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Hindi Story : बदलाव के कदम

Hindi Story : लक्ष्मण अपनी अंधेरी कोठरी का बल्ब जला कर चारपाई पर लेट गया और कुछ सोचने लगा. कल ही तो लक्ष्मण की शादी है. अब तक कोई भी ठोस इंतजाम नहीं हो सका है. तिलक के दिन भी लक्ष्मण को ही अपने घर के सारे इंतजाम करने पड़े थे. बैंक में जमा रुपए निकाल कर वह अपनी शादी का इंतजाम कर रहा था. उस की इच्छा थी कि कोर्ट में ही शादी कर ले. आलतूफालतू खर्च तो बच जाएंगे, लेकिन लड़की के घर वालों की इच्छा की अनदेखी वह नहीं कर सका. लड़की वाले अपनी तरफ से उस की खातिरदारी में अपनी इच्छा से सबकुछ खर्च कर रहे हैं, तो क्या उस का अपना कोई फर्ज नहीं बनता?

लक्ष्मण के बाबूजी लालधारी इस शादी से खुश नहीं थे. उन का स्वभाव शुरू से ही खराब रहा है, ऐसा नहीं
था. हां, शादी के मुद्दे पर मनमुटाव हुआ है.

लालधारी को इस बात का दुख था कि उन का बेटा लक्ष्मण अपनी बिरादरी की इज्जत का खयाल न कर दूसरी जाति की, वह भी अछूत जाति की लड़की से ब्याह कर रहा है.

प्यारव्यार तो ठीक था, लेकिन शादीब्याह की बात से तो पूरी बिरादरी के लोग लालधारी पर थूथू कर रहे थे. इसे सही और गलत के तराजू पर तौल कर लालधारी लक्ष्मण का पक्ष लिए होते, तब लक्ष्मण इतना दुखी नहीं होता. उसे दुख तो इस बात पर हो रहा था कि वे अपने बेटे के बजाय बिरादरी का ही समर्थन कर रहे थे.

लालधारी को ज्यादा दुख इस बात का था कि इस शादी में दहेज की मोटी रकम नहीं मिल रही थी. उन्होंने सपने में भी ऐसा नहीं सोचा था कि जिस बेटे को एमए की डिगरी दिलाने में उन्होंने एड़ीचोटी एक कर दी, उस के ब्याह में उन्हें फूटी कौड़ी भी हाथ नहीं लगेगी. हताश हो कर वे अपने हाथ मलते रह गए थे. बेटा नासमझ तो था नहीं, जो उसे डांटनेफटकारने के बाद लड़की वाले से मोटी रकम की मांग कर बैठते. सच बात तो यह थी कि लक्ष्मण के आदर्शवादी खयालों से वे नाराज हुए बैठे थे.

एक बार लालधारी ने लक्ष्मण से कहा भी था, ‘‘बेटा, गैरजाति में शादी कर तू ने बिरादरी में मेरी नाक तो कटवा ही दी. अब एक पैसा भी दहेज न लेने की जिद कर के क्यों हाथ आ रहे पैसे को तू ठुकरा रहा है? कुछ नहीं, तो जमीनजायदाद ही लिखवा ले…’’

तब लक्ष्मण एकदम गंभीर हो गया था और फिर तैश में आ कर बोल उठा था, ‘‘बाबूजी, बिरादरी से हमें कोई लेनादेना नहीं है. मैं जाति नहीं, इनसान की इनसानियत की कद्र करता हूं. मेरे ऊपर आप का बहुत अहसान और कर्ज है, लेकिन वह अहसान और कर्ज इतना छोटा नहीं है कि उसे पैसे से चुका दूं.

‘‘आप अपने लक्ष्मण से इज्जत जरूर पा सकेंगे. लेकिन बेटे की शादी के एवज में दानदहेज नहीं. मैं पैसे को ठुकरा नहीं रहा हूं, अपने घर में इज्जत के साथ पैसे को ला रहा हूं. क्या अच्छी बहू किसी पैसे से कम होती है?’’

लक्ष्मण की बातों के चलते पूरी बिरादरी वाले यह सोचसोच कर डर रहे थे कि कहीं यह हवा उन के घर के भीतर भी न घुस जाए, उन का बेटा भी बगावत पर न उतर जाए, गैरजाति की लड़की से प्यार न कर बैठे और फिर लाखों रुपए के दानदहेज से अछूते न रह जाएं.

उसी समय लालधारी से मिलने सरपू और अवधेश आए थे. बातचीत के दौरान लालधारी ने उन से कहा था, ‘‘मैं ने भी तय कर लिया है कि जिस तरह लक्ष्मण की शादी में मुझे एक भी पैसा नहीं मिला है, उसी तरह मैं भी उस की शादी में एक भी पैसा खर्च नहीं करूंगा. देखता हूं, बच्चों को कौन उधार देता है और वह कैसे कर लेता है ब्याह… और हां, सरयू और अवधेश, तुम लोग भी एक पैसा मत देना लक्ष्मण को.’’

‘‘मैं क्यों पैसे दूंगा? कल लक्ष्मण 500 रुपए उधार मांगने के लिए मेरे पास आया था, लेकिन मैं ने साफसाफ कह दिया कि अपने बाबूजी से जा कर मांगने में लाज लगती है क्या?

‘‘बस, इतना सुनना था कि उल्लू जैसा मुंह बना कर वह चला गया. अरे भाई, अब तो उस का मुंह भी बंद हो गया है. उस की शादी न रुक गई, तो फिर देखना.’’

लक्ष्मण का लंगोटिया दोस्त सुरेश मन ही मन मना रहा था कि मेरे दोस्त की यह परेशानी दूर हो जाती, ताकि वह अपनी बात पर अटल रहते हुए अपनी मंजिल को पा सके.

सुरेश को यकीन नहीं हो पा रहा था कि इतने विरोधों और परेशानियों के बावजूद लक्ष्मण और किरण की शादी हो सकेगी. लक्ष्मण और किरण का आकर्षण अनजाने में हुआ था. लक्ष्मण ट्यूशन पढ़ाने हर शाम जाया करता था. पढ़ातेपढ़ाते वह खुद प्रेम का पाठ पढ़ने लगा. दोनों के विचार जब आपसी लगाव का कारण बन गए, तब वे एकदूसरे को पसंद करने लगे.

यह जोड़ी किरण की मां को भी बहुत भली लगी. किरण के बाबूजी तो 2 साल पहले ही इस दुनिया से जा चुके थे, इसलिए सारे फैसले मां को ही लेने थे. वे इस से बढि़या लड़का कहां से ढूंढ़तीं? पढ़ालिखा और समझदार लड़का बैठेबैठे मिला है. फिर जातपांत में क्या रखा है? जमाना बदल रहा है, तो विचारों में भी बदलाव लाना ही चाहिए.

किरण की मां को जब यह लगा कि किरण भी लक्ष्मण से सचमुच प्रेम करती है, तब उन्होंने बातबात में ही बात चला दी थी, ‘‘बेटा, मेरी बेटी तुम्हारी बहुत बड़ाई किया करती है. अगर तुम्हें मेरी बेटी पसंद हो, तो मैं उस की शादी तुम से करने के लिए तैयार हूं.’’

‘‘मांजी, मैं खुद ऐसी ही बात आप के सामने कहने वाला था. जल्दी ही किरण से शादी कर के आप को भरोसा दिला दूंगा कि मेरा प्यार झूठा नहीं है.’’

‘‘लेकिन, अगर तुम्हारे बाबूजी इस शादी के खिलाफ हुए, तब तुम क्या करोगे बेटा?’’ अपना शक सामने रखते हुए किरण की मां बोलीं.

‘‘उन के खिलाफ भी कदम बढ़ाने की मेरी पूरी कोशिश रहेगी.’’

‘‘लेकिन, दहेज के रूप में मैं…’’

‘‘दहेज का नाम न लीजिए मांजी. मुझे दहेज से सख्त नफरत है. न जाने कितनी मासूम जानें ली हैं इस दहेज के नाग ने.’’

किरण की मां लक्ष्मण से बहुत खुश हो चुकी थीं. उन्होंने सोचा, ‘एमए पास है ही, 4-5 ट्यूशन कर लेता है. अभी नौकरी नहीं करता है तो क्या? मेहनती लड़का है, कुछ न कुछ तो करेगा ही. इसलिए जल्दी ही उस की नौकरी भी लग जाएगी.’

लक्ष्मण का दोस्त सुरेश भी किरण के घर पर आनेजाने लगा था. किरण से बातचीत भी किया करता था. उसे लगा कि सचमुच, लक्ष्मण के लिए यह खुशी की बात है कि इतनी विचारवान, पढ़ीलिखी और सुशील लड़की के दिल पर उस ने अधिकार प्राप्त कर लिया है.

लक्ष्मण अब तक इसी सोच में था कि आखिर वह बिना दहेज लिए कहां से इतने पैसों का इंतजाम करे कि किरण के घर वालों की इज्जत कर सके और अपने दोस्तों का खयाल भी रख सके.

अचानक उसे उपाय सूझा. उस ने सोचा, आखिर इतने दोस्त कब साथ देंगे? अबू, रवींद्र, श्यामल, देवनाथ और सुरेश. सभी अपने ही तो हैं. क्यों न उन्हीं लोगों से कुछ रुपए उधार ले लूं?

उस ने उदास मन में भी आस का दीप जलाए रखा था. उसे पूरा यकीन था कि उस के दोस्त इस मौके पर उस का साथ जरूर देंगे.

आज सुरेश को लग रहा था कि लक्ष्मण जोकुछ कर रहा है, अपनी नैतिकता के कारण. इसी के आगे लक्ष्मण ने अपने बाप से भी मुंह मोड़ लिया है. उस की जाति के लोग उस पर थूथू कर रहे हैं, तिरछी नजर से देख रहे हैं. फिर भी लक्ष्मण के चेहरे पर खुशी के बादल ही मंडरा रहे हैं. उस के दिल को इस बात पर तसल्ली मिलती है कि दहेज न ले कर और अछूत कही जाने वाली जाति की लड़की से शादी करने का फैसला ले कर वह अपने सामाजिक फर्ज को निभा रहा है. आखिर गलत परंपरा को तोड़ कर नई परंपरा को अपनाने में बुराई ही क्या है?

आखिर इस नई परंपरा को अपनाने में मदद करने के लिए लक्ष्मण को मुंह खोलना ही पड़ा. मुंह खोलने भर की देर थी, उस के दोस्तों ने अपनीअपनी पहुंच के मुताबिक दिल खोल कर लक्ष्मण को मदद दी.

इसी का यह फल था कि लक्ष्मण की शादी धूमधाम से हो रही थी. बेकार खर्च नहीं किए जाने के बावजूद बरात में कोई खास कमी नजर नहीं आ रही थी. झाड़बत्ती के खर्च को बचाने के खयाल से शाम के उजाले में ही बरात दरवाजे पर लगा दी गई थी. बरात में अपने ही परिवार के लोग नजर नहीं आ रहे थे. हां, दोस्तों की भीड़ जरूर बरात की शोभा बढ़ा रही थी.

शादी के समय मंडवे में जब लक्ष्मण के पिताजी की उपस्थिति की जरूरत पड़ी, तब समस्या आ पड़ी. उस के बाबूजी तो गुस्से के चलते वहां पर आए ही नहीं थे.

इसी बीच लक्ष्मण के दोस्त देवनाथ ने मंडवे में सामने आ कर लक्ष्मण से कहा, ‘‘इस में परेशान होने की क्या बात है लक्ष्मण? जिस लड़के का बाप या भाई जिंदा नहीं रहता, क्या उस की शादी रुक जाती है? मैं बन जाता हूं तुम्हारा बड़ा भाई.’’

यह सुन कर लक्ष्मण गदगद हो उठा. लड़की वालों का भी यही हाल था. सभी सोच रहे थे, ‘‘लड़की के पिता न होने के कारण उपस्थित नहीं हैं और लक्ष्मण के बाबूजी जिंदा हो कर भी अनुपस्थित हैं. क्या फर्क रह जाता है ऐसे मौके पर… जिंदगी और मौत में… अपने और बेगाने में?’’

शादी आखिर हो गई. दूसरे दिन किरण ब्याहता बन कर दुलहन के रूप में लक्ष्मण के घर में आई.

लक्ष्मण की मां के अनुरोध और जिद पर उस के बाप ने कोई विरोध तो नहीं किया, लेकिन मन ही मन अनबन बनी रही.

उस घर में किरण जिंदा दुलहन नहीं, बल्कि निर्जीव गुडि़या बन कर रह गई. किसी ने पूछा नहीं. किसी का भी प्यार उसे न मिला. उस घर में सारे लोगों के होते हुए भी उस के लिए सिर्फ लक्ष्मण ही रह गया था.

कुछ दिनों में ही लक्ष्मण को लगा कि यह घर अपना हो कर भी अपना नहीं है, यहां के लोग अपने हो कर भी बेगाने हैं. इस तरह अपने लोगों के बीच कटकट कर रहने से तो बेहतर है, खुले आकाश के नीचे रह कर जीना.

उस ने किसी से कोई शिकायत नहीं की. वह जानता था कि मांगने से दुश्मनी मिल सकती है, प्यार नहीं मिल सकता.

और फिर एक दिन अपने मन से उस ने उसी शहर में किराए पर 2 कमरे का एक मकान ले लिया. उस में वह किरण के साथ रहने लगा.

किराए के मकान में घुसते ही उसे असली घर जैसा सुख मिला. वहां के पड़ोसी लोगों के साथ भी धीरेधीरे मेलजोल बढ़ गया. तब वे आपस में घुलमिल गए.

लेकिन अभी भी उसे किनारा नजदीक नजर नहीं आ रहा था. इतना संतोष तो था ही कि दूर है किनारा तो क्या, जिस मंजिल की तलाश थी, उस के बहुत करीब वे बढ़ते जा रहे थे.

कुछ ही दिनों के बाद उन दोनों के दिन फिर गए. लक्ष्मण को अदालत में सहायक के पद पर नौकरी मिल गई. अब वह सोचने लगा, माली तंगी से छुटकारा पा सकेगा और खुशीखुशी जिंदगी का सफर तय कर सकेगा.

लेखक – सिद्धेश्वर

Family Story : लक्खू का गृहप्रवेश

Family Story : लक्खू मोची अपनी दुकान पर हर रोज सुबह 7 बजे आ कर बैठ जाता था. वह टूटी हुई चप्पलों और फटे हुए जूतों की मरम्मत करता था. उस की दुकान खूब चलती थी. वह चाहे जूते की पौलिश करता या टूटी चप्पलें बनाता, उस की मेहनत साफ झलकती थी. उस के सधे हुए काम से लोग खुश हो जाते थे.

लक्खू मोची की बीवी अंजू बहुत खूबसूरत थी. उस का रंगरूप मोहक था. वह लक्खू की घरगृहस्थी बखूबी संभाल रही थी. वह 10वीं जमात तक पढ़ी थी, जबकि लक्खू मोची ने तो स्कूल का मुंह तक नहीं देखा था. वह सिरे से अनपढ़ था. लेकिन शादी के बाद अंजू ने उसे थोड़ाबहुत पढ़नालिखना सिखा दिया था. अब तो वह अखबार भी पढ़ लेता था.

एक दिन औफिस जाने के लिए एक मैडम घर से निकलीं, तो रास्ते में उन की चप्पल टूट गई. वे लक्खू की दुकान पर पहुंचीं और बोलीं, ‘‘लक्खू, जरा जल्दी से मेरी चप्पल की मरम्मत कर दो, नहीं तो दफ्तर के लिए लेट हो जाऊंगी.’’

लक्खू मोची ने उस मैडम की चप्पल की मरम्मत 5 मिनट में कर दी.

‘‘ये लो 10 रुपए लक्खू,’’ उन मैडम ने चप्पल मरम्मत के पैसे दे दिए.

तभी एक साहब आ कर बोले, ‘‘लक्खू, मेरे जूते पौलिश कर दो.’’

लक्खू ने फटाफट ब्रश चला कर जूते पौलिश कर दिए.

‘‘लक्खू, ये लो 25 रुपए,’’ इतना कह कर वे साहब चमकते चूते पहन कर चल दिए.

शाम हो गई थी. लक्खू अपने घर पहुंच गया था. वह चारपाई पर जा कर लेट गया. वह दिनभर की थकान इसी चारपाई पर मिटाता था.

थोड़ी देर में अंजू चाय बना कर ले आई और बोली, ‘‘ये लीजिए, चाय पी लीजिए.’’

लक्खू चारपाई से उठ कर बैठ गया. वह खुश हो कर चाय पीने लगा. अंजू भी उस के पास बैठ कर चाय पीने लगी.

‘‘मकान मालिक को हर महीने किराए की मोटी रकम देनी पड़ती है. क्यों न हम लोग अपना मकान बना लें. इस से किराए का पैसा भी बच जाएगा,’’ अंजू ने लक्खू से कहा.

‘‘हम लोगों के पास इतने रुपए हैं कि अपना मकान बना सकें. मैं रोजाना चप्पलजूते मरम्मत कर तकरीबन 500 रुपए ही कमा पाता हूं. वे सब भी दालरोटी में खर्च हो जाते हैं,’’ कहते हुए लक्खू के चेहरे पर मजबूरी उभर आई थी.

‘‘मैं आप को एक उपाय बताऊं…’’ अंजू ने कहा.

‘‘हांहां, बताओ,’’ लक्खू बोला.

‘‘आप दुकान में नई चप्पलें और नए जूते बेचिए. इस से हमारी आमदनी और बढ़ जाएगी,’’ अंजू ने कहा.

‘‘लेकिन मैं इतनी पूंजी कहां से लाऊंगा?’’ लक्खू ने पूछा.

‘‘आप होलसेल से माल ले आइए. जब बिक्री हो जाए, तो दुकानदार को पैसे दे दीजिएगा,’’ अंजू ने बताया.

‘‘हां, ऐसा हो तो सकता है. आज तो मैं ने मान लिया कि तुम्हारा दिमाग कंप्यूटर की तरह तेज काम करता है,’’ लक्खू ने कहा.

‘‘दिमाग तो लगाना पड़ता है, नहीं तो हम लोग का घर कैसे बनेगा,’’ अंजू ने मुसकरा कर कहा.

रात के 10 बज रहे थे. लक्खू और अंजू बिस्तर पर लेटे हुए थे. थकान से लक्खू को नींद आ रही थी, लेकिन अंजू के दिल में प्यार की उमंगें उठ रही थीं.

‘‘सो गए क्या?’’ अंजू ने लक्खू से पूछा.

‘‘नहीं, पर जल्दी ही सो जाऊंगा,’’ लक्खू ने अलसाई आवाज में कहा.

‘‘ज्यादा नहीं, आप 15 मिनट तो मेरे साथ जागिए,’’ कह कर अंजू ने लक्खू को चूम लिया.

लक्खू अंजू का इशारा समझ गया और बोला, ‘‘अब तो मुझे जागना ही पड़ेगा,’’ कह कर वह अंजू को अपनी बांहों में भर कर चूमने लगा. उन दोनों पर प्यार का नशा छा गया.

