Blind Faith : बुटाटी धाम  राजस्थान, 22 करोड़ की चंदाचोरी

Blind Faith.राजस्थान के नागौर जिले में अयोध्या के राम मंदिर जैसी दान चोरी का बड़ा मामला सामने आया है. मामला नागौर के बुटाटी में बने संत चतुरदास महाराज मंदिर से जुड़ा है.

जिला कलक्टर के आदेश पर बनी जांच कमेटी को मंदिर समिति के वित्तीय कामकाज में गड़बड़ी मिली है. जांच कमेटी ने मंदिर समिति के अकाउंटस, बैंक लेनदेन, वाउचर और दूसरे डौक्यूमैंट्स की जांच के बाद रिपोर्ट कलक्टर को भेजी है.

इस रिपोर्ट में सोनाचांदी के लेखाजोखा से ले कर भोजनशाला बनाने, किराया जमाखर्च वगैरह में गबन और फंड का गैरजरूरी इस्तेमाल होना माना गया है.

मंदिर में बड़े दान करने वालों ने जो निर्माण कार्य करवाया है, उसे तक मंदिर समिति ने अपने खर्च में जोड़ दिया है. कमेटी ने तकरीबन 22 करोड़ रुपए का गबन माना है.

गौरतलब है कि राम मंदिर में गबन हो गया… खाटूश्याम के पुजारी का रईसजादा बेटा बाइक सवारों को कुचल कर चला गया… सालासर बालाजी के पुजारी ने बेटी की शादी में करोड़ों रुपए खर्च किए….. और अब बुटाटी धाम में करोड़ों का घपला हो गया… वगैरहवगैरह.  हालांकि यह तो मामूली धाम हैं, ऊंचेबड़े मंदिर धामों की बात ही निराली हैं.

नागौर के रहने वाले रामनारायण चौधरी बताते हैं, ‘‘मेरा गांव बुटाटी से तकरीबन 25 किलोमीटर की दूरी पर है. जब भी किसी को लकवा होता है तो बुटाटी धाम जाते हैं, लेकिन सच तो यह हैं कि आज तक एक भी मरीज ठीक नहीं हुआ है.

‘‘मेरी छोटी बहन हर महीने बुटाटी धाम फेरी देने जाती थी. जब उन को लकवा हुआ तो हम ही पहली बार उसे बुटाटी ले कर गए थे. 7 दिन तक वहीं रखा, ताकि 7 दिन तक 7 फेरी दे सकें. लेकिन उसे बचा नहीं सके. अगर डाक्टर की सलाह को मानते तो आज हमारी बहन जिंदा होती.’’

जब भी किसी को लकवा होता है और अस्पताल ले जाने की बात करते हैं तो 99 फीसदी लोग बुटाटी की पैरवी करते हैं. जिन के घर में कोई लकवाग्रस्त है, वह मजबूरी में बुटाटी ले कर जाता ही है, क्योंकि नहीं ले जाएं और मरीज को कुछ हो जाए तो दुनिया उसे जीने नहीं देती है कि हम नें कहा था कि बुटाटी ले जाओ, लेकिन नहीं माना इसलिए मरीज की जान चली गई.

जब लोग जबरदस्ती ऐसे धामों पर जा कर दान देते हैं तो ये गबन करने वालों की गलती नहीं हैं, बल्कि वहां जाने वालों की गलती है.

बुटाटी धाम के प्रचारप्रसार पर निवेश करने वालों ने ही अपना अर्जित लाभांश लिया है. किसी ने चंदा या दान भी दिया तो प्रचारप्रसार देख कर ही दिया था. अर्जित आय में से अपना लाभांश निकालना धंधे का नैतिक नियम होता है. किसी भी मंदिर, धाम, आश्रम आदि में आय पर पहला हक समिति, ट्रस्ट, पुजारी का ही होता है.

मैं ने अपनी आंखों के सामने एक दीवार पर तसवीर टांगने से ले कर 20 सालों में ‘अति प्राचीन हनुमान मंदिर’ बनते देखा है. इन 20 सालों तक उस नागौर जिले के फरार आरोपी की मेहनत, सब्र, समर्पण की कोई तो कीमत होगी जो रोज सरकारी दीवार पर तसवीर को साफ कर के टांगता, खाली जगह की सफाई करता, आसपास में पेड़पौधे लगाए.

समय बीतने पर तसवीर की जगह मूर्तियां लगाईं, रोज सुबहशाम धूप, अगरबत्ती करता, 2-2 घंटे तथाकथित मंत्र गुनगुनाता. आज वह कमाई कर रहा है. निवेश से अपना लाभांश ले रहा है.

धर्म का धंधा ही ऐसा है, जो तमाम जोखिमों से दूर बिना पूंजी लगाए अपनी धरती पर सदियों से धड़ल्ले से चलता आ रहा है. धर्म को धंधा बना कर चालाक लोगों द्वारा गरीबों, दलितों, पिछड़ों का शोषण करने की महज सोचीसम झी चाल है. यह एकतरफा वसूली है. आमजन के साथसाथ पूरे देश के भविष्य के लिए यह खतरनाक है.

किसी मामूली आदमी के पास 5,000 रुपए हैं, तो वह अपने बच्चों की पढ़ाईलिखाई पर खर्च करने के बजाय मंदिरमसजिद या धर्म के अड्डों को चंदा देना बेहतर सम झता है. बेचारे बच्चों का भविष्य कुरबान कर दिया जाता है.

सीकर जिले के सालासर बालाजी मंदिर का पुजारी अपनी बेटी की शादी में 11 किलो सोना दें व करोड़ों रुपए खर्च कर डाले, तो इसे क्या कहेंगे, जबकि मंदिर की देखरेख के लिए एक ट्रस्ट बना हुआ है व ट्रस्ट में शामिल पुजारियों को तनख्वाह भी दी जाती है.

30,000 महीना तनख्वाह लेने वाला पुजारी इतना पैसा व धन अपनी बेटी पर कहां से खर्च करेगा? यकीनीतौर पर चंदेचढ़ावे में हेराफेरी हुई होगी, नहीं तो इतना खर्चा इस समय 30,000 कमाने वाले के बूते में तो कतई नहीं है.

पुराने मंदिरों के पुनर्निर्माण के नाम पर आजकल हरेक गांव में इन पर करोड़ों रुपए खर्च कर के भव्य मंदिर बनाए जा रहे हैं. दिलचस्प बात तो यह है कि इन मंदिरों के निर्माण में किसानों की कड़ी मेहनत की पूंजी इस्तेमाल की जा रही है.

राजस्थान के किसानों में पनपी इस नई प्रथा में गांवों के किसान बेबस या शौकशौक में अपनी मेहनत की कमाई भव्य मंदिर निर्माण के लिए दे रहे हैं. अकसर सभी गांवों में ऐसा किया जा रहा है. चाहे किसान फटे कपड़े पहने, उस के बच्चे भूखे रहें, बच्चे पढ़ाई छोड़ दें, कर्ज के पैसे न चुकें, लेकिन मंदिर निर्माण के लिए तो कमाई दान देनी ही होगी वरना धर्म के ठेकेदार नाराज हो जाएंगे और स्वर्ग जाने का सर्टिफिकेट नहीं मिलेगा.

कोई भी धार्मिक काम बिना चंदे के नहीं होता. मेहनत की कमाई चंदे के जरीए ज्यादातर धार्मिक आयोजनों और अनुष्ठानों में जाती है. आम जनता चंदों से परेशान है, फिर भी धर्म के नाम पर अपनी जेब ढीली करने में कोताही नहीं बरतती, इसलिए चंदाखोरी का धंधा खूब फलफूल रहा है.

मेरे गांव कोथून से उत्तर दिशा में तालाब किनारे एक तरफ जंगल से घिरा एक धार्मिक स्थल है. यहां शिव का एक प्राचीन मंदिर है. इस के बारे में कहा जाता है कि यहां का शिवलिंग राजा भृतहरि द्वारा स्थापित हैं. बाद में भक्तों ने यहां भव्य मंदिर बनवा दिया.

बहरहाल, जो भी हो, शिव का यह मंदिर काफी पुराना था, यह सच है. लेकिन 10-15 साल से यह नए स्वरूप में खड़ा है. यहां लाल पत्थर की जगह अब भव्य मार्बल और संगमरमर के पत्थर लगे हैं. मंदिर की ऊंचाई भी आकाश को छूती नजर आती है और यह सारा कमाल हुआ है चंदा उगाही से.

ऐसा एक नहीं, कई मंदिर और हैं जो चंदे और चढ़ावे से आज विशाल रूप लिए हुए हैं. अब तो ट्रस्ट के नाम पर चंदा उगाही होती है जिस में एक नहीं, कई महंतपुजारियों का हिस्सा होता है जो बराबरबराबर बंटता है और बंटवारे में जहां तीनपांच हुआ, तो वहीं आपस में लड़ाई झगड़ा शुरू हो जाता है.

महंतपुजारी आने वाले भक्तों से रसीद काट कर चंदा वसूलते हैं और शहरगांव में घूमघूम कर धनपतियों से भी उन की धार्मिक भावनाओं का दोहन कर के चंदा वसूला जाता है.

कुलमिला कर बात यह है कि चाहे कोथून का शिव मंदिर हो या फिर देश के कोनेकोने में बने मंदिर, इन मंदिरों के नाम पर करोड़ों का चंदा वसूला जाता है. इस चंदे से मंदिरों का भव्य निर्माण तो होता ही है, साथ ही महंतोंपुजारियों की जीवनशैली भी भव्य हो जाती है. अब इन लोगों ने आमदनी के लिए दूसरे मंदिर भी बना लिए हैं. महंतपुजारी अब गाडि़यों में सफर करते हैं और लग्जरी लाइफ जीते हैं.

पिछले दिनों खाटूश्याम मंदिर के पुजारी के बेटे द्वारा नशे की हालत में गाड़ी से टक्कर मारने की घटना काफी चर्चा में रही. यह घटना अजमेरपुष्कर रोड पर हुई थी, जहां उस की तेज रफ्तार फौर्च्यूयूनर ने कई बाइक सवारों को कुचल दिया. इस हादसे में एक आदमी की मौके पर ही मौत हो गई थी और कई लोग घायल हो गए थे. कार में सवार सभी लोग नशे में चूर थे और मौके पर पुलिस ने कार में शराब की दर्जनों बोतलें भी बरामद की थीं.

हमारा समाज अब काफी शिक्षित हो चूका है लेकिन अफसोस है कि सोच अभी भी अवैज्ञानिक एवं रूढि़वादी है और पैसा उगाई का काम तथाकथित बुद्धिजीवी, पढ़ेलिखे और इज्जतदार लोगों की समितियां करती हैं.

जब कोई इस तरह की लूटचोरी पर सवाल उठाते है तो नसीहत दी जाती है कि तुम लोग हिंदू विरोधी हो, कम्युनिस्ट हो, मुल्ला हो, देशद्रोही हो, तो क्या करें? एक सवाल इन का बड़ा हैरान करने वाला होता है कि लोग अपनी मरजी से देते है, तेरा मन नहीं है तो मत दे.

वैसे तो हर धंधा सम्मानजनक होता है क्योंकि कोई सामान बेचता है और खरीदार खरीदते हैं. शर्तें तय की जाती हैं और मामला साफ होता है. लेकिन यहां मंदिर, धाम, आश्रम में लूट ही लूट है. धर्म के नाम की लूट. इन लोगों की महारत इसी से समझ में आ जाती है कि शिक्षित, जागरूक लोग भी इन के बहकावे में फंसे हुए हैं.    Blind Faith

Religious Superstition : रील्स का पाखंडी ‘डिजिटल बाबा’

Religious Superstition. हरियाणा की धरती, जो कभी मेहनतकश किसानों और विचारकों की ज्ञानभूमि हुआ करती थी, आज डिजिटल युग के ‘रील्स मार्केटिंग’ वाले बाबाओं की चारागाह बन चुकी है.

हांसी के नंद नगर में सजे ‘श्री बालाजी धाम’ के दरबार पर नजर डालें, तो समझ आता है कि 21वीं सदी में भी अंधविश्वास को कितने शातिर ढंग से बेचा जा सकता है.

गद्दी पर बैठे हैं तथाकथित महंत डाक्टर दिनेश पुरी, जिन्हें लोग ‘हांसी वाले बाबा’ कहते हैं, मगर इन की असलियत चमचमाती मर्सिडीज गाड़ी, यूट्यूबरों की फौज और कोर्टकचहरी के चक्करों के बीच हिचकोले खा रही है.

यह वही ‘डिजिटल ठगी’ का मौडर्न कुनबा है जहां लच्छेदार बातों की चाशनी में लपेट कर सीधेसादे लोगों की जेब और दिमाग दोनों पर डाका डाला जाता है. कतई गजब ढा रखा है इन धंधेबाजों ने.

