Religious Story : बहुरंगी आस्था

 Religious Story : ‘‘ऐ छोकरी… चल, पीछे हट…’’ मंदिर का पुजारी कमली को गणेश की मूर्ति के बहुत करीब देख कर आगबबूला हो उठा. वह अपनी आंखों से अंगारे बरसाते हुए कमली के पास आ गया और चिल्लाते हुए बोला, ‘‘सुनाई नहीं देता… मूर्ति को छू कर गंदा करेगी क्या… चल, पीछे हट…’’

कमली 10 साल की थी. उस समय वह ऊंची जातियों की मेम साहबों की नकल करने के लिए अपनी ही धुन में गणेश की मूर्ति के बिलकुल सामने खड़ी सिद्धि विनायक मंत्र के जाप में मगन थी.

उसे पहली बार ऐसा मौका मिला था, जब वह मंदिर में गणेश चतुर्थी की पूजा के लिए सब से पहले आ कर खड़ी हो गई थी. अभी तक दर्शन के लिए कोई लाइन नहीं लगी थी. मंदिर के अहाते को रस्सियों से घेरा जा रहा था, ताकि औरत और मर्द अलगअलग लाइनों में खड़े हो कर गणेश के दर्शन कर सकें और किसी तरह की कोई भगदड़ न मचे.

कमली पूजा शुरू होने के बहुत पहले ही चली आई थी और चूंकि मंदिर में भीड़ नहीं थी, इसलिए वह बेझिझक गणेश की मूर्ति के बिलकुल ही सामने बने उस ऊंचे चबूतरे पर भी चढ़ गई, जिस पर खड़े हो कर पुजारी सामने लाइन में लगे श्रद्धालुओं का प्रसाद ग्रहण करते हैं और फिर उन में से थोड़ा सा प्रसाद ले कर मूर्ति की ओर चढ़ाते हुए बाकी प्रसाद श्रद्धालुओं को वापस कर देते हैं.

उस ऊंचे चबूतरे पर खड़े रहने का हक केवल और केवल मंदिर के पुजारियों के पास ही था, इसलिए कमली का उस चबूतरे पर खड़े हो कर गणेश की पूजा करना पुजारी को कतई स्वीकार नहीं था. उस ने फिर चिल्ला कर कहा, ‘‘ऐ लड़की… परे हट…’’ इस बार उस ने कमली की बांह पकड़ कर धक्का दे दिया.

अपनी पूजा में अचानक से आई इस बाधा से कमली ठिठक गई. उस ने खुद को गिरने से बचा कर सामने खड़े पुजारी को देखा और फिर हाथ जोड़ कर बोली, ‘‘क्या हुआ पंडितजी, आप मुझे धक्का क्यों दे रहे हैं?’’

‘‘तो क्या मैं तेरी यहां आरती उतारूं…?’’ गुस्से से तमतमाते हुए पुजारी के मुंह से आग के गोले फूट पड़े, ‘‘तेरी हिम्मत कैसे हुई इस चबूतरे पर चढ़ने की… प्रभु की मूर्ति को गंदा कर दिया… चल भाग यहां से…’

कमली को अब भी समझ में नहीं आया कि यह पंडितजी को क्या हो गया… अब तक तो हमेशा उस ने इन से ज्ञान की बातें ही सुनी थीं, लेकिन… आज… उस ने फिर कहा, ‘‘गुस्सा क्यों होते हैं आप? सामने कोई लाइन तो थी नहीं, इसलिए मैं ऊपर चढ़ आई. बस, मंत्र खत्म होने ही वाले हैं,’’ कह कर उस ने फिर आंखें बंद कर लीं और मूर्ति के आगे अपने हाथ जोड़ लिए.

‘यह तो सरासर बेइज्जती है… एक लड़की की इतनी हिम्मत… पहले तो चबूतरे तक चढ़ आई और अब… कहने से भी पीछे नहीं हटती…’ सोच कर पुजारी बौखला गया और बादलों सा गरजा, ‘‘कोई है…’’

देखते ही देखते भगवा कपड़ों में 2 लड़के आ कर पुजारी के पास खड़े हो गए. कमली अब भी रटेरटाए मंत्रों को बोलने में ही मगन थी.

पुजारी ने दोनों लड़कों को इशारे में जाने क्या समझाया, दोनों ने कमली को पीछे धक्का देते हुए चबूतरे से नीचे गिरा दिया और फिर दोनों ओर से कमली को जमीन पर घसीटते हुए मंदिर के बाहर ले कर चले गए.

पुजारी ने अपने हाथ की उंगलियों को देखा और फिर अपनी नाक के पास ले जा कर सूंघते हुए नफरत से बोला, ‘‘इतनी सुबहसुबह फिर से दोबारा नहाना पड़ेगा.’’

मंदिर से जबरदस्ती निकाली गई कमली मंदिर के बाहर जमीन पर ही बैठ कर फफक पड़ी. कितने मन से उस ने रातभर जाग कर मां से कह कर गणेश के लिए लड्डू बनाए थे और फिर आज सुबह ही वह नहाधो कर नई फ्रौक पहने पूजा के लिए दौड़ी चली आई थी.

साथ ही, भाई को भी कह आई थी कि जल्दी से नहाधो कर मां से लड्डू व फलफूल की गठरी लिए मंदिर में चले आना. मां ने बड़ी जतन से घी, आटे का इंतजाम किया था.

कमली का भाई सूरज मंदिर के बाहर आ कर ठिठक गया. कमली धूलमिट्टी में अपने दोनों घुटने मोड़ कर बैठी हुई थी. उस की नई फ्रौक भी तो धूल में गंदी हो गई थी. माथे पर हाथ रख कर बैठी कमली ने सामने अपने भाई को देखा तो मानो उसे आसरा मिला.

‘‘क्या हुआ…’’ सूरज ने झट से गठरी उस के पास ही जमीन पर रख दी और उस के कंधे पर हाथ रख कर पूछा, ‘‘तू तो यहां पूजा करने आई थी… फिर ऐसी हालत कैसे?’’

‘‘वह… पुजारी ने…’’ रोतेरोते कमली की हिचकियां बंध गईं. उस ने वैसे ही रोते हुए सूरज को सारा हाल कह सुनाया.

सबकुछ सुन कर सूरज भी ताव में आ गया और बोला, ‘‘यह पुजारी तो… खुद को भगवान का दूत समझ बैठा है… जो औरत पूरे महल्ले और मंदिर के बाहर की सफाई करती है, उस औरत की बेटी के छूने से मंदिर गंदा हो जाता है… वाह रे पंडित…’’

फिर उस ने कमली को भी फटकारते हुए कहा, ‘‘ऐसे भगवान की पूजा करने के लिए तू इतने दिनों से पगलाई थी, जो मूर्ति बने तेरी बेइज्जती होते देखते रहे… चल उठ यहां से… हमें कोई पूजा नहीं करनी…’’

‘‘लेकिन, ये लड्डू और…’’ कमली को अब अपनी मेहनत का खयाल हो आया. आखिर मां को रातभर जगा कर उस ने गणेश के लिए एक किलो लड्डू बनवाए थे. मेहनत तो थी ही, साथ ही रुपए भी लगे थे… उसे लगा, सबकुछ बरबाद हो गया.

‘‘कमली, मुझे ये लड्डू अब तो खाने को दे दे…’’ सूरज को पूजा से क्या लेनादेना था, वह तो बस अपने लिए ही परेशान था.

‘‘ले, तू सब खा ले…’’ कह कर कमली ने पास रखी पोटली गुस्से से सूरज के आगे कर दी और खुद खड़ी हो कर बोली, ‘‘मेरी तो मेहनत और मां के पैसे दोनों पर पानी फिर गया… बेइज्जती हुई सो अलग…’’ फिर मंदिर की ओर देखते हुए वह सूरज से बोली, ‘‘अब इस मंदिर में मैं कभी पैर न धरूंगी… मां ठीक कहती हैं… बप्पा भी मूर्ति बने सब देखते रहे… मेरा साथ उन्होंने न दिया… वे भी उसी पुजारी और लड़कों से मिले हैं…’’ फिर अपने आंसू पोंछ कर उस ने कहा, ‘‘अगर बप्पा को मेरी जरूरत नहीं है तो मुझे भी उन की जरूरत नहीं है, रह लूंगी मैं उन के बिना…’’ और फिर पैर पटक कर कमली घर की ओर जाने लगी, तो सूरज ने उसे रोकते हुए पूछा, ‘‘इन लड्डुओं का क्या करूं?’’

‘‘जो जी में आए… फेंक दे… जो मन करे वह कर…’’

‘‘गणेश को चढ़वा दूं…’’ सूरज ने अपना सिर खुजाते हुए पूछा.

‘‘बप्पा को… मगर, कैसे… इतनी बेइज्जती के बाद मैं तो अंदर न जाऊंगी और न तुझे जाने दूंगी… फिर कैसे…?’’

‘‘पुजारी ने तुझे गंदा कहा है न… अब यही तेरे हाथ के बने लड्डुओं को वह छुएगा और गणेश को चढ़ाएगा भी…’

‘‘मगर, कैसे…?’’

‘‘बस तू देखती जा…’’ कह कर सूरज मंदिर से थोड़ा आगे बढ़ कर एक ढाबे पर गया और वहां से मिट्टी के कुछ बरतन मांग लाया. फिर उस ने मंदिर के पास लगे नल से सभी बरतनों को धोया और फिर एक साफ पक्की जगह पर गठरी और बरतन ले कर जा बैठा.

मंदिर के बाहर अब श्रद्धालुओं की भीड़ बढ़ने लगी थी. सूरज ने गठरी खोल दी और आनेजाने वाले लोगों को देख कर आवाज लगाने लगा, ‘‘बप्पा के लिए घी के लड्डू… फलफूल समेत केवल 21 रुपए में.’’

और फिर क्या था, देखते ही देखते कमली के हाथ के बने लड्डू, फलफूल समेत एक श्रद्धालु और पुजारी के हाथों से होते हुए गणेश की मूर्ति को चढ़ गए. सूरज ने रुपयों का हिसाब किया, लागत से ज्यादा मुनाफा हुआ था.

सूरज ने सारे रुपए कमली के हाथ पर धर दिए और कहा, ‘‘ले… तेरी बेइज्जती का बदला पूरा हो गया. जिस के हाथ के छूने से गणेश मैले हुए जा रहे थे, उसी हाथ के बने लड्डुओं से वे पटे हुए हैं और वह पुजारी… आज तो वह न जाने कितनी बार मैला हुआ होगा…’’

सूरज की बात सुन कर कमली हंस दी और बोली, ‘‘कितनी बेवकूफ थी मैं, जो कितने दिनों से पैसे जमा कर के इन की पूजा करने का जुगाड़ कर रही थी. यही अक्ल पहले आई होती तो अब तक कितने पैसे बच गए होते…’’ फिर कुछ सोच कर वह बोली, ‘‘गणेश चतुर्थी का यह उत्सव तो अभी 3-4 दिन तक चलना है… क्या ऐसा नहीं हो सकता कि बप्पा पर रोज मेरे ही हाथों का प्रसाद चढ़े…’’

‘‘क्यों नहीं हो सकता… यहां बेवकूफों की कोई कमी है क्या…’’ फिर कुछ रुक कर सूरज ने आगे कहा, ‘‘तू एक काम कर, घर चली जा… कुछ देर आराम कर ले… मैं लाला से जा कर बेसन, घी, चीनी वगैरह ले आता हूं. कल फिर हम यहीं लड्डू बेचेंगे…’’

उधर मंदिर के अंदर पुजारी अपने साथ के लोगों को बताते नहीं थक रहा था कि कैसे आज एक अछूत लड़की के मलिन स्पर्श से उस ने अपने प्रभु को बचाया. और गणेशजी, उन्हें इस फलफूल, मानअपमान, स्पर्शअस्पर्श से कहां कुछ फर्क पड़ने वाला था. वे अब भी पहले के समान ही जड़ थे.

लेखिका- एकता बृजेश गिरि,

Short Story : बुद्धिजीवी अर्थात!

Short Story : रोहरानंद को देख, लंबी-लंबी फलांग भरता, मानौ दौड़ता भागने लगा. रोहरानंद ने पुकारा- “अरे भाई ! रुको ! रुको तो…”

बुद्धिजीवी ने पलट कर देखा और पुनः लंबे-लंबे डग भरता हवा से बातें करने लगा. विवश रोहरानंद पीछे दौडा. सोचा,आज बमुश्किल एक बुद्धिजीवी मिला है, चार बातें कर लूं तो जीवन धन्य हो जाए.

-“भाई साहब ! सुनिए तो…” रोहरानंद ने दौड़ते हुए पास पहुंच मानो गुहार लगाई.

-“क्यों?”बुद्धिजीवी  ने घूर कर देखा

-“कुछ शंका समाधान करना चाहता हूं.”

-“मैं अभी शीघ्रता में हूं, फिर कभी मिलना.”

-” ऐसा अनर्थ न करें,मेरी बस एक-दो ही शंका, कुशंका है.” रोहरानंद ने  लरजते स्वर में कहा.

-“अच्छ, जरा जल्दी पूछो.” बुद्धिजीवी ठहर गए.

-” धन्यवाद !” रोहरानंद ने  इधर उधर देखा और फिर कहा,- “भाई साहब सामने काफी हाउस है, वहीं बैठते हैं न !”

-“ठीक है !”अब बुद्धिजीवी मुस्कुराया. रोहरानंद को लगा चिड़िया फंसने को तैयार है.

दोनों काफी हाउस में प्रविष्ट हुए . कुर्सियों पर बैठ गए. रोहरानंद ने सधे खिलाड़ी की तरह उंगली पकड़ी और कहा,” भाई साहब और क्या हाल है ?”

बुद्धिजीवी ने गर्म हवा छोडी-” देश तालिबानी संस्कृति की ओर अग्रसर है ! बेहद दुखी है हम.”

रोहरानंद- “तालिबानी अर्थात बर्बर सभ्यता .. नहीं… नहीं हमारा देश तो लोकतंत्र की ताजी हवाओं के झोंके से खुशनुमा है…”

बुद्धिजीवी- “यह सब कहने की बातें हैं. लोकतंत्र तो एक मृगतृष्णा है, हमारा देश अभी बर्बर अवस्था में ही सांसे ले रहा है .”

रोहरानंद ने आश्चर्य से कहा- “भाई साहब ! वह भला कैसे.”

बुद्धिजीवी- “इंटेलेक्यूअल पर्सन को आज देशद्रोही ठहराया जा रहा है, इससे बड़ा काला दिन और क्या होगा. जब बुद्धिजीवियों के साथ सरकार ऐसा दमनकारी कृत्य कर रही है फिर आम लोगों के पीड़ा की आप कल्पना भी नहीं कर सकते.”

रोहरानंद- “मगर भाई साहब ! मुझे लगता है इसमें गलती बुद्धिजीवी की होती है .वह अपनी सीमा का सदैव अतिक्रमण करता है और यह खतरा तो उसे उठाना ही होगा. यह तो हर देश- काल में होता रहा है.”

