Family Story: मेरा घर – क्या स्मिता ने रूद्र को माफ किया?

Family Story: स्पीच के बाद कुछ लोगों से मिलने के उपरांत स्मिता ने जैसे ही प्लेट उठाई, पीछे से एक धीमी, चिरपरिचित आवाज आई, जिसे वह वर्षों पहले भूल चुकी थी- ‘हैलो स्मिता.’

यह सुनते ही स्मिता चौंक कर

मुड़ी, तो सामने रुद्र था. वह बोला, ‘‘कैसी हो स्मिता? अब तो घर लौट आओ, प्लीज.’’

रुद्र को इतने सालों बाद अपने सामने देख स्मिता को ऐसा लगा जैसे किसी ने उस की दुखती रग पर हाथ रख दिया हो. उस के जख्म फिर हरे हो गए और वह समारोह बीच में ही छोड़ वहां से निकल गई. सारे रास्ते वह विचारों में खोई रही. इतने सालों बाद रुद्र का इस प्रकार उस के समक्ष आना और घर वापस चलने को कहना, उस का मन कंपित हो उठा.

समारोह में सम्मिलित सभी गणमान्य और प्रतिष्ठित लोगों के बीच केवल एक ही नाम की चर्चा थी और वह नाम था स्मिता, जो एक बिजनैस टायकून और ‘फैशन द रिवौल्यूशन’ कंपनी की मालकिन थी. हर कोई उसे देखने और सुनने को आतुर था, क्योंकि आज का यह समारोह स्मिता को सम्मानित करने के लिए आयोजित किया गया था. आज स्मिता को बिजनैस वुमन औफ द ईयर से सम्मानित किया जाना था. सभी की निगाहें स्मिता पर ही टिकी हुई थीं.

स्मिता के सशक्त और भावपूर्ण उद्बोधन के पश्चात भोज का भी प्रावधान रखा गया था, जब रुद्र उसे मिला था.

घर पहुंचते ही वह सीधे अपने कमरे में जा, सारी बत्तियां बुझा आराम कुरसी पर बैठ कर झूलने लगी. वह रुद्र और अपने जीवन के उन पन्नों को पलटने लगी, जिन को वह अपनी जीवनरूपी किताब से हमेशा के लिए फाड़ कर फेंक देना चाहती थी, पर वह ऐसा कर न सकी, क्योंकि इस अध्याय से उसे काव्या जैसे अनमोल मोती की प्राप्ति भी हुई थी, जिस की रोशनी आज भी उस के जीवन को जगमगा रही है.

‘स्मिता, तुम अपनी यह कंपनी ‘फैशन द रिवौल्यूशन’ बंद क्यों नहीं कर देतीं? क्या जरूरत है तुम्हें अपनी यह छोटी सी कंपनी चलाने की जब मेरा खुद का इतना बड़ा बिजनैस है.’’

‘नहीं रुद्र, नहीं, यह कंपनी मेरा सपना है, इसे मैं ने अपनी कड़ी मेहनत से खड़ा किया है और फिर मैं इसे शादी के पहले से रन कर रही हूं और उस वक्त तो तुम्हें इस बात से कोई एतराज भी नहीं था, फिर आज ऐसा क्या हुआ कि तुम मुझे कंपनी बंद करने को कह रहे हो और फिर मैं घर पर बैठ कर करूंगी क्या…?’

‘क्या मतलब, करूंगी क्या? इतनी सारी औरतें घर पर बैठ कर क्या करती हैं? अपना घर संभालती हैं, पूजापाठ करती हैं, किटी पार्टी करती हैं, तुम भी वही करो,’ रुद्र ने गुस्से से कहा.

स्मिता घर पर किसी तरह का कोई झगड़ा नहीं चाहती थी, इसलिए वह शांत भाव से बोली, ‘रुद्र, मैं फैशन डिजाइनिंग में ग्रैजुएट हूं. मुझे पूजापाठ, सत्संग में कोई दिलचस्पी नहीं है और मैं जब घर बहुत अच्छी तरह से संभाल रही हूं, तो फिर मैं अपनी कंपनी क्यों बंद करूं?’

स्मिता के इतना कहते ही रुद्र का गुस्सा ज्वालमुखी की तरह फूट पड़ा और चीखते हुए कहने लगा, ‘तुम इस दुनिया की कोई पहली फैशन डिजाइनिंग में ग्रैजुएट या पढ़ीलिखी औरत नहीं हो. मां को देखो, वे अपने समय की ग्रैजुएट हैं, लेकिन उन्होंने अपना सारा जीवन इस चारदीवारी में पूजापाठ व सत्संग में गुजारा है. कभी इस तरह के प्रपंच में वे नहीं पड़ी हैं और न ही तुम्हारी तरह पापा के संग बातबात पर तर्क करती थीं. ऐसी होती है आदर्श नारी, तुम्हारी तरह बदजबान नहीं,’ कहता हुआ रुद्र चला गया.

स्मिता जड़वत सी खड़ी रही. उस की जबान पर यह बात आ कर ठहर गई कि मां ग्रैजुएट नहीं पोस्ट ग्रैजुएट हैं और वह भी संगीत विश्वविद्यालय से, लेकिन मां ने शादी के बाद गाना तो दूर वे अपने दिल के जज्बात भी कभी किसी से बयां नहीं कर पाईं, क्योंकि हमारा घर, हमारा समाज, पुरुषप्रधान है, जहां एक स्त्री को अपने मन के भावों को व्यक्त करने का कोई अधिकार नहीं. तभी मां ने स्मिता के कंधे पर धीरे से अपना हाथ रखा, तो वह मां के गले लग बिफर कर रो पड़ी.

रिश्तों में विभाजन की सीलन और गंध बढ़ती जा रही थी. रोज रुद्र कोई न कोई बहाना बना कर घर को कुरुक्षेत्र बनाने पर आमादा रहता. स्मिता घर और अपने बिखर रहे रिश्ते को समेटने का असफल प्रयास करने लगी.

अचानक कुछ समय बाद रुद्र में आ रहे परिवर्तन से स्मिता चकित थी. उसे ऐसा महसूस होने लगा कि रुद्र एकाएक उस के प्रति केयरिंग और कुछ बहुत ज्यादा ही कंसंर्ड रहने लगा है, जिस का कारण उस की समझ से परे था.

सहसा एक दिन रुद्र स्मिता को अपनी बांहों के घेरे में लेते हुए कहने लगा, ‘स्मिता, मैं चाहता हूं कि अब हमें 2 से 3 हो जाना चाहिए. अब परिवार को बढ़ाने का समय आ गया है.’

यह सुन स्मिता हैरान रह गई, अपनेआप को रुद्र से अलग करती हुई बोली, ‘रुद्र, इतनी जल्दी क्या है? शादी को अभी केवल सालभर ही तो हुआ है. अभी तो मुझे अपनी कंपनी को विस्तार देने का समय है और मुझे यह मौका भी मिल रहा है. मैं अभी

1-2 साल बच्चे के लिए तैयार नहीं हूं.’

स्मिता के इतना कहते ही रुद्र स्मिता पर बरस पड़ा. रोजरोज के क्लेश से बचने और अपना घर बचाने के लिए स्मिता ने हार मान ली. परिवार बढ़ाने के लिए वह राजी हो गई और फिर काव्या जैसी परी स्मिता की गोद में आ गई, जिस से स्मिता की जिम्मेदारी में बढ़ोतरी के साथ उस की दुनिया खुशियों से भी भर गई.

लेकिन रुद्र के व्यवहार में कोई परिवर्तन नहीं आया, बल्कि अब वह बारबार काव्या और उस की देखभाल को ले कर स्मिता से झगड़ता, उसे अपनी कंपनी बंद करने को कहता, और स्वयं काव्या की जिम्मेदारी संभालने से पीछे हट जाता.

मां यदि कुछ कहतीं या स्मिता का पक्ष लेतीं तो वह मां को भी झिड़क देता. यह देख मां चुप हो जातीं. स्मिता अब समझ चुकी थी कि क्यों रुद्र को परिवार बढ़ाने की जल्दी थी. असल में वह मातृत्व की आड़ में स्मिता की प्रगति पर अंकुश लगाना चाहता था.

स्मिता घर, परिवार और बेटी काव्या के उत्तरदायित्व के साथ ही साथ बिजनैस भी बखूबी संभाल रही थी. व्यापारी वर्ग में स्मिता अपनी पहचान और एक विशेष स्थान बनाने में कामयाब होने लगी थी, जो रुद्र और उस के पुरुषत्व को नागवार गुजरने लगा और एक दिन रुद्र बेवजह अपना फ्रस्ट्रेशन, अपनी नाकामयाबी पर अपने पुरुषत्व और अहम का रंग चढ़ा स्मिता से कहने लगा, ‘अगर तुम्हें कुछ करने का इतना ही शौक है तो छोटीमोटी कोई टाइमपास 9 से 5 बजे वाली जौब क्यों नहीं कर लेतीं? क्या जरूरत है इस कंपनी को चलाने की. और सुनो, कंपनी का नाम ‘द रिवौल्यूशन’ रखने से कोई रिवौल्यूशन नहीं होने वाला, समझीं? यह मेरा घर है और यदि तुम्हें इस घर में रहना है तो मेरे अनुसार रहना होगा, वरना इस घर से निकल जाओ.’

यह सुनते ही स्मिता के सब्र का बांध टूट गया और उस ने आज रुद्र को समझाने की कोई कोशिश नहीं की. उस ने केवल इतना कहा, ‘‘यदि यह घर सिर्फ तुम्हारा है और मुझे इस घर में रहने के लिए कठपुतली की तरह तुम्हारे इशारों पर नाचना होगा तो बेहतर है कि मैं अभी इसी वक्त यह घर छोड़ दूं,’’ इतना कह कर स्मिता ने काव्या के संग उस रात घर छोड़ दिया और मां भी स्मिता के साथ हो लीं.

सारी रात स्मिता अतीत की काली स्याही में डूबी रही. दरवाजे पर हुई आहट से वह यथार्थ में लौटी.

‘‘मैडम, आप की कौफी,’’ स्मिता की मेड ने कहा.

‘‘हूं… यहां रख दो. काव्या और मां जाग गए?’’ स्मिता ने अपनी मेड से पूछा. पूरी रात जागने की वजह से स्मिता की आंखें लाल और स्वर में थोड़ा भारीपन था.

मेड ने बड़े अदब से दोनों हाथों को बांधे और सिर झुका कर जवाब दिया, ‘‘मैडम, मांजी को काफी समय हो चुका जागे. उन के स्टूडैंट्स भी आ गए हैं और मांजी संगीत की क्लास ले रही हैं, और काव्या बेबी सो रही हैं.’’

‘‘ठीक है, तुम जाओ,’’ कह कर स्मिता अपनी कौफी खत्म कर काव्या के कमरे में जा कर वहां सो रही काव्या के सिर और बालों में अपनी उंगलियां फेरती व उस के माथे को चूमती हुई बोली, ‘‘हैप्पी बर्थ डे टू माई डियर स्वीटहार्ट. आज मेरी डौल को उस के एटीन्थ बर्थ डे पर क्या चाहिए.’’

काव्या स्मिता से लिपटती हुई बोली, ‘‘मम्मा… मुझे मेरी कंप्लीट फैमिली चाहिए. मैं चाहती हूं कि पापा भी हमारे साथ रहें.’’

तभी स्मिता का फोन बजा. फोन रुद्र का था. स्मिता के फोन रिसीव करते ही रुद्र बोला, ‘‘आई एम सौरी स्मिता, मैं बहुत अकेला हो गया हूं. तुम सब प्लीज घर लौट आओ.’’

स्मिता ने सौम्य भाव से कहा, ‘‘रुद्र, मैं तुम्हें माफ कर सकती हूं, लेकिन मेरी एक शर्त है कि मैं तुम्हारे घर आ कर नहीं रहूंगी, तुम्हें मेरे घर आ कर हम सब के साथ रहना होगा.’’

रुद्र खुशीखुशी मान गया और कहने लगा, ‘‘तुम सब के चले जाने के बाद ही मुझे यह एहसास हुआ कि ईंटपत्थरों से बनी इस चारदीवारी में मेरा घर नहीं है, जहां तुम सब हो, जहां मेरा पूरा परिवार रहता है, वही मेरा घर है.’’

Funny Hindi Story: साष्टांग प्रणाम

Funny Hindi Story: आदरणीय और परमादरणीय सरकारजी को मेरा प्यार भरा प्रणाम, टांग और जांघ प्रणाम, साष्टांग प्रणाम.

मैं सरकारी साहब भक्ति विभाग से महीना नवंबर, साल 2018 में चपरासी के पद से ससम्मान रिटायर होने वाला एक्स चपरासी भोलाराम, सुपुत्र श्री मांगेराम, गांव-अबस, तहसील-अबस, जिला-अबस, प्रदेश-अबस, मोबाइल नंबर-अबस, भारत देश का असली आधारकार्डधारक हूं. मेरे पास नकली हंसीखुशी के सिवा और कुछ भी नकली नहीं है.

सरकारजी, जब भी मैं बहुत परेशान हो जाता हूं, तो आप को चिट्ठी लिख देता हूं, ताकि मुझे भी लगे कि मैं ने भी अपना रोना किसी के आगे रो दिया.

मेरे बच्चे औफिशियल प्रोसीजर का पालन करते हुए मेरी बीवी के सामने अपना रोना रोते हैं. मेरी बीवी थू्र प्रोपर चैनल उन का रोना मेरे आगे रखती है. वह भी रोती है, पर कभी कहती नहीं.

चपरासी भोलाराम की बीवी है न सरकारजी. उस ने अब लोकतंत्र में रोने को स्वीकार कर लिया है… और मैं अपना रोना थू्र प्रोपर चैनल पहले आप के सामने रखता हूं, बाद में अपने ऊपर वाले के आगे, क्योंकि मुझे ऊपर वाले से पावरफुल आप लगते हो सरकारजी.

पर, लगता है कि अब हम सब की तरह ऊपर वाला भी बहरा हो गया है. यहां किसी की सुनता ही कौन है सरकारजी. लगता है कि ऊपर वाले ने जो कान हमारे सुनने को लगाए थे, वे सब अब बहरे हो गए हैं. बस, बची जबान, सो चलाए रहते हैं.

बहुत बधाई हो सरकारजी आप को. अखबार में पढ़ कर अच्छा नहीं, बहुत अच्छा लगा, जब पढ़ा कि आप सब ने जो बातबात पर संसद में हमें दिखाने को लड़ते रहते हैं, मिलमिला कर अपने वेतन भत्तों में इजाफा कर लिया है और बाहर आप ने हमें दो चार सौ पर दिन के हिसाब से दे कर किसी न किसी बहाने चौबीसों घंटे आपस में लड़ामरवा कर रखा. बधाई हो सरकारजी. किसी के वेतन भत्ते तो बढ़े.

बुरा मत मानिएगा सरकारजी. अमीरों के पेट में तो सोएसोए भी जाता ही रहता है सरकारजी. अब तनिक हम जैसों के पेट में भी कुछ डलवा दीजिए न प्लीज. आप जोकुछ हमारे पेटों के लिए भेजते हैं, वह तो ऊपरऊपर ही खत्म हो जाता है सरकारजी. इसे आप शिकायत नहीं, सच मानिएगा जनाब.

सरकारजी, आप ने तर्क दिया है कि मुद्रास्फीति बढ़ गई थी, इसलिए उस दिन से नहीं, 2 साल पीछे से आप के वेतन भत्ते बढ़ने चाहिए थे कायदे से. चलो सरकारजी, खुशी हुई कि देश में कायदे से कुछ तो हो रहा है.

आप के वेतन भत्ते बढ़ने जरूरी, नहीं बहुत जरूरी थे. जनता भी मान रही थी. न बढ़ते तो सरकारजी आप को खानेपीने में तंगी हो जाती.

देश में जनता तंगी में रहे तो रहे, पर जनता का लोकप्रिय नेता कभी तंगी में नहीं रहना चाहिए. देश की जनता तंगी में रहे तो रहे, पर जनता के नेता तंगी में रहें, यह कहां का लोकतंत्र है सरकारजी.

