Hindi Story: शेरनी की दहाड़

सुनीता के सपनों की उड़ान उस के गांव की पगडंडियों से शुरू हो कर शहर की यूनिवर्सिटी तक जा पहुंची थी. ऊंची कदकाठी, दोहरा बदन और आंखों में आत्मविश्वास की चमक. वह सिर्फ खूबसूरत और सुशील ही नहीं, बल्कि फौलादी इरादों वाली लड़की थी. जब वह अपनी मोटरसाइकिल पर सवार हो कर निकलती, तो उस की सख्त शख्सीयत और स्वाभिमान देखने लायक होता. सुनीता के मामा शहर के नामी वकील थे. वही उस के आदर्श थे. वह भी उन्हीं की तरह काला कोट पहन कर गरीबों को इंसाफ दिलाने का सपना देखती थी. कानून की पढ़ाई के साथसाथ वह यह भी जानती थी कि इंसाफ की पहली सीढ़ी बेखौफ और नाइंसाफी के खिलाफ खड़ा होना है.

लेकिन उस शहर की चमक के पीछे अपराध का अंधेरा भी था. जिस इलाके में सुनीता रहती थी, वहां राजा नाम के एक बदमाश का खौफ था. राजा और उस के साथी आएदिन राहगीरों को लूटते और लड़कियों के साथ बदतमीजी करते थे. राजा अकसर सुनीता को दूर से घूरता था, पर उस की आंखों की तेज चमक और कड़क स्वभाव को देख कर वह सामने आने की हिम्मत नहीं जुटा पाता था. उसे सुनीता के कड़क स्वभाव से डर लगता था. शांति तब भंग हुई, जब सुनीता को पता चला कि पड़ोस की मासूम दिव्या ने स्कूल जाना छोड़ दिया है. कई दिनों से वह खामोश और डरी हुई थी. दिव्या को राजा ने बीच सड़क पर रोक कर उस के साथ बदतमीजी की थी.

दिव्या के मातापिता डर के मारे पुलिस के पास जाने की हिम्मत भी नहीं जुटा पा रहे थे. उन का खामोश डर और दिव्या की सिसकियां सुनीता के कानों में गूंज उठीं. उसे लगा कि अगर आज वह चुप रही तो उस की पढ़ाई लिखाई, उस की हिम्मत और वकालत का उस का सपना, सब बेकार है. उस के खून में उबाल गया. अगले दिन सूरज की तपिश के बीच सुनीता ने अपनी चमचमाती बाइक सीधे उस चौराहे पर रोकी, जहां राजा अपने चमचों के साथ बैठा था. इंजन बंद हुआ, चारों तरफ सन्नाटा छा गया. सुनीता ने धीमे से हैलमैट उतारा, उस के खुले बाल हवा में लहराए और उस की तीखी नजरों ने सीधे राजा को भेदा. ‘‘भाई, जरा यहां तो आना,’’ सुनीता की आवाज गूंजी, जिस में चेतावनी और शालीनता दोनों थे.

राजा अपनी अकड़ में साथियों के साथ बाइक के पास पहुंचा. उसे लगा, शायद कोई मदद मांग रही है, पर सुनीता की आंखों में अंगारे थेसुनीता ने बिना डरे, सीधे राजा की आंखों में ?ांकते हुए कहा, ‘‘तुम्हारी हरकतें हदें पार कर रही हैं राजा. अपनी ताकत निहत्थों पर आजमाना बंद करो. बेहतर होगा कि आज के बाद तुम यहां किसी लड़की की तरफ आंख उठा कर भी देखो, वरना याद रखनाकानून की पढ़ाई बाद में काम आएगी, मेरा हाथ पहले चलेगा.’’ सुनीता की आवाज में ऐसी दहाड़ और आत्मविश्वास था कि राजा के पैर कांपने लगे. उस ने हड़बड़ाते हुए कहा, ‘‘मैं नेमैं ने क्या किया?’’ सुनीता ने कड़क कर जवाब दिया, ‘‘वही, जो एक बुजदिल करता है. तुम्हें शर्म नहीं आती बहनबेटियों को छेड़ते हुए? मैं ने तुम्हेंभाईकह कर पुकारा है, इस शब्द की लाज रख लो, वरना अंजाम भुगतने के लिए तैयार रहना.’’

