़्त का ब्लौटिंगपेपर कभी सोख नहीं पाया.’

शफीका के चेहरे और जिस्म की बनावट में कश्मीरी खूबसूरती की हर शान मौजूद थी. इल्म के नाम पर वह कश्मीरी भाषा ही जानती थी. डाक्टर की दूसरी बीवी, जिंदगी की तमाम रंगीनियों से लबरेज, खुशियों से भरपूर, तनमन पर आधुनिकता का पैरहन पहने, डाक्टर के कद के बराबर थी.

इंगलैंड की चमकदमक, बेबाकपन और खुद की आर्थिक स्थिति को मजबूत करने के लिए हाथ आई चाचा की बेशुमार दौलत ने एक बेगर्ज मासूम मुहब्बत का गला घोंट दिया. शफीका ने 19 साल, जिंदगी के सब से खूबसूरत दिन, सास के साथ रह कर गुजार दिए. दौलत के नशे में गले तक डूबे डाक्टर को न ही मां की ममता बांध सकी, न बावफा पत्नी की बेलौस मुहब्बत ही अपने पास बुला सकी.

डाक्टर की वादाखिलाफी और जवान बहन की जिंदगी में फैलती वीरानी और तनहाई के घनघोर अंधेरे के खौफ से गमगीन हो कर शफीका के बड़े भाई ने अपनी बीवी को तलाक देने का मन बना लिया जो डाक्टर की सगी बहन थी. लेकिन शफीका चीन की दीवार की तरह डट कर सामने खड़ी हो गई, ‘शादी के दायित्व तो इन के भाई ने नहीं निभाए हैं न, दगा और फरेब तो उन्होंने मेरे साथ किया है, कुसूर उन का है तो सजा भी उन्हें ही मिलनी चाहिए. उन की बहन ने आप की गृहस्थी सजाई है, आप के बच्चों की मां हैं वे, उस बेकुसूर को आप किस जुर्म की सजा दे रहे हैं, भाई जान? मेरे जीतेजी यह नहीं होगा,’ कह कर भाई को रोका था शफीका ने.

खौफजदा भाभी ने शफीका के बक्से का ताला तोड़ कर उस का निकाहनामा और डाक्टर के साथ खींची गई तसवीरों व मुहब्बतभरे खतों को तह कर के पुरानी किताबों की अलमारी में छिपा दिया था. जो 15 साल बाद रद्दी में बेची जाने वाली किताबों में मिले. भाभी डर गई थीं कि कहीं उन के भाई की वजह से उन की तलाक की नौबत आ गई तो कागजात के चलते उन के भाई पर मुकदमा दायर कर दिया जाएगा. लेकिन शफीका जानबूझ कर चुपचाप रहीं.

लंबी खामोशी के धागे से सिले होंठ, दिल में उमड़ते तूफान को कब तक रोक पाते. शफीका के गरमगरम आंसुओं का सैलाब बड़ीबड़ी खूबसूरत आंखों के रास्ते उन के गुलाबी गालों और लरजाते कंवल जैसे होंठों तक बह कर डल झील के पानी की सतह को और बढ़ा जाता. कलैंडर बदले, मौसम बदले, श्रीनगर की पहाडि़यों पर बर्फ जमती रही, पिघलती रही, बिलकुल शफीका के दर्दभरे इंतजार की तरह.

फूलों की घाटी हर वर्ष अपने यौवन की दमक के साथ अपनी महक लुटा कर वातावरण को दिलकश बनाती रही, लेकिन शफीका की जिंदगी में एक बार आ कर ठहरा सूखा मौसम फिर कभी मौसमेबहार की शक्ल न पा सका. शफीका की सहेलियां दादी और नानी बन गईं. आखिरकार शफीका भी धीरेधीरे उम्र के आखिरी पड़ाव की दहलीज पर खड़ी हो गईं.

बड़े भाईसाहब ने मरने से पहले अपनी बहन के भविष्य को सुरक्षित कर दिया. अपनी पैंशन शफीका के नाम कर दी. पूरे 20 साल बिना शौहर के, सास के साथ रहने वाली बहन को छोटे भाईभाभी ले आए हमेशा के लिए अपने घर. बेकस परिंदे का आशियाना एक डाल से टूटा तो दूसरी डाल पर तिनके जोड़तेजोड़ते

44 साल लग गए. चेहरे की चिकनाई और चमकीलेपन में धीरेधीरे झुर्रियों की लकीरें खिंचने लगीं.

प्यार, फिक्र और इज्जत, देने में भाइयों और उन के बच्चों ने कोई कमी नहीं छोड़ी. भतीजों की शादियां हुईं तो बहुओं ने सास की जगह फूफीसास को पूरा सम्मान दिया. शफीका के लिए कभी भी किसी चीज की कमी नहीं रही, मगर अपने गर्भ में समाए नुकीले कंकड़पत्थर को तो सिर्फ ठहरी हुई झील ही जानती है. जिंदगी में कुछ था तो सिर्फ दर्द ही दर्द.

अपनी कोख में पलते बच्चे की कुलबुलाहट के मीठे दर्द को महसूस करने से महरूम शफीका अपने भतीजों के बच्चों की मासूम किलकारियों, निश्छल हंसी व शरारतों में खुद को गुम कर के मां की पहचान खो कर कब फूफी से फूफीदादी कहलाने लगीं, पता ही नहीं चला.

शरीर से एकदम स्वस्थ 80 वर्षीया शफीका के चमकते मोती जैसे दांत आज भी बादाम और अखरोट फोड़ लेते हैं. यकीनन, हाथपैरों और चेहरे पर झुर्रियों ने जाल बिछाना शुरू कर दिया है लेकिन चमड़ी की चमक अभी तक दपदप करती हुई उन्हें बूढ़ी कहलाने से महफूज रखे हुए है.

पैरों में जराजरा दर्द रहता है तो लकड़ी का सहारा ले कर चलती हैं, लेकिन शादीब्याह या किसी खुशी के मौके पर आयोजित की गई महफिल में कालीन पर तकिया लगा कर जब भी बैठतीं, कम उम्र औरतों को शहद की तरह अपने आसपास ही बांधे रखतीं.

उन के गाए विरह गीत, उन की आवाज के सहारेसहारे चलते चोटखाए दिलों में सीधे उतर जाते. शफीका की गहरी भूरी बड़ीबड़ी आंखों में अपना दुलहन वाला लिबास लहरा जाता, जब कोई दुलहन विदा होती या ससुराल आती. उन की आंखों में अंधेरी रात के जुगनुओं की तरह ढेर सारे सपने झिलमिलाने लगते. सपने उम्र के मुहताज नहीं होते, उन का सुरीला संगीत तो उम्र के किसी भी पड़ाव पर बिना साज ही बजने लगता है.

एक घर, सजीधजी शफीका, डाक्टर का चंद दिनों का तिलिस्म सा लगने वाला मीठा मिलन, बच्चों की मोहक मुसकान, सुखदुख के पड़ाव पर ठहरताबढ़ता कारवां, मां, दादी के संबोधन से अंतस को सराबोर करने वाला सपना…हमेशा कमी बन कर चुभता रहता. वाकई, क्या 80 साल की जिंदगी जी या सिर्फ जिंदगी की बदशक्ल लाश ढोती रहीं? यह सवाल खुद से पूछने से डरती रहीं शफीका.

शफीका ने एक मर्द के नाम पूरी जिंदगी लिख दी. जवानी उस के नाम कर दी, अपनी हसरतों, अपनी ख्वाहिशों के ताश के महल बना कर खुद ही उसे टूटतेबिखरते देखती रहीं. जिस्म की कसक, तड़प को खुद ही दिलासा दे कर सहलाती रहीं सालों तक.

रिश्तेदार, शफीका से मिलते लेकिन कोई भी उन के दिल में उतर कर नहीं देख पाता कि हर खुशी के मौके पर गाए जाने वाले लोकगीतों के बोलों के साथ बजते हुए कश्मीरी साजों, डफली की हर थाप पर एक विरह गीत अकसर शफीका के कंपकंपाते होंठों पर आज भी क्यों थिरकता जाता है-

‘तू आए न आए

लगी हैं निगाहें

सितारों ने देखी हैं

झुकझुक के राहें

ये दिल बदगुमां है

नजर को यकीं है

तू जो नहीं है

तो कुछ भी नहीं है

ये माना कि महफिल

जवां है हसीं है.’

अब आज पूरे 3 महीनों बाद मुझे अचानक डायरी में फूफीदादी का दिया हुआ परचा दिखाई दिया तो इंटरनैट पर कश्मीरी मुसलमानों के नाम फिर से सर्च कर डाले. पता वही था, नाम डा. खालिद अनवर, उम्र 90 साल. फोन मिलाया तो एक गहरी लेकिन थकी आवाज ने जवाब दिया, ‘‘डाक्टर खालिद अनवर स्पीकिंग.’’

‘‘आय एम फ्रौम श्रीनगर, इंडिया, आई वांट टू मीट विद यू.’’

‘‘ओ, श्योर, संडे विल बी बैटर,’’ ब्रिटिश लहजे में जवाब मिला.

जी चाहा फूफीदादी को फोन लगाऊं, दादी मिल गया पता…वैसे मैं उन से मिल कर क्या कहूंगा, अपना परिचय कैसे दूंगा, कहीं हमारे खानदान का नाम सुन कर ही मुझे अपने घर के गेट से बाहर न कर दें, एक आशंका, एक डर पूरी रात मुझे दीमक की तरह चाटता रहा.

निश्चित दिन, निश्चित समय, उन के घर की डौरबैल बजाने से पहले, क्षणभर के लिए हाथ कांपा था, ‘तुम शफीका के भतीजे के बेटे हो. गेटआउट फ्रौम हियर. वह पृष्ठ मैं कब का फाड़ चुका हूं. तुम क्या टुकड़े बटोरने आए हो?’ कुछ इस तरह की ऊहापोह में मैं ने डौरबैल पर उंगली रख दी.

‘‘प्लीज कम इन, आई एम वेटिंग फौर यू.’’ एक अनौपचारिक स्वागत के बाद उन के द्वारा मेरा परिचय और मेरा मिलने का मकसद पूछते ही मैं कुछ देर तो चुप रहा, फिर अपने ननिहाल का पता बतलाने के बाद देर तक खुद से लड़ता रहा.

अनौपचारिक 2-3 मुलाकातों के बाद वे मुझ से थोड़ा सा बेबाक हो गए. उन की दूसरी पत्नी की मृत्यु 15 साल पहले हो चुकी थी. बेटों ने पाश्चात्य सभ्यता के मुताबिक अपनी गृहस्थियां अलग बसा ली थीं. वीकैंड पर कभी किसी का फोन आ जाता, कुशलता मिल जाती. महीनों में कभी बेटों को डैड के पास आने की फुरसत मिलती भी तो ज्यादा वक्त फोन पर बिजनैस डीलिंग में खत्म हो जाता. तब सन जैसी सफेद पलकें, भौंहें और सिर के बाल चीखचीख कर पूछने लगते, ‘क्या इसी अकेलेपन के लिए तुम श्रीनगर में पूरा कुनबा छोड़ कर यहां आए थे?’

हालांकि डाक्टर खालिद अनवर की उम्र चेहरे पर हादसों का हिसाब लिखने लगी थी मगर बचपन से जवानी तक खाया कश्मीर का सूखा मेवा और फेफड़े में भरी शुद्ध, शीतल हवा उन की कदकाठी को अभी भी बांस की तरह सीधा खड़ा रखे हुए है. डाक्टर ने बुढ़ापे को पास तक नहीं फटकने दिया. अकसर बेटे उन के कंधे पर हाथ रख कर कहते हैं, ‘‘डैड, यू आर स्टिल यंग दैन अस. सो, यू डौंट नीड अवर केयर.’’ यह कहते हुए वे शाम से पहले ही अपने घर की सड़क की तरफ मुड़ जाते हैं.

शरीर तो स्वस्थ है लेकिन दिल… छलनीछलनी, दूसरी पत्नी से छिपा कर रखी गई शफीका की चिट्ठियां और तसवीरों को छिपछिप कर पढ़ने और देखने के लिए मजबूर थे. प्यार में डूबे खतों के शब्द, साथ गुजारे गिनती के दिनों के दिलकश शाब्दिक बयान, 63 साल पीछे ले जाता, यादों के आईने में एक मासूम सा चेहरा दिखलाई देने लगता. डाक्टर हाथ बढ़ा कर उसे छू लेना चाहते हैं जिस की याद में वे पलपल मरमर कर जीते रहे. बीवी एक ही छत के नीचे रह कर भी उन की नहीं थी. दौलत का बेशुमार अंबार था. शानोशौकत, शोहरत, सबकुछ पास में था अगर नहीं था तो बस वह परी चेहरा, जिस की गरम हथेलियों का स्पर्श उन की जिंदगी में ऊर्जा भर देता.

मेरे अपनेपन में उन्हें अपने वतन की मिट्टी की खुशबू आने लगी थी. अब वे परतदरपरत खुलने लगे थे. एक दिन, ‘‘लैपटौप पर क्या सर्च कर रहे हैं?’’

‘‘बेटी के लिए प्रौपर मैच ढूंढ़ रहा हूं,’’ कहते हुए उन का गला रुंधने लगा. उन की यादों की तल्ख खोहों में उस वक्त वह कंपा देने वाली घड़ी शामिल थी, जब उन की बेटी का पति अचानक बिना बताए कहीं चला गया. बहुत ढूंढ़ा, इंटरनैशनल चैनलों व अखबारों में उस की गुमशुदगी की खबर छपवाई, लेकिन सब फुजूल, सब बेकार. तब बेटी के उदास चेहरे पर एक चेहरा चिपकने लगा. एक भूलाबिसरा चेहरा, खोयाखोया, उदास, गमगीन, छलछला कर याचना करती 2 बड़ीबड़ी कातर आंखें.

