News Story : संविधान सत्ताधारी और सब से ज्यादा साल

News Story: ‘‘यार, ऐसा कौन सा सरप्राइज देना है, जो तू मुझे  इस हाउसिंग सोसाइटी के बाहर ले आई? तेरा कोई दोस्त रहता है क्या यहां?’’ विजय ने तंग आ कर अनामिका से पूछा.

‘‘इतनी भी क्या जल्दी है. अंदर तो चलो पहले,’’ अनामिका बोली और विजय को उस सोसाइटी के 7वें फ्लोर पर एक 2 बैडरूम सैट के बाहर ले गई.

‘‘यहां कौन रहता है?’’ विजय ने सवाल किया.

‘‘अभी तो कोई नहीं रहता, पर जल्दी ही कोई यहां अपने सपनों की दुनिया बसाएगा…’’ अनामिका ने इतना कहा और अपने पर्स से एक चाबी निकाली, ‘‘अब जरा दरवाजा खोलिए.’’

हैरान विजय ने उस चाबी से दरवाजा खोला और वे दोनों उस फ्लैट के भीतर दाखिल हुए. वह सोसाइटी बहुत अच्छी लोकेशन पर बनी थी, पर विजय के दिमाग में कुछ और ही चल रहा था.

‘‘अरे बाबा, इतनी चिंता क्यों कर रहे हो. यह फ्लैट मेरे पापा ने मुझे गिफ्ट में दिया है. कब तक किराया भरती रहूंगी…’’ अनामिका ने राज खोला.

‘‘बधाई मेरी जान,’’ इतना कह कर विजय ने अनामिका को गले लगा लिया.

‘‘डार्लिंग, आप भी अपना सामान यहां रख सकते हैं, पर एक बात का ध्यान रखना,’’ अनामिका बोली.

‘‘कौन सी बात?’’ विजय ने पूछा.

‘‘यही कि तुम इस घर में रह सकते हो, अपनी चला भी सकते हो, पर रहेगा यह मेरा ही. मैं तुम्हें जनता की तरह इजाजत और अधिकार देती हूं कि तुम एक जनप्रतिनिधि की तरह इस घर को चलाओ और हम दोनों के सुनहरे सपनों को पूरा करो,’’ अनामिका बोली.

‘‘जनता, जनप्रतिनिधि, अधिकार… क्या है यह सब?’’ विजय ने पूछा.

‘‘देश का हाल देख कर मैं यह सब कह रही हूं. हाल ही में नरेंद्र मोदी ने सब से ज्यादा दिन तक प्रधानमंत्री बने रहने का रिकौर्ड बनाया है, पर ऐसा लग रहा है जैसे जनता ने उन्हें नहीं, बल्कि उन्होंने किसी दैवीय अधिकार के बल पर प्रधानमंत्री पद हासिल किया है,’’ अनामिका बोली.

‘‘हम दोनों के बीच में राजनीति कहां से आ गई. तुम्हें ऐसा क्यों लग रहा है कि नरेंद्र मोदी जनता के नहीं, बल्कि ईश्वर के प्रतिनिधि हैं?’’ विजय ने एकदम से सवाल किया.

‘‘तुम्हें नहीं लगता कि पिछले 12 साल में भारत में ‘राजा का दैवीय अधिकार’ वाली सोच बढ़ी है. बह्मा की बनाई इस दुनिया में ‘मनुस्मृति’ के हिसाब से ‘राजा विष्णु का अंश है’ बताया गया है. मतलब राजा भगवान का प्रतिनिधि है और जनता का काम सेवा करना और टैक्स देना है.

‘‘पर असलियत में ऐसा नहीं है. धर्मग्रंथों में भले ही बह्मा ने दुनिया बनाई है, पर 1947 के बाद हम जनता ने तय किया कि ‘दैवीय अधिकार’ वाली थ्योरी नहीं चलेगी. हम भारत के लोग हैं और यहां का शासन संविधान से चलेगा. जनता का कोई भी प्रतिनिधि संविधान की रक्षा की शपथ लेता है, ईश्वर बचाने की नहीं. जब भी कोई प्रधानमंत्री खुद को संविधान से ऊपर सम?ाता है, तो जनता उसे गद्दी से उतार देती है. बिना किसी खूनखराबे के,’’ अनामिका बोली.

‘‘पर नरेंद्र मोदी ने कब कहा कि वे ईश्वर के प्रतिनिधि हैं?’’ विजय ने सवाल किया.

‘‘बताती हूं और मुझे  इस बात का बहुत ज्यादा दुख हुआ जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने बारे में ‘नौन बायोलौजिकल’ वाला बयान दिया था,’’ अनामिका बोली.

‘‘कौन सा बयान?’’ विजय ने पूछा.

‘‘नरेंद्र मोदी ने 2024 में हुए लोकसभा चुनाव के दौरान एक इंटरव्यू में एक बात कही थी कि ‘जब मेरी मां जिंदा थीं, मुझे लगता था कि मैं बायोलौजिकल रूप से पैदा हुआ हूं. उन के जाने के बाद मैं मानने लगा हूं कि परमात्मा ने मुझे भेजा है. यह ऊर्जा बायोलौजिकल नहीं हो सकती, मुझे परमात्मा ने काम के लिए भेजा है’.’’

‘‘पर यह तो उन्होंने भावनात्मक या आध्यात्मिक संदर्भ में कहा था. मां के निधन के बाद अब वे खुद को ‘ईश्वर का उपकरण’ मानते हैं यानी वे काम करने के लिए भेजे गए हैं, बस उन का शरीर बायोलौजिकल है. उन के समर्थकों ने इसे ‘सेवा भाव’ कहा था,’’ विजय बोला.

‘‘क्या तुम्हें नहीं लगता कि इस कथन में स्वयं को ईश्वर का दूत बताने या जताने की कोशिश की गई है? वे जनता के सेवक हैं और एक चुने हुए जनप्रतिनिधि, इसलिए उन्हें ऐसा कोई दावा नहीं करना चाहिए कि वे ईश्वर के कहने पर काम करते हैं,’’ अनामिका ने अपनी बात रखी.

‘‘मतलब हम भारत की जनता ही संविधान का मूल हैं?’’ विजय ने सीधा सवाल किया.

‘‘हां, बिलकुल सही बोला तुम ने. भारतीय संविधान का यही बेसिक आइडिया है. इसे ‘लोकतांत्रिक गणराज्य’ और ‘प्रतिनिधि लोकतंत्र’ कहते हैं. तुम नहीं जानते कि भारत का संविधान क्या कहता है?’’

