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Blind Faith : बुटाटी धाम  राजस्थान, 22 करोड़ की चंदाचोरी

Blind Faith.राजस्थान के नागौर जिले में अयोध्या के राम मंदिर जैसी दान चोरी का बड़ा मामला सामने आया है. मामला नागौर के बुटाटी में बने संत चतुरदास महाराज मंदिर से जुड़ा है.

जिला कलक्टर के आदेश पर बनी जांच कमेटी को मंदिर समिति के वित्तीय कामकाज में गड़बड़ी मिली है. जांच कमेटी ने मंदिर समिति के अकाउंटस, बैंक लेनदेन, वाउचर और दूसरे डौक्यूमैंट्स की जांच के बाद रिपोर्ट कलक्टर को भेजी है.

इस रिपोर्ट में सोनाचांदी के लेखाजोखा से ले कर भोजनशाला बनाने, किराया जमाखर्च वगैरह में गबन और फंड का गैरजरूरी इस्तेमाल होना माना गया है.

मंदिर में बड़े दान करने वालों ने जो निर्माण कार्य करवाया है, उसे तक मंदिर समिति ने अपने खर्च में जोड़ दिया है. कमेटी ने तकरीबन 22 करोड़ रुपए का गबन माना है.

गौरतलब है कि राम मंदिर में गबन हो गया… खाटूश्याम के पुजारी का रईसजादा बेटा बाइक सवारों को कुचल कर चला गया… सालासर बालाजी के पुजारी ने बेटी की शादी में करोड़ों रुपए खर्च किए….. और अब बुटाटी धाम में करोड़ों का घपला हो गया… वगैरहवगैरह.  हालांकि यह तो मामूली धाम हैं, ऊंचेबड़े मंदिर धामों की बात ही निराली हैं.

नागौर के रहने वाले रामनारायण चौधरी बताते हैं, ‘‘मेरा गांव बुटाटी से तकरीबन 25 किलोमीटर की दूरी पर है. जब भी किसी को लकवा होता है तो बुटाटी धाम जाते हैं, लेकिन सच तो यह हैं कि आज तक एक भी मरीज ठीक नहीं हुआ है.

‘‘मेरी छोटी बहन हर महीने बुटाटी धाम फेरी देने जाती थी. जब उन को लकवा हुआ तो हम ही पहली बार उसे बुटाटी ले कर गए थे. 7 दिन तक वहीं रखा, ताकि 7 दिन तक 7 फेरी दे सकें. लेकिन उसे बचा नहीं सके. अगर डाक्टर की सलाह को मानते तो आज हमारी बहन जिंदा होती.’’

जब भी किसी को लकवा होता है और अस्पताल ले जाने की बात करते हैं तो 99 फीसदी लोग बुटाटी की पैरवी करते हैं. जिन के घर में कोई लकवाग्रस्त है, वह मजबूरी में बुटाटी ले कर जाता ही है, क्योंकि नहीं ले जाएं और मरीज को कुछ हो जाए तो दुनिया उसे जीने नहीं देती है कि हम नें कहा था कि बुटाटी ले जाओ, लेकिन नहीं माना इसलिए मरीज की जान चली गई.

जब लोग जबरदस्ती ऐसे धामों पर जा कर दान देते हैं तो ये गबन करने वालों की गलती नहीं हैं, बल्कि वहां जाने वालों की गलती है.

बुटाटी धाम के प्रचारप्रसार पर निवेश करने वालों ने ही अपना अर्जित लाभांश लिया है. किसी ने चंदा या दान भी दिया तो प्रचारप्रसार देख कर ही दिया था. अर्जित आय में से अपना लाभांश निकालना धंधे का नैतिक नियम होता है. किसी भी मंदिर, धाम, आश्रम आदि में आय पर पहला हक समिति, ट्रस्ट, पुजारी का ही होता है.

मैं ने अपनी आंखों के सामने एक दीवार पर तसवीर टांगने से ले कर 20 सालों में ‘अति प्राचीन हनुमान मंदिर’ बनते देखा है. इन 20 सालों तक उस नागौर जिले के फरार आरोपी की मेहनत, सब्र, समर्पण की कोई तो कीमत होगी जो रोज सरकारी दीवार पर तसवीर को साफ कर के टांगता, खाली जगह की सफाई करता, आसपास में पेड़पौधे लगाए.

