Hindi Story : देवी

Hindi Story : मंदार का जिक्र सपना के मन में ही नहीं बल्कि घर में भी एक नई चेतना भर देता. आखिर क्यों न हो, इतना सुशील, पढ़ालिखा और सुंदर दामाद, उस से भी ज्यादा सभ्य और समझदार उस के पिताजी आज के इस दहेज लोलुप समाज में कहां मिलते हैं. तभी तो उस के पिताजी कहते हैं, ‘‘आज लोग भले ही रहनसहन और पहनावे से आधुनिक हो गए हों पर शादी की बात चलते ही एकदम पुरातनपंथी हो जाते हैं. कुंडलियां देखेंगे, गोत्र मिलाएंगे और नाड़ी भी मिलाएंगे. लड़की पढ़ी- लिखी भी हो, नौकरी करती हो, साथ ही घर के काम में भी कुशल हो. लेकिन मंदार के पिता इस भीड़ से बिलकुल अलग हैं.मंदार के खयालों में खोई सपना को एक साल पहले की घटना याद आ गई जब वह पहली बार मंदार से मिली थी. पिछले साल जब आई.आई.टी. दिल्ली से कंप्यूटर साइंस में बी. टेक. करने के बाद वह अमेरिका जाने की तैयारी कर रही थी तब पड़ोस के खन्ना अंकल ने उस से अपनी साफ्टवेयर कंपनी ज्वाइन करने को कहा था. पहले तो सपना का इरादा नहीं था पर बाद में उस ने सोचा कि जब तक वीजा आदि की औपचारिकता पूरी नहीं हो जाती तब तक थोड़ा अनुभव लेने में हर्ज क्या है. पहले ही दिन खन्ना अंकल की कंपनी में मंदार को देखने के बाद जो सपना के दिल में हुआ था, वह पहली नजर का प्यार नहीं तो और क्या था?

मंदार आई.आई.टी. मुंबई से बी.टेक. कर के यहां दिल्ली में अपने पिताजी के साथ रहता था. जब सपना ने मंदार से अपने अमेरिका के प्लान के बारे में पूछा तो बिना नजर उठाए उस ने कहा था कि यहां पिताजी अकेले रह जाएंगे.

बस, एक सीधा सा जवाब. शायद उस की नजरों में इस सवाल की कोई खास अहमियत नहीं थी. इसीलिए तो उस ने नजरें उठा कर सपना की ओर देखा भी नहीं था.

हमेशा चुपचुप रहने वाले मंदार की आंखों में एक अजीब सा आकर्षण था, जिसे देखे बिना न तो समझ पाना आसान था और न ही शब्दों में बता पाना संभव था. कई बार तो बिना बोले भी अपनी आंखों से वह सारी बातें कह जाता था जिस का अर्थ ढू़ंढ़ने में सपना रातरात भर जागती रहती थी.

वह कब मंदार के करीब आ गई उसे पता भी नहीं चल पाया. हर वह प्रोजेक्ट जिस पर मंदार काम करता था उस में खन्ना अंकल से कह कर वह भी शामिल हो जाती थी. इस तरह वह जितना मंदार के करीब होने की कोशिश करती वह सपना से उतना ही दूरी बना के रहता.

सपना के दिल में पल रही इन हसरतों को उस की सहेली रागिनी जानती थी. पर उस का कहना था कि अगर मंदार पहल नहीं करता तो सपना तो पहल कर ही सकती है. अरे, भाई, बराबरी का जमाना है. पर सपना कुछ भी कह कर अपने पहले प्यार को असफल होता देखने से डरती थी.

रागिनी का मकान मंदार के घर से कुछ आगे की ओर था अत: आफिस से घर जाते समय वह मंदार को लिफ्ट दे दिया करती थी. कई बार रागिनी जानबूझ कर कह देती कि आज उसे मार्केट में कुछ काम है अत: सपना तुम मंदार को उस के घर तक लिफ्ट दे देना. ऐसे किसी मौके पर सपना देखती कि पूरे रास्ते मंदार अपनी फाइलों में ही सिर झुकाए रहता. अगर सपना कुछ पूछ बैठती तो बस, हां हूं कर के चुप हो जाता.

दूसरे दिन जब रागिनी छेड़ते हुए सपना से पूछती, ‘‘कल अपने मंदनाथ को डेटिंग पर कहां ले गई थी,’’ तो वह न चाहते हुए भी मुसकरा देती. फिर रागिनी हमेशा की तरह कहती, ‘‘बालिके, ऐसे में तो तेरा बैंड बजने से रहा.’’

एक दिन मंदार के घर के बाहर उस के पिता शर्माजी खड़े थे. सपना की कार देखते ही वह उस की तरफ आए. उन्हें अपनी ओर आते देख सपना कार के बाहर आ गई. बडे़ प्यार से उन्होंने सपना से कहा, ‘‘बेटी, अगर जल्दी न हो तो  अंदर आओ, हम साथ बैठ कर ठंडा पी लेते हैं.’’ उन के आग्रह को सपना मना न कर सकी.

घर काफी सादगी से सजाया हुआ था. सपना को पिताजी के पास बैठा छोड़  मंदार अपने कमरे में चला गया. उस के इस व्यवहार पर शर्माजी नाराज हुए और सपना से कहने लगे कि बेटी, यह तुम्हें बहुत चाहता है पर थोड़ा शर्मीला है. फिर डरता भी है कि हमारे अतीत के बारे में जान कर अगर तुम ने उसे ठुकरा दिया तो दोबारा वह यह सबकुछ झेल नहीं पाएगा.

सपना के लिए तो यह सबकुछ किसी मनपसंद फिल्म के फास्ट फारवर्ड होने जैसा था. उस का मन मंदार का अपने प्रति लगाव की अनपेक्षित खुशी के साथ ही उस के रहस्यमय डर के बीच झूलने लगा. और यह सब बातें शर्माजी के मुंह से बिना किसी प्रस्तावना के सुन कर उसे कुछ अजीब सा लगा.

शर्माजी ने धीरेधीरे उसे अपने बारे में सबकुछ सचसच बता दिया कि मंदार के जन्म के बाद से ही उस की मां नीला का ध्यान घर में कम और भजनपूजन में ज्यादा लगने लगा था. मंदार तो अपनी दादी की गोद में ही रहता था और नीला साधुसंन्यासियों के चक्कर में इस मंदिर से उस मंदिर तक घूमती रहती थी. कईकई बार मैं ने हंसीहंसी में पत्नी से कहा भी कि मंदिर को छोड़ कर जरा अपने मंदार पर ध्यान दे दो तो हम सब का कल्याण हो जाएगा. कुछ दिनों बाद नीला का भगवान प्रेम इतना बढ़ा कि साधु और बाबा घर में भी आने लगे थे.

उन्हीं दिनोंएक बाबा का मेरे घर में काफी आनाजाना हो गया था. जब मंदार 7 साल का था तो एक दिन नीला अपना बसा- बसाया घर छोड़ कर बाबा के साथ सन्ंयासिन बन कर न जाने कहां चली गई. बदनामी से बचने के लिए मैं

ने अपना तबादला दिल्ली करवा लिया और अम्मां व मंदार को ले कर यहां आ गया.

इस घटना का मंदार के बालमन पर काफी गहरा असर हुआ. वह अपनेआप में सिमट गया, न तो कोई दोस्त और न ही किसी तरह के शौक, बस, अपनी पढ़ाई में ही डूबा रहता. जिस साल मंदार का आई.आईर्.टी. मुंबई में दाखिला हुआ उस की दादी की मृत्यु हो गई. बस, तब से मंदार के सूने जीवन में और कोई औरत नहीं आई.

इस खालीपन में बापबेटे के बीच का रिश्ता बहुत हद तक दोस्तों जैसा हो गया. मंदार अपने दिल की कोई बात मुझ से छिपाता नहीं था. इसीलिए जब उस ने तुम्हारे लिए अपने दिल में पैदा हुए लगाव को मुझ से बताया तो मैं ने सीधे तुम से ही बात करना ठीक समझा.

बेटी, मैं अकसर देखता हूं कि तुम अपनी कार से मंदार को छोड़ने आती हो तो वह जब तक घर के अंदर नहीं आ जाता तुम उसी को देखती रहती हो. तुम्हारी आंखों की चाहत की भाषा को मैं ने पढ़ लिया था इसीलिए तुम से ही सारी बात करना ठीक समझा.

यह सुन सपना जोर से हंसने लगी.

जाते समय शर्माजी ने कहा, ‘‘बेटी, तुम अपने मातापिता को मेरे बारे में सबकुछ बता कर उन की राय पूछ लेना. अगर उन्हें कोई एतराज न हो तो मैं उन से बात करने आऊंगा.’’

घर आने पर सपना ने मां और पिताजी को शर्माजी के परिवार टूटने की कहानी बताई तो उन्हें मंदार में कोई बुराई नजर नहीं आई. दूसरे ही दिन वे दोनों शर्माजी के घर जा कर सपना और मंदार की शादी तय कर आए.

शादी का दिन नजदीक आ रहा था इसलिए गांव से दादादादी भी आ गए. दादी नाराज थीं कि एक तो इस मामले में उन की कोई राय नहीं ली गई, दूसरे लड़कालड़की की कुंडलियां भी नहीं मिलवाई गईं. अत: दादी ने जब पापा से कहा कि वह सपना को अपने गुरु महाराज के पास ले जाना चाहती हैं तो इच्छा होते हुए भी पापा मना नहीं कर पाए.

दादी के साथ सपना गुरु महाराज के आश्रम में पहुंची तो वहां का वातावरण उसे कुछ अजीब सा लगा. एक अजीब सी महक के बीच साधु इधरउधर आराम कर रहे थे. दादी से पहले मोटी दक्षिणा रखवाने के बाद रात 8 बजे मिलने का समय दिया गया. वहां की व्यवस्था देख कर सपना को हिंदी फिल्मों के खलनायक का अड्डा याद आया.

दादी बड़ी खुश थीं कि आज इतनी जल्दी गुरुमहाराज ने दर्शन का समय दे दिया. वह सपना के भाग्य को सराहने लगीं. रात को ठीक 8 बजे दादी और सपना को गुरु महाराज के शयनकक्ष में भेजा गया.

एक बडे़ से कमरे में गुरु महाराज रेशमी वस्त्र पहने मोटे आरामदायक गद्दे पर लेटे हुए थे. उन से कुछ ही दूरी पर एक प्रौढ़ा बैठी माला जप रही थी. कमरे में चंदन की खुशबू फैली हुई थी. जाने क्यों सपना वहां असहज महसूस कर रही थी. तभी दादी ने उस से कहा, ‘‘बेटी, गुरुमहाराज और गुरुमाई के चरण स्पर्श करो.’’

गुरुमहाराज के बाद सपना गुरुमाई के पास पहुंची तो उन का चेहरा कुछ जानापहचाना सा लगा.

सपना पर गुरुमहाराज की नजरें टिकी देख कर दादी ने कहा, ‘‘गुरु महाराज, इस के पिता ने इस का विवाह इस के साथ काम करने वाले मंदार शर्मा से करना तय किया है. मैं दोनों की कुंडलियां आप को दिखाने आई हूं. अब आप का आशीर्वाद मिल जाए तो मैं निश्ंिचत हो जाऊं.’’

सपना को दादी का इस तरह गुरु महाराज को अपनी शादी का निर्णय करने का अधिकार देना अच्छा नहीं लगा मगर वह कुछ बोली नहीं. उधर उस के चेहरे पर अपनी नजरें टिकाए हुए गुरु महाराज ने दादी से कहा, ‘‘बेटी, मुझे कुंडली पढ़ने की क्या जरूरत है. मैं तो इस का चेहरा देख कर ही बता सकता हूं कि कन्या तो साक्षात ‘देवी मां’ का अवतार है. इस का एक सामान्य इनसान की तरह सांसारिक बातों में पड़ना एक बड़ी भूल होगी. इस संसार में ऐसा कोई मानव नहीं है जो ‘देवी मां’ से विवाह कर सके. इसे तो आश्रम की अधिष्ठात्री बनना है. तुम कल सुबह अपने बेटेबहू के साथ यहां आ जाना. मैं एक यज्ञ का अनुष्ठान कर के कन्या को विधिवत देवी के रूप में स्थापित करूंगा.’’

अब सपना में गुरुमहाराज की बकवास सुनने की ताकत नहीं रही. वह बिजली की गति से वहां से उठी और तेज आवाज में दादी से बोली, ‘‘दादी, मैं यह तमाशा देखने नहीं आई थी. मैं जा रही हूं. आप का काम हो जाए तो घर पर आ जाना.’’

घर आ कर उस ने मां और पापा से पूरी रामकहानी बता दी तो पापा ने कहा, ‘‘बेटी, तुम डरो मत. मेरे रहते हुए अम्मां इस तरह की बेवकूफी नहीं कर पाएंगी.’’

रात भर दादी आश्रम में ही रहीं.

सारी रात सपना काफी परेशान रही. उस ने सुबह होते ही मंदार को फोन कर सारा किस्सा बता दिया. थोड़ी ही देर में शर्माजी और मंदार उस के घर आ गए. शर्माजी ने पापा और मां को समझाते हुए कहा, ‘‘आज विज्ञान के इस युग में हमें ऐसी पुरानी सड़ीगली मान्यताओं और उन्हें फैलाने वाले ढोंगी बाबाओं से बचना चाहिए.’’

शर्माजी की बातों से घर का वातावरण फिर से खुशनुमा हो गया. मां चाय बना कर ले आईं तो सब चाय पीने लगे. तभी पापा ने शर्माजी से कहा कि आप थोड़ी देर और रुकें तो मैं अम्मां को आश्रम से ले कर आता हूं.

शर्माजी ने हंसते हुए कहा, ‘‘चलिए, मैं भी तो वह जगह देख आऊं, जहां मेरे घर की लक्ष्मी देवी बन कर विराजने वाली थी.’’

सपना और मंदार बातों में ऐसे खो गए कि गुजरते समय का पता ही नहीं चला. टेलीफोन की घंटी कब बजी और मां ने कब रिसीवर उठाया इस का भी उन्हें पता नहीं चला. पर जब मां के मुंह से खून, गुरुमहाराज, जैसे शब्द सुने तो दोनों भागते हुए मां के पास आए.

मां के हाथ से रिसीवर ले कर सपना ने पापा से बात की तो पापा ने बताया कि आज सुबह जब लोग गुरुमहाराज के दर्शन के लिए उन के कमरे में गए तो देखा कि महाराज की लाश के पास गुरुमाई हाथ में देवी का त्रिशूल ले कर बैठी हैं और पुलिस के पूछने पर गुरुमाई ने सिर्फ यही कहा कि इस का वध मैं ने किया है.

मामला काफी संवेदनशील था. गुरु महाराज के भक्तों में काफी राजनेता, अभिनेता, बडे़बडे़ उद्योगपति और विदेशी भी थे इसलिए पुलिस कोई चूक नहीं करना चाहती थी.

चूंकि पुलिस को घटनास्थल से सपना और मंदार की कुंडलियां और फोटो मिले थे इसलिए उन्हें अंदर ले जाया गया. उन दोनों ने देखा कि गुरुमाई सिर झुका कर बैठी थीं और उन के चरणों में पुलिस महानिरीक्षक बैठे हुए पूछ रहे थे, ‘‘मां, तुम ने यह क्या कर डाला?’’

आहट सुन कर गुरुमाई ने जैसे ही सिर उठाया शर्माजी के मुंह से अपनेआप निकल पड़ा, ‘‘नीला, तुम यहां.’’

यह सुनते ही मंदार, सपना और उस के पापा ने चौंक कर गुरुमाई की ओर देखा. सपना को अब समझ में आया कि क्यों उसे कल रात गुरुमाई का चेहरा जानापहचाना लग रहा था.

शर्माजी और मंदार को सामने देख कर गुरुमाई के धैर्य का बांध टूट गया. वह उठीं और शर्माजी के पैरों में गिर पड़ीं. जब शर्माजी ने उन्हें उठाया तो वह पास में स्तब्ध खडे़ मंदार का चेहरा अपने हाथों में ले कर उसे पागलों की तरह चूमने लगीं.

पुलिस महानिरीक्षक की ओर देख गुरुमाई बोलीं, ‘‘तुम जानना चाहते हो कि मैं ने इस पापी की हत्या क्यों की तो सुनो, मुझ जैसी कितनी ही औरतों का सर्वनाश कर अब यह पापी सपना पर अपनी गंदी नजर डाल रहा था. जब मैं ने मंदार का नाम सुना और उस की कुंडली देखी तो समझ गई कि यह मेरा ही बेटा है. मैं एक बार पहले भी अपना बसाबसाया घरसंसार इस पापी की वजह से उजाड़ चुकी थी. अब दूसरी बार इसे अपने बेटे का बसता हुआ चमन कैसे उजाड़ने देती.’’

गुरुमाई एक पल को रुकीं फिर बोलीं, ‘‘शायद मैं ने आज वह काम किया जो मुझे काफी पहले करना चाहिए था क्योंकि यह पापी जब तक जीवित रहता, तब तक धर्म के नाम पर भोलेभाले लोगों को लूटता रहता.’’

शर्माजी कहने लगे, ‘‘नीला, ऐसे पापियों को प्रश्रय देने वाले भी हम ही हैं, हमें अपने मन से अंधविश्वास के राक्षस को भगाना होगा.’’

नीला ने पुलिस महानिरीक्षक से कहा, ‘‘चलिए, मुझे अपने कर्मों का फल भी तो पाना है.’’

जातेजाते नीला के कानों में शर्माजी के शब्दों ने शहद घोल दिया, ‘‘नीला, तुम्हें जल्दी घर वापस आना है, अपनी बहू का स्वागत करने के लिए.’’

लेखक- नितीन उपाध्ये

Hindi Story : मोहभंग – सीमा का अपने मायके से क्यों मोहभंग हुआ ?

Hindi Story : बारबार मुझे अपनेआप पर ही क्रोध आ रहा है कि क्यों गई थी मैं वहां. यह कोई एक बार की तो बात है नहीं, हर बार यही होता है. पर हर बार चली जाती हूं. आखिर मायके का मोह जो होता है, पर इस बार जैसा मोहभंग हुआ है, वह मुझे कुछ निर्णय लेने के लिए जरूर मजबूर करेगा.

मैं उठ कर बैठ जाती हूं. थर्मस से पानी निकाल कर पीती हूं.

‘‘कौन सा स्टेशन है?’’ मैं सामने बैठी महिला से पूछती हूं.

‘‘बरेली है शायद. कहां जा रही हैं आप?’’

‘‘दिल्ली,’’ मैं सपाट सा उत्तर देती हूं.

‘‘किस के घर जा रही हैं?’’ फिर प्रश्न दगा.

‘‘अपने घर.’’

एक पल की खामोशी के बाद वह महिला पुन: पूछती है, ‘‘कानपुर में कौन रहता है आप का?’’

‘‘मायका है,’’ मैं संक्षिप्त सा उत्तर देती हूं.

‘‘कोई काम था क्या?’’