परची का धंधा

डाक्टर दिनेश पुरी के दरबार का विज्ञान बड़ा सीधा है, कैमरा औन करो, भावुकता का माहौल बनाओ, और फिर एक परची निकाल कर किसी लाचार इनसान के भूत, भविष्य और वर्तमान का फैसला कर दो.

विज्ञान और चिकित्सा को अंगूठा दिखाते हुए यहां तंत्रमंत्र से कैंसर ठीक करने के दावे बेचे जाते हैं. जब लोग अपनी गंभीर बीमारियों और पारिवारिक समस्याओं से टूट चुके होते हैं, तब यह ढोंगी उन्हें इलाज के बजाय दैवीय चमत्कार के चक्रव्यूह में फंसाता है.

लेकिन जैसा कि कबीर कह गए हैं कि काठ की हांड़ी बारबार नहीं चढ़ती… इस कथित चमत्कार की पोल तब खुली जब हांसी के ही एक वकील राजेश कुमार ने इस पाखंड को कोर्ट तक घसीट लिया.

बाबा ने सरेआम परची निकाल कर वकील पर तंत्रमंत्र का झूठा आरोप मढ़ा था, जिस के जवाब में पुलिस ने न सिर्फ एफआईआर दर्ज की, बल्कि अब यह ढोंगी अदालत में मानहानि के मुकदमे भुगत रहा है.

शिकायत करने वाले वकील राजेश कुमार ने अदालत में बेहद मजबूत कानूनी तर्क रखे हैं. वकील का कहना है कि बाबा का यह कृत्य केवल एक शख्स की मानहानि नहीं, बल्कि कानून व्यवस्था और नागरिक अधिकारों पर सीधा हमला है.

बिना किसी सुबूत के, भरे दरबार में लाइव कैमरे के सामने किसी पर ‘कैंसर करवाने का तांत्रिक प्रयोग’ करने का आरोप लगाना मानसिक प्रताड़ना की श्रेणी में आता है.

कानूनी तर्कों के मुताबिक, बाबा ने सोशल मीडिया के विशाल मंच का इस्तेमाल कर के पीडि़त परिवार का सामाजिक बहिष्कार करवाया, जिस से उन की इज्जत पूरी तरह धूल में मिल गई.

अब पीडि़त पक्ष की मांग बेहद कड़क है कि बाबा को उसी सोशल मीडिया पर लाइव आ कर, हाथ जोड़ कर लिखित और मौखिक माफी मांगनी होगी, क्योंकि कानून के राज में कोई भी ढोंगी खुद को अदालत से ऊपर नहीं समझ सकता.

कसता कानूनी शिकंजा

यह पूरा मामला केवल मानहानि तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सीधेतौर पर कानून की धज्जियां उड़ाने का है. कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, इस प्रकार के ढोंग पर भारतीय न्याय संहिता की धारा 318 (ठगी/ धोखाधड़ी) और धारा 356 (मानहानि) के तहत गंभीर कानूनी कार्रवाई बनती है.

इस के साथ ही, तंत्रमंत्र और दैवीय शक्तियों से कैंसर जैसी लाइलाज बीमारियों को ठीक करने का भ्रामक दावा करना ‘ड्रग्स एंड मैजिक रैमेडीज (आपत्तिजनक विज्ञापन) अधिनियम, 1954’ के तहत एक संज्ञेय अपराध है.

जातिगत नफरती टिप्पणी

इस पाखंडी का अहंकार सिर्फ अंधविश्वास फैलाने तक सीमित नहीं रहा. जब समाज के सजग लोगों और किसान नेताओं ने इन के पाखंड को ‘डिजिटल आतंकवाद’ कह कर बेनकाब करना शुरू किया, तो बाबा अपनी मर्यादा भूल गए.

भरे मंचों से और बयानों में विशिष्ट समाजों और उन के नेतृत्व को निशाना बनाते हुए ‘हुड्डासूडा’ जैसे अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल किया गया. यह किसी आध्यात्मिक गुरु की भाषा नहीं, बल्कि एक डरे हुए सियार की बौखलाहट है.

मर्सिडीज वाला अध्यात्म

साध्वी देवा ठाकुर और धर्मेंद्र हुड्डा जैसे लोगों ने जब इन के तंत्र की परतें खोलीं, तो सच सामने आया कि इस भीड़ के पीछे असल खेल ‘कैश और कीवर्ड्स’ का है. सोशल मीडिया पर जो लाखों की रील्स दिखती हैं, उन के पीछे यूट्यूबरों को दी जाने वाली अघोषित रकम और तगड़ी पीआर टीम काम करती है.

जनता से चढ़ावे और ‘रसीद’ के नाम पर काटी गई गाढ़ी कमाई धर्मार्थ कामों में जाने के बजाय लग्जरी गाडि़यों के टायर घिसने और इस झूठे भ्रामक प्रचार तंत्र को जिंदा रखने में फूंकी जा रही है. साफ कहें तो यह अध्यात्म नहीं, बल्कि अंधविश्वास की रील्स बना कर नोट छापने की मौडर्न फैक्टरी है.

राहत की बात यह है कि इस डिजिटल पाखंड के खिलाफ हरियाणा का प्रबुद्ध समाज और स्थानीय सामाजिक संगठन अब खुल कर खिलाफ उतरने लगे हैं. तर्कशील सोसाइटियों, छात्र संगठनों और किसान यूनियनों ने इस अंधविश्वास के खिलाफ एक बड़ा वैचारिक मोरचा खोल दिया है.

कहा जा रहा है कि बीमारियों के लिए बाबाओं के परचों के बजाय अच्छे अस्पतालों और डाक्टरों पर भरोसा करें. यह सामाजिक आंदोलन इस बात का प्रमाण है कि हरियाणवी समाज अब इन ढोंगियों के झांसे में आ कर अपनी गाढ़ी कमाई और स्वाभिमान को लुटने नहीं देगा.

यह समय हरियाणवी समाज के लिए पूरी तरह जागने का है. कानून अपनी कार्रवाई पुलिस फाइलों और हिसार कोर्ट के चक्करों में कर ही रहा है व धर्मेंद्र हुड्डा ने भी कानूनी कार्रवाई की बात कही है, लेकिन सब से बड़ा बहिष्कार जनता की अदालत को करना होगा.  Religious Superstition

Superstition : औलाद की चाह में फंस रही औरतें

Superstition: भारत ने विज्ञान के क्षेत्र में काफी तरक्की की है. जहां देश ने चांद पर अपनी मौजूदगी दर्ज कराने में कामयाबी पाई है, वहीं एआई, रोबोट तकनीकी और पेट से न होने की समस्या से जूझ रही औरतों के लिए संतान पाने के इलाज के नए और सफल तरीके भी ईजाद हुए हैं.

आज मैडिकल के क्षेत्र में इलाज के कई नए तरीके मौजूद हैं, जिन की मदद से सालों से बच्चे का इंतजार कर रहे दंपतियों को भी मातापिता बनने में मदद मिल रही है.

इस सब के बावजूद भारत के हजारों गांवों, कसबों और छोटे शहरों में आज भी बच्चा न होने पर सब से पहले औरत को ही दोष दिया जाता है. डाक्टर से इलाज कराने के बजाय उसे ओझा, तांत्रिक या झाड़फूंक करने वाले बाबा के पास ले जाया जाता है. यहीं से उस की परेशानी शुरू होती है. कई बार इस के नाम पर पैसे ठग लिए जाते हैं, औरत के साथ गलत हरकत होती है, उस की बदनामी होती है और कभीकभी तो उस की जान तक चली जाती है.

दुख की बात यह है कि ऐसी घटनाओं को अकसर सिर्फ अंधविश्वास कह कर छोड़ दिया जाता है. औरतों के साथ होने वाला यह अपराध  केवल झाड़फूंक और शोषण से जुड़ा नहीं है, बल्कि यह उस दकियानूसी सोच की कहानी है, जिस ने आज भी औरत की पहचान को उसकी कोख से जोड़ रखा है. शादी के कुछ साल बाद अगर संतान न हो तो परिवार, रिश्तेदार और समाज की उंगलियां सब से पहले औरत की ओर उठती हैं. उस के दर्द से पहले उस के चालचलन, नसीब और जिस्म का फैसला सुना दिया जाता है. यही सामाजिक दबाव उसे उन लोगों के सामने असहाय बना देता है जो धर्म, आस्था और चमत्कार के नाम पर अपराध का कारोबार चलाते हैं.

विश्व स्वास्थ्य संगठन और माहिर डाक्टरों का कहना हैं कि पेट से न होने का मसला केवल औरत से जुड़ा नहीं होता, बल्कि अनेक मामलों में कारण मर्द ही होते हैं, कई बार दोनों में कमी होती है और कई बार कारणों का पता भी नहीं चल पाता. इलाज

के नए तरीकों में जांच और दवा के साथ आईयूआई, आईवीएफ और आईसीएसआई जैसे तरीके भी शामिल हैं. इन से लाखों दंपतियों को बच्चा होने में मदद मिली है. इस के बावजूद समाज में सब से पहले यही कहा जाता है कि कमी बहू में है.

इसी मसले से जुड़ी एक घटना उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ से जुड़ी है, जहां शादी के लगभग 10 साल बाद भी जब अनुराधा की गोद नहीं भरी तो परिवार उम्मीद की तलाश में एक तथाकथित तांत्रिक तक पहुंचा. परिजनों के आरोप के मुताबिक तांत्रिक ने संतान दिलाने का भरोसा दिया और इस के बदले बड़ी रकम मांगी.

झाड़फूंक के दौरान अनुराधा के साथ बहुत बुरा सुलूक किया गया. उस का गला दबाया गया, उसे बुरी तरह मारापीटा गया और कथिततौर पर नाले का गंदा पानी तक पिलाया गया. जब उस की हालत बिगड़ी तो उसे अस्पताल ले जाया गया. अस्पताल पहुंचने पर डाक्टरों ने कहा कि अनुराधा की मौत हो चुकी है.

उत्तर प्रदेश के हाथरस में घटी घटना और भी डरावनी तसवीर सामने लाती है. शादी के 3 साल बाद भी संतान न होने से परेशान एक जवान औरत अपने पति और ननद के साथ एक तांत्रिक के पास पहुंची. उसे भरोसा दिलाया गया कि विशेष अनुष्ठान के बाद उस की गोद भर जाएगी.

तांत्रिक ने पति को मंदिर में बैठाए रखा और औरत को खेत में ले जा कर गुप्त पूजा के नाम पर उस के साथ गलत काम किया. बाद में जब औरत ने हिम्मत जुटा कर हकीकत बताई तो पुलिस ने मामला दर्ज कर आरोपी को गिरफ्तार किया.

जांच के दौरान एक और चौंकाने वाली बात सामने आई. औरत की ननद ने भी सालों पहले इसी तांत्रिक से झाड़फूंक कराई थी. आरोप है कि उस दौरान वह भी उस के जिस्मानी शोषण का शिकार हुई थी.

मध्य प्रदेश के टीकमगढ़ जिले में भी लगभग यही कहानी दोहराई गई. संतान न होने से परेशान औरत को किसी ने एक बाबा के बारे में बताया. बाबा ने दावा किया कि तंत्रमंत्र से उस की गोद भर जाएगी. औरत विश्वास कर बैठी.

इस के बाद कथित अनुष्ठान के नाम पर उस के साथ गलत किया गया और चुप रहने के लिए जान से मारने की धमकी दी गई. आखिरकार पीडि़ता ने हिम्मत दिखाई और पुलिस तक पहुंची, जिस के बाद आरोपी गिरफ्तार हुआ.

इन तीनों घटनाओं में राज्य अलग हैं, पात्र अलग हैं, लेकिन अपराध की पटकथा एक जैसी है. पहले औरत की सब से बड़ी पीड़ा को पहचानो, फिर उसी पीड़ा को चमत्कार के नाम पर हथियार बना कर उसका शोषण करो.

उत्तर प्रदेश के महोबा की एक घटना बताती है कि अंधविश्वास सिर्फ औरतों की इज्जत को ही नहीं, उन की जिंदगी को भी नुकसान पहुंचाता है. पेट से हुई एक औरत की तबीयत अचानक बिगड़ी. बच्चा होने से पहले की तकलीफ में हर मिनट कीमती होता है और डाक्टर की सलाह यही कहती है कि ऐसे हालात में तत्काल अस्पताल पहुंचना चाहिए. लेकिन परिवार ने इलाज कराने के बजाय झाड़फूंक का रास्ता चुना और उस औरत को एक तथाकथित तांत्रिक के पास ले जाया गया.

उस पाखंडी तांत्रिक द्वारा घंटों तक मंत्र, तावीज और झाड़फूंक का सिलसिला किया गया. लेकिन झाड़फूंक के चलते उस औरत की हालात बहुत नाजुक हो गई तब जा कर उसे अस्पताल ले जाने का फैसला लिया गया. लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी और अस्पताल पहुंचने से पहले ही औरत की मौत हो गई.