बुद्धिजीवी – “मगर आज हम क्या करें ? क्या इसका प्रतिकार नहीं करें . सरकार एक कार्टूनिस्ट को राष्ट्रद्रोही बता रही है .यह कैसी व्यवस्था है, कैसा लोकतंत्र है. क्या कलाकार आम आदमी अपनी भावना को प्रकट करने स्वतंत्र नहीं है.”

रोहरानंद-( दोसे का ऑर्डर देने के बाद )-” भाई साहब, मेरी एक सलाह मानेंगे… बुद्धिजीवी की सार्थकता तभी है जब वह लकीर को तोड़े.”

बुद्धिजीवी अब थोड़ा मुस्कुराए और कहा-” ठीक कहते हो, किसी ने कहा है न, लकीर को तोड़ते हैं सिर्फ तीन शायर, सिंह और फकीर.”

रोहरानंद- “और अगर बुद्धिजीवी देशद्रोही नहीं हुआ तो बुद्धिजीवी क्या खाक हुआ… बुद्धिजीवी का तो अर्थ ही है विद्रोही होना.जेल जाना जेल में मरना, सच्चा इंटेलेक्यूअल तो यही है.”

बुद्धिजीवी के सामने अब दोसा आ चुका था. कांटे से एक टुकड़ा काटते हुए उसने कहा- “तुम ठीक कह रहे हो, दुनिया के सारे शीर्ष बुद्धिजीवी जेल में ठूंसे गए हैं, चाहे राजसत्ता हो या लोकसत्ता .”

रोहरानंद – “और आपको उनका धन्यवाद करना चाहिए अगर राष्ट्रदोही कहकर न सताए बुद्धिजीवी को जेल में नहीं ठूंसेगी तो उसकी प्रतिभा को संसार भला कैसे जानेगा ?”

बुद्धिजीवी के समक्ष अब काफी आ चुकी थी उन्होंने शांत भाव से कप उठाया और होठों से लगा एक घूंट पीकर कहा- “तुम ठीक कहते हो, मगर हम तो नाम मात्र के बुद्धिजीवी रह गए हमारी प्रतिभा को देश-दुनिया ने जाना  ही नहीं. चलो ठीक है हम अपना काम करेंगे हम विद्रोह को कंधे पर उठा उठा प्रदर्शन करेंगे.” Short Story

Social Story : कैसे जीता बृजलाल ने चुनाव

Social Story : बृजलाल यादव के लिए प्रधानी का चुनाव जीतना इतना आसान नहीं था. ठाकुरों से मिल कर ब्राह्मण यादवों पर भारी पड़ रहे थे. दलितों के वोट अपनी बिरादरी के अलावा किसी और को मिलने की उम्मीद नहीं थी, इसलिए कल्पनाथ गांव के सभी अल्पसंख्यकों को रिझा कर चुनाव जीतने का गुणाभाग लगा रहा था.

बृजलाल यादव किसी भी कीमत पर चुनाव नहीं हारना चाहता था, इसलिए वह हर हथकंडा अपना रहा था. अगर उसे ठाकुरों और ब्राह्मणों का समर्थन मिल जाए, तो उस की जीत पक्की थी.

प्रभाकर चौबे भी अपनी जीत पक्की समझ कर जम कर प्रचारप्रसार कर रहा था.

बृजलाल बचपन से ही छोटेमोटे अपराध किया करता था. बलिया से शाम को दिल्ली जाने वाली बस में कारोबारियों की तादाद ज्यादा होती थी. उन को लूटने में मिली कामयाबी से बृजलाल का मनोबल बढ़ा, तो वह गिरोह बना कर बड़ी वारदातें करने लगा.

इसी बीच बृजलाल की पहचान मोहित यादव से हो गई थी. जब से वह मोहित का शागिर्द बन गया था, तब से लोगों के बीच में उस की पहचान एक गुंडे के रूप में होने लगी थी. मोहित यादव की भी इच्छा थी कि बृजलाल प्रधानी का चुनाव जीत जाए, इसलिए वह कभीकभार उस के गांव आ कर उस का कद ऊंचा कर जाता था.

समाज में मोहित यादव की इमेज साफसुथरी नहीं थी. उस के ऊपर हत्या, लूट वगैरह के तमाम मुकदमे चल रहे थे, पर राजनीतिक दबाव के चलते जिस पुलिस को उसे गिरफ्तार करना था, वह उस की हिफाजत में लगी थी. रोजाना शाम को बृजलाल का दरबार लग जाता था. एक घूंट शराब पाने के लालच में लोग उस की हां में हां मिला कर तारीफों की झड़ी लगा देते.

जैसेजैसे चुनाव की तारीख नजदीक आ रही थी, वैसेवैसे लोगों के भीतर का कुतूहल बढ़ता जा रहा था. आज बृजलाल को आने में काफी देर हो रही थी. उस के घर के बाहर बैठे लोग बड़ी बेसब्री से उस का इंतजार कर रहे थे. गरमी का मौसम था. बरसात होने के चलते उमस बढ़ गई थी.

जगन बोला, ‘‘बड़ी उमस है. अभी पता नहीं, कब तक आएंगे भैया?’’

‘‘आते होंगे… उन के जिम्मे कोई एक ही काम थोड़े ही न हैं. उन को अगले साल विधायक का चुनाव भी तो लड़ना है,’’ रामफल ने खीसें निपोरते हुए कहा.

सुबरन से रहा नहीं गया. वह रामफल की हां में हां मिलाते हुए बोला, ‘‘विधायक का चुनाव जिता कर भैया को मंत्री बनवाना है.’’

उन सब के बीच बैठे बृजलाल के पिता राम सुमेर इस बातचीत से मन ही मन खुश हो रहे थे. एकाएक जब तेज रोशनी के साथ गाड़ी की ‘घुर्रघुर्र’ की आवाज लोगों के कानों में पड़ी, तो वे एकसाथ बोले, ‘लो, भैया आ गए…’

बृजलाल जब उन सब के सामने आया, तो सभी लोग खड़े हो गए. जब वह बैठा, तो उस के साथ सभी लोग बैठ गए. बृजलाल ने लोगों से पूछा, ‘‘आज आप लोगों ने क्याक्या किया? प्रचारप्रसार का क्या हाल है? प्रभाकर और कल्पनाथ के क्या हाल हैं?’’

बृजलाल के इन सवालों पर संदीप तिवारी ने हंसते हुए कहा, ‘‘दुबे और पांडे के पुरवा से तो मैं सौ वोट जोड़ चुका हूं. दलितों में कोशिश चल रही है.’’ ‘‘दलितों में सोमारू की ज्यादा पकड़ है, आज मैं उस से मिला था. वह कह रहा था कि अगर बृजलाल भैया प्रधानी जीतने के बाद मुझे अपना सैक्रेटरी बना लें, तो मैं अपनी पूरी बस्ती के वोट उन्हें दिलवा दूं,’’ थोड़ा संजीदा होते हुए जब जगन ने कहा, तो बृजलाल बोला, ‘‘तो उसे बुलवा लिए होते, मैं उस से बात कर लेता.’’

‘‘ठीक है, मैं कल आप से मिलवा दूंगा.’’

फिर शराब की बोतलें खुलीं, नमकीन प्लेटों में रखी गई. सभी लोगों ने छक कर शराब पी और झूमते हुए चले गए. कल्पनाथ को भी अपनी जीत का पूरा भरोसा था. जहां एक ओर वह छोटी जातियों के लोगों की तरक्की की लड़ाई लड़ रहा था, वहीं दूसरी ओर प्रभाकर चौबे गांव की तरक्की के साथसाथ सभी की तरक्की की बात कर अपनी जीत के लिए वोट करने को कह रहा था.

कई गुटों में बंटे ब्राह्मण प्रभाकर का साथ खुल कर नहीं दे पा रहे थे. प्रभाकर को ठाकुरों का ही भरोसा था. ब्राह्मणों की आपसी लड़ाई का फायदा बृजलाल को मिल रहा था. चुनाव हुआ. सोमारू ने अपनी बस्ती वालों के ही नहीं, बल्कि अपनी पूरी बिरादरी को भरोसा दे कर बृजलाल को वोट दिलाने की पुरजोर कोशिश की.

चुनाव में धांधली भी हुई. शातिर दिमाग के बृजलाल ने धन, बल और फर्जी वोटों का खूब इस्तेमाल किया और चुनाव जीत गया. शाम से जश्न शुरू हुआ, तो रात के 12 बजे तक चला. शराब और मांस के सेवन से वहां का माहौल तामसी हो गया था.

लोगों की भलाई, गांव की तरक्की, भरोसा देने वाला बृजलाल अब अपने असली रूप में आ गया था. समाजसेवा के नाम पर वह ग्राम सभा की तरक्की के लिए आए रुपए को दोनों हाथ से लूटने लगा था. सारे काम कागजों तक ही सिमट कर रह गए थे. सोमारू की तो लौटरी खुल गई थी. ग्राम सभा की जमीन पर कब्जा करना, सरकारी योजना से तालाब खुदवा कर अपने परिवार या जानकार को मछली पालन के लिए दे देना, गांव की तरक्की के लिए आए पैसे को हड़प लेना उस की आदत बन गई थी.

मनरेगा के तहत कार्डधारकों को काम पर न लगा कर वह एक तालाब जेसीबी मशीन से खुदवा रहा था. इस की शिकायत जब ऊपर गई, तो जांच करने वाले आए और रिश्वत खा कर रात को जेसीबी चलवाने की सलाह दे कर चले गए. इस तरह से ग्राम पंचायत से संबंधित सभी अफसरों व मुलाजिमों को साम, दाम, दंड और भेद के जरीए चुप करा कर सारी योजनाओं का रुपया डकारा जा रहा था.

सोमारू बृजलाल का विश्वासपात्र ही नहीं, नुमाइंदा बन कर सारा काम कर रहा था. अपनी बिरादरी वालों व सभी लोगों से धोखा कर के विधवा पैंशन, वृद्धावस्था पैंशन, आवासीय सुविधा वगैरह सभी योजनाओं और कामों में जो भी कमीशन मिलता था, उस में सोमारू का भी हिस्सा तय रहता था.

Social Story : ऐसे हुआ अंधविश्वास का अंत

Social Story : शहर के किनारे काली माता का मंदिर बना हुआ था. सालों से वहां कोई पुजारी नहीं रहता था. लोग मंदिर में पूजा तो करने जाते थे, लेकिन उस तरह से नहीं, जिस तरह से पुजारी वाले मंदिर में पूजा की जाती है. एक दिन एक ब्राह्मण पुजारी काली माता के मंदिर में आए और अपना डेरा वहीं जमा लिया. लोगों ने भी पुजारीजी की जम कर सेवा की. मंदिर में उन की सुखसुविधा का हर सामान ला कर रख दिया. पहले तो पुजारीजी बहुत नियमधर्म से रहते थे, सत्यअसत्य और धर्मअधर्म का विचार करते थे, लेकिन लोगों द्वारा की गई खातिरदारी ने उन का दिमाग बदल दिया. अब वे लोगों को तरहतरह की बातें बताते, अपनी हर सुखसुविधा की चीजों को खत्म होने से पहले ही मंगवा लेते.

काली माता की पूजा का तरीका भी बदल दिया. पहले पुजारीजी काली माता की सामान्य पूजा कराते थे, लेकिन अब उन्होंने इस तरह की पूजा करानी शुरू कर दी, जिस से उन्हें ज्यादा से ज्यादा चढ़ावा मिल सके.

धीरेधीरे पुजारीजी ने काली माता पर भेंट चढ़ाने की प्रथा शुरू कर दी. वे पशुओं की बलि काली माता को भेंट करने के नाम पर लोगों से बहुत सारा पैसा ऐंठने लगे. जब कोई किसी काम के लिए काली माता की भेंट बोलता, तो पुजारीजी उस से बकरे की बलि चढ़ाने के नाम पर 5 हजार रुपए ले लेते और बाद में कसाई से बकरे का खून लाते और काली माता को चढ़ा देते.

बकरे के नाम पर लिए हुए 5 हजार रुपए पुजारीजी को बच जाते थे, जबकि बकरे का मुफ्त में मिला खून काली माता की भेंट के रूप में चढ़ जाता था.

धीरेधीरे दूरदूर के लोग भी काली माता के मंदिर में आने शुरू हो गए. पुजारीजी दिनोंदिन पैसों से अपनी जेब भर रहे थे. लोग सब तरह के झंझटों से बचने के लिए पुजारीजी को रुपए देने में ही अपनी भलाई समझते थे.

लेकिन कुछ ऐसे भी लोग थे, जो पुजारीजी की इस प्रथा का विरोध करते थे. लेकिन पुजारीजी के समर्थकों की तुलना में ये लोग बहुत कम थे, इसलिए उन्हें ऐसा काम करने से रोक न सके.

जब पुजारीजी के ढोंग की हद बढ़ गई, तो कुछ लोगों ने पुजारी की अक्ल ठिकाने लगाने की ठान ली. शहर में रहने वाले घनश्याम ने इस का बीड़ा उठाया.

घनश्याम सब से पहले पुजारीजी के भक्त बने और 2-4 झूठी समस्याएं उन्हें सुना डालीं. साथ ही बताया कि उन के पास पैसों की कमी नहीं है, लेकिन इतना पैसा होने के बावजूद भी उन्हें शांति नहीं मिलती. अगर किसी तरह उन्हें शांति मिल जाए, तो वे किसी के कहने पर एक लाख रुपए भी खर्च कर सकते हैं.

एक लाख रुपए की बात सुन कर पुजारीजी की लार टपक गई. उन्होंने तुरंत घनश्याम को अपनी बातों के जाल में फंसाना शुरू कर दिया.

पुजारी बोला, ‘‘देखो जजमान, अगर तुम इतने ही परेशान हो, तो मैं तुम्हें कुछ उपाय बता सकता हूं.

‘‘अगर तुम ने ये उपाय कर दिए, तो समझो तुम्हें मुंहमांगी मुराद मिल जाएगी. लेकिन इस सब में खर्चा बहुत होगा.’’

घनश्याम ने पुजारीजी को अपनी बातों में फंसते देखा, तो झट से बोल पड़े, ‘‘पुजारीजी, मुझे खर्च की चिंता नहीं है. बस, आप उपाय बताइए.’’ पुजारीजी ने काली माता की पूजा के लिए एक लंबी लिस्ट तैयार कर दी. घनश्याम पुजारीजी की कही हर बात  मानता गया. पुजारीजी ने काली माता की भेंट के लिए 2 बकरों का पैसा भी घनश्याम से ले लिया. साथ ही, उन्हें घर में एक पूजा कराने को कह दिया.

पुजारीजी की इस बात पर घनश्याम तुरंत तैयार हो गए. तीसरे दिन घनश्याम के घर पर पूजा की तारीख तय हुई, जबकि भेंट चढ़ाने के लिए पैसे तो पुजारीजी उन से पहले ही ले चुके थे. तीसरे दिन पुजारीजी घनश्याम के घर जा पहुंचे. पुजारीजी ने अमीर जजमान को देख हर बात में पैसा वसूला और घनश्याम अपनी योजना को कामयाब करने के लिए पुजारी द्वारा की गई हर विधि को मानते गए. जोरदार पूजा के बाद घनश्याम ने पुजारीजी के लिए स्वादिष्ठ पकवान बनवाए, बाजार से भी बहुत सी स्वादिष्ठ चीजें मंगवाई गईं.