‘‘हां, शादी थी भाई की?’’ कह कर मैं मुंह फेर लेती हूं.

‘‘तब तो बहुत मजे रहे होंगे,’’ वह बातों का सिलसिला पुन: जोड़ती है.

मेरा मन आगे बातें करने का बिलकुल नहीं था. बहुत सिरदर्द हो रहा था.

‘‘आप के पास कोई दर्द की गोली है? सिरदर्द हो रहा है,’’ मैं उस से पूछती हूं.

‘‘नहीं, बाम है. लीजिएगा?’’

‘‘हूं. दीजिए.’’

‘‘शादीविवाह में अनावश्यक शोरगुल से सिरदर्द हो ही जाता है. मैं पिछले साल बहन की शादी में गई थी. सिर तो सिर, मेरा तो पेट भी खराब हो गया था,’’ वह अपने थैले में से बाम निकाल कर देती है.

मैं उसे धन्यवाद दे बाम लगा कर चुपचाप सो जाती हूं.

उन बातों को याद कर के मेरा सिर फिर से दर्द करने लगता है. भुलाना चाह कर भी नहीं भूल पाती. बारबार वही दृश्य आंखों के सामने तैरने लगते हैं.

‘यहीं की दी हुई तो साड़ी पहनती हो तुम. क्या जीजाजी कभी तुम्हें साड़ी नहीं दिलाते?’ छोटी बहन रेणु कहती है.

‘सुनो जीजी, मामी के आगे यह मत बताना कि जीजाजी लेखापाल ही हैं. हम ने उन्हें शाखा प्रबंधक बता रखा है, समझीं.’

‘क्यों? झूठ क्यों बोला?’ मैं चिहुंक कर पूछती हूं.

‘अरे, तुम्हारी तो कोई इज्जत नहीं, पर हमारी तो है न. पिताजी ने सभी को यही बता रखा है,’ मुझ से 5 वर्ष छोटी रेणु एक ही वाक्य में समझा गई कि अब मेरी इस घर में क्या इज्जत है.

मेरे मन में कहीं कुछ चटक सा जाता है. वैसे यह चटकन तो हर वर्ष मायके आने पर होती है, पर इस बार इतने रिश्तेदार जुटे हैं कि इन के सामने इतनी बेइज्जती सहन नहीं होती मुझ से. मैं उठ कर ऊपर चली जाती हूं.

ऊपर की सीढि़यों पर ताई मिल जाती हैं, ‘क्यों बेटी, अकेली ही आई है इस बार. छोटे से मुन्ने को भी छोड़ आई? न तेरा दूल्हा ही आया है. क्या बात है, बेटी?’

‘कुछ नहीं, ताईजी, बस, दफ्तर का काम था कुछ. फिर मुन्ना उन के बगैर रहता ही नहीं है. छमाही परीक्षा भी है, इसीलिए छोड़ आई,’ मैं पिंड छुड़ा कर भागती हूं.

छोटी बहन रेणु यहां भी आ धमकती है, ‘अरे, तुम यहां बैठी हो. तैयार नहीं हुईं अभी तक? तुम्हें तो आरती करनी है. देखो, 4 बज गए. औरतें आने लगी हैं.’

‘चल रही हूं. चिल्ला मत,’ मैं उसे डांट देती हूं.

‘हूं. पता नहीं क्या समझती हो अपने को. कुछ काम नहीं होता. शादी के बाद एकदम बौड़म हो गई हो तुम तो.’

‘तुम से होता है? बातें बनाने के अलावा कोई काम है तेरे पास?’ मैं बिफर पड़ती हूं.

वह बड़बड़ करती हुई नीचे उतर जाती है. न जाने मां को क्याक्या भड़काती है.

‘क्या बात है सीमा, 4 बज रहे हैं, घुड़चढ़ी का समय हो रहा है. तुम से अभी थाल भी नहीं सजाया गया आरती के लिए? किसी भी काम का होश नहीं रहता इसे,’ मां औरतों के सामने डांटती हैं.

‘क्यों सीमा, जमाई बाबू नहीं आए?’ बड़ी मामी पूछती हैं.

मां व्यंग्य से मुसकरा कर मुंह पीछे कर लेती हैं. मैं चुपचाप बिना कुछ उत्तर दिए थाल उठा कर भीतर कमरे में आ जाती हूं.

सारा काम हो चुका था. बरात लड़की वालों के यहां जा चुकी थी. मैं निढाल हो कर धम से चारपाई पर लेट जाती हूं कि रेणु की आवाज सुनाई पड़ती है, ‘हाय जीजी, तुम अभी से सो गईं क्या? कितना काम पड़ा है.’

‘मुझे नींद आ रही है, रेणु. कुछ तू ही कर ले बहन. मेरा सिर फटा जा रहा है.’

वह बड़बड़ करती चली गई. यद्यपि यह मेरा मायका था, जहां मैं ने जिंदगी के 19 वर्ष काटे थे. फिर भी न जाने क्यों आज इतना पराया लग रहा था. सुबह से न किसी ने खाने के लिए पूछा, न मैं ने खाया ही. यही घर है वह जहां मैं हर समय फ्रिज में से कुछ न कुछ निकाल कर खाती रहती थी. मुझे लगता है कि मैं ने सच ही यहां आ कर गलती की है. राकेश नहीं आए, ठीक ही हुआ.

‘जरा उधर खिसक सीमा, मुन्ने को सुला दूं. इसे ओढ़ा ले. देख, हलकीहलकी सर्दी पड़ने लगी है और तू कैसे लेट गई? कुछ खायापिया भी नहीं है,’ दीदी के करुण स्वर से मैं पिघल गई. मुझ में और दीदी में सिर्फ ढाई वर्ष का ही अंतर है. दीदी की शादी कोलकाता में हुई है. जीजाजी का रेशमी साडि़यों का काफी बड़ा व्यापार है.

दीदी ने मुझ से दोबारा कहा, ‘सीमा, तू कुछ खा ले बहन. और तेरे पति क्यों नहीं आए?’

‘जानबूझ कर क्यों पूछती हो, दीदी. तुम्हें लेने तो बड़े भैया गए थे. मुझे लेने कौन गया? सिर्फ कार्ड डाल दिया. यह तो कहो, मैं आ गई. तुम्हारे सामने मेरी क्या कीमत है?’ मैं ने कहा.

‘हां, सीमा, मेरे साथ भी पहले कुछ ऐसा ही व्यवहार किया जाता था. शादी से पहले मुझे मां कितना डांटती थीं, पर  अब सब उलटा हो गया है.’

‘तुम बड़े घर जो ब्याही हो, भई. मेरे पति बैंक में सिर्फ लेखापाल हैं. तुम्हारे पति की मासिक आय 20 हजार है, तो मेरे पति की सिर्फ 2 हजार. अंतर नहीं है क्या?’

‘नहीं सीमा, रो मत. राकेश कितना सुशील है, तुझे पता नहीं है. तेरे जीजाजी एक तो मुझ से 10 वर्ष बड़े हैं, रुचियों में कितना अंतर है. हर समय इन्हें पैसा ही पैसा चाहिए. न घर की चिंता और न बच्चों की. घर में हर समय बड़ेबड़े व्यापारी आते रहते हैं. नौकरों के बावजूद पूरे दिन रसोई में घुसी रहती हूं. यह भी कोई जिंदगी है? तू तो हर शाम राकेश के साथ घूमने चली जाती है. मुझे तो महीने बाद घर से निकलना होता है इन के साथ. देख, शादी में आए हैं, पर दिन भर पड़े सोते रहते हैं. अभी राकेश होता, तो दौड़दौड़ कर काम करता, मजमा लगा देता. कुछ नहीं तो हमें घुमा ही लाता. कुंआरे में मुझे घूमने की कितनी हसरत थी, पर सब धरी रह गई.’

कुछ देर रुक कर दीदी फिर बोलीं, ‘मैं पिछले वर्ष दिल्ली आई थी तेरे घर. 2 दिन रही. सच, राकेश ने कितना आदर दिया, इधर घुमाया, उधर घुमाया, खूब हंसाहंसा कर मन लगा दिया. तुम तो मियांबीवी हो और एक बच्चा. एक हम हैं कि पूरी गृहस्थी है, 2 छोटी ननदें, देवर, सास सभी की जिम्मेदारी है. कैसी बंध गई हूं मैं? पैसा होगा तेरे जीजाजी के पास बैंक में, पर मैं तो देख, पूरी चौधराइन बन गई. तू मुझ से केवल ढाई वर्ष छोटी है, पर नायिका जैसी लगती है अब भी,’ दीदी मेरी ओर निहारने लगीं.

‘ले देख, यह साड़ी पहन ले. तेरे ऊपर बहुत खिलेगी,’ कहते हुए दीदी ने गुलाबी रेशमी साड़ी मुझे दी.

‘मैं इतनी भारी साड़ी का क्या करूंगी?’ मैं झिझकी.

‘यह क्या हो रहा है?’ अचानक मां की आवाज सुन कर मैं ठिठक गई.

‘सीमा, तू यहां क्या कर रही है? इतना काम पड़ा है. कौन निबटाएगा. उठ, जा जल्दी से कर, फिर बैठियो. और यह साड़ी किस की है?’

‘जीजी की है. मुझे दे रही हैं,’ मैं ने उठते हुए उत्तर दिया.

‘अरे, इतनी भारी साड़ी का सीमा क्या करेगी? तू ही रख ले. तेरे यहां तो रिश्तेदारी काफी बड़ी है. आनाजाना लगा रहता है. क्यों दे रही है इसे?’ मां ने दीदी को समझाया.

मेरा मुंह तमतमा गया, पर चुपचाप काम में लग गई. सारा काम निबटा कर मैं फिर से लेट गई. विवाह की थकान से मेरा बदन चूरचूर हो रहा था.

दूसरे दिन बहू भी आ गई थी. उधर राकेश का फोन भी आ चुका था कि सीमा को भेजो. यद्यपि काम के कारण अम्मां मुझे रोकना चाहती थीं, पर मैं नहीं रुकी. मां ने बड़ी दीदी को विदा कर दिया था. जीजाजी को जल्दी थी. जीजाजी के चलने पर मां ने पूछा, ‘अब कब दर्शन देंगे?’

‘बस जी, अब क्या दर्शन देंगे? एक बार के दर्शन में हमारा लाखों का नुकसान हो जाता है,’ जीजाजी ने चांदी की डिबिया से पान निकाल कर खाते हुए कहा, ‘दर्शन देने वाले तो राकेश बाबू थे. बारबार दर्शन देते थे. जाने अब कहां लोप हो गए.’

मैं जीजाजी का कटाक्ष अच्छी तरह समझ चुकी थी. जीजी ने डांटते हुए कहा, ‘क्यों तंग करते हो उसे?’

जीजाजी के जाने के बाद मेरी भी जाने की बारी थी. शाम की गाड़ी से मुझे भी जाना था. मेरा सामान बंध चुका था. पिताजी ने पूछा, ‘अब राकेश की तरक्की कब होगी?’

‘पता नहीं,’ मैं ने धीरे से उत्तर दिया.

‘पता रखा कर. कुछ लोगों से मिलोजुलो. रेखा को देख. तेरे साथ ही विवाह हुआ था. बैंक में ही था. अफसर हो गया. कोशिश ही नहीं करते तुम लोग.’

मां ने ताना मारा, ‘रीमा को देख कितनी सुखी है. कितना पैसा, कोठी सभी कुछ है.’

‘मां, हमें क्या कमी है. हम भी तो मजे में हैं.’

‘वो मजे हमें दीख रहे हैं,’ मां ने कटाक्ष किया.

मैं नहीं जानती थी कि यह मां की सहानुभूति है या उन की गरिमा आहत होती है मेरे आने से. उन्हें मैं मखमल में टाट का पैबंद सा लगती हूं. जबतब राकेश को ले कर मुझे जलील करना शुरू कर देती हैं. बड़े भैयाभाभी सदा राकेश को ही पसंद करते हैं, पर मां को स्वभाव से क्या मतलब? जीजाजी चाहे कितनी बेइज्जती करें मां की, वे उन से ही खुश रहती हैं. पैसा जो है, उन के पास.

भैया मुझे छोड़ने स्टेशन आए थे. मैं मां की बातें याद कर के रोने लगी थी.

‘देख सीमा, मां और पिताजी की बातों का बुरा न मानना. पत्र जरूर डालना. राकेश क्यों नहीं आए, मुझे पता है. मैं जब दिल्ली आऊंगा तब मिलूंगा,’ भैया गाड़ी में बिठा कर चले गए थे.

अचानक एक सहानुभूति भरा स्वर मेरे कानों में पड़ा. मैं एकदम से वर्तमान में लौट आई.

‘‘अब आप का सिरदर्द कैसा है? चाय पिएंगी क्या?’’ थर्मस से चाय निकालते हुए सामने बैठी महिला बोली.

‘‘ठीक हूं,’’ मैं उठ बैठती हूं. उस के हाथ से शीशे के गिलास में चाय ले कर पूछती हूं, ‘‘कौन सा स्टेशन है?’’

‘‘बस, 1 घंटे का रास्ता और है. दिल्ली आ रही है. पूरी रात आप बेचैन सी रहीं.’’

‘‘हूं, तबीयत ठीक नहीं थी न,’’ मैं मुसकराने का प्रयास करती हूं.

‘‘कितने बच्चे हैं आप के?’’ वह पूछती है.

‘‘जी, सिर्फ एक.’’

‘‘उसे क्यों छोड़ आईं. लगता है दादादादी का प्यारा होगा,’’ वह मेरी ओर मुसकरा कर देखती है.

‘‘हूं. अब नहीं छोड़ूंगी कभी,’’ राकेश और मुन्ने की शक्ल बारबार मेरी आंखों के सामने तैरने लगती है. रहरह कर मुन्ने की याद आने लगती है. जाने कैसा होगा वह, राकेश ने कैसे रखा होगा उसे? बस, घंटे भर की तो बात है.

मैं उतावली हो जाती हूं उन दोनों से मिलने के लिए.

आखिर मैं उन को छोड़ कर क्यों गई थी? मायके का मोह छोड़ना होगा मुझे. इस से पहले कि मुझे वे घटनाएं फिर याद आएं, मैं नीचे से टोकरी खींच शादी की मिठाई निकाल कर सामने वाली महिला को देती हूं और सबकुछ बिसरा कर उन से बातों में लीन हो जाती हूं.

लेखक- कृष्णा गर्ग

Hindi Story : दुश्मन – सोम अपने रिश्तेदारों को क्यों दुश्मन मानता था

Hindi Story : ‘‘कभी किसी की तारीफ करना भी सीखो सोम, सुनने वाले के कानों में कभी शहद भी टपकाया करो. सदा जहर ही टपकाना कोई रस्म तो नहीं है न, जिसे पीढ़ी दर पीढ़ी सदा निभाया ही जाए.’’

टेढ़ी आंख से सोम मुझे देखने लगा.

‘‘50 के पास पहुंच गई तुम्हारी उम्र और अभी भी तुम ने जीवन से कुछ नहीं सीखा. हाथ से कंजूस नहीं हो तो जबान से ही कंजूसी किस लिए?’’ बड़बड़ाता हुआ क्याक्या कह गया मैं.

वह चुप रहा तो मैं फिर बोला, ‘‘अपने चारों तरफ मात्र असंतोष फैलाते हो और चाहते हो तुम्हें संतोष और चैन मिले, कभी किसी से मीठा नहीं बोलते हो और चाहते हो हर कोई तुम से मीठा बोले. सब का अपमान करते हो और चाहते हो तुम्हें सम्मान मिले…तुम तो कांटों से भरा कैक्टस हो सोम, कोई तुम से छू भर भी कैसे जाए, लहूलुहान कर देते हो तुम सब को.’’

शायद सोम को मुझ से ऐसी उम्मीद न थी. सोम मेरा छोटा भाई है और मैं उसे प्यार करता हूं. मैं चाहता हूं कि मेरा छोटा भाई सुखी रहे, खुश रहे लेकिन यह भी सत्य है कि मेरे भाई के चरित्र में ऐसा कोई कारण नहीं जिस वजह से वह खुश रहे. क्या कहूं मैं? कैसे समझाऊं, इस का क्या कारण है, वह पागल नहीं है. एक ही मां के शरीर से उपजे हैं हम मगर यह भी सच है कि अगर मुझे भाई चुनने की छूट दे दी जाती तो मैं सोम को कभी अपना भाई न चुनता. मित्र चुनने को तो मनुष्य आजाद है लेकिन भाई, बहन और रिश्तेदार चुनने में ऐसी आजादी कहां है.

मैं ने जब से होश संभाला है सोम मेरी जिम्मेदारी है. मेरी गोद से ले कर मेरे बुढ़ापे का सहारा बनने तक. मैं 60 साल का हूं, 10 साल का था मैं जब वह मेरी गोद में आया था और आज मेरे बुढ़ापे का सहारा बन कर वह मेरे साथ है मगर मेरी समझ से परे है.

मैं जानता हूं कि वह मेरे बड़बड़ाने का कारण कभी नहीं पूछेगा. किसी दूसरे को उस की वजह से दर्द या तकलीफ भी होती होगी यह उस ने कभी नहीं सोचा.

उठ कर सोम ऊपर अपने घर में चला गया. ऊपर का 3 कमरों का घर उस का बसेरा है और नीचे का 4 कमरों का हिस्सा मेरा घर है.

जिन सवालों का उत्तर न मिले उन्हें समय पर ही छोड़ देना चाहिए, यही मान कर मैं अकसर सोम के बारे में सोचना बंद कर देना चाहता हूं, मगर मुझ से होता भी तो नहीं यह कुछ न कुछ नया घट ही जाता है जो मुझे चुभ जाता है.

कितने यत्न से काकी ने गाजर का हलवा बना कर भेजा था. काकी हमारी पड़ोसिन हैं और उम्र में मुझ से जरा सी बड़ी होंगी. उस के पति को हम भाई काका कहते थे जिस वजह से वह हमारी काकी हुईं. हम दोनों भाई अपना खाना कभी खुद बनाते हैं, कभी बाजार से लाते हैं और कभीकभी टिफिन भी लगवा लेते हैं. बिना औरत का घर है न हमारा, न तो सोम की पत्नी है और न ही मेरी. कभी कुछ अच्छा बने तो काकी दे जाती हैं. यह तो उन का ममत्व और स्नेह है.

‘‘यह क्या बकवास बना कर भेज दिया है काकी ने, लगता है फेंकना पड़ेगा,’’ यह कह कर सोम ने हलवा मेरी ओर सरका दिया.

सोम का प्लेट परे हटा देना ही मुझे असहनीय लगा था. बोल पड़ा था मैं. सवाल काकी का नहीं, सवाल उन सब का भी है जो आज सोम के साथ नहीं हैं, जो सोम से दूर ही रहने में अपनी भलाई समझते हैं.

स्वादिष्ठ बना था गाजर का हलवा, लेकिन सोम को पसंद नहीं आया सो नहीं आया. सोम की पत्नी भी बहुत गुणी, समझदार और पढ़ीलिखी थी. दोषरहित चरित्र और संस्कारशील समझबूझ. हमारे परिवार ने सोम की पत्नी गीता को सिर- आंखों पर लिया था, लेकिन सोम के गले में वह लड़की सदा फांस जैसी ही रही.