वह दबंग राजा, जिस से पूरा महल्ला थरथर कांपता था, सुनीता के सामने बौना पड़ गया. उस ने हाथ जोड़ लिए और वहां से चला गया. वह डर सिर्फ पुलिस का नहीं था, वह एक स्वाभिमानी लड़की के तेज का डर था. कुछ ही दिनों में बदलाव साफ दिखने लगा. सुनीता ने केवल उसे सुधारा, बल्कि उसे उस की रुकी हुई पढ़ाई दोबारा शुरू करने के लिए भी बढ़ावा दिया, ‘‘कुछ बन कर दिखाओ. मातापिता का मान बढ़ाओ. यह जिंदगी घरपरिवार, समाज और देश का मान बढ़ाने के लिए मिली है.’’ ‘‘सम? गया दीदी,’’ राजा ने हाथ जोड़ कर कहा. राजा के बदमाश साथी, जो कल तक लड़कियों को छेड़ते थे, भी सुनीता कोदीदीकह कर सम्मान देने लगे थे. कालोनी के लोगों ने राहत की सांस ली. वे अब सुनीता कोशेरनीकहने लगे थे. सुनीता ने साबित कर दिया कि आत्मविश्वास और हिम्मत ही एक महिला का सब से बड़ा गहना और सब से ताकतवर हथियार है.         

पप्पू यादव के दावे पर बवाल   
बिहार में पूर्णिया से सांसद पप्पू यादव ने दावा किया है कि भारतीय जनता पार्टी सीमांचल और पश्चिम बंगाल के कुछ जिलों को मिला कर केंद्रशासित प्रदेश बनाने की साजिश रच रही है. इस योजना के तहत पहले पश्चिम बंगाल में राष्ट्रपति शासन लागू कराया जा सकता है. इस के बाद बिहार विधानसभा से एक प्रस्ताव पास करवाने की कोशिश की जाएगी. इस पूरे प्रोसैस के बाद सीमांचल क्षेत्र के साथ पश्चिम बंगाल के मालदा, मुर्शिदाबाद, रायगंज और दिनाजपुर जैसे कुछ जिलों को जोड़ कर एक नया केंद्रशासित प्रदेश बनाया जा सकता है, जबकि केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने साफ शब्दों में कहा कि ये दावे तथ्यों के बिलकुल उलट हैं और इन में रत्तीभर भी सच्चाई नहीं है.   

Hindi Kahani: रफू

वि और सुधा की शादीशुदा जिंदगी को 20 साल से ज्यादा का समय बीत चुका था. इन सालों में घर की दीवारों का रंग, शहर का पता, बच्चों की उम्र और समय का पहिया बहुतकुछ बदला, पर एक चीज जो कभी नहीं बदली, वह थी पारिवारिक बैठकों का खत्म होने वाला सिलसिला, जिस में हर बार सुधा की पीड़ा को सुना तो जाता था, पर सम? कभी नहीं गया. आज फिर वही बैठक थी. ड्राइंगरूम में कुरसियां ऐसे सजी थीं, मानो कोई पंचायत बैठने वाली हो. मेज पर रखे चाय के कपों से उठती भाप कमरे की गंभीरता को और ज्यादा गंभीर बना रही थी. दीवार पर टंगी घड़ी की टिकटिक, उस चुप्पी को चीरती हुई, समय के लगातार आगे बढ़ने की गवाही दे रही थी.

सुधा कमरे के एक कोने में बैठी थी. उस की आंखों में अब सवाल नहीं थे, क्योंकि सवाल पूछने की हिम्मत और उम्मीद, दोनों ही समय के साथ कमजोर हो चुकी थीं. बड़े भैया ने धीमी और फैसला करने वाली आवाज में कहा, ‘‘देखो सुधा, अब इन बातों को उखाड़ने से क्या फायदा? अब तो बच्चे भी बड़े हो गए हैं. घर परिवार सम?ाते से ही चलते हैं.’’ भाभी ने सहमति में सिर हिलाया, ‘‘हर बात को दिल से लगा लोगी, तो जिंदगी मुश्किल हो जाएगी.’’ किसी ने खानदान की इज्जत का हवाला दिया, तो किसी ने सामाजिक मर्यादा का भार सुधा पर डाला. सब के अपनेअपने शब्द और अपनाअपना लहजा था, मतलब एक ही था कि चुप रहो, सहन करो और सबकुछ सामान्य मान लो. रवि, जो इस पूरी बैठक का केंद्र था, एक ओर शांत बैठा रहा. उस के चेहरे पर अपराध का भाव था, ही कोई चिंता. वह ऐसे चुप था, जैसे यह सब उस की जिंदगी का रोजमर्रा का हिस्सा हो.

