रवि और सुधा की शादीशुदा जिंदगी को 20 साल से ज्यादा का समय बीत चुका था. इन सालों में घर की दीवारों का रंग, शहर का पता, बच्चों की उम्र और समय का पहिया बहुतकुछ बदला, पर एक चीज जो कभी नहीं बदली, वह थी पारिवारिक बैठकों का न खत्म होने वाला सिलसिला, जिस में हर बार सुधा की पीड़ा को सुना तो जाता था, पर सम?ा कभी नहीं गया. आज फिर वही बैठक थी. ड्राइंगरूम में कुरसियां ऐसे सजी थीं, मानो कोई पंचायत बैठने वाली हो. मेज पर रखे चाय के कपों से उठती भाप कमरे की गंभीरता को और ज्यादा गंभीर बना रही थी. दीवार पर टंगी घड़ी की टिकटिक, उस चुप्पी को चीरती हुई, समय के लगातार आगे बढ़ने की गवाही दे रही थी.
सुधा कमरे के एक कोने में बैठी थी. उस की आंखों में अब सवाल नहीं थे, क्योंकि सवाल पूछने की हिम्मत और उम्मीद, दोनों ही समय के साथ कमजोर हो चुकी थीं. बड़े भैया ने धीमी और फैसला करने वाली आवाज में कहा, ‘‘देखो सुधा, अब इन बातों को उखाड़ने से क्या फायदा? अब तो बच्चे भी बड़े हो गए हैं. घर परिवार सम?ाते से ही चलते हैं.’’ भाभी ने सहमति में सिर हिलाया, ‘‘हर बात को दिल से लगा लोगी, तो जिंदगी मुश्किल हो जाएगी.’’ किसी ने खानदान की इज्जत का हवाला दिया, तो किसी ने सामाजिक मर्यादा का भार सुधा पर डाला. सब के अपनेअपने शब्द और अपनाअपना लहजा था, मतलब एक ही था कि चुप रहो, सहन करो और सबकुछ सामान्य मान लो. रवि, जो इस पूरी बैठक का केंद्र था, एक ओर शांत बैठा रहा. उस के चेहरे पर न अपराध का भाव था, न ही कोई चिंता. वह ऐसे चुप था, जैसे यह सब उस की जिंदगी का रोजमर्रा का हिस्सा हो.
सुधा ने एक पल के लिए रवि की ओर देखा. कभी यही चेहरा उस की जिंदगी की बुनियाद था. इसी चेहरे में उस ने विश्वास, सुरक्षा और प्यार खोजा था, पर आज वही चेहरा उस के लिए एक अनचाही छवि बन चुका था. सुधा को शादी के सपनों से भरे शुरुआती दिन याद हो आए, जब हर सुबह विश्वास के साथ शुरू होती थी. उस ने अपने वजूद को रवि की जिंदगी में इस आसानी से पिरो दिया था, जैसे कोई धागा कपड़े का हिस्सा बन जाता है, पर अब धीरेधीरे उस धागे पर बहुत ज्यादा खिंचाव आने लगा था. जब सुधा ने पहली बार अपनी पीड़ा जाहिर की थी, तब उसे यकीन था कि उस की आवाज सुनी जाएगी. उसे लगा था कि सच में इतनी ताकत जरूर होती है कि वह इंसाफ को ?ाक?ार दे. परिवार ने उसे सुना भी. उसे हमदर्दी मिली. उस की आंखों के आंसू पोंछे गए पर इंसाफ कभी नहीं मिला. हर बार उसे यही सम?ाया गया कि समय के साथ सब ठीक हो जाएगा. तुम्हें थोड़ा और सब्र रखना चाहिए.
धीरेधीरे सुधा को सम?ा आने लगा कि परिवार के पास पीड़ा को स्वीकार करने की सम?ा तो है, पर उस का हल निकालने की हिम्मत नहीं है. समय बीतता गया और हर बार सुधा के टूटे विश्वास को सम?ाते के धागों से रफू कर दिया गया. वह बाहर से एकदम सही दिखती रही, पर भीतर से उस का वजूद धीरेधीरे कमजोर होता गया. बैठक खत्म हो चुकी थी. लोग एकएक कर के उठने लगे. जातेजाते सब ने हमदर्दी से सुधा के कंधे पर हाथ रखा. रवि बिना कुछ कहे अपने कमरे में चला गया. सुधा वहीं बैठी रही. अब वहां गहरा सन्नाटा था. उस की नजर सामने रखी उस पुरानी साड़ी पर पड़ी, जिसे उस ने सालों पहले बड़े जतन से रफू किया था. वह साड़ी सुधा की मां की निशानी थी. एक बार उस का किनारा फट गया था. उस ने सूईधागा ले कर उसे सावधानी से जोड़ दिया था, पर समय के साथ वही जगह बारबार फटती रही.
हर बार उस ने उसे फिर से रफू किया. अब वह हिस्सा इतना कमजोर हो चुका था कि धागे भी उसे संभालने में नाकाम थे.
सुधा ने साड़ी को हाथ में लिया. उस की उंगलियां उस रफू किए गए हिस्से पर ठहर गईं. उसे सम?ा आया कि वह साड़ी केवल कपड़ा नहीं, उस की अपनी जिंदगी है. बारबार रफू किया गया विश्वास, ऊपर से भले ही जुड़ा हुआ दिखाई दे, पर भीतर से वह अपनी बुनियादी ताकत खो देता है. एक दिन ऐसा आता है, जब मामूली सा खिंचाव भी उसे फिर से तोड़ देता है और फिर वह टूटन आखिरी होती है. उस पल उसे एक गहरा सच सम?ा में आया. रफू करना केवल टूटन को छिपाता है, उसे खत्म नहीं कर पाता और हर बार रिश्ते को रफू करते हुए हम खुद को कमजोर करते जाते हैं. वहीं दूसरी ओर रवि यह बात अच्छी तरह जानता था कि समाज अलगाव, सामाजिक बहिष्कार करने के अलावा हमेशा उस के हक में ही खड़ा रहेगा, क्योंकि इस सिस्टम में शादी के बावजूद दूसरी औरत से गलत संबंधों का बने रहना पीडि़त इनसान की इज्जत से शायद ज्यादा अहम माना जाता है.
सुधा ने साड़ी को सावधानी से तह किया और अलमारी में रख दिया, फिर उस ने सूई और धागे को कुछ पलों तक देखा, मगर इस बार उस ने उन्हें उठाया नहीं, क्योंकि वह जान चुकी थी कि हर दरार को रफू करना जरूरी नहीं होता. कुछ दरारें हमें यह सिखाने के लिए होती हैं कि अब खुद को बचाना है न कि केवल संबंधों को ढोते जाना है. सुधा के भीतर एक गहरी चुप्पी थी, पर इस बार वह चुप्पी हार की नहीं, बल्कि एक जागरूकता का अहसास था. शायद पहली बार उस ने खुद को रफू होने से बचा लिया था.
जया विनय तागड़े




