Hindi Story : हवेली का सन्नाटा

Hindi Story. पिछले 2 साल से अपने पति से दूर याशिका सिंह गांव की हवेली संभाल रही थी. साथ था उन का नौकर अंशु. एक रात याशिका ने अंशु को अपने कमरे में बुलाया और…

पूर्वांचल के ईश्वरपुर गांव में फैली 100 बरस पुरानी हवेली दूर से ही अपनी पहचान दर्ज कराती थी. ऊंची मेहराबें, चौड़े बरामदे, पार्क में खिले रंगबिरंगे फूल सब मिल कर हवेली की खूबसूरती में चार चांद लगा रहे थे.

इस हवेली के मालिक थे जमींदार शिवकांत सिंह, जो अब बूढ़े हो चले थे और उन का एकलौता बेटा डाक्टर आर्यवर्त सिंह पिछले 2 साल से इंगलैंड में था.

गांव में इस विशाल हवेली को जिंदा रखने वाले केवल 2 लोग थे, डाक्टर आर्यवर्त सिंह की पत्नी याशिका सिंह और हवेली की देखभाल में लगा 25 साल का बांका जवान अंशु.

याशिका सिंह पढ़ीलिखी और खूबसूरत औरत थी. शादी के बाद कुछ ही दिनों में उस का पति विदेश चला गया था. धीरेधीरे 2 साल बीत गए… संदेश आते, वीडियो काल कभीकभार होती, पर दूरी का सन्नाटा कहीं ज्यादा अखरता था.

हवेली जितनी विशाल थी, उतनी ही अकेली. लंबे बरामदे, खाली कमरे, भोर का धीमा उजाला और रात का गहरा अंधेरा, सब मिल कर याशिका सिंह के भीतर एक गहरी चुप्पी उतारते जा रहे थे.

याशिका सिंह अकसर सोचती, ‘क्या सचमुच शादी केवल एक रिश्ता है या एक ऐसा साथ जिसे दूरी खा जाती है?’

इधर अंशु अपना काम ईमानदारी से करता था. उस की हर हरकत में एक सादगी थी. वह बोलता कम, काम ज्यादा करता. जब वह आंगन में झाड़ू लगाता, तो जैसे हवेली भी किसी पुराने दिन को याद कर के मुसकराने लगती.

याशिका सिंह ने कई बार खुद को उसे देखते हुए पाया और हर बार खुद को झिड़क दिया. पर हवेलियों की चुप दीवारें मन पर भी अपना असर डालती हैं. जो बात मन टालना चाहे, वही बात आंखें ढूंढ़ने लगती हैं.

दिन बीतते गए. याशिका सिंह को लगा कि अंशु का होना हवेली के सन्नाटे को थोड़ा हलका कर देता है. वह कभी जरूरत पड़ने पर आंगन से आवाज लगाती और अंशु झट से हाजिर हो जाता. उस की आवाज में, चाल में, बरताव में एक ऐसी विनम्रता थी, जो किसी के भी मन को छू ले.

लेकिन वही विनम्रता अंशु के भीतर डर भी जगाती थी. वह अकसर सोचता, ‘मालकिन की नजरों में कहीं मैं गलत न समझ लिया जाऊं. थोड़ सी भी चूक हुई, तो बरबादी पक्की है.’

पर मन को कौन रोक पाता है? इनसान चाहे कितना भी सावधान हो, भीतर कहीं एक कोना रहता है, जो चुपचाप किसी की ओर खिंचना सीख जाता है, बिना इजाजत के, बिना ऐलान के.

एक रात को हलकी ठंड हवेली में सरक रही थी. बरामदे की लालटेन कांपती लौ के साथ डोल रही थी. अंशु गौशाला से लौट कर कमरे में ही पहुंचा था कि ऊपर से याशिका सिंह ने पुकारा, ‘‘अंशु, सुनो.’’

अंशु एकदम से चौंका. रात के इस समय मालकिन का पुकारना असाधारण था. वह धीमे कदमों से ऊपर चढ़ा. कमरे का दरवाजा आधा खुला था. अंदर पीतल का दीपक जल रहा था, जिस की नरम रोशनी कमरे के कोनों में गिर रही थी.

याशिका सिंह पलंग पर बैठी थी. चेहरे पर थकान थी, आवाज में विनती, ‘‘मेरा पैर बहुत दर्द कर रहा है. प्लीज, जरा दबा दो.’’

अंशु झिझक गया, ‘‘मालकिन यह काम तो.’’

याशिका सिंह ने बीच में ही धीमी पर मजबूत आवाज में कहा, ‘‘यह आदेश नहीं, एक आग्रह है.’’

अंशु ने सिर झुकाया और सावधानी से मालकिन के पैर दबाने लगा. पर कमरे में कुछ बदल रहा था, दीया टिमटिमा रहा था, हवा भारी हो गई थी और हवेली का पुराना सन्नाटा जैसे अचानक करीब आ कर खड़ा हो गया था.

अंशु के हाथ कांप रहे थे, क्योंकि उसे डर था… अपने हाथों से कम अपने धड़कते दिल से ज्यादा. उधर याशिका सिंह अपने भीतर की उस तनहाई से लड़ रही थी, जो इतने महीनों से जमा होतीहोती भारी हो गई थी.

अचानक, बिना चेतावनी, याशिका सिंह ने अंशु की कलाई पकड़ ली. अंशु एकदम कठोर हो गया, जैसे अचानक किसी ने उसे बर्फ में धकेल दिया हो. उस की सांसें अटक गईं.

‘‘अंशु…’’ याशिका सिंह की आवाज धीमी, भारी और अनसुनी सी थी, ‘‘हम तुम्हें चाहते हैं.’’