सरकारजी, आप ने अपना वेतन बढ़ाया, बधाई हो जी. आप ने अपने भत्ते बढ़ाए, बधाई हो सरकारजी. आप को इस का एरियर भी मिलेगा, बधाई हो जी. आप ने अपना दैनिक भत्ता बढ़ाया, बधाई हो जी. आप ने अपना तो वेतन बढ़ाया ही बढ़ाया, अपने पास अपने कंप्यूटर का काम करने वाले को भी तार दिया, बधाई हो जी.

सबकुछ पेपरलैस करने की कवायद करने वाले सरकारजी, आप ने हर महीने जनता के काम करने के लिए प्रयोग होने वाले कागजस्याही का भुगतान भी बढ़ाया, बधाई हो जी. आप ने पहले ही देश को चरा चुके अपने बंधुबांधवों की पैंशन भी बढ़ाई, बधाई हो सरकारजी. खुद टिकाऊ न होने के बाद भी जनाबजी अपने लिए पहले से महंगी टिकाऊ कुरसीमेज ले सकेंगे, इस के लिए बधाई हो सरकारजी.

हम जनता तंगियों में रहे तो रहे, पर हम सब की हरदम यह दिली इच्छा रहती है कि आप तंगी में सोएसोए भी न रहें सरकारजी. जो आप तंगियों में रहें, तो हमारे तंग रहने का क्या फायदा?

सरकारजी, बुरा मत मानिएगा. सच कह रहा हूं कि जो आप अपनी पगार न भी बढ़ाएं तो भी आप के पास कमानेखाने के हजारों साधनसंसाधन हैं, पर मेरे जैसों के पास तो सब खाने ही खाने वाले हैं. कमा कर देने वाला एक भी नहीं. माना कि मैं तो 4 चपातियों से 2 पर आ गया हूं, पर मेरे पास मेरा भरापूरा परिवार खाने वाला है, रिश्तेदार खाने वाले हैं, यारदोस्त खाने वाले हैं.

जैसा कि मैं ने पहले भी आप से दोनों हाथ जोड़ कर विनती की है कि मैं सरकारी साहब भक्ति विभाग से बरस 2018, महीना नवंबर, चपरासी के पद से रिटायर हुआ जीव हूं सरकारजी, हालांकि मैं अपने जमाने का 10वीं पास था फर्स्ट डिवीजन, पर मेरी प्रमोशन न हो सकी, जबकि मेरे साथ वाले 10वीं फेल मेरे चपरासी रहते आप के साथ हो कर कहां से कहां निकल गए, अब उन्हें भी पता नहीं.

सरकारजी, महंगाई सिर से ऊपर हो जाने के बाद भी 2 साल से डीए तो मिला नहीं, पर मेरा बचा एरियर भी आज तक नहीं मिला. मेरे से बाद वालों को मिल गया. मेरी ही रोटी में से मेरे आगे कभीकभार एक टुकड़ा तोड़ कर फेंका जा रहा है. उस टुकड़े को अपने पेट में डालने की तो बारी ही नहीं आती.

एरियर का टुकड़ा मिलने से पहले ही घर में उस एरियर के टुकड़े को ले कर बहुत बहसबाजी शुरू हो जाती है. कोई कहता है कि मेरे पेट में डालो, तो कोई कहता है कि मेरे पेट में. एरियर से मिलने वाले उस टुकड़े को अब आप ही कहो कि किसकिस के पेट में डालूं सरकारजी?

एरियर के टुकड़े को ले कर हुई लड़ाई को जैसेतैसे शांत करने के बाद जिस के पेट में वह एरियर का टुकड़ा डालता हूं, वह और ‘भूखभूख’ चिल्लाने लगता है. इतने बड़े परिवार के पेटों के बीच एरियर का 10वां टुकड़ा क्या माने रखता है सरकारजी… आप ही बताओ.

एक बार फिर आप से गुजारिश है कि आप मेरा बचा एरियर मेरे जीतेजी एकमुश्त देने की कृपा करें, ताकि मुझे लगे कि किसी से तो मेरा लेनदेन जिंदा रहते खत्म हुआ. शेषों, अवशेषों से तो मरने के बाद भी हिसाबकिताब चलते रहेंगे सरकारजी.

Hindi Story: जोरू का गुलाम – मां इतनी संगदिल कैसे हो गईं

Hindi Story : ‘‘अरे, ऋचा दीदी, यहां, इस समय?’’ सुदीप अचानक अपनी दीदी को देख हैरान रह गया. ‘‘सप्ताहभर की छुट्टी ले कर आई हूं. सोचा, घर बाद में जाऊंगी, पहले तुम से मिल लूं,’’ ऋचा ने गंभीर स्वर में कहा तो सुदीप को लगा, दीदी कुछ उखड़ीउखड़ी सी हैं.

‘‘कोई बात नहीं, दीदी, तुम कौन सा रोज यहां आती हो. जरा 5 मिनट बैठो, मैं आधे दिन की छुट्टी ले कर आता हूं. आज तुम्हें बढि़या चाइनीज भोजन कराऊंगा,’’ लाउंज में पड़े सोफों की तरफ संकेत कर सुदीप कार्यालय के अंदर चला गया. ऋचा अपने ही विचारों में डूबी हुई थी कि अचानक ही सुदीप ने उस की तंद्रा भंग की, ‘‘चलें?’’

ऋचा चुपचाप उठ कर चल दी. उस की यह चुप्पी सुदीप को बड़ी अजीब लग रही थी. यह तो उस के स्वभाव के विरुद्ध था. जिजीविषा से भरपूर ऋचा बातबात पर ठहाके लगाती, चुटकुले सुनाती और हर देखीसुनी घटना को नमकमिर्च लगा कर सुनाती. फिर ऐसा क्या हो गया था कि वह बिलकुल गुमसुम हो गई थी? ‘‘सुदीप, मैं यहां चाइनीज खाने नहीं आई,’’ ऋचा ने हौले से कहा.

‘‘वह तो मैं देख ही रहा हूं, पर बात क्या है, अक्षय से झगड़ा हुआ है क्या? या फिर और कोई गंभीर समस्या आ खड़ी हुई है?’’ सुदीप की उत्सुकता बढ़ती जा रही थी. ‘‘अक्षय और झगड़ा? क्या सभी को अपने जैसा समझ रखा है? पता है, अक्षय मेरा और अपनी मां का कितना खयाल रखता है, और मांजी, उन के व्यवहार से तो मुझे कभी लगा ही नहीं कि मैं उन की बेटी नहीं हूं,’’ ऋचा बोली.

‘‘सब जानता हूं. सच पूछो तो तुम्हारी खुशहाल गृहस्थी देख कर कभीकभी बड़ी ईर्ष्या होती है,’’ सुदीप उदास भाव से मुसकराया. ‘‘सुदीप, जीवन को खुशियोंभरा या दुखभरा बनाना अपने ही हाथ में है. सच पूछो तो मैं इसीलिए यहां आई हूं. कम से कम तुम से व प्रेरणा से मुझे ऐसी आशा न थी. आज सुबह मां ने फोन किया था. फोन पर ही वे कितना रोईं, कह रही थीं कि तुम अब विवाहपूर्व वाले सुदीप नहीं रह गए हो. प्रेरणा तुम्हें उंगलियों पर नचाती है. सनी, सोनाली और मां की तो तुम्हें कोई चिंता ही नहीं है,’’ ऋचा ने शिकायत की.

‘‘और क्या कह रही थीं?’’ सुदीप ने पूछा.

‘‘क्या कहेंगी बेचारी, इस आयु में पिताजी उन्हें छोड़ गए. 3 वर्षों में ही उन का क्या हाल हो गया है. सनी और सोनाली का भार उन के कंधों पर है और तुम उन से अलग रहने की बात सोच रहे हो,’’ ऋचा के स्वर में इतनी कड़वाहट थी कि सुदीप को लगा, इस आरोपप्रत्यारोप लगाने वाली युवती को वह जानता तक नहीं. उसे उम्मीद थी कि घर का और कोई सदस्य उसे समझे या न समझे, ऋचा अवश्य समझेगी, पर यहां तो पासा ही उलटा पड़ रहा था. ‘‘अब कहां खो गए, किसी बात का जवाब क्यों नहीं देते?’’ ऋचा झुंझला गई.

‘‘तुम ने मुझे जवाब देने योग्य रखा ही कहां है. मेरे मुंह खोलने से पहले ही तुम ने तो एकतरफा फैसला भी सुना डाला कि सारा दोष मेरा व प्रेरणा का ही है,’’ सुदीप तनिक नाराजगी से बोला. ‘‘ठीक है, फिर कुछ बोलते क्यों नहीं? तुम्हारा पक्ष सुनने के लिए ही मैं यहां आई हूं, वरना तुम से घर पर भी मिल सकती थी.’’

‘‘मैं कोई सफाई नहीं देना चाहता, न ही तुम से बीचबचाव की आशा रखता हूं. मैं केवल तुम से तटस्थता की उम्मीद करता हूं. मैं चाहूंगा कि तुम एक सप्ताह का अवकाश ले कर हमारे साथ आ कर रहो.’’ ‘‘पता नहीं तुम मुझ से कैसी तटस्थता की आशा लगाए बैठे हो. मां, भाईबहन आंसू बहाएं तो मैं कैसे तटस्थ रहूंगी?’’ ऋचा झुंझला गई.

‘‘हमें अकेला छोड़ दो, ऋचा. हम अपनी समस्याएं खुद सुलझा सकते हैं,’’ सुदीप ने अनुनय की. ‘‘अब तुम्हारे लिए अपनी सगी बहन पराई हो गई? मां ठीक ही कर रही थीं कि तुम बहुत बदल गए हो. प्रेरणा सचमुच तुम्हें उंगलियों पर नचा रही है.’’

‘‘ऋचा दीदी, प्रेरणा तो तुम्हारी सहेली है, तुम्हीं ने उस से मेरे विवाह की वकालत की थी. पर आज तुम भी मां के सुर में सुर मिला रही हो.’’ ‘‘यही तो रोना है, मैं ने सोचा था, वह मां को खुश रखेगी, हमारा घर खुशियों से भर जाएगा, पर हुआ उस का उलटा…’’

‘‘मैं कोई सफाई नहीं दूंगा, केवल एक प्रार्थना करूंगा कि तुम कुछ दिन हमारे साथ रहो, तभी तुम्हें वस्तुस्थिति का पता चलेगा.’’ ‘‘ठीक है. यदि तुम जोर देते हो तो मैं अक्षय से बात करूंगी,’’ ऋचा उठ खड़ी हुई.

‘‘तो कब आ रही हो हमारे यहां रहने?’’ सुदीप ने बिल देते हुए प्रश्न किया. ‘‘तुम्हारे यहां?’’ ऋचा हंस दी, ‘‘तो अब वह घर मेरा नहीं रहा क्या?’’

‘‘मैं तुम्हें शब्दजाल में उलझा भी लूं तो क्या. सत्य तो यही है कि अब तुम्हारा घर, तुम्हारा नहीं है,’’ सुदीप भी हंस दिया.

लगभग सप्ताहभर बाद ऋचा को सूटकेस व बैग समेत आते देख छोटी बहन सोनाली दूर से ही चिल्लाई, ‘‘अरे दीदी, क्या जीजाजी से झगड़ा हो गया?’’ ‘‘क्यों, बिना झगड़ा किए मैं अपने घर रहने नहीं आ सकती क्या? ले, नीनू को पकड़,’’ उस ने गोद में उठाए हुए अपने पुत्र की ओर संकेत किया.

सोनाली ने ऋचा की गोद से नीनू को लिया और बाहर की ओर भागी. ‘‘रुको, सोनाली, कहां जा रही हो?’’

‘‘अभी आ जाएगी, अपनी सहेलियों से नीनू को मिलवाएगी. उसे छोटे बच्चों से कितना प्यार है, तू तो जानती ही है,’’ मां ने ऋचा को गले लगाते हुए कहा. ‘‘लेकिन मां, अब सोनाली इतनी छोटी भी नहीं है जो इस तरह का व्यवहार करे.’’

‘‘चल, अंदर चल. इन छोटीछोटी बातों के लिए अपना खून मत जलाया कर. माना अभी सोनाली में बचपना है, एक बार विवाह हो गया तो अपनेआप जिम्मेदारी समझने लगेगी,’’ मां हाथ पकड़ कर ऋचा को अंदर लिवा ले गईं. ‘‘हां, विवाह की बात से याद आया, सोनाली कब तक बच्ची बनी रहेगी. नौकरी क्यों नहीं ढूंढ़ती. इस तरह विवाह में भी सहायता मिलेगी,’’ ऋचा बोली.

‘‘बहन का विवाह करना भैयाभाभी का कर्तव्य होता है, उन्हें क्यों नहीं समझाती? मेरी फूल सी बच्ची नौकरी कर के अपने लिए दहेज जुटाएगी?’’ मां बिफर उठीं. ‘‘मेरा यह मतलब नहीं था. पर आजकल अधिकतर लड़कियां नौकरी करने लगी हैं. ससुराल वाले भी कमाऊ वधू चाहते हैं. इन की दूर के रिश्ते की मौसी का लड़का आशीष बैंक में काम करता है, पर उसे कमाऊ बीवी चाहिए. वैसे भी, इस में इतना नाराज होने की क्या बात है? सोनाली काम करेगी तो उसे ?इधरउधर घूमने का समय नहीं मिलेगा. फिर अपना भी कुछ पैसा जमा कर लेगी. तुम्हें याद है न मां, पिताजी ने पढ़ाई समाप्त करते ही मुझे नौकरी करने की सलाह दी थी. वे हमेशा लड़कियों के स्वावलंबी होने पर जोर देते थे,’’ ऋचा बोली.

‘‘अरे दीदी, कैसी बातें कर रही हो, जरा सी बच्ची के कंधों पर नौकरी का बोझ डालना चाहती हो?’’ तभी सुदीप का स्वर सुन कर ऋचा चौंक कर मुड़ी. प्रेरणा व सुदीप न जाने कितनी देर से पीछे खड़े थे. सुदीप के स्वर का व्यंग्य उस से छिपा न रह सका. ‘‘बड़ी देर कर दी तुम दोनों ने?’’ ऋचा बोली.

‘‘ये दोनों तो रोज ऐसे ही आते हैं, अंधेरा होने के बाद.’’ ‘‘क्या करें, 6 साढ़े 6 तो बस से यहां तक पहुंचने में ही बज जाते हैं. फिर शिशुगृह से तन्मय को लेते हुए आते हैं, तो और 10-15 मिनट लग जाते हैं.’’

‘‘क्या? तन्मय को शिशुगृह में छोड़ कर जाती हो? घर में मां व सोनाली दोनों ही रहती हैं, क्या तुम्हें उन पर विश्वास नहीं है? जरा से बच्चे को परायों के भरोसे छोड़ जाती हो?’’ प्रेरणा बिना कुछ कहे तन्मय को गोद में ले कर रसोईघर में जा घुसी.

‘‘मां, तुम इन लोगों से कुछ कहती क्यों नहीं, जरा से बच्चे को शिशुगृह में डाल रखा है.’’ ‘‘मैं ने कहा है बेटी, मेरी दशा तो तुझ से छिपी नहीं है, हमेशा जोड़ों का दर्द, ऐसे में मुझ से तो तन्मय संभलता नहीं. सोनाली को तो तू जानती ही है, घर में टिकती ही कब है. कभी इस सहेली के यहां, तो कभी उस सहेली के यहां.’’

ऋचा कुछ क्षणों के लिए स्तब्ध बैठी रही. उसे लगा, उस के सामने उस की मां नहीं, कोई और स्त्री बैठी है. उस की मां के हृदय में तो प्यार का अथाह समुद्र लहलहाता था. वह इतनी तंगदिल कैसे हो गई.

तभी प्रेरणा चाय बना लाई. तन्मय भी अपना दूध का गिलास ले कर वहीं आ गया. अचानक ही ऋचा को लगा कि उसे आए आधे घंटे से भी ऊपर हो गया है, पर किसी ने पानी को भी नहीं पूछा. शायद सब प्रेरणा की ही प्रतीक्षा कर रहे थे. सोनाली तो नीनू को ले कर ऐसी अदृश्य हुई कि अभी तक घर नहीं लौटी थी. झटपट चाय पी कर प्रेरणा फिर रसोईघर में जा जुटी थी. ऋचा अपना कप रखने गई तो देखा, सिंक बरतनों से भरी पड़ी है और प्रेरणा जल्दीजल्दी बरतन साफ करने में लगी है.

