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Heart Touching Story in Hindi : सफेद फूल

Heart Touching Story in Hindi. एक भूलाबिसरा गांव था, जिस के किनारे एक पुराना पुल बना हुआ था. हर शाम, ठीक सूरज छिपने से पहले, डैनियल नाम का एक बुजुर्ग उस पुल पर आता, रेलिंग पर एक सफेद फूल रखता, एक मिनट तक चपुचाप खड़ा रहता और फिर घर लौट जाता.

40 साल तक डैनियल ने एक भी दिन नहीं छोड़ा. गांव वाले समझते थे कि वह किसी अपने का शोक मना रहा है, लेकिन किसी ने कभी पूछा नहीं.

एक बरसाती शाम को एक मुसाफिर डैनियल से मिला. उस ने पूछा, ‘‘आप यह फूल किस के लिए रखते हैं?’’

डैनियल मुसकराया और धीरे से बोला, ‘‘एक अजनबी के लिए.’’

यह सुन कर वह मुसाफिर चौंक गया, ‘‘अजनबी?’’

डैनियल ने सिर हिलाया और कहा, ‘‘जब मैं 23 साल का था, तब मैं ने अपनी जिंदगी खत्म करने का फैसला कर लिया था. मैं इसी पुल पर आया था. यहीं खड़ा था. बस, नदी में कूदने की हिम्मत जुटा रहा था. तभी एक आदमी आया, जिसे मैं ने पहले कभी नहीं देखा था.’’

‘‘आगे क्या हुआ?’’ उस मुसाफिर ने पूछा.

‘‘उस अजबनी ने मु झ से यह नहीं पूछा कि क्या हुआ है. उस ने कोई सलाह भी नहीं दी. वह बस मेरे पास आ कर खड़ा हो गया. कुछ देर की खामोशी के बाद उस ने केवल एक वाक्य कहा, ‘अगर तुम कल भी जिंदा रहे, तो शायद कल तुम्हारे लिए कुछ अच्छा ले कर आए.’

‘‘इतना कह कर वह अजनबी चला गया,’’ डैनियल ने अपनी बात पूरी की.

मुसाफिर ने पूछा, ‘‘बस इतनी सी बात?’’

डैनियल की आंखें नम हो गईं, ‘‘मेरे लिए वही सबकुछ था. मैं अगले दिन फिर लौटा. फिर उस के अगले दिन. धीरेधीरे मैं इस पुल पर मरने नहीं, जीने के लिए आने लगा.’’

मुसाफिर ने धीमे स्वर में पूछा, ‘‘क्या आप को वह आदमी फिर कभी मिला?’’

डैनियल ने न में सिर हिलाया, ‘‘नहीं, मु झे उस का नाम तक नहीं पता,’’ इतना कह कर उस ने एक सफेद फूल धीरे से रेलिंग पर रख दिया.

लोग सोचते हैं कि दुनिया बड़ेबड़े भाषणों से बदलती है, लेकिन ऐसा जरूरी नहीं होता. कई बार किसी की जिंदगी सिर्फ इसलिए बच जाती है, क्योंकि किसी अजनबी ने उस के साथ एक मिनट और रुकने का फैसला किया था.

एक हफ्ते बाद डैनियल अपनी नींद में ही हमेशा के लिए इस दुनिया से चला गया. उस के अंतिम संस्कार की शाम, जब गांव वाले उस पुल पर पहुंचे, तो वे हैरान रह गए. पूरी रेलिंग सफेद फूलों से ढकी हुई थी. न कोई चिट्ठी, न कोई नाम… सिर्फ सफेद फूल.

शायद वे उन लोगों ने रखे थे, जिन की जिंदगी डैनियल ने बदल दी थी या शायद किसी अजनबी ने, जो कुछ पल के लिए उन के साथ रुका था.  Heart Touching Story in Hindi

-सतीश चामलिंग

Hindi Story : रेत, धुआं और उम्मीद

Hindi Story. विकास ने कभी नहीं सोचा था कि एक दिन उसे सबकुछ छोड़ कर भागना पड़ेगा. दुबई की चमचमाती इमारतों के बीच उस ने अपने सपनों का एक छोटा सा संसार बना लिया था. एक अच्छी नौकरी, सलीके की जिंदगी और भविष्य के सुनहरे ख्वाब… सबकुछ ठीक चल रहा था.

फिर अचानक दुनिया बदल गई. अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव ने देखते ही देखते युद्ध का रूप ले लिया. खाड़ी देशों में डर का माहौल फैल गया. कंपनियां बंद होने लगीं, फ्लाइट्स अनिश्चित हो गईं और लोगों को अपनेअपने देश लौटने की सलाह दी जाने लगी.

विकास की कंपनी ने भी एक दिन अचानक ईमेल भेज दिया, ‘औपरेशन्स अनिश्चितकाल के लिए बंद किए जा रहे हैं.’

कुछ ही दिनों में विकास ने अपना कमरा खाली किया, जरूरी सामान समेटा और एक भीड़ भरी फ्लाइट में बैठ कर भारत लौट आया.

भारत आना आसान था, लेकिन यहां टिकना मुश्किल. शुरुआत के कुछ दिन तो अपने शहर की मिट्टी ने उसे सुकून दिया. मां के हाथ का खाना, अपने कमरे की दीवारें… सबकुछ अपनापन दे रहा था, लेकिन 2 हफ्ते बीततेबीतते हकीकत सामने आने लगी.

नौकरी पाना आसान नहीं था. 2 महीने गुजर गए. बैंक बैलेंस धीरेधीरे खत्म होने लगा. दुबई में जोकुछ जमा किया था, वह अब रोजमर्रा के खर्च में पिघल रहा था. घर में किसी से कुछ कहना उसे अच्छा नहीं लगता था. विकास अब भी सुबह तैयार हो कर ऐसे निकलता जैसे किसी बड़े औफिस में जा रहा हो. असल में वह इंटरव्यू के पीछेपीछे भटक रहा था.

ए क दिन विकास एक कंपनी से बुलावा आया. इंटरव्यू दूसरे शहर में था. जेब में पैसे बहुत कम थे, लेकिन उम्मीद अभी भी बाकी थी. उस ने टिकट के लिए स्लीपर क्लास चुनी, और बाकी खर्च बचाने के लिए रात का सफर किया. सुबह जब वह स्टेशन पहुंचा, तो उस के पास बस इतने पैसे बचे थे कि वापसी का टिकट लिया जा सके या दिनभर का खर्च चलाया जा सके.

विकास ने खुद से कहा, ‘‘पहले मौका पकड़ो, फिर बाकी देखेंगे.’’

स्टेशन के बाहर विकास ने आटोरिकशा नहीं लिया. मोबाइल में मैप देखा… औफिस 3 किलोमीटर दूर था. वह पैदल ही चल पड़ा.

धूप तेज होती जा रही थी, लेकिन विकास ने अपनी चाल नहीं धीमी की. हर कदम के साथ उस के अंदर एक जिद जाग रही थी, ‘मुझे  हारना नहीं है.’

औफिस पहुंच कर विकास ने वाशरूम में खुद को ठीक किया. पसीना पोंछा, शर्ट सीधी की, बाल संवारे और चेहरे पर वही आत्मविश्वास ओढ़ लिया, जो अब उस की सब से बड़ी पूंजी था. रिसैप्शन पर बैठ कर वह इंतजार करने लगा.

भूख धीरेधीरे अपना असर दिखाने लगी थी, लेकिन विकास ने पानी पी कर खुद को संभाला. आसपास बैठे लोगों को देख कर वह अंदाजा लगाने की कोशिश कर रहा था कि कौन सच में जरूरतमंद है और कौन सिर्फ बेहतर मौके की तलाश में. फिर उसे अहसास हुआ कि शायद सब उस की ही तरह हैं, बस कोई दिखा नहीं रहा.

इंटरव्यू के दौरान विकास ने पूरी ईमानदारी और आत्मविश्वास के साथ जवाब दिए. उस ने अपने अनुभव, अपनी गलतियां और अपने संघर्ष… सबकुछ खुल कर बताया.

बाहर निकलते समय विकास को नहीं पता था कि उसे नौकरी मिलेगी या नहीं, लेकिन एक अजीब सी शांति उस के अंदर थी…

वापसी का सफर अब भी बाकी था. जेब में बचे पैसों से विकास ने सिर्फ एक कप चाय ली. भूख अब तेज हो चुकी थी, लेकिन उस ने खुद को रोका.

‘घर पहुंच कर खा लूंगा,’ यह सोच कर विकास प्लेटफार्म पर बैठ गया. उस के पास समय था और सोचने के लिए बहुतकुछ.

विकास को याद आया दुबई का वह दिन, जब वह औफिस की खिड़की से बाहर देखता हुआ भविष्य की योजनाएं बना रहा था और आज… वह उसी भविष्य के लिए संघर्ष कर रहा था.

ट्रेन आई. विकास स्लीपर कोच में चढ़ गया और अपनी सीट पर बैठ गया. रात गहराने लगी. हवा में हलकी ठंडक थी.

विकास ने आंखें बंद कीं और खुद से कहा, ‘‘जिंदगी ने मुझे पीछे जरूर धकेला है, लेकिन खत्म नहीं किया.’’

अगली सुबह जब विकास घर पहुंचा, तो थकान उस के शरीर में थी, लेकिन आंखों में एक नई चमक थी. मोबाइल औन किया तो एक ईमेल उस का इंतजार कर रहा था, ‘‘आप को अगले राउंड के लिए शौर्टलिस्ट किया गया है.’

विकास हलके से मुसकराया. संघर्ष अभी खत्म नहीं हुआ था, लेकिन रास्ता बंद भी नहीं था.

विकास जानता था… जब तक इनसान कोशिश करता रहता है, तब तक जिंदगी कहीं न कहीं उस के लिए एक दरवाजा खुला रखती है. Hindi Story

–प्रज्ञा पांडेय मनु

Motivational Story : उस का गणित

Motivational Story. मनोज हर दिन जिस मिनी बस में बैठता था, उसी जगह से लक्ष्मी भी बस में बैठती थी. आमतौर पर वे एक ही बस में बैठा करते थे, मगर कभीकभार दूसरी में भी बैठ जाते थे.

उन दिनों उन के बस स्टौप से सिविल लाइंस तक का किराया 4 रुपए लगता था, मगर लक्ष्मी कंडक्टर को 3 रुपए ही थमाती थी. इस बात को ले कर उस की रोज कंडक्टर से बहस होती थी, मगर उस ने एक रुपया कम देने का जैसे नियम बना ही लिया था.

कभीकभार कोई बदतमीज कंडक्टर मिलता, तो लक्ष्मी को बस से उतार देता था. वह पैदल आ जाती थी, पर एक रुपया नहीं देती थी.

लक्ष्मी मनोज के ही महकमे के किसी दूसरे सैक्शन में चपरासी थी. एक साल पहले ही अपने पति की जगह पर उस की नौकरी लगी थी.

लक्ष्मी का पति शंकर मनोज के महकमे में ड्राइवर था. सालभर पहले वह एक हादसे में गुजर गया था.

लक्ष्मी की उम्र महज 25 साल थी, मगर उस के 3 बच्चे थे. 2 लड़के और एक लड़की.

एक दिन मनोज पूछ ही बैठा, ‘‘लक्ष्मी, तुम रोज एक रुपए के लिए कंडक्टर से झगड़ती हो. क्या करोगी इस तरह एकएक रुपया बचा कर?’’

‘‘अपनी बेटी की शादी करूंगी.’’ ‘‘एक रुपए में शादी करोगी?’’ मनोज हैरान था.

‘‘बाबूजी, यों देखने में यह एक रुपया लगता है, मगर रोजाना आनेजाने के बचते हैं 2 रुपए. महीने के हुए 60 रुपए और सालभर के 730 रुपए.  10 साल के 7 हजार, 3 सौ. 20 साल के 14 हजार, 6 सौ.

‘‘5 सौ रुपए इकट्ठे होते ही मैं किसान विकास पत्र खरीद लेती हूं. साढ़े 8 साल बाद उस के दोगुने पैसे हो जाते हैं. 20 साल बाद शादी करूंगी, तब तक 40-50 हजार रुपए तो हो ही जाएंगे.’’