किस का है यह चेहरा? दूसरी बीवी का? नहीं, तो? मां का? बिलकुल नहीं. फिर किस का है, जेहन को खुरचने लगे, 63 साल बाद यह किस का चेहरा? चेहरा बारबार जेहन के दरवाजे पर दस्तक दे रहा है. किस की हैं ये सुलगती सवालिया आंखें? किस का है यह कंपकंपाता, याचना करता बदन, मगर डाक्टर पर उस का लैशमात्र भी असर नहीं हुआ था. लेकिन आज जब अपनी ही बेटी की सिसकियां कानों के परदे फाड़ने लगीं तब वह चेहरा याद आ गया.

दुनियाभर के धोखों से पाकसाफ, शबनम से ज्यादा साफ चेहरा, वे कश्मीर की वादियां, महकते फूलों की लटकती लडि़यों के नीचे बिछी खूबसूरत गुलाबी चादर, नर्म बिस्तर पर बैठी…खनकती चूडि़यां, लाल रेशमी जोड़े से सजा आरी के काम वाला लहंगाचोली, मेहंदी से सजे 2 गोरे हाथ, कलाई पर खनकती सोने की चूडि़यां, उंगलियों में फंसी अंगूठियां. हां, हां, कोई था जिस की मद्धम आवाज कानों में बम के धमाकों की तरह गूंज रही थी, मैं तुम्हारा इंतजार करूंगी खालिद, हमेशा.

लाहौर एयरपोर्ट पर अलविदा के लिए लहराता हाथ, दिल में फांस सी चुभी कसक इतनी ज्यादा कि मुंह से बेसाख्ता चीख निकल गई, ‘‘हां, गुनहगार हूं मैं तुम्हारा. तुम्हारे दिल से निकली आह… शायद इसीलिए मेरी बेटी की जिंदगी बरबाद हो गई. मेरे चाचा के बहुत जोर डालने पर, न चाहते हुए भी मुझे उन की अंगरेज बेटी से शादी करनी पड़ी. दौलत का जलवा ही इतना दिलफरेब होता है कि अच्छेअच्छे समझदार भी धोखा खा जाते हैं.

‘‘शफीका, तुम से वादा किया था मैं ने. तुम्हें लाहौर ला कर अपने साथ रखने का. वादा था नए सिरे से खुशहाल जिंदगी में सिमट जाने का, तुम्हारी रातों को हीरेमोती से सजाने का, और दिन को खुशियों की चांदनी से नहलाने का. पर मैं निभा कहां पाया? आंखें डौलर की चमक में चौंधिया गईं. कटे बालों वाली मोम की गुडि़या अपने शोख और चंचल अंदाज से जिंदगी को रंगीन और मदहोश कर देने वाली महक से सराबोर करती चली गई मुझे.’’

अचानक एक साल बाद उन का दामाद इंगलैंड लौट आया, ‘‘अब मैं कहीं नहीं जाऊंगा. आप की बेटी के साथ ही रहूंगा. वादा करता हूं.’’

दीवानगी की हद तक मुहब्बत करने वाली पत्नी को छोड़ कर दूसरी अंगरेज औरत के टैंपरेरी प्यार के आकर्षण में बंध कर जब वह पूरी तरह से कंगाल हो गया तो लौटने के लिए उसे चर्चों के सामने खड़े हो कर वायलिन बजा कर लोगों से पैसे मांगने पड़े थे.

पति की अपनी गलती की स्वीकृति की बात सुन कर बेटी बिलबिला कर चीखी थी, ‘‘वादा, वादा तोड़ कर उस फिनलैंड वाली लड़की के साथ मुझ पत्नी को छोड़ कर गए ही क्यों थे? क्या कमी थी मुझ में? जिस्म, दौलत, ऐशोआराम, खुशियां, सबकुछ तो लुटाया था तुम पर मैं ने. और तुम? सिर्फ एक नए बदन की हवस में शादी के पाकीजा बंधन को तोड़ कर चोरों की तरह चुपचाप भाग गए. मेरे यकीन को तोड़ कर मुझे किरचियों में बिखेर दिया.

‘‘तुम को पहचानने में मुझ से और मेरे बिजनैसमैन कैलकुलेटिव पापा से भूल हो गई. मैं इंगलैंड में पलीपढ़ी हूं, लेकिन आज तक दिल से यहां के खुलेपन को कभी भी स्वीकार नहीं कर सकी. मुझ से विश्वासघात कर के पछतावे का ढोंग करने वाले शख्स को अब मैं अपना नहीं सकती. आई कांट लिव विद यू, आई कांट.’’ यह कहती हुई तड़प कर रोई थी डाक्टर की बेटी.

आज उस की रुलाई ने डाक्टर को हिला कर रख दिया. आज से 50 साल पहले शफीका के खामोश गरम आंसू इसी पत्थरदिल डाक्टर को पिघला नहीं सके थे लेकिन आज बेटी के दर्द ने तोड़ कर रख दिया. उसी दम दोटूक फैसला, दामाद से तलाक लेने के लिए करोड़ों रुपयों का सौदा मंजूर था क्योंकि बेटी के आंसुओं को सहना बरदाश्त की हद से बाहर था.

डाक्टर, शफीका के कानूनी और मजहबी रूप से सहारा हो कर भी सहारा न बन सके, उस मजलूम और बेबस औरत के वजूद को नकार कर अपनी बेशुमार दौलत का एक प्रतिशत हिस्सा भी उस की झोली में न डाल सके. शफीका की रात और दिन की आह अर्श से टकराई और बरसों बाद कहर बन कर डाक्टर की बेटी पर टूटी. वह मासूम चेहरा डाक्टर को सिर्फ एक बार देख लेने, एक बार छू लेने की चाहत में जिंदगी की हर कड़वाहट को चुपचाप पीता रहा. उस पर रहम नहीं आया कभी डाक्टर को. लेकिन आज बेटी की बिखरतीटूटती जिंदगी ने डाक्टर को भीतर तक आहत कर दिया. अब समझ में आया, प्यार क्या है. जुदाई का दर्द कितना घातक होता है, पहाड़ तक दरक जाते हैं, समंदर सूख जाते हैं.

मैं यह खबर फूफीदादी तक जल्द से जल्द पहुंचाना चाहता था, शायद उन्हें तसल्ली मिलेगी. लेकिन नहीं, मैं उन के दिल से अच्छी तरह वाकिफ था. ‘मेरे दिल में डाक्टर के लिए नफरत नहीं है. मैं ने हर लमहा उन की भलाई और लंबी जिंदगी की कामना की है. उन की गलतियों के बावजूद मैं ने उन्हें माफ कर दिया है, बजी,’ अकसर वे मुझ से ऐसा कहती थीं.

मैं फूफीदादी को फोन करने की हिम्मत जुटा ही नहीं सका था कि आधीरात को फोन घनघना उठा था, ‘‘बजी, फूफीदादी नहीं रहीं.’’ क्या सोच रहा था, क्या हो गया. पूरी जिंदगी गीली लकड़ी की तरह सुलगती रहीं फूफीदादी.

सुबह का इंतजार मेरे लिए सात समंदर पार करने की तरह था. धुंध छंटते ही मैं डाक्टर के घर की तरफ कार से भागा. कम से कम उन्हें सचाई तो बतला दूं. कुछ राहत दे कर उन की स्नेहता हासिल कर लूं मगर सामने का नजारा देख कर आंखें फटी की फटी रह गईं. उन के दरवाजे पर एंबुलैंस खड़ी थी. और घबराई, परेशान बेटी ड्राइवर से जल्दी अस्पताल ले जाने का आग्रह कर रही थी. हार्टअटैक हुआ था उन्हें. हृदयविदारक दृश्य.

मैं स्तब्ध रह गया. स्टेयरिंग पर जमी मेरी हथेलियों के बीच फूफीदादी का लिखा खत बर्फबारी में भी पसीने से भीग गया, जिस पर लिखा था, ‘बजी, डाक्टर अगर कहीं मिल जाएं तो यह आखिरी अपील करना कि वे मुझ से मिलने कश्मीर कभी नहीं आए तो मुझे कोई शिकवा नहीं है लेकिन जिंदगी के रहते एक बार, बस एक बार, अपनी मां की कब्र पर फातेहा पढ़ जाएं और अपनी सरजमीं, कश्मीर की खूबसूरत वादियों में एक बार सांस तो ले लें. मेरी 63 साल की तपस्या और कुरबानियों को सिला मिल जाएगा. मुझे यकीन है तुम अपने वतन से आज भी उतनी ही मुहब्बत करते हो जितनी वतन छोड़ते वक्त करते थे.’

गुनाहों की सजा तो कानून देता है, लेकिन किसी का दिल तोड़ने की सजा देता है खुद का अपना दिल.

‘तू आए न आए,

लगी हैं निगाहें

सितारों ने देखी हैं

झुकझुक के राहें…’

इस गजल का एकएक शब्द खंजर बन कर मेरे सीने में उतरने लगा और मैं स्टेयरिंग पर सिर पटकपटक कर रो पड़ा.

दूसरी बीवी का खेल

20जनवरी, 2022 को गुरुवार का दिन था. दोपहर के करीब 12 बजे शरद विश्वकर्मा ने लखनऊ के
थाना पारा की हंसखेड़ा पुलिस चौकी के इंचार्ज ओमप्रकाश मिश्रा को फोन किया. उस ने बताया कि उस की बहन शिवा विश्वकर्मा उर्फ जारा उर्फ सोफिया खान (27 साल) सुबह से अपने घर से गायब है. वह पुरानी कांशीराम कालोनी के फ्लैट नंबर 2/6 में अपने पति यासीन खान के साथ रहती है.  ‘‘ठीक है, आप चिंता मत करो, कुछ ही देर में पुलिस वहां पहुंचती है,’’ चौकी इंचार्ज ओमप्रकाश मिश्रा ने शरद से कहा.

इस के बाद एसआई मिश्रा ने अपने पास बैठे सहयोगी एसआई सुधांशु रंजन को फोन पर हुई बातचीत के बारे में बताते हुए विचारविमर्श किया.फिर वह एसआई सुधांशु रंजन और महिला सिपाही अंतिमा पांडेय को साथ ले कर मौके पर आ पहुंचे. फ्लैट पर ताला लगा था. उन्होंने फ्लैट के दरवाजे की झिरखी से झांक कर देखा. कमरे में अंधेरा था.

अंधेरे में कमरे के अंदर कुछ साफ दिखाई नहीं दे रहा था. अंदर से हलकी दुर्गंध आती महसूस हुई तो मौके की नजाकत को समझ कर एसआई सुधांशु रंजन ने थाना पारा के प्रभारी दधिबल तिवारी को फोन पर मामला संदिग्ध होने की आशंका जाहिर करते हुए तुरंत ही मौके पर आने को कहा.
थानाप्रभारी दधिबल तिवारी एसआई की सूचना पा कर महिला एसआई रीना वर्मा, हैडकांस्टेबल अशोक कुमार को साथ ले कर पुरानी कांशीराम कालोनी आ पहुंचे.

पड़ोसियों से पुलिस ने यासीन खान के बारे में पूछताछ की तो वह कुछ नहीं बता सके.चूंकि फ्लैट से दुर्गंध आ रही थी, इसलिए लोगों की मौजूदगी में पुलिस ने फ्लैट का ताला तोड़ दिया. उस के बाद कमरे का सघन निरीक्षण किया. काफी देर तक छानबीन करने पर यासीन खान की दूसरी पत्नी शिवा विश्वकर्मा उर्फ जारा उर्फ सोफिया खान की लाश पलंग पर गद्दे की तह में लिपटी हुई मिली.
पुलिस टीम अभी छानबीन कर ही रही थी, उसी समय मृतका शिवा उर्फ सोफिया का भाई शरद विश्वकर्मा भी मौके पर पहुंच गया.

उस ने थानाप्रभारी को बताया कि यासीन खान ने पहली पत्नी शहर बानो के मौजूद रहते हुए उस की बहन शिवा विश्वकर्मा से दूसरा प्रेम विवाह नेपाल में किया था और उस के साथ इसी फ्लैट पर दोनों पत्नियां रहती थीं.

शरद विश्वकर्मा ने बताया कि वह 6 दिन पहले नेपाल से अपना इलाज कराने बहन शिवा उर्फ सोनिया खान के कहने पर लखनऊ आया था और डिलाइट सन हौस्पिटल में भरती था.20 जनवरी, 2022 को दिन के लगभग 10 बजे के समय शिवा से उस की फोन पर बात हुई थी तो उस ने खाना ले कर अस्पताल में आने को कहा था. लेकिन 2 घंटे बीत जाने के बाद भी शिवा खाना ले कर जब अस्पताल नहीं पहुंची तो मन में जानने की उत्सुकता हुई.

इस पर उस ने शिवा को कई बार फोन किया तो बहुत मुश्किल से बहनोई यासीन खान ने काल रिसीव करते हुए उसे बताया कि तुम्हारी बहन की शहर बानो से कुछ कहासुनी हो गई है. कुछ ही देर में मैं उसे मना कर अस्पताल ला रहा हूं.जब काफी देर हो गई और शिवा खाना ले कर अस्पताल नहीं पहुंची तो शरद विश्वकर्मा को कुछ आशंका हुई. तब उस ने मोबाइल फोन से थाना पारा चौकी इंचार्ज ओमप्रकाश मिश्रा को सूचना दी.

शरद विश्वकर्मा ने कहा कि उस का बहनोई यासीन खान और उस की पहली पत्नी शहर बानो सुबह अपने घर पर मौजूद थे, जिन्होंने अस्पताल आने का जिक्र किया था, लेकिन अब वह अपनी पत्नी शहर बानो को ले कर गायब हो गया.थानाप्रभारी दधिबल तिवारी ने एसआई ओमप्रकाश मिश्रा और सुधांशु रंजन से मृतका के पोस्टमार्टम काररवाई कराने हेतु निर्देश देने के बाद शरद विश्वकर्मा से तहरीर ले कर मुकदमा दर्ज करने को कहा और थाने लौट आए.

