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Story in Hindi : सतरंगी आसमान

Story in Hindi. 22  साल की नैना पहली बार अकेले नेपाल घूमने आई थी. उसे किसी धार्मिक जगह या भीड़भाड़ वाले पर्यटन स्थल में कोई खास दिलचस्पी नहीं थी. वह पहाड़, जंगल, झीलें और खुली हवा देखना चाहती थी.

काठमांडू पहुंचने पर एक होटल के रिसैप्शन पर नैना की मुलाकात आकाश से हुई. आकाश स्थानीय नौजवान था और पर्यटकों को आसपास की जगहें दिखाने का काम करता था.

आकाश इस होटल के मैनेजमैंट से जुड़ा हुआ था. जो भी टूरिस्ट होटल में रुकने के लिए आते तो आकाश ही उन का गाइड बन जाता.

आकाश की उम्र यही कोई 25 साल के आसपास होगी. छोटीछोटी आंखों वाले आकाश के चेहरे पर जमानेभर का भोलापन था. वह थोड़ा जल्दीजल्दी बोलता था और उस की बोली में नेपाली भाषा का असर भी साफ झलकता था. इसी भोलेपन के कारण वह सहज ही पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित कर लेता था.

‘‘मैडम, अगर आप को सच में नेपाल देखना है तो सिर्फ शहर मत देखिए, पहाड़ों और जंगलों की तरफ चलिए,’’ आकाश ने कहा तो नैना ने पूछा, ‘‘और अगर मैं रास्ते में पहाड़ों में खो जाऊंगी तो?’’

आकाश हंस पड़ा और उस ने कहा कि वह हर हाल में नैना को ढूंढ़ ही लेगा.

नैना को आकाश का यह जवाब अच्छा लगा.

उ स दिन नैना ने आराम करना ही उचित समझा. वह होटल के कमरे में गई. अपना सामान एक ओर रख दिया और गरम पानी से शावर लिया और फिर एक कौफी मंगवा कर पी. उस ने कुछ भी खाने के लिए और्डर नहीं किया, बल्कि वह अपने साथ वर्मा बेकरी के बिसकुट ले कर आई थी. कौफी के साथ उस ने सिर्फ वे बिसकुट ही खाए.

उस रात नैना जल्दी ही सो गई और जब अगली सुबह उठी तो वह एकदम फ्रैश थी और उस की आंखें नेपाल की  खूबसूरती देखने के लिए उतावली हो रही थीं.

नैना नीचे रिसैप्शन पर पहुची तो उस ने देखा कि आकाश पहले से ही वहां उस का इंतजार कर रहा था. उसे देख कर आकाश ने मुसकराते हुए नैना को जोरदार ढंग से ‘गुड मौर्निंग’ कहा और  दोनों गाड़ी में बैठ कर घूमने निकल पड़े.

गाड़ी आगे बढ़ी तो नैना बाहर की ओर देखने लगी. कितनी खूबसूरती फैली थी चारों ओर. नैना की आंखें खूबसूरती को आंखों में बसाने में लगी हुई थीं.

गाड़ी चलते हुए लगभग आधा घंटा बीत चुका था और नैना अपने कैमरे से लगातार तसवीरें उतारे जा रही थी. काठमांडू  शहर से उत्तर की तरफ जाने पर शिवापुरी इलाका था. यहां  चारों ओर कुदरती खूबसूरती फैली हुई थी. झोल नाम का एक झरना भी बह रहा था वहां. नैना उसे अपलक निहारने लगी थी.

नैना बुदबुदा उठी थी कि किसी ने कितना सही कहा है कि गिरो तो झरने की तरह गिरो जिस मे असीम सुंदरता समाहित हो… झरने पर नजर गड़ाए हुए ही नैना गाड़ी से उतरी और झोल वाटरफाल की तसवीरें लेने लगी.

आकाश ने भी झरने के आगे नैना के साथ सैल्फी ली और तसवीरें लेने के बाद वे लोग आगे बढ़ गए. फिर एक छोटी झील के किनारे काफी देर बैठे रहे. झोल का पानी बिलकुल शांत था और सामने के पहाड़ बादलों में आधे छिपे हुए थे.

नैना ने कहा, ‘‘यह जगह तो तसवीरों में देखी गई जगह से ज्यादा खूबसूरत है.’’

आकाश ने तुरंत जवाब दिया, ‘‘तसवीरें सच नहीं बोलती हैं, क्योंकि तसवीरों में हवा नहीं होती.’’

नैना हंस पड़ी. उस दिन के बाद वे दोनों लगभग हर दिन साथ घूमने लगे. कभी पहाड़ी रास्तों पर पैदल चलते, कभी छोटी सी चाय की दुकान पर बैठ जाते, तो कभी किसी ऊंचे स्थान से नीचे फैली घाटी देखते.

आकाश ने नैना से पूछा कि उस के चले जाने के बाद भी वह अपने चारों ओर एक अजीब सी खुशबू महसूस करता रहा है, तो इस बात पर नैना ने मजाक में कहा कि यह तो उस की पर्सनालिटी की खुशबू है. असल में नैना मस्क का परफ्यूम का प्रयोग करती थी जिस की खुशबू काफी देर तक बनी रहती है.

नैना को आकाश हर जगह से जुड़ी हुई कोई न कोई कहानी जरूर बताता. कई बार तो नैना को लगता कि आकाश उसे खुश करने के लिए  सिर्फ मनगढ़ंत कहानी सुना रहा है पर आकाश तो अपनी बताई गई हर बात को सच बताता और उस की सच्चाई साबित करने पर आमादा भी रहता.

