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Story in Hindi. आप के भीतर भी बैठा है शर्माजी

Story in Hindi. राजस्थान के एक जज शर्माजी ने कहा था कि मोर सारी जिंदगी ब्रह्मचारी रहता है. वह रोता है तो उस के आंसू मोरनी पी लेती है और पेट से हो जाती है इसलिए मोर को राष्ट्रीय पक्षी बनाया गया है. भारत सरकार द्वारा अब गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित कर देना चाहिए और उसे मारने वाले को ताउम्र कैद की सजा देनी चाहिए.

हम सब लोग शर्माजी की खिल्ली उड़ा रहे हैं. लेकिन क्या हम सभी लोग शर्माजी जैसे ही दंतकथाओंअंधविश्वासों को जानकारी मान कर नहीं जी रहे हैं?

मैं इंगलैंड में पढ़ेलिखे जयपुर के एक बड़े अस्पताल में प्रैक्टिस करने वाले एक ऐसे डाक्टर को जानता हूं जो सच में मानता है कि उस का बेटा गुरुओं के आशीर्वाद से ही पैदा हुआ है. कुछ सालों पहले तक मैं भी मानता था कि मंगलवार को व्रत रखने से मेरे सभी काम बन जाएंगे. इतना ही नहीं, जब बच्चा ज्यादा रोता है तो ज्यादातर घरों में उस की नजर उतारी जाती है.

हम मोर वाली कहानी पर ही यकीन नहीं करते बल्कि नाग की मणि, छींकने पर काम बिगड़ जाना, बिल्ली का रास्ता काट जाना, स्वर्गनरक, पूजानमाज वगैरह पर भी यकीन रखते हैं.

अब मैं खुद को अपने आसपास अकेला पाता हूं. कुछ महीने पहले जब मेरी मां की मौत हुई तो मैं ने घोषणा की थी कि कोई धार्मिक कर्मकांड नहीं होगा. मां के शव को मैडिकल कालेज को दान दिया जाएगा तो मेरी बड़ी बहन ने कहा कि बिना अंतिम संस्कार के आत्मा की मुक्ति कैसे होगी?

मैं ने कहा कि आत्मा और रूह कुछ नहीं होती. दरअसल, आप खुद कुछ भी नहीं सोचते. आप सोच की परंपरा की अगली कड़ी बन जाते हैं और हजारों सालों तक समाज एक ही ढर्रे पर चलता रहता है.

औरतों के हकों के बारे में, दूसरे धर्म वालों के बारे में, जाति के बारे में जैसे आप के पिताजी सोचते हैं, वैसे ही आप भी सोचने लगते हैं इसलिए धर्म के बारे में, संस्कृति के बारे में, मान्यताओं के बारे में आप कुछ नया नहीं सोच पाते हैं.

इस का नतीजा यह होता है कि सारी दुनिया उसी पुरानी सोच में फंसी रह जाती है. आप के कपड़े बदल जाते हैं, मकान बनाने का तरीका बदल जाता है, गाड़ी बदल जाती है, लेकिन सोच नहीं बदलती. आप अपने हालात के लिए किस्मत को, अपने पुराने कर्मों को या ईश्वर को जिम्मेदार मानते रहते हैं.

राजस्थान के जस्टिस शर्मा भी तो भारतीय समाज की नुमाइंदगी करते हैं.  अगर कोई इनसान समाज से अलग तरह से सोचने की कोशिश करता है तो उसे गालियां व बेइज्जती मिलती है इसलिए भी डर के मारे लोग समाज की सोच से अलग नहीं सोच पाते हैं.

समाज में इज्जत वाला बन कर रहने के लिए भी हम आसपास के समाज जैसा बन कर रहते हैं.

जो इनसान ईश्वर या अल्लाह की महानता के बड़ेबड़े दावे करता है उसे समाज में बड़ी इज्जत भी मिलती है. लेकिन जो कहता है कि इनसान की बदहाली के लिए समाज की व्यवस्था जिम्मेदार है और इस समाज को अच्छा बनाने का काम भी इनसान को ही करना पड़ेगा तो वह गाली खाता है इसलिए राजस्थान के जज शर्माजी का मजाक उड़ाने से पहले अपनी हालत पर भी नजर डाल लीजिए एक बार, क्योंकि आप सब के भीतर भी एक शर्माजी बैठा हुआ है. Story in Hindi

Story in Hindi : जिंदगी के साथ भी जिंदगी के बाद भी

Story in Hindi. वह औरत कौन थी? कार में धीरज के साथ कहां जा रही थी? धीरज के साथ उस का क्या रिश्ता था? धीरज के पास से तो उस का मोबाइल और पर्स मिल गया था, लेकिन उस औरत का कोई पहचानपत्र या मोबाइल घटनास्थल से बरामद नहीं हुआ. इस वजह से यह सब एक रहस्य बन गया था.

धीरज के मित्र, औफिस वाले, रिश्तेदार और पड़ोसी सब जानना चाहते थे कि आखिर वह औरत थी कौन? और उस का धीरज से क्या रिश्ता था? सब को धीरज की मौत का गम कम, उस राज को जानने की उत्सुकता ज्यादा थी.

जिंदगी में कभीकभी ऐसा घटित हो जाता है कि इंसान समझ ही नहीं पाता कि यह क्या हो गया? ऐसी ही एक घटना नहीं बल्कि दुर्घटना घटी शोभा के साथ. उस का पति धीरज एक औरत के साथ सड़क दुर्घटना में मारा गया था.

पुलिस ने अपनी खानापूर्ति कर दी. दोनों लाशों का पोस्टमौर्टम हो गया. उस औरत की लाश को लेने कोई नहीं आया, सो, उस का अंतिम संस्कार पुलिस द्वारा कर दिया गया.

वह औरत शादीशुदा थी क्योंकि उस की मांग में सिंदूर था. सवाल यह था कि वह गैरमर्द के साथ कार में क्यों थी? कार के कागजात के आधार पर पता चला कि वह कार धीरज के मित्र की थी. एक दिन पहले ही धीरज ने उस से यह कह कर ली थी कि वह एक जरूरी काम से चंडीगढ़ जा रहा है, लेकिन कार दुर्घटनाग्रस्त हुई दिल्लीआगरा यमुना ऐक्सप्रैसवे पर यानी धीरज ने अपने मित्र से झूठ बोला.

जब दुर्घटना की गुत्थी नहीं सुलझ सकी तो लोगों ने खुल कर कहना शुरू कर दिया कि उस औरत के साथ धीरज के अवैध रिश्ते रहे होंगे और वे दोनों मौजमस्ती के लिए निकले होंगे.

लोगों की इस बेहूदा सोच पर शोभा खासी नाराज थी लेकिन वह कर भी क्या सकती थी. किसी का मुंह वह बंद तो नहीं कर सकती थी.

धीरज उसे बहुत प्यार करता था. शादी के 5 वर्षों में जब उन्हें संतान सुख नहीं मिला तब उन दोनों ने अपनाअपना मैडिकल चैकअप कराया. रिपोर्ट में पता चला कि वह मां नहीं बन सकती जबकि धीरज पिता बनने के काबिल था. यह जान कर वह बहुत रोई और धीरज से बोली, ‘तुम दूसरी शादी कर लो, मैं अपना जीवन काट लूंगी.’

‘शोभा, अगर कमी मुझ में होती तो क्या तुम मुझे छोड़ कर दूसरी शादी कर लेतीं,’ कहते हुए धीरज ने उसे अपनी बांहों में भर लिया था.

क्या उस से इतना प्यार करने वाला धीरज उस के साथ इस तरह बेवफाई कर सकता है? शोभा ने अपने मन को यह कह कर तसल्ली दी, हो सकता है उस औरत ने धीरज से लिफ्ट मांगी हो. लेकिन दिमाग में कुछ सवाल बिजली की तरह कौंध रहे थे कि धीरज ने अपने दोस्त से गाड़ी चंडीगढ़ जाने को कह कर ली तो फिर वह आगरा जाने वाले यमुना ऐक्सप्रैसवे पर क्यों गया? मित्र से उस ने झूठ क्यों बोला? आखिर वह जा कहां रहा था? और उसे भी कुछ बता कर नहीं गया जबकि वह उस को छोटी से छोटी बात भी बताता था. कुछ बात तो जरूर है तभी धीरज ने उस से अपने बाहर जाने की बात छिपाई थी.

शोभा को दुखी और परेशान देख कर उस के पिता ने कहा, ‘‘बेटी, जो होना था वह तो हो गया, तुम अब खुद को मजबूत करो और आर्थिक रूप से अपने पांवों पर खड़ी होने की कोशिश करो. धीरज की कोई सरकारी नौकरी तो थी नहीं कि जिस के आधार पर तुम्हें नौकरी या पैंशन मिलेगी. उस के कागजात देखो, शायद उस ने कोई इंश्योरैंस पौलिसी वगैरह कराई हो. उस के बैंक खातों को भी देखो. शायद तुम्हें कुछ आर्थिक मदद मिल सके.’’

‘‘नहीं पापा, मुझे सब पता है. उन्होंने कोई पौलिसी वगैरह नहीं कराई थी. न ही बैंक में कोई खास रकम है, क्योंकि उन की नौकरी मामूली थी और वेतन भी कम था. कुछ बचता ही कहां था जो वे जमा करते. वे अपने मांबाप की भी आर्थिक मदद करते थे.’’

‘‘फिर भी बेटा, एक बार देख लो, हर इंसान अपने आने वाले वक्त के लिए करता है और फिर धीरज जैसे समझदार इंसान ने भी कुछ न कुछ अवश्य किया होगा.’’

दुखी मन से शोभा ने धीरज की अलमारी खोली, शायद उस के कागजात के साथ ही उस के साथ हुए हादसे का भी कोई सूत्र मिल जाए. अलमारी में बैंक की एक चैकबुक मिली और भारतीय जीवन बीमा निगम की एक डायरी मिली. उस ने उसे जोश के साथ से खोला. पहले ही पृष्ठ पर लिखा था, ‘जिंदगी के साथ भी, जिंदगी के बाद भी.’ कुछ पृष्ठों पर औफिस से संबंधित कार्यों का लेखाजोखा था.

डायरी के बीच में एक मैडिकल स्टोर का परचा मिला, जिस में कुछ दवाइयां लिखी थीं. ये कौन सी दवाइयां थीं, खराब लिखावट की वजह से कुछ भी समझ नहीं आ रहा था. जिस तारीख का परचा था, शोभा को खासा याद था कि उस ने उस दौरान कोई दवाई नहीं मंगाई थी. इस का मतलब धीरज ने अपने लिए दवा खरीदी थी. यह सोच कर वह भयभीत हो उठी कि कहीं धीरज किसी गंभीर बीमारी से पीडि़त तो नहीं था.

उस ने फौरन मैडिकल स्टोर जाने का फैसला लिया. वह मैडिकल स्टोर उस के घर से काफी दूर था, लेकिन वह वहां गई. मैडिकल स्टोर वाले ने परचे पर लिखी दवाएं तो बता दीं लेकिन दवाएं लेने कौन आया था, वह न बता सका. दवाइयां दांतों की बीमारी से संबंधित थीं.

उस दौरान धीरज को दांतों से संबंधित कोई समस्या नहीं थी. अगर थी भी तो वह अपने घर या औफिस के नजदीक के मैडिकल स्टोर से दवा लेता. इतनी दूर आने की क्या जरूरत थी? तो इस का मतलब साफ था कि धीरज ने किसी और के लिए दवाइयां खरीदी थीं. किस के लिए खरीदी थीं, यह जानने के लिए शोभा ने घर आ कर धीरज का सामान फिर से टटोला.

उस ने उस की डायरी दोबारा अच्छी तरह से चैक की. 15 अगस्त वाले पृष्ठ पर उस ने लिखा था, ‘आज आजादी का दिन मेरे लिए खास बन गया.’ आखिर15 अगस्त को ऐसा क्या हुआ था जो उस के लिए खास बन गया था, इस बात का जिक्र नहीं था.

उस ने उस के मोबाइल पर भी एक चीज नोट की, उस ने अपने मोबाइल के वालपेपर पर तिरंगे के साथ अपनी हंसतीमुसकराती तसवीर लगा रखी थी. तभी उस का मोबाइल बज उठा. बच्चे की खिलखिलाहट की रिंगटोन थी. यह सत्य था कि उसे बच्चों से बहुत प्यार था, इसलिए उस ने बच्चे की खिलखिलाहट की रिंगटोन लगा रखी थी. लेकिन आज ध्यान से सुना तो बीच में कोई धीरे से बोल रहा था, ‘पापा, बोलो पापा.’

यह सुन कर उस का माथा ठनका. हो न हो, 15 अगस्त और बच्चे की खिलखिलाहट में कुछ न कुछ राज जरूर छिपा है.

वालपेपर को उस ने गौर से देखा. धीरज के पीछे एक अस्पताल था. अस्पताल का नाम साफ नजर आ रहा था. शायद उस ने सैल्फी ली थी यानी 15 अगस्त को धीरज उस अस्पताल के पास था. वह वहां क्यों गया था, यह जानने के लिए वह तुरंत उस अस्पताल के लिए चल पड़ी. वह भी काफी दूर था. वहां गई तो वास्तव में अस्पताल के बाहर तिरंगा लहरा रहा था. यह तो तय हो गया था कि धीरज ने सैल्फी यहीं ली थी. लेकिन वह यहां करने क्या आया था. अचानक उस के मस्तिष्क में बच्चे की खिलखिलाहट की रिंगटोन और ‘पापा, बोलो पापा’ की ध्वनि बिजली की तरह कौंध गई और वह फौरन अस्पताल के अंदर चली गई.

मैटरनिटी होम के रिसैप्शन पर जा कर उस ने 15 अगस्त को जन्मे बच्चों की जानकारी चाही. पहले तो उसे मना कर दिया गया, लेकिन काफी रिक्वैस्ट करने पर बताया गया कि उस दिन 7 बच्चे हुए थे जिन में 4 लड़के और 3 लड़कियां थीं. उन बच्चों के पिता के नाम में धीरज का नाम नहीं था. सातों मांओं के नाम उस ने नोट कर लिए. अस्पताल के नियम के मुताबिक उसे उन के पते और मोबाइल नंबर नहीं दिए गए.

घर आ कर उस ने धीरज के मोबाइल में उन नामों के आधार पर नंबर ढूंढ़े, लेकिन कोई नंबर नहीं मिला. एक नंबर जरूर ‘एस’ नाम से सेव था. उस ने उस नंबर पर फोन लगाया तो उधर से एक नारीस्वर गूंजा, ‘‘कौन?’’

‘‘जी, मैं बोल रही हूं.’’

‘‘कौन? तू सीमा बोल रही है क्या?’’

यह सुन कर वह थोड़ा घबराई, ‘‘आप मेरी बात तो सुनिए.’’

‘‘अरे सीमा, क्या बात सुनूं तेरी? तू उस दिन शाम तक आने को कह कर गई थी और आज चौथा दिन है. तेरे बच्चे का रोरो कर बुरा हाल है. जल्दबाजी में तू अपना मोबाइल और पर्स भी यहीं भूल गई. तेरे फोन भी आ रहे हैं. समझ नहीं आ रहा कि क्या कहूं कि तू है कहां?’’

‘‘जी, वह बात यह है कि…’’

‘‘तू इतना घबरा कर क्यों बोल रही है? कोई परेशानी है तो मुझे बता, क्या पति से झगड़ा हो गया है?’’

‘‘जी, मैं सीमा नहीं, उस की बहन शोभा बोल रही हूं.’’

‘‘शोभा? लेकिन सीमा ने कभी आप का जिक्र ही नहीं किया. आप बोल कहां से रही हैं?’’ उस ने हैरानी से पूछा.

‘‘मैं आप को फोन पर कुछ नहीं बता पाऊंगी. आप से मिल कर सबकुछ विस्तार से बता दूंगी. शीघ्र ही मैं आप से मिलना चाहती हूं. प्लीज, आप अपना पता बता दीजिए,’’ निवेदन करते हुए उस ने कहा.

‘‘ठीक है, मैं अभी आप को अपना पता एसएमएस करती हूं.’’

चंद मिनटों में ही उस का पता मोबाइल स्क्रीन पर आ गया और शोभा शीघ्र ही वहां के लिए रवाना हो गई.

जैसे ही शोभा ने दरवाजे की घंटी बजाई, एक अधेड़ उम्र की महिला ने दरवाजा खोला, ‘‘आप शोभाजी हैं न,’’ कहते हुए वे उसे बहुत सम्मान के साथ अंदर ले गईं.

पानी का गिलास पकड़ाते हुए बोलीं, ‘‘सीमा ने कभी आप का जिक्र तक नहीं किया था. वह मेरे यहां किराए पर अपने पति के साथ रहती थी. अभी 15 अगस्त को उस के बेटा  भी हुआ है. उस की ससुराल और मायके से कोई नहीं आया था. सारा काम मैं ने और उस के पति ने ही संभाला था. वह मुझे मां समान मानती है. अभी

4 दिनों पहले ही सुबह 6 बजे अपने बेटे को मेरे पास छोड़ कर जाते हुए बोली थी, ‘‘आंटी, एक बहुत जरूरी काम से हम दोनों जा रहे हैं, शाम तक वापस आ जाएंगे, प्लीज, तब तक आप आर्यन को संभाल लेना.’’

अपने पर्स से धीरज का फोटो निकाल कर उन्हें दिखाते हुए शोभा बोली, ‘‘आंटी, क्या यही सीमा के पति हैं?’’