शरद विश्वकर्मा की तरफ से पारा थाने में भादंवि की धारा 302, 201 के अंतर्गत यासीन खान एवं उस की पत्नी शहर बानो के खिलाफ मुकदमा दर्ज करा दिया.मुकदमा दर्ज होने के बाद पुलिस के गले यह बात नहीं उतर रही थी कि यासीन खान अपनी पत्नी सोफिया की हत्या भला क्यों करेगा.
पड़ोसियों से छानबीन करने पर एसआई ओमप्रकाश मिश्रा को पता चला कि शहर बानो 2 दिन पहले ही अपने मायके बहराइच से लगभग 3 माह के बाद ही लौटी थी और वह यहां लखनऊ में यासीन और सोफिया के साथ एक ही रूम में रहती थी.

अब पुलिस को पोस्टमार्टम रिपोर्ट का इंतजार था. 22 जनवरी, 2022 को शिवा विश्वकर्मा की पोस्टमार्टम रिपोर्ट पुलिस को मिल गई. पोस्टमार्टम रिपोर्ट से यह बात स्पष्ट हो गई कि उस की हत्या किसी धारदार हथियार से नहीं, बल्कि गला दबा कर की गई थी.थानाप्रभारी दधिबल तिवारी ने विवेचना अपने हाथों में ले कर जांच करनी शुरू कर दी. पुलिस को भरोसा था कि सोफिया की हत्या का क्लू उस के भाई शरद विश्वकर्मा से जरूर मिल जाएगा, लेकिन पुलिस के पूछने पर शरद हत्या का राज व कारण तो नहीं बता सका, अलबत्ता इतना जरूर कहा कि शहर बानो एवं उस की बहन में काफी अनबन रहती थी और उस की बहन को शहर बानो फूटी आंख नहीं सुहाती थी.

पड़ोसियों ने बताया यासीन खान सोफिया के कहने पर ही शहर बानो को मनमुटाव के चलते 3 महीने पहले उस के मायके नानपारा, बहराइच छोड़ आया था और घटना के बाद पुलिस के पहुंचने से पहले शहर बानो और यासीन खान दोनों घर से फरार हो गए थे.अब पुलिस को शिवा उर्फ सोफिया के पति यासीन खान और शहर बानो की तलाश थी ताकि हत्या का परदाफाश हो सके.कानपुर रोड कृष्णानगर अंडरपास से मुखबिर की सूचना पर 22 जनवरी, 2022 को रात के समय शहर बानो और यासीन खान को गिरफ्तार कर लिया गया.

पूछताछ में यासीन खान ने बताया कि उस ने शहर बानो के सहयोग से ही दूसरी पत्नी सोफिया की हत्या की थी. हत्या के बाद उस की लाश को गद्दे में छिपा दी थी. उस ने हत्या की जो वजह बताई, वह हैरान कर देने वाली निकली—उत्तर प्रदेश के शहर लखनऊ और हरदोई मार्ग पर अवध हौस्पिटल बहुत चर्चित है. इसी अवध अस्पताल से लगभग 3 किलोमीटर की दूरी पर लखनऊ विकास प्राधिकरण द्वारा कांशीराम कालोनी बनाई गई है.

पुरानी कांशीराम कालोनी में लगभग 5 हजार आबादी रहती है. प्राधिकरण द्वारा बनाई गई इस कालोनी में यासीन खान किराए के फ्लैट नंबर 2/6 में सोफिया व शहर बानो के साथ रहता था. उस के पिता का नाम ताहिर खान है और वह नेपाल के जिला बांके के कस्बा उधड़ापुर का मूल निवासी है.
उस की पहली शादी सन 2016 में उत्तर प्रदेश के जिला बहराइच के मोहल्ला घसियारिन टोला निवासी मुल्ला खान की बेटी शहर बानो से हुई थी.

वह लखनऊ में 2 साल पहले शहर बानो के साथ रोजीरोटी की तलाश में आ कर बस गया था. इन दिनों वह आयुर्वेदिक दवाओं का सप्लायर था.यासीन खान की दूसरी पत्नी शिवा विश्वकर्मा उर्फ सोफिया शरद विश्वकर्मा की बहन थी. वह हिंदू थी. उस के पिता का नाम बंसबहादुर विश्वकर्मा था. वह नेपाल के कस्बा घोराई उपमहानगर पालिका वार्ड-14, जिला-दाड़ के मूल निवासी थे.शरद विश्वकर्मा से यासीन खान के व्यवसाय के सिलसिले में आनेजाने के कारण नेपाल में ही दोस्ती हो गई थी. शरद ने यासीन को साथ मिल कर नेपाल में ही प्रौपर्टी डीलिंग का काम करने की सलाह दी. यासीन खान शरद के कहने पर नेपाल के कस्बा घोराई में प्रौपर्टी डीलिंग का धंधा करने लगा था.

शरद के कहने पर उस ने उस की बहन शिवा विश्वकर्मा को अपने औफिस में रिसैप्शनिस्ट की नौकरी पर रख लिया था.शरद और यासीन खान ने घोराई में रह कर लगभग एक साल तक धंधा किया. लेकिन इन का वहां कोई खास फायदा नहीं हुआ और अधिक पूंजी न होने के कारण प्रौपर्टी डीलिंग के धंधे में कोई खास सफलता नहीं मिल सकी.तब यासीन के कहने पर शरद नेपाल छोड़ कर लखनऊ आ कर रहने लगा. यहां भी इस धंधे में सफलता न मिलने पर शरद विश्वकर्मा का मन इस काम से उचट गया और वह शिवा को साथ ले कर नेपाल वापस लौट गया.

यहां उल्लेख कर दें कि नेपाल में ही प्रौपर्टी के धंधे के दौरान शिवा विश्वकर्मा यासीन खान के संपर्क में आई थी और उस के प्यार में रचबस गई थी. दोनों ने प्रेम विवाह करने की कसमें खाई थीं. उस ने यासीन खान से धर्म बदल कर जीवन भर साथ निभाने का भरोसा दिला कर 3 साल पहले प्रेम विवाह कर लिया था. यासीन से शादी के बाद शिवा विश्वकर्मा ने अपना नाम बदल कर सोफिया खान रख लिया था.
नेपाल में धंधा बंद होने पर यासीन के साथ वह लखनऊ आ कर शेष जीवन गुजारना चाहती थी. लेकिन शिवा मुसलिम रीतिरिवाजों के कारण यासीन के साथ खुल कर जीने का रास्ता नहीं खोज पा रही थी.
तब शिवा ने नेपाल में ही अपने पिता के यहां जा कर बसने का तानाबाना बुन कर यासीन के समक्ष प्रस्ताव रखा. लेकिन यासीन उस के साथ नेपाल में रहने के लिए हरगिज तैयार नहीं हुआ.

तब यासीन ने शिवा उर्फ सोफिया खान उर्फ जारा को लखनऊ में अपने साथ रहने के लिए राजी कर लिया था.वर्ष 2018 से यासीन खान शिवा उर्फ सोफिया को साथ ले कर लखनऊ रहने लगा था. शिवा उसे दिलोजान से प्यार करती थी. लेकिन यासीन खान की पहली बीवी शहर बानो को शिवा उर्फ सोफिया पसंद नहीं थी. वह नहीं चाहती थी कि उस का पति उस के अलावा किसी और को प्यार करे.
लखनऊ में ही रहने के दौरान शिवा ने एक बेटी को जन्म दिया और उस का नाम सारा रखा था. उस की बेटी सारा इस समय लगभग 3 साल को होने जा रही है. लखनऊ के कांशीराम कालोनी के मकान नंबर 2/6 में यासीन खान सोफिया के साथ रहने लगा था.

यहां उस ने कुछ समय तक इलैक्ट्रीशियन का धंधा किया लेकिन बाद में वह आयुर्वेदिक दवाओं की सप्लाई की कंपनी में नौकरी करने लगा.लखनऊ में सोफिया उर्फ जारा के रहने के कारण पहली बीवी शहर बानो घसियारी टोला, नानपारा बहराइच में अपने पिता के घर पर रहा करती थी और यासीन साल छ: महीने में शहर बानो से मिलने बहराइच आताजाता था.बहराइच पहुंचने पर शहर बानो यासीन खान को काफी भलाबुरा कहा करती थी और दोनों में सोफिया को ले कर कहासुनी होती थी. शहर बानो यासीन से सीधे मुंह बात तक नहीं करती थी और यह कह कर उलाहने दिया करती थी कि अब यहां क्या लेने आते हो. उस कलमुंही के साथ ही गुरछर्रे उड़ाओ.

यासीन 1-2 दिन ससुराल में रुकने के बाद शहर बानो को तसल्ली दे कर लखनऊ वापस लौट आता था. शहर बानो के साथ किए गए वादों को अमली जामा पहनाने के लिए वह दिनरात बेचैन रहने लगा था.
पहली पत्नी शहर बानो के बाद सोफिया यासीन की जिंदगी में जब से आई थी, उस के अमनचैन की जिंदगी में जहर घुल गया था.एक बार की बात है. उस समय सोफिया और यासीन का निकाह नहीं हुआ था. मनमुटाव के कारण शहर बानो जब अपने मायके आई थी, तब यासीन शहर बानो की रुखसती कराने अपनी ससुराल आया हुआ था.

लखनऊ से यासीन के साथ शिवा विश्वकर्मा भी आई थी तो शहर बानो को ससुराल में न पा कर यासीन को काफी अचरज हुआ.शहर बानो की बहन रेशमा ने पूछने पर यासीन को बताया कि आपा तो खालाजान के यहां गई हुई हैं. उन के यहां कुरान खुवानी की दावत है. आज ही वापस आने के लिए कह गई थीं.यासीन को जान कर काफी तसल्ली हुई कि अब शहर बानो नाम का कांटा उस की आंखों से दिन भर के लिए दूर है. दोपहर के समय यासीन खान जब शिवा के साथ कमरे में सो रहा था तो शिवा के साथ अठखेलियां खेलने में मस्त हो गया. शिवा यासीन के साथ बातें करने मे मशगूल थी.

कुछ ही देर पहले शिवा और यासीन हमबिस्तर हो कर अलग हुए थे. तब शिवा ने उस के साथ निकाह नहीं किया था. शिवा यासीन को प्यार का वास्ता दे कर शीघ्र ही निकाह करने के लिए कुछ कहने ही जा रही थी कि अचानक घर में शहर बानो के आने की आहट सुनाई दी.दरवाजे पर उस की ब्याहता बेगम शहर बानो खड़ी थी. शहर बानो उस के लिए कमरे में चाय ले कर आई थी कि यासीन शहर बानो को अच्छे कपड़ों में देख कर चहक उठा और बोला आज तुम काफी खूबसूरत लग रही हो.शहर बानो ने उस दिन काफी सुंदर लिबास पहन रखा था, पति की बातें सुन कर वह मुसकरा उठी.

शहर बानो के पूछने पर उस ने शिवा विश्वकर्मा का परिचय कराया तो वह जलभुन कर राख हो गई. शहर बानो खिसियानी बिल्ली की तरह नफरत भरी नजरों से शिवा विश्वकर्मा को घूर कर रह गई. शहर बानो काफी देर तक उसे जलीकटी सुनाती रही.यासीन खान के संपर्क में आने के बाद शहर बानो को शिवा की गतिविधियों पर शक होने लगा था. उसे यह आभास नहीं था कि उस का पति शिवा के चक्कर में फंस गया है और उस के सामने सौत के गुन गाया करता है.

यासीन के साथ वह कांशीराम कालोनी में आई हुई थी तो शिवा को पति के साथ एक बार आपत्तिजनक अवस्था में उसे देख लिया था तो उसे पूर्ण विश्वास हो गया था कि शिवा विश्वकर्मा उर्फ सोफिया उस के शौहर पर डोरे डाल चुकी है और यासीन भी उस के रंग में रचबस चुका है.यहीं से शहर बानो के मन में कांटा पनप चुका था और खुशहाल जिंदगी में घर के अंदर कलह शुरू हो गई थी.

फलस्वरूप शहर बानो आए दिन अपनी ससुराल में रहा करती थी और यासीन खान ने पूर्णरूप से स्वतंत्र हो कर शिवा विश्वकर्मा के साथ निकाह कर लिया था. घर में शहर बानो पहले से जलीभुनी बैठी थी और उस ने घर में शिवा उर्फ सोफिया को देख कर कोहराम मचा दिया था.पानी सिर से ऊंचा होते देख यासीन पत्नी शहर बानो की बातें सुन कर बुरी तरह बौखला उठा था. उस ने कहा, ‘‘तुम लोग सोफिया के बारे में बुराभला कहने वाले कौन होते हो.’’

शहर बानो और उस की बहन रेशमा को तो उस दिन जैसे भूत सवार था. यासीन ने रेशमा को डांटते हुए खामोश रहने की हिदायत दी.विवाद बढ़ता गया और यासीन ने गुस्से में सोफिया के सामने शहर बानो पर मिट्टी का तेल उड़ेल दिया और शहर बानो को जला कर मारने की धमकी दे डाली.उस दिन कोई अनहोनी न हो, इसलिए मातापिता के द्वारा मामला रफादफा कर दिया गया और यासीन अगले दिन शहर बानो की बिना रुकसती कराए सोफिया को साथ ले कर बहराइच से लखनऊ वापस लौट आया और शहर बानो को धमकी दे डाली कि अगर तुम्हारी गर्ज हो तो तुम लखनऊ खुद चली आना.

लेकिन सोफिया के कारण शहर बानो लखनऊ वापस लौट कर नहीं आई. यासीन उसे ले कर परेशान रहने लगा था क्योंकि सोफिया के कारण शहर बानो से अब उस की तलाक की नौबत आ गई थी. कहावत है कि नारी नदिया की धार होती है और पुरुष एक किनारा होता है. दोनों विमुख भी नहीं रह सकते हैं.शहर बानो भी यासीन से लगाव होने के कारण उसे दिल से निकाल नहीं पा रही थी. शहर बानो के मातापिता ने अपनी बेटी की जिंदगी में फिर से बहार लाने के लिए यासीन को रुखसत कराने के लिए खबर भेजी.