समय बीतने पर तसवीर की जगह मूर्तियां लगाईं, रोज सुबहशाम धूप, अगरबत्ती करता, 2-2 घंटे तथाकथित मंत्र गुनगुनाता. आज वह कमाई कर रहा है. निवेश से अपना लाभांश ले रहा है.

धर्म का धंधा ही ऐसा है, जो तमाम जोखिमों से दूर बिना पूंजी लगाए अपनी धरती पर सदियों से धड़ल्ले से चलता आ रहा है. धर्म को धंधा बना कर चालाक लोगों द्वारा गरीबों, दलितों, पिछड़ों का शोषण करने की महज सोचीसम झी चाल है. यह एकतरफा वसूली है. आमजन के साथसाथ पूरे देश के भविष्य के लिए यह खतरनाक है.

किसी मामूली आदमी के पास 5,000 रुपए हैं, तो वह अपने बच्चों की पढ़ाईलिखाई पर खर्च करने के बजाय मंदिरमसजिद या धर्म के अड्डों को चंदा देना बेहतर सम झता है. बेचारे बच्चों का भविष्य कुरबान कर दिया जाता है.

सीकर जिले के सालासर बालाजी मंदिर का पुजारी अपनी बेटी की शादी में 11 किलो सोना दें व करोड़ों रुपए खर्च कर डाले, तो इसे क्या कहेंगे, जबकि मंदिर की देखरेख के लिए एक ट्रस्ट बना हुआ है व ट्रस्ट में शामिल पुजारियों को तनख्वाह भी दी जाती है.

30,000 महीना तनख्वाह लेने वाला पुजारी इतना पैसा व धन अपनी बेटी पर कहां से खर्च करेगा? यकीनीतौर पर चंदेचढ़ावे में हेराफेरी हुई होगी, नहीं तो इतना खर्चा इस समय 30,000 कमाने वाले के बूते में तो कतई नहीं है.

पुराने मंदिरों के पुनर्निर्माण के नाम पर आजकल हरेक गांव में इन पर करोड़ों रुपए खर्च कर के भव्य मंदिर बनाए जा रहे हैं. दिलचस्प बात तो यह है कि इन मंदिरों के निर्माण में किसानों की कड़ी मेहनत की पूंजी इस्तेमाल की जा रही है.

राजस्थान के किसानों में पनपी इस नई प्रथा में गांवों के किसान बेबस या शौकशौक में अपनी मेहनत की कमाई भव्य मंदिर निर्माण के लिए दे रहे हैं. अकसर सभी गांवों में ऐसा किया जा रहा है. चाहे किसान फटे कपड़े पहने, उस के बच्चे भूखे रहें, बच्चे पढ़ाई छोड़ दें, कर्ज के पैसे न चुकें, लेकिन मंदिर निर्माण के लिए तो कमाई दान देनी ही होगी वरना धर्म के ठेकेदार नाराज हो जाएंगे और स्वर्ग जाने का सर्टिफिकेट नहीं मिलेगा.

कोई भी धार्मिक काम बिना चंदे के नहीं होता. मेहनत की कमाई चंदे के जरीए ज्यादातर धार्मिक आयोजनों और अनुष्ठानों में जाती है. आम जनता चंदों से परेशान है, फिर भी धर्म के नाम पर अपनी जेब ढीली करने में कोताही नहीं बरतती, इसलिए चंदाखोरी का धंधा खूब फलफूल रहा है.

मेरे गांव कोथून से उत्तर दिशा में तालाब किनारे एक तरफ जंगल से घिरा एक धार्मिक स्थल है. यहां शिव का एक प्राचीन मंदिर है. इस के बारे में कहा जाता है कि यहां का शिवलिंग राजा भृतहरि द्वारा स्थापित हैं. बाद में भक्तों ने यहां भव्य मंदिर बनवा दिया.