‘‘यह क्या, आज कामवाली नहीं आई?’’ अनायास ही ऋचा के मुंह से निकला. ‘‘आजकल बड़े शहरों में आसानी से कामवाली कहां मिलती हैं. ऊपर से मांजी को किसी का काम पसंद भी नहीं आता. सुबह तो समय रहता ही नहीं, इसलिए सबकुछ शाम को ही निबटाना पड़ता है.’’

‘‘अच्छा, यह बता कि आज क्या पकेगा? मैं भोजन का प्रबंध करती हूं,’’ ऋचा ने कहा. ‘‘फ्रिज में देख लो, सब्जियां रखी हैं, जो खाना है, बना लेंगे.’’

‘‘क्या कहूं प्रेरणा, लगता है, मेरे आने से तो तेरा काम और बढ़ गया है.’’ ‘‘कैसी बातें कर रही है? सुदीप की बहन होने के साथ ही तू मेरी सब से प्यारी सहेली भी है, यह कैसे भूल गई, पगली. इतने दिनों बाद तुझे मेरी याद आई है तो मुझे बुरा लगेगा?’’ अनजाने ही प्रेरणा की आंखें छलछला आईं.

फ्रिज से सब्जियां निकाल कर काटने के लिए ऋचा मां के पास जा बैठी. ‘‘अरे, यह क्या, 4 दिनों के लिए मेरी बेटी मायके क्या आ गई, तुरंत ही सब्जियां पकड़ा दीं,’’ मां का पारा सातवें आसमान पर पहुंच गया.

‘‘ओह मां, किसी ने पकड़ाई नहीं हैं, मैं खुद सब्जियां ले कर आई हूं. खाली ही तो बैठी हूं, बातें करते हुए कट जाएंगी,’’ ऋचा ने बात पूरी नहीं की थी कि सुदीप ने आ कर उस के हाथ से थाली ले ली और कुरसी खींच कर वहीं बैठ कर सब्जियां काटने लगा. ‘‘यह बैठा है न जोरू का गुलाम, यह सब्जी काट देगा, खाना बना लेगा, तन्मय को नहलाधुला भी देगा. दिनरात पत्नी के चारों तरफ चक्कर लगाता रहेगा,’’ मां का व्यंग्य सुन कर सुदीप का चेहरा कस गया.

वह कोई कड़वा उत्तर देता, इस से पहले ही ऋचा बोल पड़ी, ‘‘तो क्या हुआ, अपने घर का काम ही तो कर रहा है,’’ उस ने हंस कर वातावरण को हलका बनाने का प्रयत्न किया. ‘‘जो जिस काम का है, उसी को शोभा देता है. सुदीप को तो मैं ने उस के पैर तक दबाते देखा है.’’

‘‘उस दिन बेचारी दर्द से तड़प रही थी, तेज बुखार था,’’ सुदीप ने धीरे से कहा. ‘‘फिर भी पति, पत्नी की सेवा करे, तोबातोबा,’’ मां ने कानों पर हाथ

रखते हुए आंखें मूंद कर अपने भाव प्रकट किए. ‘‘मां, अब वह जमाना नहीं रहा, पतिपत्नी एक ही गाड़ी के 2 पहियों की तरह मिल कर गृहस्थी चलाते हैं.’’

‘‘सब जानती हूं, हम ने भी खूब गृहस्थी चलाई है. तुम 4 भाईबहनों को पाला है और मेरी सास तिनका उठा कर इधर से उधर नहीं रखती थीं.’’ ‘‘इस में बुराई क्या है? अक्षय की मां तो घर व हमारा खूब खयाल रखती हैं.’’

‘‘ठीक है, रखती होंगी, पर मुझ से नहीं होता. पहले अपनी गृहस्थी में खटते रहे, अब बेटे की गृहस्थी में कोल्हू के बैल की तरह जुते रहें. हमें भी घूमनेफिरने, सैरसपाटे के लिए कुछ समय चाहिए कि नहीं? पर नहीं, बहूरानी का दिमाग सातवें आसमान पर रहता है, नौकरी जो करती हैं रानीजी,’’ मां ने बुरा सा मुंह बनाते हुए कहा. ‘‘यदि नौकरी करने वाली लड़की पसंद नहीं थी तो विवाह से पहले आप ने पहली शर्त यही क्यों नहीं रखी थी?’’ ऋचा ने मां को समझाना चाहा.

‘‘इस में भी हमारा ही दोष है? अरे, एक क्या तेरी भाभी ही नौकरी करती है? आजकल तो सभी लड़कियां नौकरी करती हैं, साथ ही घर भी संभालती हैं,’’ मां भला कब हार मानने वाली थीं. ऋचा चुप रह गई. उसे लगा, मां को कुछ भी समझाना असंभव है.

दूसरे दिन सुबह ही ऋचा भी तैयार हो गई तो प्रेरणा के आश्चर्य की सीमा न रही, ‘‘यह क्या, आज ही जा रही हो?’’

‘‘सोचती हूं, तुम लोगों के साथ ही निकल जाऊंगी. फिर कल से औफिस चली जाऊंगी…क्यों व्यर्थ में छुट्टियां बरबाद करूं. सोनाली के विवाह में तो छुट्टियां लेनी ही पड़ेंगी,’’

वह बोली. ‘‘तुम कहो तो मैं भी 2 दिनों की छुट्टियां ले लूं? आई हो तो रुक जाओ.’’

‘‘नहीं, अगली बार जब 3-4 दिनों की छुट्टियां होंगी, तभी आऊंगी. इस तरह तुम्हें भी छुट्टियां नहीं

लेनी पड़ेंगी.’’ ‘‘बेचारी एक दिन के लिए आई, लेकिन मेरी बेटी काम में ही जुटी रही. रुक कर भी क्या करे, जब यहां भी स्वयं ही पका कर खाना है तो,’’ मां ऋचा को इतनी जल्दी जाते देख अपना ही रोना रो रही थीं.

‘अब जो होना है, सो हो. मैं आई थी सुदीप व प्रेरणा को समझाने, पर किस मुंह से समझाऊं. प्रेम व सद्भाव की ताली क्या भला एक हाथ से बजती है?’ ऋचा सोच रही थी. ‘‘अच्छा, दीदी,’’ सुदीप ने बस से उतर कर उस के पैर छुए. प्रेरणा पहले ही उतर गई थी.

‘‘सुदीप, मुझे नहीं लगता कि तुम्हें उपदेश देने का मुझे कोई हक है. फिर भी देखना, सनी की नौकरी व सोनाली के विवाह तक साथ निभा सको तो…’’ कहती हुई ऋचा मुड़ गई. पर उसे लगा, मन जैसे बहुत भारी हो आया है, कहीं थोड़ा एकांत मिल जाए तो फूटफूट कर रो ले.

Hindi Story: उतावली – क्या कमी थी सारंगी के जीवन में

Hindi Story : ‘‘मैं क्या करती, उन से मेरा दुख देखा नहीं गया तो उन्होंने मेरी मांग में सिंदूर भर दिया.’’

सारंगी का यह संवाद सुन कर हतप्रभ सौम्या उस का मुंह ताकती रह गई. महीनेभर पहले विधवा हुई सारंगी उस की सहपाठिन थी.

सारंगी के पति की असामयिक मृत्यु एक रेल दुर्घटना में हुई थी.

सौम्या तो बड़ी मुश्किल से सारंगी का सामना करने का साहस जुटाती दुखी मन से उस के प्रति संवेदना और सहानुभूति व्यक्त करने आई थी. उलझन में थी कि कैसे उस का सामना करेगी और सांत्वना देगी. सारंगी की उम्र है ही कितनी और ऊपर से 3 अवयस्क बच्चों का दायित्व. लेकिन सारंगी को देख कर वह भौचक्की रह गई थी. सारंगी की मांग में चटख सिंदूर था, हथेलियों से कलाइयों तक रची मेहंदी, कलाइयों में ढेर सारी लाल चूडि़यां और गले में चमकता मंगलसूत्र. उसे अपनी आंखों पर विश्वास नहीं हुआ.

विश्वास होता भी कैसे. तीजत्योहार पर व्रतउपवास रखने वाली, हर मंदिरमूर्ति के सामने सिर झुकाने वाली व अंधभक्ति में लीन रहने वाली सारंगी को इस रूप में देखने की कल्पना उस के मन में नहीं थी. वह तो सोचती आई थी कि सारंगी सूनी मांग लिए, निपट उदास मिलेगी.

सारंगी की आंखों में जरा भी तरलता नहीं थी और न ही कोई चिंता. वह सदा सुहागन की तरह थी और उस के चेहरे पर दिग्विजयी खुशी फूट सी रही थी. सब कुछ अप्रत्याशित.

एक ही बस्ती की होने से सारंगी और सौम्या साथसाथ पढ़ने जाती थीं. दोनों का मन कुछ ऐसा मिला कि आपस में सहेलियों सा जुड़ाव हो गया था. सौम्या की तुलना में सारंगी अधिक यौवनभरी और सुंदर थी. उम्र में उस से एक साल बड़ी सारंगी, पढ़ाई में कमजोर होने के कारण वह परीक्षाओं में पास होने के लिए मंदिरों और देवस्थानों पर प्रसाद चढ़ाने की मनौती मानती रहती थी. सौम्या उस की मान्यताओं पर कभीकभी मखौल उड़ा देती थी. सारंगी किसी तरह इंटर पास कर सकी और बीए करतेकरते उस की शादी हो गई. दूर के एक कसबे में उस के पति का कबाड़ खरीदनेबेचने का कारोबार था.

शुरूशुरू में सारंगी का मायके आनाजाना ज्यादा रहा. जब आती तो गहनों से लद के सजीसंवरी रहती थी. खुशखुश सी दिखती थी.

एक दिन सौम्या ने पूछा था, ‘बहुत खुश हो?’

‘लगती हूं, बस’ असंतोष सा जाहिर करती हुई सारंगी ने कहा.

‘कोई कमी है क्या?’ सौम्या ने एकाएक तरल हो आई उस की आंखों में झांकते हुए पूछा.

‘पूछो मत,’ कह कर सारंगी ने निगाहें झुका लीं.

‘तुम्हारे गहने, कपड़े और शृंगार देख कर तो कोई भी समझेगा कि तुम सुखी हो, तुम्हारा पति तुम्हें बहुत प्यार करता है.’

‘बस, गहनों और कपड़ों का सुख.’

‘क्या?’

‘सच कहती हूं, सौम्या. उन्हें अपने कारोबार से फुरसत नहीं. बस, पैसा कमाने की धुन. अपने कबाड़खाने से देररात थके हुए लौटते हैं, खाएपिए और नशे में. 2 तरह का नशा उन पर रहता है, एक शराब का और दूसरा दौलत का. अकसर रात का खाना घर में नहीं खाते. घर में उन्हें बिस्तर दिखाई देता है और बिस्तर पर मैं, बस.’ सौम्या आश्चर्य से उस का मुंह देखती रही.

‘रोज की कहानी है यह. बिस्तर पर प्यार नहीं, नोट दिखाते हैं, मुड़ेतुड़े, गंदेशंदे. मुट्ठियों में भरभर कर. वे समझते हैं, प्यार जताने का शायद यही सब से अच्छा तरीका है. अपनी कमजोरी छिपाते हैं, लुंजपुंज से बने रहते हैं. मेरी भावनाओं से उन्हें कोई मतलब नहीं. मैं क्या चाहती हूं, इस से उन्हें कुछ लेनादेना नहीं.

‘मैं चाहती हूं, वे थोड़े जोशीले बनें और मुझे भरपूर प्यार करें. लेकिन यह उन के स्वभाव में नहीं या यह कह लो, उन में ऐसी कोईर् ताकत नहीं है. जल्दी खर्राटे ले कर सो जाना, सुबह देर से उठना और हड़बड़ी में अपने काम के ठिकाने पर चले जाना. घर जल्दी नहीं लौटना. यही उन की दिनचर्या है. उन का रोज नहानाधोना भी नहीं होता. कबाड़खाने की गंध उन के बदन में समाई रहती है.’

सारंगी ने एक और रहस्य खोला, ‘जानती हो, मेरे  मांबाप ने मेरी शादी उन्हें मुझे से 7-8 साल ही बड़ा समझ कर की थी लेकिन वे मुझ से 15 साल बड़े हैं. जल्दी ही बच्चे चाहते हैं, इसलिए कि बूढ़ा होने से पहले बच्चे सयाने हो जाएं और उन का कामधंधा संभाल लें. लेकिन अब क्या, जीवन तो उन्हीं के साथ काटना है. हंस कर काटो या रो कर.’

चेहरे पर अतृप्ति का भाव लिए सारंगी ने ठंडी सांस भरते हुए मजबूरी सी जाहिर की.

सौम्या उस समय वैवाहिक संबंधों की गूढ़ता से अनभिज्ञ थी. बस, सुनती रही. कोई सलाह या प्रतिक्रिया नहीं दे सकी थी.

समय बीता. सौम्या बीएड करने दूसरे शहर चली गई और बाहर ही नौकरी कर ली. उस का अपना शहर लगभग छूट सा गया. सारंगी से उस का कोई सीधा संबंध नहीं रहा. कुछ वर्षों बाद सारंगी से मुलाकात हुई तो वह 2 बच्चों की मां हो चुकी थी. बच्चों का नाम सौरभ और गौरव बताया, तीसरा होने को था परंतु उस के सजनेधजने में कोई कमी नहीं थी. बहुत खुश हो कर मिली थी. उस ने कहा था, ‘कभी हमारे यहां आओ. तुम जब यहां आती हो तो तुम्हारी बस हमारे घर के पास से गुजरती है. बसस्टैंड पर किसी से भी पूछ लो, कल्लू कबाड़ी को सब जानते हैं.’

‘कल्लू कबाड़ी?’

‘हां, कल्लू कबाड़ी, तेरे जीजा इसी नाम से जाने जाते हैं.’ ठट्ठा मार कर हंसते हुए उस ने बताया था.

सौम्या को लगा था कि वह अब सचमुच बहुत खुश है. कुछ समय बाद आतेजाते सौम्या को पता चला कि सारंगी के पति लकवा की बीमारी के शिकार हो गए हैं. लेकिन कुछ परिस्थितियां ऐसी थीं कि वह चाहते हुए भी उस से मिल न सकी.

लेकिन इस बार सौम्या अपनेआप को रोक न पाई थी. सारंगी के पति की अचानक मृत्यु के समाचार ने उसे बेचैन कर दिया था. वह चली आई. सोचा, उस से मिलते हुए दूसरी बस से अपने शहर को रवाना हो जाएगी.

बसस्टैंड पर पता करने पर एक दुकानदार ने एक बालक को ही साथ भेज दिया, जो उसे सारंगी के घर तक पहुंचा गया था. और यहां पहुंच कर उसे अलग ही नजारा देखने को मिला.

‘कौन है वह, जिस से सारंगी का वैधव्य देखा नहीं गया. कोई सच्चा हितैषी है या स्वार्थी?’ सनसनाता सा सवाल, सौम्या के मन में कौंध रहा था.

‘‘सब जान रहे हैं कि कल्लू कबाड़ी की मौत रेल दुर्घटना में हुई है लेकिन मैं स्वीकार करती हूं कि उन्होंने आत्महत्या की है. सुइसाइड नोट न लिखने के पीछे उन की जो भी मंशा रही हो, मैं नहीं जानती,’’ सारंगी की सपाट बयानी से अचंभित सौम्या को लगा कि उस की जिंदगी में बहुत उथलपुथलभरी है और वह बहुतकुछ कहना चाहती है.

सौम्या अपने आश्चर्य और उत्सुकता को छिपा न सकी. उस ने पूछ ही लिया, ‘‘ऐसा क्या?’’

