फांसी से बचाने के लिए सालाना खर्च करते हैं 36 करोड़ रुपए

हर देश का अपना अलगअलग कानून होता है. कहींकहीं, खासतौर पर अरब देशों में कानून बहुत सख्त है. पाकिस्तान को ही ले लीजिए, वहां एक बच्ची से रेप और हत्या के दोषी को 2 महीने में फांसी की सजा सुना दी गई, लेकिन हमारे यहां देश के सब से चर्चित मामले निर्भया रेप और हत्या के मामले में दोषी साबित हो जाने के बाद भी मुजरिमों को जेल में पाला जा रहा है.

अगर ऐसा अरब देशों में हुआ होता तो मुजरिमों को अब से 6 साल पहले फांसी हो चुकी होती. सख्त कानून के चलते अरब देशों में यह भी कानून है कि अगर कोई व्यक्ति किसी की हत्या कर देता है और शरिया कानून के अंतर्गत उसे फांसी की सजा हो जाती है तो फांसी से बचने के लिए उस के पास एक ही उपाय होता है, पीडि़त परिवार से सौदेबाजी.

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अगर पीडि़त परिवार उस से इच्छित रकम ले कर उसे माफ कर देता है तो अदालत फांसी की सजा को रद्द कर देती है. लेकिन सौदेबाजी की यह रकम इतनी बड़ी होती है, जिसे चुकाना आसान नहीं होता. इस रकम को वहां ब्लड मनी कहा जाता है.

दुबई में रहने वाले भारतीय मूल के बड़े बिजनैसमैन एस.पी.एस. ओबराय ऐसे व्यक्ति हैं, जो लोगों को फांसी से बचाने के लिए प्रतिवर्ष 36 करोड़ रुपए खर्च करते हैं. यानी फांसी पाए लोगों को बचाने के लिए ब्लड मनी खुद देते हैं. अब तक वह 80 से ज्यादा युवाओं को फांसी से बचा चुके हैं, जिन में से 50 से ज्यादा भारतीय थे. ये ऐसे लोग थे, जो काम की तलाश में सऊदी अरब गए थे और हत्या या अन्य अपराधों में फंसा दिए गए.

2015 में भारत के पंजाब से अबूधाबी जा कर काम करने वाले 10 युवकों से झड़प के दौरान पाकिस्तानी युवक की हत्या हो गई. अबूधाबी की अल अइन अदालत में केस चला, जहां 2016 में दसों युवकों को फांसी की सजा सुनाई गई. बाद में जब इस सिलसिले में याचिका दायर की गई तो अदालत ब्लड मनी चुका कर सजा को माफी में बदलने के लिए तैयार हो गई.

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सौदेबाजी में मृतक का परिवार 6 करोड़ 50 लाख रुपए ले कर माफी देने को तैयार हुआ. यह ब्लड मनी चुकाई एस.पी.एस. ओबराय ने.

इस तरह दसों युवक फांसी से बच गए. ओबराय साहब यह काम सालों से करते आ रहे हैं और उन के अनुसार जीवन भर करते रहेंगे.

चालान का डर

छोटेछोटे गुनाहों पर भारी रकम वसूल करना आज किसी भी कोने में खड़े वरदीधारी के लिए वैसा ही आसान हो गया है जैसा पहले सूनी राहों में ठगों और डकैतों के लिए हुआ करता था.

ट्रैफिक को सुधारने की जरूरत है, इस में शक नहीं है पर ट्रैफिक सुधारने के नाम पर कागजों की भरमार करना और किसी को भी जब चाहे पकड़ लेना एक आपातकाल का खौफ पैदा करना है. नियमकानून बनने चाहिए क्योंकि देश की सड़कों पर बेतहाशा अंधाधुंध टेढ़ीमेढ़ी गाडि़यां चलाने वालों ने अपना पैदायशी हक मान रखा था पर जिस तरह का जुर्माना लगाया गया है वह असल में उसी सोच का नतीजा है जिस में बिल्ली को मारने पर सोने की बिल्ली ब्राह्मण को दान में देने तक का विधान है.