राजस्थान के बांसवाड़ा की घटना इस से भी ज्यादा विचलित करने वाली है. पेट से हुई एक औरत को दिमागी और शारीरिक परेशानी होने पर यह मान लिया गया कि उस पर भूतप्रेत का साया है. उपचार की जगह उसे लोहे की जंजीरों से बांध दिया गया. घंटों तक झाड़फूंक, मारपीट और तथाकथित तांत्रिक अनुष्ठान चलते रहे. जब तक उसे अस्पताल पहुंचाया गया, तब तक औरत और उस के पेट में पल रहे बच्चे की मौत हो चुकी थी.

य  ह केवल किसी एक परिवार की त्रासदी नहीं थी. यह उस रूढि़वादी सोच का डरावना चेहरा था जिस में पेट से हुई औरत भी मरीज नहीं, बल्कि किसी दैवीय शक्ति का शिकार मान ली जाती है.

औरतों के मसले पर काम करने वाली माधुरी का कहना है देश के अलगअलग हिस्सों से लगातार सामने आने वाली ऐसी घटनाएं यह साबित करती हैं कि अंधविश्वास का सब से बड़ा बोझ  औरतों  पर पड़ता है. कभी उन्हें डायन घोषित कर दिया जाता है, कभी ऊपरी साए का शिकार तो कभी बांझ  कह कर उन की सामाजिक पहचान ही खत्म करने की कोशिश की जाती है.

माधुरी ने आगे बताया कि राष्ट्रीय अपराध अभिलेख ब्यूरो के आंकड़े इस भयावह तसवीर की पुष्टि करते हैं.  साल 2020 में जादूटोना और डायन प्रथा से जुड़े 88 हत्या के मामले दर्ज हुए और साल 2022 में इस मामले में 85 लोगों की हत्या हुई. साल 2023 में यह संख्या 74 रही और साल 2024 में भी 54 हत्याएं दर्ज की गईं.

माहिरों का अंदाजा है कि पिछले 2 दशकों में देश में 2,500 से ज्यादा औरतों की जान जादूटोना, डायन प्रथा और अंधविश्वास से जुड़े मामलों में जा चुकी है. इन में बड़ी संख्या गरीब, दलित, आदिवासी, अकेली रहने वाली या सामाजिक रूप से कमजोर औरतों की थी.

इ न आंकड़ों का सब से दुखद पहलू यह भी है कि इन में दर्ज ज्यादातर घटनाएं केवल हत्या की नहीं हैं, बल्कि इन के पीछे महीनों और सालों तक चली लोगों की ज्यादती, सबके सामने बेइज्जती, पैसे की लूट, औरत के साथ गलत हरकत और मन को पहुंचाई गई तकलीफ छिपी होती है.

झारखंड, बिहार, छत्तीसगढ़, ओडिशा और मध्य प्रदेश लंबे समय से डायन प्रथा से जुड़े अपराधों के लिए चर्चा में रहे हैं. लेकिन अब उत्तर प्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र और हरियाणा जैसे राज्यों से भी झाड़फूंक और तंत्रमंत्र के नाम पर औरतों के शोषण की घटनाएं लगातार सामने आ रही हैं. इस का मतलब है कि समस्या किसी एक क्षेत्र या समुदाय तक सीमित नहीं रही, बल्कि बदलते रूप में पूरे देश में मौजूद है.

यदि किसी दंपति को संतान नहीं होती, तो सब से पहले औरत को दोषी ठहरा दिया जाता है. यदि कोई औरत अवसाद, चिंता, मिर्गी, सिजोफ्रेनिया या किसी अन्य दिमागी बीमारी से जूझ रही हो तो उसे डाक्टर के पास ले जाने के बजाय ऊपरी हवा का शिकार मान लिया जाता है.

यदि किसी विधवा के पास थोड़ी सी जमीन हो, यदि वह संपत्ति में अपना अधिकार मांगे या सामाजिक रूप से अकेली हो, तो उसे डायन घोषित करना आसान समझ जाता है.

यदि कोई औरत परिवार के ज्यादती का विरोध करे तो उसे देवी का प्रकोप या बुरी आत्मा का डर दिखा कर चुप करा दिया जाता है यानी अंधविश्वास और पाखंड सिर्फ धर्म से जुड़ी गलत सोच नहीं है, बल्कि कई बार इस का इस्तेमाल औरतों को दबाने और उन्हें अपने काबू में रखने के लिए भी किया जाता है.

हमारे समाज में लंबे समय से मां बनना औरत की सब से बड़ी जिम्मेदारी माना जाता रहा है. औरत के लिए मां बनना खुशी और सम्मान की बात है. लेकिन जब किसी औरत की कीमत सिर्फ इस बात से तय होने लगे कि वह मां बनी है या नहीं, तो यही सम्मान उस के लिए दबाव बन जाता है.

शादी के कुछ साल बाद अगर घर में बच्चे की किलकारी न गूंजे तो सब से पहले बहू से ही सवाल किए जाते हैं. रिश्तेदार तरहतरह की सलाह देने लगते हैं और पड़ोसी ताने मारने लगते हैं. कई बार पति की जांच कराने की बात तक नहीं होती. यहीं सब से बड़ी गलती होती है.

जिला चिकित्सालय बस्ती में चिकित्सक डाक्टर वीके वर्मा का कहना है कि मैडिकल साइंस साफतौर पर कहती है कि गर्भधारण न होने के मामलों में केवल औरत ही जिम्मेदार नहीं होती. मर्दों में बच्चा पैदा करने की क्षमता से जुड़ी दिक्कत, हार्मोन से जुड़ी दिक्कतें. इंफैक्शन, लाइफ स्टाइल और कई दूसरे कारण भी समान रूप से जिम्मेदार हो सकते हैं.

अनेक मामलों में दोनों की जांच जरूरी होती है. आज के मैडिकल साइंस के पास इस का उपचार भी है, इस के बावजूद समाज विज्ञान पर नहीं, अंधविश्वास पर भरोसा करता है.

इसी मानसिकता का फायदा उठा कर कथित तांत्रिक औरतों  को विश्वास दिलाते हैं कि उन के ऊपर किसी आत्मा का साया है, किसी ने जादूटोना कर दिया है, पूर्वज नाराज हैं या विशेष पूजा के बिना संतान संभव नहीं है.

इस के बाद शुरू होता है शोषण का वह सिलसिला जिस में पहले पैसे लिए जाते हैं, फिर औरत को परिवार से अलग कर के गुप्त अनुष्ठान कराए जाते हैं, बाद में यही गुप्त अनुष्ठान जिस्मानी शोषण का जरीया बन जाता है.

औरतों के साथ होने वाली इस ज्यादती में उस के अपने परिवार के लोग भी जानेअनजाने में इन बाबाओं के सहयोगी बन जाते हैं. वे खुद ही पत्नी, बेटी या बहू को ऐसे लोगों के पास ले कर जाते हैं, क्योंकि उन्हें भी लगता है कि यही आखिरी उम्मीद है. अपराधी किस्म के यह तांत्रिक इसी विश्वास का सब से ज्यादा फायदा उठाते हैं और शुरू होता है औरत के शोषण का खेल.

माधुरी आगे बताती हैं कि आज झाड़फूंक केवल दूरदराज के गांव तक सीमित नहीं रह गई है. उस ने आधुनिक तकनीक का चोला भी पहन लिया है. फेसबुक, यूट्यूब, इंस्टाग्राम, व्हाट्सऐप और सैकड़ों वैबसाइटों पर कथित तांत्रिक खुलेआम विज्ञापन करते दिखाई देते हैं. संतान प्राप्ति की गारंटी, सौ प्रतिशत सफल तंत्र, पतिपत्नी में प्रेम, विदेश जाने का उपाय, हर समस्या का समाधान  जैसे दावे लोगों की आस्था नहीं, उन की मजबूरी को निशाना बनाते हैं.

सब से ज्यादा निशाने पर वे औरतें  होती हैं जो सालों से संतान न होने की पीड़ा झोल रही होती हैं. कई बार उन से कहा जाता है कि उन पर किसी आत्मा का साया है, किसी ने जादूटोना कर दिया है या पूर्वज नाराज हैं. इस के बाद शुरू होती है महंगी पूजा, विशेष अनुष्ठान, गुप्त साधना और तंत्रमंत्र. इस के बाद औरत के परिजनों से हजारों से ले कर लाखों रुपए तक वसूले जाते हैं.

सा  माजिक कार्यकर्ता माधुरी कहती हैं कि सब से बड़ी समस्या अंधविश्वास नहीं, बल्कि जानकारी की कमी है. उन के अनुसार, यदि शादी के बाद लंबे समय तक संतान न हो तो परिवार का पहला कदम किसी बाबा के पास जाना नहीं, बल्कि महिला और पुरुष दोनों की मैडिकल जांच कराना होना चाहिए.

आधुनिक मैडिकल साइंस आज अधिकांश कारणों की पहचान कर सकता है और अनेक मामलों में उपचार भी उपलब्ध है. लेकिन जब समाज पहले ही औरत को दोषी मान लेता है, तब वह उपचार के बजाय अपराधियों के जाल में फंस जाती है.

माधुरी का आगे कहना है कि गांवों में सेहत से जुड़े जागरूकता अभियान केवल गर्भवती औरतों तक सीमित नहीं रहने चाहिए. लोगों को यह भी बताया जाना चाहिए कि बांझपन किसी एक व्यक्ति की समस्या नहीं होता. पुरुषों की जांच उतनी ही जरूरी है जितनी औरतों की. यदि यह संदेश समाज तक पहुंच गया, तो हजारों औरतें  ढोंगी तांत्रिकों के चंगुल में फंसने से बच सकती हैं.  Superstition

Power of Hard Work : मेहनत से बनाएं आज और कल

Power of Hard Work. उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ की 19 साल की भावना का भगवान में इतना ज्यादा विश्वास था कि वह अपना हर छोटाबड़ा काम मंदिर जा कर ईश्वर की सलाह से करती थी. कई बार तो वह परची निकालती थी कि यह काम करना चाहिए या नहीं. वैसे वह पिछड़ी जाति की है जिनके पुरखों ने मंदिरों में घुसने की भी हिम्मत नहीं की थी पर अब वह समझाती है कि ऊंची जातियों के लोग अमीर हैं क्योंकि भगवान उन की पूजा से प्रसन्न हैं. वह भी ऊंची जातियों से बढ़ कर पूजापाठ कर रही है.

एक बार भावना के छोटे भाई नीरज का 12वीं का रिजल्ट आना था तो उस ने मंदिर जा कर यह पूछा कि आज वह क्या कपड़े पहने कि उस के भाई के अच्छे नंबर आ जाएं? वहां एक पंडित बता दिया कि लाल रंग का सूट पहन ले काम बन जाएगा.

नीरज पढ़ाई में होशियार था, तो अच्छे नंबर आने थे, पर चूंकि भावना ने मंदिर में भगवान से पंडित के मार्फत किए वार्तालाप के मुताबिक लाल रंग का सूट पहना था तो उसे यह भरोसा हो गया कि ईश्वर से उस की डायरैक्ट बात होती है और वह कुछ भी कर सकती है. इंटरव्यू में सब जने सादे प्रैस किए शर्टपैंट पहन कर आए थे और नीरज लाल रंग के सूट में जोकर लग रहा था. वह रिजैक्ट हो गया.

क्या पूजापाठ और मंदिर जाने से भावना का भाग्य इतना ज्यादा बदल जाता था कि वह हर काम में कामयाब हो रही थी? नहीं. इस के उलट भाग्य के पीछे भागने वाली लड़की ‘इंतजार’ करती है, जबकि मेहनत के पीछे भागने वाली लड़की ‘इतिहास’ बनाती है.

ऐसा ही कुछ हाल दिल्ली की रहने वाली मोना का था. सुबहशाम नंगे पैर मंदिर जाना, पूरे मन से आरती करना. सोमवार को शिव के नाम का उपवास करना. वजह, मोना की उम्र 27 साल हो गई थी और मंदिर के पुजारी का कहना था कि सोलह सोमवार का उपवास करने से उसे मनचाहा वर मिल जाएगा. वह खेतों में काम करने वाले घर से थी, इसलिए वह नंगे पैर चल भी सकी थी. ऊंची जातियों की लड़कियां तो बैड से बाथरूम तक बिना चप्पल के नहीं जा सकतीं.

मोना ने सिर्फ 12वीं तक पढ़ाई की थी और वर चाहती थी कोई सरकारी नौकरी वाला. पर वह खुद को इतना ज्यादा आस्थावान मानती थी कि पूजापाठ से उस के सारे दुखदर्द दूर हो जाएंगे.

क्या होता है भाग्य के पीछे भागने से

धर्म के सारे कर्मकांड हमें कर्म से दूर ले जा कर भाग्य के भरोसे छोड़ देते हैं. जब हमारा कोई काम नहीं बनता है तो पंडेपुजारी के पढ़ाए पाठ से ‘मेरा भाग्य ही खराब है’ बोल कर हम कंट्रोल किसी और को दे देते हैं, जैसे पंडित, तारीख, कुंडली. इस से खुद पर से भरोसा हट जाता है.