‘मुझे यह लड़की पसंद नहीं आई मां. पता नहीं क्या बांध दिया आप ने मेरे गले में.’

‘क्यों, क्या हो गया?’

अवाक् रह गए थे मां और पिताजी, क्योंकि गीता उन्हीं की पसंद की थी. 2 साल की शादीशुदा जिंदगी और साल भर का बच्चा ले कर गीता सदा के लिए चली गई. पढ़ीलिखी थी ही, बच्चे की परवरिश कर ली उस ने.

उस का रिश्ता सोम से तो टूट गया लेकिन मेरे साथ नहीं टूट पाया. उस ने भी तोड़ा नहीं और हम पतिपत्नी ने भी सदा उसे निभाया. उस का घर फिर से बसाने का बीड़ा हम ने उठाया और जिस दिन उसे एक घर दिलवा दिया उसी दिन हम एक ग्लानि के बोझ से मुक्त हो पाए थे. दिन बीते और साल बीत गए. गीता आज भी मेरी बहुत कुछ है, मेरी बेटी, मेरी बहन है.

मैं ने उसे पीछे मुड़ कर कभी नहीं देखने दिया. वह मेरी अपनी बच्ची होती तो भी मैं इसी तरह करता.

कुछ देर बाद सोम ऊपर से उतर कर नीचे आया. मेरे पास बैठा रहा. फिर बोला, ‘‘तुम तो अच्छे हो न, तो फिर तुम क्यों अकेले हो…कहां है तुम्हारी पत्नी, तुम्हारे बच्चे?’’

मैं अवाक् रह गया था. मानो तलवार सीने में गहरे तक उतार दी हो सोम ने, वह तलवार जो लगातार मुझे जराजरा सी काटती रहती है. मेरी गृहस्थी के उजड़ने में मेरी तो कोई भूल नहीं थी. एक दुर्घटना में मेरी बेटीबेटा और पत्नी चल बसे तो उस में मेरा क्या दोष. कुदरत की मार को मैं सह रहा हूं लेकिन सोम के शब्दों का प्रहार भीतर तक भेद गया था मुझे.

कुछ दिन से देख रहा हूं कि सोम रोज शाम को कहीं चला जाता है. अच्छा लगा मुझे. कार्यालय के बाद कहीं और मन लगा रहा है तो अच्छा ही है. पता चला कुछ भी नया नहीं कर रहा सोम. हैरानपरेशान गीता और उस का पति संतोष मेरे सामने अपने बेटे विजय को साथ ले कर खडे़ थे.

‘‘भैया, सोम मेरा घर बरबाद करने पर तुले हैं. हर शाम विजय से मिलने लगे हैं. पता नहीं क्याक्या उस के मन में डाल रहे हैं. वह पागल सा होता जा रहा है.’’

‘‘संतान के मन में उस की मां के प्रति जहर घोल कर भला तू क्या साबित करना चाहता है?’’ मैं ने तमतमा कर कहा.

‘‘मुझे मेरा बच्चा वापस चाहिए, विजय मेरा बेटा है तो क्या उसे मेरे साथ नहीं रहना चाहिए?’’ सफाई देते सोम बोला.

‘‘आज बच्चा पल गया तो तुम्हारा हो गया. साल भर का ही था न तब, जब तुम ने मां और बच्चे का त्याग कर दिया था. तब कहां गई थी तुम्हारी ममता? अच्छे पिता नहीं बन पाए, कम से कम अच्छे इनसान तो बनो.’’

आखिर सोम अपना रूप दिखा कर ही माना. पता नहीं उस ने क्या जादू फेरा विजय पर कि एक शाम वह अपना सामान समेट मां को छोड़ ही आया. छटपटा कर रह गया मैं. गीता का क्या हाल हो रहा होगा, यही सोच कर मन घुटने लगा था. विजय की अवस्था से बेखबर एक दंभ था मेरे भाई के चेहरे पर.

मुझे हारा हुआ जुआरी समझ मानो कह रहा हो, ‘‘देखा न, खून आखिर खून होता है. आ गया न मेरा बेटा मेरे पास…आप ने क्या सोचा था कि मेरा घर सदा उजड़ा ही रहेगा. उजडे़ हुए तो आप हैं, मैं तो परिवार वाला हूं न.’’

क्या उत्तर देता मैं प्रत्यक्ष में. परोक्ष में समझ रहा था कि सोम ने अपने जीवन की एक और सब से बड़ी भूल कर दी है. जो किसी का नहीं हुआ वह इस बच्चे का होगा इस की भी क्या गारंटी है.

एक तरह से गीता के प्रति मेरी जिम्मेदारी फिर सिर उठाए खड़ी थी. उस से मिलने गया तो बावली सी मेरी छाती से आ लगी.

‘‘भैया, वह चला गया मुझे छोड़ कर…’’

‘‘जाने दे उसे, 20-22 साल का पढ़ालिखा लड़का अगर इतनी जल्दी भटक गया तो भटक जाने दे उसे, वह अगर तुम्हारा नहीं तो न सही, तुम अपने पति को संभालो जिस ने पलपल तुम्हारा साथ दिया है.’’

‘‘उन्हीं की चिंता है भैया, वही संभल नहीं पा रहे हैं. अपनी संतान से ज्यादा प्यार दिया है उन्होंने विजय को. मैं उन का सामना नहीं कर पा रही हूं.’’

वास्तव में गीता नसीब वाली है जो संतोष जैसे इनसान ने उस का हाथ पकड़ लिया था. तब जब मेरे भाई ने उसे और बच्चे को चौराहे पर ला खड़ा किया था. अपनी संतान के मुंह से निवाला छीन जिस ने विजय का मुंह भरा वह तो स्वयं को पूरी तरह ठगा हुआ महसूस कर रहा होगा न.

संतोष के आगे मात्र हाथ जोड़ कर माफी ही मांग सका मैं.

‘‘भैया, आप क्यों क्षमा मांग रहे हैं? शायद मेरे ही प्यार में कोई कमी रही जो वह…’’

‘‘अपने प्यार और ममता का तिरस्कार मत होने दो संतोष…उस पिता की संतान भला और कैसी होती, जैसा उस का पिता है बेटा भी वैसा ही निकला. जाने दो उसे…’’

‘‘विजय ने आज तक एक बार भी नहीं सोचा कि उस का बाप कहां रहा. आज ही उस की याद आई जब वह पल गया, पढ़लिख गया, फसल की रखवाली दिनरात जो करता रहा उस का कोई मोल नहीं और बीज डालने वाला मालिक हो गया.’’

‘‘बच्चे का क्या दोष भैया, वह बेचारा तो मासूम है…सोम ने जो बताया होगा उसे ही मान लिया होगा…अफसोस यह कि गीता को ही चरित्रहीन बता दिया, सोम को छोड़ वह मेरे साथ भाग गई थी ऐसा डाल दिया उस के दिमाग में…एक जवान बच्चा क्या यह सच स्वीकार कर पाता? अपनी मां तो हर बेटे के लिए अति पूज्यनीय होती है, उस का दिमाग खराब कर दिया है सोम ने और  फिर विजय का पिता सोम है, यह भी तो असत्य नहीं है न.’’

सन्नाटे में था मेरा दिलोदिमाग. संतोष के हिलते होंठों को देख रहा था मैं. यह संतोष ही मेरा भाई क्यों नहीं हुआ. अगर मुझे किसी को दंड देने का अधिकार प्राप्त होता तो सब से पहले मैं सोम को मृत्युदंड देता जिस ने अपना जीवन तो बरबाद किया ही अब अपने बेटे का भी सर्वनाश कर रहा है.

2-4 दिन बीत गए. सोम बहुत खुश था. मैं समझ सकता था इस खुशी का रहस्य.

शाम को चाय का पहला ही घूंट पिया था कि दरवाजे पर दस्तक हुई.

‘‘ताऊजी, मैं अंदर आ जाऊं?’’

विजय खड़ा था सामने. मैं ने आगेपीछे नजर दौड़ाई, क्या सोम से पूछ कर आया है. स्वागत नहीं करना चाहता था मैं उस का लेकिन वह भीतर चला ही आया.

‘‘ताऊजी, आप को मेरा आना अच्छा नहीं लगा?’’

चुप था मैं. जो इनसान अपने बाप का नहीं, मां का नहीं वह मेरा क्या होगा और क्यों होगा.

सहसा लगा, एक तूफान चला आया हो सोम खड़ा था आंगन में, बाजार से लौटा था लदाफंदा. उस ने सोचा भी नहीं होगा कि उस के पीछे विजय सीढि़यां उतर मेरे पास चला आएगा.

‘‘तुम नीचे क्यों चले आए?’’

चुप था विजय. पहली बार मैं ने गौर से विजय का चेहरा देखा.

‘‘मैं कैदी हूं क्या? यह मेरे ताऊजी हैं. मैं इन से…’’

‘‘यह कोई नहीं है तेरा. यह दुश्मन है मेरा. मेरा घर उजाड़ा है इस ने…’’

सोम का अच्छा होने का नाटक समाप्त होने लगा. एकाएक लपक कर विजय की बांह पकड़ ली सोम ने और यों घसीटा जैसे वह कोई बेजान बुत हो.

‘‘छोडि़ए मुझे,’’ बहुत जोर से चीखा विजय, ‘‘बच्चा नहीं हूं मैं. अपनेपराए और अच्छेबुरे की समझ है मुझे. सभी दुश्मन हैं आप के, आप का भाई आप का दुश्मन, मेरी मां आप की दुश्मन…’’

‘‘हांहां, तुम सभी मेरे दुश्मन हो, तुम भी दुश्मन हो मेरे, तुम मेरे बेटे हो ही नहीं…चरित्रहीन है तुम्हारी मां. संतोष के साथ भाग गई थी वह, पता नहीं कहां मुंह काला किया था जो तेरा जन्म हुआ था…तू मेरा बच्चा होता तो मेरे बारे में सोचता.’’

मेरा बांध टूट गया था. फिर से वही सब. फिर से वही सभी को लहूलुहान करने की आदत. मेरा उठा हुआ हाथ विजय ने ही रोक लिया एकाएक.

‘‘रहने दीजिए न ताऊजी, मैं किस का बेटा हूं मुझे पता है. मेरे पिता संतोष हैं जिन्होंने मुझे पालपोस कर बड़ा किया है, जो इनसान मेरी मां की इज्जत करता है वही मेरा बाप है. भला यह इनसान मेरा पिता कैसे हो सकता है, जो दिनरात मेरी मां को गाली देता है. जो जरा सी बात पर दूसरे का मानसम्मान मिट्टी में मिला दे वह मेरा पिता नहीं.’’

स्तब्ध रह गया मैं भी. ऐसा लगा, संतोष ही सामने खड़ा है, शांत, सौम्य. सोम को एकटक निहार रहा था विजय.

‘‘आप के बारे में जो सुना था वैसा ही पाया. आप को जानने के लिए आप के साथ कुछ दिन रहना बहुत जरूरी था सो चला आया था. मेरी मां आप को क्यों छोड़ कर चली गई होगीं मैं समझ गया आज…अब मैं अपने मांबाप के साथ पूरापूरा न्याय कर पाऊंगा. बहुत अच्छा किया जो आप मुझ से मिल कर यहां चले आने को कहते रहे. मेरा सारा भ्रम चला गया, अब कोई शक नहीं बचा है.

‘‘सच कहा आप ने, मैं आप का बच्चा होना भी नहीं चाहता. आप ने 20 साल पहले भी मुझे दुत्कारा था और आज भी दुत्कार दिया. मेरा इतना सा ही दोष कि मैं नीचे ताऊजी से मिलने चला आया. क्या यह इतना बड़ा अपराध है कि आप यह कह दें कि आप मेरे पिता ही नहीं… अरे, रक्त की चंद बूंदों पर ही आप को इतना अभिमान कि जब चाहा अपना नाम दे दिया, जब चाहा छीन लिया. अपने पुरुष होने पर ही इतनी अकड़, पिता तो एक जानवर भी बनता है. अपने बच्चे के लिए वह भी उतना तो करता ही है जितना आप ने कभी नहीं किया. क्या चाहते हैं आप, मैं समझ ही नहीं पाया. मेरे घर से मुझे उखाड़ दिया और यहां ला कर यह बता रहे हैं कि मैं आप का बेटा ही नहीं हूं, मेरी मां चरित्रहीन थी.’’

हाथ का सामान जमीन पर फेंक कर सोम जोरजोर से चीखने लगा, पता नहीं क्याक्या अनापशनाप बकने लगा.

विजय लपक कर ऊपर गया और 5 मिनट बाद ही अपना बैग कंधे पर लटकाए नीचे उतर आया.

चला गया विजय. मैं सन्नाटे में खड़ा अपनी चाय का प्याला देखने लगा. एक ही घूंट पिया था अभी. पहले और दूसरे घूंट में ही कितना सब घट गया. तरस आ रहा था मुझे विजय पर भी, पता नहीं घर पहुंचने पर उस का क्या होगा. उस का भ्रम टूट गया, यह तो अच्छा हुआ पर रिश्ते में जो गांठ पड़ जाएगी उस का निदान कैसे होगा.

‘‘रुको विजय, बेटा रुको, मैं साथ चलता हूं.’’

‘‘नहीं ताऊजी, मैं अकेला आया था न, अकेला ही जाऊंगा. मम्मी और पापा को रुला कर आया था, अभी उस का प्रायश्चित भी करना है मुझे.’’

Hindi Story : अंधेरे उजाले

Hindi Story : जीवन में बहुत कुछ अचानक, अनायास, अनजाने घट जाता है. आदमी उस के लिए तैयार नहीं होता इसलिए उस का अनचाहे शिकार हो जाता है. ये घटनाएं व्यक्ति की सोच, नजरिए और जिंदगी की धारा तक बदल देती हैं. सुदेश अपनी पत्नी तनवी के साथ एक होटल में ठहरा था. होटल के अपने कमरे में टीवी पर समाचार देख वह एकदम परेशान हो उठा.

राजस्थान अचानक गुर्जरों की आरक्षण की मांग को ले कर दहक उठा था. वहां की आग गुड़गांव, फरीदाबाद, गाजियाबाद, दनकौर, दादरी, मथुरा, आगरा आदि में फैल गई थी. वे दोनों बच्चों को घर पर नौकरानी के भरोसे छोड़ कर आए थे. तनवी दिल्ली अपने अर्थशास्त्र के शोध से संबंधित कुछ जरूरी किताबें लेने आई थी. सुदेश उस की मदद को संग आया था.

1-2 दिन में किताबें खरीद कर वे लोग घर वापस लौटने वाले थे लेकिन तभी गुर्जरों का यह आंदोलन छिड़ गया. अपनी कार से उन्हें वापस लौटना था. रास्ते में नोएडा, ग्रेटर नोएडा और गाजियाबाद का हाईवे पड़ेगा. वाहनों में आगजनी, बसों की तोड़फोड़, रेल की पटरियां उखाड़ना, हिंसा, मारपीट, गोलीबारी, लंबेलंबे जाम…क्या मुसीबत है. बच्चों की चिंता ने दोनों को परेशान कर दिया. उन के लिए अब जल्दी से जल्दी घर पहुंचना जरूरी है. ‘‘क्या होता जा रहा है इस देश को? अपनी मांग मनवाने का यह कौन सा तरीका निकाल लिया लोगों ने?’’ तनवी के स्वर में घबराहट थी.

वोटों की राजनीति, जातिवाद, लोकतंत्र के नाम पर चल रहा ढोंगतंत्र, आरक्षण, गरीबी, बेरोजगारी, बढ़ती आबादी आदि ऐसे मुद्दे थे जिन पर चाहता तो सुदेश घंटों भाषण दे सकता था पर इस वक्त वह अवसर नहीं था. इस वक्त तो उन की पहली जरूरत किसी तरह होटल से सामान समेट कर कार में ठूंस, घर पहुंचना था. उन्हें अपने बच्चों की चिंता लगातार सताए जा रही थी. फोन पर दोनों बच्चों, वैभव और शुभा से तनवी और सुदेश ने बात कर के हालचाल पूछ लिए थे. नौकरानी से भी बात हो गई थी पर नौकरानी ने यह भी कह दिया था कि साहब, दिल्ली का झगड़ा इधर शहर में भी फैल सकता है…

हालांकि अपनी सड़क पर पुलिस वाले गश्त लगा रहे हैं…पर लोगों का क्या भरोसा साहब… आदमी का आदमी पर से विश्वास ही उठ गया. कैसा विचित्र समय आ गया है. हम सब अपनी विश्वसनीयता खो बैठे हैं. किसी को किसी पर भरोसा नहीं रह गया. कब कौन आदमी हमारे साथ गड़बड़ कर दे, हमें हमेशा यह भय लगा रहता है. सामान पैक कर गाड़ी में रखा और वे दोनों दिल्ली से एक तरह से भाग लिए ताकि किसी तरह जल्दी से जल्दी घर पहुंचें. बच्चों की चिंता के कारण सुदेश गाड़ी को तेज रफ्तार से चला रहा था.

तनवी खिड़की से बाहर के दृश्य देख रही थी और वह तनवी को देख कर अपने अतीत के बारे में सोचने लगा. शहर में हो रही एक गोष्ठी में सुदेश मुख्य वक्ता था. गोष्ठी के बाद जलपान के वक्त अनूप उसे पकड़ कर एक युवती के निकट ले गया और बोला, ‘सुदेश, इन से मिलो…मिस तनवी…यहां के प्रसिद्ध महिला महाविद्यालय में अर्थशास्त्र की जानीमानी प्रवक्ता हैं.’ ‘मिस’ शब्द से चौंका था सुदेश, एक पढ़ीलिखी, प्रतिष्ठित पद वाली ठीकठाक रंगरूप की युवती का इस उम्र तक ‘मिस’ रहना, इस समाज में मिसफिट होने जैसा लगता है. अब तक मिस ही क्यों? मिसेज क्यों नहीं? यह सवाल सुदेश के दिमाग में कौंध गया था. ‘और मिस तनवी, ये हैं मिस्टर सुदेश कुमार…

यहां के महाविद्यालय में समाज- शास्त्र के जानेमाने प्राध्यापक, जातिवाद के घनघोर आलोचक….अखबारों में दलितों, पिछड़ों और गरीबों के जबरदस्त पक्षधर… इस कारण जाति से ब्राह्मण होने के बावजूद लोग इन की पैदाइश को ले कर संदेह जाहिर करते हैं और कहते हैं, जरूर कहीं कुछ गड़बड़ है वरना इन्हें किसी हरिजन परिवार में ही पैदा होना चाहिए था.’ अनूप की बातों पर सुदेश का ध्यान नहीं था पर ‘कुमार’ शब्द उस ने जिस तरह तनवी के सामने खास जोर दे कर उच्चारित किया था उस से वह सोच में पड़ गया था. अनूप ने कहा, ‘है तो यह अशिष्टता पर मिस तनवी की उम्र 28-29 साल, मिजाज तेजतर्रार, स्वभाव खरा, नकचढ़ा…टूटना मंजूर, झुकना असंभव. इन की विवाह की शर्तें हैं…कास्ट एंड रिलीजन नो बार. पति की हाइट एंड वेट नो च्वाइस. कांप्लेक्शन मस्ट बी फेयर, हायली क्वालीफाइड…सेलरी 5 अंकों में. नेचर एडजस्टेबल. स्मार्ट बट नाट फ्लर्ट.