मनोज उस का गणित जान कर हैरान था. उस ने तो इस तरह कभी सोचा ही नहीं था. भले ही गलत तरीके से सही, मगर पैसा तो बच ही रहा था.

लक्ष्मी को खूबसूरत कहा जा सकता था. कई मनचले बाबू और चपरासी उसे पाने को तैयार रहते, मगर वह किसी को भाव नहीं देती थी.

लक्ष्मी का पति शराब पीने का आदी था. दिनभर नशे में रहता था. यही शराब उसे ले डूबी थी. जब वह मरा, तो घर में गरीबी का आलम था और कर्ज देने वालों की लाइन.

अगर लक्ष्मी को नौकरी नहीं मिलती, तो उस के मासूम बच्चों का भूखा मर जाना तय था.

पैसे की तंगी और जिंदगी की जद्दोजेहद ने लक्ष्मी को इतनी सी उम्र में ही कम खर्चीली और समझदार बना दिया था.

एक दिन लक्ष्मी ने न जाने कहां से सुन लिया कि 10वीं जमात पास करने के बाद वह क्लर्क बन सकती है. बस, वह पड़ गई मनोज के पीछे, ‘‘बाबूजी, मुझे कैसे भी कर के 10वीं पास करनी है. आप मुझे पढ़ालिखा कर 10वीं पास करा दो.’’

वह हर रोज शाम या सुबह होते ही मनोज के घर आ जाती और उस की पत्नी या बेटाबेटी में से जो भी मिलता, उसी से पढ़ने लग जाती. कभीकभार मनोज को भी उसे झेलना पड़ता था.

मनोज के बेटाबेटी लक्ष्मी को देखते ही इधरउधर छिप जाते, मगर वह उन्हें ढूंढ़ निकालती थी. वह 8वीं जमात तक तो पहले ही पढ़ी हुई थी, पढ़नेलिखने में भी ठीकठाक थी. लिहाजा, उस ने गिरतेपड़ते 2-3 सालों में 10वीं पास कर ही ली.

कुछ साल बाद मनोज रिटायर हो गया. तब तक लक्ष्मी को लोवर डिविजनल क्लर्क के रूप में नौकरी मिल गई थी. उस ने किसी कालोनी में खुद का मकान ले लिया था. धीरेधीरे पूरे 20 साल गुजर गए.

एक दिन लक्ष्मी अचानक मनोज के घर आ धमकी. उस ने मनोज और उस की पत्नी के पैर छुए. वह उसे पहचान ही नहीं पाया था. वह पहले से भी ज्यादा खूबसूरत हो गई थी. उस का शरीर भी भराभरा सा लगने लगा था.

लक्ष्मी ने चहकते हुए बताया, ‘‘बाबूजी, मैं ने अपनी बेटी की शादी कर दी है. दामादजी बैंक में बाबू हैं. बेटी बहुत खुश है.

‘‘मेरे बड़े बेटे राजू को सरकारी नौकरी मिल गई है. छोटा बेटा महेश अभी पढ़ रहा है. वह पढ़ने में बहुत तेज है. देरसवेर उसे भी नौकरी मिल ही जाएगी.’’

‘‘क्या तुम अब भी कंडक्टर को एक रुपया कम देती हो लक्ष्मी?’’ मनोज ने पूछा.

‘‘नहीं बाबूजी, अब पूरे पैसे देती हूं…’’ लक्ष्मी ने हंसते हुए बताया, ‘‘अब तो कंडक्टर भी बस से नहीं उतारता, बल्कि मैडम कह कर बुलाता है.’’

थोड़ी देर के बाद लक्ष्मी चली गई, मगर मनोज का मन बहुत देर तक इस हिम्मती औरत को शाबाशी देने का होता रहा. Motivational Story

Hindi Motivational Story : लत

Hindi Motivational Story. अब्बा की मौत के बाद जहूर ही अपनी अम्मां का एकलौता सहारा था, लेकिन शराब की लत ने उसे भटका दिया था. क्या जहूर इस बुरी लत से नजात पा सका?

जहूर रोज की तरह शराब पी कर घर लौटा था. उस की मां जैसे ही कमरे में आईं, शराब की बदबू महसूस करते ही चीख उठीं, ‘‘क्यों रे, तू ने आज फिर शराब पी?’’

‘‘न… नहीं तो अम्मां,’’ शराब के नशे में धुत्त जहूर बोल उठा. ‘‘तू झूठ बोल रहा है,’’ मां की आंखों में आंसू आ गए. वे बोलीं, ‘‘कुदरत ने एक बार फिर हमें अच्छे दिन दिखाए थे, पर तू ने…’’

मां की आंखों में आंसू देख कर जहूर को लगा, मानो सारा नशा ही उतर गया हो. वह चीख उठा, ‘‘हांहां अम्मां, मैं ने शराब पी है… मुझे  सजा दो अम्मां, मुझे सजा दो…’’ इतना कह कर वह सिसकने लगा.

मां उसे पलंग पर बैठा कर समझाते हुए बोलीं, ‘‘बेटा, तेरे अब्बा के गुजर जाने के बाद अब तू ही मेरा एकमात्र सहारा है. शराब की खातिर तू ने घर की एकएक चीज बेच दी है… जो बचा है, कम से कम वह तो रहने दे, वक्तजरूरत पर तेरे ही काम आएगा. मेरा क्या?है, आज हूं, कल नहीं.’’

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‘‘बसबस अम्मां, मुझे  और शर्मिंदा मत करो…’’ कहता हुआ वह आगे बोला, ‘‘मैं तो इस गंदी शराब को छोड़ना चाहता हूं, पर यह मेरा पीछा ही नहीं छोड़ती. क्या करूं, मजबूर हूं. अब शराब मेरी जरूरत बन गई है. काश, यह बुरी आदत मैं ने न डाली होती.’’

कहतेकहते जहूर पुरानी यादों में खोता चला गया कि दरदर की ठोकरें खाने के बाद कैसे वह एक अच्छी नौकरी पा गया था. बाद में उस ने खुद ही शराब की बुरी लत डाल कर अपनी जिंदगी बरबाद कर ली…

जहूर कमरुद्दीन जुलाहे का लड़का था. कमरुद्दीन का छोटामोटा घरेलू कारोबार था. इस से वह इतना पैसा कमा लेता था कि जहूर की पढ़ाई और घर का खर्च आराम से चल जाता था.

जहूर खूब मन लगा कर पढ़ाई करता. उसे पढ़ाई से जब भी फुरसत मिलती, अब्बा के काम में हाथ बंटाता.

एक बार कमरुद्दीन ऐसा बीमार पड़ा कि ठीक होने की उम्मीद ही न रही.

जहूर की पढ़ाई छूट गई. वह हर वक्त अब्बा की खिदमत में रहने लगा. पैसे न होने की वजह से उसे अपनी मां के साथ मजदूरी भी करनी पड़ती थी.

आखिर एक दिन कमरुद्दीन चल बसा. मां पर तो जैसे मुसीबत की गाज ही गिर पड़ी. घर के हालात बिगड़ते ही चले गए. पैसों की किल्लत हो गई. अब तो जहूर को कोई काम तलाशना था, जिस से वह अपना और मां का पेट भर सकता. वह काम के सिलसिले में भटकता रहा, पर कोई उम्मीद न बंधाता.

रोज शाम को वह घर लौटता, तो मां पूछतीं, ‘बेटा, कहीं कुछ बात बनी?’

इस पर जहूर का जवाब ‘नहीं’ में ही होता था.

एक दिन जहूर बहुत परेशान था. उसे अपनी जिंदगी बोझ  महसूस हो रही थी. वह सोच रहा था कि शायद अब उसे कोई काम नहीं मिलेगा. जब आंखों से आंसू बहने लगे, तो वह फुटपाथ पर बैठ गया. तभी वहां एक कार आ कर रुकी. उस में से सांवले रंग का एक आदमी उतरा और जहूर की तरफ बढ़ने लगा.

जहूर समझ  नहीं पा रहा था कि आखिर माजरा क्या है?

‘क्या नाम है तुम्हारा?’ उस आदमी ने पूछा, तो वह हड़बड़ाते हुए बोल उठा, ‘जहूर.’

‘घबराओ नहीं…’ वह आदमी शांत लहजे में बोला, ‘मुझे  बताओ, तुम्हें क्या परेशानी है?’

तब जहूर ने उसे सारी बातें सचसच बता दीं और बोला, ‘बूढ़ी मां का मैं ही सहारा हूं. मुझे अब तक कहीं कोई काम नहीं मिला…’

इस से पहले कि जहूर पूरी बात बोल पाता, वह आदमी पूछा बैठा, ‘मेरे यहां काम करोगे?’

जहूर को ऐसा लगा, मानो उस ने रुई के ढेर से सूई खोज ली हो. वह चहक उठा, ‘क्या आप मुझे  काम देंगे?’

‘हां, मेरी खुद की एक फैक्टरी है, जहां कई आदमी काम करते हैं. तुम भी वहां काम कर सकते हो.’

जहूर काम करने को फौरन तैयार हो गया. वह आदमी उसे ले कर चल पड़ा. पहली बार कार में बैठे जहूर को बड़ा अजीब लग रहा था.

‘बाबूजी, आप ने मुझे  गरीब पर इतनी मेहरबानी क्यों की?’ जहूर पूछ बैठा.

वह आदमी कुछ पलों के लिए सोच में डूब गया. उस आदमी की आंखों से आंसू टपक पड़े, फिर बोला, ‘तकरीबन 15 साल पहले मैं भी तुम्हारी ही तरह बेसहारा था.’

‘क्या कहते हैं बाबूजी?’ जहूर कहते हुए चौंक उठा.

‘हां, यह सच है. जब मैं 18 साल का था, तो मेरे वालिद साहब गुजर गए थे. मैं बेसहारा हो गया था… कुछ करताधरता भी नहीं था. कुछ ही दिनों बाद अम्मी भी चल बसीं. मैं दरदर भटकने लगा.

‘भूख के लिए क्याक्या करना पड़ता है, मैं ने पहली बार जाना था. मैं बहुत परेशान हुआ, पर कहीं काम न मिल सका. जहां जाता, दुत्कारा जाता.

‘कभीकभी भिखारियों को देखता, तो सोचता, मुझ  से ज्यादा मजे में तो यही हैं. आखिर भीख मांग कर शाम को दालरोटी का जुगाड़ तो बना लेते हैं.

‘इतना सब होने पर भी मैं ने कभी हाथ फैला कर भीख नहीं मांगी और न ही हालात के आगे घुटने टेके.

‘मैं ने सोचा कि कुदरत ने 2 हाथ और 2 पैर दिए हैं, सोचने के लिए दिमाग और रहने के लिए इतनी बड़ी जमीन दी है…कुछ न कुछ तो कर ही लूंगा.

‘मैं ने मेहनतमजदूरी कर के कुछ पैसे इकट्ठे किए, फिर उन्हीं से फल और सब्जियां खरीद कर बेचने लगा. मुझे  अच्छा फायदा हुआ और धीरेधीरे मैं तरक्की करता गया…

‘इसीलिए जब भी मैं किसी बेसहारा या लाचार को देखता हूं, तो मुझे  अपने पुराने दिन याद आ जाते हैं. फिर सोचता हूं कि यह बेसहारा इनसान उतना ही काम कर सकता है, जितना कि और सब. जरूरत है उसे सहारा देने की…’

अब तक कार फैक्टरी तक पहुंच चुकी थी. मालिक ने जहूर को काम समझा या और घर चला गया.

जहूर की जिंदगी का वह सब से हसीन दिन था. वह इतना खुश था कि मत पूछो. उस की मां भी बहुत खुश थीं.

जहूर लगन व मेहनत के बल पर तरक्की करता गया, मगर कुछ ही समय में चंद ऐसे लोग उस के दोस्त बन गए, जो शराबी थे. उन्होंने दोस्ती के नाम पर शराब पिलाई, तो मारे खुशी के वह पीता ही गया. धीरेधीरे शराब उस की आदत बन गई.