सुधा ने एक पल के लिए रवि की ओर देखा. कभी यही चेहरा उस की जिंदगी की बुनियाद था. इसी चेहरे में उस ने विश्वास, सुरक्षा और प्यार खोजा था, पर आज वही चेहरा उस के लिए एक अनचाही छवि बन चुका था. सुधा को शादी के सपनों से भरे शुरुआती दिन याद हो आए, जब हर सुबह विश्वास के साथ शुरू होती थी. उस ने अपने वजूद को रवि की जिंदगी में इस आसानी से पिरो दिया था, जैसे कोई धागा कपड़े का हिस्सा बन जाता है, पर अब धीरेधीरे उस धागे पर बहुत ज्यादा खिंचाव आने लगा था. जब सुधा ने पहली बार अपनी पीड़ा जाहिर की थी, तब उसे यकीन था कि उस की आवाज सुनी जाएगी. उसे लगा था कि सच में इतनी ताकत जरूर होती है कि वह इंसाफ को ?ाक?ार दे. परिवार ने उसे सुना भी. उसे हमदर्दी मिली. उस की आंखों के आंसू पोंछे गए पर इंसाफ कभी नहीं मिला. हर बार उसे यही सम?ाया गया कि समय के साथ सब ठीक हो जाएगा. तुम्हें थोड़ा और सब्र रखना चाहिए.

धीरेधीरे सुधा को सम? आने लगा कि परिवार के पास पीड़ा को स्वीकार करने की सम? तो है, पर उस का हल निकालने की हिम्मत नहीं है. समय बीतता गया और हर बार सुधा के टूटे विश्वास को सम?ाते के धागों से रफू कर दिया गया. वह बाहर से एकदम सही दिखती रही, पर भीतर से उस का वजूद धीरेधीरे कमजोर होता गया. बैठक खत्म हो चुकी थी. लोग एकएक कर के उठने लगे. जातेजाते सब ने हमदर्दी से सुधा के कंधे पर हाथ रखा. रवि बिना कुछ कहे अपने कमरे में चला गया. सुधा वहीं बैठी रही. अब वहां गहरा सन्नाटा था. उस की नजर सामने रखी उस पुरानी साड़ी पर पड़ी, जिसे उस ने सालों पहले बड़े जतन से रफू किया था. वह साड़ी सुधा की मां की निशानी थी. एक बार उस का किनारा फट गया था. उस ने सूईधागा ले कर उसे सावधानी से जोड़ दिया था, पर समय के साथ वही जगह बारबार फटती रही.
हर बार उस ने उसे फिर से रफू किया. अब वह हिस्सा इतना कमजोर हो चुका था कि धागे भी उसे संभालने में नाकाम थे.

सुधा ने साड़ी को हाथ में लिया. उस की उंगलियां उस रफू किए गए हिस्से पर ठहर गईं. उसे सम? आया कि वह साड़ी केवल कपड़ा नहीं, उस की अपनी जिंदगी है. बारबार रफू किया गया विश्वास, ऊपर से भले ही जुड़ा हुआ दिखाई दे, पर भीतर से वह अपनी बुनियादी ताकत खो देता है. एक दिन ऐसा आता है, जब मामूली सा खिंचाव भी उसे फिर से तोड़ देता है और फिर वह टूटन आखिरी होती है. उस पल उसे एक गहरा सच सम? में आया. रफू करना केवल टूटन को छिपाता है, उसे खत्म नहीं कर पाता और हर बार रिश्ते को रफू करते हुए हम खुद को कमजोर करते जाते हैं. वहीं दूसरी ओर रवि यह बात अच्छी तरह जानता था कि समाज अलगावसामाजिक बहिष्कार करने के अलावा हमेशा उस के हक में ही खड़ा रहेगा, क्योंकि इस सिस्टम में शादी के बावजूद दूसरी औरत से गलत संबंधों का बने रहना पीडि़त इनसान की इज्जत से शायद ज्यादा अहम माना जाता है.