बहरहाल, जो भी हो, शिव का यह मंदिर काफी पुराना था, यह सच है. लेकिन 10-15 साल से यह नए स्वरूप में खड़ा है. यहां लाल पत्थर की जगह अब भव्य मार्बल और संगमरमर के पत्थर लगे हैं. मंदिर की ऊंचाई भी आकाश को छूती नजर आती है और यह सारा कमाल हुआ है चंदा उगाही से.

ऐसा एक नहीं, कई मंदिर और हैं जो चंदे और चढ़ावे से आज विशाल रूप लिए हुए हैं. अब तो ट्रस्ट के नाम पर चंदा उगाही होती है जिस में एक नहीं, कई महंतपुजारियों का हिस्सा होता है जो बराबरबराबर बंटता है और बंटवारे में जहां तीनपांच हुआ, तो वहीं आपस में लड़ाई झगड़ा शुरू हो जाता है.

महंतपुजारी आने वाले भक्तों से रसीद काट कर चंदा वसूलते हैं और शहरगांव में घूमघूम कर धनपतियों से भी उन की धार्मिक भावनाओं का दोहन कर के चंदा वसूला जाता है.

कुलमिला कर बात यह है कि चाहे कोथून का शिव मंदिर हो या फिर देश के कोनेकोने में बने मंदिर, इन मंदिरों के नाम पर करोड़ों का चंदा वसूला जाता है. इस चंदे से मंदिरों का भव्य निर्माण तो होता ही है, साथ ही महंतोंपुजारियों की जीवनशैली भी भव्य हो जाती है. अब इन लोगों ने आमदनी के लिए दूसरे मंदिर भी बना लिए हैं. महंतपुजारी अब गाडि़यों में सफर करते हैं और लग्जरी लाइफ जीते हैं.

पिछले दिनों खाटूश्याम मंदिर के पुजारी के बेटे द्वारा नशे की हालत में गाड़ी से टक्कर मारने की घटना काफी चर्चा में रही. यह घटना अजमेरपुष्कर रोड पर हुई थी, जहां उस की तेज रफ्तार फौर्च्यूयूनर ने कई बाइक सवारों को कुचल दिया. इस हादसे में एक आदमी की मौके पर ही मौत हो गई थी और कई लोग घायल हो गए थे. कार में सवार सभी लोग नशे में चूर थे और मौके पर पुलिस ने कार में शराब की दर्जनों बोतलें भी बरामद की थीं.

हमारा समाज अब काफी शिक्षित हो चूका है लेकिन अफसोस है कि सोच अभी भी अवैज्ञानिक एवं रूढि़वादी है और पैसा उगाई का काम तथाकथित बुद्धिजीवी, पढ़ेलिखे और इज्जतदार लोगों की समितियां करती हैं.

जब कोई इस तरह की लूटचोरी पर सवाल उठाते है तो नसीहत दी जाती है कि तुम लोग हिंदू विरोधी हो, कम्युनिस्ट हो, मुल्ला हो, देशद्रोही हो, तो क्या करें? एक सवाल इन का बड़ा हैरान करने वाला होता है कि लोग अपनी मरजी से देते है, तेरा मन नहीं है तो मत दे.

वैसे तो हर धंधा सम्मानजनक होता है क्योंकि कोई सामान बेचता है और खरीदार खरीदते हैं. शर्तें तय की जाती हैं और मामला साफ होता है. लेकिन यहां मंदिर, धाम, आश्रम में लूट ही लूट है. धर्म के नाम की लूट. इन लोगों की महारत इसी से समझ में आ जाती है कि शिक्षित, जागरूक लोग भी इन के बहकावे में फंसे हुए हैं.    Blind Faith

Religious Superstition : रील्स का पाखंडी ‘डिजिटल बाबा’

Religious Superstition. हरियाणा की धरती, जो कभी मेहनतकश किसानों और विचारकों की ज्ञानभूमि हुआ करती थी, आज डिजिटल युग के ‘रील्स मार्केटिंग’ वाले बाबाओं की चारागाह बन चुकी है.

हांसी के नंद नगर में सजे ‘श्री बालाजी धाम’ के दरबार पर नजर डालें, तो समझ आता है कि 21वीं सदी में भी अंधविश्वास को कितने शातिर ढंग से बेचा जा सकता है.