जब हम पूजापाठ में लीन होते हैं तो 1-2 घंटे के इस समय में हमारा सारा ध्यान ‘मेरा कब अच्छा दिन आएगा’ सोचने में ही निकल जाता है, जबकि उसी समय में अगर कोई स्किल सीख लिया जाए, तो ज्यादा बेहतर रहता है.

पूजापाठ करने और भाग्यवादी होने से धीरेधीरे यह मन में यह सवाल उठने लगता है कि ‘अगर भाग्य साथ न दे तो?’ यह सोच हिम्मत तोड़ देती है. नतीजतन, लड़की रिस्क नहीं लेती, किसी नए काम को सीखने की ट्राई ही नहीं करती.

लोग फायदा उठाते हैं

धर्म का डर दिखा कर लड़कियों को दिमागी तौर पर कुंद करने के हजार तरीके हैं. सब से ज्यादा उन की शादी को ले कर मनोवैज्ञानिक खेल खेला जाता है. जैसे, ‘‘बेटा, तुम्हारी शादी में अड़चन है, एक पूजा करवा लो, फिर सारे संकट दूर.’’

कहने का मतलब है कि भाग्य के नाम पर लड़कियों को सब से ज्यादा डराया जाता है. नजर न लगे तो एक पैर में काला धागा बांध लो, लड़का नहीं मिल रहा तो रत्नजड़ी अंगूठी पहन लो, बस ऐसे ही टोटकों का इस्तेमाल कर लड़कियों को भाग्यवादी और पूजापाठी बना दिया जाता है.

मेहनत क्यों जरूरी

पहली नजर में ऐसा लगता है कि भाग्य वाली सोच मेहनत वाली सोच से बेहतर होती है और ज्यादातर लड़कियां ऐसा मान भी लेती हैं. लेकिन ‘मिलेगा तो ठीक’ से ‘मैं ले कर रहूंगी’ तक का सफर इतना भी मुश्किल नहीं होता है. बस लड़कियों को अपना भविष्य बनाने का 4 पिलर वाला फार्मूला नहीं भूलना चाहिए.

इस का पहला कदम है खुद को मजबूत बनाना. यह मजबूती पढ़ाई के बेस, एक्स्ट्रा स्किल और ‘न’ बोलना सीखने से आएगी. दूसरा कदम है अपने पैरों पर खड़ा होना. अच्छी पढ़ाई से बढि़या नौकरी मिलती है और बढि़या नौकरी पैसे दिलाती है. पैसा आप को आजाद होने का एहसास देता है.

तीसरे कदम की खासीयत है कि काम से आप को नाम और पहचान मिलती है. इस से आप को फैसला लेने की ताकत बढ़ जाती है. जब यह सब हो जाए तो चौथा कदम है दूसरों की मदद करना. उन्हें पढ़ाई और काम की अहमियत समझाना, पूजापाठ से दूर रहने की सलाह देना. मतलब, जब तुम कुछ बन जाओ, तो 2 लड़कियों को नौकरी दिलाओ या स्किल सिखाओ.

पिछले कुछ सालों में पूजापाठ बढ़ा

लड़कियों पर धर्म के ठेकेदारों का पहरा हमेशा रहा है, पर पिछले कुछ सालों से धर्म को ग्लैमराइज करने की कोशिश की गई है. अब धार्मिक जगहें ही नहीं, बाजार भी धर्म का प्रचारक बन गया है.

सोशल मीडिया ने भी हर छोटे से छोटे त्योहार को बड़ा बना कर नौजवान पीढ़ी को टारगेट किया है. धार्मिक अंधविश्वास को बढ़ाने वाली जूलरी लड़कियां खूब खरीद रही हैं. यह सारा  भ्रमजाल सरकार के उकसावे पर खूब फलफूल रहा है. नतीजतन, नौजवान पीढ़ी को लगता है कि ऊपर वाले से सही समय पर मौका मिलेगा और उन का भाग्य जाग जाएगा.

पर याद रखिए कि मौका अपनेआप नहीं आता है. मेहनत और स्किल से हम मौका खुद बनाते हैं. पूजापाठ हमें भाग्यवादी बनाता है, जिस की कोई जरूरत नहीं है.      Power of Hard Work

Hindi Story: डायन का कलंक – दीपक ने की बसंती की मदद

Hindi Story. आज पूरे 3 साल बाद दीपक अपने गांव पहुंचा था, लेकिन कुछ भी तो नहीं बदला था उस के गांव में. पहले अकसर गरमियों की छुट्टियों में वह अपने मातापिता और अपनी छोटी बहन प्रतिभा के साथ गांव आता था, लेकिन 3 साल पहले उसे पत्रकारिता पढ़ने के लिए देश के एक नामी संस्थान में दाखिला मिल गया था और कोर्स पूरा होने के बाद एक बड़े मीडिया समूह में नौकरी भी.

दीपक की बहन प्रतिभा को मैडिकल कालेज में एमबीबीएस के लिए दाखिला मिल गया था. इस वजह से उन का गांव में आना नहीं हो पाया था. पिताजी और माताजी भी काफी खुश थे, क्योंकि पूरे 3 साल बाद उन्हें गांव आने का मौका मिला था.

दीपक का गांव शहर से तकरीबन 15 किलोमीटर की दूरी पर बड़ी सड़क के किनारे बसा हुआ था, लेकिन सड़क से गांव में जाने के लिए कोई भी रास्ता नहीं था. गरमी के दिनों में तो लोग पंडितजी के बगीचे से हो कर आतेजाते थे, मगर बरसात हो जाने पर किसी तरह खेतों से गुजर कर सड़क पर आते थे.

जब वे गांव पहुंचे, तो ताऊ और ताई ने उन का खूब स्वागत किया. ताऊ तो घूमघूम कर कहते फिरे, ‘‘मेरा भतीजा तो बड़ा पत्रकार हो गया है. अब पुलिस भी हमारा कुछ नहीं बिगाड़ पाएगी.’’ दीपक के ताऊ की एक ही बेटी थी, जिस का नाम कुमुद था.

ताऊजी नजदीक के एक गांव में प्राथमिक पाठशाला में प्रधानाध्यापक थे. आराम की नौकरी. जब मन किया पढ़ाने गए, जब मन किया नहीं गए. वे इस इलाके में ‘बड़का पांडे’ के नाम से मशहूर थे. वे जिस गांव में पढ़ाते थे, वहां ज्यादातर दलित जाति के लोग रहते थे, जो किसी तरह मेहनतमजदूरी कर के अपना पेट पालते थे.

उन बेचारों की क्या मजाल, जो इलाके के ‘बड़का पांडे’ के खिलाफ कहीं शिकायत करते. शायद इसी का नतीजा था कि उन की बेटी कुमुद 10वीं जमात में 5 बार फेल हुई थी, पर ताऊ ने नकल कराने वाले एक स्कूल में पैसे दे कर उसे 10वीं जमात पास कराई थी.

दीपक का सारा दिन लोगों से मिलनेजुलने में बीत गया. अगले दिन शाम को वह अपने एक चचेरे भाई रमेश के साथ गांव में घूमने निकला. उस ने कहा कि चलो, अपने बगीचे की तरफ चलते हैं, तो रमेश ने कहा कि नहीं, शाम के समय वहां कोई नहीं जाता, क्योंकि वहां बसंती डायन रहती है.

दीपक को यह सुन कर थोड़ा गुस्सा आया कि आज विज्ञान कहां से कहां पहुच गया है, लेकिन ये लोग अभी भी भूतप्रेतों और डायन जैसे अंधविश्वासों में उलझे हुए हैं.

दीपक ने रमेश से पूछा ‘‘यह बसंती कौन है?’’

उस ने बताया, ‘‘अपने घर पर जो चीखुर नाम का आदमी काम करता था, यह उसी की पत्नी है.’’

चीखुर का नाम सुन कर दीपक को झटका सा लगा. दरअसल, चीखुर दीपक के खेतों में काम करता था और ट्रैक्टर भी चलाता था. उस की पत्नी बसंती बहुत सुंदर थी. हंसमुख स्वभाव और बड़ी मिलनसार. लोगों की मदद करने वाली. गांव के पंडितों के लड़के हमेशा उस के आगेपीछे घूमते थे.

दीपक ने रमेश से पूछा, ‘‘बसंती डायन कैसे बनी?’’ उस ने बताया, ‘‘उस के कोई औलाद तो थी नहीं, इसलिए वह दूसरे के बच्चों पर जादूटोना कर देती थी. वह हमारे गांव के कई बच्चों की अपने जादूटोने से जान ले चुकी है.’’

बसंती के बारे सुन कर दीपक थोड़ा दुखी हो गया, लेकिन उस ने मन ही मन ठान लिया कि उसे डायन के बारे में पता लगाना होगा.

जब थोड़ी रात हुई, तो दीपक शौच के बहाने लोटा ले कर घर से निकला और अपने बगीचे की तरफ चल पड़ा. बगीचे के पास एक कच्ची दीवार और उस के ऊपर गन्ने के पत्तों का छप्पर पड़ा था, जिस में एक टूटाफूटा दरवाजा भी था.

दीपक ने बाहर से आवाज लगाई, ‘‘कोई है?’’

अंदर से किसी औरत की आवाज आई, ‘‘भाग जाओ यहां से. मैं डायन हूं. तुम्हें भी जादू से मार डालूंगी.’’

दीपक ने कहा, ‘‘दरवाजा खोलो. मैं दीपक हूं.’’

वह औरत बोली, ‘‘कौन दीपक?’’

दीपक ने कहा, ‘‘मैं रामकृपाल का बेटा दीपक हूं.’’

वह औरत रोते हुए बोली, ‘‘दीपक बाबू, आप यहां से चले जाइए. मैं डायन हूं. आप को भी मेरी मनहूस छाया पड़ जाएगी.’’

दीपक ने कहा, ‘‘तुम बाहर आओ, वरना मैं दरवाजा तोड़ कर अंदर आ जाऊंगा.’’

तब वह औरत बाहर आई. वह एकदम कंकाल लग रही थी. फटी हुई मैलीकुचैली साड़ी, आंखें धंसी हुईं. उस के भरेभरे गाल कहीं गायब हो गए थे. उन की जगह अब गड्ढे हो गए थे.

उस औरत ने बाहर निकलते ही दीपक से कहा, ‘‘बाबू, आप यहां क्यों आए हैं? अगर आप की बिरादरी के लोगों ने आप को मेरे साथ देख लिया, तो मेरे ऊपर शामत आ जाएगी.’’

दीपक ने कहा, ‘‘तुम्हें कुछ नहीं होगा. लेकिन तुम्हारा यह हाल कैसे हुआ?’’

वह औरत रोने लगी और बोली, ‘‘क्या करोगे बाबू यह जान कर?’’

दीपक ने उसे बहुत समझाया, तो उस औरत ने बताया, ‘‘तकरीबन 2 साल पहले मेरे पति की तबीयत खराब हुई थी. जब मैं ने अपने पति को डाक्टर को दिखाया, तो उन्होंने कहा कि इस के दोनों गुरदे खराब हो गए हैं. इस का आपरेशन कर के गुरदे बदलने पड़ेंगे, लेकिन पैसे न होने के चलते मैं उस का आपरेशन नहीं करा पाई और उस की मौत हो गई.

‘‘पति की दवादारू में मेरे गहने बिक गए थे और हमारी एक बीघा जमीन जगनारायण पंडित के यहां गिरवी हो गई. अपने पति का क्रियाकर्म करने में जो पैसा लगाया था, वह सारा जगनारायण पंडित से लिया था. उन पैसों के बदले उस ने हमारी जमीन अपने नाम लिखवा ली, पर मुझे तो यह करना ही था, वरना गांव के लोग मुझे जीने नहीं देते. पति तो परलोक चला गया था. सोचा कि मैं किसी तह मेहनतमजदूरी कर के अपना पेट भर लूंगी.

‘‘फिर मैं आप के खेतों में काम करने लगी, लेकिन जगनारायण पंडित मुझे अकसर आतेजाते घूर कर देखता रहता था. पर मैं उस की तरफ कोई ध्यान नहीं देती थी.

‘‘एक दिन मैं खेतों से लौट रही थी. थोड़ा अंधेरा हो चुका था. तभी खेतों के किनारे मुझे जगनारायण पंडित आता दिखाई दिया. वह मेरी तरफ ही आ रहा था.

‘‘मैं उस से बच कर निकल जाना चाहती थी, लेकिन पास आ कर उस ने मेरा हाथ पकड़ लिया और बोला, ‘कहां इतना सुंदर शरीर ले कर तू दूसरों के खेतों में मजदूरी करती है. मेरी बात मान, मैं तुझे रानी बना दूंगा. आखिर तू भी तो जवान है. तू मेरी जरूरत पूरी कर दे, मैं तेरी जरूरत पूरी करूंगा.’

