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Funny Hindi Story : असली जिंदगी तो ये जी रहे हैं

Funny Hindi Story. यह अलग ही तरह का शख्स था. पता नहीं कहां कौन सी साधारण बात इसे खास लगने लगे, किस बात से मोहित हो जाए, कुछ कह नहीं सकते थे. जिन बातों से एक आम आदमी को ऊब होती थी, इस आदमी को उस में मजा आता था. एक अजीब सा आनंद आता था उसे. इस की अभिरुचि बिलकुल अलग ही तरह की थी. वैसे यह मेरा दोस्त है, फिर भी मैं कई बार सोचने को मजबूर हो जाता हूं कि आखिर यह आदमी किस मिट्टी का बना है. मिट्टी सी चीज में अकसर यह सोना देखता है और अकसर सोने पर इस की नजर ही नहीं जाती.

मैं इस के साथ मुंबई घूमने गया था. हम टैक्सी में दक्षिण मुंबई के इलाके में घूम रहे थे. हमारी टैक्सी बारबार सड़क पर लगे जाम के कारण रुक रही थी. जब टैक्सी ऐसे ही एक बार रुकी तो इस का ध्यान सड़क के किनारे बनी एक 25 मंजिली बिल्ंिडग की 15वीं मंजिल पर चला गया, जहां एक कमरा खुला दिख रहा था. मानसून का समय था. आसमान में बादल छाए थे. कमरे की लाइट जल रही थी, पंखा घूमता दिख रहा था. वह बोल उठा, ‘यार, इस को कहते हैं ऐश. देखो, अपन यहां ट्रैफिक में फंसे हैं और वो महाशय आराम फरमा रहे हैं, वह भी पंखे की हवा में.’

मैं ने सोचा इस में क्या ऐश की बात है? मैं ने कहा, ‘यार, वह आदमी जो उस कमरे में दिख रहा है, वह क्या कुछ काम नहीं करता होगा? आज कोई कारण होगा कि घर पर है.’

अब वह बोला, ‘यार, अपन यहां ट्रैफिक में फंसे हैं और वह ऐश कर रहा है. यह तो एक बिल्डिंग के एक माले के एक फ्लैट की बात है, यहां तो हर फ्लैट में लोग मजे कर रहे हैं.’

मैं ने झल्ला कर कहा, ‘हां, हर फ्लैट नहीं, हर फ्लैट के हर कमरे में कहो और अपन यहां ट्रैफिक में फंसे हुए हैं.’

यह तो एक घटना मुंबई की रही. एक दिन शाम को घूमते हुए शहर के रेलवे स्टेशन पर मिल गया. मैं शाने भोपाल ट्रेन से दिल्ली जा रहा था. यह तफरीह करने आया था. चूंकि ट्रेन के लिए समय था, सो हम एक बैंच पर बैठ गए. स्टेशन पर आजा रही ट्रेनों को यह टकटकी लगा कर देखता. बोगी में बैठे लोगों को देखता. यदि किसी एसी बोेगी में कोई यात्री दिख जाता आपस में बतियाते या खाना खाते, लेटे पत्रिका पढ़ते तो यह कहता, ‘यार, देखो इन के क्या ऐश हैं. मस्त एसी में यात्रा कर रहे हैं, खापी रहे हैं, गपशप कर रहे हैं और अपन यहां कुरसी पर बैठे हैं?’

मैं ने कहा, ‘यार, इस में क्या खास बात हो गई? अपन लोग भी जाते हैं तो इसी तरह मौज करते हैं यदि तुम्हारे पैमाने से बात तोली जाए.’ मैं ने आगे कहा, ‘वैसे मैं तो रेलयात्रा को एक बोरिंग चीज मानता हूं.’ अब मेरा मित्र बोल पड़ा, ‘अरे यार, तुम नहीं समझोगे क्या आनंद है यात्रा का. मस्ती में पड़े रहो, सोते ही रहो और यदि घर से परांठेसब्जी लाए हो तो उस का भी मजा अलग ही है. काश, अपन भी ऐसे ही इस समय ट्रेन की ऐसी ही किसी बोगी में बैठे होते तो मजा आ जाता.’

मैं ने कहा, ‘तो चल मेरे साथ? असल जिंदगी जीना, मैं तो खैर बोर होऊंगा तो होते रहूंगा.’ लेकिन इस बात पर यह मौन हो गया.

इसे कौन से साधारण दृश्य अपील कर जाएं, कहना मुश्किल था. एक बार मैं और यह कार से शहर से 80 किलोमीटर दूर स्थित एक प्रसिद्ध पिकनिक स्पौट को जा रहे थे. एक जगह ट्रैफिक कुछ धीमा हो गया था. इस की नजर सड़क के किनारे खड़े ट्रकों व उस के साइड में बैठे ड्राइवरक्लीनरों पर चली गई.

वे अपनी गाडिं़यां खड़ी कर खाना पका रहे थे. ईंटों के बने अस्थायी चूल्हे पर खाना पक रहा था. एक व्यक्ति रोटियां सेंक रहा था, एक सब्जी बना रहा था. बाकी बैठे गपशप कर रहे थे. बस, इतना दृश्य इस के लिए असली जिंदगी वाला इस का जुमला फेंकने और उसे लंबा सेंकने के लिए काफी था.

यह बोल उठा, ‘देखो यार, जिंदगी इस को कहते हैं मस्त, कहीं भी रुक गए, पकायाखाया, फिर सो गए और जब नींद खुली तो फिर चल दिए और अपन, बस चले जा रहे हैं. अभी किसी होटल में ऊटपटांग खाएंगे. ये अपने हाथ का ही बना खाते हैं, इस में  किसी मिलावट व अशुद्धता की गुंजाइश ही नहीं है. ऐसी गरम रोटियां होटल में कहीं मिलती हैं क्या?

मैं ने चिढ़ कर कहा, ‘ऐसा करते हैं अगली बार तुम भी रसोई का सामान ले कर चलना. अपन भी ऐसे ही सड़क के किनारे रुक कर असली जिंदगी का मजा लेंगे. और तुरंत ही मजा लेना है तो चल आगे, किसी शहरकसबे के बाजार से अपना तवा, बेलन और किराने का जरूरी सामान खरीद लेते हैं, इस पर वह मौन हो गया.

मैं एक बार इस के साथ हवाईजहाज से बेंगलुरु से देहरादून गया. फ्लाइट के 2 स्टौप बीच में थे. एयर होस्टैस और दूसरे हौस्पिटैलिटी स्टाफ के काम को यह देखतासुनता रहा. बाद में बोला, ‘यार, असली मजे तो इन्हीं के हैं? 2 घंटे में इधर, तो 2 घंटे में उधर. सुबह उठ कर ड्यूटी पर आए तो दिल्ली में थे, नाश्ता किया था मुंबई में. लंच लिया बेंगलुरु में और डिनर लेने फिर दिल्ली आ गए. करना क्या है, बस, मुसकराहटों को फेंकते चलना है. एक बार हर उड़ान में सैफ्टी निर्देशों का प्रदर्शन करना है, बस, फिर जा कर बैठ जाना है. प्लेन के लैंड करते समय फिर आ जाना है और यात्रियों के जाते समय बायबाय, बायबाय करना है. इसे कहते हैं जिंदगी.’

मैं ने कहा, ‘यार, तुझे हर दूसरे आदमी की जिंदगी अच्छी लगती है, अपनी नहीं.’ मैं ने आगे कहा कि इन की जिंदगी में रिस्क कितना है? अपन तो कभीकभी प्लेन में बैठते हैं तो हर बार सब से पहला खयाल सहीसलामती से गंतव्य पहुंच जाने का ही आता है. अब इस बात पर यह बंदा मौन हो गया, कुछ नहीं बोला. बस, इतना ही दोहरा दिया कि असली ऐश तो ये करते हैं.

एक और दिन की बात है. यह अपने खेल अनुभव के बारे में बता कर दूसरों की जिंदगी में फिर से तमगे पर तमगे लगा रहा था. वनडे क्रिकेट मैच देख आया था नागपुर में, बोला, ‘यार, जिंदगी हो तो खिलाड़ी जैसी. कोई काम नहीं, बस, खेलो, खेलो और जम कर शोहरत व दौलत दोनों हाथों से बटोर लो. जनता भी क्या पगलाती है खिलाडि़यों को देख कर, इतनी भीड़, इतनी भीड़, कि बस, मत पूछो.’

मैं ने कहा, ‘बस कर यार, अभी पिछले सप्ताह प्रसिद्ध गायक सोनू निगम का कार्यक्रम हुआ था, उस में भी तेरा यह कहना था कि अरे बाप रे, क्या भीड़ है. लोग पागलों की तरह दाद दे रहे हैं, झूम रहे हैं. जिंदगी तो ऐसे कलाकारों की होती है’ मैं ने आगे कहा, ‘इस स्तर पर वे क्या ऐसे ही पहुंच गए हैं. न जाने कितने पापड़ बेले हैं, कितना संघर्ष किया है. असली कलाकार तो मैं तुझे मानता हूं जो असली जिंदगी को कहांकहां से निकाल ढूंढ़ता है.’

वह बोला, ‘यार, यह सब ठीक है. पापड़आपड़ तो सब बेलते हैं, लेकिन समय भी कुछ होता है. ये समय के धनी लोग हैं और अपन समय के कंगाल? घिसट कर जी रहे हैं.’ मैं ने कहा, ‘मैं तो तुम्हारी असली जिंदगी जीने की अगली उपमा किस के बारे में होगी, उस का इंतजार कर रहा हूं. तुम्हारा यह चेन स्मोकर की तरह का नशा हो गया है कि हर दूसरे दिन किसी दूसरे की जिंदगी में तुम्हें नूर दिखता है और अपनी जिंदगी कू्रर.’

वह कुछ नहीं बोला. अब उस के मौन हो जाने की बारी थी. उस का मौन देख कर मैं ने भी अब मौन रहना उचित समझा, वरना मैं ने कुछ कहा तो पता नहीं यह फिर किस से तुलना कर के अपने को और मुझे भी नीचा फील करवा दे.

मेरे इस दोस्त का नाम तकी रजा है. महीनेभर बाद पिछले शनिवार को मैं इस से मिलने घर गया था. मैं आजकल इस के ‘असली जिंदगी इन की है’ जुमले से थोड़ा डरने लगा हूं. मुझे लग रहा था कि कहीं यह मेरे पहुंचते ही ‘असली जिंदगी तो इन की है’ कह कर स्वागत न कर दे. मैं इस के घर का गेट खोल कर अंदर दाखिल हुआ. यह लौन में ही बैठा हुआ था.

मेरी ओर इस की नजर गई. लेकिन तकी, जो ऊपर को टकटकी लगाए कुछ देख रहा था, ने तुरंत नजर ऊपर कर ली. मैं उस के सामने पड़ी कुरसी पर जा कर बैठ गया. उस के घुटनों को छू कर मैं ने कहा कि क्या बात है, सब ठीक तो है? वह मेरे यह बोलते ही बोला, ‘क्या ठीक है यार, ऊपर देख? कैसे एक तोता मस्त अमरूद का स्वाद ले रहा है?’

मैं ने ऊपर की तरफ देखा, वाकई एक सुरमी हरे रंग का लेकिन लाल रंग की चोंच, जोकि तोते की होती ही है, वाला तोता अमरूद कुतरकुतर कर खा रहा था और बारीकबारीक अमरूद के कुछ टुकड़े नीचे गिर रहे थे. थोड़ी देर बाद वह फुर्र से टांयटांय करते उड़ गया. फिर एक दूसरा तोता आ गया. उस के पीछे 2-3 तोते और आ गए. वे सब एकएक अमरूद पर बैठ गए.

एक अमरूद पर तो 2 तोते भी बैठ कर उसे 2 छोरों से कुतरने लगे. कौमी एकता का दृश्य था. तकी बोला, ‘यार, असली जिंदगी तो इन की है. जमीन पर आने की जरूरत ही नहीं, हवा में रहते ही नाश्ता, खाना, टौयलेट सब कर लिया.’ और हमारे आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा कि तकी ने जैसे ही यह बोला कि एक तोता, जो उस के सिर के ठीक ऊपर वाली डाल पर था, ने अपना वेस्ट मैटेरियल सीधे तकी के सिर पर ही गिरा दिया.

‘यह भी कोई तरीका है,’ कह कर तकी अंदर की ओर भागा. जब वह वापस आया तो मैं ने कहा, ‘हां यार, वाकई असली जिंदगी ये ही जी रहे हैं.’ तकी ने मुझे खा जाने वाली नजरों से देखा.

मैं ने इस के ‘असली जिंदगी ये जी रहे हैं’ वाले आगामी बेभाव पड़ने वाले डायलौग से बचने के लिए बात को आम भारतीय की तरह महंगाई को कोसने के शाश्वत विषय की ओर मोड़ दिया.

तकी बोला, ‘हां यार, यह महंगाई तो जान ले रही है.’ लेकिन थोड़ी ही देर में असली जिंदगी तो ये जी रहे हैं’ का साजोसामान ले जाती कुछ बैलगाडि़यां सामने से निकल रही थीं. ये गड़रियालुहार थे जोकि खानाबदोश जिंदगी जीते हैं. बैलगाडि़यों पर पलंग, बच्चे और सब सामान लदा दिख रहा था. अब तकी टकटकी लगा कर इन्हें ही देख रहा था. उस की आंखों ने बहुतकुछ देख लिया जो कि उसे बाद में शब्दों में प्रकट कर मेरी ओर शूट करना था. अंतिम बैलगाड़ी जब तक 25 मीटर के लगभग दूर नहीं पहुंच गई, यह उसे टकटकी लगा कर देखता ही रहा. अब वह बोला, ‘यार, जिंदगी तो इन की है?’