ट्रैफिक कानून को सख्ती से लागू करना जरूरी था पर इस में फाइन बढ़ाना जरूरी नहीं. पहले भी जो जुर्माने थे वे कम नहीं थे और यदि उन्हें लागू किया जाता तो उन से ट्रैफिक संभाला जा सकता था, पर लगता है नीयत कुछ और है. नीयत यह है कि हर पुलिस कौंस्टेबल एक डर पैदा कर दे ताकि उस के मारफत घरघर में सरकार के बारे में खौफ का माहौल पैदा किया जा सके. यह साजिश का हिस्सा है.

इस की एक दूरगामी साजिश यह भी है कि ट्रक, टैंपो, आटो, टैक्सी, ट्रैक्टर, बस ड्राइवरों को इस तरह गरीब रखा जाए कि वे कभी न तो चार पैसे जमा कर सकें और न ही अपनी खुद की गाडि़यों के मालिक बन सकें. उन्हें आधा भूखा रखना ऐसे ही जरूरी है जैसे सदियों तक देश के कारीगरों को साल में 2 बार अनाज और कपड़े ही वेतन के बदले दिए जाते थे.

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पहले भी गाड़ीवानों, ठेला चलाने वालों, तांगा चलाने वालों, घोड़े वालों को बस इतना मिलता था कि वे घोड़े पाल सकें. मालिक तो कोई और ही होते थे. ये जुर्माने इतने ज्यादा हैं कि अगर सख्ती से लागू किए गए तो देश फिर पौराणिक युग में पहुंच जाएगा. यह गाज आम शहरी पर कम, उन पर ज्यादा पड़ेगी जो दिन में 10-12 घंटे गाडि़यां चलाते हैं.

आजकल इन कमर्शियल ड्राइवरों के लिए गाड़ी चलाते हुए मोबाइल पर बात करना जरूरी हो गया है ताकि ग्राहक मिलते रहें. ट्रैफिक फाइन ज्यादातर उन्हीं से वसूले जाएंगे या फिर हफ्ता चालू कर दिया जाएगा जैसा शराब के ठेकों, वेश्याओं के कोठों, जुआघरों में होता है. एक इज्जत का काम सरकार ने बड़ी चालाकी से अपराध बना दिया है ताकि एक पूरी सेवादायी कौम को गुलाम बना कर रखा जा सके. यही तो हमारे पुराणों में कहा गया है.

दलितों की अनसुनी

देश का दलित समुदाय आजकल होहल्ला तो मचा रहा है कि उस के हकों पर डाके डालने की तैयारी हो रही है पर यह हल्ला सामने नहीं आ रहा क्योंकि न अखबार, न टीवी और न सोशल मीडिया उन की बातों को कोई भाव दे रहे हैं. दलितों में जो थोड़े पढ़ेलिखे हैं वे देख रहे हैं कि देश किस तरफ जा रहा है पर अपनी कमजोरी की वजह से वे वैसे ही कुछ ज्यादा नहीं कर पा रहे जैसे अमेरिका के काले नहीं कर पा रहे जिन्हें ज्यादातर गोरे आज भी गुलामों की गुलाम सरीखी संतानें मानते हैं. दलितों का हल्ला अनसुना करा जा रहा है.

1947 के बाद कम्यूनिस्ट या समाजवादी सोच के दलितों को थोड़ी जगह देनी शुरू की थी क्योंकि तब गिनती में ज्यादा होने के बावजूद उन का कोई वजूद नहीं था. धीरेधीरे आरक्षण के कारण उन्हें कुछ जगह मिलने लगी तो ऊंची जातियों को एहसास हुआ कि सदियों से जो सामाजिक तौरतरीका बनाया गया है वह हाथ से निकल रहा है.