‘‘हां सौम्या, ऐसा ही. तुम से मैं कुछ नहीं छिपाऊंगी. वे तो इस दुनिया में हैं नहीं और उन की बुराई भी मैं करना नहीं चाहती, लेकिन अगर सचाई तुम को न बताऊं तो तुम भी मुझे गलत समझोगी. विनय से मेरे विवाहेतर संबंध थे, यह मेरे पति जानते थे.’’

‘‘विनय कौन है?’’ सौम्या अपने को रोक न सकी.

‘‘विनय, उन के दोस्त थे और बिजनैसपार्टनर भी. जब उन्हें पैरालिसिस का अटैक हुआ तो विनय ने बहुत मदद की, डाक्टर के यहां ले जाना, दवादारू का इंतजाम करना, सब तरह से. विनय उन के बिजनैस को संभाले रहे. और मुझे भी. जब पति बीमार हुए थे, उस समय और उस के पहले से भी.’’

सौम्या टकटकी लगाए उस की बातें सुन रही थी.

‘‘जब सौरभ के पापा की शराबखोरी बढ़ने लगी तो वे धंधे पर ठीक से ध्यान नहीं दे पाते थे और स्वास्थ्य भी डगमगाने लगा. मैं ने उन्हें आगाह किया लेकिन कोई असर नहीं हुआ. एक दिन टोकने पर गालीगलौज करते हुए मारपीट पर उतारू हो गए तो मैं ने गुस्से में कह दिया कि अगर अपने को नहीं सुधार सकते तो मैं घर छोड़ कर चली जाऊंगी.’’

‘‘फिर भी कोई असर नहीं?’’ सौम्या ने सवाल कर दिया.

‘‘असर हुआ. असर यह हुआ कि वे डर गए कि सचमुच मैं कहीं उन्हें छोड़ कर न चली जाऊं. वे अपनी शारीरिक कमजोरी भी जानते थे. उन्होंने विनय को घर बुलाना शुरू कर दिया और हम दोनों को एकांत देने लगे. फिसलन भरी राह हो तो फिसलने का पूरा मौका रहता है. मैं फिसल गई. कुछ अनजाने में, कुछ जानबूझ कर. और फिसलती चली गई.’’

‘‘विनय को एतराज नहीं था?’’

‘‘उन की निगाहों में शुरू से ही मेरे लिए चाहत थी.’’

‘‘कितनी उम्र है विनय की?’’

‘‘उन से 2 साल छोटे हैं, परंतु देखने में उम्र का पता नहीं चलता.’’

‘‘और उन के बालबच्चे?’’

‘‘विधुर हैं. उन का एक बेटा है, शादीशुदा है और बाहर नौकरी करता है.’’

सौम्या ने ‘‘हूं’’ करते हुए पूछा, ‘‘तुम्हारे पति ने आत्महत्या क्यों की?’’

‘‘यह तो वे ही जानें. जहां तक मैं समझती हूं, उन में सहनशक्ति खत्म सी हो गई थी. पैरालिसिस के अटैक के बाद वे कुछ ठीक हुए और धीमेधीमे चलनेफिरने लगे थे. अपने काम पर भी जाने लगे लेकिन परेशान से रहने लगे थे. मुझे कुछ बताते नहीं थे. उन्हें डर सताने लगा था कि विनय ने बीवी पर तो कब्जा कर लिया है, कहीं बिजनैस भी पूरी तरह से न हथिया ले. एक बार विनय से उन की इसी बात पर कहासुनी भी हुई.’’

‘‘फिर?’’

‘‘फिर क्या, मुझे विनय ने बताया तो मैं ने उन से पूछा. अब मैं तुम्हें क्या बताऊं, सौम्या. कूवत कम, गुस्सा ज्यादा वाली बात. वे हत्थे से उखड़ गए और लगे मुझ पर लांछन लगाने कि मैं दुश्चरित्र हूं, कुल्टा हूं. मुझे भी गुस्सा आ गया. मैं ने भी कह दिया कि तुम्हारे में ताकत नहीं है कि तुम औरत को रख सको. अपने पौरुष पर की गई

चोट शायद वे सह न सके. बस, लज्जित हो कर घर से निकल गए. दोपहर में पता चला कि रेललाइन पर कटे हुए पड़े हैं.’’

बात खत्म करतेकरते सारंगी रो पड़ी. सौम्या ने उसे रोने दिया.

थोड़ी देर बाद पूछा, ‘‘और तुम ने शादी कब की?’’

‘‘विनय से मेरा दुख देखा नहीं जाता था, इसलिए एक दिन मेरी मांग…’’ इतना कह कर सारंगी चुप हो गई और मेहंदी लगी अपनी हथेलियों को फैला कर देखने लगी.

‘‘तुम्हारी मरजी से?’’

‘‘हां, सौम्या, मुझे और मेरे बच्चों को सहारे की जरूरत थी. मैं ने मौका नहीं जाने दिया. अब कोई भला कहे या बुरा. असल में वे बच्चे तीनों विनय के ही हैं.’’

कुछ क्षण को सौम्या चुप रह गई और सोचविचार करती सी लगी. ‘‘तुम ने जल्दबाजी की, मैं तुम्हें उतावली ही कहूंगी. अगर थोड़े समय के लिए धैर्य रखतीं तो शायद, कोई कुछ न कह पाता. जो बात इतने साल छिपा कर रखी थी, साल 2 साल और छिपा लेतीं,’’ कहते हुए सौम्या ने अपनी बायीं कलाई घुमाते हुए घड़ी देखी और उठ जाने को तत्पर हो गई. सारंगी से और कुछ कहने का कोई फायदा न था.

Family Story: मोहरा

Family Story: ‘काम का न काज का दुश्मन अनाज का. दूसरों के घरों की जूठन उठा कर, ?ाड़ूपोंछा कर के इस निकम्मे को पढ़ानालिखाना चाहा… सोचा कि अपने पैरों पर खड़ा हो जाएगा, चार पैसे कमाने लगेगा तो बुढ़ापा थोड़ा आराम से कटेगा, लेकिन नहीं, मेरी ऐसी किस्मत कहां…

‘जवानीभर इस के शराबी बाप के लिए कमाती रही, मरती, खटती, खपती रही और अब इस उम्र में इस निठल्ले, नालायक बेटे के लिए अपनी हड्डियां तोड़नी पड़ रही हैं. जब अपना ही सिक्का खोटा हो, तो किसी को क्या दोष देना…’

शक्कू बाई अपनी झोपड़ी के सामने बह रहे गंदे नाले से कुछ ही दूर पर बैठी अपने घर के बरतन मांजते हुए, बरतनों पर अपनी बेबसी व भड़ास निकालते हुए बड़बड़ा रही थी और शायद अपने एकलौते बेटे, जो 3 बेटियों के बाद जनमा था… जगेश्वर, जिसे बस्ती में जग्गू के नाम से जाना जाता है, को सुना रही थी.

शक्कू बाई जहां बैठी थी, वहां से कुछ ही दूर नगरपालिका के नल पर भारी भीड़ लगी हुई थी, चिल्लपों मची हुई थी. वैसे तो इस बस्ती का यह सीन कोई नया नहीं था, हर सुबह यह देखने को मिलता ही है.

ऐसा इसलिए है, क्योंकि तकरीबन 1,000 घरों और तकरीबन 6,000 लोगों की आबादी वाली इस बस्ती में केवल यही एकलौता नल है, जिस में हर रोज सुबह महज 2 घंटे के लिए ही पानी आता है. उस के बाद अगर किसी को पानी चाहिए, तो वह अगली सुबह तक का इंतजार करे या फिर बस्ती से तकरीबन
5 किलोमीटर दूर जा कर पानी लाए.

इस बस्ती में केवल पानी की ही किल्लत है, ऐसा नहीं है और भी कई छोटीबड़ी समस्याएं किसी दानव की तरह इस बस्ती में तब से हैं, जब से यह बस्ती वजूद में आई है.

चमचमाते हाईटैक महानगर में यह गंदी बस्ती कब से है, किसी को कुछ पता नहीं. कितनी सरकारें बदल गई हैं, पर इस बस्ती के हालात में कोई सुधार नहीं आया है. यहां रहने वाले कुछ बड़ेबूढ़े कहते हैं कि उन का जन्म ही इस बस्ती में हुआ है.

बुनियादी सहूलियतों की कमी में यहां जिंदगी हर सुबह कुरुक्षेत्र बन जाती है और यहां के रहवासी योद्धा. पेट की आग बुझाने के लिए, दो वक्त की रोटी जुटाने के लिए बस्ती के लोग सुबह होते ही अपनेअपने घरों से मेहनतमजदूरी के लिए निकल पड़ते हैं.

घर से निकलते समय बस्ती के ज्यादातर मर्दों को इस बात की कोई चिंता नहीं होती है कि उन के पीछे घर में जो बूढ़ेबुजुर्ग, बीमार, लाचार व छोटे बच्चे छूट जाते हैं, उन के लिए दिनभर के खानेपीने का क्या इंतजाम होगा… उन्हें तो बस इस बात की फिक्र होती है कि शाम को दारू की बोतल का जुगाड़ कैसे होगा…

लेकिन औरतें रूखेसूखे बासी खाने के इंतजाम के साथ बड़ी जद्दोजेहद के बाद पानी भर कर ही घर से बाहर अपने काम के लिए निकलती हैं.

बस्ती के ज्यादातर लोगों के पास पक्का रोजगार नहीं है. रोज कमाना, रोज खाना. जिस दिन काम न मिला, उस दिन भूखे ही सो जाना, यही उन की नियति बन चुकी है.

इतने उलट हालात में भी शक्कू बाई अपने बेटे जग्गू को पढ़ालिखा कर कुछ बनाना चाहती थी, उसे इस नरक से निकाल कर एक अच्छी जिंदगी देने का सपना अपनी आंखों में संजोए हुए थी.

जब तक जग्गू छोटा था, तब तक उसे भी स्कूल जाना अच्छा लगता था, क्योंकि वहां उसे मिड डे मील मिलता था, पर जैसेजैसे वह बड़ा होने लगा, वैसेवैसे हर दिन उस का सामना जिंदगी की कड़वी हकीकत के साथ होने लगा.

जग्गू जिस सरकारी स्कूल में पढ़ता था, वहां उस के साथ स्कूल में कुछ ऐसे ओबीसी बच्चे भी पढ़ते थे, जिन के मातापिता के पास थोड़े रुपएपैसे ज्यादा थे या यों समझ लें कि उन बच्चों के हालात जग्गू के हालात से थोड़े बेहतर थे. वे बच्चे जग्गू को परेशान करते थे. उसे उस की जाति के नाम से चिढ़ाते थे, उसे शर्मिंदा करते थे. उस के साथ न तो खेलते थे और न ही खाना खाते थे.

जग्गू अपने स्कूल व अपनी क्लास में खुद को अलगथलग पा कर अनदेखा महसूस करने लगा, उस के कोमल बाल मन में विद्रोह की भावना और कुंठा पनपने लगी. जग्गू को यह सम?ाने में ज्यादा समय भी नहीं लगा कि जिंदगी की राहें चुनौती से भरी हुई हैं, जहां रुपया ही सबकुछ है. रुपयों के बगैर न तो दो वक्त की रोटी मिलती है और न ही इज्जत.

जग्गू अपनी पढ़ाई छोड़ कर किसी कामधंधे में लग जाना चाहता था, लेकिन शक्कू बाई अपने बेटे को मेहनतमजदूरी के दलदल में धकेलना नहीं चाहती थी.

वह चाहती थी कि जग्गू पढ़लिख कर छोटीमोटी नौकरी कर ले, ताकि उस की आगे की जिंदगी बेहतर हो जाए और वह गरीबी, भुखमरी, बेइज्जती जैसे दानव के मुंह में जाने से बच जाए, लेकिन यह इतना आसान भी नहीं था.

जग्गू हर दिन अपना, अपनी जाति और अपने हालात का एक नए रूप में मजाक झेलता था. उस का मन लहूलुहान होने लगा था और फिर एक दिन उन बदमाश लड़कों ने मिल कर जग्गू से जबरदस्ती अपनी जूठन साफ करने के लिए मजबूर कर दिया. उस दिन के बाद से जग्गू ने स्कूल जाना ही छोड़ दिया.

स्कूल छोड़ने के बाद जग्गू काम की तलाश में सारा दिन यहांवहां भटकता रहता. नौकरी तो मिली नहीं, पर वर्तमान सरकार व कुछ जाति विशेष लोगों के प्रति गुस्से और विद्रोह की भावना जग्गू के भीतर जो सुलग रही थी, उस ने प्रचंड रूप ले लिया, जिस पर राजनीतिक दल व विपक्ष पार्टी के एक ओबीसी नेता ने जम कर घी डालने का काम किया. जग्गू गुमराह हो कर बरबाद होने की राह पर निकल पड़ा.

अब नौकरी तलाशना और कामधंधा ढूंढ़ने का विचार छोड़ कर जग्गू उन नेताजी के कहने पर अपने हक के लिए लड़नेमरने और मरनेमारने को तैयार था. जहां नेताजी कहते, चल पड़ता. कभी रैली, कभी धरना और कभी आम सभा. कभी चक्का जाम तो कभी शहर बंद कराने की मुहिम में.

जग्गू अपना कीमती समय और योगदान अपनी तरक्की में देने के बजाय इन्हीं सब कामों में देने लगा.

नेताजी भी अपना फायदा देखने और साधने में लगे रहे. कभी जग्गू से खुश हो कर नेताजी उसे कुछ रुपए दे देते, तो कभी शराब की बोतल थमा देते, जिसे पा कर जग्गू का सीना यह सोच कर चौड़ा हो जाता कि उस पर नेताजी का हाथ है.

ऊर्जावान नौजवानों को राह से भटकाना व उन की ऊर्जा का गलत इस्तेमाल अपनी पार्टी के फायदे के लिए कैसे करना है, यह हर पार्टी का नेता बखूबी जानता है. कभी आरक्षण, तो कभी जाति, कभी धर्म तो कभी बेरोजगारी के नाम पर जग्गू जैसे भोलेभाले नौजवानों को छला जाता है, उन्हें आसानी से निशाना बना लिया जाता है.

अब जग्गू भी एक राजनीतिक पार्टी के नेता के शिकंजे में था. जब से जग्गू ने यह रास्ता चुना है, शक्कू बाई उखड़ीउखड़ी व जग्गू से नाराज रहती है, क्योंकि यह उस का सपना नहीं है. वह तो अपने बेटे को इज्जत से छोटीमोटी नौकरी करते हुए देखना चाहती है, न कि किसी राजनीतिक पार्टी का मोहरा बने हुए.

आज सुबह जब से शक्कू बाई ने जग्गू को फोन पर यह कहते सुना है कि सरकार के प्रति विरोध प्रदर्शन करने के लिए शहर के मध्य नगरी चौक पर चक्का जाम करना है, तब से शक्कू बाई का पारा चढ़ा हुआ है और वह सुबह से ही जग्गू पर अपना गुस्सा दिखाते हुए बड़बड़ा रही है.

शक्कू बाई को बरतन साफ करते हुए यों बड़बड़ाता सुन कर जग्गू बोला, ‘‘अरे अम्मां, क्या तू सुबह से ही चिकचिक शुरू कर देती है. आज पढ़लिख कर भी हर नौजवान बेरोजगार, निठल्ला बैठा है.

‘‘मेरे पास कोई कामधंधा नहीं है, इस के लिए मैं नहीं, बल्कि यह सरकार जिम्मेदार है. वह चाहती है कि हमें नौकरी न मिले और हम यों ही सड़ते रहें. सरकार हमें अपने वोट बैंक के अलावा कुछ नहीं समझती.’’

इतना कह कर जग्गू गुस्से में वहां से चला गया. शक्कू बाई उसे समझाना चाहती थी कि धरना देने, चक्का जाम करने, दंगा करने या प्रदर्शन करने से उसे नौकरी नहीं मिलेगी, बल्कि उस के लिए कड़ी मेहनत व सब्र की जरूरत पड़ती है. इतनी साधारण सी बात अनपढ़ शक्कू बाई समझ रही थी, लेकिन जग्गू नहीं, क्योंकि उस की आंखों में विरोधी पार्टी के नेताजी ने काला चश्मा पहना रखा था.