धीरेधीरे नैना को महसूस होने लगा कि नेपाल की जगहों की खूबसूरती आकाश के शब्दों के बयान से और भी ज्यादा सुंदर हो जाती है.

नैना ‘भुवन सुंदरी’ नाम के होटल में रुकी हुई थी और इस होटल के एक किलोमीटर आगे चलने पर छोटा सा भोजनालय था, जिसे दिलीप और उस की पत्नी सरिता चलाते थे.

एक शाम वहां जोरजोर से झगड़ा हो रहा था. दिलीप अपनी पत्नी सरिता से लड़ रहा था. दोनों में झगड़ा पैसों को ले कर था.

दिलीप अपनी पत्नी से कह रहा था कि वह ग्राहकों से खाने के कम पैसे लेती है, जबकि सरिता का कहना था कि जब हर चीज का दाम फिक्स है तो कम पैसे लेने का मतलब ही नहीं है.

नैना थोड़ी देर ये सब देखती रही फिर चुपचाप वहां से हट गई. बाद में उस ने आकाश से पूछा कि क्या इन के बीच हमेशा ऐसा ही रहता है?

आकाश ने नैना को बताया कि असल में दिलीप को जुआ खेलने की लत है और वह शहर के कसीनो में रोज जा कर जुआ खेलता है और फिर अपनी पत्नी से नजर बचा कर खुद के होटल में ही चोरी करता है और बड़ी चतुराई से इलजाम अपनी पत्नी पर मढ़ देता है.

पैसा बहुत से रिश्ते बनवा भी देता है और बहुत जल्दी भरोसा तोड़ भी देता है. आकाश के द्वारा कही गई यह बात नैना के मन में रह गई थी.

नैना ने बातोंबातों में आकाश के परिवार के बारे में उस से पूछा तो आकाश ने उसे बताया था कि भरापूरा परिवार है उस का. मांबाप के अलावा उस की 2 छोटी बहनें भी हैं जो अभी कुंआरी हैं और उन के लिए आकाश लड़का ढूंढ़ रहा है. बस थोड़े पैसे और जमा हो जाएं फिर वह बारीबारी दोनों बहनों की शादी कर देगा.

कितनी जिम्मेदारी निभा रहा है आकाश और अपने परिवार के प्रति कितना सच्चा और ईमानदार है… नैना की नजर में आकाश का कद और बढ़ गया था.

अगले दिन आकाश नैना को नागरकोट नाम की ऊंची पहाड़ी पर ले गया जहां से सूर्यास्त और सूर्योदय का दृश्य बहुत लुभावना लगता था.

आकाश ने नैना को बताया कि सभी टूरिस्ट को यह जगह बहुत पसंद आती है. नैना ने उस से पूछा कि क्या एक बार जो पर्यटक उस के पास आते हैं, वे दोबारा भी उसी के पास आते हैं?

तो बदले में आकाश के स्वर में थोड़ी निराशा झलक आई थी. उस ने बताया कि बहुत सारे लोग बड़े वादे कर के तो जाते हैं कि हम तुम से मिलने जरूर आएंगे, पर ज्यादातर लोग वापस नहीं आते. आते भी हैं तो किसी और होटल में किसी और गाइड के साथ.

दुनिया बहुत बड़ी है मैडम, तरहतरह के लोग हैं बिलकुल इंद्रधनुष के रंगों की तरह… सामने निकले हुए इंद्रधनुष को देखते हुए आकाश ने कहा.

‘‘पर मैं वापस जरूर आऊंगी,’’  नैना ने आकाश की छोटी और मासूम आंखों में झांकते हुए कहा.

इस बीच शाम हो रही थी. नीचे पूरा इलाका धुंध में डूब रहा था और आसमान धीरेधीरे नारंगी हो रहा था. दोनों वापस आने के लिए नीचे उतरने लगे थे.

रात को बारबार बिजली कड़कती रही. नैना को खयाल आया कि पहाड़ों पर बारिश को अच्छा नहीं माना जाता. कहावत है कि पहाड़ का पानी और पहाड़ की जवानी कभी पहाड़ के काम नहीं आती. नैना ने खिड़की से ?ांका तो उसे अहसास हुआ कि बादल छाए हुए हैं, बारिश हो सकती है.

पर अगली सुबह आकाश जल्दी आ गया था और नैना और वह पैदल ही घूमने निकले थे. अभी वे रोड के किनारे की टपरी पर चाय पी रहे थे कि मौसम अचानक कुछ ज्यादा ही बिगड़ गया. आसमान घनघोर काला हो गया, पहाड़ों से तेज आवाजें आने लगीं.

पहले लोगों को लगा कि कहीं भूस्खलन हुआ है पर असल में बादल फटने के कारण एक ही जगह ढेर सा पानी आ गया था और अब वह पानी लगातार आगे बढ़ता जा रहा था.

फिर पानी और मलबे का तेज बहाव सड़क की तरफ आया. इसी समय तेज आंधी भी चलने लगी थी. लोगों में भगदड़ मच गई.

पानी का बहाव अपने साथ मिट्टी के मलबे को ले कर आ रहा था और रास्ते में पड़ने वाली हर चीज को अपने साथ बहा ले जाने पर आमादा था.

आकाश ने नैना का हाथ पकड़ा और दोनों बेतहाशा भागने लगे. नैना को ज्यादा कुछ समझ नहीं आ रहा था, पर फिलहाल तो जान बचाने के लिए किसी महफूज जगह पर पहुचना था, इसलिए दोनों के हाथ एकदूसरे के हाथों को जकड़े हुए थे. वे दोनों लगातार भाग रहे थे लेकिन कुछ ही पल में उन के बीच लोगों की भीड़ और मलबा आ गया.