जहूर अच्छा पैसा कमाने लगा था, पर जब से उसे शराब की बुरी लत लगी थी, सारी कमाई इसी में उड़ने लगी थी. अब तो यह नौबत आ गई थी कि उस ने घर के बरतन तक बेच डाले थे…

अचानक सोच में डूबा जहूर जैसे जाग उठा, ‘‘नहीं अम्मां, अब मैं कभी शराब को हाथ नहीं लगाऊंगा. अब मैं कुछ बन कर दिखाऊंगा. मैं मेहनत करूंगा, खुशियां फिर से लौटेंगी. ‘‘शुक्र है, मैं वक्त पर संभल गया, वरना यह शराब मेरा सबकुछ तबाह कर देती.’’

जहूर के मुंह से ऐसी बातें सुन कर मां खुशी से रो पड़ीं. उन्होंने प्यार से उस के सिर पर हाथ फेरा और गले से लगा लिया.

–मोहम्मद साजिद खान

Social Story : तीसरा

Social Story. गांव के लोग नए कलक्टर से गांव के बांध का उद्घाटन कराना चाहते थे, पर कलक्टर ने उन्हें कोई भाव नहीं दिया. इस से गांव वाले हैरान थे. पर जब उन्हें नए कलक्टर के बारे में पता चला, तो उन की आंखें फटी की फटी रह गईं. क्या था कलक्टर की जिंदगी का राज?

कुरुक्षेत्र शहर से तकरीबन 20 किलोमीटर दूर पिहोवा रोड पर गांव मुर्तजापुर गांव में बहुत बड़ा बांध बनाया गया. वहां बहती नदी पर खूबसूरत और चौड़ा पुल बनाया गया जिस से कि गांव के अंदर से आने और बाहर से निकलने वाले ट्रैफिक की वजह से ज्यादा परेशानी न हो.

अब बाहर से जाने वाला ट्रैफिक पुल से निकल जाएगा और गांव में गाडि़यों की भीड़ भी जमा नहीं होगी. साथ ही, बांध बनाने से किसानों को बारिश में फसल खराब होने का खतरा भी नहीं और सूखा पड़ने पर पानी का भी इंतजाम हो गया.

गांव वाले आज खुशी से फूले नहीं समा रहे. गांव की तो मानो काया ही पलट गई. सब आपस में बातें कर रहे थे कि नए कलक्टर ने तो गांव की सूरत ही बदल डाली. पंचायत ने गुजारिश की कि इस पुल और बांध का उद्घाटन भी कलक्टर के हाथों कराया जाए.

आखिर वह दिन भी आ गया. कलक्टर साहब आए और सीधे रैस्टहाउस में चले गए. सभी गांव वाले उन का धन्यवाद करना चाहते थे लेकिन कलक्टर साहब ने किसी से मिलना तो दूर अपनी शक्ल तक न दिखाई.

आखिर 2 दिन बाद उद्घाटन की पूरी तैयारी हो गई. कलक्टर साहब को न्योता भेजा गया कि उद्घाटन उन्हीं के शुभ हाथों से होगा. सरपंच खुद कलक्टर साहब से मिलने गए, तो बाहर ही उन का पीए मिल गया, ‘‘भाई, ये आप के सरजी का पूरा नाम क्या है, क्योंकि बाहर तो केवल एससी लिखा है? आप पूरा नाम बता दो ताकि इस निमंत्रण पर उन का पूरा नाम लिख दें.’’

‘‘सरपंचजी, पूरा नाम तो मैं भी नहीं जानता, मुझे भी केवल एससी ही पता है. आप एससी ही लिख दीजिए और यह निमंत्रण पत्र मुझे दे दीजिए, मैं उन्हें दे दूंगा. कलक्टर साहब आराम कर रहे हैं. इस समय उन से कोई नहीं मिल सकता.’’ ‘‘अगर कलक्टर साहब अभी आराम फरमा रहे हैं, तो हम बाद में आ जाएंगे. हम चाहते हैं कि हम गांव के कुछ लोग खुद उन्हें न्योता दें.’’ ‘‘देखिए सरपंचजी, कलक्टर साहब आज बहुत बिजी रहेंगे, इसलिए आज मिलना मुमकिन न होगा. आप फिक्र मत कीजिए, मैं आप लोगों का संदेश उन्हें दे दूंगा. वैसे भी कल आप सब ही मिल लीजिएगा उन्हें,’’ कहते हुए पीए ने टाल दिया.

अगले दिन उद्घाटन वाली जगह पर पूरा गांव खुशी से झूमता हुआ जमा था. कलक्टर साहब काली पैंट, सफेद दूधिया सी शर्ट पर डार्क रौयल ब्लू रंग का कोट पहने, सिर पर घुंघराले मैगी जैसे बाल, आंखों पर धूप का काला चश्मा, चेहरे पर मास्क लगाया हुआ, रोबीली चाल से चलते हुए आए और गांव के कुछ खास लोग उन्हें फूलमाला पहनाने लगे, लेकिन कलक्टर साहब ने हाथ के इशारे से उन्हें रोक दिया.

रिबन काट कर उद्घाटन किया गया. उस के बाद सरपंच ने कलक्टर साहब को फूलमाला पहनाने की कोशिश की, कलक्टर साहब ने हाथ रोक दिया और नत्थूलाल को स्टेज पर बुला कर कहा कि यह सम्मान उन्हें दिया जाए. ‘‘कलक्टर साहब, यह सम्मान आप के लिए है. आप ने नत्थूलाल भाई को क्यों बुलाया? मैं इस का कुछ मतलब नहीं समझा ?’’ सरपंच ने हैरानी से पूछा. नत्थूलाल चुपचाप खड़ा यह सब देख रहा था.

तब कलक्टर साहब ने अपने चेहरे से चश्मा तथा मास्क हटाया और पूरे गांव वालों के सामने जोर की आवाज में बोले, ‘‘गांव वालो, जरा गौर से देखो मुझे. क्या आप में से कोई जानता है मुझे? कोई पहचानता है मुझे? क्योंकि मैं इसी गांव की पैदाइश हूं. इस सम्मान पर मेरा हक नहीं (नत्थूलाल की तरफ इशारा कर के), बल्कि इन का हक है, इसलिए यह सम्मान इन्हें दिया जाए.’’

सभी हैरान हो कर यह सब सुन और देख रहे थे, लेकिन किसी की समझा में कुछ नहीं आ रहा था. हां, तभी बचनी दौड़ीदौड़ी स्टेज की तरफ आई और कलक्टर साहब को गले से लगा लिया. उस की आंखें आंसुओं का साथ ही नहीं छोड़ रही थीं. सरपंच हैरान से खड़े यह सब देख रहे थे. कुछ न सम?ा पाने पर वे बोले, ‘‘कलक्टर साहब….आप इस गांव की पैदाइश हैं… कौन? हैं आप और बचनी भाभी और नत्थूलाल को कैसे जानते हैं आप?’’

फिर नत्थूलाल और बचनी की तरफ मुखातिब होते हुए सरपंच बोले, ‘‘क्या आप पहचानते हैं कलक्टर साहब को?’’ लेकिन वे दोनों चुप रहे. कलक्टर साहब ने बोलना शुरू किया, ‘‘काकी, दाई अम्मां, रानी चाची, बिमला मौसी…’’ इस तरह कई नाम लिए. सब अपनाअपना नाम सुन कर हैरानी से देखने लगे कि कौन हैं ये.

‘‘क्या अभी भी आप लोगों ने नहीं पहचाना मुझे? दाई अम्मां, आप तो नहीं भूल सकती मुझे. याद करो वह दिन जब मेरा जन्म हुआ था.मुझे देखते ही मेरी नाल तक नहीं काटी थी आप ने. ‘मेरी मां खून से लथपथ पड़ी थीं और मैं नाल से मां के साथ बंधी वहीं गंदगी में पड़ी रो रही थी. मुझे साफ कर के गोद में लेना तो दूर रहा, बल्कि हाथों में से ऐसे पटका जैसे हाथों पर बिच्छू हो, जिस ने काट खाया हो.

‘‘हां… मैं वही हूं, वही तीसरा. आप तो जानते हो न तीसरा कौन? मैं वही तीसरा एससी मतलब सुशीला चौधरी. नत्थूलाल के बेटे मन्नु की औलाद, जिसे आप लोगों ने तीसरा कह कर कहीं फेंक आने के लिए मेरे दादादादी को कहा था, पर जब वे नहीं माने तो गांव वालों ने क्याक्या नहीं उन्हें कहा, कैसीकैसी धमकियां उन्हें दी गईं.

‘‘क्या कुछ नहीं मेरे मातापिता और दादादादी को सहन करना पड़ा मेरी वजह से, लेकिन इन्होंने हार नहीं मानी. न केवलमुझे दूसरे भाईबहनों की तरह पाला बल्कि उन से ज्यादा प्यार दिया और मेरे भाईबहनों ने कभी मुझे अहसास नहीं होने दिया कि मैं उन के जैसी या जैसा नहीं, बल्कि तीसरा जैंडर हूं. उन्होंने हमेशा मुझे अपने जैसा ही समझा. हमेशा मुझे बड़ी बहन का ओहदा दिया.

‘‘आज मैं जोकुछ भी हूं, इस परिवार की वजह से हूं वरना न जाने मेरा भविष्य क्या होता. अब तक मन्नु और मुनिया और उन के चारों बच्चे भी स्टेज तक आ चुके थे. बचनी ने जोर दे कर कहा, ‘‘तू कोई तीसरावीसरा नहीं है, तू मेरी बच्ची है मेरी. मेरी सब से बड़ी और सब से लाड़ली पोती है तू.’’ आंखों में आंसू लिए बचनी ने नत्थूलाल से पूछा, ‘‘आप ने मुझे बताया क्यों नहीं?’’

‘‘लेकिन फिर भी तुम ने बिना बताए जान लिया… वह कैसे?’’ ‘‘मां का दिल है न. 2 दिन से बहुत बेचैनी हो रही थी. आप से कहा भी कि मेरी बात करा दो लेकिन आप टालते रहे और मैं अंदर ही अंदर परेशान होती रही.’’

‘‘मैं समझ रहा था तेरी परेशानी, मगर मैं तुम सब के चेहरों पर यह रौनक देखना चाहता था, इसलिए मैं ने किसी को कुछ नहीं बताया. मैं ने ही सुशीला से गांव की परेशानियों का जिक्र किया था.और सुशीला ने गांव की परेशानियों का हल निकाल कर खुद भी यहां हमारे साथ रहने के लिए अपनी पोस्टिंग कुछ समय के लिए यहां करा ली.’’

सब गांव वालों को अपनी वे बातें याद आने लगीं कि कैसे उन्होंने इस बच्ची को दुत्कारा था, किस तरह से उस के मातापिता और दादादादी को इसे गांव से निकालने के लिए कहा करते थे. दाई को भी याद आ गया वह दिन जब इस बच्ची का जन्म हुआ था.

दरअसल, यह बात है आज से 26-27 साल पहले की, जब कुरुक्षेत्र से तकरीबन 20 किलोमीटर पिहोवा रोड पर मुर्तजापुर गांव के एक किसान परिवार नत्थूलाल के बेटे मन्नु की शादी गांव के ही आसाराम की बेटी मुनिया से हुई. शादी के तकरीबन एक महीने बाद ही मुनिया के पांव भारी हो गए. घर में सब परिवार, जो कि लेदे कर मातापिता, मन्नु, मुनिया और मन्नु की छोटी बहन गुडि़या, बहुत ही खुश थे? घर में नया मेहमान जो आने वाला था.

मुनिया की खूब सेवा होती, खूब लाड़ लड़ाए जाते, खूब खयाल रखा जाता. सभी बेसब्री से आने वाले मेहमान का इंतजार कर रहे थे, लेकिन एक दिन जब मुनिया को दर्द शुरू हो गया तो मुनिया की सास बचनी देवी ने झट से मुनिया को गरम दूध में कैस्ट्रौल डाल कर पिलाया और उसे ऊपर छत पर 4-5 चक्कर काटने को कहा. 2-4 घंटे के भीतर ही दर्द बढ़ गया और मुनिया को एक छोटे से अलग कमरे में लिटा दिया गया और सास दौड़ कर दाई को बुला लाई.