मैं ने कहा, ‘खानाबदोश जिंदगी भी कोई जिंदगी है?’

वह बोला, ‘यार, तुम नहीं समझोगे, इसी में जिंदगी का मजा है. एक जगह से दूसरी जगह को ये लोग हमेशा घूमते रहते हैं. कहीं भी रुक लिए और कहीं भी बनाखा लिया, और कहीं भी रात गुजार ली. भविष्य की कोई चिंता नहीं, मस्तमौला, घुमक्कड़ जिंदगी, सब को कहां मिलती है.’

मैं ने सोचा कि इस को भी यह अच्छा कह रहा है. अब तो यहां से रवानगी डालना ही ठीक होगा, वरना ‘असली जिंदगी तो इन की है’ का कोई न कोई नया संस्करण कहीं न कहीं से इस के लिए प्रकट हो जाएगा, जिसे वह मेरे पर शूट करेगा जो कि मुझे आजकल हकीकत की गोली से भी तेज लगने लगा है.

यह भीखूब रही. मेरी शादी के तुरंत बाद की घटना है. पत्नी विदा हो कर ससुराल आ गईर् थी. बहू से मिलने वालों का आनाजाना लगा हुआ था.

उन दिनों हमारे ताऊजी सेवानिवृत्त हो कर उसी शहर में रहते थे. उन के क्रोधी स्वभाव से हम सभी परिचित थे. मेरी पत्नी को जल्द ही ताऊजी के बारेमें इतने किस्से सुनने को मिले कि उस के दिल में एक डर सा समा गया.

शाम का वक्त था. तभी ताऊजी का आगमन हुआ. उन को देखते ही पत्नी घर के अंदर भागी. ताऊजी बहू का नाम पुकारते हुए उस के पीछे जाने लगे तो वह अपने कमरे के अंदर भागी. ताऊजी को दरवाजे की तरफ आता देख उस के होश उड़ गए. कमरे में एक ही दरवाजा था. भागने का कोई उपाय न देख वह पलंग के नीचे छिप गई. ताऊजी कमरे के अंदर झांक कर वापस लौटे. फिर सब को बतलाने लगे कि बहू को अंदर जाते देखा, फिर गायब कहां हो गई.

ताऊजी के जाने के बाद ही पत्नी पलंग के नीचे से बाहर आई. तब तक उस के कपड़ों तथा मेकअप का बुरा हाल हो चुका था. वह शर्म से लाल हो रही थी, जबकि हम सब का हंसते हंसते बुरा हाल था.  विनोद प्रसादशर्माजी कुछ महीनों पहले ही रिटायर हुए. अब उन के पास न तो कोई विशेष काम था और न ही सरकारी नौकर या गाड़ी. वे कोशिश करते घर के कामों में खुद को व्यस्त रखने की, दोस्तों के यहां जाना और उन्हें बुलाना बढ़ गया.

एक दिन हम 5-6 दोस्त शर्माजी के घर गपें मारने के लिए इकट्ठा हुए. थोड़ी देर बाद मिसेज शर्मा बोलीं, ‘‘मैं चाय बना कर ले आती हूं.’’ शर्माजी बोले, ‘‘अरे, रुको, चाय तो आज मैं ही बनाऊंगा.’’ और वे चले चाय बनाने. पत्नी साथ जाने लगीं तो उन्हें यह कह कर रोक दिया कि ‘‘आप यहीं बैठो.’’ पत्नी बुदबुदाई, ‘‘कभी तो चाय बनाई नहीं.’’

थोड़ी देर बाद शर्माजी बिलकुल बैरा स्टाइल में चाय की ट्रे ले कर आ गए. सब ने चाय ले ली. पहली चुस्की लेते ही सब की नाक में हींग की महक तैर गई. सब एकदूसरे का मुंह देखने लगे तो वे बोले, ‘‘है न बढि़या मसाला चाय?’’

सब कहने लगे, ‘‘आप भी लीजिए.’’

शर्माजी ने जैसे ही चाय की चुस्की ली, उन का मुंह देख कर हम सब खिलखिला कर हंस दिए. असल में उन्होने चाय में जीरावन मसाला डाल दिया था जो चाय मसाले के साथ ही रखा था. Funny Hindi Story

Hindi Story : क्या क्या ख्वाब दिखाए: मेरी पत्नी छंदा

Hindi Story. ख्वाब दिखाना तो महिलाओं का शगल होता है. मेरी पत्नी छंदा को भी सपने दिखाने का शौक है. मैं ने एक दिन छंदा से कहा, ‘‘तुम प्लीज मुझे सपने मत दिखाया करो. यह सब काम तो प्रेमिका का होता है.’’

वह गार्डन में मिलती है. मुसकराती है, जूड़े में लगे फूल को संवारती है, फिर धीरे से कहती है, ‘‘हमारी शादी हो जाएगी न हैंडसम, तब मैं डैड से कह कर दफ्तर में पीए बनवा दूंगी. कार दिलवा दूंगी फिर हम हनीमून के लिए बैंकाक, सिंगापुर जाएंगे. बड़ा मजा आएगा न.’’

प्रेमी ख्वाब के समुद्र में गोता लगाने लगता है. बाद में पता चलता है कि ऐसे ख्वाब के चक्कर उस ने कई पे्रमियों के साथ चलाए हैं. सब को पतंग समझ कर सपनों के आसमान पर जी भर कर उड़ाया है. अपनी जमीन छोड़ चुके प्रेमी हवा में उड़ते रहे और वे अब जमीन के रहे न आसमान के, त्रिशंकु बन कर अधर में लटकते रहे.

मैं ने कहा, ‘‘क्षमा करना देवी, मैं शादीशुदा हूं, घर में सपने दिखाने के लिए पत्नी है. वह रातदिन सपने दिखाती रहती है.’’

प्रेमिका ठहाका मार कर हंसते हुए बोली, ‘‘पत्नी व सपने? अच्छा मजाक कर लेते हो. सपने दिखाना प्रेमिका को ही शोभा देता है. पत्नी तो बेचारी चूल्हाचौका,  झाड़ूपोंछा, बर्तनों की सफाई में, बच्चों की चिल्लपों में उलझी रहती है. उस के पास न तो सोने की फुरसत होती है न सपने देखने का समय बचता है. एक पल पति से बात करने के लिए तरस जाती है बेचारी. घरगृहस्थी का चक्कर होता ही ऐसा है. पत्नी तो ब्लाटिंगपेपर बन कर रह जाती है जहां सारे सपने एकएक कर सोख लिए जाते हैं.’’

इस के बाद प्रेमिका की खिल- खिलाहट काफी देर तक मेरे कान में गूंजती रही. मैं मन ही मन एक फिल्मी गीत गुनगुनाने लगा, ‘‘रात ने क्याक्या ख्वाब दिखाए…’’

सात फेरों के समय पत्नी का हर फेरा किसी रंगीन ख्वाब से कम नहीं होता. पहले फेरे में छंदा ने ख्वाब का पहला फंदा डालते हुए कहा था, ‘‘डार्लिंग, मैं वचन देती हूं कि मेरी ओर से तुम्हें किसी प्रकार की शिकायत नहीं होगी.’’

मैं ने कहा था, ‘‘थैंक्स…’’

दूसरा फेरा लेते हुए वह बोली थी, ‘‘मैं तुम्हें वह सब सुख दूंगी जो हर पति चाहता है.’’

मैं ने प्रसन्न मुद्रा में कहा, ‘‘ख्वाब अच्छा है. बुनती जाओ.’’

वह तुरंत बोली, ‘‘हम अपने बच्चों को जापान पढ़ने भेजेंगे.’’

ख्वाबों के आकाश से वह तारे तोड़ने लगी. तब मेरा पति धर्म जाग गया.

मैं ने पूछा, ‘‘ठंडा पीओगी? सपने बुनने में तुम्हें राहत मिलेगी.’’

‘‘आप ऐसा कैसे बोल रहे हैं. मैं तो अपनी गृहस्थी की नींव मजबूत करने के लिए अपनी कोमल भावनाएं जाहिर कर रही थी. तुम्हारी पत्नी बन रही हूं. खाना बनाऊंगी भी और पेट भर तुम्हें खिलाऊंगी भी. तुम तो जानते ही होगे कि पत्नी अपने पति के दिल पर शासन करने के लिए उस के पेट से ही रास्ता बनाती है.’’

छंदा नारी रहस्य बताती जा रही थी.

‘‘मतलब?’’ मैं ने पूछा.

‘‘जो पत्नी स्वादिष्ठ भोजन बनाना जानती है उस का पति हमेशा उस के आसपास मंडराता रहता है, फुदकता रहता है. उन के बीच सदैव प्रेम बना रहता है. प्यार कभी मुरझाता नहीं.’’

छंदा सप्तपदी की एकएक शपथ में ख्वाबों का उल्लेख करती रही, जिस में कम खर्च, सहनशीलता, आपसी सहयोग ‘…सुख मेरा ले ले मैं दुख तेरा ले लूं’ टाइप के फिल्मी गीत के मुखड़े शामिल थे.

ऐसी बातें कर जो सपने छंदा ने मुझे दिखाए तब मैं ने अपने भाग्य को सराहा था. अपने को दुनिया का सब से भाग्यशाली पति समझा था, जिसे ऐसी सुशील, दूरदर्शी पत्नी मिली थी.

 

गृहस्थी के विषय में मैं निश्ंिचत था. ख्वाबगाह में आराम से लेटेलेटे चैन की बांसुरी बजाता रहा. तब मुझे क्या पता था कि छंदा ने अभी तो सिर्फ मेरी उंगली पकड़ी है, वह धीरेधीरे पहुंचा पकड़ने की गुप्त तैयारी कर रही है.

छंदा ने कहा, ‘‘सुनो, मिसेज चोपड़ा ने बसंत विहार में 45 लाख का फ्लैट लिया है. क्यों न हम भी एक फ्लैट वहां बुक करा लें. आप का ख्वाब पूरा हो जाएगा.’’

मेरे कान खड़े हो गए. एक पल को मुझे लगा कि मेरा ख्वाब टूटने से कहीं मेरा ब्लडप्रेशर न बढ़ जाए. गंभीर हो कर मैं ने कहा, ‘‘प्रिय छंदा, मध्यवर्गीय परिवार के सपने भी छोटेछोटे होते हैं. बड़ेबड़े सपने देखना हमें शोभा नहीं देता. इन के टूटने पर हम डिप्रेशन के शिकार हो सकते हैं. ख्वाब तो शुद्ध घी की तरह होता है जिसे हर कोई पचा नहीं पाता. अपना यह छोटा सा मकान क्या बुरा है. सिर पर बस, छत होनी चाहिए. रातोंरात तुम्हारे लखपति बनने के ख्वाब ने ही हमें शेयरमार्केट के आकाश से पटक कर जमीन दिखला दी. तब तुम ने इस हादसे को सहजता से लिया था.’’

‘‘ऐसी करवटें तो शेयर बाजार का ऊंट बदलता रहता है. आज घाटे में हैं कल फिर लाभ में आ जाएंगे. सब दिन एक जैसे नहीं होते,’’ कहते हुए वह मुझे फिर से अच्छे दिन आने के ख्वाब दिखाने लगी.

मैं जानता हूं कि बीवी के ख्वाब के पीछे उस की महत्त्वाकांक्षी भावनाएं ही हैं. मैं ने विवाह के समय ली गई शपथ याद दिलाते हुए कहा, ‘‘तुम सभी सुख मुझे दोगी जो हर पति चाहता है.’’ मेरे द्विअर्थी संवाद सुन कर वह ‘धत’ कहते हुए शरमा गई.

मेरी स्थिति ‘खरबूजे को देख खरबूजा रंग बदलता है’ की तरह हो गई. मैं भी पत्नी के साथ रहतेरहते रातदिन ख्वाब देखने लगा हूं. हम शाम को साथसाथ ख्वाब बुनते हैं. ख्वाब देखना आज देश की पहली जरूरत है. ख्वाब ही तो हमें आगे बढ़ाते हैं. पहले जब मैं ख्वाब नहीं देखता था तब रक्तचाप, मधुमेह बीमारी का शिकार था. अब ख्वाब साकार करने के लिए नईनई योजनाएं बना रहे हैं. इसी अनुसार अर्थात चादर के अनुसार पैर पसार रहे हैं. आशा का संचार मन में हो रहा है. छंदा अब पत्नी के रूप में प्रेमिका नजर आने लगी है. नएनए ख्वाबों की जननी है वह, उसे मैं अब ख्वाबों की मलिका कहने लगा हूं. Hindi Story

Exam Cheating : मिशन छिपकली- कोई पेपर में फेल नहीं हो सकता

Exam Cheating.45 साल की ढलती उम्र में हमारी जुड़वां संतानें हुई थीं. मुझे नन्हींमुन्नी गुडि़या का मनचाहा उपहार मिला था और वाइफ को उन का दुलारा गुड्डा, लेकिन वाइफ को बिटिया की भी चाहत थी. वे बिटिया को साइंटिस्ट बनाना चाहती थीं. मुझे बेटे के साथ नुक्कड़ पर क्रिकेट खेलने की तमन्ना थी. हम ने महल्ले में मिठाई बंटवाई. अनाथालय के बच्चों के लिए मिठाईनमकीन के पैकेट और कपड़ों के उपहार भिजवाए. हमारी खुशी का ठिकाना न था.

हम ने अपने बच्चों को भरपूर प्यार दिया. उन की सभी इच्छाएं पूरी कीं. कभी शिकायत का कोई मौका नहीं दिया. मोबाइल, लैपटौप, स्कूटी, बाइक, कार, ब्रैंडेड ड्रैसेज, ट्यूटर सबकुछ उन के पास थे. दोनों अब बड़े हो चुके थे. 9वीं कक्षा की परीक्षा दे चुके थे.

