Story in Hindi : दिल हथेली पर

Story in Hindi. अमित और मेनका चुपचाप बैठे हुए कुछ सोच रहे थे. उन की समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करना चाहिए. तभी कालबेल बजी. मेनका ने दरवाजा खोला. सामने नरेन को देख चेहरे पर मुसकराहट लाते हुए वह बोली, ‘‘अरे जीजाजी आप… आइए.’’

‘‘नमस्कार. मैं इधर से जा रहा था तो सोचा कि आज आप लोगों से मिलता चलूं,’’ नरेन ने कमरे में आते हुए कहा. अमित ने कहा, ‘‘आओ नरेन, कैसे हो? अल्पना कैसी है?’’

नरेन ने उन दोनों के चेहरे पर फैली चिंता की लकीरों को पढ़ते हुए कहा, ‘‘हम दोनों तो ठीक हैं, पर मैं देख रहा हूं कि आप किसी उलझन में हैं.’’ ‘‘ठीक कहते हो तुम…’’ अमित बोला, ‘‘तुम तो जानते ही हो नरेन कि मेनका मां बनने वाली है. दिल्ली से बहन कुसुम को आना था, पर आज ही उस का फोन आया कि उस को पीलिया हो गया है. वह आ नहीं सकेगी. सोच रहे हैं कि किसी नर्स का इंतजाम कर लें.’’

‘‘नर्स क्यों? हमें भूल गए हो क्या? आप जब कहेंगे अल्पना अपनी दीदी की सेवा में आ जाएगी,’’ नरेन ने कहा. ‘‘यह ठीक रहेगा,’’ मेनका बोली.

अमित को अपनी शादी की एक घटना याद हो आई. 4 साल पहले किसी शादी में एक खूबसूरत लड़की उस से हंसहंस कर बहुत मजाक कर रही थी. वह सभी लड़कियों में सब से ज्यादा खूबसूरत थी. अमित की नजर भी बारबार उस लड़की पर चली जाती थी. पता चला कि वह अल्पना है, मेनका की मौसेरी बहन.

अब अमित ने अल्पना के आने के बारे में सुना तो वह बहुत खुश हुआ. मेनका को ठीक समय पर बच्चा हुआ. नर्सिंग होम में उस ने एक बेटे को जन्म दिया.

4 दिन बाद मेनका को नर्सिंग होम से छुट्टी मिल गई. शाम को नरेन घर आया तो परेशान व चिंतित सा था. उसे देखते ही अमित ने पूछा, ‘‘क्या बात है नरेन, कुछ परेशान से लग रहे हो?’’

‘‘हां, मुझे मुंबई जाना पड़ेगा.’’ ‘‘क्यों?’’

‘‘बौस ने हैड औफिस के कई सारे जरूरी काम बता दिए हैं.’’ ‘‘वहां कितने दिन लग जाएंगे?’’

‘‘10 दिन. आज ही सीट रिजर्व करा कर आ रहा हूं. 2 दिन बाद जाना है. अब अल्पना यहीं अपनी दीदी की सेवा में रहेगी,’’ नरेन ने कहा. मेनका बोल उठी, ‘‘अल्पना मेरी पूरी सेवा कर रही है. यह देखने में जितनी खूबसूरत है, इस के काम तो इस से भी ज्यादा खूबसूरत हैं.’’

‘‘बस दीदी, बस. इतनी तारीफ न करो कि खुशी के मारे मेरे हाथपैर ही फूल जाएं और मैं कुछ भी काम न कर सकूं,’’ कह कर अल्पना हंस दी. 2 दिन बाद नरेन मुंबई चला गया.

अगले दिन शाम को अमित दफ्तर से घर लौटा तो अल्पना सोफे पर बैठी कुछ सोच रही थी. मेनका दूसरे कमरे में थी. अमित ने पूछा, ‘‘क्या सोच रही हो अल्पना?’’

‘‘कुछ नहीं,’’ अल्पना ने कहा. ‘‘मैं जानता हूं.’’

‘‘क्या?’’ ‘‘नरेन के मुंबई जाने से तुम्हारा मन नहीं लग रहा?है.’’

‘‘ऐसी बात नहीं है. वे जिस कंपनी में काम करते हैं, वहां बाहर जाना होता रहता है.’’ ‘‘जैसे साली आधी घरवाली होती है वैसे ही जीजा भी आधा घरवाला होता है. मैं हूं न. मुझ से काम नहीं चलेगा क्या?’’ अमित ने अल्पना की आंखों में झांकते हुए कहा.

‘‘अगर जीजाओं से काम चल जाता तो सालियां शादी ही क्यों करतीं?’’ कहते हुए अल्पना हंस दी. 5-6 दिन इसी तरह हंसीमजाक में बीत गए. एक रात अमित बिस्तर पर बैठा हुआ अपने मोबाइल फोन पर टाइमपास कर रहा था. जब आंखें थकने लगीं तो वह बिस्तर पर लेट गया.

तभी अमित ने आंगन में अल्पना को बाथरूम की तरफ जाते देखा. वह मन ही मन बहुत खुश हुआ. जब अल्पना लौटी तो अमित ने धीरे से पुकारा.

अल्पना ने कमरे में आते ही पूछा, ‘‘अभी तक आप सोए नहीं जीजाजी?’’ ‘‘नींद ही नहीं आ रही है. मेनका सो गई है क्या?’’

‘‘और क्या वे भी आप की तरह करवटें बदलेंगी?’’ ‘‘मुझे नींद क्यों नहीं आ रही है?’’

‘‘मन में होगा कुछ.’’ ‘‘बता दूं मन की बात?’’

‘‘बताओ या रहने दो, पर अभी आप को एक महीना और करवटें बदलनी पड़ेंगी.’’ ‘‘बैठो न जरा,’’ कहते हुए अमित ने अल्पना की कलाई पकड़ ली.

‘‘छोडि़ए, दीदी जाग रही हैं.’’ अमित ने घबरा कर एकदम कलाई छोड़ दी.

‘‘डर गए न? डरपोक कहीं के,’’ मुसकराते हुए अल्पना चली गई. सुबह दफ्तर जाने से पहले अमित मेनका के पास बैठा हुआ कुछ बातें कर रहा था. मुन्ना बराबर में सो रहा था.

तभी अल्पना कमरे में आई और अमित की ओर देखते हुए बोली, ‘‘जीजाजी, आप तो बहुत बेशर्म हैं.’’ यह सुनते ही अमित के चेहरे का रंग उड़ गया. दिल की धड़कनें बढ़ गईं. वह दबी आवाज में बोला, ‘‘क्यों?’’

‘‘आप ने अभी तक मुन्ने के आने की खुशी में दावत तो क्या, मुंह भी मीठा नहीं कराया.’’ अमित ने राहत की सांस ली. वह बोला, ‘‘सौरी, आज आप की यह शिकायत भी दूर हो जाएगी.’’

शाम को अमित दफ्तर से लौटा तो उस के हाथ में मिठाई का डब्बा था. वह सीधा रसोई में पहुंचा. अल्पना सब्जी बनाने की तैयारी कर रही थी. अमित ने डब्बा खोल कर अल्पना के सामने करते हुए कहा, ‘‘लो साली साहिबा, मुंह मीठा करो और अपनी शिकायत दूर करो.’’

मिठाई का एक टुकड़ा उठा कर खाते हुए अल्पना ने कहा, ‘‘मिठाई अच्छी है, लेकिन इस मिठाई से यह न समझ लेना कि साली की दावत हो गई है.’’ ‘‘नहीं अल्पना, बिलकुल नहीं. दावत चाहे जैसी और कभी भी ले सकती हो. कहो तो आज ही चलें किसी होटल में. एक कमरा भी बुक करा लूंगा. दावत तो सारी रात चलेगी न.’’

‘‘दावत देना चाहते हो या वसूलना चाहते हो?’’ कह कर अल्पना हंस पड़ी. अमित से कोई जवाब न बन पड़ा. वह चुपचाप देखता रह गया.

एक सुबह अमित देर तक सो रहा था. कमरे में घुसते ही अल्पना ने कहा, ‘‘उठिए साहब, 8 बज गए हैं. आज छुट्टी है क्या?’’ ‘‘रात 2 बजे तक तो मुझे नींद ही नहीं आई.’’

‘‘दीदी को याद करते रहे थे क्या?’’ ‘‘मेनका को नहीं तुम्हें. अल्पना, रातभर मैं तुम्हारे साथ सपने में पता नहीं कहांकहां घूमता रहा.’’

‘‘उठो… ये बातें फिर कभी कर लेना. फिर कहोगे दफ्तर जाने में देर हो रही है.’’ ‘‘अच्छा यह बताओ कि नरेन की वापसी कब तक है?’’

‘‘कह रहे थे कि काम बढ़ गया है. शायद 4-5 दिन और लग जाएं. अभी कुछ पक्का नहीं है. वे कह रहे थे कि हवाईजहाज से दिल्ली तक पहुंच जाऊंगा, उस के बाद ट्रेन से यहां तक आ जाऊंगा.’’ ‘‘अल्पना, तुम मुझे बहुत तड़पा रही हो. मेरे गले लग कर किसी रात को यह तड़प दूर कर दो न.’’

‘‘बसबस जीजाजी, रात की बातें रात को कर लेना. अब उठो और दफ्तर जाने की तैयारी करो. मैं नाश्ता तैयार कर रही हूं,’’ अल्पना ने कहा और रसोई की ओर चली गई. एक शाम दफ्तर से लौटते समय अमित ने नींद की गोलियां खरीद लीं. आज की रात वह किसी बहाने से मेनका को 2 गोलियां खिला देगा. अल्पना को भी पता नहीं चलने देगा. जब मेनका गहरी नींद में सो जाएगी तो वह अल्पना को अपनी बना लेगा.