आकाश एक तरफ फंस गया. फिर पानी और मलबे की एक लहर दोनों के बीच आ गई और दोनों एकदूसरे से अलग हो गए.

आकाश ने चीख कर नैना को ऊपर की तरफ जाने को कहा था जहां वह महफूज रह सकती थी और नैना उसी दिशा में बेतहाशा बढ़ती चली गई.

नैना महफूज जगह पहुंच गई थी. वह चारों ओर के भयानक मंजर को देख कर बुरी तरह डर गई थी.

आकाश कहीं दिखाई नहीं दे रहा था. बाढ़ का पानी और मलबे का बहाव कुछ घंटों के बाद शांत हुआ पर इतनी देर में काफीकुछ तबाह हो चुका था. जानवर, इनसान और दुकानें बह गई थीं और बहुत सारे लोगों के घर तक ढह गए थे.

घटना के बाद से ही नेपाल की सरकार हरकत में आ गई और राहत शिविर लगाए जाने लगे. लोगों के लिए खानेपीने का सामान पहुंचाया जाने लगा. बिछड़े लोगों को उन के परिवार से मिलाए जाने की कवायद तेजी से चल रही थी.

नैना के पास उस का मोबाइल भी तो नहीं था जो वह आकाश को ढूंढ़ती, इसलिए उस ने चारों ओर जाजा कर कर आकाश को ढूंढ़ना शुरू किया. वह ऐसा क्यों कर रही थी? वह एक गाइड के लिए क्यों इतना परेशान हो रही थी? खुद उसे भी पता नहीं था.

नैना ने एक राहत शिविर में पता किया पर उस के पास आकाश की कोई तसवीर नहीं होने के कारण कुछ पता नहीं चल पाया था. घायलों की लिस्ट में आकाश का नाम नहीं था.

उस गार्ड ने यह जरूर बताया कि नीचे एक हाइड्रोपावर प्लांट है जिस के अंदर बहुत सारे लोग फंस गए हैं और जिन के बच पाने की उम्मीद बिलकुल भी नहीं है.

नैना का दिल यह सुन कर बैठ गया था पर वह क्या कर सकती थी… नैना नीचे की जगह चल कर पहुंच गई जहां पर लोग फंसे हुए थे, पर पुलिस ने नैना को और आगे नहीं जाने दिया.

नैना की आंखों में आंसू आ गए, पर वह इस समय लाचार थी और बहुत ही अकेलापन महसूस कर रही थी. उस का दिल तो बारबार कह रहा था कि आकाश जिंदा है, पर वह कहां और किस हाल में होगा, यह पता नहीं चल पा रहा था.

नैना बहुत थकी हुई थी. वह अंदर से पूरी तरह से टूट चुकी थी और उसे कमजोरी भी महसूस हो रही थी. वह राहत शिविर में वापस आ गई और अपने भारतीय पर्यटक होने का पूरा ब्योरा नोट कराया.

2 दिन तक नैना को उसी राहत शिविर में रहना पड़ा था, उस के बाद नेपाल सरकार की तरफ से सभी पर्यटकों को वापस उन के देश में भेजने का इंतजाम कर दिया था.

एयरपोर्ट पर भी नैना की आंखें लगातार आकाश को ही ढूंढ़ रही थीं, पर आकाश न जाने कहां खो गया था.

नैना भारत अपने शहर लखनऊ लौट तो आई थी, पर रात को उसे नेपाल का वह दुखद और भयावह मंजर बारबार याद आता था तो उस के रोंगटे खड़े हो जाते थे.

नैना कई दिनों तक सामान्य जीवन नहीं जी पा रही थी और इस सदमे से नजात पाने के लिए उस ने फेसबुक पर एक पेज बनाया, जिस का नाम रखा ‘नेपाल-उम्मीद की एक डोर’.

इस पेज पर लोग अपने खो गए रिश्तेदारों, दोस्तों और परिवार के लोगों के फोटोग्राफ, उन के मोबाइल नंबर और आखिरी बार उन को कहां देखा गया था, यह सब जानकारी अपलोड कर सकते थे.

नेहा को यह भी लग रहा था कि शायद इसी बहाने उसे आकाश मिल जाए, पर अभी तक तो आकाश का कोई अतापता नहीं था.

कहते हैं कि समय से बड़ा कोई मरहम नहीं होता है और वक्त बड़ेबड़े घाव भी भर देता है. धीरेधीरे नैना भी अपने मांबाप और अपने कामकाज में बिजी हो गई पर ऐसा एक पल भी नहीं था जब वह आकाश को एकदम से भूल पाई हो.

नैना के मांबाप चाहते थे कि वे अपनी एकलौती बेटी की शादी कर दें, पर नैना शादी के लिए हामी ही नहीं भर रही थी.

नैना का साफ कहना था कि जब उसे लगेगा कि उसे शादी की जरूरत है तब वह उन लोगों को बता देगी.

समय बीता पर नैना के मन के अंदर अभी भी बेचैनी सी थी. न जाने आकाश का क्या हुआ होगा? उस की बहनें और उस का परिवार किस हाल में होगा? ये खयाल आते थे नैना के दिमाग में, इसलिए पूरे एक साल बाद नैना ने एक बार फिर से नेपाल जाने का प्लान बनाया और वह काठमांडू के उसी ‘भुवन सुंदरी’ नाम के होटल में पहुंच गई.