शाम को अंधियारा छाने लगा था कि बच्चे के रोने की आवाज आई. कमरे के बाहर खड़े सब लोग खुशी से उछल पड़े. सब एकदूसरे को बधाई देते हुए गले लगाने लगे. अब उत्सुकता यह थी कि हुआ क्या है बेटा या बेटी? सब लोग टकटकी लगा कर दरवाजे की ओर देख रहे थे कि इतने में मुंह लटकाए हुए दाई बाहर आई.

नत्थूलाल ने पूछा, ‘‘अरे भाभी, लाओ… बच्चा सब से पहले मेरी गोद में देना.’’ बचनी बोली, ‘‘न जी न, पहला हक तो दादी का है,’’ कहते हुए जैसे ही वह दाई से बच्चा लेने को पलटी, लेकिन दाई के खाली हाथ देख कर एक पल के लिए सहम गई, ‘‘भाभी, बच्चा कहां है? बच्चा लाओ और अपना नेग लो.’’

दाई को खामोश देख कर नत्थूलाल भी बोला, ‘‘हांहां भाभी, आज तो मुंहमांगा नेग मिलेगा, लेकिन लाओ पहले हमारे कुलदीपक के दर्शन तो कराओ.’’ ‘‘काहे का कुलदीपक… मैं तो उसे अंदर ही पटक आई,’’ कहते हुए दाई ने मुंह बना लिया.

दाई की बात सुन कर नत्थूलाल को गुस्सा आ गया और वह बोला, ‘‘अंदर पटक आई का क्या मतलब हुआ भाभी, लड़का हो या लड़की हमारे लिए तो कुलदीपक ही है. आज के समय में लड़के और लड़की में कोई फर्क नहीं. जैसे लड़का कुल का दीपक है तो लड़की भी तो कुल की ज्योति है न, तो हुए न दोनों कुलदीपक.

‘‘हमारी बहू का पहला बच्चा, जो भी है हमारा खून है. लाओ, हमारी गुडि़या या हमारा गुड्डू जो भी है ला कर हमारी झोली में दे दो और हमारे कलेजे को ठंडक पहुंचाओ.’’ ‘‘काहे का लड़का और काहे की लड़की भाई, वह तो तीसरा है तीसरा. मैं तो चली. बचनी, तू ही संभाल अपनी बहू को और बच्चे को फेंक आ कहीं जा के,’’ कहते हुए दाई घर से बाहर जाने के लिए कदम उठाने लगी.

‘‘तीसरा… बच्चे को फेंक आई… भाभी, क्या कह रही हो तुम, हमें कुछ समझा नहीं आ रहा,’’ नत्थूलाल बोला. ‘‘अरे भाई, तीसरा नहीं समझाते हो? वही…..जिस को सब नीची नजर से देखते हैं.’’

बचनी दौड़ती हुई अंदर गई. देखा तो मुनिया खून से लथपथ बेहोश पड़ी थी. बच्चा जारजार रोए जा रहा था, क्योंकि बच्चे के पैदा होते ही दाई उसे मुनिया की टांगों के बीच में लिटा कर सफाई किए बिना और बच्चे की नाल काटे बिना ही जाने की जो ठान ली थी.

बचनी ने अंदर का हाल देखा तो दौड़ी आई और दाई का हाथ पकड़ कर बोली, ‘‘भाभी, इस में बहू और बच्चे का क्या दोष? आप चल कर नाल काट कर बहू और बच्चे को संभालो. ऐसा न हो कोई अधर्म हो जाए हमारे हाथों से…’’ कहते हुए बचनी दाई के हाथपैर जोड़ने लगी.

अब तक नत्थूलाल भी समझ चुका था कि क्या हुआ है. उस ने झट से जेब से बिना देखे, बिना गिने मुठ्ठी भर कर रुपए निकाले और दाईं को देते हुए बोले, ‘‘भाभी, मेरी बहू और बच्चे को कुछ न होने देना.’’

नोटों से भरी मुठ्ठी देख दाई के मुंह में पानी आ गया. वह बोली, ‘‘भाई, बहू से तो मेरी को दुश्मनी न है, पर यह बच्चा कहीं भी जा के फेंक आ, नहीं तो यह गांव तुझे जीने नहीं देगा,’’ कहते हुए कमरे में जा कर बच्चे की नाल काट कर मुनिया के बदन की सफाई कर के ठीकठाक किया. लेकिन बच्चे को फिर हाथ तक न लगाया. उसे बचनी ने खुद से साफ कर के कपड़े में लपेटा.

जब दाई जाने लगी तो नत्थूलाल ने एक मुट्ठी नोटों की और थमा दी और बोला, ‘‘भाभी, किसी से कोई जिक्र न करना, आप को हमारी लाज का वास्ता. अभी हम सोचते हैं कुछ कि बच्चे का क्या करना है.’’

इतनी बात बचनी के कानों में पड़ी तो वह कमरे से बाहर आ गई. उस की गोद में बच्चा था. वह बोली, ‘‘क्यों जी, क्यों न जिक्र करें? जो भी कुदरत ने दिया इसे अस्वीकार कर दें क्या? यह भी इनसान ही है. हमारी बहू ने इनसान का बच्चा जना है, जानवर का नहीं, जो हम छिपाते फिरें,’’ कहते हुए उस ने बच्चे को सीने से लगा लिया.

नत्थूलाल भी सोचने पर मजबूर हो गया, ‘‘बचनी, कह तो तुम सही रही हो. इस में बहू और बच्चे का क्या कुसूर है,’’ और दाईं से बोला, ‘‘भाभी, मु?ो किसी की कोई चिंता नहीं. गांव वाले जब जो कहेंगे तब हम देख लेंगे.’’

अब तक मन्नु शांत खड़ा अचरज से यह सब देखसुन रहा था. मां ने उस की ?ाली में बच्चे को डालते हुए कहा, ‘‘मन्नु, इस तरह चुप क्यों है? देख अगर तू ही इसे नहीं स्वीकारेगा, तो दुनिया तो तेरे से पहले ही इसे दुत्कारेगी, इसलिए हम से पहले तु?ो इस सच को स्वीकारना होगा. ले… ले अपने बच्चे को गोद में ले कर प्यार कर.’’

मां की बात सुन कर मन्नु में भी जोश भर गया. उस ने बच्चे को गोद में ले कर प्यार किया और सीने से लगा लिया. पैसे के लालच में दाई ने अपना सारा काम तो कर दिया, मगर कहीं न कहीं उस के दिल में डर था कि इस बच्चे का ये क्या करेंगे? क्या इसे अपनाएंगे या कहीं किसी को दे आएंगे या यों ही फेंक देंगे?

खैर, दाई अपना कम निबटा कर, अपनी मेहनत से भी ज्यादा पैसे ले कर खुशी से अपने घर चली गई. अब उसे नत्थूलाल ने कहा था कि किसी से कुछ न कहे, मगर एक दिन दाई के मुंह से बात निकली और एक से दूसरे और दूसरे से तीसरे के कान तक जा पहुंची.

पूरे गांव को खबर हो गई कि नत्थूलाल के बेटे मन्नु की बीवी मुनिया ने तीसरे को जन्म दिया. आसपड़ोस की औरतें पहुंच गई नत्थूलाल के घर इस बात को पुख्ता करने. उन में से एक काकी आते ही लगीं आवाज लगाने, ‘‘बचनी, अरी ओ बचनी.’’ ‘‘आओ काकी, आओ. बड़े दिनों बाद आई हो. आओ बैठो. मैं जरा बच्चे को उस की मां को पकड़ा कर आती हूं,’’ बचनी जानती थी कि इन सब को पता चल चुका है कि मुनिया का बच्चा हो गया है, तो फिर छिपाए क्यों?

‘‘न बचनी न, बैठने का समय कहां है री. पहले तो यह बता… मैं क्या सुन के आई हूं… तेरी कुलछनी बहू ने क्या जन दिया…’’ ‘‘काकी, बुरा मत मानो. मेरी सुलछनी बहू के बारे में कुछ मत कहो और रही बच्चे की बात तो जो कुदरत ने दिया वह सिरमाथे पर. अब भला इस में बहू या बच्चे का क्या दोष?’’

बचनी की बात सुन कर काकी और दूसरी औरतें चुप हो गईं, लेकिन जातेजाते काकी एक बात बचनी के कानों में डाल गईं, ‘‘देख बचनी, यह तो सही है कि जो दिया कुदरत ने दिया इस में बहू का क्या दोष, लेकिन कुदरत के किए को हम संभाल तो सकते हैं न, इस बच्चे को कहीं छोड़ आओ या इन्हीं की बिरादरी में दे दो वरना ऐसा न हो कल को गांव में तुम लोगों का हुक्कापानी ही बंद हो जाए.’’

काकी की इस तरह की सीधीसीधी धमकी से एक पल के लिए तो बचनी के प्राण कंठ में आ गए, लेकिन दूसरे ही पल हिम्मत कर के वह बोली, ‘‘काकी, कल किस ने देखा है, जो होगा देखा जाएगा.’’ इसके बाद जैसे ही नत्थूलाल और मन्नु अपने काम से घर आए तो बचनी ने सारी बात कह सुनाई.

नत्थूलाल बोला, ‘‘बचनी, तू चिंता मत कर. देखना इस बच्चे को मैं क्या से क्या बनाऊंगा. गांव वाले जो कहते हैं, करते हैं उन्हें उन का काम करने दो और हमें हमारा.’’

वह बच्चा उस परिवार में पलने लगा. उस का नाम सुशीला रखा गया. सुशीला के बाद उस के 2 भाई और 2 बहनें और हुईं. सब को पढ़ायालिखाया गया. पहले तो सुशीला को स्कूल में एडमिशन देने से मना किया गया, लेकिन नत्थूलाल और मन्नु ने भागदौड़ कर के सरकारी कागज बनवाए, जिस में साफसाफ परमिशन दी गई थी कि तीसरे जैंडर के बच्चे भी आम बच्चों के साथ पढ़ सकते हैं.

सुशीला भी अब आम बच्चों के साथ पढ़ रही थी. 10वीं के बाद जिस तरह से बाकी बच्चों को बड़े स्कूल और फिर कालेज भेजा गया, तब सुशीला को उन से अलग कर दिया गया. उसे कहां और क्यों भेजा गया, यह नत्थूलाल के सिवा कोई नहीं जानता था. आज वही बच्ची एक कलक्टर बन कर जिस गांव में जिल्लत सही, उसी गांव की भलाई के लिए दिनरात कोशिश कर रही है.

यह सब सुन कर गांव वाले जो शर्म से आंखें नीची किए खड़े थे, एकजुट हो गए. एक बुजुर्ग बोले, ‘‘सुशीला बेटी, हमें माफ कर दो. हम ने खुद को बड़ा बना कर कुदरत की रचना में भी नुक्स निकालना चाहा. अनजाने में हम से बहुत बड़ी गलती हो गई.

‘‘अब तुम थोड़े समय के लिए नहीं, बल्कि हमेशा के लिए यहीं रहोगी. इसी गांव में और हमें अपने किए का पछतावा करने का मौका दोगी.’’

हिजड़ा कहो या किन्नर या फिर तीसरा जैंडर, देखने में बिलकुल साधारण इनसान जैसे होते हैं. वे भी एक आम इनसान की तरह जीना चाहते हैं, मगर समाज उन्हें बारबार तीसरा जैंडर या अलग तरह के होने का एहसास दिलाता है, उन्हें अपने से अलगथलग रख कर भेदभाव करता है. पर कुदरत के दिए गए तोहफे से भेदभाव कैसा?

लेखक : प्रेम बजाज

Hindi Kahani: ईयरफोन

Hindi Kahani: 20 साल के मजदूर रघु पर ईयरफोन का ऐसा जुनून चढ़ा कि वह हर वक्त उन्हें कान में ठूंसे रहता. बंशी चाचा ने इस के खतरे बताए, पर वह अनजान बना रहा. एक दिन गांव जाते समय रघु हाईवे पर ईयरफोन पर गाने सुन रहा था कि तभी… वे सभी बिल्डिंग कंस्ट्रक्शन के काम में लगे थे. सुबहसुबह अपने गांव से निकल कर फतुहा से पटना जाने वाली ट्रेन से वे रोजाना वहां पहुंच जाते थे. जैसी कि उम्मीद थी, पूजा के पहले ही बिल्डिंग कंस्ट्रक्शन का यह काम पूरा हो जाना था. ऐसे में उन्हें अपने गांवघर में छुट्टी काटने की उम्मीद थी. मगर कुछ वजह से ऐसा मुमकिन नहीं हो सका था.