‘‘पापा, एडवांस बुकिंग करानी है,’’ बिटिया ने मुझ से रिक्वैस्ट की.

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‘‘हांहां, क्यों नहीं, ‘संजू’ लगी है. यह फिल्म काफी पसंद की जा रही है,’’ मैं ने बिटिया का हौसला बढ़ाया. मैं खुद फिल्म देखने के मामले में आगे रहता हूं.

‘‘पापा, अगले साल हम दोनों 10वीं बोर्ड की परीक्षा देंगे. परीक्षा में हैल्प के लिए मिशन की बुकिंग चल रही है,’’ बिटिया ने मुझे बताया.

‘‘बोर्ड की परीक्षा के लिए बहुत पढ़ाई करनी पड़ती है. सेहत पर बुरा असर पड़ता है. सर्विस प्रोवाइडर एजेंसी में एडवांस बुकिंग कराना सही होगा. अभी औफर चल रहा है,’’ साहबजादे ने मुझे समझाया.

अपनी समझदानी थोड़ी छोटी है. पूरी बात समझ आने में थोड़ी देर लगी. अपनी संतान को 10वीं में नकल करने के लिए विशेषज्ञों द्वारा तैयार की गई स्पैशल चिटों की जरूरत होगी. मुझे इस संबंध में जानकारी कम थी.

‘‘वैज्ञानिक बनाने के लिए अच्छे कालेज में दाखिला दिलाना होगा. 10वीं कक्षा में अच्छे मार्क्स की जरूरत होगी,’’ वाइफ ने चिंता जताई. बच्चों को उन से झिझक नहीं थी. उन को सबकुछ पता था.

औलाद के भविष्य की चिंता मुझे भी थी. वैज्ञानिक बनने के लिए अच्छे कालेज में दाखिले की जरूरत भी थी. अच्छे कालेज में दाखिले के लिए कक्षा 10 में 90 प्रतिशत मार्क्स आने भी जरूरी थे.

परिवार के साथ मैं सर्विस प्रोवाइडर एजेंसी से मिला. उन से रेट्स और औफर्स की जानकारी ली.

‘‘साइंस के एक पेपर और मैथ्स के लिए 8 हजार रुपए तथा दूसरे पेपरों के लिए 5 हजार रुपए. हमारी एजेंसी प्रीमियर एजेंसी है. एडवांस बुकिंग में 25 प्रतिशत की छूट दी जा रही है. ये रेट केवल प्रश्नोत्तर चिट के लिए हैं. और हां, मिशन छिपकली के लिए डबल रेट से रुपए देने होंगे. इस के अलावा दूसरी सेवाएं तथा कौम्बो औफर भी हैं,’’ प्रीमियर एजेंसी के रिसैप्शन पर तैनात मैडम ने जानकारी दी.

‘‘यह मिशन छिपकली क्या बला है?’’ मैं ने पूछ ही लिया. वैसे कुछकुछ अंदाजा हो रहा था.

पिछले महीने मैं ने पाटलीपुत्र सुसंवाद समाचारपत्र में खबर पढ़ी थी कि ईस्टर्न इंडिया के महानगरों के चिडि़याघरों से बहुत ही खास प्रजाति की कुछ छिपकलियों की चोरी हो गई थी. ये प्रजातियां विलुप्त होने के कगार पर थीं. इस इमारत की दीवार पर कई मानव आकृतियां चिपकी थीं. मैं ने बाद में इस न्यूज को चश्मा लगा कर पढ़ा था.

‘‘मिशन छिपकली के अंतर्गत एजेंसी बहुमंजिली इमारतों में परीक्षार्थियों को स्पैशल चिट उपलब्ध कराती है. पुलिस, केंद्र अधीक्षक, न्यूजपेपर रिपोर्टर सब को मैनेज करना मुश्किल जौब है. मिशन छिपकली के लिए औनजौब ट्रेनिंग की जरूरत पड़ती है. भगदड़ में दुर्घटना भी हो जाती है. परीक्षा केंद्र ग्राउंडफ्लोर पर होने की हालत में भुगतान की गई रकम का 50 प्रतिशत लौटा दिया जाता है. अप्रत्याशित और कठिन परिस्थितियों के लिए 2 साल की वारंटी का प्रावधान रखा गया है,’’ रिसैप्शनिस्ट ने मुसकरा कर मिशन छिपकली के टैरिफ वाउचर्स का बखान किया.

हम ने शहर की दूसरी सर्विस प्रोवाइडर एजेंसियों से भी संपर्क किया. गोल्डन सर्विस एजेंसी में बालिकाओं के लिए फीस में 30 प्रतिशत की छूट का औफर था. लेकिन एजेंसी की बहुमंजिली सर्विस काफी महंगी थी.

बैस्ट सर्विस प्रोवाइडर ने रजिस्टर्ड परीक्षार्थियों के लिए शहरी इलाकों से परीक्षा केंद्रों तक ले जाने के लिए वीडियो सुविधायुक्त फ्री बस का औफर दिया था.

इन सभी एजेंसियों की शाखाएं राज्य के सभी छोटेबड़े शहरों में होने की भी जानकारी मिली. एजेंसीज ने प्रश्नोत्तर के लिए राजधानी व राज्य के दूसरे शहरों के नामीगिरामी स्कूलों के शिक्षकों व खास कोचिंग संस्थानों के विशेषज्ञों से भी अपने जुड़े होने की बात कही.

इस संपर्क मुहिम के दौरान कई दूसरी सर्विसेज की मौजूदगी के बारे में जाननेसमझने का मौका मिला. उन की सेवाओं की जानकारी मिली. कई खुलासे हुए. ये सुविधाएं परीक्षार्थियों, अभिभावकों के व्यापक हित में हैं, इस का भी ज्ञान हुआ.

मुझे इस उद्योग की पूरी जानकारी नहीं थी. मुझे पता नहीं था कि कभी शिक्षा का केंद्र रहे अपने पुराने शहर में कक्षा-10 स्पैशल चिट सप्लाई के धंधे ने बड़े कारोबार का दर्जा हासिल कर लिया है और इस कारोबार से बड़े घराने भी आकर्षित हो रहे हैं.

परीक्षाएं लंबे समय तक चलती हैं. इस दौरान खेलकूद, मूवी, मौजमस्ती, गेम्स, फेसबुक, चैटिंग, यारदोस्तों से गपें और सभी खिलंदड़ी व मनोरंजक गतिविधियां बंद हो जाती हैं. महीनों किताबों, नोट्स में घुसे रहने से बोरियत होती है. टैंशन से सेहत खराब हो जाती है. ऐसे में परीक्षाओं से जुड़ी सर्विसेज एजेंसियां हमारी आम दिनचर्या के साथसाथ ही कैरियर विकल्पों को आगे बढ़ाने में सहायक होती हैं.

इन सुविधाओं से गुप्तरूप से जुड़े शिक्षकों व सहायक कर्मियों को होने वाली कमाई, उन को कठिन हालात से उबारने में सहायक होती है. राज्य में शिक्षकों व कर्मचारियों के वेतन भुगतान की समस्या हमेशा बनी रहती है. त्योहार के महीनों में भी वेतन भुगतान नहीं हो पाता है. इस तरह सर्विस एजेंसीज उन की वित्तीय समस्याओं का समाधान भी करती हैं.

अभिभावक सर्विस एजेंसीज की बुकिंग के बाद बेफिक्र हो जाते हैं. उन्हें बहुमंजिली इमारतों पर छिपकली बन कर चिपकने से मुक्ति मिल जाती है. अच्छे कालेजों में दाखिले की राह आसान हो जाती है. शिक्षक उत्तरपुस्तिका पर, अपने द्वारा तैयार उत्तर पा कर, मार्क्स लुटाते हैं. एजेंसी विभिन्न कोलेजों व तकनीकी संस्थानों में ऐडमिशन भी दिलवाती है.

‘‘विशिष्ट संस्थानों में ऐडमिशन के लिए आप हमारी एजेंसी से संपर्क कर सकते हैं,’’ ब्राइट सर्विस एजेंसी की सुंदर रिसैप्शनिस्ट ने मुसकरा कर मुझे बताया.

कई स्रोतों से जानकारी मिली कि सर्विस एजेंसीज अपनी सीक्रेट सर्विस के तहत राष्ट्रीय स्तर व राज्य स्तर पर होने वाली प्रतियोगिता परीक्षाओं के प्रश्नपत्र, उत्तर के साथ उपलब्ध कराती हैं. प्रश्नपत्र लीक कराने के लिए कई वैज्ञानिक राजनीतिक हथियारों का इस्तेमाल किया जाता है. एडवांस बुकिंग कराने से पहले ठोकबजा कर पूरी तसल्ली करने की अपनी पुरानी आदत रही है. सो, मैं ने छानबीन की, कई एजेंसियों से जानकारी ली-

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‘‘हमारी एजेंसी एक सर्विस एजेंसी है. यह जनसुविधाएं मुहैया कराती है.’’

‘‘अभिभावकों के हितों की सुरक्षा का काम कर रहे हैं. उन के सपने पूरे हों, इस के लिए कोशिश जारी है.’’

‘‘हमारी इंडस्ट्री बेरोजगारों को रोजगार देती है.’’

‘‘लंबे समय तक पूरी रात किताबों से चिपके रहने से गरदन अकड़ जाती है. ओनली बुक्स ऐंड नो प्ले मेक्स पप्पू ए डल बौय इस का हमारे पास कारगर इलाज है.’’

‘‘नाकामी से जूझते हुए बच्चे कई बार गलत फैसले भी ले लेते हैं. हमारी एजेंसी उन्हें कामयाबी दिलाने का काम करती है.’’

अब मुझे पूरी तसल्ली हो चुकी थी. स्पैशल चिट बनाना, बहुमंजिली इमारतों की दीवार से चिपकना मेरे बूते से बाहर की बात थी. लंबी पढ़ाई और अपनी रोजमर्रा से लंबी जुदाई बच्चों के लिए तकरीबन नामुमकिन था. मिशन छिपकली मुझे जंच रही थी. Exam Cheating

Hindi Kahani: संकट मोचन

Hindi Kahani: ‘यहां सब की इच्छा पूरी होती है.’ आजकल भगवानों में कारोबारी होड़ लगी हुई है. सब ने एक ऐसा स्लोगन ढूंढ़ निकाला है, जो आम आदमी को अपनी तरफ खींचता है. कहते हैं कि यहां सब की इच्छा पूरी होती है… और इस में कोई शक भी नहीं कि ज्यादातर लोगों की इच्छाएं पूरी होती हैं. 90 से 95 फीसदी तक, पर वे कैसे पूरी होती हैं? क्या यह किसी बाबा या भगवान का चमत्कार है या जो चंदा हम उस द्वार पर चढ़ाते हैं या फिर कोई मनोविज्ञान?

पहले तो हमें यह देखना होगा कि हम मांग क्या रहे हैं? मान लीजिए कि एक गरीब आदमी के पास एक टूटी हुई साइकिल है, जो रोजाना वर्कशौप में ही खड़ी रहती है. वह भगवान से एक साइकिल मांगता है और कहता है कि पुरानी ही देदे भगवान, बस रोजाना वर्कशौप ठीक कराने न जाना पड़े. एक इनसान के पास एक ठीक सी साइकिल है, पर थोड़ी पुरानी हो गई है, वह भगवान से एक नई साइकिल की इच्छा रखता है.
एक इनसान, जिस के पास साइकिल है और 10-12 हजार रुपए हैं, वह एक पुराने स्कूटर या पुरानी मोटरसाइकिल की इच्छा रखता है और जिस के पास पुराना दोपहिया है, वह एक नए दोपहिया के लिए प्रार्थना करता है.

ठीकठाक दोपहिए वाला एक पुरानी कार की इच्छा रखता है और पुरानी कार वाला एक नई कार की. और इसी तरह एक छोटी कार वाला एक बड़ी कार की. कोई लड़का या लड़की अच्छे कालेज में दाखिले की, फिर अच्छी नौकरी की. कोई बहनबेटी की शादी की. खतरनाक बीमारी हो गई है, तो उस के ठीक होने की. सड़क पर सोता होगा तो ?ाग्गी की और ?ाग्गी में सोता होगा तो एक किराए के कमरे की, किराए के 3 कमरे हों तो  अपना हो जाए चाहे एक ही हो. और अगर एक कमरा है तो 2 कमरे, 2 हों तो 3 कमरे… और इन में से ज्यादातर लोगों की तमन्ना पूरी हो जाती है. किसी गरीब आदमी की ?ाग्गी की छत बहुत ठीक न होने के चलते उस में बारिश में पानी टपकता है या सर्दीगरमी में ठंड और गरमी लगती होगी, तो वह भगवान से यही कहता होगा कि कुछ पैसे आ जाएं, तो मैं छत ठीक करवा लूं.

क्यों और कैसे यह इच्छा पूरी होती है, क्योंकि वह भक्त अपनी इच्छा पूरी करने के काफी करीब है, वह उस को पाने वाला ही है, कोशिश तो वह कर ही रहा है और वह अपनी इच्छा पूरी करने में सक्षम है और उस की इच्छा बहुत बड़ी भी नहीं है. टूटी हुई साइकिल वाले के लिए पुरानी ठीक साइकिल, पुरानी ठीक साइकिल वाले के लिए नई साइकिल और नई साइकिल वाले के लिए पुराना स्कूटर, पुराने स्कूटर वाले के लिए नया स्कूटर और नए स्कूटर वाले के लिए पुरानी कार और पुरानी कार वाले के लिए नई कार और छोटी कार वाले के लिए बड़ी कार की इच्छा पूरी होने की बहुत ज्यादा उम्मीद रहती है. सड़क पर सोने वाले के लिए ?ाग्गी, ?ाग्गी वाले के लिए किराए के कमरे की इच्छा पूरी होने की बहुत ज्यादा उम्मीद रहती है. ये सब लोग अपने मकसद के बहुत करीब हैं.