‘‘क्या कहता है, बताओ तो जरा?’’ विजय ने सवाल दागा.

‘‘संविधान की ‘प्रस्तावना’ के पहले 3 शब्द ही सब बता देते हैं कि ‘हम, भारत के लोग…’ यानी सत्ता का सोर्स जनता है, राजा या कोई तानाशाह नहीं.

‘‘अनुच्छेद 326 को समझ, जिस में हर बालिग भारतीय को वोट देने का अधिकार है. इसी वोट से जनता अपनी ‘ताकत’ किसी विधायक या सांसद को ‘उधार’ देती है. जनता ही असली मालिक है. 5 साल में एक बार आप वोट दे कर बताते हो कि शासन कौन चलाएगा. तो असली पावर आप के पास हुई न?

‘‘आसान शब्दों में कहूं तो जनता के चुने हुए प्रतिनिधि नौकर की तरह होते हैं. विधायक, सांसद, प्रधान, मेयर… ये सब जनता के नौकर हैं. इन का काम है आप के लिए कानून बनाना, बजट पास करना, सरकार चलाना.’’

‘‘अगर तुम्हारी ही बात को सही माना जाए तो मैं सरकार को नौकर नहीं, बल्कि ट्रस्टी कहूंगा. सरकार आप की दी हुई ताकत को ट्रस्ट की तरह चलाती है. मनमानी की तो 5 साल बाद आप कुरसी छीन सकते हो,’’ विजय ने कहा.

‘‘कह सकते हैं, पर डाक्टर अंबेडकर ने संविधान सभा में कहा था कि संविधान में जनता सर्वोच्च है. सरकार उस के प्रति जवाबदेह है. पर सारी गड़बड़ तब होती है, जब प्रतिनिधि मालिक बन जाता है. वह जनता को भूल कर सिर्फ पार्टी

या पैसे के लिए काम करता है,’’ अनामिका बोली.

‘‘पर अगर जनता ही सो जाए तो?’’ विजय ने सवाल किया.

‘‘जनता के सोने का मतलब है वोट न देना, सवाल न पूछना या फिर जातिधर्म के नाम पर वोट देना. फिर नेता तानाशाह हो जाते हैं. यही आजकल हो रहा है. जहां देखो लोग जाति, धर्म और समाज के नाम पर बंट रहे हैं. यह वर्तमान सरकार का ही कियाधरा है.’’

‘‘मतलब नरेंद्र मोदी ने अपने राज में कोई भी ढंग का काम नहीं किया?’’ विजय ने पूछा.

‘‘ज्यादा कुछ खास नहीं. बस, देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को ही ज्यादा कोसा, जबकि उन के राज में देश के हालात बहुत ज्यादा अच्छे नहीं थे. जनता आजादी का मतलब भी ढंग से नहीं जानती थी. इस के बावजूद उस समय में देश को आगे बढ़ाने के कई काम हुए थे.’’

‘‘जैसे?’’ विजय ने सवाल किया.

‘‘भले ही नरेंद्र मोदी सब से ज्यादा दिन तक प्रधानमंत्री बनने का रिकौर्ड अपने नाम कर चुके हैं और खूब काम कराने की लिस्ट जनता को दिखाते रहते हैं, लेकिन देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के कार्यकाल में हुए बड़े कामों को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. देश के बंटवारे के बाद भारत में उन्होंने लोकतंत्र और संविधान की नींव रखी थी और 26 जनवरी, 1950 को दुनिया का सब से बड़ा लिखित संविधान दिया था.

‘‘जब देश में 1951-52 में पहला आम चुनाव हुआ था, तब तकरीबन 17 करोड़ वोटर थे, उन में से 85 फीसदी अनपढ़. तब दुनिया को लगा था कि भारत टूट जाएगा, पर जवाहरलाल नेहरू ने चुनाव आयोग को फ्री हैंड दिया. चुनाव सफल हुआ, जिस से लोकतंत्र मजबूत हुआ.

‘‘नेहरू के राज में देश में भिलाई, राउरकेला, दुर्गापुर जैसी जगहों पर स्टील उद्योग लगे. भाखड़ा नांगल, हीराकुंड, दामोदर वैली डैम बने. विदेश नीति में भारत तीसरी दुनिया की आवाज बना. चीन के साथ पंचशील समझोता किया.

‘‘सामाजिक सुधार की बात करें तो हिंदू कोड बिल 1955-56 लाया गया. हिंदू महिलाओं को तलाक, संपत्ति में हक, एक विवाह का कानून बना. बड़े जमींदारों से जमीन ले कर ‘सीलिंग’ लगाई. गांवों में स्कूल, सड़क, स्वास्थ्य केंद्र शुरू किए. पंचायती राज की नींव रखी.

‘‘नेहरू राज की सब से बड़ी कामयाबी यह थी कि वे जनता के सामने हाथ पसार कर उस के भले के काम करते थे और नरेंद्र मोदी जैसे किसी तानाशाह की तरह जबरदस्ती करते दिखाई देते हैं कि किसी ने जरा सी भी चूं की तो बुलडोजर से सब तहसनहस कर दिया जाएगा.’’

‘‘इस सरकार ने कौन सी तानाशाही दिखाई है?’’ विजय ने पूछा.

‘‘अगर नरेंद्र मोदी सरकार की अर्थव्यवस्था से जुड़े मुद्दों पर बात की जाए तो साल 2016 की नोटबंदी को याद करो. तब सरकार ने अचानक से 500 और 1,000 के नोट यह कह कर बंद कर दिए थे कि सरकार का मकसद कालाधन रोकना था. इस सारे तामझाम में कालाधन कितना वापस आया, अगर इसे नजरअंदाज भी कर दें तो भी तब छोटे व्यापार और कैश इकोनौमी को तगड़ा झटका लगा था. इतना ही नहीं, पिछले 12 साल में देश में बेरोजगारी बढ़ी है. जीडीपी ग्रोथ में भी बहुत ज्यादा उतारचढ़ाव रहा. साल 2017 से 2020 के बीच यह ग्रोथ बेहद धीमी रही.