यह सुनते ही अंशु का चेहरा सफेद पड़ गया. वह कांपती आवाज में बोला, ‘‘मालकिन, अगर मालिक को मालूम हो गया, तो वे मुझे जिंदा नहीं छोड़ेंगे.’’

याशिका सिंह ने अंशु के डर को अपने हाथों में समेटने जैसा कहा, ‘‘तुम डरो मत. हम हैं न.’’

उस पल उन दोनों के बीच खामोशी उतर आई… एक ऐसी खामोशी जिस में हवेली का सन्नाटा भी अपनी सांस रोक ले.

अंशु अपनी सारी हिचक और डर भूल बैठा. उस रात का सन्नाटा हवेली की दीवारों में हमेशा के लिए दर्ज हो गया. बिना शोर के, बिना शब्द के, पर गहरा.

उन दोनों ने उस रात को खूब भोगा.

अगली सुबह अंशु आंगन में बैठा था. चेहरा बुझा  हुआ, आंखों में बेचैनी. उसे खुद से डर लग रहा था. वह डर और उलझन से भरा था.

याशिका सिंह ने बरामदे से उतरते हुए कहा, ‘‘अंशु, कल जो हुआ उस से डरने की कोई जरूरत नहीं.’’

पर अंशु के भीतर का तूफान किसी भी आश्वासन से शांत नहीं हो सकता था, ‘‘मालकिन, हम से पाप हुआ है. हम इस हवेली में मुंह दिखाने लायक नहीं रहे.’’

याशिका ने उसे स्थिर नजरों से देखा और कहा, ‘‘पाप वही है जिसे मन स्वीकार न करे. हम दोनों अकेले थे हालात ने हमें मजबूर किया.’’

लेकिन अंशु जानता था कि समाज हालात नहीं देखता, वह केवल सीमाएं देखता है.

Hasya Vayngye : मैं मायके चली जाऊंगी

Hasya Vayngye. दफ्तर में ज्यादा काम की मार से हमारा कामकाजी दिमाग चरचराया हुआ था. शाम को हम घर को चले तो सोचा कि आज श्रीमतीजी के हाथों की गरमागरम चाय पी कर उन के साथ अपने गमों को साझा करेंगे.

उधर डोरबैल बजाने के बाद भी जब श्रीमतीजी ने दरवाजा नहीं खोला, तो हम ने गुस्से में आ कर दरवाजे को जोर से धकेल दिया. देखा तो वह खुला पड़ा था. सोचा कि श्रीमतीजी अंदर से बंद करना भूल गई होंगी. घर में घुसते ही हम ने इधरउधर नजर दौड़ाई. हमारी श्रीमतीजी हमें कहीं नजर नहीं आईं.

हम घबराए हुए सीधे बैडरूम में जा पहुंचे. वहां श्रीमतीजी अंधेरा किए बैड पर ऐसे फैली पड़ी थीं, जैसे किसी ने उन के कीमती जेवरों पर हाथ साफ कर दिए हों और अब उसी का गम मना रही हों.

हम ने जैसे ही कमरे की बत्ती जलाई, तो श्रीमतीजी ने गुस्से में मोटीमोटी लाललाल आंखें हमें दिखाईं, तो हम तुरंत समझ गए कि आज हमारी शामत आई है.

हम ने धीरे से श्रीमती से पूछा, ‘‘क्या तबीयत खराब है या मायके में कोई बीमार है?’’

वे गुस्से में फट पड़ीं, ‘‘खबरदार, जो मेरी या मेरे मायके वालों की तबीयत खराब होने की बात मुंह से निकाली.’’

श्रीमतीजी बालों को बांधते हुए बैडरूम से निकल कर ड्राइंगरूम में आ कर सोफे पर पसर गईं. हम भी अपने कपड़े बदल कर उन के पास आ कर बैठ गए. फिर उन के शब्दों के बाणों की बौछारें शुरू हो गईं, ‘‘शादी को अभी सालभर भी नहीं हुआ है और तुम ने मुझे इस फ्लैट की चारदीवारी में कैद कर दिया है. तुम न तो मुझे कभी फिल्म दिखाने ले जाते हो, न कहीं घुमाते हो और न ही किसी अच्छे से रैस्टोरैंट में खाना खिलाते हो.

‘‘आज तो तुम को मुझे कहीं न कहीं घुमाने ले जाना पड़ेगा और मेरे नाजनखरों को उठाना पड़ेगा, वरना मैं मायके चली जाऊंगी और फिर कभी वापस नहीं आऊंगी.’’

श्रीमतीजी के मायके जाने की धमकी ने हमारी आंखों को उन के पहलवान पिताजी कल्लू के साक्षात दर्शन करा दिए थे, जिन्होंने अपनी बेटी को विदा करते समय हमें चेतावनी दी थी कि अगर कभी हमारी बेटी यहां रोतीबिलखती आई, तो हम से बुरा कोई न होगा. बेटी राधिका को परेशान करने के एवज में तुम्हें हमारे बेटे भूरा से गांव के वार्षिक दंगल में लड़ना होगा.

भूरा की कदकाठी कुछ ऐसी ही थी कि हाथी भी सामने आ जाए, तो उस सांड़ को देख कर अपना रास्ता बदल ले.

हम ने तुरंत श्रीमतीजी के पैर पकड़ लिए और उन के नाजनखरों को उठाने को तैयार हो गए.

अगले दिन दफ्तर में श्रीमतीजी का फोन आया. वे बोलीं, ‘‘आज हमारा सलमान खान की फिल्म ‘बजरंगी भाईजान’ देखने का मन कर रहा है. उस के बाद डिनर भी हम बाहर ही करेंगे.’’

