सोशल मीडिया : ‘पठान’ के बहाने नफरती ट्रैंड का चलन

सुनामी चाहे कोई समुद्र उगले या कोई फिल्म, ज्वार का जोश ठंडा होने पर ही पता चलता है कि तबाही किस हद तक की थी. कुछ ऐसा ही महसूस हुआ फिल्म ‘पठान’ को ले कर. 25 जनवरी, 2023 को रिलीज हुई शाहरुख खान की इस फिल्म ने कामयाबी के नए झंडे गाड़ दिए, नफरत के इस आलम में मुहब्बत की जीत हुई, दुनियाभर में ढाई घंटे की इस फिल्म का डंका बज गया, टिकट खिड़की पर हायतोबा मच गई, हिंदी फिल्म इंडस्ट्री निहाल हो गई, ‘बौयकौट गैंग’ का जनाजा निकल गया, बंद हो चुके सिनेमाघर तक खुल गए… और भी न जाने क्याक्या दावे किए गए.

पर हकीकत तो यह है कि ‘पठान’ एक साधारण कहानी पर बनी फिल्म है, जिस में इतना ज्यादा ऐक्शन था कि शाहरुख खान को अपनी दिलकश अदाकारी दिखाने का मौका ही नहीं मिला. दरअसल, वे चाहते ही नहीं थे, क्योंकि उन्हें तो अपनी ‘घर वापसी’ सेहरे के पीछे मुंह छिपाए किसी दूल्हे की तरह शाही चाहिए थी, जिस में बेगाने अब्दुल्ला भी बेवजह नाचते. हुआ भी ऐसा ही. सोशल मीडिया के संगदिल दौर में यह साबित हो गया. कि फिल्म हो या राजनीति, लोगों की भावनाएं भड़का कर अपना उल्लू कैसे सीधा किया जाता है.

फिल्म ‘पठान’ को ले कर यह भी सुनने में आया कि जिस तरह नेता अपनी रैली को हिट करने के लिए किराए की जनता बुलाते हैं, उसी की तर्ज पर इस फिल्म को बनाने वालों ने सिनेमाघरों की टिकटें खुद खरीद कर लोगों में बांट दी थीं, ताकि फिल्म की ओपनिंग में कोई कसर न रह जाए.

बता दें कि फिल्म ‘पठान’ का रिलीज से पहले एक वीडियो वायरल हुआ था, जहां शाहरुख खान के एक फैन ने तकरीबन 800 टिकट बुकिंग करने का दावा किया था.

वीडियो में मौजूद शख्स ने बताया था कि वह शाहरुख खान का बहुत बड़ा फैन है और उस ने 25 जनवरी को ‘फर्स्ट डे फर्स्ट शो’ का पूरा थिएटर बुक कर लिया था, ताकि फिल्म के हक में माहौल बन जाए.

दक्षिण भारत की फिल्मों के कलाकारों को चाहने वाले तो अलग ही लैवल पर रहते हैं. रजनीकांत हों या चिरंजीवी या फिर ममूटी ही सही, उन के फैंस सिनेमाघरों के आगे ऐसी धमाचौकड़ी मचाते हैं कि जैसे वे कोई फिल्म देखने नहीं, बल्कि जंग की ओर कूच कर रहे हों. कुछ ऐसा ही फिल्म ‘पठान’ की रिलीज के समय दिखा.

दिक्कत यह नहीं है कि एक साधारण फिल्म को असाधारण पहचान मिल गई या इस फिल्म ने अपने बनाने वालों को मालामाल कर दिया, बल्कि दिक्कत यह है कि अब आगे क्या?

क्या शाहरुख खान को फिर 4 साल का वनवास लेना होगा अपनी फिल्म हिट कराने के लिए, क्योंकि फैंस भले ही आप की अधपकी रोटी को शीरमाल समझ कर खा लें, पर बाकी जनता को तो शाहरुख खान से बहुत ज्यादा उम्मीदें हैं? क्या शाहरुख अपनी अगली फिल्म में भी सलमान खान का कैमियो चाहेंगे? स्पाई फिल्में शाहरुख खान का जोन नहीं हैं, यह तो नहीं कहा जा सकता, पर 57 साल की उम्र में हर फिल्म में वीएफऐक्स के जोर पर फिल्में हिट कराना क्या टेढ़ी खीर नहीं होगी?

मुझे लगता है कि अब हिंदी फिल्म इंडस्ट्री की छोटी बजट की फिल्मों को बड़ा नुकसान होगा. सलमान खान, शाहरुख खान, अजय देवगन, अक्षय कुमार, आमिर खान जैसे मैगास्टार एकदूसरे की फिल्मों में कैमियो करेंगे, तो फिर कहानियों की तो जरूरत ही नहीं रहेगी.