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उन्होंने मंडल कमीशन लागू करवा कर पिछड़ों को उन गरीब दलितों से अलग किया जो पहले जातिभेद के बावजूद साथ गरीबी में रहते थे और फिर इन पिछड़ों को भगवाई रस पिला कर अपनी ओर मिला लिया. यह काम बड़ी चतुराई और चुपचाप किया गया. लाखों ऊंची जातियों के कर्मठ और अपना पैसा लगाने वाले अलग काम करते हुए, अलग पार्टियों में रहते हुए धीरेधीरे उस समाज की सोच फिर से थोपने लगे जिस में खाइयां सिर्फ गरीबअमीर की नहीं हैं, जाति और वह भी जो जन्म से मिली है और पिछले जन्मों के कर्म का फल है, चौड़ी होने लगीं.

मजे की बात है कि दलितों और पिछड़ों ने इन खाइयों को बचाव का रास्ता मान लिया और खुद गहरी करनी शुरू कर दीं. आज इस का नतीजा देखा जा सकता है कि मायावती को भारतीय जनता पार्टी के पाले में बैठने को मजबूर होना पड़ रहा है और सभी पार्टियों के ऊंची जातियों के लोग बराबरी, आजादी, मेहनत वगैरह के हकों की जगह धर्म का नाम ले कर बहुतों की आवाज दबाने में अभी तो सफल हो रहे हैं.

जातिगत भेदभाव का सब से बड़ा नुकसान यह है कि उस से वे ताकतवर हो जाते हैं जो करतेधरते कम हैं और वे अधपढ़े आलसी हो जाते हैं जिन पर देश बनाने का जिम्मा है. हमारे समाज में खेती, मजदूरी, सेना, कारीगरी हमेशा उन हाथों में रही है जिन के पास न पढ़ाई है, न हक है. आज की तकनीक का युग हर हाथ को पढ़ालिखा मांगता है और जो पढ़ालिखा होगा वह हक भी मांगेगा. दलितों की आवाज दबा कर ऊंची जातियां खुश हो लें पर इस खमियाजा देश को भुगतना होगा. देश के किसान, मजदूर, कारीगर, सैनिक, छोटे काम करने वाले बहुत दिन चुप नहीं रहेंगे. वे या तो देश की जड़ें खोखली कर देंगे या कुछ करने के लिए खुल्लमखुल्ला बाहर आ जाएंगे.

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लोगों की जेबें ढीली करेंगे नए ट्रैफिक नियम

ट्रैफिक से संबंधित नया नियम कड़ा है ताकि लोग और ज्यादा संभल कर सड़क पर गाड़ी चलाएं. दुर्घटना के शिकार न हों या दूसरों के लिए परेशानी का सबब न बनें. सड़क पर हिफाजत से चलें,  मनमानी न करें.

‘धीरे चलिए सुरक्षित चलिए’ का नारा अब सब की समझ आ गया है, पर लोग भी तमाम बहाने बना कर अपनी आदत को बदलने का नाम ही नहीं ले रहे थे तभी तो ट्रैफिक का नया नियम  कान ऐंठने के लिए लागू किया गया है.

सड़क आप की बपौैती नहीं है, इस बात का खयाल रखें और अपनी लापरवाही किसी और पर न थोपें. कहीं ऐसा न हो कि आगे ट्रैफिक पुलिस वाले आप के गलत गाड़ी चलाने या तेज स्पीड में गाड़ी चलाने पर चालान काट कर थमा दे और आप भी कोर्टकचहरी के चक्कर लगाते रहें.

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लेकिन जो नए ट्रैफिक नियम आए हैं, वे अच्छेअच्छों की जेबें ढीली कर देंगे और आप भी सोचने पर मजबूर होंगे कि काश, गाड़ी गलत न चलाई होती या अपने बच्चे को चलाने के लिए न दी होती तो मैं चालान कटवाने या जेल जाने से तो बच जाता.

सड़क पर कतई जल्दबाजी न दिखाएं या ओवरस्पीड में गाड़ी न चलाएं. वहीं दोपहिया वाहन पर 2 सवारियां ही बैठें यानी अब आप को नए नियमों के मुताबिक ही चलना होगा.