‘‘साल 2020 में सरकार के लाए 3 कृषि कानून तो तुम्हें याद ही होंगे. तब किसान संगठनों ने एक साल तक दिल्ली बौर्डर पर प्रदर्शन किया था. उन का कहना था कि इस से एमएसपी खत्म हो जाएगी और कौर्पोरेट हावी होंगे. थकहार कर साल 2021 में सरकार ने तीनों कानून वापस ले लिए थे.

‘‘इस से पहले नागरिकता संशोधन कानून 2019 के चक्कर में देशभर में विरोध हुआ था. बहुत से लोगों ने इसे धर्म पर आधारित बताया था, जबकि सरकार का कहना था यह कानून सिर्फ शरणार्थियों के लिए है, भारतीय नागरिकों पर लागू नहीं होगा. यह जो लोगों के बीच डर का माहौल बना है, यह मोदी सरकार की सब से बड़ी नाकामी मानी जाएगी,’’ अनामिका बोली.

‘‘तुम तो विपक्ष जैसी दलील दे रही हो. मोदी सरकार से बड़ी राष्ट्रवादी सरकार आज तक नहीं आई है. इस सरकार का तो कहना ही यह है कि देशहित पहले, बाकी सब बाद में,’’ विजय ने कहा.

‘‘अच्छा? फिर इस सरकार पर जांच एजेंसियों का इस्तेमाल करने का आरोप क्यों लगा? ईडी, सीबीआई जैसी जांच एजेंसियों की कार्रवाइयों में 95 फीसदी केस विपक्षी नेताओं पर ही क्यों हुए?

‘‘और अगर प्रधानमंत्री इतने ही दबंग नेता हैं, तो मई, 2023 से मैतेईकुकी संघर्ष में 200 से ज्यादा मौतें हुई थीं, तब प्रधानमंत्री द्वारा इस मुद्दे पर बहुत देर के बाद बयान देने और मणिपुर न जाने पर खूब आलोचना क्यों हुई थी?’’ अनामिका ने सवाल किया.

‘‘पर इस सरकार ने कोविड काल में खूब वाहवाही बटोरी थी. कितना बढि़या मैनेजमैंट दिखा था तब,’’ विजय ने मानो बचाव सा किया.

‘‘कोविड की दूसरी लहर अप्रैलमई 2021 में आई थी. इस के बावजूद अस्पतालों में औक्सीजन सिलैंडरों और बिस्तरों की कमी देखी गई थी. कितने ही लोग बेमौत मारे गए थे.

‘‘जब मार्च 2020 में अचानक लौकडाउन लगा था, तब महज 4 घंटे के नोटिस पर प्रवासी मजदूरों का पलायन शुरू हो गया था.’’

‘‘तुम्हें तो सरकार की हर बात में कमी नजर आती है. हम ने अपने पड़ोसी देशों पर नकेल कस रखी है,’’ विजय तुनक कर बोला.

‘‘तुम्हारी याददाश्त बड़ी कमजोर है. साल 2020 का चीन सीमा विवाद भूल गए जब गलवान में 20 जवान शहीद हुए थे. विपक्ष का आरोप है कि सरकार ने ‘चीनी घुसपैठ’ की बात स्वीकारी नहीं.

‘‘चलो, इसे भी नजरअंदाज करते हैं. रुपए की गिरावट पर क्या कहोगे?

साल 2014 में एक डौलर 60 रुपए के बराबर था, जबकि साल 2024 में एक डौलर 83 रुपए के बराबर हो गया था. मतलब, रुपया कमजोर हुआ था. आज 95 रुपए बराबर एक डौलर है,’’ अनामिका ने तेज आवाज में कहा.

‘‘अच्छा, मुझे  यह बता कि तुझे  नरेंद्र मोदी से दिक्कत क्या है?’’ विजय ने सवाल किया.

‘‘मुझे  किसी भी नेता से कोई दिक्कत नहीं है. अगर जनता ने किसी को वोट दे कर चुना है, तो यह लोकतंत्र की असली पहचान है. पर जब नेता जनता को सेवक समझने की भूल करते हैं, तो उन की सोच से तानाशाही की बू आती है. वे भूल जाते हैं कि जनता ने उन्हें काम करने की इजाजत दी है.

‘‘अगर सरकार की तरफ से देश में 80 करोड़ लोगों को मुफ्त भोजन दिया जा रहा है तो यह सरकार की उपलब्धि नहीं है. सरकार को तो देश में ऐसा ढांचा तैयार करना चाहिए कि हर हाथ को काम मिले, हर पेट को रोटी मिले, हर तन को कपड़ा और घर मिले. ऐसा कर के कोई सरकार जनता पर अहसान नहीं कर रही है, बल्कि सरकार तो बनी ही इसी काम के लिए है.

‘‘जब नेता जनता को बरगलाते हैं, चाहे वह धर्म के नाम पर हो या जातबिरादरी के नाम पर तो शक पैदा होता ही है,’’ अनामिका बोली.

‘‘तो इस का हल क्या है?’’ विजय ने पूछा.

‘‘हल यही है कि जब कोई जनप्रतिनिधि संविधान की रक्षा की कसम खा कर प्रधानमंत्री या कोई भी मंत्री आदि बनता है तो वहां संविधान का मतलब है जनता की रक्षा करना. संविधान तो नियमों की एक किताब है. उस का आदर करें, पर जनता को न भूलें, क्योंकि लोकतंत्र में जनता ही जनार्दन है,’’ अनामिका ने अपनी बात रखी.

‘‘जनार्दन साहिबा, मैं आप की बात सम?ा गया. यह घर गिफ्ट में मिलने की तुम्हें दोबारा बधाई और अंकल को मेरी तरफ से थैंक्स कहना. बाकी इस घर को हम दोनों संवारेंगे और इसे दुनिया की सब से खूबसूरत जगह बनाएंगे, मेरा वादा है,’’ विजय ने कहा और अनामिका को चूम लिया.

Indian Constitution: सनातन के लिए संविधान पर चलाया जूता

Indian Constitution: भारत का सुप्रीम कोर्ट वह जगह है, जहां संविधान की आत्मा बसती है. जहां शब्द नहीं, व्यवस्था बोलती है. जहां न्याय की मर्यादा सब से ऊपर मानी जाती है. वहीं ऐसा सीन सामने आया, जिस ने पूरे देश को शर्मसार कर दिया.