‘‘हां, यही इस के पति हैं, लेकिन आप क्यों पूछ रही हैं? आप को तो सबकुछ पता होना चाहिए, क्योंकि आप तो सीमा की बहन हैं,’’ उन्होंने शंका जाहिर की.

‘‘आंटी, बात दरअसल यह है कि सीमा ने परिवार की मरजी के खिलाफ प्रेमविवाह किया था, इसलिए हमारा उस से संपर्क नहीं था. लेकिन अभी 4 दिनों पहले ही सीमा और उस के पति की एक कार ऐक्सिडैंट में मौत हो गई है. आखिरी समय में उस ने पुलिस को हमारा पता और आप का मोबाइल नंबर बताया था. उसी के आधार पर मैं यहां आई हूं,’’ कहते हुए उस ने अखबार की कटिंग जिस में दुर्घटना के समाचार के साथसाथ सीमा और धीरज की तसवीर थी, दिखा दी, और फिर सुबक पड़ी. वे बुजुर्ग महिला भी रो पड़ीं और सिसकते हुए बोलीं, ‘‘अब आर्यन तो अनाथ हो गया.’’

‘‘नहीं आंटी, आर्यन क्यों अनाथ हो गया. उस की मौसी तो जिंदा है. मैं पालूंगी उसे. आखिर मौसी भी तो मां ही होती है.’’

‘‘हां शोभा, तुम ठीक कह रही हो. अब तुम ही संभालो नन्हें आर्यन को,’’ कहते हुए वे अंदर से एक 7-8 माह के बच्चे को ले आईं जो हूबहू धीरज की फोटोकौपी था.

शोभा ने बच्चे को अपनी छाती से ऐसे चिपका लिया जैसे कोई उसे छीन न ले. वह जल्दी से जल्दी वहां से निकलना चाह रही थी.

आंटी ने कहा, ‘‘आप सीमा का कमरा खोल कर देख लो. बच्चे का जरूरी सामान तो अभी ले जाओ, बाकी सामान जब जी चाहे ले जाना. उस के बाद ही मैं कमरा किसी और को किराए पर दूंगी.’’

उस ने सीमा का कमरा खोला. कमरे में खास सामान नहीं था. बस, जरूरी सामान था. बच्चे का सामान और सीमा का पर्स व मोबाइल ले कर वह आंटी को फिर आने को कह कर घर चल पड़ी.

सारे रास्ते सोचती रही कि धीरज ने उस के साथ कितना बड़ा धोखा किया. दूसरी शादी रचा ली और बच्चा तक पैदा कर लिया. जब खुद उस ने दूसरी शादी के लिए कहा था तब कितनी वफादारी दिखा रहा था. ऐसे दोहरे व्यक्तित्व वाले इंसान के प्रति उस का मन घृणा से भर गया.

घर आ कर उस ने सब से पहले सीमा का पर्स चैक किया. पर्स में थोड़ेबहुत रुपए, दांतों के डाक्टर का परचा और थोड़ाबहुत कौस्मैटिक का सामान था. पैनकार्ड और आधारकार्ड से पता चला कि सीमा धीरज के ही शहर की थी. इस का मतलब धीरज शादी के पहले से ही सीमा को जानता था और उस का प्रेमप्रसंग काफी पुराना था.

फिर उस ने सीमा का मोबाइल चैक किया. वालपेपर पर सीमा, धीरज और बच्चे का फोटो लगा था. व्हाट्सऐप पर काफी मैसेज थे जो डिलीट नहीं किए गए थे.

‘‘सीमा, इतने सालों बाद तुम मुझे मैट्रो में मिली. मुझे अच्छा लगा. लेकिन यह जान कर दुख हुआ कि तुम्हारा पति से तलाक हो चुका है.’’

‘‘नहीं, मैं तुम्हारे घर नहीं आऊंगा क्योंकि अब मैं शादीशुदा हूं और अपनी पत्नी से बहुत प्यार करता हूं. वैसे भी तुम अकेली रहती हो, मुझे देख कर तुम्हारी मकानमालकिन आंटी क्या सोचेंगी?’’

‘‘तुम ने आंटी को अपना परिचय मेरे पति के रूप में दिया, यह मुझे अच्छा नहीं लगा.’’

‘‘हमारे बीच जो कुछ क्षणिक आवेश में हुआ, उस के लिए मैं तुम से माफी चाहता हूं और अब मैं तुम से कभी नहीं मिलूंगा.’’

‘‘क्या? मैं पिता बनने वाला हूं.’’

‘‘सीमा, प्लीज जिद छोड़ दो, मैं शोभा को तलाक नहीं दे सकता. मैं

उसे सचाई बता दूंगा. वह स्वीकार कर लेगी. उस का दिल बहुत बड़ा है. हम सब साथ रहेंगे. हमारे बच्चे को 2-2 मांओं का प्यार मिलेगा.’’

‘‘सीमा, मुझे अपने बच्चे से मिलने दो. उस के बिना मैं मर जाऊंगा.’’

इस के अलावा औरों के भी मैसेज थे. तभी अचानक सीमा के मोबाइल की घंटी बजी. उस ने तुरंत रिसीव किया, ‘‘कौन?’’

‘‘कौन की बच्ची? इतने दिनों से फोन लगा रही हूं. हर बार तेरी खड़ूस आंटी उठाती है और कहती है कि तू अभी तक वापस नहीं आई. क्या बात है? मथुरा में शादी कर के वहीं से हनीमून मनाने भी निकल गई.’’

शोभा चुप रही. बस, ‘‘हूं’’ कहा.

‘‘अच्छा, व्यस्त है हनीमून में. वैसे सीमा, यह ठीक ही रहा वरना धीरज तो तुझे अपने घर में अपनी बीवी की नौकरानी बना कर रख देता. तेरा बच्चा भी तेरा अपना नहीं रहता. बच्चे से न मिलने देने की धमकी सुन कर आ गया न लाइन पर. मेरा यह आइडिया कामयाब रहा. अब मंदिर में तू ने शादी तो कर ली है लेकिन ऐसी शादी कोई नहीं मानेगा, इसलिए बच्चे को ढाल बना कर जल्दी से जल्दी धीरज को अपनी बीवी से तलाक के लिए राजी कर.’’

‘‘हांहां,’’ शोभा ने अटकते स्वर में कहा.

‘‘हांहां मत कर, पार्टी की तैयारी शुरू कर. मैं अगले हफ्ते ही दिल्ली आ रही हूं औफिस के काम से.’’

‘‘ठीक है,’’ कहते हुए शोभा ने फोन काट दिया.

धीरज के प्रति उस के मन में जो गलत भाव आ गए थे, वे एक पल में धुल गए. सच में धीरज ने एक पति होने के नाते उसे पूरा मानसम्मान और प्रेम दिया. वह धीरज पर गौरवान्वित हो उठी. धीरज की निशानी नन्हें आर्यन को पा कर उस का तनमन महक उठा. उस ने उसे कस कर सीने से लगा लिया और बरसों से सहेजा ममता का खजाना उस पर लुटा दिया.

उस के अनुभवी पिता ने सत्य ही कहा था कि धीरज जैसे समझदार इंसान ने भविष्य के लिए कुछ न कुछ जरूर किया होगा. वास्तव में उस ने अपनी जिंदगी की एक महत्त्वपूर्ण पौलिसी करा ही दी थी जो शोभा का सुरक्षित भविष्य बन गई थी. बीमा कंपनी की टैग लाइन ‘जिंदगी के साथ भी जिंदगी के बाद भी’ को सार्थक कर दिया था धीरज ने. वह जिंदगी में शोभा के साथ था और जिंदगी के बाद भी उस के साथ है नन्हें आर्यन के रूप में. Story in Hindi

Story in Hindi : ऐलान ए जग

Story in Hindi. ‘‘जल्दी चलो,’’ वह बोला.

‘‘मैं तो तुम्हारे पीछेपीछे ही आ रही हूं. तुम्हारे ही पैर नहीं उठ रहे हैं. मुड़मुड़ कर पीछे क्या देख रहे हो? दिल में कुछ है क्या?’’

‘‘कुछ नहीं, गांव छूट रहा है न… संगीसाथी… अपने लोग… छूट गए एक ही  झटके में. दर्द तो होगा ही. बहुत मजबूरी में गांव छोड़ रहा हूं.’’

‘‘एक बार फिर सोच लो, अभी कोई ज्यादा दूर नहीं आए हैं,’’ वह ठिठक कर खड़ी हो गई.

‘‘अब क्या सोचना है. हम तो अब ऐसे रास्ते पर निकल चुके हैं, जहां से वापस लौटना नामुमकिन है. मैं इस घटना को कमजोरी नहीं बनाना चाहता हूं. एक जंग की शुरुआत हो चुकी है.’’

‘‘हम गरीब मजदूर हैं, मेहनत के सिवा हमारे पास कुछ भी नहीं है. इतनी बड़ी लड़ाई हम कैसे लड़ेंगे? आने वाली परेशानियों को सोच कर डर गए, तो हम मुसीबत में आ सकते हैं, इसलिए हमें जल्दीजल्दी चलना चाहिए. समय नहीं है.’’

‘‘अभी बहुत समय है. स्टेशन कौन सा दूर है. गांव के लोग रात में दुबके पड़े होंगे. इस समय कौन आता है इधर?’’

‘‘यह रात हमारी दुश्मन बन गई है.’’

‘‘हमारा कुछ भी अपना नहीं है… हमारी इच्छाएं, हमारी खुशियां दूसरों के हाथों में होती हैं. हम मशीन हो कर रह जाते हैं. सामंत लोग हमें इनसान सम झते ही कहां हैं?

‘‘जब अपने ही दुश्मन बन जाएं, तो दूसरे रास्ते तलाशने पड़ते हैं. तुम अपने गांव को बहुत प्यार करते हो न?’’

‘‘हां, पर अब हम गांव छोड़ चुके हैं, यह अब फांसी का फंदा बन चुका है.’’

‘‘जहां जाएंगे, वहां ठीक से रह पाएंगे क्या?’’   ‘‘समय हर जख्म को भर देता है.’’

‘‘अगर ऐसा नहीं हुआ तो…’’ ‘‘कुछ नहीं होगा. नई माटी… नई गंध… नए लोगों के साथ नई जिंदगी बसाएंगे.’’

‘‘वह दिन जिंदगी का सब से अच्छा दिन होगा. जो कुछ हुआ, उस में तुम कहीं मु झे कुसूरवार तो नहीं मानते?’’

‘‘नहीं.’’   ‘‘वजह तो मैं ही थी.’’

‘‘तुम कुसूरवार नहीं हो. कोई भी हमारे बीच आया, तो उस का भी यही हाल होगा.’’

‘‘मैं बहुत खुश हूं कि तुम अपने गांव से इतना प्यार करते हो. एक न एक दिन इस गांव में तुम्हारे साथ जरूर वापस आऊंगी.

‘‘यह मेरी भी तो ससुराल है. जिस ने मेरी ससुराल… मेरा सुखचैन छीना, उस का सबकुछ छीन कर रहूंगी. मैं बदले की आग में जल रही हूं.’’

‘‘तुम्हारी बातों में बड़ी ताकत है. मु झे बहुत अच्छा लगता है, जब तुम बोलती हो. हमारे हालात बिगड़ गए हैं. हर कदम संभल कर उठाना है. कुछ छूटता है, तो कुछ मिलता भी है. यह तो जिंदगी में चलता ही रहता है.’’

‘‘औरत अपने को हर हाल में महफूज रखना चाहती है. कुछ गलत कदम भी उठ जाते हैं, जिस का नतीजा उसे शैतान के खूनी पंजों तक पहुंचा देता है. हर जगह औरत का शोषण होता है… वह बारबार टूटती है… जुड़ती है… उजड़ती है… बसती है.

‘‘मैं जिंदा रहना चाहती हूं, मैं बेइज्जती बरदाश्त नहीं कर सकती. औरत की बेइज्जती कुदरत की बेइज्जती है.’’

‘‘मैं तुम्हारी बहुत इज्जत करता हूं. इसीलिए तो इतना बड़ा काम कर दिया.’’

‘‘इसे हम जश्न के रूप में लेंगे… हम ऐसे जश्न हर रोज मनाएंगे… अपने साथ… औरों के साथ…’’

‘‘हम अपराधी हो गए हैं… कानून की नजरों में… गांव की नजरों में.’’

‘‘तुम अपराधी नहीं हो. तुम ने वही किया, जो हर पति करता. सच से कहीं भाग तो नहीं रहे हो न?’’

‘‘भाग कर जाऊंगा कहां? रहना तो यहीं है. हम ने इस तरह की जिंदगी सोची नहीं थी.’’

‘‘किस ने सोचा था? तुम ने सोचा था कि तुम्हारी बीवी के साथ चौधरी इतनी गिरी हरकत… बलात्कार करेगा आज रात? सोचने भर से ही जी कांप जाता है. वह बाप की उम्र का था. उस ने वह कर दिया… बेशर्म था.’’

‘‘उसे काट भी तो दिया.’’ ‘‘हम दोनों भी तो सजा के भागीदार हो गए?’’

‘‘बिना काटे भी तो मैं सजा का भागीदार बन जाता… अपनी नजरों में… तुम्हारी नजरों में?’’

‘‘खुश तो हो?’’ ‘‘दुखी नहीं हूं. मैं तुम्हें खोना नहीं चाहता.’’

‘‘मैं ही कहां चाहती हूं तुम्हें खोना? इतना ही होता, तो मैं चौधरी को कटने नहीं देती. मौजमस्ती करती, उस के साथ और तुम फावड़ा ले कर खेत में काम करते. मु झे पसंद नहीं है यह सब… घिन आती है.’’

‘‘मैं खुश हूं तुम्हारा खून पानी नहीं हुआ है.’’

‘‘सच बताओ, तुम को कभी ऐसा लगता था क्या?’’ ‘‘नहीं.’’

‘‘हम और मजबूत हो गए.’’ ‘‘हर मोरचे पर मैं तुम्हारे साथ आगेआगे चलूंगी.’’

‘‘इसे बरकरार रखना है… हम जरूर कामयाब होंगे.’’

‘‘तुम सुल झे हुए हो. यह कामयाबी की पहली शर्त है.’’

‘‘हमें निराश नहीं होना पड़ेगा.’’

‘‘मुझे यहां का रास्ता नहीं मालूम है. कोई छोटा रास्ता पकड़ो. आम रास्ते से चलना अब ठीक नहीं होगा.’’

‘‘रात को इधर कौन आएगा?’’ ‘‘पूछ कर नहीं आएगा.’’

‘‘तेज चलो. समय बहुत कम है.’’

‘‘हम बहुत नजदीक आ गए हैं. मेरा मूड आज नाचने… गाने… मौजमस्ती करने का था. टेपरेकौर्डर में आज ही नई बैटरी लगवाई थी.’’   ‘‘मु झे मालूम है.’’

‘‘दिल को चोट लगी है… कह नहीं पा रही हूं?’’ उस का गला भर आता है. दोनों चुपचाप कुछ दूर तक चलते रहे.

‘‘बात करने से रास्ता जल्दी कट जाता है,’’ वह खामोशी तोड़ता है.

‘‘खामोश जिंदगी भी कोई जिंदगी है. मु झे बात करने में बहुत मजा आता है. बात करने से जी हलका होता है.’’

‘‘हमारी खुशी चौधरी ने छीन ली.’’

‘‘तुम्हारा यह रूप मु झे बहुत प्यारा लगा.’’ ‘‘मैं कमजोर नहीं रहूंगा.’’

‘‘कमजोर मर्द को औरत पसंद नहीं करती.’’

‘‘अविश्वास ही इनसानी रिश्ते को कमजोर बनाता है.’’

‘‘गलती करने का समय नहीं है. जिंदगी अंधेरे में चली जाएगी.’’

‘‘मैं भावुक हूं, लेकिन बेवकूफ नहीं. हालात की नाजुकता को सम झता हूं.’’

‘‘वह जो खेत में नीम का पेड़ है न, वहीं चल कर थोड़ी देर बैठते हैं. वहां से स्टेशन भी साफ दिखेगा. सिगनल हुआ कि दौड़ कर गाड़ी पकड़ लेंगे.

‘‘स्टेशन जाना अभी ठीक नहीं है. वहां गांव का कोई आदमी मिल गया, तो बहुत मुश्किल हो जाएगी.’’

दोनों आम रास्ता छोड़ खेत की मेंड़ पकड़ कर टेढ़ेमेढ़े रास्ते से होते हुए नीम के पेड़ के नीचे पहुंचे.

सुघरी ने बैग से निकाल कर एक नई चादर बिछा दी.

‘‘कितनी अच्छी है?’’ जमना ने उसे छू कर देखा.

‘‘मेरी भाभी मुंबई से लाई थीं… मेरी सुहागरात के लिए…’’

‘‘यहीं हमारी सुहागरात मनेगी,’’ कह कर वह हंसा.

‘‘आज जितना मिलेगा, उतने में ही हम अपना अच्छा समय बिताएंगे.’’

‘‘तु झे डर नहीं लगता है.’’  ‘‘नहीं. डरना क्या है? हर हालात से मुकाबला करने को तैयार रहना है. डरडर कर जीना कोई जीना नहीं रह जाता. हमें जिंदगी को अपने हिसाब से जीना है.’’

‘‘लोग बड़े गुनाह करते हैं और मजे से जीते हैं.’’ ‘‘हां, तुम ठीक कहते हो.’’