बहनबेटी का ब्याह भी हो ही जाएगा, चाहे जो भी लड़का मिलेगा. बेटेबेटी का भी कालेज में दाखिला होगा और कहीं न कहीं नौकरी भी लग ही जाएगी. शुरू में कम और बाद में ज्यादा तनख्वाह की नौकरी लग जाएगी. आज के हालात और इच्छा में आर्थिक अंतर जितना कम होगा, उतनी ही इच्छा पूरी होने की उम्मीद ज्यादा और जल्दी रहेगी. जितना अंतर ज्यादा होगा, उतना समय ज्यादा लगेगा और उम्मीद कम हो जाएगी या फिर उस इच्छा को पूरा करने के लिए गलत रास्ता अपनाना होगा. अगर टूटी हुई साइकिल का मालिक एक नई मोटरसाइकिल की इच्छा करने लगे तो उस की उम्मीद कम हो जाएगी और इच्छा पूरी हुई तो बहुत ज्यादा समय लगेगा. अगर एक किराए के कमरे में रहने वाला कोठी की तमन्ना करने लगे तो
उस की उम्मीद बहुत कम हो जाएगी और हो सकता है कि एक पीढ़ी भी पार कर जाए.

एक आदमी जिस के पास साइकिल है और 10-12 हजार रुपए हैं, तो सम?ों कि आप की इच्छाएं कैसे पूरी हो रही हैं. गांव के लोगों की इच्छाएं पूरी नहीं होतीं, क्योंकि उन की इच्छाएं होती ही नहीं हैं. इच्छाएं क्यों नहीं होतीं, क्योंकि उन की जेब में पैसे ही नहीं हैं. वे किसी भी इच्छा को पूरा करने में सक्षम नहीं हैं, इसलिए वे भगवान के द्वार अपनी अर्जी नहीं लगाते हैं. मु?ो ऐसे फोन आते हैं कि आप लक्ष्मी, हनुमान, गणेश किसी एक का लौकेट खरीद लें, जो ओरिजनल है (बाजार में डुप्लीकेट भी हैं), आप की सब इच्छाएं पूरी हो जाएंगी और आप के घर लक्ष्मी बरसेगी. कीमत मात्र 3,000 रुपए. मैं ने उस से कहा कि मु?ो 100 लौकेट दे दें, लेकिन मैं अभी पैसे नहीं दूंगा. मैं  उन को भारत के किसी गरीब गांव में जा कर बांट दूंगा और एक साल बाद जा कर देखूंगा कि कितने लोगों के घर लक्ष्मी बरसी है.

अगर उन में से 50 फीसदी लोग भी अमीर (पेटभर पौष्टिक भोजन, बच्चों को पढ़ाईलिखाई, कपड़े, बड़ों को स्कूटर) हो गए होंगे, तो मैं आप को 6,000 के हिसाब से 3 लाख के बदले 6 लाख दूंगा. इस के बाद से उस का फोन आना बंद हो गया यानी कोई चमत्कार, बाबा या भगवान कुछ नहीं कर रहा. आप ही कर रहे हैं.
एक स्लोगन है कि ‘भगवान उन की सहायता करता है, जो अपनी सहायता स्वयं करते हैं’ तो फिर भगवान क्या करता है? यानी मु?ो ही कुछ करना है और मैं कर भी रहा हूं, तभी तो मेरी समस्याएं दूर हो रही हैं.
भगवान, अल्लाह, गौड से मेरा मतलब सर्वशक्तिमान यानी सुपर पावर से है.   Hindi Kahani

Press Release: पटना में सजेगा भोजपुरी सिनेमा का महोत्सव

Press Release: 7वां सरस सलिल भोजपुरी सिने अवॉर्ड्स समारोह का 15 मार्च, 2026 को पटना के बापू सभागार में*

पटना: भोजपुरी सिनेमा के प्रतिष्ठित और बहुप्रतीक्षित 7वें सरस सलिल भोजपुरी सिने अवॉर्ड्स शो का आयोजन 15 मार्च को सायं 6 बजे से बिहार की राजधानी पटना के ऐतिहासिक बापू सभागार में किया जाएगा। यह समारोह भोजपुरी फिल्म उद्योग के लिए एक बड़े सांस्कृतिक उत्सव के रूप में देखा जा रहा है, जिसमें सिनेमा जगत की नामचीन हस्तियां शिरकत करेंगी।

इस संबंध में पटना स्थित आई.एम. ए. हाल में आयोजित प्रेस वार्ता में जानकारी देते हुए दिल्ली प्रेस में सरस सलिल के इंचार्ज भानु प्रकाश राणा ने बताया कि यह अवॉर्ड शो अब बिहार की राजधानी पटना में हो रहा है, जो एक नए अध्याय की शुरुआत है. इस बार इसे और भव्य और बड़े स्तर पर किया जाएगा और दर्शकों के लिए यह मनोरंजन का शानदार अनुभव रहेगा।

भानु प्रकाश राणा ने बताया कि इस अवॉर्ड शो में नामांकित फिल्मों और कलाकारों को जूरी द्वारा चयनित कर विभिन्न श्रेणियों में सम्मानित किया जाएगा। कार्यक्रम के दौरान रंगारंग सांस्कृतिक प्रस्तुतियां, लाइव म्यूजिकल परफॉर्मेंस और स्टार नाइट मुख्य आकर्षण रहेंगे।

*डिजिटल युग के साथ बदला अवॉर्ड शो का स्वरूप*
भोजपुरी सिनेमा में अपनी जबरदस्त कॉमेडी के जरिए हंसाने वाले अभिनेता रोहित सिंह मटरू ने बताया इस वर्ष के आयोजन की सबसे बड़ी विशेषता इसका परिवर्तित फॉर्मेट है। बदलते समय और डिजिटल प्लेटफॉर्म के विस्तार को ध्यान में रखते हुए इस बार अवॉर्ड शो को तीन प्रमुख वर्गों में बांटा गया है—सिनेमा (थिएटर रिलीज फिल्में), ओटीटी प्लेटफॉर्म और यूट्यूब/टीवी कंटेंट के आधार पर बेस्ट अवॉर्ड्स दिए जाएंगे। आयोजन समिति से जुड़े बृहस्पति कुमार पांडेय ने बताया कि भोजपुरी कंटेंट अब केवल सिनेमाघरों तक सीमित नहीं है, बल्कि ओटीटी और डिजिटल माध्यमों के जरिए विश्वभर में देखा जा रहा है। ऐसे में इन प्लेटफॉर्म पर कार्य करने वाले कलाकारों और तकनीशियनों को समान मंच देना समय की आवश्यकता है।

*2020 से शुरू हुआ सम्मान का यह सिलसिला*

सरस सलिल भोजपुरी सिने अवॉर्ड्स शो की शुरुआत वर्ष 2020 में बस्ती जिले से हुई थी जिसका उद्देश्य था भोजपुरी सिनेमा को एक व्यवस्थित और प्रतिष्ठित मंच प्रदान करना। लोकप्रिय पत्रिका सरस सलिल द्वारा शुरू की गई इस पहल ने कुछ ही वर्षों में भोजपुरी फिल्म उद्योग में अपनी विशेष पहचान बना ली।
इसके बाद अयोध्या में 3 बार, बस्ती में 2 बार, इसका आयोजन हुआ था। लगातार इस आयोजन की भव्यता और सहभागिता में वृद्धि होती गई।

*लखनऊ में हुआ था छठा भव्य आयोजन*
पिछले वर्ष ‘छठा सरस सलिल भोजपुरी सिने अवॉर्ड्स’ शो का आयोजन लखनऊ के प्रतिष्ठित इंदिरा गांधी प्रतिष्ठान में हुआ था। यह अब तक का सबसे बड़ा और व्यवस्थित समारोह माना गया।
उस समारोह में 50 से अधिक श्रेणियों में पुरस्कार प्रदान किए गए। बेस्ट फिल्म, बेस्ट अभिनेता, बेस्ट अभिनेत्री, बेस्ट निर्देशक, बेस्ट सिंगर, बेस्ट म्यूजिक डायरेक्टर और लाइफटाइम अचीवमेंट जैसी प्रमुख श्रेणियों में कलाकारों को सम्मानित किया गया।

अब तक हुए अवॉर्ड समारोह में यह अवॉर्ड दिनेशलाल यादव ‘निरहुआ’, अरविंद अकेला ‘कल्लू’, प्रदीप पांडे ‘चिंटू’, अंजना सिंह, आम्रपाली दुबे, ऋचा दीक्षित, संजय पांडेय, देव सिंह, अवधेश मिश्रा, रक्षा गुप्ता, मनोज टाइगर, प्रियंका सिंह, सीपी भट्ट, संजय कुमार श्रीवास्तव,विजय खरे, केके गोस्वामी, शुभम तिवारी, माही खान, मनोज भावुक, प्रसून यादव, कविता यादव, अनुपमा यादव, अंतरा सिंह ‘प्रियंका’, समर सिंह, सहित कई नामचीन एक्टरों को मिल चुका है।

पिछले वर्ष लखनऊ में हुए अवॉर्ड शो में लोकप्रिय अभिनेता अरविंद अकेला ‘कल्लू’, अभिनेत्री अंजना सिंह, निर्देशक रजनीश मिश्रा सहित कई चर्चित हस्तियों को उनके उत्कृष्ट कार्य के लिए सम्मान मिला। समारोह में बड़ी संख्या में दर्शकों और मीडिया की उपस्थिति ने इसे ऐतिहासिक बना दिया।

*इस बार पटना में और भी भव्य तैयारी*
अभिनेता और गायक विवेक पांडेय ने पटना में आयोजित हो रहे सातवें संस्करण को और भी भव्य और आकर्षक बनाने की तैयारी की गई है। रेड कार्पेट एंट्री, सेलिब्रिटी इंटरैक्शन, लाइव डांस परफॉर्मेंस और विशेष सांस्कृतिक कार्यक्रमों के जरिए इसे यादगार बनाने की योजना है।
भोजपुरी सिनेमा के चर्चित सितारे, निर्माता-निर्देशक, संगीतकार, गायक और तकनीकी विशेषज्ञ इस समारोह में भाग लेंगे। आयोजकों का कहना है कि यह मंच केवल सितारों को सम्मानित करने तक सीमित नहीं है, बल्कि पर्दे के पीछे काम करने वाले तकनीकी कलाकारों को भी बराबर की पहचान देता है।

*क्षेत्रीय सिनेमा को नई ऊंचाई*
आयोजकों ने बताया कि सरस सलिल भोजपुरी सिने अवॉर्ड्स शो का मुख्य उद्देश्य भोजपुरी फिल्म उद्योग के प्रतिभाशाली कलाकारों और तकनीशियनों को प्रोत्साहित करना तथा क्षेत्रीय सिनेमा को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाना है।
भोजपुरी सिनेमा ने पिछले कुछ वर्षों में कंटेंट, तकनीक और प्रस्तुति के स्तर पर उल्लेखनीय प्रगति की है। डिजिटल प्लेटफॉर्म के विस्तार के साथ इसकी पहुंच देश-विदेश तक बढ़ी है। ऐसे में यह अवॉर्ड समारोह उद्योग को एक सकारात्मक प्रतिस्पर्धा और गुणवत्ता की दिशा में प्रेरित करता है।

*सिने प्रेमियों से अपील*
आयोजन समिति ने पटना और आसपास के जिलों के सिने प्रेमियों से अधिक से अधिक संख्या में उपस्थित होकर इस भव्य समारोह की शोभा बढ़ाने की अपील की है। जब बापू सभागार में रोशनी, कैमरा और तालियों की गूंज होगी, तब यह केवल कलाकारों का सम्मान नहीं बल्कि पूरी भोजपुरी संस्कृति का उत्सव होगा।

7वां सरस सलिल भोजपुरी सिने अवॉर्ड्स शो एक बार फिर यह साबित करने जा रहा है कि भोजपुरी सिनेमा अब क्षेत्रीय दायरे से निकलकर राष्ट्रीय और वैश्विक मंच पर अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज करा रहा है।

दिल्ली प्रेस पिछले 86 वर्षों से भारत का एक अग्रणी प्रकाशन समूह रहा है और इसकी 9 भाषाओं में प्रकाशित होने वाली 30 पत्रिकाओं के जरिए देश-भर के पाठकों तक सीधी पहुंच है। हमारे यहां देश की सबसे ज्यादा पढ़ी जाने वाली हिंदी पत्रिकाओं ‘सरिता’, ‘गृहशोभा’, ‘चंपक’, ‘सरस सलिल’, ‘मुक्ता’, मनोहर कहानियां’, ‘सत्यकथा’ का निरंतर सफल प्रकाशन किया जा रहा है, जिन्हें करोड़ों पाठक बड़े चाव से पढ़ते हैं।

दिल्ली प्रेस समूह की ‘सरस सलिल’ पत्रिका वर्ष 1993 से निरंतर प्रकाशित हो रही है और आमजन को जानकारी देने के साथ-साथ उनका मनोरंजन भी कर रही है।

Short Story: एक मुलाकात जिन्ना से

Short Story. मोहम्मद अली जिन्ना, जिन को पाकिस्तान का संस्थापक होने का श्रेय दिया जाता है, अब इस दुनिया में नहीं हैं. जाहिर है उन से मुलाकात तो अब सिर्फ सपने में ही हो सकती है. चलिए ऐसा ही एक सपना एक दिन मैं ने भी देख लिया. सपने में मैं ने देखा कि मैं जिन्ना का इंटरव्यू ले रहा हूं.

