शाम को समीर ने अपने विवाह के उपलक्ष्य में एक छोटी सी पार्टी का आयोजन किया था. सारा इंतजाम होटल में रखा गया. कुछ वरिष्ठ, कुछ कनिष्ठ, कुछ सहकर्ता अफसर आमंत्रित थे. सभी आमंत्रित मेहमानों ने शर्मिला के रूप, लावण्य और शिक्षा की खूब प्रशंसा की, तो समीर ने भी पत्नी के गुणों की प्रशंसा की. साथ ही, यह भी कहा, ‘उच्च शिक्षित होने के बावजूद वह एक अच्छी गृहस्थन भी है.’ यह सुन शर्मिला अवाक रह गई.
आखिरकार, अपशब्दों पर उतर आई और समीर पर झूठ बोलने का आरोप लगाया. ‘ झूठा’ संबोधन से ही समीर अवाक रह गया. ठंडी सांस ले कर बोला, ‘शर्मिला, मु झे आज तक किसी ने ‘ झूठा’ नहीं कहा और तुम्हें जरा भी िझ झक नहीं हुई?’
‘नहीं, क्योंकि मैं जानती हूं तुम ने मेरी झूठी प्रशंसा की है.’
‘लगता है, मां ने इस आंगन में तुलसी के स्थान पर नागफनी रोप ली है.’
‘इस नागफनी को तुम्हें पानी भी देना पड़ेगा और ध्यान भी रखना पड़ेगा.’ शर्मिला एकदम निर्लज्ज बनी थी.
उस रात समीर की हलक से एक निवाला नहीं उतरा. सारी रात यही सोचता रहा, ‘किस मिट्टी की बनी है शर्मिला. न वाणी में मिठास है, न व्यवहार में नम्रता, हर समय घात लगाए बैठी रहती है कि कैसे किसी का अपमान करे.’
एक दिन समीर के सिर में तेज दर्द था. उस ने शर्मिला को पुकारा. दफ्तर में वह अनुशासन अधिकारी था, उस की आवाज में दम था. सो, उस की सहज बातचीत में भी शर्मिला को आदेश की गंध आती थी. ऐसे वाक्यांशों को वह अनसुना कर देती थी. उस ने सुन कर भी अनसुना कर दिया. समीर का धैर्य टूट गया.
‘क्या कम सुनाई पड़ने लगा है?’ शर्मिला मौन रही.
‘क्या ऊंचा सुनने लगी हो?’
शर्मिला को अपनी मां से पता चल चुका था, इस घर में 7 पीढि़यों से किसी औरत पर हाथ नहीं उठाया गया है. सो, उस ने शेरनी की तरह व्यवहार किया, ‘‘इतवार को मेरा मूड खराब मत करो. मेरे कान बिलकुल ठीक हैं. अगर गुस्सा आ गया तो मिट्टी का तेल डाल कर आग लगा लूंगी.’
‘क्या कहा?’’ समीर चीख कर उछल पड़ा, जैसे सांप ने सामने से फुफकार मारी हो.
‘जो तुम ने सुना,’ शर्मिला ने स्वर धीमा नहीं किया, ‘यही कि अधिक परेशान करोगे तो मैं आत्महत्या कर लूंगी. तुम्हारे साथ दूसरे भी बंधेबंधे फिरेंगे, सारी इंजीनियरिंग धरी की धरी रह जाएगी.’
‘कितने घटिया संस्कार हैं तुम्हारे?’
‘तो छोड़ दो मु झे, तलाक दे दो.’
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समीर बुरी तरह डर गया. डरी तो शर्मिला भी थी मगर नारीहठ पुरुष के अहं को पराजित करने के लिए मन प्राण से जुटा था. असल में कुतर्कपूर्ण असभ्य संवाद शैली के कारण शर्मिला का अकसर समीर से झगड़ा हो जाता था. घर की बात घर से बाहर न निकले, इसलिए समीर हमेशा घुटने टेक देता था. शर्मिला इसे अपनी जीत सम झ कर अपनी मां और बहनों की वाहवाही बटोरती. संक्षेप में कहा जाए तो उस ने नंदन कानन को श्मशानभूमि में बदल सा दिया था.