रोहित शेट्टी की फिल्मों में काम करने वाले अजय देवगन, अक्षय कुमार और रणवीर सिंह ने फिल्म ‘सूर्यवंशी’ के क्लाईमैक्स में ऐसा ही कुछ किया था और एक औसत फिल्म ने कई करोड़ की कमाई कर ली थी.

इस साल जनवरी महीने में ‘कुत्ते’, ‘लकड़बग्घा’, ‘गांधी गोडसे : एक युद्ध’ जैसी फिल्में रिलीज हुईं, लेकिन क्या ‘पठान’ के हिट होने से उन्हें या हिंदी फिल्म इंडस्ट्री का कोई भला हुआ? बिलकुल नहीं, क्योंकि एक ने भी बौक्स औफिस पर पानी तक नहीं मांगा.

लेकिन अब बड़े सितारों की फिल्मों को ले कर सोशल मीडिया पर एक नया ट्रैंड जरूर चल गया है और इसी का नतीजा था कि 15 अगस्त, 2023 के आसपास (शायद 11 अगस्त को) रिलीज होने वाली फिल्म ‘गदर 2’ के पोस्टर ने बवाल मचाना शुरू कर दिया.

फिल्म ‘गदर 2’ के पोस्टर रिलीज पर एनडीटीवी की वैबसाइट पर कुछ यों लिखा था, ‘हाथ में हथौड़ा और आंखों में गुस्से के साथ लौट आया तारा सिंह, ‘गदर 2’ का पोस्टर शेयर कर सनी देओल ने लिखा, ‘हिंदुस्तान जिंदाबाद.’ दैनिक जागरण की वैबसाइट पर खबर थी, ‘हैंडपंप उखाड़ने एक बार पाकिस्तान जाएंगे तारा सिंह, ‘गदर 2’ की रिलीज डेट आई सामने.’

फिल्म ‘गदर 2’ की कहानी क्या होगी, कलाकार ऐक्टिंग कैसी करेंगे, म्यूजिक और गाने कैसे होंगे, लोगों को इस बात की परवाह नहीं थी, पर इसे ले कर सोशल मीडिया पर एक अलग ही गदर मच गया. किसी ने तो लिख दिया, ‘न पठान, न भाईजान, अब…’ मतलब लोगों ने पोस्टर के रिलीज होते ही ‘हिंदूमुसलिम’ शुरू कर दिया.

साल 2001 में आई फिल्म ‘गदर’  मसाला फिल्म थी. इस में भारतपाकिस्तान के बंटवारे की बैकग्राउंड पर सिख लड़के और मुसलिम लड़की की प्रेम कहानी को दिखाया गया था. फिल्म के गाने सुपरहिट थे. जोश जगाने वाले संवादों और सनी देओल के साथसाथ बाकी कलाकारों की अच्छी ऐक्टिंग ने दर्शकों का दिल जीत लिया था.

26 जनवरी, 2023 को रिलीज हुए इस पोस्टर के बाद फिल्म ‘गदर’ के उस खास सीन को खूब साझा किया गया, जिस में पाकिस्तान में गए सनी देओल अपने दुश्मनों को ललकारते हुए हैंडपंप उखाड़ देते हैं. कई मीम्स में इमरान खान (हालांकि वे अब पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नहीं हैं) अपने लोगों से कहते नजर आए कि पाकिस्तान में सिक्योरिटी बढ़ा दो.

कहने का मतलब यह है कि अब फिल्में मनोरंजन का साधन नहीं रह गई हैं, बल्कि उन के जरीए लोग अपनी भड़ास निकालते दिखते हैं. एक धड़ा अपने पसंदीदा कलाकार की फिल्म को हिट कराने के लिए किसी भी हद तक जा सकता है, तो दूसरा धड़ा उसे फ्लौप कराने की सारी जुगत लगाता दिखता है. जिस ने शाहरुख खान की ‘पठान’ का विरोध किया, अब वह सनी देओल के गुण गाएगा.

कोढ़पर खाज यह कि फिल्म डायरैक्टर अनुराग कश्यप ने हिंदी फिल्मों को हौलीवुड की सस्ती कौपी करार दिया है. उन्होंने साथ ही यह भी कहा कि एक वक्त था, जब विदेशों में भी बौलीवुड फिल्मों का जलवा देखने को मिलता था.

अनुराग कश्यप ने कहा कि साउथ की फिल्में अभी भी भारतीय फिल्मों की तरह दिखती हैं. बहुत सारी हिंदी फिल्में भारतीय फिल्मों की तरह नहीं दिखती हैं, इन्हें भारत में शूट भी नहीं किया गया है… यही वजह है कि ‘आरआरआर’ जैसी फिल्म ने सब को चौंका दिया और यह विदेशों में भी हिट हुई.