अमित खुश हो कर घर पहुंचा तो देखा कि अल्पना मेनका के पास बैठी हुई थी. ‘‘अभी नरेन का फोन आया है. वह ट्रेन से आ रहा है. ट्रेन एक घंटे बाद स्टेशन पर पहुंच जाएगी. उस का मोबाइल फोन दिल्ली स्टेशन पर कहीं गिर गया. उस ने किसी और के मोबाइल फोन से यह बताया है. तुम उसे लाने स्टेशन चले जाना. वह मेन गेट के बाहर मिलेगा,’’ मेनका ने कहा.

अमित को जरा भी अच्छा नहीं लगा कि नरेन आ रहा है. आज की रात तो वह अल्पना को अपनी बनाने जा रहा था. उसे लगा कि नरेन नहीं बल्कि उस के रास्ते का पत्थर आ रहा है. अमित ने अल्पना की ओर देखते हुए कहा, ‘‘ठीक है, मैं नरेन को लेने स्टेशन चला जाऊंगा. वैसे, तुम्हारे मन में लड्डू फूट रहे होंगे कि इतने दिनों बाद साजन घर लौट रहे हैं.’’

‘‘यह भी कोई कहने की बात है,’’ अल्पना बोली. ‘‘पर, नरेन को कल फोन तो करना चाहिए था.’’

‘‘कह रहे थे कि अचानक पहुंच कर सरप्राइज देंगे,’’ अल्पना ने कहा. अमित उदास मन से स्टेशन पहुंचा. नरेन को देख वह जबरदस्ती मुसकराया और मोटरसाइकिल पर बिठा कर चल दिया.

रास्ते में नरेन मुंबई की बातें बता रहा था, पर अमित केवल ‘हांहूं’ कर रहा था. उस का मूड खराब हो चुका था. भीड़ भरे बाजार में एक शराबी बीच सड़क पर नाच रहा था. वह अमित की मोटरसाइकिल से टकराताटकराता बचा. अमित ने मोटरसाइकिल रोक दी और शराबी के साथ झगड़ने लगा.

शराबी ने अमित पर हाथ उठाना चाहा तो नरेन ने उसे एक थप्पड़ मार दिया. शराबी ने जेब से चाकू निकाला और नरेन पर वार किया. नरेन बच तो गया, पर चाकू से उस का हाथ थोड़ा जख्मी हो गया. यह देख कर वह शराबी वहां से भाग निकला.

पास ही के एक नर्सिंग होम से मरहमपट्टी करा कर लौटते हुए अमित ने नरेन से कहा, ‘‘मेरी वजह से तुम्हें यह चोट लग गई है.’’ नरेन बोला, ‘‘कोई बात नहीं भाई साहब. मैं आप को अपना बड़ा भाई मानता हूं. मैं तो उन लोगों में से हूं जो किसी को अपना बना कर जान दे देते हैं. उन की पीठ में छुरा नहीं घोंपते.

‘‘शरीर के घाव तो भर जाते हैं भाई साहब, पर दिल के घाव हमेशा रिसते रहते हैं.’’ नरेन की यह बात सुन कर अमित सन्न रह गया. वह तो हवस की गहरी खाई में गिरने के लिए आंखें मूंदे चला जा रहा था. नरेन का हक छीनने जा रहा था. उस से धोखा करने जा रहा था. उस का मन पछतावे से भर उठा.

दोनों घर पहुंचे तो नरेन के हाथ में पट्टी देख कर मेनका व अल्पना दोनों घबरा गईं. अमित ने पूरी घटना बता दी. कुछ देर बाद अमित रसोई में चला गया. अल्पना खाना बना रही थी.

नरेन मेनका के पास बैठा बात कर रहा था. अमित को देखते ही अल्पना ने कहा, ‘‘जीजाजी, आप तो बातोंबातों में फिसल ही गए. क्या सारे मर्द आप की तरह होते हैं?’’

‘‘क्या मतलब…?’’ ‘‘लगता है दिल हथेली पर लिए घूमते हो कि कोई मिले तो उसे दे दिया जाए. आप को तो दफ्तर में कोई भी बेवकूफ बना सकती है. हो सकता है कि कोई बना भी रही हो.

‘‘आप ने तो मेरे हंसीमजाक को कुछ और ही समझ लिया. इस रिश्ते में तो मजाक चलता है, पर इस का मतलब यह तो नहीं कि… अब आप यह बताइए कि मैं आप को जीजाजी कहूं या मजनूं?’’ ‘‘अल्पना, तुम मेनका से कुछ मत कहना,’’ अमित ने कहा.

‘‘मैं किसी से कुछ नहीं कहूंगी पर आप तो बहुत डरपोक हैं,’’ कह कर अल्पना मुसकरा उठी. अमित चुपचाप रसोईघर से बाहर निकल गया. Story in Hindi

Inspirational Story in Hindi : हकीकत

Inspirational Story in Hindi. कमलेश चाय पीती जा रही थीं और एकटक सामने बैठी गिरिजा देवी की ओर देखती जा रही थीं. वे सोचने लगीं कि ऐसी बात उन से कैसे पूछी जाए. किसी लड़की के चरित्र की बात पूछने पर रिश्तों में कड़वाहट भी आ सकती है और रिश्ता टूट भी सकता है.

अगर वे लड़की के बारे में नहीं पूछतीं, तो जो उन्होंने सुना है, वह गलत नहीं माना जा सकता.

यह बात अगर महल्ले में फैल गई कि उन की होने वाली बहू पेट गिरा कर आई है, तो चुल्लूभर पानी में डूब मरने वाली बात होगी. कोई उन्हें बोलने तक नहीं देगा. आखिर वे क्या करें?

चाय पी कर कमलेश ने कप ट्रे में रख दिया. गिरिजा देवी ट्रे को ले कर अंदर चली गईं. वे होने वाली समधिन के लिए रसोई में नाश्ते का इंतजाम करने लगीं.

कमलेश ने यह बात अपने बेटे उमेश को भी बताई थी, पर उमेश ने कहा था, ‘मां, मैं रजनी को अच्छी तरह से जानता हूं. वह सुशील और अच्छे संस्कारों वाली लड़की है. हमारा संबंध तोड़ने के लिए आप से किसी ने चुगली की है.’

उमेश की बात सुन कर कमलेश को तब चुप रह जाना पड़ा था.

उमेश और रजनी एक ही कालेज में पढ़ते थे. दोनों पक्के दोस्त थे. दोनों बहुत अच्छी पेंटिंग बनाते थे. पेंटिंग की वजह से ही दोनों में दोस्ती हुई थी. फिर दोनों एकदूसरे के घर आनेजाने लगे थे. इस दौरान उमेश ने रजनी को अच्छी तरह जांचापरखा था. उस के चरित्र पर शक की तो कोई गुंजाइश ही नहीं थी.

यही वजह थी कि रजनी से शादी करने की बात भी अपने घर वालों से खुद उमेश ने ही चलाई थी. किसी मौडर्न मातापिता की तरह उमेश के मातापिता ने भी बिना किसी विरोध के यह रिश्ता स्वीकार कर लिया था, इसीलिए मां के मुंह से यह बात सुन कर कि रजनी पेट गिरा कर आई है, उमेश को यकीन नहीं हुआ था.

गिरिजा देवी हलवा और बिसकुट ले आई थीं. वे बोलीं, ‘‘लो समधिनजी, नाश्ता करो.’’

‘‘मुझे भूख नहीं है, आप खाओ.’’ ‘‘यह तो हलका भोजन है. बिना भूख के भी चल जाएगा.’’

कमलेश खाने लगीं. गिरिजा देवी सामने रखी कुरसी पर बैठ गईं.

‘‘इस तरह मत बैठो, आप भी तो खाओ समधिनजी,’’ कमलेश ने प्यार से कहा, तो गिरिजा देवी भी खाने लगीं.

कमलेश एक स्कूल में टीचर थीं. उन के पति का देहांत हो गया था, इसलिए उमेश की शादी में पिता की भूमिका वही निभा रही थीं. रजनी के बारे में शक भरी बातें उन की एक सहेली ने बताई थीं, इसलिए सचाई जानने के लिए वे यहां चली आई थीं.

गिरिजा देवी के पति आगरा में बैंक में नौकरी करते थे, इसलिए उन का सामना सीधा समधिन से हुआ था, पर डर रही थीं कि बात कैसे शुरू करें. कहीं बात झूठी निकली तो.

फिर भी कमलेश ने हिम्मत बांध कर कह डाला, ‘‘समधिनजी, मुझे आप से कुछ बातें करनी हैं.’’

गिरिजा देवी ने हंस कर कहा, ‘‘किस बारे में?’’

कमलेश मन को मजबूत करते हुए बोलीं, ‘‘रजनी के बारे में.’’

गिरिजा देवी के चेहरे पर तुरंत हैरानी के भाव छा गए. वे बोलीं, ‘‘हां बोलो, क्या बातें करनी हैं?’’

‘‘मैं ने सुना है कि रजनी पेट गिरा कर…’’ कहतेकहते कमलेश के शब्द गले में ही अटक गए.

मगर गिरिजा देवी साफसाफ बोलीं, ‘‘समधिनजी, आप ने ठीक ही सुना है.’’

कमलेश ने समझा कि गिरिजा देवी नाराज हो गईं, इसलिए वे बोलीं, ‘‘इस में बुरा मानने वाली कोई बात नहीं है. हम ने तो किसी से यह सुना था. अब आंखों देखी मक्खी तो निगली नहीं जा सकती. इसीलिए आप के पास आई हूं कि यह तो पता चले कि इस बात में कितनी सचाई है.’’