नेहा ने रिसैप्शन पर जा कर अपने लिए एक कमरा बुक कर लिया और यह भी बताया कि वह जंगल, नदीझरने तो देखना चाहती ही है पर साथ ही साथ वह उस इलाके में भी जाना चाहेगी जहां पर पिछले साल बादल फटने के कारण तबाही आ गई थी.

मैनेजर ने नैना की बात सुन कर उसे बताया कि कल सुबह वह नैना को इन सब जगह घुमाने के लिए एक गाइड का इंतजाम कर देगा.

अगली सुबह नैना ने ब्लू कलर की जींस पर आसमानी रंग का टौप पहना और अपने बाल खुले रहने दिए. वह अपना फेवरेट मस्क डियो लगाना नहीं भूली थी.

‘‘आप के लिए गाइड और गाड़ी तैयार है मैडम,’’ मैनेजर ने बताया और किनारे खड़े आदमी की तरफ इशारा किया.

नैना ने उस आदमी पर नजरें डालीं तो खुशी से चौंक गई. यह तो आकाश था. आकाश जिंदा था.

‘‘अरे, तुम ने मुझे फोन भी नहीं किया. अपने ठीक होने का मैसेज तो दे सकते थे. ऐसा क्यों किया तुम ने आकाश? मैं कितना परेशान थी तुम्हारे लिए,’’ एक ही सांस में न जाने क्याक्या कह जाना चाहती थी नैना.

आकाश, जो अब तक कुरसी पर बैठा हुआ था. वह अपनी कुरसी से धीरे से खड़ा हुआ. उस के एक हाथ में बैसाखी थी.

नैना की सवालिया नजरें आकाश के पैरों की तरफ गईं. आकाश ने फीकी मुसकराहट के साथ उसे बताया कि एक पैर तो पिछले साल के हादसे में ही चला गया था, पर नैना को घबराने की जरूरत नहीं है, वह अब भी उसे पूरी शिद्दत से वे सारी जगहें घुमा देगा जो पिछले साल उस ने दिखाई थीं.

नैना थोड़ी देर तो खामोश रही. उसे आकाश को इस हाल में देख कर कुछ अच्छा नहीं लगा था. नैना ने एक लंबी सांस छोड़ी और फिर आकाश से उस ने सब से पहले नागरकोट वाली पहाड़ी पर ले चलने को कहा. वह आज फिर से वही खूबसूरत नजारा देखना चाहती थी.

कुछ देर की ड्राइविंग के बाद आकाश और नैना नागरकोट की पहाड़ी पर बैठे हुए थे. नैना उसे अपने पिछले साल की सारी बातें बता रही थी, जिस में उस ने यह भी बताया कि उस ने अभी तक उस ने शादी नहीं की है.

आकाश ने भी बताया कि फिलहाल उस की जिंदगी में भी कुछ नहीं बदला है, उलटा हालात बदतर ही हुए हैं. उस का घर बाढ़ से टूट गया था और उस की दोनों बहनें अब भी कुंआरी हैं, पर उस ने उम्मीद नहीं छोड़ी है. वह अभी एक टांग से ही बहुतकुछ कर पाने में समर्थ है. आकाश की बातें सुन कर नैना मुसकरा दी.

‘‘आप वापस आईं, मुझे बहुत अच्छा लगा. आप के पास से आज भी वही पुरानी खुशबू आ रही है,’’ आकाश ने कहा तो नैना ने मुसकराते हुए कहा, ‘‘जिन से एक रिश्ता बन जाता है उन के पास तो वापस आना ही पड़ता है.’’

आकाश ने अपनी नजरें नैना के चेहरे पर गड़ा दीं और पूछा, ‘‘भला एक गाइड और एक टूरिस्ट के बीच कौन सा रिश्ता हो सकता है?’’

नैना थोड़ी देर कुछ न बोल सकी, फिर उस ने कहा, ‘‘अरे दोस्ती का आकाश, मैं तुम्हें कभी नहीं भूलूंगी. हम दोनों जीवनभर अच्छे दोस्त बन कर रहेंगे. फोन पर एकदूसरे का हालचाल लेते रहेंगे और सोशल मीडिया पर भी एकदूसरे से जुड़े रहेंगे.’’

‘‘बिलकुल मैडम, आप अपनी शादी में मुझे जरूर बुलाना. अपनी एक टांग पर खूब नाचूंगा मैं,’’ आकाश ने भोलेपन से कहा तो प्यार से नैना ने उस का हाथ अपने हाथों में ले  लिया.

नैना और आकाश ने देखा कि सामने की ओर एक सतरंगी इंद्रधनुष अपनी छटा बिखेर रहा था.Story in Hindi

Hindi Story : हवेली का सन्नाटा

Hindi Story. पिछले 2 साल से अपने पति से दूर याशिका सिंह गांव की हवेली संभाल रही थी. साथ था उन का नौकर अंशु. एक रात याशिका ने अंशु को अपने कमरे में बुलाया और…

पूर्वांचल के ईश्वरपुर गांव में फैली 100 बरस पुरानी हवेली दूर से ही अपनी पहचान दर्ज कराती थी. ऊंची मेहराबें, चौड़े बरामदे, पार्क में खिले रंगबिरंगे फूल सब मिल कर हवेली की खूबसूरती में चार चांद लगा रहे थे.

इस हवेली के मालिक थे जमींदार शिवकांत सिंह, जो अब बूढ़े हो चले थे और उन का एकलौता बेटा डाक्टर आर्यवर्त सिंह पिछले 2 साल से इंगलैंड में था.