सो, इंटरनैट के जरीए हम ने ‘बजरंगी भाईजान’ के 2 टिकट बुक करा दिए. शाम को जब हम घर पहुंचे, तो श्रीमतीजी दरवाजे पर तैयार खड़ी गुस्से से कलाई घड़ी की तरफ देख रही थीं. उधर गरमी के मारे हमारी हालत बुरी थी.

सकपकाते हुए हम धीरे से घर के अंदर घुसे. फिर फ्रिज से हम ने ठंडा पानी निकाला और 2-4 घूंट पानी गले में डाला, जल्दी से कपड़े बदले और श्रीमतीजी के साथ स्कूटर पर निकल पड़े.

मगर रास्ते में ही स्कूटर ने धोखा दे दिया. उधर श्रीमतीजी का पारा सातवें आसमान पर चढ़ गया. स्कूटर का पिछला पहिया पंक्चर हो गया.

हम ने श्रीमतीजी के तमतमाए चेहरे की तरफ देखा और फिर घड़ी में समय देखा, तो शाम के 7 बज चुके थे. एक घंटे का शो पहले ही निकल चुका था. जब तक हम पंक्चर लगवा कर सिनेमाघर तक पहुंचे, तब तक रात के 9 बज चुके थे. लोग सिनेमाघर से बाहर निकल रहे थे.

अब हमारा दिल डर के मारे बुरी तरह धड़क रहा था.

हम ने श्रीमतीजी को समझाया, ‘‘कल हम तुम्हें मौर्निंग शो में फिल्म ‘बजरंगी भाईजान’ दिखा लाएंगे. इस के एवज में हम कल ड्यूटी पर भी नहीं जाएंगे.’’

यह सुन कर श्रीमतीजी के चेहरे पर गुस्से की लकीरें थोड़ी कम होने लगी थीं. फिर वहीं पास ही के एक अच्छे से रैस्टोरैंट में श्रीमतीजी को ले गए. वहां हम दोनों ने लजीज खाने का लुत्फ उठाया. जब पैसे देने का समय आया, तो हमारी जेब से पर्स गायब था.

हम ने रैस्टोरैंट के मालिक को बहुत समझाया. आखिरकार हमें अपना स्कूटर उन के पास बतौर गिरवी छोड़ना पड़ा और पैदल ही घर जाना पड़ा.

अभी हमारी मुसीबत कम नहीं हुई थी, क्योंकि सुनसान सड़क पर चलती हुई हमारी श्रीमतीजी सोने के जेवरों से दमक रही थीं. जब हम ने उन्हें समझाया कि पल्लू से अपने गहनों को ढक लो, तो वे अकड़ते हुए बोलीं, ‘‘मैं कल्लू पहलवान की बेटी हूं. चोरउचक्कों से डर तुम जैसे शहरियों को लगता होगा. मैं एक धोबीपछाड़ दांव में अच्छेअच्छों को पटक दूंगी और अपनी हिफाजत मैं खुद कर लूंगी.’’

श्रीमतीजी की बहादुरी से हमारे हौसले भी बढ़ चुके थे कि तभी वही हो गया, जिस का हमें डर था. 2 लुटेरों ने हमें धरदबोचा. चाकूपिस्तौल देख हमारी हालत पतली हुई जा रही थी, तभी एक लुटेरा हमारी श्रीमतीजी के गहनों पर झपट पड़ा.

इस के बाद श्रीमतीजी ने उन दोनों की जो हालत बनाई, वह नजारा हम अपनी जिंदगी में कभी भूल नहीं सकते हैं.

कुछ ही देर में पुलिस की एक गाड़ी वहां आ पहुंची. उन दोनों इनामी बदमाशों को पकड़वाने के एवज में श्रीमतीजी को 50 हजार रुपए का चैक बतौर इनाम मिला.

हम ने उन रुपयों से एक सैकंडहैंड कार ले ली है. अब तो हम हर शाम श्रीमतीजी के साथ कार में घूमने जाते हैं. इस बात की उम्मीद करते हैं कि दोबारा किसी लुटेरे गैंग से हमारी श्रीमतीजी की भिड़ंत हो जाए और उसे पकड़वाने के एवज में इनाम के तौर पर फिर कोई चैक मिल जाए. Hasya Vayngye

News Story: ‘जी राम जी’ का बवाल

News Story: शनिवार का दिन था. शाम के 6 बज रहे थे. विजय घर पर अकेला था. इतने में दरवाजे की घंटी बजी. विजय ने दरवाजा खोला. बाहर अनामिका खड़ी थी. वह दनदनाती हुई भीतर आई. उस का मुंह गुस्से से तमतमा रहा था.‘‘क्या हुआ? घायल शेरनी क्यों बनी हुई हो? सब ठीक है ? तुम तो अपनी सहेली के घर गई थी,’’ विजय ने पूछा. ‘‘सत्यानाश हो गया. और तुम तो अपना मुंह खोलो ही मत. सब तुम्हारा ही कियाधरा है,’’ अनामिका ने कहा. ‘‘मैं ने क्या किया? सुबह तो तुम्हारा मूड एकदम ठीक था,’’ विजय बोला.
इतने में अनामिका ने अपने बैग से एक प्रैग्नेंसी टैस्ट स्ट्रिप निकाली और विजय के सामने रख दी. ‘‘यह क्या है?’’ विजय ने पूछा.