वे एकदूसरे के जिस्म से खेलने लगे. कुछ देर तक प्यार का खेल चलता रहा, फिर थक कर वे दोनों गहरी नींद में सो गए.

अगले दिन लक्खू थोक विक्रेता से जूतेचप्पल ले कर अपनी दुकान में बेचने लगा. जल्दी ही उस की आमदनी बढ़ने लगी.

3 साल में ही लक्खू के पास इतने रुपए हो गए कि उस ने एक नया मकान बना लिया. अंजू और लक्खू का नए मकान का सपना पूरा हुआ था, लेकिन अभी गृहप्रवेश करना बाकी था.

एक सुबह लक्खू अपनी दुकान के लिए जा रहा था कि तभी अंजू ने कहा, ‘‘आप गृहप्रवेश की पूजा के
लिए पंडितजी से बात कीजिए. यह काम जल्द निबट जाए, तो घर का किराया बच जाएगा.’’

‘‘ठीक है, मैं आज ही पंडितजी से बात करता हूं,’’ कह कर लक्खू वहां से चला गया.

पंडितजी कालोनी में पूजा कराते थे. वे लक्खू को रास्ते में ही मिल गए.

‘‘प्रणाम पंडितजी,’’ कह कर लक्खू ने हाथ जोड़े.

‘‘कहो, कोई खास बात है क्या?’’ पंडितजी ने लक्खू से पूछा.

‘‘हां, मुझे गृहप्रवेश की पूजा करानी थी,’’ लक्खू ने कहा.

‘‘अरे लक्खू मोची, तुम ने भी घर बना लिया… चप्पलजूते मरम्मत कर के इतनी तरक्की कर ली,’’ पंडितजी ने हैरान हो कर लक्खू से कहा.

‘‘हां, मेहनतमशक्कत से एकएक पाई जोड़ कर घर बनाया है,’’ लक्खू ने थोड़ी नाराजगी जताई…

‘‘पंडितजी, आप की क्या दानदक्षिणा होगी, बता दीजिए. मुझे 1-2 दिन में पूजा करा लेनी है,’’ लक्खू ने कहा.

‘‘अभी एक यजमान के यहां पूजा कराने जा रहा हूं. कल बता दूंगा,’’ पंडितजी अकड़ कर चले गए.
लक्खू रात में जब घर लौटा, तब अंजू ने पूछा, ‘‘क्या पंडितजी से बात हुई थी? वे दक्षिणा क्या लेंगे?’’

‘‘हां, उन से बात हुई थी. वे दक्षिणा क्या लेंगे, कल बताने को बोले हैं,’’ लक्खू ने कहा.

शाम को पंडितजी घर पर बैठे थे. पंडिताइन भी पास ही बैठी थीं. पंडितजी ने पंडिताइन से लक्खू का जिक्र किया, ‘‘लक्खू मोची के घर का गृहप्रवेश है. मुझे पूजा कराने को बोल रहा था. मैं तो धर्मसंकट में पड़ गया हूं. तुम्हीं बताओ, उस के यहां मैं जाऊं या नहीं?’’

पंडिताइन कुछ सोच कर बोलीं, ‘‘लक्खू मोची है. आप ब्राह्मण हो कर उस के घर पूजा कराने जाएंगे. लोग क्या कहेंगे कि पंडितजी मोची के घर भी पूजा कराने जाते हैं.

‘‘उन के यहां के बरतन कितने गंदे होते हैं. मुझे तो देख कर ही घिन आती है. उन्हीं बरतनों में आप को दहीपूरी और मिठाई का भोग लगाना पड़ेगा.’’

‘‘कोई उपाय बताओ कि मुझे करना क्या होगा?’’ पंडितजी ने पूछा.

‘‘आप को यही करना है कि दूसरे यजमानों से जो दक्षिणा लेते हैं, लक्खू मोची से उस का दोगुना मांगिएगा. वह दक्षिणा का रेट सुन कर भाग जाएगा. इस तरह लक्खू मोची से आप का पिंड छूट जाएगा.’’

पंडितजी को यह उपाय भा गया. उन के होंठों पर कुटिल मुसकान खिल गई.

पंडितजी लक्खू की दुकान पर पहुंचे. उस समय लक्खू खाली बैठा था. पंडितजी को देख कर लक्खू ने हाथ जोड़े और बोला, ‘‘प्रणाम पंडितजी… गृहप्रवेश की पूजा के लिए आप को कितनी दक्षिणा देनी होगी?’’

‘‘दक्षिणा के 1,000 रुपए लगेंगे,’’ पंडितजी ने कहा.

‘‘मुझ से दक्षिणा के 1,000 रुपए क्यों, जबकि दूसरों से तो आप 500 रुपए ही लेते हैं?’’ लक्खू ने पूछा.

‘‘देखो लक्खू, तुम मोची हो. मैं ब्राह्मण हूं. तुम्हारे घर जा कर पूजा करानी है. अपना धर्म भी भ्रष्ट करूं और दोगुनी दक्षिणा भी न लूं,’’ पंडितजी ने कहा.

‘‘अच्छा, तो यह बात है. पंडितजी, आप जातीय जंजाल में जी रहे हैं. पूजापाठ कराना तो आप का ढकोसला है. आप की रगरग में छुआछूत की भावना भरी हुई है.

‘‘मुझे ऐसे पंडितजी से गृहप्रवेश नहीं कराना है. मेरी समझ से आप का सामाजिक बहिष्कार होना चाहिए,’’ लक्खू ने कहा.

‘‘लक्खू मोची, तुम मेरा सामाजिक बहिष्कार करोगे. अधर्मी, पापी. छोटी जाति का आदमी,’’ पंडितजी गुस्से से कांप रहे थे.

लक्खू को भी काफी गुस्सा आ गया. उस ने अपने पैर से जूता निकाल कर पंडितजी को धमकाया, ‘‘जाओ, नहीं तो इसी जूते से चेहरे का हुलिया बिगाड़ दूंगा.’’

लक्खू और पंडितजी लड़नेमरने को तैयार थे. आसपास के लोगों ने बीचबचाव कर के उन दोनों को अलग कर दिया.

लक्खू जब शाम को घर पहुंचा, तब अंजू ने पूछा, ‘‘पंडितजी कल गृहप्रवेश कराने आ रहे हैं न?’’

‘‘नहीं. वे तो कहने लगे कि मोची के घर नहीं जाऊंगा. उन का धर्म भ्रष्ट हो जाएगा. वे हम लोगों को अछूत मानते हैं,’’ लक्खू ने कहा.

‘‘जाने भी दीजिए. हम लोग नए ढंग से गृहप्रवेश कर लेंगे. ऐसे नालायक पंडित पर निर्भर रहना सरासर बेवकूफी है,’’ अंजू ने कहा.

दूसरे दिन लक्खू और अंजू ने मिल कर नए घर को फूलों की माला से सजा दिया था. अंजू ने पूरी, मटरपनीर की सब्जी और सेंवइयां बनाई थीं.

अंजू ने लक्खू से कहा, ‘‘बगल की बस्ती से गरीब बच्चों को बुला कर ले आइए. उन बच्चों को हम लोग भरपेट भोजन कराएंगे.’’

बस्ती के 8-10 बच्चे पंगत लगा कर बैठ गए थे. पूरी, मटरपनीर की सब्जी व सेंवइयां बच्चों को परोस दी गईं. बच्चों ने छक कर खाया. कुछ बच्चे खापी कर खुशी से नाचनेगाने लगे थे. बच्चों को नाचतेगाते देख कर अंजू और लक्खू बेहद खुश थे.

अंजू और लक्खू का गृहप्रवेश दूसरे से अलग और अनूठा था. अंजू और लक्खू अपने नए घर में खुशीखुशी रहने लगे थे.

इस बात को 2 महीने बीत चुके थे. लक्खू अपनी दुकान पर बैठा था. इतने में पंडितजी अपनी टूटी हुई चप्पल की मरम्मत के लिए लक्खू की दुकान पर आए थे.

‘‘लक्खू, मेरी चप्पल टूट गई है. फटाफट मरम्मत कर दो. मुझे पूजा कराने जाना है,’’ पंडितजी ने कहा.

लक्खू ने पंडितजी को पहचानते हुए कहा, ‘‘आप की चप्पल यहां मरम्मत नहीं होगी. कहीं और जा कर देखिए.’’

‘‘लेकिन, मेरी चप्पल क्यों नहीं मरम्मत होगी?’’ पंडितजी ने पूछा.

लक्खू ने कहा, ‘‘मेरे घर पूजा कराने पर आप का धर्म भ्रष्ट होता है. मेरे हाथ से चप्पल मरम्मत कराने पर क्या आप का धर्म भ्रष्ट नहीं होगा.’’

‘‘बकवास मत करो. जल्दी से मेरी चप्पल मरम्मत कर दो. जो पैसा लेना है, ले लो.’’

‘‘मैं ने कह दिया न कि आप की चप्पल मरम्मत नहीं करूंगा,’’ लक्खू ने कहा.

‘‘लक्खू मोची, घर आई लक्ष्मी को ठुकराना नहीं चाहिए. ग्राहक से ही तुम्हारी रोजीरोटी चलती है,’’ पंडितजी ने थोड़ी खुशामद की.

‘‘मुझे उपदेश मत दीजिए. अपना रास्ता नापिए,’’ कह कर लक्खू एक ग्राहक के जूते में पौलिश करने लगा.

पंडितजी टूटी चप्पल ही पहन कर घिसटते हुए चल दिए. उन को नंदन साहब के यहां पूजा करानी थी. वहां दक्षिणा की मोटी रकम मिलने वाली थी.

चिलचिलाती धूप थी. सड़क पर कोई सवारी नहीं थी. अमूमन रिकशा वाले टैंपो वाले दिख जाते थे, लेकिन इस आफत में सभी गायब थे.

समय बीता जा रहा था. पंडितजी की चिंता बढ़ती जा रही थी. वे मन ही मन लक्खू को कोस रहे थे, ‘लक्खू मोची, तुम ने मुझ से खूब बदला लिया है.’

आखिरकार पंडितजी टूटी चप्पल से पैर घिसटते हुए नंदन साहब के घर पहुंच गए थे. वहां का नजारा देख कर उन के होश उड़ गए. नंदन साहब कुरसी पर बैठे हुए थे. कोई दूसरे पंडितजी पूजा करा रहे थे.

नंदन साहब का ध्यान पंडितजी पर गया. वे बोले, ‘‘आप बहुत लेट आए हैं.’’

‘‘हां, एक घंटा लेट हो गया. थोड़ी परेशानी में पड़ गया था,’’ पंडितजी ने कहा.

‘‘खैर, कोई बात नहीं. पूजा कराने के लिए बगल के मंदिर से पंडितजी को बुला लिया है. अब तो पूजा भी खत्म होने वाली है. आप की जरूरत नहीं रही. आप जा सकते हैं,’’ नंदन साहब ने बेलौस आवाज में कहा.
ऐसा सुन कर पंडितजी का चेहरा उतर गया. दक्षिणा की मोटी रकम जो हाथ से निकल गई थी.

वे बुदबुदा रहे थे, ‘‘लक्खू मोची, तुझे जिंदगीभर नहीं भूलूंगा. तुम्हारे चलते मेरी इतनी फजीहत हुई है. लेकिन इस के लिए तो मैं खुद भी कम जिम्मेदार नहीं हूं.’’

Family Story : कंफर्म टिकट

Family Story : सुभि को इस बार होली का बेहद बेसब्री से इंतजार था. इस बार उसे कई सालों बाद अपने घर यह त्योहार मनाने जाना था.

सुभि कई महीने पहले से ही होली पर अपने गांव जाने की तैयारी में जुट गई थी. अपने पति राकेश को उस
ने टिकट कराने के लिए बोल दिया था, पर औफिस में ज्यादा काम होने के चलते वह टिकट लेने के लिए जा ही नहीं सका था.

राकेश ने अपने दोस्त रमेश को यह बात बताई. फिर क्या था. रमेश बोला, ‘‘यार, तुम भी कौन सी दुनिया में जी रहे हो…? अब टिकट खरीदने के लिए रेलवे स्टेशन जाना जरूरी नहीं है. यह काम तो यहां बैठेबैठे औनलाइन भी हो सकता है.’’

रमेश ने पलक झपकते ही अपने आईडी पासवर्ड के साथ आईआरसीटीसी की साइट पर पटना जाने की ट्रेन खोजना शुरू कर दिया. पर सूरत से पटना के लिए किसी भी ट्रेन में एक भी सीट खाली नही दिख रही थी. फिर भी कम वेटिंग वाली टिकट राकेश ने अपने और सुभि के लिए बुक करवा दी. उस के कंफर्म होने की उम्मीद ज्यादा थी, ऐसा रमेश ने कहा था.

दिन बीतते जा रहे थे. सुभि अपने गांव जाने की तैयारी में जुटी थी, पर राकेश हर दिन टिकट का वेटिंग चैक करता था, पर वेटिंग संख्या में कोई खास कमी नहीं आई थी और हर बीतते दिन के साथ राकेश की दुविधा बढ़ती जा रही थी. वह सुभि और अपने बच्चे के चेहरे पर छाए जोश को टिकट कंफर्म नहीं होने के चलते खत्म नहीं करना चाहता था. किंतु वह अंदर ही अंदर घुट रहा था. फ्लाइट की टिकट खरीदना उस के बस में नहीं था और रेल के तत्काल के टिकट का भी कोई ठिकाना नहीं था.

जनरल डब्बे का हाल सोच कर ही राकेश के पसीने छूट रहे थे. उसे याद आया, एक बार उस के पिताजी जब बीमार थे, तो वह जनरल डब्बे में ले गया था, तो भीड़ में एक औरत के साथ कितनी बदसुलूकी हुई थी. वह औरत रो रही थी. इस बार वह सुभि और अपने बच्चे के साथ कैसे जाएगा.

राकेश सोचता था कि जिस देश में बुलेट ट्रेन चलाने की योजना बनाई जा रही है, वहां कुछ नई ट्रेन चलाना क्या इतना मुश्किल है? गरीब कम से कम इनसान की तरह बैठ कर तो कहीं आजा सके.

खैर, सफर का दिन आ गया और टिकट को न कंफर्म होना था और न हुई. अब वह परिवार को ले कर स्टेशन पर आ गया. अभी तक उस ने सुभि को टिकट कंफर्म न होने की बात बताई नहीं थी.

अब राकेश स्टेशन आ गया. ट्रेन आने में कुछ मिनट बाकी थे. वह प्लेटफार्म पर चहलकदमी कर रहा था. इतने में एक आदमी एक ब्रीफकेस ले कर तेज कदमों से भाग कर जा रहा था. उस के हावभाव से लग रहा था कि वह उस ब्रीफकेस को चुरा कर भाग रहा है.

राकेश ने उस आदमी को पकड़ लिया और उसे पकड़ कर उसी दिशा की तरफ जाने लगा, जिधर से वह भागता हुआ आ रहा था.

इतने में 50 साल के एक अमीर आदमी ने राकेश को हाथ दे कर रुकने का इशारा किया. वह रईस आदमी बदहवास सा दिख रहा था. ब्रीफकेस देख कर उस की जान में जान आई.

इतने में एक कांस्टेबल उस चोर को पकड़ कर ले गया, जिसे शायद इस वारदात की सूचना उस अमीर आदमी के असिस्टैंट ने दी थी.

उस सेठ ने राकेश को बहुत धन्यवाद दिया और कहा, ‘‘बेटा, तुम ने मु झे बहुत बड़े नुकसान से बचा लिया. बोलो, मैं तुम्हारे लिए क्या कर सकता हूं?’’

राकेश बोला, ‘‘बाबूजी, मु झे कुछ नहीं चाहिए.’’

सेठ ने राकेश से कहा, ‘‘तुम शायद मु झे नहीं जानते हो. आओ मेरे साथ.’’

सेठजी राकेश को अपने साथ एसी के वेटिंगरूम में ले गए और बोले, ‘‘मैं सूरत का मशहूर हीरा व्यापारी हूं. मैं पटना जा रहा हूं. प्लेन में स्कैन करने पर हीरों का पता चल जाता, जिस से उन की हिफाजत करना मुश्किल था, इसलिए मैं ट्रेन से पटना जा रहा हूं. वहां के एक बहुत बड़े आदमी को एक हीरे के हार की डिलीवरी देनी है.

‘‘मेरी आंखें एक जौहरी की आंखें हैं, जो कभी धोखा नहीं खा सकतीं. तुम बहुत ईमानदार भी हो और साथ ही परेशान भी हो, इसीलिए तुम्हें मैं ने अपना इतना बड़ा राज बताया. अब जल्दी से अपनी परेशानी बताओ?’’

राकेश सेठजी की बातों से भावुक हो गया और बोला, ‘‘सेठजी, मु झे अपने बीवीबच्चे को पटना ले जाना है.

टिकट कंफर्म नहीं हुआ है, इसीलिए परेशान हूं.’’

सेठ ने कहा, ‘‘भाई, तुम को मैं अपने साथ ऐसी फर्स्ट क्लास में ले कर चलूंगा. तुम चिंता मत करो.’’

सेठजी ने तुरंत ही अपने असिस्टैंट से कहा, ‘‘सुनो, तुम अपनी टिकट मु झे दो और तुम फ्लाइट ले कर सूरत से पटना आ जाना. मेरे साथ राकेश और उस का परिवार जाएगा. और हां, इन का टिकट जनरल क्लास का है, तो टीटी से बात कर के जो भी जुर्माना भरना हो वह सब देख लेना.’’

राकेश को तो मानो अपने कान पर यकीन ही नहीं हुआ. सेठजी की भी गरीबों के प्रति सोच बदल गई. वे सोचने लगे कि जैसे हीरा कोयले की खदान से निकलता है, वैसे ही कभीकभी जनरल डब्बे में सफर करने वाला इनसान इतना बहादुर, होशियार और ईमानदार भी हो सकता है…

इतने में ट्रेन के आने की अनाउंसमैंट हो गई. राकेश सुभि और मुन्ना को ले कर सेठजी के पास आ गया. सेठजी ने उन्हें अपने साथ एसी फर्स्ट क्लास में पटना तक का सफर करा दिया.

Hindi Story : जीजाजी का पत्र – दीदी के उदास चेहरे के पीछे क्या था सच?

Hindi Story : घर में सालों बाद सफेदी होने जा रही थी. मां और भाभी की मदद के लिए मैं ने 2 दिन के लिए कालेज से छुट्टी कर ली. दीदी के जाने के बाद उन का कमरा मैं ने हथिया लिया था. किताबों की अलमारी के ऊपरी हिस्से में दीदी की किताबें थीं. मैं कुरसी पर चढ़ कर किताबें उतार रही थी कि अचानक हाथ से 3-4 किताबें गिर पड़ीं.