राजनेता वैसे भी इंटरव्यू देने में बड़े उतावले व कुशल होते हैं. खुद का अधिक से अधिक प्रचार व सत्ता की प्राप्ति ही उन के जीवन का इकलौता ध्येय होता है. जिन्ना कोई साधारण राजनेता नहीं थे, वे आजादी के लिए संघर्ष करने वाले योद्धा थे. कोई एक व्यक्ति ही नए राष्ट्र के निर्माण का सारा श्रेय ले जाए, ऐसा उदाहरण विश्व इतिहास में विरला है. जिन्ना साहब ने यही श्रेय प्राप्त किया है.

मेरे मन में मुख्य प्रश्न तो यही था कि यदि इस पृथ्वी पर धर्म जैसी कोई चीज नहीं होती तो क्या जिन्ना जिन्ना होते या कुछ और होते? माना, जिन्ना ने देश के 2 टुकड़े किए लेकिन जिस चाकू से उन्होंने 2 टुकड़े किए वह चाकू तो धर्म का ही था. सदियों से इनसान समझ नहीं पाया है कि धर्म जोड़ने का काम करता है या तोड़ने का. धर्म को ले कर इनसान इतना टची क्यों है? खैर, यहां आप के लिए पेश हैं उस काल्पनिक इंटरव्यू के कुछ अंश :

जिन्ना साहब, आप हमेशा हौट रहे हैं. आप उन राजनेताओं में हैं जो हमेशा हौट डिमांड में रहते हैं. आप इस समय भी बड़ी चर्चा में हैं. आप को चर्चा में लाने वाले हैं जसवंत सिंह. आप जिन्ना और वे जसवंत. मजे की बात यह है कि वे एक ऐसे राजनीतिक दल के सदस्य रहे हैं जो धर्म की बैसाखियों के सहारे ही चलता रहा है. जसवंत ने बड़ी कुशलता से अपने विचारों को वर्षों छिपा कर रखा और अब जब उन्होंने उन विचारों को जाहिर किया तो उन के दल ने उन्हें बाहर निकाल दिया.

हूं हूं. राजनीति कुछ ऐसी ही होती है. एक समय सुभाष चंद्र बोस को भी कांगे्रस छोड़ कर जाना पड़ा था.

आप को यह जान कर खुशी होगी कि जसवंत ने आप को एक महान भारतीय बताया है?

इनसानों पर लेबल लगाना हमेशा से समाज का काम रहा है. किसी पर वह भगवान होने का लेबल लगाता है तो किसी पर शैतान होने का लेबल लगाता है. हिंदूमुसलमान के लेबल भी तो समाज ही लगाता है, कोई अपनी मां के पेट से तो हिंदूमुसलमान हो कर आता नहीं है. दूसरे इनसानों की तरह मैं भी सिर्फ एक इनसान ही हूं.

(आश्चर्य से) जिन्ना साहब, यह आप कह रहे हैं?

यकीन रखो, मैं अब बहुत बदल चुका हूं. मैं वह नहीं हूं जो कभी पहले था. गांधी भी आज होते तो वही नहीं होते जो वे 1948 में थे. इनसान निरंतर बदलता रहता है, समय व समाज भी निरंतर बदलते रहते हैं. बौद्ध ठीक कहते हैं कि सत्य परिवर्तनशील है.

आप की बातों से मेरा आश्चर्य बढ़ता है. इन दिनों मैं ने आप पर दर्जनों लेख समाचारपत्रपत्रिकाओं में पढ़े हैं. ये लेख स्वनामधन्य, नामीगिरामी लेखकों द्वारा लिखे गए हैं. सब पढ़ कर भी कुछ हाथ नहीं लगा. और तो और यह भी पता नहीं लगा कि जिन्ना साहब नायक हैं या खलनायक, और न ही यह पता चला कि देश का बंटवारा क्यों हुआ. क्या आप बता सकते हैं कि देश का बंटवारा क्यों हुआ?

देश का बंटवारा हुआ, इस बारे में हम कह सकते हैं कि पहली बार 2 आधुनिक राष्ट्रों के रूप में भारत व पाकिस्तान का गठन हुआ. 540 रियासतों को एक कर पहली बार भारत देश बना. वरना तो यह भूभाग हजारों वर्षों से छोटेछोटे राजामहाराजाओं के कब्जे में रहा है. मैं ने भी पाकिस्तान के रूप में एक आधुनिक देश के निर्माण का प्रयास किया. यह अलग बात है कि वह आधुनिक राष्ट्र नहीं बन पाया. अब तो पाकिस्तान तालिबानीकरण का शिकार हो गया है. न जाने मेरे सपने का क्या होगा?

इस देश के लोग हमेशा से धर्म व जाति के नाम पर बंटे हुए थे. देश का बंटवारा क्यों हुआ यह पूछने से पहले यह पूछो कि देश गुलाम क्यों हुआ? हजारों साल से यह देश गुलाम था. देश का गुलाम होना, आजाद होना, देश का बंटवारा होना, ये सब एक लंबी ऐतिहासिक प्रक्रिया का हिस्सा हैं.

1971 में तो देश फिर एक बार टूटा. पाकिस्तान व भारत पर आज भी विभाजन का खतरा ज्यों का त्यों बना हुआ है. लोग धर्म, जाति, भाषा, क्षेत्र आदि के नाम पर दिनरात लड़ रहे हैं. बंटवारे के लिए किसी एक व्यक्ति को दोषी नहीं ठहराया जा सकता है. पूरा देश व पूरा समाज इस के लिए जिम्मेदार था.

मैं पूछता हूं कि 1947 में मुझ जिन्ना के सिवा शेष 40 करोड़ लोग क्या कर रहे थे. यदि मैं देश को तोड़ने में लगा था तो उन्होंने मेरा हाथ क्यों नहीं पकड़ा? उन्होंने मुझ को उठा कर गटर में क्यों नहीं डाल दिया? अपने को धोखा न दो, बंटवारे के लिए उस समय मौजूद देश का हर नागरिक जिम्मेदार था. हां, मेरी जिम्मेदारी दूसरों से कुछ ज्यादा हो सकती है.

जिन्ना साहब, आप तो धर्मवादी नहीं थे. धर्म ने एकता के नाम पर हमेशा लोगों को विभाजित किया है. आप का निजी जीवन तो धर्म से लगभग मुक्त था. फिर क्यों आप ने अपनी राजनीति को आगे बढ़ाने के लिए धार्मिक विभाजन की बैसाखियों का सहारा लिया?

मजेदार बात यह है कि मैं, नेहरू व पटेल तो शुद्ध राजनेता थे. हम में से किसी को भी साधु होने का शौक नहीं था. केवल गांधी ही कभी यह तय नहीं कर पाए कि उन्हें साधु होना है या राजनीति करनी है. उन का जीवन एक घालमेल बन गया. राजनेता हर हाल में सत्ता पाना चाहता है. लेकिन समाज द्वारा थोपे गए आदर्शों के कारण उसे हिप्पोक्रेट बनना पड़ता है.

मैं भी अपने समय का शीर्षस्थ नेता होना चाहता था लेकिन 1915 में गांधी ने अफ्रीका से आ कर मेरे सपनों को तोड़ना शुरू कर दिया. पटेल व नेहरू तो उन के अनुयायी हो गए. मेरे लिए यह संभव नहीं था. उन्होंने सार्वजनिक जीवन में जिस तरह धर्म का उपयोग शुरू किया उस का मुकाबला भी मैं किसी प्रकार नहीं कर सकता था. राजनेता के लिए लोकप्रियता उस का जीवन रस है. आखिर एक समय भगतसिंह का अपने बराबर लोकप्रिय हो जाना गांधी को भी रास नहीं आया था.

राजनीति में अपनी महत्त्वाकांक्षा पूरी करना बुरी बात नहीं समझी जाती है. चाणक्य ने भी साम, दाम, दंड, भेद की बात की है. हजारों वर्षों से राजा, राजनेता अपने स्वार्थ, अपनी महत्त्वाकांक्षा के लिए राज्यों को बनाते व तोड़ते आए हैं. इसलिए मैं न तो ऐसा पहला व्यक्ति हूं और न ही अंतिम. हां, आज मुझे यह लगता है कि मैं ने धर्म व राजनीति की जगह इनसानियत को तरजीह दी होती तो बेहतर होता.

तो आप विभाजन में अपनी जिम्मेदारी स्वीकारते हैं?

जितनी मेरी थी उतनी स्वीकारता हूं. उस से ज्यादा जिम्मेदारी मुझ पर मत थोपें.

कुछ लोग यह सपना देखते हैं कि भारत, पाकिस्तान व बंगलादेश फिर एक हो जाएं. क्या आप भी ऐसा सोचते हैं?

उस से क्या होगा? एक हो भी गए तो क्या होगा? जो हाल अभी इन 3 देशों का है एक होने पर भी वही हाल बना रहेगा. भ्रष्टाचार, सांप्रदायिकता, वोटों की राजनीति, कमजोरों और दलितों पर अत्याचार, पैसे की ताकत का नंगा नाच, स्त्रियों से बलात्कार आदि मामलों में एक होने से हालात कुछ बदल नहीं जाएंगे.

धर्मों ने हमेशा एकतासमानता की बातें की हैं, लेकिन वे कभी एकता- समानता ला नहीं पाए हैं. सच तो यह है कि हर नए धर्म ने विश्व को एक नया विभाजन दिया है. एक ही धर्म के मानने वाले लोग भी कभी आपस में एकतासमानता को स्थापित नहीं कर सके तो अन्य धर्मावलंबियों के साथ तो एकतासमानता की बात ही व्यर्थ है.

शायद वैश्विक एकता की बात वे लोग करते हैं जो दूसरों पर शासन करने को उत्सुक होते हैं. बगैर लोगों को संगठित किए नेता बना नहीं जा सकता है. यदि विश्व सरकार स्थापित हो जाए तो एक राजनेता पूरे विश्व पर शासन कर सकता है. यदि विश्व के सब नागरिक हिंदू हो जाएं तो एक हिंदू धर्मगुरु पूरे विश्व पर शासन कर सकता है. इसी तरह यदि सब मुसलमान एक हो जाएं तो एक मुसलमान धर्मगुरु सब पर शासन कर सकता है. बुरा होगा वह दिन जब एक ही व्यक्ति या एक ही दल का शासन पूरे विश्व पर होगा.

राजनेता हो या धर्मगुरु, कोई भी आखिरी सांस तक अपनी सत्ता छोड़ना नहीं चाहता है. जनता मजबूर कर दे तो बात अलग है.

खेद व्यक्त करता हूं जिन्ना साहब कि आप का इंटरव्यू करतेकरते मैं अपने विचार व्यक्त करने लग गया.

खैर, आप आज के युवकों को कोई संदेश देना चाहते हैं?

मेरा कोई संदेश नहीं है. हजारों वर्षों में धर्मगुरुओं, विचारकों ने हजारों व्यर्थ धारणाओं, आदर्शों को गढ़ा है. हमें इस जाल को काट फेंकना है. इनसान को धर्म व राजनीति की जकड़ से छुड़ाना है. Short Story.

Hindi Family Story: अपना अपना वनवास – क्या थी अकेलेपन की समस्या

Hindi Family Story: एक बड़े महानगर से दूसरे महानगर में स्थानांतरण होने के बाद मैं अपने कमरे में सामान जमा रही थी कि दरवाजे की घंटी बजी.

‘‘कौन है?’’ यह सवाल पूछते हुए मैं ने दरवाजा खोला तो सामने एक अल्ट्रा माडर्न महिला खड़ी थी. मुझे देख कर उस ने मुसकरा कर कहा, ‘‘गुड आफ्टर नून.’’

‘‘कहिए?’’ मैं ने दरवाजे पर खड़ेखड़े ही उस से पूछा.

‘‘मेरा नाम बसंती है. मैं यहां ठेकेदारी का काम करती हूं,’’ उस ने मुझे बताया. लेकिन ठेकेदार से मेरा क्या रिश्ता…यहां क्यों आई है? ऐसे कई सवाल मेरे दिमाग में आ रहे थे. मैं कुछ पूछती उस के पहले ही उस ने कहना जारी रखते हुए बताया, ‘‘आप को किसी काम वाली महिला की जरूरत हो तो मैं उसे भेज सकती हूं.’’

मैं ने सोचा चलो, अच्छा हुआ, बिना खोजे मुझे घर बैठे काम वाली मिल रही है.

मैं ने कहा, ‘‘जरूरत तो है…’’ पर मेरा वाक्य पूरा भी नहीं हुआ था कि वह कहने लगी, ‘‘बर्तन साफ करने के लिए, झाडू़ पोंछा करने के लिए, खाना बनाने के लिए, बच्चे संभालने के लिए…आप का जैसा काम होगा वैसी ही उस की पगार रहेगी.’’

मैं कुछ कहती उस से पहले ही उस ने फिर बोलना शुरू किया, ‘‘उस की पगार पर मेरा 2 प्रतिशत कमीशन रहेगा.’’

‘‘तुम्हारा कमीशन क्यों?’’ मैं ने पूछा.

‘‘हमारा रजिस्टे्रेशन है न मैडम, जिस काम वाली को हम आप के पास भेज रहे हैं उस के द्वारा कभी कोई नुकसान होगा या कोई घटनादुर्घटना होगी तो उस की जिम्मेदारी हमारी होगी,’’ उस ने मुझे 2 प्रतिशत कमीशन का स्पष्टीकरण देते हुए बताया.

