Superstition. अगर आज भारत के किसी चौराहे पर एक वैज्ञानिक आ कर चिल्लाए कि उस ने कैंसर की अचूक दवा खोज ली है, तो शायद 4 लोग खड़े हो कर उस की बात सुनेंगे और 2 लोग उस पर हंस देंगे. लेकिन वहीं अगर कोई पीत वस्त्रधारी दाढ़ी वाला बाबा घोषणा कर दे कि ‘मेरी तरफ देख कर 3 बार पलकें झपकाओ, तुम्हारे बैंक खाते में रुका हुआ पैसा आ जाएगा’, तो अगले ही घंटे वहां लाखों की बेकाबू भीड़ जमा हो जाएगी.

यह है हमारे  समाज की कड़वी और खौफनाक हकीकत. हम तरक्की के दावे चाहे जितने कर लें, हमारी सोच आज भी अंधविश्वास के उसी गंदे नाले में अटकी है जहां डर को भक्ति, अज्ञानता को धर्म और ढोंग को ‘दिव्यता’ का दर्जा दे दिया गया है. विज्ञान के इस दौर में जहां दुनिया मंगल पर बस्तियां बसाने की सोच रही है, हम इस जुगत में लगे हैं कि कौन सा बाबा अपनी तंत्र विद्या से हमारे ‘मंगल दोष’ को काट सकता है.

हाल ही में आई फिल्म ‘हनुमान अंश’ हो या दशकों पहले आई ‘जय संतोषी मां’ हमारी सिनेमाई पसंद भी हमारी इस मानसिक सड़न का प्रदर्शन करती है.

‘जय संतोषी मां’ जब आई थी, तो सिनेमाघरों के बाहर लोग जूतेचप्पल उतार कर जाते थे, परदे पर सिक्के उछालते थे और गुड़चना बांटते थे.

आज भी हमारी रीढ़विहीन सोच में एक इंच का सुधार नहीं हुआ है. फिल्में कला या अभिनय के दम पर हिट नहीं होतीं, वे हमारी ‘मुफ्त में चमत्कार’ पा लेने की गीदड़भूख के दम पर सुपरहिट होती हैं. हम परदे पर भी ऐसा ईश्वर देखना चाहते हैं जो बस एक गदा घुमाए या त्रिशूल चलाए और हमारी जिंदगी के सारे कर्जे और बीमारियां एक ?ाटके में भस्म कर दे.

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