समस्या ने विकराल रूप तब धारण किया, जब नन्हा गौरव इस परिवार का सदस्य बना. समीर को पूरी उम्मीद थी कि शर्मिला के स्वभाव में अब बदलाव आएगा. अब वह इस परिवार से जुड़ेगी. लेकिन जुड़ना तो दूर, उस ने देवयानी और सुधाकर को उसे छूने तक नहीं दिया और जता दिया कि वह अपने बच्चे की देखभाल भलीभांति कर सकती है. बढ़ावा देने के लिए बहनें तो थीं ही, अब उस के अभियान में मां भी शामिल हो गई.
‘मेरा बेटा है, चाहे जिस प्रकार रखूं, मारूं या पालपोस कर बड़ा करूं.’
समीर ने बड़े दुखी स्वर में कहा, ‘इस मासूम ने किसी का क्या बिगाड़ा है शर्मिला? अपने हठ में तुम ने गर्भ के समय भी किसी का कहना नहीं माना. न मां की सलाह सुनी, न डाक्टर की हिदायतें, न पौष्टिक आहार ही अपनी डाइट में शामिल किया, इसलिए गौरव इतना कमजोर है.’
‘तुम यही कहना चाहते हो न कि, ‘गौरव मेरी लापरवाही के कारण कमजोर है? नहीं, वह तुम्हारी बेवकूफी और गैरजिम्मेदाराना हरकतों की वजह से कमजोर है. तुम न अच्छे पति बन सके, न अच्छे पिता.’
समीर के भीतर की कड़वाहट उस के सामने फूट पड़ना चाहती थी, फिर भी वह खुद को बांधे रहा. जानता था कि शर्मिला कभी भी अपनी गलती नहीं मानेगी. उस की मां ने बचपन से ही अपनी बेटियों को समर्पण का जवाब ठोकर से देना सिखाया है.
अगर समीर उसे गोद में उठाना चाहता, तो शर्मिला उसे भी दो कड़वे बोल सुना कर दूर छिटक देती. अगर देवयानी और सुधाकर उसे खिलाना चाहते, तो ऐसा कुहराम मचाती कि पूरा घर ज्वालामुखी के मुहाने पर जा बैठता.
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समीर तर्क देता, ‘एक व्यक्ति को कई लोग एकसाथ प्यार कर सकते हैं क्योंकि वह किसी का बेटा, किसी का भाई, किसी का पति और किसी का मित्र होता है. सभी तो उसे चाहेंगे. गौरव पर निश्चय ही सब से अधिक तुम्हारा अधिकार है, किंतु मेरे परिवार के लोग भी तो उस से स्नेह करते हैं और उस के सच्चे हितैषी हैं.’
किंतु शर्मिला ने किसी की न सुनी और गौरव को ले कर मायके चली गई ताकि उस की मां गौरव का लालनपालन कर सके. बहनों के सामने उस ने बढ़चढ़ कर अपनी विजय पताका लहराने के किस्से सुनाए तो तलाकशुदा बहन नीरा और छोटी बहन शिल्पा ने उस के समर्थन में सिर हिला दिया.
शर्मिला को मायके आए हुए एक महीने से ऊपर हो चुका था. शुरू में मां ने दुलारा, पुचकारा, सहानुभूति जतलाई, सांत्वना भी प्रकट की. बहनों ने भी उस के साहस की खूब प्रशंसा की. फिर, सभी अपनीअपनी राह हो लिए. मां अपनी सभासोसाइटियों और भजन मंडलियों में व्यस्त हो गई. बहनों का पूरा दिन सैरसपाटे, किटी पार्टियों और शौपिंग में बीत जाता. उस के बाद जो समय बचता, उस दौरान मन बहलाने के लिए फेसबुक और व्हाट्सऐप जैसी विधाएं तो थीं ही.