सुनवाई के दौरान, 71 साल के एक वकील राकेश किशोर ने चीफ जस्टिस बीआर गवई की ओर जूता फेंकने की कोशिश की. यह न केवल एक अदालत की इज्जत को भंग करना था, बल्कि यह घोर पौराणिक और सनातन सोच का प्रदर्शन था, जो आज भी यह स्वीकार नहीं कर पा रहा है कि भारत के सुप्रीम कोर्ट की कुरसी पर एक एससी बैठा है और दूसरे एससीएसटी, पढ़ेलिखे लोगों की तरह पुराणवादियों की कठपुतली बनने को तैयार नहीं है.

चीफ जस्टिस बीआर गवई ने इस घटना को शांत भाव से लिया. उन्होंने कहा, ‘इस से मैं विचलित नहीं हुआ, कृपया कार्यवाही जारी रखिए.’

सामाजिक सोच

सवाल सीधा है कि अगर वही जूता किसी एससीएसटी ने ऊंची जाति के चीफ जस्टिस की ओर फेंका होता, तो क्या वही सहिष्णुता दिखाई जाती? क्या तब यह मामला भी माफ कर देने जितना हलका होता? वह वकील है, 71 साल का है और यह किसी किशोर का गुस्सा नहीं था. उस की हरकत में अनुभव, शिक्षा और विचार का मिश्रण था और यही उसे भयावह बनाता है.

किसी एससी चीफ जस्टिस पर इस तरह का हमला यह दिखाता है कि भारतीय समाज का एक हिस्सा अब भी उस ‘मनुस्मृति’ को भीतर दबाए बैठा है, जो कहती है कि शूद्र ज्ञान या न्याय पाने का अधिकारी नहीं है और उस से भी नीचे का अछूत एससी तो कतई नहीं, चाहे संविधान कुछ भी कहता रहे.

बीआर गवई का चीफ जस्टिस बनना उस व्यवस्था पर चोट है, जिस ने हमेशा सत्ता और न्याय को ऊंची जातियों के दायरे में सीमित रखा. एक एससीएसटी का सर्वोच्च न्यायासन पर बैठना उस सोच के लिए असहनीय है, जो अपने वर्चस्व को ईश्वरीय व्यवस्था मानती है. हां, ऐसा जना चुपचाप अगर ऊंची जातियों को माईबाप मानता रहे, तो ठीक है.

इस घटना के बाद सोशल मीडिया पर कुछ पोस्टें आईं. किसी ने लिखा, ‘गवई तो बैचलर हैं, मास्टर नहीं’. यह तंज नहीं, जातिगत ईष्या का प्रदर्शन था. असलियत यह है कि चीफ जस्टिस बीआर गवई मास्टर इन ला में गोल्ड मैडलिस्ट हैं. लेकिन फिर भी सवाल उठे. ‘वह कैसे मुख्य न्यायाधीश बन गया और वह सनातनी वकील वकील ही क्यों रह गया?’

यह सवाल पढ़ाईलिखाई या काबिलीयत का नहीं है, बल्कि उस सामाजिक सोच का है, जो यह नहीं स्वीकार कर पाती कि कभी ‘अछूत’ कहे जाने वाले लोग अब न्याय और सत्ता के केंद्र में पहुंच चुके हैं.

संविधान बनाम ‘मनुस्मृति’

भारत का संविधान कहता है कि सभी नागरिक समान हैं. किसी के साथ धर्म, जाति, लिंग या जन्म के आधार पर भेदभाव नहीं किया जाएगा, जबकि ‘मनुस्मृति’ का मानना है कि ब्राह्मण ही ईश्वर का मुख है, शूद्र उस के पैर हैं. ‘मनुस्मृति’ अछूतों की बात ही नहीं करती जो शूद्रों से भी नीचे हैं और जिन को कंट्रोल करने के लिए शूद्रों को डंडाभाला दिया गया है.

इन दोनों विचारों के बीच टकराव सिर्फ इतिहास का नहीं है, बल्कि यह वर्तमान भारत का सच है. चीफ जस्टिस बीआर गवई का वजूद ही इस टकराव की याद दिलाता है. वे संविधान के उस वादे के प्रतीक हैं, जिस में हर भारतीय को समान अवसर का अधिकार दिया गया है, पर यह समानता सिर्फ कागज पर नहीं टिक सकती, अगर समाज की मानसिकता बदलने को तैयार न हो.

जूता फेंकने वाला वकील संविधान से नहीं, उस के समानता के सिद्धांत से चिढ़ा हुआ था. वह यह नहीं सह सकता था कि एक दलित किसी ऊंची जाति की याचिका को नामंजूर कर दे. उस की मूर्ति को दोबारा स्थापित करने की मांग खारिज हुई, तो वह धर्म के नाम पर संविधान पर चोट करने निकल पड़ा.

कोर्ट में धर्म की दखलअंदाजी

यह पूरा मामला खजुराहो मंदिर परिसर से जुड़ा था. वकील ने एक याचिका दायर की थी कि वहां भगवान विष्णु की 7 फुट ऊंची मूर्ति को दोबारा स्थापित करने का आदेश दिया जाए. चीफ जस्टिस बीआर गवई ने अपनी पीठ से यह याचिका खारिज करते हुए कहा कि यह धार्मिक मामला है, इसे अदालत नहीं, बल्कि भगवान पर छोड़ दीजिए.

यह संविधानिक नजरिए से सही टिप्पणी थी, क्योंकि कोर्ट धर्म का निर्णायक नहीं है. वह कानून का व्याख्याता है, लेकिन मनुवादियों के लिए यह बेइज्जती बन गया, क्योंकि उन का लक्ष्य भगवान नहीं, बल्कि अपने धार्मिक वर्चस्व का प्रदर्शन था. और इस बात को मनुवादी मानने के लिए तैयार नही थे. इसी का नतीजा यह हुआ कि जूता फेंकने की कोशिश की गई. यह जूता धर्म के नाम पर संविधान के चेहरे पर मारा गया.

भाजपा सरकार की चुप्पी

इस घटना के बाद जो सब से ज्यादा चौंकाने वाली बात रही, वह थी भाजपा सरकार की चुप्पी. न प्रधानमंत्री ने प्रतिक्रिया दी, न गृह मंत्री ने और न ही कानून मंत्री ने.

सवाल यह है कि क्या यह चुप्पी सहमति की भाषा थी? जब किसी मंदिर पर पत्थर फेंका जाता है, तो पूरा राष्ट्रवादी तंत्र जाग उठता है. फिर जब न्याय के मंदिर पर हमला हुआ, तो वही लोग खामोश क्यों रहे?