सुधा ने साड़ी को सावधानी से तह किया और अलमारी में रख दिया, फिर उस ने सूई और धागे को कुछ पलों तक देखा, मगर इस बार उस ने उन्हें उठाया नहीं, क्योंकि वह जान चुकी थी कि हर दरार को रफू करना जरूरी नहीं होता. कुछ दरारें हमें यह सिखाने के लिए होती हैं कि अब खुद को बचाना है कि केवल संबंधों को ढोते जाना है. सुधा के भीतर एक गहरी चुप्पी थी, पर इस बार वह चुप्पी हार की नहीं, बल्कि एक जागरूकता का अहसास था. शायद पहली बार उस ने खुद को रफू होने से बचा लिया था.                
 

जया विनय तागड़े

Hindi Kahani: अमीर

रो की तरह डमरू ने चबूतरे की सफाई की. उसी समय उस पर कुछ सजीधजी औरतों ने दया दिखाई. प्रसाद के 2 लड्डू दे दिए उस को. डमरू आगे बढ़ गया. 10 मिनट चल कर ट्रक के करीब आया. आधे दाम पर 3 दर्जन केले खरीद लिए. अब उसे इस जंगल के दूसरी तरफ चादर बिछा कर केले बेचने थे.
दरअसल, इस कसबे की एक तरफ छोटा सा जंगल है. बंदर आते हैं. लोग केले खिला देते हैं. इस तरह डमरू की आमदनी हो जाती है.

अकेले रहने वाले डमरू के पास बचत के 2,120 रुपए रखे हैं. हर दिन 50 रुपए के केले खरीद कर 130 रुपए में बेच देता है. डमरू को रोज मुनाफा होता है. 65 साल की अकेली जिंदगी. उसे रुपए की इसीलिए कमी नहीं रहती है. अब दोपहर से शाम हो रही थी. वैसे दिन ढलना एक रोज घटने वाली घटना है. उसी तरह तय समय पर डमरू का 1-1 लड्डू कुछ समय पर निकाल कर खाना. खाने का उसे कोई शौक नहीं रहा है, इसलिए कुछ भी पकाना नहीं है और उस का बहुत सारा समय बच जाता है वरना जब पत्नी थी, तब सुबह उठ कर रोटी बनाने में ही उस का बहुत सारा समय बरबाद हो जाता था.

डमरू लड्डू पर बाजार से खरीदा गया काला नमक छिड़कता है और काम तमाम. मीठा और नमकीन दोनों का मजा एकसाथ. जैसे कभीकभार पानी में शक्कर बुरक कर भी पी जाता है. लड्डू खत्म तो अखबार के उस कतरे को कूड़ेदान में डाल कर वह अपनी जगह पर कर बैठ गया. इधर गरमी भी अपना रंग दिखाते जा रही थी, बदन जैसे ?ालस ही जाए. ऐसे में कुछ लोग अपने घरों से निकलने में कतरा रहे थे. दोपहरी का यह समय तमाम जगहों पर आराम का होता है, लेकिन डमरू अपनी टूटी चप्पल घसीट कर घर जाए और फिर बचे हुए केले बेचने आए, यह नामुमकिन है, इसीलिए रोज इतनी तेज धूप में भी इसी नीले के किनारे आसमान के नीचे बैठा रहता है, गरमी के कम होने तक. कोई भूलाभटका ग्राहक भी जाता था.

एक बार तो कुछ मजदूर आए और एक दर्जन केले खरीद कर ले गए. वाह, ऐसे में डमरू खुश हो गया.
लेकिन डमरू का ज्यादा समय ऊंघने में ही बीतता था. जमीन में पड़ा हुआ उस का वजूद कितना कमजोर लगता था. दुबलापतला बूढ़ा आदमी, जिस के बालों की बसावट जरा भी घनी नहीं थी. खोपड़ी ही दिखाई देती थी. मुंह खोल कर बीचबीच में ऊंघता हुआ डमरू सचमुच किसी ढोल सा लग रहा था जिसे किसी ने हथेली नहीं, बल्कि टहनी मार कर, ?ाक?ार कर, बारबार बजा कर जिंदा कर दिया हो. नाली के किनारे पर दूर नीम के पेड़ के पीछे जमा सूखे पत्तों और इस बुजुर्ग में कितनी तो समानता है, मगर इस की किसी को परवाह नहीं. अचानक डमरू को कुछ लोगों की आवाज सुनाई दी. सिर पर पोटली रखे कुछ औरतें रही थीं. वे सब डमरू के करीब गईं. वे 4 औरतें थीं. बेहद गरीब लग रही थीं. डमरू की फटी चादर के पास बैठ गईं.