गद्दी पर बैठे हैं तथाकथित महंत डाक्टर दिनेश पुरी, जिन्हें लोग ‘हांसी वाले बाबा’ कहते हैं, मगर इन की असलियत चमचमाती मर्सिडीज गाड़ी, यूट्यूबरों की फौज और कोर्टकचहरी के चक्करों के बीच हिचकोले खा रही है.

यह वही ‘डिजिटल ठगी’ का मौडर्न कुनबा है जहां लच्छेदार बातों की चाशनी में लपेट कर सीधेसादे लोगों की जेब और दिमाग दोनों पर डाका डाला जाता है. कतई गजब ढा रखा है इन धंधेबाजों ने.

परची का धंधा

डाक्टर दिनेश पुरी के दरबार का विज्ञान बड़ा सीधा है, कैमरा औन करो, भावुकता का माहौल बनाओ, और फिर एक परची निकाल कर किसी लाचार इनसान के भूत, भविष्य और वर्तमान का फैसला कर दो.

विज्ञान और चिकित्सा को अंगूठा दिखाते हुए यहां तंत्रमंत्र से कैंसर ठीक करने के दावे बेचे जाते हैं. जब लोग अपनी गंभीर बीमारियों और पारिवारिक समस्याओं से टूट चुके होते हैं, तब यह ढोंगी उन्हें इलाज के बजाय दैवीय चमत्कार के चक्रव्यूह में फंसाता है.

लेकिन जैसा कि कबीर कह गए हैं कि काठ की हांड़ी बारबार नहीं चढ़ती… इस कथित चमत्कार की पोल तब खुली जब हांसी के ही एक वकील राजेश कुमार ने इस पाखंड को कोर्ट तक घसीट लिया.

बाबा ने सरेआम परची निकाल कर वकील पर तंत्रमंत्र का झूठा आरोप मढ़ा था, जिस के जवाब में पुलिस ने न सिर्फ एफआईआर दर्ज की, बल्कि अब यह ढोंगी अदालत में मानहानि के मुकदमे भुगत रहा है.

शिकायत करने वाले वकील राजेश कुमार ने अदालत में बेहद मजबूत कानूनी तर्क रखे हैं. वकील का कहना है कि बाबा का यह कृत्य केवल एक शख्स की मानहानि नहीं, बल्कि कानून व्यवस्था और नागरिक अधिकारों पर सीधा हमला है.

बिना किसी सुबूत के, भरे दरबार में लाइव कैमरे के सामने किसी पर ‘कैंसर करवाने का तांत्रिक प्रयोग’ करने का आरोप लगाना मानसिक प्रताड़ना की श्रेणी में आता है.

कानूनी तर्कों के मुताबिक, बाबा ने सोशल मीडिया के विशाल मंच का इस्तेमाल कर के पीडि़त परिवार का सामाजिक बहिष्कार करवाया, जिस से उन की इज्जत पूरी तरह धूल में मिल गई.

अब पीडि़त पक्ष की मांग बेहद कड़क है कि बाबा को उसी सोशल मीडिया पर लाइव आ कर, हाथ जोड़ कर लिखित और मौखिक माफी मांगनी होगी, क्योंकि कानून के राज में कोई भी ढोंगी खुद को अदालत से ऊपर नहीं समझ सकता.

कसता कानूनी शिकंजा

यह पूरा मामला केवल मानहानि तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सीधेतौर पर कानून की धज्जियां उड़ाने का है. कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, इस प्रकार के ढोंग पर भारतीय न्याय संहिता की धारा 318 (ठगी/ धोखाधड़ी) और धारा 356 (मानहानि) के तहत गंभीर कानूनी कार्रवाई बनती है.

इस के साथ ही, तंत्रमंत्र और दैवीय शक्तियों से कैंसर जैसी लाइलाज बीमारियों को ठीक करने का भ्रामक दावा करना ‘ड्रग्स एंड मैजिक रैमेडीज (आपत्तिजनक विज्ञापन) अधिनियम, 1954’ के तहत एक संज्ञेय अपराध है.