‘‘मैं भी सच कह रही हूं समधिनजी कि यह बात पूरी तरह सच है,’’ गिरिजा देवी ने मजबूती से कहा.

यह सुन कर कमलेश के चेहरे पर कठोरता छा गई. उन्होंने नाश्ते की प्लेट एक ओर सरका दी और गुस्से में बोलीं, ‘‘तो फिर यह बात तुम ने सगाई से पहले हमें क्यों नहीं बताई? हमारे साथ इतना बड़ा धोखा क्यों किया?

‘‘आप ने कैसे सोच लिया कि रजनी हमारे घर की बहू हो जाएगी? बात कैसी भी हो, एक न एक दिन सभी को पता लग जाती है.’’

‘‘वह तो ठीक है समधिनजी. आप ने जो सुना है, वह सच है और केवल उसे सुन कर कोई भी सास किसी लड़की को अपने बेटे की बहू नहीं बना सकती, मगर आप ने अधूरा सच सुना है.’’

‘‘अब पूरा सच सुनने की मुझे जरूरत भी नहीं है. जब मैं ने यह बात सुनी थी, तो मैं ने इस पर यकीन नहीं किया था. लेकिन जब तुम ही इसे सच बता रही हो, तो यह रिश्ता तोड़ना पड़ रहा है,’’ कहते हुए कमलेश कुरसी से उठ कर खड़ी हो गईं.

गिरिजा देवी ने उन का हाथ पकड़ लिया और बोलीं, ‘‘आप यह रिश्ता तोड़ दें, मुझे कोई दुख नहीं है, पर क्या अब यह नहीं जानना चाहोगी कि रजनी मां कैसे बनी?’’

‘‘लाई होगी किसी का पाप, हमें इस से क्या?’’

‘‘उमेश को यह रिश्ता तोड़ने की ठोस वजह भी तो बतानी होगी.’’

‘‘हां, बताइए…’’ कमलेश फिर से बैठ गईं.

गिरिजा देवी ने कहना शुरू किया, ‘‘आज से 3 साल पहले रजनी 12वीं में पढ़ रही थी. वह अपने गांव जा रही थी. वह मेरे साथ थी. रात का समय था. बस अपनी पूरी रफ्तार से चल रही थी. अचानक रास्ते में बस को रुकती देख हम चौंक गए. कुछ बंदूकधारी लोग

बस में चढ़ आए थे. उन्होंने सब सवारियों को बंदूक का निशाना बना कर नीचे उतार लिया.

‘‘सभी से रुपए और गहने लूट लिए. औरतों से जबरन बलात्कार किया गया, जिस का शिकार हम दोनों को होना पड़ा. तकरीबन आधा घंटा उन्होंने यह खौफनाक खेल खेला.

‘‘रजनी तो इस हादसे से बेहोश हो चुकी थी. कई महीनों बाद रजनी ने महसूस किया कि उस के पेट में उन दरिंदों का पाप पल रहा है.

‘‘पर शर्म और झिझक की वजह से उस ने यह बात किसी को नहीं बताई. जब 4-5 महीने का पेट हो गया, तब एक दिन मुझे बताया. एक नर्सिंग होम में जा कर तब इस का पेट गिरवाया.’’

यह सुनतेसुनते कमलेश के चेहरे की कठोरता न जाने कहां गायब हो गई.

गिरिजा देवी बोलीं, ‘‘समधिनजी, आप यह रिश्ता भले ही तोड़ दें, हमें कोई एतराज नहीं है, पर यह बात किसी और को मत बताना. इस घटना की वजह से रजनी की कई सगाई टूट चुकी हैं. उमेश और रजनी की दोस्ती की बात सुन कर हमें उम्मीद बंधी थी कि अब सगाई नहीं टूटेगी.

‘‘आप समझदार हैं, टीचर हैं, अब आप ही बताइए कि इस में रजनी का क्या कुसूर है?

‘‘गहराई से सोचें कि यह हादसा आप के साथ हुआ होता, तब आप पर क्या बीतती? आप अपने दिल पर हाथ रख कर सोचें कि क्या यह रिश्ता तोड़ कर आप रजनी के साथ इंसाफ कर रही हैं? अगर आप की सोच से यह ठीक है, तो आप यह रिश्ता तोड़ सकती हैं.’’

गिरिजा देवी की बात सुन कर कमलेश हैरान रह गईं. उन्होंने गिरिजा देवी का कंधा थपथपा कर कहा, ‘‘समधिनजी, इस बात के लिए माफी चाहती हूं कि मैं ने आप का दिल दुखाया. मैं सच से वाकिफ नहीं थी, इसलिए गुस्से में न जाने क्याक्या कह गई.

‘‘अब आप कोई चिंता नहीं करें. मैं सब संभाल लूंगी. आप शादी की तैयारियां कीजिए.’’

कमलेश की बात सुन कर गिरिजा देवी का दिल एकदम हलका हो गया. उन की निगाह दीवार पर टंगी रजनी द्वारा बनाई गई उस पेंटिंग पर चली गई, जिस में ऊपर लिखा था, ‘औरत ही औरत को मुक्ति दिला सकती है.’

Emotional Story in Hindi : लड़का

Emotional Story in Hindi-

‘‘कैसा लगा लड़का तुम्हें?’’ नंदराम ने अपनी बीवी प्रभावती से पूछा.

‘‘और तो सब ठीक है, पर…’’ प्रभावती हिचक गईं.

‘‘तो अपनी संगीता ही कहां की…’’ यह कहते हुए नंदराम भी हिचके. प्रभावती कुछ सोचती हुई सी चुप ही रहीं.

नंदराम प्रभावती के साथ सुबह पैसेंजर रेलगाड़ी से ही गए थे और लड़का देख कर शाम तक वापस इसलिए आ जाना चाहते थे कि वे लड़की को घर पर अकेली नहीं छोड़ना चाहते थे.

एक बार वे दोनों गलती कर चुके थे. बात तब की है, जब उन्होंने मकान के बाहर की बैठक इंटर कालेज में नए आए अंगरेजी के टीचर कीर्ति बाबू को किराए पर दे दी थी. संगीता प्राइवेट बीए कर रही थी. अंगरेजी पूछने वह उस एमए पास टीचर कीर्ति से बैठक में जाने लगी थी.

एक दिन प्रभावती ने संगीता और उस टीचर के बीच बैठक के एकांत में कुछ ऐसावैसा देख लिया था.

नंदराम को सावधान करती हुई वे बोली थीं, ‘मास्टर कीर्ति की आदतें अच्छी नहीं हैं. लालच छोड़ो और उसे किराए की बैठक से निकाल बाहर करो.’

प्रभावती की बात को नंदराम समझ गए. लिहाजा, दूसरे दिन ही उन्होंने उस टीचर को निकाल बाहर किया.

बुरा यह हुआ कि नंदराम के पुश्तैनी दुश्मन जयकिशन बाबू, जिन का घर गली में ठीक नंदराम के घर के सामने था, ने अपना बाहर का कमरा उस टीचर को किराए पर दे दिया.

किराए पर देते हुए जयकिशन बाबू ने टीचर कीर्ति बाबू से कहा, ‘हमारा होनहार लड़का हाईस्कूल में है. कसबे के सभी लड़कों की तरह वह भी अंगरेजी में कमजोर है. उसे अपनी तरह फर्राटेदार अंगरेजी सिखा दें.’’

एक दिन प्रभावती ने पति नंदराम को बताया, ‘कीर्ति बाबू पड़ोसी के चबूतरे पर लगे हैंडपंप से जब पानी भरते हैं, तो संगीता ऊपर छत पर चढ़ कर मुंडेर से उन्हें देखने के लिए झांकती है.’

यह सुनते ही नंदराम परेशान हो गए. नातेरिश्तेदारों के यहां उस के रिश्ते के लिए दौड़ लगाने लगे. जल्दीजल्दी में जो भी लड़का जहां भी मिले, वे संगीता को ब्याह कर कसबे से बाहर कर बदनामी से बचने की कोशिश में जुट गए.

वे मन ही मन सोचा करते, ‘आदमी किसी से नहीं हारता, पर अपनी औलाद से हार जाता है.’

एक दिन संगीता को प्रभावती के सामने नंदराम ने समझाने और जिंदगी की ऊंचनीच बताने की कोशिश की, तो संगीता समझ गई कि पापा यह सब उस से क्यों कह रहे हैं.

पिता से तो उस ने कुछ नहीं कहा, पर बाद में वह मां से बोली, ‘किसी से तो करेंगे हमारी शादी. कीर्ति बाबू क्या बुरे हैं? नौकरी से लगे हैं, देखनेसुनने में भी अच्छे हैं. फर्राटेदार अंगरेजी बोलते हैं.

‘बड़े घर के लड़के हैं. पिता की खासी जमीनजायदाद है. घर पर मोटरसाइकिल है. खुद के पास मोबाइल फोन रहता है. वे होनहार हैं. जल्दी अच्छी जगह पहुंच जाएंगे.’

‘पर वे तो पहले से ही शादीशुदा हैं. सुना है, बीवी बहुत पढ़ीलिखी और किसी अच्छी नौकरी से लगी है. कीर्ति बाबू से ज्यादा कमाती है, पर कीर्ति बाबू के साथ रह कर वह अपनी नौकरी नहीं कर सकती थी और वह नौकरी छोड़ने को राजी नहीं है.

‘कीर्ति बाबू को ससुराल में घरजंवाई बन कर रहना पसंद नहीं, इसलिए नौकरी पर यहां चले आए. लाख अच्छे हों वे, पर हैं तो शादीशुदा…’ प्रभावती बोलीं.