1-2 किताबें जमीन पर अधखुली पड़ी थीं. उन को उठाने के लिए झुकी तो देखा, 3-4 पेज का एक पत्र पड़ा था. अरे, यह तो जीजाजी का पत्र है जो उन्होंने दीदी को इंगलैंड से लिखा था. पत्र पर एक नजर डालते हुए मैं ने सोचा, ‘दीदी का पत्र मुझे नहीं पढ़ना चाहिए.’

परंतु मन में पत्र पढ़ने की उत्सुकता हुई. मां अभी रसोई में ही थीं. भाभी बंटी को स्कूल छोड़ने गई थीं. जीजाजी के पत्र ने मुझे झकझोर कर रख दिया और अतीत के आंगन में ला कर खड़ा कर दिया.

दीदी हम तीनों में सब से बड़ी हैं. भैया दूसरे नंबर पर हैं. दीदी और मुझ में फर्क भी 12 साल का है. मां और पिताजी को घर में बहू लाने की बहुत इच्छा थी. इसलिए भैया की शादी जल्दी ही हो गई… वैसे भी दीदी की शादी की प्रतीक्षा करते तो भैया कुंआरे ही रह जाते.

उस दिन सवेरे से ही सब लोग काम में लगे हुए थे. पूरे घर की अच्छी तरह से सफाई की जा रही थी. मां और भाभी रसोई में लगी थीं. दीदी को देखने के लिए कुछ लोग दिल्ली से आ रहे थे. वे दोपहर 12 बजे तक हमारे घर पहुंचने वाले थे. दिल्ली से चलने से पहले उन का 10 बजे के लगभग फोन आ गया था. दीदी नहाधो कर तैयार हो रही थीं.

इस बार दीदी को देखने आने वाले लोग जरा दूसरी ही किस्म के थे. लड़का इंगलैंड में नौकरी करता था. शादी कराने भारत आया हुआ था और उसे 2 हफ्ते से भी कम समय में वापस लौट जाना था.

पिछले 5 वर्ष से दीदी को न जाने कितनी बार दिखाया जा चुका था. हमारे पड़ोस में ही दीदी की एक साथी प्राध्यापिका रहा करती थीं. वे हमेशा ही हमारे घर में होने वाली गतिविधियों से जान जातीं कि कोई दीदी को देखने आ रहा है. हर बार जब निराशा हाथ लगती तो दीदी को उन के सामने लज्जित होना पड़ता था. वैसे वे बेचारी दीदी को कुछ नहीं कहती थीं, परंतु दीदी ही हर बार अपने को हीन और अपमानित महसूस करती थीं.

पिछले कुछ महीनों में तो दीदी ने कई बार घर में काफी क्लेश किया था कि वे भेड़बकरी की तरह नहीं दिखाई जाएंगी, परंतु पिताजी की एक डांट के आगे बेचारी झुक जातीं. हां, अपनी जिद, हीनभावना और अपमान के कारण वह खूब रोतीं.

वे लोग ठीक समय पर ही आ गए थे. उन सब की खूब खातिरदारी की गई. वे खुश नजर आ रहे थे. लड़के के भैया- भाभी, छोटी बहन, मातापिता, 2 छोटे भाई और बड़े भाई के 3 बच्चे सभी बैठक में बैठे थे. लड़के की मां, भाभी, छोटी बहन तो पहले ही अंदर जा कर दीदी से मिल चुकी थीं. जिस प्यार से लड़के की मां दीदी को देख रही थीं उस से तो लगता था कि उन्हें दीदी बहुत पसंद आई हैं.

खाने के पश्चात दीदी को बैठक में लाया गया, जहां सब लोग बैठे थे. लड़के के पिता और बड़े भाई दीदी को बड़े गौर से देख रहे थे. लड़का बेचारा चुप ही था. उस की शायद समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करे? वह दीदी से आंख मिलाने का साहस नहीं कर पा रहा था. लगभग आधे घंटे बाद लड़के के पिता ने कहा, ‘‘इन दोनों को कुछ देर के लिए अकेला छोड़ देते हैं. एकदूसरे से एकांत में कुछ पूछना हो तो पूछ सकते हैं.’’

उन की बात सुन कर सब लोग वहां से उठ गए.  लगभग 20 मिनट पश्चात दीदी अंदर आ गईं. उन के आने पर लड़के के घर की महिलाएं बैठक में चली गईं. उन्होंने अपने परिवार के पुरुषों को भी वहीं बुला लिया. वे आपस में सलाहमशवरा कर रहे थे. लगभग आधे घंटे पश्चात लड़के के पिता ने मेरे पिताजी को बुलाया और उन के बैठक में पहुंचते ही कहा, ‘‘मुबारक हो, हमें आप की बेटी बहुत पसंद आई है.’’  पिताजी ने मां और भैया को वहीं बुला लिया. कुछ ही क्षणों में वहां का माहौल ही बदल गया. कुछ देर पहले का तनावपूर्ण वातावरण अब आत्मीयता में परिवर्तित हो चुका था.

जब दीदी ने सुना कि उन को आखिर किसी ने पसंद कर ही लिया है तब उन्होंने चैन की सांस ली. वे लाज की चादर ओढ़े बैठी थीं. बैठक में पिताजी उन लोगों से सारी बातें तय कर रहे थे. मां और भाभी महिलाओं से बातें कर रही थीं.  थोड़ी देर बाद अंदर आ कर लड़के की मां ने अपने गले से सोने की चेन उतार कर दीदी को पहना दी. पहले तो उन सब का 4-5 बजे तक दिल्ली लौट जाने का कार्यक्रम था परंतु अब रात का खाना खाए बिना कैसे जा सकते थे. मां और भाभी खाने की तैयारी में लग गईं. मुझे भी मन मार कर रसोई में उन दोनों की मदद करने जाना पड़ा.  खाने के तुरंत पश्चात ही वे लोग जाने की तैयारी करने लगे. दीदी अपने कमरे से नहीं आईं. मैं जिद कर के होने वाले जीजाजी को दीदी के कमरे में ले गई और उन दोनों को अकेले छोड़ दिया, परंतु वे कुछ देर बाद ही बाहर आ गए. उन्होंने दीदी से क्या कहा? यह तो दीदी ने मुझे बाद में कुरेदने पर भी नहीं बताया था.

3 दिन बाद पिताजी और भैया जा कर सगाई की रस्म पूरी कर आए. उन लोगों ने दीदी के लिए साडि़यां और सोने का एक सैट भेजा. घर में कुछ नजदीकी रिश्तेदार आ गए थे. समय कम था, फिर भी परिवार के सब लोगों की दिनरात की मेहनत से सारी तैयारियां हो ही गईं.

खूब धूमधाम से शादी हुई. किसी को विश्वास ही नहीं होता था कि लड़के वालों ने 6 दिन पहले ही हमारे यहां आ कर पहली बार दीदी को देखा था. सवेरे 8 बजे बरात विदा हो गई. दीदी हमारा घर सूना कर गई थीं.

दीदी को जीजाजी अगले ही दिन ब्रिटेन के हाईकमीशन ले गए. उन के लिए वीजा मिलने में कुछ दिन तो लग ही जाने थे. दिल्ली में दीदी से हम मुश्किल से 40 घंटे बाद मिले थे, परंतु ऐसा लगा कि जैसे मुद्दतों के बाद मिले हों. दीदी बहुत थकीथकी नजर आ रही थीं. कुछ उदास भी थीं, आखिर जीजाजी लंबी हवाई यात्रा पर जो जा रहे थे.  जीजाजी के विमान के चले जाने पर हम लोग मोदीनगर रवाना हो गए. दीदी की सास ने तो घर चलने की काफी जिद की, पर मांपिताजी नहीं माने. 1-2 दिन बाद तो भैया दीदी को लिवाने के लिए उन के यहां जाने ही वाले थे. दीदी भी घर जल्दी आने को इच्छुक थीं. उन्होंने अभी अपनी नौकरी से इस्तीफा नहीं दिया था.

2 दिन बाद भैया दीदी को लिवा लाए. घर में जैसे बहार आ गई. दीदी का कालेज जाने का वह आखिरी दिन था. उन्होंने सवेरे ही अपना इस्तीफा लिख लिया था.  वे रिकशा वाले की प्रतीक्षा कर रही थीं, तभी दरवाजे की घंटी बजी. दीदी ने जल्दी से दरवाजा खोला. उन के ही नाम रजिस्ट्री थी. जीजाजी ने ही रजिस्ट्री पत्र भेजा था.  दीदी पत्र को उत्सुकता से खोलने लगीं. उन के हवाई टिकट के साथ एक पत्र भी था. दीदी ने हवाई टिकट पर एक नजर डाली.

‘‘अरे, अगले इतवार की ही हवाई उड़ान है,’’ मैं ने टिकट दीदी के हाथ से ले लिया.

दीदी पत्र पढ़ने लगीं. अचानक मुझे उन के चेहरे का रंग उड़ता सा नजर आया, ‘‘जीजाजी ठीक हैं न?’’ मैं ने घबरा कर पूछा.

‘‘हां, ठीक हैं,’’ दीदी ने बस यही कहा. उन का चेहरा बिलकुल पीला पड़ गया था. वे मुझे वहीं छोड़ कर स्नानघर में चली गईं.

मैं जीजाजी का भेजा हवाई टिकट मां को दिखाने के लिए रसोई में चली गई. कुछ ही देर में भाभी भी आ गईं. रिकशा वाला बाहर घंटी बजा रहा था. हम लोग हवाई टिकट देख कर इतने उत्साहित हो गए कि दीदी की अनुपस्थिति का एहसास ही नहीं हुआ. दीदी जब स्नानघर से निकलीं तो सीधी रिकशा की ओर जाने लगीं. भाभी ने रोका तो बस यही कह दिया, ‘‘भाभीजी, मुझे देर हो रही है.’’

दीदी के चेहरे की बस एक ही झलक मैं देख पाई थी. उन्होंने चाहे भाभी के मन में कोई शक न पैदा किया हो, पर मुझे विश्वास हो गया कि दीदी स्नानघर में जरूर ही रोई होंगी. शायद वे इतनी जल्दी हम सब को छोड़ कर विदेश जाने से घबरा रही थीं. जीजाजी के साथ उन्होंने कितना कम समय बिताया था. वे दोनों एकदूसरे के लिए लगभग अजनबी ही तो थे दीदी का उसी दिन से मन खराब रहने लगा. 2-3 बार तो रोई भी थीं. मां और पिताजी उन्हें समझाने के अलावा और कर भी क्या सकते थे. इंगलैंड जाने से 2 दिन पहले वे अपनी ससुराल चली गईं.  दीदी को हवाई अड्डे पर विदा करने के लिए उन की ससुराल के लोगों के साथसाथ हम सब भी पहुंचे हुए थे. तब दीदी में काफी परिवर्तन सा नजर आ रहा था. विदा लेते समय दीदी की जेठानी ने उन से कहा, ‘‘अब तो हमें जल्दी से जल्दी खुशखबरी देना.’’

दीदी चली गईं. हम लोग भी वापस मोदीनगर आ गए. जीजाजी ने दीदी के लंदन पहुंचने का तार उन के वहां पहुंचते ही भेज दिया. तार पा कर घर में सब को बहुत राहत मिली. दीदी का पत्र भी आ गया. मां ने उन का पत्र न जाने कितनी बार पढ़ा होगा. दीदी के जाने के बाद कई सप्ताह तो घर कुछ सूनासूना लगा, परंतु बाद में सब सामान्य हो गया.

जीजाजी और दीदी के पत्र हमेशा नियमित रूप से आते रहते थे. दीदी ने मांपिताजी को तसल्ली दे रखी थी कि उन की बेटी वहां बहुत खुश है. उन को इंगलैंड गए 2 साल होने जा रहे थे. मां ने कभी दीदी को भारत आने के लिए नहीं लिखा था. सोचा था, उचित समय आने पर ही आग्रह करेंगी. मां की नजरों में उचित समय मेरी शादी का ही अवसर था, जिस के लिए मांपिताजी दौड़धूप कर रहे थे.

मां ने रसोई से आवाज दी, ‘‘सफेदी करने वाले आते ही होंगे…सामान जल्दी से निकाल कर कमरा खाली करो.’’

‘‘अच्छा मां,’’ मैं ने उत्तर दिया. पता नहीं उसी क्षण मुझे अपनी दीदी पर क्यों इतना स्नेह उमड़ आया. भावावेश में मेरी आंखें भीग गईं. फिर मुझे जीजाजी का ध्यान आया. उन्होंने अपने प्यार से दीदी के अधूरे जीवन में शायद कुछ पूर्णता सी ला दी है. यह तो हमें कभी शायद पता नहीं चल पाएगा कि दीदी वास्तव में खुश हैं या नहीं. परंतु उन के पत्रों से इस बात का जबरदस्त एहसास होता कि जीजाजी उन को बहुत प्यार करते हैं.

भाभी बंटी को विद्यालय छोड़ कर घर आ गई थीं. इस से पहले कि वे मुझे जीजाजी का पत्र पढ़ते हुए देख पातीं, मैं ने पत्र की कुछ खास पंक्तियों पर आखिरी नजर डाली. जीजाजी ने स्पष्ट शब्दों में लिखा था कि घर वालों की जिद के आगे झुक कर ही उन्होंने शादी की थी. उन की इस भूल के लिए वे स्वयं ही उत्तरदायी हैं. घर वालों में से किसी को भी नहीं मालूम था कि वे अपनी पत्नी को एक पति का सुख देने में असमर्थ हैं. वे अपनी इस शारीरिक असमर्थता को अपने परिवार वालों के सामने स्वीकार नहीं कर सके. इस के लिए वे अत्यंत दुखी हैं.

जीजाजी के पत्र के छोटेछोटे टुकड़े कर के मैं उसे घर के बाहर कूड़ेदान में फेंक आई थी.

Hindi Story : संजोग – मां-बाप के मतभेद के कारण विवेक ने लिया ये फैसला?

Hindi Story : जीवन में कुछ परिवर्तन अचानक होते हैं जो जिंदगी में खुद के दृष्टिकोण पर एक प्रश्नचिह्न लगा जाते हैं. पुराना दृष्टिकोण किसी पूर्वाग्रह से घिरा हुआ गलत साबित होता है और नया दृष्टिकोण वर्षा की पहली सोंधी फुहारों सा तनमन को सहला जाता है. सबकुछ नयानया सा लगता है.

कुछ ऐसा ही हुआ विवेक के साथ. कौसानी आने से पहले मां से कितनी जिरह हुई थी उस की. विषय वही पुराना, विवाह न करने का विवेक का अडि़यल रवैया. कितना समझाया था मां ने, ‘‘विवेक शादी कर ले, अब तो तेरे सभी दोस्त घरपरिवार वाले हो गए हैं. अगर तेरे मन में कोई और है तो बता दे, मैं बिना कोई सवाल पूछे उस के साथ तेरा विवाह रचा दूंगी.’’

विवेक का शादी न करने का फैसला मां को बेचैन कर देता. पापा कुछ नहीं कहते, लेकिन मां की बातों से मूक सहमति जताते पापा की मंशा भी विवेक पर जाहिर हो जाती, पर वह भी क्या करे, कैसे बोल दे कि शादी न करने का निर्णय उस ने अपने मम्मीपापा के कारण ही लिया है. पतिपत्नी के रूप में मम्मीपापा के वैचारिक मतभेद उसे अकसर बेचैन कर देते. एकदूसरे की बातों को काटती टिप्पणियां, अलगअलग दिशाओं में बढ़ते उन के कदम, गृहस्थ जीवन को चलाती गाड़ी के 2 पहिए तो उन्हें कम से कम नहीं कहा जा सकता था.

छोटीबड़ी बातों में उन के टकराव को झेलता संवेदनशील विवेक जब बड़ा हुआ तो शादी जैसी संस्था के प्रति पाले पूर्वाग्रहों से ग्रसित होने के कारण वह विवाह न करने का ऐलान कर बैठा. मम्मीपापा ने शुरू में तो इसे उस का लड़कपन समझा, धीरेधीरे उस की गंभीरता को देख वे सचेत हो गए.

पापा अब मम्मी की बातों का समर्थन करने लगे थे. वे अकसर विवेक को प्यार से समझाते कि सही निर्णय के लिए एक सीमा तक वैचारिक मतभेद जरूरी है. यह जरूर है कि नासमझी में आपसी सवालजवाब सीमा पार कर लेने पर टकराव का रूप ले लेते हैं, पर सिक्के का एक दूसरा पहलू भी है. समझदारी व आपसी सामंजस्य से विषम परिस्थितियों में भी तालमेल बिठाया जा सकता है.

विवाह जैसी संस्था की जड़ें बहुत गहरी व मजबूत होती हैं. छोटीमोटी बातें वृक्ष को हिला तो सकती हैं, पर उसे उखाड़ फेंकने का माद्दा नहीं रखतीं. उन की ये दलीलें विवेक को संतुष्ट न कर पातीं, लेकिन कौसानी आने पर अचानक ऐसा क्या हुआ कि दिल के जिस कोमल हिस्से को जानबूझ कर उस ने सख्त बना दिया था. उस के द्वारा बंद किए उस के दिल के दरवाजे पर कोई यों अचानक दस्तक दे प्रवेश कर जाएगा, किसी ने कहां सोचा था.

कौसानी में होटल के रिसैप्शन पर रजिस्टर साइन करते समय डा. विद्या के नाम पर उस की नजर पड़ी थी. उस शाम कैफेटेरिया में एक युवती ने बरबस ही उस का ध्यान खींचा.

सांवली सी, बड़ीबड़ी हिरनी सी बोलती आंखें, कमर तक लहराते केश, हलके नीले रंग की शिफान की साड़ी पहने वह सौम्यता की मूर्ति लग रही थी.

विवेक अपनी दृष्टि उस पर से हटा न पाया और बेखयाली में ही एक कुर्सी पर बैठ गया. तभी किसी ने आ कर कहा, ‘‘ऐक्सक्यूज मी, यह टेबल रिजर्व है…’’ उस ने झुक कर देखा तो नीचे लिखा था, डा. विद्या. वह जल्दी से खड़ा हो गया, तभी मैनेजर ने दूसरी टेबल की तरफ इशारा किया और वह उस तरफ जा कर चुपचाप बैठ गया.

‘डा. विद्या’ कितनी देर तक यह नाम उस के जेहन में डूबताउतराता रहा था. वह युवती डा. विद्या की जगह पर बैठ गई. कुछ ही देर में 2 अनजान मेहमान आए और वह उन से कुछ चर्चा करती रही. विवेक की नजरें घूमफिर कर उस पर टिक जातीं. उस के बाद तो यह सिलसिला सा बन गया था.

डा. विद्या के आने से पहले ही उस की महक फिजा में घुल कर उस के आने का संकेत दे देती. विवेक की बेचैन नजरें बढ़ी हुई धड़कन के साथ उसे खोजती रहतीं. उस पर नजर पड़ते ही उस का गला सूखने लगता और जीभ तालु से लग जाती.