रघु के बाबा कहा करते थे, ‘राजा का भी महल तय समय में पूरा नहीं होता…’ तो फिर इस बिल्डिंग का काम कैसे पूरा होता. जो भी हो, मालिक ने कह रखा था कि वह छुट्टियों में काम बंद रखेगा और उन्हें पूरे पैसे देगा. इस बात से वे सभी खुश थे. बीसेक साल के रघु को दूसरे तमाम नौजवानों के समान ही मोबाइल फोन में दिलचस्पी थी. फिर हालात कुछ ऐसे बने कि उसे पढ़ाईलिखाई छोड़ कर काम में लगना पड़ा.
पिछली बाढ़ में रघु के गांवघर की फसल मारी गई थी. ऐसे में कहीं न कहीं काम तो करना ही था. सो, वह भी दिहाड़ी मजदूरी में लग गया था. वही क्यों, उस के गांव के दर्जनों लोग दिहाड़ी मजदूर के रूप में पटना में काम पर जाया करते थे. महीने में दसेक दिन भी काम मिल गया, तो महीनेभर का खर्च निकल आता था.
और यहां तो जब बिल्डिंग कंस्ट्रक्शन में काम मिला, तो जैसे सब की खुशी का ठिकाना नहीं रहा था. अब आराम से महीनेभर काम मिलेगा, तो अच्छे पैसे भी बनेंगे.

और जब घर में पैसे हों, तो अगली वासंती फसल के लिए बीजखाद और पटवन का भी इंतजाम हो जाएगा. तीजत्योहार भी अच्छे से मनाया जा सकेगा. एक बात तो तय है कि आजकल सभी नौजवानों के पास अपना एंड्रौइड मोबाइल फोन है, जिस से सभी का मनोरंजन होता है. बूढ़े तो अभी भी बस कीपैड वाले पुराने फोन का इस्तेमाल करते हैं, क्योंकि उन्हें एंड्रौइड  मोबाइल चलाना नहीं आता. लेकिन गरीब हैं, तो क्या हुआ. दीनदुनिया की खबर तो यूट्यूब, फेसबुक, व्हाट्सऐप से ही पता चल पाती है न. इस के अलावा भी इस में कितना सारा कुछ है देखनेसुनने के लिए. कितने सारे फीचर हैं इस में और यहां कोई नौजवान पीछे नहीं रहना चाहता. सभी के अपने दोस्त हैं, गर्लफ्रैंड हैं, तो उन से भी तो बात करनी है. उन पर रोबदाब कायम करना है. इस के लिए मोबाइल फोन से सही और क्या हो सकता है. लेकिन दिक्कत यह है कि हर महीने इसे चार्ज भी तो कराना पड़ता है, जिस में अच्छे पैसे लग जाते हैं, इसलिए तो कहीं कामधंधा करना जरूरी है.

कुछ दिन पहले की बात है कि बिल्डिंग कंस्ट्रक्शन की साइट पर मालिक का बेटा संतोष आया था. रघु सिर पर ईंट लिए चार मंजिले पर चढ़ रहा था. संतोष मजदूरों को कभी कुछ निर्देश देता, तो अपने कान से ईयरफोन निकाल कर उन्हें कुछ कहता. फिर अपने कान में ईयरफोन तुरंत लगा लेता था. उन लोगों को भी उत्सुकता होती कि आखिर कान में लगा ईयरफोन है कैसा. संतोष रघु का ही हमउम्र होगा. उस की बात पर संतोष ने हंसते हुए बताया, ‘‘अरे, यह मोबाइल फोन के साथ जरूरी है. सारा कुछ साफसाफ सुनाई देता है.’’ ‘‘लेकिन यह तो बहुत महंगा मिलता होगा न?’’ इस बार रामू ने उत्सुकता दिखाई, तो वह बोला, ‘‘हां, यह ईयरफोन ब्रांडेड कंपनी का है, तो महंगा तो है ही. लेकिन इलैक्ट्रौनिक मार्केट में लोकल ईयरफोन सस्ते में मिल जाता है.’’

‘‘सस्ता कितने तक का होता होगा?’’ रघु ने पूछा, तो संतोष बोला, ‘‘50 रुपए में मिल जाता होगा.’’
उस दिन मौका निकाल कर रघु काम के बीच ही में इलैक्ट्रौनिक मार्केट चला गया था और वहां से ईयरफोन खरीद लाया था. अब रघु को जब भी समय मिलता, वह मोबाइल चला कर कान में ईयरफोन खोंस लेता था. दूसरे लोगों ने भी देखादेखी ईयरफोन खरीद लिए थे, मगर रघु की बात ही निराली थी. वह एक तरह से मोबाइल एडिक्टेड सा था, इसलिए उसे अकसर ही डांट खानी पड़ती थी कि ईयरफोन के चलते वह किसी की नहीं सुनता. बंशी चाचा अकसर ही रघु को डांटते, ‘‘अरे, तुम हमेशा कान में यह कनठेपी क्यों घुसाए रहता है? किसी की तुम बात तक नहीं सुनते. ऐसे तो चल चुका तुम्हारा काम. कहीं मालिक ने देख लिया, तो तुम्हें काम से निकाल बाहर करेगा.’’

रघु को भी महसूस होता था कि इस ईयरफोन के वजह से किसी को सुनना मुश्किल होता है. ‘‘जब मालिक का बेटा ही कान में ईयरफोन लगाए इधरउधर घूमता हो, तो गलत तो नहीं ही होना चाहिए,’’ रघु बंशी चाचा की बात को हंसी में उड़ा देता था, ‘‘बुढ़ा गए हैं, तो बोलेंगे ही. उन्हें क्या पता कि हम जेनजी पीढ़ी वाले लोग हैं. पैसे नहीं हैं, तो क्या हुआ, जीना छोड़ दें? थोड़ी मस्ती भी नहीं करें क्या?’’ यह जेनजी शब्द रघु की डिक्शनरी में नयानया शामिल हुआ था, जिस का मतलब यह कि हम नई पीढ़ी और सोच के लोग हैं. ऐसे में उन्हें कुछ अलग करने और सोचने का हक है.
अब इत्तिफाक की बात है कि बिल्डिंग कंस्ट्रक्शन साइट पर एक कच्चा चहबच्चा था. वहीं मालिक का बेटा ईयरफोन लगाए घूम रहा था. वहां एक जगह गीली, कच्ची मिट्टी थी.
बंशी चाचा चिल्लाते रह गए, ‘‘अरे सुभाष बाबू, जरा संभल कर. वहां फिसले, तो गहरे पानी में गिरोगे.’’
मगर सुभाष सुन नहीं पाया था और वही हुआ, जो नहीं होना चाहिए था. वह फिसल कर उस गहरे गड्ढे में जा गिरा था. गनीमत थी कि वहां लोग मौजूद थे और उसे बाहर निकाल लिया गया. मगर उसे चोटखरोंच तो आई ही थी.

तभी रामू को महसूस हुआ था कि यह ईयरफोन लगाना भी खतरनाक हो सकता है.  शाम में तय समय पर उन्हें छुट्टी मिली, तो सभी को चैन आया. अब पूरे एक हफ्ते की छुट्टी है. अब पूजा के बाद ही तो काम शुरू होगा. पैसे भी मिल गए थे, तो सब में एक जोश भी था. पटना से फतुहा वे ट्रेन से आ गए थे और हाईवे के किनारे अपने गांव जा रहे थे. जब 50 मील दूर पटना से फतुहा मुफ्त में ट्रेन से आ गए, तो एकाध मील के लिए आटोरिकशा क्या पकड़ना. यह तो रोजरोज की बात है.
तीजत्योहार के दिन हों, तो मन आकाश में उड़ता रहता है. तब और, जब पास में पूरे पैसे हों. आखिर वे घर से बाहर शहरों में इसी दिन के लिए तो धक्के खाते फिरते हैं और कमाई की जुगत भिड़ाते रहते हैं. रामू यही सबकुछ सोचता, मस्ती में अपने ग्रुप के साथ आगे बढ़ता जा रहा था. तभी रघु बोला, ‘‘क्या रामू भाई, जरा यह गाना यूट्यूब पर सुनिए. मजा आ जाएगा.’’ ‘‘अब घर जा ही रहे हैं, तो वहीं आराम से सुनेंगे. यहां इस हाईवे पर गाडि़यों की तेज रफ्तार और शोर के बीच कोई कुछ क्या सुनेगा…’’

‘‘अरे, शोर को मारिए गोली. कान में ईयरफोन लगाइए और सुनिए. इस ईयरफोन को लगा कर बाहर का कुछ सुनाई कहां देता है. आखिर इसी दिन के लिए न ईयरफोन खरीदे हैं.’’ ‘‘उस दिन काम की साइट पर देखे थे न कि मालिक का बेटा पानी भरे चहबच्चे में कैसे जा गिरा था,’’ रामू ने रघु को सम?ाना चाहा, ‘‘खतरा उठाने की क्या जरूरत है? आराम से घर जा कर सुनना.’’ इस पर रघु ठठा कर हंस दिया था.
‘‘जब देखो, तब कान में कनठेपी लगाए घूमता रहता है…’’ रामू के कान में बंशी चाचा के कहे शब्द गूंज रहे थे,
‘‘
देख लेना, अभी तो कुछ सुन नहीं रहा. कल को किसी भारी एक्सीडैंट के चपेट में आएगा, तो पता चलेगा.’’
‘‘इस ईयरफोन से आवाज कितनी बढि़या आती है… जैसे स्टेज के सामने खड़े हो कर सुन रहे हों. सिर्फ 50 रुपए में मिल गया. इतना सस्ता में कहां
मिलता है…’’
‘‘लेकिन इस तरह हाईवे पर ईयरफोन लगा कर चलने में कितना खतरा है…’’ रामू बोला.
‘‘अरे, हम सड़क के बीच में नहीं, सड़क किनारे चल रहे हैं…’’ रघु ने कहा.

हाईवे के दोनों तरफ भारी गाडि़यां तेजी से दौड़ रही थीं. अचानक सड़क पर होड़ लगा कर दौड़ते ट्रकों को ओवरटेक करती एक पिकअप वैन को अपनी तरफ आता देख कर रामू चिल्लाया और भागा, ‘‘बचो रघु, यह हमारी तरफ ही आ रही है.’’
रघु के साथ 2 साथी और थे, जिन्होंने कान में ईयरफोन लगा रखा था, इसलिए उन लोगों ने भी कुछ नहीं सुना, जबकि चाचा बंशी, चाचा सोनू और भैया भानु ने उस की आवाज सुन ली थी. वे चारों हाईवे की ढलान पर भागे. तब तक तो रघु के साथ मनोज और रंजीत उस पिकअप वैन की चपेट में आ ही चुके थे. पिकअप वैन पलभर को रुकी. उन तीनों को गिरते, सड़क पर छटपटाते देखा, फिर तेज रफ्तार से वहां से चली गई.
वे तीनों सड़क पर पड़े छटपटा रहे थे. सड़क का वह हिस्सा खून से लाल हो रहा था. किसी के सिर में, तो किसी के हाथपैर में चोट लगी थी.

बंशी चाचा अपने गमछे से उन के जख्मी शरीर को बांध रहे थे, ताकि बहता खून रुक जाए. रामू आतीजाती गाडि़यों को रुकने और मदद करने के लिए हाथ हिलाते हुए चिल्ला रहा था, मगर यहां किस को चिंता थी.
यहां हाईवे की भागमभाग में सब को अपनीअपनी ही पड़ी थी. आखिरकार एक आटोरिकशा दिखा, जिसे रामू ने रुकवाया. फिर तीनों घायलों को उस में टांगटूंग कर बैठाया और अस्पताल जाने का इंतजाम किया.
रास्ते में रघु कराहते हुए रामू से कह रहा था, ‘‘तुम ठीक कह रहे थे रामू.