‘क्या फर्क पड़ता है इस से?’ संगीता ने मुंहफट हो कर कहा, ‘बीवी बहुत नकचढ़ी है. अपनी नौकरी और बाप के पैसे का घमंड है उसे. सीधेसच्चे कीर्ति बाबू उस से ब्याह कर के बुरे फंस गए हैं. आजकल शहरों में ऐसे तमाम लोग हैं, जो नौकरी की जगह अलग औरत रखते हैं और शहर में दूसरी औरत…’

‘पागल हुई है क्या? दिमाग खराब है तेरा?’ मां ने फटकारा, ‘ऐसी ऊलजलूल बातें कहीं सोची जाती हैं? कल को बीवी के बच्चे होंगे, तब तू क्या करेगी? बीवी दबंग हुई, तो जूतमपैजार करेगी तुझ से. पुलिस में जा धमकेगी. इतनी बात तू नहीं समझ पा रही?’

अब जब लौट कर वे दोनों स्टेशन पर उतरे, तो नंदराम ने बीवी से फिर बात छेड़ी, ‘‘संगीता जरूर पूछेगी. क्या कहोगी?’’

‘‘कुछ भी कहें, पर संगीता इस रिश्ते के लिए तैयार नहीं होगी,’’ प्रभावती बोलीं, ‘‘लड़का ज्यादा पढ़ालिखा नहीं है. शहर में बरतनों की दुकान करता है.’’

‘‘पर कमाता ठीकठाक है. संगीता को सारे सुख मिलेंगे,’’ नंदराम बोले.

प्रभावती बोलीं, ‘‘ऐसे लड़के को वह कभी भी पसंद नहीं करेगी.’’

‘‘जिस लड़के को देखा था, वह 2 भाई थे. बड़े भाई को बदमाशों ने पैसे के लालच में अपहरण कर लिया था. यह लड़का पुलिस में रिपोर्ट कर आया. बदमाशों ने पैसे की मांग रखी. पुलिस भी बदमाशों से मिली हुई थी. इस लड़के के मन में लालच आ गया. पैसा नहीं दिया. नतीजा यह हुआ कि उन्होंने बड़े भाई की हत्या कर दी. अब पूरी दुकान और मकान का खुद मालिक है.’’

‘‘जो भाई अपने सगे भाई को दगा दे सकता है, वह तुम्हारी संगीता को दगा नहीं देगा, इस बात का क्या भरोसा है?’’ प्रभावती ने शक जाहिर किया.

‘‘तो क्या हम उसे कीर्ति बाबू को सौंप दें?’’ नंदराम बुरी तरह झल्लाए, ‘‘उस की पहले से बीवी है. कल को मार कर भगा देगी वह, फिर खिलाना बेटी को अपने घर बैठा कर जिंदगीभर.’’

‘‘और भी 2-4 लड़के सुने हैं हम लोगों ने. उन्हें क्यों न देखा जाए?’’ प्रभावती ने कहा.

‘‘और तब तक अपनी संगीता के पैर डगमगा गए तो? वह कीर्ति बाबू के साथ ज्यादा उलझ गई तो? कुछ ऊंचनीच हो गई, तो कहीं मुंह दिखाने लायक नहीं रहेंगे. कसबे को तो देख ही रही हो. बात फैलते देर नहीं लगेगी,’’ कुछ सोच कर वे बोले, ‘‘हम तो कहते हैं, लंगड़ा है तो क्या हुआ, बरतनों की चलती दुकान है. खासा कमा लेता है. अब सारी जायदाद का अकेला मालिक है.

‘‘शक्लोसूरत और पहननाओढ़ना क्या मतलब रखता है आजकल? संगीता को इस शादी के लिए तैयार करना ही चाहिए.’’

हालांकि वे खुद समझ रहे थे, संगीता कैसे भी राजी नहीं होगी इस संबंध के लिए. कहीं कुछ उलटासीधा कर बैठी, तो लड़की से भी हाथ धो बैठेंगे.

वही हुआ. प्रभावती ने संगीता को हंसते हुए सबकुछ सामान्य ढंग से बताया. देखे हुए लड़के की तमाम खूबियां गिनाईं, पर कमियों को भी छिपाया नहीं. आखिर रिश्ते का सवाल था. लड़की बरात आने पर बिदक गई, तो कसबे में बड़ी बदनामी होगी. 2-3 बरातें ऐसे अनमेल संबंधों के चलते लड़कियां दरवाजे से लौटा चुकी हैं. संगीता ने भी ऐसा किया, तो क्या होगा?

संगीता सहेली के घर जाने के बहाने कसबे के कालेज में चली गई और कीर्ति बाबू को जा कर सबकुछ बता दिया.

यह सुन कर कीर्ति बाबू मुसकराए और बोले, ‘‘जिंदगी में चलतेचलते तमाम सवाल हमें ऐसे ही घेर कर खड़े हो जाते हैं संगीता… और अकसर हम परेशानी में पड़ जाते हैं, हम यह तय नहीं कर पाते कि क्या करें, क्या न करें.’’

‘‘लेकिन, हमें जवाब तो तलाशने पड़ेंगे सर… आप बताइए कि हम क्या करें?’’ संगीता ने पूछा.

‘‘यह तुम्हारी जिंदगी है. इस का फैसला तुम्हें करना चाहिए. जिस फैसले पर पहुंचो, उस पर तुम्हें मजबूत रहना चाहिए. तुम क्या सोच रही हो?’’ वे संगीता की आंखों में ताक रहे थे.

संगीता ने सिर झुका लिया और बोली, ‘‘मैं तो आप के अलावा किसी के बारे में कुछ नहीं सोच पा रही.’’

‘‘लेकिन मेरे बारे में तुम्हें सब पता है. तुम मुझे अच्छी लगती हो, इस में शक नहीं. लेकिन हर चीज जो हमें अच्छी लगे, जरूरी नहीं है, वह हासिल भी हो जाए. हासिल करने की हिम्मत भी मुझ में नहीं है… मेरी बीवी झगड़ालू है, यह मैं अच्छी तरह से जानता हूं. वह मेरी और तुम्हारी जिंदगी नरक बना देगी, इस का एहसास मुझे है.’’

‘‘तब? तब क्या मैं आप को पाने के सपने न देखूं?’’ संगीता ने सवाल पूछा.

कीर्ति बाबू काफी देर तक चुप रहे, फिर बोले, ‘‘मांबाप से कहो कि तुम्हारे लिए कोई और अच्छा लड़का देखें, जो तुम्हारे लायक हो… तुम उस के साथ खुश रह सको,’’ मन मार कर कीर्ति बाबू ने संगीता को सलाह दी.

‘‘गांव में आप को ले कर मेरी बदनामी शुरू हो गई है. बात कल को बढ़ जाएगी,’’ संगीता बोली, ‘‘लड़का मिलना आसान तो नहीं है. समय लग सकता है और मैं आप से मिले बिना रह नहीं सकती… ऐसे में क्या होगा?’’

‘‘पिताजी से कहो, तुम्हें पढ़ने के लिए शहर भेज दें,’’ कीर्ति बाबू बोले, ‘‘वहां मन लगा कर पढ़ो. कंप्यूटर सीखो. हुनर बढ़ाओ और जब रिश्ता ठीक सा मिल जाए, ब्याह कर लेना.

‘‘मैं भी नहीं चाहता कि यह नौकरी तुम्हारी वजह से खो बैठूं. नौकरी न रही, तो बीवी मुझ पर और दबाव डालेगी कि उस के साथ रहूं, जो मैं नहीं चाहता.’’

उम्मीद नहीं थी कि कीर्ति बाबू उसे इस तरह टरका देंगे. वह उन्हें साहसी मान रही थी. उन के साथ बिना शादी के ही रहने को तैयार हो रही थी, पर अब तो हालात ही बदल गए थे.

संगीता ने घर आ कर मां से कहा, ‘‘जहां आप लोग लड़का देख आए हैं, उसी से रिश्ता तय कर दीजिए…’’

नंदराम ने सुना, तो उन्हें अपने कानों पर यकीन नहीं हुआ, पर वे बहुत खुश हो गए और शहर चले गए.  Emotional Story in Hindi

Hindi Short Story : आखिरी ख्वाब एक छत

Hindi Short Story. ‘‘मुझे बचा लीजिए. कुछ गुंडे मेरे पीछे पड़े हैं,’’ एक हांफती लड़की को उस नौजवान ने चौंकते हुए देखा, जो अचानक सामने से भागती हुई उस की मोटरसाइकिल से टकराई थी.

मोटरसाइकिल वाले नौजवान ने पूछा, ‘‘तुम कौन हो?’’   ‘‘नजराना,’’ नौजवान के सवाल को भांपते हुए नजराना ने फौरन कहा.

‘‘बैठो…’’ उस नौजवान के कहने पर नजराना जल्दी से मोटरसाइकिल पर बैठ गई.

वह नौजवान नजराना को अपने घर ले आया था, क्योंकि रात के 11 बजे उसे कहीं छोड़ना मुनासिब नहीं लगा.

‘‘पानी पी लो,’’ नौजवान ने पानी का गिलास उसे थमाया और खुद उस के सामने कुरसी पर बैठ गया.

नजराना ने एक सहमी हुई नजर उस पर डाली, फिर एक सांस में पूरा गिलास खाली कर दिया. उस ने खाली गिलास कांपते हाथों में दबोच लिया और घूरघूर कर पूरे घर को देखने लगी.