‘‘मैं ने उस से अपना हाथ छुड़ाया और उसे एक तमाचा जड़ दिया. मैं अपने घर की तरफ दौड़ पड़ी. पीछे से उस की आवाज आई, ‘तू ने मेरी बात नहीं मानी है न, इस थप्पड़ का मैं तुझ से जरूर बदला लूंगा.’

‘‘कुछ महीनों के बाद रामजतन का बेटा और मंगरू की बेटी बीमार पड़ गई. शहर के डाक्टर ने बताया कि उन्हें दिमागी बुखार हो गया है, लेकिन जगनारायण पंडित और उस के चमचे कल्लू ने गांव में यह बात फैला दी कि यह सब किसी डायन का कियाधरा है.

‘‘उन बच्चों को अस्पताल से निकाल कर घर लाया गया और एक तांत्रिक को बुला कर झाड़फूंक होने लगी. लेकिन अगले दिन ही दोनों बच्चों की मौत हो गई, तो जगनारायण पंडित ने उस तांत्रिक से कहा कि बाबा उस डायन का नाम बताओ, जो हमारे बच्चों को खा रही है.

‘‘उस तांत्रिक ने मेरा नाम बताया, तो भीड़ मेरे घर पर टूट पड़ी. मेरा घर जला दिया गया. मुझे मारापीटा गया. मेरे कपड़े फाड़ दिए गए और सिर मुंड़वा कर पूरे गांव में घुमाया गया.

‘‘इतने से भी उन का मन नहीं भरा और उन लोगों ने मुझे गांव से बाहर निकाल दिया. तब से मैं यहीं झोंपड़ी बना कर और आसपास के गांवों से कुछ मांग कर किसी तरह जी रही हूं’’.

उस औरत की बातें सुन कर दीपक की आंखें भर आईं. उस ने कहा, ‘‘मैं जैसा कहता हूं, वैसा करना. मैं तुम्हारे माथे से डायन का यह कलंक हमेशा के लिए मिटा दूंगा.’’

दीपक ने उसे धीमी आवाज में समझाया, तो वह राजी हो गई. दीपक ने गांव में यह बात फैला दी कि बसंती को कहीं से सोने के 10 सिक्के मिल गए हैं. पूरा गांव तो डायन से डरता था, लेकिन एक दिन जगनारायण पंडित उस के घर पहुंचा और बोला, ‘‘क्यों री बसंती, सुना है कि तुझे सोने के सिक्के मिले हैं. ला, सोने के सिक्के मुझे दे दे, नहीं तो तू जानती है कि मैं क्या कर सकता हूं.

‘‘जब पिछली बार तू ने मेरी बात नहीं मानी थी, तो मैं ने तेरा क्या हाल किया था, भूली तो नहीं होगी?

‘‘मेरी वजह से ही तू आज डायन बनी फिर रही है. अगर इस बार तू ने मेरी बात नहीं मानी, तो मैं तेरा पिछली बार से भी बुरा हाल करूंगा.’’

वह बसंती को मारने ही वाला था कि दीपक गांव के कुछ लोगों के साथ वहां पहुंच गया. इतने लोगों को वहां देख कर जगनारायण पंडित की घिग्घी बंध गई. वह बड़बड़ाने लगा. इतने में बसंती ने अपने छप्पर में छिपा कैमरा निकाल कर दीपक को दे दिया.

जगनारायण पंडित ने कहा, ‘‘यह सब क्या?है?’’

दीपक ने कहा, ‘‘मेरा यह प्लान था कि डायन के डर से गांव का कोई आदमी यहां नहीं आएगा, लेकिन तुझे सारी हकीकत मालूम है और तू सोने के सिक्कों की बात सुन कर यहां जरूर आएगा, इसलिए मैं ने बसंती को कैमरा दे कर सिखा दिया था कि इसे कैसे चलाना है.

‘‘जब तू दरवाजे पर आ कर चिल्लाया, तभी बसंती ने कैमरा चला कर छिपा दिया था और जब तू इधर आ रहा था, मैं ने तुझे देख लिया था. अब तू सीधा जेल जाएगा.’’

यह बात जब गांव वालों को पता चली, तो वे बसंती से माफी मांगने लगे. जगनारायण पंडित को उस के किए की सजा मिली. पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया. भीड़ से घिरी बसंती दीपक को देख रही थी, मानो उस की आंखें कह रही हों, ‘मेरे सिर से डायन का कलंक उतर गया दीपक बाबू.’

दीपक ने अपने नाम की तरह अंधविश्वास के अंधेरे में खो चुकी बसंती की जिंदगी में उजाला कर दिया था. Hindi Story

Hindi Story: अंधविश्वास

Hindi Story: जातियों को कंट्रोल करने के लिए मांगलिक दोष का डर बिहार के एक छोटे से कसबे में रहने वाली सविता शर्मा पढ़ीलिखी थी. वह नौकरी करती थी और अपने परिवार का सहारा भी थी. उस के लिए शादी के लिए रिश्ते आते थे, बातचीत होती थी, लड़का और लड़की एकदूसरे को पसंद भी कर लेते थे, लेकिन जैसे ही कुंडली मिलाई जाती, एक शब्द पूरे रिश्ते पर भारी पड़ जाता कि लड़कीमांगलिकहै.
इस के बाद सवाल होते, बातचीत. यह पूछा जाता कि सविता कैसी इनसान है. यह कि वह अच्छे जीवनसाथी के तौर पर कितनी जिम्मेदार साबित हो सकती है. बस, इतना कहा जाता कि हम अपने बेटे की जान खतरे में नहीं डाल सकते.

सविता शर्मा हर बार चुपचाप सुन लेती. धीरेधीरे उसे खुद पर शक होने लगा कि क्या सच में वह किसी की जिंदगी के लिए खतरा है? क्या उस के जन्म के समय मंगल ग्रह की किसी स्थिति ने उसे दोषी बना दिया है?
यह कहानी किसी एक सविता शर्मा की नहीं है, बल्कि उन लाखों लड़कियों और लड़कों की है, जिन की जिंदगी पर मांगलिक दोष नाम का एक अनदेखा लेकिन जालिम ठप्पा लगा दिया गया है खासकर ऊंची जातियों में, जिन में अमूमन कुंडली मिलान करने के बाद ही शादी तय होती है. बिना किसी अपराध, बिना किसी सुबूत, सिर्फ एक ज्योतिषीय सोच की बुनियाद पर. यहीं से शुरू होते हैं वे सवाल, जिन्हें पूछने से हमारा समाज आज भी डरता है.

मांगलिक दोष है कितना सच भारतीय समाज में शादी होने केवल 2 लोगों का निजी संबंध नहीं माना जाता, बल्कि उसे परिवार, परंपरा, धर्मजाति, कुलगोत्र और ग्रहनक्षत्रों से जोड़ कर देखा जाता है. इसी सिलसिले में मांगलिक दोष एक ऐसा शब्द बन चुका है, जिस ने असंख्य युवाओं, खासकर महिलाओं के जीवन में भय, अपमान, मानसिक यातना और अस्वीकार की दीवारें खड़ी की हैं. यह दोष केवल विवाह को कठिन बनाता है, बल्कि प्रेम, समानता और व्यक्ति की स्वतंत्रता जैसे आधुनिक मूल्यों पर भी सीधा प्रहार करता है.
मांगलिक दोष के नाम पर आज भी भारत में रिश्ते टूटते हैं, लड़कियों को अशुभ कहा जाता है, लड़कों को डराया जाता है और परिवारों को मानसिक गुलामी में जकड़ दिया जाता है.

सवाल यह नहीं है कि ज्योतिष में मंगल ग्रह का क्या स्थान है? सवाल यह भी है कि क्या किसी ग्रह की कथित स्थिति के आधार पर किसी मनुष्य के पूरे जीवन को अभिशप्त घोषित कर देना नैतिक, वैज्ञानिक और मानवीय है? मांगलिक दोष क्या है, इस संबंध में पंडित वाचस्पति ने बताया कि ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार, यदि किसी व्यक्ति की कुंडली में मंगल ग्रह कुछ विशेष भावों पहले, चौथे, सातवें, आठवें या बारहवें भाव में स्थित हो, तो उसे मांगलिक कहा जाता है. यह मान लिया जाता है कि ऐसा व्यक्ति विवाह के लिए अशुभ होता है और उस के जीवनसाथी को कष्ट, बीमारी या मृत्यु तक का सामना करना पड़ सकता है.

यहीं से समस्या शुरू होती है. बिना किसी वैज्ञानिक प्रमाण के, एक अनुमान को सामाजिक सत्य बना दिया गया. यह मान्यता पीढ़ी दर पीढ़ी चलती रही और धीरेधीरे यह भय, अफवाह और सामाजिक दबाव का औजार बन गई. विज्ञान बनाम ज्योतिष आज का युग विज्ञान, तर्क और प्रमाण का युग है. खगोल विज्ञान और ज्योतिष में बुनियादी अंतर है. खगोल विज्ञान ग्रहों की गति, दूरी और भौतिक गुणों का अध्ययन करता है, जबकि ज्योतिष उन ग्रहों को मनुष्य के भाग्य से जोड़ देता है, बिना किसी ठोस वैज्ञानिक आधार के.
अब तक दुनिया में ऐसी कोई वैज्ञानिक स्टडी नहीं हुई है जो यह साबित करे कि मंगल ग्रह की स्थिति शादी, मौत, बीमारी या शादी से जुड़े ?ागड़े की वजह बनती है. अगर मंगल ग्रह सच में इतना असरदार होता, तो एक ही दिन जनमे लाखों लोगों की जिंदगी एक सी होती, लेकिन हकीकत इस से ठीक उलट है.

सफल और असफल विवाह, सुख और दुख, बीमारी और सेहत, ये सब सामाजिक, माली, दिमागी और बायोलोजिकल वजह से जुड़े होते हैं, कि किसी ग्रह की काल्पनिक स्थिति से. मांगलिक दोष के सब से बड़े शिकार भारतीय समाज में मांगलिक दोष का सब से खतरनाक असर लड़कियों पर पड़ता है. मांगलिक लड़की को अकसर मनहूस, अशुभ, खतरनाक जैसे शब्दों से नवाजा जाता है. उस की कुंडली उस के किरदार, उस की तालीम, उस की काबिलीयत से बड़ी मान ली जाती है. कई परिवारों में मांगलिक लड़की की शादी देर से होती है या उसे जबरन किसी ऐसे लड़के से ब्याह दिया जाता है, जिसे भी मांगलिक बताया गया हो. चाहे उन दोनों की सोच, पढ़ाईलिखाई या जिंदगी को सम?ाने के नजरिए में कोई तालमेल हो.ऐसे हालात में लड़की की नई सोच और आत्मसम्मान पर सीधा हमला होता है. उसे यह भरोसा दिला दिया जाता है कि वह अपने जीवनसाथी के लिए खतरा है. यह मानसिक हिंसा का एक गहरा और अनदेखा रूप है.

दिमागी सेहत पर असर
मांगलिक दोष के डर से पीडि़त नौजवान डिप्रैशन और चिंता का शिकार हो जाते हैं. कई लड़कियां यह मानने लगती हैं कि वे अपने पति की मौत की वजह बन सकती हैं. यह सोच उन के आत्मविश्वास को तोड़ देती है और जिंदगी को बो? बना देती है. कुछ मामलों में मांगलिक होने का ठप्पा खुदकुशी जैसे खतरनाक कदमों तक ले गया है. सवाल यह है कि क्या एक अप्रमाणित सोच किसी की जान से ज्यादा कीमती है?

धार्मिकता या सामाजिक कंट्रोल
अकसर मांगलिक दोष को धर्म से जोड़ कर उसे सवालों से परे रखा जाता है, लेकिन सच यह है कि यह धार्मिक आस्था से ज्यादा सामाजिक कंट्रोल का उपकरण बन चुका है. ब्याह के बाजार में यह दोष सौदेबाजी का हथियार बन जाता हैदहेज बढ़ाने, लड़की को नीचा दिखाने या रिश्ते तोड़ने के लिए.
मांगलिक दोष और पाखंड सब से बड़ा विरोधाभास यह है कि मांगलिक दोष को उपायों से खत्म किया जा सकता है.
ज्योतिषी द्वारा यह बताया जाता है कि मांगलिक लड़कियों का ग्रह से छुटकारा पाने के लिए पेड़ या मूर्ति से ब्याह पहले किया जाता है, खास तरह का पूजापाठ कराया जाता है. पर अगर कोई दोष इतना घातक है कि वह मौत तक करा सकता है, तो वह किसी पेड़ या मूर्ति से शादी कर के कैसे खत्म हो सकता है? यह साफ करता है कि मांगलिक दोष एक डर पैदा करने वाला सिद्धांत है, जिसे बाद में आर्थिक और धार्मिक पाखंड से जोड़ा गया.