पुजारीजी ने जम कर खाना खाया. उन्होंने आज तक इतना लजीज खाना नहीं खाया था. जब पुजारीजी खाना खा चुके, तो उन्होंने घनश्याम से पूछा, ‘‘घनश्याम, तुम ने हमें इतना स्वादिष्ठ खाना खिला कर खुश कर दिया. ये कौन सा खाना है और किस ने बनाया है?

पुजारी के पूछने पर घनश्याम ने जवाब दिया, ‘‘पुजारीजी, कुछ खाना तो बाजार से मंगवाया था और कुछ यहीं पकाया था. सारा खाना ही बकरे के मांस से बना हुआ था.’’

घनश्याम ने बकरे के मांस का नाम लिया, तो पुजारीजी की सांसें अटक गईं, लेकिन उन्होंने सोचा कि शायद घनश्याम मजाक कर रहे हैं. वे बोले, ‘‘जजमान, आप मजाक बहुत कर लेते हैं, लेकिन हमारे सामने मांसाहारी चीज का नाम मत लो. हम तो मांसमदिरा को छूते भी नहीं, खाना तो बहुत दूर की बात है.’’

घनश्याम ने अपनी बात पर जोर देते हुए कहा, ‘‘मैं सच कह रहा हूं पुजारीजी. आप चाहें तो जिस बावर्ची ने खाना बनाया है, उस से पूछ लें.’’

घनश्याम की बात सुन पुजारीजी का दिल बैठ गया. मन किया कि उलटी कर दें. नफरत से भरे मन में घनश्याम के लिए गुस्सा भी बहुत था. घनश्याम ने आवाज दे कर बावर्ची को बुला कर कहा, ‘‘जरा पुजारीजी को बताओ तो कि तुम ने क्या बनाया था.’’

बावर्ची अपने बनाए हुए खाने को बताने लग गया. सारा खाना बकरे के मांस से बनाया गया था. पुजारीजी पैर पटकते हुए गुस्से से भरे घनश्याम के घर से चले गए. घर के बाहर आ कर उन्होंने गले में उंगली डाली और खाए हुए खाने को अपने पेट से खाली कर दिया, लेकिन मन की नफरत इतने से ही शांत नहीं हुई.

पुजारीजी ने बस्ती में हंगामा कर लोगों को जमा कर लिया, जिन में ज्यादातर उन के भक्त थे. उन्होंने घनश्याम द्वारा की गई हरकत सब लोगों को बताई, तो हर आदमी घनश्याम की इस हरकत पर गुस्सा हो उठा. अब लोग पुजारीजी समेत घनश्याम के घर जा पहुंचे. सब ने घनश्याम को भलाबुरा कहा.

घनश्याम ने सब लोगों की बातें चुपचाप सुनीं, फिर अपना जवाब दिया, ‘‘भाइयो, मैं किसी भी गलती के लिए माफी मांगने के लिए तैयार हूं, लेकिन आप पहले मेरी बात ध्यान से सुनें,

उस के बाद जो आप कहेंगे, वह मैं करूंगा.’’

सब लोग शांत हो कर घनश्याम की बात सुनने लगे. घनश्याम ने बोलना शुरू किया, ‘‘देखो भाइयो, जब मैं पुजारीजी के पास गया और अपनी परेशानी बताई, तो इन्होंने मुझ से 2 बकरों की भेंट काली माता पर चढ़ाने के लिए रुपए लिए थे. साथ ही, मुझ से यह भी कहा था कि मैं घर में पूजा कराऊं.’’

‘‘मैं ने पुजारीजी के कहे मुताबिक ही पूजा कराई और घर में बकरे के मांस से बना खाना परोसा. पुजारीजी ने मुझ से पूछा नहीं और मैं ने बताया नहीं.’’ भीड़ में से एक आदमी ने लानत भेजते हुए कहा, ‘‘तो भले आदमी, तुम को तो सोचना चाहिए कि पुजारी को मांस खिलाना कितना अधर्म का काम है. क्या तुम यह नहीं जानते थे?’’

घनश्याम ने शांत लहजे में जवाब दिया, ‘‘भाइयो, मुझे नहीं लगता कि यह कोई अधर्म का काम है. जब ब्राह्मण पुजारी अपनी आराध्य काली माता पर बकरे की बलि चढ़ा सकता है, तो उस बकरे के मांस को खुद क्यों नहीं खा सकता? क्या पुजारी की हैसियत भगवान से भी ज्यादा है या भगवान ब्राह्मण से छोटी जाति के होते हैं?’’

लोगों में सन्नाटा छा गया. घनश्याम की बात पर किसी से कोई जवाब न मिल सका. पुजारीजी का सिर शर्म से झुक गया. उन्होंने यह बात तो कभी सोची ही नहीं थी. लोग खुद इस बात को सोचे ही बिना काली माता के लिए बकरे की बलि देते रहे थे.

आज पंडितजी की समझ में आया कि भला भगवान किसी जानवर का मांस क्यों खाने लगे? वे तो किसी भी जीव की हत्या को बुरा मानते हैं, वहां मौजूद सभी लोग घनश्याम की बात का समर्थन करने लगे. भीड़ के लोगों ने पुजारीजी को ही फटकार कर काली माता का मंदिर छोड़ देने की चेतावनी दे दी. उस दिन से काली माता के मंदिर पर पशु बलि की प्रथा बंद हो गई.

पुजारीजी का धर्म भ्रष्ट हो चुका था, ऊपर से लोगों की नजरों में उन की इज्जत न के बराबर हो गई थी. उन्होंने वहां से भाग जाने में ही अपनी भलाई समझी. अब मंदिर वीरान हो गया था. अब वहां जानवर बंधने लगे थे.

Funny Story : दलित दूल्हे

लेखक- अनुराग वाजपेयी, Funny Story : वे तो इस बात पर अड़े हुए थे कि दूल्हा घोड़ी पर नहीं बैठेगा. हमारे प्रदेश में हर साल ऐसी 10-20 घटनाएं होती हैं, जब बड़ी जातियों के लोग अपने गांव में जाति की इज्जत बचाए रखने के लिए दलित जाति के दूल्हे को घोड़ी से उतार देते हैं.

किले ढह गए, महल बिक गए, खेत बंट गए, लड़के शराबी बन गए, पर मूंछें नहीं झुकीं. इन लोगों को भरोसा है कि अगर बड़प्पन बचाए रखना है, तो एक ही तरीका है कि दलित जाति के दूल्हे की बरात ही मत निकलने दो.

इस गांव में भी यही हो रहा था. कई दिनों से दलित दूल्हे को घोड़ी से उतारने की तैयारी चल रही थी.

मैं ने एक से कहा, ‘‘भाई, दूल्हा तो वैसे ही दलित होता है, सामने दिखती आफत को गले लगाने के बावजूद वह गाजेबाजे के साथ निकलने को तैयार हो जाता है. उस से ज्यादा दलित, पीडि़त और कौन होगा? फिर अलग से इन्हें दलित दूल्हा कहने की क्या जरूरत है?’’

वह बोला, ‘‘हम भी इन दूल्हों को यही बात तो समझाना चाहते हैं कि शादी के बाद जिंदगी में वैसे ही दलित हो जाओगे तो अच्छा है कि अभी से धरती पर रहो.’’

खैर, यह बात तो हंसने की है, लेकिन जब सारा देश अयोध्या में मंदिरमसजिद, सीएए, पाकिस्तान और ऐसे ही खास मुद्दों में उलझा हुआ था, तब इस गांव में सब से बड़ा मुद्दा यह था कि दलित दूल्हा घोड़ी पर बैठ सकेगा या नहीं.

मैं ने दूल्हे के  पिता से पूछा, ‘‘भाई, क्या तैयारी हो रही है शादी की?’’

वह बेचारा चौक में जूते गांठने का काम करता था. बोला, ‘‘बाबूजी, तैयारी क्या है, आप लोगों का आशीर्वाद है. किसी तरह शादी हो जाए बस.’’

उस ने अपने 2 बेटों में से इसी बेटे को स्कूल भेजा था. वह कालेज तक पढ़ा था और अब घोड़ी पर चढ़ कर बरात निकालने को तैयार था.

मैं ने उस से पूछा, ‘‘भाई, तुम क्यों जिद कर रहे हो घोड़ी पर ही बैठ कर ससुराल जाने की?’’

उस 19 साल के लड़के ने, जिस की हलकीहलकी मूंछें उग आई थीं और जिस ने बड़े चाव से शहर के दर्जी से गुलाबी रंग का सूट सिलवाया था, बड़े भोलेपन से मुझ से ही सवाल पूछा, जिस का जवाब किसी शास्त्र में नहीं है.

उस ने पूछा, ‘‘भाई साहब, मैं क्यों नहीं बैठ सकता घोड़ी पर?’’

इस सवाल पर आज तक सारा समाज बगलें झांक रहा है.

इस सवाल में न कोई राजनीति थी, न किसी को बहकाने की नीयत, न अपने किसी खोए हुए हक को पाने की लड़ाई. यह शहर में पढ़ रहे एक 19 साल के लड़के का सहज सवाल था.

यह सवाल भले ही सहज हो, पर इस का जवाब सहज नहीं है.

मैं ने लड़के से पूछा, ‘‘पर यह बताओ, इस गांव में तुम्हारा बड़ा भाई, पिता या तुम्हारी जाति का बड़े से बड़ा कोई भी आदमी आज तक घोड़ी पर चढ़ कर शादी करने नहीं गया, तो फिर तुम ही क्यों जाना चाहते हो?’’

वह बोला, ‘‘दरअसल, जो लोग मुझे घोड़ी से उतारना चाहते हैं, उन के सारे परिवार के लोग घोड़ी पर चढ़ कर शादी करने जाते हैं. मैं देखना चाहता हूं कि घोड़ी में ऐसा क्या है, जो आदमी को दूसरों से ऊंचा बना देती है.’’

मैं ने कहा, ‘‘घोड़ी में कुछ नहीं है भैया, आजकल वे कार में भी जाते हैं. पहले घोड़ी ताकत और पैसे की निशानी थी, अब कार है. अगर तुम ताकत और पैसे में उन के बराबर हो जाओगे तो वे बरदाश्त करेंगे.’’

लड़का बोला, ‘‘बात पैसे की है, तो भाई साहब जैसे वे किराए की घोड़ी लाते हैं, वैसे ही मैं लाया हूं. अगर बात ताकत की है, तो आज वोट की ताकत हमारे पास भी है. मैं तो घोड़ी पर चढ़ कर ही बरात ले जाऊंगा.’’

लड़का लड़ाई को न्योता दे रहा था. उस के बड़ेबुजुर्ग समझाबुझा कर हार गए कि इस से कुछ नहीं मिलने वाला. तुम एक दिन घोड़ी पर चढ़ कर भी जाओगे तो क्या होगा? कल से तुम्हारे बाप को वहीं चौक पर बैठ कर जूते गांठने हैं.

लड़का बोला, ‘‘जूते गांठने में क्या दिक्कत है, जो मुझे रोकते हैं? वे तो दारू पी कर हल्ला मचाते हैं. उन के लड़के पढ़ेलिखे भी नहीं हैं. मैं उन से क्यों डरूं?’’ समझाने का दौर सुबह से चलता रहा और शाम हो गई.

मैं ने सोचा कि जरा दूसरे पक्ष का भी हाल देख आऊं. उधर माहौल बड़ा ही गरम था. एक दलित लड़के की बरात घोड़ी पर निकलने वाली है, यह बात इतनी गंभीर थी कि मानो बमों से लैस कोई हवाईजहाज उन के घरों पर बमबारी के लिए उड़ान भरने वाला हो.

मैं ने एक से पूछा, ‘‘चढ़ने क्यों नहीं देते उस लड़के को घोड़ी पर? क्या हो जाएगा?’’

वह बोला, ‘‘वाह भाई साहब, वाह, आज घोड़ी पर चढ़ने दें, कल हमारे साथ खाना खिला दें, परसों आप कहिएगा कि उन से रिश्ता भी कर लें…’’

मैं ने कहा, ‘‘पर, इतनी दूर तक जाने की क्या जरूरत है? लड़के की जिद है तो आप लोग ही सम्मान करिए. आप लोगों ने इतने लोगों को घोड़ी पर चढ़ा कर क्या पा लिया?’’

वह बोला, ‘‘आप उस का पक्ष न लें. यह लड़का शहर में चार अक्षर क्या पढ़ लिया है, इस के तो पंख उग आए हैं. पिछले साल हम ने इन को तालाब से पानी भरने की छूट दे कर नतीजा देख लिया. ससुरे उस में हमारे साथ नहाने की मांग करने लगे.’’

मैं ने कहा, ‘‘पर, तालाब तो पंचायत का है, सब का है.’’

उस ने पूछा, ‘‘और पंचायत किस की है भाई साहब?’’

मैं चुप हो गया. वहां लोग तैयार थे, दुनिया इधर से उधर हो जाए, पर यह बरात घोड़ी पर नहीं निकलेगी.

इसी माहौल में रात हुई. बरात सजी, घोड़ी आई और लड़का उस पर बैठ गया. हजारों साल में इस गांव में पहली बार यह ऐतिहासिक घटना हुई. चंद्रमा पर पहुंचने से भी बड़ी घटना थी यह.

बरात चली और जब अपने महल्ले को पार कर दूसरे महल्ले में पहुंची, तो सबकुछ तयशुदा कार्यक्रम से हुआ. 100-150 आदमी आए, उन्होंने दूल्हे को घोड़ी से उतारा, पीटा, उस के बाप को भी पीटा और चले गए.

गांव में पुलिस चौकी भी थी और प्रशासन भी सतर्क था. उस ने चारों ओर घेरा बनाया और बरात को दूल्हे व घोड़ी समेत ससुराल तक पहुंचा दिया.

ऐसा ही होता है, बीसियों बार हो चुका है. पुलिस निश्चिंत हुई, तभी लोग फिर पहुंचे, अब की उन्होंने पत्थरों और लाठियों से हमला किया, पुलिस भाग गई, दूल्हे को फिर उतार दिया गया और वह अपने बापदादा की तरह पैदल शादी करने पहुंचा.

अगले दिन प्रशासन ने दावा किया कि दूल्हा घोड़ी पर ही गया था. अखबारों में छपा कि ऐसा नहीं हुआ था. अखबार शाम तक पुराना हो गया.

एक ऐतिहासिक घटना होतेहोते रह गई. इसी अखबार में एक खबर और थी कि देश के वैज्ञानिकों ने लंबी दूरी तक मार करने वाले एक मिसाइल का कामयाब परीक्षण किया था.

इस पर प्रधानमंत्री ने खुशी जाहिर करते हुए कहा था कि देश अब तरक्कीशुदा देशों की कतार में खड़ा हो गया है.