अनुराग कश्यप की बात में दम है, क्योंकि जिन फिल्मों ‘केजीएफ 2’ और ‘बाहुबली 2’ की कमाई के रिकौर्ड को तोड़ने की बात फिल्म ‘पठान’ वाले कर रहे हैं, वे दोनों दक्षिण भारत की ही फिल्में हैं.

अब दर्शकों और बड़े फिल्म कलाकारों को मिल कर सोचना चाहिए कि हिंदी फिल्म इंडस्ट्री सोशल मीडिया के नफरती ट्रैंड पर चलेगी या अच्छी फिल्मों के बल पर? याद रखिए, शाहरुख खान ने फिल्म ‘पठान’ से वापसी की है, यह उन की आखिरी फिल्म नहीं है, जो उन्हें भावुक फेयरवैल दिया जाए.

दुविधा: जब बेईमानों का साथ देना पड़े!

लेखक- धीरज कुमार

बिहार में डेहरी औन सोन के रहने वाले मदन कुमार एक राष्ट्रीय अखबार के लिए ब्लौक लैवल के प्रैस रिपोर्टर का काम करते हैं. वे पत्रकारिता को समाजसेवा ही मानते हैं.

बेखौफ हो कर वे अपने लेखन से समाज को बदलना चाहते हैं, लेकिन उन के स्थानीय प्रभारी से यह दबाव रहता है कि खबर उन्हीं लोगों की दी जाए, जिन से उन्हें इश्तिहार मिलते हैं. जो इश्तिहार नहीं दे पाते हैं, उन की खबर बिलकुल नहीं दी जाए, भले ही खबर कितनी भी खास क्यों न हो.

मदन कुमार के प्रभारी उन लोगों के बारे में अकसर लिखते रहते हैं, जिन से उन्हें दान के तौर पर कुछ मिलता रहता है. भले ही वे लोग दलाली और भ्रष्टाचार कर के पैसा कमा रहे हैं. अपने ब्लौक के भ्रष्टाचारियों और दलालों की खबरों को ज्यादा अहमियत दी जाती है. उन के बारे में गुणगान पढ़ कर मन दुखी हो जाता है. कभीकभी तो उन के प्रभारी कुछ लोगों से मुंह खोल कर पैट्रोल खर्च, आनेजाने के खर्चे के नाम पर पैसे लेते रहते हैं.

वहीं मदन कुमार द्वारा काफी मेहनत और खोजबीन कर के लाई गई खबरों को नजरअंदाज कर दिया जाता है, न ही छापा जाता है या बहुत छोटा कर दिया जाता है, क्योंकि उन संस्थाओं से प्रभारी महोदय को नाराजगी पहले से रहती है या कोई ‘दान’ नहीं मिला होता है, इसलिए वे कुछ दिनों से अपने प्रभारी से बहुत नाराज हैं.

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वे अकसर कहते हैं कि अब पत्रकारिता छोड़ कर दूसरा काम करना ठीक रहेगा और इस के लिए वे कोशिश भी कर रहे हैं. उन्हें इस प्रकार की दलाली पत्रकारिता से नफरत होती जा रही है.

मदन कुमार का कहना है, ‘‘अगर बेईमानी से ही कमाना है तो फिर पत्रकारिता में आने की क्या जरूरत है? बेईमानी के लिए बहुत सारे रास्ते खुले हुए हैं. और फिर मुंह खोल कर किसी से पैट्रोल और आनेजाने के खर्चे के नाम  पर पैसे मांग कर अपना ही कद छोटा करते हैं.

‘‘आम लोग इस तरह के बरताव से सभी रिपोर्टरों को एक ही तराजू पर तौलते हैं, इसीलिए आज स्थानीय पत्रकारों को कोई तवज्जुह नहीं देता है. लोग उन्हें बिकाऊ और दो टके का सम झते हैं, जबकि पत्रकारिता देश का चौथा स्तंभ माना जाता है.

‘‘इस तरह के बेईमानों के साथ काम करने पर मन को ठेस पहुंचती है. ईमानदारी से काम करने वाले के दिल को यह सब कचोटता है, खासकर तब जब आप का बड़ा अधिकारी ही बेईमान हो. आप उस का खुल कर विरोध भी नहीं कर सकते हैं. विरोध करने का मतलब है, अपनी नौकरी को जोखिम में डालना.’’

औरंगाबाद के रहने वाले नीरज कुमार सरकारी प्राथमिक विद्यालय में शिक्षक हैं. सरकारी विद्यालय में बच्चों को मिड डे मील के लिए सरकार द्वारा चावल और पैसे दिए जाते हैं. उन के विद्यालय के प्रधानाध्यापक मिड डे मील के चावल और पैसे की हेराफेरी करते रहते हैं.