‘‘अब हम जोरजुल्म बरदाश्त नहीं करेंगे. अभी तो शुरुआत है… बहुतकुछ करना बाकी है.’’ ‘‘हक की लड़ाई लड़ेंगे.’’

‘‘यह काम पहले हो गया होता, तो आज हमारी यह हालत नहीं होती?’’ ‘‘हम ने सही राह पकड़ ली है.’’

‘‘थोड़ी और धार की जरूरत है.’’

‘‘गांव में सब से ज्यादा तुम्हारा ही परिवार चौधरी का शिकार हुआ है. जो उस ने मेरे साथ करने की कोशिश की, वह उस के जोरजुल्म की अगली कड़ी थी. किसी ने उस के खिलाफ आवाज उठाने की हिम्मत नहीं की, उन की आंखों के सामने ही उन की बहूबेटियों की इज्जत लुटती रही और वे सबकुछ देखते रहे.

‘‘तुम्हारे बाबा ने आवाज उठाई थी. सामंतों ने उन की इतनी पिटाई की कि जिंदगीभर चारपाई से उठ नहीं सके. इस भयानक नतीजे को देख कर फिर किसी ने हिम्मत नहीं की.

‘‘चौधरी को जाना था, उस ने आग को सीने से लगाने की कोशिश की. तुम्हारे अंदर तुम्हारे बाबा की आग थी, राख से ढकी हुई… वक्त की हवा लगते ही ज्वाला बन गई. इतिहास रच गया.’’

‘‘तुम तो एकदम नेता हो गई हो.’’ ‘‘जुल्म के पैरों तले कुचली गई

एक औरत हूं, जिस की सुहागरात खून में रंग गई.’’

‘‘मु झे तुम्हारी बातें कुछ अलग सी लगती हैं.’’

‘‘तुम खुश तो हो न? जो काम तुम ने किया, वह मैं ने किया होता तो मैं बहुत खुश होती.’’

‘‘मैं खुश हूं, तभी तो तुम्हारे साथ हूं. सुनते हैं, प्यार में लोग कमजोर हो जाते हैं.’’

‘‘एकदम  झूठ. वे प्यार नहीं करते होंगे. तुम खुद सोचो न.’’

‘‘तुम ठीक कहती हो. मैं ही कभीकभी गड़बड़ा जाता हूं. तुम ने चौधरी को काट दिया. तुम मु झ से बहुत ज्यादा प्यार करती हो. कितना खुश हूं आज मैं.’’

‘‘चौधरी शैतान था. मैं ने बहुत कोशिश की उसे बहलानेफुसलाने की, पर उस पर तो शैतान सवार था. उसे आदत पड़ गई थी. वह मु झे उसी अंदाज में इस्तेमाल करना चाहता था.

‘‘मैं उस नरक की जिंदगी से मरना ज्यादा पसंद करती हूं. वह मु झ पर एकदम हावी हो गया था. तुम समय पर नहीं आए होते, तो वह अपनी मनमानी कर लेता. फिर उस की नहीं, मेरी लाश वहां पड़ी होती.’’

‘‘ऐसी बातें मत करो.’’

‘‘तुम ने मु झे बचाया है इसलिए कि मैं तुम्हारी बीवी हूं. जिसे तुम जीजान से प्यार करते हो. अपनी प्यारी चीज पर जब खतरा आया दिखता है, तो इनसान उस से मुकाबला करने के लिए अपनी पूरी ताकत  झोंक देता है.

‘‘तुम्हीं सोचो, तुम मु झे उस हालत में देख कर आंखें बंद कर के ऊपर वाले को याद करते, तो क्या हो जाता? तुम्हारे ऊपर वाले के आने के पहले तुम्हारी बीवी की इज्जत चौधरी लूट चुका होता और तुम नामर्द बने खड़ेखड़े आंसू बहाते रहते.

‘‘मैं खुश हूं… तुम को पति के रूप में पा कर. मैं तो तुम्हारी यादों में खोई हुई थी कि तभी चौधरी आ टपका, हमारी जिंदगी में जहर बन कर.

‘‘उसे देख कर मेरे मन में कुछ शक तो हो ही गया था. फिर भी मैं ने हिम्मत जुटा ली थी किसी भी हालात से निबटने के लिए.

‘‘मैं ने मन बना लिया था कि थोड़ा इधरउधर की बातें कर के उसे टरका दूंगी. वह मालिक है, यह तो याद ही रखना था. उस ने तुम से कहा और तुम आज्ञाकारी नौकर की तरह बोरिंग चालू करने खेत में चले गए.

‘‘मैं अकेली हो गई थी एक खूंख्वार मांसभक्षी के सामने, जो मेरे अंगअंग को ऐसे देख रहा था, जैसे कोई कसाई बकरे को.

‘‘मैं कमरे में आ गई. वह भी मेरे पीछेपीछे आ गया. उसे चौकी पर बैठने को कहा. वह एक खतरनाक मुसकराहट के साथ बैठ गया.

‘‘मैं जैसे ही बाहर निकलने के लिए आगे बढ़ी कि उस ने बाज की तरह  झपट कर मु झे पकड़ लिया.

‘‘मैं ज्यादा कुछ सम झती, वह तब तक मु झ पर हावी हो चुका था. उस ने मेरे कपड़े नोच कर मु झे नंगा कर दिया था कि मैं बाहर निकल कर न भाग सकूं. उस की प्लानिंग सही थी. मेरा नंगा होना मेरी मजबूरी बन गई थी.

‘‘मैं उस से लड़तेलड़ते थक गई थी… सारी कोशिशें बेकार हो गई थीं. उसे तो बस अपनी आग शांत करने की जल्दी थी.

‘‘मु झे महसूस होने लगा कि मैं अपने को ज्यादा देर तक नहीं बचा सकती. वह भूखे भेडि़ए की तरह मेरे नंगे जिस्म को नोच रहा था.

‘‘वह चाहता था कि प्यार से ही काम हो जाए, लेकिन मैं कतई राजी नहीं थी. लिहाजा, वह पहले से भी ज्यादा खूंख्वार हो गया.

‘‘मैं उस के चंगुल से छूटने के लिए छटपटाने लगी. उस का शिकंजा कसता गया. मैं ने पूरी ताकत से लात मार कर उसे चौकी से नीचे गिरा दिया.

‘‘मैं जैसे ही साड़ी ले कर बाहर जाने को भागी, उस के हाथ में मेरा पैर आ गया. उस ने  झटके से मु झे कमरे में खींच लिया.

‘‘मैं ने जोर से चिल्लाना शुरू किया, ताकि तुम सुन कर आ जाओ… या वह मु झे अपनी बदनामी के डर से छोड़ दे.

‘‘मु झे मालूम था कि वहां और भी लोग होंगे, पर उस के ऊपर इस का कोई असर नहीं पड़ा. तब तक तो तुम आ ही गए. सबकुछ अपनी आंखों से देख लिया और चौधरी के ऊपर फावड़े से वार पर वार करने लगे.

‘‘उस के कितने टुकड़े हो गए थे… गिनना भी मुश्किल हो गया था. खून के फव्वारे से पूरा कमरा रंग गया था. तुम्हारे ऊपर भी खून के छींटे पड़े थे.

‘‘मैं कोने में खड़ी थरथर कांप रही थी. बहुत ही डरावना नजारा था. तुम ने फावड़ा एक तरफ रख कर मेरी तरफ देखा. मैं दौड़ कर तुम से लिपट गई.’’

‘‘मैं ने जो किया, उसे क्या कहेंगे?’’ जमना ने पूछा.

‘‘तुम ने मेरी इज्जत बचा ली थी. एक मर्द का काम किया,’’ सुघरी उस से लिपट कर बोली.

‘‘लेकिन मु झे लगता है, हम लोग अकेले पड़ गए हैं. कोई साथ नहीं देगा. सब गाली देते होंगे… घर वालों को लोग बहुत सताएंगे… मारपीट करेंगे,’’ जमना ने शक जाहिर किया.

‘‘ऐसा मत सोचो. हमारे साथ समाज के सताए लोग होंगे, उन की हमदर्दी होगी. जहां तक हमारे घर वालों को मारनेपीटने का सवाल है, उन की तरफ आंख उठा कर कोई देखेगा भी नहीं.

‘‘चौधरी की मौत से हमारा परिवार ताकतवर हो गया है. सब से ज्यादा खुश होेंगे तुम्हारे बाबा… अब कोई भी गांव की बहूबेटियों की तरफ बुरी नजर डालेगा, तो वह सोचेगा, कहीं कोई और जमना किसी चौधरी को फिर काट न दे?’’ सुघरी फख्र से बोली.

उन्होंने स्टेशन की तरफ देखा. गाड़ी आ चुकी थी और हरी बत्ती जल गई थी. जल्दीजल्दी दोनों ने सामान समेटा और स्टेशन की तरफ दौड़ पड़े. Story in Hindi

-उदय भानु राय

Story in Hindi : काई

Story in Hindi. मंजू ने राजन की गहरी आंखों में  झांका और लाज से अपनी आंखें बंद कर लीं. उस ने राजन के कंधे पर अपना सिर टिका दिया… इस नाजायज रिश्ते का क्या नतीजा रहा?

एक दिन अचानक मौसम ने ऐसी करवट ली कि लोग अपने घरों की ओर भागने लगे. सां झ होतेहोते आसमान से ऐसा  झमा झम पानी गिरा कि चारों तरफ ऊधम मच गया. उसी तेज आंधीतूफान के बीच राजन भीगताकांपता हुआ किसी तरह मंजू के घर के सामने से गुजर ही रहा था, तभी अचानक ‘खट’ से दरवाजा खुला.

दरअसल, बनारस के पास एक छोटा सा कसबा है, वहीं राजन अपनी पत्नी सुनीता के साथ रहता था. राजन दिल का बहुत साफ और सीधा इनसान था. वह बरतनों का व्यापार करता था लेकिन माल लाने और पैसों की अदायगी के चक्कर में उसे अकसर हफ्तों शहर से बाहर गुजारने पड़ते थे.

ठीक उन के पड़ोस में मंजू का घर था. मंजू के पति भी दूर सूरत के कपड़ों की एक फैक्टरी में थे, जो सालभर में बस एक ही बार घर लौट पाते थे.

सुनीता की मां को लकवा मार गया था, जिस से वह भी अपने मायके लखनऊ आतीजाती रहती थी. अब दोनों ही अपनेअपने सूने घरों में अकेलेपन से घुट रहे थे. शुरुआत तो बस आतेजाते छोटीमोटी बातचीत से हुई थी. कभी छत पर कपड़े फैलाते हुए, तो कभी गली के मोड़ पर.

पर धीरेधीरे ये मुलाकातें गहरी होती चली गईं. दोनों के बीच एक ऐसा अनकहा सा रिश्ता जुड़ गया, जो इस दुनिया और समाज के नियमों के हिसाब से बिलकुल गलत था.

उस बरसात की शाम को मंजू ने चौखट पर आ कर घबराते हुए कहा, ‘‘अरे राजनजी, बाहर तो कयामत आ गई है. जल्दी से अंदर आ जाइए, नहीं तो पूरा भीग जाइएगा.’’

राजन ने कुछ सोचा नहीं और तुरंत बरामदे के अंदर आ गया. अपनी भीगी कमीज को  झटकते हुए वह बोला, ‘‘हां मंजूजी, मौसम अचानक ऐसा बिगड़ गया कि संभलने का मौका ही नहीं मिला. सोचा था कि किसी तरह भाग कर घर पहुंच जाएंगे, पर यह पानी तो थमने का नाम ही नहीं ले रहा.’’

थोड़ी देर बाद मंजू रसोई से गरमागरम चाय की 2 प्यालियां ले कर कमरे में आई. बाहर पानी बरस रहा था, पर कमरे के भीतर की खामोशी में एक अजीब सा खिंचाव और बेचैनी तैर रही थी.

मंजू ने चाय का कप आगे बढ़ाया, लेकिन उस की नजरें  झुकी हुई थीं. वह दबी आवाज में बोली, ‘‘राजनजी, यह अकेलापन भी बड़ी जालिम चीज है, इनसान को भीतरभीतर खोखला कर देता है. जब सूने घर में कोई बोलने वाला तक न हो, ता मन एकदम भारी हो जाता है.’’

राजन ने प्याली पकड़ते हुए धीरे से मंजू की कांपती उंगलियों को छू लिया. वह बेहद धीमे से बोला, ‘‘हम तुम्हारी तकलीफ अच्छी तरह सम झ रहे हैं मंजू. हमारा भी हाल कुछ अलग नहीं है. जब मन उदास होता है न, तो बस यही लगता है कि काश कोई ऐसा इनसान पास होता जिस से अपने दिल का सारा दर्द कह पाते.’’

मंजू ने अपना हाथ पीछे नहीं खींचा, बल्कि उस की सांसें तेज हो गईं. उस धुंधली शाम, समाज के बनाए कायदेकानून और बदनामी के डर को पीछे छोड़ते हुए दोनों के कदम एकदूसरे की तरफ बढ़ गए.

बाहर सावन की बारिश अब और तेज हो चुकी थी, जैसे बादलों ने सारे बांध तोड़ दिए हों. कमरे के एक कोने में रखी डिबरी की धीमी रोशनी में दोनों एकदूसरे के बेहद पास बैठे थे.

राजन ने आगे बढ़ कर मंजू के चेहरे पर बिखरी भीगी लटों को धीरे से कान के पीछे समेटा और बोला, ‘‘मंजू, आज तुम्हारा यह रूप देख कर सचमुच हमारा जिया बेकाबू हो गया है. ऐसा लगता है जैसे यह सावन सिर्फ हम दोनों को मिलाने के वास्ते ही आया है.’’

मंजू ने शरमा कर अपना चेहरा दूसरी तरफ फेर लिया और धीमी आवाज में फुसफुसाई, ‘‘अरे राजनजी, ऐसा मत बोलिए. हम को बहुत लाज आती है. यह सब ठीक नहीं है, कोई देख लेगा तो सांपछछूंदर वाला हाल हो जाएगा.’’

राजन ने मंजू की ठुड्डी को धीरे से उठा कर अपनी तरफ किया. उस ने मंजू की आंखों में देखा और धीमे स्वर में कहा, ‘‘आज यहां कोई नहीं है मंजू. बस तुम हो, हम हैं और यह सुहाना मौसम है. सच बताओ, क्या तुम्हारे दिल में हमारे लिए कुछ नहीं है?’’

मंजू ने राजन की गहरी आंखों में  झांका और लाज से अपनी आंखें बंद कर लीं. उस ने राजन के कंधे पर अपना सिर टिका दिया और कांपती हुई आवाज में बोली, ‘‘हमारा मन बहुत कमजोर पड़ गया है राजन. जब तुम सामने आते हो न, तो हम अपनेआप को एकदम भूल जाते हैं.’’

राजन ने मंजू को अपनी बांहों में भर लिया. तभी हवा के एक  झोंके से कमरे में जल रही डिबरी की लौ बुझ गई. अंधेरे में दोनों के दिलों की गरमी और करीब आती सांसों ने उस सूनेपन को मिटा दिया था. यह सिलसिला कई हफ्तों तक चलता रहा. दोनों भूल गए कि वे काई की तरह एक ऐसी फिसलन भरी राह पर हैं, जहां से लौटना नामुमकिन है.

एक रात, जब पूरा गांव गहरी नींद में सो रहा था, राजन मंजू के घर पर ही था. तभी अचानक मंजू की सास तीर्थयात्रा से लौट आईं, जिस से दोनों बेखबर थे. वे सीधे मेन दरवाजे की तरफ बढ़ीं. आंगन का भारी सा किवाड़ जोरजोर से खटखटाया गया.

मंजू की सास बाहर से चिल्लाईं, ‘‘अरे मंजू, किवाड़ खोलो बहुरिया. हम लौट आए.’’

सास की आवाज सुनते ही मंजू के चेहरे का रंग उड़ गया. डर के मारे उस के पैर थरथराने लगे. उस ने घबरा कर राजन का हाथ कस कर पकड़ लिया और कांपती आवाज में बोली, ‘‘राजन, अब क्या होगा? माताजी आ गईं. अगर वे तुम को यहां देख लेंगी, तो गजब हो जाएगा.’’

राजन ने अपनी गंभीरता बनाए रखी. उस ने मंजू का हाथ थाम कर हिम्मत बंधाई और बोला, ‘‘डरो मत मंजू. अब छिपनेछिपाने से कुछ नहीं होगा. आज नहीं तो कल, इस बात को सब के सामने आना ही था. किवाड़ खोलो, जो होगा हम देख लेंगे.’’

मंजू ने कांपते हाथों से सांकल खोली. सामने लालटेन लिए खड़ी उस की सास की नजर सीधे कमरे के भीतर खड़े राजन पर पड़ी.  झटके में सास के हाथ से लालटेन छूट कर जमीन पर गिर गई. तेल बिखर गया और गांव की उस खामोशी में एक नया तूफान खड़ा हो गया.

सास के सामने यह राज खुलने के बाद बात आग की तरह राजन की पत्नी सुनीता तक पहुंच गई.

सुनीता आपा खो बैठी और सीधे मंजू के घर आ धमकी, जहां राजन और मंजू दोनों मौजूद थे.

सुनीता रोते हुए गुस्से में चिल्लाई, ‘‘अरे राजन, यह क्या सुन रहे हैं हम? तुम हमारी पीठ पीछे यह पाप कर रहे थे? और तुम मंजू, तुम को तनिक भी लाजशरम नहीं आई?’’