सुप्रीम कोर्ट अकसर छोटीछोटी बातों पर खुद से संज्ञान लेता है, तो फिर संविधान के सम्मान पर हुए इस हमले पर चुप क्यों रहा? क्या यह इसलिए कि हमला करने वाला ‘हमारा’ था या इसलिए कि जिस पर हमला हुआ, वह ‘दलित’ था?

न्यायपालिका में प्रतिनिधित्व की असमानता

भारतीय न्यायपालिका में सामाजिक प्रतिनिधित्व का संकट नया नहीं है. देश की बड़ी अदालतों में बहाल जजों में 80 फीसदी से ज्यादा सवर्ण बैकग्राउंड के होते हैं. सुप्रीम कोर्ट में दलित, पिछड़े या आदिवासी वर्गों से आने वाले जजों की संख्या उंगलियों पर गिनी जा सकती है.

बीआर गवई का चीफ जस्टिस बनना इसलिए ऐतिहासिक था. वे यह प्रमाण हैं कि संविधान ने कम से कम एक शख्स को वह अवसर दिया जो ‘मनुस्मृति’ ने कभी नहीं दिया था. लेकिन इसी वजह से उन की उपस्थिति कई लोगों के लिए चुनौती बन गई, क्योंकि बीआर गवई का नाम यह साबित करता है कि भारत में न्याय केवल ब्राह्मण नहीं कर सकता, दलित भी कर सकता है.

सनातनी सोच की जड़ें बहुत गहरी

ब्राह्मणवाद कोई धर्म नहीं, एक विचार प्रणाली है जो श्रेष्ठता के भरम पर टिकी है. यह उस समय की देन है, जब समाज को जातियों में बांट कर सत्ता और ज्ञान कुछ हाथों में कैद कर दिया गया था. आज वही सोच नए रूपों में फिर से उभर रही है. कभी यह काबिलीयत के नाम पर कभी मैरिट के नाम पर, कभी संस्कृति के नाम पर समानता का विरोध करती है. जूता फेंकने वाला शख्स उसी सोच का प्रतिनिधि था, जो यह मानती है कि दलितों को सम्मान देना सामाजिक व्यवस्था का अपमान है.

मीडिया की भूमिका और चुप्पी

सब से गलत पहलू यह रहा कि मुख्यधारा मीडिया ने इस घटना को ‘बड़ी खबर’ की तरह नहीं उठाया, जहां मनोरंजन की छोटी घटनाएं घंटों तक चलती हैं. वहीं सुप्रीम कोर्ट की इस शर्मनाक घटना पर कुछ सैकंड की खबर, कुछ कौलम की रिपोर्ट बस इतना ही.

मीडिया की यह चुप्पी सिर्फ पत्रकारिता की नाकामी नहीं, लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की कमजोरी भी है, क्योंकि यह घटना केवल जूता फेंकने की नहीं थी, बल्कि यह संविधान की आत्मा पर पुराणवाद द्वारा किया गया प्रतीकात्मक प्रहार था.

संविधान की ताकत

जस्टिस बीआर गवई ने जो किया, वह न्याय का नहीं, संस्कार का उदाहरण था. उन्होंने कहा कि ‘मुझे इस से कोई फर्क नहीं पड़ता’. यह वाक्य साधारण नहीं है. यह उस शख्स का कहना है, जिस ने जाति के कांटों के बीच चल कर न्याय के मंदिर तक पहुंचने का सफर तय किया.

उन्होंने उसे माफ किया, लेकिन यह माफी उन की नहीं, संविधान की गरिमा की थी. वे जानते थे कि अगर वे प्रतिशोध लेंगे, तो लोग कहेंगे कि देखो, दलित जज भावनात्मक है, इसलिए उन्होंने माफी को हथियार बनाया.

पर इस माफी को समाज बुजदिली न सम झे, चेतावनी सम झे. यह पक्का है कि अगर उलटा होता तो जूता फेंकने वाले का पूरा परिवार और उस के दोस्त थानों में बैठे बयान दर्ज करा रहे होते.

आत्ममंथन की जरूरत

यह घटना न्यायपालिका के लिए भी आत्ममंथन का अवसर है. क्या हमारी अदालतें वास्तव में हर नागरिक के लिए समान हैं? क्या न्याय की कुरसी पर बैठने वालों का चयन सिर्फ काबिलीयत से होता है या उस में सामाजिक ढांचे की झलक भी है?

समानता का मतलब केवल अवसर देना नहीं, सम्मान की रक्षा करना भी है. जब किसी चीफ जस्टिस पर इस तरह हमला होता है, तो यह केवल उस शख्स का नहीं, पूरे संस्थान का अपमान है.

सामाजिक न्याय का अधूरा सपना

डाक्टर भीमराव अंबेडकर ने कहा था कि राजनीतिक स्वतंत्रता बेकार है, अगर सामाजिक स्वतंत्रता नहीं है. आज वही बात सही साबित होती है. हम ने संविधान बना लिया, आरक्षण दे दिया, कानून बना दिए लेकिन समाज का सोचने का ढंग अभी भी वही है. दलितों को न्याय, पिछड़ों को समान अवसर और स्त्रियों को सम्मान ये सब आज भी सिद्धांत हैं, असलियत नहीं.

ब्राह्मणवाद चाहे जितना भी सिर उठाए, संविधान का उजाला उस की छाया को मिटाने के लिए काफी है. चीफ जस्टिस बीआर गवई ने माफ कर दिया, पर भारत को यह भूलना नहीं चाहिए, क्योंकि यह माफी नहीं, एक संदेश है कि समानता की राह अभी लंबी है, पर जब तक संविधान है, आशा भी है. Indian Constitution

Indian Constitution: मनुवादी विधान की जकड़न में संविधान

Indian Constitution: डाक्टर भीमराव अंबेडकर ने शायद ही यह सोचा था कि उन के अनुयायी उन की बात को समझने के बजाय कोरा ‘जय भीम’ का जयजयकार करने लगेंगे. वे लोग समझ ही नहीं पा रहे हैं कि ‘जय गोपाल’, ‘श्रीराम’, ‘जय माताजी’ या ‘जय भीम’ सब मनु की परंपरा के परिचायक हैं.