‘‘यहां तो काम…’’

‘‘बर्तन मांजने का होगा, आप यही कह रही हैं न,’’ उस ने मेरी बात सुने बिना पहले ही कह दिया, ‘‘मैडम, कितने लोगों के बर्तन साफ करने होंगे, बता दीजिए ताकि ऐसी काम वाली को मैं भेज सकूं.’’

‘‘तुम ने अपना नाम बसंती बताया था न?’’

‘‘जी, मैडम.’’

‘‘तो सुनो बसंती, मेरे घर पर बर्तन मांजने, पोंछने वाली मशीन है.’’

‘‘सौरी मैडम, कपड़े साफ करने होंगे? तो कितने लोगों के कपड़े होंगे? मुझे पता चले तो मैं वैसी ही काम वाली जल्दी से आप के लिए ले कर आऊं.’’

‘‘बसंती, तुम गजब करती हो. मुझे मेरी बात तो पूरी करने दो,’’ मैं ने कहा.

‘‘कहिए, मैडमजी.’’

‘‘मेरे घर पर वाशिंग मशीन है.’’

‘‘फिर आप को झाड़ ूपोंछा करने वाली बाई चाहिए…है न?’’

‘‘बिलकुल नहीं.’’

उस ने यह सुना तो उसे बहुत आश्चर्य हुआ. कहने लगी, ‘‘कपड़े धोने वाली नहीं, बर्तन मांजने वाली नहीं,

झाड़ू पोंछे वाली नहीं, तो फिर मैडमजी…’’

‘‘क्योंकि मेरे घर पर वेक्यूम क्लीनर है, बसंती.’’

‘‘फिर खाना बनाने के लिए?’’ उस ने हताशा से अंतिम आशा का तीर छोड़ते हुए पूछा.

‘‘नो, बसंती. खाना बनाने के लिए भी नहीं, क्योंकि मैं पैक फूड लेती हूं और आटा गूंथने से ले कर रोटी बनाने की मेरे पास मशीन है,’’ मैं ने विजयी मुसकान के साथ कहा.

उस के चेहरे पर परेशानी झलकने लगी थी. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर इस नए घर से उसे 2 प्रतिशत की आमदनी होने वाली थी उस का क्या होगा.

उस ने हताशा भरे स्वर में कहा, ‘‘मैडमजी, मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा है कि जब सबकुछ की मशीन आप के पास है तो आखिर आप को काम वाली महिला क्यों चाहिए? उस का तो कोई उपयोग है ही नहीं.’’

मुझे भी हंसी आ गई थी. मुझे हंसता देख कर उस की उत्सुकता और बढ़ गई. उस ने बडे़ आदर के साथ पूछा, ‘‘मैडमजी, बताएं तो फिर वह यहां क्या काम करेगी?’’

कुछ देर चुप रही मैं. उस ने अंतिम उत्तर खोज कर फिर कहा, ‘‘समझ गई.’’

‘‘क्या समझीं?’’

‘‘घर की रखवाली के लिए चाहिए?’’

‘‘नहीं.’’

‘‘बच्चों की देखरेख के लिए?’’

‘‘नो, बसंती. मैं ने अभी शादी भी नहीं की है.’’

‘‘तो मैडमजी, फिर आप ही बता दें, आप को काम वाली क्यों चाहिए?’’

अब मैं ने उसे बताना उचित समझा. मैं ने कहा, ‘‘बसंती, पिछले दिनों मैं दिल्ली में थी और आज नौकरी के चक्कर में बंगलौर में हूं. मुझे अच्छी पगार मिलती है. मेरा दिन सुबह 5 बजे से शुरू होता है और रात को 11 बजे तक चलता रहता है. मेरी सहेली कंप्यूटर है. मेरे रिश्तेदार सर्वे, डाटा, प्रोजेक्ट रिपोर्ट हैं. सब सिर्फ काम ही काम है. मेरे घर में सब मशीनें हैं. मुझे एक महिला की जरूरत है जो मेरे खाली समय में मुझ से बातचीत कर सके. मुझे इस बात का एहसास कराती रहे कि मैं भी इनसान हूं. मैं भी जिंदा हूं. मैं मशीन नहीं… समाज का अंग हूं.’’

मैं ने उसे विस्तार से अपनी पीड़ा बताई. मेरी बात सुन कर वह ठगी सी रह गई. उस ने आगे बढ़ कर मुझ से कहा, ‘‘मैडमजी, आप को ऐसी काम करने वाली महिला मैं भी नहीं दिला पाऊंगी,’’ कह कर वह कमरे से निकल गई.

मुझे लगा कि सब को अपनेअपने एकांत का वनवास खुद ही भोगना होता है. मैं फिर अपने कमरे का सामान जमाने में लग गई. Hindi Family Story

Hindi Story : मिसेज चोपड़ा, मीडिया और न्यूज

Hindi Story : लंबा कद, गोरा रंग, सलीके से   बंधा हुआ जूड़ा, कलफ लगी बढि़या सूती साड़ी और साड़ी के रंग से मेल खाते गहने पहने मिसेज चोपड़ा पूरे दफ्तर में अलग ही दिखती थीं. मैं जिस दफ्तर में काम करती थी वहां काम कम ही होता था. यों समझ लीजिए, अकसर लोग गरमगरम चाय और गरमागरम बहस से टाइम पास करते थे. कुछ ही दिनों में दफ्तर का यह माहौल देखदेख कर मेरा धैर्य जवाब दे गया.

मैं ने अपने एन.जी.ओ. के कोआर्डिनेटर से एक दिन बातों ही बातों में पूछ लिया, ‘‘यह मिसेज चोपड़ा मुझे आफिस में सब से अलग दिखती हैं, यह कैसा काम करती हैं. मैं अभी नई हूं इसलिए इन के बारे में ज्यादा जानती नहीं हूं.’’

सामने बैठे मिस्टर शर्मा बोले, ‘‘यह यहां पी.आर.ओ. के पद पर हैं. पब्लिक और प्रेस से डीलिंग करना ही इन का काम है. यह किसी मजबूरी में नौकरी नहीं कर रही हैं. मिसेज चोपड़ा जैसी हाइक्लास सोसाइटी की औरतें जब अपनी किटी पार्टियों से बोर हो जाती हैं और उन्हें अपना समय बिताना होता है तो वे किसी एन.जी.ओ. से जुड़ जाती हैं. समय भी बीत जाता है, नाम भी मिल जाता है. मिसेज चोपड़ा भी इसी रंग में रंगी हैं.’’

मैं थोड़ी देर में अपनी जगह पर वापस आ कर काम में जुट गई. चूंकि मेरे ऊपर अपनी विधवा मां की जिम्मेदारी थी इसलिए मैं अपना काम बड़ी ईमानदारी से करती थी. मैं कुछ दिनों से यह भी अनुभव कर रही थी कि मिसेज चोपड़ा मुझे पसंद नहीं करती हैं. मेरे हर काम में उन्हें सिर्फ कमी ही नजर आती थी.

मिसेज चोपड़ा ने धीरेधीरे मुझे सताना शुरू कर दिया. मेरी किसी भी रिपोर्ट को रद्द कर देतीं और फिर से नए ढंग से बनाने को कहतीं. कभी आफिस के काम से हटा कर फील्ड वर्क पर लगा देतीं तो कभी अचानक फील्ड वर्क से आफिस भेज देतीं.

एक दिन उन्होंने मुझ से पूछ ही लिया, ‘‘मिस बेला, आप इतना कम क्यों बोलती हैं?’’

मैं ने कहा, ‘‘मैडम, ऐसा तो नहीं है. बस, मैं बोलने से ज्यादा काम करना पसंद करती हूं. फिर हम जो काम कर रहे हैं अगर उस में हम अपने बारे में ही सोचेंगे तो दूसरों के दुख कब शेयर करेंगे.’’

वह अचानक बौस के ढंग में बोलीं, ‘‘मिस बेला, इस केस की डिटेल्स पढि़ए. नेहा के घर वालों का बयान लीजिए और गवाहों से बात कीजिए. पुलिस से भी मिलिए. आजकल बहुत कंपीटीशन है. मैं मीडिया से बात कर के रखती हूं. हम पहले केस सुलझा लेंगे तो हमारा नाम होगा. हमारी बढि़या न्यूज तैयार होगी.’’

मैं सिर झुकाए बोली, ‘‘किसी के दुख पर सफलता की सीढ़ी लगाना अच्छा तो नहीं लगता, मैडम.’’

उन की नजरें मुझ पर जम गईं. अच्छा स्टेटस, पैसा और अच्छे संबंध यही दुनिया में जीने के उन के सिद्धांत थे.

मैं अपने गु्रप के साथ घटनास्थल पर जाने को निकल गई. वह एक बौस की तरह मेरे साथ थीं. मैं ने नेहा के घर वालों से बहुत से सवाल पूछे. नेहा को उस के ससुराल वालों ने जला कर मार दिया था. नशे की हालत में उस के पति ने उस पर तेल छिड़क कर आग लगा दी थी. मिसेज चोपड़ा बहुत खुश थीं कि अगर मीडिया यह न्यूज अच्छी तरह से पेश करता है तो उन का बहुत नाम होगा. उन्होंने प्रेस कान्फ्रेंस बुला कर मीडिया में इस मामले पर हलचल मचा दी.

उन की इस हरकत से मैं बहुत बेचैन थी. अपनी उस बेचैनी को कम करने के लिए मैं उन के केबिन में जा कर फट पड़ी, ‘‘मैडम, इस प्रेस कान्फ्रेंस से नेहा को क्या फायदा पहुंच रहा है? उस की मौत को भुना कर हमें क्या मिलेगा?’’

मेरे अंदर सवालों का ढेर लगा था. उन्हें मुझ पर गुस्सा आ गया, ‘‘मिस बेला, आप को क्या लगता है कि हमारी संस्था सिर्फ नाम कमाने के लिए दूसरों के दुख अपने पास जमा करती है? क्या हम उन के लिए कुछ नहीं करते? अगर किसी की मदद के साथ मीडिया वाले हमें भी कैमरे के सामने ला कर न्यूज बना देते हैं तो इस में बुरा क्या है?’’

मैं ने अपनी आवाज को संतुलित करते हुए जवाब दिया, ‘‘मैडम, हम क्या करते रहे हैं महिलाओं के लिए? जो बात सिर्फ घर वाले जानते हैं हम उन्हें सब के सामने ला कर दुखी लोगों को और दुखी कर देते हैं. थोड़ी सी जबानी सहानुभूति या कभीकभी कुछ आर्थिक सहायता. हमारी संस्था औरत को कभीकभी एक तमाशा बना देती है. मीडिया को तो खबरें ही चाहिए. मैडम, मैं यहां नौकरी नहीं कर पाऊंगी.’’

‘‘हां, यही अच्छा रहेगा. जहां काम में रुचि न हो वहां इनसान को काम नहीं करना चाहिए. आप जा सकती हैं.’’

मैं अपना बैग उठा कर आफिस से बाहर आ गई. मैं हर उस नौकरी को बुरा समझती हूं जिस में किसी के दुख को भुनाया जाता है.

मैं ने कुछ दिन बाद एक स्कूल में नौकरी ज्वाइन कर ली लेकिन मिसेज चोपड़ा और उन की संस्था के बारे में मुझे खबर मिलती रहती थी. नेहा का केस उन्होंने सुलझा लिया था, उन की संस्था की धूम मची हुई थी.

जीवन अपने ढर्रे पर चल रहा था कि एक दिन अचानक सुबह उठने पर पेपर पढ़ा तो रोंगटे खडे़ हो गए. मिसेज चोपड़ा की बेटी आकृति के साथ कुछ दरिंदों ने रेप किया था. वह अपने कालिज से घर आ रही थी कि सुनसान सड़क पर कुछ लड़के कार में उसे उठा कर ले गए थे.

इस खबर को पढ़ने के बाद मैं अपने को वहां जा कर उन से मिलने से रोक नहीं पाई. उन के घर पहुंची तो वह मासूम सी लड़की कमरे में बंद थी और बारबार बेहोश हो रही थी. बहुत ही हृदयविदारक दृश्य था. पूरा स्टाफ वहां था. सब को आकृति पर तरस आ रहा था. मिसेज चोपड़ा का विलाप दिल को चीर रहा था. चोपड़ा साहब विदेश में थे. उन मांबेटी से सब को सहानुभूति हो रही थी. कुछ देर वहां ठहर कर मैं वापस घर आ गई लेकिन अगले दिन भी उन दुखियारी मांबेटी के पास कुछ देर बैठने के लिए मैं गई. फिर कई दिनों तक रोज ही जाती रही. सब को आकृति के सामान्य होने का इंतजार था.

एक दिन अचानक एक प्रसिद्ध एन.जी.ओ. की महिलाएं मीडिया के साथ मिसेज चोपड़ा के घर पहुंच गईं. हर तरफ कैमरे की रोशनियां और उन की बेटी का रोना, मिसेज चोपड़ा बारबार उन लोगों से जाने की प्रार्थना करते हुए सिसक उठीं, लेकिन संस्था की महिलाएं, हाथ में पेपर, पैन लिए मीडिया के लोग, मांबेटी से सवाल पर सवाल पूछे जा रहे थे और अपनी संस्था की शान में कमेंट भी किए जा रहे थे कि हम आप की बेटी को न्याय दिलवाएंगे. मैडम, आप तो खुद एक संस्था चलाती थीं. आज आप आम आदमी की जगह खड़ी हैं. आप को कैसा लग रहा है? मैडम, आप कुछ जवाब दें. आप इस केस में क्या कहना चाहेंगी.