वजह कुछ भी हो, पर आप अब बेतरतीब ढंग से गाड़ी नहीं चला सकते. गलती से अगर आप ने अनदेखी की तो नए नियमों के मुताबिक चालान कटना तय है.
मतलब यह कि सड़क पर कोई भी वाहन हो, नियंत्रित स्पीड में चलाएं.

बता दें कि संसद ने जुलाई में मोटर वाहन (संशोधन) विधेयक, 2019 पारित कर दिया है. इस नियम के तहत सड़क सुरक्षा से सम्बंधित नियम कड़ा किया गया है जैसे ड्राइविंग लाइसैंस जारी करने और सड़क सुरक्षा में सुधार के प्रयास में उल्लंघन के लिए कठोर दंड लगाना वगैरह.

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अब तक जो चल रहा था जैसा चल रहा था, पर अब ऐसा नहीं चलेगा. अपनी सोच बदलें और नए नियमों का सख्ती से पालन करें. नए जमाने के साथ चलना है तो अपनी आदत में सुधार लाना होगा. जुर्माने से बचना है तो सचेत रहें, सावधान रहें.

जानें नए ट्रैफिक के नियम 

1- बिना ड्राइविंग लाइसैंस के गाड़ी न चलाएं. पकड़े जाने पर 5,000 रुपए का जुर्माना होगा.
2- शराब पी कर गाड़ी चलाने पर 10,000  रुपए जुर्माना भरना पड़ सकता है या फिर 6 महीने की कैद. अगर ऐसा दूसरी बार पाया गया तो 2 साल की कैद या 15,000 रुपए तक जुर्माना.
3-अगर गाड़ी तय स्पीड से तेज चलाई तो 2,000 रुपए का चालान काटा जाएगा.
4- बिना सीट बेल्ट बांधे गाड़ी चलाने पर 1,000 रुपए का चालान कटेगा.
5- मोबाइल फोन पर बात करते हुए ड्राइविंग करने पर 5,000 रुपए का जुर्माना भरना होगा.
6- सड़क नियमों को तोडऩे पर अब 500 रुपए का चालान कटेगा.
7-बिना इंश्योरेंस के गाड़ी चलाने पर अब 2,000 रुपए का चालान कटेगा.
8-इमर्जैंसी व्हीकल यानी अंबुलैंस गाड़ी, दमकल गाड़ी या अति महत्त्वपूर्ण लोगों के वाहन को रास्ता न देने पर 10,000 रुपए का चालान कटेगा.
9- डिसक्वालीफाई किए जाने के बावजूद भी अगर कोई शख्स गाड़ी चलाता है तो उसे 10,000  रुपए का जुर्माना देना होगा.
10- उबेर,ओला अगर ड्राइविंग लाइसैंस के नियमों का उल्लंघन करते हैं तो उन पर 1 लाख रुपए तक का जुर्माना लगाया जा सकता है, वहीं जरूरत से ज्यादा सवारी बैठाने पर 20,000 रुपए का जुर्माना लगेगा.
11- हेलमेट न पहनने पर 1,000 रुपए देने होंगे. साथ ही, 3 महीने के लिए लाइसैंस रद्द कर दिया जाएगा.
12- नाबालिग अगर सड़क पर कोई दुर्घटना करता है तो उस के मातापिता कुसूरवार माने जाएंगे और उन पर 25,000 रुपए तक का जुर्माना लगेगा, वहीं गाड़ी के रजिस्ट्रेशन पेपर रद्द कर दिए जाएंगे और 3 साल तक की जेल हो सकती है.
13- ट्रैफिक नियमों का उल्लंघन करने पर 500 रुपए का जुर्माना देना होगा.
14- गलत दिशा में ड्राइविंग करने पर 5,000 रुपए का चालान देना होगा.
15- दोपहिया वाहन पर 3 सवारी बैठाने पर 500 रुपए का चालान काटा जाएगा.
16-पौल्यूशन सर्टिफिकेट न होने पर  500 रुपए देने होंगे.
17- खतरनाक तरीके से गाड़ी चलाने  पर 5,000 रुपए का चालान होगा.
18- रेड लाइट जंप करने पर  1,000 रुपए का जुर्माना लगेगा.

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