गांव में इस विशाल हवेली को जिंदा रखने वाले केवल 2 लोग थे, डाक्टर आर्यवर्त सिंह की पत्नी याशिका सिंह और हवेली की देखभाल में लगा 25 साल का बांका जवान अंशु.

याशिका सिंह पढ़ीलिखी और खूबसूरत औरत थी. शादी के बाद कुछ ही दिनों में उस का पति विदेश चला गया था. धीरेधीरे 2 साल बीत गए… संदेश आते, वीडियो काल कभीकभार होती, पर दूरी का सन्नाटा कहीं ज्यादा अखरता था.

हवेली जितनी विशाल थी, उतनी ही अकेली. लंबे बरामदे, खाली कमरे, भोर का धीमा उजाला और रात का गहरा अंधेरा, सब मिल कर याशिका सिंह के भीतर एक गहरी चुप्पी उतारते जा रहे थे.

याशिका सिंह अकसर सोचती, ‘क्या सचमुच शादी केवल एक रिश्ता है या एक ऐसा साथ जिसे दूरी खा जाती है?’

इधर अंशु अपना काम ईमानदारी से करता था. उस की हर हरकत में एक सादगी थी. वह बोलता कम, काम ज्यादा करता. जब वह आंगन में झाड़ू लगाता, तो जैसे हवेली भी किसी पुराने दिन को याद कर के मुसकराने लगती.

याशिका सिंह ने कई बार खुद को उसे देखते हुए पाया और हर बार खुद को झिड़क दिया. पर हवेलियों की चुप दीवारें मन पर भी अपना असर डालती हैं. जो बात मन टालना चाहे, वही बात आंखें ढूंढ़ने लगती हैं.

दिन बीतते गए. याशिका सिंह को लगा कि अंशु का होना हवेली के सन्नाटे को थोड़ा हलका कर देता है. वह कभी जरूरत पड़ने पर आंगन से आवाज लगाती और अंशु झट से हाजिर हो जाता. उस की आवाज में, चाल में, बरताव में एक ऐसी विनम्रता थी, जो किसी के भी मन को छू ले.

लेकिन वही विनम्रता अंशु के भीतर डर भी जगाती थी. वह अकसर सोचता, ‘मालकिन की नजरों में कहीं मैं गलत न समझ लिया जाऊं. थोड़ सी भी चूक हुई, तो बरबादी पक्की है.’

पर मन को कौन रोक पाता है? इनसान चाहे कितना भी सावधान हो, भीतर कहीं एक कोना रहता है, जो चुपचाप किसी की ओर खिंचना सीख जाता है, बिना इजाजत के, बिना ऐलान के.

एक रात को हलकी ठंड हवेली में सरक रही थी. बरामदे की लालटेन कांपती लौ के साथ डोल रही थी. अंशु गौशाला से लौट कर कमरे में ही पहुंचा था कि ऊपर से याशिका सिंह ने पुकारा, ‘‘अंशु, सुनो.’’

अंशु एकदम से चौंका. रात के इस समय मालकिन का पुकारना असाधारण था. वह धीमे कदमों से ऊपर चढ़ा. कमरे का दरवाजा आधा खुला था. अंदर पीतल का दीपक जल रहा था, जिस की नरम रोशनी कमरे के कोनों में गिर रही थी.

याशिका सिंह पलंग पर बैठी थी. चेहरे पर थकान थी, आवाज में विनती, ‘‘मेरा पैर बहुत दर्द कर रहा है. प्लीज, जरा दबा दो.’’

अंशु झिझक गया, ‘‘मालकिन यह काम तो.’’

याशिका सिंह ने बीच में ही धीमी पर मजबूत आवाज में कहा, ‘‘यह आदेश नहीं, एक आग्रह है.’’

अंशु ने सिर झुकाया और सावधानी से मालकिन के पैर दबाने लगा. पर कमरे में कुछ बदल रहा था, दीया टिमटिमा रहा था, हवा भारी हो गई थी और हवेली का पुराना सन्नाटा जैसे अचानक करीब आ कर खड़ा हो गया था.

अंशु के हाथ कांप रहे थे, क्योंकि उसे डर था… अपने हाथों से कम अपने धड़कते दिल से ज्यादा. उधर याशिका सिंह अपने भीतर की उस तनहाई से लड़ रही थी, जो इतने महीनों से जमा होतीहोती भारी हो गई थी.

अचानक, बिना चेतावनी, याशिका सिंह ने अंशु की कलाई पकड़ ली. अंशु एकदम कठोर हो गया, जैसे अचानक किसी ने उसे बर्फ में धकेल दिया हो. उस की सांसें अटक गईं.

‘‘अंशु…’’ याशिका सिंह की आवाज धीमी, भारी और अनसुनी सी थी, ‘‘हम तुम्हें चाहते हैं.’’

यह सुनते ही अंशु का चेहरा सफेद पड़ गया. वह कांपती आवाज में बोला, ‘‘मालकिन, अगर मालिक को मालूम हो गया, तो वे मुझे जिंदा नहीं छोड़ेंगे.’’

याशिका सिंह ने अंशु के डर को अपने हाथों में समेटने जैसा कहा, ‘‘तुम डरो मत. हम हैं न.’’

उस पल उन दोनों के बीच खामोशी उतर आई… एक ऐसी खामोशी जिस में हवेली का सन्नाटा भी अपनी सांस रोक ले.