भारतीय समाज में पिछड़ों और दलितों की दशा में सुधार लाने के लिए समाज के परंपरागत मजबूत तबकों से कड़ी जद्दोजेहद करते हुए संविधान सभा में पहुंचने के बाद दिनरात मेहनत कर के डाक्टर भीमराव अंबेडकर ने संविधान का मसौदा तैयार करने में कामयाबी हासिल की थी. पर, बेहद अफसोसजनक बात है कि हमारे देश में 76 साल से लागू संविधान आज भी महज एक राजकीय दस्तावेज ही बन कर रह गया है.

भारत की सब से बड़ी दिक्कत यह है कि इस देश का संविधान भले ही डाक्टर भीमराव अंबेडकर ने अपने ढंग से बनाया हो, पर इस संविधान की व्याख्या करने का पूरा काम आज भी मनु के कट्टर समर्थकों के हाथों में है, तभी तो राजस्थान हाईकोर्ट की जयपुर पीठ के सामने खड़ी मनु की प्रतिमा न्यायपालिका से संवैधानिक न्याय की उम्मीद से आने वालों को ठेंगा दिखा रही है.

गौरतलब है कि मनु का विधान हजारों सालों से इस देश के खून में घुला हुआ है, जिस ने गीता, धम्मपद, जिन्न सूत्र, गोरख वाणी, कबीर बीजक व गुरु ग्रंथ साहिब जैसी मजबूत आवाज को भी मुखर नहीं होने दिया है.

हालांकि, आधुनिक संविधान निर्माताओं ने अस्तित्व की आवाज की कोमलता को संविधान का हिस्सा नहीं बनने दिया. मनु की कठोरता से उपजे परंपरागत आरक्षण के जवाब में संवैधानिक आरक्षण की व्यवस्था भी की, पर क्योंकि मनु का विधान सदासदा से ही बेहद संरक्षित है, जिस का मूल कारण यह है कि यह विधिविधान सनातन धर्म व संस्कृति का चोला पहने हुए है.

लिहाजा, जो संवैधानिक व्यवस्थाएं इस देश की जिस 90 फीसदी आबादी के लिए की गई थीं, वही 90 फीसदी आबादी इन संवैधानिक व्यवस्थाओं के बजाय मनु की सनातन संस्कृति के धार्मिक विधान के अनुष्ठानों में लीन है.

यह दुख की बात है कि आजाद भारत के संविधान से वजूद में आई अदालतों में मनु की मूर्ति आज भी वैसी ही कुटिल मुसकान बिखेरती हुई संवैधानिक न्याय की उम्मीद में आए लोगों को चिढ़ा रही है.

आजादी के बाद वजूद में आई संवैधानिक व्यवस्था के कर्णधारों ने किसानों, मजदूरों व दलितों के लिए कुछ और ही उम्मीदें देखी थीं, तभी तो संविधान निर्माता ने संविधान की प्रस्तावना की शुरुआत में इन्हीं उम्मीदों के साथ लिखा था, ‘हम भारत के लोग भारत को एक संपूर्ण प्रभुत्व संपन्न, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए…’

बंद हो कोर्ट में पूजापाठ

पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस अभय ओका ने कानूनी बिरादरी के लोगों यानी वकीलों और जजों को सलाह दी थी कि उन्हें कोर्ट में पूजापाठ से बचना चाहिए.

जस्टिस अभय ओका का कहना था कि कानूनी जगत में शामिल लोगों को किसी भी काम की शुरुआत संविधान की प्रति के सामने झुक कर करनी चाहिए.

वहीं, जिस वक्त जस्टिस अभय ओका वकीलों और जजों से पूजापाठ की जगह संविधान के सामने सिर ?ाकाने को कह रहे थे, उस वक्त सुप्रीम कोर्ट के एक और जज जस्टिस भूषण आर. गवई भी वहां मौजूद थे. उन्होंने बिल्डिंग के समारोह का नेतृत्व किया था.

इस कार्यक्रम के दौरान जस्टिस भूषण आर. गवई ने भी कहा, ‘‘संविधान को अपनाए हुए 75 साल हो चुके हैं, इसलिए हमें संविधान का सम्मान दिखाने और इस के मूल्यों को अपनाने के लिए इस प्रथा की शुरुआत करनी चाहिए.’’

जस्टिस अभय ओका ने खुल कर कहा, ‘‘अब हमें न्यायपालिका से जुड़े हुए किसी भी कार्यक्रम के दौरान पूजापाठ या दीप जलाने जैसे अनुष्ठानों को बंद करना होगा. इस के बजाय हमें संविधान की प्रस्तावना रखनी चाहिए और किसी भी कार्यक्रम को शुरू करने के लिए उस के सामने झुकना चाहिए.

‘‘कर्नाटक में अपने कार्यकाल के दौरान मैं ने ऐसे धार्मिक अनुष्ठानों को रोकने की कोशिश की थी, लेकिन मैं इसे पूरी तरह से नहीं रोक पाया था. हालांकि, मैं इसे किसी तरह से कम करने में कामयाब जरूर रहा.’’
जयपुर हाईकोर्ट में

मनु की मूर्ति

जयपुर हाईकोर्ट देश का अकेला ऐसा हाईकोर्ट है, जिस के परिसर में ‘मनुस्मृति’ लिखने वाले मनु की मूर्ति लगी हुई है.

यह बेहद दुख की बात है कि औरतों और दलितों के विरोधी और इनसानी बराबरी के दुश्मन मनु की मूर्ति कोर्ट में लगी हुई है, जबकि उसी कोर्ट के बाहर अंबेडकर की मूर्ति लगाई गई है, जो अनदेखी की शिकार है.

गौरतलब है कि ‘मनुस्मृति’ में औरतों व शूद्रों के बारे में बेहद ऊंचनीच भरी बातें लिखी गई हैं. डाक्टर भीमराव अंबेडकर ने भी कहा था कि, ‘मनुस्मृति’ जाति की ऊंचनीच भरी व्यवस्था को मजबूत करती है, इसलिए उन्होंने 25 दिसंबर, 1927 को सरेआम ‘मनुस्मृति’ को जलाने की हिम्मत दिखाई थी.

साल 1989 में न्यायिक सेवा संगठन के अध्यक्ष पद्म कुमार जैन ने राजस्थान हाईकोर्ट के कार्यवाहक चीफ जस्टिस एमएम कासलीवाल की इजाजत से मनु की इस बड़ी मूर्ति को लगवाया था. तब राज्यभर में खूब हंगामा मचा था और राजस्थान हाईकोर्ट की प्रशासनिक पीठ ने इसे हटाने के लिए रजिस्ट्रार के जरीए न्यायिक सेवा संगठन को कहा था.