राजन ने अपने अंदर छिपे डर को दबाया और बड़ी बेरुखी से बोला, ‘‘सुनीता, चिल्लाओ मत. जो सच है, वह तुम्हारे सामने है. अब हम मंजू के बिना नहीं रह सकते.’’

सुनीता ने अपने आंसू पोंछे और गुस्से में तमतमाते हुए बोली, ‘‘ऐसा कैसे नहीं रहोगे? हम यह गांव और समाज हिला के रख देंगे. कोर्टकचहरी जाएंगे, लेकिन तुम दोनों को जेल भिजवा के ही दम लेंगे,’’ इतना कह कर सुनीता पैर पटकती हुई अपने घर की तरफ चली गई.

सुनीता का यह रौद्र रूप देख कर राजन और मंजू के होश उड़ गए. बंद आंखों से भी उन्हें अपना आने वाला कल अब जेल की काल कोठरी में नजर आने लगा था.

मंजू ने थरथराते हुए राजन का हाथ पकड़ा और घबरा कर बोली, ‘‘राजन, अगर सुनीता पुलिस या पंचायत में गई, तो समाज हम दोनों को जीने लायक नहीं छोड़ेगी. इस तरह बदनाम हो कर घुटघुट के मरने से तो अच्छा है कि…’’

राजन की आंखों में एक अजीब सी हैवानियत उतर आई. उस ने बेहद धीमी और ठंडी आवाज में कहा, ‘‘क्यो न उसी को रास्ते से हटा दिया जाए? तुम ठीक कह रही हो मंजू. अब पानी सिर से ऊपर बह चुका है. उस को हमेशा के लिए चुप कराना ही पड़ेगा.’’

इस के बाद उन दोनों ने मिल कर एक खौफनाक साजिश रच डाली.

गांव की सरहद के पास एक पुराना, गहरा और सूखा कुआं था. अगली रात, राजन ने सुनीता के सामने माफी मांगने का ढोंग रचाया और उसे बहलाफुसला कर रात के सन्नाटे में गांव के बाहर मिलने के लिए मना लिया.

सुनीता सीधे दिल की थी, सो उस की बातों में आ कर वहां पहुंच गई. वहां चारों तरफ सन्नाटा देख कर सुनीता बोली, ‘‘राजन, तुम इस सूनी जगह पर क्यों बुलाए हो? चलो, अब घर चलें.’’

राजन अंधेरे के साए से बाहर निकला और पथराई आवाज में बोला, ‘‘घर अब तुम कभी नहीं जाओगी सुनीता.’’

इस से पहले कि सुनीता कुछ सम झ पाती या शोर मचाती, राजन और मंजू ने चीते की तरह  झपट कर उसे दबोच लिया.

सुनीता ने खुद को छुड़ाने की बहुत कोशिश की, हाथपैर मारे, लेकिन मंजू ने उस का मुंह कपड़े से कस कर दबा दिया था. दोनों ने मिल कर पूरी ताकत लगाई और सुनीता को उस गहरे सूखे कुएं में धकेल दिया.

उस स्याह अंधेरे कुएं से एक आखिरी चीख गूंजी… और फिर सबकुछ हमेशाहमेशा के लिए शांत हो गया.

सुनीता को रास्ते से हटाए एक हफ्ता बीत चुका था. पूरे गांव को यही लग रहा था कि सुनीता गुस्से में अपने मायके चली गई है, लेकिन राजन और मंजू के भीतर एक खौफनाक नरक की शुरुआत हो चुकी थी. जिस आलिंगन में कभी उन्हें सुकून मिलता था, अब वहां सिर्फ एकदूसरे के प्रति अविश्वास और घोर अपराधबोध की ‘काई’ जम चुकी थी.

राजन चौबीसों घंटे इसी बात से घबराता रहता कि कहीं मंजू कमजोर पड़ कर पुलिस के सामने सारा सच न उगल दे. उधर मंजू के मन में भी यह बात घर कर गई थी कि राजन खुद की चमड़ी बचाने के लिए उसे भी रास्ते से हटा सकता है.

इसी अविश्वास और खौफ के साए में, राजन ने मंजू को भी ठिकाने लगाने की एक खतरनाक साजिश रच डाली. वह बाजार से चूहों को मारने वाला एक बेहद तेज जहर खरीद लाया.

रात के सन्नाटे में जब राजन मंजू के घर पहुंचा, तो उस के चेहरे पर एक बनावटी और  झूठी मुसकान थी. वह बोला, ‘‘मंजू, हम लोग को आपस में लड़ना झगड़ना नहीं है. हम तुम्हारे साथ यहां से शहर भागने का पूरा इंतजाम कर लिए हैं. तुम बैठो, हम तुम्हारे लिए रसोई में चाय बना रहे हैं.’’

राजन रसोई में गया और छिप कर मंजू के प्याली में वह तेज जहर मिला दिया. जब वह बाहर आया, मजाक तो उस की धड़कनें तेज थीं. राजन ने प्याली मंजू की तरफ बढ़ाते हुए उतावली आवाज में कहा, ‘‘लो मंजू, गरमगरम चाय पी लो. सारी थकान एकदम गायब हो जाएगी.’’

मंजू ने चाय की प्याली को हाथ में लिया. उस ने पहले प्याली को देखा, फिर अपनी पैनी नजरों से राजन के चेहरे को पढ़ा. उस ने चाय को चुपचाप नीचे रख दिया और उस की आंखों में साफसाफ नफरत तैरने लगी.

मंजू अचानक ठहाका मार कर हंसी और बेहद तीखे लहजे में बोली, ‘‘क्या  राजन बाबू, तुम हम को बेवकूफ समझ रखे हो क्या? हम तुम्हारी नसनस से वाकिफ हैं. तुम्हारा यह कांपता हुआ हाथ और यह  झूठी ममता… हम को सब समझ में आ रहा है. तुम जिसे जहर देने आए न हो, वह पहले ही तुम्हारी खातिर तगड़ा इंतजाम कर चुकी है.’’

राजन का खून जम गया. वह हक्काबक्का हो कर हकलाने लगा, ‘‘क्या मतलब है तुम्हारा?’’

मंजू दो कदम पीछे हटी और तंज कसते हुए बोली, ‘‘मतलब यह कि जब तुम रसोई में चाय में जहर मिला रहे थे, हम यहां खिड़की से दारोगाजी को पहले ही इशारा कर दिए थे. वे लोग बाहर तुम्हारा ही इंतजार कर रहे हैं.’’

मंजू के मुंह से यह सुनते ही राजन के पैरों तले की जमीन खिसक गई. ठीक उसी पल, मेन दरवाजा एक  झटके में भरभरा कर टूट गया और पुलिस के भारी जूतों की आवाज से पूरा आंगन गूंज उठा.

लालटेन की पीली रोशनी में दारोगा और सिपाही चमचमाती हथकडि़यां लिए सामने खड़े थे.

राजन ने भागने के लिए पैर बढ़ाए, पर पुलिस ने उसे चारों तरफ से दबोच लिया.

मंजू भी सुबकते हुए घुटनों के बल जमीन पर बैठ गई. वह अच्छी तरह जानती थी कि राजन के साथसाथ जेल की वे काली सलाखें अब उस का भी इंतजार कर रही हैं.

एक नाजायज और फिसलन भरे रिश्ते की काई ने आखिरकार दोनों की जिंदगी को हमेशाहमेशा के लिए गहरे अंधकार में धकेल दिया था.  Story in Hindi

–राजेश प्रसाद

Relationship Story in Hindi : अवंतिका

Relationship Story in Hindi. बिजनौर की अवंतिका की शादी मेरठ के पौश इलाके गंगानगर के रहने वाले रिटायर्ड जेलर दीपचंद्र सिंह चहल के बड़े बेटे राहुल से तय हुई तो वह खुशी से  झूम उठी. उस की ससुराल वालों का खूब नाम था. पैसे की कोई कमी न थी. बहुओं को सास का बड़ा डर सताता है, यहां तो सास ही नहीं थी. वे बहुत पहले इस दुनिया से कूच कर गई थीं. हां, उस का एक देवर जरूर था लेकिन उसे तो घर की बड़ी बहू बनने का मौका मिल रहा था.

जेलर दीपचंद्र का ज्यादातर समय जेल की कोठरियों को देख कर बीता था. उन की सोच अभी भी जेलर वाली ही थी. इस की  झलक उन के बड़े मकान में दिखाई पड़ती थी. उनके दुमंजिले मकान में जेल की कोठरियों की तरह कमरे ही कमरे थे. घर की मेन एंट्री पर एक बड़ा मजबूत सा लोहे का गेट लगा था. कोई अजनबी उस मकान में घुस जाए तो उसे भूलभुलैया ही सम झ बैठे. उन्होंने उस मकान में किराएदारों को भी ऐसे ही ठूंसठूंस कर रखा हुआ था जैसे जेल में कैदी. हर कमरे में किराएदार ही किराएदार.

जेलर दीपचंद्र ने वहीं बीच में एक औफिसनुमा कमरा बना रखा था जहां से वे पूरे मकान और किराएदारों पर नजर रखते थे. उसी कमरे में वे सुबह नाश्ता पानी करने के बाद बैठ जाया करते थे. किराएदारों वाला रजिस्टर चैक करते थे कि किस का किराया आया और किस का नहीं. वहीं पर वे अपने मेहमानों या दूसरे लोगों से मिला करते थे. सुबह और शाम को पूरे मकान का एक राउंड वे जरूर ही लगाया करते थे.

उन्होंने अपने दोनों बेटों राहुल और सागर को दवाओं के कारोबार में लगा रखा था. एक बड़ा मैडिकल स्टोर मेन रोड पर खुलवा रखा था. उन का बड़ा बेटा राहुल अल्ट्रामौडर्न था. दोस्तों के संग कौकटेल पार्टी, हुक्का पार्टी करना उस का शौक था. पैसे की कोई कमी थी नहीं इसलिए राहुल की मौजमस्ती में भी कोई कमी आड़े नहीं आती थी.

अवंतिका राहुल को पहली ही नजर में भा गई थी. दीपचंद्र का नाम इतना बड़ा था कि उन की शोहरत की आड़ में राहुल के सब ऐब ढक गए थे. जब किसी रिश्तेदार ने अवंतिका के पिता को इशारों ही इशारों में बताया था कि राहुल शराब पीता है तो उन्होंने तपाक से कहा, ‘‘अरे भाई, आजकल शराब कौन नहीं पीता? ये तो बड़े लोगों के शौक हुआ करते हैं.’’

लेकिन यह बात उन्होंने अवंतिका से जानबू झ कर छिपाई. उन्हें डर था कि उन की बेटी की शादी एक अमीर परिवार में हो रही है, राहुल के शराब पीने की बात पर कहीं कोई अड़चन पैदा न हो जाए.

अवंतिका और राहुल की शादी मेरठ के एक बड़े होटल में बड़ी धूमधाम के साथ हो गई. बड़ी नामीगिरामी हस्तियां इस शादी समारोह में शामिल हुईं. पुलिस महकमे के आला अफसर वरवधु को आशीर्वाद देने के लिए पधारे.

अवंतिका को तो अपनी इस शादी पर बड़ा गुमान हो रहा था कि उस का शादी समारोह कितने शानदार ढंग से हो रहा है.

लेकिन सुहागरात को ही अवंतिका के सपने तब चकनाचूर हो गए जब राहुल नशे की हालत में उस के पास पहुंचा. वह बहकीबहकी बातें कर रहा था और होशोहवास में नहीं था. वह तो उस की हालत को देख कर ही घबरा उठी. वह बैड के एक कोने में सिमट कर बैठ गई और वह नशेडि़यों की तरह हरकतें करता रहा और फिर बेसुध हो गया.

सुहागरात को ही अवंतिका के सारे अरमान ताश के पत्तों की तरह बिखर गए. हालांकि, नशा उतरते ही सुबह के समय राहुल ने उस से माफी मांग ली लेकिन अब माफी मांगने से कोई फायदा होने वाला नहीं था. एक लड़की जिस रात को अपनी जिंदगी की सब से खास रात मानती है, वह तो गुजर चुकी थी.

राहुल ने इस की भरपाई करने की बहुत कोशिश की. वह अवंतिका को एक लंबे टूर पर गोवा और अंदमान निकोबार द्वीप समूह ले कर गया. उस की हर ख्वाहिश पूरी करने की कोशिश की. अवंतिका ने भी उसे दिल से माफ कर दिया और जीवन में मधुर रस घोलने की कोशिश की. कुछ खट्टेमीठे अनुभवों के साथ 2 साल गुजर गए और वह एक बेटी सान्वी की मां भी बन गई.

अवंतिका के कहने से राहुल ने शराब पीना कम तो कर दिया था, लेकिन बंद नहीं किया था. किसीकिसी दिन तो वह यारदोस्तों के संग इतनी पी लेता था कि उसे संभालना तक मुश्किल हो जाता था. तब अवंतिका को लगता था कि उस की जिंदगी नरक बन गई है.

कोई भी औरत अपने आदमी को बिस्तर पर कभी भी बेसुध देखना नहीं चाहती. उस की भी तो अपनी इच्छाएं होती हैं. एक ओर भरा बंधा यौवन और दूसरी ओर बेसुध पड़ा आदमी. दिनभर का रोमांटिक मूड पलभर में स्वाह. आखिर कौन औरत ऐसा चाहेगी?

लेकिन नशे की आदत कुत्ते की टेढ़ी दुम की तरह होती है. न दुम सीधी होती है और न ही नशा छूटता है. राहुल के साथ भी ऐसा ही था. आएदिन वह नशे की हालत में घर पहुंचता. उस का छोटा भाई सागर ही उसे उठा कर बिस्तर तक लाता. कभीकभी अवंतिका को भी नशे में चूर राहुल को उठाने में सागर की सहायता करनी पड़ती. उस समय सागर के हाथों का स्पर्श उसे अलग ही आनंद देता था.

एक दिन अवंतिका ने सागर से कहा, ‘‘देवरजी, ऐसा कब तक चलेगा? आप अपने भाई को शराब पीने से रोकते क्यों नहीं? इन्हें सम झाते क्यों नहीं?’’

‘‘भाभी, मैं तो बहुत मना करता हूं लेकिन भैया मानते ही नहीं. शाम होते ही इन पर न जाने कौन सा फुतूर सवार हो जाता है कि पिए बिना रहते ही नहीं.’’

‘‘देवरजी, ऐसे काम नहीं चलने वाला. कितनी ही रातें तुम्हारे भैया के चक्कर में मु झे जाग कर गुजारनी पड़ती हैं.’’

‘‘तो भाभी, आप जागती क्यों हो? सो जाया करो.’’

‘‘इन्हें इस हालत में छोड़ कर देवरजी, आप सम झो तो सही मु झे नींद ही कैसे आएगी?’’

धीरेधीरे इन बातों का दायरा बढ़ने लगा. अवंतिका को अपने देवर सागर से बातें करने में अजीब सा सुकून मिलता. इस सुकून का दायरा भी धीरेधीरे बढ़ कर बांहों की पनाह तक पहुंच गया. सागर का कमरा बराबर में ही था. जब राहुल बिस्तर पर नशे में चूर पड़ा होता था तब अवंतिका सागर की बांहों में असीम सुकून पा रही होती थी.

ससुर दीपचंद्र को जब इस की भनक लगी तो उन्होंने चुप रहना ही बेहतर सम झा. ये हालात देख कर उन्होंने अपने औफिस को ही अपना बैडरूम बना लिया. घर के अंदर आना कम से कम कर दिया मानो ऐसा कर के वे अवंतिका और सागर के संबंधों को अपनी मौन स्वीकृति दे रहे हों. अब वे अपना ज्यादातर समय वहीं गुजारने लगे.

राहुल को जब अवंतिका और सागर के संबंधों का पता चला तो उस के पैरों तले से जमीन खिसक गई लेकिन वह क्या करे गलती खुद उस की थी. लेकिन कौन मर्द होगा जो अपनी पत्नी को दूसरों की बांहों में होने की बात सुन कर चुप रह जाए. वह तो अंदर ही अंदर सुलग रहा था और मौका मिलते ही भड़क उठा, ‘‘अवंतिका, ऐसा नीच काम कोई गिरी हुई औरत ही कर सकती है जो तुम कर रही हो.’’

अवंतिका भी इस लांछन को सुन कर चुप रहने वाली नहीं थी. वह भी फट पड़ी, ‘‘मु झे नीच औरत कहने में तो तुम्हें शर्म नहीं आती लेकिन ये हालात पैदा किस ने किए? रात में शराब के नशे में चूर बिस्तर पर आ कर पड़ जाते हो उस का क्या?’’

‘‘तो तुम यह सब करोगी क्या?’’

‘‘मैं ब्याहता हूं कोई संन्यासिनी नहीं. मेरे बदन को भी भूखप्यास लगती है. अगर नशे में ऐसे ही चूर रहना था तो शादी ही क्यों की?’’

ऐसा कह कर अवंतिका अपनी बिटिया सान्वी को ले कर किचन में चली गई और राहुल सिर पकड़ कर वहीं बैठ गया. इस बेवफाई से वह बुरी तरह टूट गया. अब तो वह अपना गम भुलाने के लिए कभी भी पीनी शुरू कर देता. न वह दिन देखता, न रात.