अंशु अपनी सारी हिचक और डर भूल बैठा. उस रात का सन्नाटा हवेली की दीवारों में हमेशा के लिए दर्ज हो गया. बिना शोर के, बिना शब्द के, पर गहरा.

उन दोनों ने उस रात को खूब भोगा.

अगली सुबह अंशु आंगन में बैठा था. चेहरा बुझा  हुआ, आंखों में बेचैनी. उसे खुद से डर लग रहा था. वह डर और उलझन से भरा था.

याशिका सिंह ने बरामदे से उतरते हुए कहा, ‘‘अंशु, कल जो हुआ उस से डरने की कोई जरूरत नहीं.’’

पर अंशु के भीतर का तूफान किसी भी आश्वासन से शांत नहीं हो सकता था, ‘‘मालकिन, हम से पाप हुआ है. हम इस हवेली में मुंह दिखाने लायक नहीं रहे.’’

याशिका ने उसे स्थिर नजरों से देखा और कहा, ‘‘पाप वही है जिसे मन स्वीकार न करे. हम दोनों अकेले थे हालात ने हमें मजबूर किया.’’

लेकिन अंशु जानता था कि समाज हालात नहीं देखता, वह केवल सीमाएं देखता है.

Top 10 Romantic Story in Hindi: टॉप 10 रोमांटिक कहानियां हिंदी में

Romantic Story in Hindi: ‘प्यार’ एक ऐसा अहसास है जिसे हर कोई जीना चाहता है. जब हम किसी से प्यार करते हैं तो उसमें केवल खूबियां ही नजर आती हैं, चाहे वह हमारे साथ धोखा ही क्यों न कर रहा हो. लेकिन हर प्यार के रिश्ते में ऐसा नहीं होता. कई लोग तो अपने प्यार की खातिर कुछ भी करने को तैयार हो जाते हैं. तो इस आर्टिकल में हम आपके लिए लेकर आए हैं सरस सलिल की  Top 10 Romantic Story in Hindi. प्यार और रिश्ते से जुड़ी दिलचस्प कहानियां, जिससे आपको बहुत कुछ जानने को मिलेगा, क्या वाकई में सच्चा प्यार मिल सकता है? तो अगर आपको भी है कहानियां पढ़ने का शौक तो पढ़िए सरस सलिल की Top 10 Romantic Story in Hindi.

1.मुरझाया मन: जब प्यार के बदले मिला दर्द

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‘‘कोई घर अपनी शानदार सजावट खराब होने से नहीं, बल्कि अपने गिनेचुने सदस्यों के दूर चले जाने से खाली होता है,’’ मां उस को फोन करती रहीं और अहसास दिलाती रहीं, ‘‘वह घर से निकला है तो घर खालीखाली सा हो गया है.’’

‘मां, अब मैं 20 साल का हूं, आप ने कहा कि 10 दिन की छुट्टी है तो दुनिया को समझो. अब वही तो कर रहा हूं. कोई भी जीवन यों ही तो खास नहीं होता, उस को संवारना पड़ता है.’

‘‘ठीक है बेबी, तुम अपने दिल की  करो, मगर मां को मत भूल जाना.’’ ‘मां, मैं पिछले 20 साल से सिर्फ आप की ही बात मानता आया हूं. आप जो कहती हो, वही करता हूं न मां.’

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2. अटूट प्यार : यामिनी से क्यों दूर हो गया था रोहित

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‘कितने मस्ती भरे दिन थे वे…’ बीते दिनों को याद कर यामिनी की आंखें भर आईं.

कालेज में उस का पहला दिन था. कैमिस्ट्री की क्लास चल रही थी. प्रोफैसर साहब कुछ भी पूछते तो रोहित फटाफट जवाब दे देता. उस की हाजिरजवाबी और विषय की गहराई से समझ देख यामिनी के दिल में वह उतरता चला गया.

कालेज में दाखिले के बाद पहली बार क्लास शुरू हुई थी. इसीलिए सभी छात्रछात्राओं को एकदूसरे को जाननेसमझने में कुछ दिन लग गए. एक दिन यामिनी कालेज पहुंची तो रोहित कालेज के गेट पर ही मिल गया. उस ने मुसकरा कर हैलो कहा और अपना परिचय दिया. यामिनी तो उस पर पहले दिन से ही मोहित थी. उस का मिलनसार व्यवहार देख वह खुश हो गई.

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3. परख : प्यार व जनून के बीच थी मुग्धा

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मुग्धा कैंटीन में कोल्डड्रिंक और सैंडविच लेने के लिए लाइन में खड़ी थी कि अचानक कंधे पर किसी का स्पर्श पा कर यह चौंक कर पलटी तो पीछे प्रसाद खड़ा मुसकरा रहा था.

‘‘तुम?’’ मुग्धा के मुख से अनायास ही निकला.

‘‘हां मैं, तुम्हारा प्रसाद. पर तुम यहां क्या कर रही हो?’’ प्रसाद ने मुसकराते हुए प्रश्न किया.

‘‘जोर से भूख लगी थी, सोचा एक सैंडविच ले कर कैब में बैठ कर खाऊंगी,’’ मुग्धा हिचकिचाते हुए बोली.

‘‘चलो, मेरे साथ, कहीं बैठ कर चैन से कुछ खाएंगे,’’ प्रसाद ने बड़े अपनेपन से उस का हाथ पकड़ कर खींचा.

‘‘नहीं, मेरी कैब चली जाएगी. फिर कभी,’’ मुग्धा ने पीछा छुड़ाना चाहा.