Patriotic Story : देशभक्ति की “बू”

Patriotic Story : मैं ने नींद में देखा, लोग मुझ को घेर कर खड़े हुए हैं और मैं भयभीत निकल भागने का रास्ता ढूंढ रहा हूं. भीड़ मेरी और कुत्सित भाव से देख रही है, मानो आज मुझे अपने हाथों से दंड देकर अपना कर्तव्य, धर्म भीड़ निभाएगी .मैं सहमा इधर उधर तक रहा हूं.मगर भागने या बचाव का कोई रास्ता नजर नहीं आ रहा है.

जी हां! मुझ पर, आज कल का प्रचलित सबसे गर्मा गर्म  आरोप लगा दिया गया है, मुझे देश द्रोही करार दिया गया है. और भीड़ मेरी और ऐसे देख रही है जैसे मैं उसका जानी दुश्मन हूं और भीड मुझको ठीक करके ही सुख पाएगी.

दरअसल, हुआ यह की मैंने सीधे सरल शब्दों में माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र दामोदरदास मोदी व गृहमंत्री अमित शाह की शैली पर प्रश्नचिन्ह लगा दिए .मैं ने कल्पना नहीं की थी कि मेरे दो शब्द के बोल, मुझे देशद्रोही बना देंगे.मैं ने जैसे ही कहा की हमारे प्रधानमंत्री देश को एक प्रयोगशाला बना चुके हैं और मोदी और शाह मिलकर आर एस एस के एजेंडे पर देश को एक दिन हिंदू राष्ट्र घोषित कर देंगे .उन लोगों ने मेरी तरफ कुछ इस दृष्टि से देखा मानो मैं ने कोई राष्ट्रीय अपराध कर दिया है.

मेरी बातें अभी खत्म ही नहीं हुई की एक आदमी ने कहा- तुम्हारी बातों से हम इत्तेफाक नहीं रखते.

एक दूसरे ने कहा- तुम्हारी बात में देशद्रोह की “बू” आती है.

मैं मुस्कुराया और बोला- भाई ! देश प्रेम की परिभाषा क्या है.

एक व्यक्ति चिल्लाया- तुम्हें इतना भी नहीं मालूम तुम्हें इस देश से चले जाना चाहिए। तुम्हें एक पल भी यहां रहने का अधिकार नहीं है.

मैंने कहा- मगर मैं कहां जाऊं और क्यों जाऊं ? मैं तो यहीं पैदा हुआ हूं,मैं यही मरूंगा.

इस पर एक शख्स चीखा- तो फिर तुम अपने को सीमा के भीतर क्यों नहीं रखते अगर तुम पजामे से बाहर जाओगे तो फिर हम नहीं जानते, तुम देशद्रोही कहलाओगे और हम तुम्हें…

हमारे बीच कहासुनी चलती रही मैं, मेरे तर्क उनके सामने भोथरे सिद्ध हो गए उन्होंने एक स्वर में कहा- तुम अकेले हो और अकेले आदमी की कोई बखत नहीं होती. हम बहुसंख्यक हैं, तुम वही करोगे, जो हम चाहेंगे. अगर ज्यादा होशियारी दिखाई तो तुम्हें पाकिस्तान भेज देंगे.

मैं घबराया, मगर साहस के साथ अपनी बात को एक दफे उनके समक्ष रखने का प्रयास किया.मैं ने भोलेपन  से  कहा- भाई! तुम मुझे पाकिस्तान भेजने की बात कह रहे हो, मगर मैं तो एक विशुद्ध भारतीय हूं मैं भला क्यों कहीं जाऊं.

वे ठठाकर हंसने लगे- देखो ! संसार मे सबसे ताकतवर शै है भीड़ ! अगर भीड़ ने कुछ ठान लिया तो फिर न तुम जैसे बुद्धिजीवी की चलती है, न ही सरकार की चलती है. भीड सब को साफ करके, आगे बढ़ जाती है.भीड़ के लिए कानून कोई मायने नहीं रखता. हम स्वयं अपना कानून है.

मैं गंभीर हो गया .एक आदमी ने मेरे सर पर हाथ रख स्नेह पूर्ण  शब्दों में कहा- देखो ! अभी भी सुधर जाओ, नहीं तो पाकिस्तान जाने से तुम्हें कोई रोक नहीं सकेगा… नहीं जाओगे तो तुम्हें यहीं मार-मार कर दुरुस्त कर दिया जाएगा .

मैं बोला- तो… तो मैं क्या करूं.

एक व्यक्ति ने कहा- कुछ नही बस हां में हां मिलाते रहो. मन को कस लो.चार आदमी जो कहें, उसे सुनो और प्रत्ति उत्तर मत दो .सवाल जवाब मत करो. अगर भीड़ के स्वर के खिलाफ जाओगे तो तुम्हें देश की पुलिस कानून और भगवान भी नहीं बचा सकता .

– मगर मैं क्यों गलत बात स्वीकार करूंगा. मैं तो रामधारी सिंह दिनकर का मुरीद हूं जिन्होंने कहा था ” जो तटस्थ रहेगा समय लिखेगा उसका भी अपराध ” तो मैं मर जाऊंगा मगर चुप नहीं रहूंगा.

मैं चुप हुआ तो भीड़ ने मेरी ओर घृणा से देखा और चिल्लाई यह बहुत बड़ा देशद्रोही है रे ! बहुत बड़ा.यह हमारी ताकत नहीं जानता या फिर यह सिरफिरा है इसको ठीक कर दो.जब भीड़ मेरी ओर मुट्ठी तान कर आगे बढ़ी तो मैं कांप गया.

मैं इधर-उधर देखने लगा की कैसे भीड़ के हाथों अपनी जान बचाऊं . मन ही मन सोचने लगा- प्रभु ! बचाओ! काश यह स्वपन हो… मैं सवा रुपए का प्रसाद चढ़ाऊगा प्रभु ! मैं यह कहते- कहते पसीने से लथपथ हो चला था भीड़ दांत किटकिटाते मुट्ठी भींचे मेरी ओर बढ़ रही थी.

Hindi Story: एक इंच मुसकान-दीपिका-सलोनी की कशमश

Hindi Story: ‘‘अरे, कहां भागी जा रही हो?’’ दीपिका को तेजतेज कदमों से जाते हुए देख पड़ोस में रहने वाली उस की सहेली सलोनी उसे आवाज लगाते हुए बोली.

‘‘मरने जा रही हूं,’’ दीपिका ने बड़बड़ाते हुए जवाब दिया.

‘‘अरे वाह, मरने और इतना सजधन कर. चल अच्छा है, आज यमदूतों का भी दिन अच्छा गुजरेगा,’’ सलोनी चुटकी लेते हुए बोली.

‘‘मैं परेशान हूं और तुझे मजाक सूझ रहा है,’’ दीपिका सलोनी को घूरते हुए बोली, ‘‘अभी मैं औफिस के लिए लेट हो रही हूं, तुझ से शाम को निबटूंगी.’’

‘‘अरे हुस्नेआरा, इस बेचारी को भी आज करोलबाग की ओर जाना है, यदि महारानी को कोई एतराज न हो तो यह नाचीज उन के साथ चलना चाहती है,’’ सलोनी ने दीनहीन होने की ऐक्टिंग करते हुए मासूमियत से जवाब दिया.

‘‘चल, बड़ी आई औपचारिकता निभाने वाली,’’ सलोनी की पीठ पर हलका सा धौल जमाते हुए दीपिका बोली, ‘‘एक तू ही तो है, जो मेरा दुखदर्द समझती है.’’

बातोंबातों में दोनों पड़ोसन सहेलियां बसस्टैंड पहुंच गईं. कुछ ही देर में करोल बाग वाली बस आ गई.

एक तो औफिस टाइम, ऊपर से सुरसा के मुंह की तरह बढ़ती हुई दिल्ली की आबादी. जिधर देखो भीड़ ही भीड़. खैर, धक्कामुक्की के बीच दोनों सहेलियां बस में सवार हो गईं. यह अच्छा था कि 2 सीटों वाली एक लेडीज बर्थ खाली थी.

‘‘कुछ तो अच्छा हुआ,’’ कहते हुए दीपिका सलोनी का हाथ पकड़ कर झट से उस खाली बर्थ पर कर बैठ गई.

सलोनी ने पूछा, ‘‘अरे, ऐसा क्यों बोल रही है? चल, अब साफसाफ बता कि क्या हुआ…? और यह चांद सा चेहरा आज सूजा हुआ क्यों है?’’

दीपिका बोली, ‘‘अरे, क्या बताऊं? घर में किसी को मेरी बिलकुल भी परवाह नहीं है. मैं सिर्फ पैसा कमाने की मशीन और सब की सेवा करने वाली नौकरानी हूं.’’

‘‘अरे, इतना गुस्सा… क्यों, क्या हो गया?’’ सलोनी उसे प्यार से अपने से चिपकाते हुए बोली.

‘‘आज सुबह मैं थोड़ी ज्यादा देर तक क्या सो गई, घर का पूरा माहौल ही बिगड़ गया. देर हो जाने के चलते भागमभाग में मैं इन के लिए कपड़े निकालना भूल गई, तो महाशय तौलिया लपेटे ही तब तक बैठे रहे, जब तक कि मैं बाथरूम से निकल नहीं आई.

‘‘इस भागदौड़ के बीच इतना मुश्किल से जो नाश्ता बनाया, उसे भी बिना किए यह कहते हुए औफिस चले गए कि आज शर्टपैंट न होने के चलते तैयार होने में देरी हो गई.

‘‘इधर साहबजादे तरुण को आलूगोभी की सब्जी नाश्ते में दी, तो वे जनाब मुंह फुला कर बैठ गए कि रोजरोज एक ही तरह की सब्जी खातेखाते बोर हो गया हूं, मशरूम क्यों नहीं बनाई?

‘‘उधर, बिटिया रानी की रोज यही शिकायत रहती है कि आप रोज एक ही तरह की बहनजी स्टाइल की चोटी करती हो. मेरी फ्रैंड्स की मम्मियां रोज नएनए स्टाइल में उन के हेयर डिजाइन करती हैं.

‘‘बस, सब को अपनीअपनी पड़ी रहती है. कोई यह नहीं पूछता कि मैं ने नाश्ता किया या नहीं? टिफिन में क्या ले जा रही हूं? मेरी डै्रस कैसी है? कहीं मुझे लेट तो नहीं हो रहा है? सब को बस अपनीअपनी चिंता है,’’ कहतेकहते दीपिका की आंखों में आंसू भर गए.

‘‘अरे, परेशान मत हो मेरी ब्यूटी क्वीन, अव्वल तो तू खुद इतनी खूबसूरत है कि कुछ भी पहन ले तो भी हीरोइन ही लगेगी और घर के जो सारे लोग तुझ से फरमाइशें करते हैं, उस की वजह उन का तुझ से लगाव है. वे तुझ पर भरोसा करते है,’’ सलोनी प्यार से समझाते हुए बोली.

‘‘बसबस रहने दो. मैं सब समझती हूं. यह सब कहने की बात है. यहां मेरी जान भी जा रही होगी न, तो किसी न किसी को जरूर मुझ से कोई काम पड़ा होगा,’’ दीपिका का उबाल कम होने का नाम नहीं ले रहा था.

इसी बीच अगले स्टौप पर बस के रुकते ही उस के औफिस में डेली वेज पर काम करने वाली चपरासी कांति किसी तरह जगह बनाते हुए भी उस में दाखिल हो गई. लेडीज सीट की ओर पहुंच कर बस के हैंगिंग हुक को पकड़ कर वह खड़ी हो गई.

अभी वह आंचल से अपना पसीना पोंछ रही थी कि दीपिका ने पूछा, ‘‘अरे कांति, कैसी हो?’’

दीपिका की आवाज सुन कर कांति चौंक कर उस की ओर मुड़ते हुए बोली, ‘‘अरे मैडम, आप भी इसी बस में… नमस्ते,’’ दीपिका को देख कर उस के चेहरे पर हमेशा छाई रहने वाली मुसकान कुछ और खिल आई थी.

दीपिका बोली, ‘‘नमस्ते. तुम तो रोज 9 बजे दफ्तर पहुंच जाती हो, पर आज लेट कैसे?’’

कांति ने कहा, ‘‘दरअसल मैडम, आज से बेटे की 10वीं की बोर्ड परीक्षा शुरू हुई है. वह जिद कर रहा था कि सब के मम्मीपापा उन्हें छोड़ने एग्जाम सैंटर पर आएंगे, तो आप भी मेरे साथ चलिए. वह इतने लाड़ से बोल रहा था कि मैं उसे मना नहीं कर पाई. उसे पहुंचाने चली गई, इसलिए थोड़ी देर हो गई… सौरी.’’

दीपिका बोली, ‘‘अरे, कोई बात नहीं. मैं तो बस ऐसे ही पूछ रही थी. लेकिन एक बात बताओ, तुम्हारे पति भी तो बेटे के साथ जा सकते थे न?’’

अभी कांति कोई जवाब दे पाती कि दीपिका सलोनी की ओर मुड़ते हुए बोली, ‘‘देखो, हर घर की यही कहानी है. औरत घर का भी काम करे और बाहर भी मरे और पति एक भी काम ऐक्स्ट्रा नहीं कर सकते, क्योंकि वे मर्द हैं.’’

‘‘नहीं मैडम, ऐसी बात नहीं है,’’ अभी कांति आगे कुछ और बोल पाती कि दीपिका ने कहा, ‘‘अब पति की तरफदारी करना छोड़ो. पति को हमेशा परमेश्वर मानने और उन की ज्यादतियों पर परदा डालने का ही यह नतीजा है कि उन की मनमानी बढ़ती जा रही है,’’ वह बिफरने सी लगी थी.

‘‘नहीं मैडम, मैं उन्हें बचा नहीं रही हूं. दरअसल, पिछले साल आटोरिकशा चलाते समय उन का बुरी तरह से एक्सीडैंट हो गया था, जिस में उन का दाहिना हिस्सा बुरी तरह खराब हो गया था, इसलिए बाहर के काम में उन्हें बहुत ही दिक्कत होती है. पर, वे घरेलू काम में मेरी पूरी मदद करते हैं और मुझे अपने परिवार के लिए कुछ भी करना बहुत अच्छा लगता है.’’

कांति की बात से हैरान दीपिका एकदम सन्नाटे में आ गई. दिव्यांग और बेरोजगार पति, छोटी सी तनख्वाह में पूरे परिवार का गुजारा करने वाली कांति क्या उस से कम चुनौतियों का सामना कर रही है, लेकिन एक इंच की मुसकान लिए घर और बाहर दोनों जगह का काम कितनी हंसीखुशी से संभाल रही है.

इधर कांति बोले जा रही थी, ‘‘मैडम, बच्चे और पति जब अपनी इच्छा और परेशानी मेरे सामने रखते हैं, तो मुझे लगता है कि मैं इस घर की धुरी हूं. उन का मुझ से कुछ उम्मीद रखना मुझे मेरे होने का अहसास कराता रहता है.’’