यासीन ने भी उत्तर में कहलवा दिया कि यदि वह अपनी बेटी को भेजने के लिए तैयार हैं तो वह उसे खुद पहुंचा दें. वह उसे अपने पास रखने को तैयार है.शहर बानो के वालिद मुल्ला खान ने बेटी को समझाया कि तुम्हें अपने शौहर के यहां खुद चले जाना चाहिए. उस दिन 18 जनवरी, 2022 को एक लंबे अरसे के बाद लखनऊ स्थित कांशीराम कालोनी वह खुद आ गई थी.शहर बानो जब कांशीराम कालोनी वाले आवास पर पहुंची तो यासीन बरामदे में बैठाबैठा दूसरी पत्नी शिवा उर्फ सोफिया से हंसहंस कर बातें कर रहा था.

शहर बानो को अचानक आया देख कर वह भड़क उठा और बोला कि आने से पहले तुम्हें फोन करना चाहिए था. शिवा उर्फ सोफिया ने भी यासीन का साथ दिया, ‘‘यासीन ठीक तो कह रहे हैं. कम से कम आने से पहले तुम्हें फोन तो करना चाहिए था. जब से यासीन ने मुझ से निकाह किया है तुम बातबात में रूठ कर चली जाती हो.’’शहर बानो ने कहा कि तुम लोगों से मेरा यहां रहना देखा नहीं जाता है तो मैं बहराइच न जाऊं तो फिर क्या करूं.

लंबे अरसे बाद लखनऊ आने पर शहर बानो को यासीन खान से यह उम्मीद नहीं थी. वह उलाहना सुन कर मन मसोस कर रह गई थी.पुलिस के पूछने पर यासीन खान ने बताया कि सोफिया ने अपने भाई शरद विश्वकर्मा के इलाज के लिए 30-40 हजार रुपया अलमारी में बचा कर रखे थे, गुरुवार को सोफिया को बिना बताए वह पैसे उस ने निकाल लिए.इस पर पहले तो उस का शक शहर बानो पर गया था. जिस पर दोनों में काफी कहासुनी हुई थी. लेकिन सोफिया को उस ने बताया कि वह रुपए शहर ने नहीं बल्कि उस ने निकाले थे. इस पर उस का उस से भी काफी झगड़ा हुआ.

जब रात को सोफिया अपने अंदर के कमरे में जा कर सो गई, तभी शहर बानो ने यासीन खान को अपने बाहुपाश में लेते हुए सोफिया की हत्या करने और हमेशा के लिए रास्ते का कांटा हटाने के लिए उकसाया, ताकि वह बाकी जिंदगी चैन से जी सके.यासीन उस की बात सुन कर राजी हो गया. शहर बानो जानती थी कि जब से शिवा उर्फ सोफिया खान उस के पति यासीन की जिंदगी में आई है, यासीन की महीने भर की कमाई अपने भाई शरद को भेज दिया करती है, जिस से यासीन मन मसोस कर रह जाता है.

20 जनवरी, 2022 को शिवा उर्फ सोफिया जब सो गई तो शहर बानो ने सोफिया की हत्या करने के लिए यासीन को अस्पताल में शरद विश्वकर्मा के पास न भेज कर घर पर ही रोक लिया.
सुबह होने पर जब सोफिया ने अस्पताल में भरती अपने भाई शरद के लिए खाना बना कर और उस के औपरेशन के लिए रुपए ले कर यासीन को साथ चलने को कहा तो यासीन ने रुपए न देने की बात कही.
जिस के कारण उस की सोफिया से कहासुनी हो गई. उसी दौरान यासीन के इशारे पर शहर बानो ने सोफिया के हाथ पकड़ लिए और यासीन ने गला दबा कर शिवा उर्फ सोफिया की हत्या कर दी. हत्या के बाद शव को पलंग पर गद्दे में लपेट कर छिपा दिया.

जब शिवा विश्वकर्मा उर्फ सोफिया खाना और रुपए ले कर अस्पताल नहीं पहुंची, तब शरद ने उसे कई बार फोन किया. जब उस की बहन से बात नहीं हो पाई तो शरद ने संदेह होने पर हंसखेड़ा पुलिस चौकीप्रभारी को फोन कर सूचना देते हुए बहन के घर पहुंचने को कहा था.
गिरफ्तारी के बाद थानाप्रभारी दधिबल तिवारी, एडिशनल सीपी राजेश श्रीवास्तव, डीसीपी गोपालकृष्ण चौधरी व एसीपी आशुतोष कुमार के समक्ष शहर बानो व यासीन खान को पेश किया गया. आरोपियों ने इन सभी अधिकारियों को भी हत्या की कहानी बताई.
इस के बाद यासीन खान और शहर बानो को 23 जनवरी, 2022 को कोर्ट में पेश कर जेल भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक विवेचना जारी थी.

दोस्ती की कमजोर छत

छत्तीसगढ़ के जिला महासमुंद के गांव किशनपुर में मनहरण उर्फ मोनो और दुर्गेश उर्फ पुस्तम की दोस्ती एक मिसाल बन चुकी थी. लोग उन की दोस्ती की नजीर दिया करते थे. दोनों का ही एकदूसरे के घर खूब आनाजाना था.

करीब 6 महीने पहले मनहरण की शादी आरती से हुई थी. दोनों की गृहस्थी ठीक चल रही थी. दुर्गेश को पिथौरा में आरटीओ एजेंट से काम था. उस ने सोचा कि पहले मनहरण के घर जाएगा, वहां से उसे साथ ले कर एजेंट के पास चला जाएगा. यही सोच कर वह सुबह 8 बजे मनहरण के घर चला गया.

मनहरण की पत्नी आरती नहाने के बाद नाश्ता तैयार करने के लिए किचन में जा रही थी, तभी दरवाजे पर दस्तक हुई. आरती ने दरवाजा खोला तो दुर्गेश को आया देख कर मुसकराई. वह बोली, ‘‘भैया आप? आओ, अंदर आओ.’’

उस समय आरती बेहद खूबसूरत लग रही थी. दुर्गेश उसे निहारता रह गया. आरती उसे कमरे में ले गई. मनहरण उस समय सो रहा था. आरती दुर्गेश को बैठा कर चाय बनाने लगी. दुर्गेश आरती के खयालों में खो सा गया. कुछ ही देर में वह दुर्गेश के लिए चाय बना कर ले आई. आरती उसे खोया देख बोली, ‘‘क्या बात है भैया, कहां खो गए? लो, चाय पी लो.’’

‘‘कुछ नहीं भाभी, बस यूं ही… मनहरण कहां है, दिखाई नहीं दे रहा.’’ दुर्गेश ने पूछा.

‘‘अभी सो रहे हैं. मैं उठाती हूं.’’ कह कर वह पति को जगाने चली गई.

दुर्गेश के आने की बात सुन कर मनहरण ने बिस्तर छोड़ दिया. वह दुर्गेश के पास पहुंच कर बोला, ‘‘अरे यार, तुम बैठो मैं तुरंत तैयार होता हूं. बस 5 मिनट में…’’

इस बीच आरती दुर्गेश के पास बैठी बतियाती रही. उस दौरान दुर्गेश उसे चाहत की नजरों से देखता रहा. इस बात को आरती ने महसूस किया तो उस ने दुर्गेश को टोका, ‘‘क्या बात है दुर्गेश भैया, ऐसा क्या है जो मुझे इतनी गौर से देखे जा रहे हो?’’

दुर्गेश ने साहस कर के कहा, ‘‘भाभी, मैं देख रहा हूं कि आप कितनी खूबसूरत हैं. आप की मिसाल तो पूरी दुनिया में नहीं मिलेगी. मेरा दोस्त कितना भाग्यशाली है, जो आप उसे मिली हैं.’’ चाय की चुस्कियां लेते हुए दुर्गेश बोला.

‘‘तुम जरूर झूठी तारीफ कर रहे हो. कुछ लोग दोस्त की पत्नी की झूठी तारीफ इसलिए करते हैं कि समय पर चायनाश्ता मिलता रहे.’’ कह कर आरती रसोई की ओर जाने लगी तो दुर्गेश ने कहा, ‘‘भाभी, एक बात कहूं.’’

आरती ने ठिठकते हुए रुक कर उस की ओर देखा तो वह बोला, ‘‘मैं जो भी कह रहा हूं सौ फीसदी सही है. आप इसे दिल बहलाने वाली बात मत समझना. आप वाकई…’’

आरती ने हंस कर कहा, ‘‘अच्छा भैया, तुम्हारी पत्नी खूबसूरत नहीं है क्या, बताओ तो. मैं आज ही तुम्हारे यहां आ धमकूंगी और सब कुछ बता दूंगी.’’

यह सुन कर दुर्गेश ने साहस के साथ कहा, ‘‘ऐसा है तो आप आज शाम को ही हमारे यहां आ जाओ. आप का स्वागत है. और हां, मेरी बात सही हुई तो मुझे क्या दोगी?’’

‘‘मैं भला तुम्हें क्या दूंगी? मगर मैं इतना जरूर जानती हूं कि तुम बिलावजह मेरी प्रशंसा कर रहे हो. तुम्हारी पत्नी रेशमा को मैं ने देखा है, समझे न.’’ आरती मुसकराते हुए बोली.

आरती कमरे से फिर जाने को हुई तो दुर्गेश ने रुकने का अनुरोध किया लेकिन वह उस की बातें अनसुनी कर के किचन में चली गई.

दोस्त की बीवी पर गंदी नजर

थोड़ी देर में मनहरण नहा कर बाहर आया और नाश्ता कर दुर्गेश के साथ चला गया.

इस के बाद दुर्गेश किसी न किसी बहाने मनहरण के घर आनेजाने लगा. दुर्गेश की आंखों के आगे बस आरती घूमती रहती थी. अब वह उसे पाने के उपाय खोजने लगा था. वह यह भी भूल गया था कि आरती उस के जिगरी दोस्त मनहरण की जीवनसंगिनी है.

पति की गैरमौजूदगी में भी दुर्गेश आरती से मिलता तो वह उसे पूरा सम्मान देती थी. लेकिन उस की नजरों की भाषा को समझते हुए वह खुद संयम से रहती थी.

एक दिन जब मनहरण घर पर नहीं था, तो दुर्गेश आ धमका और आरती से अधिकारपूर्वक बोला, ‘‘भाभी, आज मेरे सिर में बड़ा दर्द हो रहा है. मैं ने सोचा कि आप के हाथों की चाय पी लूं तो शायद सिरदर्द गायब हो जाए.’’

आरती ने स्वाभाविक रूप से उस का स्वागत किया और कहा, ‘‘बैठिए, मैं चाय बना कर लाती हूं. लेकिन भैया, यह तो बताओ कि मेरी बनाई चाय में ऐसा क्या जादू है, जो तुम ठीक हो जाओगे. और हां, रेशमा की चाय में ऐसा क्या नहीं है, जो तुम्हारा सिरदर्द ठीक नहीं होगा.’’ कह कर आरती हंसने लगी.

‘‘भाभी, मेरा यह मर्ज आप नहीं समझोगी.’’ वह बोला.

‘‘क्यों…क्यों नहीं समझूंगी. मुझे समझाओ मैं कोशिश करूंगी.’’ आरती ने भोलेपन से कहा.

‘‘भाभी, एक गाना है न ‘तुम्हीं ने दर्द दिया है, तुम्हीं दवा देना’ तो यह समझो कि दर्द तुम्हारा ही दिया हुआ है इसलिए यह तुम्हारी ही दवाई से ठीक भी होगा. इसलिए जल्द से चाय बना कर पिला दो.’’

आरती समझ रही थी कि दुर्गेश कुछ ज्यादा ही बहकने लगा है, इसलिए एक दिन उस ने पति को दुर्गेश की हरकतों का हवाला देते हुए सारी बातें विस्तार से बता दीं.

पति की गैरमौजूदगी में दुर्गेश के आनेजाने का मतलब आरती समझ रही थी. वह पति का दोस्त था, इसलिए वह उसे घर आने को मना भी नहीं कर सकती थी. उस का आदरसत्कार करना उस की मजबूरी थी. लेकिन दुर्गेश के वहां आने का मकसद कुछ और ही था.

एक दिन दुर्गेश आरती के यहां पहुंचा तो आरती उस के लिए चाय बना कर लाई. चाय पीते समय आरती बोली, ‘‘दुर्गेश भैया, मैं बहुत दिनों से आप से एक सवाल पूछना चाहती थी. सचसच बताओगे?’’

सुन कर दुर्गेश खिल उठा. उसे लगा कि बस उस की बात बन गई. आरती कुछ ऐसा कहेगी कि उस की मनोकामना पूरी हो जाने का रास्ता खुल जाएगा.

‘‘भाभी, आप एक क्या 2 बातें पूछो.’’ दुर्गेश खुश हो कर बोला.

‘‘भैया, पिछले साल एक मर्डर हुआ था, जिस में तुम्हारे बड़े भाई जेल में हैं, वो क्या मामला था?’’ आरती बोली.

आरती की बातें सुन कर दुर्गेश मानो आसमान से जमीन पर आ गिरा. वह सोचने लगा कि भाई द्वारा मर्डर करने की बात आरती को पता है. उस ने तत्काल बातों को घुमाया और कहने लगा, ‘‘कुछ नहीं भाभी, मेरे भैया को झूठा फंसाया गया था. भैया तो देवता समान आदमी हैं, वे भला किसी का मर्डर क्यों करेंगे. मैं तुम को सब कुछ बता दूंगा कि सच्चाई क्या है, मगर फिर किसी दिन…’’ दुर्गेश ने आरती की आंखों में डूबते हुए कहा.

‘‘ठीक है, बता देना.’’ कह कर आरती कमरे से निकलने को हुई कि तभी दुर्गेश ने पीछे से आ कर उसे बांहों में भर लिया. आरती ने किसी तरह उस के चंगुल से छूट कर कहा, ‘‘दुर्गेश भैया, यह तुम क्या कर रहे हो. शर्म आनी चाहिए तुम्हें. मैं तुम्हें जो सम्मान देती हूं, उस का तुम यह सिला दे रहे हो. अपनी मर्यादा में रहो. आइंदा अगर तुम ने ऐसी हरकत की तो अच्छा नहीं होगा.’’

इसी बीच मनहरण भी आ गया. उस ने पत्नी की सारी बातें सुन ली थीं लेकिन अपने हावभाव से उस ने यह बात दुर्गेश को महसूस नहीं होने दी. कुछ देर तक दुर्गेश और मनहरण इधरउधर की बातें करते रहे. इस के बाद दुर्गेश वहां से चला गया.