‘‘कैब चली भी गई तो क्या? मैं छोड़ दूंगा तुम्हें,’’ प्रसाद हंसा.

‘‘नहीं, आज नहीं. मैं जरा जल्दी में हूं. मां के साथ जरूरी काम से जाना है,’’ मुग्धा अपनी बारी आने पर सैंडविच और कोल्डड्रिंक लेते हुए बोली. उसे अचानक ही कुछ याद आ गया था.

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4. लव इन मालगाड़ी: मालगाड़ी में पनपा मंजेश और ममता का प्यार

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देश में लौकडाउन का ऐलान हो गया, सारी फैक्टरियां बंद हो गईं, मजदूर घर पर बैठ गए. जाएं भी तो कहां. दिहाड़ी मजदूरों की शामत आ गई. किराए के कमरों में रहते हैं, कमरे का किराया भी देना है और राशन का इंतजाम भी करना है. फैक्टरियां बंद होने पर मजदूरी भी नहीं मिली.

मंजेश बढ़ई था. उसे एक कोठी में लकड़ी का काम मिला था. लौकडाउन में काम बंद हो गया और जो काम किया, उस की मजदूरी भी नहीं मिली.

मालिक ने बोल दिया, ‘‘लौकडाउन के बाद जब काम शुरू होगा, तभी मजदूरी मिलेगी.’’

एक हफ्ते घर बैठना पड़ा. बस, कुछ रुपए जेब में पड़े थे. उस ने गांव जाने की सोची कि फसल कटाई का समय है, वहीं मजदूरी मिल जाएगी. पर समस्या गांव पहुंचने की थी, दिल्ली से 500 किलोमीटर दूर उत्तर प्रदेश के सीतापुर के पास गांव है. रेल, बस वगैरह सब बंद हैं.

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5. प्रेम का दूसरा नाम: क्या हो पाई उन दोनों की शादी

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दियाबाती कर अभी उठी ही थी कि सांझ के धुंधलके में दरवाजे पर एक छाया दिखी. इस वक्त कौन आया है यह सोच कर मैं ने जोर से आवाज दी, ‘‘कौन है?’’

‘‘मैं, रोहित, आंटी,’’ कुछ गहरे स्वर में जवाब आया.

रोहित और इस वक्त? अच्छा है जो पूर्वा के पापा घर पर नहीं हैं, यदि होते तो भारी मुश्किल हो जाती, क्योंकि रोहित को देख कर तो उन की त्यौरियां ही चढ़ जाती हैं.

‘‘हां, भीतर आ जाओ बेटा. कहो, कैसे आना हुआ?’’

‘‘कुछ नहीं, आंटी, सिर्फ यह शादी का कार्ड देने आया था.’’

‘‘किस की शादी है?’’

‘‘मेरी ही है,’’ कुछ शरमाते हुए वह बोला, ‘‘अगले रविवार को शादी और सोमवार को रिसेप्शन है, आप और अंकल जरूर आना.’’

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6. इजहार: सीमा के लिए गुलदस्ता भेजने वाले का क्या था राज?

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मनीषा ने सुबह उठते ही जोशीले अंदाज में पूछा, ‘‘पापा, आज आप मम्मी को क्या गिफ्ट दे रहे हो?’’

‘‘आज क्या खास दिन है, बेटी?’’ कपिल ने माथे में बल डाल कर बेटी की तरफ देखा.

‘‘आप भी हद करते हो, पापा. पिछले कई सालों की तरह आप इस बार भी भूल गए कि आज वैलेंटाइनडे है. आप जिसे भी प्यार करते हो, उसे आज के दिन कोई न कोई उपहार देने का रिवाज है.’’

‘‘ये सब बातें मुझे मालूम हैं, पर मैं पूछता हूं कि विदेशियों के ढकोसले हमें क्यों अपनाते हैं?’’

‘‘पापा, बात देशीविदेशी की नहीं, बल्कि अपने प्यार का इजहार करने की है.’’

‘‘मुझे नहीं लगता कि सच्चा प्यार किसी तरह के इजहार का मुहताज होता है. तेरी मां और मेरे बीच तो प्यार का मजबूत बंधन जन्मोंजन्मों पुराना है.’’

‘‘तू भी किन को समझाने की कोशिश कर रही है, मनीषा?’’ मेरी जीवनसंगिनी ने उखड़े मूड के साथ हम बापबेटी के वार्तालाप में हस्तक्षेप किया, ‘‘इन से वह बातें करना बिलकुल बेकार है जिन में खर्चा होने वाला हो, ये न ला कर दें मुझे 5-10 रुपए का गिफ्ट भी.’’

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7. आहत: शालिनी के प्यार में डूबा सौरभ उसके स्वार्थी प्रेम से कैसे था अनजान

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बहुत तड़के ही शालिनी उठ कर नहाने चली गई. अभी वह ड्रैसिंगटेबल के पास पहुंची ही थी कि सौरभ ने उसे पीछे से अपनी बांहों में भर लिया और चुंबनों की बौछार कर दी.

‘‘अरे छोड़ो न, क्या करते हो? रात भर मस्ती की है, फिर भी मन नहीं भरा तुम्हारा,’’ शालिनी कसमसाई.

‘‘मैं तुम्हें जितना ज्यादा प्यार करता हूं, उतना ही और ज्यादा करने का मन करता है.’’

‘‘अच्छा… तो अगर मैं आज कुछ मांगूं तो दोगे?’’

‘‘जान मांगलो, पर अभी मुझे प्यार करने से न रोको.’’