आज शहर के सब से ज्यादा भीड़भाड़ वाले चौक में चक्का जाम व प्रदर्शन जग्गू की अगुआई में होने वाला था. जग्गू अपने दोस्तों, बस्ती व शहर के बेरोजगार नौजवानों के साथ और नेताजी द्वारा बहकाए गए सभी लड़कों को इकट्ठा कर शहर के मध्य नगरी चौक पर पहुंच गया. ?

नारेबाजी के साथ चक्का जाम व प्रदर्शन शुरू हुआ. इस दौरान वहां पुलिस का जत्था आ पहुंचा और उन्हें रोकने की कोशिश करने लगा. देखते ही देखते प्रदर्शन विकराल व विनाशक रूप में बदल गया. आगजनी, लूटपाट व तोड़फोड़ तेजी से बढ़ने लगी और फिर पुलिस द्वारा लाठीचार्ज और गिरफ्तारी का सिलसिला शुरू हो गया.

जग्गू के माथे पर चोट लग गई और वह घायल हो गया. पुलिस ने उसे शहर की शांति भंग करने, दंगा करने और बिना इजाजत प्रदर्शन करने के आरोप में हिरासत में ले लिया.

जब यह खबर शक्कू बाई तक पहुंची, तो वह दौड़ती हुई पहले अस्पताल, फिर पुलिस स्टेशन और आखिर में उन नेताजी के पास पहुंची, जिन के इशारे पर जग्गू यह सब कर रहा था.

शक्कू बाई जब मदद की गुहार ले कर नेताजी के बंगले पर पहुंची, तो नेताजी ने शक्कू बाई से मिलने से साफ इनकार कर दिया और अपने नौकर से यह कहलवा भेजा कि वह किसी जग्गू या जगेश्वर को नहीं जानते और न ही उन्होंने चक्का जाम या कोई प्रदर्शन के लिए किसी को कहा है.

शक्कू बाई यहांवहां मदद के लिए भटकती रही, लेकिन कोई सामने नहीं आया और जग्गू को जेल हो गई.

जग्गू के जेल जाने के साथ ही शक्कू बाई का अपने बेटे को कुछ अच्छा करते हुए, नौकरी करते हुए देखने का सपना भी आंखों से पानी बन कर बह गया.

एक राजनीतिक पार्टी का मोहरा बन चुका जग्गू जेल जाने और शक्कू बाई के द्वारा उसे सारी हकीकत से रूबरू कराने के बावजूद इसी उम्मीद में है कि नेताजी उसे बहुत जल्दी इस मुसीबत से बाहर निकल लेंगे.

Hindi Story: मेहनत का फल

Hindi Story: घर आते ही सलीम सिर पकड़ कर पलंग पर बैठ गया. उस के चेहरे की हालत देख कर सईदा का माथा ठनका. उस की हालत बता रही थी कि कोई ऐसी बात जरूर हुई है, जिस ने उसे परेशान कर दिया है.

‘‘क्या बात है, बहुत परेशान दिखाई दे रहे हो?’’ सईदा सलीम की बगल में जा बैठी और धीरे से बोली.

बीवी की आवाज सुन कर सलीम चौंका. उस ने उसे देखा और बोला, ‘‘ऐसा लगता है, परेशानियां हमारा पीछा नहीं छोड़ेंगी.’’

‘‘क्या मतलब? बात क्या है? आप बताते क्यों नहीं?’’ यह सुन कर सईदा भी परेशान हो गई.

‘‘और क्या हो सकता है… काम से निकाल दिया गया हूं,’’ सलीम ने कहा, तो निकाले जाने की वजह पूछने की सईदा की हिम्मत ही नहीं हुई.

साल में यह तीसरा मौका था, जब सलीम काम से निकाला गया था. दरअसल, सईदा को लगता था कि अगर सलीम ऐसे ही नौकरी में रहा तो उम्रभर उस के साथ यही होता रहेगा.

सलीम शादी से पहले ही छोटीबड़ी दुकानों में काम करता था. वह अपने काम में होशियार था. मालिक भी उस के काम से बहुत खुश रहता था, पर इस के बावजूद किसी भी छोटीमोटी भूल पर कभीकभी बिना वजह ही उसे काम से निकाल दिया जाता था. इस में सलीम का कोई कुसूर नहीं होता था, कुसूर होता था मालिक की नीयत का.

मालिकों को यह डर रहता था कि एक खास मुद्दत तक काम करने के बाद सलीम पक्का मुलाजिम बन जाएगा और फिर उसे पक्की नौकरी की सारी सहूलियतें देनी पड़ेंगी, इसलिए इस मुसीबत को गले बांधने से पहले ही उसे काम से निकाल दिया जाता था.

मालिकों के दिल में यह डर सलीम की लियाकत और पढ़ाई को देख कर पैदा होता था. उन्हें लगता था कि कम पढ़ेलिखे आदमी को अगर वे 10 साल तक अपने यहां नौकर रखें और सारी सहूलियतें न भी दें, तब भी वह उन का कुछ नहीं बिगाड़ पाएगा. पर सलीम के मामले में ऐसा मुमकिन नहीं था, यह सोच कर वे उसे पक्का होने से पहले ही निकाल देते थे.

‘‘ठीक है…’’ सईदा ने प्यार से सलीम के बालों में हाथ फेरते हुए कहा, ‘‘अब चिंता छोडि़ए… जो होना है, वही होगा. हर बार जो हुआ, इस बार भी वही होगा, इसलिए चिंता करने की क्या जरूरत है. चलिए, खाना खा लीजिए.’’

बीवी सईदा की बात सुन कर सलीम उठा और हाथ धोने के लिए चला गया.

हर बार कोई अलग बात नहीं होती थी. हफ्ता 10 दिन या कभीकभी एकाध महीना सलीम को बेकार रहना पड़ता था, फिर नया काम ढूंढ़ना पड़ता था. काम मिल ही जाता था.

इस बात को एक हफ्ता हो गया था. रोज सवेरे नौकरी की तलाश में सलीम बाहर जाता और शाम को थकहार कर वापस आ जाता.

‘‘एक बात कहूं,’’ एक दिन सईदा सलीम से बोली.

‘‘हां, बोलो.’’

‘‘ऐसा कब तक चलता रहेगा? जोकुछ आप के साथ होता है, लगता है कि उम्रभर होता रहेगा. आखिर इस नौकरीनुमा गुलामी से क्या फायदा, जिस में हर पल नौकरी जाने का डर बना रहता है. आप ऐसा कोई काम क्यों नहीं करते, जो गुलामी की जंजीरों को हमेशा के लिए तोड़ दे और हमारे मन से ऐसा डर भी निकाल दे?’’

‘‘ऐसा क्या काम हो सकता है?’’

‘‘आप अपना ही कोई छोटामोटा कारोबार शुरू कर दो.’’

‘‘कारोबार शुरू करने के लिए हमारे पास पैसे कहां हैं?’’ सलीम सईदा की आंखों में झांकने लगा.

‘‘पैसे तो नहीं हैं, पर 15-20 हजार रुपए में भी तो काम शुरू किया जा सकता है.’’

‘‘ऐसा कौन सा धंधा हो सकता है?’’

‘‘आप कपड़ों की दुकानों पर काम कर चुके हैं. आप को तो यह अच्छी तरह मालूम है.’’

‘‘हां,’’ सलीम ने कुछ सोचते हुए सईदा से कहा.

‘‘अगर आप कटपीस कपड़े ला कर बेचें, तो उस में हमें इतने पैसे मिल जाया करेंगे कि हमारी गुजरबसर हो जाए…’’

‘‘खयाल बुरा नहीं है. पर कपड़े बेचेंगे कहां? कोई दुकान तो नहीं है…’’

‘‘धंधा फुटपाथ से भी शुरू किया जा सकता है.’’

सईदा की बात सुन कर सलीम सोच में डूब गया.

दूसरे दिन सलीम एक ऐसी दुकान पर पहुंचा, जहां कमीजों के कटपीस मिलते थे. 10,000 रुपयों में अच्छाखासा कपड़ा आ गया. उसे 60 रुपया प्रति टुकड़ा पड़ा था. शाम को एक भीड़ भरे रास्ते के किनारे वह दुकान लगा कर बैठ गया.

‘‘100 रुपए में कमीज का कपड़ा है भाई, 100 रुपए में,’’ सलीम आवाज लगाता रहा.

सलीम की आवाज सुन कर आनेजाने वाले रुकते और कपड़े देखते. पसंद नहीं आता तो आगे बढ़ जाते. पसंद आता तो मोलभाव करने लगते. पर वह अपनी कीमत पर अड़ा रहता, तो ग्राहक पैसा दे कर कपड़ा ले लेते.

रात को जब सलीम कपड़ों की गठरी उठा कर आया, तो सईदा उसे देख कर हैरान रह गई, ‘‘यह सब क्या है?’’

‘‘तुम ने जो रास्ता बताया था, उसी पर चल रहा हूं. अपना छोटा सा धंधा शुरू कर दिया है… और यह आज की कमाई,’’ कहते हुए उस ने 500 रुपए सईदा के हाथ में रख दिए.

‘‘500 रुपए,’’ सईदा हैरानी से बोली.

‘‘जी हां…’’ सलीम हंस कर बोला, ‘‘शुरुआत तो अच्छी है, आगे देखो…’’

दूसरे दिन जब सलीम उसी जगह पर दुकान लगाने लगा, तो एक आदमी ने रोक दिया, ‘‘तू इधर दुकान नहीं लगा सकता.’’

‘‘क्यों?’’ सलीम ने पूछा.

‘‘इधर मेरी दुकान लगती है.’’

‘‘तुम्हारी दुकान यहां नहीं, सामने लगती है.’’

‘‘मतलब वही है. एक जगह 2 दुकानें नहीं लग सकतीं.’’

‘‘एक जगह 10 दुकानें भी लग सकती हैं… ग्राहक माल उसी दुकान से खरीदेगा, जहां उसे पसंद आएगा या सस्ता मिलेगा.’’

‘‘तू जाता है यहां से या मजा चखाऊं,’’ वह आदमी हाथापाई पर उतर आया. सलीम को भी गुस्सा आ गया. मारपीट में दोनों को चोंटें लगीं. राह चलते लोगों ने बीचबचाव किया. सामने वाला कमजोर पड़ रहा था, इसलिए यह कहता हुआ चला गया, ‘‘मैं तुझे देख लूंगा.’’

उस दिन भी सलीम ने 400 रुपए कमाए. पर उसे यह अच्छा नहीं लगा कि उसे इस काम के लिए किसी से झगड़ा करना पड़ा.

दूसरे दिन जब सलीम दुकान लगाने लगा, तो एक दादा किस्म के आदमी ने उसे रोक दिया, ‘‘तू यहां दुकान नहीं लगाएगा.’’

‘‘क्यों, आप को क्या परेशानी है?’’

‘‘बोल दिया न… यहां दुकान नहीं लगाएगा का मतलब है… नहीं लगाएगा. यह मंगल दादा का हुक्म है. यहां पहले से अपना एक आदमी दुकान लगाता है. तू बहुत दादा बनता है क्या? हमारे आदमी को धमकी देता है… इस शहर में रहना है या नहीं?’’

‘‘लेकिन मंगल दादा, मेरी दुकान लगाने से उस के धंधे पर कोई…’’

‘‘फिर होशियारी बताई,’’ कहते हुए मंगल ने उसे एक घूंसा लगाया, तो उसे भी गुस्सा आ गया. उस ने भी मंगल दादा को घूंसा लगा दिया. मार खा कर मंगल दादा को गुस्सा आ गया. वह उस पर टूट पड़ा.

सलीम ने भी बराबरी का जवाब दिया. मंगल दादा कमजोर पड़ जाता, लेकिन उस के 4-5 साथी आ गए और वे सब उस से उलझ गए.

सलीम को बुरी तरह चोटें आईं.

‘‘जा, आज तुझे माफ कर दिया… अब जिंदगी में मंगल के मुंह नहीं लगना,’’ कहता हुआ वह चला गया.
सलीम कराहता हुआ घर आया. उस की हालत देख कर सईदा रोने लगी, ‘‘इस सब की जिम्मेदार मैं ही हूं. मैं ने ही आप को यह धंधा शुरू करने की सलाह दी थी.’’

2 दिन तक सलीम घर से बाहर नहीं निकल सका. दोस्त, रिश्तेदार मिलने आते तो सलीम को सारी कहानी सुनानी पड़ती.

‘‘क्या मंगल दादा और उस के साथियों ने आप को मारा?’’ सलीम के साले फारुख ने सुना, तो गुस्से से बोला,’’ मैं उसे देखता हूं… जो हुआ, भूल जाइए. आप फिर दुकान लगाइए. कोई भी आप को नहीं रोकेगा.’’

तीसरे दिन सलीम फिर वहां पहुंच गया और दुकान लगा दी.

थोड़ी देर बाद मंगल दादा आया और बोला, ‘‘अरे सलीम भाई, आप ने पहले क्यों नहीं बताया कि आप फारुख के जीजा हैं, वरना बात यहां तक पहुंचती ही नहीं. मैं ने जोकुछ किया, उस की माफी चाहता हूं.

‘‘फारुख मेरा बचपन का दोस्त है. मेरी वजह से फारुख के जीजा को दुख हुआ, मेरे लिए यह बड़े शर्म की बात है. आज के बाद कोई भी आप की ओर आंख उठा कर नहीं देखेगा. मैं ने उस आदमी को भी भगा दिया है, जो पहले वहां दुकान लगाता था.’’

‘‘नहीं दादा, उसे मत भगाइए… उसे भी धंधा करने दीजिए.’’ सलीम बोला.

अब सलीम का धंधा खूब चलने लगा. उसे अच्छी आमदनी होने लगी. जितनी तनख्वाह उसे नौकरी से मिलती थी, उतनी तो वह कभीकभी 7-8 दिन में ही कमा लेता था.

एक दिन नगरपालिका की गाड़ी आई और सलीम का सामान उठा कर ले गई.

फुटपाथ पर दुकान लगाने का जुर्माना भी अदा करना पड़ा और उस का आधा माल ही वापस मिल सका.

उस के बाद तो हफ्ते में एकाध बार नगरपालिका की गाड़ी जरूर आती और सड़क के किनारे लगी दुकानों को उठा ले जाती. गाड़ी के आते ही जो दुकानदार अपनी दुकानें ले कर भाग जाते, वे बच जाते, वरना सारा माल नगरपालिका वाले उठा ले जाते.

कभी सलीम गाड़ी के आते ही अपनी दुकान का माल उठा कर भाग जाता और कभी उस का माल पकड़ा जाता, जिस से उसे काफी नुकसान उठाना पड़ता.

इस नई मुसीबत से वह काफी परेशान हो गया था. डर यहां भी बना हुआ था. पूरी हिफाजत तो उसे दुकान ही दे सकती थी और दुकान किराए पर लेने और पगड़ी वगैरह देने के लिए उस के पास 40-50 हजार रुपए नहीं थे.

सलीम जहां दुकान लगाता था, उस के पास ही एक पान की दुकान थी, जो अशोक नामक एक आदमी की थी. आसपास और भी पान की दुकानें थीं, इसलिए उस का धंधा नहीं होता था.

अशोक अकसर ही सलीम से कहता था, ‘‘बस, अब बहुत हो गया सलीम भाई, मैं यह दुकान किसी और को किराए पर दे देता हूं और कोई धंधा शुरू करता हूं… यह तो चलती ही नहीं.’’

अशोक की बात सुन कर एक बात सलीम के दिमाग में आई. अगर वह इस दुकान को किराए कर ले ले, तो छोटी सी ही सही, वह यहां भी कपड़े की दुकान डाल सकता है. इस तरह नगरपालिका वालों की ओर से जो डर बना रहता है, उस से भी छुटकारा मिल जाएगा.

सलीम ने अशोक से बात की, तो वह 20,000 रुपए पगड़ी और 1,000 रुपए महीना किराए पर दुकान देने को तैयार हो गया.

सलीम के पास इतने पैसे तो नहीं थे, पर जब यह बात सईदा को मालूम हुई, तो उस ने अपने जेवर उसे दे दिए, ‘‘आप इन्हें बैंक में रख कर कर्ज उठा लीजिए और किसी भी तरह उस दुकान को किराए पर ले लीजिए.’’