मनहरण हकीकत जान गया था

उस रात आरती ने पति को दुर्गेश के क्रियाकलापों से अवगत कराया. उस ने कहा कि वह अपने दोस्त को समझाने की कोशिश करे. मनहरण ने पत्नी की ओर उचटती निगाह डालते हुए कहा, ‘‘मैं ने उस की हरकतें देख ली हैं और तुम्हारी बातें भी सुन ली हैं. सच कहूं, मुझे तुम पर गर्व है.’’

यह सुन कर आरती के चेहरे पर मुसकान तैरने लगी. वह बोली, ‘‘मैं ने आज उसे सही तरह से डांट दिया है और तुम भी आ गए थे. अब वह दोबारा गलत हरकत नहीं करेगा.’’

‘‘और अगर करेगा तो मैं उसे हमेशा के लिए सही कर दूंगा.’’ मनहरण के स्वर में कठोरता थी.

‘‘यह आप क्या कह रहे हो?’’ आरती घबराते हुए बोली, ‘‘क्या मतलब है तुम्हारा?’’

‘‘कुछ नहीं, मैं उसे अच्छी तरह समझा दूंगा. वह सोचता है कि उस के भाई फूल सिंह ने 4 मर्डर किए हैं तो उस की वजह से मैं डर जाऊंगा. वह बेवकूफ है. फूल सिंह अपनी करनी का फल जेल में भोग रहा है. देखना यह भी भोगेगा.’’ वह गुस्से में बोला.

‘‘देखो जी, वह तुम्हारा दोस्त है, उसे प्रेम से समझा कर मामला खत्म करना है. हमें बात का बतंगड़ नहीं बनाना है, समझे. वादा करो मुझ से…’’ आरती ने कहा.

‘‘ठीक है, चलो अब सो जाओ. मुझे नींद आ रही है.’’ कह कर मनहरण ने करवट बदल कर सोने का अभिनय किया. मगर सच तो यह था कि उस की आंखों की नींद उड़ चुकी थी.

7 सितंबर, 2019 की शाम को जब मनहरण और दुर्गेश मिले तो दोनों एकदम सामान्य थे. ऐसे जैसे उन के बीच कुछ हुआ ही न हो. मनहरण ने कहा, ‘‘यार, मैं ने देशी माल बनवाया है.’’

मनहरण दुर्गेश को किशनपुर के पास स्थित गांव रामपुर ले गया, जहां मनहरण के लिए पहले से ही देशी शराब तैयार थी. उसे ले कर दोनों कटरा नाले के पास बैठ गए. उसी समय दुर्गेश का एक दोस्त सूरज वहां आ टपका. तीनों ने एक साथ शराब पीनी शुरू की.

मनहरण ने उस दिन पहले से ही मन ही मन एक योजना बना ली थी. उसी के तहत उस ने खुद कम शराब पी. दुर्गेश और सूरज को ज्यादा पिलाता चला गया. जब दोनों मदहोश हुए तो अपनेअपने घर जाने को तैयार हो गए, मगर दुर्गेश और सूरज ने इतनी ज्यादा पी ली थी कि दोनों के पैर लड़खड़ाने लगे.

सूरज अभी 16 साल का ही था. वह चलतेचलते साइकिल सहित सड़क पर गिर गया. उधर मनहरण दोनों की गतिविधियों पर नजर रखे हुए था. जब दुर्गेश पर शराब का नशा चढ़ा तो वह भी एक खेत के पास गिर गया.

शराब पिला कर मार डाला

मनहरण इसी मौके की तलाश में था. वह दुर्गेश के पास बैठा सोचता रहा कि आखिर सोचीसमझी योजना को मूर्तरूप कैसे दिया जाए. तभी दुर्गेश को हलका होश सा आने लगा तो वह उठ बैठा.

‘‘तुम तो शेर हो यार, तुम ढेर कैसे हो गए.’’ मनहरण ने व्यंग्य बुझा तीर चलाया.

‘‘नहींनहीं, मैं ठीक हूं. चलो.’’ दुर्गेश बोला.

‘‘कहां जाओगे, पहले मेरी बात तो सुन लो. तुम कमीने हो, नीच आदमी हो, तुम ने मेरी बीवी का हाथ पकड़ कर उसे छेड़ा. तुम से मुझे ऐसी उम्मीद नहीं थी.’’ मनहरण गुस्से में कहता चला गया, ‘‘मैं ने बहुत बरदाश्त किया, लेकिन तुम दोस्ती के लायक नहीं निकले.’’

दुर्गेश पर ज्यादा नशा सवार था. नशे में मनहरण की ओर देख कर बोला, ‘‘यार, तू इतनी छोटी सी बात पर गुस्सा हो रहा है. दोस्ती में यह सब तो चलता है भाई. एक रोटी को मिलबांट कर खाना चाहिए.’’

मनहरण को गुस्सा आ गया. वह बोला, ‘‘तुम नीच सोच के आदमी निकले, इसलिए आज मैं तुम्हें मौत की सजा दूंगा. और सुनो, बोल कर मार रहा हूं.’’

यह कह कर मनहरण दुर्गेश पर टूट पड़ा और उसे लातघूंसों से मारता रहा. शराब के नशे में दुर्गेश विरोध भी नहीं कर सका. मनहरण ने लस्तपस्त पड़े दुर्गेश को अंतत: गला दबा कर मार डाला और गालियां देते हुए अपने घर चला गया.

जब रात को दुर्गेश घर नहीं पहुंचा, तो उस के घर वालों को चिंता हुई. पिता कन्हैया यादव उसे ढूंढने निकले. सुबह जब उन की मुलाकात मनहरण से हुई तो मनहरण ने दुर्गेश से कई दिनों से मुलाकात न होने की बात कही.

8 सितंबर तक दुर्गेश का कहीं पता नहीं चला. परिवार के लोग यह सोचते रहे कि दुर्गेश कहीं बाहर तो नहीं चला गया, मगर 9 सितंबर को सुबह रामपुर गांव का तीरथराम जब अपने खेत पर पहुंचा तो वहां एक आदमी की लाश पड़ी देख उस के होश उड़ गए.

उस ने कोटवार (चौकीदार) समयलाल और सरपंच को घटना की जानकारी दी. कोटवार ने पिथौरा के थानाप्रभारी दीपेश जायसवाल को घटना की सूचना मिली तो वह घटनास्थल पर पहुंच गए.

वहां मौजूद लोगों ने मृतक की शिनाख्त दुर्गेश उर्फ पुस्तम के रूप में की. थानाप्रभारी ने जरूरी काररवाई कर के लाश पोस्टमार्टम के लिए भेज दी.

जांच अधिकारी दीपेश जायसवाल को जानकारी मिली कि दुर्गेश मनहरण का जिगरी दोस्त था. पुलिस ने मनहरण को यह सोच कर पूछताछ के लिए थाने बुलाया कि शायद उस से हत्यारे के बारे में कोई सुराग मिल जाए.

लेकिन मनहरण ने इस मामले से पल्ला झाड़ लिया. तभी पुलिस सूरज को हिरासत में ले कर थाने लौट आई.

दरअसल, पुलिस को जानकारी मिली थी कि मृतक दुर्गेश, मनहरण और सूरज ने कल शाम एक साथ बैठ कर शराब पी थी. सूरज को आया देख कर मनहरण समझ गया कि अब उस का झूठ नहीं चल सकता, इसलिए वह टूट गया.

मनहरण ने पुलिस के सामने स्वीकार कर लिया कि पत्नी आरती के साथ छेड़छाड़ की वजह से उस ने अपने दोस्त दुर्गेश की हत्या की थी. उस से पूछताछ के बाद पुलिस ने मनहरण उर्फ मोनो को दुर्गेश उर्फ पुस्तम की हत्या के आरोप में गिरफ्तार कर न्यायालय में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया. जबकि सूरज को बेकसूर पाए जाने पर थाने से घर भेज दिया.

दोस्ती एक ऐसा रिश्ता है, जो कभीकभी सगे भाई से भी बेहतर साबित होता है. लेकिन जब यह रिश्ता वासनामय हो कर दोस्त की पत्नी का दामन छूने लगे तो अंजाम भयानक ही होता है. अगर समाज में आप को रिश्ते बनाए रखने हैं तो रिश्तों की मर्यादा को समझिए और उन का सम्मान बनाए रखिए.

कहानी सौजन्य-मनोहर कहानियां

मोहब्बत की मकड़ी, क्राइम का मकड़जाल

बुधवार, 17 मई, 2017 का दिन ढल चुका था और रात उतर आई थी. 9 बजे के करीब राजस्थान के जिला कोटा के थाना नयापुरा के थानाप्रभारी देवेश भारद्वाज के चैंबर में जिस समय 2 लड़कियां दाखिल हुई थीं, उस समय वह बाहर निकलने की तैयारी कर रहे थे. उन लड़कियों के नाम पूजा और स्वाति थे. दोनों की ही उम्र 30-32 साल के बीच थी. वे थीं भी काफी आकर्षक. अपना परिचय देने के बाद पिछले पौन घंटे के बीच उन्होंने हिचकियां लेले कर रोते हुए जो कुछ बताया था, उस ने देवेश भारद्वाज को पशोपेश में डाल दिया था.

पूरी बात पूजा ने बताई थी. स्वाति तो बीचबीच में हौसला बढ़ाते हुए उस की बातों की तसदीक कर रही थी और जहां पूजा रुकती थी, वहां वह उसे याद दिला देती थी. उन की बातें सुन कर देवेश भारद्वाज उसे जिन निगाहों से ताक रहे थे, उस से पूजा को लग रहा था कि शायद वह उस की बातों पर विश्वास नहीं कर पा रहे हैं. शायद इसी वजह से एक बार तो लगा कि वह फूटफूट कर रो पड़ेगी. लेकिन किसी तरह खुद को संभालते हुए आखिर उस ने पूछ ही लिया, ‘‘सर, क्या आप को हमारी बातों पर विश्वास नहीं हो रहा है?’’

देवेश भारद्वाज ने पानी का गिलास पूजा की ओर बढ़ाते हुए कहा, ‘‘आप को ऐसा क्यों लग रहा है? आप ने अपने ऊपर हुए जुल्मों के बारे में जो बताया है, उसे एक कागज पर लिख कर रिपोर्ट दर्ज करा दीजिए.’’

युवती, जिस ने अपना नाम पूजा हाड़ा बताया था, उस के बताए अनुसार, वह कोटा के कुन्हाड़ी की रहने वाली थी. आर्थिक तंगी की वजह से वह नौकरी करना चाहती थी. नौकरी की तलाश में उस की मुलाकात लालजी नमकीन भंडार के मालिक अशोक अग्रवाल से हुई. उन्होंने उसी दिन यानी 17 मई की दोपहर लगभग 3 बजे नयापुरा स्थित एक रेस्तरां में नौकरी की खातिर बातचीत करने के लिए उसे बुलाया.

बातचीत के दौरान अशोक अग्रवाल ने सौफ्टड्रिंक औफर किया. व्यावहारिकता के नाते मना करना ठीक नहीं था, इसलिए पूजा ने भी मना नहीं किया. उसे पीते ही पूजा पर नशा सा चढ़ने लगा. उस में शायद कोई नशीली चीज मिलाई गई थी. वह जल्दी ही बेसुध हो गई.

होश आया तो पूजा को पता चला कि नौकरी के बहाने बुला कर अशोक अग्रवाल ने उस की अस्मत लूट ली थी. होश में आने पर पूजा ने यह बात सब को बताने की धमकी दी तो उन्होंने उसे बेइज्जत कर के भगा दिया.

पूजा के साथ स्वाति उस की घनिष्ठ सहेली थी. जब यह पूरा वाकया पूजा ने उसे बताया तो हिम्मत दिला कर वह उसे थाने ले आई. अशोक अग्रवाल पैसे वाले आदमी थे, वह कुछ भी करा सकते थे, इसलिए पूजा ने अपनी जान का खतरा जताया.

रिपोर्ट दर्ज करा कर पूजा और स्वाति ने देवेश भारद्वाज के पास आ कर कहा, ‘‘सर, अब हम जाएं?’’

देवेश भारद्वाज ने अपनी घड़ी देखी. उस समय रात के 11 बज रहे थे. उन्होंने कहा, ‘‘नहीं, तुम लोग इतनी रात को अकेली कैसे जा सकती हो? अकेली जाना तुम दोनों के लिए ठीक नहीं है. क्योंकि अभी तुम्हीं ने कहा है कि तुम्हारी जान को खतरा है.’’

इस के बाद ट्रेनी आरपीएस सीमा चौहान की ओर देखते हुए देवेश भारद्वाज ने कहा, ‘‘मैडम, आप अपनी जिप्सी से इन्हें इन के घर पहुंचा दीजिए.’’

‘‘नहीं सर, इस की कोई जरूरत नहीं है. मैं खुद चली जाऊंगी और पूजा को भी उस के घर पहुंचा दूंगी.’’ स्वाति ने कहा, ‘‘मैं ही इसे ले कर आई थी और मैं ही इसे इस के घर छोड़ भी आऊंगी. पूजा को घर पहुंचाना मेरी जिम्मेदारी है. आप इतनी रात को मैडम को क्यों परेशान करेंगे?’’

देवेश भारद्वाज स्वाति की इस बात पर हैरान रह गए. उन की समझ में यह नहीं आया कि पुलिस की गाड़ी से जाने में इन्हें परेशानी क्यों हो रही है? आखिर उन्हें शक हो गया. क्योंकि इधर लगभग रोज ही अखबारों में वह पढ़ रहे थे कि लड़कियों ने फलां व्यापारी को दुष्कर्म में फंसाने की धमकी दे कर मोटी रकम ऐंठी है, इसलिए उन्होंने दोनों लड़कियों को चुपचाप पुलिस जिप्सी में बैठने को कहा.