लेकिन तभी हिंदू महासभा की तरफ से आचार्य धर्मेंद्र ने मनु की मूर्ति को हटाने के खिलाफ हाईकोर्ट में स्टे और्डर की याचिका लगा दी थी कि एक बार लगाई गई मूर्ति हटाई नहीं जा सकती. तब से ले कर आज तक केवल 2 बार ही इस मामले की सुनवाई हुई है. जब भी सुनवाई होती है, कोर्ट में टकराव का माहौल बन जाता है और मामला बंद कर दिया जाता है.

मनु की मूर्ति के विरोधियों का कहना है कि रोजरोज चिढ़ाते मनु का हम कुछ नहीं कर पा रहे हैं, क्योंकि मनुवाद फिर से बेहद मजबूत रूप से दोबारा उभर रहा है.

इस की वजह यह है कि दलित बहुजनों को मनु, मनुस्मृति, मनु मूर्ति और मनुवाद से अब कोई तकलीफ नहीं लगती है. अब वे वारत्योहार बतौर रस्म ‘जय भीम’ व ‘जयजय भीम’ चिल्लाते हैं. उन के लिए अंबेडकर का दर्शन महज प्रदर्शन की चीज बन कर रह गया है. Indian Constitution

Indian Constitution: अंबेडकर को पूजिए नहीं, संविधान को मानिए

Indian Constitution: देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 14 अप्रैल को ‘अंबेडकर जयंती’ के मौके पर डाक्टर भीमराव अंबेडकर की जिस मूर्ति की पूजा कर रहे थे, उस पर फूलमाला चढ़ा रहे थे, उस मूर्ति के हाथ में संविधान है. इस का मतलब यह होता है कि अंबेडकर के साथसाथ हम संविधान की भी पूजा कर रहे हैं.

नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बनने के बाद जब पहली बार संसद में जा रहे थे, तो संसद की सीढि़यों के सामने लेट कर नतमस्तक हुए थे. इस के बाद संविधान के प्रति अपनी आस्था को दिखाने के लिए ‘संविधान दिवस’ भी मनाना शुरू किया.

साल 2024 के लोकसभा चुनाव के जब नतीजे आए, तो यह साफ संकेत मिल गया था कि संविधान के मुद्दे पर ही भाजपा को हार का सामना करना पड़ा था. इस के बाद भाजपा संविधान और डाक्टर अंबेडकर को
ले कर सचेत हो गई.

11 जनवरी से 26 जनवरी के बीच ‘संविधान गौरव अभियान’ चलाया गया.

‘अंबेडकर जयंती’ पर इसी रणनीति के तहत भाजपा बड़ी संख्या में कार्यक्रम करा रही है. सवाल उठता है कि क्या केवल पूजा और सम्मान से बात बन जाएगी?

डाक्टर भीमराव अंबेडकर ने कहा था कि भले ही संविधान कितना ही अच्छा हो, उसे लागू करने वाले लोग अच्छे नहीं हैं, तो वह भी बुरा साबित हो सकता है. अब सुप्रीम कोर्ट का फैसला न केवल तमिलनाडु, बल्कि सभी राज्यों के लिए एक संवैधानिक चेतावनी भी है कि राज्यपालों को लोकतंत्र के पहरेदार की भूमिका में रहना चाहिए.

केंद्र सरकार को डाक्टर अंबेडकर की पूजा करने से बेहतर है कि वह उन के बनाए संविधान पर चले. आज संविधान और डाक्टर अंबेडकर जैसी ही हालत में महिलाएं भी पहुंच गई हैं. वैसे तो उन को लक्ष्मी बता कर पूजा जाता है, लेकिन अधिकार उन को नहीं दिए जाते हैं. संविधान ने लड़कियों को पिता की संपत्ति में बराबर का हक दिया है.

देश के कितने परिवारों ने अपने घर की महिलाओं को यह हक दिया? क्या सरकार ने कोई पहल की?

आज भी लड़कियों को पिता की संपत्ति अधिकार नहीं दिया जाता है. घर की मालकिन उस को कहा जाता है, पर मकान और बिजनैस पर नाम पुरुष के अधिकार में होता है स्टैंप डयूटी बचाने के लिए महिला के नाम रजिस्ट्री भले हो जाए, पर जमीन और मकान पर असल अधिकार आदमी का ही होता है.

जिस तरह से लक्ष्मी के रूप में औरतों को पूजा जाता है, उसी तरह से अंबेडकर और संविधान की पूजा तो होती है, लेकिन उस के बताए रास्ते पर चलते नहीं हैं.

समाज में दलितों की हालत अभी भी बहुत सोचने वाली है. उन को घोड़ी पर चढ़ने से रोका जाता है. मूंछें नहीं रखने दी जाती हैं. बारबार ‘मनुस्मृति’ का हवाला दिया जाता है. दलित इस समाज का हिस्सा नहीं हैं, यह जताने की कोशिश होती है. वह अंबेडकर की पूजा कर सकते हैं, लेकिन मंदिर में मूर्ति की पूजा करने से रोका जाता है.

इतना ही नहीं, दलितों के खिलाफ अत्याचार के मामलों में भाजपा शासित राज्य उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान और बिहार सब से ऊपर है. अनुसूचित जाति के खिलाफ साल 2022 में अत्याचार के सभी मामलों में से तकरीबन 97.7 फीसदी मामले 13 राज्यों में दर्ज किए गए, जिन में उत्तर प्रदेश, राजस्थान और मध्य प्रदेश में सब से ज्यादा अपराध दर्ज किए गए.

अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत नवीनतम सरकारी रिपोर्ट के अनुसार, अनुसूचित जनजाति (एसटी) के खिलाफ ज्यादातर अत्याचार भी इन 13 राज्यों में केंद्रित थे, जहां साल 2022 में सभी मामलों में से 98.91 फीसदी मामले इन 13 राज्यों में से सामने आए.

उत्तर प्रदेश, राजस्थान, और मध्य प्रदेश में सब से ज्यादा मामले सामने आए.

अनुसूचित जाति (एससी) के खिलाफ कानून के तहत साल 2022 में दर्ज किए गए 51,656 मामलों में से उत्तर प्रदेश में 12,287 के साथ कुल मामलों का 23.78 फीसदी हिस्सा था. इस के बाद राजस्थान में 8,651 (16.75 फीसदी) और मध्य प्रदेश में 7,732 (14.97 फीसदी) थे.