‘‘तुम्हारी करतूत…’’ अनामिका बोली, ‘‘मैं प्रैग्नेंट हूं. कहा था कि प्रोटैक्शन लगा लेना, पर तुम्हें तो अपने मजे से मतलब है.’’ वह स्ट्रिप देख कर विजय के चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगीं. उस ने कांपते हाथ से वह स्ट्रिप उठाई और अपना माथा पकड़ लिया. ‘‘अब मुंह से कुछ बोलोगे या ऐसेही माथा पकड़े इसे घूरते रहोगे?’’ अनामिका बोली तुम  ही क्यों कोस रही हो? सारी गलती क्या मेरी है? तुम्हें भी तो ध्यान रखना चाहिए था. सब तुम्हारी लापरवाही का नतीजा है,’’ विजय बोला. तुम सही कह रहे हो. यहां मैं तुम्हारी जीहुजूरी करती रहूं और वहां केंद्र सरकार चाहती है कि दुनियाजय राम जीबोलती रहे,’’ अनामिका बोली. ‘‘अब यहां केंद्र सरकार कहां से गई?’’ विजय ने पूछा.


‘‘तुम और केंद्र सरकार एकजैसे हो. सारी गलती सामने वाले की. अब बताओ कि मनरेगा का नाम बदल करजी राम जीकरने की क्या तुक थी?’’ ‘‘तुम किस बारे में कह रही हो?’’ विजय ने कहा. अनामिका ने कहा, ‘‘मनरेगा यानी महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम के बारे में, जो भारत की गांवदेहात से जुड़ी सब से बड़ी ग्रामीण रोजगार योजना रही है. यह साल 2005 में कांग्रेस सरकार के समय में लागू हुई थी. यह योजना गांवदेहात में 100 दिनों का गारंटेड रोजगार देती थी, जिस से गरीबों, किसानों और मजदूरों को पैसे के तौर पर ताकत मिलती थी. ‘‘पर अब केंद्र की मोदी सरकार ने चूंकि इस योजना से जुड़ा नया बिल पास किया है और इस काविकसित भारत गारंटी फौर रोजगार एंड आजीविका मिशन (ग्रामीण)’ यानीवीबीजी राम जीनाम दिया है, तो इस पर विपक्ष ने बवाल मचाया है.’’


‘‘इस बारे में किस ने क्या कहा है?’’ विजय ने पूछा. ‘‘कांग्रेस संसदीय दल की अध्यक्ष सोनिया गांधी ने इस पर गहरा एतराज जताया है. ‘ हिंदूअखबार में एक लेख के जरीए मोदी सरकार पर आरोप लगाया कि मनरेगा को बुल्डोज कर दिया गया है. ‘‘सोनिया गांधी ने आगे कहा कि सरकार ने पिछले 11 सालों में इसे कमजोर किया और अबवीबीजी राम जीबिल से इसे पूरी तरह बदल दिया है, जो एक काला कानून है. वजह, केंद्र सरकार द्वारा यह बिल बिना बहस, राज्यों से सलाह या विपक्ष की सहमति के बिना पास किया गया. नया कानून केंद्र सरकार को रोजगार तय करने का हक देता है, जो जमीनी हकीकत से दूर है.


‘‘सोनिया गांधी ने इसे करोड़ों किसानों, मजदूरों और गरीबों के हितों पर हमला बताया और कांग्रेस द्वारा इस का विरोध करने का वादा किया. उन्होंने मनरेगा को महात्मा गांधी के सर्वोदय (सभी का कल्याण) का प्रतीक बताया और इस के ध्वस्त होने को नैतिक नाकामी कहा, जो सालों तक माली और इनसानी नुकसान पहुंचाएगा,’’ अनामिका ने कहा. यह सुन कर विजय ने कहा, ‘‘लेकिन क्या तुम जानती हो कि मनरेगा से पहले इस योजना का नाम नरेगा था. मई, 2004 में तब की संप्रग सरकार ने गांवदेहात के इलाकों के लिए एक रोजगार योजना को अपने न्यूनतम सा? कार्यक्रम में शामिल किया था. ‘‘भारत में 11वीं पंचवर्षीय योजना (साल 2007-12) पर काम शुरू होने से पहले ही इस पर काम करने वाले वर्किंग ग्रुप ने उस समय देश में मौजूद करीब 36 फीसदी गरीब आबादी पर खास चिंता जताई थी. उसी समय से गांवदेहात के इलाकों के लिए एक योजना बनाने पर काम शुरू हो गया था.


‘‘हालांकि, इस से पहले ही वीपी सिंह वाली केंद्र सरकार ने ऐसी योजना पर विचार किया था, लेकिन वह योजना कामयाब नहीं हो पाई थी. दिसंबर, 2004 में नैशनल रूरल गारंटी स्कीम (नरेगा) का विधेयक पेश किया गया था. ‘‘यह योजना मूल रूप से महाराष्ट्र राज्य में चल रही एक रोजगार योजना से प्रेरित थी. उस के बाद यह विधेयक उस समय ग्रामीण विकास मंत्रालयकी संसद की स्थायी समिति के पास भेजा गया था. जून, 2005 में समिति के अध्यक्ष कल्याण सिंह ने इसे आजादी के बाद का सब से खास बिल बताया था.
‘‘अब केंद्र सरकार ने नए अधिनियम कोविकसित भारत गारंटी फौर रोजगार एंड आजीविका मिशन (ग्रामीण)’ यानीवीबीजी राम जीनाम दिया है. केंद्र सरकार के इस नए अधिनियम में नाम के अलावा भी कई बदलाव किए गए हैं, जैसे नए अधिनियम में साल में 125 दिन रोजगार देने का प्रस्ताव है.