अगर मैं ने अपने कानों में ईयरफोन नहीं लगाया होता, तो मैं बच सकता था.’’ रास्ते में ही रघु ने दम तोड़ दिया था. दूसरे 2 लोगों में से एक के हाथ, जबकि दूसरे के हाथपैर दोनों टूटे थे. अस्पताल से वापस गांव आने पर रामू बहुत उदास था. रघु के घर का हाहाकार उस के कानों में गूंज रहा था. बारबार उस की आंखों के सामने रघु का चेहरा आ रहा था. रामू के कानों में घायल रघु की आवाज अब भी गूंज रही थी, ‘‘अगर मैं ने अपने कानों में ईयरफोन नहीं लगाया होता, तो मैं बच सकता था.’’  

sweet story : मौसी की महक

लेखिका – रीता कश्‍यप 

sweet story :  रात के 9 बज चुके थे. टीवी चैनल पर ‘कौन बनेगा करोड़पति’ प्रोग्राम शुरू हो चुका था. मैं जल्दी से मेज पर खाना लगा कर प्रोग्राम देखने के लिए बैठना ही चाहती थी, तभी फोन की घंटी बज उठी. आनंद प्रोग्राम छोड़ कर उठना नहीं चाहते थे, सो मुझे फोन की ओर बढ़ता देख बोले, ‘‘मेरे लिए हो तो नाम पूछ लेना, मैं बाद में फोन कर लूंगा.’’

मेरे रिसीवर उठाते ही अजनबी आवाज कानों में पड़ी. संक्षिप्त परिचय के बाद अत्यंत दुखद समाचार मिला कि आनंद की उदयपुर वाली मौसी के एकलौते जवान बेटे की ऐक्सिडैंट में मौत हो गई है. फोन सुनते ही मैं स्तब्ध रह गई.

मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि यह दुखद समाचार मैं आनंद को कैसे दूं. खाना मेज पर लगा था. मैं सोच में पड़ गई कि क्या पहले खाना खा लेने दूं, फिर बताऊं? लेकिन मेरे दिलोदिमाग ने चेहरे का साथ नहीं दिया. मुझे देखते ही आनंद हैरान हो गए, बोले, ‘‘क्या हुआ? किस का फोन था?’’

आनंद के पूछते ही मैं स्वयं को रोक न सकी और भीगी आंखों से उन्हें पूरी बात बता दी. सुनते ही आनंद गुमसुम से हो गए. मैं भी परेशान हो उठी थी. टीवी प्रोग्राम में अब मन नहीं लग रहा था. उस प्रोग्राम से कई गुना बड़े सवाल हमारे मन में उठने लगे थे. प्रोग्राम में पूछे जा रहे सवालों का तो 4 में से एक सही उत्तर भी था, लेकिन मन में उठ रहे सवालों का हमारे पास कोई उत्तर न था.

बच्चे हमें देख कर सहम से गए थे. उन्हें तो जैसेतैसे खाना खिला कर सुला दिया, लेकिन हम दोनों चाह कर भी कुछ न खा पाए.

आनंद उदयपुर जाने की तैयारी करने लगे. वहां जाना तो मैं भी चाहती थी, लेकिन एक तो सुबह दफ्तर में जरूरी मीटिंग थी, जिस के कारण मेरा अचानक छुट्टी करना संभव नहीं था, दूसरे, बच्चों को कुछ दिनों के लिए कहां, किस के पास छोड़ते हमें हड़बड़ी में कुछ नहीं सूझ रहा था. सो, आनंद तुरंत ही अकेले उदयपुर के लिए रवाना हो गए.

आनंद बहुत दुखी थे. यह स्वाभाविक भी था, क्योंकि मौसी से आनंद का विशेष स्नेह है. बचपन में आनंद अपनी छुट्टियां मौसी के यहां ही बिताना पसंद करते थे. मां की मृत्यु के बाद तो मौसी ने मां की ही जगह ले ली थी. मौसी के बेटे, शिव और आनंद में उम्र का भी कोई ज्यादा फर्क नहीं था. शिव आनंद का मौसेरा भाई कम, दोस्त ज्यादा था.

मौसी शादी के 10 साल बाद ही विधवा हो गई थीं. बहुत मेहनत से उन्होंने अपने एकलौते बेटे शिव की परवरिश की, उसे पैरों पर खड़ा किया था. शिव भी श्रवण कुमार से कम न था. शादी के लिए बरसों इनकार करता रहा. मां की कठिन तपस्या के बदले वह मां की आजीवन सेवा करना चाहता था. वह डरता था कि कहीं कोई झगड़ालू बहू आ कर मां का जीवन जीर्ण न बना दे.

मौसी का स्वभाव बहुत ही अच्छा है. उन की जबान से शहद और आंखों से स्नेह बरसता था. मौसी के जीवन का एक ही अरमान था कि बेटे के सिर पर सेहरा देखें और बहू घर लाएं. लेकिन शिव था कि अपनी ही जिद पर अड़ा था. मौसी के बहुत कहने और हम सब के बहुत समझने पर शिव ने शादी के लिए हामी भरी थी. उस की शादी को 2 साल भी नहीं हुए थे कि जीवनभर मां की सेवा का व्रत लेने वाला शिव, बुढ़ापे में मां को छोड़ कर चला गया था.

कुछ ही दिनों बाद मैं भी दफ्तर से छुट्टी ले कर बच्चों को साथ ले उदयपुर पहुंच गई. सफेद साड़ी में लिपटी मौसी और शिव की पत्नी भारती मुझे वेदना की प्रतिमूर्ति लगीं. मैं दोनों से गले क्या मिली कि आंसुओं की बाढ़ सी आ गई.

मौसी की गृहस्थी 2 प्राणियों में सिमट कर रह गई थी. सूनी मांग तथा सूनी गोद वाली 2 औरतें, एक के सामने पहाड़ जैसा जीवन था तो दूसरी के सामाने लाचार बुढ़ापा. घर लोगों से भरा था, लेकिन शिव के बिना बिलकुल खाली लग रहा था.

भारती के मातापिता उसे हमेशा के लिए अपने साथ ले जाना चाहते थे. एक तरह से यह ठीक भी था. मुझे लगा, उस घर से दूर रह कर भारती का जख्म जल्दी भर जाएगा और फिर उस की दूसरी शादी भी कर देनी चाहिए. किसी औरत के लिए पूरा जीवन अकेले काटना बहुत कठिन होता है. वैसे भी, जीने का कोई तो बहाना होना ही चाहिए.

अपने मातापिता के निर्णय पर भारती मुझे 2 हिस्सों में बंटी हुई लगी. वह शिव की यादों के सहारे जीना भी चाहती थी और पूरा जीवन अकेले जीने के भय से ग्रस्त भी थी.

मौसी कुछ भी नहीं कह पा रही थीं. जीने का बहाना तो उन्हें भी चाहिए था, जो अब मात्र भारती के रूप में था, लेकिन भारती के भविष्य की चिंता उन्हें चुप रहने पर भी मजबूर कर रही थी.

फिर एक शाम बहुत ही दुखी मन से हम सब ने यही फैसला लिया कि भारती का लौट जाना ही उस के भविष्य को सुरक्षित रख पाएगा. आखिर एक बूढ़े पेड़ के साए में वह पूरा जीवन कैसे काट पाएगी?

मौसी अब बिलकुल अकेली हो गई थीं. एक ओर मौसी का दुख और उन का अकेलापन मुझसेदेखा नहीं जा रहा था तो दूसरी ओर आनंद का अंदर ही अंदर टूटना मुझसे सहा नहीं जा रहा था. मेरे अंदर अजीब सी कशमकश चल रही थी.

एक शाम मैं अपनी कशमकश से उबर ही आई और मैंने अपना फैसला सुना दिया, ‘‘मौसी, आप अब यहां अकेली नहीं रहेंगी. यहां की हर चीज शिव की यादों से जुड़ी है, जो आप को जीने नहीं देगी.’’

‘‘मैं तो जीती ही रहूंगी, बहू. मेरी मौत बहुत मुश्किल है. भरी जवानी में पति छोड़ कर चले गए, मैं जीती रही. अब बुढ़ापे में बेटा छोड़ गया है तो भी…’’ कहते हुए वे फूटफूट कर रोने लगीं.

मैं भी स्वयं को रोक न सकी. बहुत देर तक कमरे में सन्नाटा छाया रहा.

‘‘आप को जीना है और हमारे लिए जीना है,’’ कहते हुए मैं ने खामोशी तोड़ी.

‘‘बहू, मेरे लिए परेशान होने की जरूरत नहीं. मेरी जिंदगी में अब बचा ही क्या है.’’

‘‘मौसीजी, आप हमारे साथ चलेंगी. हमें आप की जरूरत है,’’ कहते हुए मैं मौसी के गले लग गई.

मेरी बात सुन कर आनंद ने राहत की सांस ली थी, ऐसा उन के चेहरे के हावभाव बता रहे थे. वे तुरंत बोल उठे, ‘‘मौसी, मुझमें और शिव में आप ने कभी कोई फर्क नहीं किया. मैं आप का बेटा, अभी जिंदा हूं. आप के पोतेपोती हैं, बहू है, हम सब को छोड़ कर आप यहां अकेली कैसे रहेंगी?’’

‘‘क्यों नहीं, बेटा. तुम सब मेरे अपने हो, तुम्हारे सिवा अब मेरा और है ही कौन? लेकिन बेटा, मैं दुखियारी अब बुढ़ापे में तुम पर बोझ नहीं बनना चाहती.’’

‘‘मां बोझ नहीं हुआ करती. आप हमारे साथ चलिए. हम सब मिल कर आप का दुख बांटने की कोशिश करेंगे, फिर भी अगर आप को वहां अच्छा न लगे तो लौट आइएगा. हम आप को नहीं रोकेंगे,’’ मैं ने अपनी बात रखते हुए कहा.

‘‘हां मौसी, अभी आप हमारे साथ चल रही हैं. हम आप को यहां अकेला नहीं छोड़ सकते. बाद में आप को जैसा ठीक लगेगा, हम ने आप पर छोड़ा,’’ आनंद ने भी अपना फैसला सुना दिया था.

जल्दी ही हम मौसी को साथ ले कर दिल्ली लौट आए. 2-4 दिन मौसी के साथ घर पर बिता कर मैं ने दफ्तर जाना शुरू कर दिया. कई दिनों की छुट्टी के बाद मैं दफ्तर गई तो लंचटाइम में सब सहेलियां मिलीं और कई तरह के सवाल करने लगीं. कोई मेरी छुट्टियों का कारण पूछ रही थी तो कोई शिव की मृत्यु की खबर पर दुख जता रही थी, कोई उदयपुर के बारे में जानकारी चाहती थी. तभी बातोंबातों में मैं ने बताया कि मैं मौसी को साथ ले आई हूं. अब वे हमारे साथ ही रहेंगी.

मेरी बात सुनते ही सीमा बोली, ‘‘दीपा, गई तुम भी काम से. हो गया शुरू रोज का कलह, तानोंउलाहनों का सिलसिला.’’

‘‘मौसी ऐसी नहीं हैं. वे स्वभाव की बहुत अच्छी हैं,’’ मैं ने तुरंत उत्तर दिया.

‘‘कैसी भी हों, हैं तो सास ही. देख लेना एक दिन तेरा सांस लेना दूभर कर देंगी,’’ रश्मि ने हाथ नचाते हुए कहा.

तभी सुषमा बहुत ही अपनेपन से बोली, ‘‘तुझे बैठेबिठाए क्या पड़ी थी जो यह मुसीबत गले डाल ली. अच्छीभली गृहस्थी चल रही थी, ले आई मौसी को साथ.’’

‘‘अरी, ऐसा फैसला लेने से पहले तुझे हमारी याद नहीं आई, जो वर्षों से सास के जुल्मों को सह रही हैं, तू तो फिर भी खुशहाल है जो तेरी सास नहीं है. तुझे क्या शौक चर्राया था जो मौसी सास को घर ले आई?’’ वनिता ने मुंह बनाते हुए कहा.

‘‘मेरे हसबैंड अगर ऐसा कहते भी न, तो मैं अड़ जाती, कभी ऐसा न होने देती. और एक तू है मूर्ख, जो स्वयं मौसी को साथ ले आई,’’ शिखा कब चुप रहने वाली थी जो कुछ महीने पहले ही लड़झगड़ कर ससुराल से अलग हुई थी, सो वह भी बोल उठी.