आखिर सलीम ने वह दुकान किराए पर ले ही ली. थोड़ी सी रद्दोबदल के बाद उस ने कपड़े की अपनी छोटी सी दुकान शुरू कर दी.

दुकान के बाहर सलीम कटपीस रखता था और अंदर थान. वह वाजिब दाम लेता था. जब लोगों को मालूम हुआ कि उस के पास दूसरी दुकानों से काफी सस्ते कपड़े मिलते हैं, तो लोग उसी से कपड़े खरीदने लगे. इस तरह उस का धंधा खूब चल निकला. दुकान पर हमेशा भीड़ सी लगी रहती.

शहर में कपड़े सस्ते दामों पर कहां मिलते हैं, सलीम को यह बखूबी पता था. पर साथ ही साथ वह सीधे मिलों से भी कपड़ा मंगवाने लगा.

थोक दुकानदारों से भी सलीम की अच्छीखासी जानपहचान हो गई थी, इसलिए कभीकभी वे उसे उधारी पर भी माल दे देते थे. धंधा अच्छा होता था, इसलिए उसे पैसों की कमी भी महसूस नहीं होती थी. जितने का धंधा होता था, वह उतने ही पैसों का और माल ले आता था.

सलीम का धंधा बढ़ता जा रहा था. मिलने वाला मुनाफा भी धंधे में लग रहा था, इसलिए पैसा भी बढ़ता जा रहा था. अब उसे इस बात का अहसास हो रहा था कि अब उसे बड़ी दुकान ले लेनी चाहिए. उस का नाम भी हो गया था और लोग उस पर इतना यकीन भी करने लगे थे.

सलीम की दुकान के पास ही एक दुकान खाली हुई थी, पर मालिक 50,000 रुपए पगड़ी के मांग रहा था. सलीम के पास इतने पैसे नहीं थे. पर उतने पैसों से ज्यादा का माल उस के पास था. वह सोचने लगा कि अगर वह माल बेच कर उन पैसों से पगड़ी दे दे, तो दुकान में माल नहीं रहेगा, वह खालीखाली दिखाई देगी.

आखिर में सलीम ने यही फैसला किया कि माल तो बाद में भी भरा जा सकता है. पर इस वक्त जो दुकान मिल रही है, वह बाद में नहीं मिल सकती. उस ने नया माल खरीदना बंद कर दिया और पैसे जमा करने शुरू कर दिए. जब 50,000 रुपए जमा हो गए, तो उस ने दुकान किराए पर ले ली.

दुकान को सजाने में भी 10,000 रुपए लग गए, पर उस का धंधा पहले की तरह चल रहा था, इसलिए उसे पैसों की कमी महसूस नहीं हो रही थी.

नई दुकान इतनी बड़ी थी कि कई लाख रुपए का माल भरने के बाद वह खालीखाली दिखाई दे, जबकि सलीम चाहता था कि जब वह यह दुकान शुरू करे तो वह भरी हुई हो, इसलिए वह दुकान शुरू करने में हिचकिचा रहा था. पर ऐसे मौके पर थोक दुकानदारों ने उस का साथ दिया, उस की खूब मदद की.
अब सलीम अकेले नहीं संभाल सकता था, इसलिए उस ने 2 नौकर भी रख लिए.

आखिर वह दिन भी आ ही गया, जिस दिन सलीम की दुकान का उद्घाटन था. उस के पुराने ग्राहकों ने भी साथ दिया. उन्हें सलीम पर यकीन था कि वह सस्ता और अच्छा कपड़ा ही बेचेगा, इसलिए उसी की दुकान से कपड़ा खरीदने लगे.

सलीम ने भी उन के यकीन को कायम रखा था. उस की दुकान उसी तरह से चलने लगी, जैसे शहर की दूसरी बड़ीबड़ी दुकानें चलती थीं.

काउंटर पर बैठा सलीम कभी ग्राहकों को देखता तो कभी अपने नौकरों को, जो ग्राहकों को कपड़े दिखा रहे होते थे. तब उसे बीते दिन याद आते थे, जब वह भी उन्हीं की तरह एक नौकर था और हर 3-4 महीनों के बाद काम से निकाल दिया जाता था.

पर सईदा ने सलीम को एक राह दिखाई. उस ने भी उस राह पर चलने की ठानी और उस के लिए मेहनत करनी शुरू कर दी. उस की मेहनत का ही यह फल था कि वह मालिक के रूप में उस दुकान में बैठा था.

लेखक – एम. मुबीन

Hindi Story: पहली तारीख – रेखा अपने पति के सरप्राइज से क्यों हैरान हो गई?

Hindi Story: डोरबैल बजी तो रेखा ने दरवाजा खोला. न्यूजपेपर वाला हाथ में पेपर लिए किसी से फोन पर बात कर रहा था. रेखा ने उस के हाथ से अखबार ले दरवाजा बंद किया ही था कि फिर से डोरबैल बजी. जैसे ही रेखा ने दरवाजा खोला तो अखबार वाला बोला, ‘‘मैडम, यह हिंदी का अखबार. आप के घर हिंदी और अंगरेजी 2 पेपर आते हैं.’’

‘‘अरे, फिर तभी क्यों नहीं दे दिया?’’

‘‘जब तक देता, आप ने दरवाजा ही बंद कर दिया,’’ अखबार वाला बोला.

‘‘अच्छा, ठीक है,’’ कह रेखा ने अखबार ले कर दरवाजा बंद कर दिया. तभी विपुल यानी रेखा के पति का शोर सुनाई दिया.

‘‘अरे भई कहां हो?’’ रेखा के पति विपुल की आवाज आई.

तभी डोरबैल भी बजती है. रेखा परेशान सी दरवाजा खोलने चल दी. दरवाजा खोला तो सामने वही अखबार वाला खड़ा था. अब रेखा ने गुस्से से पूछा, ‘‘अब क्या है?’’

‘‘मैडम, वह अखबार का बिल,’’ अखबार वाला बोला.

‘‘पहले नहीं दे सकते थे?’’ गुस्से से कह रेखा ने दरवाजा बंद कर दिया.

उधर विपुल आवाज पर आवाज लगाए जा रहा था, ‘‘रेखा, तौलिया तो दे दो, मैं नहा चुका हूं. कब से आवाजें लगा रहा हूं.’’

रेखा ने तौलिया पकड़ाया ही था कि फिर से डोरबैल बजी. दरवाजा खोलते ही रेखा गुस्से में चीखी, ‘‘क्यों बारबार बैल बजा रहे हो?’’

‘‘मैडम, यह गृहशोभा.’’

‘‘नहीं चाहिए,’’ कह रेखा दरवाजा बंद करने लगी.

तभी अखबार वाला बोला, ‘‘अरे, आप ने ही तो कल मैगजीन लाने को बोला था.’’

‘‘क्या ये सब काम एक बार में नहीं कर सकते?’’ कह रेखा ने जोर से दरवाजा बंद कर दिया.

‘‘इतनी देर लगती है क्या तौलिया देने में?’’ विपुल बोला.

‘‘मैं क्या करती, घंटी पर घंटी बजाए जा रहा था, तुम्हारा पेपर वाला.’’

‘‘लगता है तुम्हें पसंद करता है,’’ विपुल हंसते हुए बोला.

‘‘विपुल, मैं मजाक के मूड में नहीं हूं.’’

तभी फिर डोरबैल बजती है. रेखा गुस्से से दरवाजा खोल कर बोली, ‘‘अब क्या है?’’

सामने दूध वाला था. बोला, ‘‘मैडम दूध.’’

रेखा ने थोड़ा शांत हो दूध ले लिया.

‘‘अरे भई नाश्ता लगाओ. देर हो रही है. औफिस जाना है,’’ विपुल की आवाज आई.

रेखा आंखें तरेरते हुए विपुल को देख किचन में चली गई. विपुल किसी से फोन पर बात कर रहा था.

फिर डोरबैल बजी. रेखा ने झल्लाते हुए दरवाजा खोला.

‘‘मैडम, दूध का बिल,’’ दूध वाला बोला.

‘‘क्या परेशानी है तुम सब को? क्या यह बिल दूध के साथ नहीं दे सकते थे?’’ गुस्से में बोल रेखा ने बिल ले लिया.

‘‘क्या खिला रही हो नाश्ते में?’’ विपुल बोला.

रेखा बोली, ‘‘अपना सिर… घंटी पर घंटी बज रही… ऐसे में क्या बन सकता है? ब्रैडबटर से काम चला लो.’’

‘‘अरे, तुम्हारे हाथों से तो हम जहर भी खा लेंगे,’’ विपुल ने कहा.

‘‘देखो, मैं इतनी भी बुरी नहीं हूं,’’ रेखा बोली.

तभी फिर से डोरबैल बज उठी. रेखा गुस्से से बोली, ‘‘विपुल, दरवाजा खोलो… फिर मत कहना मुझे औफिस को देर हो रही है.’’

विपुल ने फोन पर बात करते हुए ही दरवाजा खोला. दूध वाला ही खड़ा था.

दूध वाला बोला, ‘‘साहब, हम कल दूध देने नहीं आएंगे.’’

‘‘जब दूध दिया था तब नहीं बता सकते थे?’’ विपुल ने डांटा.

‘‘सर, भूल गया था.’’

विपुल औफिस चला गया. औफिस पहुंच कर उस ने रेखा को फोन किया. तभी फिर घंटी बज उठी. रेखा जब दरवाजा खोलने पर पेपर वाले को देखती है, तो उस का गुस्सा 7वें आसमान को छू जाता है. विपुल फोन लाइन पर ही था. अत: बोला, ‘‘अरे, रेखा अब कौन है?’’

‘‘वही तुम्हारा पेपर वाला.’’

‘‘यह क्या बना रखा है… क्या सारा दिन दरवाजे पर ही बैठे रहें एक चौकीदार की तरह?’’

‘‘अब क्या लेने आए हो?’’ रेखा तमतमाते हुए बोली.

‘‘सुबह के 50 दे दो… फिर से नहीं आऊंगा,’’ पेपर वाला बोला.

‘‘कोई 50 नहीं मिलेंगे. चले जाओ यहां से,’’ रेखा ने कहा.

इस बीच फोन कट गया था. वह नहाने जा ही रही थी कि फिर से डोरबैल की आवाज पर भिन्ना गई. दरवाजा खोला तो सामने केबल वाला खड़ा था.

‘‘मैडम, केबल का बिल,’’ वह बोला.

‘‘कुछ और देना है तो वह भी दे दो.’’

‘‘मैडम, समझा नहीं,’’ वह बोला.

‘‘कुछ नहीं,’’ रेखा ने जोर से दरवाजा बंद कर दिया और फिर नहाने चली गई.

तभी उसे कुछ शोर सुनाई देता है. ध्यान से सुनने पर, ‘मैडमजी, मैडमजी,’ एक लड़की की आवाज सुनाई दी.

नहा कर दरवाजा खोला तो सामने नौकरानी की लड़की खड़ी थी.

रेखा ने पूछा, ‘‘क्या चाहिए?’’

‘‘मैडमजी, मम्मी आज काम पर नहीं आएंगी. शाम को जिस औफिस में सफाई करती हैं, वहां पगार लेने गई हैं… वहां लंबी लाइन लगी है.’’

रेखा गुस्से में बोली, ‘‘अच्छाअच्छा, ठीक है.’’

‘इसे भी आज ही…’ रेखा मन ही मन बड़बड़ाई और फिर सोचने लगी कि आज खाने में बनेगा क्या… इतनी देर हो गई है… घड़ी की तरफ देखा 1 बज चुका था. अभी सोच ही रही थी कि फिर घंटी बजी. वह चुपचाप यह सोच बैठी रही कि अब दरवाजा नहीं खोलेगी. 2… 3… 4… बार घंटी बजी पर वह नहीं उठी.

तभी फोन बजा. विपुल बोला, ‘‘अरे भई, क्या हम यहीं खड़े रहेंगे… दरवाजा तो खोलो.’’

रेखा मन ही मन सोचती कि इतनी जल्दी कैसे आ गए? क्या बात है? फिर जल्दी से दरवाजा खोला.

‘‘क्या मैं अंदर आ सकता हूं?’’ विपुल बोला.

‘‘अरे, आप इतनी जल्दी कैसे आ गए?’’

‘‘कैसे आ गए. तुम सुबह से परेशान थीं. सोचा, चलो आज लंच बाहर ही करते हैं.’’

रेखा सवाल भरी निगाहों से विपुल की तरफ देखने लगी तो वह बोला, ‘‘अरे बावली, आज पहली तारीख है.’’

Short Story: रहने दो रिपोर्टर

अतीत के काले पन्नों को भूल कर विमल और गंगा ने नई गृहस्थी की शुरुआत की. दोनों अपने जीवन से संतुष्ट थे लेकिन रिपोर्टर द्वारा दुनिया वालों के सामने उसी अतीत की जो धूल फिर उड़ी उस ने सबकुछ मटियामेट कर दिया.

वह आज पूरी तरह छुट्टी मनाने के मूड में था. सुबह देर से उठा, फिर धीरेधीरे चाय पीते हुए अखबार पढ़ता रहा था. अखबार पूरी तरह से चाटने के बाद उस का ध्यान घर में छाए सन्नाटे की तरफ गया. आज न पानी गिरने की आवाज, न बरतनों की खटरपटर, न झाड़ूपोंछे की सरसराहट, जबकि घर में कुल 2 छोटेछोटे कमरे हैं. वह एकाएक ही किसी आशंका से पीडि़त हो उठा. गंगा इतनी शांति से क्या कर रही है, वह उसे चौंकाने के विचार से ही नहीं उठा था.

बरामदे में पैर रखते ही वह सहम सा गया. गंगा वाशबेसिन के पास चुपचाप बैठी हुई थी और सामने रखी बोतल को ध्यान से देख रही थी.

‘‘गंगा, वह तेजाब की बोतल है,’’  उस ने आशंकित स्वर में कहा, ‘‘मैं बाथरूम साफ करने के लिए लाया था. काई जमी हुई है न, रोज तुम रगड़ती रहती हो. देखना, इसे जरा सा डाल कर रगड़ने से एकदम साफ हो जाएगा…किंतु तुम उसे नहीं छूना.’’

‘‘अच्छा,’’ उस ने कहा लेकिन अभी भी जैसे वह सोच में डूबी हुई थी.

‘‘क्या सोच रही हो, गंगा?’’ उस ने कंधा पकड़ कर उसे झकझोर दिया.

‘‘सोच रही हूं कि इस के लगाने से चेहरा बदल जाएगा, तब कोई

मुझे पहचान नहीं पाएगा, पहचान भी

ले तो…लेकिन तुम्हारी भावनाएं क्या होंगी?’’

‘‘मेरी भावनाओं का आदर करती हो तो अब से कभी यह विचार मन में न लाना.’’

‘‘पता नहीं क्यों, भय लगता है.’’

‘‘तुम भयभीत क्यों होती हो? मैं ने सबकुछ जानने के बाद ही तुम से विवाह किया है, हमारा विवाह कानूनसम्मत है, कोई हमें अलग नहीं कर सकता, समझीं.’’

तभी दरवाजे पर आहट हुई. विमल ने द्वार खोला. पड़ोसी जोशीजी की छोटी बेटी लतिका थी. बाहर से ही बोली, ‘‘काकी, आज हमारे घर में हलदी- कुमकुम होना है. मां ने  तुम को बुलाया है.  दिन में 2 से 5 बजे तक जरूर आ जाना. अच्छा, मैं जाती हूं. मुझे बहुत घरों में बोलने जाना है.’’

गंगा ने प्रश्न भरी आंखों से पति की ओर देखा, जैसे पूछ रही हो कि आज जोशीजी के घर क्या है?

‘‘सुहागिन महिलाओं को घर बुलाते हैं. टीका करने के बाद नाश्तापानी, गानाबजाना होता है. मेरे घर तो आज पहली बार इस तरह का बुलावा आया है और पहले आता भी कैसे, सुहागिन तो अभी आई है.’’