जातिगत नफरती टिप्पणी

इस पाखंडी का अहंकार सिर्फ अंधविश्वास फैलाने तक सीमित नहीं रहा. जब समाज के सजग लोगों और किसान नेताओं ने इन के पाखंड को ‘डिजिटल आतंकवाद’ कह कर बेनकाब करना शुरू किया, तो बाबा अपनी मर्यादा भूल गए.

भरे मंचों से और बयानों में विशिष्ट समाजों और उन के नेतृत्व को निशाना बनाते हुए ‘हुड्डासूडा’ जैसे अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल किया गया. यह किसी आध्यात्मिक गुरु की भाषा नहीं, बल्कि एक डरे हुए सियार की बौखलाहट है.

मर्सिडीज वाला अध्यात्म

साध्वी देवा ठाकुर और धर्मेंद्र हुड्डा जैसे लोगों ने जब इन के तंत्र की परतें खोलीं, तो सच सामने आया कि इस भीड़ के पीछे असल खेल ‘कैश और कीवर्ड्स’ का है. सोशल मीडिया पर जो लाखों की रील्स दिखती हैं, उन के पीछे यूट्यूबरों को दी जाने वाली अघोषित रकम और तगड़ी पीआर टीम काम करती है.

जनता से चढ़ावे और ‘रसीद’ के नाम पर काटी गई गाढ़ी कमाई धर्मार्थ कामों में जाने के बजाय लग्जरी गाडि़यों के टायर घिसने और इस झूठे भ्रामक प्रचार तंत्र को जिंदा रखने में फूंकी जा रही है. साफ कहें तो यह अध्यात्म नहीं, बल्कि अंधविश्वास की रील्स बना कर नोट छापने की मौडर्न फैक्टरी है.

राहत की बात यह है कि इस डिजिटल पाखंड के खिलाफ हरियाणा का प्रबुद्ध समाज और स्थानीय सामाजिक संगठन अब खुल कर खिलाफ उतरने लगे हैं. तर्कशील सोसाइटियों, छात्र संगठनों और किसान यूनियनों ने इस अंधविश्वास के खिलाफ एक बड़ा वैचारिक मोरचा खोल दिया है.

कहा जा रहा है कि बीमारियों के लिए बाबाओं के परचों के बजाय अच्छे अस्पतालों और डाक्टरों पर भरोसा करें. यह सामाजिक आंदोलन इस बात का प्रमाण है कि हरियाणवी समाज अब इन ढोंगियों के झांसे में आ कर अपनी गाढ़ी कमाई और स्वाभिमान को लुटने नहीं देगा.

यह समय हरियाणवी समाज के लिए पूरी तरह जागने का है. कानून अपनी कार्रवाई पुलिस फाइलों और हिसार कोर्ट के चक्करों में कर ही रहा है व धर्मेंद्र हुड्डा ने भी कानूनी कार्रवाई की बात कही है, लेकिन सब से बड़ा बहिष्कार जनता की अदालत को करना होगा.  Religious Superstition

Superstition Crime: अंधविश्वास की आड़ में हत्या

Superstition Crime, लेखक –  वीरेंद्र कुमार खत्री

पढ़ाईलिखाई के प्रचारप्रसार के बावजूद हमारा समाज आज भी अंधविश्वास जैसी बुराई से उबर नहीं पाया है. इस की आड़ में हत्याएं हो रही हैं.

बिहार के नवादा जिले में एक शर्मनाक घटना घटी. डायन के आरोप में भीड़ ने पहले तो एक पतिपत्नी का मुंडन किया, उन पर चूना लगा कर गांवभर में घुमाया और फिर पेड़ से बांध कर बुरी तरह से मारपीट की, जिस में पति की मौके पर ही मौत हो गई, जबकि पत्नी गंभीर रूप से घायल हो गई.

मीडिया रिपोर्ट से पता चला है कि मुसहरी टोला में मारे गए उस आदमी के पड़ोसी के घर छठीयारी समारोह मनाया जा रहा था, जिस में डीजे बारबार बंद हो रहा था.