खूबसूरत बरामदा था, दीवार पर बड़ीबड़ी तसवीरें लगी थीं. कमरा कुछ बुजुर्गों की तसवीरों से सजा हुआ था. बरामदे के ठीक बीच में एक बड़ा सा सोफा रखा था.

‘‘देखिए, यहां आप को डरने की कोई जरूरत नहीं है. आप मेरे घर में पूरी तरह से महफूज हैं,’’ वह नौजवान मुसकरा कर बोला और चंद सवाल करने लगा, ‘‘आप कहां रहती हैं?’’

‘‘मैं उत्तर प्रदेश के एक गांव की हूं,’’ नजराना ने खाली गिलास मेज पर रखा और धीरे से बोली.

‘‘यहां दिल्ली में कैसे?’’ यह सुन कर वह चुप रही.

‘‘कहां जाना है? आप के मांबाप का क्या नाम है? जब तक आप बताएंगी नहीं, तब तक मैं आप को वहां भला कैसे पहुंचाऊंगा?’’ उस नौजवान ने पूछा, तो जवाब में नजराना फूटफूट कर रोने लगी.

‘‘मेरा कोई नहीं है. मुझे कहीं नहीं जाना,’’ नजराना थोड़ी देर बाद कुछ सोच कर बोली.

‘‘क्यों?’’ वह नौजवान हैरान होते हुए बोला. ‘‘मैं घर से भागी हुई लड़की हूं.’’

‘‘क्या?’’ यह सुन कर उस नौजवान को जोर का झटका लगा.

‘‘हां, मैं घर से भागी हुई हूं, पर मुझे घर से भागने पर मेरे अपने ही घर वालों ने मजबूर किया था,’’ नजराना को पहली बार कोई ऐसा मिला था, जिस से वह अपने दिल का हाल बताने पर मजबूर हो गई थी.

नजराना ने बताया, ‘‘हम 4 बहिनें थीं. घर में सब से बड़ी मैं ही थी. मां की एक बेटे की आस में 4 लड़कियों ने घर में कदम रख लिया था.

‘‘अब्बा को हम से कोई लगाव नहीं था. अम्मां की गालीगलौज व मारपीट के साथ हम बड़ी हो गईं.

‘‘अम्मां का जुल्म बढ़ता गया. दहेज की खातिर मेरा रिश्ता टूट गया. तब मेरा वजूद ही कहीं खो गया था.

‘‘एक दिन अम्मां ने मुझे बहुत मारापीटा और कहा, ‘जा, कहीं जा कर डूब मर या किसी के साथ अपना मुंह काला कर के भाग जा. यहां से कम से कम मेरे सीने का बोझ तो कम होगा. न जाने कौन से जन्म का हम से बदला ले रही है. इतनी लड़कियां देने के बजाय 4 बेटे ही दे देता.’

‘‘मैं ने घर की सारी जिम्मेदारी संभाल रखी थी. मगर इस तरह रोजरोज मां की गालियां, मारपीट सह कर मेरा दिलोदिमाग खराब हो गया. खुद को खत्म करने के इरादे से मैं तनहा घर से निकल गई, लेकिन जैसा मैं ने सोचा था, ऐसा बिलकुल नहीं हुआ. मैं दुनिया जितनी आसान समझती थी, वैसी थी नहीं.

‘‘रास्ते में मुझे कुछ शराबियों, जुआरियों ने पकड़ लिया. वे मुझे बेचने के इरादे से शहर ले आए, पर मैं अपनी इज्जत बड़ी मुश्किल से बचा कर भाग निकली.’’

‘‘तुम अब कहां जाओगी?’’ उस नौजवान ने नजराना की आपबीती सुनने के बाद पूछा.

‘‘किसी ने कहा है कि लड़की उस कटी पतंग की तरह होती है, जिसे हर कोई अपनी जागीर समझ कर लूटने के लिए दौड़ पड़ता है. ऐसे हालात में मैं ने देख लिया है कि जमाना कितना भी बदल जाए, मगर औरत को हर रूप में मर्द की जरूरत होती है, चाहे वह भाई हो, बाप हो या शौहर का साथ.

‘‘हर औरत का आखिरी ख्वाब एक छत होती है. न तो मेरे पास छत है और न ही किसी मर्द का साथ. बस, अब मैं इज्जत के साथ मरना चाहती हूं,’’ कहते हुए वह भावुक हो गई.

‘‘अगर आप चाहें तो… मेरा मतलब है, आप गलत बात कर रही हैं मरने की. आप मुझे अच्छी लगीं, जो आप ने अपनेपन से मुझे सब सचसच बता दिया.

‘‘आज रात आप चाहें तो…’’ वह नौजवान कुछ आगे कहना चाह रहा था, तभी अंदर से कुछ गिरने की आवाज आई, तो दौड़ कर वह कमरे में भागा.

नौजवान के पीछे नजराना भी भागी. अंदर कमरे में एक बूढ़ी औरत बिस्तर के करीब नीचे बेसुध पड़ी थी. उस का चेहरा एकदम पीला लग रहा था.

नौजवान ने फौरन उस बूढ़ी औरत को उठा कर बिस्तर पर लिटाया और डाक्टर को बुलाने के लिए तुरंत फोन किया.

नौजवान ने बगल वाले कमरे से नजराना से पानी लाने को कहा. वह दौड़ती हुई उस कमरे में पहुंची और झटपट पानी ले कर आ गई. उस का हर दर्द हर गम जैसे छूमंतर हो गया था.

अब उसे नौजवान का दर्द अपना सा लग रहा था. बूढ़ी औरत नौजवान की अम्मी थीं. वे हाई ब्लड प्रैशर की मरीज थीं. डाक्टर ने आ कर अम्मी का चैकअप किया और दवाएं दीं.

नजराना रातभर अम्मी की सेवा में लगी रही. नौजवान भी अपनी अम्मी की देखभाल कर रहा था, मगर सुबह होते ही कमरे से निकल कर वह कुछ परेशान सा लग रहा था, फिर सिर झटक कर नहाने चला गया.

जब अम्मी की आंख खुली, तो देखा कि नजराना उन के सिरहाने बैठी उन का सिर दबा रही थी.

अम्मी बोलीं, ‘‘क्या नाम है तुम्हारा?’’ उन के सपाट लहजे से नजराना को बिलकुल हैरानी नहीं हुई थी. रात से ही उस के मन में हजारों खयाल उमड़घुमड़ रहे थे कि नौजवान की अम्मी के सवालों का वह कैसे जवाब देगी.

‘‘बेटी, तुम ने नाम नहीं बताया,’’ अम्मी के दोबारा पूछने पर वह चौंक कर अपनी सोच से बाहर आ गई और धीरे से बोली, ‘‘जी, नजराना.’’

अम्मी ने हौले से कहा, ‘‘मेरा नवेद लाखों में एक है. किसी तरह की बुराई उस में नहीं है. लेकिन दुनिया इतनी भी अच्छी नहीं है, यह तो तुम जान ही चुकी हो,’’ अम्मी नजराना का सहारे ले कर बैठ गईं.

उस नौजवान का नाम नवेद है, यह नजराना जान गई थी, मगर अम्मी के मुंह से अपने बारे में जान कर वह सन्न रह गई.

‘‘नजराना, इतनी हैरान मत हो. मैं ने सब सुन लिया है. तुम्हारी अम्मी ने ठीक नहीं किया. एक औरत हो कर एक औरत पर जुल्म करे.

‘‘बेटी, मैं मानती हूं, तुम ने जो किया था, सही था, पर जुल्म देख कर भागना जुर्म है, बहादुरी वह है, जो जुल्म को भगा दे,’’ अम्मी ने समझाया, तो नजराना सिर हिला कर रह गई.

अम्मी ने उसे बांहों में समेट लिया, तभी नवेद चायनाश्ते के साथ अंदर आया.

अम्मी के साथ नजराना को यों देख नवेद के दिल में सुकून सा उतर गया.

‘‘नवेद,’’ अम्मी ने पुकारा. ‘‘जी, अम्मी…’’ नवेद ने इतमीनान से कहा, ‘‘आप की तबीयत कैसी है?’’

‘‘मैं ठीक हूं, क्योंकि मेरी बेटी ठीक है,’’ अम्मी ने अपने दिल की बात कही.

‘‘मैं समझा नहीं,’’ नवेद ने कहा. ‘‘मेरी बेटी को इस के घर छोड़ कर आओ. नजराना की अम्मी से कहना कि मैं उन से मिलने आऊंगी. मुझे उन से एक खास बात करनी है,’’ अम्मी के कहने पर नवेद के चेहरे पर शरारती मुसकराहट फैल गई थी.  Hindi Short Story

–एनएसएन अंसारी

Self-Confidence Story : माला का विश्वास

Self-Confidence Story: ‘‘अरे, इस लड़की को कितना समझाएं कि लड़कियों को अपने अंदर पहनने वाले कपड़ों को छिपा कर सुखाना चाहिए, ताकि किसी मर्द की नजर इन पर न पड़ जाए, पर यह लड़की है कि अपनी समीज हमेशा खुले में ही डाल देती है,’’ माला की मां शांता बड़बड़ाए जा रही थीं और इसी गुस्से में भर कर उन्होंने अपनी बेटी माला को आवाज दी और खरीखोटी सुनाने लगीं.

मां की डांट से माला सहम गई और तार पर सूख रही अपनी समीज को उठा कर कुरते के नीचे कर दिया.

18 साल की माला का शरीर भरा हुआ था, पर इस उम्र में भी वह घर पर सिली हुई सूती कपड़े की समीज ही पहना करती थी, क्योंकि उस की पुराने खयालों की मां का मानना था कि शादी से पहले लड़कियों को समीज ही पहननी चाहिए.