अब उस का मन किसी काम में भी नहीं लगता. सारी दुनिया उसे बेगानी सी लगती. हर समय वह अवंतिका को  झिड़कता रहता. उसे दुत्कारता रहता. न जाने क्याक्या बड़बड़ाता रहता. अवंतिका भी उस के प्रति ढीठ बन गई थी. उस ने राहुल की चिंता ही करनी छोड़ दी. वह जोकुछ भी कहता उसे वह एक कान से सुनती दूसरे से निकाल देती.

राहुल को लगता था जैसे उस के दिमाग ने काम करना बंद कर दिया हो. उसे पता था कि घर में वह 24 घंटे अपनी पत्नी की निगरानी नहीं कर सकता. सागर की जगह कोई और होता तो शायद वह उसे गोली से ही उड़ा देता, लेकिन छोटे भाई पर वह गोली कैसे चलाए? उस पर गोली चलाने की बात सोच कर ही उस की रूह कांप जाती.

जिस भाई के साथ उस ने इतने साल इतने प्रेम से गुजारे, आज वह उस पर गोली चला कर उस की जान लेले… नहींनहीं, वह ऐसा नहीं कर सकता. इस से बेहतर तो यही है कि वह खुद अपनी जान देदे. अब उस के जीवन में हताशा और निराशा के सिवा कुछ नहीं बचा था.

दीपचंद्र सबकुछ जान कर भी अनजान बने हुए थे. वे घर की बात को घर में ही रखना चाहते थे. वे जानते थे कि ये हालात इतने खतरनाक और काबू से बाहर हो चुके हैं कि कभी भी कुछ भी हो सकता है.

उन्हें पता था कि राहुल ने अगर शराब पीनी नहीं छोड़ी तो अवंतिका अब कभी उस की नहीं हो सकेगी. राहुल के सामने यही बड़ी समस्या थी कि वह शराब के नशे का दास बन चुका था और दासत्व की बेडि़यों में जकड़ा आदमी कभी कुछ नहीं कर सकता.

दीपचंद्र सोचते बहुत थे, लेकिन करते कुछ नहीं थे. यहां तक कि उन्होंने अवंतिका से भी इस मसले पर कभी खुल कर बात नहीं की. वे तो सागर के लिए आने वाले रिश्तों को भी इसीलिए टालते रहे कि पता नहीं आगे क्या हो.

एक दिन राहुल ने अवंतिका और सागर को एक साथ देख लिया. वह उस समय भी नशे में था लेकिन उन दोनों को साथ देख कर उस का नशा काफूर हो गया. वह अपने ऊपर से कंट्रोल खो बैठा और घर में रखी लाइसैंसी बंदूक उठा लाया.

वह अवंतिका को गोली मारना चाहता था लेकिन सागर के बीच में आ जाने से उस का निशाना चूक गया. फिर भी कुछ छर्रे अवंतिका को लग ही गए.

सागर और दीपचंद्र अवंतिका को तुरंत अस्पताल ले कर गए जहां डाक्टरों ने कड़ी मशक्कत से उस के शरीर में घुसे छर्रों को निकाला. पुलिस केस भी दर्ज हुआ, लेकिन दीपचंद्र ने अपने असर और पैसे से केस ही बदलवा दिया.

अब केस यह बना कि अवंतिका घर की सफाई करते समय बंदूक को एक जगह से उठा कर दूसरी जगह रख रही थी तभी लापरवाही से बंदूक का ट्रिगर दब गया और गोली चल गई, जिस के कारण कुछ  छर्रे अवंतिका को लगे. इस तरह से पुलिस केस रफादफा हो गया.

लेकिन लोग इतने भोले नहीं थे. सच्चाई धीरेधीरे सब को पता चल रही थी. अवंतिका ने सबकुछ हिम्मत से सहन किया. वह अभी भी इस इंतजार में थी कि राहुल संभल जाए तो वह अपने देवर की शादी किसी और से करा दे, लेकिन वह इतनी होशियार भी थी कि अगर उस का पति नहीं सुधरता है तो वह देवर को अपना बना कर रखेगी और उस की शादी में अड़ंगे लगाएगी. किसी भी सूरत में वह उस की शादी नहीं होने देगी.

इस तरह से वह अपने जीवन को सुरक्षित रखेगी भले ही दुनिया कुछ भी कहे. वह सागर को अपने पति की तरह ट्रीट करने लगी थी. कोई क्या कह रहा था उस ने इस की चिंता करनी बंद कर दी थी.

राहुल ने जब से उन दोनों को साथ देखा था तब से वह और ज्यादा टूट गया था. वह खुद को संभाल नहीं पा रहा था. अब दुनिया में उस का एक ही सहारा था और वह थी शराब. अब वह हर समय नशे में डूबा रहता.

उस ने बाहर आनाजाना भी छोड़ दिया था. नशा उतरते ही उस की आंखों के सामने वही घातक दृश्य घूमने लगता जिस में उस ने अपनी पत्नी को सागर के साथ गलबहियां करते देखा था. यह उस के लिए असहनीय था. इस के बाद वह फिर से जाम पर जाम चढ़ाने लगता और अवंतिका को गंदीगंदी गालियां बकने लगता.

अवंतिका पर इन गालियों का रत्तीभर भी असर नहीं होता, बल्कि वह इन गालियों को सुन कर खुद को और मजबूत कर रही होती. उसे तो इस लाचार ओर शराबी आदमी पर तरस ही आता. उसे पता था कि वह शराब पीने और गालियां बकने के अलावा कुछ नहीं कर सकता.

दीपचंद्र ने इन हालात का आकलन कर के मन में बहुतकुछ सोच लिया था. इसी आधार पर वे न तो राहुल को कुछ सम झाते और न ही उसे डाक्टर के पास ले कर जाते. इस मामले में वे बिलकुल निष्क्रिय हो गए थे और अवंतिका के साथ मजबूती से खड़े थे. उन्हें पता था कि राहुल पूरी तरह से बरबाद हो चुका है और इस के लिए वह खुद जिम्मेदार है. उस का इस दुनिया में रहना न रहना बराबर है. इस के लिए उन्होंने अपने कलेजे पर पत्थर रख लिया था, आखिर बेटा तो वह उन्हीं का था.

ज्यादा शराब पीने के चलते आखिरकार राहुल का जिगर जवाब दे गया. अवंतिका और परिवार के दूसरे सदस्यों को इस का अंदाजा पहले से ही था. जब वे उसे अस्पताल ले कर गए तो वह मरने की हालत में पहुंच चुका था. उस का चैकअप कर डाक्टरों ने अपने हाथ खड़े कर दिए. घर पहुंचते ही वह मर गया. वह हड्डियों का ढांचा मात्र बचा था.

दिखाने के लिए सब रोए, लेकिन मन ही मन सब ने चैन की सांस ली कि एक मुसीबत टली. कुदरत ने आखिरकार अपना अनोखा फैसला कर ही दिया था. कमजोर को जाना है, मजबूत को जीवन का आनंद लेना है. प्रकृति की नजर में राहुल कमजोर साबित हुआ और अवंतिका मजबूत.

अब अवंतिका के लिए कोई रोकटोक नहीं थी. राहुल का जाना अवंतिका के लिए ही नहीं सब के लिए अंदरूनी खुशियां ले कर आया था. खराब और कमजोर किसी को बरदाश्त नहीं चाहे परिवार हो समाज हो या कुदरत. दुनिया में रहना तो काबिल बनना ही होगा. नकारा लोग खुद ब खुद हाशिए पर चले जाते हैं.

राहुल की तेरहवीं होते ही दीपचंद्र ने अवंतिका के मातापिता को बुला कर उन से बात की. अवंतिका और सागर से उन्होंने पहले ही बात कर ली थी. सब यही चाहते थे कि घर की दौलत और सम्मान के साथ घर में ही रहे.

दीपचंद्र ने सम झदारी दिखाते हुए एक सादा समारोह आयोजित कर के अवंतिका और सागर को शादी के बंधन में बांध दिया, लेकिन कोर्ट में कानूनी कार्यवाही करना वे नहीं भूले. उन की शादी का रजिस्ट्रेशन करवा कर सर्टिफिकेट हासिल किया जिस से भविष्य में कोई अड़चन न आए.

अवंतिका की जिंदगी में फिर से इतनी मुसीबतों के बाद खुशियों की बहार आ गई थी. वह जिंदगी के नए सवेरे में ताजगी और उमंग भरने के लिए सागर के साथ दिल्ली एयरपोर्ट से स्पेन के लिए उड़ चली जहां उसे अपना हनीमून मनाना था. पुरानी जिंदगी और यादों को दफन करना था और नई जिंदगी को गुलाबों की बगिया की तरह महकाना था. Relationship Story in Hindi

Story in Hindi : देश की माटी पुकारे

Story in Hindi. कई सालों के बाद मुझे विदेश जाने का मौका मिला था. जाहिर है कि बाहर भी देशी आदतें दिलोदिमाग पर छाई हुई थीं. अपने देश की मिट्टी की बात ही निराली है और उस से ज्यादा निराले इस मिट्टी के लोग. हमारा तो कतराकतरा इस से बना हुआ है. देश की मिट्टी और यहां के लोगों को खूब याद किया.

आप कहेंगे कि इस में खास बात क्या है. आदमी घरपरिवार, राज्य, गांवखेड़े, कसबेशहर, देश से दूर जाएगा, तो इन की याद तो आएगी ही. वैसे ही जैसे पत्नी से दूर जाओ, तो उस की याद आती ही है.

यह बात अलग है कि पतिपत्नी साथसाथ ज्यादा देर बिना खटपट के रह नहीं सकते हैं. उस समय तो ऐसा लगता है कि कुंआरे रह कर अलग ही रहते, तो अच्छा रहता. यह हम अपनी नहीं आप की बात कर रहे हैं. हमारी तो शादीशुदा जिंदगी बहुत सुखी है. वैसे, हर आम पति यही सोचता है, आप भी और मैं भी. अब परदेश में देश की याद कैसेकैसे आई, यह थोड़ा सुन लें, तो आप के परदेश जाने पर काम आएगा.

परदेश में 15 दिन बीत गए थे. हमें यूरोप में एक भी आदमी ऐसा नहीं मिला, जो सड़क पर कहीं खड़े हो कर देशी ढंग से हलका हो रहा हो. कहां अपने देश में हर गलीनुक्कड़ में ऐसे लोगों के चाहे जब दर्शन हो जाते थे और यहां एक अदद आदमी का टोटा पड़ा था.

हम ने सोचा कि सच में भारत ऐसे ही ‘विश्व गुरु’ नहीं कहलाता है. ये देश भले ही अपने को धनी समझते हों, लेकिन कई मामलों में कितने दरिद्रनारायण हैं. यहां हमारे वहां जैसा एक भी आदमी नहीं है.

यहां के रेलवे स्टेशन का खालीपन देख कर जी भर आया. आदमी नहीं दिख रहे थे. रेलें खाली चलती थीं. एक कंपार्टमैंट में मुश्किल से 4-5 लोग मिलते थे. वे भी ऐसे बैठते थे कि एकदूसरे से कोई मतलब नहीं. जैसे दुश्मन देशों के नागरिक हों.

यह देख कर हम तो अंदर से टूट से गए. अपने यहां तो मूंगफली, पौपकौर्न बेचने वाले, कागज के टुकड़ों, बीड़ीसिगरेट के ठूंठों, पानी की खाली बोतलों, गुस्से से भरे लोगों से ठसाठस भरी ट्रेन में धक्कामुक्की करते, लड़तेभिड़ते, फिर दूसरे पल आपस में प्यार करते, बतियाते, ठहाके लगाते, सरकार को कोसते लोग हर जगह मिलते हैं.

हम ने देखा कि ट्रेन में टीटीई के पीछे एक भी आदमी नहीं भाग रहा था. सोचा कि यह टीटीई कैसे अपना व बच्चों का पेट पालता होगा. वैसे, हमारे पास टिकट था, लेकिन हम खुद को रोक नहीं पाए. हम ने अपने बटुए से सौ डौलर का एक नोट निकाल कर ऐसे हवा में लहराया कि उस की नजर पड़ जाए और वह आ कर अपना काम कर जाए, लेकिन वह तो उलटा नाराज हो गया.

हम ने किसी तरह अपनेआप को इस आफत से छुटकारा दिलाया.यहां की सड़कों पर घूमे तो मायूसी हुई. न चाट के ठेले, न पानसिगरेट के, न चाय के, न पापड़ बेचने वाला, न चना जोर गरम बाबू वाला कोई और. कोई भीड़भाड़ भी नहीं.

हमारे यहां जब तक भीड़ का रैला न दिखे, किसी रैली में सड़क जाम में न फंसे, तब तक मजा ही नहीं आए.

और तो और, ट्रैफिक सिगनल 2 मिनट का भी हो, तो कोई उसे तोड़ते हुए अपने यहां जैसा नहीं दिखा. पूरे 2 मिनट तक आराम से इंतजार करता. हम तो बड़े मायूस हुए.

यहां के लोग जानवर प्रेमी बिलकुल नहीं लगे. वजह, किसी सड़क पर कुत्ते, बकरियां, गायभैंस, बैल यहां तक कि सूअर भी नहीं मिले. जानवरों की इतनी अनदेखी हम ने नहीं देखी. हमारे लोग तो स्टेशन व बस स्टैंड पर बिना इन के रह ही नहीं सकते. ‘पीटा’ वाले पता नहीं, हमें अवार्ड देने में इतनी देर क्यों कर रहे हैं. असली ‘एनीमल लवर’ हम ही हैं.

वहां के बाजार में मुर्दनी छाई सी लगी. कोई खास भीड़ नहीं. कोई खुला सामान नहीं. हर सामान डब्बाबंद. कुछ खरीदो या कुछ दाम कम करने की बात करो, तो अजीब सा मुंह बनाए सेल्समैन. मजा ही नहीं आया खरीदारी करने में.

सर्दीखांसी होने पर हम एक मैडिकल स्टोर में दवा लेने गए, तो उस ने बिना डाक्टर की परची के दवा देने से इनकार कर दिया. हमें तुरंत अपने वतन की दुकानें याद आईं. चाहे जो दवा बिना परची के झट से ले लो और कैमिस्ट भी डाक्टर की कमी अपनी सलाह दे कर पूरी कर देता था. हम ने मन में फिर दोहराया कि हम यहां नहीं रह पाएंगे.

यहां के एक दफ्तर में हमें एक काम से जाना पड़ा, तो बड़ा अजीब सा लगा. यहां के साहब के कमरे के बाहर कोई चपरासी नहीं मिला, जो कान में पैन डाल कर मैल निकाल रहा हो या तंबाकू मलते पंजे बजा रहा हो. दफ्तरों में कहीं भी न कोई कागज दिखा, न फाइलों के अंबार, न टैग उलझे हुए, न धूल खाते बस्ते. न पान की पीक का निशान ही दिखा.

हम ने सोचा, ‘बहुत बंदिशें लगा रखी हैं. यहां जरूर तनाव में खुदकुशी के मामले ज्यादा तादाद में होते होंगे. हमारे यहां तो कोई बंदिश नहीं है, जिस को जो आता है, वह करने से उसे रोका नहीं जाता.

‘पान की पीक थूकने की, हलका होने की, गालीगलौज करने की, नाककान में उंगली डालने की, बाल व खोपड़ी खुजलाने की, सरकार व महंगाई को कोसने की कोई मनाही नहीं है.’

हम 20 दिन में ही विदेश से ऊब गए. सड़क के न तो बीचोंबीच में और न ही किनारे कहीं धार्मिक स्थल दिखे और न बतियाने वाले लोग. हम ने तो मन भर जाने से टिकट कैंसिल कर हफ्ते भर पहले का टिकट बनवा लिया और अपनी माटी की ओर लौट चले.

दिल्ली एयरपोर्ट से उतर कर हम ने अपने शहर की ट्रेन पकड़ने की सोची. दिल्ली स्टेशन पर पहुंचते ही भीड़ देख कर हमारा दिल बागबाग हो गया. रात में घर पहुंचे, तो और बागबाग हो गया. ट्रेन के चूहों ने सूटकेस में 2 जगह छेद कर अपनी भूख शांत कर ली थी. हमारा बटुआ भी किसी ने पार कर ‘वैलकम बैक’ की परची जेब में उस की जगह रख दी थी. हम अपने देश जो आ गए थे. story in hindi

Story in Hindi : मुंबई की लोकल ट्रेन के फायदे

Story in Hindi. आप ने मुंबई की लोकल ट्रेन की काफी शिकायतें सुनी होंगी. शिकायतों से मतलब सवारी करने वालों की शिकायतें. मसलन, काफी भीड़ का होना, सीट का न मिलना, यहां तक कि इन्हें कलंक, हत्यारिन वगैरह कहना. वैसे तो लोकल ट्रेनें मुंबई की लाइफलाइन हैं और लाइफलाइन की शिकायत भला कैसे की जा सकती है? यहां की लोकल टे्रनों के कुछ खास फायदे हैं. इन्हें जान कर आप का मन खुश हो जाएगा.

फायदा नंबर एक यह है कि आप कितने भी सीधेसरल क्यों न हों, यहां की लोकल ट्रेन की कृपा से आप जीवट इनसान में तबदील हो जाते हैं.

शुरुआत में भीड़ देख कर आप 1-2 ट्रेनें छोड़ भी सकते हैं. ट्रेन में भीड़ के चढ़ जाने पर प्लेटफार्म चुनाव में हारी हुई पार्टी के दफ्तर या हारी हुई क्रिकेट टीम के खिलाड़ी के घर की तरह सूना हो सकता है और आप यह गलतफहमी पाल सकते हैं कि अगली ट्रेन में आप आराम से जा पाएंगे. पर अगली टे्रन आने तक, जिस में सिर्फ चंद मिनट ही होते हैं, भीड़ फिर पहले जैसी ही हो जाएगी.