जब कभी बच्चों की लिस्ट बनानी हो, तो उसे नीरज कुमार ही तैयार करते हैं. वे जानते हैं कि गलत रिपोर्ट बना रहे हैं, फिर भी वे उस गलत रिपोर्ट का विरोध नहीं कर पाते हैं, क्योंकि उन्हें हर हाल में प्रधानाध्यापक की बात माननी पड़ती है.

एक बार प्रखंड शिक्षा पदाधिकारी को इस बारे में शिकायत की थी. तब प्रखंड शिक्षा पदाधिकारी का कहना था, ‘आप अपने काम से मतलब रखिए. दूसरों के काम में अड़ंगा मत डालिए. आप सिर्फ अपने फर्ज को पूरा कीजिए.’

बाद में नीरज कुमार को पता चला कि इस हेराफेरी में प्रखंड शिक्षा पदाधिकारी को भी कमीशन के रूप में पैसा मिलता है. उन का कमीशन फिक्स है, इसलिए वे ऐसे शिक्षकों को हेराफेरी करने से रोकते नहीं हैं, बल्कि सपोर्ट करते हैं. इस सब में नाजायज कमाई करने का एक नैटवर्क बना हुआ है.

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तब से नीरज कुमार अपने विद्यालय के गरीब बच्चों के निवाला की हेराफेरी करने वाले अपने प्रधानाचार्य का विरोध नहीं करते हैं. उन का कहना है, ‘‘मैं सिर्फ अपने फर्ज को पूरा करता हूं. यह हमारे अधिकार क्षेत्र में नहीं आता है, इसलिए मैं इस के बारे में चुप रहता हूं.

‘‘मैं सिर्फ पढ़ानेलिखाने पर ध्यान देता हूं. मैं आर्थिक मामलों में कुछ भी दखलअंदाजी नहीं करता हूं, क्योंकि मैं जानता हूं कि ऐसा करने का मतलब है अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारना यानी अपना ही नुकसान करना.

‘‘वैसे भी आप शिकायत करने किस के पास जाएंगे? जिन के पास भी जाएंगे यानी आप ऊपर के अधिकारी के पास जाएंगे तो उस की कमाई भी उस हेराफेरी से होती है, इसलिए वैसे लोग उस हेराफेरी को रोकने से तो रहे. बदले में आप का नुकसान भी कर सकते हैं. आप का ट्रांसफर करा देंगे.

‘‘आप को दूसरे मामले में फंसा कर नुकसान पहुंचाना चाहेंगे. अगर आप को शांति से नौकरी करनी है, तो अपना मुंह बंद रखना ही होगा.’’

इस तरह की बातों से यह साफ है कि जब बेईमानों के साथ काम करना पड़े या साथ देना पड़े, तो यह जरूरी है कि हम उन से अपनेआप को अलगथलग रखें. हमें जो काम और जिम्मेदारी दी गई है, उस को बखूबी निभाएं.

बेईमान सहकर्मी के बारे में जहांतहां शिकायत करना भी ठीक नहीं है. इस  से आप की उस से दुश्मनी बढ़ने लगती है. शिकायत से कोई फायदा नहीं  होता है. आप के बनेबनाए काम भी बिगड़ जाते हैं, इस से खुद का ही नुकसान होता है. आप दूसरों को सुधारने के फेर में खुद का ही नुकसान कर लेते हैं.

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अगर आप अपनी भलाई चाहते हैं, तो ज्यादा रोकटोक न करें. उन की बेईमानी की कमाई में किसी तरह का अड़ंगा न डालें.

मुमकिन हो, तो उन्हें किसी दूसरे तरीके से बताने की कोशिश करें. अगर वे आप के इशारे को सम झ जाते हैं, तो उचित है वरना अपने काम से मतलब रखें, क्योंकि उन का सीधा विरोध करने पर दुश्मनी महंगी पड़ सकती है.

लुटियंस दिल्ली की ठंडक पर भारी पड़ा राहुल गांधी का भाषण, याद दिलाया मीडिया का दायित्व

आजादी के की अगर कुछ राजनीतिक घटनाएं याद की जाएं तो पोरो में गिन सकते हैं. 60 के दशक में कांग्रेस का विभाजन, देश में आपातकाल, पहली बार गैर कांग्रेसी सरकार, 90 के दशक में पहली बार बड़े पैमाने पर आर्थिक बदलाव. इन सब के बाद अगर कुछ बड़ा हुआ तो वो था 2014 का आम चुनाव. वर्षों बाद किसी राजनीतिक दल को पूर्ण बहुमत मिला था. ये चुनाव कई मायनों पर खास था. एक मुख्यमंत्री का पीएम पद के लिए नाम आना फिर उस चुनाव की रणनीति. हाईटेक चुनाव, बेशुमार दौलत लगाया गया. उसके बाद कुछ तो था तो अब तक गुम लग रहा था. वो था देश का विपक्ष. वही विपक्ष जिसके बिना लोकतंत्र अधूरा रहता है. इस अधूरेपन को देश 2014 से महसूस कर रहा था लेकिन इसको पूरा किया शनिवार को.