अनुसूचित जाति के खिलाफ अत्याचार के मामलों की ज्यादा संख्या वाले अन्य राज्यों में बिहार 6,799 (13.16 फीसदी), ओडिशा 3,576 (6.93 फीसदी) और महाराष्ट्र 2,706 (5.24 फीसदी) थे. इन 6 राज्यों में
कुल मामलों का तकरीबन 81 फीसदी हिस्सा है.

साल 2022 के दौरान भारतीय दंड संहिता के साथसाथ अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत पंजीकृत अनुसूचित जाति के सदस्यों के खिलाफ अत्याचार के अपराधों से संबंधित कुल मामलों (52,866) में से 97.7 फीसदी (51,656) मामले 13 राज्यों में हैं.

इसी तरह एसटी के खिलाफ अत्याचार के ज्यादातर मामले 13 राज्यों में केंद्रित थे. इस के तहत दर्ज 9,735 मामलों में से मध्य प्रदेश में सब से ज्यादातर 2,979 (30.61 फीसदी) मामले दर्ज किए गए.

राजस्थान में 2,498 (25.66 फीसदी) के साथ दूसरे सब से ज्यादा मामले थे, जबकि ओडिशा में 773 (7.94 फीसदी) दर्ज किए गए. ज्यादा संख्या में मामलों वाले अन्य राज्यों में 691 (7.10 फीसदी) के साथ महाराष्ट्र और 499 (5.13 फीसदी) के साथ आंध्र प्रदेश भी शामिल हैं.

कोर्ट से ले कर अपराध के आंकड़े तक बता रहे हैं कि कानून और संविधान का कितना पालन हो रहा है. ऐसे में केवल दिखावे के लिए डाक्टर अंबेडकर की मूर्ति पूजा से बदलाव नहीं आएगा.

देश में बदलाव तब आएगा जब दलित हो या औरतें उन को सही तरह से हक दिए जाएं. घरों में लड़कियों को आज भी खराब स्कूल में पढ़ने भेजा जाता है. उन के कैरियर को बढ़ाने के लिए पैसे खर्च करते समय घर वाले कई बार सोचते हैं.

शादीब्याह के मसलों में भी लड़कियों के हक न के बराबर हैं. औरत कितने बच्चे पैदा करेगी, यह तय करने का काम मर्द करता है. संविधान महिलाओं को पूरी आजादी देता है. समाज अभी भी छोटी सोच का परिचय देता है.

संविधान निर्माता डाक्टर भीमराव अंबेडकर को सच्ची श्रद्वांजलि वह होगी, जब सरकार उन के बनाए संविधान पर चले. उन की मूर्ति पर फूल चढ़ाने से कोई फायदा नहीं होने वाला है.

संविधान पर खतरा 

आम लोगों को एक सरकार से बहुत उम्मीदें होती हैं चाहे हर 5 साल बाद पता चले कि सरकार उम्मीदों पर पूरी नहीं उतरी. सरकार चलाने वालों के वादे असल में पंडेपुजारियों की तरह होते हैं कि हमें दान दो, सुख मिलेगा. हमें वोट दो, पैसा बरसेगा. अब के तो जैसे हम लोगों ने पंडेपुजारियों को ही संसद में चुन कर भेजा है. यह तब पक्का हो गया जब संसद सदस्यों ने लोकसभा में शपथ ली.

भाजपा सांसद कभी गुरुओं का नाम लेते, कभी ‘भारत माता की जय’ का नारा बोलते, तो कभी ‘वंदे मातरम’ और ‘जय श्रीराम’ एकसुर में चिल्लाते रहे. यह सीन एक धीरगंभीर लोकसभा का नहीं, एक प्रवचन सुनने के लिए जमा हुई भीड़ का सा लगने लगा था. भाजपा की यह जीत धर्म के दुकानदारों, धर्म की देन जातिवाद के रखवालों, हिंदू राष्ट्र की सपनीली जिंदगी की उम्मीदें लगाए थोड़े से लोगों की अगुआई वाली पार्टी के अंधे समर्थकों को चाहे अच्छी लगे, पर यह देश में एक गहरी खाई खोद रही हो, तो पता नहीं.

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जिन्हें हिंदू धर्मग्रंथों का पता है वे तो जानते हैं कि हम किस कंकड़ भरे रास्ते पर चल रहे हैं जहां झंडा उठाने वाले और जयजयकार करने वाले तो हैं, पर काम करने वाले कम हैं. ज्यादातर धर्मग्रंथ, हर धर्म के, चमत्कारों की झूठी कहानियों से भरे हैं. ये कहानियां सुनने में अच्छी लगती हैं पर जब इन को जीवन पर थोपा जाता है तो सिर्फ भेदभाव, डर, हिंसा, लूट, बलात्कार मिलता है.

सदियों से दुनियाभर में अगर लोगों को सताया गया है तो धर्म के नाम पर बहुत ज्यादा यह राजा की अपनी तानाशाही की वजह से बहुत कम था. पिछले 65 सालों में कांग्रेस का राज भी धर्म का राज था पर ऐसा जिस में हर धर्म को छूट थी कि अपने लोगों को मूर्ख बना कर लूटो. अब यह छूट एक धर्म केवल अपने लिए रखना चाह रहा है और संसद के पहले 2 दिनों में ही यह बात साफ हो रही थी.

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दुनिया के सारे संविधानों की तरह हमारा संविधान भी धर्म का हक देता है पर सभी जगह संविधान बनाने वाले भूल गए हैं कि धर्म का दुश्मन नंबर एक जनता का ही बनाया गया संविधान है. यह तो पिछले 300 सालों की पढ़ाई व नई सोच का कमाल है कि दुनिया के लगभग हर देश में एक जनप्रतिनिधि सभा द्वारा बनाया गया संविधान धर्म के भगवान के दिए कहलाए जाने वाले सामाजिक कानून के ऊपर छा गया है. अब भारत में कम से कम यह कोशिश की जा रही है कि हजारों साल पुराना धर्म का आदेश नए संविधान के ऊपर मढ़ दिया जाए.

सांसदों का शपथ लेने का पहला काम तो यही दर्शाता है. उम्मीद की जानी चाहिए कि भारतीय जनता पार्टी अपने वादों को याद रखेगी जो विकास और विश्वास के हैं न कि उन नारों के जो संसद में सुनाई दिए गए.

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