नजरिया आधुनिक, तर्कसंगत, बीवी को जो पांव की जूती न समझे, बराबर की हैसियत और हक दे. दकियानूस और अंधविश्वासी न हो. अनूप लगातार जिस लहजे में बोले जा रहा था उस से सुदेश को एकदम हंसी आ गई थी और तनवी सहम सी गई थी, ‘अनूपजी, आप पत्रकार लोगों से मैं झगड़ तो सकती नहीं क्योंकि आज झगडं़ूगी, कल आप अखबार में खिंचाई कर के मेरे नाम में पलीता लगा देंगे, तिल होगा तो ताड़ बता कर शहर भर में बदनाम कर देंगे…पर जिस सुदेशजी से मैं पहली बार मिल रही हूं, उन के सामने मेरी इस तरह बखिया उधेड़ना कहां की भलमनसाहत है?’ ‘यह मेरी भलमनसाहत नहीं मैडम, आप से रिश्तेदारी निभाना है…असल में आप दोनों का मामला मैं फिट करवाना चाहता हूं…वह नल और दमयंती का किस्सा तो आप ने सुना ही होगा…बेचारे हंस को दोनों के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभानी पड़ी थी…आजकल हंस तो कहीं रह नहीं गए कि नल और दमयंती की जोड़ी बनवा दें.

अब तो हम कौए ही रह गए हैं जो यह भूमिका निभा रहे हैं. ‘आप जानती हैं, मेरी शादी हो चुकी है, वरना मैं ही आप से शादी कर लेता…कम से कम एक बंधी हुई रकम कमाने वाली बीवी तो मुझे मिलती. अपने नसीब में तो घरेलू औरत लिखी थी…और अपन ठहरे पत्रकार…कलम घसीट कर जिंदगी घसीटने वाले…हर वक्त हलचल और थ्रिल की दुनिया में रहने वाले पर अपनी निजी जिंदगी एकदम रुटीन, बासी…न कोई रोमांस न रोमांच, न थ्रिल न व्रिल. सिर्फ ड्रिल…लेफ्टराइट, लेफ्ट- राइट करते रहो, कभी यहां कभी वहां, कभी इस की खबर कभी उस की खबर…दूसरों की खबरें छापने वाले हम लोग अपनी खबर से बेखबर रहते हैं.’ बाद में अनूप ने तनवी के बारे में बहुत कुछ टुकड़ोंटुकड़ों में सुदेश को बताया था और उस से ही वह प्रभावित हुआ था.

तनवी उसे काफी दबंग, समझदार, बोल्ड युवती लगी थी, एक ऐसी युवती जो एक बार फैसला सोचसमझ कर ले तो फिर उस से वापस न लौटे. सुदेश को ढुलमुल, कमजोर दिमाग की, पढ़ीलिखी होने के बावजूद बेकार के रीतिरिवाजों में फंसी रहने वाली अंधविश्वासी लड़कियां एकदम गंवार और जाहिल लगती थीं, जिन के साथ जिंदगी को सहजता से जीना उसे बहुत कठिन लगता था, इसी कारण उस ने तमाम रिश्ते ठुकराए भी थे.

तनवी उसे कई मानों में अपने मन के अनुकूल लगी थी, हालांकि उस के मन में एक दुविधा हमेशा रही थी कि ऐसी दबंग युवती पतिपत्नी के रिश्ते को अहमियत देगी या नहीं? उसे निभाने की सही कोशिश करेगी या नहीं? विवाह एक समझौता होता है, उस में अनेक उतारचढ़ाव आते हैं, जिन्हें बुद्धिमानी से सहन करते हुए बाधाओं को पार करना पड़ता है. कसबे में तनवी का वह निर्णय खलबली मचा देने वाला साबित हुआ था. देखा जाए तो बात मामूली थी, ऐसी घटनाएं अकसर शादीब्याह में घट जाया करती हैं पर मानमनौवल और समझौतों के बाद बीच का रास्ता निकाल लिया जाता है.

तनवी ने बीच के सारे रास्ते अपने फैसले से बंद कर दिए थे. तनवी की शादी जिस लड़के से तय हुई थी वह भौतिक विज्ञान के एक आणविक संस्थान में काम करने वाला युवक था. बरात दरवाजे पर पहुंची. औपचारिकताओं के लिए दूल्हे को घोड़ी से उतार कर चौकी पर बैठाया गया. लकड़ी की उस चौकी के अचानक एक तरफ के दोनों पाए टूट गए और दूल्हे राजा एक तरफ लुढ़क गए. द्वारचार के उस मौके पर मौजूद बुजुर्गों ने कहा कि यह अपशकुन है. विवाह सफल नहीं होगा. दूल्हे राजा उठे और लकड़ी की उस चौकी में ठोकर मारी, एकदम बौखला कर बोले, ‘ऐसी मनहूस लड़की से मैं हरगिज शादी नहीं करूंगा. इस महत्त्वपूर्ण रस्म में बाधा पड़ी है. अपशकुन हुआ है.’ क्रोध में बड़बड़ाते दूल्हे राजा दरवाजे से लौट गए. ‘मुझे नहीं करनी शादी इस लड़की से,’ उन का ऐलान था. पिता भी बेटे की तरफ. सारे बुजुर्ग भी उस की तरफ. रंग में भंग पड़ गया. बाद में पता चला कि चौकी बनाने वाले बढ़ई से गलती हो गई थी.

जल्दबाजी में एक तरफ के पायों में कीलें ठुकने से रह गई थीं और इस मामूली बात का बतंगड़ बन गया था. तनवी ने यह सब सुना तो फिर उस ने भी यह कहते हुए शादी से इनकार कर दिया, ‘ऐसे तुनकमिजाज, अंधविश्वासी और गुस्सैल युवक से मैं हरगिज शादी नहीं करूंगी.’ तनवी के इस फैसले ने एक नया बखेड़ा खड़ा कर दिया. लड़के वालों को उम्मीद थी कि लड़की वाले दबाव में आएंगे. अपनी इज्जत का वास्ता देंगे, मिन्नतें करेंगे, लड़की की जिंदगी का सवाल ले कर गिड़गिड़ाएंगे. तनवी के पिता और मामा लड़के के और उन के परिवार वालों के हाथपांव जोड़ने पहुंचे भी, किसी तरह मामला सुलटने वाला भी था पर तनवी के इनकार ने नई मुसीबत खड़ी कर दी. पिता और मामा ने तनवी को बहुत समझाया पर वह किसी प्रकार उस विवाह के लिए राजी नहीं हुई. उस ने कह दिया, ‘जीवन भर कुंआरी रह लूंगी पर इस लड़के से शादी किसी भी कीमत पर नहीं करूंगी. नौकरी कर रही हूं.

कमाखा लूंगी, भूखी नहीं मर जाऊंगी, न किसी पर बोझ बनूंगी. उस का निर्णय अटल है, बदल नहीं सकता.’ कसबे में तमाम चर्चाएं चलने लगीं…लड़की का पहले से किसी लड़के से संबंध है. कसबे के किन्हीं परमानंद बाबू ने इस अफवाह को और हवा दे दी. बताया कि जिस कालिज में तनवी नौकरी करती है, उस के प्रबंधक के लड़के के साथ वह दिल्ली, कोलकाता घूमतीफिरती है. होटलों में अकेली उस के साथ एक ही कमरे में रुकती है. चालचलन कैसा होगा, लोग स्वयं सोच लें. कसबे के भी 2-3 युवकों से उस के संबंध होने की बातें कही जाने लगीं. दूसरे के फटे में अपनी टांग फंसाना कसबाई लोगों को खूब आता है. पत्रकार अनूप तनवी का रिश्ते में कुछ लगता था. उस विवाह समारोह में वह भी शामिल हुआ था इसलिए उसे सारी घटनाओं और स्थितियों की जानकारी थी. ‘बदनाम हो जाओगी.

पूरी जाति- बिरादरी में अफवाह फैल जाएगी. फिर तुम से कौन शादी करेगा?’ मामा ने समझाना चाहा था. सुदेश ने अनूप से शंका प्रकट की, ‘ऐसी जिद्दी लड़की से शादी कैसे निभेगी, यार?’ ‘सुदेशजी, इस बीच गुजरे वक्त ने तनवी को बहुत कुछ समझा दिया होगा. 28-29 साल कुंआरी रह ली. बदनामी झेल ली. नातेरिश्तेदारों से कट कर रह ली. इन सब बातों ने उसे भी समझा दिया होगा कि बेकार की जिद में पड़ कर सहज जीवन नहीं जिया जा सकता. सहज जीवन जीने के लिए हमें अपना स्वभाव नरम रखना पड़ता है. कहीं खुद झुकना पड़ता है, कहीं दूसरे को झुकाने का प्रयत्न करना पड़ता है. इस सिलसिले में तनवी से बहुत बातें हुई हैं मेरी. उसे भी जिंदगी की ऊंचनीच अब समझ में आने लगी है.’ अनूप के इतना कहने पर भी सुदेश के भीतर संदेह का कीड़ा हमेशा रेंगता रहा. एक तरफ तनवी का दृढ़निश्चयी होना सुदेश को प्रभावित करता था.

दूसरी तरफ उस का अडि़यल रवैया उसे शंकालु भी बनाता था. अपनी सारी शंकाओं को उस दिन रिश्ता पक्का करने से पहले सुदेश ने अनूप के सामने तनवी पर जाहिर भी कर दिया था. तनवी सचमुच गंभीर थी, ‘मैं जैसी हूं, आप जान चुके हैं. विवाह का मतलब मैं अच्छी तरह जानती हूं. बिना समझौते व सामंजस्य के जीवन को नहीं जिया जा सकता, यह भी समझ गई हूं.

मेरी ओर से आप को कभी शिकायत का मौका नहीं मिलेगा.’ ‘विवाहित जिंदगी में छोटीमोटी नोकझोंक, झगड़े, विवाद होने स्वाभाविक हैं. मैं कोशिश करूंगा, तुम्हारी कसबाई घटनाओं को कभी बीच में न दोहराऊं…उन बातों को तूल न दूं जो बीत चुकी हैं.’ ‘मैं भी कोशिश करूंगी, जिंदगी पूरी तरह नए सिरे से, नई उमंग और नए उत्साह के साथ शुरू करूं…इतिहास दोहराने के लिए नहीं होता, दफन करने के लिए होता है.’ मुसकरा दिया था सुदेश और अनूप भी खुश हो गया था.

अचानक तनवी ने कुछ पूछा तो अतीत की यादों में खोया सुदेश उसे देख कर हंस दिया. उन की शादी को पूरे 8 साल गुजर गए थे. 2 बच्चे थे. शुभा 7 साल की, वैभव 5 साल का. ऐसा नहीं है कि इन 8 सालों में उन के बीच झगड़े नहीं हुए, विवाद नहीं हुए. पर पुराने गड़े मुर्दे जान- बूझ कर न सुदेश ने उखाड़े न तनवी ने उन्हें उखड़ने दिया. जीवन के अंधेरे- उजाले संगसंग गुजारे. Hindi Story

Hindi Story : जिंदगी

Hindi Story : चायनाश्ते और खाने का भी बढि़या इंतजाम है. मतलब, जेब से कुछ खर्च नहीं, फोकट में घूमना हो जाएगा. बस, पार्टी का झंडा भर साथ में ले कर चलना है. मंत्रीजी के प्रताप से मुफ्त में रेलगाड़ी में जाना है.’ मंगरू कुछ कहता, उस से पहले महेंद्र ने उस के कान में मंत्र फूंका था, ‘लगे हाथ किशना से भी मिल लेना. सुना है, गांधी मैदान में कोई होटल खोले बैठा है.’ बात तो ठीक थी. कितने दिन से मंगरू का मन कर रहा था कि बेटे किशना से मिल आए. मगर मौका ही हाथ नहीं लग रहा था, इसलिए वह नेताजी की रैली में शामिल होने के लिए तैयार हो गया था. गाड़ी से उतरते वक्त मंगरू ने जेब में से परची निकाल कर देखी. हां, यही तो पता दिया था किशना का. मगर टे्रन कमबख्त इतनी लेट थी कि दोपहर के बजाय रात 7 बजे पटना स्टेशन पहुंची थी. अब इस समय उसे कहां खोजेगा वह कि उस की जेब में रखा मोबाइल फोन घनघनाने लगा. मंगरू ने लपक कर मोबाइल फोन निकाला और तकरीबन चिल्लाने वाले अंदाज में बोला, ‘‘हां बबुआ, स्टेशन पहुंच गया हूं. अब कहां जाना है?’’

‘स्टेशन से बाहर निकल कर आटोस्टैंड पर आ जाइए,’ किशना बोल रहा था, ‘वहीं से गांधी मैदान के लिए आटोरिकशा पकड़ लेना. 5 मिनट में पहुंचा देगा.’ अपना झोला, लाठी और पोटली संभाल कर मंगरू बाहर निकला. बाहर रेलवे स्टेशन दूधिया रोशनी से नहाया हुआ था. हजारोंलाखों की भीड़ इधरउधर आजा रही थी. उस ने झोले को खोल कर देखा. पार्टी का झंडा सहीसलामत था. एक जोड़ी कपड़ा, गमछा और चनेचबेने भी ठीकठाक थे. किशना की मां ने कुछ पकवान बना कर उस के लिए बांध कर रख दिए थे. आटोरिकशा में बैठा मंगरू आंख फाड़े भागतीदौड़ती, खरीदारी करती, खातीपीती भीड़ को देखता रहा कि ड्राइवर ने उसे टोका, ‘‘आ गया गांधी मैदान. उतरिए न बाबा.’’ आटोस्टैंड की दूसरी तरफ गांधी मैदान के विशाल परिसर को उस ने नजर भर निहारा, ‘बाप रे,’ इतना बड़ा मैदान. बेटे किशना का होटल किधर होगा.’ एक बार फिर मोबाइल घनघनाया, ‘हां, आप गेट के पास ही खड़े रहिए…’ किशना बोल रहा था, ‘मैं आप को लेने वहीं आ रहा हूं.’ मंगरू मैदान के किनारे लोहे के विशाल फाटक के पास खड़ा ही था कि उसे किशना आता दिखा. उसे देख वह लपक कर उस के पास पहुंचा. पैर छूने के बाद किशना ने उसी मैदान में रखी हुई एक बैंच पर बिठा दिया. ‘‘कहां है तुम्हारा होटल?’’ अधीर सा होते हुए मंगरू बोला, ‘‘बहुत मन कर रहा है तुम्हारा होटल देखने का.’’ ‘‘वह भी देख लीजिएगा,’’ किशना कुछ बुझे स्वर में बोला, ‘‘चलिए, पहले कुछ चायनाश्ता तो करवा दूं आप को. ‘‘और हां, वह रहा आप की पार्टी का पंडाल. सुना है, तकरीबन 20 लाख रुपए खर्च हुए हैं पंडाल बनाने में. भोजनपानी और रहने का अच्छा इंतजाम है.’’ एक जगह पूरीसब्जी का नाश्ता करा और चाय पिला कर किशना बोला,

‘‘अब चलिए आप को पंडाल दिखा दूं.’’ ‘‘अरे, रात में तो वहीं रहना है…’’ मंगरू जोश में था, ‘‘आखिर उसी के लिए तो आया हूं. बाकी तुम्हारा गांधी मैदान बहुत बड़ा है.’’ ‘‘शहर भी तो बहुत बड़ा है बाऊजी,’’ किशना बिना लागलपेट के बोला, ‘‘इस शहर में ढेरों मैदान हैं. मगर उन में रात के 10 बजे के बाद कोई नहीं रह सकता. पुलिस पहरा देती है. भगा देती है लोगों को.’’ ‘‘देखो, तुम्हारी माई ने तुम्हारे खाने के लिए कुछ भेजा?है…’’ मंगरू झोले में से पोटली निकालते हुए बोला, ‘‘वह तो थोड़े चावलदाल भी दे रही थी कि लड़का कुछ दिन घर का अनाज पा लेगा. लेकिन मैं ने ही मना कर दिया कि इसे ढो कर कौन ले जाए.’’ ‘‘अच्छा किया आप ने जो नहीं लाए…’’ किशना की आवाज में लड़खड़ाहट सी थी, ‘‘यह शहर है. यहां सबकुछ मिलता है. बस, खरीदने की औकात होनी चाहिए.’’ ‘‘सब ठीक चल रहा है न?’’ ‘‘सब ठीक चल रहा है. कमाई भी ठीकठाक हो जाती है.’’ ‘‘तभी तो हर महीने 2-3 हजार रुपए भेज देते हो.’’ ‘‘भेजना ही है. अपना घर मजबूत रहेगा, तो हम बाहर भी मजबूत रहेंगे. जो काम मिला, वही कर रहा हूं. बाकी नौकरी कहां मिलती है.’’ ‘‘अरे, यह क्या,’’ मंगरू चौंका. एक ठेले के पास 2-4 लड़के कुछकुछ काम कर रहे थे और वहां ग्राहकों की भीड़ लगी थी. एक कड़ाही में पूरी या भटूरे तल रहा था. दूसरा उन्हें प्लेटों में छोले, अचार और नमकमिर्चप्याज के साथ ग्राहकों को दे रहा था. तीसरा जूठे बरतनों को धोने में लगा था, जबकि चौथा रुपएपैसे का लेनदेन कर रहा था. इधर एक तरफ से अनेक ठेलों की लाइनें लगी हुई थीं, जिन पर इडलीडोसा, लिट्टीचोखा, चाटपकौड़े, मोमो, मैगी, अंडेआमलेट और जाने क्या कुछ बिक रहा था. ‘‘यही है हमारा होटल बाऊजी…’’ फीकी हंसी हंसते हुए किशना बोल रहा था, ‘‘ठेके के साइड में पढि़ए. लिखा है ‘किशन छोलाभटूरा स्टौल’. इसी होटलरूपी ठेले से हम 5 जनों का पेट पल रहा है. ‘‘इतना बड़ा गांधी मैदान है. थक जाने पर यहीं कहीं आराम कर लेते हैं.