वह सोचता कि यह क्या हो रहा है. ऐसा तो आज तक नहीं हुआ. सांवली सी, चंचलचितवन वाली इस लड़की ने जाने कौन सा जादू कर दिया, जिस ने उस का चैन छीन लिया है. कौसानी के ये 4-5 दिन तो जैसे पंख लगा कर उड़ गए. समय बीतने का एहसास तक नहीं हुआ.

कल विवेक के सेमिनार का अंतिम दिन था. उस दिन उस के दोस्त ध्रुव का फोन आया, वह काफी समय से विवेक को कौसानी बुला रहा था. इत्तेफाक से विवेक का सेमिनार कौसानी में आयोजित होने से उसे वहां जाने का मौका मिल गया, लेकिन अचानक ध्रुव को कुछ काम से दिल्ली जाना पड़ा.

इस होटल में ध्रुव ने ही विवेक की बुकिंग करवाई थी. ध्रुव दिल्ली में था, वरना तो वह अपने परम मित्र को कभी भी होटल में नहीं रहने देता. उस की नईनई शादी हुई थी, तो विवेक ने भी ध्रुव की अनुपस्थिति में उस के घर रहना ठीक नहीं समझा.

‘‘हैलो, धु्रव… कहां है यार, मुझे बुला कर तो तू गायब ही हो गया.’’

‘‘माफ कर दे यार, मुझे खुद इतना बुरा लग रहा है कि क्या बताऊं? मैं परसों तक कौसानी पहुंच जाऊंगा. ईशा भी तुझ से मिलना चाहती है. मैं ने उसे अपने बचपन के खूब किस्से सुनाए हैं. तब तक तुम अपना सेमिनार निबटा लो, फिर हम खूब मस्ती करेंगे,’’ ध्रुव ने फोन पर कहा.

दूसरे दिन विवेक का सेमिनार था. होटल आतेआते उसे शाम हो गई थी. वह थक गया था. फ्रैश हो कर वह कैफेटेरिया की तरफ गया. प्रवेश करते ही उस का सामना फिर डा. विद्या से हुआ. वह नाश्ता कर रही थी. हलके गीले बाल, जींस के ऊपर चिकन की कुरती पहने, वह ताजी हवा की मानिंद विवेक के दिल को छू गई.

वह असहज हो गया था. उस के दिल की धड़कनें बढ़ गई थीं. जाने क्यों, उसे ऐसा लगा कि पाले के उस पार बैठी उस युवती के हृदय में भी कुछ ऐसा बवंडर उठा है. क्या वह भी अपने परिचय का दायरा विस्तृत करना चाहती है? वे दोनों ही अनजान बने बैठे थे. उन की नजरें जबतब इधरउधर भटक कर एकदूसरे पर पड़ जातीं. तभी वेटर ने आ कर पूछा, ‘‘आप कुछ लेंगे,’’ तो विवेक को मन मार कर उठना पड़ा. वह समझ गया कि यों अंधेरे में तीर चलाने का कोई फायदा नहीं है.

कमरे में आते ही उस ने अपना लैपटौप निकाला. अपना ईमेल अकाउंट खोला, तो उस में फेसबुक की तरफ से मां का मैसेज देखा. उस लिंक पर जाने पर मां की फ्रैंड्स लिस्ट में एक चेहरे पर उस की नजर पड़ी जिसे देख कर वह चौंक उठा, ‘‘ओ माई गौड, यह यहां कैसे?’’

मां की फ्रैंड्स लिस्ट में डा. विद्या की तसवीर देख उस की आंखें विस्मय से फैल गईं. शायद धोखा हुआ है, परंतु नाम देख कर तो विश्वास करना ही पड़ा. मां कैसे जानती हैं इसे. उस ने पहले तो कभी इस चेहरे पर ध्यान ही नहीं दिया.

विवेक चकरा गया था. शायद मां की मैडिकल एडवाइजर हों. उस ने तुरंत मां को फोन कर के डा. विद्या के बारे में पूछा, तो उन्होंने सहजता से बताया, ‘‘यह तो मेरी डाक्टर है. तुम्हारे दोस्त ध्रुव ने ही तो इस के बारे में बताया था. यह धु्रव की दोस्त है और काफी नामी डाक्टर है यहां की.’’

विवेक की जिज्ञासा चरम पर पहुंचने लगी. उस ने तुरंत फ्रैंड्स लिस्ट के माध्यम से विवेक का फेसबुक अकाउंट खोला, तो उस में भी उस युवती की तसवीर थी. ध्रुव के वालपोस्ट को चैक करने पर उस के द्वारा विद्या को दिया गया मैसेज देखा, जिस में ध्रुव ने विद्या को विवेक के कौसानी आने के बारे में बताया था.

विवेक ने डा. विद्या वाली उलझी गुत्थी को सुलझाने के लिए ध्रुव को फोन लगाया तो लगातार उस का फोन स्विच औफ आता रहा. ईशा भाभी से पूछना कुछ ठीक नहीं लगा. क्यों न हिम्मत कर डा. विद्या से ही बात करूं कि यह माजरा क्या है? पर अब रात बहुत हो चुकी थी. अभी जाना ठीक नहीं है. पूरी रात उस की करवटें बदलते बीती. सुबहसुबह ही उस ने रिसैप्शन से डा. विद्या के बारे में पता किया, तो पता चला मैडम सुबहसुबह ही कहीं निकल गई हैं.

ध्रुव का मोबाइल अभी भी स्विच औफ आता रहा. उस की बेचैनी व उत्कंठा बढ़ती ही जा रही थी. वह रिसैप्शन में ही डेरा डाल कर बैठ गया. अचानक ध्रुव ने प्रवेश किया, वह जैसे ही उस की ओर बढ़ता ईशा से बतियाती डा. विद्या भी साथ आती दिखी. विवेक के कदम वहीं थम गए. उसे पसोपेश में पड़ा देख ध्रुव शरारत से मुसकराया. विद्या एक औपचारिक ‘हैलो’ करती हुई बोली, ‘‘मैं अभी फ्रैश हो कर आती हूं, आज का डिनर तुम दोस्तों को मेरी तरफ से,’’ कह कर वह चली गई.

विवेक को चक्कर में पड़ा देख ध्रुव को हंसी आ गई.

‘‘तुम जानते हो इसे,’’ विवेक ने पूछा तो कंधे उचाकते हुए ध्रुव बोला, ‘‘हां, दोस्त है मेरी, मतलब हमारी पुरानी स्कूल की दोस्ती है.’’

‘‘ऐसी कौन सी दोस्त है तुम्हारी, जिसे मैं नहीं जानता,’’ विवेक बोला.

‘‘तुम नहीं जानते? क्या बात कर रहे हो.’’

‘‘ध्रुव, प्लीज साफसाफ बताओ कौन है ये? तुम ने इसे ईमेल के जरिए यह क्यों बताया कि मैं कौसानी आ रहा हूं.’’

‘‘कमाल है यार, एक दोस्त दूसरे दोस्त के बारे में पूछे तो क्यों न बताऊं,’’ ध्रुव ने कहा.

‘‘ओफ, ध्रुव, अब बस भी करो,’’ विवेक के चेहरे पर झुंझलाहट और उस की विचित्र मनोदशा का आनंद लेता हुआ ध्रुव आराम से सोफे पर बैठ गया और उस की आंखों को देखता हुआ बोला, ‘‘विवेक, तुझे अपनी क्लास टैंथ याद है. सहारनपुर से आई वह झल्ली सी लड़की, जिस के कक्षा में प्रवेश करते ही हम सब को हंसी आ गई थी. जिस से तेरा फ्रैंडशिप बैंड बंधवाना चर्चा का विषय बन गया था. सब ने कितनी खिल्ली उड़ाई थी तेरी.’’

विवेक के चेहरे का रंग बदलता गया और अचानक वह बोला, ‘‘ओ माई गौड, यह वह विद्या है, जिस के तेल से तर बाल चर्चा का विषय थे.

‘‘कितनी हंसती थी सारी लड़कियां. मीरा मैम ने जब डौली को घर से तेल लगा कर आने को कहा तो कैसे हंस कर वह बोली, ‘हम सब के हिस्से का तेल तो विद्या लगाती है न मैम…’ उस की इस बात पर सब कैसे ठहाका लगा कर हंस पड़े थे.’’

विद्या लगभग बीच सैशन में आई थी. मैम ने जब सब से कहा कि विद्या का काम पूरा करने के लिए सब उसे सहयोग करें. उस का काम पूरा करने के लिए अपने नोट्स उसे दे दें, तो विद्या कैसी मासूमियत से ध्रुव की ओर इशारा कर के बोली थी, ‘मैम, ये भैया, अपनी कौपी मुझे नहीं दे रहे हैं.’ उस के भैया शब्द पर पूरी क्लास ठहाकों से गूंज उठी थी. खुद मीरा मैम भी अपनी हंसी दबा नहीं पाई थीं. छोटे शहर की मानसिकता किसी से भी हजम नहीं होती. लड़कियों का तो वह सदा ही निशाना रहती थी.

विद्या पढ़ने में तो तेज थी, लेकिन अंगरेजी उस की सब से बड़ी प्रौब्लम थी. अंगरेजी माध्यम से पढ़ते हुए उसे खासी दिक्कत पेश आई थी. फिर उसे ‘फ्रैंडशिप डे’ का वह दिन याद आया, जब सभी एकदूसरे को फ्रैंडशिप बैंड बांध रहे थे, तो किसी ने विद्या पर कमेंट किया, ‘विद्या तुम से तो हम सब राखी बंधवाएंगे.’ उस की आंखों में आंसू आ गए. बेचारगी से उस ने अपनी मुट्ठी में रखे बैंड छिपा लिए थे.

विवेक को उस बेचारी सी लड़की पर बड़ा तरस आया. सब के जाने के बाद विवेक और धु्रव ने उस से फ्रैंडशिप बैंड बंधवाया, पर यह दोस्ती ज्यादा दिन तक नहीं चल पाई थी.

एक साल बाद ही विद्या कोटा चली गई. ध्रुव ने बताया कि जुझारू विद्या का मैडिकल में चयन हो गया था.

विवेक मानो स्वप्न से जागा हो. जब उस ने आत्मविश्वास से भरी, मुसकराती हुई डा. विद्या को आते देखा. कोई इतना कैसे बदल सकता है. विद्या ने आते ही विवेक की आंखों में झांक कर पूछा, ‘‘अभी भी नहीं पहचाना तुम ने, मैं ने तो तुम्हें फेसबुक पर कब का ढूंढ़ लिया था, लेकिन तुम्हारी अतीत की स्मृति में बसी विद्या के रूप से डरती थी.’’

ध्रुव ने खुलासा किया कि हम सब ने विद्या को विस्मृत कर दिया था, लेकिन यह तुम्हें कभी भुला न पाई.

विद्या लरजते स्वर में बोली, ‘‘विवेक, तुम्हें तो मालूम भी नहीं होगा कि उम्र के उस नाजुक दौर में मैं अपना दिल तुम्हें दे बैठी थी. मुझे नहीं पता कि कच्ची उम्र में तुम्हारे प्रति मेरा वह एकतरफा तथाकथित प्यार था या महज आकर्षण, पर यह सच है कि स्वयं को तुम्हारे काबिल बनाने की होड़ व जनून ने ही मुझे कुछ कर दिखाने की प्रेरणा व हिम्मत दी. मुझे सफलता के इस मुकाम तक पहुंचाने का एक अप्रत्यक्ष जरिया तुम बने. किस ने सोचा था कि कभी तुम से यों मुलाकात भी होगी.’’

‘‘वह भी इतने नाटकीय तरीके से,’’ कहता हुआ ध्रुव हंस पड़ा, ‘‘पिछले 6 महीने से विद्या के साथ तुम्हारे बारे में ही बातें होती रहीं. तुम्हारी शादी न करने की बेवजह जिद से परेशान हो कर आंटी ने जब मैट्रीमोनियल साइट पर तुम्हारा बायोडाटा डाल दिया था तब आंटी को मैं ने ही विश्वास में ले कर विद्या के बारे में बताया. अब मुसीबत यह थी कि तुम्हारी आशा के अनुरूप तो कोई उतर ही नहीं रहा था. तो हम सब ने यह नाटक रचा.

‘‘तुम कौसानी आए, तो मैं ने झूठ बोला कि मैं दिल्ली जा रहा हूं, ताकि तुम होटल में रुको. विद्या तुम से मिलना चाहती थी, पर बिना किसी पूर्वाग्रह के, हालांकि हमें संदेह था कि कोई यों आसानी से तुम्हारे हृदय में अधिकार जमा भी पाएगी. शायद नियति को भी यह संजोग मंजूर था.’’

‘‘पर तुम मुझे एक बार बताते तो सही,’’ विवेक हैरानी से बोला.

ध्रुव बोल पड़ा, ‘‘ताकि तुम अपनी जिद के कारण अपने दिल के दरवाजे को स्वयं बंद कर देते.’’

तभी मां का फोन आया. उन के कुछ पूछने से पहले ही विवेक बोल उठा, ‘‘मां, तुम्हारी खोज पूरी हो गई है. जल्दी ही मैं एक डाक्टर बहू घर ले कर आ रहा हूं. आप पापा के साथ मिल कर शादी की पूरी तैयारी कर लेना.’’

मां भावुक हो उठी थीं, ‘‘विवेक समस्याएं तो हर एक के जीवन में आती हैं, पर उन से डर कर रिश्ते के बीजों को कभी बोया ही न जाए, यह सही नहीं है. हम ने नासमझी की, पर मेरा बेटा समझदार है और विद्या भी बहुत सुलझी हुई लड़की है. मुझे पूरा विश्वास है कि तुम दोनों

तभी पीछे से ईशा ने विवेक को छेड़ते हुए कहा, ‘‘क्यों विवेक भैया, एक बार फिर एक विश्वामित्र की तपस्या टूट ही गई.’’

विवेक और ध्रुव उस की बात पर जोर से हंस पड़े. विवेक ने विद्या के हाथों को ज्यों ही अपने हाथों में थामा, उस की नारी सुलभ लज्जा व गरिमा ने उस के सौंदर्य को अपरिमित कर दिया.

Hindi Story : एक गलत सोच – जब बहू चुनने में हुई सरला से गलती

Hindi Story : किचन में खड़ा हो कर खाना बनातेबनाते सरला की कमर दुखने लगी पर वे क्या करें, इतने मेहमान जो आ रहे हैं. बहू की पहली दीवाली है. कल तक उसे उपहार ले कर मायके जाना था पर अचानक बहू की मां का फोन आ गया कि अमेरिका से उन का छोटा भाई और भाभी आए हुए हैं. वे शादी पर नहीं आ सके थे इसलिए वे आप सब से मिलना चाहते हैं. उन्हीं के साथ बहू के तीनों भाई व भाभियां भी अपने बच्चों के साथ आ रहे हैं.

कुकर की सीटी बजते ही सरला ने गैस बंद कर दी और ड्राइंगरूम में आ गईं. बहू आराम से बैठ कर गिफ्ट पैक कर रही थी.

‘‘अरे, मम्मी देखो न, मैं अपने भाईभाभियों के लिए गिफ्ट लाई हूं. बस, पैक कर रही हूं…आप को दिखाना चाहती थी पर जल्दी है, वे लोग आने वाले हैं इसलिए पैक कर दिए,’’ बहू ने कुछ पैक किए गिफ्ट की तरफ इशारा करते हुए कहा. तभी सरलाजी का बेटा घर में दाखिल हुआ और अपनी पत्नी से बोला, ‘‘सिमी, एक कप चाय बना लाओ. आज आफिस में काफी थक गया हूं.’’

‘‘अरे, आप देख नहीं रहे हैं कि मैं गिफ्ट पैक कर रही हूं. मां, आप ही बना दीजिए न चाय. मुझे अभी तैयार भी होना है. मेरी छोटी भाभी बहुत फैशनेबल हैं. मुझे उन की टक्कर का तैयार होना है,’’ इतना कह कर सिमी अपने गिफ्ट पैक करने में लग गई.

शाम को सरलाजी के ड्राइंगरूम में करीब 10-12 लोग बैठे हुए थे. उन में बहू के तीनों भाई, उन की बीवियां, बहू के मम्मीपापा, भाई के बच्चे और उन सब के बीच मेहमानों की तरह उन की बहू सिमी बैठी थी. सरला ने इशारे से बहू को बुलाया और रसोईघर में ले जा कर कहा, ‘‘सिमी, सब के लिए चाय बना दे तब तक मैं पकौड़े तल लेती हूं.’’

‘‘क्या मम्मी, मायके से परिवार के सारे लोग आए हैं और आप कह रही हैं कि मैं उन के साथ न बैठ कर यहां रसोई में काम करूं? मैं तो कब से कह रही हूं कि आप एक नौकर रख लो पर आप हैं कि बस…अब मुझ से कुछ मत करने को कहिए. मेरे घर वाले मुझ से मिलने आए हैं, अगर मैं यहां किचन में लगी रहूंगी तो उन के आने का क्या फायदा,’’ इतना कह कर सिमी किचन से बाहर निकल गई और सरला किचन में अकेली रह गईं. उन्होंने शांत रह कर काम करना ही उचित समझा.

सरलाजी ने जैसेतैसे चाय और पकौड़े बना कर बाहर रख दिए और वापस रसोई में खाना गरम करने चली गईं. बाहर से ठहाकों की आवाजें जबजब उन के कानों में पड़तीं उन का मन जल जाता. सरला के पति एकदो बार किचन में आए सिर्फ यह कहने के लिए कि कुछ रोटियों पर घी मत लगाना, सिमी की भाभी नहीं खाती और खिलाने में जल्दी करो, बच्चों को भूख लगी है.

सरलाजी का खून तब और जल गया जब जातेजाते सिमी की मम्मी ने उन से यह कहा, ‘‘क्या बहनजी, आप तो हमारे साथ जरा भी नहीं बैठीं. कोई नाराजगी है क्या?’’

सब के जाने के बाद सिमी तो तुरंत सोने चली गई और वे रसोई संभालने में लग गईं.

अगले दिन सरलाजी का मन हुआ कि वे पति और बेटे से बीती शाम की स्थिति पर चर्चा करें पर दोनों ही जल्दी आफिस चले गए. 2 दिन बाद फिर सिमी की एक भाभी घर आ गई और उस को अपने साथ शौपिंग पर ले गई. शादी के बाद से यह सिलसिला अनवरत चल रहा था. कभी किसी का जन्मदिन, कभी किसी की शादी की सालगिरह, कभी कुछ तो कभी कुछ…सिमी के घर वालों का काफी आनाजाना था, जिस से वे तंग आ चुकी थीं.

एक दिन मौका पा कर उन्होंने अपने पति से इस बारे में बात की, ‘‘सुनो जी, सिमी न तो अपने घर की जिम्मेदारी संभालती है और न ही समीर का खयाल रखती है. मैं चाहती हूं कि उस का अपने मायके आनाजाना कुछ कम हो. शादी को साल होने जा रहा है और बहू आज भी महीने में 7 दिन अपने मायके में रहती है और बाकी के दिन उस के घर का कोई न कोई यहां आ जाता है. सारासारा दिन फोन पर कभी अपनी मम्मी से, कभी भाभी तो कभी किसी सहेली से बात करती रहती है.’’