आखिर वही हुआ, जिस का अंदेशा देवेश भारद्वाज को था. करीब डेढ़ घंटे बाद उन्हें पता चला कि सीमा चौहान को स्वाति और पूजा करीब एक घंटे तक कुन्हाड़ी की गलियों में घुमाती रहीं, लेकिन उन का घर नहीं मिला. जब वे अपना घर नहीं दिखा सकीं तो वह उन्हें ले कर थाने आ गईं.

सीमा चौहान ने यह बात देवेश भारद्वाज को बताई तो उन्होंने कहा, ‘‘अब समझ में आया कि स्वाति और पूजा आप के साथ क्यों नहीं जाना चाहती थीं. स्वाति क्यों कह रही थी कि पूजा को मैं खुद उस के घर छोड़ आऊंगी.’’

इस के बाद पूजा और स्वाति शक के घेरे में आ गईं. देवेश भारद्वाज ने पूजा के बयान पर विचार किया तो उन्हें सारा माजरा समझ में आने लगा. भला दिनदहाड़े रेस्तरां में ग्राहकों की आवाजाही के बीच कोई किसी के साथ कैसे दुष्कर्म कर सकता है? दुष्कर्म की छोड़ो, छेड़छाड़ भी मुमकिन नहीं है. लड़की शोर मचा सकती थी. हां, लड़की चाहती तो कुछ भी हो सकता था. इस का मतलब शिकारी भी वही है और शिकार भी वही है.

इस के बाद पूजा और स्वाति से सख्ती से पूछताछ की गई तो दोनों टूट गईं और उन्होंने जो बताया, उस से एक ऐसे रैकेट का खुलासा हुआ, जो खूबसूरत औरतों का चारा डाल कर शहर के रसूखदार लोगों को दुष्कर्म में फंसाने की धमकी दे कर मनमानी रकम वसूल रहा था. इस पूछताछ में जो खुलासा हुआ, वह काफी चौंकाने वाला था.

पूजा का असली नाम पूजा बघेरवाल था. वह कोटा के अनंतपुरा की रहने वाली थी. पुलिस ने उस के घर पर छापा मार कर वहां से जो कागजात बरामद किए थे, उस के अनुसार उस की उम्र 20 साल थी. स्वाति इस रैकेट की सरगना थी. उन के गिरोह में नाजमीन भी शामिल थी. पुलिस ने उसे भी अनंतपुरा से गिरफ्तार कर लिया था.

पूछताछ में स्वाति ने स्वीकार किया कि नमकीन कारोबारी अशोक अग्रवाल तक पूजा को उसी ने पहुंचाया था. पूजा और स्वाति ने अपना अपराध स्वीकार कर लिया तो देवेश भारद्वाज ने देर रात नमकीन कारोबारी अशोक अग्रवाल को बुला कर पूजा और स्वाति के खिलाफ धारा 420 और 384 के तहत मुकदमा दर्ज करा कर उन्हें गिरफ्तार कर लिया.

इस तरह आढ़त और नमकीन के बड़े कारोबारी अशोक अग्रवाल इस गिरोह का आखिरी शिकार साबित हुए. जब उन से पूछा गया कि उन्हें कैसे फंसाया गया तो उन्होंने जो बताया, उस के अनुसार 7 मई, 2017 को जब वह बूंदी जा रहे थे तो उन के मोबाइल पर एक फोन आया. वह फोन उन्हें पूजा हाड़ा ने किया था.

पूजा ने उन से कहा कि उसे नौकरी की सख्त जरूरत है. वह बड़े आदमी होने के साथसाथ जानेमाने कारोबारी भी हैं. वह चाहें तो उसे कहीं न कहीं नौकरी मिल जाएगी. किसी अजनबी लड़की द्वारा इस तरह बेबाकी से नौकरी मांगना अशोक अग्रवाल के लिए हैरानी की बात थी. उन्होंने पूछा, ‘‘तुम मुझे कैसे जानती हो, मेरा मोबाइल नंबर तुम्हें कैसे मिला?’’

इस पर पूजा ने कहा, ‘‘तरक्की के इस दौर में आप जैसी जानीमानी हस्ती के मोबाइल नंबर हासिल कर लेना कोई मुश्किल काम नहीं है.’’

पूजा ने अपनी गरीबी और लाचारी का हवाला दिया तो अशोक अग्रवाल ने उसे कहीं नौकरी दिलाने की बात कह कर टालने की कोशिश की. लेकिन पूजा उन्हें लगातार फोन करती रही. यह सिलसिला लगातार जारी रहा. 17 मई की दोपहर को जब पूजा ने फोन कर के कहा कि वह उन से मिल कर अपनी परेशानी बताना चाहती है तो वह पिघल गए.

संयोग से अशोक अग्रवाल उस समय नयापुरा किसी काम से गए हुए थे. पूजा की परेशानी पर तरस खा कर वह उस के बताए रेस्टोरेंट में मिलने पहुंच गए. जिस समय वह रेस्टोरेंट में पहुंचे थे, उस समय वहां गिनेचुने लोग ही थे. कोने की एक मेज पर अकेली लड़की बैठी थी, जिसे देख कर वह समझ गए कि वही पूजा होगी. वह उन्हें देख कर मुसकराई तो उन्हें विश्वास भी हो गया. वह उस की ओर बढ़ गए.

कुरसी से उठ कर नमस्ते करते हुए उस ने कहा, ‘‘मेरा नाम पूजा है. आप ने मेरे लिए इस दोपहर में आने का कष्ट किया, इस के लिए आप को बहुतबहुत धन्यवाद.’’

अशोक अग्रवाल उस के सामने पड़ी कुरसी पर बैठते हुए बोले, ‘‘अब बताओ, मैं तुम्हारे लिए क्या कर सकता हूं?’’

‘‘मैं अपनी परेशानी इतनी दूरी से नहीं बता सकती.’’ पूजा ने अशोक अग्रवाल की आंखों में आंखें डाल कर मुसकराते हुए कहा, ‘‘आप यहां मेरे बगल में आ कर बैठें तो मैं आप को अपनी परेशानी बताऊं.’’

इतना कह कर पूजा दोनों हाथ टेबल पर रख कर झुकी तो उस के वक्ष झांकने लगे. अशोक अग्रवाल यह देख कर हड़बड़ा उठे, क्योंकि उन्होंने ऐसी स्थिति की कल्पना नहीं की थी. उन्होंने इधरउधर देखा, संयोग से उन की ओर कोई नहीं देख रहा था. लेकिन उस तनहाई में उस के इस रूप को देख कर वह पसीनेपसीने हो गए. उन का हलक सूख गया. जुबान से हलक को तर करते हुए उन्होंने कहा, ‘‘यह क्या है?’’

‘‘वही, जो एक औरत किसी मर्द को खुश करने के लिए करती है.’’ अधखुले वक्षों की ओर ताकते हुए पूजा ने मदभरी आवाज में कहा, ‘‘इधर आओ न?’’

परेशान हो कर अशोक अग्रवाल ने इधरउधर देखा. इस के बाद नाराज हो कर उठते हुए उन्होंने कहा, ‘‘मैं ने तुम्हें क्या समझा था और तुम क्या निकली?’’

पूजा ने आंखें तरेरते हुए कहा, ‘‘सही बात यही है कि मैं वही हूं, जो तुम ने नहीं समझा था. मैं तुम्हें इज्जत दे कर वह देना चाहती थी, जिस के लिए लोग तरसते हैं. लेकिन शायद तुम्हें हसीन तोहफा पसंद नहीं है. फिलहाल तो जो कुछ भी तुम्हारे पास है, चुपचाप निकाल कर रख दो, वरना अभी शोर मचा कर लोगों को इकट्ठा कर लूंगी कि तुम नौकरी देने के बहाने यहां बुला कर मेरी इज्जत पर हाथ डाल रहे हो?’’

अशोक अग्रवाल पसीनेपसीने हो गए. कांपती आवाज में उन्होंने कहा, ‘‘तुम ने यह ठीक नहीं किया.’’

इतना कह कर उन्होंने अपनी जेब से सारी नकदी निकाल कर मेज पर रख दी. उस समय उन के पास करीब 8 हजार रुपए थे. पूजा ने फौरन सारे पैसे समेटे और तेजी से यह कहती हुई बाहर चली गई कि इतनी रकम से मेरी इज्जत की भरपाई नहीं होनी सेठ.

अशोक अग्रवाल हक्काबक्का उसे जाते देखते रहे. हैरानपरेशान कांपते हुए वह अपनी दुकान पर पहुंचे. वह अभी सांस भी नहीं ले पाए थे कि एक नई मुसीबत आ खड़ी हुई. अचानक एक मोटरसाइकिल उन की दुकान पर आ कर रुकी. उस से मवाली सरीखे 3 लोग आए थे.

अशोक अग्रवाल उन से कुछ पूछ पाते, उस से पहले ही उन में से एक युवक उन के पास आ कर उन्हें डांटते हुए बोला, ‘‘इतना बड़ा कारोबारी है, फिर भी लड़कियां फंसाता घूमता है? तू ने पूजा के साथ क्या किया है, उस रेस्टोरेंट में? 50 लाख का इंतजाम कर ले, वरना दुष्कर्म के मामले में ऐसा फंसेगा कि सीधे जेल जाएगा. बदनामी ऐसी होगी कि किसी को मुंह दिखाने लायक नहीं रहेगा.’’

डरेसहमे अशोक अग्रवाल के मुंह से बोल नहीं निकले. वह यह भी नहीं पूछ पाए कि वे आखिर हैं कौन और दिनदहाड़े इतना दुस्साहस करने की उन की हिम्मत कैसे हुई? उन्हें जैसे सांप सूंघ गया था. यह नौकरों की मौजूदगी में हुआ था, इसलिए बेइज्जती और धमकी से परेशान हो कर वह सिर थाम कर बैठ गए.

अशोक अग्रवाल के बयान के आधार पर उन्हें दुष्कर्म में फंसाने की धमकी दे कर 50 लाख रुपए की मांग करने वाले तीनों लोगों को भी थाना नयापुरा पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया था. उन तीनों के नाम थे महेंद्र सिंह तंवर उर्फ चाचा, फिरोज खान और शानू उर्फ सलीम. महेंद्र सिंह रंगपुर रोड स्थित रेलवे कालोनी का रहने वाला था तो फिरोज खान साजीदेहड़ा का. शानू उर्फ सलीम कोटडी का रहने वाला था.

तीनों ने स्वाति के साथ मिल कर पूरी योजना तैयार की थी. उसी योजना के तहत तीनों ने अशोक अग्रवाल की दुकान पर जा कर रुपए मांगे थे. पूजा और स्वाति के साथ गिरफ्तार की गई नाजमीन भी रसूखदार लोगों को फंसाने में उन्हीं की तरह माहिर थी. उस की 3 बहनें हैं. पिता की मौत हो चुकी है. उस की मां भी अपराधी प्रवृत्ति की है. मादक पदार्थों की तस्करी के आरोप में वह 10 साल की सजा काट चुकी है.

शहर के रसूखदारों को हनीट्रैप में फंसाने वाला रैकेट सामने आया तो पुलिस ने विस्तार से पूछताछ की. इस पूछताछ में उन्होंने एक और खुलासा किया. स्वाति उर्फ श्वेता और पूजा बघेरवाल ने मिल कर बैंकिंग सेक्टर में एजेंसी चलाने वाले प्रदीप जैन के खिलाफ थाना गुमानपुरा में छेड़छाड़ और दुष्कर्म का मुकदमा दर्ज कराया था. अक्तूबर, 2016 में इन लोगों ने प्रदीप जैन से 8 लाख रुपए मांगे थे. हालांकि बाद में दोनों अपने इस बयान से मुकर गई थीं.

इस के बाद प्रदीप जैन से पूछताछ की गई तो उन्होंने बताया कि उन्हें औफिस में काम करने वाले कर्मचारियों की जरूरत थी, जिस के लिए उन्होंने अखबार में विज्ञापन दिया था. उसी विज्ञापन के आधार पर पूजा बघेरवाल ने खुद को निशा जैन बताते हुए उन से संपर्क किया. उस ने करीब 3 महीने तक उन के यहां नौकरी की.

वह काम करने के बजाय दिन भर फोन पर ही बातें करती रहती थी, इसलिए उन्होंने उसे नौकरी से निकाल दिया. इस के बाद स्वाति उर्फ श्वेता उन के यहां नौकरी करने आई. लेकिन 3 दिन बाद ही वह नौकरी छोड़ कर चली गई. इस के बाद उस ने उन के खिलाफ छेड़खानी की रिपोर्ट दर्ज करा दी, लेकिन प्रदीप जैन ने इसे गंभीरता से नहीं लिया. उन्हें परेशानी तब हुई, जब अक्तूबर, 2016 में पूजा ने थाना गुमानपुरा में उन के खिलाफ दुष्कर्म का मुकदमा दर्ज कराया. उस का कहना था कि 8 महीने पहले जब वह उन के यहां नौकरी करती थी, तब उन्होंने उस के साथ दुष्कर्म किया था.

जब इस बात की जानकारी प्रदीप को हुई तो वह सन्न रह गए. उन का परिवार तनाव में आ गया. लेकिन वह अपनी बात पर अडिग थे, क्योंकि आरोप सरासर झूठा था. पर मित्रों और रिश्तेदारों के कहने पर बेगुनाह होते हुए भी उन्हें भूमिगत होना पड़ा. बाद में डील हुई तो पूजा ने अदालत में अपने बयान बदल दिए. समझौता होने के बाद उस से फिर 50 हजार रुपए मांगे गए. लेकिन उस ने देने से साफ मना कर दिया. उस ने कहा कि अब उस का खेल खत्म हो चुका है.

पुलिस के अनुसार, शहर में यह गिरोह अभी ताजाताजा ही सक्रिय हुआ था. किसी रसूखदार को जाल में फंसाने से पहले ये लोग उस के रिश्तों और कारोबार की पूरी जानकारी जुटाते थे. उस के बाद शिकार की पंसद की लड़की का जुगाड़ किया जाता था, जो उसे फांस सके. शिकार से जो रकम मिलती थी, वह सभी में बराबरबराबर बंटती थी. गिरोह की सरगना स्वाति हनीट्रैप के लिए ‘नई’ और ‘काम की’ लड़कियां तलाशती रहती थी.