मिसेज चोपड़ा ने कुछ कहने की कोशिश की लेकिन उन के शब्द अंदर ही रह गए और वे गिर पड़ीं.

आफिस के कुछ लोगों के साथ मैं उन को अस्पताल ले गई. आकृति को मैं ने अपनी मां के पास भेज दिया. मिसेज चोपड़ा को हार्टअटैक पड़ा था. उन की देखरेख मैं ने एक दोस्त की तरह की, क्योंकि मेरी मां ने मुझे यही सिखाया था. उन के दिए गए संस्कार मेरे अंदर खून बन कर बहते थे. स्कूल से मैं ने छुट्टियां ली हुई थीं. मिसेज चोपड़ा जब तक अस्पताल से घर आने लायक हुईं हम एक अच्छे दोस्त बन चुके थे.

घर आ कर वह अपने काम में व्यस्त हो गईं और मैं अपने में. जीवन निर्बाध गति से चल रहा था. एक दिन मैं ने टेलीविजन चलाया तो मिसेज चोपड़ा अपने साक्षात्कार में कह रही थीं, ‘‘अगर हम किसी बहन या बेटी की इज्जत करते हैं तो क्या हमें उस को हजारों लोगों के सामने खड़ा कर देना चाहिए. हमें यदि किसी की मदद करनी है तो क्या हम चुपचाप नहीं कर सकते. मैं एक नई संस्था बना रही हूं जिस का मीडिया से बहुत ही कम लेनादेना होगा. हम चुपचाप दुखी जनता के आंसू पोंछेंगे.’’

आज मुझे लगा कि मिसेज चोपड़ा ने अब जो रास्ता चुना है वह सही है. मुझे उन की इस बदली हुई सोच पर खुशी हुई और मैं उन को इस नए कदम के लिए शुभकामनाएं देने को फोन मिलाने लगी, साथ ही मुझे उन को यह भी बताना था कि मैं उन की नई संस्था में काम करने आ रही हूं.

Hindi Story : पतिता का प्रायश्चित्त

Hindi Story : पतिता का प्रायश्चित्तउस दिन शाम को औफिस से घर आने के बाद मयंक अपने परिवार के साथ कार से टहलने निकल पड़ा.

मयंक के साथ उस की पत्नी स्नेह भी थी जो 2 साल के अंशु को गोद में ले कर बैठी थी.

मयंक कार के स्टेयरिंग पर था और उसे बहुत धीमी रफ्तार से चला रहा था. अचानक उस की नजर सड़क पार करती एक जवान औरत पर पड़ी. एकाएक उस के दिल की धड़कनें बढ़ गईं. उस ने कार की रफ्तार को और भी धीमा कर दिया और उस औरत को गौर से देखने लगा.

‘‘क्या बात है?’’ स्नेह की आवाज में जिज्ञासा थी, ‘‘क्या देख रहे हैं आप?’’

‘‘मैं उस औरत को देख रहा हूं,’’ मयंक ने उस औरत की ओर इशारा करते हुए कहा.

‘‘क्यों… कोई खास बात है क्या?’’ स्नेह ने पूछा.

‘‘हां है…’’ मयंक ने कहा, ‘‘एक लंबी कहानी है इस की. उस कहानी का एक पात्र खुद मैं भी हूं.’’

‘‘अच्छा…’’ एक अविश्वास भरी हैरानी से स्नेह का मुंह खुला का खुला रह गया.

थोड़ी देर में मयंक ने कार की रफ्तार बढ़ा दी और आगे निकल गया.

मयंक इस शहर में अभी नयानया जिला जज बन कर आया था. उसे यहां रहने के लिए एक सरकारी बंगला मिला हुआ था. वह सपरिवार यानी स्नेह और 2 साल के अंशु के साथ रहने लगा था.

उस रात जब वे खाना खाने बैठे तो स्नेह ने उसी सवाल को दोहराया, ‘‘कौन थी वह औरत?’’

मयंक का दिल ‘धक’ से बैठ गया, पर उस ने खुद पर कंट्रोल कर के मन ही मन बात शुरू करने की भूमिका बना ली. फिलहाल टालने भर का मसाला तैयार कर के उस ने कहा, ‘‘आजकल उस औरत का एक केस मेरी अदालत में चल रहा है. तलाक का मामला है.’’

‘‘लेकिन, आप ने तो कहा था कि उस की कहानी के एक पात्र आप भी…’’

‘‘हां, मैं ने तब जो भी कहा हो, लेकिन इस समय मेरे सिर में दर्द है. मुझे आराम करने दो,’’ मयंक की आवाज में कुछ झुंझलाहट थी.

स्नेह के मन में मची उथलपुथल को मयंक बखूबी समझ रहा था. औरत के मन में शक की उपज स्वाभाविक होती है. यों स्नेह मयंक के प्यार के आगे मुंह खोल सकने की हालत में नहीं थी.

मयंक टाल तो गया, पर वह औरत अब भी उस की यादों में छाई रही.

आज से तकरीबन 8 साल पहले जब मयंक ग्रेजुएशन का छात्र था तो उस की बड़ी बहन की शादी में दूर के रिश्तेदारों, परिचितों के अलावा बड़े भाई के एक खास दोस्त की बहन रेणु भी आई थी.

मयंक को पहले ही दिन लगा था कि रेणु बहुत ही चंचल स्वभाव की थी और बातूनी भी. रेणु के आते ही सब उस से घुलमिल गए थे. बातबात में हर कोई ‘रेणु, जरा मुझे एक गिलास पानी देना’, ‘जरा मेरे लिए एक कप चाय बना देना’, ‘मुझे भूख लगी है, खाना परोस देना’ जैसी फरमाइशें करने लगा था.

एक दिन मयंक ने पुकारा था, ‘रेणु, मुझे प्यास लगी है.’

अचानक रेणु मयंक के पास आई और फुसफुसा कर बोली, ‘कैसी…’ और इतना कह कर उस ने अपने होंठों पर बड़ी गूढ़ मुसकान बिखेर दी.

मयंक अचकचा सा गया था. उसे रेणु से इस तरह की हरकत की कतई उम्मीद न थी.

मयंक ने अपनी झेंप को काबू में करते हुए कहा, ‘फिलहाल तो मुझे पानी ही चाहिए.’

रेणु ने पानी दिया और उसी दिन थोड़ा एकांत पाते ही उस ने कहा, ‘मयंक, तुम मुझ से इतना कतराते क्यों हो? क्या मैं तुम्हें अच्छी नहीं लगती?’

‘नहीं’ कहने के बजाय मयंक के मुंह से निकला था, ‘क्यों नहीं…’

लेकिन उसी दिन से उन दोनों के बीच ऐसी निजी बातों का सिलसिला चल पड़ा था. लगा कि जैसे सारी दूरियां खत्म होती जा रही थीं. मयंक भी रेणु की बातों में दिलचस्पी लेने लगा था.

रेणु ने एक दिन मयंक के सामने शादी करने का प्रस्ताव रख दिया, ‘मयंक, मैं चाहती हूं कि हम दोनों जीवनभर एकदूसरे के बने रहें.’

‘क्या…’ मयंक की हैरानी लाजिमी थी. क्या रेणु उस के बारे में इस हद तक सोचती है?

‘हां मयंक, अगर मेरी शादी तुम से नहीं हुई तो मैं जिंदगीभर कुंआरी ही रहूंगी,’ रेणु ने कहा. लगा, जैसे उस के आंसू छलक पड़ेंगे.

मयंक थोड़ी देर तो चुप रहा था लेकिन कुछ ही पलों में उस के दिल में रेणु के लिए प्यार उमड़ पड़ा था. वह उसे वचन दे बैठा, ‘अगर तुम में सचमुच सच्चे प्यार की भावना है रेणु, तो मैं जिंदगीभर तुम्हारा साथ निभाऊंगा.’’

यह सुनते ही रेणु मयंक से लिपट गई.

‘मुझे तुम से ऐसी ही उम्मीद थी,’ रेणु बुदबुदाई.

मयंक का एक दोस्त विनय भी शादी से कुछ दिन पहले ही हाथ बंटाने के लिए वहां आ गया था. एक दिन मयंक की मां ने विनय से शादी का कुछ सामान लाने को कहा. रेणु भी अपनेआप तैयार हो गई.

‘क्या मैं भी विनय के साथ चली जाऊं? इन के रास्ते में ही महमूदपुर पड़ेगा, जहां मेरी एक सहेली ब्याही गई है. अगर एतराज न करें तो मैं उस से मिल लूं? शाम को जब ये शहर से सामान ले कर लौटेंगे तो इन्हीं के साथ आ जाऊंगी,’ रेणु ने मयंक की मां से पूछा.

थोड़ी देर सोच कर मां बोलीं, ‘लेकिन, शाम तक जरूर लौट आना.’

‘हांहां, बस मिलना ही तो है,’ रेणु ने कहा, फिर वे दोनों स्कूटर पर बैठे और चले गए.

शाम हुई और शाम से रात, पर रेणु नहीं आई. मयंक ने सोचा कि आखिर वह अभी तक क्यों नहीं लौटी? विनय भी नहीं आया था.

अचानक दरवाजे पर दस्तक हुई.

‘कौन…?’ मां ने पूछा.

‘मैं हूं,’ उधर से विनय ने कहा.

मां ने दरवाजा खोला. रेणु भी पीछे खड़ी थी.

‘कहां रह गए थे तुम दोनों?’ मां ने  झुंझलाते हुए पूछा.

‘कुछ नहीं… बस, इन का खटारा स्कूटर खराब हो गया था, फिर काफी पैदल चलना पड़ा,’ विनय कुछ बोलता, उस से पहले ही रेणु ने कहा और घर में जा घुसी.

उस समय मयंक को उस की यह हरकत सही नहीं लगी थी, फिर भी वह उस के शब्दजाल में फंस चुका था.

फिर एक दिन रेणु अपने घर चली गई. कई दिनों तक मयंक को कुछ भी अच्छा नहीं लगा था. घर में जाने की इच्छा भी न होती थी. हर जगह उस की यादें बिखरी हुई मालूम पड़ती थीं. उन्हीं यादों के नाते मयंक को लगता था जैसे वह खुद भी बिखर कर रह गया है.

मयंक ने अपनी मां को भी बता दिया था कि वह रेणु से प्यार करता है और शादी भी उसी से करना चाहता है.

‘मयंक, एक सवाल पूछूं तुम से?’ मां ने पूछा.

‘पूछो न मां… एक नहीं, हजार पूछो,’ मयंक ने कहा.

‘तुम्हें रेणु के चरित्र के बारे में क्या लगता है?’ मां ने सीधा सवाल किया.

मयंक बोला, ‘मुझे तो ठीक लगता है. वैसे, क्या आप को…?’

‘नहींनहीं, आजकल की लड़कियों के बारे में कालेज के लड़के ही ज्यादा जानकारी रखते हैं. खैर, ठीक ही है,’ मां ने कहा.

अचानक मां को पिताजी ने बुला लिया था. मयंक ने सोचा कि मां कहना क्या चाहती थीं?

एक दिन जब मयंक ने विनय को रेणु से अपने संबंध की बात बताई तो वह एकदम से बिफर गया, ‘तुम उसे भूल जाओ प्यारे… उस की मधुर मुसकानें बहुत जहरीली हैं.’

‘मैं समझा नहीं…’

‘तुम समझोगे भी कैसे? तुम्हारे दिमाग को तो रेणु नाम की उसी घुन ने चट कर रखा है. अब तुम समझनेबूझने की हालत में रह ही कहां गए हो?’ विनय ने ताना मारा.

‘क्या मतलब…’

‘तुम्हें यह शादी नहीं करनी है…’ विनय हक के साथ बोल पड़ा, ‘और अगर तुम उसे भूल नहीं पाते हो तो मुझे भूलने की कोशिश कर लेना.’

‘ठीक है. मैं भूल जाऊंगा उसे, लेकिन तुम भी इतना जान लो कि मैं जिंदगीभर कुंआरा ही रहूंगा,’ मयंक थोड़ा भावुक हो उठा.

‘आखिर तुम ने उस के अंदर ऐसा क्या देखा है, जो उस के लिए इतना बड़ा त्याग करने को तैयार हो?’

‘सिर्फ बरताव, खूबसूरती नहीं,’ मयंक ने कहा.

‘तो बस यही नहीं है उस में, बाकी सबकुछ हो भी तो क्या?’

‘क्या…?’

‘हां मयंक, उस का चरित्र सही नहीं है. अच्छा बताओ, तुम्हें वह दिन याद है न, जब रेणु मेरे साथ महमूदपुर गई थी?’

‘हां, याद तो है?’

‘मेरा स्कूटर खराब हो गया था और मैं देर रात वापस लौटा था?’

‘हां, यह भी याद है…’

‘मैं और भी जल्दी आ सकता था, पर वह देरी रेणु ने जानबूझ कर की थी.’

मयंक हैरानी से विनय का मुंह ताकने लगा.

‘लेकिन, उस को भी तो आना था?’ मयंक अपने अंदर हैरानी समेटे बोल रहा था, ‘जबकि तुम दोनों को महमूदपुर में ही रात होने लगी थी.’

‘हां इसलिए, रात का फायदा उठाने के लिए ही ऐसा किया गया था.’

‘क्या मतलब…?’

‘अब इतने नादान तो हो नहीं तुम कि तुम्हें मतलब समझाना पड़े…’

‘तो क्या रेणु ऐसी…?’

‘जी हां, ऐसी ही है रेणु…’ विनय ने आगे कहा, ‘उस की उन गलत इच्छाओं के आगे मुझे मजबूर होना पड़ा था, क्योंकि वह किसी भी हद तक जा चुकी थी…’ वह बोलता जा रहा था, ‘मैं इस के बारे में कभी भी कुछ न कहता, अगर आज अपने सब से अच्छे और एकलौते दोस्त को जिंदगी के इतने बड़े फैसले का धर्मसंकट सामने न आ खड़ा होता.’