‘‘मजदूरों को उन की मजदूरी का भुगतान साप्ताहिक आधार पर या अधिकतम 15 दिनों के भीतर करना अनिवार्य होगा. इस योजना के तहत होने वाले कामों को 4 मुख्य क्षेत्रों में बांटा गया है, जैसे जल सुरक्षा, ग्रामीण सड़कें, बाजार और भंडारण जैसे आजीविका इन्फ्रास्ट्रक्चर और जलवायु में बदलाव से निबटने वाले काम. ‘‘इन सभी का रिकौर्डविकसित भारत नैशनल रूरल इन्फ्रास्ट्रक्चर स्टैकनाम के नैशनल डाटाबेस में रखा जाएगा. भ्रष्टाचार रोकने के लिए बायोमैट्रिक हाजिरी, जियोटैगिंग और जीपीएस आधारित रियलटाइम मौनिटरिंग को अनिवार्य बनाया गया है. ‘‘सब से बड़ा रणनीतिक बदलाव योजना की फंडिंग में हुआ है. अब तक मनरेगा पूरी तरह केंद्र प्रायोजित थी, लेकिन अब यह 60:40 के अनुपात (केंद्र:राज्य) पर आधारित होगी, जबकि पूर्वोत्तर राज्यों के लिए यह अनुपात 90:10 होगा. इस के अलावा, यह अब पूरी तरहडिमांड ड्रिवननहीं रहेगी.


‘‘केंद्र सरकार हर साल राज्यों के लिए एक निश्चित बजट तय करेगी. अगर राज्य उस बजट से ज्यादा खर्च करते हैं, तो अतिरिक्त बो? उन्हें खुद उठाना होगा. इस पूरी योजना का सालाना बजट तकरीबन डेढ़ लाख करोड़ रुपए आंका गया है.’’ ‘‘दूर के ढोल सुहावने. तुम तो इस बिल का कागजी करतब बता रहे हो, जमीनी हकीकत से इस का दूरदूर तक कोई नाता नहीं है,’’ अनामिका बोली.  तुम कहना क्या चाहती हो?’’ विजय ने कहा. ‘‘यही कि किसी बिल में अगर सुधार करना भी है, तो उस के लिए योजना का नाम बदलने की क्या जरूरत है? पहले यह योजना महात्मा गांधी के नाम पर थी, तो अब इसेजी राम जीक्यों बना दिया गया है?’’ अनामिका बोली.


‘‘अरे, ‘जी राम जीबोलने में क्या हर्ज है? अब सनातनी भारत मेंजी राम जीही बोला जाएगा ?’’ विजय ने कहा. ‘‘बस, यहीं पर मु? सरकार की नीयत में खोट नजर आता है. भारत जैसे सैकुलर देश में जहां कई धर्मों के लोग रहते हैं, वहां धर्म विशेष और उस में भीरामका नाम जोड़ने की क्या वजह थी? ‘‘फिर प्रियंका गांधी की कही बात भी तो सच ही लगती है. उन्होंने कहा, ‘मु? नाम बदलने की यह सनक सम? नहीं आती. इस में खर्चा बहुत होता है, इसलिए मु? सम? नहीं आता कि वे बेवजह ऐसा क्यों कर रहे हैं. मनरेगा ने गरीब लोगों को 100 दिन के रोजगार का अधिकार दिया था. यह बिल उस अधिकार को कमजोर करेगा…’


‘‘इस के आगे प्रियंका गांधी बोलीं, ‘उन्होंने दिनों की संख्या तो बढ़ा दी है, लेकिन मजदूरी नहीं बढ़ाई है. पहले ग्राम पंचायत तय करती थी कि मनरेगा का काम कहां और किस तरह का होगा, लेकिन यह बिल कहता है कि केंद्र सरकार तय करेगी कि फंड कहां और कब देना है, इसलिए ग्राम पंचायत का अधिकार छीना जा रहा है. हमें यह बिल हर तरह से गलत लगता है.’ ‘‘जहां तक सैकुलर होने की बात है तोजी राम जीजैसे नाम वाली सरकारी योजनाओं से हर केंद्र सरकार को परहेज करना चाहिए. हमारे देश में 75 फीसदी लोग ऐसे हैं, जो गरीब हैं और उन में से ऐसे हैं जो सालभर दिहाड़ी मजदूरी नहीं कर पाते हैं. वे सभीराम भक्ततो नहीं हैं. इस तरह की योजना से देश के गैरहिंदुओं को लगेगा कि सरकार जानबू? कर चाहती है कि धर्म विशेष के लोग सिर्फ योजना के नाम से ही इस का फायदा लें पाएं.


‘‘गैरहिंदू ही क्यों, एससी और एसटी तबके के बहुत से लोग हिंदू देवीदेवताओं की पूजा नहीं करते हैं खासकर अंबेडकरवादी सोच के लोग भी इस योजना से कन्नी काट सकते हैं या फिर उन्हें उकसाया जा सकता है. तो क्या यह मान लिया जाए कि सरकार सिर्फ रामभक्तों के लिए यह योजना लाई है? ‘‘मेरा ऐसा कहने की एक वजह यह है कि हिंदुओं के भी हजारों देवीदेवता हैं. शैव भक्त क्या राम भक्त हो सकते हैं, क्योंकि उन का पूजा करने का अपनाअपना तरीका है.’’ ‘‘तुम मामले को बेवजह धार्मिक रंग दे रही हो. सरकार की ऐसी कोई मंशा नहीं है,’’ विजय ने कहा. ‘‘मेरी मंशा सही है, पर सरकार के इन सांसद की भी सुन लो. जब इस बिल पर चर्चा हो रही थी, तब उस में भाग लेते हुए भाजपा सांसद बृजमोहन अग्रवाल ने कहा था कि प्रभु राम चाहते थे तो मंदिर बन गया और अब वे चाहते हैं कि विकसित गांव बनें.