माला की मां दुकान पर जा कर ब्रा खरीदने को बेशर्मी मानती थीं और खुद भी अपने लिए घर पर सिले कपड़े ही पहना करती थीं.

पिछले दिनों ही जब माला को अपने सीने के उभार कुछ ज्यादा उठे हुए से लगने लगे थे, तो उस ने घर की सिलाई मशीन से ही अपनी समीज को खूब टाइट सिल दिया, ताकि वह उस के बदन पर चिपक कर फिट हो, जिस से उस का सीना ज्यादा उभरा न लगे.

उत्तर प्रदेश के बड़े शहर गोरखपुर से तकरीबन 80 किलोमीटर की दूरी पर कप्तानगंज नाम का यह छोटा कसबा था. इसी कसबे में शांता अपने पति और 18 साल की बेटी माला के साथ रहती थीं. शांता बेहद दकियानूसी और पुरानी विचारधारा की थीं और अपनी एकलौती बेटी पर हमेशा सख्ती करती थीं.

शांता के पति ट्रक ड्राइवर थे और अकसर बाहर ही रहते थे. महीने में एक बार घर आते और तब वे अपनी बेटी माला से खूब सारी बातें करते.

माला के पापा उस की मां के मुकाबले थोड़े खुले विचारों के थे, लेकिन माला की मां को तो जैसे अपने विचारों को छोटा रखने में ही अच्छा लगता था, तभी तो पिछले हफ्ते जब माला का 18वां जन्मदिन था तो माला ने अपनी मां से दबे स्वर में कहा कि उस के साथ की सभी लड़कियां अपने जन्मदिन पर केक काटती हैं और होटल में अपनी सभी सहेलियों को पार्टी देती हैं. दिनभर बाहर घूमतीफिरती हैं, तो माला की बात सुन कर उस की मां ने कितना डांटा था उसे… और ऐसी घूमने वाली लड़कियों को आवारा कहते हुए इन लड़कियों से दूर रहने की सलाह दे डाली थी.

मा ला का मन होता कि टीवी चला कर नए फिल्मी गानों पर डांस करे, पर अपनी मां के चलते वह ऐसा नहीं कर पाती थी, क्योंकि माला की मां का कहना था कि नए फिल्मी गानों में फूहड़ता और नंगापन दिखाया जाता है, इसलिए वे नए गानों के बजाय पुराने जमाने के गाने ही सुनने पर जोर देती थीं और अकसर तो टीवी बंद कर के माला को अपनी पढ़ाई पर धयान देने को कहती थीं.

नए जमाने की लड़की माला. उस का भी एक मन था जो कहता था कि घूमोफिरो, बाहर खाओपियो और मौजमस्ती करो. उस का भी एक बौयफ्रैंड हो, जिस से वह अपने मन की बात कह सके और उस की बाइक पर बैठ कर अपने बालों को हवा में लहराए, पर मां की सख्ती के चलते माला की दोस्ती का दायरा सीमित हो कर रह गया था.

माला और उस की सहेली रिया एक दिन घर के बाहर टहलते हुए आपस में बातें कर रही थीं.

‘‘तेरा यह पर्स बहुत सुंदर लग रहा है,’’ माला ने रिया से कहा, तो रिया ने इठलाते हुए बताया कि यह उस के बौयफ्रैंड ने उसे गिफ्ट किया है. यह सुनते ही माला का मुंह उतर गया.

‘‘कोई मुझे गिफ्ट क्यों नहीं देता?’’ माला ने हताशा भरे स्वर में कहा.

‘‘क्योंकि तेरा कोई बौयफ्रैंड नहीं है. बौयफ्रैंड बना ले यार, मन को थोड़ा अच्छा लगेगा और गिफ्ट भी मिलेंगे,’’ रिया ने राय दी.

बातोंबातों में माला ने रिया से राय मांगी कि उस का कोई बौयफ्रैंड क्यों नहीं है, तो रिया ने अपनी नजर को माला के सीने पर चिपकाते हुए कहा, ‘‘तुम्हें अपनी ड्रैसिंग सैंस पर ध्यान देना चाहिए और थोड़ा स्टाइलिश दिखना होगा, तभी कोई लड़का तेरी तरफ ध्यान देगा.

‘‘बुरा मत मानना पर तुम्हारे इस चपटे और लटके हुए सीने को देख कर कोई लड़का तुम्हारी तरफ ध्यान नहीं देगा. लड़कियों का सीना तो तना हुआ और उठा हुआ ही सैक्सी लगता है,’’ रिया ने आंखों के इशारे से अपना सीना दिखाते हुए कहा, तो माला ने देखा कि रिया के उभार तो वाकई में सुगठित, सुडौल और तने हुए लग रहे थे, जिस से रिया की खूबसूरती कई गुना ज्यादा लग रही थी और रिया काफी फिट भी दिख रही थी.

दूसरी तरफ माला ने महसूस किया कि उस के समीज पहनने के चलते उस के उभार तो लटक से गए हैं, जिस के चलते वह उम्र से काफी बड़ी दिख रही थी और सैक्सी भी नहीं लग रही थी.

‘‘अरे, पर ये तो छिपा कर रखने वाली चीज हैं. मां कहती हैं कि इन्हें तान कर नही घूमना चाहिए. क्या यह अपने बदन का शो औफ करना नही होगा?’’ माला ने कहा तो रिया ने उसे बताया, ‘‘इस में कुछ गलत नहीं है. मर्द भी तो जिम में अपनी बौडी और मसल्स बनाते हैं और फिर उन्हें दिखाते फिरते हैं. जब उस में कुछ गलत नहीं है तो हम लड़कियां भी तो अपनी बौडी को क्यों छिपा कर रखें? हम अपनी देह को क्यों न यूज करें और क्यों न फायदा उठाएं?’’

ये सारी बातें माला की समझ  में अच्छी तरह आ गई थीं और उसे लगने लगा था कि वाकई में उसे अपने ऊपर ध्यान देना होगा.

अगले दिन ही माला ने मां से बताया कि वह रिया को ले कर गोरखपुर जा रही है, पढ़ाई के लिए कुछ जरूरी किताबें लानी हैं, तो मां ने मना तो नहीं किया, पर जल्दी घर वापस आने का निर्देश जरूर दिया.

रिया और माला गोरखपुर के जैनिथ नाम के मौल में गईं, जहां रिया ने अपने लिए जींस और टौप जैसे मौडर्न कपड़े खरीदे, पर माला अब भी शरमा रही थी. कुछ देर बाद उस की नजर हैंगर पर लटकी हुई एक लाल रंग की ब्रा पर पड़ी.

माला ने इधरउधर देखा कि कोई देख तो नहीं रहा है और फिर नजरें झुकाए हुए ब्रा उठाई और ट्रायल रूम में जा कर ब्रा को शरमाते हुए पहन कर देखा. ब्रा के हुक बंद करते हुए माला ने अपनेआप को आईने में निहारा. कितनी सुंदर हो गई थी वह. उस के उभार कसावट से भर गए थे.

माला ने खुद को आगे से देखा, फिर अपनी पीठ घुमा कर देखी. उस की सुंदरता में चार चांद लग गए थे.

माला ने बिना देर किए ही ब्रा खरीदने का फैसला कर लिया और साथ ही अपने लिए एक ट्रैक सूट भी खरीद लिया.

वापसी में रिया और माला ने कुछ जरूरी किताबें भी खरीद लीं और शाम से पहले घर वापस आ गईं.

माला जब घर पहुंची, तो उस की मां की आंखें तनी हुई थीं, पर माला सिर्फ मां को देख कर मुसकरा दी और सीधा अपने कमरे मे चली गई और जल्दी से ब्रा का पैकेट अपने बिस्तर के नीचे छिपा दिया.

अगली सुबह माला ने नहाने के बाद बाथरूम में ब्रा पहनी और बाकी कपड़े पहन कर कालेज जाने लगी लगी. उस के चेहरे पर नया सा आत्मविश्वास था, क्योंकि अंदर ही अंदर उसे महसूस हो रहा था कि वह बहुत सुंदर दिख रही है.

कालेज में भी आज माला की निगाहें पहले की तरह झुकी हुई नहीं थीं, बल्कि वह सभी नजरों से नजरें मिला कर चल रही थी. एक तेज हवा के झोंके ने माला की जुल्फों को उड़ा दिया और उस का दुपट्टा सीने से ढलक गया.

माला ने दुपट्टे को संभालने की कोई जरूरत नहीं समझी, बल्कि वह शान के साथ आगे बढ़ती रही. आज वह अपनी सुंदरता को छिपा नहीं रही थी और न ही दुपट्टा गिरने पर उसे शर्म आ रही थी.

क्लास में माला के साथ पढ़ने वाले लड़के रवि ने उसे ऊपर से नीचे तक देखा, तो तो माला रोमांचित हुए बिना न रह सकी. उसे आज इस तरह लोगों का घूरना बुरा नहीं, बल्कि अच्छा लग रहा था.

क्लास में आज माला का फोकस पढ़ाई पर भी था. क्लास खत्म कर के वह वापस घर आई, तो आईने के सामने खड़े हो कर खुद को देखने लगी.

मां ने माला को टोक दिया, ‘‘क्या बात है आजकल बहुत सजनेसंवरने लगी हो?’’

माला पहली बार घबराई नहीं, बल्कि हलकी सी मुसकराहट के साथ उस ने कहा, ‘‘अपने लिए थोड़ा अच्छा महसूस करने और शरीर को फिट रखने में कोई बुराई तो नहीं है न मां…’’

माला की बात सुन कर शांता चुप तो हो गईं, पर तुरंत ही उन की नजर माला के सुडौल और तने हुए उभारों पर गई, ‘‘अंदर क्या पहन रखा है तुम ने… यह ब्रा कहां से लाई तुम?’’