और रात के वक्त चारों तरफ सूना पड़ जाने पर यह सड़क, यह जगह बहुत बड़ी दिखने लगती है. सो, कहीं भी किसी दुकान के सामने चादर बिछा कर सो जाते हैं.’’ ‘‘यह भी कोई जिंदगी हुई?’’ मंगरू ने पूछा. ‘‘हां बाऊजी, यह भी जिंदगी ही है. बड़े शहरों में लाखों लोग ऐसी ही जिंदगी जीते हैं.’’ ‘‘और वह तुम्हारी पढ़ाई, जिस के पीछे तुम ने पटना में रह कर 7 साल लगाए, हजारों रुपए खर्च हुए.’’ ‘‘आज की पढ़ाई सिर्फ सपने दिखाती है, नौकरी या कामधंधा नहीं देती. मैं ने आप की जिंदगी को नजदीक से देखाजाना है. बस उसे अपनी जिंदगी में उतार लिया और जिंदगी आगे चल पड़ी. यही नहीं, मेरे साथ मेरे 4 साथियों की जिंदगी भी पटरी पर आ गई, नहीं तो यहां लाखों बेरोजगार घूम रहे हैं.’’ मंगरू एकटक कभी किशना को तो कभी गांधी मैदान को देखता रहा. ‘‘यह एक कार्टन है बाऊजी, जिस में आप लोगों के लिए नए कपड़े हैं. छोटे भाईबहनों के लिए खिलौने हैं. इसे साथ ले जाना.’’ थोड़ी देर के बाद किशना मंगरू को गांधी मैदान के पास लगे पार्टी के पंडाल में पहुंचा आया. वहां एक तरफ पुआल के ऊपर दरियां बिछी थीं, जिन पर हजारों लोग लेटे या बैठे हुए थे. पर मंगरू को कुछ अच्छा नहीं लग रहा था. वह वहीं अनमना सा लेट गया, चुपचाप.

Hindi Story : दर्पण

Hindi Story : ‘‘आजकल बड़ा लजीज खाना भेजती हो बेगम,’’ आफिस से आ कर जूते खोलते हुए सुजय ने कहा. ‘‘क्यों, अच्छा खाना न भेजा करूं,’’ मैं ने कहा, ‘‘इन दिनों कुकिंग कोर्स ज्वाइन किया है. सोचा, रोज नईनई डिश भेज कर तुम्हें सरप्राइज दूं.’’ ‘‘शौक से भेजिए सरकार, शौक से. आजकल तो सभी आप के खाने की तारीफ करते हैं,’’ सुजय ने हंस कर कहा. मैं ने आश्चर्य से पूछा, ‘‘सभी कौन?’’ ‘‘अरे भई, अभी आप यहां किसी को नहीं जानती हैं. हमें यहां आए दिन ही कितने हुए हैं. जब एक बार पार्टी करेंगे तो सब से मुलाकात हो जाएगी. यहां ज्यादातर अधिकारी मैस में ही खाना खाते हैं.

हां, मैं तुम्हें बताना भूल गया था कि निसार भी पिछले हफ्ते ट्रांसफर पर यहीं आ गया है. उसे मेरी सब्जियां बहुत पसंद आती हैं. एक दिन कह रहा था कि जब ठंडे खाने में इतना मजा आता है तो गरम कितना लजीज होगा,’’ सुजय मेरे खाने की तारीफों के पुल बांध रहे थे. मैं ने पूछा, ‘‘यह निसार क्या सरनेम हुआ?’’ ‘‘वह निसार नाम से गजलें लिखता है, वैसे उस का नाम निश्चल है,’’ सुजय ने बताया. ‘‘अच्छा,’’ कह कर मैं चुप हो गई पर चाय के उबाल के साथसाथ मेरे विचारों में भी उबाल आ रहे थे. ‘‘तुम्हें याद नहीं क्या मौली? हमारी शादी में भी निसार आया था.’’ ‘‘हूं, याद है,’’ अतीत की यादें आंधी की तरह दिल के दरवाजे में प्रवेश करने लगी थीं. मुंह दिखाई की रस्म शुरू हो चुकी थी. घर के सभी बड़े, ताऊ, चाचा, मामी, मामा कोई भी उपहार या गहना ले कर आता और पास बैठी छोटी ननद मेरा घूंघट उठा देती. बड़ों को चरण स्पर्श और छोटों को प्रणाम में मैं हाथ जोड़ देती थी. इतना सब करने पर भी मेरी पलकें झुकी ही रहतीं. घूंघट की ओट से अब तक बीसियों अनजान चेहरे देख चुकी थी. अचानक स्टेज के पास निश्चल को देखा तो हैरत में पड़ गई. सोचा, कोई दोस्त होगा, पर वह जब पास आया तो वही अंदाज. ‘भाभी, ऐसे नहीं चलेगा.

आप को मुंह दिखाई के समय आंखें भी दिखानी होंगी. कहीं भेंगीवेंगी आंख वाली तो नहीं?’ कह कर किसी ने घूंघट उठाना चाहा तो आवाज सुन कर मेरा मन हुआ कि आंखें खोल कर पुकारने वाले को देख तो लूं, पर संकोचवश पलक झपक कर रह गए थे. ‘अरे, दुलहन, दिखा दो अपनी आंखें वरना तुम्हारा यह देवर मानने वाला नहीं,’ किसी बूढ़ी औरत का स्वर सुन कर मैं ने आंखें खोल दीं. ऐसा लगा जैसे शिराओं में खून जम सा गया हो. तो यह निश्चल और सुजय आपस में रिश्तेदार हैं. मन ही मन सोचती मैं कई वर्ष पीछे लौट गई थी. निश्चल और कोई नहीं, मेरे स्कूल के दिनों का सहपाठी था जो रिकशे में मेरे साथ जाता था. सारे बच्चे मिल कर धमा- चौकड़ी मचाते थे. इत्तेफाक से कालिज में भी वह साथ रहा और 2-3 बार हमारा पिकनिक भी साथ ही जाना हुआ था. पता नहीं क्यों निश्चल की आंखों की भाषा पढ़ कर हमेशा ऐसा लगता था जैसे उस की आंखें कुछ कहनासुनना चाहती हैं. तब कहां पता था कि एक दिन पापा मेरे रिश्ते के लिए उसी का दरवाजा खटखटाने पहुंचेंगे. निश्चल का बायोडाटा काफी दिनों तक पापा की जेब में पड़ा रहा था. वह उस समय न्यूयार्क में कंप्यूटर इंजीनियर था. 2 महीने बाद भारत आने वाला था. घर वालों को फोटो पसंद आ चुकी थी. बस, जन्मपत्री मिलानी बाकी थी. हरसंभव कोशिशों के बाद भी जन्मपत्री नहीं मिली थी. चूंकि निश्चल के मातापिता जन्मपत्री में विश्वास करते थे इसलिए शादी टल गई थी. उन्हीं दिनों वैवाहिक विज्ञापन के जरिए सुजय से शादी की बात चली. सुजय से जन्मपत्री मिलते ही शादी की रस्म पूरी होगी. ‘‘क्या सोच रही हो, मौली?’’ सुजय की आवाज से मैं अतीत से वर्तमान में आ गई. ‘‘कुछ नहीं,’’ होंठों पर बनावटी हंसी लाते हुए मैं ने कहा.

निश्चल कुछ ज्यादा मजाकिया स्वभाव का है. उस की बातों का बुरा नहीं मानना तुम. वैसे भी बेचारा अकेला है. न्यूयार्क में किसी अमेरिकन लड़की से शादी कर ली थी पर वह छोड़ कर चली गई…’’ उदार हृदय, पति बताते रहे और मैं हूं, हां करती चाय के कप से उड़ती हुई भाप देखती रही. निरीक्षण भवन में सुजय ने पार्टी का इंतजाम कराया था. खाने की प्लेट हाथ में लिए मैं खिड़की से बाहर का नजारा देखने लगी थी. रात के अंधेरे में मकानों की रोशनी आसमान में चमकते सितारों सी जगमगा रही थी. ‘‘आप बिलकुल नहीं बदलीं,’’ किसी ने पीछे से आवाज दी. निश्चल को देख कर मैं चौंक कर बोली, ‘‘आप ने मुझे पहचान लिया?’’ ‘‘लो, जिस के साथ बचपन से जवान हुआ उसे न पहचानने की क्या बात है. तब आप संगमरमर की तरह गोरी थीं, आज दूध की तरह सफेद हैं,’’ निश्चल ने कहा. ‘‘पर समय के साथ शक्ल और यादें दोनों बदल जाती हैं,’’ मैं ने यों ही कह दिया. ‘‘आप गलत कह रही हैं. समय का अंतराल यहां नहीं चल पाया. आप 13 साल पहले भी ऐसी ही थीं,’’ निश्चल ने हंसते हुए कहा तो शर्म से मेरी पलकें झुक गई थीं. तभी किसी को अपने आसपास यह कहते सुना, ‘‘ओहो, इस उम्र में भी क्या ब्लश कर रही हैं आप?’’ सुन कर मेरे गाल लाल हो गए थे. प्लेट रख कर हाथ धोने के बहाने दर्पण में अपना चेहरा देख कर मैं खुद ही शरमा गई थी. जब से निश्चल ने मेरी तारीफ में कसीदे पढ़े, मेरी जिंदगी ही बदल गई. जेहन में बारबार यह सवाल उठते कि क्यों कहा निश्चल ने मुझे संगमरमर की तरह गोरी और दूध की तरह सफेद…तब तो चौराहे की भीड़ की तरह मुझे छोड़ कर निश्चल ने पीछे मुड़ कर देखा तक नहीं और अपना रास्ता ही बदल लिया था.

अब, जब हमारे रास्ते अलग हो गए, मंजिलें बदल गईं फिर उस कहानी को याद दिलाने की जरूरत किसलिए? मुझे किसी से भी किसी बात की शिकायत नहीं है, न क्षोभ न पछतावा, पर नियति ने क्यों मेरी जिंदगी में उस व्यक्ति को सामने खड़ा कर दिया जिस को मैं ने बचपन से चाहा. मैं सोच नहीं पाती, क्यों मन बारबार संयम का बांध तोड़ना चाहता है? क्या ऐसा नहीं हो सकता कि उस से मुलाकात का कोई रास्ता ही न रह जाए. क्लब में तो हर हफ्ते ही मुलाकात होती है. उस पर भी अगर संतोष कर लिया जाए तो ठीक लेकिन गुस्सा तो मुझे अपने ऊपर इसलिए आता था कि जिस का अब जिंदगी से कोई वास्ता नहीं तो फिर क्यों मन उस चीज को पाना चाहता है. क्यों तिरछी बौछार में भीगने की चाहत है, क्या मैं समझती नहीं, निश्चल की आंखों की भाषा? सोचसोच कर मेरी रातों की नींद उड़ने लगी थी. मुलाकातों का सिलसिला अपने आप चलता जा रहा था. अपनी भांजी की शादी में जाना था. व्यस्तताओं के चलते सुजय दिल्ली आ कर मुझे प्लेन में बैठा गए थे. वहीं निश्चल को भी प्लेन में बैठा देख कर मैं हैरान थी कि अचानक उस का कार्यक्रम कैसे बन गया था, मैं समझ नहीं पा रही थी. प्लेन में कई सीटें खाली पड़ी थीं. निश्चल मेरे पास ही आ कर बैठ गया. धरती से हजारों मील ऊपर क्षितिज को अपने बहुत पास देख कर मन पुलकित हो रहा था या निश्चल का साथ पा कर, यह मैं समझ नहीं पा रही थी.

एक दिन पेट में तेज दर्द से अचानक तबीयत खराब हो गई. फोन कर के डाक्टर को घर पर बुला लिया था. उन्होंने ब्लड टेस्ट, अल्ट्रासाउंड की रिपोर्ट देख कर कहा था कि आपरेशन करना पड़ेगा. डाक्टर ने ब्लड का इंतजाम करने को कहा क्योंकि मेरा ब्लड गु्रप ‘ओ पाजिटिव’ था. ‘‘अब क्या होगा?’’ मैं घबरा गई. ‘‘होना क्या है, कोई न कोई दाता तो मिल ही जाएगा,’’ डाक्टर ने कहा. ‘‘यहां कौन है? अभी तो हम ने किसी को खबर भी नहीं दी है,’’ सुजय ने कहा. मैं ने निश्चल को फोन मिलाया. ‘‘क्या कोई खास बात, आप परेशान लग रही हैं, मैं अभी आता हूं,’’ कह कर निश्चल ने फोन रख दिया. 10 मिनट के बाद ही निश्चल मेरे सामने था. उस को देखते ही सुजय ने कहा, ‘‘ब्लड का इंतजाम करना पड़ेगा.’’ निश्चल तुरंत अपना ब्लड टेस्ट कराने चला गया और लौट कर बोला, ‘‘सुनो, तुम्हारा और मेरा एक ही ब्लड गु्रप है.’’ ‘‘काश, घर वाले जन्मपत्री की जगह ‘ब्लड गु्रप’ मिला कर शादी करने की बात सोचते तब तो मैं जरूर ही तुम्हें कहीं न कहीं से ढूंढ़ निकालता.’’ अवाक् सी मैं निश्चल को देखती रह गई. शर्म से मेरे गाल लाल हो गए.

सुजय ने हंस कर कहा, ‘‘फिर तो हम घाटे में रहते.’’ आपरेशन के बाद होश में आने में कई घंटे लग गए थे. पानीपानी कहते हुए मैं ने आंखें खोलीं तो सामने निश्चल को देखा. मेरी आंखें सुजय को तलाश रही थीं. मुझे देख कर निश्चल ने कहा, ‘‘सुजय सब को फोन करने गया है कि आपरेशन ठीक हो गया और होश आ गया है, लेकिन पता है भाभी, आपरेशन के बाद से अब तक सुजय ने एक बूंद पानी तक नहीं पिया है, क्योंकि आप को भी पानी नहीं देना है. वैसे आप को तो ड्रिप चढ़ाई जा रही है,’’ रूमाल से मेरे होंठों को गीला कर के निश्चल बाहर सुजय के इंतजार में खड़ा रहा. निश्चल के कहे शब्दों से मैं अंदर तक हिल गई. जिस दर्पण में भावुक, टूट कर चाहने वाले इनसान का प्रतिबिंब हो उसे मैं खंडित करने की सोच भी नहीं सकती. अगर उस में जरा सी दरार आ जाए तो वह बेकार हो जाता है. अपने मन के दर्पण को मैं खंडित नहीं होने दूंगी. ‘खंडित दर्पण नहीं बनूंगी मैं,’ मन ही मन बुदबुदा रही थी. सुजय की मेरे प्रति आस्था ने मेरी दिशा ही बदल दी. जरा सी दरार जो दर्पण को खंडित कर देती है उस से मैं अपने को संयत कर पाई.

लेखक- मंजरी सक्सेना

Hindi Story : छिपकली – क्या कविता छिपकली को लक्ष्मी का अवतार मानती थी

Hindi Story : कविता की यह पहली हवाई यात्रा थी. मुंबई से ले कर चेन्नई तक की दूरी कब खत्म हो गई उन्हें पता ही नहीं चला. हवाई जहाज की खिड़की से बाहर देखते हुए वह बादलों को आतेजाते ही देखती रहीं. ऊपर से धरती के दृश्य तो और भी रोमांचकारी लग रहे थे. जहाज के अंदर की गई घोषणा ‘अब विमान चेन्नई हवाई अड्डे पर उतरने वाला है और आप सब अपनीअपनी सीट बेल्ट बांध लें,’ ने कविता को वास्तविकता के धरातल पर ला कर खड़ा कर दिया.

हवाई अड्डे पर बेटा और बहू दोनों ही मातापिता का स्वागत करने के लिए खड़े थे. बेटा संजू बोला, ‘‘मां, कैसी रही आप की पहली हवाई यात्रा?’’

‘‘अरे, तेरी मां तो बादलों को देखने में इतनी मस्त थीं कि इन्हें यह भी याद नहीं रहा कि मैं भी इन के साथ हूं,’’ दीप बोले.

‘‘मांजी की एक इच्छा तो पूरी हो गई. अब दूसरी इच्छा पूरी होने वाली है,’’ बहू जूही बोली.

‘‘कौन सी इच्छा?’’ कविता बोलीं.

‘‘मां, आप अंदाजा लगाओ तो,’’ संजू बोला, ‘‘अच्छा पापा, आप बताओ, मां की वह कौन सी इच्छा थी जिस की वह हमेशा बात करती रही थीं.’’

‘‘नहीं, मैं अंदाजा नहीं लगा पा रहा हूं क्योंकि तेरी मां की तो अनेक इच्छाएं हैं.’’

इसी बातचीत के दौरान घर आ गया था. संजू ने एक बड़ी सी बिल्ंिडग के सामने कार रोक दी.

‘‘उतरो मां, घर आ गया. एक नया सरप्राइज मां को घर के अंदर जाने पर मिलने वाला है,’’ संजू ने हंसते हुए कहा.

लिफ्ट 10वीं मंजिल पर जा कर रुकी. दरवाजा खोल कर सब अंदर आ गए. घर देख कर कविता की खुशी का ठिकाना न रहा. एकदम नया फ्लैट था. फ्लैट के सभी खिड़कीदरवाजे चमकते हुए थे. बाथरूम की हलकी नीली टाइलें कविता की पसंद की थी. रसोई बिलकुल आधुनिक.

संजू बोला, ‘‘मां, तुम्हारी इच्छा थी कि अपना घर बनाऊं और उस घर में जा कर उसे सजाऊं. देखो, घर तो एकदम नया है, चाहे किराए का है. अब तुम इसे सजाओ अपनी मरजी से.’’

कविता पूरे घर को प्रशंसा की नजर से देखती रही फिर धीरे से बालकनी का दरवाजा खोला तो ठंडी हवा के झोंके ने उन का स्वागत किया. बालकनी से पेड़ ही पेड़ नजर आ रहे थे. सामने पीपल का विशालकाय वृक्ष था जिस के पत्ते हवा में झूमते हुए शोर मचा रहे थे. आसपास बिखरी हरियाली को देख कर कविता का मन खुशी से झूम उठा.

संजू और जूही दोनों कंप्यूटर इंजीनियर हैं और सुबह काम पर निकल जाते तो रात को ही वापस लौटते. सारा दिन कविता और दीप ही घर को चलाते. कविता को नया घर सजाने में बहुत मजा आ रहा था. इमारत भी बिलकुल नई थी इसलिए घर में एक भी कीड़ामकोड़ा और काकरोच नजर नहीं आता था, जबकि मुंबई वाले घर में काकरोचों की भरमार थी. पर यहां नए घर की सफाई से वह बहुत प्रभावित थी. गिलहरियां जरूर उन की रसोई तक आतीं और उन के द्वारा छिड़के चावल के दाने ले कर गायब हो जाती थीं. उन गिलहरियों के छोटेछोटे पंजों से चावल का एकएक दाना पकड़ना और उन्हें कुतरते देखना कविता को बहुत अच्छा लगता था.

उस नई इमारत में कुछ फ्लैट अभी भी खाली थे. एक दिन कविता को अपने ठीक सामने वाला फ्लैट खुला नजर आया. सुबह से ही शोरगुल मचा हुआ था और नए पड़ोसी का सामान आना शुरू हो चुका था. देखने में सारा सामान ही पुराना सा लग रहा था. कविता को लगा, आने वाले लोग भी जरूर बूढे़ होंगे. खैर, कविता ने यह सोच कर दरवाजा बंद कर लिया कि हमें क्या लेनादेना उन के सामान से. हां, पड़ोसी जरूर अच्छे होने चाहिए क्योंकि सुबहशाम दरवाजा खोलते ही पहला सामना पड़ोसी से ही होता है.