गंगा मुसकराई फिर गंभीर हो उठी. विमल ने बनावटी गुस्सा दिखाते हुए कहा, ‘‘सोचा था दिनभर साथसाथ घूमते रहेंगे… जोशीजी को भी आज का ही दिन मिला.’’

‘‘मैं अपनी हाजिरी लगा कर शीघ्र ही आ जाऊंगी.’’

‘‘नहींनहीं, जब सब उठें तभी तुम भी उठना. पहली बार बुलाया है उन्होंने, मेरी चिंता न करो, तुम्हारे वापस आने तक मैं सोता रहूंगा.’’

‘‘कैसा रहा आज,’’ जोशी के घर से वापस आने पर विमल ने गंगा से पूछा.

‘‘बहुत अच्छा. बड़े अच्छे लोग हैं, मैं तो अभी किसी से मिली ही नहीं थी. आसपास की सभी महिलाएं आई थीं और सभी ने मुझ से खूब प्यार से बातें कीं..’’

‘‘अच्छा, सब की बोली समझ में आई?’’

‘‘हां, थोड़ीबहुत तो समझ में आ ही जाती है. वैसे मुझ से तो हिंदी में ही बोल रही थीं.’’

मेलमुलाकात का सिलसिला चल निकला तो बढ़ता ही रहा. विमल खुश था कि गंगा का मन बहल गया है.

अब वह पहले जैसी सहमीसहमी नहीं रहती बल्कि अब तो वह अपनी नईनई गृहस्थी की सुखद कल्पनाओं में खोई रहती है.

एक दिन बेहद खुश हो कर गंगा ने  विमल से कहा, ‘‘सुनो, मैं भी सब को हलदीकुमकुम का बुलावा दे रही हूं. जोशी काकी ने कहा है कि वह सब तैयारी करवा देंगी. मैं ने सामान की सूची बना ली है.’’

‘‘ठीक है, हम कल शाम को बाजार चल कर सब सामान ले आएंगे.’’

बाजार में जाते हुए विमल फूलों की वेणी वाले को देख कर रुक गया. गंगा वेणी लगाने में सकुचाती थी. विमल ने हंस कर कहा, ‘‘अब तुम अपनी सहेलियों की तरह वेणी लगाया करो. हलदीकुमकुम करोगी, वेणी नहीं लगाओगी?’’

तभी विमल को  किसी ने टोकते हुए कहा, ‘‘नमस्ते, साहब. ऐसा लगता है, आप को कहीं देखा है…’’

‘‘मुझे…जी, मैं ने आप को पहचाना नहीं.’’

‘‘आप वही विमल साहब हैं न जिन्होंने अपना नाम समाचारपत्र में देने से मना किया था.’’

‘‘जी, जी…मैं आप को नहीं पहचानता,’’ और गंगा का हाथ पकड़ कर सामने से आते रिकशे को रोक कर उस पर बैठते हुए विमल ने कहा, ‘‘चलो गंगा, घर चलते हैं.’’

दूसरे दिन सुबह चाय का प्याला लिए विमल अपनी बालकनी में बैठा धूप की गरमाहट महसूस कर ही रहा था कि द्वार पर आहट हुई.

‘‘नमस्कार, मैं जयंत हूं.. आप जो समाचारपत्र पढ़ रहे हैं, मैं उसी का एक अदना सा रिपोर्टर हूं.’’

विमल का चेहरा बुझ गया. अनमने मन से स्वागत कर उन के लिए चाय मंगाई.

जयंत कहे जा रहा था, ‘‘कहते हैं कि बड़े लोग विनम्र होते हैं, आप तो साक्षात विनम्रता के अवतार लगते हैं. इतने उदार, समाज सुधारक, अभिमान तो नाम को नहीं…’’

विमल ने प्रतिवाद किया, ‘‘ऐसा लगता है आप किसी भ्रम में हैं. मुझे गलत समझ रहे हैं, मैं वह नहीं हूं जो आप समझ रहे हैं.’’

‘‘तभी तो मैं कह रहा हूं कि आप जैसा महान व्यक्ति प्रचार से दूर रहना चाहता है पर आप ने जो कुछ किया उसे जान कर मुझे गर्व का अनुभव हुआ.’’

‘‘मैं ने क्या किया…मैं तो किसी प्रशंसा के लायक नहीं…’’

‘‘आप संकोच न करें, गुप्ताजी ने मुझे सब बता दिया है. अरे, वही गुप्ताजी जो कल आप से मिले थे. आप ने उन्हें नहीं पहचाना हो पर वह तो आप को पहचान गए हैं. आप की पत्नी उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले की हैं न?’’

विमल मना न कर सका. रसोई के दरवाजे पर खड़ी गंगा का चेहरा उतरा हुआ था.

‘‘देखिए, मेरा कोई स्वार्थ नहीं,’’ रिपोर्टर जयंत ने कहा, ‘‘कोई लांछन का उद्देश्य नहीं, आप की इज्जत जितनी है वह आप को नहीं मिल रही है. मैं तो केवल इसलिए आप को प्रकाश में लाना चाहता हूं कि लोगों को आप से सबक मिले. ऐसा समाज सुधारक छिप कर नहीं बैठता है. इसलिए मैं आप को प्रकाश में लाना चाहता हूं कि लोगों को आप से प्रेरणा मिले. लोग जानेंगे कि पाप से घृणा करो पापी से नहीं, प्यार आदमी को बदल देता है.

‘‘यह चित्र विवाह के बाद का है न,’’ कमरे में कोने की मेज पर गंगा का चित्र रखा हुआ देख कर उस ने उठा लिया, ‘‘मैं अभी आप को दे जाऊंगा, यह सिगरेट लीजिए न, विदेशी है…मेरा पेशा ही ऐसा है भाई, लोग बहुत आवभगत करते हैं समाचारपत्र में अपना नाम देखने के लिए. मेरा रुतबा ही

इतना है…भाभी, आप का एक चित्र

लेना है, रसोई में काम करते हुए…लोग देखेंगे. वह, कैसी सुघड़ गृहिणी हैं,

कैसी सुंदर गृहस्थी है…हां, तो आप ने जानकी को गंगा नाम दिया. बहुत

ठीक, गंगा तो पवित्र है, गंगा मैली थोड़े होती है.

‘‘अच्छा, धन्यवाद, मैं चलता हूं,’’ वह कागजकलम समेट कर उठ गया. विमल नीचे तक पहुंचा कर आया तो गंगा वैसे ही दीवार से सटी खड़ी थी. मौन,  चिंतित, भयाक्रांत, प्रशंसा के मद से मस्त. विमल को देर हो रही थी, ध्यान नहीं दिया.

शाम को उस ने हलदीकुमकुम के लिए सामान लाने को कहा तो गंगा ने मना कर दिया, ‘‘अभी ठहर कर लाऊंगी.’’

तीसरे दिन समाचारपत्र के तीसरे पेज पर वही चित्र था जो उन के घर की मेज पर रखा था. दूसरा चित्र गंगा का रसोई में काम करते हुए. साथ में संक्षेप से उस की यातना की कहानी के साथ ही विमल की महानता की कहानी छपी थी.

विमल को उठने में देर हो गई थी. समाचारपत्र ऊपरऊपर से देख कर वह काम पर जाने के लिए तैयार होने लगा कि उस से मिलने वाले एकएक कर आने लगे. फ्लैट के सभी लोग आए और उस के उदार नजरिए पर बधाई दी.

‘‘प्रचारप्रसार से इतनी दूर कि आज का समाचार- पत्र तक नहीं देखा, जबकि अपने बारे में आप को छपने की आशा थी.’’

‘‘वाह, आप धन्य हैं. आप दोनों सुखी रहें, हमारी कामना है.’’

गंगा भोजन तैयार न कर सकी और न नाश्ते का डब्बा ही. वह अपने अंदर एक अज्ञात भय महसूस कर रही थी.

विमल तैयार हो कर आया तो बोला, ‘‘मैं वहीं कुछ खा लूंगा. तुम अपना ध्यान रखना.’’

पुरुषों के जाने के बाद महिलाओं की बारी आई. एकएक कर सब गंगा का हाल पूछने पहुंच गईं. सब में यह बताने की होड़ लगी थी कि सब से पहले किस ने समाचारपत्र देखा और कैसे एकदूसरे को जानकारी दी. फिर सभी ने एक स्वर से कहा कि हमें नहीं पता था कि आप का नाम जानकी है. वैसे नाम तो हम लोग भी पतिगृह का दूसरा रखते हैं. आप के गांव में ऐसा नहीं होता क्या?

‘‘जानकी तो पतिव्रता स्त्री का

नाम था,’’ एक के मुंह से निकला तो दूसरी ने कहा, ‘‘बेचारी औरत का क्या दोष.’’

इस तरह सभी ने गंगा से सहानुभूति दिखाई. खाली चौका देख कर कई घरों से खाना आ गया. जबरन कौरकौर खिलाया और आंसू पोंछे. अपने प्रति कोमल भावनाएं देख कर गंगा को लगा कि उस की आशंका निर्मूल थी, वह व्यर्थ ही इतनी भयभीत हो रही थी कि उस का अतीत जान कर कहीं लोग उस से घृणा न करने लगें, फिर भी वह आश्वस्त न हो पाई.

विमल ने सुबह कहा था कि शाम को तैयार रहना, डाक्टर को दिखाना है और बाजार भी जाना है. किंतु शाम को वह कहीं नहीं गई. 3 दिन हो गए वह घर से निकली ही नहीं.

काशी बाई 2 दिन बाद आई तो बाहर से ही बोली, ‘‘बाई, मेरी पगार जितनी बनती है दे दो.’’

गंगा चकित हो उस से काम न करने का कारण पूछने ही वाली थी कि तभी सुना, ‘‘जूठा साफ करते हैं तो क्या, हमारा धरमईमान तो बना है. छि:, ऐसी बाई के घर कौन काम करेगा.’’

कूड़ा फेंकने वाली मीनाबाई ने भी कहा, ‘‘गंदा साफ करते हैं तो क्या हुआ, हमारा भी धरम है, अपने मरद के लिए तो मैं सच्ची हूं.’’

भाजी वाला आया था. गंगा साहस कर के नीचे उतरी ताकि कुछ सब्जीभाजी खरीद ले. गोभी, मटर का भाव पूछते ही वह मुसकराया, ‘‘अजी, आप जो चाहे दे दें…’’

गंगा ने यथार्थ समझ लिया था. अंदर ही अंदर घुटती रही. एक घर से गीतों का बुलावा आया हुआ था. विमल ने कहा, ‘‘दिन में थोड़ी देर को चली जाना और शगुन दे देना.’’

गंगा कहीं जाने को तैयार नहीं थी. विमल समझाता रहा, ‘‘देखो, हमें कमजोर नहीं पड़ना है. हम ने कोई बुरा काम तो किया नहीं है. मजबूरी ने जो करा दिया उस के लिए लज्जित क्यों हों? तुम अवश्य जाओ और सब के बीच में मिलोजुलो अन्यथा लोग हमें गलत समझेंगे, दोषी समझेंगे, उन के घर लड़की का विवाह है. तुम को गीतों में बुलाया है. नहीं जाओगी तो कहीं वे लोग बुरा न मान जाएं कि पास में रह कर नहीं आई.

गंगा दुविधा में थी. जोशी काकी के मुख से सुन ही लिया था और लोग भी ऐसा ही कहें तब…उधर विमल का कहा भी मन में गूंजता रहा तो वह बड़ा साहस जुटा कर वहां गई थी.

गाना चल रहा था. कुछ महिलाएं नृत्य कर रही थीं. हंसीखुशी का वातावरण था, उसे देखते ही नृत्य थम गया, गाना बंद हो गया और सब की नजर उस की ओर थी. उसे याद आया जब पहले वह जोशी काकी के घर गई थी तो वहां भी गाना हो रहा था किंतु उस के जाते ही सब ने उस का स्वागत किया था और उन नजरों में कौतूहल था पहचान का, परिचय का किंतु स्नेह का भाव भी था.

आज पहले तो सब एकदूसरे की ओर देख कर मुसकराईं, घर की मालकिन ने उसे बैठने का संकेत किया तो पास की महिलाएं इस तरह सरक कर बैठीं जैसे उस के स्पर्श से बच रही हों.

परस्पर फुसफुसाहट हुई, पर उस से न बोलने की चुप्पी  का प्रहार इतना मुखर था कि गंगा अधिक देर वहां बैठ न सकी. शगुन का लिफाफा हाथ में ही रह गया. वह उठी तब भी उस से किसी ने बैठने को न कहा, न जल्दी जाने का कारण पूछा.

कुहराम मचा हुआ था. गंगा ने स्नान घर में मिट्टी का तेल छिड़क कर अपने को जला लिया था. विमल के नाम एक पत्र रखा था जिस में लिखा था :

‘‘औरत पर कलंक लग जाए तो कलंक के साथ ही जीना होता है. आप पुरुष हैं दूसरा विवाह कर लेंगे किंतु मेरे साथ रह कर आप भी कलंकित ही रहेंगे. मैं इस लांछन को सह भी लेती पर मैं मां बनने वाली हूं. बेटा होगा तो वह भी कलंक का टीका ले कर, बेटी होगी तो और भी विडंबना होगी.

‘‘आत्महत्या कर के मैं पाप कर रही हूं पर आप को इन सब से मुक्ति दे रही हूं.

‘‘मुझे क्षमा करना. समाचारपत्र वाले फिर पूछने आएंगे. उन्हें यह पत्र दे देना, शायद मेरा चित्र लेना चाहें तो ले लेंगे.’’

विमल से पढ़ा नहीं जा रहा था. पत्र हाथ से छूट गया, क्या लिखा है…क्या कारण है, कई लोग पत्र पढ़ चुके थे. अब पत्र पकड़ते हुए जिसे देखा, विमल आक्रोश से फट पड़ा.

‘‘तसवीर भी ले लो न, वह भी…’’

रिपोर्टर ने सहम कर देखा…पत्र उस के हाथ से छूट गया.

Short Story, लेखक- नारायणी

Short Story: जरूरत है एक कोपभवन की

Short Story: आजकल के इंजीनियर और ठेकेदार यह बात अपने दिमाग से बिलकुल ही बिसरा बैठे हैं कि घर में एक कोपभवन का होना कितना जरूरी है. इसीलिए तो आजकल मकान के नक्शों में बैठक, भोजन करने का कमरा, सोने का कमरा, रसोईघर, सोने के कमरे से लगा गुसलखाना, सभी कुछ रहता है, अगर नहीं रहता है तो बस, कोपभवन.

सोचने की बात है कि राजा दशरथ के राज्य में वास्तुकला ने कितनी उन्नति की थी कि हर महल में कोप के लिए अलग से एक भवन सुरक्षित रहता था. शायद इसीलिए वह काल इतिहास में ‘रामराज्य’ कहलाया, क्योंकि उस काल में महिलाएं बजाय राजनीति के अखाड़े में कूदने के अपना सारा गुबार कोपभवनों में जा कर निकाल लेती थीं और इसीलिए समाज में इतनी शांति और अमनचैन छाया रहता था.

ठीक ही तो था. राजा दशरथ के काल की यह व्यवस्था कितनी अच्छी थी. पति अपनी पत्नियों को समान अधिकार देते थे. वे जानते थे कि कोप सरेआम, हाटबाजार में या कोई कोर्टकचहरी में करने की चीज नहीं है. इस के  लिए तो घर में ही अलग से कोपभवन का होना बहुत जरूरी है.

भला यह भी कोई बात हुई कि कुपिता हो कर बीवी बेचारी दिन भर मुंह फुलाए अपने 2 कमरों के छोटे से घर में काम करती रहे, पति को खाना खिलाए, बच्चों को स्कूल भेजे, शाम को फिर सभी को खिलापिला कर, बच्चों को सुला कर खुद भी अपना तकिया ले कर मुंह फेर कर लेट जाए.

पति के पास तो व्यस्तता का बहाना रहता है जिस के कारण वह जान ही नहीं पाता कि आज पत्नी अवमानिनी बनी हुई, कोप मुद्रा में दर्शन दे रही है या फिर वह इतना चतुर होता है कि जब तक हो सके, जानबूझ कर पत्नी के रूठने से अनजान बने रहने की ही कोशिश करता रहता है. तब क्या पत्नी खुद आ कर कहे कि सुनोजी, मैं रूठी हुई हूं, आप मुझे आ कर मना लीजिए.