कांति की सहज बातों ने अनजाने में ही दीपिका के अंदर धधक रही गुस्से की आग को मीठी फुहार से बुझा दिया. सच में कांति ने कितनी आसानी से उसे समझा दिया था कि पति और बच्चों की फरमाइशें और उन का उस पर निर्भर होना उसे परेशान करना नहीं, बल्कि उस से जुड़े रहने की निशानी है.

एक पल के लिए दीपिका ने कल्पना कर यह देखा कि पति और बच्चे अपनाअपना काम करने में बिजी हैं. कोई अपनी डिमांड पूरी करने के लिए न तो उस की चिरौरी कर रहा है और न ही कोई तुनक कर मुंह फुलाए बैठा है.

अभी कुछ पल पहले तक इन्हीं फरमाइशों से बुरी तरह खीझी हुई दीपिका का दिल इस कल्पना से ही घबरा उठा था. वह खुद से दृढ़तापूर्वक बोली, ‘‘चलो, आज से ही एक नई शुरुआत करते हैं.’’

पछतावे की बूंदें गुस्से और खीझ से उपजे उस की आंखों के सूखेपन को तर कर रही थीं. तभी उस के मोबाइल फोन की रिंगटोन बजी. देखा तो पति अश्विनी की काल थी. उस के ‘हैलो’ कहते ही वे बोले, ‘दीपू, आज सुबह सोते समय तुम बिलकुल इंद्रलोक की परी लग रही थीं. तुम्हें नींद से जगा कर मैं यह मौका खोना नहीं चाहता था.’

अश्विनी की बातें सुन कर इस भीड़ भरी बस में भी दीपिका के गाल शर्म से गुलाबी हो उठे. वह धीरे से बोली, ‘‘बसबस, ठीक है. शाम को समय से घर आ जाना. आज मैं आप के पसंद के केले के कोफ्ते और लच्छा परांठा बनाऊंगी और तरुण के लिए मशरूम… बाय.’’

अश्विनी ने कहा, ‘बाय स्वीटहार्ट.’

फोन रखते ही उस ने सलोनी के साथ मिल कर 2 सीट वाली बर्थ पर थोड़ी सी जगह बनाई और कांति का हाथ पकड़ कर उसे सीट पर बैठाते हुए बोली, ‘‘आओ, कांति बैठो, तुम भी खड़ेखड़े काफी थक गई होगी. हम सब साथसाथ चलेंगे.’’

कांति पहले थोड़ा सा हिचकी, लेकिन दीपिका के न्योते से उस का संकोच चला गया.

कांति बोली, ‘‘थैक्स दीदी. आप का परिवार बहुत भाग्यशाली है.’’

दीपिका ने कहा, ‘‘धन्यवाद. पर भला वह क्यों?’’

कांति ने कहा, ‘‘जब आप बाहरी लोगों का ही इतना ध्यान रखती हैं, तो आप के घर वालों को तो किसी बात की चिंता करने की कोई जरूरत ही नहीं पड़ती होगी.’’

कांति की हथेली को धीमे से दबा कर उसे मौन धन्यवाद देते हुए दीपिका बोली, ‘‘थैक्स, कांति. मेरे संसार में मुझे अपने इस वजूद का अहसास कराने के लिए.’’

दीपिका के चेहरे पर भी अब कांति की तरह एक इंच की सच्ची वाली मुसकान खिल आई थी. उसे मुसकराते हुए देख कर सलोनी बोली, ‘‘तुम अब लग रही हो न सच्ची ब्यूटी क्वीन.’’

दुनिया से बेखबर बस की इस लेडीज बर्थ पर एकसाथ 3 मुसकान खिल आईं. इधर अच्छी और चिकनी सड़क पा कर बस की रफ्तार भी तेज हो गई थी. Hindi Story

Hindi Story: राजकुमारी- क्या पूरी हो सकी उसकी प्रेम कहानी

Hindi Story: उस का नाम ही राजकुमारी था. वैसे तो वह कहीं की राजकुमारी नहीं थी, लेकिन वह सचमुच राजकुमारी लगती थी. उस की खूबसूरती, रखरखाव, बातचीत करने का अंदाज और उस की शाही चाल उसे वाकई राजकुमारी बनाए हुए थे, जबकि वह एक मामूली घर की लड़की थी. जब उस ने पहले दिन दफ्तर में कदम रखा, तो न केवल कुंआरों के, बल्कि शादीशुदा लोगों के दिलों की धड़कनें भी तेज हो गई थीं. ‘चांदी जैसा रूप है तेरा सोने जैसे बाल, एक तू ही धनवान है गोरी बाकी सब कंगाल’, जैसी गजल उन के सामने आ गई थी. सपनों की हसीन शहजादी उन के सामने थी.

दफ्तर की दूसरी लड़कियों और औरतों ने भी जलन और तारीफ भरी नजरों से देखा था उसे. वह सब से अलग नजर आ रही थी. उस पर जवानी ही कुछ ऐसी टूट कर बरस रही थी कि दफ्तर में सभी चौंक पड़े थे. लंबा कद, घने बाल, भरी छातियां, पतली कमर और चाल में कोमलता. लेकिन वह वहां नौकरी करने आई थी, इश्क करने नहीं. उसे औरों से ज्यादा अपने काम से लगाव था. उस ने किसी की तरफ नजर भर कर मुसकरा कर भी नहीं देखा. उस के चेहरे पर खामोशी छाई रहती थी और आंखों में चिंता तैरती रहती थी. ऐसा लगता था कि वह बहुत सी परेशानियों से एकसाथ लड़ रही है. वह एक मामूली साड़ी बांधे हुए थी, लेकिन दूसरी औरतों और लड़कियों के मुकाबले उस की वह मामूली साड़ी भी खूब जंच रही थी उस पर. कई दिन बीत गए. वह सिर्फ अपने काम से काम रखती.

यदि वह किसी की माशूका न होती तो किसी न किसी को अपना दिल दे बैठती. खूबसूरत नौजवानों की इस दफ्तर में भी कमी नहीं थी. आमतौर पर उस तरह की खूबसूरत लड़कियां सहयोगियों पर दाना फेंक कर अपना काम निकालती हैं, पर राजकुमारी उन में से न थी. यह ऐसा सैंटर था, जिस में छोटीछोटी सैकड़ों मेजें लगी थीं. इस कंपनी का मालिक था निर्मल कुमार. अच्छीखासी दौलत होने के बावजूद उस ने अभी तक शादी नहीं की थी. अपनी पसंद की लड़की उसे अभी तक नहीं मिली थी. वह रोशन खयाल और गहरी सोच रखने वाला इनसान था. उस की उम्र 32 साल की थी. वह लंदन से पढ़ कर लौटा था.  उस ने आज तक वहां काम कर रही किसी लड़की की ओर ध्यान नहीं दिया था.

तकरीबन 4 साल से बड़ी सूझबूझ और लगन से वह कंपनी को चला रहा था. उस की कई दोस्त थीं, पर वह किसी से भी प्रेम नहीं करता था, क्योंकि उस की सब दोस्त लड़कियां खुले विचारों की थीं और कितनों के साथ रह चुकी थीं. निर्मल कुमार खुद भी कभी किसी के साथ नहीं सोया था उसे ऐसी लड़की चाहिए थी, जो कहीं भी मुंह मार ले. निर्मल कुमार ने जब पहली बार राजकुमारी को देखा था, तो उस का दिल भी धड़का था. आखिर वह उस के हुस्न की खुशबू से कैसे बच सकता था? वह लाखों में एक थी. निर्मल कुमार पहले मर्द था, मालिक बाद में. राजकुमारी जब भी किसी काम से निर्मल कुमार के सामने जाती, तो वह दो नजर भर देखे बगैर नहीं रह सकता था. इस से पहले भी उस की मुलाकात कई खूबसूरत पढ़ीलिखी ऊंचे घराने वालियों से होती रही थी. लंदन और मुंबई में भी वह कई हसीन लड़कियों से मिल चुका था, लेकिन उस ने उन में से किसी एक के लिए भी अपने दिल में तड़प महसूस नहीं की थी. उसे लगा कि राजकुमारी उतनी ही साफ थी जितना दिखती थी.

उस ने कभी काम के अलावा कुछ बात करने की कोशिश नहीं की, जबकि उस के स्टार्टअप में हर लड़की हर दूसरेतीसरे हफ्ते कोई पर्सनल प्रौब्लम लिए खड़ी होती थी. राजकुमारी में उस ने जैसे कोई खास बात महसूस की थी. वह दिन में 2-3 बार उसे जरूर बुलाता. राजकुमारी की मौजूदगी उसे तड़पाने लगती थी. जब वह कमरे से चली जाती तो उस की पीड़ा और बढ़ जाती. वह अपनी मेज  पर सिर टेक देता और आंखें बंद हो जातीं. फिर वह सोचता कि यह उसे क्या  होता जा रहा है, वह क्यों दीवानगी के खयाल पालने लगा है? इसी तरह कई हफ्ते बीत गए. राजकुमारी को भी अब महसूस होने लगा था कि निर्मल कुमार उस में दिलचस्पी लेने लगा है. लेकिन वह जल्दी ही दिमाग से यह बात निकाल देती. वह अपने और निर्मल कुमार के बीच के फासले को जानती थी.

वह 12,000 रुपए पाने वाली मामूली नौकर थी और निर्मल कुमार करोड़ों का मालिक था. उस के दिल में निर्मल कुमार को पाने या अपनाने की कोई ख्वाहिश नहीं थी, क्योंकि उस का राजकुमार तो राजेश था, जो उस के दिल का मालिक था. उस का और राजेश का साथ उसी समय से था, जब वह 10वीं में पढ़ती थी. लगभग 10 साल पहले की सी ताजगी थी. फिलहाल दोनों ही अपनीअपनी जिंदगी की परेशानियों में उलझे हुए थे. इसी कारण वे अपने सपनों की दुनिया को आबाद नहीं कर सके थे. राजेश भी बहुत सुंदर और गठीला नौजवान था. वह जहां काम करता था, वहां उस की बड़ी इज्जत थी. फैक्टरी का मालिक भी उस पर बहुत मेहरबान था. राजकुमारी और राजेश रोजाना शाम को किसी छोटे से ढाबे या पार्क में मिलते थे. वे देर तक बातें करते रहते थे. हर रोज एक ही परेशानी उन के सामने होती थी.

वे दोनों बातें कर के दिल की भड़ास निकाल लेते थे और अपने दुखों को जैसे बांट लेते थे.  ऐसा करने से उन को बड़ी शांति मिलती थी. कभीकभार जब मौका मिलता, तो दोनों एकदूसरे के साथ रातभर रहते, पर दोनों ने वादा कर रखा था कि वे पक्का शादी करेंगे. दोनों एक ही जाति के थे और घर वाले मंजूर कर लेंगे. यह भी उन्हें मालूम था. निर्मल कुमार ने एक रोज अपने दफ्तर के साथी लोगों को रात के खाने की दावत दी. नवंबर का महीना था. सर्दी शुरू हो चुकी थी. राजकुमारी पार्टी में आई, तो बादामी रंग की साड़ी पहने हुए थी. उस पर चौकलेटी रंग का शाल देखने वालों को बड़ी भली मालूम हो रही थी.  उस के अंगअंग से जवानी उबल रही थी. जब वह हंसती थी तो देखने वालों का कलेजा मुंह को आ जाता था.

चारों ओर एक आह सी निकलती महसूस होती थी. पार्टी में जितने भी लोग थे, सभी उसी को घूर रहे थे. दावत खत्म होने के बाद निर्मल कुमार जब अपने कमरे में पहुंचा तो खुद को बहुत थकाथका सा महसूस करने लगा. उसे बिस्तर पर पड़ेपड़े बहुत देर हो गई. करवटें बदलतेबदलते रात के 3 बज गए. रहरह कर उसे राजकुमारी का मासूम चेहरा दिखाई देता. आज उसे अपने अंदर अधूरेपन का एहसास हो रहा था. बहुतकुछ होते हुए भी वह अपनेआप को बहुत गरीब समझ रहा था. उस की यह गरीबी एक औरत ही दूर कर सकती थी. और वह मालदार औरत थी राजकुमारी.

उस के दिल में कहीं से एक सदमे की लहर आई, जिस ने उसे अपने लपेटे में ले लिया. उसे ऐसा लगा जैसे वह इस दुनिया में अकेला है. उसे कोई चाहने वाला नहीं, प्यार करने वाला नहीं, उस की जवानी को अपनी बांहों में भरने वाला कोई नहीं है. निर्मल कुमार अपनेआप को एक बड़े कैदखाने में बंद पा रहा था, जिस से बाहर निकलने का एक ही रास्ता था, लेकिन वह भी बंद था. फिर उसे अपनेआप में शोर सुनाई देने लगा. पहली बार यह शोर गूंजा था. कितनी ही देर वह इस शोर को सुनता रहा.

क्या राजकुमारी को वह अपना जीवनसाथी बना सकता है? वह सोच रहा था, ‘वह इनकार तो नहीं कर देगी? वह किसी और से तो प्यार नहीं करती? अगर वह किसी से मुहब्बत करती है तो क्या हुआ, मेरे पास तुरुप के पत्ते हैं. मैं अपना सबकुछ उस हुस्न की मलिका के कदमों में डाल दूंगा.’  सोचतेसोचते वह बिस्तर पर लेट गया. अब वह बहुत खुश था. जैसे उस ने राज को पा लिया हो.  अगले दिन उस ने राजकुमारी का शाम को अपनी गाड़ी में पीछा किया. वह रिकशे में 10 लोगों के साथ जहां उतरी, वह कच्चेपक्के मकानों की बस्ती थी. दूसरे दिन पार्क की बैंच पर बैठते हुए राजेश ने कहा, ‘‘कल कहां थी राज? तुम घर पर भी नहीं थी.’’ ‘‘हां, मैं परसों तुम को बताना भूल गई थी… हमारे मालिक ने दफ्तर के तमाम लोगों को खाने पर बुलाया था,’’ राजकुमारी ने राजेश की ओर देखते  हुए कहा. ‘‘अरे भई, निर्मल सेठ?है, जवान है. उस की पार्टी हो तो हमारी गुंजाइश कहां, हम ठहरे गरीब आदमी…’’ सुन कर राजकुमारी ने फौरन कहा, ‘‘यह बात तो है… निर्मल बहुत अमीर है, लेकिन उस में जरा सा भी घमंड नहीं है.’’