शाम होतेहोते सबकुछ शांत हो गया. उस फ्लैट का दरवाजा भी बंद हो गया. अब कविता को यह जानने की उत्सुकता थी कि वहां कौन आया है. रात को जब बेटाबहू आफिस से वापस लौटे तब भी सामने के फ्लैट का दरवाजा बंद था. बहू बोली, ‘‘मां, कैसे हैं अपने पड़ोसी?’’

‘‘पता नहीं, बेटा, मैं ने तो केवल सामान ही देखा है. रहने वाला अभी तक कोई नजर नहीं आया है. पर लगता है कोई गांव वाले हैं. पुरानापुराना सामान ही अंदर आता दिखाई दिया है.’’

‘‘चलो मां,   2-4 दिन में पता लग जाएगा कि कौन लोग हैं और कैसे हैं.’’

एक सप्ताह बीत गया. पड़ोसियों के दर्शन नहीं हुए पर एक दिन उन के घर से आता हुआ एक काकरोच कविता को नजर आ गया. वह जोर से चिल्लाईं, ‘‘दीप, दौड़ कर इधर आओ. मारो इसे, नहीं तो घर में घुस जाएगा. जल्दी आओ.’’

‘‘क्या हुआ? कौन घुस आया? किसे मारूं? घबराई हुई क्यों हो?’’ एकसाथ दीप ने अनेक प्रश्न दाग दिए.

‘‘अरे, आओगे भी या वहीं से प्रश्न करते रहोगे. वह देखो, एक बड़ा सा काकरोच अलमारी के पीछे चला गया.’’

‘‘बस, काकरोच ही है न. तुम तो यों घबराई हुई हो जैसे घर में कोई अजगर घुस आया हो.’’

‘‘दीप, तुम जानते हो न कि काकरोच देख कर मुझे घृणा और डर दोनों लगते हैं. अब मुझे सोतेजागते, उठतेबैठते यह काकरोच ही नजर आएगा. प्लीज, तुम इसे निकाल कर मारो.’’

‘‘अरे, भई नजर तो आए तब तो उसे मारूं. अब इतनी भारी अलमारी इस उम्र में सरकाना मेरे बस का नहीं है.’’

‘‘किसी को मदद करने के लिए बुला लो, पर इसे मार दो. मुझे हर हालत में इस काकरोच को मरा हुआ देखना है.’’

‘‘तुम टेंशन मत लो. रात को काकरोचमारक दवा छिड़क देंगे…सुबह तक उस का काम तमाम हो जाएगा.’’

दीप ने बड़ी मुश्किल से कविता को शांत किया.

शाम को काकरोचमारक दवा आ गई और छिड़क दी गई. सुबह उठते ही कविता ने एक सधे हुए जासूस की भांति काकरोच की तलाश शुरू की पर मरा या जिंदा वह कहीं भी नजर नहीं आया. कविता की अनुभवी आंखें सारा दिन उसी को खोजती रहीं पर वह न मिला.

अब तो अपने फ्लैट का दरवाजा भी कविता चौकन्नी हो कर खोलती पर फिर कभी काकरोच नजर नहीं आया.

एक दिन खाना बनाते हुए रसोई की साफसुथरी दीवार पर एक नन्ही सी छिपकली सरकती हुई कविता को नजर आई. अब कविता फिर चिल्लाईं, ‘‘जूही, संजू…अरे, दौड़ कर आओ. देखो तो छिपकली का बच्चा कहां से आ गया.’’

मां की घबराई हुई आवाज सुन कर दौड़ते हुए बेटा और बहू दोनों रसोई में आए और बोले, ‘‘मां, क्या हुआ?’’

‘‘अरे, देखो न, वह छिपकली का बच्चा. कितना घिनौना लग रहा है. इसे भगाओ.’’

‘‘मां, भगाना क्या है…इसे मैं मार ही देता हूं,’’ संजू बोला.

‘‘मारो मत, छिपकली को लक्ष्मी का अवतार मानते हैं,’’ जूही बोली.

‘‘और सुन लो नई बात. अब छिपकली की भी पूजा करनी शुरू कर दो.’’

‘‘तुम इसे भगा दो. मारने की क्या जरूरत है,’’ कविता भी बोलीं.

झाड़ू उठा कर संजू ने उस नन्ही छिपकली को रसोई की खिड़की से बाहर निकाल दिया.

कविता ने चैन की सांस ली और काम में लग गईं.

अगले दिन सुबह कविता चाय बनाने जब रसोई में गईं तो बिजली का बटन दबाते ही सब से पहले उसी छिपकली के दर्शन हुए जो गैस के चूल्हे के पास स्वच्छंद घूम रही थी. कविता को लगा वह फिर से चिल्लाएं…पर चुप रह गईं क्योंकि सुबह सब मीठी नींद में सो रहे थे. कविता ने उस छोटी सी छिपकली को झाड़ू से भगाया तो वह तेजी से रसोई की छत पर चढ़ गई.

अब कविता जब भी रसोई में जातीं तो उन का पूरा ध्यान छिपकली के बच्चे की ओर लगा रहता. खानेपीने का सब सामान वह ढक कर रखतीं. धीरेधीरे वह छिपकली का बच्चा बड़ा होने लगा और 10-15 दिनों के भीतर ही पूरी छिपकली बन गया.

मां के तनाव को देख कर संजू बोला, ‘‘मां, मैं इस छिपकली को मारने के लिए दवाई लाता हूं. रात को गैस के पास डाल देंगे और सुबह तक उस का काम तमाम हो जाएगा.’’

‘‘तुम्हें क्या कह रही है छिपकली जो तुम उस को मारने पर तुले हो,’’ जूही बोली, ‘‘अरे, छिपकली घर में रहेगी तो घर साफ रहेगा. वह कीड़ेमकोड़े और काकरोच आदि खाती रहेगी.’’

‘‘तुम छिपकली के पक्ष में क्यों बात करती हो? क्या पुराने जन्म का कोई रिश्ता है?’’ संजू ने चुटकी ली.

‘‘कल एक पुजारी भी मुझ से कह रहा था कि छिपकली को नहीं मारना चाहिए. छिपकली रहने से घर में लक्ष्मी का आगमन होता है,’’ दीप बोले.

‘‘पापा, आप भी अपनी बहू के सुर में सुर मिला रहे हैं…आप दोनों मिल कर छिपकलियां ही पाल लो. इसी से यदि घर में जल्दी लक्ष्मी आ जाए तो मैं अभी से रिटायर हो जाता हूं,’’ संजू बोला.

उन की इस बहस में छिपकली कहीं जा कर छिप गई. जूही बोली, ‘‘देखो, आज सुबहसुबह ही हम सब ने छिपकली को देखा है. देखें आज का दिन कैसा बीतता है.’’

सारा दिन सामान्य रूप से बीता. शाम को जब जूही आई तो दरवाजे से ही चिल्ला कर बोली, ‘‘मां, एक बहुत बड़ी खुशखबरी है. मैं आज बहुत खुश हूं, बताओ तो क्यों?’’

‘‘प्रमोशन मिल गया क्या?’’

‘‘नहीं. इस से भी बड़ी.’’

‘‘तुम्हीं बताओ.’’

‘‘मां, एक तो डबल प्रमोशन और उस पर सिंगापुर का एक ट्रिप.’’

‘‘देखा, सुबह छिपकली देखी थी न,’’ दीप बोले.

‘‘बस, पापा, आप भी. अरे, जूही का प्रमोशन तो होने ही वाला था. सिंगापुर का ट्रिप जरूर एक्स्ट्रा है,’’ संजू बोला.

‘‘मां, देखो कुछ तो अच्छा हुआ,’’ जूही बोली, ‘‘आप इस छिपकली को घर में ही रहने दो.’’

‘‘अरे, आज इसी विषय पर पार्क में भी बात हो रही थी. मेरे एक परिचित बता रहे थे कि घर में मोरपंख रख दो तो छिपकली अपनेआप ही भाग जाती है,’’ दीप बोले.

‘‘चलो, कल को मोरपंख ला कर रख देना तो अपनेआप छिपकली चली जाएगी,’’ कविता बोलीं.

दूसरे दिन ही दीप बाजार से ढूंढ़ कर मोरपंख ले आए और एक खाली गुलदस्ते में उसे सजा दिया गया. पर छिपकली पर उस का कोई असर नहीं हुआ. वह पहले की तरह ही पूरे घर में घूमती रही. हर सुबह कविता को वह गैस के पास ही बैठी मिलती.

एक दिन दीप बहुत सारे आम ले आए और आइसक्रीम खाने की इच्छा जताई. कविता ने बड़ी लगन से दूध उबाला, उसे गाढ़ा किया, उस में आम मिलाए और ठंडा होने के लिए एक पतीले में डाल कर रख दिया. वह उसे जल्दी ठंडा करना चाहती थीं. इसलिए पतीला ढका नहीं बल्कि वहीं खड़ी हो कर उसे कलछी से हिलाती जा रही थीं और रसोई के दूसरे काम भी कर रही थीं. तभी फोन की घंटी बजी और वह उसे सुनने के लिए दूसरे कमरे में चली गईं.

अमेरिका से उन के छोटे बेटे का फोन था. वह बहुत देर तक बात करती रहीं और फिर सारी बातें दीप को भी बताईं. इसी में 1 घंटा बीत गया.

कविता वापस रसोई में गईं तो दूध ठंडा हो चुका था. उन्होंने पतीले को वैसे ही उठा कर फ्रीजर में रख दिया. रात को खाने के बाद कविता ने आइसक्रीम निकाली और संजू और जूही को दी. दीप ने रात में आइसक्रीम खाने से मना कर दिया और खुद कविता ने इसलिए आइसक्रीम नहीं खाई कि उस दिन उन का व्रत था. संजू और जूही ने आइसक्रीम की तारीफ की और सोने चल दिए. आधे घंटे के बाद ही उन के कमरे से उलटियां करने की आवाजें आनी शुरू हो गईं. दोनों ही लगातार उलटियां किए जा रहे थे. कविता और दीप घबरा गए. एक मित्र की सहायता से दोनों को अस्पताल पहुंचाया. डाक्टर बोला, ‘‘लगता है इन को फूड पायजिनिंग हो गई है. क्या खाया था इन दोनों ने?’’

‘‘खाना तो घर में ही खाया था और वही खाया था जो रोज खाते हैं. हां, आज आइसक्रीम जरूर खाई है,’’ कविता बोलीं.

‘‘जरूर उसी में कुछ होगा. शायद आम ठीक नहीं होंगे,’’  दीप बोले.

डाक्टर ने दोनों को भरती कर लिया और इलाज शुरू कर दिया. 2 घंटे बाद दोनों की तबीयत संभली. तब दीप बोले, ‘‘कविता, तुम घर जाओ. मैं रात भर यहीं रहता हूं.’’

घर आते ही कविता ने सब से पहले आइसक्रीम का पतीला फ्रिज से बाहर निकाला और सोने के लिए बिस्तर पर लेट गईं. 5 बजे आंख खुली तो उठ गईं. जा कर रसोई में देखा तो आइसक्रीम पिघल कर दूध बन चुकी थी. कविता ने पतीला उठा कर सिंक में उड़ेल दिया. जैसे ही सारा दूध गिरा वैसे ही उस में से मरी हुई छिपकली भी गिरी. छिपकली को देखते ही कविता का दिल जोरजोर से धड़कने लगा और हाथ कांपने लगे. वह धम से जा कर सोफे पर बैठ गईं.

तभी दीप भी घर आ गए. उन्हें देखते ही कविता का रोना छूट गया. उन्होंने रोतेरोते पूरी बात बताई.

‘‘चलो, जो होना था हो गया,’’ दीप सांत्वना देते हुए बोले, ‘‘अब दोनों बच्चे ठीक हैं और 1 घंटे में डाक्टर उन्हें घर वापस भेज देगा.

‘‘संजू ने तो पहले ही दिन कहा था कि उसे मार दो. तुम और तुम्हारी बहू ही उसे पूज रहे थे.’’

‘‘अच्छा बाबा, गलती हो गई मुझ से. अब बारबार उस की याद मत दिलाओ.’’

मम्मीपापा की बातें सुन कर संजू जोर से हंसा और बोला, ‘‘हां, तो पापा, कितनी लक्ष्मी घर से चली गई… अस्पताल का बिल कितने का बना?’’

संजू का व्यंग्य भरा मजाक सुन कर सभी खिलखिला कर हंस पड़े.

Family Story : मरियम अब बड़ी हो गई थी

Family Story : जब वह छोटी थी, तो मां यह कह कर उसे बहला दिया करती थी कि पापा परदेश में नौकरी कर रहे हैं और उस के लिए ढेर सारा पैसा ले कर आएंगे. लेकिन मरियम अब बड़ी हो गई थी और स्कूल जाने लगी थी.

एक बार मरियम ने मां से कहा, ‘‘मम्मी, न तो पापा खुद आते हैं, न ही कभी उन का फोन आता है. क्या वे हम से नाराज हैं?’’

मरियम के इस सवाल पर फिरदौस कहतीं, ‘‘नहीं बेटी, तुम्हारे पापा तो दुनिया में सब से अच्छे पापा हैं. वे हम लोगों से बहुत प्यार करते हैं, लेकिन वे जहां नौकरी करते हैं, वहां छुट्टी नहीं मिलती है, इसीलिए आ नहीं पाते हैं.’’

मां की बातों से मरियम को तसल्ली तो मिल जाती, लेकिन पिता की याद कम नहीं हो पाती थी.

समय हवा के झोंके की तरह बीतता रहा. मरियम अब 5वीं जमात की एक समझदार बच्ची बन चुकी थी.

एक दिन स्कूल की छुट्टी के समय मरियम ने देखा कि उस के स्कूल की एक छात्रा सुमन ने दौड़ कर अपने पापा के गले से लिपट कर कहा कि आज हम पहले आइसक्रीम खाएंगे, उस के बाद घर जाएंगे.

यह देख कर मरियम को अपने पापा की याद बहुत आई. वह स्कूल से घर आई, तो बगैर कुछ खाएपीए सीधे अपने कमरे में जा कर लेट गई.

घर के काम निबटा कर फिरदौस मरियम के पास आ कर बैठ गईं और उस के काले खूबसूरत बालों में हाथ से कंघी करते हुए पूछा, ‘‘क्या बात है, आज हमारी बेटी कुछ उदास लग रही है?’’

फिरदौस का इतना पूछना था कि मरियम फफक कर रो पड़ी, ‘‘मम्मी, आप मुझ से झूठ बोलती हैं न कि पापा दुबई में नौकरी करते हैं? अगर वे दुबई में हैं, तो फोन पर हम लोगों से बात क्यों नहीं करते हैं?’’

अब फिरदौस के लिए सचाई को छिपा कर रख पाना बहुत मुश्किल हो गया.

‘‘अच्छा, पहले तुम खाना खा लो. आज मैं तुम्हें सबकुछ सचसच बता दूंगी,’’ कहते हुए फिरदौस मरियम के लिए खाना लेने चली गईं.

जब फिरदौस खाना ले कर कमरे आईं, तो मरियम ने उन से कहा, ‘‘मम्मी, आप को पापा के बारे में जोकुछ बताना है, बताती जाइए. मैं खाना खाती हूं.’’

‘‘बेटी, तुम्हारे पापा इंजीनियर थे और दुबई में नौकरी करते थे. मैं भी उन्हीं के साथ रहती थी.’’

‘‘मम्मी, आप बारबार ‘थे’ शब्द का क्यों इस्तेमाल कर रही हैं? क्या पापा अब इस दुनिया में नहीं हैं?’’ इतना कह कर वह रोने लगी.

‘‘नहीं बेटी, पापा जिंदा हैं.’’

मरियम तुरंत आंसू पोंछ कर चुप हो गई. उसे डर था कि कहीं मम्मी सचाई बताए बगैर चली न जाएं.

फिरदौस ने बात का सिलसिला फिर से शुरू करते हुए कहा, ‘‘12 साल पहले की बात है, जब तुम्हारे पापा और मैं दुबई से भारत आए थे. हम दोनों ही बहुत खुश थे, लेकिन हमें क्या पता था कि इस के बाद हम सब एक ऐसी मुसीबत में पड़ जाएंगे, जिस से छुटकारा पाना नामुमकिन हो जाएगा.’’

‘‘शहर में दंगा हो गया. हिंदू और मुसलमान एकदूसरे के खून के प्यासे हो गए थे.

‘‘जैसेतैसे कर के जब फसाद थोड़ा थमा, तो हम दुबई जाने के लिए तैयार हो गए. यह भी एक अजीब इत्तिफाक था कि जिस दिन हमारी फ्लाइट थी, उसी दिन शहर में बम धमाके हो गए. इस में काफी लोगों की जानें चली गईं.

‘‘हम लोग दुबई तो पहुंच गए, लेकिन भारत से आने वाली हर खबर बड़ी संगीन थी. बम धमाकों के अपराधियों में तुम्हारे पापा का नाम भी आ रहा था.

‘‘तुम्हारे पापा को यह बात नामंजूर थी कि उन्हें कोई देशद्रोही या आतंकवादी समझे. उन्होंने किसी तरह भारत में रहने वाले अपने घरपरिवार और दोस्तों के जरीए पुलिस तक यह बात पहुंचाई कि वे बेकुसूर हैं और अपनी बेगुनाही साबित करने के लिए भारत आना चाहते हैं. कुछ दिनों के बाद तुम्हारे पापा भारत आ गए.

‘‘फिर वही हुआ, जिस का डर था. पुलिस ने हाथ आए तुम्हारे बेगुनाह मासूम पापा को उन बम धमाकों का मास्टरमाइंड बना कर जेल की सलाखों के पीछे डाल दिया.

‘‘पिछले 12 सालों से तुम्हारे पापा जेल में हैं,’’ इतना कह कर फिरदौस फूटफूट कर रोने लगीं.

मरियम ने किसी संजीदा शख्स की तरह पूछा, ‘‘क्या मैं अपने पापा से मिल सकती हूं?’’

‘‘हां बेटी, जरूर मिल सकती हो,’’ फिरदौस ने जवाब दिया, ‘‘मैं हर रविवार को तुम्हारे पापा से मिलने जेल जाती हूं. अब तुम भी मेरे साथ चल सकती हो.’’

12 साल की बेटी जब सामने आई, तो शहजाद ने अपना चेहरा छिपा लिया. अपनी बेटी के सामने वे एक अपराधी की तरह जेल की सलाखों के पीछे खड़े हो कर जमीन में धंसे जा रहे थे.

‘‘पापा, क्या आप सचमुच अपराधी हैं?’’ मरियम के इस सवाल पर शहजाद घबरा गए.

‘‘बेटी, तुम्हारे पापा बेकुसूर हैं. उन्होंने कोई जुर्म नहीं किया है. बस, हालात ने जेल की सलाखों के पीछे ला कर खड़ा कर दिया है,’’ इतना कह कर शहजाद बेटी की तरफ देखने लगे.