एक औरत बोली, ‘‘हमारे पास पैसे नहीं हैं. हम को केले खाने को दे दो.’’ डमरू ने उन को गौर से देखा. उसे 4 साल पहले मरी अपनी पत्नी याद गई. लाली नाम था. मटकती रहती थी. डमरू को जाने क्या सू?. वह बोला, ‘‘गीत सुनाओ. तब फोकट में केला मिलेगा.’’ ‘‘अच्छा, ठीक है,’’ कह कर वे औरतें एक फिल्मी गीत गाने लगीं. 2-3 लाइनें गा कर उन सब को जोश गया. एक के बाद एक टूटेफूटे 10 गीत सुना दिए डमरू को. डमरू ने केले गिने. पूरे 12 थे. उस ने खुशीखुशी उन औरतों को दे दिए. खुश हो कर वे औरतें केले ले कर चली गईं. डमरू ने भी चादर समेटी और मजे से गुनगुनाता हुआ अपने ठिकाने की तरफ चल दिया. आज वह किसी अमीरजादे सा महसूस कर रहा था

Hindi Story: गली के कुत्ते

Hindi Story: रा के तकरीबन साढ़े 10 बज रहे थे. शहर की सड़कों पर हलकीहलकी ठंड उतर आई थी. सड़क किनारे बंद होती दुकानें. झिलमिलाती स्ट्रीट लाइट्स. बीचबीच में भागते आटोरिकशा और मोटरसाइकिलें. यह वही शहर था, जो कभी पूरी तरह सोता नहीं था. बस, कुछ घंटों के लिए आंखें मूंद लेता था.
आर्या औफिस से लौटते हुए बस से उतर कर पैदल घर की ओर बढ़ रही थी. बस स्टौप से घर तक का रास्ता मुश्किल से 10 मिनट का था. पर इन 10 मिनट में वह रोज जाने कितनी दुआएं पढ़ लेती थी.
आर्या के कानों में ईयरफोन नहीं थे. मोबाइल भी हाथ में नहीं था, क्योंकि उस ने बहुत पहले सीख लिया था कि रात की सड़कें सजग रहने वालों का इम्तिहान लेती हैं.

उस गली में कदम रखते ही आर्या ने हलकी सी सीटी बजाई. सीटी की आवाज सुनते ही गली के कोने से
3-4 कुत्ते निकल आए. ये कोई नए कुत्ते नहीं थे. ये वही थे जिन्हें वह महीनों से जानती थी. औफिस से लौटते वक्त वह अकसर उन के लिए बिसकुट ले आती थी. वीकैंड पर उन्हें रोटी खिलाए बिना उस के दिन की शुरुआत नहीं होती थी. जब भी महल्ले के डौग लवर्स उन कुत्तों को टीका लगवाने का इंतजाम करते, आर्या भी बढ़चढ़ कर उन की मदद करती. कुत्तों के इलाज और देखभाल में अकसर वह सब से आगे रहती. बरसात में उन के लिए टिन की शैड बनवाने का विचार भी उसी का था. उस छोटे से इंतजाम ने सर्दी और बारिश में गली के कुत्तों को बड़ी राहत दी थी. यही वजह थी कि वे आर्या की आहट पहचानते थे. उसे अपना मानते थे.

आर्या भी जानती थी कि ये कुत्ते भरोसेमंद हैं, क्योंकि ये अपनी हद जानते हैं. हवस की आग में ये पागल हो कर इधरउधर नहीं भटकते और सब से जरूरी बात यह कि ये गली को अपना घर मानते थे. इन दिनों कुत्तों को ले कर शहर में खूब विवाद चल रहा था. अखबारों में सुर्खियां थीं. टीवी डिबेट में शोर था. कोई कहता था सड़क के कुत्ते खतरनाक हैं. कोई उन्हें हटाने की मांग कर रहा था. पर आर्या जानती थी कि असल खतरा दांतों से नहीं, नीयत से होता है. गली के एक बुजुर्ग अकसर कहते थे, ‘‘बेटा, जिस कुत्ते को रोज खाना मिलता है और इलाज होता है, वह गली का पहरेदार बन जाता है.’’ उन की यह बात आर्या के दिल में उतर गई थी.