लोगों ने इसे जादूटोना कर दिए जाने का आरोप लगा कर पीडि़त पतिपत्नी को घर से बाहर निकाला और मारपीट की.

गौर करें तो ऐसा पहली बार नहीं हुआ है, जब जादूटोना करने के आरोप में लोगों को मौत की नींद सुलाने की खबरें अखबारों की सुर्खियां बनी हैं. आएदिन इस तरह की खबरें समाज के सामने आती रहती हैं.

दूसरी घटना यह सामने आई कि एक ओ झा के कहने पर औलाद की चाहत में एक बुजुर्ग का सिर काट कर धड़ को होलिका दहन में जला कर बलि दे दी और सिर को तालाब में गड्ढा खोद कर गाड़ दिया.

यह घटना बिहार के औरंगाबाद जिले के मदनपुर थाना के जलवन गांव की है. इस साल होली से पहले होलिका दहन की जगह से जो हड्डियां पुलिस ने बरामद कीं, उन की जांच में बुजुर्ग की हड्डियां होने की तसदीक हुई.

इस से पहले झारखंड के गुमला के एक गांव में डायन आरोप लगा कर 4 लोगों की पीटपीट कर हत्या कर दी गई. खबरों के मुताबिक, गांव के लोगों ने सामूहिक रूप से पहले बैठक कर उन्हें मार डालने का फैसला लिया और फिर 1-1 कर चारों को घर से निकाल कर लाठीडंडे से पीटपीट कर मार डाला.

पिछले साल झारखंड की राजधानी रांची के निकट एक गांव की 5 औरतों की डायन के शक में हत्या कर दी गई थी. झारखंड में ही एक 80 साल की बूढ़ी औरत को डायन बता उस के भतीजे ने मार दिया था.

हत्यारे का मानना था कि उस के बेटे की बीमारी के लिए वह बूढ़ी औरत ही जिम्मेदार थी.

बिहार और झारखंड ही नहीं, बल्कि देश के दूसरे राज्यों में भी इसी तरह की हैवानियत देखने को मिलती रहती है. पिछले साल उत्तर प्रदेश के सोनभद्र जिले में डायन होने के शक में एक औरत की जीभ काट दी गई.

अंधविश्वास की ज्यादातर निर्मम घटनाएं उन्हीं राज्यों में देखी जा रही हैं जहां तालीम पूरी तरह पहुंच नहीं सकी है. अमूमन इन इलाकों में रहने वाले लोग अभी भी पढ़ाईलिखाई के मामले में पिछड़े हैं. वे अपनी बीमारी की मूल वजह सम झने के बजाय इसे भूतप्रेत और डायन का असर मान रहे हैं. इस का बुरा नतीजा यह है कि डायन की आड़ में घटनाएं घट रही हैं.

आदिवासी बहुल राज्य झारखंड की ही बात करें तो यहां अंधविश्वास की जड़ें काफी गहरी हैं और उस का सब से ज्यादा खमियाजा औरतों को भुगतना पड़ रहा है.

एक गैरसरकारी संस्था ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि देश में तकरीबन हर साल सैकड़ों से ज्यादा औरतों की हत्या डायन के नाम पर होती है. पिछले डेढ़ दशक में देश में डायन के नाम पर तकरीबन 2,000 से भी ज्यादा औरतों की हत्या हो चुकी है.

देखा जाए तो दिल दहलाने वाली ये घटनाएं मामूली नहीं हैं. जहां एक ओर देश में औरतें पंचायतों में अहम सहभागी बन रही हैं, नई बुलंदियों को चूम रही हैं और संसद में भी अपना लोहा मनवा रही हैं, वहीं डायन के नाम पर उन की बेरहमी से हत्या हो रही है. समाज के ठेकेदार डायन के नाम पर उन्हें बिना कपड़ों के घुमा रहे हैं और रेप कर रहे हैं.

समाज में फैली इन कुरीतियों और अंधविश्वासों के खिलाफ जनजागरण चलाने की जरूरत है. साथ ही, इन घटनाओं को अंजाम देने वालों को भी कड़ी सजा मिलनी चाहिए. समाज में ऐसे लोगों को रहने का हक नहीं है, जो अपना मतलब साधने के लिए अंधविश्वासों को बढ़ावा दे रहे हैं.