राजेश ने मुसकराते हुए कहा, ‘‘फिर मैं ऐसा समझूं कि मेरी 3,650 दिनों की तपस्या बेकार गई, कहीं तुम्हारा इरादा…’’ ‘‘नहीं…’’ राजकुमारी बोली, ‘‘सब से पहली बात तो यह है कि कहां निर्मल कुमार और कहां मैं. मेरा उस के बारे में सोचना ही बेकार है.’’ ‘‘तुम कितनी मालदार हो, तुम्हें नहीं मालूम…’’ राजेश बोला, ‘‘बस एक बात है, 100 साल पहले मुझे तुम से प्यार था, आज भी है और कल भी रहेगा…’’ राजकुमारी ने खड़े होते हुए कहा, ‘‘मालूम है बाबा, अब उठो.’’ अगले दिन जब निर्मल कुमार के कमरे में राजकुमारी आई, तो वह अपनी कुरसी से खड़ा हो गया और बोला, ‘‘आओ राजकुमारी, मैं तुम्हें बुलाने ही वाला था.’’  वह उसे कुरसी की ओर इशारा करते हुए आगे बोला, ‘‘बैठोबैठो.’’ निर्मल कुमार के इस तरह बोलने पर वह जरा हैरान हुई और ‘जी’ कहती हुई बैठ गई. ‘‘कहो, तुम्हें हमारी पार्टी कैसी लगी?’’

निर्मल कुमार की आंखों में एक खास चमक देखते हुए राजकुमारी ने कहा, ‘‘पार्टी बहुत शानदार रही.’’  वह सोच रही थी कि राजेश उस के दिल में बसा हुआ है तो क्या हुआ, खूबसूरत मर्द तो अपने अंदर चुंबक का असर रखते हैं. वह निर्मल कुमार को गौर से देखने लगी. फिर आंखें झुका कर वह बोली, ‘‘जी कहिए, क्या हुक्म है?’’ ‘‘हुक्म नहीं, गुजारिश है… वह यह है कि आज शाम मैं तुम से एक खास बात करना चाहता हूं. तुम कल साढ़े  7 बजे होटल डिलाइट में मुझ से मिलना. अब तुम जा सकती हो. लेकिन ध्यान रहे, मुलाकात का किसी को पता न चले, समझीं?’’ राजकुमारी ‘ठीक है’ कहते हुए कमरे से बाहर चली गई. उस के दिमाग में कितने ही सवाल उठ खड़े हुए. उसे महसूस हो गया था कि निर्मल कुमार उस पर डोरे डाल रहा है.  उस पार्टी की रात की पार्टी में भी वह उस की निगाहों के इशारे को पढ़ चुकी थी. और उसे वह यकीन भी हो गया कि उस का मालिक ऐयाश नहीं है.

वह अपनी जवानी की आग नहीं बुझाना चाहता, वह जीवनसाथी चाहता है. फिर एक और डर भी उसे परेशान कर रहा था कि अमीर मर्द एक गरीब लड़की को अपनी बीवी कैसे बना सकता है?  शाम को वह राजेश से मिली, तो कुछ खिंचीखिंची सी थी. राजेश ने उस का मन रखने को कहा ‘‘चलो, तुम्हारे कमरे में चलते हैं. वहां बैठ कर बात करेंगे.’’ उधर निर्मल कुमार बेचैन था, पर अगले दिन का इंतजार नहीं करना चाहता था. वह उसी बस्ती तक चला गया और राजकुमारी के कमरे के सामने भी चाय की दुकान में बैठ कर राजकुमारी के दर्शन का इंतजार करने लगा. उस ने उन 2-3 घंटों में बहुतकुछ देख लिया, पर उस का राजकुमारी ने प्रति लगाव कम नहीं हुआ था.

जब अगले दिन दोनों शाम को मिले, तो राजकुमारी ने सिर उठाया और उस से कोई बात नहीं छिपाई. लेकिन जानबूझ कर राजेश के बारे में कुछ नहीं बताया. बाकी सबकुछ सचमुच बता दिया कि मातापिता हैं, 2 बहनें हैं, मकान गिरवी रखा है, दोनों बहनों की शादी बड़ी उलझन बनी हुई है, क्योंकि शादी करने के लिए रकम नहीं है, और हजारों रुपए का कर्ज भी चढ़ा हुआ है, जिसे अपनी पगार से बचा कर वह उतारने की कोशिश कर रही है. उस की कहानी सुन कर निर्मल कुमार वैसे तो दिल ही दिल में बहुत खुश हुआ. पर अब उसे राजेश के बारे में पता करना था. इस हुस्न की मलिका को खरीदने के लिए वह ज्यादा जरूरी था. उस ने बड़ी आसानी से राजेश के बारे में पता कर लिया था. फिर भी उसे भरोसा था कि राजकुमारी और राजेश की सिर्फ दोस्ती है और वह उस की अच्छी साथी बन सकती है, चाहे गरीब घर की क्यों न हो.

बहनों की बात को ले कर उस ने राजकुमारी से पूछा, ‘‘सीधी सी बात है कि बहनों की शादी के बाद तुम शादी करोगी. करोगी न…?’’ राजकुमारी ने एक मीठी सी मुसकान के साथ कहा, ‘‘जी हां.’’ ‘‘यह तो तुम देख रही हो कि मैं ने अब तक शादी नहीं की. तुम्हें देखने के बाद शादी करना चाहता हूं. मुझे एक ऐसी ही पत्नी की तलाश थी.’’ ‘‘मुझ से…? मैं तो…’’ राजकुमारी का गला सूख गया. निर्मल कुमार ने मुसकराते हुए आगे कहा, ‘‘जब तुम मेरी बीवी बन जाओगी, तो जोकुछ मेरा है, वह तुम्हारा होगा. एक शानदार जिंदगी तुम्हारे सामने है. तुम्हारे लिए कोई परेशानी बाकी नहीं रहेगी.

मकान छुड़ा लेना, बहनों की शादी पर जितना चाहे खर्च करना, मुझे कोई एतराज नहीं होगा.’’ राजकुमारी ने फौरन हामी नहीं भरी और इनकार भी नहीं किया. निर्मल कुमार ने उसे देखते हुए कहा, ‘‘इस बात का जवाब आराम से देना…’’ ‘‘हांहां, सोच लो, आराम से सोचो और तब मुझे बताओ. वैसे, मेरा यकीन है कि मेरी बात को तुम ठुकराओगी नहीं, मंजूर कर लोगी. अच्छा, चलो तुम्हें छोड़ते चलते हैं.’’ घर आ कर राजकुमारी रातभर सो नहीं सकी. वह बारबार बिस्तर से उठती और पानी पीती… इसी तरह सवेरे के  6 बज गए.  एक तरफ राजेश था, जिस से वह बेहद प्यार करती थी. वह रातोंरात चाहे राजेश के साथ रही हो, पर उस ने कभी भी जिस्मानी संबंध नहीं बनाए थे.

वह निर्मल कुमार से कम उम्र का भी था और सुंदर भी. वह उसे बहुत चाहती थी.  पर राजेश के साथ भी लगभग यही परेशानियां थीं. इन दोनों ने शादी इसीलिए नहीं की थी कि इस से घर वालों पर असर पड़ता था.  दूसरी ओर निर्मल कुमार एक करोड़पति था. उस की सारी उलझनें चुटकी बजाते ही हल हो सकती थीं. दूसरे दिन वह दिनभर इन्हीं खयालों में गुम रही. वह दफ्तर भी नहीं गई.  2-3 रोज बाद जब राजेश से मिली, तो उसे सारी बातें बता दीं.  राजेश उन दिनों काफी बिजी रहने लगा था. वह कहता था कि शादी के लिए पैसा जमा करने के लिए उस ने  2 पार्टटाइम नौकरियां पकड़ी हैं. राजेश ने पूछा, ‘‘फिर, तुम ने क्या फैसला किया?’’ राजकुमारी ने जमीन की ओर नजरें करते हुए कहा, ‘‘मैं सोच रही हूं, अपने परिवार के लिए यह कुरबानी दे ही दूं… तुम्हें कोई एतराज तो नहीं होगा?’’ सुनते ही राजेश का चेहरा पीला पड़ गया. लेकिन जल्दी ही उस ने अपनेआप पर काबू पा लिया.

राजकुमारी किसी मुजरिम की तरह नजरें नीचे किए बैठी थी, इसलिए वह राजेश का चेहरा नहीं देख पाई थी. राजेश ने धीरे से कहा, ‘‘मुझे भला क्या इनकार हो सकता है? इस ‘सच’ को मान लेना चाहिए तुम्हें.’’ राजकुमारी बोली, ‘‘लेकिन, मैं ने फैसला कर लिया है, जो मैं तुम्हें 2-3 रोज में बताऊंगी. प्लीज, उस दौरान मुझ से कुछ पूछना नहीं.’’ ‘‘छोड़ो इन बातों को,’’ राजेश हंसते हुए बोला, ‘‘तुम निर्मल कुमार की बात मान लो. मेरा क्या, मां कहीं से गांव की लड़की पकड़ कर ब्याह कर देगी.’’ दोनों जब उठे तो राजकुमारी एक फैसले पर पहुंच चुकी थी. राजकुमारी निर्मल कुमार की होने को तैयार हो गई थी और दोनों अपनीअपनी मंजिल की ओर चल पड़े. उस रात वह बहुत खुश थी. फिर भी करवटें बदलती रही. दूसरे दिन भी वह दफ्तर नहीं गई. उसे बुखार हो गया. इसी तरह 4 दिन बीत गए. छठे दिन जब वह दफ्तर जा रही थी, तो उस के दिमाग में हलचल मच गई.

उसे आज निर्मल कुमार को अपना फैसला सुनाना था.  निर्मल कुमार को लगा कि वह राजेश के लिए कहीं चली न गई हो. उस के घर पर जा कर देखा, तो राजकुमारी का कमरा खुला दिखा.  एक घंटे तक न कोई आया और न कोई गया तो वह चुपचाप घर चला गया. राजकुमारी किसी भी कीमत पर राजेश को खोना नहीं चाहती थी. उस की मुहब्बत के आगे निर्मल कुमार की दौलत कुछ भी नहीं थी. उस के दिल की धड़कन तेज हो गई और राजेश की मुहब्बत रंग लाने लगी.  उस ने जब दफ्तर में प्रवेश किया, तो पता चला कि निर्मल साहब आ चुके हैं. वह उन के कमरे में गई और थोड़ी मुसकान के बाद बोली, ‘‘सर, आप बहुत महान हैं कि आप ने मुझे अपनाने का फैसला किया था. पर, मैं अपना दिल तो राजेश को दे चुकी हूं. मैं आप से शादी नहीं कर सकती. यह मेरा इस्तीफा है. मैं राजेश से शादी करूंगी.’’ निर्मल कुमार बोला, ‘‘तुम उस राजेश से बात कर रही हो न, जो इंपैक्ट इंडस्ट्री में काम करता है. उस के मालिक ने अपनी सांवली लड़की के लिए राजेश को तैयार कर लिया था. पर, मैं ने उन्हें बता दिया है कि राजेश और तुम कितनी ही रातें एक कमरे में गुजार चुके हो.

उन के पास तुम्हारे घर के वीडियो पहुंच चुके हैं. उन्होंने आज ही राजेश को धक्के दे कर नौकरी से निकल दिया है.  ‘‘राजेश तुम्हें धोखा देता रहा है. तुम जैसी लड़की से मैं भी अब शादी करने से इनकार करता हूं. इंपैक्ट इंडस्ट्री के मालिक ने राजेश को मेरे भेजे वीडियो के आधार पर उस के खिलाफ मुकदमा भी कर दिया है. वह अब जेल में है. जाओ, जेल में मिल आओ.’’ राजकुमारी उस से आगे एक लफ्ज भी नहीं सुन सकी. उस के हाथ से कागज छूट कर गिर पड़े. राजकुमारी की दुनिया उजड़ चुकी थी. न निर्मल साथ रहा, न राजेश. Hindi Story

Hindi Story: तुम टूट न जाना-बचपन की दोस्त से ले कर दिल की रानी तक कौन थी वाणी

Hindi Story: ‘हैलो… हैलो… प्रेम, मुझे तुम्हें कुछ बताना है.’

‘‘क्या हुआ वाणी? इतनी घबराई हुई क्यों हो?’’ फोन में वाणी की घबराई हुई आवाज सुन कर प्रेम भी परेशान हो गया.

‘प्रेम, तुम फौरन ही मेरे पास चले आओ,’ वाणी एक सांस में बोल गई.

‘‘तुम अपनेआप को संभालो. मैं तुरंत तुम्हारे पास आ रहा हूं,’’ कह कर प्रेम ने फोन काट दिया. वह मोबाइल फोन जींस की जेब में डाल कर मोटरसाइकिल बाहर निकालने लगा.

वाणी और प्रेम के कमरे की दूरी मोटरसाइकिल से पार करने में महज 15 मिनट का समय लगता था. लेकिन जब कोई बहुत अपना परेशानी में अपने पास बुलाए तो यह दूरी मीलों लंबी लगने लगती है. मन में अच्छेबुरे विचार बिन बुलाए आने लगते हैं.

यही हाल प्रेम का था. वाणी केवल उस की क्लासमेट नहीं थी, बल्कि सबकुछ थी. बचपन की दोस्त से ले कर दिल की रानी तक.

दोनों एक ही शहर के रहने वाले थे और लखनऊ में एक ही कालेज से बीटैक कर रहे थे. होस्टल में न रह कर दोनों ने कमरे किराए पर लिए थे. लेकिन एक ही कालोनी में उन्हें कमरे किराए पर नहीं मिल पाए थे. उन की कोशिश जारी थी कि उन्हें एक ही घर में या एक ही कालोनी में किराए पर कमरे मिल जाएं, ताकि वे ज्यादा से ज्यादा समय एकदूसरे के साथ गुजार सकें.

बहुत सी खूबियों के साथ वाणी में एक कमी थी. छोटीछोटी बातों को ले कर वह बहुत जल्दी परेशान हो जाती थी. उसे सामान्य हालत में आने में बहुत समय लग जाता था. आज भी उस ने कुछ देखा या सुना होगा. अब वह परेशान हो रही होगी. प्रेम जानता था. वह यह भी जानता था कि ऐसे समय में वाणी को उस की बहुत जरूरत रहती है.

जैसे ही प्रेम वाणी के कमरे में घुसा, वाणी उस से लिपट कर सिसकियां भरने लगी. प्रेम बिना कुछ पूछे उस के सिर पर हाथ फेरने लगा. जब तक वह सामान्य नहीं हो जाती कुछ कह नहीं पाएगी.

वाणी की इस आदत को प्रेम बचपन से देखता आ रहा था. परेशान होने पर वह मां के आंचल से तब तक चिपकी रहती थी, जब तक उस के मन का डर न निकल जाता था. उस की यह आदत बदली नहीं थी. बस, मां का आंचल छूटा तो अब प्रेम की चौड़ी छाती में सहारा पाने लगी थी.

काफी देर बाद जब वाणी सामान्य हुई तो प्रेम उसे कुरसी पर बिठाते हुए बोला, ‘‘अब बताओ… क्या हुआ?’’

‘‘प्रेम, सामने वाले अपार्टमैंट्स में सुबह एक लव कपल ने कलाई की नस काट कर खुदकुशी कर ली. दोनों अलगअलग जाति के थे. अभी उन्होंने दुनिया देखनी ही शुरू की थी. लड़की

17 साल की थी और लड़का 18 साल का…’’ एक ही सांस में कहती चली गई वाणी. यह उस की आदत थी. जब वह अपनी बात कहने पर आती तो उस के वाक्यों में विराम नहीं होता था.