जैसे बारिश के डर से चींटियां बिलबिला कर बिल से निकलती हैं, वैसे ही कुछ ही पलों में हजारों की तादाद में लोगों का प्रकट होना यहां आम बात है. आखिर में आप को लगेगा कि किसी ने चारा घोटाला कर चारे का हरण कर लिया है और आप के पास कोई चारा नहीं बचा है. नतीजतन, आप भीड़ से डरने के बजाय उस का हिस्सा बन जाएंगे. ट्रेन में चढ़ना तो अपनेआप में भगीरथ प्रयास है ही, ट्रेन में टिके रहना भी उतना ही बहादुरी भरा काम है. बदन की मालिश बगैर किसी खर्चेपानी के होती रहेगी. कभी रेलिंग के सहारे खड़े रहने, तो कभी दीवार से हाथ टेके खड़े रहने से आप की मांसपेशियां मजबूत होंगी. सेहत सुधरती जाएगी और बगैर ज्यादा कोशिश किए आप का बदन गठीला हो कर लोगों के जलने की वजह बन जाएगा.

जब आप प्लेटफार्म पर पहुंचते हैं और देखते हैं कि ट्रेन के आने में महज एक मिनट ही बाकी है तो आप फर्राटा धावक बन जाते हैं, वह भी अपने जैसी बहुत सी बाधाओं से टकराने से बचने की जुगत के साथ. आप भले ही मोबाइल फोन से कितनी भी दूरी बना कर रखते हों, पर ट्रेन में समय बिताने के लिए आप को इस से दोस्ती करनी पड़ेगी और आप का अपने मोबाइल फोन से मधुर संबंध बन जाएगा. इन ट्रेनों में कुछ घोर पुस्तक विरोधियों को पुस्तक प्रेमी बनते, नास्तिकों को भजन करते भी देखा गया है. इसी तरह इन लोकल ट्रेनों में नाश्ता करते लोग भी मिल जाते हैं. वे भी जो बड़े आराम से नाश्ता करने के हिमायती हैं, इन लोकल ट्रेनों के चक्कर में सब से पहले जगह पाने की जुगत भिड़ाते हैं. खड़ा होने या बैठने की जगह मिल जाने के बाद ही ये नाश्ता करते हैं. पहले ट्रेन में सीट पाओ, फिर खाना खाओ.

कभीकभी आप ट्रेन से बैग ले कर उतरेंगे तो हाथ में सिर्फ बैग का हैंडल रह जाएगा मानो भीड़रूपी झांसी की रानी लक्ष्मीबाई ने किसी अंगरेज सैनिक का सिर धड़ से अलग कर दिया हो. इस से बैग इंडस्ट्री को काफी बढ़ावा मिलेगा. अगर बैग भारत में बनेंगे तो ‘मेक इन इंडिया’ को भी बढ़ावा मिलेगा. अगर इस हालत यानी बैग के सिर और धड़ को अलग होने से बचाना है तो आप को बैग को हाथ में न ले कर पीठ पीछे कस कर लटकाना होगा. अगर पीछे से किसी के बैग से कुछ निकाल लेने का डर सता रहा हो तो बैग को बैकपैक के बजाय चैस्टपैक बनाना पड़ेगा यानी बैग को पीठ पर न लटका कर सीने पर लटकाना पड़ेगा.

इस का एक बड़ा फायदा मर्दों को को ‘खिलाडि़यों के खिलाड़ी’ अक्षय कुमार की तरह ‘पेट से होने’ का अहसास हो पाएगा. यहां हम किसी तरह का लिंगभेद न करते हुए बताते चलें कि यही हालत औरतों की बोगी की भी होती है और वे औरतें भी इसी तरह के सुख भोगने का हक रखती हैं. आखिरी स्टेशन को छोड़ कर बीच के किसी स्टेशन पर टे्रन से उतरने में भी काफी मशक्कत की जरूरत होती है यानी बीच के किसी स्टेशन पर सहीसलामत उतरना मतलब महारथी होना ही है. फिर इस से आप चौकन्ने भी होते हैं, क्योंकि अगर 1-2 स्टेशन पहले से ही कोशिश नहीं करेंगे तो अपने स्टेशन के 1-2 स्टेशन बाद ही उतर पाएंगे और फिर वापसी में फिर से वही परेशानी मोल लेनी पड़ेगी. इस से आप जागरूक मुसाफिर बन जाते हैं.

इस के अनेक फायदों में से एक फायदा यह भी है कि डियोडरैंट इंडस्ट्री को इस से काफी बढ़ावा मिलता है. 50 लोगों के बैठने के लिए बनी बोगी में डेढ़ सौ लोगों के लदने से सब के पसीनों की गंध ‘मिले गंध मेरी तुम्हारी तो गंध बने हमारी’ का राग अलापते लगते हैं. उन के इस राग से बचने के लिए डियोडरैंट की जरूरत होती है और इस से संबंधित इंडस्ट्री को काफी बढ़ावा मिलता है. ‘स्टार्टअप’ और?‘स्टैंडअप इंडिया’ को इस से बढ़ावा मिल सकता है. यहां की लोकल ट्रेन वर्गभेद को भी दूर करती है. सैकंड क्लास और फर्स्ट क्लास में कोई खास फर्क नहीं होता. बहुत हुआ तो सैकंड क्लास में डेढ़ सौ मुसाफिर होंगे तो फर्स्ट क्लास में 140.

मुसाफिरों की तादाद के मामले में लिंगभेद भी नहीं है. औरतों की बोगी में भी यही देखने को मिलेगा. हां, लोकल मुसाफिर एक फर्क बताते हैं कि फर्स्ट क्लास में पसीने की गंध डियोडरैंट की गंध से हार मानती है तो सैकंड क्लास में डियोडरैंट की गंध अपनी हार मान लेती है. बाकी मामलों में दोनों एक से हैं. हालांकि कई मामलों में मुकाबला बराबरी पर भी छूटता है.

ट्रेन के डब्बों में सामान बेचने वालों के भी वारेन्यारे होते हैं. कितनी भी भीड़ हो, वे लोग अपना सामान आसानी से बेच देते हैं. फायदे और भी हैं, पर ज्यादा फायदे गिनाने से कहीं आप कब्ज के शिकार न हो जाएं, इसलिए फिलहाल इतना ही. story in hindi

story in hindi : बड़ा फील करने के अवसर पगपग पर

story in hindi. हर आदमी बड़ा होना, बड़ा बनना चाहता है. लेकिन हर आदमी बड़ा बन नहीं सकता. यदि सभी बड़े बन जाएं तो फिर कोई बड़ा नहीं रहेगा क्योंकि कोई छोटा नहीं बचेगा. आदमी जो मुकाम हासिल नहीं कर पाता है, वह उस के अवचेतन में बैठ जाता है और समयसमय पर प्रकट होता है. कोई सोते में सपने देखता है तो कोई जागते में देखता है.
वैसे, जो बड़ा नहीं बन पाया उस के लिए हर जगह अवसर उपलब्ध हैं कि वह अपनेआप को दूसरों से बड़ा फील करे. एक उदाहरण ले लें, एक प्रसिद्ध गायक का कार्यक्रम शहर के औडिटोरियम में चल रहा था. हजारों की भीड़ होने से जगह की मारामारी हो रही थी. कुरसियां भीड़ से काफी कम थीं. जो पहले आ गए वे कुरसी पा गए. जो देर से आए उन्हें यहांवहां खड़ा होना पड़ा. अब जो कुरसी में बैठे थे वे इन खड़े लोगों से अपने को बड़े समझने लगे. यह भाव उन में ज्यादा झलक रहा था जिन की कुरसी के बिलकुल पास 10-15 लोग खड़े थे. वे अब कार्यक्रम कम देख रहे थे, खड़े लोगों को ज्यादा देख रहे थे. यहां अवसर था छोटे होते हुए भी अपने को बड़ा फील करने का. एकदो चवन्नी के चलन से बाहर होने के बाद भी अपनेआप को हजार रुपए के सिक्के के बराबर समझ रहे थे. बड़े होने के अवसर बड़ा न होते हुए भी हर जगह हैं.
दूसरी स्थिति लीजिए, आप भद्र पुरुष हैं. अचानक शहर से बाहर जाना पड़ा. ट्रेन में आरक्षण नहीं मिला. आप को स्लीपर में बिना आरक्षण के जाना पड़ा. ट्रेन में खचाखच भीड़ थी. कई लोग अर्थ पर थे, मतलब फर्श पर. आप जिस बर्थ पर बैठे, वह आरक्षित थी. बैठे हुए सज्जन ने पहले तो कोई प्रतिक्रिया नहीं की लेकिन बाद में पूछ बैठे कि आप का बर्थ नंबर कौन सा है. आप ने कहा कि अभी तो टीटीई का इंतजार कर रहे हैं. आप ने उसे बड़ा फील करने का अवसर प्रदान कर दिया. वह बड़ा फील कर रहा था लगातार और आप उस के रहमोकरम पर थे. आप जब कभी अर्थ पर बैठे लोगों और कभी इस को देखते तो आप को लगता कि वह आप से बड़ा है. उस के चेहरे के हावभाव से ऐसा लगता भी था. ऐसे ही स्थिति सिटी बसों में भी बनती है यदि आप को खड़ा होना पड़े और कोई बैठा हो. लेकिन यहां बड़ा होने का खयाल बहुत कम समय के लिए रहता है. जो आज सीट पर बैठा है वह कल खड़ा हो कर छोटा फील कर सकता है.
छोटा होते हुए बड़ा फील करने के बड़े अवसर हैं. आप सिनेमा देखने सपरिवार गए हैं. लाइन में लगे हैं टिकट लेने के लिए और आप के पहले वाले को टिकट मिल गया है. आप के आते ही टिकटखिड़की धड़ाम से बंद हो जाती है. अब जिसे टिकट मिल गया है उस के चेहरे पर मुसकान है. आप के चेहरे पर मायूसी. वह बड़ा फील कर रहा है. छोटा आदमी हो सकता है, फेरी लगा कर पेट भरता हो या गुब्बारे बेचता हो लेकिन इस समय उस का मुंह प्रसन्नता की हवा से गुब्बारे की तरह फूल कर कुप्पा हो गया है. आज सपरिवार वह इस हिट मूवी को देखेगा और आप टिकटरूपी खेल में हिटविकेट हो गए हैं. आप की पत्नी का भी मुख फूल कर कुप्पा हो गया है लेकिन यह नाराजगी की हवा भरने से हुआ है.
यही तत्काल के आरक्षण की लाइन में भी होता है. आप सुबह 6 बजे से जा कर लाइन में लग गए हैं. आप के पहले 4 बजे से ही कई लोग लगे हैं. 8 बजे खिड़की छपाक से खुलती है, काम शुरू हो गया है. कैसे पता चला? रेलवे के चरमराते हुए डौट मैट्रिक्स प्रिंटर की कर्णभेदी ध्वनि लय में सुनाई दे रही है.
लाइन में सब बराबर हैं रिकशे वाला, आटो वाला, फेरी वाला, बाबू, अधिकारी, व्यापारी, प्रोफैशनल. लेकिन आप के नंबर आने के पहले 4 आदमी और हैं. आप व पीछे के सभी हाथ मलते रह गए जब छपाक से खुली खिड़की धड़ाम से बंद हो गई. ऐसी कि लगा कि धड़कन न बंद हो जाए. अब जो आदमी आरक्षण करवा कर जा रहा था, वह आप जैसे छोटे रह गए लोगों के सामने अपने को बड़ा समझेगा ही. आप बड़े बाप की औलाद हो, कार से कालेज आते हो. आप के कालेज का आज रिजल्ट आया है. आप सैकंड ग्रेड में आए हैं जबकि रामरतन मोची का साइकिल में आने वाला लड़का फर्स्ट ग्रेड में है. अब उस का समय है बड़ा फील करने का.
बड़ा फील करने का अवसर तो किसी होटल बुक करते समय भी उपलब्ध है. सीजन है, होटल्स बुक हैं. पर्यटकों से भरे पड़े हैं. आप भी पहुंच गए हैं. होटलों के चक्कर काट रहे हैं. कहीं कमरा नहीं मिला. 7वीं होटल में आए हैं. एक ही कमरा बचा है. एक अनार और 4 बीमार, 3 और लोग कमरे को खोजते आ गए हैं. एक ज्यादा व्यावहारिक निकला. ऐसे मौके पर उस ने बिना कमरे को देखे ही हां कर बुक कर दिया. अब आप तीनों छोटों के सामने वह अंदर ही अंदर मुसकराता हुआ बड़ा फील कर रहा है.
भगवानों की दुकानों में भी लोग अपने को बड़ा फील करते हैं या करवाते हैं. कहने को यहां सब बराबर होने चाहिए लेकिन कई लोग खुद दुकानदार पंडों को पैसा दे कर उन से वीआईपी पास बनवा लेते हैं और लाइन से हट कर सीधे पूजा के प्रोडक्ट के सामने पतली गली से पहुंच जाते हैं. श्रद्धालुओं की भारी भीड़ देखते ही रह जाती है और ये अपने को बड़ा फील करने लगते हैं. बड़ा फील करने के अवसर हर जगह हैं. बड़ा बनना बड़ा कठिन है, बड़ा फील करना बड़ा आसान है. बस, मौका मिलना चाहिए. ठीक है समय ने आप को अभी तक छोटा ही रखा है. लेकिन बड़ा फील करने, थोड़ी देर के लिए बड़ा बन जाने के अवसर पगपग पर हैं.
वैसे भी, इस देश में आम आदमी छोटा ही रह जाता है ताउम्र. यहां बड़ा माना जाता है उस को जिस के पास धनदौलत हो, भले ही वह घोटालेबाजी से, कालाबाजारी से या सरकारी धन में पलीता लगा कर की गई कमाई हो. और यहां बड़ा बनने के अवसर अधिकारी, ठेकेदार, नेता व दलालों को ज्यादा मिलते हैं. तो फिर, बड़ा फील करने के जितने अवसर मिलते हैं उन को एंजौय करने में ही समझदारी है. story in hindi

Mobile Phone and Family : मां और मोबाइल

Mobile Phone and Family. ‘‘मेरा मोबाइल कहां है? कितनी बार कहा है कि मेरी चीजें इधरउधर मत किया करो पर तुम सुनती कहां हो,’’ आफिस जाने की हड़बड़ी में मानस अपनी पत्नी रोमा पर बरस पड़े थे.

‘‘आप की और आप के बेटे राहुल के कार्यालय और स्कूल जाने की तैयारी में सुबह से मैं चकरघिन्नी की तरह नाच रही हूं, मेरे पास कहां समय है किसी को फोन करने का जो मैं आप का मोबाइल लूंगी,’’ रोमा खीझपूर्ण स्वर में बोली थी.

‘‘तो कहां गया मोबाइल? पता नहीं यह घर है या भूलभुलैया. कभी कोई सामान यथास्थान नहीं मिलता.’’

‘‘क्यों शोर मचा रहे हो, पापा? मोबाइल तो दादी मां के पास है. मैं ने उन्हें मोबाइल के साथ छत पर जाते देखा था,’’ राहुल ने मानो बड़े राज की बात बताई थी.

‘‘तो जा, ले कर आ…नहीं तो हम दोनों को दफ्तर व स्कूल पहुंचने में देर हो जाएगी…’’

पर मानस का वाक्य पूरा हो पाता उस से पहले ही राहुल की दादी यानी वैदेहीजी सीढि़यों से नीचे आती हुई नजर आई थीं.

‘‘अरे, तनु, मेरे ऐसे भाग्य कहां. हर घर में तो श्रवण कुमार जन्म लेता नहीं,’’ वे अपने ही वार्त्तालाप में डूबी हुई थीं.

‘‘मां, मुझे देर हो रही है,’’ मानस अधीर स्वर में बोले थे.

‘‘पता है, इसीलिए नीचे आ रही हूं. तान्या से बात करनी है तो कर ले.’’

‘‘मैं बाद में बात कर लूंगा. अभी तो मुझे मेरा मोबाइल दे दो.’’

‘‘मुझे तो जब भी किसी को फोन करना होता है तो तुम जल्दी में रहते हो. कितनी बार कहा है कि मुझे भी एक मोबाइल ला दो, पर मेरी सुनता ही कौन है. एक वह श्रवण कुमार था जिस ने मातापिता को कंधे पर बिठा कर सारे तीर्थों की सैर कराई थी और एक मेरा बेटा है,’’ वैदेहीजी देर तक रोंआसे स्वर में प्रलाप करती रही थीं पर मानस मोबाइल ले कर कब का जा चुका था.

‘‘मोबाइल को ले कर क्यों दुखी होती हैं मांजी. लैंडलाइन फोन तो घर में है न. मेरा मोबाइल भी है घर में. मैं भी तो उसी पर बातें करती हूं,’’ रोमा ने मांजी को समझाना चाहा था.

‘‘तुम कुछ भी करो बहू, पर मैं इस तरह मन मार कर नहीं रह सकती. मैं किसी पर आश्रित नहीं हूं. पैंशन मिलती है मुझे,’’ वैदेही ने अपना क्रोध रोमा पर उतारा था पर कुछ ही देर में सब भूल कर घर को सजासंवार कर रोमा को स्नानगृह में गया देख कर उन्होंने पुन: अपनी बेटी तान्या का नंबर मिलाया था.

