Religious Superstition. हरियाणा की धरती, जो कभी मेहनतकश किसानों और विचारकों की ज्ञानभूमि हुआ करती थी, आज डिजिटल युग के ‘रील्स मार्केटिंग’ वाले बाबाओं की चारागाह बन चुकी है.
हांसी के नंद नगर में सजे ‘श्री बालाजी धाम’ के दरबार पर नजर डालें, तो समझ आता है कि 21वीं सदी में भी अंधविश्वास को कितने शातिर ढंग से बेचा जा सकता है.
गद्दी पर बैठे हैं तथाकथित महंत डाक्टर दिनेश पुरी, जिन्हें लोग ‘हांसी वाले बाबा’ कहते हैं, मगर इन की असलियत चमचमाती मर्सिडीज गाड़ी, यूट्यूबरों की फौज और कोर्टकचहरी के चक्करों के बीच हिचकोले खा रही है.
यह वही ‘डिजिटल ठगी’ का मौडर्न कुनबा है जहां लच्छेदार बातों की चाशनी में लपेट कर सीधेसादे लोगों की जेब और दिमाग दोनों पर डाका डाला जाता है. कतई गजब ढा रखा है इन धंधेबाजों ने.
परची का धंधा
डाक्टर दिनेश पुरी के दरबार का विज्ञान बड़ा सीधा है, कैमरा औन करो, भावुकता का माहौल बनाओ, और फिर एक परची निकाल कर किसी लाचार इनसान के भूत, भविष्य और वर्तमान का फैसला कर दो.
विज्ञान और चिकित्सा को अंगूठा दिखाते हुए यहां तंत्रमंत्र से कैंसर ठीक करने के दावे बेचे जाते हैं. जब लोग अपनी गंभीर बीमारियों और पारिवारिक समस्याओं से टूट चुके होते हैं, तब यह ढोंगी उन्हें इलाज के बजाय दैवीय चमत्कार के चक्रव्यूह में फंसाता है.
लेकिन जैसा कि कबीर कह गए हैं कि काठ की हांड़ी बारबार नहीं चढ़ती… इस कथित चमत्कार की पोल तब खुली जब हांसी के ही एक वकील राजेश कुमार ने इस पाखंड को कोर्ट तक घसीट लिया.
बाबा ने सरेआम परची निकाल कर वकील पर तंत्रमंत्र का झूठा आरोप मढ़ा था, जिस के जवाब में पुलिस ने न सिर्फ एफआईआर दर्ज की, बल्कि अब यह ढोंगी अदालत में मानहानि के मुकदमे भुगत रहा है.
शिकायत करने वाले वकील राजेश कुमार ने अदालत में बेहद मजबूत कानूनी तर्क रखे हैं. वकील का कहना है कि बाबा का यह कृत्य केवल एक शख्स की मानहानि नहीं, बल्कि कानून व्यवस्था और नागरिक अधिकारों पर सीधा हमला है.
बिना किसी सुबूत के, भरे दरबार में लाइव कैमरे के सामने किसी पर ‘कैंसर करवाने का तांत्रिक प्रयोग’ करने का आरोप लगाना मानसिक प्रताड़ना की श्रेणी में आता है.
कानूनी तर्कों के मुताबिक, बाबा ने सोशल मीडिया के विशाल मंच का इस्तेमाल कर के पीडि़त परिवार का सामाजिक बहिष्कार करवाया, जिस से उन की इज्जत पूरी तरह धूल में मिल गई.
अब पीडि़त पक्ष की मांग बेहद कड़क है कि बाबा को उसी सोशल मीडिया पर लाइव आ कर, हाथ जोड़ कर लिखित और मौखिक माफी मांगनी होगी, क्योंकि कानून के राज में कोई भी ढोंगी खुद को अदालत से ऊपर नहीं समझ सकता.
कसता कानूनी शिकंजा
यह पूरा मामला केवल मानहानि तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सीधेतौर पर कानून की धज्जियां उड़ाने का है. कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, इस प्रकार के ढोंग पर भारतीय न्याय संहिता की धारा 318 (ठगी/ धोखाधड़ी) और धारा 356 (मानहानि) के तहत गंभीर कानूनी कार्रवाई बनती है.
इस के साथ ही, तंत्रमंत्र और दैवीय शक्तियों से कैंसर जैसी लाइलाज बीमारियों को ठीक करने का भ्रामक दावा करना ‘ड्रग्स एंड मैजिक रैमेडीज (आपत्तिजनक विज्ञापन) अधिनियम, 1954’ के तहत एक संज्ञेय अपराध है.
जातिगत नफरती टिप्पणी
इस पाखंडी का अहंकार सिर्फ अंधविश्वास फैलाने तक सीमित नहीं रहा. जब समाज के सजग लोगों और किसान नेताओं ने इन के पाखंड को ‘डिजिटल आतंकवाद’ कह कर बेनकाब करना शुरू किया, तो बाबा अपनी मर्यादा भूल गए.
भरे मंचों से और बयानों में विशिष्ट समाजों और उन के नेतृत्व को निशाना बनाते हुए ‘हुड्डासूडा’ जैसे अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल किया गया. यह किसी आध्यात्मिक गुरु की भाषा नहीं, बल्कि एक डरे हुए सियार की बौखलाहट है.
मर्सिडीज वाला अध्यात्म
साध्वी देवा ठाकुर और धर्मेंद्र हुड्डा जैसे लोगों ने जब इन के तंत्र की परतें खोलीं, तो सच सामने आया कि इस भीड़ के पीछे असल खेल ‘कैश और कीवर्ड्स’ का है. सोशल मीडिया पर जो लाखों की रील्स दिखती हैं, उन के पीछे यूट्यूबरों को दी जाने वाली अघोषित रकम और तगड़ी पीआर टीम काम करती है.
जनता से चढ़ावे और ‘रसीद’ के नाम पर काटी गई गाढ़ी कमाई धर्मार्थ कामों में जाने के बजाय लग्जरी गाडि़यों के टायर घिसने और इस झूठे भ्रामक प्रचार तंत्र को जिंदा रखने में फूंकी जा रही है. साफ कहें तो यह अध्यात्म नहीं, बल्कि अंधविश्वास की रील्स बना कर नोट छापने की मौडर्न फैक्टरी है.
राहत की बात यह है कि इस डिजिटल पाखंड के खिलाफ हरियाणा का प्रबुद्ध समाज और स्थानीय सामाजिक संगठन अब खुल कर खिलाफ उतरने लगे हैं. तर्कशील सोसाइटियों, छात्र संगठनों और किसान यूनियनों ने इस अंधविश्वास के खिलाफ एक बड़ा वैचारिक मोरचा खोल दिया है.
कहा जा रहा है कि बीमारियों के लिए बाबाओं के परचों के बजाय अच्छे अस्पतालों और डाक्टरों पर भरोसा करें. यह सामाजिक आंदोलन इस बात का प्रमाण है कि हरियाणवी समाज अब इन ढोंगियों के झांसे में आ कर अपनी गाढ़ी कमाई और स्वाभिमान को लुटने नहीं देगा.
यह समय हरियाणवी समाज के लिए पूरी तरह जागने का है. कानून अपनी कार्रवाई पुलिस फाइलों और हिसार कोर्ट के चक्करों में कर ही रहा है व धर्मेंद्र हुड्डा ने भी कानूनी कार्रवाई की बात कही है, लेकिन सब से बड़ा बहिष्कार जनता की अदालत को करना होगा. Religious Superstition