यह विधेयक रामराज्य लाने के लिए लाया गया है, गांधीजी के सपनों को पूरा करने के लिए लाया गया है.
‘‘बृजमोहन अग्रवाल ने कहा था किजी राम जीसे ग्रामीण अर्थव्यवस्था मजबूत होगी और गांवों का चौतरफा विकास होगा भ्रष्टाचार रुकेगा. इस विधेयक से हिंदुत्व और सनातन की भावना उभर कर सामने आई है.’’ ‘‘तो तुम्हारा यह मानना है कि इस से देश को रफ्तार नहीं मिलेगी?’’ विजय ने कहा. ‘‘रफ्तार तो मनरेगा से ही मिल रही थी. अगर बिल में कुछ अच्छे बदलाव होते तो बात सम? में आती, पर यहां तोजी राम जीका खेल चल रहा है. कहीं ऐसा हो कि इस योजना का हीराम नाम सत्यहो जाए और साथ ही ऐसे करोड़ों लोगों के सपने बिखर जाएं जो साल के 365 दिनों में इज्जत से 100 दिन की मजदूरी पा कर अपने घरों में चूल्हा जलाते हैं,’’ अनामिका ने कहा.


‘‘तुम्हें तो हर बात में कमी निकालनी है और कुसूर मोदी सरकार पर मढ़ना है. कभी तारीफ भी तो कर दिया करो,’’ विजय ने कहा. ‘‘जैसे तुम ने सारा कुसूर मु? पर मढ़ दिया कि मेरी गलती से मैं प्रैग्नेंट हुई
हूं. क्यों सही कहा ?’’ अनामिका ने ताना कसा. और नहीं तो क्याजब तुम्हें पता है कि अभी हम शादी नहीं कर सकते हैं, तो क्यों यह बवाल खड़ा किया. अब कहीं इसे साफ कराओ,’’ विजय बोला. ‘‘यार, तुम तो बड़े दब्बू निकले. जैसे ही जिम्मेदारी निभाने की बात आई तो मु? पर भड़ास निकाल दी,’’ अनामिका ने कहा, ‘‘तुम सत्ता पक्ष के हिमायती लोगों को यही बीमारी है कि जब मामला हाथ से निकल जाए, तो सामने वाले को ही कोस दो. ‘‘पर डरो मत. यह प्रैग्नेंसी टैस्ट स्ट्रिप मेरी नहीं है. यह तो मेरी सहेली की बड़ी बहन की है, जिस की शादी को 2 साल हो गए हैं और अब उस के घर यह खुशखबरी आई है. मैं खुद अभी जल्दबाजी में शादी नहीं करना चाहती. अभी तो हमें और ज्यादा एकदूसरे को सम?ाना है,’’ कह कर अनामिका ने अपनी बात खत्म की. यह सुन कर विजय की सांस में सांस आई और उस ने अनामिका को गले से लगा लिया. News Story: 
          

Top 10 Best Husband-Wife Story In Hindi: पति-पत्नी की टॉप 10 बेस्ट कहानियां हिन्दी में

Top 10 Best Husband-Wife Story In Hindi: पति और पत्नी एक दूसरे के पूरक होते हैं. यह एक ऐसा रिश्ता होता है जहां प्यार के साथ-साथ तकरार भी देखने को मिलता है. यह रिश्ता दो लोगों को पूरी जिंदगी बांध कर रखता है. जीवन के हर सुख-दुख में पति-पत्नी एक-दूसरे का साथ निभाते हैं.  इस आर्टिकल में हम लेकर आए हैं सरस सलिल की 10 Best Husband-Wife Story In Hindi. इन कहानियों को पढ़कर आप पति-पत्नी के रिश्ते को गहराई से समझ पाएंगे.  तो अगर आपको भी हैं कहानियां पढ़ने का शौक तो पढ़िए सरस सलिल की Top 10 Best Husband-Wife Story In Hindi.

1. तुम ही चाहिए ममू

husband-wife-story-in-hindiकुछ अपने मिजाज और कुछ हालात की वजह से राजेश बचपन से ही गंभीर और शर्मीला था. कालेज के दिनों में जब उस के दोस्त कैंटीन में बैठ कर लड़कियों को पटाने के लिए तरहतरह के पापड़ बेलते थे, तब वह लाइब्रेरी में बैठ कर किताबें खंगालता रहता था.

ऐसा नहीं था कि राजेश के अंदर जवानी की लहरें हिलोरें नहीं लेती थीं. ख्वाब वह भी देखा करता था. छिपछिप कर लड़कियों को देखने और उन से रसीली बातें करने की ख्वाहिश उसे भी होती थी, मगर वह कभी खुल कर सामने नहीं आया.

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2. भीगी पलकों में गुलाबी ख्वाब: क्या ईशान अपनी भाभी को पसंद करता था?

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मालविका की गजल की डायरी के पन्ने फड़फड़ाने लगे. वह डायरी छोड़ दौड़ी गई. पति के औफिस जाने के बाद वह अपनी गजलों की डायरी ले कर बैठी ही थी कि ड्राइंगरूम के चार्ज पौइंट में लगा उस का सैलफोन बज उठा.

फोन उठाया तो उधर से कहा गया, ‘‘मैं ईशान बोल रहा हूं भाभी, हम लोग मुंबई से शाम तक आप के पास पहुंचेंगे.’’