मेरी बात कोई सुनने को तैयार ही नहीं थी. सब अपनीअपनी कह रही थीं. उन के विचार में वे सब अनुभवी थीं और मैं नादान, जिस ने स्वयं ही अपने पांव पर कुल्हाड़ी मार ली थी. उन सब की बातें सुन कर मेरे मन में बहुत से प्रश्न उठ रहे थे. मैं उन्हें बहुतकुछ समझना चाहती थी, लेकिन मैं जानती थी कि उस समय उन से बहस करना फुजूल था.

शाम को मेरे घर पहुंचते ही मौसी पानी का गिलास ले आईं जो हमेशा मुझे स्वयं ही भर कर पीना पड़ता था. फिर मौसी बहुत ही अपनत्व से बोलीं, ‘‘बहू, हाथमुंह धो लो, चाय तैयार है.’’

यह सुनते ही खुशी से मेरा तनमन भीग गया. कपड़े बदल कर हाथमुंह धोए, मेज पर पहुंचते ही मैं ने देखा कि गरमागरम चायनाश्ता तैयार है.

‘‘आनंद भी आने ही वाले होंगे,’’ मैं ने यों ही कह दिया, जबकि गरमागरम चायनाश्ता देख कर मैं स्वयं को रोक नहीं पा रही थी.

‘‘कोई बात नहीं, बहू. सुबह की गई अब आई हो. थकी होगी तुम, अब तुम आराम से चाय पियो, आनंद आएगा तो फिर बना दूंगी.’’

मैं चाय पी ही रही थी कि रसोईघर से कुकर की सीटी की आवाज कानों में पड़ी. पता चला मौसी ने रात के खाने की तैयारी भी शुरू कर दी थी.

‘‘मौसीजी, आप पूरा दिन काम में लगी रहीं, आप आराम किया कीजिए, यह काम तो मैं आ कर रोज करती ही थी.’’

‘‘तुम्हारी गृहस्थी है, बहू. सब तुम्हें ही करना है, मैं तो यों ही थोड़ी मदद कर रही हूं. पहाड़ जितना बड़ा दिन, खाली बैठ कर गुजारना भी तो मुश्किल होता है.’’

‘‘इन दोनों शैतानों ने आप को परेशान तो नहीं किया?’’ मौसी की अगलबगल आ कर बैठे दोनों बच्चों को देख कर मैं ने हंसते हुए कहा.

‘‘ये क्या परेशान करेंगे, बहू. वे लोग खुशहाल होते हैं जिन के घर में बच्चों की किलकारियां गूंजती हैं. इन से ही तो जीवन में रौनक है,’’ मौसी बोलीं.

शायद मैं ने अनजाने में ही मौसी की दुखती रग पर हाथ रख दिया था, लेकिन मौसी ने मुझे शर्मिंदा होने का अवसर ही नहीं दिया, वे तुरंत बोलीं, ‘‘बहू, चाहो तो जब तक आनंद आता है, थोड़ा आराम कर लो. रसोई की चिंता तुम मत करो,’’ कहते हुए वे दोनों बच्चों का हाथ पकड़ कर उन्हें अपने कमरे में ले गईं.

आजकल रहरह कर मेरे कानों में अपनी सहकर्मियों की कड़वी बातें गूंजती रहती हैं, लेकिन मेरा अनुभव उन के अनुभव से मेल नहीं खाता. मैं तो आजकल दफ्तर में स्वयं को इतना हलका और तनावमुक्त अनुभव करती हूं कि बता नहीं सकती. सुबह बिना किसी भागदौड़ के दफ्तर पहुंचती हूं, क्योंकि मौसी घर पर हैं ही. बच्चों को स्कूल के लिए तैयार करने से ले कर नाश्ता बनाने तक वे बराबर मेरी मदद करती हैं.

अब बच्चों के लिए दोपहर का खाना बनाने की भी जरूरत नहीं रही, क्योंकि मौसी उन्हें गरमागरम खाना खिलाती हैं. अब न बच्चों का सामान क्रैच में दे कर आना पड़ता है और न ही शाम को दफ्तर के बाद उन्हें वहां से लाने की चिंता है. बच्चे दिनभर अपने घर में सुरक्षित हाथों में रहते हैं.

मुझे तो मौसी को घर लाने के अपने फैसले में कहीं कोई गलती नजर नहीं आ रही. शाम को जब घर पहुंचती हूं तो घर का दरवाजा खुला मिलता है. मुसकराते और खिलखिलाते बच्चे मिलते हैं जो दिनभर क्रैच के बंधन में नहीं, अपने घर के उन्मुक्त वातावरण में रहते हैं. दोनों बच्चे दोपहर में थोड़ा आराम करने के बाद अपनाअपना होमवर्क भी कर लेते हैं.

मौसी को देख कर मुझे लगता है, वे ऐसा घना पेड़ हैं जिस के साए में हम जिंदगी की तेज धूप से बच सकते हैं. हम सब की भी पूरी कोशिश रहती है कि मौसी अपने गम को भूली रहें.

एक शाम मैं दफ्तर से आई तो तबीयत कुछ ठीक नहीं लग रही थी. देखते ही देखते मुझे तेज बुखार हो गया. मौसी तो परेशान हो उठीं. आनंद अभी दफ्तर से नहीं लौटे थे. मौसी ने तुरंत मुझे दूध के साथ बुखार उतारने की गोली दी और पानी की पट्टियां रखनी शुरू कर दीं. आनंद को आते ही डाक्टर के पास भेज दिया. जब तक मेरा बुखार नहीं उतरा, वे मेरे पास से नहीं उठीं.

मौसी का ऐसा स्नेह देख कर मैं स्वयं को रोक न सकी, मेरी आंखें भीग गईं. मौसी के हाथ अपने हाथों में ले कर मैं ने पूछा, ‘‘आप आनंद की मौसी हैं या मेरी मां?’’

‘‘चल पगली, मैं आनंद की मौसी बाद में हूं, पहले तेरी मां हूं. बहू क्या बेटी नहीं होती? सास क्या मां नहीं होती?’’ मौसी की जबान से सदा की भांति शहद और आंखों से नेह बरस रहा था.

‘‘मां ही तो होती है,’’ कहते हुए मैं मौसी से लिपट गई.

उस पल मुझे मौसी से वैसी ही गंध आ रही थी जो मैं बचपन में अपनी मां के गले लग कर महसूस करती थी. यह यकीनन ममता, प्यार की ही गंध थी, जिसे मैं वर्षों बाद अनुभव कर रही थी.

 

Abuse : बहन शादी नहीं करना चाहती, उसके साथ यौन शोषण हुआ था

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सवाल –

मेरे घर में मुझ से बड़ी एक बहन है जिस की अब शादी की उम्र हो चुकी है और उस के लिए रिश्ते भी आने लगे हैं. जब भी हम घर में उस की शादी की बात करते हैं तो उसे बिलकुल अच्छा नहीं लगता और वह शादी की बात से ही मुंह बनाने लगती है. दरअसल, मेरी बहन का एक बौयफ्रेंड था जिस से वह बहुत प्यार करती थी पर मुझे उस लड़के के बारे में कुछ ज्यादा नहीं पता. मुझे पता है कि उन दोनों के बीच कुछ ऐसा हुआ था जिस से कि मेरी बहन को शादी के नाम से ही नफरत हो गई है. दरअसल, उस लड़के ने मेरी बहन का लंबे समय तक दुरुपयोग किया था और उस का यौन शोषण भी किया था जिस वजह से मेरी बहन को अब किसी पर भी विश्वास नहीं होता. उसे ऐसा लगता है कि सारे लड़के एकजैसे होते हैं. मैं उस से इस बारे में खुल कर बात भी नहीं कर पाता क्योंकि आखिरकार है तो वह मेरी बहन ही. कृपया बताइए कि मैं अपनी बहन को शादी के लिए कैसे मनाऊं और उसे कैसे समझाऊं कि सारे लड़के एकजैसे नहीं होते.

जवाब –

आप की और आप की बहन की मनोदशा को समझा जा सकता है. आप की बहन का डर गलत नहीं है. यौन शोषण होना किसी भी लड़की के लिए छोटी बात नहीं होती और वह भी उस लड़के से जिसे उन्होंने इतना प्यार किया हो और उस पर पूरा भरोसा किया हो. यह दिमाग पर बहुत बुरा असर करता है.

आप को अपनी बहन को प्यार से समझाना चाहिए कि उन की जो भी दिक्कत है वह आप से शेयर कर सकती है. आप को अपनी बहन को भरोसा दिलाना होगा कि आप सब उस के भले के लिए ही सोच रहे हैं. अपनी बहन के बैस्ट फ्रैंड बनने की कोशिश करें और उसे विश्वास दिलाएं कि आप जिस से भी उन की शादी कराने की सोच रहे हैं वह एक अच्छा लड़का है और उसे खूब प्यार करेगा.

अपनी बहन को बताएं कि उस की फैमिली उस के लिए कभी गलत नहीं सोच सकती और भविष्य में भी उसे कोई परेशानी हुई तो आप सब उस के साथ खड़े रहेंगे.

आप अपनी बहन का बैस्ट फ्रैंड बनने की कोशिश करें. इस का मतलब यह है कि आप को उन से हर तरीके की बात कर उन की स्थिति समझनी चाहिए. आप उन्हें प्यार से समझाएं कि सैक्सुअली असौल्ट होने का कोई भी असर शरीर पर नहीं होता और वह दिमाग से लड़कों के लिए डर निकाल दें. आप सब उन को एक अच्छा लङका और शरीफ परिवार में भेज रहे हैं, इस बात का विश्वास दिलाना बेहद जरूरी है.

आप अपने घर का माहौल खुशनुमा रखें और अपनी बहन का ध्यान रखें. अपनी बहन की इज्जत करेंगे, ध्यान रखेंगे, दोस्ताना बरताव करेंगे तो जाहिर है कि वह यह सोचने पर मजबूर हो जाएगी कि हर लङके एकजैसे नहीं होते। संभव है कि वह शादी के लिए हामी भर दे.

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Girlfriend का भाई मुझे धमकी दे रहा है, क्‍या करूं

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सवाल –

मैं 22 साल का हूं और एक कालेज में पढ़ता हूं. कालेज में मेरी एक गर्लफ्रैड है जिसे मैं बहुत प्यार करता हूं। वह भी मुझे बेहद प्यार करती है. हम दोनों एकदूसरे के साथ बहुत खुश रहते हैं और ऐसा लगता है जैसे हम एकदूसरे के लिए ही बने हैं. हम दोनों ने एकदूसरे से वादा किया है कि हम शादी करेंगे और मैं ने उस के बारे में अपने पेरैंट्स को भी बताया भी है. लेकिन जब उस के घर में मेरे बारे में पता चला तो पता नहीं क्यों उस के भाई को बिलकुल अच्छा नहीं लगा और उस दिन के बाद से उस का भाई मुझे धमकी देने लगा है कि मैं उसकी बहन से दूर रहूं. मैं अपनी गर्लफ्रैंड को नहीं छोड़ सकता और मैं ने उस के भाई से भी कहा है कि मैं उस की बहन को हमेशा खुश रखूंगा पर वह मानने को तैयार नहीं है. मैं क्या करूं?

जवाब –

यह जहां एक तरफ एक भाई की चिंता है, वहीं दूसरी तरफ आप का अपनी गर्लफ्रैंड के लिए प्यार भी कोई गलत नहीं है. आप दोनों अपनी अपनी जगह बिलकुल ठीक हैं. आप ने बहुत अच्छा किया कि अपने प्यार के बारे में पहले ही अपने घर वालों को बता दिया है. मगर ऐसे में आप को गर्लफ्रैंड के भाई की स्थिति को भी समझना होगा. अगर आप की भी कोई बहन है तो यकीनन आप को भी उस की चिंता रहती होगी.

आप दोनों एकदूसरे के साथ जिंदगीभर रहना चाहते हैं यह बात काफी अच्छी है और आप दोनों बालिग हैं तो कानूनी तौर पर कोई कुछ नहीं कर सकता। आप अपनी गर्लफ्रैंड से कहें कि वह अपने भाई को समझाए कि सिर्फ आप ही नहीं, बल्कि वह भी आप से उतना ही प्यार करती है और आप उस का अच्छे से खयाल रख सकते हैं. एक भाई के लिए यह बहुत जरूरी होता है कि उस की बहन जिस के साथ भी रहे बस खुश रहे और सेफ रहे.