देश के लोगों को सम झना होगा कि अंधविश्वास को खत्म करने की जिम्मेदारी सिर्फ सरकार की ही नहीं है. इसे उखाड़ फेंकने के लिए समाज को भी आगे आना होगा.

उन क्षेत्रों की पहचान करनी होगी, जहां ऐसी घटनाएं बारबार हो रही हैं. उन वजहों को भी तलाशना होगा, जिन के चलते इन घटनाओं को बढ़ावा मिल रहा है.

हसपुरा के समाजसेवी डाक्टर विपिन कुमार का कहना है कि कम पढ़ेलिखे लोग अकसर गंभीर बीमारियों से निबटने के लिए अस्पतालों में जाने के बजाय तांत्रिकों की शरण लेते हैं. तांत्रिक उन के अंधविश्वास का फायदा उठा कर उन्हें लूटते तो हैं ही, उन्हें अपराध करने के लिए भी उकसाते हैं.

बेहतर होगा कि सरकार और स्वयंसेवी संस्थाएं पिछड़े और सुविधाहीन क्षेत्रों में शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करें. इस से अफवाहों और अप्रिय घटनाओं पर रोक लगेगी और समाज अंधविश्वास से छुटकारा पा लेगा.

सब से जरूरी बात यह है कि ऐसी वारदातों को अंजाम देने वालों को कानून कड़ी से कड़ी सजा दे. Superstition Crime

Superstition: धार्मिक कर्मकांड के चंगुल में नौजवान

Superstition: ‘‘बाबा, अगर यह पूजा करा दूं, तो नौकरी पक्की हो जाएगी न?’’

बिहार की राजधानी पटना के एक बड़े मंदिर के बाहर खड़े 25 साल के रोहित ने पुजारी से यह सवाल किया. बीटैक पास रोहित पिछले डेढ़ साल से नौकरी की तलाश में है. सरकारी इम्तिहान दिए, प्राइवेट इंटरव्यू दिए, लेकिन नतीजा वही, नौकरी नहीं मिली. अब रोहित के भरोसे की आखिरी डोर भगवान और कर्मकांड है.

यह कहानी सिर्फ रोहित की नहीं, बल्कि आज के लाखोंकरोड़ों नौजवानों की है. पढ़ाईलिखाई में अच्छे, तकनीक के इस्तेमाल में आगे, लेकिन जिंदगी की चुनौतियों के सामने जब हार महसूस होती है, तो वे धर्म और कर्मकांड की शरण में चले जाते हैं.

धर्म की ओर लौटते नौजवान

यह विरोधाभास नहीं तो और क्या है कि जो नौजवान इंटरनैट पर रील बनाता है, आर्टिफिशियल इंटैलिजैंस की बातें करता है, वही मंदिर में मन्नत का धागा भी बांधता है. पटना यूनिवर्सिटी में पढ़ने वाली 22 साल की नेहा कहती है, ‘‘हम पढ़ेलिखे हैं, लेकिन कभीकभी लगता है कि कोई ताकत तो है, जो सब बदल सकती है. शायद पूजा करने से किस्मत भी बदल जाए.’’

मंदिरों में नौजवानों की बढ़ती भीड़ इस का सुबूत है. पूजापाठ के बाद सोशल मीडिया पर फोटो डालना, शिवभक्ति के गानों पर रील बनाना, यूट्यूब पर धार्मिक गुरुओं के प्रवचन सुनना, यह नई पीढ़ी के रूटीन का हिस्सा बन गया है.

बेरोजगारी और निराशा की तरफ

बेरोजगारी इस सोच की सब से बड़ी वजह है. गांव का पढ़ालिखा लड़का जब शहर में स्ट्रगल करता है और नाकाम होता है, तो उस का भरोसा सिस्टम से ज्यादा ‘ऊपर वाले’ पर होने लगता है.