शनिवार को कांग्रेस ने दिल्ली के रामलीला मैदान पर ‘भारत बचाओ’ रैली का आयोजन किया. इस रैली में गजब की भीड़ पहुंची. कांग्रेस ने इसको सफल बनाने के लिए प्रदेशों के मुखियाओं को पहले ही आदेश दे दिया था. फिर क्या था. राहुल गांधी के तेवर सातवें आसमान में थे. एक के बाद एक मुद्दे लाकर वो सरकार को घेर रहे थे. ऐसे मुद्दे जो वाकई में आम आदमी के थे. वो मुद्दे जिनसे हर रोज हमको-आपको जूझना पड़ता है.

राहुल गांधी ने कहा, “कल संसद में भाजपा के लोगों ने कहा कि आप अपने भाषण के लिए माफी मांगिए. लेकिन मैं आपको बता दूं कि मेरा नाम ‘राहुल सावरकर’ नहीं है, मेरा नाम ‘राहुल गांधी’ है. मर जाऊंगा, मगर माफी नहीं मांगूंगा. सच बोलने के लिए मैं माफी नहीं मांगूंगा. कांग्रेस का कोई व्यक्ति माफी नहीं मांगेगा.” राहुल ने कहा, “माफी (प्रधानमंत्री) नरेंद्र मोदी को मांगनी है इस देश से. उनके असिस्टेंट (गृहमंत्री) अमित शाह को देश से माफी मांगनी है,” क्योंकि उन्होंने देश को बर्बाद कर दिया है.

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राहुल का इशारा हिंदूवादी नेता दिवंगत विनायक दामोदर सावरकर द्वारा 14 नवंबर, 1913 को ब्रिटिश सरकार को लिखे गए माफी के पत्र की तरफ था, जिसे उन्होंने अंडमान के सेलुलर जेल में बंद रहने के दौरान लिखा था. उल्लेखनीय है कि राहुल गांधी ने झारखंड में एक चुनावी रैली के दौरान ‘रेप इन इंडिया’ टिप्पणी की थी, जिस पर भाजपा सदस्यों ने शुक्रवार को संसद में उनसे माफी की मांग की थी. राहुल की इस टिप्पणी को लेकर संसद में काफी हंगाम हुआ था.

राहुल ने आगे कहा, “इस देश की शक्ति, आत्मा यहां की अर्थव्यवस्था थी. पूरी दुनिया हमारी तरफ देखती थी और कहती थी कि यह हिंदुस्तान में क्या हो रहा है. अलग-अलग धर्मो का देश नौ प्रतिशत जीडीपी पर कैसे चल रहा है. पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था भारत और चीन पर निर्भर थी। इसे चिंडिया कहते थे.”

उन्होंने कहा, “लेकिन आज प्याज की कीमत 200 रुपये (प्रति किलोग्राम) पर पहुंच गई है. नोटबंदी कर दिया. उस चोट से जो नुकसान हुआ वह आजतक ठीक नहीं हुआ. देश की अर्थव्यवस्था को नरेंद्र मोदी ने नष्ट कर दिया. इसलिए मोदी को देश से माफी मांगनी है.”

कांग्रेस नेता ने कहा, “उन्होंने आपसे झूठ कहा कि काले धन के खिलाफ लड़ाई है, काले धन, भ्रष्टाचार को खत्म करना है। माताओं, बहनों, युवाओं की जेब से पैसा निकाला और लाखों करोड़ रुपये अडानी और अंबानी के हवाले कर दिया. उसके बाद ‘गब्बर सिंह टैक्स’ (जीएसटी). (पूर्व प्रधानमंत्री) मनमोहन सिंह जी, (पूर्व वित्तमंत्री) चिदंबरम जी ने उनसे कहा कि बिना पायलट प्रोजेक्ट के इसे लागू मत कीजिए, लेकिन मोदी ने उनकी नहीं सुनी.”

बेरोजगारी के मुद्दे पर केंद्र की भाजपा सरकार पर हमला बोलते हुए राहुल ने कहा, “देश में आज 45 सालों की सबसे ज्यादा बेरोजगारी है. आज जीडीपी (सकल घरेलू उत्पाद) नौ प्रतिशत से घटकर चार प्रतिशत पर आ गई है. उन्होंने जीडीपी मापने का तरीका बदल दिया, अगर आज पुराने तरीके से जीडीपी मापी जाए तो यह सिर्फ 2.5 प्रतिशत है.”