कानून का नजरिया
भारतीय संविधान लोगों की बराबरी, इज्जत और आजादी की गारंटी देता है. किसी इनसान को ग्रहों की बुनियाद पर भेदभाव का शिकार बनाना, उस की शादी के हक को सीमित करना या मानसिक पीड़ा देना, संवैधानिक वैल्यू के खिलाफ है. हालांकि, कानून सीधे मांगलिक दोष को नहीं पहचानता, लेकिन इस के चलते होने वाला भेदभाव, दहेज, मानसिक हिंसा और सामाजिक बहिष्कार कानूनन अपराध की श्रेणी में सकते हैं.
तालीम और वैज्ञानिक सोच का रोल मांगलिक दोष जैसे अंधविश्वासों के खिलाफ सब से बड़ा हथियार पढ़ाईलिखाई है. वैज्ञानिक सोच, तर्कभरी बातें और सवाल करने की आदत समाज को इस डर से दूर कर सकती हैं. आज जरूरी है कि स्कूलकालेजों और सामाजिक मंचों पर यह चर्चा खुले रूप में हो कि शादी की बुनियाद ग्रह नहीं, बल्कि आपसी सम?, इज्जत और जिम्मेदारी होनी चाहिए.

नई पीढ़ी और बदलाव की उम्मीद
अच्छा संकेत यह है कि शहरी और पढ़ेलिखे नौजवानों में मांगलिक दोष की पकड़ कमजोर पड़ रही है. प्रेम विवाह, अंतर्जातीय विवाह और बराबरी की बुनियाद पर खड़े रिश्ते इस अंधविश्वास को चुनौती दे रहे हैं.
लेकिन यह बदलाव अभी अधूरा है. गांवदेहात के इलाकों और पारंपरिक परिवारों में आज भी यह डर गहराई से मौजूद है, इसलिए लड़ाई लंबी है, लेकिन लड़नी जरूरी है.

मांगलिक दोष के विरोध का मतलब
मांगलिक दोष का विरोध केवल ज्योतिष का विरोध नहीं है, बल्कि यह विरोध है मर्द और औरत की बराबरी के पक्ष में, वैज्ञानिक सोच के समर्थन में, मानसिक आजादी के लिए, शादी को इनसानी संबंध मानने के लिए, कि यह ग्रहों का खेल है. यह विरोध उस सिस्टम के खिलाफ है, जो डर पैदा कर के लोगों को कंट्रोल करता है, उन्हें बुजदिल बनाता है. ग्रह नहीं, इनसान जिम्मेदार हैं,
किसी भी शादी की कामयाबी या नाकामी की वजह कोई ग्रह नहीं, बल्कि इनसान होते हैं. उन की सोच, उन का बरताव, उन के हालात होते हैं. जब हम यह जिम्मेदारी ग्रहों पर डाल देते हैं, तो हम खुद से भागते हैं.
मांगलिक दोष जैसा अंधविश्वास एक सामाजिक भरम है, जिसे मिटाना बहुत ज्यादा जरूरी है. यह केवल लोगों की निजी आजादी का सवाल है, बल्कि एक ज्यादा बेहतर समाज बनाने की शर्त भी है.
जब तक हम यह नहीं सम?ोंगे कि इनसान का भविष्य किसी ग्रह की स्थिति से नहीं, बल्कि उस के काम, फीलिंग्स और सामाजिक ढांचे से बनता है, तब तक मांगलिक दोष जैसे अंधविश्वास हमारी जिंदगी पर ग्रहण बन कर छाए रहेंगे. अब समय गया है कि हम उस ग्रहण को हटाएं.                      

Superstition Crime: अंधविश्वास की आड़ में हत्या

Superstition Crime, लेखक –  वीरेंद्र कुमार खत्री

पढ़ाईलिखाई के प्रचारप्रसार के बावजूद हमारा समाज आज भी अंधविश्वास जैसी बुराई से उबर नहीं पाया है. इस की आड़ में हत्याएं हो रही हैं.

बिहार के नवादा जिले में एक शर्मनाक घटना घटी. डायन के आरोप में भीड़ ने पहले तो एक पतिपत्नी का मुंडन किया, उन पर चूना लगा कर गांवभर में घुमाया और फिर पेड़ से बांध कर बुरी तरह से मारपीट की, जिस में पति की मौके पर ही मौत हो गई, जबकि पत्नी गंभीर रूप से घायल हो गई.

मीडिया रिपोर्ट से पता चला है कि मुसहरी टोला में मारे गए उस आदमी के पड़ोसी के घर छठीयारी समारोह मनाया जा रहा था, जिस में डीजे बारबार बंद हो रहा था.

लोगों ने इसे जादूटोना कर दिए जाने का आरोप लगा कर पीडि़त पतिपत्नी को घर से बाहर निकाला और मारपीट की.

गौर करें तो ऐसा पहली बार नहीं हुआ है, जब जादूटोना करने के आरोप में लोगों को मौत की नींद सुलाने की खबरें अखबारों की सुर्खियां बनी हैं. आएदिन इस तरह की खबरें समाज के सामने आती रहती हैं.

दूसरी घटना यह सामने आई कि एक ओ झा के कहने पर औलाद की चाहत में एक बुजुर्ग का सिर काट कर धड़ को होलिका दहन में जला कर बलि दे दी और सिर को तालाब में गड्ढा खोद कर गाड़ दिया.

यह घटना बिहार के औरंगाबाद जिले के मदनपुर थाना के जलवन गांव की है. इस साल होली से पहले होलिका दहन की जगह से जो हड्डियां पुलिस ने बरामद कीं, उन की जांच में बुजुर्ग की हड्डियां होने की तसदीक हुई.

इस से पहले झारखंड के गुमला के एक गांव में डायन आरोप लगा कर 4 लोगों की पीटपीट कर हत्या कर दी गई. खबरों के मुताबिक, गांव के लोगों ने सामूहिक रूप से पहले बैठक कर उन्हें मार डालने का फैसला लिया और फिर 1-1 कर चारों को घर से निकाल कर लाठीडंडे से पीटपीट कर मार डाला.

पिछले साल झारखंड की राजधानी रांची के निकट एक गांव की 5 औरतों की डायन के शक में हत्या कर दी गई थी. झारखंड में ही एक 80 साल की बूढ़ी औरत को डायन बता उस के भतीजे ने मार दिया था.

हत्यारे का मानना था कि उस के बेटे की बीमारी के लिए वह बूढ़ी औरत ही जिम्मेदार थी.

बिहार और झारखंड ही नहीं, बल्कि देश के दूसरे राज्यों में भी इसी तरह की हैवानियत देखने को मिलती रहती है. पिछले साल उत्तर प्रदेश के सोनभद्र जिले में डायन होने के शक में एक औरत की जीभ काट दी गई.

अंधविश्वास की ज्यादातर निर्मम घटनाएं उन्हीं राज्यों में देखी जा रही हैं जहां तालीम पूरी तरह पहुंच नहीं सकी है. अमूमन इन इलाकों में रहने वाले लोग अभी भी पढ़ाईलिखाई के मामले में पिछड़े हैं. वे अपनी बीमारी की मूल वजह सम झने के बजाय इसे भूतप्रेत और डायन का असर मान रहे हैं. इस का बुरा नतीजा यह है कि डायन की आड़ में घटनाएं घट रही हैं.

आदिवासी बहुल राज्य झारखंड की ही बात करें तो यहां अंधविश्वास की जड़ें काफी गहरी हैं और उस का सब से ज्यादा खमियाजा औरतों को भुगतना पड़ रहा है.

एक गैरसरकारी संस्था ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि देश में तकरीबन हर साल सैकड़ों से ज्यादा औरतों की हत्या डायन के नाम पर होती है. पिछले डेढ़ दशक में देश में डायन के नाम पर तकरीबन 2,000 से भी ज्यादा औरतों की हत्या हो चुकी है.

देखा जाए तो दिल दहलाने वाली ये घटनाएं मामूली नहीं हैं. जहां एक ओर देश में औरतें पंचायतों में अहम सहभागी बन रही हैं, नई बुलंदियों को चूम रही हैं और संसद में भी अपना लोहा मनवा रही हैं, वहीं डायन के नाम पर उन की बेरहमी से हत्या हो रही है. समाज के ठेकेदार डायन के नाम पर उन्हें बिना कपड़ों के घुमा रहे हैं और रेप कर रहे हैं.

समाज में फैली इन कुरीतियों और अंधविश्वासों के खिलाफ जनजागरण चलाने की जरूरत है. साथ ही, इन घटनाओं को अंजाम देने वालों को भी कड़ी सजा मिलनी चाहिए. समाज में ऐसे लोगों को रहने का हक नहीं है, जो अपना मतलब साधने के लिए अंधविश्वासों को बढ़ावा दे रहे हैं.

देश के लोगों को सम झना होगा कि अंधविश्वास को खत्म करने की जिम्मेदारी सिर्फ सरकार की ही नहीं है. इसे उखाड़ फेंकने के लिए समाज को भी आगे आना होगा.

उन क्षेत्रों की पहचान करनी होगी, जहां ऐसी घटनाएं बारबार हो रही हैं. उन वजहों को भी तलाशना होगा, जिन के चलते इन घटनाओं को बढ़ावा मिल रहा है.

हसपुरा के समाजसेवी डाक्टर विपिन कुमार का कहना है कि कम पढ़ेलिखे लोग अकसर गंभीर बीमारियों से निबटने के लिए अस्पतालों में जाने के बजाय तांत्रिकों की शरण लेते हैं. तांत्रिक उन के अंधविश्वास का फायदा उठा कर उन्हें लूटते तो हैं ही, उन्हें अपराध करने के लिए भी उकसाते हैं.

बेहतर होगा कि सरकार और स्वयंसेवी संस्थाएं पिछड़े और सुविधाहीन क्षेत्रों में शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करें. इस से अफवाहों और अप्रिय घटनाओं पर रोक लगेगी और समाज अंधविश्वास से छुटकारा पा लेगा.

सब से जरूरी बात यह है कि ऐसी वारदातों को अंजाम देने वालों को कानून कड़ी से कड़ी सजा दे. Superstition Crime

Superstition Crime: तांत्रिक की हैवानियत – 10 साल में 12 हत्याएं

Superstition Crime, Writer – मोहित कुमार

एक ऐसा सीरियल किलर जो बेहद शातिर और खतरनाक था, 6 महीने तक ड्राइवर बन कर छिपा रहा और लोगों व पुलिस की आंखों में धूल झोंकता रहा.

पुलिस भी उस की असलियत नहीं जान पाई थी. इस मास्टरमाइंड ने अपनी चालाकी और रहस्यमयी पहचान से लंबे समय तक कानून को मात देता रहा. इस सनकी कातिल ने 12 लोगों की हत्या की थी मगर लाख कोशिशों के बावजूद पुलिस को चकमा दे कर फरार हो जाता था। मगर कहते हैं न कि कानून के हाथ लंबे होते हैं और यही हुआ भी। एक दिन पुलिस के शिकंजे में यह आ ही गया।

उसे पकड़ने के लिए पुलिस को काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ा था. मीडिया की सुर्खियों में रही इस कातिल की कहानी ने सब को हैरान कर दिया था। जानते हैं, इस कातिल की रहस्य से जुड़ी क्राइम स्टोरी :

हम बात कर रहे हैं गुजरात के राजकोट में पुलिस हिरासत में लिए गए नवल सिंह और उसे पकड़वाने वाला शख्स जिगर गोहिल की. नवल सिंह नगमा (काल्पनिक नाम) महिला से प्यार करता था. दोनों के बीच प्यार हुआ तो फिर जिस्मानी ताल्लुकात भी बन गए। इस बीच नगमा उस पर शादी करने का दबाव डालने लगी। लेकिन वह शादी करने का झांसा देता रहता. इस के बाद प्यार का झूठा वायदा करने वाले इस तांत्रित प्रेमी ने उस महिला से पीछा छुड़ाने के लिए उस का कत्ल कर कर दिया. जब नगमा के मांबाप और उस के भाई को पता चला कि नगमा गुम है तो उस की तलाशी हुई. मांबाप और उस के भाई को नहीं पता था कि उस के तांत्रिक प्रेमी ने नगमा की हत्या कर उसे दफना दिया है.

पुलिस में शिकायत

जब नगमा के घर वाले अपनी बेटी को ढूंढ़ने में कामयाब नहीं हो पाए तो उन्होंने पुलिस में शिकायत दर्ज करा दी. तांत्रिक डरा हुआ था और जब उसे लगा कि पुलिस मेरे पास पहुंच सकती है तो उस ने एक साजिश रची. उस ने नगमा के मांबाप और भाई से बताया कि वह अपनी तंत्र (Superstition) विद्या से नगमा को ढूंढ़ सकता है मगर इस के लिए सब को एक सुनसान दरगाह पर आना होगा.