‘‘पापा, आप निश्चिंत हो जाइए. चाहे सारी दुनिया आप को अपराधी समझे, पर बेटी की नजर में आप एक ईमानदार नागरिक और देशभक्त रहेंगे.’’

अब मरियम हर रविवार को अपने पापा से मिलने जेल जाने लगी. वह जब भी पापा से मिलने जाती, तो उन की पसंद की खाने की कोई न कोई चीज बना कर ले जाती और अपने हाथों से खिलाती.

बापबेटी की इस मुलाकात को 10 साल और गुजर गए. 22 साल की मरियम अब स्कूल से निकल कर कालेज में जाने लगी थी.

पिछले 10 सालों से जेल का पूरा स्टाफ पिता और बेटी का मुहब्बत भरा मेलमिलाप बड़े शौक से देखता चला आ रहा था.

शहजाद ने अपनी जिंदगी के 22 साल जेल में कुछ इस तरह बिता दिए कि दुश्मन भी दोस्त बन गए. अनपढ़ कैदियों को पढ़ाना, बीमार कैदियों की सेवा करना व जरूरतमंद कैदियों की मदद करने की आदत ने उन्हें जेल में मशहूर बना दिया था.

कानून अंधा होता है, यह सिर्फ कहावत ही नहीं, बल्कि सच भी है. वह उतना ही देखता है, जितना उसे दिखाया जाता है. कानून के रखवालों ने शहजाद को एक आतंकवादी बना कर पेश किया था. उन के खिलाफ जो तानाबाना बुना गया, वह इतना मजबूत था कि इस अपराध से छुटकारा पाना उन के लिए नामुमकिन हो गया.

वैसे भी जिस पर आतंकवाद का ठप्पा लग जाए, फिर उस की सुनता कौन है? शहजाद के साथ मुल्क के नामीगिरामी वकील थे, लेकिन सब मिल कर भी उन्हें बेगुनाह साबित करने में नाकाम रहे.

निचली अदालत से ले कर सुप्रीम कोर्ट तक ने मौत की सजा को बरकरार रखा. मरियम और फिरदौस की दया की अपील को राष्ट्रपति महोदय ने भी ठुकरा दिया. फांसी की तारीख तय हो गई.

सुबह 4 बजे शहजाद को फांसी दी जानी थी. मरियम और फिरदौस के साथ जेल के कैदी भी उदास थे.

फिरदौस और मरियम आखिरी दीदार के लिए शहजाद की कोठरी में भेजे गए. बेटी और बीवी को देख शहजाद की आंखों की वीरानी और बढ़ गई.

मरियम ने बाप की हालत देख कर कहा, ‘‘पापा, आप की मौत का हम लोग जश्न मनाएंगे. लीजिए, आखिरी बार बेटी के हाथ की बनी खीर खा लीजिए.’’

शहजाद एक फीकी मुसकराहट के साथ करीब आए, तो मरियम ने अपने हाथों से उन्हें खीर खिलाई.

2 चम्मच खीर खाने के बाद ही शहजाद का चेहरा जर्द पड़ने लगा. मुंह से खून की उलटी शुरू हो गई.

शहजाद को उलटी करते देख जहां फिरदौस घबरा गईं, वहीं मरियम ने मुसकराते हुए कहा, ‘‘पापा, आप की बेगुनाही तो साबित न करा सकी, लेकिन आप को फांसी से बचा लिया.

‘‘अब दुनिया यह न कह सकेगी कि आतंकवाद के अपराध में शहजाद को फांसी पर लटका दिया गया. आप को इज्जत की जिंदगी तो न मिल सकी, पर हां, इज्जत की मौत जरूर मिल गई.’’

फिरदौस की चीख सुन कर जब तक पहरेदार शहजाद की खबर लेते, तभी मरियम ने भी जहरीली खीर के 2 चम्मच खा लिए. जेल की उस काल कोठरी में अब 2 लाशें पड़ी थीं. एक को अदालत ने आतंकवादी होने की उपाधि दी थी, तो दूसरी को समाज ने आतंकवादी की बेटी करार दिया था. दोनों ही समाज और दुनिया से अब आजाद हो चुके थे.

Social Story : आत्मकथा एक हीरोइन की

Social Story : ‘‘अरे नीलू, एंबुलैंस को फोन किया कि नहीं?’’ नीलू की सहेली मधु हंसते हुए बोली.

‘‘क्यों…?’’ नीलू ने पूछा.

‘‘इस स्काई ब्लू ड्रैस में तो तुम बला की खूबसूरत दिख रही हो. रास्ते में कम से कम 15-20 दिलजले तो बेहोश हो कर गिर पड़े होंगे,’’ मधु बोली.

‘‘तुझे तो ब्यूटी कौंटैस्ट में हिस्सा लेना ही चाहिए. गोरा गुलाबी रंग, शानदार फिगर, तीखे नैननक्श, मीठी खनकती हुई आवाज और उस पर यह कातिलाना अदाएं… तुम से बेहतर तो इस शहर में होना मुश्किल है,’’ साथ में खड़ी सुजाता ने कहा.

‘‘हां, बिलकुल ठीक बात है. इसी महीने के आखिर में ब्यूटी कौंटैस्ट हो भी रहा है,’’ मधु ने सूचना दी.

‘‘सच में… क्या मैं यह कौंटैस्ट जीत सकती हूं?’’ नीलू ने पूछा.

‘‘क्यों, क्या कमी है तुझ में. ऐसा फिगर तो कई हीरोइनों का भी नहीं है,’’ सुजाता ने कहा.

‘‘पर, शायद मम्मीपापा इजाजत न दें,’’ नीलू ने डर जाहिर किया.

‘‘हम सब चल कर उन्हें मना लेंगी,’’ मधु ने कहा.

पूछने पर नीलू की मम्मी बोलीं, ‘‘अरे, नहींनहीं. ऐसे किसी ब्यूटी कौंटैस्ट में हिस्सा लेने की जरूरत नहीं है. अभी कालेज का एक साल और बचा है. पहले पढ़ाई पूरी कर लो, फिर किसी ऐसीवैसी बात के बारे में सोचना.’’

‘‘आंटी, सिर्फ एक ही दिन की तो बात है, बाकी समय तो हम कालेज और किताबों में ही रहेंगे न,’’ मधु बोली.

‘‘अगर यह जीत गई तो हम सब को कितना अच्छा लगेगा, आत्मविश्वास तो बढ़ेगा ही,’’ सुजाता ने अपनी तरफ से जोर लगाया.

‘‘चलो, तुम सब इतना जोर दे रही हो तो मैं इस के पापा से पूछ कर ही कोई फैसला लूंगी,’’ नीलू की मम्मी बोलीं.

‘‘आंटी, प्लीज अपनी तरफ से पूरी कोशिश कीजिएगा,’’ मधु बोली.

शाम को मम्मी ने पापा को बताया.

‘‘बच्चों की इच्छा पूरी करना हमारा फर्ज बनता है. वैसे भी हमारे कौन से 5-7 बच्चे हैं. लेदे कर एक लड़की ही तो है, इसलिए हमें इसे इस कौंटैस्ट में भाग लेने की इजाजत दे देनी चाहिए. लेकिन यह पहली और आखिरी बार होगा. इस के बाद अपने कैरियर की तरफ ध्यान देना होगा,’’ नीलू के पापा ने अपना फैसला सुनाया. यह सुन कर नीलू बहुत खुश हुई.

नीलू जब फार्म भरने पहुंची, तो उसे बताया गया कि महीने के आखिरी रविवार को सुबह 11 बजे से इवैंट शुरू हो जाएगा.

इवैंट के मुख्य जज के रूप में फिल्मी दुनिया की एक मशहूर हस्ती आएगी, जिन का नाम अभी गुप्त रखा गया है. इस सिलसिले में सभी प्रतियोगियों को मुफ्त ग्रूमिंग क्लास की सुविधा भी दी जाएगी.

आखिरकार प्रतियोगिता वाला दिन आ ही गया. नीलू सभी प्रतियोगियों पर भारी पड़ी और आखिरी 10 वाले राउंड तक पहुंच ही गई. वहां पहुंच कर मालूम पड़ा कि मुख्य निर्णायक के तौर पर फिल्म स्टार कुशाल आने वाले हैं.

नीलू फिल्म स्टार कुशाल की बहुत बड़ी फैन थी. अब उस का उत्साह सातवें आसमान पर पहुंच गया.

10वें नंबर पर नीलू का नाम पुकारा गया. इस प्रतियोगिता में सभी से 1-1 सवाल पूछा गया था, जिस का उन्हें एक मिनट में जवाब देना था.

नीलू से सवाल पूछा गया कि आप का आदर्श कौन है? बाकी प्रतियोगियों से भी इसी तरह के सवाल पूछे गए थे. सभी ने रटेरटाए जवाब दिए थे और तकरीबन सभी ने मातापिता, गुरु, दोस्त को अपने जवाबों में शामिल किया था, पर नीलू ने अपने जवाब को एक नया मोड़ दे दिया था.

‘‘मेरा आदर्श इस सृष्टि की एक छोटी सी रचना है, जिसे हम सब चींटी के नाम से जानते हैं. चींटी अपने शारीरिक वजन से कई गुना ज्यादा भार उठा कर बिना थके मेहनत करती है. जरूरत पड़ने पर हाथी से टकराने की भी हिम्मत रखती है. हमें भी इसी तरह बिना थके कामयाबी मिलने तक अपनी मेहनत जारी रखनी चाहिए.’’

नीलू के जवाब से काफी देर तक हाल में तालियां बजती रहीं. नीलू को इस इवैंट में पहला नंबर मिला था. इनाम देते हुए कुशाल ने नीलू की दिल खोल कर तारीफ की.

‘‘कमाल की खूबसूरत हैं आप. क्या फिगर है. क्या आंखें हैं. क्या बाल हैं. एकएक चीज लाजवाब और सब से ऊपर आप का जवाब. वाह, कमाल हो गया. इसे कहते हैं ब्यूटी विद ब्रेन.

‘‘मैं तो आप की डायलौग डिलीवरी का कायल हो गया हूं. बिना किसी ट्रेनिंग के किस जगह सांस लेना है, कितनी देर रोकना है, सब एकदम प्रोफैशनल. आप जैसे लोगों की तो बौलीवुड को जरूरत है. आप मुंबई आइए, मैं आप की पूरी मदद करूंगा,’’ कुशाल नीलू की तारीफ करते हुए बोला.

अवार्ड के अलावा विजेता नीलू को कुशाल के साथ डिनर भी करना था.

डिनर के समय नीलू ने कुशाल से पूछा, ‘‘क्या मैं सचमुच हीरोइन बन सकती हूं?’’

‘‘हां, तुम बिलकुल हीरोइन बन सकती हो,’’ कुशाल बोला.

‘‘क्या आप मेरी मदद करेंगे?’’ नीलू ने पूछा.

‘‘अरे, आप मंबई आइए तो सही, जो हम से बन पड़ेगा, जरूर करेंगे,’’ कुशाल ने जवाब दिया.

‘‘कुशाल साहब का तो नाम चलता है. अगर साहब कह रहे हैं तो चली जाओ सुबह की फ्लाइट से ही,’’ एक चमचाटाइप आदमी बोला.

‘‘मम्मीपापा से पूछना पड़ेगा,’’ नीलू थोड़ा सोच कर बोली.

‘‘ये पापा लोग ही तो विलेन होते हैं… फिल्मों में भी…’’ हंसते हुए कुशाल बोला, ‘‘जब इजाजत मिल जाए, तब आ जाना.’’

‘‘जी, आप अपना नंबर दे दीजिए,’’ नीलू ने कहा.

‘‘जरा नंबर दे दो,’’ कुशाल ने पास खड़े चमचे से कहा.

चमचे ने नंबर लिखवा दिया.

नीलू ने घर में घुसते ही कह दिया, ‘‘मैं फिल्मों में काम करना चाहती हूं.’’

मातापिता दोनों जानते थे कि ऐसा ही होने वाला है, क्योंकि उस प्रोग्राम में वे भी शामिल थे. मना करने पर नीलू के गलत कदम उठाने की संभावना बनी हुई थी. इस पर भी वे विचार कर रहे थे.

उस के पापा ने कहा, ‘‘2 महीने बाद तुम्हारे इम्तिहान हैं. पहले अच्छे से इम्तिहान दे दो, फिर मैं खुद तुम्हारे साथ चलूंगा, क्योंकि 1-2 दिन में तो तुम्हें कोई काम देगा नहीं, इसलिए हम वहां  महीनाभर रुक कर कोशिश कर लेंगे.’’

‘‘वैसे, इस की जरूरत नहीं पड़ेगी, क्योंकि कुशाल ने कहा है कि वहां पहुंचते ही मुझे काम दिलवा देंगे,’’ नीलू चहक कर बोली.

‘‘उस दुनिया की सारी चकाचौंध दिखावटी है. परदे के पीछे का सच बहुत स्याहा और कड़वा है,’’ पापा ने चेतावनी देते हुए कहा.

‘‘जिस पर कुशाल का हाथ हो, वह हर तरफ से सुरक्षित है,’’ नीलू पर तो जैसे कुशाल का जादू छा गया था.

इस बीच नीलू ने सैकड़ों बार कुशाल को फोन लगाया. कई बार तो घंटी जाने के बाद भी फोन नहीं उठाया. कई बार दूसरे ने उठाया. कभी कुशाल साहब शूटिंग कर रहे होते, तो कभी स्टोरी सीटिंग या कभी सो रहे होते.

आखिर वह दिन भी आ गया, जब नीलू को मुंबई जाना था. अभी तक कुशाल से उस की बात नहीं हो पाई थी, फिर भी उसे यकीन था कि कुशाल उसे पहचान ही लेगा और और मदद करेगा.

विभिन्न पत्रपत्रिकाओं और इंटरनैट से नीलू ने कुशाल के घर का पता निकाल ही लिया था.

अपने पापा के साथ नीलू मुंबई में एक छोटे से होटल में रुक गई. सुबह होते ही वह कुशाल के बंगले पर पहुंच गई. वहां उस जैसे पचासों लोग खड़े थे. गार्ड ने उस की कोई बात नहीं सुनी और बाकी लोगों के साथ भीड़ में खड़ा कर दिया.

तकरीबन 4 घंटे धूप में खड़े रहने के बाद 12 बजे कुशाल अपने घर की गैलरी में आया और हाथ हिला कर मौजूद लोगों को देखा और फिर हाथ जोड़ कर अंदर चला गया.

इतनी दूर से उस का नीलू को पहचान पाना मुश्किल था. यही हाल स्टूडियो का था. वहां भी गार्ड किसी को अंदर नहीं जाने दे रहा था.

दूसरे दिन नीलू फिर भीड़ का हिस्सा बन कर खड़ी हो गई, पर आज उस ने अपने हाथों में दुपट्टा ले कर लहराया.

तकरीबन 7 दिनों तक लगातार ऐसा चलने के बाद आखिर एक दिन कुशाल का ध्यान उस की तरफ चला ही गया. वह उसे पहचान नहीं पाया था, फिर भी गार्ड को आदेश दे कर नीलू को अंदर बुलवा लिया.

सारी बातें जानने के बाद कुशाल ने पूछा, ‘‘कहां रुकी हो?’’

नीलू ने जब उसे अपना पता बताया, तो उस ने उसे अपने गैस्ट हाउस में रुकने को कहा. यह भी कहा कि तुरंत काम मिलना मुमकिन नहीं है, इसलिए बेहतर होगा कि वह अपने पिता को वापस घर भेज दे. यहां तो काम की तलाश में इधरउधर जाना पड़ेगा.

गैस्ट हाउस में अच्छीखासी सुविधाएं  थीं. स्टाफ भी अच्छा था, पर किसी भी बात का जवाब हां या न से ज्यादा नहीं देता था.

कुशाल ने अपनी एक कार ड्राइवर के साथ नीलू को दे रखी थी, जहां वह अपने पिता के साथ अलगअलग डायरैक्टरों के यहां मिलने जाती थी.

6-7 घंटे गुजरने के बाद भी किसी से मुलाकात नहीं हो पाती थी, इसलिए 10 दिनों के बाद नीलू के पिता ने वापस जाने का फैसला कर लिया.

नीलू के पिता के जाने के दूसरे ही दिन कुशाल गैस्ट हाउस में आ गया.

‘‘गुड मौर्निंग नीलू, कुछ काम मिला क्या?’’ कुशाल नीलू के कमरे में घुसता हुआ बोला.

‘‘नहीं, अभी तक तो नहीं मिला. किसी से मुलाकात नहीं हो पाई,’’ नीलू निराशा भरी आवाज में बोली.

‘‘हम तुम्हें सिखाते हैं काम कैसे मिलता है. चलो, हमारे साथ,’’ कुशाल मुसकराते हुए बोला.

नीलू में इतनी हिम्मत नहीं थी कि पूछे कहां चलना है, किस से मिलना है. वह तैयार हो कर आ गई.

‘‘मैडम, यह क्या कपड़े पहने हैं. ये सब शूटिंग के दौरान पहनना. कोई छोटी ड्रैस नहीं है क्या?’’ सलवारकुरता पहने नीलू को देख कर कुशाल बोला.

‘‘जी, एक शौर्ट स्कर्ट तो है,’’ नीलू बोली.

‘‘तो फिर वही पहनो. यहां अकेले चेहरा नहीं देखा जाता है, बाकी चीजें

भी गौर से देखते हैं. समझी?’’ कुशाल कुटिलता से बोला.

‘‘जी, समझी,’’ कह कर नीलू ड्रैस बदल कर आ गई.

कमरे से बाहर निकलते ही कुशाल ने नीलू की कमर में हाथ डाल दिया. नीलू को असहज लगा.

‘‘लाइमलाइट में रहने के लिए यह सब तो करना ही पड़ेगा, तभी मीडिया में फोटो छपेगा और लोग जानेंगे. हम और हमारी टीम के जितना नजदीक रहोगी, उतनी ही ज्यादा कामयाब हो पाओगी, समझी?’’ कुशाल की आंखों में शरारत साफ नजर आ रही थी.

‘‘समझ गई,’’ कह कर नीलू उस से और चिपक गई. बाहर कई फोटोग्राफर खड़े थे, जो धड़ाधड़ इस पल को कैमरे में कैद कर रहे थे.

‘‘चलो, तुम्हें डायरैक्टर सोबर कुमार से मिलवाते हैं. वह एक फिल्म बनाने की प्लानिंग कर रहा है, हमारे साथ,’’ कुशाल बोला.

‘‘मैं वहां गई थी, पर 7 घंटे बाद भी वे मिल नहीं पाए थे,’’ नीलू बोली.

‘‘तुम हमारे साथ जा रही हो और हम तुम्हारे गौडफादर हैं, फादर नहीं. समझी?’’ कुशाल बोला.

कार में बैठते ही कुशाल ने नीलू की खुली जांघ पर अपना हाथ रख दिया. नीलू उसे हटाना चाहती थी, पर हाथ का दबाव इतना ज्यादा था कि वह चाह कर भी नहीं हटा पाई.

सारे रास्ते वह अलगअलग जगहों पर इस तरह का दबाव महसूस करती रही और खून के घूंट पी कर सहन करती रही.