उन्होंने कहा कि दुश्मन चाहते थे और चाहते हैं कि देश की अर्थव्यवस्था नष्ट हो जाए और मोदी ने उसे कर दिया. राहुल ने प्रधानमंत्री मोदी पर चुनिंदा उद्योगपतियों को लाभ पहुंचाने का भी आरोप लगाया. उन्होंने कहा, “मोदी ने अडानी को 50 कॉन्ट्रैक्ट दे दिए. एक लाख करोड़ रुपये से ज्यादा के एयरपोर्ट्स पकड़ा दिए. बिना कॉन्ट्रैक्ट के दे दिए, इसे क्या चोरी, भ्रष्टाचार नहीं कहेंगे? कुछ दिनों पहले ही उन्होंने देश के 15-20 लोगों के 1.40 लाख करोड़ रुपये माफ कर दिए.”

उन्होंने कहा, “हमने मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, कर्नाटक, पंजाब में किसानों के कर्ज माफ किए, क्योंकि किसान के बिना अर्थव्यवस्था आगे नहीं जा सकती. मनरेगा इसलिए दिया, क्योंकि मजदूर के बिना अर्थव्यवस्था आगे नहीं जा सकती. नरेंद्र मोदी ने ये पैसा छीन कर अपने दो-चार दोस्तों को दे दिया. आज हर रोज किसानों की आत्महत्या की खबरें आ रही हैं. मैंने संसद में सवाल किया कि कितने किसानों ने आत्महत्या की तो जवाब मिला कि उन्हें (केंद्र सरकार) नहीं मालूम, प्रदेशों से पूछो। इन्हें शर्म आनी चाहिए.”

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राहुल ने भाजपा सरकार पर लोगों को बांटने का भी आरोप लगाया. उन्होंने कहा, “वे (भाजपा) एक धर्म को दूसरे धर्म से लड़ाने का काम करते हैं. जम्मू-कश्मीर, पूर्वोत्तर, असम, मिजोरम, नागालैंड, अरुणाचल प्रदेश में देखिए मोदी ने क्या कर डाला है, जला दिया है उन प्रदेशों को, आग लगा दी है.”

राहुल ने मीडिया और सरकारी संस्थानों को उनके कर्तव्यों के प्रति सचेत किया. उन्होंने कहा, “मीडिया पर बहुत जिम्मेदारी है. हमारे शासनकाल में आप हम पर आक्रमण करते थे. लेकिन आज आप अपना काम भूल गए हैं. मैं हिंदुस्तान की सभी संस्थाओं, सरकारी कार्यालयों, मीडिया से आग्रह करता हूं कि जिम्मेदारी आपकी भी है. आज हमें डराया जा रहा है, लेकिन कांग्रेस पार्टी किसी से नहीं डरती. इस डर को हम सब मिलकर मिटा देंगे.”

सोशल मीडिया क्राइम: नाइजीरियन ठगों ने किया कारनामा

यह ठगी की क्राइम स्टोरी पढ़कर आप भी चौंक जाएंगे की ठगी के कैसे-कैसे नायाब नमूने लोगों ने इजाद कर लिए हैं. इस संदर्भ में कहा जा सकता है कि छत्तीसगढ़ की
राजनांदगांव पुलिस को बड़ी कामयाबी हासिल हुई है. सोशल मीडिया के जरिए आनलाइन ठगी करने वाले दो नाईनीरियन को पुलिस ने नईदिल्ली से गिरफतार किया है इनके नाम- किबी स्टेनली ओकवो और नवाकोर इमानुएल हैं.

दंपत्ति से 44 लाख की ठगी

पुलिस अधीक्षक कमललोचन कश्यप ने बताया कि राजनांदगांव निवासी श्रीमती सुनीता आर्य पति चैतूराम आर्य ने विगत एक दिसंबर को उक्त आरोपियों के खिलाफ एक रिपोर्ट दर्ज कराते हुए कहा था कि जुलाई 2018 में किसी डेविड सूर्ययन नामक व्यक्ति उन्हें फ्रेंड रिक्वेस्ट भेजी. तथा खुद को लंदन निवासी होना बताया. काफी दिनों तक दोनों के बीच चेटिंग होती रही और एक दिन उपरोक्त व्यक्ति ने कहा कि वह उसे मोबाइल, गोल्डन ज्वेलरी, रिंग, जूते, कोट, घडी चैनल, बैग इत्यादि सामान गिफट करना चाहता है परंतु उसका जहांज फिनलैण्ड में रूका पड़ा है, उसके बाद पीड़िता के पास एक व्यक्ति का फेान आया जिसने खुद को कस्टम अधिकारी बताया और कहा कि उपरोक्त सामान चाहिऐ तो उसे 62500 रूपये जमा कराने होंगे. इस तरह क्राइम प्रारंभ हो गया विश्वास करके आगे दंपत्ति ने यूपी जमाने प्रारंभ कर दिए और धीरे धीरे 44लाख रुपए की चपत उन्हें लग गई.