‘‘देखो सरला, तुम को ही शौक था कि तुम्हारी बहू भरेपूरे परिवार की हो, दिखने में ऐश्वर्या राय हो. तुम ने खुद ही तो सिमी को पसंद किया था. कितनी लड़कियां नापसंद करने के बाद अब तुम घर के मामले में हम मर्दों को न ही डालो तो अच्छा है.’’

सरलाजी सोचने लगीं कि इन की बात भी सही है, मैं ने कम से कम 25 लड़कियों को देखने के बाद अपने बेटे के लिए सिमी को चुना था. तभी पति की बातों से सरला की तंद्रा टूटी. वे कह रहे थे, ‘‘सरला, तुम कितने दिनों से कहीं बाहर नहीं गई. ऐसा करो, तुम अपनी बहन के घर हो आओ. तुम्हारा मन अच्छा हो जाएगा.’’

अपनी बहन से मिल कर अपना दिल हलका करने की सोच से ही सरला खुश हो गईं. अगले दिन ही वे तैयार हो कर अपनी बहन से मिलने चली गईं, जो पास में ही रहती थीं. पर बहन के घर पर ताला लगा देख कर उन का मन बुझ गया. तभी बहन की एक पड़ोसिन ने उन्हें पहचान लिया और बोलीं, ‘‘अरे, आप सरलाजी हैं न विभाजी की बहन.’’

‘‘जी हां, आप को पता है विभा कहां गई है?’’

‘‘विभाजी पास के बाजार तक गई हैं. आप आइए न.’’

‘‘नहींनहीं, मैं यहीं बैठ कर इंतजार कर लेती हूं,’’ सरला ने संकोच से कहा.

‘‘अरे, नहीं, सरलाजी आप अंदर आ कर इंतजार कर लीजिए. वे आती ही होंगी,’’ उन के बहुत आग्रह पर सरलाजी उन के घर चली गईं.

‘‘आप की तसवीर मैं ने विभाजी के घर पर देखी थी…आइए न, शिखा जरा पानी ले आना,’’ उन्होंने आवाज लगाई.

अंदर से एक बहुत ही प्यारी सी लड़की बाहर आई.

‘‘बेटा, देखो, यह सरलाजी हैं, विभाजी की बहन,’’ इतना सुनते ही उस लड़की ने उन के पैर छू लिए.

सरला ने उसे मन से आशीर्वाद दिया तो विभा की पड़ोसिन बोलीं, ‘‘यह मेरी बहू है, सरलाजी.’’

‘‘बहुत प्यारी बच्ची है.’’

‘‘मम्मीजी, मैं चाय रखती हूं,’’ इतना कह कर वह अंदर चली गई. सरला ने एक नजर घुमाई. इतने सलीके से हर चीज रखी हुई थी कि देख कर उन का मन खुश हो गया. कितनी संस्कारी बहू है इन की और एक सिमी है.

‘‘बहनजी, विभा दीदी आप की बहुत तारीफ करती हैं,’’ मेरा ध्यान विभा की पड़ोसिन पर चला गया. इतने में उन की बहू चायबिस्कुट के साथ पकौड़े भी बना कर ले आई और बोली, ‘‘लीजिए आंटीजी.’’

‘‘हां, बेटा…’’ तभी फोन की घंटी बज गई. पड़ोसिन की बहू ने फोन उठाया और बात करने के बाद अपनी सास से बोली, ‘‘मम्मी, पूनम दीदी का फोन था. शाम को हम सब को खाने पर बुलाया है पर मैं ने कह दिया कि आप सब यहां बहुत दिनों से नहीं आए हैं, आप और जीजाजी आज शाम खाने पर आ जाओ. ठीक कहा न.’’

‘‘हां, बेटा, बिलकुल ठीक कहा,’’ बहू किचन में चली गई तो विभा की पड़ोसिन मुझ से बोलीं, ‘‘पूनम मेरी बेटी है. शिखा और उस में बहुत प्यार है.’’

‘‘अच्छा है बहनजी, नहीं तो आजकल की लड़कियां बस, अपने रिश्तेदारों को ही पूछती हैं,’’ सरला ने यह कह कर अपने मन को थोड़ा सा हलका करना चाहा.

‘‘बिलकुल ठीक कहा बहनजी, पर मेरी बहू अपने मातापिता की अकेली संतान है. एकदम सरल और समझदार. इस ने यहां के ही रिश्तों को अपना बना लिया है. अभी शादी को 5 महीने ही हुए हैं पर पूरा घर संभाल लिया है,’’ वे गर्व से बोलीं.

‘‘बहुत अच्छा है बहनजी,’’ सरला ने थोड़ा सहज हो कर कहा, ‘‘अकेली लड़की है तो अपने मातापिता के घर भी बहुत जाती होगी. वे अकेले जो हैं.’’

‘‘नहीं जी, बहू तो शादी के बाद सिर्फ एक बार ही मायके गई है. वह भी कुछ घंटे के लिए.’’

हम बात कर ही रहे थे कि बाहर से विभा की आवाज आई, ‘‘शिखा…बेटा, घर की चाबी दे देना.’’

विभा की आवाज सुन कर शिखा किचन से निकली और उन को अंदर ले आई. शिखा ने खाने के लिए रुकने की बहुत जिद की पर दोनों बहनें रुकी नहीं. अगले ही पल सरलाजी बहन के घर आ गईं. विभा के दोनों बच्चे अमेरिका में रहते थे. वह और उस के पति अकेले ही रहते थे.

‘‘दीदी, आज मेरी याद कैसे आ गई?’’ विभा ने मेज पर सामान रखते हुए कहा.

‘‘बस, यों ही. तू बता कैसी है?’’

‘‘मैं तो ठीक हूं दीदी पर आप को क्या हुआ कि कमजोर होती जा रही हो,’’ विभा ने कहा. शायद सरला की परेशानियां उस के चेहरे पर भी झलकने लगी थीं.

‘‘आंटीजी, आज मैं ने राजमा बनाया है. आप को राजमा बहुत पसंद है न. आप तो खाने के लिए रुकी नहीं इसलिए मैं ले आई और इन्हें किचन में रख रही हूं,’’ अचानक शिखा दरवाजे से अंदर आई, किचन में राजमा रख कर मुसकराते हुए चली गई.

‘‘बहुत प्यारी लड़की है,’’ सरला के मुंह से अचानक निकल गया.

‘‘अरे, दीदी, यही वह लड़की है जिस की बात मैं ने समीर के लिए चलाई थी. याद है न आप को इन के आफिस के एक साथी की बेटी…दीदी आप को याद नहीं आया क्या…’’ विभा ने सरला की याददाश्त पर जोर डालने को कहा.

‘‘अरे, दीदी, जिस की फोटो भी मैं ने मंगवा ली थी, पर इस का कोई भाई नहीं था, अकेली बेटी थी इसलिए आप ने फोटो तक नहीं देखी थी.’’

विभा की बात से सरला को ध्यान आया कि विभा ने उन से इस लड़की के बारे में कहा था पर उन्होंने कहा था कि जिस घर में बेटा नहीं उस घर की लड़की नहीं आएगी मेरे घर में, क्योंकि मातापिता कब तक रहेंगे, भाइयों से ही तो मायका होता है. तीजत्योहार पर भाई ही तो आता है. यही कह कर उन्होंने फोटो तक नहीं देखी थी.

‘‘दीदी, इस लड़की की फोटो हमारे घर पर पड़ी थी. श्रीमती वर्मा ने देखी तो उन को लड़की पसंद आ गई और आज वह उन की बहू है. बहुत गुणी है शिखा. अपने घर के साथसाथ हम पतिपत्नी का भी खूब ध्यान रखती है. आओ, चलो दीदी, हम खाना खा लेते हैं.’’

राजमा के स्वाद में शिखा का एक और गुण झलक रहा था. घर वापस आते समय सरलाजी को अपनी गलती का एहसास हो रहा था कि लड़की के गुणों को अनदेखा कर के उन्होंने भाई न होने के दकियानूसी विचार को आधार बना कर शिखा की फोटो तक देखना पसंद नहीं किया. इस एक चूक की सजा अब उन्हें ताउम्र भुगतनी होगी.

Hindi Story : जो बोया सो काटा

Hindi Story : बच्चों के साथ रहने के मामले में मनीषा व निरंजन के सुनेसुनाए अनुभव अच्छे नहीं थे. अपने दोस्तों व सगेसंबंधियों के कई अनुभवों से वे अवगत थे कि बच्चों के पास जा कर जिंदगी कितनी बेगानी हो जाती है, लेकिन अब मजबूरी थी कि उन्हें बच्चों के पास जाना ही था क्योंकि वे शारीरिक व मानसिक रूप से लाचार हो गए थे.

उम्र अधिक हो जाने से शरीर कमजोर हो गया था. निरंजन के लिए अब बाहर के छोटेछोटे काम निबटाना भी भारी पड़ रहा था. कार चलाने में दिक्कत होती थी. मनीषा वैसे तो घर का काम कर लेती थीं लेकिन अकेले ही पूरी जिम्मेदारी संभालना मुश्किल हो जाता था. नौकरचाकरों का कोई भरोसा नहीं, काम वाली थी, कभी आई कभी नहीं.

छुट््टियां न मिलने की वजह से बेटा अनुज भी कम ही आ पाता था. इसलिए उन्हें अब मानसिक अकेलापन भी खलने लगा था. अकेले रहने में अपनी बीमारियों से भी निरंजनजी डरते थे.

यही सब सोचतेविचारते अपने अनुभवों से डरतेडराते आखिर उन्होंने भी लड़के के साथ रहने का फैसला ले ही लिया.

इस बारे में उन्होंने पहले बेटे को चिट्ठी लिखना ठीक समझा ताकि बेटे और बहू के मूड का थोड़ाबहुत पहले से ही पता

चल जाए.

हफ्ते भर के अंदर ही बेटे का फोन आ गया कि पापा, आज ही आप की चिट्ठी मिली है. आप मेरे पास आना चाह रहे हैं, यह हम सब के लिए बहुत खुशी की बात है. बच्चे और नीता तो इतने खुश हैं कि अभी से आप के आने का इंतजार करने लगे हैं. आप बताइए, कब आ रहे हैं? मैं लेने आ जाऊं या फिर आप खुद ही आ जाएंगे?

फोन पर बेटे की बातें सुन कर निरंजन की आंखें भर आईं. प्रत्युत्तर में बोले, ‘‘हम खुद ही आ जाएंगे, बेटे… परसों सुबह यहां से टैक्सी से चलेंगे और शाम 7 बजे के आसपास वहां पहुंच जाएंगे.’’

‘‘ठीक है, पापा,’’ कह कर बेटे ने फोन रख दिया.

‘‘अनुज हमारे आने की बात सुन कर बहुत खुश है,’’ निरंजन बोले.

‘‘अभी तो खुश है पर पता नहीं हमेशा साथ रहने में कैसा रुख हो,’’ मनीषा अपनी शंका जाहिर करती हुई बोलीं.

‘‘सब अच्छा होगा, मनीषा,’’ निरंजन दिलासा देते हुए बोले.

शाम के 7 बजे जब निरंजन और मनीषा बेटे के घर पर पहुंचे तो बेटेबहू और बच्चे उन के इंतजार में बैठे थे. दरवाजे पर टैक्सी रुकने की आवाज सुन कर चारों घर से बाहर निकल पड़े.

दादाजी…दादाजी कहते हुए दोनों बच्चे पैर छूते हुए उन से चिपक गए. बेटेबहू ने भी पैर छुए. सब ने एकएक सामान उठा लिया. यहां तक कि बच्चों ने भी छोटा सामान उठाया और सब एकसाथ अंदर आ गए.

मन में शंका थी कि थोड़े दिन रहने की बात अलग थी पर हमेशा के लिए रहना…न जाने कैसा हो.

नीता चायनाश्ता बना कर ले आई. सभी बैठ कर गपशप करने लगे.

‘‘मम्मीपापा, आप फ्रेश हो लीजिए,’’ बहू नीता बोली, ‘‘इस कमरे में आप का सामान रख दिया है. आज से यह कमरा आप का है.’’

‘‘यह हमारा कमरा…पर यह तो बच्चों का कमरा है…’’

‘‘बच्चे  छोटे वाले कमरे में शिफ्ट हो गए हैं.’’

‘‘लेकिन तुम ने बच्चों का कमरा क्यों बदला, बहू…उन की पढ़ाईलिखाई डिस्टर्ब होगी. फिर उस छोटे से कमरे में दोनों कैसे रहेंगे?’’

‘‘कैसी बात कर रही हैं, मम्मीजी आप, घर के सब से बड़े क्या सब से छोटे कमरे में रहेंगे. बच्चों की पढ़ाई और सामान वगैरह के लिए अलग कमरा चाहिए…रात में तो दोनों आप के साथ ही घुस कर सोने वाले हैं,’’ नीता हंसते हुए बोली.

मनीषा को सुखद एहसास हुआ. बेटा तो अपना ही है लेकिन बहू के मुंह से ऐसे शब्द सुन कर जैसे दिल की शंकाओं का कठोर दरवाजा थोड़ा सा खुल गया.

सुबह बहुत देर से नींद खुली. निरंजन उठ कर बाथरूम हो आए. अंदर खटरपटर की आवाज सुन कर नीता ने चाय बना दी. उस दिन रविवार था.  बच्चे व अनुज भी घर पर थे.

चाय की टे्र ले कर नीता दरवाजे पर खटखट कर बोली, ‘‘मम्मीजी, चाय.’’

‘‘आजा…आजा बेटी…अंदर आजा,’’ निरंजन बोले.

‘‘नींद ठीक से आई, पापा,’’ नीता चाय की ट्रे मेज पर रखती हुई बोली.

‘‘हां, बेटी, बहुत अच्छी नींद आई. बच्चे और अनुज कहां हैं?’’ मनीषा ने पूछा.

‘‘सब उठ गए हैं. बच्चों ने तो अभी तक दूध भी नहीं पिया है. कह रहे थे कि जब दादाजी उठ जाएंगे तो वे चाय पीएंगे और हम दूध.’’

‘‘तुम ने भी अभी तक चाय नहीं पी,’’ मनीषा ट्रे में चाय के 4 कप देख कर बोलीं.

‘‘मम्मीजी, हम एक बार की चाय तो पी चुके हैं, दूसरी बार की चाय आप के साथ बैठ कर पीएंगे.’’

तभी बच्चे व अनुज कमरे में घुस गए और दादादादी के बीच में बैठ गए.

‘‘दादाजी, पापा कहते हैं कि वह आप से बहुत डरते थे. आप जब आफिस से आते थे तो वह एकदम पढ़ने बैठ जाते थे, सच्ची…’’ पोता बोला.

‘‘पापा यह भी कहते हैं कि वह बचपन में बहुत शैतान थे और दादी को बहुत तंग करते थे. है न दादी?’’ पोती बोली थी.

दोनों बच्चों की बातें सुन कर निरंजन व  मनीषा हंसने लगे.

‘‘सभी बच्चे बचपन में अपनी मम्मी को तंग करते हैं और अपने पापा से डरते हैं,’’ निरंजन बच्चों को प्यार करते हुए बोले.

‘‘हां, और मम्मी कहती हैं कि सभी मम्मीपापा अपने बच्चों को बहुत प्यार करते हैं…जैसे दादादादी मम्मीपापा को प्यार करते हैं और मम्मीपापा हमें.’’

पोती की बात सुन कर मनीषा व निरंजन की नजरें नीता के चेहरे पर उठ गईं. नीता का खुशनुमा चेहरा दिल में उतर गया. दोनों ने मन में सोचा, एक अच्छी मां ही बच्चों को अच्छे संस्कार दे सकती है.

दोपहर के खाने में नीता ने कमलककड़ी के कोफ्ते और कढ़ी बना रखी थी.

‘‘पापा, आप यह कोफ्ते खाइए. ये बताते हैं कि आप को कमलककड़ी के कोफ्ते बहुत पसंद हैं,’’ नीता कोफ्ते प्लेट में रखती हुई बोली.

‘‘और मम्मी को कढ़ी बहुत पसंद है. है न मम्मी?’’ अनुज बोला, ‘‘याद है मैं कढ़ी और कमलककड़ी के कोफ्ते बिलकुल भी पसंद नहीं करता था. और मेरे कारण आप अपनी पसंद का खाना कभी भी नहीं बनाती थीं. अब आप की पसंद का खाना ही बनेगा और हम भी खाएंगे.’’

बेटा बोला तो मनीषा को अपने भावों पर नियंत्रण रखना मुश्किल हो गया. आंखों के कोर भीग गए.

‘‘नहीं बेटा, खाना तो बच्चों की पसंद का ही बनता है, जो बच्चों को पसंद हो वही बनाया करो.’’

रात को पोते व पोती में ‘बीच में कौन सोएगा’ इस को ले कर होड़ हो गई. आखिर दोनों बीच में सो गए.

थोड़ी देर बाद नीता आ गई.

‘‘चलो, बच्चो, अपने कमरे में चलो.’’

‘‘नहीं, हम यहीं सोएंगे,’’ दोनों चिल्लाए.

‘‘नहीं, दादादादी को आराम चाहिए, तुम अपने कमरे में सोओ.’’

‘‘रहने दे, बेटी,’’ निरंजन बोले, ‘‘2-4 दिन यहीं सोने दे. जब मन भर जाएगा तो खुद ही अपने कमरे में सोने लगेंगे.’’

दोनों बच्चे उस रात दादादादी से चिपक कर सो गए.

दिन बीतने लगे. नीता हर समय उन की छोटीछोटी बातों का खयाल रखती. बेटा भी आफिस से आ कर उन के पास जरूर बैठता.

एक दिन मनीषा शाम को कमरे से बाहर निकली तो नीता फोन पर कह रही थी, ‘‘मैं नहीं आ सकती… मम्मीपापा आए हुए हैं. यदि मैं आ गई तो वे दोनों अकेले रह जाएंगे. उन को खराब लगेगा,’’ कह कर उस ने बात खत्म कर दी.

‘‘कहां जाने की बात हो रही थी, बेटी?’’

‘‘कुछ नहीं, मम्मीजी, ऐसे ही, मेरी सहेली बुला रही थी कि बहुत दिनों से नहीं आई.’’

‘‘तो क्यों नहीं जा रही हो. हम अकेले कहां हैं, और फिर थोड़ी देर अकेले भी रहना पड़े तो क्या हो गया. देखो बेटी, तुम अगर नहीं जाओगी तो मैं बुरा मान जाऊंगी.’’

नीता कुछ न बोली और दुविधा में खड़ी रही.