तकरीबन एक घंटे बाद दोनों सोबर कुमार के औफिस में थे.

‘‘यह रही हमारी नई फिल्म की हीरोइन, जिस के बारे में हम ने तुम से बात की थी,’’ कुशाल बोला.

‘‘साहब, कम से कम 7 नई हीरोइनों को तो आप इंट्रोड्यूस करा ही चुके हैं,’’ सोबर कुमार हाथ जोड़ कर बोला.

‘‘यह 8वीं है,’’ कुशाल बोला.

‘‘साहब, स्क्रीन टैस्ट लेना पड़ेगा,’’ सोबर कुमार ने कहा.

‘‘स्क्रीन टैस्ट, स्टोरी सीटिंग, प्रोड्यूसर से मीटिंग सब 7 दिन के बाद फिक्स कर लो. अभी 7 दिन तक तो यह हमारे साथ है,’’ कुशाल बोला.

‘‘जी, साहब,’’ सोबर कुमार ने कहा.

‘‘चलो, बधाई हो मैडम, आप हीरोइन बन गई हैं,’’ कुशाल बोला.

‘‘थैंक्यू सर,’’ नीलू ने कहा.

‘‘सर नहीं, साहब कहो. साहब हैं ये,’’ सोबर कुमार नीलू की तरफ देख कर बोला.

‘‘अभी नईनई हैं, धीरेधीरे सब समझ जाएंगी,’’ कुशाल बोला.

लौटतेलौटते रात के 11 बज गए. गैस्ट हाउस में आ कर कुशाल ने खाने का और्डर दिया.

‘‘ड्रिंक करोगी?’’ कुशाल ने पूछा.

‘‘जी, मैं शराब नहीं पीती,’’ नीलू ने जवाब दिया.

‘‘मैडमजी, यह शराब नहीं है. ट्रेनिंग है आप की. फिल्म के रोल के हिसाब से तैयारी तो करनी पड़ेगी न? लो पियो,’’ कह कर कुशाल ने एक पैग बढ़ा दिया.

नीलू में मना करने की हिम्मत नहीं थी. उस ने जिंदगी में पहली बार शराब पी थी.

खाना खा कर कुशाल ने एक विदेशी सिगरेट निकाली और सुलगा ली. एक सिगरेट नीलू की तरफ बढ़ाते हुए बोला, ‘‘यह ट्रेनिंग का दूसरा हिस्सा है. हमारा साथ देने के लिए इसे पी लो.’’

नीलू मना करती रही, पर कुशाल ने सिगरेट सुलगा कर उसे जबरन दे दी. मजबूरन नीलू को सिगरेट पीनी पड़ी.

2-3 कश लेते ही उस पर अजीब सी बेहोशी छाने लगी.

सुबह जब नीलू की नींद खुली तो अपनेआप को बिस्तर पर बिना कपड़ों के पाया. तकरीबन इसी अवस्था में कुशाल उस के पास लेटा हुआ था.

नीलू समझ चुकी थी कि ट्रेनिंग के नाम पर वह जिंदगी की अनमोल चीज गंवा चुकी है.

तकरीबन एक हफ्ते तक यही चलता रहा, बस अब फर्क इतना हो गया था कि कुशाल के आते ही नीलू खुद पैग बना लाती और सिगरेट पेश कर देती.

7 दिन बाद सोबर कुमार के पास स्क्रीन टैस्ट के लिए जाना पड़ा. जैसे ही सोबर कुमार ने सिगरेट पेश की, नीलू बोली, ‘‘मैं रियल ऐक्टिंग करती हूं. मुझे सिगरेट की जरूरत नहीं. बताइए, कहां देना है स्क्रीन टैस्ट.’’

‘‘वाह,’’ सोबर कुमार बोला.

इस के बाद तो प्रोड्यूसर, स्टोरी राइटर, डायलौग राइटर, म्यूजिक डायरैक्टर और कैमरामैन तक सभी ने नीलू को अलगअलग ढंग से टैस्ट किया और टे्रनिंग दी.

नीलू फिर भी दूसरे लोगों की तुलना में खुशकिस्मत थी. उसे कम से कम एक फिल्म तो मिल गई और वह फिल्म हिट भी हो गई.

किसी फिल्म की शूटिंग के दौरान वह अपनी वैनिटी वैन में मेकअप करवा रही थी, तभी बाहर जा रहे 2 लोग जोरजोर से बातें कर रहे थे.

‘‘अरे कालगर्ल है वह तो,’’ एक आदमी दूसरे से कह रहा था.

नीलू को लगा, शायद वह आदमी उसे आवाज दे रहा था.

Cyber Fraud : 50 लाख का इनाम

Cyber Fraud : ‘सर, हमारी मोबाइल कंपनी ने लकी ड्रा में आप को विजेता चुना है. मुंबई में होने वाले शानदार समारोह में आप को 50 लाख रुपए का इनाम दिया जाएगा. कृपया उस के अग्रिम टैक्स और प्रोसैसिंग फीस के रूप में 25 हजार रुपए आज ही 11 बजे तक कंपनी के बैंक अकाउंट 18760… में जमा करा दें. अगर आप 11 बजे तक यह रकम जमा नहीं करा पाते हैं, तो यह इनाम किसी दूसरे शख्स को दे दिया जाएगा.’

कामता प्रसाद के मोबाइल फोन पर सुबहसुबह यह संदेश आया. उसे पढ़ कर वे खुशी से झूम उठे.

कामता प्रसाद के गांव से बैंक तकरीबन 15 किलोमीटर दूर शहर में था. वे रुपए ले कर फौरन बैंक की ओर चल दिए. 11 बजे से पहले उन्होंने बैंक में रुपए जमा करा दिए.

कामता प्रसाद का बेटा रमन राजधानी के एक नामी इंजीनियरिंग कालेज में पढ़ता था. वह उसी दिन अपने एक दोस्त सुकेश के साथ गांव आ गया.

कामता प्रसाद ने जब 50 लाख का इनाम जीतने की बात बताई, तो वह बोला, ‘‘पिताजी, बैंक में रुपए जमा कराने से पहले आप ने मुझे बताया क्यों नहीं?

‘‘जरा से पैसों के लालच में आप ने अपनी पूंजी भी गंवा दी,’’ रमन ने अफसोस के साथ कहा.

‘‘क्या मतलब…?’’ कामता प्रसाद ने हैरानी से पूछा.

‘‘चाचाजी, कोई मोबाइल कंपनी इस तरह के इनाम नहीं बांटती है. यह ठगी का नया तरीका है, जिस में आप जैसे भोलेभाले लोग फंस जाते हैं,’’ सुकेश ने कहा.

ठगी की बात जान कर कामता प्रसाद परेशान हो उठे. सुकेश ने उन्हें समझाया, ‘‘आप परेशान मत होइए. मेरे मामाजी पुलिस इंस्पैक्टर हैं. हम लोग उन के साथ बैंक जा कर पता करते हैं.’’

कामता प्रसाद को समझाबुझा कर रमन और सुकेश उसी समय शहर की ओर चल दिए.

सुकेश के मामा देवांशु राय पुलिस स्टेशन में ही थे. पूरी बात सुन कर वे फौरन बैंक की ओर चल दिए.

बैंक मैनेजर ने अपने कंप्यूटर पर उस अकाउंट की जांच की, फिर बोला, ‘‘इस खाते में औनलाइन बैंकिंग होती है. इस में आज सुबह से 5 आदमियों ने 25-25 हजार की रकम जमा कराई है और यह सारी रकम थोड़ी ही देर बाद निकाल ली गई है.’’

‘‘इस का मतलब है कि कई लोग इस ठगी के शिकार हुए हैं,’’ इंस्पैक्टर देवांशु राय ने कहा.

‘‘जी हां, इस खाते की पिछली जानकारी बता रही है कि इस में पिछले कई दिनों से 25-25 हजार की रकम जमा हो रही है और वह थोड़ी ही देर में औनलाइन ट्रांसफर कर दी जाती है,’’ मैनेजर ने बताया.

‘‘क्या आप हमें इस के खाताधारी का पता दे सकते हैं?’’ रमन ने कहा.

‘‘हांहां, क्यों नहीं,’’ मैनेजर ने खाताधारी का पता प्रिंट कर के दे दिया.

रमन इंस्पैक्टर देवांशु राय की ओर मुड़ते हुए बोला, ‘‘अंकल, मुझे पूरी उम्मीद है कि यह पता फर्जी होगा, लेकिन फिर भी वहां चल कर एक बार जांच कर लेनी चाहिए.’’

‘‘ठीक है,’’ देवांशु राय ने सिर हिलाया, फिर मैनेजर से बोले, ‘‘आप यह खाता फ्रीज कर दीजिए.’’

‘‘आप चिंता मत कीजिए,’’ मैनेजर ने कहा.

रमन और सुकेश इंस्पैक्टर देवांशु राय के साथ उस पते पर चल दिए. जैसा कि अंदाजा था, वह पता फर्जी निकला.

‘‘अंकल, जिस मोबाइल फोन से एसएमएस आया था, उस के दफ्तर में चल कर पता करना चाहिए कि यह नंबर किस का है,’’ रमन ने अपनी राय दी.

‘‘ओके,’’ इंस्पैक्टर देवांशु राय ने कहा.

वहां से पता चला कि यह नंबर सिविल लाइंस में रहने वाले गिरिजा कुमार का था. वहां से सभी लोग सीधे गिरिजा कुमार के घर पहुंचे. वे तकरीबन 55 साल के शख्स थे.

इंस्पैक्टर देवांशु राय ने उन्हें मोबाइल नंबर बताते हुए पूछा, ‘‘मिस्टर गिरिजा कुमार, इस मोबाइल नंबर से आज सुबह आप ने किसकिस को एसएमएस किया था?’’

‘‘इंस्पैक्टर साहब, यह मोबाइल नंबर मेरा नहीं है,’’ गिरिजा कुमार ने कहा.

‘‘यह कैसे हो सकता है. मोबाइल कंपनी ने हमें बताया है कि पिछले हफ्ते यह सिम कार्ड आप ने खरीदा है,’’ इंस्पैक्टर देवांशु राय ने कहा.

‘‘जरूर कोई गलतफहमी हुई है. मैं ने पिछले हफ्ते इस कंपनी का सिम कार्ड जरूर खरीदा था, लेकिन उस का नंबर दूसरा है,’’ गिरिजा कुमार ने अपना मोबाइल नंबर दिखाते हुए कहा.

‘‘इस का मतलब है कि आप ने एक नहीं, 2 सिम कार्ड खरीदे हैं. आप की भलाई इसी में हैं कि दूसरा मोबाइल भी चुपचाप हमारे हवाले कर दें,’’ इंस्पैक्टर देवांशु राय की आवाज सख्त हो गई.

‘‘इंस्पैक्टर साहब, मेरा विश्वास कीजिए. मैं ने एक सिम कार्ड ही खरीदा है,’’ गिरिजा कुमार ने मजबूती से अपनी बात रखी.

रमन ने इंस्पैक्टर देवांशु को अलग ले जा कर कहा, ‘‘अंकल, ये शख्स शरीफ आदमी मालूम पड़ते हैं. कहीं ऐसा तो नहीं कि इन्होंने सिम कार्ड खरीदते समय जो आईडी दी हो, उस पर ही दूसरा सिम कार्ड बेच दिया गया हो.’’

‘‘ऐसा हो भी सकता है, लेकिन इस की जांच कैसे की जाए? हमारे पास इस समय और कोई सूत्र भी तो नहीं है,’’ इंस्पैक्टर देवांशु ने कुछ सोचते हुए कहा.

‘‘जिन लोगों ने उस खाते में 25-25 हजार रुपए जमा करवाए हैं, अगर उन से किसी तरह संपर्क हो सके तो पता लगाया जा सकता है कि उन को एमएमएस किस मोबाइल नंबर से आया था. उस के बाद शायद हमें कोई और सूत्र मिल सके,’’ रमन ने अपना विचार बताया.

‘‘उन सब के संपर्क सूत्र बैंक मैनेजर से मिल सकते हैं,’’ इंस्पैक्टर देवांशु राय ने कहा. वे गिरिजा कुमार के पास आए और बोले, ‘‘फिलहाल तो हम आप के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं कर रहे हैं, लेकिन आप शक के घेरे में हैं, इसलिए बिना पुलिस की इजाजत के शहर से बाहर मत जाइएगा.’’

इस के बाद सभी लोग बैंक मैनेजर के पास वापस आए. मैनेजर ने कहा, ‘‘जिन लोगों ने पैसे जमा किए हैं, उन के  पते तो नहीं हैं, लेकिन मोबाइल नंबर जरूर मिल जाएंगे. क्योंकि फार्म में मोबाइल नंबर का कौलम होता है.’’

‘‘इतना ही काफी होगा,’’ इंस्पैक्टर देवांशु राय ने कहा, तो मैनेजर ने सारे फार्म मंगवा दिए. इंस्पैक्टर ने उन में से 5 लोगों के नंबर नोट कर लिए.

इंस्पैक्टर देवांशु राय ने उन नंबरों पर फोन किया, तो पता चला कि उन में से 2 लोगों को उसी नंबर से एसएमएस आया था, जिस से कामता प्रसाद को फोन आया था. बाकी 3 लोगों को दूसरे नंबरों से एसएमएस आया था. इस समय वे सारे नंबर स्विच औफ चल रहे थे.

‘‘अंकल पता कीजिए, अगर इन सारे नंबरों के सिम कार्ड एक ही दुकान से बेचे गए हैं, तो समझिए कि हम अपराधियों तक पहुंच गए हैं,’’ रमन ने अपनी राय दी.

‘‘वह कैसे?’’ इंस्पैक्टर देवांशु राय ने हैरानी से पूछा.

‘‘आप पता तो कीजिए,’’ रमन ने जोर देते हुए कहा.

इंस्पैक्टर देवांशु राय ने पुलिस स्टेशन आ कर पूछताछ कराई, तो रमन का अंदाजा सही निकला. ये सारे नंबर न केवल एक ही कंपनी के थे, बल्कि उन के सिम कार्ड भी एक ही शोरूम से बेचे गए थे. वे रमन और सुकेश को ले कर उस शोरूम में पहुंच गए.

रमन के कहने पर उन्होंने शोरूम के मालिक को उन नंबरों को नोट कराते हुए कहा, ‘‘इन नंबरों के सिम कार्ड खरीदने के लिए जो फार्म भरे गए थे, आप उन्हें अभी मंगवाइए.’’

शोरूम के मालिक ने थोड़ी ही देर में फार्म मंगवा दिए. रमन ने उन्हें देखते हुए कहा, ‘‘ये सारे फार्म एक ही हैंडराइटिंग में भरे गए हैं. क्या आप बता सकते हैं कि इन्हें आप के किसी मुलाजिम ने भरा है या कस्टमर ने खुद भरा है?’’

शोरूम के मालिक ने उन फार्मों को गौर से देखा, फिर बोला, ‘‘यह हमारे मुलाजिम रमेश की हैंडराइटिंग है.’’

‘‘आप अभी रमेश को बुलवाइए,’’ इंस्पैक्टर देवांशु राय ने कहा. वे रमन की बात समझ गए थे.

रमेश के आने पर इंस्पैक्टर देवांशु राय ने उसे वे फार्म दिखाते हुए पूछा, ‘‘यह फार्म तुम ने भरे हैं?’’

‘‘जी,’’ रमेश ने हां में सिर हिलाया.

‘‘तुम ने क्यों भरे हैं?’’

‘‘ग्राहकों की मदद के लिए ज्यादातर फार्म हम लोग ही भरते हैं.’’

‘‘इन फार्मों के साथ ग्राहकों के जो आईडी लगे हैं, वे तुम कहां से लाए थे?’’ रमन ने पूछा.

‘‘इन्हें ग्राहकों ने खुद ही दिया था,’’ रमेश ने कहा.

‘‘इन मोबाइल नंबरों का इस्तेमाल अपराध के लिए किया गया है. तुम्हारी भलाई इसी में है कि सचसच बता दो, वरना तुम्हें भी इन अपराधों में शामिल माना जाएगा,’’ इंस्पैक्टर देवांशु राय ने सख्त लहजे में कहा.

‘‘जी, मैं सच कह रहा हूं.’’

‘‘मिस्टर रमेश, हमें शक है कि आप ने किन्हीं दूसरे ग्राहकों के आईडी को इन सिम कार्डों को बेचने में इस्तेमाल किया है, इसलिए मेरा कहना मानिए और पुलिस के साथ सहयोग कीजिए,’’ रमन ने अपनी आंखें रमेश के चेहरे पर गड़ाते हुए कहा.

यह सुन कर रमेश घबरा उठा. थोड़ी सख्ती करने पर उस ने कबूल कर लिया कि जो ग्राहक इस दुकान से सिम कार्ड खरीदते थे, उन के ही आईडी की फोटोकौपी करवा कर उस ने 2-2 हजार रुपए में ये सिम कार्ड एक शख्स को बेचे थे, पर उसे उस शख्स का नाम और पता नहीं मालूम था.

‘‘तुम्हें अंदाजा भी नहीं होगा कि तुम ने कितना खतरनाक काम किया है,’’ इंस्पैक्टर देवांशु राय ने रमेश पर गुस्से से भरी नजर डाली, फिर अफसोस के साथ बोले, ‘‘अगर उस शख्स का नाम या पता मालूम होता, तो उसे पकड़ा जा सकता था, लेकिन अब तो कुछ भी नहीं हो सकता.’’

‘‘अभी भी बहुतकुछ हो सकता है,’’ रमन हलका सा मुसकराया, फिर रमेश से बोला, ‘‘इस शोरूम में सीसीटीवी कैमरे लगे हैं. जिन दिनों ये सिम कार्ड बेचे गए, क्या उन दिनों की रेकौर्डिंग देख कर तुम उस आदमी को पहचान सकते हो?’’

‘‘जी, मैं तुरंत पहचान लूंगा,’’ रमेश ने पछतावे के साथ कहा.

रमेश ने रेकौर्डिंग देख कर उस आदमी को पहचान लिया. इंस्पैक्टर देवांशु राय ने रेकौर्डिंग की एक कौपी ले ली, फिर अपने बड़े अफसर से बात कर उस आदमी का फोटे न्यूज चैनलों पर चलवा दिया.

थोड़ी ही देर में इंस्पैक्टर देवांशु राय के पास एक आदमी का फोन आ गया कि यह अपराधी उस के पड़ोस में रहता है.

इंस्पैक्टर देवांशु राय ने उस का पता नोट कर तुरंत वहां छापा मार कर उसे गिरफ्तार कर लिया. उस के घर से भारी मात्रा में नकदी बरामद हुई. थोड़ी सख्ती होते ही उस ने कबूल कर लिया कि इनाम का एसएमएस भेज कर उस ने काफी लोगों को ठगा था.

इंस्पैक्टर देवांशु राय ने उस आदमी को जेल भेज दिया. अपने पैसे वापस मिलने पर कामता प्रसाद ने रमन और सुकेश को जी भर कर आशीर्वाद दिया.Cyber Fraud

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें