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Short Story : योग की पोल…

Short Story. पिछले 3 दिनों से रतन कुमारजी का सुबह की सैर पर हमारे साथ न आना मुझे खल रहा था. हंसमुख रतनजी सैर के उस एक घंटे में हंसाहंसा कर हमारे अंदर एक नई ऊर्जा का संचार कर देते थे.

क्या बताएं, जनाब, हम दोनों ही मधुमेह से पीडि़त हैं. दोनों एक ही डाक्टर के पास जाते हैं. सही समय से सचेत हो, नियमपूर्वक दवा, संतुलित भोजन और प्रतिदिन सैर पर जाने का ही नतीजा है कि सबकुछ सामान्य चल रहा है यानी हमारा शरीर भी और हम भी.

बहरहाल, जब चौथे दिन भी रतन भाई पार्क में तशरीफ नहीं लाए तो हम उन के घर जा पहुंचे. पूछने पर भाभीजी बोलीं कि छत पर चले जाइए. हमें आशंका हुई कि कहीं रतन भाई ने छत को ही पार्क में परिवर्तित तो नहीं कर दिया. वहां पहुंच कर देखा तो रतनजी  योगाभ्यास कर रहे थे.

बहुत जोरजोर से सांसें ली और छोड़ी जा रही थीं. एक बार तो ऐसा लगा कि रतनजी के प्राण अभी उन की नासिका से निकल कर हमारे बगल में आ दुबक जाएंगे. खैर, साहब, 10 मिनट बाद उन का कार्यक्रम समाप्त हुआ.

रतनजी मुसकराते हुए बोले, ‘‘आइए, आइए, देखा आप ने स्वस्थ होने का नायाब नुस्खा.’’

मैं ने कहा, ‘‘यार, यह नएनए टोटके कहां से सीख आए.’’

वह मुझे देख कर अपने गुरु की तरह मुखमुद्रा बना कर बोले, ‘‘तुम तो निरे बेवकूफ ही रहे. अरे, हम 2 वर्षों से उस डाक्टर के कहने पर चल, अपनी शुगर केवल सामान्य रख पा रहे हैं. असली ज्ञान तो अपने ग्रंथों में है. योेग में है. देखना एक ही माह में मैं मधुमेह मुक्त हो जाऊंगा.’’

मैं ने कहा, ‘‘योगवोग अपनी जगह कुछ हद तक जरूर ठीक होगा पर तुम्हें अपनी संतुलित दिनचर्या तो नहीं छोड़नी चाहिए थी. अरे, सीधीसादी सैर से बढ़ कर भी कोई व्यायाम है भला.’’

उन्होंने मुझे घूर कर देखा और बोले, ‘‘नीचे चलो, सब समझाता हूं.’’

नीचे पहुंचे तो एक झोला लिए वह प्रकट हुए. बड़े प्यार से मुझे समझाते हुए बोले, ‘‘मेरी मौसी के गांव में योगीजी पधारे थे. बहुत बड़ा योग शिविर लगा था. मौसी का बुलावा आया सो मैं भी पहुंच गया. वहां सभी बीमारियों को दूर करने वाले योग सिखाए गए. मैं भी सीख आया. देखो, वहीं से तरहतरह की शुद्ध प्राकृतिक दवा भी खरीद कर लाया हूं.’’

मैं सकपकाया सा कभी रतनजी को और कभी उन डब्बाबंद जड़ीबूटियों के ढेर को देख रहा था. मैं ने कहा, ‘‘अरे भाई, कहां इन चक्करों में पडे़ हो. ये सब केवल कमाई के धंधे हैं.’’

रतनजी तुनक कर बोले, ‘‘ऐसा ही होता है. अच्छी बातों का सब तिरस्कार करते हैं.’’

इस के बाद मैं ने उन्हें ज्यादा समझाना ठीक नहीं समझा और जैसी आप की इच्छा कह कर लौट आया.

एक सप्ताह बाद एक दिन हड़बड़ाई सी श्रीमती रतन का फोन आया, ‘‘भाईसाहब, जल्दी आ जाइए. इन्हें बेहोशी छा रही है.’’

मैं तुरंत डाक्टर ले कर वहां पहुंचा. ग्लूकोज चढ़ाया गया. 2 घंटे बाद हालात सामान्य हुए. डाक्टर साहब बोले, ‘‘आप को पता नहीं था कि मधुमेह में शुगर का सामान्य से कम हो जाना प्राणघातक होता है.’’

डाक्टर के जाते ही रतनजी मुंह बना कर बोले, ‘‘देखा, मैं ने योग से शुगर कम कर ली तो वह डाक्टर कैसे तिलमिला गया. दुकान बंद होने का डर है न. हा…हा हा….’’

मैं ने अपना सिर पकड़ लिया. सोचा यह सच ही है कि हम सभी भारतीय दकियानूसी पट्टियां साथ लिए घूमते हैं. बस, इन्हें आंखों पर चढ़ाने वाला चाहिए. उस के बाद जो चाहे जैसे नचा ले.

एक माह तक रतनजी की योग साधना जारी रही. हर महीने के अंत में हम दोनों ब्लड टेस्ट कराते थे. इस बार रतनजी बोले, ‘‘अरे, मैं पूरी तरह से स्वस्थ हूं. कोई परीक्षण नहीं कराऊंगा.’’

अब तो परीक्षा का समय था. मैं बोला, ‘‘दादा, अगर तुम्हारी रिपोर्ट सामान्य आई तो कल से मैं भी योग को पूरी तरह से अपना लूंगा.’’

बात बन गई. शुगर की जांच हुई. नतीजा? नतीजा क्या होना था, रतनजी का ब्लड शुगर सामान्य से दोगुना अधिक चल रहा था.

रतनजी ने तुरंत आश्रम संपर्क साधा. कोई संतोषजनक उत्तर न पा कर  वह कार ले कर चल पड़े और 2 घंटे का सफर तय कर आश्रम ही जा पहुंचे.

मैं उस दिन आफिस में बैठा एक कर्मचारी से किसी दूसरे योग शिविर की महिमा सुन रहा था. रतनजी का फोन आया, ‘‘यार, योगीजी अस्वस्थ हैं. स्वास्थ्य लाभ के लिए अमेरिका गए हैं. 3 माह बाद लौटेंगे.’’

मैं ठहाके मार कर हंसा. बस, इतना ही बोला, ‘‘लौट आओ यार, आराम से सोओ, कल सैर पर चलेंगे.’’

लेखक- हिमांशु जोशी

Story : शादीलाल की ससुराल यात्रा

Story. शादीलाल जैसा सामान धरती पर कम ही मिलता है. साढ़े 4 फुट की उस चीज का पेट आगे निकला हुआ था और गंजे सिर पर गिनने लायक बाल थे. मुझे यकीन था कि उस की शादी नामुमकिन है, पर शायद वह अपने माथे पर कुछ और ही लिखा कर लाया था.

पिछले साल ही तो शादीलाल की शादी हुई थी. कुदरत ने उस के साथ मजाक नहीं किया, क्योंकि कोई भी यह नहीं कह सकता था कि ‘राम मिलाए जोड़ी, एक अंधा एक कोढ़ी’.

जी हां, जैसा हमारा प्यारा दोस्त शादीलाल था, ठीक वैसी ही उस की बीवी यानी मेरी भाभी आई थीं. वे भी करीब 37 साल की होंगी. शादीलाल की कदकाठी से ले कर मोटापा, लंबाई, ऊंचाई, निचाई, चौड़ाई सभी में जबरदस्त टक्कर देने वाली थीं.

मेरी भाभी का नाम पहले कुमारी सुंदरी था, पर अब श्रीमती सुंदरी देवी हो गया था.

पर भाभी का सुंदरी होना तो दूर, वे सुंदरी का ‘सु’ भी नहीं थीं, मगर ससुराल के नाम से बिदकने वाला मेरा यार गजब की तकदीर पाए हुए था. उस के 7 सगी सालियां थीं और सातों एक से बढ़ कर एक.

मैं भी शादी में गया था. सच कहता हूं कि मेरा ईमान भूचाल में जैसे धरती डोलती है, वैसे डोल गया था. अगर मेरी नकेल पहले से न कसी होती, तो मैं शादीलाल की सालियों के साथ इश्क कर डालता.

शादी में शादीलाल की सालियों ने उस की इतनी खिंचाई की थी कि वह ससुराल का नाम लेना ही भूल गया. शादी में उस से जूतों की पूजा कराई गई. धोखे में डाल कर सुंदरी देवी के पैर छुआए गए. सुंदरी देवी के नाम से झूठी चिट्ठी भेज कर उसे जनवासे से 7 फर्लांग दूर बुलवाया गया.

खैर, होनी को कौन टाल सकता था. आज शादीलाल की शादी को एक साल हो गया. सुंदरी देवी अपने मायके में थीं. वे न जाने कितनी बार वहां हो आईं, पर मेरे यार ने कभी वहां की यात्रा का नाम नहीं लिया.

वहां से ससुर साहब की चिट्ठी आई कि आप शादी के बाद से ससुराल नहीं आए. अब सुंदरी की विदाई तभी होगी जब आप खुद आएंगे, वरना नहीं.

यह वाकिआ मुझे तब पता चला, जब औफिस की बड़े बाबू वाली कुरसी पर शादीलाल को गमगीन बैठे देखा.

‘‘मेरे यार, क्या कहीं से कोई तार वगैरह आया है या गमी हो गई?’’ मैं ने घबरा कर पूछा.

शादीलाल ने अपना मुंह नहीं खोला. अलबत्ता, नाक पर मक्खी बैठ जाने पर भैंस जैसे सिर हिलाती है, वैसे न में सिर हिला दिया.

तब मैं ने पूछा, ‘‘क्या आप को सुंदरी देवी की तरफ से तलाक का नोटिस आया है? क्या वे बीमार हैं या सासससुर गुजर गए?’’

अब शादीलाल ने जो सिर उठाया, तो मेरा दिल बैठ गया. लाललाल आंखें आंसुओं से भरी थीं. चेहरा गधे सा मुरझाया था.

मैं ने उस के हाथ पर हाथ रखा, तो शादीलाल रो उठा और बोला, ‘‘देखो एकलौता राम, तुम मेरे खास दोस्त हो, तुम से क्या छिपाना. चिट्ठी आई है.’’

‘‘क्या कोई बुरी खबर है या कोई अनहोनी घटना घट गई?’’

‘‘नहीं, ससुरजी ने मुझे बुलाया है. इस बार वे साले के साथ सुंदरी को नहीं भेज रहे हैं. अब तो मुझे जाना ही होगा.’’

‘‘अरे, तो इस में घबराने की क्या बात है. ससुराल से बुलावा तो अच्छे लोगों को ही मिलता है. तुम तो 7 सालियों के आधे घरवाले हो, तुम जरूर जाओ.’’

‘‘नहीं यार, यही तो मुसीबत है. मैं उन सातों के मुंह में तिनके की तरह समा जाता हूं.’’ ‘‘शादीलाल, तुम्हें क्या हो गया है? घबराओ मत, मैं तुम्हारे साथ हूं,’’ मैं ने उसे हौसला बंधाया.

‘‘एकलौता राम, मुझे तुम्हीं पर भरोसा है. इस संसार में मेरा साथ देने वाले यार तुम्हीं हो. क्या तुम मेरे ऊपर एक एहसान करोगे?’’ ‘‘कहो यार, मैं तो यारों का एकलौता राम हूं.’’

‘‘तुम को मेरे साथ मेरी ससुराल चलना होगा, वरना मेरी शैतान सालियां मुझे सतासता कर काढ़ा बना कर पी जाएंगी.’’

मैं ने शादीलाल को समझाना चाहा, पर वह मुझे अपनी ससुराल ले ही गया. इस तरह अब शादीलाल की ससुराल यात्रा और साथ में एकलौता राम की यादगार यात्रा शुरू हो गई. 87 किलोमीटर दूर ससुराल में पहुंचे, तो हमारी खूब खातिरदारी हुई. फिर सातों शैतान सालियों के कारनामे शुरू हो गए, जिन का हमें डर था.

थका होने की वजह से शादीलाल शाम 7 बजे से ही खर्राटे लेने में मस्त हो गया. तभी वे सातों आईं. उन्होंने मुंह पर उंगली रख चुप रहने का इशारा किया तो मैं समझ गया कि शादीलाल अब तो गया काम से.

मैं शादीलाल को जगाने के चक्कर में था कि 27 साला एक साली ने कहा, ‘‘आप खामोश रहिए, वरना आप की हजामत जीजा से भी बढ़ कर होगी.’’

मैं ने रजाई तानी और उस में झरोखा बना कर नजारा देखने लगा. शादीलाल के हाथों में एक साली ने नीली स्याही का पोता फेरा. दूसरी साली ने उस की नाक में कागज की सींक बना कर घुसा दी. नतीजतन, शादीलाल का हाथ नाक पर पहुंच गया और स्याही चेहरे पर ‘मौडर्न आर्ट’ बनाती गई.

मैं लिहाफ के अंदर हंसी नहीं रोक पा रहा था. आखिर में 6 सालियां बाहर चली गईं, केवल 7 साल की सुनीता बची, तो उस ने अपने जीजा के हाथों में उसी की हवाई चप्पलें उलटी कर के फंसी दीं और फिर उस के कानों में सींक घुमा कर भाग गई.

सींक से बेचैन हो कर शादीलाल ने अपने कानों पर हाथ मारे, तो चप्पलें गालों पर चटाक से बोलीं. मैं ने किसी तरह झरोखा बंद किया. हंसहंस कर मेरा पेट हिल रहा था, पर कान आहट ले रहे थे.

मेरा यार उठा. चप्पलें फेंकने की आवाज आई, फिर उस ने मेरी रजाई उठा दी. मैं तब भी हंस रहा था. शादीलाल बरस पड़ा, ‘‘एकलौता राम, तू कर गया न गद्दारी. मेरी यह हालत किस ने की?’’

मैं ने आंख मलने का नाटक किया और पूछा, ‘‘क्या बात है यार?’’ ‘‘बनो मत, मेरी हालत पर तुम हंस रहे थे.’’ ‘‘क्या बात करते हो यार… मैं तो सपने में हंस रहा था. अरे, तुम्हारे चेहरे पर रामलीला का मेकअप किस ने किया?’’

‘‘उठ यार, मैं यहां पलभर भी नहीं ठहर सकता. वही कमबख्त सालियां होंगी,’’ उस ने आईने में अपना चेहरा देखते हुए कहा. ‘‘चलो ससुरजी के पास, मैं उन सब की शिकायत करता हूं,’’ मैं ने कहा.

‘‘पर यार, ससुरजी ऐसा टैक्नीकलर दामाद देखेंगे तो क्या कहेंगे? आखिर मैं क्या करूं? मैं इसीलिए यहां नहीं आता हूं. तुझे बचाव के लिए लाया था, पर तू भी बेकार रहा.’’

‘‘शादीलाल, क्या मैं रातभर जाग कर तुम्हारी खाट के चक्कर लगाऊंगा? तुम भी तो घोड़े बेच कर सो गए. वहां जग में पानी रखा है, मुंह धो डालो.’’ बेचारा शादीलाल मुंह धो कर लेट गया. मैं सोने की कोशिश में था कि तभी पायल की आवाज सुन कर चौंका.

जीरो पावर का बल्ब जल रहा था. मैं ने देखा, वह भारीभरकम औरत शायद श्रीमती शादीलाल थीं. मैं ज्यादा रात तक जागने पर मन ही मन झल्लाया और करवट बदल कर लेटा रहा. मुझे आवाजें सुनाई पड़ रही थीं.

‘‘अरे तुम, देखो हल्ला नहीं करना. मेरा यार एकलौता राम सोया हुआ है. तुम खुद नहीं आ सकती थीं. तुम्हारी बहनों ने मेरा मजाक बना दिया.’’

ठीक तभी बिजली जलने की आवाज सुनाई दी और सामूहिक ठहाके भी. मैं ने फौरन हड़बड़ा कर रजाई फेंकी. देखा तो दंग रह गया. शादीलाल की 6 सालियां खड़ी थीं. बेचारा शादीलाल उन्हें टुकुरटुकुर देख रहा था.

साली नंबर 5 गद्दा, तकिया व साड़ी फेंक कर फ्राक में खड़ी हो गई और बोली, ‘‘हम सातों को जीजाजी शैतान कह रहे थे.’’ ‘‘अरे, मैं तो पहले ही समझ गया था. मैं तो नाटक कर रहा था,’’ शादीलाल ने झेंपते हुए साली नंबर 5 को देखा.

इस मजाक के बाद अगला मजाक सुबह ही हुआ. मैं और मेरा यार जब कमरे से बाहर आए, तो आंगन में सालियों से दुआसलाम हुई. तभी एक साली ने कहा, ‘‘जीजाजी, क्या आप रात को बड़ी दीदी के कमरे में गए थे?’’

‘‘नहीं सालीजी, तुम्हारे होते हुए मैं वहां क्यों जाता?’’ कह कर शादीलाल ने उसे गोद में उठा लिया. ‘‘पर जीजाजी, आप बड़ी दीदी की चप्पलें पहने हैं और आप की चप्पलें तो दीदी के कमरे में पड़ी हैं.’’

शादीलाल ने घबरा कर पैरों की ओर देखा. पैरों में लेडीज चप्पलें ही थीं. शादीलाल के हाथ से साली छूट गई, पर मैं ने उसे संभाल लिया. फिर ठहाका लगा, तो शादीलाल की सिट्टीपिट्टी गुम हो गई.

सब से ज्यादा मजा उस समय आया, जब शादीलाल पेट हलका करने शौचालय में घुसा. तब मैं आंगन में खड़ाखड़ा ब्रश कर रहा था. सालियों ने जो टूथपेस्ट दिया था, उस का स्वाद कड़वा सा था और उस से बेहद झाग भी निकल रहा था.

तभी शौचालय के अंदर के नल का कनैक्शन, जिस से पानी जाता था, एक साली ने बाहर से बंद कर दिया. मैं ने सोचा कि शादीलाल तो गया काम से. इधर मैं थूकतेथूकते परेशान था कि शादीलाल की सास ने कहा, ‘‘बेटा, तुम कुल्ला कर लो. इन शैतानों ने टूथपेस्ट की जगह तुम्हें ‘शेविंग क्रीम’ दे दी थी.’’

मेरे तो मानो होश ही उड़ गए. जल्दीजल्दी थूक कर भागा और सालियों के जबरदस्त ठहाके सुनता रहा. शादीलाल एक घंटे बाद जब बिना पानी के ‘शौचालय’ से बाहर आया तो छोटी साली नाक दबा कर आई और बोली, ‘‘जीजाजी, फिर से अंदर जाइए. अब नल चालू कर दिया है.’’

शादीलाल दोबारा अंदर घुसा, फिर निकल कर नहाने घुस गया. उस का लगातार मजाक बनाया जा रहा था, पर वह ऐसा चिकना घड़ा था कि उस पर कोई बात रुकती नहीं थी.

2 दिन ऐसे ही सालियों की मुहब्बत भरी छेड़खानी में गुजरे. जब जाने का नंबर आया तो मेरे सीधेसादे यार शादीलाल ने सालियों से ऐसा मजाक किया कि सातों सालियां ही शर्म से पानीपानी हो गईं.

हुआ यों कि जब हमारे जाने का समय आया और रोनेधोने के बाद तांगे में सामान रख दिया गया, तब सालियां, उन की सहेलियां और महल्ले वालों की भीड़ जमा थी.

तभी शादीलाल ने कहा, ‘‘देखो सातों सालियो, मुझे यह बताओ कि कुंआरी लड़की को क्या पसंद है?’’ सातों सालियों ने न में सिर हिलाया. सब लोगों को यह जानने की बेताबी थी कि शादीलाल अब क्या कहेंगे. तभी शादीलाल ने आगे बढ़ कर कहा, ‘‘अरे, तुम लोगों को नहीं पता कि कुंआरी लड़कियों को क्या पसंद है?’’

‘नहीं,’ सातों सालियों ने एकसाथ फिर से वही जवाब दिया. ‘‘मुझे पहले ही तुम लोगों पर शक था,’’ शादीलाल ने नाटकीय लहजे में कहा.

उस समय सातों सालियों पर घड़ों पानी पड़ गया, जब उन की एक सहेली ने कहा, ‘‘तुम लोगों को जीजाजी ने बेवकूफ बना दिया. उन्हें तुम्हारे कुंआरे होने पर शक है. उन्होंने तुम सभी को शादीशुदा बना दिया है, क्योंकि तुम लोगों को कुंआरी लड़कियों की पसंद नहीं मालूम है.’’

और फिर तो सातों सालियों पर इतने जबरदस्त ठहाके लगे कि सभी दुपट्टे में मुंह छिपा कर अंदर भाग गईं. Story

Short Story in Hindi : मैं… मैं…

Short Story in Hindi. देश की छोड़ो, वह तो बहुत बड़ी चीज है. इंसान भी मैं मैं मैं कर रहा है. देश के प्रधानमंत्री हो या राज्य के मुख्यमंत्री! मुंह से सिर्फ मैं मै ही निकल रहा है. प्रधानमंत्री इत्ते ऊंचे पद पर पहुंच गए हैं मगर हम नहीं कहते. अमेरिका गए, ऑस्ट्रेलिया गए, जापान और नेपाल गए कहीं भी हम, हमारा देश हमारी मातृभूमि नहीं कहा. कहा तो सिर्फ, मैं मैं मैं .जिसमें कुछ भी सत्य समाहित नहीं है. देश के सर्वोच्च पद पर पहुंच गए इतने बड़े ज्ञानी धुरंधर मगर मैं मैं मैं.

मैं सोचता हूं आखिर इंसान मे,- मैं मैं आया कहां से ? हर साधु महात्मा ज्ञानी यही कहता है कभी मैं मैं मैं मत करो, यह अज्ञान का प्रतीक है.मगर मुझे कोई भी नहीं मिलता जो मैं मैं मैं नहीं करता हो .

एक बड़े साहित्यकार फेसबुक पर हैं .मै उनकी कृपा दृष्टि पाने उनकी हर एक स्टेट्स पर लाइक करता हूं .आंखें मूंद कर बिना पढ़े लाइक करता .मैं सोचता मेरी लाइक से कभी तो पिघलेंगे. मैं अनवरत नाटक करता रहा. मगर उन्होंने कभी मेरी और झांका तक नहीं .मैं फोटो अपलोड करूं या कुछ लिखूं, कभी लाइक नहीं किया, मैं तरस गया एक लाइक के लिए.

एक दिन उनके स्टेटस पर किसी क्षुब्ध आदमी ने विपरीत टिप्पणी कर दी .मैंने सोचा, आज मै को परखूंगा .मैंने उस टिप्पणी के खिलाफ टिप्पणी की .और चुपचाप इंतजार करने लगा. आश्चर्य, मै मैं पिघलने लगा, मेरी टिप्पणी को साहित्यकार ने लाइक किया । मैं समझ गया, वहां एक मैं नहीं, मैं मैं का साम्राज्य है.

हर जगह मैं मै है .हमारे एक मित्र हैं कहते हैं- एक बच्चे में भी मैं मै होता है .जिसको आप ने पैदा किया है, उसमें भी मैं मैं होता है, वह भी आपकी बेवजह मैं मैं को स्वीकार नहीं करता, उसका मैं में जागृत हो  उठता है . वे बड़े ज्ञानी पुरुष है . मैं देखता हूं वे हर किसी के मैं में को बड़ी चतुराई से शांत करते हैं . बात मनवानी हो तो चार बार रोहरा जी… रोहरा जी करते हैं .इतने मीठे स्वर में कि मैं समझ जाता हूं वे मेरे मै को जागृत करके अपनी मै की संतुष्टि करना चाहते हैं .

एक शख्स इतने पहुंचे हुए मै हैं की दावा करते हैं, दुनिया के किसी भी महिला को ज्यादा नहीं आधा एक घंटा अकेले बात करने का वक्त दिया जाए मैं उसे काबू में कर लूंगा. पहले मै, जब वह यह  कहते, तो मन ही मन हंसता, मगर तीन-चार प्रकरण अपनी आंखों से देखें, मैं डर गया .यह आदमी है या सम्मोहन का जानकार. वह कहता है कुछ मोहनी या सम्मोहन नहीं होता, यह बातों का मायाजाल है .मैं… मैं …बस उसके मैं… मैं… को पकड़ता हूं, सहलाता  हूं ,उत्सर्जित करता हूं बस…

शहर में एक प्रखर अखबार नवीस है. मैं… मैं… उनका विश्वामित्र की तरह नाक पर बैठा रहता है .लोग उक्त पंडित जी की मैं मैं को उनके क्रोध के कारण आंखें बंद करके सुनते रहते हैं. कौन अग्नि कुंड में हाथ डाले ? बहुतेरे बड़े पदों में हैं । पैसे वाले हैं . लोग उनकी मैं में को सिर्फ इसलिए सहते हैं की पद है रुपया है . मैं भी तब ही सर चढकर बोलता है जब उसे सत्ता का धन का रस्सा पकड़ में आ जाता है. लोग बड़े समझदार होते हैं, जानते हैं इनसे मुंह लगाना फिजूल हैसो आत्मसमर्पण कर देते हैं.

ऐसे लोगों में आपका यह शुद्र लेखक भी है.मैं अपनी यह योग्यता पहचानता नहीं था.जब कभी किसी सत्ताधारी से साबका पड़ता, मै सरेंडर कर जाता उसकी हर गलत बात में भी हां में हां मिलाता .कभी विनम्रता से बात काटता, मगर दुबारा अड़ते ही मै आत्मसमर्पण कर जाता. किसी धनपति के यहां भी यही स्थिति होती, मैं उसकी हर सही-गलत बात की हां में हां कहता.

मैं यह मानता हूं की धनाढृय आदमी का, अपना मैं होता है. वह कभी भी मुझ जैसे साधारण लेखक की मैं में को स्वीकार नहीं कर सकता.

मेरे एक ज्ञानी मित्र ने मेरी इस चलाकी को पकड़ा और हंस-हंस कर मित्रों को बताता .मैं दांत निकाल कर हंसता मुस्कुराता .मैं भी अनेक प्रकार के होते हैं .मैं एक दुर्लभ एक सहज मै. मेरा में सरल किस्म का है .मेरी प्रकृति के लोग सुखी रहते हैं, समन्ववादी . मगर जकड़ने वाला मै मैं खतरनाक होता है .जो इसकी जद में आते हैं, वह उन्हें निगल जाता है .मैं कहां नहीं है. संसार का निर्माण, संहार और पालन करने वालों मैं भी मैं मैं और मैं है .

उनकी तीनों देवियों में भी, मैं मैं मै है .वेदों में, स्मृतियों में, महाभारत में भी तो मैं मै ही मिलता है. सारी लड़ाई और अस्तित्व  मैं को लेकर ही है . यह मेरा घर है, यह मेरी जमीन, यहां का मै मालिक,यह मेरी बपौती.

यह सब जानते हैं, यह संसार  क्षण भंगुर है. यह मै निरा बेझडपन है,मगर हर कोई मैं मैं मैं कर रहा है . साधु हो या महात्मा हो, मतदाता हो या नेता, अथवा अभिनेता सभी मै की परिक्रमा कर रहे हैं .और क्यों न करें, जब गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है- मैं मृत्यु में भी हूं, जीवन में भी हूं, आग में भी हूं और पानी में भी .जब भगवान “मैं” को नहीं छोड़ सके, फिर हम आदम जात कैसे छोड़ सकते हैं.Short Story in Hindi

Social Humor. एक दु:खी आत्मा से मुलाकात

Social Humor. अगर मेयर बन जाते, विधायक बन जाते या फिर सांसद बन जाते तो सारे दु:ख मिट जाते.जीवन तर जाता.मगर किस्मत में शायद दु:खी रहना ही बदा है.

सुबह सवेरे सामना हो गया. चेहरे पर दुख के बादल उमड़ घुमड़ रहे थे. हमें देखा तो चेहरा और भी सुकुड़ गया बोले, भैया, रोहरानंद! मेरा देश गर्त में जा रहा है ?

रोहरानंद को सहानुभूति उमड़ी-” क्यों भैय्या! क्या हो गया, सब कुछ तो ठीक-ठाक नजर आता है।आखिर क्या हो गया ?”

दु:खी आत्मा मानो तड़फ उठी-” क्या हो गया ? क्या तुम्हें कुछ भी गलत  दृष्टिगोचर नहीं हो रहा ??”

रोहरानंद ने कहा -” ऐसा तो चलता रहता है और ऐसा ही चलता रहेगा .हम जैसे आम आदमी को भला क्या विशिष्ट दृष्टिगोचर होने लगेगा.”

दु:खी आत्मा ने दु:खी स्वर में कहा- “अगरचे, हम महापौर होते, सांसद होते तो, यह सब कतई नहीं होता जो शहर में इन दिनों हो रहा है.”

रोहरानंद – “क्या अनर्थकारी हुआ है जरा हम भी सुने.”

दु:खी आत्मा- “अगरचे हम महापौर बनते तो शहर का कायाकल्प हो गया होता. विधायक बनते, विधानसभा क्षेत्र का चेहरा बदल देते और अगर सांसद बनते तो संसदीय क्षेत्र का कायाकल्प हो जाता.”

रोहरानंद –  “आप दूसरों को भी  समय  दीजिए, अभी समय ही कितना व्यतीत हुआ है.”

दुखी आत्मा -” एक एक दिन बहुत होता है ,इतना समय क्या कम है.हमें तो एक बार बना दीजिए 4 दिन मे सब ठीक कर कर देंगे.”

रोहरानंद -” अच्छा, 4 दिन क्या 100 दिन  में क्या कुछ चमत्कार कर दिखाते .”

दुखी आत्मा – “देखो!सच तो यह है कि सबसे पहले मैं स्वयं अपना दु:ख दूर करता. चुनाव में एक करोड़ रुपए बहा डाला, उसकी रिकवरी करता.”

रोहरानंद – “अर्थात स्वयं लाल होते, फिर जनता को लाल करते…

दु:खी आत्मा -” भैय्या! क्या बताएं तुम अपने आदमी हो  तुमसे क्या छिपाना. इन दो वर्षों में ही मैं स्वयं सुखी हो ही जाता अपने खासुल खास समर्थकों को भी सुखी कर डालता.तुम्हें भी मालामाल कर डालता.”

रोहरानंद- ( हंसते हुए )” तो फिर आपको महापौर पर विधायक पर बाण छोड़ने का क्या अधिकार है. शहर की किस्मत अच्छी है जो तुम न महापौर हुए. ना विधायक बने.”

दु:खी आत्मा – “नहीं, नहीं ,यह नगर का दुर्भाग्य है भाई . मैं ना दु:खी रहता, न किसी को दु:खी रहने देता.मैं स्वयं तो दोनों हाथों से रुपए समेटता, अपने समर्थकों को भी निहाल कर देता.”

रोहरानंद- “मुझे तो आपकी बात पर राई भर भी एतबार नहीं है, हां अगर जीत जाते तो खुद मालामाल अवश्य हो जाते.”

दु:खी आत्मा -” नहीं, नहीं , मुझ पर विश्वास करो. मैं भ्रष्टाचार करता और जी भर कर करता और सभी नगरवासियों को अपना पिछलग्गू बनाकर दिखा देता.”

रोहरानंद -” भैय्या! जनता समर्थक यूं ही नहीं बनती, उसके लिए नगर का विकास करना पड़ता है. काम करना पड़ता है. महापौर का दायित्व है नगर की साफ-सफाई,सड़कों की मरम्मत सौन्दरीकरण,जल पानी इत्यादि का ध्यान रखें. जनता तब पिछलग्गू होती है.”

दुखी आत्मा -” जनता यह सब नहीं देखती, जनता सिर्फ मुस्कुराता चेहरा देखती है.तब मैं सदा मुस्कुराता रहता. जनता मुस्कुराता देख स्वयं  मुस्कुराती…”

रोहरानंद – “मगर, तुम्हें देखकर तो कोई भी नहीं कह सकता कि तुमने जिंदगी में कभी मुस्कुराया भी होगा. जब  देखो तुम्हारा मुंह लटका रहता है.

दुखी आत्मा -” ( आर्त स्वर में ) मैं पहले ऐसा नहीं था.”

रोहरानंद – “तुम्हें देख कर लगता है तुम जन्मजात दुखी हो.

दुखी आत्मा -” नहीं, नहीं, ऐसा नहीं है . पहले मैं भी एक मस्तमौला और खुशगवार मौसम की भांति खुशनुमा इसां था .”

रोहरानंद -” अच्छा, तो यह पराजित होने के पश्चात के हालात हैं…”

दुखी आत्मा- “( गहरी नि:श्वास छोड़कर ) हां, मैं मेयर चुनाव हारने के बाद से ऐसा हो गया हूं.”

रोहरानंद- “भैय्या! अब मुझे तुमसे बड़ी सहानुभूति है.”

दुखी आत्मा – “ऐसा है तो मेरा साथ दो…”

रोहरानंद -“मैं आम आदमी हूं. मैं भला क्या साथ दूं.”

दुखी आत्मा -“मुझे तुमसे कुछ नहीं चाहिए, बस एक चीज… सिर्फ एक चीज…

रोहरानंद – “अच्छा चलो, बताओ.”

दु:खी आत्मा -” सिर्फ इतना करो भैय्या! तूम भी मेरी तरह दु:खी हो जाओ .चेहरा लटका लो. चेहरे पर पीड़ा उभार लो .कोई भी देखें तो समझ जाए कि तुम भी दुखी आत्मा हो.”

रोरहरानंद – “( आश्चर्य से ) मगर इससे क्या होगा ?”

दु:खी आत्मा – “मेरी आत्मा को सुकून मिलेगा. मैं एक-एक करके शहर को अपने साथ ऐसे ही दु:खी कर अपना बहुमत बनाऊंगा .और एक दिन मेरे साथ इतने लोग हो जाएंगे की महापौर की कुर्सी हिलने लगेगी.”

रोहरानंद – “वाह! क्या तरकीब निकाली है. मगर मैं तो धर्म संकट में फंस गया.”

दु:खी आत्मा – “देखो! तुम अपनी जुबां से फिर नहीं सकते, तुमने मेरा साथ देने का वादा किया है.”

रोहरानंद – “मगर, यह तो षड्यंत्र कर रहे हो, मैं भला क्यों साथ दूं. मैं तो आम आदमी हूं. मेरा तुमसे लेना दो न देना एक. अर्थात मुझे क्या लाभ ?”

दु:खी आत्मा – “जिस दिन में बहुमत में आऊंगा, यानी महापौर बनूंगा तुम्हें खुश कर दूंगा.”

रोहरानंद – “मगर, मैं तो आज भी खुश हूं और कल भी था. और मैं जानता हूं तुम कल भी दुखी थे, आज भी हो,और कल भी रहोगे.” Social Humor

Social Satire: मुख्यमंत्री रोहरानंद चले विदेश!

Social Satire.दोस्तों! तकदीर सबकी यूं ही नहीं खुलती,अब देखो आप और मैं, हम में कितना अंतर है .आप आम आदमी हैं, मैं भाग्य से मुख्यमंत्री हूं.आपने व्होट दिया, आप अगर वोट न देते,तो मैं मुख्यमंत्री भला कैसे बनता ?

मगर, आप प्रदेश की तरक्की में अपनी भूमिका निभाईये मैं रोहरानंद मुख्यमंत्री, आपके व्होट की बदौलत दुनिया जहान के सुख भोग रहा हूं… मैं अमेरिका जा रहा हूं .हे! मतदाताओं…!! मैं आपको बताकर, अधिकारपूर्वक विदेश जा रहा हूं.

आपने अपना कर्तव्य, ईमानदारी से निभाया है. आपने अपने बहुमूल्य मत का उपयोग किया, विधायक चुने, फिर विधायकों ( माफ करिए आलाकमान, पार्टी ) ने मुझे अपना वफादार सेवक माना और मैं मुख्यमंत्री बन गया.

प्रदेश का मुखिया बनने के पश्चात, हालांकि आपकी और हमारे बीच की दूरियां बढ़ गई हैं. यह स्वभाविक है. यही लोकतंत्र है, जैसे ही मैं मुख्यमंत्री बना मेरी अंतरात्मा ने करवट बदली… मैं विशिष्ट बन गया .अब मैं आपसे दूर दूर रहता हूं. आप मुझसे सीधे नहीं मिल सकते.

दोस्तों…! यह सच है, कि मैंने कभी स्वपन में भी कल्पना नहीं की थी, कि मैं कभी मुख्यमंत्री बन जाऊंगा. मैं साफगोई से स्वीकार करता हूं कि मेरी तो लॉटरी ही निकल आईं है.मेरे इस सत्य स्वीकारोक्ति का प्लीज बतंगड़ मत बनाना. मैं स्पष्ट शब्दों में साहस के साथ कहना चाहूंगा कि मैं मुख्यमंत्री बनते ही, आप लोगों से बहुत बहुत दूर हो गया हूं.

रूपक स्वरूप इस तरह समझे जैसे मनुष्य से चांद दूर है,जैसे आम आदमी से अमेरिका दूर है. मगर मैं ईमानदार इंसान हूं. राजनीतिज्ञ की बात में नहीं करता . राजनीतिज्ञ के रूप से मेरे चेहरे पर अनेकानेक मुखोटे लगे हुए हैं.

हे मतदाताओं..!में यह कहने में कोई गुरेज नहीं करता कि आप भी जब मुख्यमंत्री बन जाएं तब मेरी ही तरह खूब सुख भोगना. जैसे मेरी फितरत देख रहे हो न… वैसी करना. कुर्सी की सौगंध मैं एक बार भी कुछ नहीं बोलूंगा.

मैं बुरा भी नहीं मानूंगा.आप मेरी ही तरह जनता जनार्दन से दूर दूर रहना और पद की गरिमा को मेंटेन करना, तब मैं आम आदमी रहूगां, मगर मैं बुरा नहीं मानूंगा. आज जैसे आपके साथ मैं व्यवहार कर रहा हूं आप करना सच में बुरा नहीं मानूंगा .मैं मिलने आऊंगा, आप के चरण स्पर्श करूंगा तब मेरी और देखना भी मत. बस…

दोस्तों! मुख्यमंत्री बनने के बाद यह रोहरानंद परिपक्व हुआ है .बहुतेरी बातों को मैंने समझा है , जिसको आपसे शेयर करने में मुझे कोई संकोच नहीं है .मैं जान गया हूं यह परम सत्य है कि जैसे यह जीवन भाग्य से मिलता है, वैसे ही लोकतंत्र में भाग्य से मैं मुख्यमंत्री बन गया हूं.

और जब भाग्य ने साथ दिया है तो क्यों न मैं जीवन का हर सुख भोग लूं. फिर पता नहीं मौका मिले या न मिले. मैं यह सत्य जान गया हूं कि मेरे कई सीनियर टापते रह गए . मेरे कई जूनियर इंतजार कर रहे हैं कि छींका कब टूटे.

हे मतदाताओं … इस जीवन दर्शन के पश्चात मै अमेरिका जा रहा हूं. मैं मुख्यमंत्री रहते रहते चीन, ब्रिटेन, रूस, जापान, जर्मनी अर्थात दुनिया के संपूर्ण 189 देशों को घूम लेना चाहता हूं .

यही नहीं स्वीटजरलैंड मैं अवश्य जाऊंगा, बारंबार जाऊंगा क्योंकि इस देश से मैं कुछ ज्यादा ही प्रेम करता हूं. क्योंकि यहां एक से एक बैंक है. यहां मैं खाता भी खुलवाना चाहूंगा.क्योंकि हम उच्च श्रेणी के मुख्यमंत्रियों के मध्य अक्सर यह शिगुफा चलता है कि जिस मुख्यमंत्री का स्विजरलैंड में बैंक अकाउंट नहीं है, भला वह भी कोई मुख्यमंत्री है.

तो मैं इसे ठीक करूगा. क्योंकि इज्जत का सवाल तो आपका है न. लोग क्या कहेंगे, कैसे लोग हैं इनके मुख्यमंत्री का एक अदद खाता भी स्विजरलैंड में नहीं है.

दोस्तों… मैं मुख्यमंत्री बनकर खुद तो दुनिया घूम ही रहा हूं,मुझे यह बताते काफी हर्ष हो रहा है कि मैं परिवार, धर्म पत्नी और बच्चों को भी घुमा रहा हूं. अगर मेरे मन में चोर होता तो यह सच्चाई में कदापि नहीं बताता.

छुपकर सपरिवार चला जाता,आप ( तुम ) क्या कर लेते ? मगर मैं एक साफ दिल मुख्यमंत्री हूं अतः जो भी करता हूं आप सभी को स्पष्ट बता कर करता हूं. क्योकि मैं जानता हूं बताऊंगा तो भी मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकते, क्योंकि संवैधानिक रूप से मैं मुख्यमंत्री हूं.और मुझे आपके हित में कोई भी निर्णय लेने का पूर्ण अधिकार है. वह इस तरह, कि मैं जिस परंपरा का पालन कर रहा हूं वह पूर्ववर्ती है,और आप के भले के लिए है, कल आप भी सपरिवार जा सकेंगे.

हे मतदाताओं! में अमेरिका जा रहा हूं… मैं अपना जन्मदिन अबकी वही मनाऊंगा. देखो, यहां मनाता तो क्या आनंद आता ? जिंदगी भर तो यही धूल धक्कड़ खाता रहा हूं .समय मिला है, उसका भरपूर लाभ उठाना ही बुद्धिमत्ता है .यहां रखा क्या है ? अमेरिका में जीवन है, सुख है ऐश्वर्य है. मैं तो कहता हूं जिसने अमेरिका में जन्म दिवस नहीं मनाया वह जन्मा ही नहीं है.

दोस्तों ! बतौर मुख्यमंत्री, मैं अमेरिका जा रहा हूं….मैं जा रहा हूं …अर्थात प्रदेश का हर नागरिक जा रहा है.आखिरकार में प्रत्येक नागरिक का प्रतिनिधित्व ही हूं. मै आनंद उठाऊंगा,मैं समझूंगा मेरे प्रदेश के प्रत्येक नागरिक ने सदुपयोग किया.

मैं मुख्यमंत्री के रूप में बेशकीमती सुख, सुविधाओं का उपयोग करूंगा समझूंगा मेरे मतदाता भी मेरे साथ आनंद उठा रहे हैं.देखिए मेरा हृदय कितना विशाल है. हे मतदाताओं… में बड़ा ही सहृदय मुख्यमंत्री हूं. आशा है आप भी सहृदयता का परिचय देंगे. जब दूरदर्शन, टीवी और समाचार पत्रों में मेरे अमेरिका दौरे की खबर पढेंगे, तो उसे सकारात्मक दृष्टि से लेंगे.

शेष फिर ( तुम्हारा ) रोहरानंद. Social Satire

Story in Hindi : वे बच्चे

Story in Hindi. लाल बत्ती पर जैसे ही कार रुकी वैसे ही भिखारी और सामान बेचने वाले उन की तरफ लपके. बड़ा मुश्किल हो जाता है इन भिखारियों से पीछा छुड़ाना. जब तक हरी बत्ती न हो जाए, भिखारी आप का पीछा नहीं छोड़ते हैं. अब तो इन के साथसाथ हिजड़ों ने भी टै्रफिक सिग्नलों पर कार वालों को परेशान करना शुरू कर दिया है. सब से अधिक परेशान अब संपेरे करते हैं, यदि गलती से खिड़की का शीशा खुला रह जाए तो संपेरे सांप आप की कार के अंदर डाल देते हैं और आप चाह कर भी पीछा नहीं छुड़ा पाते हैं.

‘‘कार का शीशा बंद कर लो,’’ मैं ने पत्नी से कहा. ‘‘गरमी में शीशा बंद करने से घुटन होती है,’’ पत्नी ने कहा.

‘‘डेश बोर्ड पर रखे सामान पर नजर रखना. भीख मांगने वाले ये छोटे बच्चे आंख बचा कर मोबाइल फोन, पर्स चुरा लेते हैं,’’ मैं ने कहा.

इतने में एक छोटी सी बच्ची कार के दरवाजे से सट कर खड़ी हो गई और पत्नी से भीख मांगने लगी.

कुछ सोचने के बाद पत्नी ने एक सिक्का निकाल कर उस छोटी सी लड़की को दे दिया. वह लड़की तो चली गई, लेकिन उस के जाने के फौरन बाद एक और छोटा सा लड़का आ टपका और कार से सट कर खड़ा हो गया.

‘‘एक को दो तो दूसरे से पीछा छुड़ाना मुश्किल हो जाता है. देखो, इस को कुछ मत देना, नहीं तो तीसरा बच्चा आ जाएगा,’’ मैं बोला.

इसी बीच बत्ती हरी हो गई और कार स्टार्ट कर के मैं आगे बढ़ गया.

‘‘इन छोटेछोटे बच्चों को भीख मांगते देख कर बड़ा दुख होता है. स्कूल जाने की उम्र में पता नहीं इन को क्याक्या करना पड़ता है. इन का तो बचपन ही खराब हो जाता है,’’ पत्नी ने कहा.

‘‘यह हम सोचते हैं, लेकिन भीख मांगना इन के लिए तो एक बिजनेस की तरह है. रोज इसी सड़क से आफिस जाने के लिए गुजरता हूं, इस लाल बत्ती पर रोज इन्हीं भिखारियों को सुबहशाम देखता हूं. कोई नया भिखारी नजर नहीं आता है. मजे की बात यह कि भिखारी सिर्फ कार वालों से ही भीख मांगते हैं. लाल बत्ती पर कभी इन को स्कूटर, बाइक वालों से भीख मांगते नहीं देखा है,’’ मैं ने कहा, ‘‘भिखारियों के साथसाथ अब सामान बेचने वालों से भी सावधान रहना पड़ता है.’’

‘‘छोड़ो इन बातों को,’’ पत्नी ने कहा, ‘‘कभीकभी तरस आता है.’’

‘‘फायदा क्या इन पर तरस दिखाने का,’’ मैं ने कहा, ‘‘जरा ध्यान रखना, फिर से लाल बत्ती आ गई.’’

‘‘अपनी भाषा कभी नहीं सुधार सकते. लाल, हरी बत्ती क्या होती है. ट्रैफिक सिग्नल नहीं कह सकते क्या,’’ पत्नी ने कहा.

‘‘फर्क क्या पड़ता है, बत्ती तो लाल और हरी ही है,’’ मैं ने कहा.

‘‘मैनर्स का फर्क पड़ता है. हमेशा सही बोलना चाहिए. अगर तुम्हें किसी को टै्रफिक सिग्नल पर मिलना हो और तुम उसे लाल बत्ती पर मिलने को कहो और मान लो, टै्रफिक सिग्नल पर हरी बत्ती हो या फिर बत्ती खराब हो तो वह व्यक्ति क्या करेगा? अगली लाल बत्ती पर आप का इंतजार करेगा, जोकि गलत होगा. इसीलिए हमेशा सही शब्दों का प्रयोग करना चाहिए,’’ पत्नी ने कहा.

‘‘अब इस बहस को बंद करते हैं. फिर से बत्ती लाल हो गई है.’’ इस बार एक छोटा सा 7-8 साल का बच्चा मेरी तरफ आया.

‘‘अंकल, टायर, एकदम नया है, सिएट, एमआरएफ, लोगे?’’ बच्चा बोला. मैं चुप रहा.

‘‘एक बार देख लो,’’ बच्चा बोला, ‘‘सस्ता लगा दूंगा.’’ ‘‘नहीं लेना,’’ मैं ने कहा.

‘‘एक बार देख तो लो. देखने के पैसे नहीं लगते,’’ बच्चा बोला. ‘‘कितने का देगा?’’ मैं ने पूछा.

‘‘मारुति 800 का नया टायर शोरूम में लगभग 1,100 रुपए में मिलेगा. आप के लिए सिर्फ 800 रुपए में,’’ बच्चा बोला.

‘‘मेरे लिए सस्ता क्यों? टायर चोरी का तो नहीं?’’ मैं ने कहा. ‘‘हम लोगों की कंपनी में सेटिंग है, इसलिए सस्ते मिल जाते हैं.’’

‘‘एक टायर कितने में लाते हो?’’ ‘‘सिर्फ 50 रुपए एक टायर पर कमाते हैं.’’

‘‘50 रुपए में टायर देगा?’’ ‘‘नहीं लेना तो मना कर दो, क्यों बेकार में मेरा टाइम खराब कर रहे हो,’’ बच्चा बोला.

‘‘टायर बेचने बेटे तुम आए थे, मैं चल कर तुम्हारे पास नहीं गया था,’’ मैं ने कहा. ‘‘सीधे मना कर दो,’’ बच्चा बोला.

‘‘मना किया तो था, लेकिन फिर भी तुम चिपक गए तो मैं ने सोचा, चलो जब तक लाल बत्ती है तुम्हारे साथ टाइम पास कर लूं,’’ मैं ने कहा.

‘‘टाइम पास करना है तो आंटी के साथ करो न. मेरा बिजनेस टाइम क्यों खराब कर रहे हो,’’ कह कर बच्चा चला गया.

‘‘बात तो बच्चा सही कह गया,’’ पत्नी बोली, ‘‘मेरे साथ बात नहीं कर सकते थे, टाइम पास करने के लिए वह बच्चा ही मिला था. ऊपर से जलीकटी बातें भी सुना गया.’’

‘‘आ बैल मुझे मार. चुप रहो तो मुसीबत, पीछा ही नहीं छोड़ते और बोलो तो जलीकटी सुना जाते हैं,’’ मैं ने कहा.

‘‘जब टायर लेना नहीं था तो उस के साथ उलझे क्यों?’’ पत्नी ने कहा. ऐसे ही बातोंबातों में घर आ गया.

दिल्ली शहर की भागदौड़ की जिंदगी में घर और दफ्तर का रुटीन है, इसी में इतनी जल्दी दिन बीत जाता है कि अपनों से भी बात करने का समय निकालना मुश्किल हो जाता है.

एक दिन आगरा घूमने का कार्यक्रम बना कर सुबह अपनी कार से रवाना हुए. खुशनुमा मौसम और सुबह के समय खाली सड़कें हों तो कार चलाने का आनंद ही निराला हो जाता है.

फरीदाबाद की सीमा समाप्त होते ही खुलाचौड़ा हाइवे और साफसुथरे वातावरण से मन और तन दोनों ही प्रसन्न हो जाते हैं. बीचबीच में छोटेछोटे गांव और कसबों में से गुजरते हुए कोसी पार कर मैं पत्नी से बोला, ‘‘चलो, वृंदावन की लस्सी पी कर आगे चलेंगे. वैसे हम दोनों पहले भी वृंदावन घूमने आ चुके हैं. मंदिरों व भगवान में अपनी कोई रुचि नहीं लेकिन यहां के बाजार में लस्सी पीने अैर भल्लाटिक्की खाने का अलग ही मजा है.’’

 

कार एक तरफ खड़ी कर इस्कान मंदिर के सामने की दुकान में हम लस्सी पीने के लिए बैठ गए.

लस्सी पी कर बाहर निकले तो पत्नी बोली, ‘‘चलो, अब थकान कम हो गई.’’

कार के पास जा कर जेब से चाबी निकाली और कार का दरवाजा खोलने के लिए चाबी को दरवाजे पर लगाया ही था कि तभी एक छोटा सा बच्चा आ कर दरवाजे से सट कर खड़ा हो गया और बोला, ‘‘अंकल, पैसे.’’

भिखारियों को मैं कभी पैसे नहीं दिया करता पर पता नहीं क्यों उस बच्चे पर मुझे तरस आ गया और जेब से 1 रुपए का सिक्का निकाल कर उस छोटे से बच्चे को दे दिया.

वह तो चला गया लेकिन उस के जाने के बाद पता नहीं कहां से छोटे बच्चों का एक  झुंड आ गया और चारों तरफ से हमें घेर लिया.

‘‘अंकल, पैसे,’’ एक के बाद एक ने कहना शुरू किया. मैं ने एक बार पत्नी की तरफ देखा, फिर उन बच्चों को.

जी में तो आया कि डांट कर सब को भगा दूं पर जिस तरह बच्चों की भीड़ ने हमें घेर रखा था और लोग तमाशबीन की तरह हमें देख रहे थे, शायद उस से विवश हो कर मेरा हाथ जेब में चला गया और फिर हर बच्चे को 1-1 सिक्का देता गया. किसी बच्चे को 1 रुपए का और किसी को 2 रुपए का सिक्का मिला. किसी के साथ भेदभाव नहीं था. यह इत्तफाक ही था कि जेब में 2 सिक्के रह गए और बच्चे भी 2 ही बचे थे. एक बच्चे को 5 रुपए का सिक्का चला गया और आखिरी वाले को 50 पैसे का सिक्का मिला.

‘‘क्यों, अंकल, उसे 5 रुपए और मुझे 50 पैसे?’’ ‘‘जितने सिक्के जेब में थे, खत्म हो गए हैं. और सिक्के नहीं हैं, अब आप जाओ.’’

‘‘ऐसे कैसे चला जाऊं,’’ बच्चे ने अकड़ कर कहा. ‘‘और पैसे मैं नहीं दूंगा. सारे सिक्के खत्म हो गए. तुम कार के दरवाजे से हटो,’’ मैं ने कहा.

‘‘मतलब ही नहीं बनता यहां से जाने का. फटाफट पैसे निकालो. दूसरे बच्चे दूर चले गए हैं. उन्हें भाग कर पकड़ना है. अपने पास ज्यादा टाइम नहीं है. अंकल, आप के पास पैसे खत्म हो गए हैं तो आंटी के पास होंगे,’’ बच्चे ने पत्नी की तरफ देखते हुए कहा, ‘‘आंटी, पर्स से फटाफट पैसे निकालो.’’

मैं और मेरी पत्नी दोनों एकदम अवाक् हो एकदूसरे की शक्ल देखने लगे. पत्नी ने चुपचाप पर्स से 5 रुपए का सिक्का निकाला और उस बच्चे को दे दिया.

सिक्का पा कर छोटा सा बच्चा जातेजाते कहता गया,  ‘‘इतनी बड़ी कार ले कर घूमते हैं. पैसे देने को 1 घंटा लगा दिया.’’

फटाफट कार में बैठ कर  मैं ने कार स्टार्ट की और अपने गंतव्य की ओर चल पड़ा.

हम आगरा पहुंचे तो काफी थक चुके थे. पत्नी ने मेरे चेहरे की थकान को देख कर कहा, ‘‘चलो, किसी गेस्ट हाउस में चलते हैं.’’

गेस्ट हाउस के कमरे में बिस्तर पर लेटेलेटे सामने दीवार पर टकटकी लगा कर मुझे सोचते देख पत्नी ने पूछा, ‘‘क्या सोच रहे हो?’’

‘‘उस छोटे बच्चे की बात मन में बारबार आ रही है. एक तो भीख दो, ऊपर से उन की जलीकटी बातें भी सुनो. सोच रहा हूं कि दया का पात्र मैं हूं या वे बच्चे. दया की भीख मैं उन से मांगूं या उन को भीख दूं. कुछ समझ में नहीं आ रहा है कि भिखारी कौन है. आखिर सुकून की जिंदगी कब और कहां मिलेगी. कहीं भी चले जाओ, ये भिखारी हर जगह सारा मजा किरकिरा कर देते हैं.’’

‘‘चलो, इस किस्से को अब भूल जाओ और हम दोनों ही प्रतिज्ञा करते हैं कि आज के बाद कभी भी किसी को भीख या दान नहीं देंगे, चाहे वह व्यक्ति कितना ही जरूरतमंद क्यों न हो.’’

‘‘करे कोई, भरे कोई,’’ मेरे मुंह से हठात निकल पड़ा. ‘‘किसी के चेहरे पर लिखा नहीं होता कि वह जरूरतमंद है.’’

‘‘सही बात है. हमें खुद अपनेआप को देखना है. दूसरों की चिंता में अपना आज क्यों खराब करें. अब आराम करते हैं. Story in Hindi

लेखक- मनमोहन भाटिया

Hindi Short Story : बेइज्जती पाने की होड़

Hindi Short Story. पहले मैं इस भरम में जीता था कि हर इनसान इज्जत के साथ अपनी जिंदगी बिताना चाहता है लेकिन बाद में मेरी इस सोच में बदलाव तब आया जब मुझे अपनी खुद की आंखों से बेइज्जती के साथ जीनेमरने की कसमें खाने वाले धुरंधरों के दर्शन करने का मौका मिला.

भारत की खोज बड़े ही मौज के साथ वास्को डी गामा ने की थी, लेकिन बेइज्जती के बोझ की खोज किस रोज और किस ने की थी, यह बता पाना उतना ही मुश्किल है जितना मुश्किल आम आदमी के लिए बिना रीचार्ज किए स्मार्ट फोन की बैटरी को पूरा दिन चलाना है.

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कुछ लोग बेइज्जत होने को अपना बुनियादी हक मानते हैं और इसे पाने के लिए वे लगातार अपनी इज्जत को तारतार करते हुए इसी जद्दोजेहद में लगे रहते हैं. ‘बेइज्जती पिपासु’ लोगों को अपनी पूरी उम्र इज्जत की प्राणवायु हजम नहीं होती है. इज्जत भरी जिंदगी की इच्छा से ही ‘बेइज्जती प्रिय’ लोग सहम जाते हैं और इज्जत जैसी नुकसान पहुंचाने वाली और मारक चीज से उचित दूरी बना कर चलते हैं. बेइज्जत होना इन के लिए रोटी, कपड़ा और मकान जैसी बुनियादी जरूरतों में शुमार होता है.

बेइज्जती के नशेड़ी उलट हालात में भी बेइज्जती का हरण कर उस का वरण करने में कामयाब हो जाते हैं. आम का सीजन हो या केले का, ये लोग हमेशा से ही सरेआम बेइज्जती से गले मिलना पसंद करते हैं ताकि सार्वजनिक जिंदगी में ट्रांसपेरैंसी बनी रहे.

इसी ट्रांसपेरैंसी और ईमानदारी के चलते ये जल्द ही बेइज्जती के वामन रूप से विराट रूप धर लेते हैं. हर देश, काल और हालात में ‘बेइज्जती उपासक’ अपनी निष्ठा और निष्ठुरता से बेइज्जती हासिल कर ही लेते हैं.

बेइज्जती के इस धंधे में कभी मंदी नहीं आती है क्योंकि बेइज्जती में हमेशा नकद से ही आप का कद बढ़ता रहता है और उधार से बेइज्जती की धार कुंद होती चली जाती है.

विजय माल्या और नीरव मोदी ने भले ही बैंक से कर्ज ले कर बैंक को चूना लगा दिया हो, लेकिन देश से भाग कर, बेइज्जत होने की दौड़ में सब को पछाड़ कर ‘बेइज्जती उद्योग’ को चार चांद लगा दिए हैं.

कुछ लोगों में बेइज्जत होने का जुनून ही उन के सुकून की वजह होता है. बेइज्जती का घूंट वे कहीं से भी लूट लेते हैं. गलती से मिली इज्जत की वाह, इन की धमनियों में होने वाली बेइज्जती के नियमित बहाव को नहीं रोक पाती है.

बेइज्जती प्रदेश के मूल निवासी, चाहे अपने निवास पर हों या दूसरी किसी जगह के प्रवास पर, वे बेइज्जती की लौजिंग बोर्डिंग हमेशा अपने शरीर पर धारण किए रहते हैं.

इस प्रदेश के मूल निवासी हमेशा बेइज्जत होने के नएनए मौके और तरीके खोजने की कोशिश करते रहते हैं ताकि बेइज्जती की बोरियत से बचा कर इसे समाज की मुख्यधारा में लाया जा सके.

लगातार बेइज्जत होना भी एक ऐसी कला है जिसे आम आदमी के लिए अंजाम देना मुश्किल होता है. बेइज्जती के फील्ड में पेशेवर फील्डिंग करने वालों की कमी महसूस की जाती रही है.

डिमांड के मुकाबले सप्लाई न होने से बैलैंस गड़बड़ा रहा?है. लेकिन फिर भी देख कर संतोष और कुछकुछ होता है कि कुछ लोगों ने बेइज्जत होने को अपनी जिंदगी का मिशन और सहारा बना लिया है और वे बेइज्जती के सामने मुसाफिर की तरह ट्रैफिक के नियमों का पालनपोषण कर, इस रास्ते पर दांडी मार्च रहे हैं.

इन्हीं लोगों द्वारा उपजी क्वालिटी के चलते क्वांटिटी की कमी महसूस नहीं हो पाती है और क्वांटिटी की कमी के खिलाफ उठने वाली संगठित आवाज बेइज्जती के बोझ के नीचे दब जाती है.

बेइज्जती उद्योग में अभी भी बहुत उम्मीदें हैं जिन पर बेइज्जत हो कर गंभीरता से विचार करना जरूरी है. समाज के फायदे के लिए इस क्षेत्र में लोगों को बढ़ावा देने की जरूरत है क्योंकि आज की गलाकाट होड़ में जहां लोगों को इज्जत और नाम के लिए दरदर भटकने के बाद भी बेइज्जती ही हाथ लगती है, वहीं अगर उन्हें सीधे ही बेइज्जत होने के लिए बढ़ावा दिया जाए तो उन का यह भटकाव काफी हद तक कम होगा और नतीजतन समाज में इज्जत पाने की अंधी दौड़ में भागने वाले, उसेन बोल्ट जैसे धावक की आवक भी कम हो जाएगी. Hindi Short Story

Story in Hindi : हैडमास्टर सीमा से क्यों पैसे लेना चाहते थे?

Story in Hind-

‘‘बाबूजी, आप मिठाई बांटिए,’’ सीमा ने खुश होते हुए कहा.

‘‘क्यों… क्या हुआ बेटी?’’

‘‘मेरी टीचर की नौकरी लगी है… पास के गांव में.’’

‘‘यह तो बहुत खुशी की बात है. आखिरकार मेरी बेटी जिंदगी में कुछ बन ही गई.’’

आज स्कूल का पहला दिन था. सीमा बहुत खुश थी. बाबूजी भी उन के साथ स्कूल में आए थे. पहला दिन तो ठीकठाक ही था. दूसरे दिन सीमा प्रार्थना में खड़ी थी, तभी हैडमास्टरजी मदन उस के पास आए और कहने लगे, ‘‘मैडमजी, बढ़िया नौकरी लगी है, चाय तो पिलाइए स्टाफ को.’’

‘‘जी, मैं ने तो अभी पहली तनख्वाह भी नहीं ली है. बाद में सब को चाय पिलाऊंगी,’’ सीमा ने कहा.

‘‘अरे मैडमजी, एक कप चाय के लिए महीनेभर का इंतजार करवाएंगी क्या?’’

‘‘सरजी, मैं ने कहा न कि पहली तनख्वाह मिलने के बाद चाय पिलाऊंगी. मुझे माफ कर दीजिए.’’

हैडमास्टरजी चले गए. अजीत सर पास में ही खड़े थे.

‘‘मै कुछ कहूं,’’ अजीत सर धीमी आवाज में बोले. ‘‘कहिए.’’

‘‘चाय पिला दीजिए. अगर पैसे नहीं हैं, तो मैं दिए देता हूं. तनख्वाह मिलने के बाद आप लौटा दीजिएगा.’’

‘‘मुझे किसी का उधार नहीं चाहिए.’’

इस के बाद सभी लोग क्लास में चले गए. सीमा की क्लास में 20 छात्र थे. 10 छात्र ठीकठाक पढ़ते थे, बाकी बचे 10 छात्रों को अलग से ज्यादा पढ़ाना पड़ता था.

सीमा जैसे ही स्टाफरूम में जाती थी, किसी न किसी बहाने दूसरे टीचर भी वहां आ जाते थे और उस का मजाक उड़ाते थे.

एक दिन सीमा का दिमाग गरम हो गया और वह बोल पड़ी, ‘‘क्यों एक कप चाय के लिए इतना मरे जा रहे हैं. अब तो मैं पहली तनख्वाह मिलने पर भी चाय नहीं पिलाऊंगी.’’

स्कूल के सारे टीचर और हैडमास्टर सीमा का यह जवाब सुन कर गुस्सा तो हुए, पर कोई भी कुछ नहीं बोला. लेकिन सीमा के इस करारे जवाब से उस के खिलाफ स्कूल में राजनीति शुरू हो गई.

एक दिन स्कूल में बड़े साहब आए. मदनजी फौरन नाश्ता ले कर आए. सीमा को भी बुलाया गया. उस ने एक समोसा खाया. बड़े साहब के स्कूल से जाते ही हैडमास्टरजी उस से 20 रुपए मांगने लगे.

‘‘एक समोसे के 20 रुपए?’’ सीमा ने हैरान हो कर पूछा.

‘‘मैडमजी, बड़े साहब के आने में गाड़ी का पैट्रोल नहीं लगा क्या,’’ राकेशजी बोले.

सीमा ने झट से 20 रुपए उन के मुंह पर फेंके और अपनी क्लास में लौट गई. उस के पीछेपीछे अजीत सर भी क्लास में पहुंच गए.’’

‘‘आप को पैसों की कोई दिक्कत है क्या?’’ ‘‘नहीं तो.’’

‘‘तो फिर 20 रुपए के लिए इतना गुस्सा क्यों?’’ ‘‘5 रुपए के समोसे के लिए 20 रुपए क्यों?’’

‘‘क्योंकि मदनजी, राकेशजी और प्रदीपजी पैसे नहीं देंगे. उन के पैसे आप से वसूले गए हैं. हैडमास्टरजी और बड़े साहब के पैसे मैं ने दिए हैं.’’ ‘‘यह तो नाइंसाफी हुई न.’’

‘‘यहां पर ऐसे ही चलता है. किसी भी सरकारी स्कूल में ऐसे ही होता है. सीनियर लोग जैसा कहते हैं, वैसा ही करना पड़ता है. आप अभी नई हैं.’’

एक हफ्ते बाद औफिस से ट्रेनिंग की चिट्ठी आई. सीमा जानती थी कि उसे ही भेजी जाएगी. दूसरे हफ्ते फिर से ट्रेनिंग की चिट्ठी आई. फिर से उसे ही भेजी गई. कभी कोई मीटिंग हो तो भी उसे जाना पड़ता था. क्लास में 20 छात्र थे, लेकिन तकरीबन 12 छात्र ही रोज आते थे.

सीमा ने बहुत बार उन के घर के चक्कर लगाए. लेकिन जब तक उन्हें बुलाने कोई घर नहीं जाता था, तब तक वे स्कूल में आते नहीं थे. हर दिन उन छात्रों को बुलाना पड़ता था.

एक दिन सीमा के पड़ोस में रहने वाले राजू का पुराना स्कूल बैग उस ने अपने स्कूल की एक छात्रा को दे दिया. वह लड़की स्कूल में बैठती ही नहीं थी. अपनी किताबों वाली थैली क्लास में रख कर वह भाग जाती थी. लेकिन पुराना ही सही स्कूल बैग मिलने के बाद वह स्कूल में रोजाना आने लगी. यह देख कर सीमा को भी अच्छा लगने लगा था.

अब इस स्कूल में सीमा को 3 साल हो चुके थे. राकेशजी, मदनजी, प्रदीपजी और हैडमास्टरजी रोजाना एक न एक टेढ़ी बात तो बोलते ही थे, पर अजीत सर अपने शांत और मजाकिया स्वभाव से उसे शांत कर देते थे. अजीत सर का उस के प्रति प्यार भरा रवैया बाकी स्टाफ को पसंद नहीं आता था.

एक दिन अजीत सर और वे बाकी शैतान औफिस में एकसाथ बैठे थे.

‘‘क्यों भई, क्या मैडमजी से शादी करने का इरादा है?’’ राकेशजी ने पूछा. ‘‘नहीं तो,’’ अजीत सर बोले.

‘‘करना भी मत. मैडमजी हमारी बिरादरी से नहीं हैं और फिर स्कूल में ही लव मैरिज के चक्कर में सस्पैंड हो जाओगे. टीचर लोगों को लव मैरिज करना अलाउड नहीं होता. पता है न भैया,’’ मदनजी बोले.

अजीत सर ने कुछ नहीं कहा, क्योंकि मन ही मन तो वे सीमा से ही शादी के ख्वाब देख रहे थे.

एक दिन बड़े साहब सीमा की क्लास में आए. क्लास में छात्र कम थे.

‘‘20 में से सिर्फ 15 ही छात्र…’’ उन्होंने पूछा. ‘‘जी… रोज तो आते हैं.’’

‘‘आज मैं आया हूं, इसलिए नहीं आए हैं क्या?’’ ‘‘जी…’’ जवाब में क्या कहा जाए, सीमा की समझ में नहीं आ रहा था.

‘‘उठो बेटे, तुम्हारा नाम क्या है?’’ बड़े साहब ने एक छात्र से पूछा. ‘‘जी, निखिल.’’

‘‘ब्लैक बोर्ड पर अपने किसी एक दोस्त का नाम लिखो.’’

निखिल ने अपने दोस्त का नाम पीयूष की जगह पिउष लिखा.

‘‘क्या पढ़ाती हैं मैडमजी आप बच्चों को. अच्छा, तुम उठो. तुम्हारा नाम क्या है?’’ ‘‘जी, स्नेहल.’’

‘‘सूर्योदय और सूर्यास्त किस दिशा में होता है?’’

‘‘सूर्योदय पूरब दिशा से होता है और सूर्यास्त…’’ स्नेहल ने जवाब नहीं दिया.

बड़े साहब सीमा पर चिल्लाने लगे, ‘‘नोटिस दूं क्या आप को? दूं आप को नोटिस?’’

सीमा नजरें झुका कर खड़ी हो गई. दूर खड़े हैडमास्टरजी मुसकरा रहे थे. बड़े साहब क्लास से निकल गए. सीमा अजीत सर की क्लास में गई.

‘‘मुझे पता है, हैडमास्टरजी जानबूझ कर बड़े साहब को मेरी क्लास में ले कर आए थे. बड़े साहब ने मुझे डांटा तो उन के कलेजे को ठंडक पहुंची होगी.’’

‘‘अगर आप एक कप चाय पिला देतीं तो…’’

‘‘मुझ से ज्यादा तनख्वाह तो ये लोग लेते हैं और सारे काम मुझ से ही कराते हैं. ये किसी और को ट्रेनिंग में क्यों नहीं भेजते, क्योंकि वे सब बड़े साहब को और उन के बीवीबच्चों को महंगेमहंगे तोहफे देते हैं.’’

‘‘अगर आप भी अपनी तरफ से कुछ गिफ्ट दे देतीं तो…’’

सीमा को पता था कि अजीत सर के पास उस का मन शांत नहीं होगा. वह फिर से अपनी क्लास में चली गई. शाम को घर में बरतनों का बहुत शोर हो रहा था.

बाबूजी ने आवाज दी, ‘‘सीमा, क्यों इतना शोर मचा रही हो?’’

‘‘बड़े साहब आए थे स्कूल में. कहते हैं कि नोटिस देंगे,’’ सीमा ने कहा.

‘‘तो देने दो न. सरकारी नौकरी में तो यह रोज की बात होती है,’’ बाबूजी बोले.

‘‘कह रहे थे कि पढ़ाती नहीं हो तो तनख्वाह क्यों लेती हो? मैं तो रोजाना पढ़ाती हूं, बच्चे पढ़ते नहीं तो क्या करूं? रोजाना आने वाले बच्चे भी आज घर रह गए. मैं क्या करूं?’’

‘‘मेरी प्यारी बेटी, इतना उदास मत हो. एक दिन सब अच्छा हो जाएगा,’’ बाबूजी ने भरोसा जताया.

लेकिन बच्चों ने बड़े साहब के सामने जवाब क्यों नहीं दिए? नोटिस दूंगा जैसे शब्द अब भी सीमा के कानों में चुभ रहे थे. साथी टीचरों की मुसकराती शक्लें नजरों से हट नहीं रही थीं.

जो होता है, अच्छे के लिए होता है, यह सोच कर सीमा ने नई शुरुआत की. शायद उस के पढ़ानेलिखाने में ही कुछ कमी है. यह सोच कर सीमा ने नए जोश से पढ़ाना शुरू किया, पर एक दिन उस के ट्रांसफर का और्डर आ गया.

सीमा का आज इस स्कूल में आखिरी दिन था. हैडमास्टरजी बताने लगे, ‘‘आप के ट्रांसफर में मेरा कोई हाथ नहीं है. मैं ने तो बड़े साहब को बताया था कि बच्ची है, जाने दीजिए. लेकिन उन्होंने मेरी नहीं सुनी.’’

‘‘500 रुपए दे देतीं, तो यह नौबत नहीं आती,’’ मदनजी बोले.

‘‘हमारा बड़ा साहब इतना सस्ता है, वह मुझे पता नहीं था,’’ सीमा ने कहा.

‘‘जाओ अब जंगल में. जानवरों के बीच रहना. रोजाना एक घंटा बस से जाना होगा. उस के आगे 5 किलोमीटर पैदल जाना होगा. रात को घर लौटते वक्त 8 बजेंगे. हमारी बेटी जैसी हो, इसलिए बता रहे हैं. दुनियादारी सीख लो. रिश्वत देना आम बात है,’’ प्रदीपजी बोले.

‘‘आप जैसे इनसानों के साथ रहने से बेहतर है कि मैं जानवरों के साथ रहूं. अगर आप पहले ही दिन मुझे अपनी बेटी मान लेते तो आज हालात ऐसे न होते प्रदीपजी.’’

दफ्तर के बाहर अजीत सर सीमा का इंतजार कर रहे थे.

‘‘कभी कोई परेशानी हो तो फोन जरूर कीजिएगा.’’

‘‘जी जरूर. इस स्कूल में सिर्फ आप ही मुझे याद करेंगे, ऐसा लगता है,’’ कह कर सीमा वहां से चली गई. Story in Hind

Romantic Story : नो बौल विद फ्री हिट : प्यार की सच्ची कहानी

Romantic Story. कोलकाता से इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी कर समीर ने कुछ  ही दिन पहले नौकरी जौइन की थी. वह वहां के गार्डन रीच वर्कशौप में ट्रेनिंग ले रहा था जो रक्षा मंत्रालय के अधीन भारत सरकार का एक उद्यम है. वहां जहाज निर्माण से ले कर उन के रखरखाव की भी सुविधा है.

कोलकाता के मटियाबुर्ज महल्ला में स्थित गार्डन रीच वर्कशौप देश का जहाज बनाने का प्रमुख कारखाना है. यह मुख्य शहर से दूर है. समीर झारखंड के धनबाद शहर का रहने वाला है, जिसे कोल कैपिटल औफ इंडिया भी कहा जाता है. यही उस की एक साल की ट्रेनिंग थी. कोलकाता में वह धर्मतल्ला में एक कमरे के फ्लैट में एक अन्य युवक के साथ शेयर कर के रहता था.

मटियाबुर्ज धर्मतल्ला से लगभग 13 किलोमीटर दूर है. इस का भी एक इतिहास है, अवध के नवाब वाजिद अली शाह ने अंगरेजों के चंगुल से भाग कर यहीं आ कर शरण ली थी. मटियाबुर्ज बहुत गंदा इलाका था और वहां मुख्यता: अनस्किल्ड लेबर ही रहते थे. ज्यादातर मजदूर बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश से आते हैं.

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समीर वर्कशौप जाने के लिए फ्लैट से थोड़ी दूर पैदल चल कर धर्मतल्ला बस स्टौप से सुबह 8 बजे की बस पकड़ता था. 9 बजे तक उसे औफिस पहुंचना होता था. उस के फ्लैट से कुछ दूरी पर स्थित एक फ्लैट से एक युवती भी रोज उसी बस को पकड़ती थी.

शुरू में तो समीर को उस में कोई दिलचस्पी नहीं थी, लेकिन लगातार एक ही स्टैंड से रोज बस पकड़ने, एक ही बस में आनेजाने से समीर का उस युवती के प्रति खासा आकर्षण हो गया था.

वैसे, दोनों में कभी कोई बातचीत नहीं हुई थी, पर कभीकभी नजरें चुरा कर समीर उसे देख लेता था. वह गेहुएं रंग के चेहरे वाली भोलीभाली युवती थी. कभीकभी भीड़ के कारण यदि उसे सीट नहीं मिलती तो वह उस युवती के बगल वाली लेडीज सीट पर जा बैठता था. तब वह युवती थोड़ा और सिमट कर खिड़की से बाहर देखने लगती थी. कभी वह उसे देखती तो समीर झट से अपनी आंखें दूसरी ओर फेर लेता.

समीर उस से बातचीत करना चाहता था पर खुद पहल न कर पाया. उस युवती ने भी उस से आगे बढ़ कर कभी हायहैलो तक न की.

एक दिन अचानक बसों की हड़ताल हो गई. सुबह तो समीर और उस युवती को बस मिल गई थी, पर लौटते वक्त बसें नहीं चल रही थीं. तो समीर अपने बौस की कार से घर आ रहा था. कंपनी की गाड़ी थी, ड्राइवर चला रहा था. कार में पीछे की सीट पर समीर अपने बौस और कंपनी के एक और अफसर के साथ बैठा था तभी समीर ने खिद्दीरपुर बस स्टौप पर उस युवती को देखा. पहले तो उसे संकोच हुआ पर उस ने साहस कर बौस से उस युवती को लिफ्ट देने की विनती की.

बौस ने हंसते हुए पूछा, ‘‘क्या बात है, कोई चक्कर चल रहा है क्या?’’

समीर बोला, ‘‘नो सर, मैं तो उस का नाम भी नहीं जानता. बस, काफी दिनों से हम दोनों एक ही बस पकड़ते हैं. आज तो उसे बस मिलने से रही और टैक्सी की भी डिमांड इतनी ज्यादा है कि वह भी उसे शायद न मिले.’’

ड्राइवर ने कार रोक कर हौर्न बजाया पर युवती ने उन की ओर देखा ही नहीं. तभी समीर ने खिड़की से बाहर सिर निकाल कर आवाज दी. ‘‘हैलो मैडम, आप ही को बोल रहा हूं. आज कोई बस नहीं मिलने वाली और टैक्सी की भी किल्लत है. हमारी कार में बैठ जाएं, बौस हमें धर्मतल्ला स्टौप पर ड्रौप कर देंगे.’’

पहले तो वह संकोच कर रही थी, पर बाद में समीर के कहने पर वह आ कर ड्राइवर की बगल वाली सीट पर थैंक्स कह कर बैठ गई. पिछली सीट पर तो 3 लोग पहले से ही बैठे थे.

धर्मतल्ला स्टौप पर उतर कर समीर और उस युवती ने बौस को थैंक्स कहा. समीर का भी थैंक्स करते हुए वह अपने घर की ओर चल दी. समीर सोच रहा था कि आज वह थैंक्स के अलावा और कुछ भी बात करेगी, पर ऐसा नहीं हुआ. समीर मन ही मन चिढ़ गया और उस ने भी आगे कुछ नहीं कहा. दोनों अपनेअपने घर की ओर चल दिए.

लेकिन अगले दिन बस स्टौप पर समीर ने उस युवती से गुडमौर्निंग कहा तो उस ने होंठों ही होंठों में कुछ कहा और मुसकरा कर सिर झुका कर बस का इंतजार करने लगी. इसी तरह कुछ दिनों तक समीर गुडमौर्निंग कहता और वह होंठ फड़फड़ा कर धीरे से गुडमौर्निंग का जवाब दे देती.

एक बार 2 दिनों से वह युवती बस स्टौप पर नहीं मिली तो समीर का मन बेताब हो गया. तीसरे दिन जब वह मिली तो समीर ने अपने पुराने अंदाज में गुडमौर्निंग कहा. युवती आज खुल कर मुसकराई और उस ने धीरे से गुडमौर्निंग कहा. बस आई और दोनों बस में चढ़े, लेकिन युवती से कोई बात नहीं हो पाई.

अगले दिन जब समीर को युवती की बगल वाली सीट पर बैठने का मौका मिला तो वह उस से पूछ बैठा, ‘‘आप की तबीयत तो ठीक है? आप इधर बीच में 2 दिन नहीं आई थीं.’’

‘‘ऐसे ही, घर में कुछ काम था,’’ युवती ने जवाब दिया.

समीर बोला, ‘‘अच्छा, अपना नाम तो बताएं. मेरा नाम समीर है.’’

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फिर दोनों हंस पड़े. दरअसल, समीर की शर्ट की जेब पर उस का आईडी कार्ड टंगा था, जिसे युवती ने पहले ही देख लिया था. अगले दिन बस स्टौप पर समीर ने फिर उस का नाम पूछा तो वह बोली, ‘‘समझ लें, जिस का कोई नाम नहीं होता उसे क्या कहते हैं…’’

‘‘उसे तो अनामिका कहते हैं,’’ समीर बोला. इस बीच कोई लेडी पैसेंजर आ गई और समीर को सीट छोड़नी पड़ी. उस ने खड़ा होते हुए कहा, ‘‘तब तो तुम्हारा नाम अनामिका होना चाहिए.’’

अब दोनों में थोड़ीबहुत बातचीत होने लगी थी और कुछ मेलजोल भी बढ़ गया था. कुछ हफ्ते बाद एक दिन औफिस से समीर को जल्दी छुट्टी मिली तो वह बस से लौट रहा था कि रास्ते से अनामिका भी उसी बस में चढ़ी. दोपहर में बस में उतनी भीड़ नहीं थी तो वह भी समीर के बगल वाली सीट पर बैठ गई और पूछा, ‘‘आज का दिन वर्कशौप में कैसा रहा? इस समय तो कभी तुम्हें लौटते देखा नहीं है.’’

समीर बोला, ‘‘आज तो बौस ने मुझे सरप्राइज दिया है. उन्होंने कहा कि बाकी 2 महीने की ट्रेनिंग रांची के मैरिन इंजन प्लांट में लेनी है. कंपनी की एक फैक्टरी वहां भी है और टे्रनिंग के बाद मेरी पोस्टिंग भी उसी फैक्टरी में होगी. 3-4 दिनों में जाना होगा.’’

अनामिका बोली, ‘‘चलो, अच्छी बात है. तुम्हारी ट्रेनिंग पूरी होने जा रही है. यहां मेरे औफिस में भी मेरे ट्रांसफर की बात चल रही है.’’

अगले दिन समीर को वर्कशौप नहीं जाना था, फिर भी वह रोज की तरह बस स्टौप पर अनामिका से मिलने पहुंच गया. पर आज वह नहीं आई थी. दूसरे दिन वह समीर को उसी स्टौप पर मिली तो उस ने पूछा, ‘‘क्या बात है, मैं कल भी यहां आया था पर तुम नहीं मिलीं?’’

अनामिका बोली, ‘‘कल लड़के वाले मुझे देखने आए थे, इसलिए औफिस नहीं जा सकी थी.’’

समीर ने निराश होते हुए बस ‘ओह’ कहा और चुप हो गया.

अनामिका ने पूछा, ‘‘क्या हुआ?’’

समीर के ‘कुछ नहीं’ कहते ही बस आ गई और अनामिका चढ़ते हुए बोली, ‘‘शाम को 4 बजे वाली बस से लौटूंगी.’’

हालांकि अनामिका ने उसे शाम को स्टौप पर मिलने को नहीं कहा था, पर समीर वहां मौजूद था. शायद अनामिका की भी यही इच्छा रही होगी. उस के बस से उतरते ही समीर बोला, ‘‘चलो, आज बगल वाले कौफी हाउस में बैठ कर कौफी पीते हैं.’’