मनीषा नीता के कंधे पर हाथ रख कर बोलीं, ‘‘बेटी, मम्मीपापा आ गए हैं इसलिए अगर तुम ने अपनी दिनचर्या में बंधन लगाए तो हम यहां कैसे रह पाएंगे. यह अब कोई 2-4 दिन की बात थोड़े न है, अब तो हम यहीं हैं.’’

‘‘कैसी बात कर रही हैं, मम्मीजी. आप का रहना हमारे सिरआंखों पर. मैं बंधन थोड़े न लगा रही हूं… और थोड़ाबहुत बंधन रहे भी तो क्या, बच्चों के कारण मांबाप बंधन में नहीं रहते हैं. फिर बच्चों को भी मांबाप के कारण बंधना पड़े तो कौन सी बड़ी बात है.’’

नीता की बात सुन कर मनीषा ने चाहा कि उस को गले लगा कर खूब प्यार करें.

मनीषा ने नीता को जबरन भेज दिया. धीरेधीरे मनीषा की कोशिश से नीता भी अपनी स्वाभाविक दिनचर्या में रहने लगी. उस ने 1-2 किटी भी डाली हुई थीं तो मनीषा ने उसे वहां भी जबरदस्ती भेजा.

उस की सहेलियां जब घर आतीं तो मनीषा चाय बना देतीं. नाश्ते की प्लेट सजा देतीं. नीता के मना करने पर प्यार से कहतीं, ‘‘तुम जो हमारे लिए इतना करती हो, थोड़ा सा मैं ने भी कर दिया तो कौन सी बड़ी बात कर दी.’’

अनुज व नीता को अब कई बातों की सुविधा हो गई थी. कहीं जाना होता तो दादादादी के होने से बच्चों की तरफ से दोनों ही निश्ंिचत रहते.

महीना खत्म हुआ. निरंजन को पेंशन मिली. उन्होंने अपना पैसा बहू को देने की पेशकश की तो अनुज व नीता दोनों नाराज हो गए.

‘‘पापा, आप कैसी बातें कर रहे हैं. पैसे दे कर ही रहना है तो आप कहीं भी रह सकते हैं. आप ने हमारे लिए जीवन भर इतना किया, पढ़ायालिखाया और मुझे इस लायक बनाया कि मैं आप की देखभाल कर सकूं,’’ अनुज बोला.

‘‘लेकिन बेटा, मेरे पास हैं इसलिए दे रहा हूं.’’

‘‘नहीं, पापा, पैसा दे कर तो आप मेरा दिल दुखा रहे हैं… जब दादीजी और दादाजी आप के पास रहने आए थे तो उन के पास देने के लिए कुछ भी नहीं था तो क्या आप ने उन की देखभाल नहीं की थी. जितना आप से  बन सकता था आप ने उन के लिए किया और आप के पास पैसा है तो आप हम से हमारा सेवा करने का अधिकार क्यों छीनना चाहते हैं.’’

निरंजन निरुत्तर हो गए. मनीषा आश्चर्य से अपने उस लापरवाह बेटे को देख रही थीं जो आज इतना समझदार हो गया है.

अनुज ने जब पैसे लेने से साफ मना कर दिया तो निरंजन ने पोते और पोती के नाम से बैंक में खाता खोल दिया और जो भी पेंशन का पैसा मिलता उस में डालते रहते. बेटे ने उन का मान रखा था और वे बेटे का मान रख रहे थे.

एक दिन निरंजन सुबह उठे तो बदन टूट रहा था और कुछ हरारत सी महसूस कर रहे थे. मनीषा ने उन का उतरा चेहरा देखा तो पूछ बैठीं, ‘‘क्या हुआ…तबीयत ठीक नहीं है क्या?’’

‘‘हां, कुछ बुखार सा लग रहा है.’’

‘‘बुखार है,’’ मनीषा घबरा कर माथा छूती हुई बोली,  ‘‘अनुज कोे बुलाती हूं.’’

‘‘नहीं, मनीषा, उसे परेशान मत करो…शाम तक देख लेते हैं…शायद ठीक हो जाए.’’

मनीषा चुप हो गई.

लेकिन शाम होतेहोते बुखार बहुत तेज हो गया. दोपहर के बाद निरंजन लेटे तो उठे ही नहीं. शाम को आफिस से आ कर अनुज पापा के साथ ही चाय पीता था.

निरंजन जब बाहर नहीं आए तो नीता कमरे में चली गई. मनीषा निरंजन का सिर दबा रही थीं.

‘‘पापा को क्या हुआ, मम्मीजी?’’

‘‘तेरे पापा को बुखार है.’’

‘‘बुखार है…’’ कहती हुई नीता ने बहू की सारी औपचारिकताएं त्याग कर निरंजन के माथे पर हाथ रख दिया.

‘‘पापा को तो बहुत तेज बुखार है, तभी पापा आज सुबह से ही सुस्त लग रहे थे. आप ने बताया भी नहीं. मैं अनुज को बुलाती हूं,’’ इतना कह कर नीता अनुज को बुला लाई.

अनुज जल्दी ही आ गया और मम्मीपापा को तकलीफ न बताने के लिए एक प्यार भरी डांट लगाई, फिर डाक्टर को बुलाने चला गया. डाक्टर ने जांच कर के दवाइयां लिख दीं.

‘‘मौसमी बुखार है, 3-4 दिन में ठीक हो जाएंगे,’’ डाक्टर बोला.

बेटाबहू, पोता और पोती सब निरंजन को घेर कर बैठ गए. नीता ने जब पढ़ाई के लिए डांट लगाई तब बच्चे पढ़ने गए.

‘‘खाने में क्या बना दूं?’’ नीता ने पूछा.

निरंजन बोले,’’ तुम जो बना देती हो वही स्वादिष्ठ लगता है.’’

‘‘नहीं, पापा, बुखार में आप का जो खाने का मन है वही बनाऊंगी.’’

‘‘तो फिर थोड़ी सी खिचड़ी बना दो.’’

‘‘थोड़ा सा सूप भी बना देना नीता, पापा को सूप बहुत पसंद है,’’ अनुज बोला.

निरंजन को अटपटा लग रहा था कि अनुज उन के लिए इतना कुछ कर रहा है. उन की हिचकिचाहट देख कर अनुज बोला, ‘‘मैं कुछ नया नहीं कर रहा. आप दोनों ने दादा व दादी की जितनी सेवा की उतनी तो हम आप की कभी कर भी नहीं पाएंगे. पापा, मैं तब छोटा था. आज जो कुछ भी हम करेंगे हमारे बच्चे वही सीखेंगे. बड़ों का तिरस्कार कर हम अपने बच्चों से प्यार और आदर की उम्मीद कैसे कर सकते हैं. यह कोई एहसान नहीं है. अब आप आराम कीजिए.’’

‘‘हमारा बेटा औरों जैसा नहीं है न…’’ मनीषा भर्राई आवाज में बोलीं.

‘‘हां, मनीषा, वह बुरा कैसे हो सकता है. तुम ने सुना नहीं, उस ने क्या कहा.’’

‘‘हां, बच्चों में संस्कार उपदेश देने से नहीं आते, घर के वातावरण से आते हैं. जिस घर में बड़ों का महत्त्वपूर्ण स्थान होता है उस घर में बच्चे बड़ों को आदर देना सीखते हैं और जिस घर में बड़ों का तिरस्कार होता है उस घर के बच्चे भी तो वही सीखेंगे.’’

एक पल रुक कर मनीषा फिर बोली, ‘‘हम दोनों ने अपने मातापिता की सेवा व उचित देखभाल की. हमारी गृहस्थी में उन का स्थान हमेशा ही महत्त्वपूर्ण रहा, वही हमारे बच्चों ने सीखा. लेकिन अधिकतर लोग अपने बच्चों से तो सेवा व आदर की उम्मीद करते हैं, लेकिन वे अपने जीवन में अपने बड़ों की मौजूदगी को भुला चुके होते हैं.’’

मनीषा के मन से आज सारे संशय खत्म हो चुके थे.

उन के सगेसंबंधियों, दोस्तों ने उन्हें अपने अनुभव बता कर उन के मन में बेटेबहू के प्रति डर व नकारात्मक विचार पैदा किए, अब वे अपने अनुभव बता कर दूसरों के मन में बेटेबहू के प्रति प्यार व सकारात्मक विचार भरेंगे.

निरंजन ने संतोष से आंखें मूंद लीं और मनीषा कमरे की लाइट बंद कर बहू की सहायता करने के लिए रसोई में चली गईं. आखिर इनसान जो अपनी जिंदगी में बोएगा वही तो काटेगा. कांटे बो कर फूलों की उम्मीद करना तो मूर्खता है.

Hindi Story : दहशत की हवा

Hindi Story : सारी गली सुनसान थी. शाम अंधेरे में बदल गई थी. पहाड़ी इलाका था. यहां साल भर सर्दी का ही मौसम रहता था. गरमियों में सर्दी कम हो जाती. सर्दियों में तो रातें सर्द ही रहतीं. जिन को सर्दी की आदत थी उन को कम या ज्यादा सर्दी से क्या फर्क पड़ता था.  हाथ में पकड़ी ए.के. 47 राइफल की नोक से अरबाज खान ने अधखुले दरवाजे को खटखटाया. कोई जवाब नहीं मिला. फिर वह थोड़ी धीमी आवाज में चिल्लाया, ‘‘कोई है?’’

उत्तर में कोई जवाब नहीं.  उस के पीछे खड़े उस के 7 साथियों के चेहरों पर गुस्से के भाव उभर आए. आज तक कभी ऐसा नहीं हुआ था. जिस किसी भी गांव में दिन या रात में कदम रखा था, उन के खौफ से वहां के लोग थरथर कांपते हुए उन की किसी बादशाह या सुलतान के समान आवभगत करते थे. मगर यहां अभी तक कोई बाहर नहीं आया था.

‘‘मार डालो इन को. कोई भी जिंदा न बच पाए,’’ सभी ए.के. 47 राइफल व हैंडगे्रनेडधारी जनों के नेता सुलतान ने अपने आदमियों से कहा तो उन के चेहरों के भावों ने एकदूसरे को कहा, ‘मगर पहले कोई सामने तो आए.’  दरवाजा आधा खुला था. पल्ला जोर पड़ते ही एक तरफ हो गया. ट्रिगर पर उंगली सख्त किए सभी अंदर प्रवेश कर गए. उन का गुस्सा माथे पर था. सामने जो भी आया गोली खाएगा. मगर सामने कोई आए तो सही.  सारा मकान खाली था. खाने का सामान तो दूर की बात थी वहां तो पानी का मटका भी खाली था. सब कहां गए? शायद कहीं बाहर गए थे?

मगर दूसरा मकान भी पहले की तरह खाली. तीसरा, चौथा मकान भी खाली. तनी हुई मशीनगनें ढीली पड़ एक तरफ कंधे पर लटक गईं. चढ़ा हुआ गुस्सा उतरने लगा. गरमी या जोश भी ढीला पड़ने लगा.  एक ही कतार में, सारे मकान खाली थे. अंधेरा बढ़ रहा था. ऐसा कैसे हो सकता था? क्या कोई साजिश थी? सेना या खुफिया विभाग वालों की साजिश भी हो सकती है. क्या पता एकदम से चारों तरफ से घेर कर सब पर गोलियों की बरसात कर दें…सभी के चेहरों पर डर और दहशत उभर आई.  पिछले माह जब वे आए थे, तब इन्हीं 4-5 मकानों में रहने वालों ने किस तरह डर कर उन की अगवानी की थी. बकरे का मांस पेश किया था. काजूसेब से बनी शराब पेश की थी. रात को जब सब ने उन की जवान बहुओं और कुंआरी बेटियों को लपक लिया था तब किसी ने विरोध नहीं किया था.

मगर आज इन्हीं मकानों में कोई नहीं था. इनसान तो क्या कोई परिंदा भी नहीं था. पशु नहीं था. इनसान कहीं बाहर किसी काम से जा सकते थे. मगर क्या परिंदे और जानवर भी जा सकते थे?  जरूर कोई साजिश थी. अंधेरा कभी उन को सुरक्षा और हिम्मत देता था. आज वही अंधेरा उन्हें डरा रहा था. दूसरों पर बिना बात गोली चलाने वाले अब इस सोच से डर रहे थे कि कहीं एकदम किसी ओर से कोई फौजी सामने आ कर गोली न चला दे या आसपास के मकानों से उन सब पर गोलियों की बौछार न हो जाए.  जिस दबंगता, अकड़ और जोश से वे सब गांव में प्रवेश करते समय भरे हुए थे वह अब एक अनजाने डर, दहशत में बदल गया था. सभी के चेहरों पर अब मातम छा गया था. प्यास से सब के गले सूख रहे थे. मगर किसी मकान के मटके में पानी नहीं था.  प्यास से गला सूख रहा था. शाम आधी रात में बदल गई थी. मगर अभी तक खाना नहीं मिला था. कहां तो सोचा था कि मुरगेबकरे का मांस, गरमागरम तंदूरी रोटियां, मिस्सी रोटियां मिलेंगी, शराब मिलेगी. रात को साथ सोने के लिए अनछुई जवान महिला मिलेगी…मगर आज सब सुनसान था. कोई भी नहीं था. खाली मकान थे. सब खालीखाली था.

‘‘अब क्या करें?’’ एक साथी ने सरदार से कहा.

सरदार चुप रहा. क्या जवाब दे? वापस चलें? मगर कहां? सामने के पहाड़ों पर बर्फ पड़ रही थी. आसमान साफ था.  मगर इस सुनसान आधी रात में जाएं कहां? सारे मकान खाली थे. सारा गांव खाली था.  सभी थक चुके थे. धीरेधीरे चलते गांव के बाहर चले आए. एक मकान पत्थरों से घिरी चारदीवारी के अंदर बना हुआ था. चारदीवारी में शायद सब्जियां बो रखी थीं. खाने को कच्ची सब्जियां तो मिल जाएंगी, सभी यह सोच कर वहां प्रवेश कर गए.

एक आतंकवादी ने हिम्मत कर टौर्च   जलाई. सचमुच सब्जियां थीं मगर   कच्चा घीया, बैगन और तोरी, कौन और कैसे खाता? शायद मकान मेें ईंधन और चूल्हा है. सभी मकान की तरफ बढ़े तभी उन के कानों में किसी के धीमेधीमे सुबकनेकी आवाज आई.  मकान में कोई था. टौर्च जलाने वाला आगे बढ़ा. एक लंबे आयताकार कमरे के भीतर खूंटे में रस्सी से बंधी एक बकरी खोली में रखी घास चर रही थी. समीप एक 2 साल का मासूम बच्चा सुबक रहा था.  गांव में इस अकेले मकान में 2 प्राणी थे. थोड़ीबहुत शराब थी. दालान के कोने में एक मटका पानी से भरा था. थोड़ाबहुत राशन भी वहां मौजूद था.  पानी देख कर सब की निगाहों में चमक आ गई. एक आतंकी रसोई में गया मगर वहां कोई गिलास नहीं था. हाथों को चुल्लू बना सब ने बारीबारी से पानी पिया. सब बकरी और बच्चे वाले कमरे में चले आए.

बच्चा अभी भी सुबक रहा था. वह भूखा था.  एक खाट दीवार से लगी सीधी खड़ी थी. सब उस को बिछा कर उस पर बैठ गए.

‘‘रहमत, देखो, क्या बकरी के थनों में दूध है?’’ सरदार के कहने पर एक आतंकी उठा और बकरी के समीप गया. थन दूध से भारी थे. मुट्ठी में थन पकड़ उसे भींचा, दूध की पतली धार एक फुहार के समान बाहर निकल आई.  रहमत ने आसपास देखा तो कोई बरतन नहीं था. वह भाग कर रसोई मेें गया. वहां भी बरतन नहीं था. दालान में एक तरफ मिट्टी से बनी एक खाली सिगड़ी थी. इस में शायद आग जला कर भट्ठी का काम लिया जाता था. उस को उठा कर झाड़ा. मटके से पानी ले, उसे धो लाया.

दूध भरपूर था. सारी सिगड़ी भर गई. दूध ले कर वह बच्चे के समीप गया. दूध देखते ही बच्चा मचल पड़ा. रहमत ने सिगड़ी उस के मुंह से लगा दी. बच्चा दूध पी गया. आधी सिगड़ी खाली हो गई. थनों में अभी काफी दूध था. बकरी शायद पिछले कई दिन से दुही नहीं गई थी. सिगड़ी फिर भर गई.  सिगड़ी उठा कर रहमत दल के सरदार के समीप पहुंचा.

‘‘आप भी दूध पी लीजिए.’’

‘‘दूध तो बच्चे के लिए है.’’

‘‘बच्चे को मैं ने दूध पिला दिया है. बकरी के थनों में अभी काफी दूध है.’’  सरदार ने सिगड़ी को मुंह से लगाने में संकोच किया. फिर हाथों की केतली बना जैसे पानी पी रहा हो, थोड़ा सा दूध पी लिया और सिगड़ी एक साथी की तरफ बढ़ा दी. सभी ने थोड़ाथोड़ा दूध पी लिया.  बच्चा अब तक जमीन पर लेटा सो गया था. बकरी भी बैठ गई थी.  ‘‘बच्चे को खाट पर लिटा दो,’’ सरदार ने कहा. 2 साथी उठ कर जमीन पर बैठे. फिर रहमत ने बच्चे को उठा कर खाट पर लिटा दिया. सरदार ने अपना ओढ़ा कंबल उतार कर उस को ओढ़ा दिया. गरमाई मिलते ही बच्चा मीठी नींद सो गया.

बकरी का थोड़ाथोड़ा दूध पीते ही अंतडि़यां राहत पा गई थीं. जैसे चोट पर मरहम लग गया हो. सभी भूखे दीवार से लगेलगे सो गए. सुबह की चमकती धूप की किरणों ने उन के चेहरों पर गरमी की, तब सब की नींद खुली. बच्चा अभी भी सो रहा था. बकरी उठ कर खड़ी हो में…में करने लगी थी. उस के थन फिर से दूध से भारी हो गए थे.  सब उठ कर नित्यक्रिया को निकल गए थे. रहमत और परवेज समीप की पहाड़ी के झरने से मटके में पानी भर लाए थे. अरबाज खान और मुश्ताक अली खाली पड़े मकानों में खाली बरतन ढूंढ़ने निकल पड़े. किसी घर में 1-2 गिलास, किसी में थालीकटोरी किसी से गड़वा, परात मिल गई.  आटा गूंध कर टिक्कड़ सेंक सब ने पेट भरा. बच्चा भी रोटी देख कर चिल्लाया. रहमत ने उस को नमक डाल कर एक टिक्कड़ सेंक कर थमा दिया.

‘‘अब क्या करें?’’ सरदार ने कहा.