पति अगर मनाने आ भी जाए तो आप क्या समझते हैं कि पत्नी ने कोई कच्ची गोलियां खेली हैं जो अपना रूठना छोड़ कर इतनी आसानी से मान जाएगी? रूठी पत्नी को मनाना इतना आसान काम नहीं है जितना आप समझ रहे हैं. न जाने कितने पापड़ बेलने पड़ते हैं उसे मनाने के लिए. यदि कोई कुंआरा व्यक्ति वह दृश्य देख ले तो शादी के नाम से ही तौबा कर ले. राजा दशरथ समझदार थे कि इस के लिए उन्होंने एक कोपभवन का निर्माण करा रखा था, ताकि जब भी उन की तीनों पत्नियों में से किसी को भी रूठना होता था वह कोपभवन में चली जाती थी और राजा दशरथ भी झट अपना राजपाट छोड़ कर रूठी पत्नी को मनाने दौड़ पड़ते थे.

यह स्वर्ण अवसर देखते ही पत्नी चटपट 2-4 वर मांग लेती थी, उस का कोप भंग हो जाता था और पतिपत्नी सारा मनमुटाव भूल कर हंसतेगाते कोपभवन से बाहर आ जाते थे और किसी को कानोंकान खबर भी नहीं होती थी. उन दिनों लोग पत्नी को तो सम्मान देते ही थे, साथ ही उस के कोप का भी भरपूर सम्मान करते थे.

अब तो हाल यह है कि तूफान के पहले की शांति देखते ही मेरे अबोध बच्चे कोप के आगमन की आशंका से ही सहम जाते हैं. सहमी हुई बबली मचल रहे गुड्डू को एक कोने में ले जा कर इशारे से समझाती है, ‘‘गुड्डू…मेरे भैया, देख, चुपचाप दूध गटक जा, आज मां का मूड ठीक नहीं है.’’ कोप के लक्षण देखते ही पतिदेव भी थाली में जो कुछ परोस दिया उसी को जल्दीजल्दी पेट में डाल कर भीगी बिल्ली की तरह दफ्तर भाग खड़े होते हैं और अतिरिक्त काम का बहाना बना कर रात को भी मेरे कोप के डर से देर से ही घर लौटते हैं.

मैं सांस रोके प्रतीक्षा करती हूं कि शायद अब वह मुझे मनाएंगे. यह जानते हुए भी कि मैं जाग रही हूं, मुझे सोई हुई समझने में अपनी खैरियत समझ कर वह खुद भी चुपचाप सो जाते हैं.

यह देख कर तो मुझे ही खिसिया कर रह जाना पड़ता है कि कौन सी कुघड़ी में रूठने का विचार मन में आया था. अलग से एक कोपभवन न होने के कारण ही तो कई बार कोप का कार्यक्रम स्थगित रखना पड़ता है. कितना अच्छा होता अगर आज भी कोपभवनों का अस्तित्व होता. कल्पना कीजिए, पत्नी रूठ कर कोपभवन में जा बैठी है.

अब पतिदेव को सुबह बिस्तर से उठते ही चाय नहीं मिलेगी तो कड़कड़ाती ठंड में उनींदी आंखों से मुंहअंधेरे उठ कर दूध वाले से दूध लेने और स्टोव से मगजमारी करने में ही उन महाशय को नानी और दादी दोनों साथ ही याद आ जाएंगी. यही नहीं वह बच्चों को स्कूल के लिए तैयार करने, उन का टिफन जमाने और स्वयं नहाधो, खापी कर दफ्तर के लिए तैयार होने की कल्पना से ही सिहर कर झटपट अपनी पत्नी को कोपभवन में जा कर मना लेने में ही अपना भला समझेंगे. कोपभवनों के अभाव में ही पत्नियों को एक अटैची हमेशा तैयार रखनी पड़ती है ताकि कुपित होते ही उस में कपड़े ठूंस कर पति को गाहेबगाहे मायके जाने की धमकी दी जा सके.

कितना अच्छा होता अगर आज भी कोपभवन होते तो पति की गाढ़ी मेहनत की कमाई रेलभाड़े में खर्च कर के पत्नी को मायके जाने की नौबत ही क्यों आती? पत्नी को अपने रूठने का इतना मलाल नहीं होता जितना मलाल पति द्वारा न मनाए जाने से होता है. पति का न मनाना कोप की आग में घी का काम करता है.

वह तो चाहती है कि पति कोपभवन में आ कर उस के चरणों में गिर कर गिड़गिड़ाए, ‘‘हे प्रियतमे, तुम अब मान भी जाओ, तुम्हारा चौकाचूल्हा संभालना मेरे बस की बात नहीं है. अब कान पकड़ कर कह रहा हूं जब तुम दिन कहोगी तो मैं भी दिन ही कहूंगा, तुम रात कहोगी तो मेरे लिए भी रात हो जाएगी.’’

इस के बाद पहली तारीख को तनख्वाह मिलते ही साड़ी लाने का वादा होता, शाम को फिल्म देखने जाने का कार्यक्रम बनता, पत्नी के अलावा किसी दूसरी सुंदरी की ओर आंख भी उठा कर न देखने की कसम खाई जाती और इस तरह पत्नी किसी फटेपुराने वस्त्र की तरह अपना कोप वहीं त्याग कर प्रसन्नवदना हो कर कोपभवन से बाहर आ जाती.

राम राज्य से ले कर इस 20वीं शताब्दी तक विज्ञान ने इतनी उन्नति कर ली है कि अब तो कोपभवन साउंड प्रूफ (जिस में बाहर की आवाज अंदर न आ सके और अंदर की आवाज बाहर न जा सके) भी बन सकते हैं. फिर चाहे पति कोपभवन में दरवाजा बंद कर के पत्नी के सामने कान पकड़े या दंडबैठक लगाए या पत्नी के कोमल चरणों में साष्टांग दंडवत कर के अपने आंसुओं से उस के चरण कमल क्यों न पखारे और बदले में पत्नी उस से नाकों चने ही क्यों न चबवा दे, वहां उन्हें देखने वाला कोई न होगा.

पत्नी चाहे जितनी गरजेगी, बरसेगी मंथरा टाइप महरी या घर के नौकरचाकर कान लगा कर नहीं सुन सकेंगे और न उन के अबोध बच्चों की मानसिकता पर कोई बुरा प्रभाव पड़ेगा. तलाक की दर निश्चित रूप से कम हो जाएगी. आखिर पतिपत्नी का मामला है. कोपभवन में जा कर सुलझ जाएगा. उस में कोर्टकचहरी की दखलंदाजी क्यों हो?

लेखक- डॉ. अरुना शास्त्री 

Hindi Story: काशी वाले पंडाजी – बेटियों ने बचाया परिवार

Hindi Story: रबी की फसल तैयार होने के बाद काशी वाले पंडाजी का इलाके में आना हुआ. लेकिन इस बार पंडाजी के साथ एक पहलवान चेला भी था, जिस की उम्र तकरीबन 35 साल के आसपास थी. पर देखने में वह 21-22 साल का ही लगता था. हाथ में कई अंगूठियां, छोटेछोटे काले बाल, प्रैस की हुई खादी की धोती और पैर में कोल्हापुरी चप्पल उस पर खूब फबती थी. पंडाजी बांस की बनी एक छोटी डोलची ले कर चलते थे. डोलची के हैंडिल के सहारे 2 छोटीछोटी गोल रंगीन शीशियां बंधी रहती थीं.

पंडाजी बड़ी सावधानी से शीशी खोलते और बहुत ही थोड़ा जल निकाल कर यजमान के बरतन में डालते. इस के बाद पहलवान चेला शुरू हो जाता, ‘‘यह प्रयाग का गंगाजल है. पंडाजी ने नवरात्र के समय मंदिर में इसे कठिन साधना के साथ मंत्रों से पढ़ा है. ‘‘इस गंगाजल में शुद्ध जल मिला कर घर के चारों तरफ छिड़क दें. इस के बाद सारा उपद्रव शांत हो जाएगा. बालबच्चे खुश रहेंगे और यजमान का कल्याण होगा.’’

उस पहलवान चेले की बात खत्म होते ही लाल और पीले धागे वाले 2 तावीज वह पंडाजी की ओर बढ़ा देता और कुछ क्षण बाद तावीजों को ले कर यजमान के हाथों में रखते हुए कहता, ‘‘पंडाजी बता रहे हैं कि लाल धागे वाला तावीज यजमान बाएं हाथ में मंगलवार को पहनें और पीले धागे वाला तावीज बुधवार को यजमान दाहिने हाथ में पहनें. इस के बाद सब तरह की बाधा दूर हो जाएगी और हर काम में तरक्की होगी.’’

यजमान दोनों हथेलियों पर 2 रंगों वाले तावीजों को इस तरह देखने लगता, मानो वह तावीज नहीं, कुबेर के खजाने की कुंजी और दवा हो. चेला दक्षिणा उठा कर गिनता. अगर वह 51 रुपए होती, तो चुपचाप पंडाजी की दाहिनी जेब से पर्स निकाल कर उस में रख देता और अगर पैसा इस से कम होता, तो कहता, ‘‘यह तो नवरात्र का खर्च भी नहीं है. लौट कर भी तो अनुष्ठान करना होगा.’’

तब यजमान कुछ रुपए निकाल कर चेले को बढ़ा देता. चेला नोटों की गिनती किए बिना पर्स के हवाले कर देता. पंडाजी यजमानों द्वारा दी गई दक्षिणा के हिसाब से ही अपना कीमती समय देते थे. पर वे माई के घर पर घंटों आसन जमाते. माई बहुत दिनों तक परदेश में रही थीं और उन की तीनों कुंआरी बेटियां भी देखने में खूबसूरत थीं.

पंडाजी के गांव में पधारते ही माई के दरवाजे पर उन के आसन का इंतजाम हो गया था. तीनों बेटियां भी अच्छी तरह सजसंवर कर तैयार हो चुकी थीं. पंडाजी के पहुंचते ही माई ने उन की आवभगत की. पंडाजी आसन पर बैठने ही वाले थे कि एक लड़की ने आ कर उन के पैर छुए. उन्होंने पूछा, ‘‘हां, क्या नाम है?’’

‘‘जी… संजू.’’ ‘‘कुंभ राशि. कन्या के लक्षण तो अति विलक्षण हैं. यह तो पिछले जन्म में राजकन्या थी. कुछ चूक हो जाने के चलते इसे इस कुल में आना पड़ा, तभी तो यह इतनी सुंदर और चंचला है.’’

सुंदर और चंचला शब्द सुनते ही संजू के गाल और भी लाल हो उठे और वह रोमांचित हो कर पंडाजी के और करीब होने लगी. तभी दूसरी लड़की रंजू ने कहा, ‘‘पंडाजी, इस को घरवर कैसा मिलेगा? इस की शादी कब तक होगी? हम तो इसी चिंता में परेशान रहते हैं. इस साल ही इस के हाथ पीले होने का कोई जतन बताइए न.’’

रंजू की बातें सुन कर पंडाजी चेले की ओर देखने लगे. संजू के यौवन में भटकता चेला अचकचा कर पंडाजी की ओर देखता हुआ कुछ पल चुप रहने के बाद बोला, ‘‘बीते सावन में इस के हाथ से जो सांप मर गया, वह कुलदेवता था. कुलदेवता इस पर बहुत गुस्सा हैं. इस के लिए मंत्र और तंत्र दोनों की साधनाएं करनी होंगी. ‘‘अच्छा है कि आज मंगलवार है. आज रात यह अनुष्ठान हो जाए, तो सब बिगड़ा काम बन सकता है.’’

चेले का यह सुझाव माई को डूबते को तिनके का सहारा जैसा लगा. सभी समस्याओं का समाधान निकल आने से माई की जान में जान आई. ठीक 5 बजे अनुष्ठान शुरू करने की बात कह कर पंडाजी चेले के साथ कैथीटोला गांव की ओर चल पड़े.

रात 9 बजे से माई के आंगन में अनुष्ठान का काम पंडाजी और चेले ने शुरू किया. हर तरह से सजीसंवरी तीनों बहनें भी आ कर लाइन से बैठ गईं. कुछ देर तक मंत्र पढ़ने के बाद आग जला कर उन्होंने माई के साथसाथ संजू, रंजू और मंजू को भभूत मिला प्रसाद खाने को दिया. इस के बाद चेले ने वहां मौजूद पासपड़ोस के लोगों को बाहर जाने का इशारा किया.

इशारा पाते ही सभी वहां से चले गए. फिर उस के बाद रात में क्या हुआ, गांव वालों को इस का क्या पता… अगली सुबह माई के घर में हाहाकार मचा हुआ था. माई और उस की छोटी बेटी मंजू छाती पीटपीट कर चिल्ला रही थीं, ‘‘कोई हमारी संजू… रंजू को वापस ला दो. वह पंडा पुरोहित नहीं, ठग था.

‘‘हम दोनों को बेहोश कर के पंडा और चेला मेरी दोनों बेटियों को उठा कर कहां ले गए… कुछ मालूम नहीं. हमारी बेटियों को वापस ला दो. उन्हें बचा लो.’’

गांव वालों को माजरा समझते देर नहीं लगी. राजमणि काका ने तुरंत रेलवे स्टेशन और बसस्टैंड के लिए कुछ लोगों को भेजा, लेकिन वे सभी खाली हाथ निराश लौट आए. तब पुलिस में मामले को ले जाया गया. लेकिन नतीजा वही ढाक के तीन पात.

माई के पास कलेजे पर पत्थर रख कर संजू और रंजू को भूलने के अलावा कोई चारा नहीं था. इधर उन दोनों बहनों ने समझदारी से काम लिया. पंडा और चेले की गलत मंसा भांपते हुए चालाकी से संजू ने पंडाजी से और रंजू ने चेले से ब्याह कर मौजमस्ती से जिंदगी बिताने का प्रस्ताव रखा.

पंडा और चेला इस प्रस्ताव को सुन कर बहुत खुश हुए. रंजू ने कहा, ‘‘लेकिन, इस के लिए जरूरी है कि हमारे घरपरिवार, गांव के लोग आगे आएं. कोई कानूनी दांवपेंच नहीं लगाएं और हमें पुलिस के चक्कर में नहीं पड़ना पड़े, सो हम लोग बिना समय गंवाए कोर्ट मैरिज कर लें.’’ संजू और रंजू के रूपजाल में फंसे पंडा और चेला कोर्ट मैरिज के कागजात के साथ अदालत में जज के सामने हाजिर हुए.

जब जज ने संजू और रंजू से उन की रजामंदी के बारे में पूछा, तो संजू कहने लगी, ‘‘जज साहब, ये दोनों हमारे गांव में पंडापुजारी बन कर आए थे. भोलेभाले गांव वालों के सामने तंत्रमंत्र का मायाजाल फैला कर इन ढोंगियों ने उन्हें खूब लूटा. ‘‘हम तीनों बहनों पर तो ये लट्टू बने थे. माई को घरपरिवार पर देवी का प्रकोप बता कर तांत्रिक अनुष्ठान कराने के लिए इन दोनों ने इसलिए मजबूर किया, ताकि उस की आड़ में हमें भोग सकें.

‘‘इन की खराब नीयत को भांप कर हम दोनों बहनों ने आपस में विचार किया और इन दोनों को कानून के हवाले करने के लिए यह नाटक खेला है, ताकि कानून इन ढोंगियों को ऐसी सजा दे, ताकि फिर कभी इस तरह की घटना न होने पाए.’’ संजू और रंजू के बयान को दर्ज करते हुए अदालत ने पंडा और चेले को जेल भेजने का आदेश दिया.

संजू और रंजू ने जब गांव वालों को यह दास्तान सुनाई, तो सभी कहने लगे, ‘सचमुच, तुम्हारी दोनों बेटियां बड़ी बहादुर हैं माई. इन दोनों ने वह कर दिखाया है, जो बहुत कम लोग ही कर पाते हैं. पूरे गांव को इन पर नाज है.’ माई की आंखों में भी खुशी और संतोष के आंसू छलछला रहे थे.

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