अनामिका सहर्ष तैयार हो गई. दोनों ने साथ बैठ कर कौफी पी. वहां समीर ने पूछा, ‘‘कल तुम्हें लड़के वाले देखने आए थे न? तो मेरा विकेट तो डाउन हो गया न. मैं क्लीन बोल्ड हो गया.’’

अनामिका बोली, ‘‘नहीं. वह नो बौल थी. तुम आउट होने से बच गए.’’

‘‘क्या मतलब?’’ कहते हुए समीर के चेहरे पर खुशी की लहर दौड़ गई.

‘‘उन्होंने मुझे रिजैक्ट कर दिया,’’ अनामिका बोली.

‘‘पर ऐसा क्यों किया. जो भी हो, मेरे लिए तो अच्छा ही है. मुझे नो बौल पर एक और चांस तो मिला.’’

अनामिका बोली, ‘‘एक और चांस नहीं, फ्री हिट का मौका भी मिला है.’’

‘‘क्या मतलब?’’ समीर ने पूछा तो वह बैग से एक लिफाफा निकाल कर समीर की ओर बढ़ाती हुई बोली,

‘‘यह देखो, आज मुझे भी ट्रांसफर और्डर मिला है. मेरी पोस्टिंग भी रांची में हुई है, हुआ न नो बौल विद फ्री हिट.’’ और दोनों हंसते हुए कौफी हाउस से निकल पड़े. Romantic Story

Humour : एक शाम थाने के नाम

Humour. एक लंबी सांस लेने के बाद प्रभु दयाल अपने घर की ओर जा रहा था कि उस ने देखा कि लालबत्ती के पास कुछ लोग जमा हो रहे हैं.

माजरा क्या है, यह जानने के लिए जब वह उन लोगों के पास पहुंचा तो पता चला कि जेब काटने के दौरान मिले माल के बंटवारे को ले कर 2 जेबकतरे आपस में झगड़ रहे थे.

तभी गश्त पर निकले 2 पुलिस वाले मोटरसाइकिल पर वहां आ धमके. होशियार लोग तो वहां से खिसक गए, लेकिन प्रभु दयाल पुलिस वालों के हत्थे चढ़ गया.

एक पुलिस वाला प्रभु दयाल की कलाई जोर से पकड़ कर बोला, ‘‘चल, थाने चल. चौकचौराहे पर झगड़ाफसाद करता है, दंगा करता है…’’

घबराया हुआ प्रभु दयाल घिघियाते हुए बोला, ‘‘अरे भाई साहब, मैं शरीफ आदमी हूं. मैं ने कुछ नहीं किया है. मुझे क्यों पकड़ रहे हैं? दंगा करने वाले बदमाश तो भाग गए.’’

दूसरा पुलिस वाला थोड़ा अकड़ कर बोला, ‘‘थाने चल, वहीं तुझे सब बताएंगे.’’

चौकचौराहे पर पुलिस के डंडे खाने के बजाय प्रभु दयाल ने थाने चलने में ही भलाई समझी.

थाने में प्रभु दयाल को जिस सबइंस्पैक्टर के सामने पेश किया गया, वह पहले से ही थाने लाए गए कुछ लोगों से निबटने में लगा था.

सबइंस्पैक्टर एक नौजवान को डांट रहा था, ‘‘देखो, तुम ने सरकारी जमीन को घेर कर रेहड़ी लगा रखी है. तुम्हारी अच्छी आमदनी होती है, तो फिर बीट कांस्टेबल से झगड़ा क्यों करते हो?

‘‘आपसी तालमेल से सब ठीकठाक चलता रहेगा. बीट कांस्टेबल जो कहता है मान लो, अकेले सब हजम करना तो ठीक नहीं है.’’

वह नौजवान घिघियाता हुआ बोला, ‘‘साहबजी, कोई नौकरी न मिलने पर ही यह काम शुरू किया था.

‘‘देखने से ही ऐसा लगता है कि हमें खूब कमाई हो रही है, पर हकीकत में ऐसा नहीं है. पुलिस वाले हर महीने पैसे बढ़ा कर लेना चाहते हैं. बताइए, उन को हम कैसे खुश रखें? आप मालिक हैं, हमें इंसाफ दीजिए.’’

सबइंस्पैक्टर पानी के साथ दवा की गोली गटकते हुए बोला, ‘‘हम फुजूल में किसी को तंग नहीं करना चाहते. तुम थोड़े कहे को ही ज्यादा समझो. बीट अफसर को खुश रखो. अब भाग लो यहां से. आगे से कोई शिकायत नहीं आनी चाहिए. पानी में रह कर मगर से बैर न पालो.’’

अब अगला नंबर एक एसटीडी बूथ चलाने वाले का था. सबइंस्पैक्टर उस आदमी से बोला, ‘‘लालाजी, तय रेट से ज्यादा पैसा वसूल रहे हो. बहुत बड़ा जुर्म है यह. जेल में चक्की पीसनी पड़ेगी. तुम्हारे खिलाफ जो शिकायतें आई हैं, उन का निबटारा कर लो, नहीं तो तुम्हारे साथ बुरा हो सकता है. समझ गए न?’’

अब अगला नंबर प्रभु दयाल का था. सबइंस्पैक्टर प्रभु दयाल को घूरते हुए बोला, ‘‘आंखों पर चश्मा, जेब में पैन. तुम तो काफी पढ़ेलिखे लगते हो, फिर भी चौकचौराहे पर दंगा क्यों कर रहे थे? सबकुछ खुद ही बता दो. मेरा गुस्सा बहुत बुरा है. तुम मुझे गुस्सा मत दिलाना, नहीं तो बड़ी मार खाओगे.’’

प्रभु दयाल बोला, ‘‘गुस्सा आप की सेहत के लिए अच्छा नहीं है साहब. हाई ब्लड प्रैशर के मरीज को तो गुस्से से हमेशा दूर ही रहना चाहिए.’’

सबइंस्पैक्टर हैरान हो कर बोला, ‘‘तुम्हें कैसे पता है कि मैं हाई ब्लड प्रैशर का मरीज हूं? यह तो कमाल है.’’

प्रभु दयाल बोला, ‘‘साहबजी, यह तो छोटी सी बात है. मुझे तो यह भी मालूम है कि कुछ देर पहले आप कोर्ट में पेश होने वाले बदमाशों की फाइल की लिखापढ़ी में लगे थे. मैं ठीक कह रहा हूं न?’’

सबइंस्पैक्टर को लगा जैसे उस के सामने एक ऐसा आदमी खड़ा है, जो दीवारों के आरपार देख सकता है.

लोहा गरम देख प्रभु दयाल ने एक और चोट की, ‘‘साहबजी, मुझे तो यह भी पता?है कि आज आप ने चावल और रोटी के साथ कौन सी सब्जी खाई है. आज आप ने लंच में कद्दू की सब्जी खाई है. ठीक कहा न?’’

सबइंस्पैक्टर को ऐसा लग रहा था, जैसे उस की कुरसी के नीचे से जमीन खिसक रही है. ऐसे सच्चे भविष्य बताने वाले से तो उस का जिंदगी में कभी सामना ही नहीं हुआ था.

सबइंस्पैक्टर प्रभु दयाल के सामने हाथ जोड़ कर खड़ा हो गया और बोला, ‘‘आप तो सबकुछ जानते हैं. मैं और मेरे बीवीबच्चों के बारे में भी कुछ बताइए. मैं खुशकिस्मत हूं कि आप जैसे बड़े लोगों के दर्शन हो गए.

‘‘यहां पास ही में मेरा फ्लैट है. क्या आप मेरे घर चल कर कुछ चायनाश्ता करेंगे? इसी बहाने ही सही, आप के साथ मिलनेबैठने का मौका मिल जाएगा.’’

प्रभु दयाल बोला, ‘‘फिर किसी दिन सही. आज बस इतना ही.’’

सबइंस्पैक्टर जैसे ही प्रभु दयाल के पैर छूने को आगे बढ़ा, प्रभु दयाल दूर हटते हुए बोला, ‘‘अजी साहब, ऐसा गजब मत कीजिए. अभी तो मैं अपने घर लौटना चाहूंगा, फिर किसी दिन फुरसत से आऊंगा.’’

सबइंस्पैक्टर गरजा, ‘‘मुबारक सिंह, भाई साहब को थाने की जीप में घर छोड़ कर आओ.

‘‘और हां, रास्ते में भोलू हलवाई की दुकान से साहब के बच्चों के लिए 5 किलो देशी घी के गुलाब जामुन दिलवा देना.’’

उधर महल्ले वाले प्रभु दयाल को थाने की जीप से उतरते व पुलिस द्वारा अदब से सलाम मारते देख हैरान थे. कुछ नौजवान भी वहां खड़े थे. उन में से एक ने कान में फुसफुसा कर कहा, ‘‘हमें तो पहले से ही शक था कि अपने में मस्त रहने वाला हमारा यह पड़ोसी प्रभु दयाल बड़ी ऊंची चीज है. थाने की जीप में आया है.’’

इधर, सारी बातें जानने के बाद प्रभु दयाल की बीवी हैरान हो कर पूछ रही थी, ‘‘शेर के मुंह में जाने के बाद भी आप सहीसलामत वापस कैसे आ गए? और साथ में देशी घी के गुलाब जामुन भी ले आए. कैसे हुआ यह चमत्कार? आप को तो ज्योतिष के बारे में कुछ भी नहीं आता, फिर वहां आप भविष्य बताने वाले कैसे बन गए?’’

प्रभु दयाल थोड़ा मुसकरा कर बोला, ‘‘अगर ज्योतिष के द्वारा कुछ बताया जा सकता, तो वाजपेयीजी समय से पहले चुनाव करा कर गद्दी नहीं खोते. ओसामा बिन लादेन कहां छिपा है, यह कब का पता लग गया होता. ज्योतिष के नाम पर जो बातें मैं ने सबइंस्पैक्टर को बताई थीं, वे तो कोई भी बता सकता था…’’

प्रभु दयाल ने राज खोला, ‘‘मैं ने देखा था कि पानी मंगा कर सबइंस्पैक्टर ने एनवास-10 की गोली गटकी थी. इस का मतलब यही था कि वह हाई ब्लड प्रैशर का मरीज है.

‘‘लिखते हुए शायद रिफिल लीक कर गई थी, जिस से उस की उंगली में स्याही लगी थी. इस से साफ जाहिर था कि उस ने थोड़ी देर पहले लिखाई का काम किया है.

‘‘उस की मूंछों में कद्दू की सब्जी का एक छोटा टुकड़ा फंसा हुआ था यानी दोपहर को उस ने कद्दू की सब्जी खाई थी.

‘‘मैं बेकुसूर था और बेमतलब ही फंसाया जा रहा था, सो बचने के लिए ही सबइंस्पैक्टर के सामने मैं ने कुछ बातें हवा में उछाल दी थीं. मेरे बुरे समय पर हाजिरजवाब होने की नीति काम कर गई थी.

‘‘मैं ने उन से एक बार भी नहीं कहा कि मैं कोई पहुंचा हुआ पीरपंडित या भविष्य बताने वाला हूं. अब वह अपनी समझ से खुद ही यह मानने लगा था कि मैं कोई बहुत बड़ा ज्योतिषी हूं, तो उस हालत में मैं क्या कर सकता था? अंधविश्वासी लोग अकसर अपने जाल में खुद ही फंस जाते हैं.’’

प्रभु दयाल की बीवी बोली, ‘‘आप ने तो कहीं भी कोई गलतबयानी नहीं की. दूसरों की मेहनत की कमाई और हक पर हिस्सापत्ती चाहने वाले ऐसे लोगों को तो सेर का कोई सवा सेर मिलते ही रहना चाहिए.’’

फिर पत्नी अपने बड़े बेटे को बुला कर बोली, ‘‘बेटा, गुलाब जामुन की यह हांड़ी गरीबों में दे आ. कहीं इस धौंसपट्टी की कमाई को खाने से हमारे बच्चों पर भी बुरा असर न पड़ जाए.’’ Humour

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