जैसे ही वह थोड़ा आगे बढ़ी, पीछे से बाइक का इंजन दहाड़ा. 2 लड़के थे. सिर पर हैलमैट नहीं. चेहरे पर बेहूदा आत्मविश्वास. एक ने कहा, ‘‘ओए देख, नाइट शिफ्ट वाली रही है.’’ दूसरा हंसा, ‘‘चल, मजे लेते हैं.’’ आर्या का दिल जोर से धड़कने लगा. उस ने कदम तेज कर दिए. पीछे से फिर आवाज आई, ‘‘डर क्यों रही हो जानेमन, हम तो आशिक हैं तुम्हारे. इन कुत्तों से कितना दिल लगाओगी, थोड़ा हम से भी लगा लो. कसम से मजा बहुत आएगा.’’ आर्या के मन में एक वाक्य कौंध गया, ‘गली का कुत्ते गली के इन वहशी लड़कों से कहीं बेहतर होते हैं. वे कम से कम इज्जत की हद जानते हैं.’ उस ने फिर से सीटी बजाई. इस बार आवाज तेज थी. कुत्ते तुरंत उस के चारों ओर गए. एक आगे. 2 पीछे. एक बगल में. बाइक जैसे ही पास आई, कुत्तों ने एक साथ भौंकना शुरू कर दिया. तेज, आक्रामक, चेतावनी भरी लहजे में.
एक लड़का घबरा गया, ‘‘अबे चल, ये काट लेंगे.’’ दूसरा भी बोला, ‘‘छोड़ यार, आज नहीं.’’

बाइक लड़खड़ाई और वापस मुड़ गई. गालियां देते हुए वे दोनों अंधेरे में गायब हो गए. आर्या वहीं खड़ी रह गई. उस के हाथ कांप रहे थे. पर इस बार डर से ज्यादा गुस्सा था. उस ने ?ाक कर कुत्तों के सिर पर हाथ फेरा. वह पूंछ हिलाने लगे. जैसे कह रहे हों, ‘तुम निश्चिंत रहो, यह हमारी गली है और हम तुम्हारे साथ हैं.’
घर पहुंचते ही मां ने पूछा, ‘‘आज फिर देर हो गई.’’ आर्या बोली, ‘‘हां मां, कुछ छिछोरे कुत्ते पीछे लग गए थे.’’ मां ने पूछा, ‘‘सब ठीक तो है ?’’ आर्या ने कहा, ‘‘हां मां, गली के कुत्ते साथ थे.’’ मां हलकी मुस्कुराईं, ‘‘अच्छा है. आजकल इनसानों से ज्यादा वही भरोसेमंद हैं.’’ अगले दिन औफिस में आर्या ने जब यह सारी घटना सुनाई. किसी ने कहा, ‘‘समाज के लिए असली खतरा ये 2 टांगों वाले कुत्ते ही हैं, जो
दुनिया को अपनी हवस के चश्मे से देखते हैं.’’

किसी ने कहा, ‘‘नगरनिगम को इन कुत्तों पर भी नकेल कसने की योजना लानी चाहिए. सड़क पर घुमते वहशी जानवर सोसाइटी के लिए बड़ा खतरा हैं.’’ आर्या शांत स्वर में बोली, ‘‘सच में, खतरनाक वे कुत्ते नहीं हैं जिन्हें रोटी नहीं मिलती, बल्कि खतरनाक वह ठरक है जिसे संस्कार मिलता है, सही इलाज.’’
उस दिन से कुत्तों के लिए आर्या के मन में इज्जत बढ़ गई थी. गली के कुत्तों के लिए अब और लोग आगे आने लगे थे. सही देखभाल मिलने पर कुत्तों का बरताव और संतुलित हो गया. धीरेधीरे गली बदलने लगी. मनचले गायब हो गए. रातें थोड़ी सुरक्षित हो गईं. आर्या अब निडर हो कर घर लौटती है. वह जानती है. इस गली में कुत्ते सिर्फ जानवर नहीं हैं. वे पहरेदार हैं. दोस्त हैं और कई बार इनसानों से ज्यादा इनसान हैं.
इस सड़क पर आज भी 2 तरह के कुत्ते हैं. एक वे जो भूख में भौंकते हैं और दूसरे वे जो हवस में नोंचने को दौड़ते हैं. पहले वाले गली की शान हैं, दूसरे समाज का कलंक.                   

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