फिर तांत्रिक अपने षड्यंत्र में कामयाब हो गया और तीनों को प्रसाद में खतरनाक जहर मिला कर खिला दिया, जिस से तत्काल तीनों की मौत हो गई.

मौत के घाट उतार कर उस ने उन तीनों के पास एक सुसाइड नोट रख दिया. इस मर्डर में सीरियल किलर जिगर गोहिल भी था. पुलिस ने इस अपराधी को पकड़ कर हिरासत में रखा था, लेकिन अचानक लौकअप में उस की तबियत बिगड़ गई और वह मर गया.

इस की मौत को लेकर पुलिस खुद ताज्जुब कर रही थी. इस के बाद पुलिस द्वारा इस सीरियल किलर का पोस्टमार्टम कराया गया. जब पुलिस को पता चला कि उस की मौत हार्ट अटैक से हुई है तो पुलिस सोच में पड़ गई क्योंकि जिन 12 लोगों की मौत हुई थी उन की भी हार्ट अटैक से मौतें हुई थीं.

कौन था नवल

नवल एक तांत्रिक था. वह अपने झूठे तंत्रमंत्र का डर दिखा कर लोगों को फंसाता और उन के पैसे लूट कर मौत के घाट उतार दिया करता था. यह तांत्रिक अहमदाबाद के सुरेंद्र नगर में काला जादू किया करता था. इस को तांत्रिक बनने का आइडिया एक तांत्रिक को देख कर आया था. बाकी इस ने टीवी पर आने वाले क्राइम शो पर सीखा.

तांत्रिक जानता था कि बहुत से लोग लालच में पैसे या सोना डबल कराने के लिए तांत्रिक का सहारा लिया करते हैं. बस, इसी बात को जान कर उस ने लोगों को फायदा उठाना चालू कर दिया. इस तांत्रिक का काला जादू चल पडा. इस के बाद वह लोगों को ठगता चला गया.

2021 के एक रोड ऐक्सिडैंट में एक नौजवान की मौत हो गई थी. पुलिस इसे रोड ऐक्सिडैंट मान कर फाइल बंद कर दी। मगर उस के भाई को शक था कि उस का भाई रोड ऐक्सिडैंट में नहीं बल्कि किसी ने उस की हत्या की है. भाई की मौत का पता लगाने के लिए वह पुलिस के चक्कर काटता रहा, लेकिन पुलिस ने उस की एक भी बात नहीं मानी. इस के बाद वह अपने भाई के कातिल का पता करने में लग गया.

कौन था हत्यारा

उसे पता चला कि 1 महीने पहले उस का भाई एक तांत्रिक (Superstition) के संपर्क में आया था. उस का नाम नवल था. इस के बाद वह नवल के करीब जाने लग गया। उस को पता चला कि उस के पास भी एक कार है जिसे रात में टैक्सी के रूप में चलवाता है. नवल को एक टैक्सी ड्राइवर की जरूरत थी और वह उस के पास जा पहुंचा और पार्ट टाइम टैक्सी चलाने लगा.

उस का ड्राइवर बनने के बाद जिगर को पता चला कि तंत्रमंत्र के अलावा उस के और भी कई रूप हैं. इस के बाद जिगर 7 महीने तक उस का ड्राइवर बना और तंत्रमंत्र के अलावा सारी जानकारी इकट्ठा करने लगा.

जिगर ने नवल का भरोसा इतना जीत लिया था कि उसे अपने पूरे रहस्य बता दिया करता था. नवल ने जिगर से कहा कि एक बिजनैसमैन मेरे पास पैसे डबल कराने आने वाला है. फिर क्या था, नवल जिगर को लालच दे कर बोला कि कार की स्टैपनी में एक बोतल और उस में सोडियम नाइट्रेट नाम का रसायन छिपा हुआ है.

इस के साथ ही एक शराब की बोतल भी है. नवल ने प्लान बनाया था कि वह आदमी उस के पास पैसे डबल कराने आएगा तो तुम उसे इस शराब को पिला देना जिस से उस की मौत हो जाएगी. उस ने बताया कि इस रसायन को पिला कर उस ने कई लोगों को मौत के घाट उतार दिया है. उस ने बताया कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मौत की वजह हार्ट अटैक आती है. इस बात को सुन कर जिगर को यकीन हो गया था कि उस के भाई की भी मौत इस ने ही की है, क्योंकि पोस्टमार्टम में भी इसी रसायन का नाम आया था. इस के बाद वह पुलिस को मैसेज के जरिए इस बात की जानकारी देता है और अपनी लोकेशन भी बता देता है.

इस के बाद नवल को अरेस्ट कर लिया गया। पुलिस ने पूछताछ की तो उस की बात सुन कर हैरान हो गई थी क्योंकि पुलिस ने एक आम आदमी को अरेस्ट नहीं किया था बल्कि एक सीरियल किलर को अरेस्ट किया था क्योंकि यह किलर 10 साल में 12 कत्ल कर चुका था. पहला कत्ल दादी, दूसरा कत्ल मां और तीसरा कत्ल अपने चाचा का. पुलिस का कहना है कि नवल एक पैसे वाले तांत्रिक (Superstition) को जानता था जो इसी रसायन का प्रयोग किया करता था. पुलिस का मानना है कि 12 कत्ल से भी ज्यादा मौतों का आंकड़ा भी हो सकता था. इस से पूरी पूछताछ करने से पहले ही इस की मौत हो चुकी है. Superstition Crime

Superstition: कथा और यात्रा के नाम पर गरीबों की मार

Superstition: आजकल देशभर में कथावाचकों की बाढ़ आई हुई है. वे अपने अनुयायियों को दानदक्षिणा और धार्मिक यात्राओं की अहमियत समझा कर उन की जेब खाली करा लेते हैं, जबकि आम जनता को गरीबी के अलावा कुछ हासिल नहीं होता है.

उत्तर प्रदेश के इटावा जिले में कुछ गांव ऐसे हैं, जो बकरीपालन में विदेशों तक अपनी पहुंच बना चुके हैं.

इन गांवों में पाली जाने वाली ‘जमुनापारी’ बकरी की डिमांड तेजी से बढ़ रही है. बकरी को ‘गरीबों की गाय’ भी कहा जाता है, पर आजकल धर्म के नाम पर गरीबों की ही बकरी की तरह बलि चढ़ाई जा रही है. कहीं कथा सुनने के नाम पर, तो कहीं धार्मिक यात्रा में उन के नाम पर सरकारी इमदाद लूटने का खेल चल रहा है.

हाल ही में इसी ऐतिहासिक जिले इटावा में एक कथावाचक को पीटने का मामला सामने आया. मुकुट मणि यादव नाम के एक कथावाचक पर खुद को ब्राह्मण बता कर कथा सुनाने का आरोप लगाया गया, जबकि वह यादव जाति का निकला. इस मामले में इटावा पुलिस ने 4 आरोपियों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया.

दरअलस, इटावा जिले के ददारपुर गांव वालों ने भागवत कथा कराई थी, पर जब पता चला कि कथावाचक मुकुट मणि यादव ब्राह्मण नहीं, बल्कि यादव है, तो गांव वालों ने मुकुट मणि यादव और उस के सहयोगी संत कुमार यादव के साथ मारपीट और बदतमीजी की, साथ ही उन दोनों के बाल भी काट दिए.

आजकल देशभर में ऐसे कथावाचकों की बाढ़ सी आ गई है, जो अपने हुनर और मशहूरी के चलते हजारों से लाखों रुपए कथा बांचने के वसूलते हैं. कथा सुनने वालों में ज्यादातर वे लोग होते हैं, जिन के पास काम नहीं होता है और वे भंडारे में मिलने वाले भोजन की आस में वहां चले जाते हैं और अपनी जेब के पैसे तक चढ़ावे में चढ़ा आते हैं. उन्हें धर्म का ऐसा नशा दिया जाता है कि मानो ऐसी कथाएं सुनने से ही उन का यह जीवन तर जाएगा.

पर असल में ऐसा कुछ होता नहीं है, बल्कि इस तरह की कथाओं में जा कर गरीब अपने काम से भी जाता है और पैसे से भी. उन्हें कभी भी ऐसी सलाह नहीं दी जाती है कि वे रोजगार को ही अपना धर्म सम झें. उन्हें बचत का भी पाठ नहीं पढ़ाया जाता है, जबकि यह जरूर कह दिया जाता है कि दान करने से ईश्वर उन्हें अपनी शरण में ले लेगा.

अब एक दिल्ली सरकार के फैसले पर गौर करते हैं. भारतीय जनता पार्टी की इस सरकार ने कांवड़ यात्रा में सेवा समितियों को शिविर लगाने के लिए 50 हजार से 10 लाख रुपए तक की मदद के साथसाथ मुफ्त बिजली देने का ऐलान किया है.

सरकार का मानना है कि कांवड़ शिविरों के नाम पर हो रहे भ्रष्टाचार को खत्म करने के लिए ऐसा कदम उठाया गया है. इस से बिचौलियों का रोल खत्म हो जाएगा.

यहां पर यह सवाल उठता है कि धर्म के नाम पर लोग भ्रष्टाचार करते ही क्यों हैं? सरकार क्यों ऐसी धार्मिक यात्राओं पर सरकारी पैसा लुटा रही है, जिस से किसी का भला नहीं होता?

ऐसी धार्मिक यात्राओं में ज्यादातर वे लोग जाते हैं, जो पहले से ही गरीब होते हैं. बहुत से तो बेरोजगार होते हैं. उन्हें किसी कामधंधे पर लगाने के बजाय सेवा समितियों को सरकारी इमदाद देने का कोई तुक नहीं है.

गरीब को पढ़नेपढ़ाने की जरूरत है. उसे इतना हिसाबकिताब तो आना ही चाहिए कि अगर वह अपना कोई छोटामोटा कामधंधा शुरू करे, तो अपने ग्राहक से पैसे का लेनदेन कर सके, जबकि ऐसी भागवत कथाओं में बैठ कर उस का दिमाग कुंद होता है और कांवड़ जैसी धार्मिक यात्राओं में पैर के छाले फूटते हैं. Superstition

Superstition: औरतों पर भूतप्रेत आने की साजिश

Superstition, लेखक – शकील प्रेम

नोएडा, उत्तर प्रदेश की रहने वाली कंचन की शादी को 7 साल हो चुके थे. इस बीच उसे एक के बाद एक 3 बेटियां हो गईं. तीसरी बेटी के जन्म के बाद से ही कंचन के पति महेश का रवैया बदल गया था, जैसे कि बेटी पैदा करने का सारा कुसूर कंचन का ही है. कंचन और बच्चा नहीं चाहती थी और अपनी तीनों बेटियों को अच्छी परवरिश देना चाहती थी.

कंचन की सब से छोटी बेटी जब 2 साल की हुई, तो कंचन ने नजदीक के एक प्राइवेट स्कूल में प्राइमरी टीचर के रूप में नौकरी करना शुरू कर दिया और अपनी दोनों बड़ी बेटियों का एडमिशन भी इसी प्राइवेट स्कूल में करा दिया.

कंचन सुबह अपनी दोनों बेटियों को स्कूल के लिए तैयार करती और सब से छोटी बेटी को दादादादी के पास छोड़ कर खुद भी तैयार हो कर स्कूल चली जाती.

कंचन के पति और उस के परिवार वाले कंचन के इस फैसले से खुश नहीं थे. वे चाहते थे कि कंचन घर में रहे और एक बेटे को जन्म दे, लेकिन कंचन अपनी जिद पर अड़ी थी.

कंचन का गर्भनिरोधक गोलियां लेना महेश को पसंद नहीं था, लेकिन कंचन नहीं मानती थी. इस से उन दोनों में बातबात पर लड़ाइयां होने लगीं. कंचन की सास भी लगातार ताने मारती थी, जिस से कंचन का घर में रहना मुश्किल होता जा रहा था. इस सब में कंचन को अपनी बेटियों की चिंता थी.

कंचन पर घर के बिगड़ते हालात का असर होने लगा. धीरेधीरे एक साल और बीत गया. अब वह पहले जैसी नहीं रह गई थी. कभी वह अचानक जोरजोर से हंसने लगती, तो कभी गहरी उदासी में चली जाती. उदासी के वक्त उस के मन में बहुत ही बुरे खयाल आते. कई बार तो खुदकुशी करने का मन करता.

कंचन के बदलते बरताव को देख कर उस की सास को लगने लगा था कि कंचन पर कोई ऊपरी चक्कर हो गया है. कंचन का पति महेश भी अपनी मां की बात को सही मानने लगा.

रविवार का दिन था. महेश और कंचन दोनों की छुट्टी थी. सुबह कंचन पर उस की बीमारी हावी हुई और वह घर के बरतनों को उठा कर फेंकने लगी. कंचन ने अपनी छोटी बेटी को मारने की कोशिश भी की.