‘‘हैलो…तान्या, मैं ने तुम से जैसा करने को कहा था तुम ने किया या नहीं?’’ वे छूटते ही बोली थीं.

‘‘वैदेही बहन, मैं आप की बेटी तान्या नहीं उस की सास अलका बोल रही हूं.’’

‘‘ओह, अच्छा,’’ वे एकाएक हड़बड़ा गई थीं.

‘‘तान्या कहां है?’’ किसी प्रकार उन के मुख से निकला था.

‘‘नहा रही है. कोई संदेश हो तो दे दीजिए. मैं उसे बता दूंगी.’’

‘‘कोई खास बात नहीं है, मैं कुछ देर बाद दोबारा फोन कर लूंगी,’’ वैदेही ने हड़बड़ा कर फोन रख दिया था. पर दूसरी ओर से आती खनकदार हंसी ने उन्हें सहमा दिया था.

‘कहीं छोकरी ने बता तो नहीं दिया सबकुछ? तान्या दुनियादारी में बिलकुल कच्ची है. ऊपर से यह फोन. स्थिर फोन में यही तो बुराई है. घरपरिवार को तो क्या सारे महल्ले को पता चल जाता है कि कहां कैसी खिचड़ी पक रही है. मोबाइल फोन की बात ही कुछ और है…किसी भी कोने में बैठ कर बातें कर लो.’ उन की विचारधारा अविरल जलधारा की भांति बह रही थी कि अचानक फोन की घंटी बज उठी थी.

‘‘हैलो मां, मैं तान्या. मां ने बताया कि जब मैं स्नानघर में थी तो आप का फोन आया था. कोई खास बात थी क्या?’’

‘‘खास बात तो कितने दिनों से कर रही हूं पर तुम्हें समझ में आए तब न. अरे, जरा अक्ल से काम लो और निकाल बाहर करो बुढि़या को. जब देखो तब तुम्हारे यहां पड़ी रहती है. कब तक उस की गुलामी करती रहोगी?’’

‘‘धीरे बोलो मां, कहीं मांजी ने सुन लिया तो बुरा मानेंगी.’’

‘‘फोन पर हम दोनों के बीच हुई बात को कैसे सुनेगी वह?’’

‘‘छोड़ो यह सब, शनिवाररविवार को आप से मिलने आऊंगी तब विस्तार से बात करेंगे. जो जैसा चल रहा है चलने दो. क्यों अपना खून जलाती हो.’’

‘‘मैं तो तेरे भले के लिए ही कहती हूं पर तुम लोगों को बुरा लगता है तो आगे से नहीं कहूंगी,’’ वैदेही रोंआसे स्वर में बोली थीं.

‘‘मां, क्यों मन छोटा करती हो. हम सब आप का बड़ा सम्मान करते हैं. यथाशक्ति आप की सलाह मानने का प्रयत्न करते हैं पर यदि आप की सलाह हमारा अहित करे तो परेशानी हो जाती है.’’

‘‘लो और सुनो, अब तुम्हें मेरी बातों से परेशानी भी होने लगी. ठीक है, आज से कुछ नहीं कहूंगी,’’ वैदेही ने क्रोध में फोन पटक दिया था और मुंह फुला कर बैठ गई थीं.

‘‘क्या हुआ, मांजी, सब ठीक तो है?’’ उन्हें दुखी देख कर रोमा ने प्रश्न किया.

‘‘क्यों? तुम्हें कैसे लगा कि सब ठीक नहीं है?’’ वैदेही ने प्रश्न के उत्तर में प्रश्न ही पूछ लिया.

‘‘आप का मूड देख कर.’’

‘‘मैं सब समझती हूं. छिप कर मेरी बातें सुनते हो तुम लोग. इसीलिए तो मोबाइल लेना चाहती हूं मैं.’’

‘‘मैं ने आज तक कभी किसी का फोन वार्त्तालाप नहीं सुना. आप को दुखी देख कर पूछ लिया था. आगे से ध्यान रखूंगी,’’ रोमा तीखे स्वर में बोली और अपने काम में व्यस्त हो गई.

वैदेही बेचैनी से तान्या के आने की प्रतीक्षा करती रही कि कब तान्या आए और कब वे उस से बात कर के अपना मन हलका करें पर जब सांझ ढलने लगी और तान्या नहीं आई तो उन का धीरज जवाब देने लगा. मानस सुबह से अपने मोबाइल से इस तरह चिपका था कि उन्हें तान्या से बात करने का अवसर ही नहीं मिल रहा था.

‘‘मुझे अपनी सहेली नीता के यहां जाना है, मांजी. मैं सुबह से तान्या दीदी की प्रतीक्षा में बैठी हूं पर लगता है कि आज वे नहीं आएंगी. आप कहें तो मैं थोड़ी देर के लिए नीता के घर हो आऊं. उस का बेटा बीमार है,’’ रोमा ने आ कर वैदेही से अनुनय की तो वे मना न कर सकीं.

रोमा को घर से निकले 10 मिनट भी नहीं बीते होंगे कि तान्या ने कौलबेल बजाई.

‘‘लो, अब समय मिला है तुम्हें मां से मिलने आने का? सुबह से दरवाजे पर टकटकी लगाए बैठी हूं. आंखें भी पथरा गईं.’’

‘‘इस में टकटकी लगा कर बैठने की क्या बात थी, मां?’’ मानस बोल पड़ा, ‘‘आप मुझ से कहतीं मैं तान्या दीदी से फोन कर के पूछ लेता कि वे कब तक आएंगी.’’

‘‘लो और सुनो, सुबह से पता नहीं किसकिस से बात कर रहा है तेरा भाई. सारे काम फोन कान से चिपकाए हुए कर रहा है. बस, सामने बैठी मां से बात करने का समय नहीं है इस के पास.’’

‘‘क्या कह रही हो मां. मैं तो सदासर्वदा आप की सेवा में मौजूद रहता हूं. फिर राहुल है, रोमा है जितनी इच्छा हो उतनी बात करो,’’ मानस हंसा.

‘‘2 बेटों, 2 बेटियों का भरापूरा परिवार है मेरा पर मेरी सुध लेने वाला कोई नहीं है. यहां आए 2 सप्ताह हो गए मुझे, तान्या को आज आने का समय मिला है.’’

‘‘मेरा बस चले तो दिनरात आप के पास बैठी रहूं. पर आजकल बैंक में काम बहुत बढ़ गया है. मार्च का महीना है न. ऊपर से घर मेहमानों से भरा पड़ा है. 3-4 नौकरों के होने पर भी अपने किए बिना कुछ नहीं होता,’’ तान्या ने सफाई दी थी.

‘‘इसीलिए कहती हूं अपने सासससुर से पीछा छुड़ाओ. सारे संबंधी उन से ही मिलने तो आते हैं.’’

‘‘क्या कह रही हो मां, कहीं मांजी ने सुन लिया तो गजब हो जाएगा. बहुत बुरा मानेंगी.’’

‘‘पता नहीं तुम्हें कैसे शीशे में उतार लिया है उन्होंने. और 2 बेटे भी तो हैं, वहां क्यों नहीं जा कर रहतीं?’’

‘‘जौय और जोषिता को मांजी ने बचपन से पाल कर बड़ा किया है. अब तो स्थिति यह है कि बच्चे उन के बिना रह ही नहीं पाते. दोचार दिन के लिए भी कहीं जाती हैं तो बच्चे बीमार पड़ जाते हैं.’’

‘‘तुम्हें और तुम्हारे बच्चों को कठपुतली बना कर रखा है उन्होंने. जैसा चाहते हैं वैसा नचाते हैं दोनों. सारा वेतन रखवा लेते हैं. दुनिया भर का काम करवाते हैं. यह दिन देखने के लिए ही इतना पढ़ायालिखाया था तुम्हें?’’

‘‘किसी ने जबरदस्ती मेरा वेतन कभी नहीं छीना है मां. उन के हाथ में वेतन रखने से वे लोग भी प्रसन्न हो जाते हैं और मेरे सासससुर भी वह पैसा अपनी जेब में नहीं रख लेते बल्कि उन्हें हमारे पर ही खर्च कर देते हैं. जो बचता है उसे निवेश कर देते हैं. ’’

‘‘पर अपना पैसा उन के हाथ में दे कर उन की दया पर जीवित रहना कहां की समझदारी है?’’

‘‘मां, आप क्यों तान्या दीदी के घर के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करती हैं,’’ इतनी देर से चुप बैठा मानस बोला था.

‘‘अरे, वाह, अपनी बेटी के हितों की रक्षा मैं नहीं करूंगी तो कौन करेगा. पर मेरी बेटी तो समझ कर भी अनजान बनी हुई है.’’

‘‘मां, मैं आप के सुझावों का बहुत आदर करती हूं पर साथ ही घर की सुखशांति का विचार भी करना पड़ता है.’’

‘‘वही तो मैं कह रहा हूं. अपनी समस्याएं क्या कम हैं, जो आप तान्या दीदी की समस्याएं सुलझाने लगीं? और मां, आप ने तो दीदी के आते ही अपने सुझावों की बमबारी शुरू कर दी. न चाय, न पानी…कुछ तो सोचा होता,’’ मानस ने मां को याद दिलाया.

‘‘रोमा अभी तक लौटी नहीं जबकि उसे पता था कि तान्या आने वाली है. फोन करो कि जल्दी से घर आ जाए.’’

‘‘फोन करने की जरूरत नहीं है. वह स्वयं ही आ जाएगी. उस की मां आई हुई हैं, उन से मिलने गई है.’’

‘‘मां आई हुई हैं? मुझ से तो कह कर गई है कि नीता का बेटा बीमार है. उसे देखने जा रही है.’’

‘‘उसे भी देखने गई है. कई दिनों से सोच रही थी पर जा नहीं पा रही थी. नीता के घर के पास रोमा के दूर के रिश्ते के मामाजी रहते हैं. वे बीमार हैं और रोमा की मम्मी उन्हें देखने आई हुई हैं.’’

‘‘ठीक है, सब समझ में आ गया. मां से मिलने जा रही हूं यह भी तो कह कर जा सकती थी, झूठ बोल कर जाने की क्या आवश्यकता थी. रोमा अपना फोन तो ले कर गई है?’’

‘‘हां, ले गई है.’’

‘‘ला, अपना फोन दे तो मैं उस से बात करूंगी.’’

‘‘क्या बात करेंगी आप? वह अपनेआप आ जाएगी,’’ मानस ने तर्क दिया.

‘‘फोन कर दूंगी तो जल्दी आ जाएगी. तान्या आई है तो खाना खा कर ही जाएगी न…’’

‘‘आप चिंता न करें मां, मैं खाना नहीं खाऊंगी. आप को जो खाना है मैं बना देती हूं,’’ तान्या ने उन्हें बीच में ही टोक दिया.

‘‘फोन तो दे मानस, रोमा से बात करनी है,’’ वैदेही जिद पर अड़ी थीं.

‘‘एक शर्त पर मोबाइल दूंगा कि आप रोमा से कुछ नहीं कहेंगी. बेचारी कभीकभार घर से बाहर निकलती है. दिनभर घर के काम में जुटी रहती है.’’

‘‘ठीक है, रोमा को कुछ नहीं कहूंगी, उस की मां से बात करूंगी. कहूंगी आ कर मिल जाएं. बहुत लंबे समय से मिले नहीं हम दोनों.’’

मां को फोन थमा कर मानस और तान्या रसोईघर में जा घुसे थे.

‘‘हैलो रोमा, तुम नीता के बीमार बेटे से मिलने की बात कह कर गई थीं. सौदामिनी बहन के आने की बात तो साफ गोल कर गईं तुम,’’ वैदेही बोलीं.

‘‘नहीं मांजी, ऐसा कुछ नहीं था. मुझे लगा, आप नाराज होंगी,’’ रोमा सकपका गई.

‘‘लो भला, मांबेटी के मिलने से भला मैं क्यों नाराज होने लगी? सौदामिनी बहन को फोन दो जरा. उन से बात किए हुए तो महीनों बीत गए,’’ वैदेहीजी का अप्रत्याशित रूप से मीठा स्वर सुन कर रोमा का धैर्य जवाब देने लगा था. उस ने तुरंत फोन अपनी मां सौदामिनी को थमा दिया था.

‘‘नमस्ते, सौदामिनी बहन. आप तो हमें भूल ही गईं,’’ उन्होंने उलाहना दिया.

‘‘आप को भला कैसे भूल सकती हूं दीदी, पर दुनिया भर के पचड़ों से समय ही नहीं मिलता.’’

‘‘तो यहां तक आ कर क्या हम से मिले बिना चली जाओगी? मेरा तो सब से मिलने को मन तरसता रहता है. इसीलिए बच्चों से कहती हूं एक मोबाइल ला दो, कम से कम सब से बात कर के मन हलका कर लूंगी.’’

रसोईघर में भोजन का प्रबंध करते मानस और तान्या हंस पड़े थे, ‘‘मां फिर मोबाइल पुराण ले कर बैठ गईं, लगता है उन्हें मोबाइल ला कर देना ही पड़ेगा.’’

‘‘मैं ने भी कई बार सोचा पर डरती हूं अपना मोबाइल मिलते ही वे हम भाईबहनों का तो क्या, अपने खानेपीने का होश भी खो बैठेंगी.’’

‘‘मुझे दूसरा ही डर है. फोन पर ऊलजलूल बात कर के कहीं कोई नया बखेड़ा न खड़ा कर दें.’’

‘‘जो भी करें, उन की मर्जी है. पर लगता है कि अपने अकेलेपन से जूझने का इन्होंने नया ढंग ढूंढ़ निकाला है.’’

‘‘चलो, तान्या दीदी, आज ही मां के लिए मोबाइल खरीद लाते हैं. इन का इस तरह फोन के लिए बारबार आग्रह करना अच्छा नहीं लगता.’’

‘‘चाय तैयार है. चाय पी कर चलते हैं, भोजन लौट कर करेंगे,’’ तान्या ने स्वीकृति दी थी.

‘‘मैं रोमा और जीजाजी दोनों को फोन कर के सूचित कर देता हूं कि हम कुछ समय के लिए बाहर जा रहे हैं.’’

‘‘कहां जा रहे हो तुम दोनों?’’ वैदेही ने अपना दूरभाष वार्त्तालाप समाप्त करते हुए पूछा.

‘‘हम दोनों नहीं, हम तीनों. चाय पियो और तैयार हो जाओ, आवश्यक कार्य है,’’ मानस ने उन का कौतूहल शांत करने का प्रयत्न किया.

वे उन्हें मोबाइल की दुकान पर ले गए तो उन की प्रसन्नता की सीमा न रही. मानो कोई मुंह में लड्डू ठूंस दे और उस का स्वाद पूछे.

वैदेहीजी के चेहरे पर ऐसे भाव थे जैसे लंबे समय से अपने मनपसंद खिलौने के लिए मचलते बच्चे को उस का मनपसंद खिलौना मिल गया हो.

उन्होंने अपनी पसंद का अच्छा सा मोबाइल खरीदा जिस से अच्छे छायाचित्र खींचे जा सकते थे. घर के पते आदि का सुबूत देने के बाद उन के फोन का नंबर मिला तो उन का चेहरा खिल उठा.

‘‘आप को अपना फोन प्रयोग में लाने के लिए 24 घंटे तक प्रतीक्षा करनी पड़ेगी,’’ सेल्समैन ने बताया तो वे बिफर उठीं.

‘‘यह कौन सी दुकान पर ले आए हो तुम लोग मुझे? इन्हें तो फोन चालू करने में ही 24 घंटे लगते हैं.’’

‘‘कोई बात नहीं है, मां जहां आप ने इतने दिनों तक प्रतीक्षा की है एक दिन और सही,’’ तान्या ने समझाना चाहा.

‘‘तुम नहीं समझोगी. मेरे लिए तो एक क्षण भी एक युग की भांति हो गया है,’’ उन्होंने उत्तर दिया.

घर पहुंचते ही फोन को डब्बे से निकाल कर उस के ऊपर मोमबत्ती जलाई गई. फिर बुला कर सब में मिठाई बांटी, मानो मोबाइल का जन्म उन्हीं के हाथों हुआ था और उस के चालू होने की प्रतीक्षा की जाने लगी.

यह कार्यक्रम चल ही रहा था कि रोमा, सौदामिनी और अपने मामा आलोक बाबू के साथ आ पहुंची.

वैदेही का नया फोन आना ही सब से बड़ा समाचार था. उन्होंने डब्बे से निकाल कर सब को अपना नया मोबाइल फोन दिखाया.

‘‘कितना सुंदर फोन है,’’ राहुल तो देखते ही पुलक उठा.

‘‘दादी मां, मुझे भी दिया करोगी न अपना मोबाइल?’’

‘‘कभीकभी, वह भी मेरी अनुमति ले कर. छोटे बच्चों पर नजर रखनी पड़ती है न सौदामिनी बहन.’’

‘‘हांहां, क्यों नहीं,’’ सौदामिनी ने सिर हिला दिया था.

‘‘सच कहूं, तो आज कलेजा ठंडा हो गया. यों तो राहुल को छोड़ कर सब के पास अपनेअपने मोबाइल हैं. पर अपनी चीज अपनी ही होती है. आयु हो गई है तो क्या हुआ, मैं ने तो साफ कह दिया कि मुझे तो अपना मोबाइल फोन चाहिए ही. मैं क्या किसी पर आश्रित हूं? मुझे पैंशन मिलती है,’’ वे देर तक सौदामिनी से फोन के बारे में बातें करती रही थीं.