‘‘ओह,’’ प्रेम धीरे से बोला.

‘‘प्रेम, क्या हमें भी मरना होगा? तुम ब्राह्मण हो और मैं यादव. तुम्हारे यहां प्याजलहसुन भी नहीं खाया जाता. मेरे घर अंडामुरगा सब चलता है. क्या तुम्हारी मां मुझे कबूल करेंगी?’’

‘‘कैसी बातें कर रही हो वाणी? मेरी मां तुम्हें कितना प्यार करती हैं. तुम जानती हो,’’ प्रेम ने उसे समझाने की भरपूर कोशिश की.

‘‘पड़ोसी के बच्चे को प्यार करना अलग बात होती?है, लेकिन दूसरी जाति की लड़की को बहू बनाने में सोच बदल जाती?है,’’ वाणी ने कहा.

वाणी की बात अपनी जगह सही थी. जो रूढि़वादिता, जातिधर्म के प्रति आग्रह इनसानों के मन में समाया हुआ है, वह निकाल फेंकना इतना आसान नहीं है. वह भी मिडिल क्लास सोच वाले लोगों के लिए.

प्रेम की मां भी अपने पंडित होने का दंभ पाले हुए थीं. पिता जनेऊधारी थे. कथा भी बांचते थे. कुलमिला कर घर का माहौल धार्मिक था. लेकिन वाणी के घर से उन के संबंध काफी घरेलू थे. एकदूसरे के घर खानापीना भी रहता था. यही वजह थी कि वाणी और प्रेम करीब आते गए थे. इतने करीब कि वे अब एकदूसरे से अलग होने की भी नहीं सोच सकते थे.

प्रेम को खामोश देख कर वाणी ने दोबारा कहा, ‘‘क्या हमारे प्यार का अंत भी ऐसे ही होगा?’’

‘‘नहीं, हमारा प्यार इतना भी कमजोर नहीं है. हम नहीं मरेंगे,’’ प्रेम वाणी का हाथ अपने हाथ में ले कर बोला.

‘‘बताओ, तुम्हारी मां इस रिश्ते को कबूल करेंगी?’’ वाणी ने फिर से पूछा.

‘‘यह मैं नहीं कह सकता लेकिन हम अपने प्यार को खोने नहीं देंगे,’’ प्रेम ने कहा.

‘‘आजकल लव कपल बहुत ज्यादा खुदकुशी कर रहे हैं. आएदिन ऐसी खबरें छपती रहती हैं. मुझे भी डर लगता है,’’ वाणी अपना हाथ प्रेम के हाथ पर रखते हुए बोली. वह शांत नहीं थी.

‘‘तुम ने यह भी पढ़ा होगा कि उन की उम्र क्या थी. वे नाबालिग थे. वे प्यार के प्रति नासमझ होते हैं, उन्हें अपने पैरों पर खड़ा होना चाहिए. हर चीज का एक समय होता है. समय से पहले किया गया काम कामयाब कहां होता है. पौधा भी लगाओ तो बड़ा होने में समय लगता है. तब फल आता है. अगर फल भी कच्चा तोड़ लो तो बेकार हो जाता है. उस पर भी आजकल के बच्चे प्यार की गंभीरता को समझ नहीं पाते हैं. एकदूसरे के साथ डेटिंग, फिर शादी. पर वे शादी के बाद की जिम्मेदारियां नकार जाते हैं.’’

‘‘यानी हम लोग पहले पढ़ाई पूरी करें, फिर नौकरी, उस के बाद शादी.’’

‘‘हां.’’

‘‘लेकिन…’’

‘‘अब लेकिन, क्या?’’

‘‘तुम्हारी मां…’’

अब प्रेम को पूरी बात समझ में आई कि वाणी का डर उस की मां, समाज और जातपांत को ले कर था. थोड़ी देर चुप रह कर वह बोला, ‘‘कोई भी बदलाव विरोध के बिना वजूद में आया है भला? मां के मन में भी यह बदलाव आसानी से नहीं आएगा. मैं जानता हूं. लेकिन मां में एक अच्छी बात है. वे कोई भी सपना पहले से नहीं संजोतीं.

‘‘उन का मानना है कि समय बदलता रहता है. समय के मुताबिक हालात भी बदलते रहते हैं. पहले से देखे हुए सपने बिखर सकते हैं. नए सपने बन सकते हैं, इसलिए वे मेरे बारे में कोई सपना नहीं बुनतीं. बस वे यही चाहती हैं कि मैं पढ़लिख कर अच्छी नौकरी पाऊं और खुश रहूं.

‘‘वे मुझे पंडिताई से दूर रखना चाहती हैं. उन का मानना है कि क्यों हम धर्म के नाम पर पैसा कमाएं जबकि इनसानों को जोकुछ मिलता है, वह उन के कर्मों के मुताबिक ही मिलता है. क्या वे गलत हैं?’’

‘‘नहीं. विचार अच्छे हैं तुम्हारी मां के. लेकिन विचार अकसर हकीकत की खुरदरी जमीन पर ढह जाते हैं,’’ वाणी बोली.

‘‘शायद, तुम मेरे और अपने रिश्ते की बात को ले कर परेशान हो,’’ प्रेम ने कहा.

‘‘हां, जब भी कोई लव कपल खुदकुशी करता है तो मैं डर जाती हूं. अंदर तक टूट जाती हूं.’’

‘‘लेकिन, तुम तो यह मानती हो कि असली प्यार कभी नहीं मरता है और हमारा प्यार तो विश्वास पर टिका है. इसे शादी के बंधन या जिस्मानी संबंधों तक नहीं रखा जा सकता है.’’

तब तक प्रेम चाय बनाने लगा था. वह चाय की चुसकियों में वाणी की उलझनों को पी जाना चाहता था. हमेशा ऐसा ही होता था. जब भी वाणी परेशान होती, वह चाय खुद बनाता था. चाय को वह धीरेधीरे तब तक पीता रहता था, जब तक वाणी मुसकरा कर यह न कह दे, ‘‘चाय को शरबत बनाओगे क्या?’’

जब पे्रम को यकीन हो जाता कि वाणी नौर्मल?है, तब चाय को एक घूंट में खत्म कर जाता.

‘‘मैं अपनी थ्योरी पर आज भी कायम हूं. मैं ने तुम्हें प्यार किया है. करती रहूंगी. चाहे हमारी शादी हो पाए या नहीं. लेकिन…’’

‘‘लेकिन क्या…?’’ चाय का कप वाणी को थमाते हुए प्रेम ने पूछा.

‘‘लड़की हूं न, इसलिए अकसर शादी, घरपरिवार के सपने देख जाती हूं.’’

‘‘मैं भी देखता हूं… सब को हक है सपने देखने का. पर मुझे पक्का यकीन है कि ईमानदारी से देखे गए सपने भी सच हो जाते हैं.’’

‘‘क्या हमारे भी सपने सच होंगे…?’’ वाणी चाय का घूंट भरते हुए बोली.

‘‘हो भी सकते हैं. मैं मां को समझाने को कोशिश करूंगा. हो सकता है, मां हम लोगों का प्यार देख कर मान जाएं.’’

‘‘न मानीं तो…?’’ यह पूछते हुए वाणी ने अपनी नजरें प्रेम के चेहरे पर गढ़ा दीं.

‘‘अगर वे न मानीं तो हम अच्छे दोस्त बन कर रहेंगे. हमारे प्यार को रिश्ते का नाम नहीं दिया जा सकता तो मिटाया भी नहीं जा सकता. हम टूटेंगे नहीं.

‘‘तुम वादा करो कि अपनी जान खोने जैसा कोई वाहियात कदम नहीं उठाओगी,’’ कहते हुए प्रेम ने अपना दाहिना हाथ वाणी की ओर बढ़ा दिया.

‘‘हम टूटेंगे नहीं, जान भी नहीं देंगे. इंतजार करेंगे समय का, एकदूसरे का,’’ वाणी प्रेम का हाथ अपने दोनों हाथों में ले कर भींचती चली गई, कभी साथ न छोड़ने के लिए. Hindi Story

Hindi Story: रूह का स्पंदन-क्या था दीक्षा ने के जीवन की हकीकत

Hindi Story:‘‘डूयू बिलीव इन वाइब्स?’’ दक्षा द्वारा पूरे गए इस सवाल पर सुदेश चौंका. उस के चेहरे के हावभाव तो बदल ही गए, होंठों पर हलकी मुसकान भी तैर गई. सुदेश का खुद का जमाजमाया कारोबार था. वह सुंदर और आकर्षक युवक था. गोरा चिट्टा, लंबा, स्लिम,

हलकी दाढ़ी और हमेशा चेहरे पर तैरती बाल सुलभ हंसी. वह ऐसा लड़का था, जिसे देख कर कोई भी पहली नजर में ही आकर्षित हो जाए. घर में पे्रम विवाह करने की पूरी छूट थी, इस के बावजूद उस ने सोच रखा था कि वह मांबाप की पसंद से ही शादी करेगा.

सुदेश ने एकएक कर के कई लड़कियां देखी थीं. कहीं लड़की वालों को उस की अपार प्यार करने वाली मां पुराने विचारों वाली लगती थी तो कहीं उस का मन नहीं माना. ऐसा कतई नहीं था कि वह कोई रूप की रानी या देवकन्या तलाश रहा था. पर वह जिस तरह की लड़की चाहता था, उस तरह की कोई उसे मिली ही नहीं थी.

सुदेश का अलग तरह का स्वभाव था. उस की सीधीसादी जीवनशैली थी, गिनेचुने मित्र थे. न कोई व्यसन और न किसी तरह का कोई महंगा शौक. वह जितना कमाता था, उस हिसाब से उस के कपड़े या जीवनशैली नहीं थी. इस बात को ले कर वह हमेशा परेशान रहता था कि आजकल की आधुनिक लड़कियां उस के घरपरिवार और खास कर उस के साथ व्यवस्थित हो पाएंगी या नहीं.

अपने मातापिता का हंसताखेलता, मुसकराता, प्यार से भरपूर दांपत्य जीवन देख कर पलाबढ़ा सुदेश अपनी भावी पत्नी के साथ वैसे ही मजबूत बंधन की अपेक्षा रखता था. आज जिस तरह समाज में अलगाव बढ़ रहा है, उसे देख कर वह सहम जाता था कि अगर ऐसा कुछ उस के साथ हो गया तो…

सुदेश की शादी को ले कर उस की मां कभीकभी चिंता करती थीं लेकिन उस के पापा उसे समझाते रहते थे कि वक्त के साथ सब ठीक हो जाएगा. सुदेश भी वक्त पर भरोसा कर के आगे बढ़ता रहा. यह सब चल रहा था कि उस से छोटे उस के चचेरे भाई की सगाई का निमंत्रण आया. इस से सुदेश की मां को लगा कि उन के बेटे से छोटे लड़कों की शादी हो रही हैं और उन का हीरा जैसा बेटा किसी को पता नहीं क्यों दिखाई नहीं देता.

चिंता में डूबी सुदेश की मां ने उस से मेट्रोमोनियल साइट पर औनलाइन रजिस्ट्रेशन कराने को कहा. मां की इच्छा का सम्मान करते हुए सुदेश ने रजिस्ट्रेशन करा दिया. एक दिन टाइम पास करने के लिए सुदेश साइट पर रजिस्टर्ड लड़कियों की प्रोफाइल देख रहा था, तभी एक लड़की की प्रोफाइल पर उस की नजर ठहर गई.

ज्यादातर लड़कियों ने अपनी प्रोफाइल में शौक के रूप में डांसिंग, सिंगिंग या कुकिंग लिख रखा था. पर उस लड़की ने अपनी प्रोफाइल में जो शौक लिखे थे, उस के अनुसार उसे ट्रैवलिंग, एडवेंचर ट्रिप्स, फूडी का शौक था. वह बिजनैस माइंडेड भी थी.

उस की हाइट यानी ऊंचाई भी नौर्मल लड़कियों से अधिक थी. फोटो में वह काफी सुंदर लग रही थी. सुदेश को लगा कि उसे इस लड़की के लिए ट्राइ करना चाहिए. शायद लड़की को भी उस की प्रोफाइल पसंद आ जाए और बात आगे बढ़ जाए. यही सोच कर उस ने उस लड़की के पास रिक्वेस्ट भेज दी.

सुदेश तब हैरान रह गया, जब उस लड़की ने उस की रिक्वेस्ट स्वीकार कर ली. हिम्मत कर के उस ने साइट पर मैसेज डाल दिया. जवाब में उस से फोन नंबर मांगा गया. सुदेश ने अपना फोन नंबर लिख कर भेज दिया. थोड़ी ही देर में उस के फोन की घंटी बजी. अनजान नंबर होने की वजह से सुदेश थोड़ा असमंजस में था. फिर भी उस ने फोन रिसीव कर ही लिया.

दूसरी ओर से किसी संभ्रांत सी महिला ने अपना परिचय देते हुए कहा, ‘‘मैं दक्षा की मम्मी बोल रही हूं. आप की प्रोफाइल मुझे अच्छी लगी, इसलिए मैं चाहती हूं कि आप अपना बायोडाटा और कुछ फोटोग्राफ्स इसी नंबर पर वाट्सऐप कर दें.’’

सुदेश ने हां कह कर फोन काट दिया. उस के लिए यह सब अचानक हो गया था. इतनी जल्दी जवाब आ जाएगा और बात भी हो जाएगी, सुदेश को उम्मीद नहीं थी. सोचविचार छोड़ कर उस ने अपना बायोडाटा और फोटोग्राफ्स वाट्सऐप कर दिए.

फोन रखते ही दक्षा ने मां से पूछा, ‘‘मम्मी, लड़का किस तरह बातचीत कर रहा था? अपने ही इलाके की भाषा बोल रहा था या किसी अन्य प्रदेश की भाषा में बात कर रहा था?’’

‘‘बेटा, फिलहाल वह दिल्ली में रह रहा है और दिल्ली में तो सभी प्रदेश के लोग भरे पड़े हैं. यहां कहां पता चलता है कि कौन कहां का है. खासकर यूपी, मध्य प्रदेश, उत्तराखंड और राजस्थान वाले तो अच्छी हिंदी बोल लेते हैं.’’ मां ने बताया.

‘मम्मी, मैं तो यह कह रही थी कि यदि वह अपने ही क्षेत्र का होता तो अच्छा रहता.’’ दक्षा ने मन की बात कही. लड़का गढ़वाली ही नहीं, अपने इलाके का ही है. मां ने बताया तो दक्षा खुश हो उठी.

दक्षा मां से बातें कर रही थी कि उसी समय वाट्सऐप पर मैसेज आने की घंटी बजी. दक्षा ने फटाफट बायोडाटा और फोटोग्राफ्स डाउनलोड किए. बायोडाटा परफेक्ट था. दक्षा की तरह सुदेश भी अपने मांबाप की एकलौती संतान था. न कोई भाई न कोई बहन. दिल्ली में उस का जमाजमाया कारोबार था. खाने और ट्रैवलिंग का शौक. वाट्सऐप पर आए फोटोग्राफ्स में एक दाढ़ी वाला फोटो था.