‘‘उफ, इतनी बेचैनी… अच्छा सुनो मैं ने नौकरी करने का निर्णय लिया है.’’

‘‘अरे, मैं तो खुद ही कह चुका हूं तुम्हें… घर बैठ कर बोर होने से तो अच्छा ही है… अच्छा समझ गया. तुम चाहती हो मैं तुम्हारी नौकरी के लिए किसी से बात करूं.’’

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8. उज्ज्वला: क्या सुनिल ने उज्ज्वला को पत्नी के रूप में स्वीकार किया

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सुनील के जाते ही उज्ज्वला कमरे में आ गई और तकिए में मुंह गड़ा कर थकी सी लेट गई. सुनील के व्यवहार से मन का हर कोना कड़वाहट से भर गया था. जितनी बार उस ने सुनील से जुड़ने का प्रयत्न किया था उतनी बार सुनील ने उसे बेदर्दी से झटक डाला था. उस ने कभी सोचा भी नहीं था कि जीवन में यह मोड़ भी आ सकता है. शादी से पहले कई बार उपहास भरी नजरें और फब्तियां झेली थीं, पर उस समय कभी ऐसा नहीं सोचा था कि स्वयं पति भी उस के प्रति उपेक्षा और घृणा प्रदर्शित करते रहेंगे. बचपन कितना आनंददायी था. स्कूल में बहुत सारी लड़कियां उस की सहेलियां बनने को आतुर थीं. अध्यापिकाएं भी उसे कितना प्यार करती थीं. वह हंसमुख, मिलनसार होने के साथसाथ पढ़ने में अव्वल जो थी. पर ऐसे निश्चिंत जीवन में भी मन कभीकभी कितना खिन्न हो जाया करता था.

उसे बचपन की वह बात आज भी कितनी अच्छी तरह याद है, जब पहली बार उस ने अपनेआप में हीनता की भावना को महसूस किया था. मां की एक सहेली ने स्नेह से गाल थपथपा कर पूछा था, ‘क्या नाम है तुम्हारा, बेटी?’ ‘जी, उज्ज्वला,’ उस ने सरलता से कहा. इस पर सहेली के होंठों पर व्यंग्यात्मक हंसी उभर आई और उस ने पास खड़ी महिला से कहा, ‘लोग न जाने क्यों इतने बेमेल नाम रख देते हैं?’ और वे दोनों हंस पड़ी थीं. वह पूरी बात समझ नहीं सकी थी. फिर भी उस ने खुद को अपमानित महसूस किया था और चुपचाप वहां से खिसक गई थी.

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9. भूलना मत: नम्रता की जिंदगी में क्या था उस फोन कौल का राज?

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नम्रता ने फोन की घंटी सुन कर करवट बदल ली. कंबल ऊपर तक खींच कर कान बंद कर लिए. सोचा कोई और उठ कर फोन उठा लेगा पर सभी सोते रहे और फोन की घंटी बज कर बंद हो गई.

‘चलो अच्छा हुआ, मुसीबत टली. पता नहीं मुंहअंधेरे फोन करने का शौक किसे चर्राया,’ नम्रता ने स्वयं से ही कहा.

पर फोन फिर से बजने लगा तो नम्रता झुंझला गई, ‘‘लगता है घर में मेरे अलावा यह घंटी किसी को सुनाई ही नहीं देती,’’ उस ने उठने का उपक्रम किया पर उस के पहले ही अपने पिता शैलेंद्र बाबू की पदचाप सुन कर वह दोबारा सो गई. पिता ने फोन उठा लिया.

‘‘क्या? क्या कह रहे हो कार्तिक? मुझे तो अपने कानों पर विश्वास ही नहीं होता. पूरे देश में प्रथम स्थान? नहींनहीं, तुम ने कुछ गलत देखा होगा. क्या नैट पर समाचार है?’

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10. सच्ची खुशी: क्या विशाखा को भूलकर खुश रह पाया वसंत?

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वसंत एक जनरल स्टोर के बाहर खड़ा अपने दोस्तों से बातें कर रहा था. उसे आज फिर विशाखा दिखाई दे गई. विशाखा उस के पास से निकली तो उस के दिल में आंधियां उठने लगीं. उस ने पहले भी कई बार आतेजाते विशाखा को देख कर सोचा, ‘धोखेबाज, कहती थी मेरे बिना जी नहीं सकती, अब यही सब अपने दूसरे पति से कहती होगी. बकवास करती हैं ये औरतें.’ फिर अगले ही पल उस के मन से आवाज आई कि तुम ने भी तो अपनी दूसरी पत्नी से यही सब कहा था. बेवफा तुम हो या विशाखा?

वह अपने दोस्तों से विदा ले कर अपनी गाड़ी में आ बैठा और थोड़ी दूर पर ही सड़क के किनारे गाड़ी खड़ी कर के ड्राइविंग सीट पर सिर टिका कर विशाखा के बारे में सोचने लगा…

वसंत ने विशाखा से प्रेमविवाह किया था. विवाह को 2 साल ही हुए थे कि वसंत की मां उमा देवी को पोतापोती का इंतजार रहने लगा. उन्हें अब विशाखा की हर बात में कमियां दिखने लगी थीं. विशाखा सोचती क्या करे, उस के सिर पर मां का साया था नहीं और पिता अपाहिज थे. बरसों से वे बिस्तर पर पड़े थे. एक ही शहर में होने के कारण वह पिता के पास चक्कर लगाती रहती थी. उस की एक रिश्ते की बूआ और एक नौकर उस के पिता प्रेमशंकर का ध्यान रखते थे.

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