42 साल की मालविका सुबह 5 बजे उठ कर 10वीं में पढ़ रहे अपने 14 वर्षीय बेटे मानस को स्कूल बस के लिए  रवाना कर के 49 वर्षीय पति पराशर की औफिस जाने की तैयारी में मदद करती है. नाश्तेटिफिन के साथ जब पराशर औफिस के लिए निकल जाता और वह खाली घर में पंख फड़फड़ाने के लिए अकेली छूट जाती तब वह भरपूर जी लेने का उपक्रम करती. सुबह 9 बजे तक उस की बाई भी आ जाती जिस की मदद से वह घर का बाकी काम निबटा कर 11 बजे तक पूरी तरह निश्ंिचत हो जाती.

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3. मेरा पति सिर्फ मेरा है: अनुषा ने अपने पति को टीना के चंगुल से कैसे निकाला?

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सुबहबह के 6 बज गए थे. अनुषा नहाधो कर तैयार हो गई. ससुराल में उस का पहला दिन जो था वरना घर में क्या मजाल कि कभी सुबह 8 बजे से पहले उठी हो.

विदाई के समय मां ने समझाया, ‘‘बेटी, लड़कियां कितनी भी पढ़लिख जाएं उन्हें अपने संस्कार और पत्नी धर्म कभी नहीं भूलना चाहिए. सुबह जल्दी उठ कर सिर पर पल्लू रख कर रोजाना सासससुर का आशीर्वाद लेना. कभी पति का साथ न छोड़ना. कैसी भी परिस्थिति आ जाए धैर्य न खोना और मुंह से कभी कटु वचन न निकालना.’’

‘‘जैसी आप की आज्ञा माताश्री…’’

जिस अंदाज में अनुषा ने कहा था उसे सुन कर विदाई के क्षणों में भी मां के चेहरे पर हंसी आ गई थी.

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4. तुम सावित्री हो: क्या पत्नी को धोखा देकर खुश रह पाया विकास?

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अमेरिका के एअरपोर्ट से जब मैं हवाईजहाज में बैठी तो बहुत खुश थी कि जिस मकसद से मैं यहां आई थी उस में सफल रही. जैसे ही हवाईजहाज ने उड़ान भरी और वह हवा से बातें करने लगा वैसे ही मेरे जीवन की कहानी चलचित्र की तरह मेरी आंखों के आगे चलने लगी और मैं उस में पूरी तरह खो गई…

विकास और मैं एक मल्टीनैशनल कंपनी में कार्यरत हैं. वैसे मैं उम्र में विकास से 1 वर्ष बड़ी हूं. वे कंपनी में एम.डी. हैं, जबकि मैं सीनियर मैनेजर. कंपनी में साथसाथ काम करने के दौरान अकसर हमारी मुलाकात होती रहती थी. मेरे मम्मीपापा मेरी शादी के लिए लड़का देख रहे थे, लेकिन कोई अच्छा लड़का नहीं मिल रहा था. आखिर थकहार के मम्मीपापा ने लड़का देखना बंद कर दिया. तब मैं ने भी उन से टैलीफोन पर यही कहा कि वे मेरी शादी की चिंता न करें. जब होनी होगी तब चट मंगनी पट शादी हो जाएगी. दरअसल, विकास का कार्यक्षेत्र मेरे कार्यक्षेत्र से एकदम अलग था. यदाकदा हम मिलते थे तो वह भी कंपनी की लिफ्ट या कैंटीन में. वे कंपनी में मुझ से सीनियर थे, हालांकि मैं पहले एक दूसरी कंपनी में कार्यरत थी. मैं ने उन के 3 वर्ष बाद यह कंपनी जौइन की थी. एक बार कंपनी के एक सेमिनार में मुझे शोधपत्र पढ़ने के लिए चुना गया. उस समय सेमिनार की अध्यक्षता विकास ने की थी. जब मैं ने अपना शोधपत्र पढ़ा तब वे मुझ से इतने इंप्रैस हुए कि अगले ही दिन उन्होंने मुझे अपने कैबिन में चाय के लिए आमंत्रित किया. चाय के दौरान हम ने आपस में बहुत बातें कीं. बातोंबातों में उन्होंने मुझ से मेरे बारे में ंसारी बातें मालूम कर लीं. रही उन के बारे में जानकारी लेने की बात, तो मैं उन के बारे में बहुत कुछ जानती थी और जो नहीं जानती थी वह भी उन से पूछ लिया.

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5. प्रेरणा: क्या शादीशुदा गृहस्थी में डूबी अंकिता ने अपने सपनों को दोबारा पूरा किया?

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‘‘बड़ी मुद्दत हुई तुम्हारा गाना सुने. आज कुछ सुनाओ. कोई भी राग उठा लो,  बागेश्वरी, विहाग या मालकोश, जो इस समय के राग हैं,’’ रात का भोजन करने के बाद मनोहर लाल ने अंकिता से इच्छा व्यक्त की. वे बड़े लंबे समय के बाद अपनी बेटी और दामाद के यहां उन से मिलने आए थे.

इस से पहले कि अंकिता कुछ कहती, उस की 14 साल की बेटी चहक पड़ी, ‘‘सुना तो है कि मां बड़ा अच्छा गाती थीं, संगीत विशारद भी हैं, लेकिन मैं ने तो आज तक इन के मुख से कोई गाना नहीं सुना.’’

‘‘यह मैं क्या सुन रहा हूं? तुम तो इतना बढि़या गाती थीं. कुछ और समय लखनऊ में रहना हो गया होता तो तुम ने संगीत में निपुणता प्राप्त कर ली होती.’’

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6. तुम्हारे हिस्से में: पत्नी के प्यार में क्या मां को भूल गया हर्ष?

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बाइक ‘साउथ सिटी’ मौल के सामने आ कर रुकी तो एक पल के लिए दोनों के बदन में रोमांच से गुदगुदी हुई. मौल का सम्मोहित कर देने वाला विराट प्रवेशद्वार. द्वार के दोनों ओर जटायु के विशाल डैनों की मानिंद दूर तक फैली चारदीवारी. चारदीवारी पर फ्रेस्को शैली के भित्तिचित्र. राष्ट्रीयअंतर्राष्ट्रीय उत्पादों की नुमाइश करते बड़ेबड़े आदमकद होर्डिंग्स और विंडो शोकेस. सबकुछ इतना अचरजकारी कि देख कर आंखें बरबस फटी की फटी रह जाएं.

भीतर बड़ा सा वृत्ताकार आंगन. आंगन के चारों ओर भव्यता की सारी सीमाओं को लांघते बड़ेबड़े शोरूम. बीच में थोड़ीथोड़ी दूर पर आगतों को मासूमियत के संग अपनी हथेलियों पर ले कर ऊपर की मनचाही मंजिलों तक ले जाने के लिए तत्पर एस्केलेटर.

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7. मेरा प्यार था वह: क्यों शादी के बाद मेघा बदल गई?

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मुझे ऐसा लगा कि नीरज वहीं उस खिड़की पर खड़ा है. अभी अपना हाथ हिला कर मेरा ध्यान आकर्षित करेगा. तभी पीछे से किसी का स्पर्श पा कर मैं चौंकी.

‘‘मेघा, आप यहां क्या कर रही हैं? सब लोग नाश्ते पर आप का इंतजार कर रहे हैं और जमाईजी की नजरें तो आप ही को ढूंढ़ रही हैं,’’ छेड़ने के अंदाज में भाभी ने कहा.

सब हंसतेबोलते नाश्ते का मजा ले रहे थे, पर मुझे कुछ अच्छा नहीं लग रहा था. मैं एक ही पूरी को तोड़े जा रही थी.

‘‘अरे मेघा, खा क्यों नहीं रही हो बहू, मेघा की प्लेट में गरम पूरियां डालो,’’ मां ने भाभी से कहा.

‘‘नहीं, मुझे कुछ नहीं चाहिए. मेरा नाश्ता हो गया,’’ कह कर मैं उठ गई.

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8. कोरोना लव : शादी के बाद अमन और रचना के रिश्ते में क्या बदलाव आया?

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अमन घर में पैर रखने ही जा रहा था कि रचना चीख पड़ी, ‘‘बाहर…बाहर जूता खोलो. अभी मैं ने पूरे घर में झाड़ूपोंछा लगाया है और तुम हो कि जूता पहन कर अंदर घुसे आ रहे हो.’’

‘‘अरे, तो क्या हो गया? रोज तो आता हूं,’’ झल्लाते हुए अमन जूता बाहर ही खोल कर जैसे ही अंदर आने लगा रचना ने फिर उसे टोका, ‘‘नहीं, बैठना नहीं, जाओ पहले बाथरूम और अच्छे से हाथमुंहपैर सब धो कर आओ. और हां, अपना मोबाइल भी सैनिटाइज करना मत भूलना. वरना यहांवहां कहीं भी रख दोगे और फिर पूरे घर में इन्फैक्शन फैलाओगे.’’

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9. धोखा: क्या संदेश और शुभ्रा शादी से खुश थे?

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संदेश और शुभ्रा ने एकदूसरे को पसंद कर शादी के लिए रजामंदी दी थी. दोनों के परिवारों ने खूब अच्छी तरह देखपरख कर संदेश और शुभ्रा की शादी करने का फैसला किया था. यह कोई प्रेम विवाह नहीं था. रिश्तेदारों ने ही ये रिश्ता करवाया था.

संदेश एमबीए कर के एक कंपनी में सहायक मैनेजर के पद पर काम कर रहा था, तो शुभ्रा भी एमए कर के सिविल सर्विस के लिए कोशिश कर रही थी. ऐसे में शुभ्रा के एक रिश्तेदार ने संदेश के बारे में शुभ्रा के मम्मीपापा को बताया. शुभ्रा के मम्मीपापा रिश्ते की बात करने के लिए संदेश के घर गए.

संदेश के पिताजी बैंक से रिटायर्ड थे तो मम्मी घरेलू औरत थी. इस तरह देखादिखाई के बाद संदेश और शुभ्रा की शादी हुई.

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10. दुनिया पूरी: क्या पत्नी को दिए गए वचन को वह निभा पाया?

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मेरी पत्नी का देहांत हुए 5 वर्ष बीत गए थे. ऐसे दुख खत्म तो कभी नहीं होते, पर मन पर विवशता व उदासीनता की एक परत सी जम गई  थी. इस से दुख हलका लगने लगा था. जीवन और परिवार की लगभग सभी जिम्मेदारियां पूरी हो चुकी थीं. नौकरी से सेवानिवृत्ति, बच्चों की नौकरियां और विवाह भी.

जिंदगी एक मोड़ पर आ कर रुक गई थी. दोबारा घर बसाना मु झे बचकाना खयाल लगता था. चुकी उमंगों के बीज भला किसी उठती उमंग में क्यों बोए जाएं.  अगर सामने भी चुकी उमंग ही हो, तो दो ठूंठ पास आ कर भी क्या करें. मु झे याद आता था कि एक बार पत्नी और अपनी खुद की नौकरी में अलगअलग पोस्ंिटग होने पर जाने के लिए अनिच्छुक पत्नी को सम झाते हुए मैं ने यह वचन दे डाला था कि मैं जीवन में कभी किसी दूसरी औरत से शरीर के किसी रिश्ते के बारे में होश रहने तक सोचूंगा भी नहीं.

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