इन सवालों के बदले में माला ने शांत जवाब दिया, ‘‘यह ब्रा मैं खरीद कर लाई हूं. यह महज एक कपड़ा ही तो है, इसे ले कर इतना हंगामा क्यों है? मां, ये पुराने जमाने के खयालात ठीक नहीं लगते अब.’’

माला की बात सुन कर शांता चुप हो गईं, पर उन के दिमाग में कुछ चल रहा था.

अगले दिन माला ने लोकल अखबार में एक विज्ञापन देखा, जिस में नजीराबाद महल्ले में बनी एक मोटरसाइकिल एजेंसी के लिए कंप्यूटर की जानकारी रखने वाली एक रिसैप्शनिस्ट की जरूरत थी.

माला को अपने जेबखर्च के लिए पैसों की जरूरत तो रहती ही थी और फिर इस जौब की टाइमिंग भी उसे सूट कर रही थी, पर वह अच्छी तरह जानती थी कि पुराने विचारों वाली मां उसे कभी भी नौकरी नहीं करने देंगी, तो माला ने तुरंत ही अपने पापा को फोन मिलाया और उन से पार्टटाइम जौब करने के लिए परमिशन मांगी.

पापा ने इस शर्त पर हां कर दी कि जौब करने के चलते उस की पढ़ाई में कोई परेशानी न हो.

पापा का राजीनामा मिलते ही माला खुश हो गई थी और इंटरव्यू की तैयारी करने लगी थी.

अगले दिन शाम को इंटरव्यू था. माला अच्छी तरह से तैयार हो कर पहुंची थी. इस समय माला ने अपने कंधे के साइड में दुपट्टे को डाला हुआ था और पूरे आत्मविश्वास के साथ इंटरव्यू के सवालों का सामना किया.

‘‘आप ने बताया कि आप पढ़ाई करती हैं, तो इस के साथसाथ आप इस जौब को ईमानदारी और लगन से कैसे कर पाएंगी?’’ तीखा सा सवाल पूछा गया था माला से, पर माला ने पूरे आत्मविश्वास से कहा, ‘‘जब कोई इनसान किसी काम को करने की ठान लेता है तो रास्ते खुद ही बन जाते हैं सर.’’

माला का जवाब इंटरव्यू लेने वालों को पसंद आया और उसे 6,000 रुपए प्रतिमाह की जौब पर रख लिया गया.

माला इसलिए भी खुश थी कि जौब की टाइमिंग शाम को 3 बजे से रात के 8 बजे तक ही थी, इसलिए वह कालेज के साथसाथ अपनी पढ़ाई भी आराम से कर सकती थी.

पर जब माला ने जौब की बात अपनी मां को बताई तो वे भुनभुनाने लगीं, ‘‘अब यही बचा था कि घर की लड़की रात को घर लौटेगी और अंगरेजी स्टाइल के कपड़े पहनेगी,’’ पर मां की बात का माला पर कोई असर नही हुआ और उस ने अगले दिन से ही जौब पर जाना शुरू कर दिया.

माला ने अगले दिन जब पहली बार दफ्तर में कदम रखा तो उस के अंदर एक नया सा आत्मविश्वास था. नजीराबाद की उस बाइक एजेंसी के बाहर खड़े हो कर उस ने एक गहरी सांस ली, जैसे किसी नई दुनिया में दाखिल होने जा रही हो.

एजेंसी के अंदर ग्राहकों की बातचीत और कंप्यूटर की टिकटिक मिल कर एक अलग ही माहौल बना रहे थे, माला ने रिसैप्शन की कुरसी संभाली और कंप्यूटर औन किया. शुरुआत में थोड़ी झिझक थी, पर जैसेजैसे समय बीतता गया, वह सहज होती गई. ग्राहकों से बात करते समय उस की आवाज में अब पहले जैसी हिचक नहीं थी, बल्कि एक संतुलित आत्मविश्वास था.

शाम के तकरीबन साढ़े 6 बजे, दुकान में एक परिचित चेहरा दाखिल हुआ… रवि.

‘‘अरे… तुम यहां?’’ रवि ने हलकी मुसकान के साथ पूछा.

माला ने भी मुसकरा कर जवाब दिया, ‘‘हां, अब यहीं काम करती हूं.’’

रवि ने चारों ओर नजर घुमाई और फिर उस की तरफ देख कर बोला, ‘‘तुम पहले से अलग लग रही हो… मतलब, ज्यादा आत्मविश्वासी और अधिक सुंदर भी.’’

यह सुन कर माला के चेहरे पर हलकी सी लाली आ गई, लेकिन इस बार उस ने नजरें नहीं झुकाईं, ‘‘शायद… अब मैं खुद को थोड़ा समझने लगी हूं,’’ उस ने धीमे से कहा.

उस दिन के बाद रवि कभीकभी एजेंसी पर आने लगा, कभी कोई बाइक का पार्ट खरीदने या नई लौंच हुई बाइक को देखने के बहाने, तो कभी बस यों ही दोनों के बीच बातचीत बढ़ने लगी. पढ़ाई, शहर, सपने और जिंदगी…

उधर घर में माला की मां शांता अपनी बेटी के बदले हुए रंगढंग सबकुछ चुपचाप देख रही थीं, पर कुछ कह और कर नहीं पा रही थीं.

एक रात, जब माला खाना खा कर अपने कमरे में जा रही थी, शांता ने उसे रोक लिया, ‘‘माला, यह सब जो तुम कर रही हो… क्या यह सही रास्ता है?’’ उन की आवाज में गुस्सा कम, चिंता ज्यादा थी.

माला कुछ पल चुप रही, फिर धीरे से बोली, ‘‘मां, मैं गलत कुछ नहीं कर रही, बस अपने पैरों पर खड़ा होना सीख रही हूं.’’

‘‘लेकिन दुनिया इतनी सीधी नहीं है,’’ शांता ने कहा.

माला ने इस बार उन की आंखों में देख कर जवाब दिया,’’ तो फिर मुझे ही मजबूत बनना पड़ेगा न मां.’’

उस रात शांता देर तक जागती रहीं. उन्हें अपनी बेटी पहली बार बड़ी लग रही थी. सिर्फ उम्र में नहीं, सोच में भी.

और माला वह अपने कमरे में आईने के सामने खड़ी थी. अब वह खुद को सिर्फ एक लड़की के रूप में नहीं, बल्कि एक इनसान के रूप में देख रही थी, जिस के अपने फैसले हैं, अपने सपने हैं.

अब रवि का कालेज में मिलना, फिर एजेंसी पर आना जैसे रोज की आदत बन गया था.

एक दिन रवि ने हंसते हुए कहा, ‘‘तुम्हारी वजह से मुझे  अलगअलग बाइक की इतनी जानकारी हो गई है कि घर वाले भी हैरान हैं.’’

माला भी हलके से मुसकराई, ‘‘तो फिर तुम्हें कमीशन मिलना चाहिए मुझे  से.’’

दोनों हंस पड़े. धीरेधीरे उन की बातें लंबी होने लगीं. मोबाइल नंबर ले लिया गया और फिर लंबी बातें और बातें अब सिर्फ ‘कैसी हो’ तक सीमित नहीं थीं. वे अपनेअपने सपनों की बात करने लगे.

‘‘मैं चाहता हूं कि आगे चल कर अपना खुद का काम शुरू करूं,’’ रवि ने एक दिन कहा.

माला ने उत्सुकता से पूछा, ‘‘और मैं… मैं बस इतना चाहती हूं कि अपने पैरों पर खड़ी हो जाऊं, ताकि किसी पर बोझ  न रहूं.’’

रवि ने उस की तरफ देखते हुए कहा, ‘‘तुम पहले से ही बहुत मजबूत हो माला.’’

रवि की यह बात माला के दिल को छू गई. उसे पहली बार लगा कि कोई उसे समझ  रहा है. दिन बीतते गए और महीने का आखिर आ गया.

आज माला को उस की पहली सैलरी मिली थी. पूरे 6,000 रुपए. उस ने पैसे हाथ में लिए तो उस की आंखों में हलकी सी चमक आ गई. ये सिर्फ पैसे नहीं थे, बल्कि यह उस की मेहनत, उस का आत्मविश्वास और उस की पहचान थी.

घर पहुंचते ही माला ने बिना कुछ कहे वे पैसे अपनी मां के हाथ में रख दिए.

‘‘यह क्या है?’’ शांता ने चौंक कर पूछा.

माला ने ठोस स्वर में कहा, ‘‘मेरी पहली कमाई आप के लिए.’’

कुछ पल के लिए घर में सन्नाटा छा गया. शांता देवी उन पैसों को देखती रहीं, फिर अपनी बेटी को… उन के चेहरे पर जो सख्ती हमेशा रहती थी, वह धीरेधीरे पिघलने लगी, आंखों में नमी उतर आई, ‘‘तू तू ने यह सब हमारे लिए किया?’’ उन की आवाज भर्रा गई.

माला ने हलकी मुसकान के साथ कहा, ‘‘आप के लिए ही तो कर रही हूं मां, ताकि आप को कभी किसी चीज की कमी न हो.’’

शांता ने बिना कुछ कहे माला को अपने सीने से लगा लिया. पहली बार था जब उन की पकड़ में गुस्से की जगह अपनापन था.

उस दिन के बाद शांता का रवैया बदलने लगा. वे अब भी अपनी सोच में पूरी तरह नहीं बदली थीं, लेकिन अब वे माला को रोकती भी नहीं थीं. उन्हें समझ  आ गया था कि उन की बेटी अब छोटी नहीं रही, अब वह  अपना भलाबुरा खुद सोच सकती है और अपने कपड़े भी खुद चुन सकती है. और सब से बड़ी बात वह गलत रास्ते पर नहीं, बल्कि अपने चुने गए सही रास्ते पर चल रही है.