यह देख कर महेश बेहद घबरा गया और कंचन के शांत हो जाने के बाद उस ने कंचन से कहा, ‘‘कंचन, कल सोमवार है. मैं औफिस से छुट्टी करूंगा, तुम भी कल छुट्टी कर लो और मेरे साथ गाजियाबाद चलो. वहां एक बाबा हैं, जो तुम्हारे ऊपर के बुरे साए का इलाज कर देंगे.’’

कंचन पढ़ीलिखी थी और जानती थी कि ऊपरी चक्कर जैसी बातें महज अंधविश्वास हैं. उसे कोई ऊपरी चक्कर नहीं है, बल्कि यह एक दिमागी बीमारी है. इस का इलाज कोई मनोचिकित्सक ही कर सकता है.

कंचन ने महेश से कहा, ‘‘ठीक है, कल तुम छुट्टी कर लो. मैं तुम्हारे साथ गाजियाबाद चलूंगी, लेकिन किसी बाबा के पास नहीं, बल्कि हम दोनों गाजियाबाद के एक अस्पताल चलेंगे.’’

महेश अपनी पत्नी कंचन की बात से सहमत नहीं था, लेकिन वह जानता था कि कंचन बहुत जिद्दी औरत है, अगर उसे कल अस्पताल जाना है, तो वह जा कर ही रहेगी.

गाजियाबाद के एक अस्पताल में चैकअप कराने के बाद पता चला कि कंचन को ‘बायपोलर डिसऔर्डर’ है. डाक्टर ने 3 महीने की दवा लिखी और कंचन के पति महेश को समझाया कि अगर कंचन को पूरी तरह ठीक देखना है, तो उसे घर में तनाव के वातावरण से छुटकारा दिलाना होगा.

महेश अपनी पत्नी कंचन से प्यार करता था. वह डाक्टर की बात सम?ा गया और 3 महीने में ही कंचन इस बीमारी से छुटकारा पा गई.

रुखसाना किसी हिंदू लड़के से प्यार करती थी, लेकिन रुखसाना और उस के प्रेमी के बीच धर्म की दीवारें इतनी ऊंची थीं कि वह लांघ न पाई और घर वालों की मरजी से उस ने अपने धर्म के लड़के से शादी कर ली.

पर शादी के 2 साल बाद तक रुखसाना अपने पहले प्यार को नहीं भूल पाई. इस में रुखसाना के शौहर अजीम का ही कुसूर था.

इन 2 सालों में अजीम ने रुखसाना को एक भी ऐसा पल नहीं दिया था, जिस में उसे यह एहसास हो सके कि अजीम उस के प्रेमी से बेहतर है. बातबात पर हाथ उठा देना अजीम की फितरत थी. गालियां बकना तो रोज की बात थी. अजीम के घर वालों का बरताव भी ज्यादा अच्छा नहीं था.

ससुराल वालों के इसी रवैए को देख कर रुखसाना अभी बच्चा नहीं चाहती थी, बल्कि वह नौकरी करना चाहती थी, लेकिन उस के शौहर को उस का नौकरी करना पसंद नहीं था.

एक दिन रुखसाना को पता चला कि उस के प्रेमी ने शादी कर ली है, तो रुखसाना का दिल टूट गया और तभी से उस की दिमागी हालत में गड़बड़ी पैदा होने लगी.

रुखसाना के मन में अजीबअजीब से विचार आने लगे. कभी उसे लगता कि उस का प्रेमी बांहें फैलाए घर के बाहर खड़ा है, तो वह दौड़ कर बाहर जाती और उसे वहां न पा कर जोरजोर से रोने लगती.

रुखसाना हमेशा डरती रहती. कभी तेज आवाज में चिल्लाने लगती, तो कभी जोरजोर से रोने लगती. हालत बिगड़ती देख रुखसाना की ससुराल वाले डर गए और उन्होंने बहाना बना कर रुखसाना को मेरठ में उस के मायके भेज दिया.

मेरठ में रुखसाना का भाई उस की बीमारी को ऊपरी चक्कर सम?ा बैठा और उस ने रुखसाना के इलाज के लिए मेरठ के एक पीर बाबा से बात भी कर ली. रुखसाना की भाभी नगमा पढ़ीलिखी थी और एक प्राइवेट कंपनी में नौकरी करती थी.

नगमा ने अपने पति को समझाया कि वह रुखसाना का इलाज अच्छे अस्पताल में किसी दिमाग के डाक्टर से कराए. जल्द ही नगमा की वजह से रुखसाना का इलाज नजदीकी प्राइवेट अस्पताल में होने लगा.

डाक्टर ने रुखसाना में सिजोफ्रेनिया के लक्षण पाए. 6 महीने तक रुखसाना का ट्रीटमैंट चलता रहा. बेहतर मानसिक इलाज की बदौलत आखिरकार रुखसाना ठीक हो गई.

नगमा ने अपनी कंपनी में बात की और रुखसाना को भी वहीं नौकरी दिला दी. एक साल बाद ही रुखसाना ने अपने शौहर अजीम को तलाक का नोटिस भिजवा दिया और इस वक्त वह बेहद खुशहाल जिंदगी जी रही है.

सभी तरह की दिमागी बीमारियों के लक्षण ऐसे ही होते हैं, जिन्हें आम आदमी सम?ा नही पाता, क्योंकि हम बचपन से जिस सामाजिक माहौल में पलेबढ़े होते हैं, वहां इस तरह की बीमारियों को भूतप्रेत और जिन्न से जोड़ कर ही देखा जाता है.

ऐसी बीमारियां सदियों से रही हैं. हर धर्म के पुरोहित, बाबा, पादरी और मुल्लाओं ने इन बीमारियों का इस्तेमाल अपना धंधा चमकाने में किया है. ज्यादातर औरतों को होने वाली दिमागी बीमारियों के जरीए पुरोहितों वगैरह द्वारा आम आदमी के मन में जिन्न, चुड़ैल, बुरी आत्माएं और जादूटोने का डर बिठाना आसान हो जाता था.

शुरू से ही दिमागी तौर पर बीमार औरतों के साथ इस तरह की घटनाएं आम बात थीं. आज भी अखबारों में ऐसी दर्दनाक घटनाओं की खबरें आती रहती हैं.

अभी हाल ही में बिहार में एक औरत की लाश मिली थी, जिस के पैरों में ढेर सारी कीलें ठोंकी हुई थीं.

इस तरह के मामलों में रहीसही कसर टैलीविजन और सिनेमा पूरी कर देते हैं, जो हमें इन बीमारियों के प्रति जागरूक करने के बजाय हमारे मन में यह बात बिठा देते हैं कि किसी के शरीर पर किसी और की आत्मा फिट हो सकती है, इसे तंत्रमंत्र द्वारा शरीर से उतारा भी जा सकता है.

समस्या यह है कि दिमागी बीमारियों के बारे में जागरूकता की घोर कमी की वजह से लोग अपने मरीजों को दिमाग के डाक्टर के पास ले जाने के बजाय किसी बाबा के पास ले जाते हैं, क्योंकि वे लोग इस तरह के डाक्टरों के बारे में जानते ही नहीं हैं और वे अंधविश्वास के गड्ढे में जाने को मजबूर हो जाते हैं.

अजीब हरकतें क्यों

आप ने ऐसे कई लोगों को देखा होगा, जो बहुत कम बोलते हैं, लेकिन जब वे शराब के नशे में होते हैं, तो बिलकुल अलग किस्म के इनसान हो जाते हैं. तब वे अजीब हरकतें करते हैं और विचित्र बातें करते हैं. तब हम कहते हैं कि शराब का असर है. जब नशा उतरेगा, तो फिर से पहले जैसा हो जाएगा.

भूत बाधा के समय भी यही होता है. यहां हमारे दिमाग के बैलेंस को बिगाड़ने में शराब नही, बल्कि कई प्रकार की घरेलू समस्याएं और घोर डिप्रैशन की अवस्था जिम्मेदार होती है, जिसे हम जानकारी की कमी में भूत बाधा समझ लेते हैं. ऐसी अवस्था मे मरीज कुछ ऐसी अजीब हरकतें करने लगता है, जो हमारी समझ से परे होता है और हम इसे बुरी आत्मा का साया समझ लेते हैं.

औरतें झूमने क्यों लगती हैं

आप को नाचना नहीं आता, इस के बावजूद जब आप किसी पार्टी में डीजे के पास होते हैं, तो आप के पैर अपनेआप थिरकने लगते हैं और जिन्हें थोड़ाबहुत भी नाचना आता है, वे तो कूद पड़ते हैं मैदान में.

यही होता है, जब पहले से बीमार औरत ऐसी किसी जगह पर जाती है जहां पहले से कई औरतें झूम रही होती हैं, तो वह औरत भी झूमने लगती है और माहौल देख कर कई ऐसी औरतें भी झूमने लगती हैं, जिन के ऊपर किसी आत्मा का साया नही होता.

इन में कई औरतें वे भी होती हैं, जो अपनी सास, जेठानी या ननद को परेशान करने के लिए जानबूझ कर नाटक करती हैं. नकली देवी आई हो या असली देवी ऐक्टिंग ही तो करनी है, आखिर सच का किसे पता चलता है? झाड़फूंक करने वाला इस नौटंकी का भी पूरा फायदा उठाता है, उसे तो पैसा ऐंठने से मतलब होता है.

सैक्स इच्छा को दबाना

नूतन की पवन से अरेंज मैरिज हुई थी. पवन उम्र में नूतन से 15 साल बड़ा था लेकिन नूतन से बेहद प्यार करता था. नूतन को अपनी ससुराल में भी कोई दिक्कत नहीं थी. बड़ा सा घर था. पवन बिजनैस में थे, इसलिए रुपयों की भी कोई कमी नही थी. ससुराल में सास और देवर भी साथ रहते थे सभी नूतन की बहुत इज्जत करते थे.

ऊपरी तौर पर तो नूतन की जिंदगी में कोई कमी नहीं थी लेकिन एक औरत के सुख के लिए सिर्फ धनदौलत ही जरूरी नहीं होता. नूतन का पति नूतन से बहुत प्यार करता था, फिर भी नूतन अधूरी सी थी. उसे अपने पति से जिस सुख की उम्मीद थी वह उसे पवन नही दे पाता था. दोनों की शादी को एक साल हो चुका था.

विकास और नूतन दोनों हमउम्र थे. विकास बैंक के एग्जाम की तैयारी घर से ही कर रहा था. विकास ज्यादातर समय घर में ही रहता. जिस्मानी सुख की चाह में नूतन अपने देवर विकास के प्रति आकर्षित होने लगी.

जवानी के सैलाब ने जिंदगी की दो अलगअलग किश्तियों को एक कर दिया. दोनों के बीच मुहब्बत का यह सिलसिला 2 साल तक चलता रहा और एक दिन विकास की शादी तय हो गई.

नूतन के लिए यह बड़ा मुश्किल समय था, लेकिन वह कर भी क्या सकती थी. जल्द ही नई बहू के रूप में घर में विकास की बीवी आ गई और नूतन के अरमानों की किश्ती एक बार फिर डांवांडोल हो गई.

हालांकि विकास की शादी के बाद भी चोरीछिपे दोनों के बीच जिस्मानी संबंध चलता रहा, लेकिन अब नूतन के लिए यह रिश्ता एक तरह का पाप बन कर रह गया था. हर बार उसे विकास की बीवी का डर बना रहता.

विकास का रवैया भी बदल चुका था. ऐसे में नूतन तनाव में रहने लगी और उसे मालूम ही न चला कि कब वह दिमागी बीमारी की शिकार हो गई.

भारत में ज्यादातर दिमागी बीमारियों की शिकार औरतें ही हैं. बेमेल शादी का सब से बड़ा दंश औरतें ही झेलती हैं. समाज में मर्दों के लिए कोई रुकावट नहीं होती. घर में पत्नी के होते हुए एक मर्द अनेक औरतों से अपनी हवस की भरपाई करता है.

लेकिन एक औरत की काम इच्छाओं के बारे में कोई नहीं सोचता. अगर किसी लड़की की शादी ऐसे लड़के से हो जाए, जो उस की कामेच्छाओं को संतुष्ट न कर पाता हो तब वह लड़की क्या करे?

कामेच्छाओं को दबाना औरत के दिमाग पर गहरा असर करता है. लंबे समय तक इच्छाओं का यह दमन चलता रहे तो औरत किसी न किसी दिमागी बीमारी की शिकार जरूर हो जाती है.

समाज की वे औरतें जो अपनी यौन इच्छाओं की भरपाई के लिए मजबूरन किसी और मर्द से जिस्मानी रिश्ता बना लेती हैं, वे भी दिमागी तौर पर ठीक नहीं रह पाती हैं. राज खुल जाने और ब्लैकमेलिंग का डर लगातार बना रहता है. बदनामी का खतरा लगातार सिर पर मंडराता रहता है, जिस के चलते ऐसी औरतें सहज जिंदगी नहीं जी पाती हैं और धीरेधीरे दिमागी बीमारी का शिकार हो जाती हैं.

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