‘‘ठिकाने पर वापस चलते हैं. अगले गांव में तो सुरक्षा बलों का बड़ा नाका है. इस बार फौज की चौकसी काफी बढ़ गई है,’’ मुश्ताक अली ने कहा.  ‘‘यह सारा गांव खाली क्यों है?’’ रहमत अली ने कहा. हालांकि वह जानता था कि इस सवाल का जवाब सब को मालूम था. उन्हीं की दहशत की वजह से सब निवासी गांव छोड़ कर चले गए थे. हर समय दहशत के साए में कौन जीता? कब किस को बिना वजह गोली मार दें. कब किसी के घर में घुस कर बहूबेटी की इज्जत लूट लें.  अभी तक घाटी से हिंदू, सिख ही गए थे, मगर अब अपने मुसलमान भी पलायन कर रहे थे…वह भी सारे के सारे एकसाथ. अगर सारी घाटी खाली हो जाए तो?

‘‘अभी वापस चलते हैं… आगे जो होगा देखेंगे,’’ सब उठ खड़े हुए.

‘‘इस बच्चे का क्या करें?’’ अरबाज खान ने पूछा.

सब सोचने लगे. क्या इसे गोली मार दें? अभी तक कभी किसी ने किसी मासूम बच्चे को नहीं मारा. बड़ी उम्र के आदमी और औरतों पर ही गोली चलाई थी. किसी का हाथ स्टेनगन की तरफ नहीं गया.  ‘‘क्या बच्चे को यहीं छोड़ दें,’’ सब सोच रहे थे. मगर इस सुनसान खाली पड़े मकान में अकेला मासूम बच्चा कैसे रहेगा? जैसे हालात थे, उन में इस के परिवार या मांबाप का आना मुश्किल था. जाने की जल्दी में वह बच्चा छूट गया था.  बच्चे को वापस लेने आने वाला अकेला शायद ही आए. सुरक्षा बल या फौजी दस्ता साथ आ सकता है. इसलिए उन का यहां ज्यादा देर तक ठहरना भी खतरनाक था. सरदार ने कुछ देर सोचा.

‘‘बच्चे को और बकरी को भी साथ ले चलो,’’ सरदार का हुक्म सुन सब ने एकदूसरे की तरफ देखा.

‘‘सरदार, बच्चे का हम क्या करेंगे?’’ मुश्ताक अली ने कहा.

‘‘यहां अकेला भूखाप्यासा बच्चा मर जाएगा.’’

‘‘हमारे साथ भी इसे कुछ हो सकता है.’’

‘‘बाद में देखेंगे. अभी इसे साथ ले चलो.’’  आंखों पर शक्तिशाली दूरबीन चढ़ाए ऊंचे टावर पर बैठे फौजियों ने सामने की पहाड़ी पर बनी पगडंडी पर कुछ आतंकवादियों को चढ़ते देखा. सब सचेत हो गए. ऐसा कभीकभी ही होता था. अधिकतर दहशतगर्द रात के अंधेरे में ही निकलते थे. उस ने दूरबीन का फोकस और करीब किया. बुदबुदाया, ‘अरे, यह तो अरबाज खान है. इस ने अपनी बांहों में एक बच्चा उठा रखा है. इस के पीछे चल रहे व्यक्ति ने एक बकरी के गले में बंधी रस्सी थाम रखी है.’

‘वाकीटाकी’ औन कर फौजी ने अपने कमांडर को खबर दी.

‘‘इस बच्चे के बारे में हमारे पास कल शाम खबर आई थी. गांव छोड़ते समय अफरातफरी में इस के मांबाप बच्चा वहीं छोड़ आए थे,’’ कमांडर ने कहा.

‘‘सर, क्या करें? सब रेंज में हैं. गोली चलाऊं?’’

‘‘उन्हें जाने दो. बच्चा उन के हाथ में है, उसे गोली लग सकती है.’’  सभी पहाड़ी पार कर अपने ठिकाने पर सुरक्षित पहुंच गए. अरबाज खान जानता था कि दिन में घाटी के किसी इलाके में निकलना खतरे से खाली नहीं था. किसी भी वक्त सुरक्षा बलों की गोली लग सकती थी. इसलिए आड़ बनाने के लिए बच्चा अपने साथ लाया था.  ठिकाने पर सब नहानेधोने, खाना बनाने में लग गए. बच्चा भी जाग गया था.

‘‘तुम्हारा नाम क्या है?’’ अरबाज खान ने पूछा.

‘‘उमर अली.’’

‘‘तुम्हारे अम्मीअब्बा का क्या नाम है?’’

‘‘अहमद अली व फरजाना खातून.’’

‘‘सब कहां गए हैं?’’

‘‘पता नहीं.’’

सब खाना खा कर सो गए. उमर अली भी एक चपाती और दूध पी कर सो गया.  रात हो गई. हर रात को किसी न किसी गांव में इन दहशतगर्दों का दल जाता था. कहीं कत्ल तो कहीं लूटमार का खेल खेला जाता था. मगर आज कोई कहीं नहीं गया था. कल रात जैसा वाकया पहले कभी नहीं हुआ था कि सारा गांव खाली हो जाए.  आज किसी दूसरे गांव में जाएं, वहां भी अगर वैसा ही हो गया तब? ऊपर से सुरक्षाबल के जवान घात लगाए बैठे हों. अचानक सब पर हमला हो जाए. इतनी सारी संभावनाएं कभी दिमाग में नहीं आई थीं. मगर कल के हालात ने उन को खुद के बारे में सोचने पर मजबूर कर दिया था.  लगभग 1 साल तक लुटेरों ने कश्मीर के विभिन्न इलाकों में स्थापित ट्रेनिंग कैंपों में इन सब को तरहतरह के हथियार चलाने व गुरिल्ला युद्ध का प्रशिक्षण दे कर सीमा पार करा दी थी. एकमुश्त मोटी रकम हर एक को अपने परिवार को देने के लिए थमा दी गई थी. साथ ही, एक बंधीबंधाई रकम हर माह इन के परिवारों को देने का वादा भी किया था.  इस जंग को अल्लाह के नाम पर जेहाद का नाम दिया गया था. काफिरों के खत्म होने पर ही पाक हुकूमत कायम होगी, जिस में कुछ भी नापाक नहीं होगा. यह सब जेहादियों के दिमाग में भरा गया था.

सब इस सचाई से वाकिफ थे कि उन्हें मरने के बाद कफन भी नहीं मिलेगा. मगर जेहाद के नाम पर दिमाग बंद था. अब कल के हालात ने सब को सोचने पर मजबूर कर दिया था. क्या थे वे सब? क्या भविष्य था उन का?  घाटी में अब काफिर कहां थे? सारे हिंदू, जिन्हें काफिर कहा जाता था, चले गए थे. फिर अब किस बात पर जेहाद था? साथ में जो बच्चा आया था उस ने भी उन के दिमाग में हलचल मचा दी थी. सब को अपनाअपना परिवार, बच्चे याद आ रहे थे. यह जेहाद तो पता नहीं कब खत्म होगा? घर कब जाएंगे? किसी के बेटे का नाम फिरोज था, कोई अशरफ था, कोई सलीम था, कोई अशफाक था. कैसे होंगे वे?

दूसरा दिन भी हो गया. उमर अली सब के साथ हिलमिल गया. सब को उस में अपनेअपने बच्चों का अक्स दिख रहा था.

‘‘मैं भी बंदूक चलाऊंगा.’’

अरबाज खान ने उसे अपनी पिस्तौल खाली कर थमा दी. उस के खेल का सब आनंद ले रहे थे.  क्या उन का बेटा भी बड़ा हो कर इस तरह बंदूक थामेगा? एक दहशतगर्द बनेगा, गोली खा मरेगा और एक कुत्ते या जानवर के समान दफन हो जाएगा?  रात हो गई. आज भी कोई कहीं नहीं गया. हर वारदात या जीत के बाद आकाओं को रिपोर्ट भेजनी पड़ती थी. मगर यह दूसरी रात थी जब कुछ न किया. तीसरी रात भी गई, चौथी भी. 5वीं रात पीछे से लपकती आ पहुंची.

‘‘कमांडर पूछता है सब कहीं जाते क्यों नहीं? 4 दिन से कुछ नहीं हुआ?’’

‘‘अभी हालात खराब हैं. जब काबू में हो जाएंगे तब जाएंगे.’’  8 दिन बीत गए. दिमाग में भारी हलचल थी.

हरकारा फिर आया. इस बार चेतावनी दे गया. ‘ड्यूटी’ करो या नतीजा भुगतो. नतीजा यानी वापस लौटे तो खत्म कर सुपुर्देखाक. ड्यूटी पर जाते हैं तो कभी न कभी सुरक्षा बलों की गोली का शिकार बनना ही था. सुपुर्देखाक इधर भी था उधर भी था. क्या करें?  जेहाद का जनून उतर चुका था. एक मासूम बच्चे ने उन्हें अपने बच्चों, परिवार आदि की याद दिला कर उन्हें सोचने पर मजबूर कर दिया था.  10 दिन बाद सुबह एक सफेद झंडा, जो सफेद कमीज फाड़ कर बनाया गया था, लिए 8 दहशतगर्दों का दल एक मासूम बच्चे की अगुआई में साथ में एक बकरी लिए आत्मसमर्पण के लिए सुरक्षा बलों के सामने हाजिर हुआ. स्टेनगन, हथगोले व अन्य हथियार पटाखों के समान एक ढेर में एक तरफ पड़े थे.  उमर अली अपने अम्मीअब्बा की गोद में पहुंच गया. सभी दहशतगर्द इस नन्हे बच्चे को मोहब्बत से देख रहे थे जिस ने उन के दिमागों से जेहाद का जनून उतार दिया था.

Family Story : ये चार दीवारें – अभिलाषा और वर्षा क्यों दुखी थी?

Family Story : कोरोना वायरस ने सभी की जिंदगियों को कितना बदल दिया है. अभी तीन दिन पहले ही तो बर्षा और अभिलाषा कालेज के कैम्पस में मदमस्त घूम रहीं थीं और आज अपने रूम में बंद मुंह बनाएं अपनेअपने फोन में लगी हुई हैं. दोनों दिल्ली विश्वविद्यालय के नामी कालेज में पढ़ती हैं. अभिलाषा लाइफ साइंसेस के छठे सेमेस्टर में है तो बर्षा बीबीए के चौथे सेमेस्टर में. दोनों के इंटर्वल्स चल रहे थे और जल्द ही एनुअल एग्जाम भी होने वाले थे कि कोरोना वायरस के चलते पहले कालेज 31 मार्च तक बंद हुआ और फिर देशभर में लौकडाउन की घोषणा हो गई. लौकडाउन के चलते वे दोनों अपने पीजी में बंद हैं. अभिलाषा इस पीजी में पहले से रह रही थी और सेमेस्टर की शुरुआत में ही बर्षा इस में शिफ्ट हुई थी.

बर्षा और अभिलाषा एकसाथ रहती तो थीं पर दोस्त नहीं थीं, होती भी कैसे, दोस्ती करने का समय था किस के पास.

बर्षा मदमस्त लड़की थी लेकिन कालेज में कोई खास दोस्त नहीं था उस का. नासिक की रहने वाली बर्षा 3 साल से पार्थ के साथ रिलेशनशिप में थी. पार्थ नासिक में ही था और बर्षा यहां दिल्ली में. बर्षा के लिए दोस्ती का मतलब था पार्थ, प्यार का मतलब था पार्थ और परिवार का मतलब भी था तो सिर्फ पार्थ. बर्षा का परिवार रसूखदार था. नौकरीपरस्त मातापिता उस की जरूरतों को तो समझते थे पर उस के मन को कभी नहीं समझ पाए. छोटी बहन से उसे प्यार तो बहुत था लेकिन उम्र में 4 साल छोटी बहन उसे समझती भी तो कैसे. सो, वह बड़ी भी कुछ इसी तरह हुई कि अपने मन की बातें अपने मन में ही रखती थी.

वहीं, अभिलाषा सोनीपत की रहने वाली थी. बचपन से हमेशा परिवार की लाड़ली. दोनों भाई उस से बेहद प्यार करते थे और मम्मीपापा की तो जान थी वह. यहां कालेज में भी उस के कई दोस्त थे. हमेशा दोस्तों से घिरी अभिलाषा के लिए शांत पर हमेशा चिड़चिड़ी बर्षा को झेलना मुश्किल हो जाता था. उस ने बर्षा के इस रूम में शिफ्ट होने पर उस की तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ाया था, वह उस से कालेज के बाद हैंगआउट करने के लिए भी पूछती थी लेकिन बर्षा कभी पार्थ के साथ फोन पर बात कर रही होती तो कभी चैटिंग. एक बार जब अभिलाषा ने बर्षा से उस की क्लासमेट से नोट्स लाने के लिए कहा था तो बर्षा ने यह कह कर टाल दिया था कि पार्थ दिल्ली आ रहा है और वह उस से मिलने स्टेशन जा रही है. अभिलाषा ने उसे कहा भी कि नोट्स लेने में उसे 5 मिनट से ज्यादा वक्त नहीं लगेगा लेकिन बर्षा नहीं मानी और कालेज से बिना नोट्स लिए ही निकल गई.

उस दिन से ही ऐसी कितनी ही छोटी बड़ी चीजें थीं जिन पर दोनों झगड़ती रहतीं. कभी अभिलाषा के दोस्तों की पीजी पार्टियों से बर्षा परेशान हो जाती तो कभी बर्षा के गंदे पड़े कपड़ों को अपनी कुर्सी पर देख अभिलाषा बिफर पड़ती. एक बार अभिलाषा को जब बहुत भूख लगी थी तो उस ने लंच में आए बर्षा के टिफिन से आलू का परांठा खा लिया था. बर्षा जब कालेज से लंच के लिए लौटी तो खाली टिफिन देख कर उस का मूड खराब हो गया.

‘तुम ने मेरा लंच खाया है?’ बर्षा ने गुस्से से अभिलाषा से पूछा.

‘हां, मुझे भूख लगी थी. तू मुझ से पैसे ले कर कैंटीन से कुछ खा ले,’ अभिलाषा बोली.

‘यार, क्या बदतमीजी है ये. एक कौल कर देती तो मैं कुछ खा लेती वहीं पर. 25 मिनट तक चलते हुए तो नहीं आना पड़ता न मुझे, वो भी इस खाली डब्बे के लिए,’ बर्षा चिल्लाने लगी.

अभिलाषा की आवाज भी अब तेज हो गई. ‘मुझ पर चिल्लाने की जरूरत नहीं है. भूख लगी थी खा लिया और कौल करना भूल गई, सौरी. पर मुझ पर आज के बाद चिल्लाने की कोशिश भी मत करियो. छोटी है, छोटी बन कर रह.’

‘स्टौप टौकिंग, मेरा अभी तुम्हारी शक्ल देखने का भी मन नहीं है.’

‘मैं तो मरी जा रही हूं जैसे तेरी शक्ल देखने के लिए. जा यहां से,’ अभिलाषा अपनी चप्पल पहन बालकनी में जा कर खड़ी हो गई थी.

बर्षा और अभिलाषा हर दिन किसी न किसी बात पर लड़ती थीं. उन दोनों के लिए खुशी की बात यही थी कि वे जबजब लड़तीं तो दोनों में से कोई एक कमरे से बाहर निकल जाया करती थी. बर्षा को अपने कमरे में ही रहना पसंद होता था तो ज्यादातर अभिलाषा ही अपनी किसी दोस्त के पीजी चली जाती थी और कभीकभी वहीं नाइट स्टे करती.

अभिलाषा और बर्षा का पीजी कालेज से 25 मिनट की दूरी पर था. उन के पीजी के पास उन के किसी क्लासमेट या फ्रैंड का पीजी नहीं था. उन के पीजी वाली गली संकरी थी लेकिन आसपास के घरों की ऊंचाई ज्यादा नहीं थी. रात में जब बालकनी में बर्षा खड़ी होती तो उसे खुला आसमान नजर आता था. तारे टिमटिमाते तो उन्हें देख वह खुश हो जाया करती थी, अपने फोन से एक पिक्चर क्लिक करती और पार्थ को भेजा करती. कितनी खुशी मिलती थी उसे पार्थ को अपने हर पल से जोड़ते हुए. जबजब उस से लड़ाई करती तो इतनी उदास हो जाया करती कि अभिलाषा से लड़ना भी उसे व्यर्थ लगता.

अभिलाषा को बर्षा की जिंदगी से कोई मतलब नहीं था, वह उसे उदास देख कर एक पल को कुछ पूछने के बारे में सोचती भी तो दूसरे ही पल उसे बर्षा से अपनी लड़ाइयां याद आ जातीं और वह चुप अपनी किताबों में घुस जाती. लड़ाइयों से अभिलाषा को सब से ज्यादा वह दिन याद आता जब बर्षा ने किचन में आ उस की मैगी के पैन में पानी डाल दिया था और अभिलाषा का खून खौल गया था. हुआ यह था कि अभिलाषा किचन में मैगी बना रही थी और रूम में रखा उस का फोन बज उठा.

अपना फोन उठाने की जल्दी में अभिलाशा किचन से मैगी हिलाने वाला चमचा हाथ में पकड़ तेजी से निकली और गलती से कुर्सी पर सूख रहे बर्षा के कपड़ों पर उस ने चमचा लगा दिया. बर्षा नहा कर बाहर आई तो उस ने देखा उस के टौप पर पीला निशान पड़ा हुआ है. उसे लगा कि अभिलाषा ने यह जानबूझ कर किया क्योंकि उसे पता था आज बर्षा को क्लास में प्रेसेंटेशन देनी है.

बर्षा गुस्से से लाल होती हुई किचन की तरफ बड़ी और बोतल खोल कर जितना पानी उस में था उस ने अभिलाषा की मैगी में उड़ेल दिया. अभिलाषा को भूख बिलकुल बर्दाश्त नहीं थी. सो, बर्षा से लड़ाई और चिल्लमचिल्ली के बाद भी उसे पानी वाली बेस्वाद मैगी खानी पड़ी थी. यह वाक्य उसे जब भी याद आता वह गुस्से से भर जाती थी और उस का मन होता कि बर्षा को खींच कर तमाचा मार दे. वैसे, एक बार जब बर्षा सोतेसोते पलंग के बिलकुल किनारे सरक आई थी तो उसे सरकाने या गिरने से बचाने के बजाय अभिलाषा फोन का विडियो रिकौर्डर खोल कर बैठ गई थी और उस ने बर्षा के गिरने की विडियो बनाई भी थी और अपने दोस्तों में खूब वायरल भी की थी.

अब जब से लौकडाउन हुआ है तब से दोनों इस बात से कम कि बाहर नहीं जा सकते, इस बात से ज्यादा परेशान हैं कि अगले 21 दिन उन्हें एक साथ, एक ही कमरे में काटने हैं. दोनों का लंच और डिनर का खाना भी आना बंद हो गया था, कुछ और्डर वे कर नहीं सकती थीं तो एक ही उपाय था कि दोनों खाना बना कर खाएं. खाना बनाने, बर्तन धोने, झाडू पोंछा करने आदि को ले कर दोनों सुबह शाम लड़ती रहती थीं. अभिलाषा अपनी मम्मी से फोन पर हर दिन बात कर उन्हें हर पल की खबर देती. दूसरी तरफ बर्षा की पार्थ से लड़ाई होती रहती. अभिलाषा ने बर्षा को अभी कल ही फोन पर चिल्लाते सुना था, ‘नहीं करनी मुझे तुम से बात अब, जाओ उस मालविका से ही बातें करो, मुझ से करने की जरूरत नहीं है.’