स्वाति पति को छोड़ कर साजीदेहड़ा में फिरोज के साथ रहती थी. लोगों की नजरों में वह मेहंदी लगाने और ब्यूटीशियन का काम करती थी. वह इन दिनों एक कोचिंग संचालक को फंसाने की फिराक में थी. उस के लिए वह हाईप्रोफेशनल लड़की ढूंढ रही थी.

लेकिन अशोक अग्रवाल को फंसाने के चक्कर में वह खुद ही फंस गई. अगर ऐसा न होता तो शायद वह उस कोचिंग संचालक को बरबाद कर के ही मानती. पुलिस ने पूछताछ के बाद स्वाति, पूजा, नाजमीन, महेंद्र सिंह तंवर उर्फ चाचा, फिरोज खान और शानू उर्फ सलीम को अदालत में पेश किया, जहां से सभी को न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया.

महेंद्र सिंह तंवर, फिरोज खान और शानू उर्फ सलीम को तब गिरफ्तार किया गया, जब स्वाति, पूजा और नाजमीन की गिरफ्तारी की खबर पा कर तीनों शहर छोड़ कर भागने की तैयारी कर रहे थे. लड़कियों के पास से एक डायरी मिली थी, जिस में इन तीनों के नाम और मोबाइल नंबर थे.

स्वाति से बरामद मोबाइल का बिल फिरोज खान के नाम था तो उस में पड़ा सिम महेंद्र सिंह के पिता मोहनलाल के नाम था. शिकार को फंसाने के लिए पूजा और नाजमीन इसी मोबाइल का इस्तेमाल करती थीं. यह मोबाइल स्वाति के पास रहता था. पुलिस अब उस मोबाइल नंबर की काल डिटेल्स निकलवा कर यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि इस नंबर से किसकिस को फोन किए गए थे.

महेंद्र सिंह तंवर उर्फ चाचा पहले औटो चलाता था. औटो चलाने के दौरान उस की मुलाकात स्वाति से हुई तो वह इस रैकेट से जुड़ गया. जबकि सलीम उर्फ शानू मकानों की मरम्मत का काम करता था. स्वाति 2 साल पहले पति से अलग हुई थी. इस के बाद साजीदेहड़ा में किराए का मकान ले कर वह फिरोज खान के साथ लिवइन रिलेशनशिप में रहने लगी थी. उस का बच्चे की सुपुर्दगी को ले कर पति से कोर्ट में केस चल रहा है.

पति से अलग होने के बाद जब वह ब्यूटीपार्लर चला रही थी, तभी फिरोज खान से उस का परिचय हुआ था. उस के बाद वह उस के साथ रहने लगी. स्वाति से बरामद डायरी में अंगरेजी के कुछ ऐसे शब्द लिखे हैं, जो आमतौर पर हाईप्रोफाइल सर्किल में व्यावहारिक तौर पर बोलबाल में इस्तेमाल किए जाते हैं. पुलिस का मानना है कि संभवत: नई लड़कियों को शिकार फंसाने के लिए इन शब्दों का ज्ञान कराया जाता था, ताकि उन की कुलीनता का असर पड़े.

जंगल में मिली लाश की गुत्थी और एक संगीन अपराध

अब माहौल दिनों दिन ऐसा त्रासद होता जा रहा है कि हत्या जैसे संगीन अपराध कम उम्र के किशोर युवा नशे और सेक्स की उत्तेजना में करने लगे हैं. परिणाम स्वरूप उन्हें मिलती है पुलिस की लाठियां और जेल की कोठरी.

छत्तीसगढ़ की न्याय धानी बिलासपुर में, महमंद के जंगल में मिली लाश की गुत्थी एक सच्चे संगीन अपराध  का सार संक्षेप कहा जा सकता है. दरअसल, तोरवा पुलिस ने यह बड़ी मशक्कत के बाद आरोपियों तक पहुंच गई है. मामले में जो तथ्य निकल कर सामने आए है वह चौंकाने वाले है और समाज को सोचने पर विवश करते है.

पुलिस को शुरू से ही शक था कि आरोपी ने मृतिका के संग शारीरिक संबंध बनाने का प्रयास किया होगा और उसका विरोध करने पर ही उसने एलुमिनियम के तार से उसका गला घोट कर उसकी हत्या कर दी है. इस बहुचर्चित हत्या मामले में तोरवा पुलिस ने लाल खदान निवासी मुख्य आरोपी सूरज कश्यप उर्फ राजा और उसके साथी महेंद्र पासी को गिरफ्तार किया है.

पुलिस के अनुसार मामला का पटाक्षेप इस तरह हो गया है मगर छत्तीसगढ़ के साहू समाज ने इसे लेकर एक जेहाद छेड़ दिया है और खुलकर सामने आकर सांसद बिलासपुर अरुण साहू के नेतृत्व में शासन प्रशासन से मांग की है कि मामला अभी पूरी तरीके से सुलझा नहीं है कुछ और आरोपी पुलिस की पकड़ से बाहर हैं. संपूर्ण घटनाक्रम आपको बताएं उससे पहले देखिए सिलसिलेवार घटनाक्रम.

स्वावलंबी और चंचल  थी किशोरी

जिला बिलासपुर के महमंद गांव में राजू साहू का  परिवार रहता है. परिवार की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं होने के कारण सोनू (उम्र17) (काल्पनिक नाम) नौकरी कर घर खर्चे में सहयोग करती थी. जानकारी के अनुसार सूरज (उम्र 21) उस पर लंबे समय से बुरी नियत रखता था सभी जानते थे कि वह एक बिगड़ा हुआ लड़का है और नित्य नशा करता है और ऐसी उसकी दोस्तों की मंडली है.वह और कई बार सोनू को प्रपोज भी कर चुका था. लेकिन सोनू उसे मना कर देती, लेकिन फिर भी सूरज कश्यप उसका पीछा नहीं छोड़ रहा था. घटना दिनांक को सोनू जब शौच के लिए घर से  सुबह करीब साढ़े 9 बजे निकली मगर दोपहर तक नहीं लौटी तो परिजनों को चिंता हुई. उन्होंने सोनू की तलाश शुरू की तो जंगल झाड़ी में उसकी लाश मिली.किसी  हत्यारे ने तार से गला घोंटकर उसकी हत्या कर दी थी और फिर उसके मुंह में बेशर्म की पत्तियां भी ठूंसी मिली  थी.

मामला सनसनीखेज बनता चला गया. इधर पुलिस को जानकारी मिली की घटना के दिन सोनू अपने काम पर नहीं गई थी क्योंकि उसकी तबीयत खराब थी और इस वजह से वह काफी कमजोर भी थी. सुबह जब सोनू शौच के लिए निकली तो उसे जाते  महेंद्र पासी ने देख लिया और इसकी जानकारी सूरज को दे दी. सूरज कश्यप और महेंद्र किशोरी का पीछा करते हुए जंगल पहुंच गए. जहां पहले तो सूरज कश्यप ने सोनू से इधर उधर की बातें की और फिर वे उसे सुनसान में लेकर गए, जहां बेशर्म के झाड़ियों में उसे पटक कर उसके साथ दुष्कर्म का प्रयास किया गया. बीमारी की वजह से सोनू काफी कमजोर हो गई थी, इसका फायदा आरोपियों ने उठाया और उसकी इच्छा विरुद्ध उसके साथ संबंध बनाने का प्रयास किया. जब सोनू शोर मचाने लगी तो उसका मुंह बंद करने के लिए उसके मुंह में बेशर्म के पत्ते ठूस दिया. सोनू ने  उन्हें धमकी दी थी कि वह यह बात सबको बता देगी. इसलिए डर कर सूरज कश्यप और महेंद्र ने पास ही पड़े एलुमिनियम के तार से उसका गला घोट मार दिया.

सांसद अरुण साहू की हुंकार

साहू समाज की एक नाबालिक लड़की से  अनाचार हत्या के इस मामले ने लगातार तूल पकड़ लिया और नित्य नए खुलासे हो रहे हैं. बिलासपुर के सांसद अरुण साहू ने इस मामले को गंभीर बताते हुए आरोपियों को कड़ी सजा देने की मांग सरकार से कर आर्थिक मदद की मांग की है. साहू संघ ने कहा कि नाबालिग की निर्मम हत्या हुई है.  संघ के अध्यक्ष का कहना है कि इस मामले पर जो शासन-प्रशासन से मदद मिलनी चाहिए वह नहीं मिल पाई है. उनके अनुसार सोनू हत्या काण्ड में 4 लोग शामिल हो सकते हैं, लेकिन दो लोग पर ही कार्रवाई हुई है. दो और लोग हैं जिनके पास से नाबालिग का पायल भी मिला है.

दूसरी तरफ हमारे संवाददाता से बात करते हुए सांसद अरुण साहू ने प्रदेश में नशे पर रोक लगाने मांग की है. उन्होंने कहा कि महमंद में जो घटना हुई है उसमें ठीक प्रकार की जांच कर दोषियों पर कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए, ताकि परिवार को न्याय मिले. उन्होंने कहा कि महमंद का पूरा क्षेत्र अपराधियों का केंद्र बना हुआ है.

यही कारण है कि महमंद गांव के ग्रामीणों का  गुस्सा फूट पड़ा और कलेक्ट्रेट का  घेराव किया गया.आरोपी सूरज कश्यप आरोपी हर पल उस पर नजर बनाए हुए था.

10 महीने के बेटे ने खोला मां की हत्या का राज, सब रह गए हैरान

रात के 9 बज रहे थे. गुजरात के गांधीनगर के पीथापुर में स्वामिनारायण गौशाला के बाहर एक बच्चे के तेज रोने की आवाज सुन कर गौशाला के कर्मचारी बाहर आए. देखा गौशाला के गेट के बाहर सड़क पर एक मासूम रो रहा है. बच्चे के आसपास कोई नहीं था.

मासूम पैरों से अभी चल भी नहीं पाता था. एक कर्मचारी ने बच्चे को गोद में उठाने के बाद उसे चुप कराने की कोशिश की और उस के मांबाप की तलाश आसपास की गई. लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ. रात के अंधेरे में वहां कोई नहीं दिखाई दिया.

गौशाला के कर्मचारी बच्चे को ले कर अंदर आ गए. रात में ही गांधीनगर पुलिस को इस की सूचना दी गई. इस बीच जानकारी होने पर आसपास के लोग एकत्र हो गए. जिस ने भी यह बात सुनी, वही दांतों तले अंगुली दबाने लगा. सभी बच्चे के पत्थर दिल मांबाप को कोस रहे थे. पुलिस ने भी उस समय अपने स्तर से छानबीन की लेकिन कुछ पता नहीं चला.

बच्चा 10-11 महीने का था. वह अभी अपने पैरों से चल भी नहीं सकता था. इस समय इस मासूम को मां के आंचल में होना चाहिए था, लेकिन वह रात के अंध्ेरे में सड़क पर लावारिस हालत में था.

पुलिस ने उस मासूम को क्षेत्र की पार्षद दीप्ति पटेल के सुपुर्द कर दिया और सुबह बच्चे के बारे में जानकारी जुटाने की बात कही. दीप्ति पटेल ने मासूम को अपने पास रखा और रात में उसे खिलायापिलाया और पूरा ध्यान रखा.

यह बात 8 अक्तूबर, 2021 की है. पुलिस सुबह बच्चे को मैडिकल चैकअप के लिए सिविल अस्पताल ले गई. जहां जांच के बाद बच्चे को स्वस्थ बताया गया.

सोशल मीडिया पर जिस किसी ने इस खबर को पढ़ा व देखा, वह सन्न रह गया. जितने मुंह उतनी बातें. कोई इतना बेदर्द कैसे हो सकता है, जो अपने कलेजे के टुकड़े को रात के अंधेरे में इस तरह गौशाला के बाहर सड़क पर लावारिस छोड़ गया. उस मां के साथ ऐसी क्या मजबूरी थी, जो उसे कलेजे पर पत्थर रख कर यह काम करना पड़ा.

दूसरे दिन 9 अक्तूबर को अखबारों में जब मासूम की फोटो सहित समाचार छपा तो हर किसी का कलेजा फट रहा था. बात गुजरात के गृहमंत्री हर्ष सांगवी के कानों तक पहुंची. गृहमंत्री भी अस्पताल पहुंचे और बच्चे के बारे में जानकारी की. बच्चे को गोदी में ले कर दुलारा. उन्होंने पुलिस अधिकारियों को बच्चे के मांबाप का शीघ्र पता लगाने के निर्देश दिए.

50 पुलिसकर्मी जुटे जांच में गांधीनगर के एसपी मयूर चावड़ा ने बच्चे के परिजनों का पता लगाने के लिए 50 पुलिसकर्मियों की 7 टीमें लगा दीं.

पुलिस ने गौशाला के बाहर लगे एक सीसीटीवी कैमरे की फुटेज को चैक किया. फुटेज में रात 9 बज कर 20 मिनट पर एक व्यक्ति बच्चे को गोद में ले कर आता हुआ दिखाई दे रहा था. वह बच्चे को गौशाला के गेट के बाहर सड़क पर छोड़ कर तेजी से भागता हुआ अंधेरे में गायब हो गया. इस पर पुलिस ने गौशाला आनेजाने वाले रास्तों पर लगे सीसीटीवी कैमरों को चैक करने का निर्णय लिया.

पुलिस ने लगभग 150 सीसीटीवी कैमरों को चैक किया. आखिर पुलिस की मेहनत रंग लाई. एक फुटेज में एक सैंट्रो कार दिखाई दे रही थी. कार में एक व्यक्ति इसी बच्चे के साथ बैठा हुआ गौशाला की ओर जाता दिखाई दे रहा था.

यहीं से पुलिस को कार का नंबर भी मिल गया. तब पुलिस ने इस कार के रजिस्ट्रेशन नंबर से कार के मालिक का पता किया.

पता चला कि यह सैंट्रो कार सचिन दीक्षित के नाम रजिस्टर्ड है. 30 साल के सचिन का पता अहमदाबाद का लिखा हुआ था. पुलिस पते पर पहुंची तो पता चला कि सचिन दीक्षित अहमदाबाद में नहीं बल्कि अब गांधीनगर में रहता है.