विनय की बातें मयंक के कानों में जहर घोल रही थीं और वह खुद को ठगा हुआ सा महसूस करने लगा था.

मयंक ने सोचा कि अपने इस सवाल का जवाब वह खुद रेणु से लेगा, पर इस की नौबत ही नहीं आने पाई. उस ने जल्दी ही सुना कि रेणु का किसी से प्रेम विवाह हो गया है.

इधर मयंक के लिए भी कोई रिश्ता आया. उस ने मांबाप के फैसले को सिर्फ उन की खुशी के लिए अपनी रजामंदी दे दी.

सुसंस्कारों में पलीबढ़ी स्नेह मयंक के घर में सब को भाती थी. जब वह जिला जज की इस जिम्मेदारी के लिए आने लगा तो मां ने स्नेह से हंसते हुए कहा, ‘मेरे और अपने दोनों बेटों का खयाल रखना है अब तुम्हें.’

‘जी मां,’ स्नेह ने भी हंस कर ही कहा, जो मां के लिए बहू के बजाय उन की लाड़ली बेटी थी.

आज रेणु से मयंक का सामना वक्त ने उस मुकाम पर आ कर कराया जहां वह मयंक की ही अदालत में एक गुनाहगार की तरह खड़ी थी. उस के पति ने ही उस पर किसी और से संबंध होने की बात पर तलाक मांगा था.

रेणु आई, मयंक भी. जिला जज से पहले वह एक नेकदिल इनसान ही था, इसलिए अपनी ही उलझनों की शिकन महसूस करते हुए वह भी उस के सामने अपनी कुरसी पर आ बैठा.

आज रेणु का चेहरा बहुत ही बुझा हुआ था. मयंक को उस का अल्हड़पन याद आया, पर उस की जिंदगी में खुशियों का जरा भी दीदार न हो सका.

बहस के दौरान रेणु ज्यादातर चुप ही बनी रही और अपनी गलतियों को मान कर आगे से ऐसा कुछ न करने के लिए कहा.

रेणु के पति के पक्ष से पेश किए गए सुबूतों के आधार पर उसे तलाक मिल चुका था. पर रेणु के अदालत में बोले गए ये बोल, ‘आज मैं कहां से कहां होती…’ मयंक के जेहन में गूंजते रहे.

मयंक को बारबार यही अहसास हो रहा था कि ऐसा रेणु ने उस के और मयंक के संबंधों को याद करते हुए बोला था.

मयंक को आज उस पर तरस आ रहा था, पर यही तो था एक ‘पतिता का प्रायश्चित्त’.

Social Story : हिंदुस्तान जिंदा है – दंगाइयों की कैसी थी मानसिकता

Social Story : यह एक इत्तफाक ही था कि मौलवी रशीद की पत्नी जिस दिन मरी थी उसी दिन मीना का पति भी मरा था. मौलवी रशीद की पत्नी को दंगाइयों ने पहले नंगा किया फिर अपना मुंह काला किया और अंत में उसे गोली मार दी. अब वह कहां जिंदा थी कि किसी का नाम बताती. बस, सड़क के किनारे एक नंगी लाश के रूप में पड़ी मिली थी.

मीना के पति को बाजार में छुरा मारा गया था, मर्द को दंगाई नंगा नहीं करते क्योंकि दंगाई भी मर्द होते हैं.

मीना और मौलवी रशीद दोनों ने अपनीअपनी लाशें उठा कर उन का अंतिम संस्कार किया था. ये दोनों जिस शहर के थे वहां की फितरत में ही दंगा था और वह भी धर्म के नाम पर.

इस शहर के लोग पढ़ेलिखे जरूर थे पर नेताओं की भड़काऊ बातों को सुन कर सड़कों पर उतर आना, छतों से पत्थरों की वर्षा करना और फिर गोली चलाना इन की आदत हो गई थी. कोई तो था जो निरंतर इस दंगा कल्चर को बढ़ावा दे रहा था ताकि जनता बंटी रहे और उन का मकसद पूरा होता रहे.

मौलवी रशीद और मीना दोनों एकसाथ पढ़े थे. दोनों का बचपन भी साथसाथ ही गुजरा था. दोनों आपस में प्रेम भी करते थे, लेकिन इन की आपस में शादी इसलिए नहीं हुई कि दोनों का धर्म अलगअलग था और ऐसे कट्टर धार्मिक, सोच वाले शहर में एक हिंदू लड़की किसी मुसलमान लड़के से शादी कर ले तो शहर में हंगामा बरपा हो जाए.

मीना ने तो चाहा था कि वह रशीद से शादी कर ले लेकिन खुद रशीद ने यह कह कर मना कर दिया था कि यदि तुम चाहती हो कि 4-5 मुसलमान मरें तो मैं यह शादी करने के लिए तैयार हूं. और फिर मीना अपने दिल पर पत्थर रख कर बैठ गई थी.

इसी के बाद दोनों के जीवन की धारा बदल गई. रशीद ने अपने संप्रदाय में एक नेक लड़की से शादी कर अपनी गृहस्थी बसा ली तो मीना ने अपनी ही जाति के एक लड़के के साथ शादी कर ली. फिर तो दोनों एक ही शहर में रहते हुए एकदूसरे के लिए अजनबी बन गए.

इधर धर्म का बाजार सजता रहा, धर्म का व्यापार होता रहा और इस धर्म ने देश को 2 टुकड़ों में बांट दिया. इनसान के लिए धर्म एक ऐसा रास्ता है जिसे केवल मन में रखा जाए और खामोशी के साथ उस पर विश्वास करता चला जाए न कि उस के लिए बेबस औरतों को नंगा किया जाए, संपत्तियों को जलाया जाए और बेगुनाह लोगों की जानें ली जाएं.

मौलवी रशीद की कोई संतान नहीं थी पर मीना के 2 बच्चे थे. एक 3 साल का और दूसरा 3 मास का. पति के मरने के बाद मीना बिलकुल बेसहारा हो गई थी. अब उस शहर में उस का दर्द, उस की जरूरतों को समझने वाला मौलवी रशीद के अलावा दूसरा कोई भी नहीं था.

सांप्रदायिक दंगों का सिलसिला शहर से खत्म नहीं हो रहा था. कभी दिन का कर्फ्यू तो कभी रात का कर्फ्यू. इनसान तो क्या जानवर भी इस से तंग हो गए थे. मौलवी रशीद ने टेलीविजन खोला तो एक खबर आई कि प्रशासन ने शाम को कर्फ्यू में 2 घंटे की ढील दी है ताकि लोग घरों से बाहर निकल कर अपनी दैनिक जरूरतों की वस्तुओं को खरीद सकें. मौलवी रशीद को मीना के 3 माह के बच्चे की चिंता थी क्योंकि पति की मौत के बाद मीना की छाती का दूध सूख गया था. उस बच्चे के लिए उसे दूध लेना था और ले जा कर हिंदू इलाके में मीना के घर देना था.

रशीद जब घर से स्कूटर पर चला तो उसे थोड़ा डर सा लगा था. वह सआदत हसन मंटो (उर्दू का प्रसिद्ध कथाकार) तो था नहीं कि अपनी जेब में 2 टोपियां रखे और हिंदू महल्ले से गुजरते समय सिर पर गांधी टोपी तथा मुसलमान महल्ले से गुजरते समय गोल टोपी लगा ले.

खैर, रशीद किसी तरह हिम्मत कर के मीना के बच्चे के लिए दूध का पैकेट ले कर चला तो रास्ते भर लोगों की तरहतरह की बातें सुनता रहा.

किसी एक ने कहा, ‘‘इस का मीना के साथ चक्कर है. मीना को कोई हिंदू नहीं मिलता क्या?’’

दूसरे के मुंह से निकला, ‘‘लगता है इस का संपर्क अलकायदा से है. हिंदू इलाके में बम रखने जा रहा है. इस मौलवी का हिंदू महल्ले में आने का क्या मतलब?’’

दूसरे की कही बातें सुन कर तीसरे ने कहा, ‘‘यदि अलकायदा का नहीं तो इस का संबंध आई.एस.आई. से जरूर है. तभी तो इस की औरत को नंगा कर के गोली मारी गई.

रशीद ने मीना के घर पहुंच कर उसे आवाज लगाई और दूध का पैकेट दे कर वापस आ गया. एक सेना का अधिकारी, जो मीना के घर के सामने अपने जवानों के साथ ड्यूटी दे रहा था, उस ने रशीद को दूध देते देखा. मौलवी रशीद उसे देख कर डर के मारे थरथर कांपने लगा. वह आर्मी अफसर आगे बढ़ा और रशीद की पीठ को थपथपाते हुए बोला, ‘‘शाबाश.’’

रशीद जब अपने महल्ले में पहुंचा तो देखा कि लोग उस के घर को घेर कर खड़े थे. वह स्कूटर से उतरा तो महल्ले के मुसलमान लड़के उस की पिटाई करते हुए कहने लगे, ‘‘तू कौम का गद्दार है. एक हिंदू लड़की के घर गया था. तू देख नहीं रहा है कि वे हमें जिंदा जला रहे हैं? हमारी बहनबेटियों की इज्जत के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं. क्या उस महल्ले के हिंदू मर गए थे जो तू उस के बच्चे को दूध पिलाने गया था.’’

एक बूढ़े मौलाना ने कहा, ‘‘रशीद, तू महल्ला खाली कर फौरन यहां से चला जा नहीं तो तेरी वजह से इस महल्ले पर हिंदू कभी भी हमला कर सकते हैं. तेरा मीना के साथ यह अनैतिक संबंध हम को बरबाद कर देगा.’’

इस बीच पुलिस की एक जीप वहां आई और पुलिस वाले यह कह कर चले गए कि यहां तो मुसलमानों ने ही मुसलमान को मारा है, खतरे की कोई बात नहीं है. लगता है कोई पुरानी रंजिश होगी.

मार खाने के बाद रशीद अपने घर चला गया और बिस्तर पर लेट कर कराहने लगा. कुछ देर के बाद फोन की घंटी बजी. फोन मीना का था. वह कह रही थी, ‘‘रशीद, तुम्हारे जाने के बाद महल्ले के कुछ हिंदू लड़के मेरे घर में घुस आए थे और उन्होेंने दूध के साथ घर का सारा सामान सड़क पर फेंक दिया. अब मैं क्या करूं. तुम जब तक माहौल सामान्य नहीं हो जाता मेरे घर मत आना. बच्चे तो जैसेतैसे जी ही लेंगे.’’

रशीद फोन पर हूं हां कर के चुप हो गया क्योंकि उसे चोट बहुत लगी थी. वह लेटेलेटे सोच रहा था कि हिंदूमुसलिम फसाद में एक तरफ से कुछ भी नहीं होता है. दोनों तरफ से लड़ाई होती है और कौम के नेता इस जलती हुई आग पर घी डालते हैं. यदि हिंदू मुसलमान को मारता है तो वही उस को सड़क से उठाता भी है. अस्पताल भी वही ले जाता है, वही पुलिस की वर्दी पहन कर उस का रक्षक भी बनता है और वही जज की कुरसी पर बैठ कर इंसाफ भी करता है, कहीं तो कुछ है जो टूटता नहीं.

4 दिन बाद कुछ हालात संभले थे. इस दौरान समाचारपत्रों ने बहुत सी घटनाओं को अपनी सुर्खियां बनाया था. इन्हीं में एक खबर रशीद और मीना को ले कर छपी थी कि ‘हिंदू इलाके में एक मुसलमान अपनी प्रेमिका से मिलने आता है.’

ऐसे माहौल में समाचारपत्रों का काम है खबर बेचना. अगर सच्ची खबर न हो तो झूठी खबर ही सही, उन के अखबार की बिक्री बढ़नी चाहिए. अब तो राजनीतिक पार्टियां भी अपना अखबार निकाल रही हैं ताकि पार्टी की पालिसी के अनुसार समाचार को प्रकाशित किया जाए. आजादी के बाद हम कितने बदल गए हैं. अब नेताओं को देश की जगह अपनी पार्टी से प्रेम अधिक है.

शहर में कर्फ्यू समाप्त हो गया था. रशीद भी अब पूरी तरह से ठीक हो गया था. उस ने फैसला किया कि अब यह शहर उस के रहने के लायक नहीं रहा पर शहर छोड़ने से पहले वह मीना से मिलना चाहता था.

वह घर से निकला और सीधा मीना के घर पहुंचा. उसे घर के दरवाजे पर बुलाया और हमेशाहमेशा के लिए उसे एक नजर देख कर मुड़ना ही चाहता था कि कुछ लोग उस को चारों ओर से घेर कर खड़े हो गए.

रशीद ने मीना से सब्जी काटने वाला चाकू मांगा और सब को संबोधित कर के बोला, ‘‘आप लोगों को मुझे मारने की आवश्यकता नहीं है. मैं अपने पेट में चाकू मार कर आत्महत्या करने जा रहा हूं. अब यह शहर जीने लायक नहीं रह गया.’’

उस भीड़ ने रशीद को पकड़ लिया और एक सम्मिलित स्वर में आवाज आई, ‘‘भाई साहब, हम आप को मारने नहीं बल्कि देखने आए हैं. आप की पत्नी को हिंदुओं ने नंगा कर के गोली मारी थी और आप एक हिंदू विधवा के बच्चों के लिए दूध लाते रहे. अब आप जैसे इनसान को देखने के बाद यकीन हो गया है कि हिंदुस्तान जिंदा है और हमेशा जिंदा रहेगा.

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