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ऐसे हुआ ठगी का एहसास

इधर पीड़िता ने उसके झांसे में आते हुए रकम जमा कर दी परंतु जब सामान नही पहुंचा तेा उसने डेविड सूर्ययन से संपर्क करना चाहा मगर उसका सोशल मीडिया एकाउंट और मोबाइल नम्बर बंद बताया जा रहा था. आश्चर्य कि इस तरह पीड़िता से कुल 44 लाख की आनलाइन धोखाधड़ी हो गई. उसके बाद पीड़िता ने राजनंदगांव पुलिस अधीक्षक एवं अधिकारियों से संपर्क किया जिन के निर्देश पर कोतवाली थाना में मामला दर्ज हुआ. रिपोर्ट
दर्ज करने के बाद पुलिस ने भादवि की धारा 420, 34 एवं 66 डी के तहत जुर्म दर्ज किया.

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अंततः अपराधी पकड़े गए

पुलिस ने इस मामले को गंभीरता से लिया और जाल बिछाकर ठगों को दबोच लिया। छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव पुलिस ने ऑनलाइन साइबर क्राइम को बहुत गंभीरता से लिया और इसके लिए एक क्राइम इन्वेस्टिगेशन टीम बनाई गई जोशीला पुलिस कप्तान कश्यप को रिपोर्ट कर रही थी बहुत ही चालाकी से दोनों नाइजीरियन नागरिकों को पुलिस ने जाल में फंसाया और गिरफ्तार करके राजनंदगांव ले आई है पुलिस ने दोनों का बयान दर्ज किया उन्होंने स्वीकार किया कि यह काम वह विगत 2 वर्षों से कर रहे थे और अनेक लोगों को अपना शिकार बनाया है. पुलिस ने उन्हें न्यायालय में पेश किया जहां से जमानत के अभाव में उन्हें जेल भेज दिया गया है.

हम जनता के सेवक हैं

लेखक- सुरेश सौरभ

लखीमपुर के सिद्धार्थनगर महल्ले के बाशिंदे अमित कुमार ग्रीन फील्ड एकेडमी स्कूल से इंटर का इम्तिहान पास करने के बाद छत्रपति शाहूजी महाराज कानपुर यूनिवर्सिटी पढ़ने चले गए थे और वहीं से बीए करने के बाद वे दिल्ली की ओर रुख कर गए थे. अमित कुमार ने दिल्ली में बाजीराव ऐंड रवि कोचिंग में सिविल सेवा की तैयारी शुरू की और एक साल के बाद पहली ही कोशिश में इतना बड़ा इम्तिहान पास कर के लोगों के हीरो बन गए. अमित कुमार ने बताया कि वे मूल रूप से हरगांव सीतापुर के गांव नुकरी के रहने वाले हैं और वहीं उन का बचपन बीता था.

वर्तमान समय में सिविल सोसाइटी के लोग तमाम राजनीतिक दखलअंदाजी के चलते कैसे सही काम कर पाएंगे? इस सवाल के जवाब में अमित कुमार ने बताया, ‘‘सत्ता का दबाव तो रहता है, पर तमाम तरह के दबावों को दरकिनार करते हुए हमें अपने हकों और फर्ज पर अडिग रहना चाहिए और अगर हम ऐसा करते हैं तो राजनीतिक दबाव को बहुत हद तक कम किया जा सकता है और जनता का काम आसानी से किया सकता है.’’

किसी बड़ी कामयाबी को पाने के लिए नौजवानों को क्या करना चाहिए? इस सवाल के जवाब में अमित कुमार कहते हैं, ‘‘नौजवानों को अगर कोई बड़ी कामयाबी पाने की इच्छा है तो उन्हें अपना टारगेट ले कर चलना पड़ेगा और उसी टारगेट पर बिना रुके बिना थके तब तक चलना होगा जब तक कि कामयाबी नहीं मिल जाती.’’

आज के समय में जब पूरा देश भ्रष्टाचार और गरीबी से जूझ रहा है, ऐसे में सिविल सेवा में गए लोगों को क्या करना चाहिए, जिस से इस सब पर काबू पाया जा सके? इस सवाल के जवाब में अमित कुमार कहते हैं, ‘‘हमारा काम जनता की सेवा करना है. हम जनता के सेवक हैं. अगर सिविल सेवा में गए लोग सेवा भाव से काम करेंगे तो काफी हद तक इस समस्या का समाधान किया जा सकता है.’’

अमित कुमार के पिता वीरेंद्र भारती प्राइमरी स्कूल में टीचर हैं और मां सुमन देवी गृहिणी हैं. अपने बेटे की कामयाबी पर पिता बहुत खुश हैं और कहते हैं, ‘‘अमित जैसा बेटा पा कर हमें गर्व महसूस होता है. हर मांबाप को अमित जैसा होनहार और काबिल बेटा मिलना चाहिए.’’