पुलिस जब गांधीनगर स्थित सचिन के घर पहुंची तो वहां ताला लगा हुआ था. तब तक पुलिस को सचिन का मोबाइल नंबर मिल गया था. पुलिस ने सचिन के मोबाइल नंबर को सर्विलांस पर लगा दिया.

इस से पता चला कि सचिन राजस्थान के कोटा के आसपास है. सचिन की लोकेशन मिलते ही पुलिस ने सचिन को फोन कर बच्चा मिलने के बारे में जानकारी दी. इस पर सचिन ने पुलिस को बताया कि वह बच्चा उसी का है और उस का नाम शिवांश है.

रविवार 10 अक्तूबर, 2021 की सुबह राजस्थान पुलिस की मदद से कोटा में ही सचिन को रोक कर हिरासत में ले लिया गया. जिस समय सचिन को हिरासत में लिया गया, उस समय वह अपनी पत्नी अनुराधा और 3 साल के बेटे तथा अपने मातापिता के साथ था. वह फुटेज में दिखाई दे रही उसी सैंट्रो कार से दशहरा मनाने उत्तर प्रदेश जा रहा था.

गुजरात पुलिस व क्राइम ब्रांच ने 11 अक्तूबर को राजस्थान पहुंचने के बाद जब सचिन से बच्चे को गौशाला के बाहर लावारिस छोड़ने की वजह पूछी. इस पर सचिन ने चुप्पी साथ ली.

इस के बाद पत्नी अनुराधा से पुलिस ने पूछा, ‘‘आप ने अपने बेटे को रात में सड़क पर क्यों छोड़ा?’’

यह सुन कर अनुराधा हैरान रह गई. उस ने पुलिस को बताया कि उस का 3 साल का एक ही बेटा है, जो इस समय उस के साथ है.

पुलिस ने अनुराधा को शिवांश की फोटो दिखाई तो उस ने पहचानने से इंकार कर दिया. उस ने बताया कि वह इस बच्चे को पहली बार देख रही है वह उसे नहीं जानती.

सचिन कह रहा था कि 10 महीने का शिवांश उस का बेटा है और उसी ने उसे गौशाला के बाहर छोड़ा था. जबकि उस की पत्नी इस बात से इंकार कर रही थी. पुलिस उलझन में पड़ गई. पुलिस ने एक बार फिर सचिन से पूछताछ करने का फैसला किया.

सचिन से लंबी पूछताछ के बाद गांधीनगर पुलिस ने बड़ोदरा पुलिस को फोन किया और एक घर का पता बताया. इस मकान पर पहुंच कर उस की किचन में रखे बैग की तलाशी लेने को कहा.

किचन में मिली लाश

गांधीनगर पुलिस के कहने पर बड़ोदरा पुलिस बताए गए मकान जो बड़ोदरा में जी-102 दर्शनम ओएसिस सोसायटी में स्थित था, पर पहुंची.

सीढि़यां चढ़ कर पुलिस जब उस फ्लैट पर पहुंची तो ताला लगा था. पुलिस ताला तोड़ कर किचन में दाखिल हुई. वहां सचमुच एक बैग रखा हुआ मिला.

पुलिस ने जब बैग को खोला तो उस में एक महिला की लाश मिली. लाश देखते ही पुलिस हैरान रह गई. बैग में बंद होने के कारण लाश से दुर्गंध आ रही थी. बड़ोदरा पुलिस ने तत्काल गांधीनगर पुलिस को बताया कि बैग में 27-28 साल की एक महिला की लाश है.

पुलिस के सामने प्रश्न था कि बैग में बंद महिला कौन थी? उस की हत्या कब और क्यों की गई थी? लाश की भनक सचिन को कैसे लगी?

अब पुलिस ने इस हत्या के बारे में सचिन से कड़ाई से पूछताछ की. आखिर पुलिस ने सचिन से सच उगलवा ही लिया. सचिन ने अपना जुर्म कुबूल कर लिया. जो कहानी सामने आई, उसे सुन कर पुलिस भी हैरान रह गई. इस घटना का 24 घंटे में ही पुलिस ने कड़ी मेहनत कर परदाफाश कर दिया था.

गांधीनगर के एसपी मयूर चावड़ा ने प्रैस कौन्फ्रैंस में बताया कि मृतका सचिन की प्रेमिका थी. दोनों लिवइन रिलेशन में रह रहे थे. उन का एक बच्चा शिवांश था.

प्रेमिका शादी करने के लिए सचिन पर जोर दे रही थी. उस से व बच्चे से छुटकारा पाने के लिए सचिन ने षडयंत्र रच इस कृत्य को अंजाम दिया था.

लेकिन तीसरी आंख से वह अपने गुनाह को छिपा नहीं सका. आखिर पुलिस की 7 टीमों ने दिनरात मेहनत कर बेरहम गुनहगार को गिरफ्तार कर लिया था.

पत्नी अनुराधा को अपने पति सचिन के गुमनाम रिश्ते के बारे में कुछ पता नहीं था. उसे नहीं मालूम था कि पति की प्रेमिका व उस से बेटा भी है. यह बात तो उसे घटनाक्रम के सामने आने के बाद पता चली.

सचिन के राज से पत्नी थी अनभिज्ञ

सचिन 3 साल से इस राज को अपनी पत्नी से छिपाए हुए था. उस ने अपनी पत्नी को भी इस बात की भनक तक नहीं लगने दी कि उस की कोई प्रेमिका और उस से पैदा कोई बच्चा भी है.प्रेमिका की हत्या करने और जिगर के टुकड़े को रात के अंधेरे में सड़क पर छोड़ने की जो कहानी सामने आई, वह चौंकाने वाली थी—

4 साल पहले सचिन दीक्षित के मातापिता ने उस की शादी अनुराधा के साथ कर दी थी. इस समय अनुराधा के 3 साल का एक बेटा है. सचिन गांधीनगर की एक कंपनी में असिस्टेंट मैनेजर के पद पर कार्यरत था.

वर्ष 2018 में अहमदाबाद के एक शोरूम में उस की मुलाकात हिना पेथाणी उर्फ मेहंदी नाम की युवती से हुई. हिना मूलरूप से जूनागढ़ जिले के केशोद की रहने वाली थी. उस की मां की मौत हो चुकी थी. मां की मौत के बाद पिता महबूब पेथाणी ने दूसरी शादी कर ली. इस के बाद हिना अपने मौसामौसी के साथ अहमदाबाद में आ कर उन के साथ रहने लगी थी.

हिना उसी शोरूम में काम करती थी. धीरेधीरे दोनों के बीच मुलाकातें बढ़ने लगीं. इन मुलाकातों के चलते दोनों एकदूसरे को दिल दे बैठे. दोनों दिलोजान से एकदूसरे को प्यार करने लगे. इस के बाद साल 2019 में दोनों लिवइन रिलेशन में रहने लगे.

लिवइन रिलेशन के दौरान साल 2020 में शिवांश पैदा हुआ, जो घटना के समय लगभग 10 महीने का था. घटना से 2 महीने पहले सचिन का बड़ोदरा ट्रांसफर हो गया. तब सचिन ने दर्शनम ओएसिस सोसायटी में एक फ्लैट किराए पर ले लिया.

वह इसी फ्लैट में हिना और बेटे शिवांश के साथ रहने लगा. सचिन सप्ताह में 5 दिन बच्चे व प्रेमिका हिना के साथ तथा 2 दिन शनिवार और रविवार को गांधीनगर में मातापिता व पत्नी अनुराधा के साथ रहता था.

प्रेमिका हिना डाल रही थी शादी का दबाव

पिछले 3 साल से सब कुछ ठीक चल रहा था. पिछले कुछ दिनों से हिना शादी करने के लिए सचिन पर दबाव डाल रही थी. सचिन कोई न कोई बहाना बना कर टालमटोल कर देता था.

8 अक्तूबर की दोपहर सचिन ने हिना को बताया कि वह एक सप्ताह के लिए अपने घर गांधीनगर मातापिता के पास जा रहा है. वहां से सभी लोग दशहरा मनाने के लिए उत्तर प्रदेश जाएंगे.

यह बात हिना को नागवार गुजरी. उस ने सचिन को दशहरा मनाने के लिए जाने से मना करते हुए अपने साथ ही रहने की बात कही. उस ने सचिन से कहा, ‘‘हम लोग लिवइन रिलेशन में कब तक रहेंगे? अब तो हमारे एक बेटा भी हो चुका है. तुम जल्द ही पत्नी अनुराधा को तलाक दे दो, ताकि हम जल्द शादी कर सकें.’’

इस बात को ले कर दोनों के बीच सुबहसुबह झगड़ा हुआ. शाम के समय भी दोनों में फिर से झगड़ा हुआ. हिना शादी के लिए सचिन पर दबाव डाल रही थी. वहीं सचिन उस से शादी करने से आनाकानी करने के साथ ही परिवार के साथ दशहरा मनाने के लिए जाने की बात कह रहा था.

बात बढ़ गई. दोनों के बीच कहासुनी, फिर हाथापाई हुई. गुस्से में सचिन ने हिना का गला दबा कर उस की हत्या कर दी. इस के बाद घर में ही रखे एक सूटकेस में उस की लाश ठूंस कर भर दी और सूटकेस को किचन में रख दिया.

उस समय रात घिर आई थी. सचिन ने घर को ताला लगाया और बेटे शिवांश को ले कर अपनी सैंट्रो कार से निकल गया. सचिन सीधे गांधीनगर पहुंचा. प्रेमिका की हत्या कर परिवार के साथ सामान्य हो गया सचिन.

वह गांधीनगर के पीथापुर की स्वामिनारायण गौशाला को जानता था, क्योंकि वह गांधीनगर में रहने के दौरान इसी गौशाला से दूध, घी लेने जाता था. सचिन रात में उसी गौशाला के पास पहुंचा. उस समय रात होने से सड़क सुनसान थी.

गौशाला से कुछ दूरी पर उस ने अपनी कार खड़ी कर दी. फिर मासूम बेटे शिवांश को गोद में ले कर वह दबेपांव गौशाला के गेट पर पहुंचा. उस समय रात के 9 बज कर 20 मिनट का समय था. उस ने शिवांश को गौशाला के गेट के सामने सड़क पर बैठाया और तेजी से उलटे पांव अपनी कार में बैठ कर रफूचक्कर हो गया.

सचिन अपनी प्रेमिका की हत्या करने और अपने बच्चे को लावारिस छोड़ने के बाद अपने घर पहुंचा और पत्नी, बच्चे व मातापिता के साथ सैंट्रो कार से दशहरा मनाने के लिए उत्तर प्रदेश के लिए निकल पड़ा.

सचिन अपने परिवार में ऐसा व्यवहार कर रहा था कि कुछ हुआ ही नहीं है. उस ने अपनी पत्नी व मातापिता पर भी कुछ जाहिर नहीं होने दिया.

जानकारी होने पर गांधीनगर पुलिस ने कोटा में सचिन को गिरफ्तार कर लिया. संतान प्राप्ति के लिए लोग देवीदेवताओं की पूजा करते हैं. लेकिन एक पत्थरदिल पिता की जो शर्मनाक करतूत सामने आई, उस से मजबूत दिल वाले भी कांप गए.

उस ने पहले उस की मां का कत्ल किया और फिर अपने ही मासूम बेटे से छुटकारा पाने के लिए रात के अंधेरे में सुनसान सड़क पर छोड़ दिया. आवारा कुत्ते या अन्य कोई हिंसक पशु उसे कोई नुकसान पहुंचाता, उस से पहले ही वह सुरक्षित हाथों में पहुंच गया.

जांच के दौरान सचिन के पड़ोसियों ने बताया कि सचिन के घर का दरवाजा केवल कचरा वाले के लिए खुलता था. सभी उन्हें पतिपत्नी समझते थे. शिवांश का जन्म 10 दिसंबर, 2020 को अहमदाबाद के बोपल स्थित एक अस्पताल में हुआ था.

मृतका के पिता महबूब पेथानी सोमवार 11 अक्तूबर को एसएसजी हौस्पिटल में बेटी का शव लेने पहुंचे.

सचिन के खिलाफ बड़ोदरा के बापोद थाने में हत्या की रिपोर्ट गांधीनगर के इंसपेक्टर की शिकायत पर दर्ज की गई. जिस की जांच बापोद के थानाप्रभारी यू.जे. जोशी कर रहे हैं. जबकि सचिन पर पहले ही अपहरण भादंवि की धारा 363 और बच्चे को छोड़ने की धारा 317 के तहत मामला दर्ज है.

गांधीनगर पुलिस ने आरोपी सचिन को 11 अक्तूबर को न्यायालय के समक्ष पेश किया. जहां से उसे 14 अक्तूबर तक पुलिस रिमांड पर भेज दिया गया.

गांधीनगर के पुलिस उपाधीक्षक एम.के. राणा के अनुसार सोमवार को अदालत में पेश किए जाने से पहले फोरैंसिक साइंस लैबोरेटरी के विशेषज्ञों ने आरोपी सचिन के फिंगरप्रिंट व नाखूनों के नमूने के साथ ही डीएनए का नमूना लिए, ताकि पता लगाया जा सके कि वह बच्चे का पिता है या नहीं. इस के अलावा अन्य फोरैंसिक एविडेंस जुटाने का कार्य किया गया. शिवांश को फिलहाल शिशुगृह में रखा गया है.

10 दिसंबर, 2021 को शिशुगृह में शिवांश का पहला जन्मदिन मनाया गया. इस अवसर पर बच्चे से केक भी कटवाया गया.

सचिन ने अपना हंसताखेलता परिवार उजाड़ने के साथ ही एक मासूम की जिंदगी दांव पर लगा दी. बच्चे से मां की गोद उस का आंचल और बचपन छीन लिया. उस मासूम को इस की कीमत ताउम्र चुकानी पड़ेगी.

इंसानियत को शर्मसार करने और 2 नावों में सवार होने पर सचिन को आखिर डूबना तो था ही. अब अपने कृत्यों के लिए उसे सलाखों के पीछे जिंदगी बितानी होगी.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

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