दक्षा को जो चाहिए था, वे सारे गुण तो सुदेश में थे. पर दक्षा खुश नहीं थी. उस के परिवार में जो घटा था, उसे ले कर वह परेशान थी. उसे अपनी मर्यादाओं का भी पता था. साथ ही स्वभाव से वह थोड़ी मूडी और जिद्दी थी. पर समय और संयोग के हिसाब से धीरगंभीर और जिम्मेदारी भी थी.

दक्षा का पालनपोषण एक सामान्य लड़की से हट कर हुआ था. ऐसा नहीं करते, वहां नहीं जाते, यह नहीं बोला जाता, तुम लड़की हो, लड़कियां रात में बाहर नहीं जातीं. जैसे शब्द उस ने नहीं सुने थे, उस के घर का वातावरण अन्य घरों से कदम अलग था. उस की देखभाल एक बेटे से ज्यादा हुई थी. घर के बिजली के बिल से ले कर बैंक से पैसा निकालने, जमा करने तक का काम वह स्वयं करती थी.

दक्षा की मां नौकरी करती थीं, इसलिए खाना बनाना और घर के अन्य काम करना वह काफी कम उम्र में ही सीख गई थी. इस के अलावा तैरना, घुड़सवारी करना, कराटे, डांस करना, सब कुछ उसे आता था. नौकरी के बजाए उसे बिजनैस में रुचि ही नहीं, बल्कि सूझबूझ भी थी. वह बाइक और कार दोनों चला लेती थी. जयपुर और नैनीताल तक वह खुद गाड़ी चला कर गई थी. यानी वह एक अच्छी ड्राइवर थी.

दक्षा को पढ़ने का भी खासा शौक था. इसी वजह से वह कविता, कहानियां, लेख आदि भी लिखती थी. एकदम स्पष्ट बात करती थी, चाहे किसी को अच्छी लगे या बुरी. किसी प्रकार का दंभ नहीं, लेकिन घरपरिवार वालों को वह अभिमानी लगती थी. जबकि उस का स्वभाव नारियल की तरह था. ऊपर से एकदम सख्त, अंदर से मीठी मलाई जैसा.

उस की मित्र मंडली में लड़कियों की अपेक्षा लड़के अधिक थे. इस की वजह यह थी कि लिपस्टिक या नेल पौलिश के बारे में बेकार की चर्चा करने के बजाय वह वहां उठनाबैठना चाहती थी, जहां चार नई बातें सुननेसमझने को मिलें. वह ऐसी ही मित्र मंडली पसंद करती थीं. उस के मित्र भी दिलवाले थे, जो बड़े भाई की तरह हमेशा उस के साथ खड़े रहते थे.

सब से खास मित्र थी दक्षा की मम्मी, दक्षा उन से अपनी हर बात शेयर करती थी. कोई उस से प्यार का इजहार करता तो यह भी उस की मम्मी को पता होता था. मम्मी से उस की इस हद तक आत्मीयता थी. रूप भी उसे कम नहीं मिला था. न जाने कितने लड़के सालों तक उस की हां की राह देखते रहे.

पर उस ने निश्चय कर लिया था कि कुछ भी हो, वह प्रेम विवाह नहीं करेगी. इसीलिए उस की मम्मी ने बुआ के कहने पर मेट्रोमोनियल साइट पर उस की प्रोफाइल डाल दी थी. जबकि अभी वह शादी के लिए तैयार नहीं थी. उस के डर के पीछे कई कारण थे.

सुदेश और दक्षा के घर वाले चाहते थे कि पहले दोनों मिल कर एकदूसरे को देख लें. बातें कर लें और कैसे रहना है, तय कर लें. क्योंकि जीवन तो उन्हें ही साथ जीना है. उस के बाद घर वाले बैठ कर शादी तय कर लेंगे.

घर वालों की सहमति से दोनों को एकदूसरे के मोबाइल नंबर दे दिए गए. उसी बीच सुदेश को तेज बुखार आ गया, इसलिए वह घर में ही लेटा था. शाम को खाने के बाद उस ने दक्षा को मैसेज किया. फोन पर सीधे बात करने के बजाय उस ने पहले मैसेज करना उचित समझा था.

काफी देर तक राह देखने के बाद दक्षा का कोई जवाब नहीं आया. सुदेश ने दवा ले रखी थी, इसलिए उसे जब थोड़ा आराम मिला तो वह सो गया. रात करीब साढ़े 10 बजे शरीर में दर्द के कारण उस की आंखें खुलीं तो पानी पी कर उस ने मोबाइल देखा. उस में दक्षा का मैसेज आया हुआ था. मैसेज के अनुसार, उस के यहां मेहमान आए थे, जो अभीअभी गए हैं.

सुदेश ने बात आगे बढ़ाई. औपचारिक पूछताछ करतेकरते दोनों एकदूसरे के शौक पर आ गए. यह हैरानी ही थी कि दोनों के अच्छेबुरे सपने, डर, कल्पनाएं, शौक, सब कुछ काफी हद इस तरह से मेल खा रहे थे, मानो दोनों जुड़वा हों. घंटे, 2 घंटे, 3 घंटे हो गए. किसी भी लड़की से 10 मिनट से ज्यादा बात न करने वाला सुदेश दक्षा से बातें करते हुए ऐसा मग्न हो गया कि उस का ध्यान घड़ी की ओर गया ही नहीं, दूसरी ओर दक्ष ने भी कभी किसी से इतना लगाव महसूस नहीं किया था.

सुदेश और दक्षा की बातों का अंत ही नहीं हो रहा था. दोनों सुबह 7 बजे तक बातें करते रहे. दोनों ने बौलीवुड हौलीवुड फिल्मों, स्पोर्ट्स, पौलिटिकल व्यू, समाज की संरचना, स्पोर्ट्स कार और बाइक, विज्ञान और साहित्य, बच्चों के पालनपोषण, फैमिली वैल्यू सहित लगभग सभी विषयों पर बातें कर डालीं. दोनों ही काफी खुश थे कि उन के जैसा कोई तो दुनिया में है. सुबह हो गई तो दोनों ने फुरसत में बात करने को कह कर एकदूसरे से विदा ली.

घर वालों की सहमति पर सुदेश और दक्षा ने मिल कर बातें करने का निश्चय किया. सुदेश सुबह ही मिलना चाहता था, लेकिन दक्षा ने ब्रेकफास्ट कर के मिलने की बात कही. क्योंकि वह पूजापाठ कर के ही ब्रेकफास्ट करती थी. सुदेश में दक्षा से मिलने के लिए गजब का उत्साह था. दक्षा की बातों और उस के स्वभाव ने आकर्षण तो पैदा कर ही दिया था. इस के अलावा दक्षा ने अपने जीवन की कुछ महत्त्वपूर्ण बातें मिल कर बताने को कहा था. वो बातें कौन सी थीं, सुदेश उन बातों को भी जानना चाहता था.

निश्चित की गई जगह पर सुदेश पहले ही पहुंच गया था. वहां पहुंच कर वह बेचैनी से दक्षा की राह देख रहा था. वह काले रंग की शर्ट और औफ वाइट कार्गो पैंट पहन कर गया था. रेस्टोरेंट में बैठ कर वह हैडफोन से गाने सुनने में मशगूल हो गया. दक्षा ने काला टौप पहना था, जिस के लिए उस की मम्मी ने टोका भी था कि पहली बार मिलने जा रही है तो जींस टौप, वह भी काला.

तब दक्षा ने आदत के अनुसार लौजिकल जवाब दिया था, ‘‘अगर मैं सलवारसूट पहन कर जाती हूं और बाद में उसे पता चलता है कि मैं जींस टौप भी पहनती हूं तो यह धोखा देने वाली बात होगी. और मम्मी इंसान के इरादे नेक हों तो रंग से कोई फर्क नहीं पड़ता.’’

तर्क करने में तो दक्षा वकील थी. बातों में उस से जीतना आसान नहीं था. वह घर से निकली और तय जगह पर पहुंच गई. सढि़यां चढ़ कर दरवाजा खोला और रेस्टोरेंट में अंदर घुसी. फोटो की अपेक्षा रियल में वह ज्यादा सुंदर और मस्ती में गाने के साथ सिर हिलाती हुई कुछ अलग ही लग रही थी.

अचानक सुदेश की नजर दक्षा पर पड़ी तो दोनों की नजरें मिलीं. ऐसा लगा, दोनों एकदूसरे को सालों से जानते हों और अचानक मिले हों. दोनों के चेहरों पर खुशी छलक उठी थी.

खातेपीते दोनों के बीच तमाम बातें हुईं. अब वह घड़ी आ गई, जब दक्षा अपने जीवन से जुड़ी महत्त्वपूर्ण बातें उस से कहने जा रही थी. वहां से उठ कर दोनों एक पार्क में आ गए थे, जहां दोनों कोने में पेड़ों की आड़ में रखी एक बेंच पर बैठ गए. दक्षा ने बात शुरू की, ‘‘मेरे पापा नहीं हैं, सुदेश. ज्यादातर लोगों से मैं यही कहती हूं कि अब वह इस दुनिया में नहीं है, पर यह सच नहीं है. हकीकत कुछ और ही है.’’

इतना कह कर दक्षा रुकी. सुदेश अपलक उसे ही ताक रहा था. उस के मन में हकीकत जानने की उत्सुकता भी थी. लंबी सांस ले कर दक्षा ने आगे कहा, ‘‘जब मैं मम्मी के पेट में थी, तब मेरे पापा किसी और औरत के लिए मेरी मम्मी को छोड़ कर उस के साथ रहने के लिए चले गए थे.

‘‘लेकिन अभी तक मम्मीपापा के बीच डिवोर्स नहीं हुआ है. घर वालों ने मम्मी से यह कह कर उन्हें अबार्शन कराने की सलाह दी थी कि उस आदमी का खून भी उसी जैसा होगा. इस से अच्छा यही होगा कि इस से छुटकारा पा कर दूसरी शादी कर लो.’’

दक्षा के यह कहते ही सुदेश ने उस की तरफ गौर से देखा तो वह चुप हो गई. पर अभी उस की बात पूरी नहीं हुई थी, इसलिए उस ने नजरें झुका कर आगे कहा, ‘‘पर मम्मी ने सभी का विरोध करते हुए कहा कि जो कुछ भी हुआ, उस में पेट में पल रहे इस बच्चे का क्या दोष है. यानी उन्होंने गर्भपात नहीं कराया. मेरे पैदा होने के बाद शुरू में कुछ ही लोगों ने मम्मी का साथ दिया. मैं जैसेजैसे बड़ी होती गई, वैसेवैसे सब शांत होता गया.

‘‘मेरा पालनपोषण एक बेटे की तरह हुआ. अगलबगल की परिस्थितियां, जिन का अकेले मैं ने सामना किया है, उस का मेरी वाणी और व्यवहार में खासा प्रभाव है. मैं ने सही और गलत का खुद निर्णय लेना सीखा है. ठोकर खा कर गिरी हूं तो खुद खड़ी होना सीखा है.’’

अपनी पलकों को झपकाते हुए दक्षा आगे बोली, ‘‘संक्षेप में अपनी यह इमोशनल कहानी सुना कर मैं आप से किसी तरह की सांत्वना नहीं पाना चाहती, पर कोई भी फैसला लेने से पहले मैं ने यह सब बता देना जरूरी समझा.

‘‘कल कोई दूसरा आप से यह कहे कि लड़की बिना बाप के पलीबढ़ी है, तब कम से कम आप को यह तो नहीं लगेगा कि आप के साथ धोखा हुआ है. मैं ने आप से जो कहा है, इस के बारे में आप आराम से घर में चर्चा कर लें. फिर सोचसमझ कर जवाब दीजिएगा.’’

सुदेश दक्षा की खुद्दारी देखता रह गया. कोई मन का इतना साफ कैसे हो सकता है, उस की समझ में नहीं आ रहा था. अब तक दोनों को भूख लग आई थी. सुदेश दक्षा को साथ ले कर नजदीक की एक कौफी शौप में गया. कौफी का और्डर दे कर दोनों बातें करने लगे तभी अचानक दक्षा ने पूछा था, ‘‘डू यू बिलीव इन वाइब्स?’’

सुदेश क्षण भर के लिए स्थिर हो गया. ऐसी किसी बात की उस ने अपेक्षा नहीं की थी. खासकर इस बारे में, जिस में वह पूरी तरह से भरोसा करता हो. वाइब्स अलौकिक अनुभव होता है, जिस में घड़ी के छठें भाग में आप के मन को अच्छेबुरे का अनुभव होता है. किस से बात की जाए, कहां जाया जाए, बिना किसी वजह के आनंद न आए और इस का उलटा एकदम अंजान व्यक्ति या जगह की ओर मन आकर्षित हो तो यह आप के मन का वाइब्स है.

यह कभी गलत नहीं होता. आप का अंत:करण आप को हमेशा सच्चा रास्ता सुझाता है. दक्षा के सवाल को सुन कर सुदेश ने जीवन में एक चांस लेने का निश्चय किया. वह जो दांव फेंकने जा रहा था, अगर उलटा पड़ जाता तो दक्षा तुरंत मना कर के जा सकती थी. क्योंकि अब तक की बातचीत से यह जाहिर हो गया था. पर अगर सब ठीक हो गया तो सुदेश का बेड़ा पार हो जाएगा.

सुदेश ने बेहिचक दक्षा से उस का हाथ पकड़ने की अनुमति मांगी. दक्षा के हावभाव बदल गए. सुदेश की आंखों में झांकते हुए वह यह जानने की कोशिश करने लगी कि क्या सोच कर उस ने ऐसा करने का साहस किया है. पर उस की आंखो में भोलेपन के अलावा कुछ दिखाई नहीं दिया. अपने स्वभाव के विरुद्ध उस ने सुदेश को अपना हाथ पकड़ने की अनुमति दे दी.

दोनों के हाथ मिलते ही उन के रोमरोम में इस तरह का भाव पैदा हो गया, जैसे वे एकदूसरे को जन्मजन्मांतर से जानते हों. दोनों अनिमेष नजरों से एकदूसरे को देखते रहे. लगभग 5 मिनट बाद निर्मल हंसी के साथ दोनों ने एकदूसरे का हाथ छोड़ा. दोनों जो बात शब्दों में नहीं कह सके, वह स्पर्श से व्यक्त हो गई.

जाने से पहले सुदेश सिर्फ इतना ही कह सका, ‘‘तुम जो भी हो, जैसी भी हो, किसी भी प्रकार के बदलाव की अपेक्षा किए बगैर मुझे स्वीकार हो. रही बात तुम्हारे पिछले जीवन के बारे में तो वह इस से भी बुरा होता तब भी मुझ पर कोई फर्क नहीं पड़ता. बाकी अपने घर वालों को मैं जानता हूं. वे लोग तुम्हें मुझ से भी अधिक प्यार करेंगे. मैं वचन देता हूं कि बचपन से ले कर अब तक अधूरे रह गए सपनों को मैं हकीकत का रंग देने की कोशिश करूंगा.’’ Hindi Story

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