हां, आप दोनों को इस समय अपनी पढ़ाई पर भी ध्यान देना चाहिए क्योंकि अगर आप अच्छे से पढ़ कर वैल सैटल्ड होंगे तो आप की गर्लफ्रैंड के घर वालों को मनाना मुश्किल नहीं होगा. लड़की के घर वाले बस यह चाहते हैं कि उन की लड़की अपना जीवनसाथी उसे चुने जो अच्छा कमाता हो, उन की बेटी को प्यार करता हो और उन की बेटी के सारे सपनों को हकीकत में बदलने का दम रखता हो.

ध्यान रहे कि प्यार में आप को कोई ऐसा कदम नहीं उठाना है जिस से दोनों घरों की बदनामी हो और आपकी गर्लफ्रैंड के घर वालों ने अगर मानना भी हो वे तब भी न मानें. जैसे आप ने अपने गर्लफ्रैंड के दिल में अपनी जगह बनाई है ठीक उसी तरह उस के घर वालों के दिलों में भी अपनी जगह बनाएं.

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short story : कलकत्ता गए बलम

बालम, कलकत्ता और गोरी का बहुत ही गहरा रिश्ता है. गोरी परेशान है. उस की रातों की नींद और दिन का चैन उड़ा हुआ है… यह सोचसोच कर कि बालम का काम बारबार कलकत्ता में ही क्यों होता है? चलो मान लिया काम होता भी है तो पूरे दफ्तर में अकेले उसी के बालम रह गए हैं क्या, जिन्हें बारबार कलकत्ता भेज दिया जाता है? बालमजी भी इतना खुश हो कर कलकत्ता ही क्यों जाते हैं जबकि देश

के मानचित्र पर अनेक शहर हैं. फिर कलकत्ता में ऐसी कौन सी डोर बंधी है जो गोरी के बालम को खींच रही है और बालम भी गोरी के लटकेझटके, नाजनखरे, प्यारमुहब्बत सब बिसार कर उधर ही खिंचे चले जाते हैं?

गोरी विरह की आग में जल रही है, ऊपर से बरसात उस की इस आग को ठीक उसी तरह भड़काने का काम कर रही है जैसे होम में घी करता है. गोरी के दिल से फिल्मी गाने के ये बोल निकल रहे हैं, ‘हायहाय ये मजबूरी, ये मौसम और ये दूरी…’

पर न तो कोई गोरी की हालत समझ रहा है, न ही उस का गीत सुन रहा है. गोरी के दिल का बोझ बढ़ता गया और आखिरकार उस ने अपनी पीड़ा हमउम्र सखियों को बताई. उस की पीड़ा सुन कर सखियां भी उदास हो गईं. एक बोली, ‘‘रे सखी, कहीं तेरे बालम का दिल वहां की किसी सांवलीसलोनी पर तो नहीं आ गया है?’’

‘‘ऐसा नहीं हो सकता. हमारी इतनी प्यारी सखी को छोड़ कहीं नहीं जाएगा जीजा,’’ दूसरी सखी डपटते हुए बोली. तभी तीसरी सखी बोली, ‘‘अरी, हम ने तो सुना है कि वहां की औरतें काला जादू जानती हैं और मर्दों को अपने बस में कर लेती हैं?’’

‘‘हां री, मैं ने भी बचपन में अपनी दादी से यही सुना था कि जो भी मरद कलकत्ता गए वे कभी न लौटे. फिर वहां की लुगाइयां मर्दों को भेड़बकरा या तोता कुछ भी बना डालती हैं जादू से और अपने यहां पालती हैं. उन की लुगाइयां बेचारी ऐसी ही जिंदगीभर इंतजार करती हैं उन का,’’ एक सखी ने उस में जोड़ा. ‘‘हां री, मैं ने भी सुना है यह तो… कलकत्ता गए मर्द कभी न आते वापस.’’

‘‘ऐसा हुआ तो हम कहां जाएंगे?’’ गोरी का कलेजा बैठने लगा, बहुत कोशिश कर के भी खुद को रोक न पाई और बुक्का फाड़ कर रो पड़ी, ‘‘हाय रे, मैं क्या करूं, कहां जाऊंगी मैं. कहीं वे भेड़बकरा बन गए तो मेरे किस काम के रह जाएंगे… एक तो पहले ही शक्ल बकरे जैसी थी, ऊपर से जादू से बकरा बना ही दिया तो कहां रखूंगी मैं उन्हें.’’ सारी सखियां उस की बातों पर हंसने लगीं. सभी सखियां मिल कर गोरी को चुप कराने लगीं, ‘अरी, रो मत. हम तो तुझ से मजाक कर रही थीं… यह सच नहीं है. ऐसा कुछ नहीं होता… जीजा बहुत जल्द आ जाएंगे,’ और उसे समझाबुझा कर घर भेज दिया.

गोरी घर तो आ गई, पर उस के मन का बोझ कई गुना बढ़ गया था. वह मन ही मन समझ रही थी कि जो बातें सखियों ने कहीं, वे झूठ नहीं थीं, क्योंकि उस ने भी वैसी बातें सुन रखी थीं… पर उस का बालम तो नहीं सुनता. इस बार तो कई महीनों से वापस नहीं आया. उसे अचानक याद आया कि उस का बालम कई बार कह भी चुका है कि कलकत्ता की लुगाइयां बड़ी सलोनी होती हैं. वह पहले क्यों न समझी. गोरी की रातों की नींद और दिन का चैन छिन गया. पर यह बालम भी कैसा बेदर्द है. वह एक फोन तक नहीं कर रहा उस से बात करने को… बताओ, उस फिल्मी हीरोइन के बालम ने तो रंगून से भी फोन किया था कि तुम्हारी याद सताती है… और यह मेरा बालम है जो कलकत्ता से भी फोन नहीं कर रहा.

ऊपर से दिनभर सास के ताने सुनने को मिलते हैं, ‘‘ये आजकल की लड़कियां भी बिना खसम के रह ही न सकें, जाने काहे की आग लगी है? हम भी तो कभी जवान थे. हमारे वे तो 6-6 महीने के लिए परदेश जाते थे कमाने को… हम ने तो यों आंसू न बहाए थे… पूरे घर के काम और करे थे. ‘‘मर्द और बैल कभी खूंटा से बांध के रखे जाते हैं भला. उन्हें तो काम करना ही पड़ेगा तभी तो पेट भरेंगे सब का.’’

गोरी बेचारी चुपचाप ताने सुनसुन कर घर के काम कर रही थी. वैसे भी हमारी बहुओं में चुप रहने की आदत होती है. उस ने ठान लिया था कि इस बार बालम बस वापस आ जाएं, फिर उन्हें कहीं भी जाने देगी, पर कलकत्ता नहीं जाने देगी, चाहे कुछ भी हो जाए. वह अपने पति के रास्ते को वैसे ही रोकेगी जैसे गोपियों ने उद्धव का रथ रोका था जब वे कान्हा को ले कर मथुरा जा रहे थे.

उस दिन सुबहसुबह सचमुच आहट हुई और दरवाजे पर बालम को देख गोरी खुशी में पति से ऐसे लिपट गई मानो चंदन के पेड़ पर सांप लिपटे हों. वह तो ऐसे ही लिपटी रहती अगर सास ने सुमधुर आवाज में उस के पूरे खानदान की आरती न उतारी होती. गालियों की बौछारों ने उस के अंदर से फूटे प्रेम के झरने को बहने से तुरंत रोक दिया.

गोरी ने अपनी भावनाओं को रोका और चुपचाप अपने कामों में जुट गई. भले ही उस की आंखें बालम पर टिकी थीं. आखिरकार इंतजार की घडि़यां खत्म हुईं और गोरी का बालम से मिलन हुआ. पर यह मिलन स्थायी तो नहीं था… गोरी के दिल में हरदम डर लगा रहता, बालम फिर से न कहें कलकत्ता जाने की. गोरी अपने बालम की हर इच्छा का खयाल रखती ताकि उसे जाने की याद न आए. वह प्यारमनुहार से बालम के दिल को टटोलने की कोशिश कर रही थी जिस की डोर का एक सिरा कलकत्ता में बंधा तो है, पर किस से? पर अब तक कामयाब न हो सकी. सो बालम के प्रेम में मगन हो गई.

अभी कुछ ही दिन प्रेम की नदी में डुबकियां लगाते बीते थे कि बालमजी ने फिर कलकत्ता का राग अलापा. इधर उन का अलाप शुरू हुआ… उधर गोरी ने ऐसा रुदन शुरू किया कि बालम के स्वर हिलने लगे. गोरी जमीन में लोटपोट हो कर दहाड़ें मार रही थी… बालम बेचारा हैरानपरेशान उसे जितना चुप कराने की कोशिश करता, गोरी उतनी ही तेज आवाज में अपना रोना शुरू कर देती. सारा घर, सारा महल्ला इकट्ठा हो गया.

सासू ने भी अपने चिरपरिचित अंदाज में गोरी को चुप होने का आदेश दिया, पर आज तो गोरी ने उन की भी न सुनी. उस का रैकौर्डर एक ही जगह फंस गया था कि इस बार बालम को कलकत्ता नहीं जाने दूंगी. जितने लोग उतने उपाय. कोई कहे इस पर भूतनी आ गई है, इसे तांत्रिक बाबा के पास ले चलो… कोई चप्पल सुंघाने की सलाह दे रहा था… कोई कह रहा था कि इस के खसम का किसी कलकत्ते वाली से टांका भिड़ा है. उस के बारे में गोरी को पता लग गया है इसलिए इतना फैल रही है. बालम बेचारा अपने माथे पर हाथ धर के बैठ गया. सब मिल कर गोरी से जानने की कोशिश कर रहे थे कि ऐसी क्या वजह है कि वह अपने बालम को कलकत्ता नहीं जाने देना चाहती.

पर गोरी पर तो जैसे सच्ची में भूत सवार था. वह दहाड़ें मारमार कर रोए जा रही थी और कलकत्ता पर गालियां बरसा रही थी. यह नाटक और कई घंटे चलता, पर इतने में किसी ने पुलिस को फोन कर दिया. कुछ देर तक तो पुलिस के सामने भी यह नाटक चालू रहा, पर फिर दरोगाजी ने डंडा फटकार कर कहा, ‘‘इस को, इस की सास को और पति को ले चलो और जेल में डाल दो. सारा सच सामने आ जाएगा…’’

जेल का नाम सुनते ही गोरी के रोने पर झटके से ब्रेक लग गया. वह एक सांस में बोली, ‘‘हमें न भेजना अपने बालम को कलकत्ता, वहां की औरतें काला जादू जानती हैं, इसे जादू से बकरा बना कर अपने घर में बांध लेंगी, फिर हमारा क्या होगा?’’ और गोरी फिर से रोने लगी. गोरी की बात सुन कर बाकी लोग हंसने लगे. गोरी रोना बंद कर मुंहबाए सब को देखने लगी… उस ने देखा कि बालम भी हंस रहा है… ‘‘धत पगली, ऐसा किस ने कह दिया तुम से. इस जमाने में ऐसी कहानी कहां से सुन ली…’’ बालम ने उसे मीठी फटकार लगाई.

‘‘मैं ने बचपन में सुना था ऐसा, जो भी बालम कलकत्ता जाते, कभी वापस नहीं आते और मेरी सब सखियों ने भी तो ऐसा ही कहा,’’ गोरी ने बताया. अब सासूजी बोलीं, ‘‘ये कौन सी सखियां हैं तेरी… मुझे बता, मैं खबर लूं उन की. बताओ छोरी का दिमाग खराब कर के धर दिया… कोई भी लुगाई यह सुनेगी, उस बेचारी का कलेजा तो धसक ही जाएगा…

‘‘चल, अब तू भीतर चल. कहीं न जाएगा तेरा बालम… और तुम सब भी अपनेअपने घर को जाओ. यहां कोई मेला थोड़े ही न लगा है.’’ सब अपने रास्ते चल दिए और दारोगाजी भी हंसते हुए वापस चले गए. आखिर गोरी की जीत जो हो गई थी. उस के बालम बकरा बनने से बच जो गए थे.

 

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