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अमित कुमार के 2 भाई और एक बहन हैं.

अमित कुमार की इस कामयाबी पर तमाम संस्थाओं ने उन्हें सम्मानित किया है. दलित महापरिसंघ के प्रमुख चंदन लाल बाल्मीकि ने अमित कुमार के सम्मान में एक बड़ी प्रैस कौंफ्रैंस कराई और उन्हें परिसंघ की ओर से सम्मानित भी किया.

अमित कुमार गौतम बुद्ध, डाक्टर भीमराव अंबेडकर, महात्मा गांधी, ज्योतिराव फुले और अपने गुरु सतीश कुमार वर्मा को अपना आदर्श मानते हैं.

सिविल सेवा में जाने के लिए नौजवानों को पढ़ने के लिए किनकिन किताबों की मदद लेनी चाहिए? इस सवाल के जवाब में अमित कुमार कहते हैं कि एनसीआरटी की किताबें इस की तैयारी के लिए बहुत ही कारगर होती हैं.

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सीसैट लागू होने पर हिंदी बैल्ट के बहुत से छात्र सिविल सेवा में नहीं जा पा रहे हैं. क्या यह बात सही है? इस सवाल के जवाब में अमित कुमार कहते हैं, ‘‘शुरुआत में हिंदी बैल्ट के छात्रों पर फर्क पड़ा था, मगर अब हालात बदल गए हैं और हिंदी बैल्ट के छात्र सीसैट पैटर्न में लगातार कामयाबी हासिल कर रहे हैं.’’

बिकाऊ मीडिया

मीडिया की निष्पक्षता व ईमानदारी पर प्रश्नचिह्न तो हमेशा लगते रहे हैं पर इस बार जिस तरह मीडिया ने सरकारी पक्ष लिया है और जिस तरह कुछ चैनलों व समाचारपत्रों ने अपनी नीतियां बनाई हैं, उन से मीडिया भी जनता के सामने कटघरे में खड़ा हो गया है.

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मीडिया या प्रैस की स्वतंत्रता को संविधान में राजनीतिक दलों से ज्यादा महत्ता दी गई है. संविधान की प्रस्तावना (प्रिअंबल) में चुनावों को जनता की प्राथमिकता नहीं बताया गया है बल्कि विचारों की अभिव्यक्ति को संविधान का मुख्य ध्येय घोषित किया गया है. मौलिक अधिकारों में चुनावों, पार्टियों, नेताओं की चर्चा नहीं है लेकिन संविधान के अनुच्छेद 19 (1) (ए) में विचारों की स्वतंत्रता को मौलिक अधिकार बताया गया है.

प्रैस और मीडिया का अधिकार चुनावों, नेताओं, प्रधानमंत्री से ऊपर है पर जिस तरह से इस बार इन पर आरोप लग रहे हैं, इस से स्पष्ट है कि प्रैस व मीडिया ने अपना स्तर घटा दिया है. जो विशिष्ट स्थान उसे संविधान के तहत मिला हुआ है, उसने उस की धज्जियां उड़वा ली हैं. बिकाऊ मीडिया का तमगा कितने ही चैनलों, ऐंकरों, समाचारपत्रों पर लग चुका है. इलैक्ट्रौनिक मीडिया ने लाइसैंसों के चक्कर में और प्रिंट मीडिया ने विज्ञापनों के लिए सरकार की जो चाटुकारिता की है, वह जनता की आंखों से बच नहीं पाई है.

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समाचारपत्र उस जमाने में भी सरकार के पक्ष या विपक्ष में खड़े होते थे जब टैलीविजन व रेडियो सिर्फ सरकारी थे और डिजिटल मीडिया का आविष्कार नहीं हुआ था. पर फिर भी वे अपनी स्वतंत्रता का आवरण ओढ़े रहने में सफल रहते थे. इस बार अति हो गई है. ज्यादातर चैनल और समाचारपत्र खुल्लमखुल्ला सरकार के पक्ष में खड़े हैं.

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कम्युनिस्ट या तानाशाही देशों में जिस तरह के समाचारपत्र और टीवी चैनल होते थे, एक लोकतंत्र में इन का वैसे होना गंभीर खतरे की निशानी है. खतरा यह भी है कि मीडिया में जो प्रकाशित होगा उस में हर बात पर प्रश्न लगा रहेगा कि क्या यह सरकार या पार्टीविशेष द्वारा प्रायोजित है.

विडंबना यह है कि 1975-1977 में इंदिरा गांधी की सरकार ने यह काम पुलिस के बलबूते कराया था. इस बार यह अपनेआप किया जा रहा है और शायद रोजगार को बचाना ज्यादा बड़ा कारण है बजाय सरकारी भय या लालच के. मौलिक अधिकार इतने सस्ते हो सकते हैं, ऐसा पहली बार दिख रहा है.

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