अब कोरोना वायरस के चलते वे दोनों कहीं आजा नहीं सकतीं, दोनों ही परेशान हैं. दोनों के अकाउंट में पैसे हैं तो दोनों को कुछ खास चिंता नहीं लेकिन घुटन तो उन्हें भी महसूस हो रही है इस चार दीवारी में. आज सुबह से ही बर्षा का मूड कुछ ठीक नहीं यह अभिलाषा को महसूस तो हुआ लेकिन वह उस से कुछ पूछनाजानना नहीं चाहती.

अभिलाषा ‘लव इन द टाइम औफ कोलेरा’ किताब पढ़ रही थी जब उसे बर्षा के रोने की आवाज आई. बर्षा अपने बेड पर थी जो अभिलाषा के बेड से चार कदम दूर ही था. बर्षा का चेहरा चादर से ढका हुआ था तो अभिलाषा को बस उस की आवाज सुनाई दे रही थी. वह बारबार फरमीना और फ्लोरेंटिनो के रोमांस पर फोकस करती और बारबार बर्षा की आवाज उस के ध्यान में बाधा डालती.

‘‘सुन,’’ अभिलाषा ने कहा.

बर्षा ने अभिलाषा की आवाज सुन कर भी उसे अनसुना कर दिया तो अभिलाषा ने फिर आवाज लगाई, ‘‘ओए बर्षा, सुन.’’

‘‘हूं,’’ बर्षा ने जवाब में कहा.

‘‘थोड़ा धीरे रो, मुझे बुक पढ़ने में डिस्टर्बेंस हो रही है,’’ अभिलाषा कहने लगी.

‘‘तुम कितनी हार्टलेस हो, कितनी बुरी हो. तुम्हें दिख रखा है मैं रो रही हूं पर तुम्हें फर्क नहीं पड़ रहा न. तुम्हारा ब्रेकअप होता तो क्या तब भी तुम यही कहती,’’ बर्षा सुबकते हुए कहने लगी.

‘‘मेरा ब्रेकअप होता तो मैं ब्रेकअप पार्टी देती. वैसे भी लड़के इस लायक होते भी नहीं कि उन के लिए आंसू बहाए जाएं, कोई समझदार लड़की उन पर आंसू नहीं बहाती. हां, तू समझदार भी तो नहीं है तो तुझ से ऐसी उम्मीद भी नहीं लगा सकते.’’

‘‘प्लीज, मुझ से बात करने की कोई जरूरत नहीं है,’’ बर्षा अब भी सुबक रही थी.

‘‘हां, जैसे मैं तो मरी जा रही हूं,’’ अभिलाषा ने मुंह बनाते हुए कहा.

बर्षा अपने बेड से उठी और बाथरूम में जा कर शावर के नीचे बैठ रोने लगी. बर्षा और पार्थ का ब्रेकअप हो गया था. पार्थ से बर्षा बेहद प्यार करती थी लेकिन जब से उसे यह पता चला था कि मालविका के पार्थ को प्रोपोज करने के बाद भी वह उस से दोस्ती बनाए हुए है तो बर्षा का शक पार्थ पर गहराता जा रहा था. इस शक और बर्षा की इन्सेक्योरिटी के चलते ही पार्थ ने बर्षा से ब्रेकअप कर लिया था. बर्षा बाथरूम में बैठ कर दिल खोल कर रो रही थी, उस के आंसू पानी की बौछार के साथ मिलते हुए नाली में बह रहे थे और हर एक आंसू के साथ उसे ऐसा लगता मानो उस के दिल के छोटेछोटे टुकड़े भी बह रहे हैं और उस के सीने से दर्द हलका होता जा रहा है.

अभिलाषा बाहर अपने पलंग पर बैठी बर्षा के रोने की आवाज सुन रही थी. तभी अभिलाषा बाहर से जोर से चिल्लाई, ‘‘पानी कम खर्च कर, न्यूज नहीं सुनती क्या, पानी की बचत कर. ऐसे ही हमारा देश कोरोना के बाद पानी की किल्लत से ही जूझने वाला है. कम पानी बहा.’’ बर्षा अपने आंसुओं के साथसाथ अभिलाषा के तानों का घूंट भी पी गई.

शाम के 7 बज रहे थे जब बर्षा अपने बेड पर आंखें बंद किए लेटी थी. बर्षा अपने और पार्थ के हर उस पल के बारे में सोच रही थी जिन में उसे महसूस होता था कि वे दोनों एकदूजे के लिए ही बने हैं और उन के बीच कभी कोई नहीं आ सकता. अचानक अभिलाषा का फोन बजा तो बर्षा की तंद्रा भंग हुई.

‘‘हां पापा, बोलिए क्या हुआ,’’ अभिलाषा फोन पर बोली. ‘‘क्या…..,’’ अभिलाषा लगभग चीख पड़ी.

अभिलाषा की आवाज सुन कर बर्षा चादर हटा अपने बेड पर बैठ गई. उस की नजरें अभिलाषा के चहरे पर टिक गईं जो धीरेधीरे रोआंसा होने लगा था.

‘‘कहां…कहां हैं मम्मी….मैं…मैं…मैं आ रही हूं….पापा….’’ कहते हुए अभिलाषा जोरजोर से रोने लगी. अभिलाषा को इतनी बुरी तरह रोते बर्षा ने पहले कभी नहीं देखा था. वह तेजी से अपने बेड से उठी और अभिलाषा को थामने लगी. अभिलाषा बस रोए जा रही थी और फोन से लगातार उस के पापा की आवाज आ रही थी.

‘‘अभिलाषा…अभिलाषा…’’ फोन से निकलती हुई आवाज अभिलाषा के कानों तक पहुंच तो रही थी लेकिन शब्दों ने जैसे उस की जबान पर आने से मना कर दिया था.

‘‘अभिलाषा क्या हुआ? बताओ तो हुआ क्या है?’’ बर्षा अभिलाषा से लगातार पूछ रही थी. बर्षा ने अभिलाषा के हाथ से फोन ले लिया.

‘‘हैलो, अंकल…क्या हुआ है,’’ बर्षा ने अभिलाषा के पापा से पूछा.

‘‘बेटा, व…वो….अभिलाषा की मम्मी काफी जल गईं है बेटा. किचन में पूडि़यां तलते हुए कढ़ाई का खौलता हुआ तेल उन के गले से पैर तक छिटक गया. ज्यादा जल गईं हैं होस्पिटल में भर्ती हैं पर अभिलाषा को मत कहना की बहुत ज्यादा जली हैं. उस से कहना कि थोड़ा बहुत जली हैं और कुछ दिन में ठीक हो जाएंगी. उस का ध्यान रखना बेटा… वो पागल है, अपनी मम्मी से बहुत प्यार करती है, रोरो कर अपना हाल बुरा कर लेगी, उस का ध्यान रखना. उस की मम्मी ठीक हैं… तुम दोनों अपना ध्यान रखना.’’

‘‘ओके…अंकल,’’ बर्षा ने कहा और फोन काट दिया.

अभिलाषा बिना रुके बस रोए जा रही थी. बर्षा उसे ले कर बेड पर बैठी और उसे चुप कराने लगी. ‘‘आंटी अब ठीक हैं अभिलाषा, अंकल ने कहा है वे जल्दी ठीक हो जाएंगी.’’

अभिलाषा अब भी कुछ नहीं सुन रही थी बस रोए जा रही थी. बर्षा उठ कर गई और गिलास में पानी ले आई. अभिलाषा ने पानी पिया और दोनों हथेलियां आंखों पर रख रोने लगी. वह बिलकुल बच्चों की तरह रो रही थी.

‘‘आंटी ठीक हो जाएंगी जल्दी,’’ बर्षा दिलासा देते हुए बोली.

‘‘मुझे मम्मी के पास जाना है,’’ अभिलाषा सुबकते हुए बोल पड़ी.

‘‘लौकडाउन खत्म होते ही चले जाना. अभी संभालो खुद को.’’

अभिलाषा ने अपना फोन उठाया और पापा को कौल लगा दिया.

‘‘पापा, मम्मी को होश आ गया तो बात करा दीजिए, मुझे उन से बात करनी है,’’ एक मिनट रुक अभिलाषा कहने लगी, ‘‘हैलो, हैलो…मम्मी आप ठीक हैं न….आप ठीक हैं न. आप को ज्यादा चोट तो नहीं आई….’’ मम्मी से बात करते हुए अभिलाषा का रोना शांत हो गया था. बर्षा को यह देख कर राहत मिली. वह उठी और बालकनी में जा कर बैठ गई.

बाहर अंधेरा छा चुका था. कोरोना वायरस से लोग इतने डरे हुए हैं कि अपने घरों से बाहर कोई दिखाई ही नहीं देता अब. अंधेरे में बालकनी के एक कोने में बैठी बर्षा खुले आसमान को ताक रही थी. आज न फोन उस के हाथ में था और न फोन के दूसरी तरफ पार्थ. अभिलाषा की मम्मी के साथ जो कुछ हुआ था उसे सुन कर बर्षा को अपना गम बहुत छोटा लगने लगा था. वह घुटनों के दोनों तरफ बांहें बांधे बैठी हुई थी कि तभी अभिलाषा कमरे से निकल कर आई और उस के बगल में आ कर बैठ गई.

‘‘आंटी ठीक हैं?’’ बर्षा ने पूछा.

‘‘हां,’’ अभिलाषा ने जवाब दिया. अभिलाषा की आंखें अब भी नम थीं और आंखों की किनारी से ऐसा लग रहा था मानो दो बूंदे बस छलकने ही वाली हैं.

‘‘तुम ठीक हो?’’ बर्षा अभिलाषा की ओर देखते हुए पूछ पड़ी.

‘‘नहीं.’’

‘‘हम्म.’’

‘‘और तुम,’’ अभिलाषा ने आसमान की ओर देखते हुए कहा.

‘‘नहीं,’’ बर्षा ने कहा और वह भी उसी आसमान में उसी ओर देखने लगी जिस ओर अभिलाषा की नजरें थीं.

‘‘बर्षा….’’

‘‘हां?’’

‘‘सौरी…एंड…थैंक यू…’’

‘‘कोई बात नहीं.’’

‘‘अगर तुम न होती तो पता नही यह रात कैसे कटती. यह दीवारें काटने को दौड़ती मुझे और मैं घुटघुट कर मर जाती,’’ अभिलाषा बोली.

‘‘जबतक मैं हूं तबतक तुम्हें काटने और मारने का हक सिर्फ मुझे है,’’ बर्षा ने कहा और हलकी सी हंसी हंस दी.

बर्षा की बात सुन अभिलाषा की हंसी भी छूट गई. दोनों अपलक आसमान में चांद को निहार रही थीं. अभिलाषा ने आंखें बंद कर लीं और बर्षा के कांधे पर सिर रख लिया. बर्षा ने अपना सिर अभिलाषा के सिर की तरफ झुका लिया. दोनों की आंखें नम अपनेअपने गम से भरी हुई थीं. बर्षा गुनगुनाने लगी, ‘रात का शौक है….रात की सौंधी सी खामोशी का शौक है….शौक है….’

Hindi Story : सावधान – क्या था पूरा माजरा

Hindi Story : दोपहर का समय था. मैं बरामदे में बैठ कर अखबार पढ़ रहा था. अचानक मोबाइल फोन की घंटी बजने लगी.

मेरा ध्यान अखबार से हट कर मोबाइल फोन पर गया. मोबाइल फोन उठा कर देखा तो कोई अनजाना नंबर था.

स्विच औन करते ही उधर से आवाज आई, ‘हैलो… सर, क्या आप राकेशजी बोल रहे हैं?’

‘‘जी हां, मैं राकेश बोल रहा हूं?’’ अनजानी आवाज से मेरे नाम के संबोधन से मैं हैरान रह गया.

‘देखिए, मैं आरबीआई, भोपाल से बोल रहा हूं.’

‘‘आरबीआई, भोपाल से?’’ मैं ने हैरानी से पूछा.

‘जी हां, ठीक सुना है आप ने. मैं मैनेजर बोल रहा हूं.’

‘‘ओह सर… कहिए क्या बात है? आप को मेरा नाम और नंबर कहां से मिला?’’ मैं ने उत्सुकतावश पूछा.

‘आप का सवाल ठीक है. देखिए, बैंक मैनेजमैंट हर ग्राहक की पूरी जानकारी रखता है. आप चिंता न करें. आप के फायदे में जरूरी जानकारी देना हमारा फर्ज है.’

‘‘जी फरमाइए, क्या बात है?’’ मैं ने उन से पूछा.

‘जरूरी बात यह है कि क्या आप के पास एटीएम कार्ड है?’

‘‘जी, बिलकुल है,’’ मेरी उत्सुकता बढ़ने लगी.

‘आप का एटीएम कार्ड तकनीकी गड़बड़ी के चलते ब्लौक हो गया है.’

‘‘कौन से बैंक का एटीएम कार्ड ब्लौक हुआ है आप का?’’

‘आप के पास कितने एटीएम कार्ड हैं?’ बैंक मैनेजर के इस सवाल पर मेरे कान खड़े हो गए. मैं समझ गया कि कोई जालसाज अपना जाल फैला रहा है, फिर भी मैं अनजान बना रहा और बात आगे बढ़ाई, ‘‘सर, मेरे पास 4 बैंकों के एटीएम कार्ड हैं.’’

‘आप का एसबीआई का एटीएम कार्ड ब्लौक हो चुका है.’

‘‘मुझे इस के लिए क्या करना होगा?’’ मैं ने अपनी चिंता जाहिर करते हुए पूछा.

अब मुझे पूरा यकीन हो गया था कि यह कोई जालसाज है. मेरा दिमाग तेजी से काम करने लगा. एसबीआई के इस एटीएम से मैं एक घंटे पहले रुपए निकाल कर लाया था. मैं जानता था कि इस जालसाज का मकसद क्या है.

उस आदमी ने फोन पर कहा, ‘आप चिंता मत कीजिए, बस आप को इतना करना है कि एटीएम कार्ड के 16 डिजिट का नंबर और पासवर्ड बताना होगा.

फिर आप खाताधारी बैंक से अपना नया एटीएम कार्ड ले सकते हैं. बैंक को कार्ड भिजवाने का इंतजाम हम करेंगे…’

‘‘ठीक है, आप 15 मिनट बाद फिर बात करें. मेरा कार्ड अलमारी में रखा है. निकाल कर नंबर बताता हूं…’’

‘‘क्या बात है दादाजी?’’ मेरा पोता आदित्य, जो लैपटौप पर कोई काम कर था, उस ने हमारी हो रही बातचीत शायद सुन ली थी. वह अपना काम छोड़ मेरे पास आया.

‘‘बेटा, बैंक खाते में सेंध लगाने वाले गिरोह के किसी आदमी से बात हो रही है. तुम अभी शांत रहो. 15 मिनट बाद वह फिर फोन करेगा,’’ मैं ने कहा.

इसी बीच हम दोनों ने उसे सबक सिखाने की योजना बनाई कि उस ठग से क्या कहना है, किस तरीके से कहना है.

ठीक 15 मिनट बाद उसी नंबर से मोबाइल फोन की घंटी बजी. हम सावधान हो गए. एटीएम कार्ड निकाल कर मैं ने अपने पास रख लिया था.

मैं ने मोबाइल उठा कर स्विच औन कर दिया, उधर से आवाज आई, ‘सर, आप ने अपना कार्ड निकाल लिया है?’

‘‘जी हां… मेरे हाथ में है.’’

इसी बीच आदित्य ने औडियो रेकौर्डर औन कर दिया. उधर से आवाज आई, ‘अब आप ऐसा कीजिए, कार्ड का 16 डिजिट का नंबर व पासवर्ड बताइए. मैं नोट करता जाऊंगा…

‘और यह भी बताइए कि आप के इस खाते में जमा रकम कितनी है?’

आदित्य ने 5 उंगलियों का इशारा किया.

‘‘ज्यादा नहीं, बस 5 लाख रुपए हैं,’’ मैं ने बताया.

‘तब तो ठीक है… प्लीज, अब आप अपना कार्ड नंबर व पासवर्ड बता दीजिए. एक हफ्ते में आप का नया एटीएम कार्ड आप के बैंक में आ जाएगा,’ उस आदमी ने संतुष्ट हो कर कहा.

आदित्य ने अब मोबाइल फोन मेरे हाथ से ले लिया और नंबर मनगंढ़त बता दिए. इसी तरह पासवर्ड भी गलत बता दिया.

उस आदमी ने बताए गए नंबर नोट कर लिए.

उधर से आवाज आई, ‘सहयोग के लिए धन्यवाद…’ और फोन स्विच औफ हो गया.

आधा घंटे बाद फिर उसी नंबर से घंटी बजी. हम सावधान हो गए.

स्विच औन करते ही उधर से आवाज आई, ‘हैलो सर, आप ने शायद किसी दूसरे एटीएम कार्ड का नंबर बता दिया है. यह आप के एसबीआई कार्ड का पासवर्ड नहीं है.’

‘‘अरे… साहब, मान गए आप को… आप ने आधा घंटे में ही यह पता लगा लिया कि हम ने जो एटीएम का नंबर और पासवर्ड बताया है, वह गलत है.

‘‘देखो मिस्टर, आप जो भी हों, हम आप की बिरादरी के ही हैं,’’ आदित्य ने तंज कसते हुए कहा.

‘क्या मतलब है आप का…? क्या कहना चाहते हैं आप?’ वह आदमी बौखला कर बोला.

‘‘मतलब यह है कि हम भी वही काम करते हैं, जो आप कर रहे हैं… हैं न हम एक ही बिरादरी के…’’ आदित्य ने शांत लहजे में कहा.

‘यानी कि आप भी… कहां रहते हैं आप?’ उस आदमी की आवाज में अब भी झल्लाहट थी.

‘‘जी… मैं शाजापुर में रहता हूं… कभी मिलिए दोदो बातें हो जाएंगी…

‘‘मैं कार्ड नंबर और पासवर्ड ले कर क्लोन कार्ड बना लेता हूं… आप जो

कर रहे हैं, वह मुझे भी याद है… अगर मिलो तो अपना धंधा पार्टनरशिप में कर लेते हैं.

‘‘अब आप ऐसा कीजिए… मेरे लिए आप अपना समय बरबाद न करें… कोई और बकरा हलाल करने के लिए ढूंढ़ लीजिए…’’

आखिर में आदित्य ने चेतावनी देते हुए कहा, ‘‘आप के नंबर की औडियो रेकौर्डिंग कर ली गई है. अब आप बताइए कि आगे करना क्या है?’’

इतना सुनते ही उस आदमी ने अपना मोबाइल स्विच औफ कर दिया.

आदित्य और मेरे चेहरे पर जीत की मुसकान तैर गई.

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