कुछ देर बाद सौदामिनी और आलोक बाबू ने जाने की अनुमति मांगी थी.

‘‘आप ने फोन किया तो लगा कि यहां तक आ कर आप से मिले बिना जाना ठीक नहीं होगा,’’ सौदामिनी बोलीं.

‘‘यही तो लाभ है मोबाइल फोन का. अपनों को अपनों से जोड़े रखता है,’’ वैदेही ने उत्तर दिया.

‘‘चिंता मत करना. अब मेरे पास अपना फोन है. मैं हालचाल लेती रहूंगी.’’

‘‘मैं भी आप को फोन करती रहूंगी. आप का नंबर ले लिया है मैं ने,’’ सौदामिनी ने आश्वासन दिया था.

हाथ में अपना मोबाइल फोन आते ही वैदेही का तो मानो कायाकल्प ही हो गया. उन का मोबाइल अब केवल वार्त्तालाप का साधन नहीं है. उन के परिचितों, संबंधियों और दोस्तों के जवान बेटेबेटियों का सारा विवरण उन के मोबाइल में कैद है. वे चलताफिरता मैरिज ब्यूरो बन गई हैं. पहचान का दायरा इतना विस्तृत हो गया है कि किसी का भी कच्चा चिट्ठा निकलवाना हो तो लोग उन की ही शरण में आते हैं.

‘‘इस बुढ़ापे में भी अपने पांवों पर खड़ी हूं मैं. साथ में पैंशन भी मिलती है,’’ वे शान से कहती हैं. और एक राज की बात. उन के पास अब एक नहीं 5 मोबाइल फोन हैं जो पहले दूरभाष पर उन के लंबे वार्त्तालाप का उपहास करते थे अब उसी गुण के कारण उन का सम्मान करने लगे हैं. Mobile Phone and Family

Hindi Story : एक बहानेबाज संस्कृति

Hindi Story. बच्चों की छुट्टी हो और अपनी नहीं, तो मुसीबत रहती है. जरा निश्ंिचतता का अनुभव कर के देर से उठी थी, पर यह देख कर मूड बिगड़ गया कि फूलमती ने फिर गोल मारा था. सब काम हड़बड़ी में हुआ. सुबहसुबह रसोईघर से उस के द्वारा बरतनों की उठापटक की मधुर ध्वनि से जरा चैन पड़ता था और उसी ध्वनि के इंतजार में आज देर तक रजाई में पड़ी रही. अब जैसेतैसे तैयार हो कर निकलने को ही थी कि छोटे साहब, जो अब तक बड़े के साथ दूसरे कमरे में हंगामा करने में व्यस्त थे, हाजिर हुए.

‘‘मां, आज तो मेरी परियोजना जरूर तैयार करनी है.’’

‘‘क्यों जी, देखते नहीं, कितनी व्यस्त हूं. ऊपर से फूलमती भी नहीं आई है. कल रविवार है न, कल देखूंगी. अरे, नहींनहीं, कल तो हमारे यहां ही किट्टी पार्टी है. ऐसा करो, परसों शाम को याद दिलाना.’’

‘‘ओफ्फोह, मां, आप ने परसों भी यही कहा था कि दूसरे शनिवार को याद दिलाना. अब सोमवार को अध्यापिका डांटेंगी,’’ अमित का पारा चढ़ता जा रहा था. वैसे वह भी ठीक था अपनी जगह. कब से तो पीछे पड़ा था. मुझे फुरसत नहीं मिल पा रही थी. मोहित को पढ़ाई से ही समय नहीं मिल पाता था. स्कूल वाले भी खूब हैं. जानते भी हैं कि 7-8 साल का बच्चा अकेले पर्वत का माडल नहीं बना सकता. डाल देते हैं मुसीबत मांबाप के सिर पर. स्कूल में ही क्यों नहीं बनवाते यह सब?

‘‘देखो अमित, तुम सोमवार को अध्यापिका से कह देना कि मां की तबीयत खराब थी और पिताजी दौरे पर गए हुए थे. बाजार से सामान कौन लाता? ठीक है? अब जाने दो मुझे.’’

मैं आंख बचाती पर्स संभालने लगी. अमित नाराजगी के अंतिम चरण पर था, ‘‘पिछली बार भी यही बहाना बनाया था कि मां बीमार है. यह भी कोई तरीका है भला.’’

‘‘अच्छा, अच्छा, बस, इस बार और सही…’’ पर्स में से 4 टाफियां निकाल कर उसे थमाती हुई मैं आगे बढ़ी ही थी कि पति महोदय अखबार के पीछे मुंह निकालते हुए बोले, ‘‘अरे, जा रही हो कालिज. भई, वह संजीव अपनी गाड़ी मांग रहा था एक दिन के लिए, भाई की शादी है, क्या कहूं?’’

‘‘मेरी मारुति? उसे दोगे. कतई नहीं. खुद तो महाकंजूस है वह. याद नहीं, पिछली बार मेरी 10 किताबें ले गया था और 10 बार याद दिलाने पर 2 फटी हुई जिल्दें वापस करता कैसा रिरिया रहा था, ‘बहनजी, मेरा साला दिल्ली ले गया था. गाड़ी में कहीं छूट गईं.’ अब भी उस का साला आ गया तो? हरगिज नहीं देनी कार हमें.’’

‘‘तो कह दूं कि…क्या कह दूं? साफ मना करते तो बनेगा नहीं. अफसर का भतीजा है, भई. भुगतना तो हमें पड़ता है न.’’

‘‘अरे, कुछ भी कह दो. कह देना कि सर्विर्सिंग के लिए गई है, ब्रेक ठीक नहीं थे या कुछ भी. ठीक है?’’

फिर एक कदम बढ़ाया कि फोन घनघना उठा. उठाया, ‘‘हैलो, कौन…ओह सरलाजी, कहिए कैसे याद किया? अरे, अपना शनिवार कहां भई. मास्टर लोग ठहरे हम तो. हां, फूलमती को तो मैं भी याद कर रही हूं, सुबह से ही. पहले लोग भगवान का नाम ले कर उठते थे, अब हम उस की बंदी को पुकारते उठते हैं. क्या? नहीं आएगी 3 दिन तक. अरे बाबा, मर जाऊंगी मैं तो. बीमार होगी शायद? क्या, आप को संदेशा भेजा है कि बीमार हूं. और खुद मकान बनाने के काम में लगी है परिवार सहित. अच्छा, धोबी ने बताया है. देखा, ये नीच लोग ऐसे ही बहानों से तो हमें लूटते हैं. ये सब दोहरी कमाई करने के बहाने हैं. इस बार उस के पैसे जरूर काटूंगी. सच बता देती तो क्या पता मैं खुद ही छुट्टी दे देती. गुस्सा भी न आता इतना. अच्छा चलूं, देर हो रही है.’’

मन ही मन कुढ़ती हुई मैं बाहर निकल आई. सच, ईमानदारी व शराफत का तो नाम ही नहीं रहा जैसे आजकल.

10 नंबर बस स्टाप के पास कुछ भीड़ थी. नई लाडली कार थी और नौसिखिया मैं. सो, जरा धीमेधीमे चलाने लगी. एकदम लतिका पर नजर पड़ी. 1-2 और लड़कियां साथ थीं उस के. ‘ग्रांड साड़ी सेल’ के बैनर वाले एक तंबू में सपाटे से घुसी जा रही थीं सब. खीज उठी मैं. उसे तो कल समझाबुझा कर आज के सेमिनार का काम सौंपा था और यह तो यहां साडि़यां खरीदने में लगी है. देख लूंगी उसे भी.

मैं ने ही उसे दया कर के किसी तरह अपने विभाग में एक लंबी अवकाश रिक्ति पर लगवाया था. यह सोच कर कि गरीब घर की लड़की है. वरना यहां तो किसी रिक्ति की सूचना पर लंबी लाइन लग जाती है. अब मेहनत से अपनी जगह बनाने के बजाय सदा काम से कतराती है. मुंह पर तो कुछ नहीं कहती. कह भी कैसे सकती है? पर प्राय: कुछ भी काम या उत्तरदायित्व की बात से किसी न किसी तरह बच निकलती है.

कालिज पहुंचते ही जल्दी से मैं भूगोल विभाग में पहुंची तो सामने मेज पर लतिका का प्रार्थनापत्र पड़ा मुंह चिढ़ा रहा था, ‘‘…अकस्मात अस्वस्थ हो जाने से महाविद्यालय आने में असमर्थ हूं. कृपया एक दिन का आकस्मिक अवकाश दें.’’

गुस्से में मेरे मुंह से कुछ अपशब्द निकलतेनिकलते रह गए. अस्वस्थ है बहानेबाज. वहां सेल पर साडि़यां खरीदी जा रही हैं. कल ही साफसाफ मना कर देती तो आज यह फजीहत तो न होती मेरी. आज रुकना पड़ता, दौड़धूप होती…बस, भाग ली चुपचाप.

खैर, सेमिनार तो होना ही था. विश्वविद्यालय से 2 भूगोलशास्त्री पधारे थे. उन के आवास व भोजन का प्रबंध भी करना था, जो लतिका को सौंपा था. किसी तरह दूसरे विभाग से नए प्राध्यापकों को पकड़ा, सो उचित व्यवस्था हो गई. प्राचार्य ने भी उदार मुसकराहट का आदानप्रदान किया, पर मन खिन्न हो गया था.

कार निकालने लगी तो माखन सामने आ गया, ‘‘मेमसाहब, गाड़ी चमक रही है न?’’

‘‘हां भई, चमक तो खूब रही है. तुम्हारा काम लगता है, धन्यवाद.’’

‘‘मेमसाहब, घरवाली को बोल रखा है, बाई की गाड़ी रोज चमचमाती होनी चाहिए. बस, मेमसाहब, वो साहब को बोल देना, मैं ने दूसरा आवेदनपत्र रोजगार दफ्तर में भिजवा दिया है. वहां के बाबू को भी खुश कर रखा है. अब जैसे ही कारखाने से मांग जाएगी, वह मेरा नाम भेज देगा. अब आगे साहब को देखना है.’’

माखन ने इसी महाविद्यालय से 4-5 साल पहले बी.ए. किया था. जब कहीं नौकरी नहीं मिली तो किसी तरह रसायन विभाग में चपरासी व सहायक के पद पर रखवा दिया था उसे. अब पीछे पड़ा था कि कारखाने में कोई जगह मिल जाए. इसे क्या पता कि साहब ही तो सर्वेसर्वा नहीं थे.

‘‘देखो माखन, मैं ने पहले भी कहा था कि वहां बड़ी लंबी लाइन लगी रहती है. सबकुछ कायदे से होता है. फिर अनुभव भी तो चाहिए.’’

‘‘अरे, मेमसाहब, मालूम है. मैं ने सब मामला तय कर रखा है. पिछड़ी जाति का प्रमाणपत्र बनवा लिया है अपने विधानसभा सदस्य से. पिछले चुनाव में हमीं ने तो जिताया था उन्हें. अब तो है न उम्मीद? सच्ची, बहुत घूम लिए, मेमसाहब.’’

मैं सकपका गई. असली ब्राह्मण परिवार का था वह. उस के चाचा अब भी तीजत्योहारों पर कालोनी में कथा बांचते थे.

‘‘भई, तुम पत्र तो आने दो दफ्तर से, फिर साहब से ही बात करना. मुझे इन बातों का ठीक से कुछ मालूम नहीं.’’

कार चलाई, तो दिमाग भी कहीं घूमने लगा. जा किधर रहे हैं सब लोग? कहां होगी सीमा? क्या सचमुच आज झूठ के बिना गुजारा नहीं है? बाबा कहा करते थे कि जब सब रास्ते बंद हो जाएं तो भगवान को पुकारना चाहिए. पर लगता है, आज की वास्तविकता यह है कि जब कोई उपाय न दिखाई दे तो झूठ, बहानों व हेराफेरी का सहारा लेना चाहिए. शायद जनता जान गई है कि पुकारने से भगवान किस्सेकहानियों में ही प्रकट होते थे. आज उन के नाम से काम नहीं निकलता है.

हां, झूठ व बेईमानी से अकसर काम चल जाता है. उदाहरण सामने रहते ही हैं, कहीं ‘झूठे का मुंह काला’ नहीं दिखता और ‘सच्चे का बोलबाला’ भी सुनीसुनाई बात लगती है. फिर बाद की सोचने की फिक्र किसे है? अभी फिलहाल, इसी पल की मुसीबत किसी न किसी तरह टल जाए. कल किस ने देखा है? पकड़े भी गए तो कौन हरिश्चंद्र का जमाना है. कह देंगे, सब करते हैं, हमीं कौन अलग हैं. ‘सब चलता है’ का मुहावरा कितना चल पड़ा है आजकल.

विचारों में डूबी चली जा रही थी कि अचानक घर की याद आई. याद आया कि फूलमती नहीं आई और पतिदेव भी घर पर हैं. यानी खाना ढंग से बनाना पड़ेगा. सोचा, पनीर व अंडे वगैरह लेती चलूं. गाड़ी टी.टी. नगर की ओर मोड़ी. सुपर बाजार के सामने पार्क करने की जगह ढूंढ़ ही रही थी कि चौंक पड़ी. स्कूल यूनीफार्म पहने 5-6 लड़कों में यह अपना मोहित ही तो है न. हां, हां, वही था. उस के हाथ घुमा कर बोलने के अंदाज से पहले ही पहचान लिया था, अब तो और स्पष्ट दिखने लगा था.

अरे, ये सब तो रंगमहल से निकल रहे हैं. 3 बज चुके थे, शो खत्म हुआ होगा. कई दिन से जिद कर रहा था फिल्म देखने की. अभी परसों ही तो अपने पिता से करारी डांट खाई थी कि ये फिल्मों का चस्का छोड़ो, बोर्ड का इम्तिहान है, मेहनत करो. और यह जनाब स्कूल से खिसक, यहां शोभा बढ़ा रहे हैं. हम से कह रहा था कि 11 बजे से अतिरिक्त कक्षाएं हैं, गणित और विज्ञान की. मेरे देखतेदेखते सब लड़के हंसते खिलखिलाते टैंपो में सवार हो कर ओझल हो गए.

पहले से उदास मन और व्यथित हो उठा. बिना कार रोके मैं सीधे घर पहुंची. अमित बाहर अपने टामी के साथ गेंद उछालने में लगा था.

‘‘अमित, तुम्हारे पिताजी कहां हैं, बेटे?’’

‘‘मां, हरीश चाचा आए हैं, उन के साथ सोने के कमरे में टेलीविजन पर मैच देख रहे हैं. क्या आप को पता है कि आस्ट्रेलिया ने 100 रन बना लिए हैं और उन का एक भी विकेट नहीं गिरा. गए हम लोग तो. मैं होता तो मालूम है, क्या करता, एक…’’

‘‘अच्छा, अच्छा, जरा चुप कर अब. मेरा सिर दर्द कर रहा है,’’ मैं खीज कर बोली.

‘‘मां, एक मजेदार बात तो सुनती जाओ. खूब हंसोगी. हरीश चाचा कह रहे थे कि चाची उन्हें घर पर टेलीविजन नहीं देखने दे रही थीं, भंडार की सफाई को कह रही थीं, इसलिए चाचा बहाना बना कर आए हैं कि पिताजी की तबीयत खराब है, देखने जाना है. अब दोनों ब्रिज खेल रहे हैं व टेलीविजन भी देख रहे हैं. चाचा ने चाची को क्या बुद्धू बनाया. मजा आ गया.’’

‘‘सुनो, अमित, अपनी परियोजना का सारा सामान अपने कमरे में रखो चल कर मेज पर. मैं अभी कौफी पी कर जुटती हूं तुम्हारे साथ. और सुनो, ठहरो, पहले जरा पिताजी को बुला लाओ इधर.’’

अमित खुशीखुशी उछलता हुआ अंदर भागा. मैं साड़ी बदल मुंहहाथ धोने लगी.

‘‘क्यों भई, बड़ी देर कर दी आज. बहुत भूख लगी है. सब परांठे वगैरह खत्म कर दिए हैं, कुछ करो जल्दी से,’’ पत्ते हाथ में पकड़े साहब ने फरमान जारी किया.

‘‘सुनिए तो, संजीवजी से साफसाफ कह दो कि आशा कार नहीं दे सकती. ज्यादा जरूरत है तो किराए पर लेने का प्रबंध कर देते हैं. और हां, अपने इन मित्र महोदय से भी कह दो कि घर पर फोन कर के बता दें कि आप की तबीयत बिलकुल ठीक है व आप दोनों बैठे ताश खेल रहे हैं.

‘‘सुनो जी, हां, आज से यह बहानेबाजी व गोलमाल बंद. कम से कम इस घर में. और मोहित आए तो कह दीजिए कि बाहर जाना हो या फिल्म देखनी हो, तो हमें बता कर जाए, आगे मैं देखूंगी. आप कृपया इतना ही सहयोग दें तो बहुत है.’’

अचकचाए से ये कुछ कहने को हुए, पर मेरी मुखमुद्रा देख चुपचाप अंदर चले गए. मैं सोचने लगी कि खाना बनाऊं या अमित का हिमालय पर्वत. दोनों कार्य कुछ विशेष कठिन तो नहीं हैं. Hindi Story

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