बिहार के औरंगाबाद के 27 साल के विकास की जबानी सुनिए, ‘‘मैं ने एमए किया. 3 बार शिक्षक भरती का फार्म भरा, लेकिन रिजल्ट नहीं आया. अब हर मंगलवार को हनुमानजी के मंदिर में जाता हूं. मन्नत मांगी है कि इस बार नौकरी मिल जाए.’’

आधुनिकता के साथ अंधविश्वास

तकनीकी युग में अंधविश्वास ने भी नए रूप ले लिए हैं. इंस्टाग्राम पर ‘शिवभक्त’ लिखने वाले नौजवान शनिवार को नीबूमिर्च जरूर टांगते हैं. बिल्ली रास्ता काट दे तो कार रोकी जाती है. नया बिजनैस शुरू करने से पहले मुहूर्त देखा जाता है. डाक्टर के इलाज के बाद भी श्रेय मंदिर और मजार को दिया जाता है.

एक रिटायर्ड डाक्टर का कहना है, ‘‘हम इलाज करते हैं, ठीक होना भगवान की मरजी है.’’

जब डाक्टर ही ऐसा मानते हैं, तो आम नौजवान क्या करेगा?

पढ़ेलिखे तबके में भी धार्मिकता की जड़ें

आज इंजीनियरिंग और मैनेजमैंट पढ़े नौजवान भी पत्थर की मूर्तियों से आशीर्वाद मांगते हैं. धार्मिक गुरुओं के प्रवचन, टीवी चैनल और सोशल मीडिया ने इस सोच को और गहरा कर दिया है. ‘संतोषी माता’ फिल्म से संतोषी माता की पूजा शुरू हुई. टीवी पर रामसीता के दर्शन होते ही लोग हाथ जोड़ने लगते हैं.

मुसलिम समाज भी घेरे में

सिर्फ हिंदू नहीं, बल्कि मुसलिम समाज के नौजवान भी धार्मिक कर्मकांडों में ज्यादा सक्रिय हुए हैं. रोजा रखना, मजार पर चादर चढ़ाना, दुआ के लिए ख्वाजा की दरगाह जाना, यह सब नई पीढ़ी की धार्मिक पहचान का हिस्सा बन रहा है.

धार्मिक शिक्षा का बढ़ता असर

मदरसे और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरस्वती शिशु मंदिर जैसे संस्थान बचपन से धार्मिक शिक्षा दे रहे हैं. बच्चे मिट्टी की मूर्ति के सामने खड़े हो कर सरस्वती से विद्या मांगते हैं. यह धार्मिकता बड़े होने पर भी बनी रहती है.

मीडिया और धर्म का बिजनैस

धर्म अब उद्योग बन चुका है. टीवी चैनल 24 घंटे प्रवचन, कथा और कीर्तन दिखा रहे हैं. हर जगह बड़े यज्ञ, कीर्तन और प्रवचन हो रहे हैं. सोशल मीडिया पर धार्मिक इंफ्लुएंसर्स करोड़ों के फौलोअर बना चुके हैं.

क्या है समाधान

अंधविश्वास नाम की सामाजिक बीमारी खतरनाक है. जरूरत है वैज्ञानिक सोच विकसित करने की. स्कूलकालेजों में तार्किक और वैज्ञानिक नजरिए की शिक्षा को मजबूत करना होगा. नुक्कड़ नाटक, सैमिनार और वर्कशौप के जरीए गांवों में जागरूकता फैलानी होगी. मीडिया को भी धार्मिक अंधविश्वास के बजाय वैज्ञानिक जानकारी पर फोकस करना होगा.

आज का नौजवान लाभ तो विज्ञान से उठाता है, लेकिन इस का श्रेय ईश्वर और देवीदेवताओं को देता है. अगर हमें एक सजग और प्रगतिशील समाज बनाना है, तो नौजवानों को वैज्ञानिक सोच को विकसित करना होगा.

अगर नौजवानों में यह सोच पैदा नहीं होगी तो धार्मिक अंधविश्वास उन के दिमाग पर नैगेटिव असर डालेगा वे फैसले लेने से डरेंगे. कर्मकांड के चक्कर में अपना पैसा बरबाद करेंगे, जो उन्हें नकारा बना देगा. Superstition

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