उधर माला भी अब पहले से ज्यादा सुकून में थी. घर में समझदारी बढ़ रही थी और बाहर रवि के साथ उस की दोस्ती एक खूबसूरत मोड़ ले रही थी… धीरेधीरे, बिना किसी जल्दबाजी के.

फिलहाल वे दोनों एकदूसरे से शादी के बारे में नही सोच रहे थे, पर दोनों दोस्त रहते हुए एक अच्छा कैरियर तो जरूर बना लेना चाहते थे.

माला अब समीज नहीं पहनती थी, बल्कि उस की अलमारी में एक से एक डिजाइनर ब्रा का कलैक्शन था और अपनी इन ब्रा को वह कपड़ों के नीचे छिपा कर नहीं सुखाती थी.Self-Confidence Story

Manoranjak Kahanhi : नाता

Manoranjak Kahanhi. छमिया ने गीले कपड़े निचोड़ कर छत पर बंधे तार पर डालने के लिए नजर उठाई, तो भरेभरे बदन के सांवले श्यामू को अपनी ओर ताकते पाया.

हालांकि छमिया के देखने पर श्यामू थोड़ा असहज जरूर हुआ और उस ने अपने बालों को इस तरह झटका दिया, जैसे उस की नजर अभी छमिया पर है और वह उस से नजरें हटा भी रहा है, मगर सच बात की चुगली उस की झेंपी नजरें कर रही थीं.

छमिया की जिन झील जैसी आंखों में डूबने को मन उतावला था, उन की एक हिलोर ही श्यामू को मेमना बना गई थी. भरेपूरे बदन पर जवानी का वसंत खिलाए छमिया ने तो उस से कुछ कहा भी नहीं था, पर श्यामू चाहने पर भी उसे दोबारा देखने की हिम्मत न जुटा सका.

वह तो कहो, अकेलेपन से ऊबी छमिया ने ही बात संभाल ली और कहा, ‘‘तुम तो लड़कियों की तरह शरमाते हो. अरे, मुझे  ही देख रहे थे न? कोई बात नहीं. अब मुंह क्यों छिपाते हो?’’

गांव में इतनी खुली हंसी हंस कर ऐसी बात कहने वाली औरत के बारे में श्यामू ने कभी सपने में भी नहीं सोचा था. वह तो शहर से इम्तिहान दे कर आया था और गांव में बोरियत से बचने के लिए शाम को छत पर बैठ गया था. पास के मिले घर की छत पर आई छमिया पर उस की नजर पड़ गई और पहली नजर में ही उस के मन की हालत जाने क्याक्या होने लगी.

छमिया की बात ने श्यामू को कुछ भरोसा दिया. वह हकलाते हुए बोला, ‘‘म…म… मैं ने सोचा कि तुम बुरा मान गई हो.’’

‘‘यह लो, सालभर बाद तो तुम नजर आए और मैं बुरा मान कर बैठ जाऊं. फिर बुरा किस बात का? हम लोग तो देवरभाभी ठहरे, जिन में हंसीमजाक होता ही रहता है. तुम्हारा नाम जरूर श्यामू है, पर तुम में कृष्ण वाले कोई गुण नहीं हैं. हां, राधा की तरह शरमाते जरूर हो,’’ छमिया श्यामू को निगाहों में तौलते हुए मुसकरा कर बोली.

‘‘कृष्ण बनूंगा तो किसी गोपी की भी जरूरत पड़ेगी न,’’ किसी तरह हिम्मत बांध कर श्यामू कह गया.

‘‘क्या इतने बड़े इलाहाबाद में तुम्हें कोई गोपी ही नहीं मिली?’’ छमिया की आंखें मुसकरा रही थीं और देह में मस्ती दिख रही थी.

‘‘अगर मिली होती, तो तुम्हें क्यों ताकता?’’ छमिया के खुलेपन ने श्यामू को ढीठ बना दिया था.

‘‘तो कब आ रहे हो माखनदही चुराने?’’ यह कहते हुए छमिया की आंखों में न्योता था.

पासपड़ोस के लोग ज्यादा दिनों बाद गांव आते हैं, तो घरघर में उन का मेहमान जैसा स्वागत होता है. वैसे तो श्यामू भले ही न जाता, पर अब तो जाना उस के मन की मजबूरी बन गया.

‘‘दहीमाखन के बजाय चाय ही मिल जाए, तब आ जाऊं,’’ कह कर श्यामू मुसकरा उठा. उस के चेहरे पर हसरत बरस रही थी.

‘‘तो अभी आ जाओ, लेकिन दरवाजे से आना, ताकि तुम्हारी चाची कुछ और न सोचने लगें. अभी वे दरवाजे पर अन्ना दीदी को बैठा कर गई हैं. जैसे मैं अकेली रहूंगी, तो भाग जाऊंगी,’’ छमिया हंसी, तो श्यामू रीझ  कर रह गया.

छमिया का पति सुशील 7 साल से बाहर कमाई कर रहा था. यही देख कर तो छमिया की मां ने कहा था, ‘बेटी राज करेगी, लड़का बड़ा कमाऊ है.’

मां की बात तो ठीक थी. सुशील ठेके पर काम ले कर अच्छी कमाई कर के घर बनवाने के अलावा 2 एकड़ खेत भी खरीद चुका था. दरवाजे पर 2 भैंसें भी बंधी थीं. जब वह गांव आता, तो छमिया के लिए बढि़या कपड़े और छोटामोटा जेवर भी लाता. घर में खानेपीने की कमी नहीं थी. पर पेट के अलावा भी तनमन में कोई भूख जगती है. इस बात को सुशील भले न जानता हो, पर छमिया उस से अनजान नहीं है.

जाड़े की रातें, सावनभादों की झाड़ी, गरमी की लंबी दोपहरें क्या तनमन को बेचैन नहीं करती हैं? पर यह क्या छमिया के कहने की बातें हैं? अंधे के आगे रोने से क्या फायदा?

एक बार तो छमिया ने सुशील से कहा भी था, ‘अब बाहर कमाने की जरूरत नहीं है. यहां खानेखर्चने भर को खेत हैं ही. उन्हीं में पसीना बहाएंगे, तो धरती माता दुखी नहीं रहने देंगी. तुम्हारे बिना अकेला घर काट खाता है.’

‘क्यों, घर में अम्मां और दीदी नहीं रहतीं? चौपाल पर बापू तो रहते ही हैं,’ कहते हुए सुशील हंसा था.

‘तुम हंसते हो. इन सब की नजरें कोतवाल की नजरें हैं. औरत का खयाल रखने वाली नजर तो अपने आदमी की ही होती है,’ छमिया ने गंभीर हो कर कहा था. यह सुन कर सुशील ने उस के गले में अपनी बांहें डाल दी थीं.

सुशील बोला था, ‘घर बैठ कर मैं तुम्हें देखूं और तुम मुझे देखो, तो हो चुकी कमाई. जवानी में कमाया हुआ ही जिंदगीभर काम आता है.’

छमिया का मन हुआ कि कह दे अगर जवानी ही रीती बीत गई, तो कमाई में क्या आग लगाई जाएगी. मगर कह न सकी. उस के मन में आया कि कह दे कि जब और कोई देखने लगेगा, तब तुम्हारी आंखें खुलेंगी.

आज सजीली कदकाठी के श्यामू को देख कर छमिया का मन खुशी से झूमने लगा. वैसे वह बात ही क्यों करती. बातें भी तो इच्छाओं की खिड़कियां होती हैं.

10 मिनट बाद श्यामू ने दरवाजे पर बैठी अन्ना दीदी के पैर छुए और ‘चाचीचाची’ कहता हुआ सीधे आंगन में चला गया. चाची यानी छमिया की सास के बारे में उसे पता था कि वे हैं नहीं, पर बहाने के लिए ही सही, कुछ तो कहना ही था.

छमिया रसोई में पकौड़े तल रही थी. चाय तैयार हो चुकी थी.

श्यामू को अपनी ओर आता देख कर छमिया ने अपने कमरे की ओर इशारा कर दिया.

छमिया का सजाधजा कमरा उस की सुरुचि की गवाही दे रहा था. श्यामू को खुशी हुई. वह कोने में रखी कुरसी पर बैठ गया.

जब छमिया चायनाश्ता ले कर आई, तो वह बोली, ‘‘यह लो, अजनबियों की तरह किनारे बैठ गए. सीधे पलंग पर आ जाओ. यहां तो देवरभाभी ही हैं… है न? इतनी दूरी ठीक नहीं होती है. न आओ, तो मैं बांह पकड़ कर उठाऊं.’’

श्यामू को लगा, अगर उस ने देर की, तो छमिया बांह पकड़ ही लेगी. वह उठ कर पलंग पर बैठ गया.

श्यामू ने पकौड़ों की तारीफ की, तो छमिया बोली, ‘‘मुझे बनाओ मत. अच्छे होते, तो 2 पकौड़ों में ही हाथ न जोड़ जाते.’’

‘‘तुम्हें बनाने की मेरी कूवत कहां है? पर जिस ने बनाया है, फुरसत में बनाया है. फिर तुम्हारे पकौड़े क्यों न अच्छे होंगे?’’ श्यामू ने उस की आंखों में झांक कर कहा.

‘‘सच कहना. तुम्हारे भैया ने तो कभी यह नहीं कहा,’’ लाज की गुलाबी लाली छमिया के गोरे मुंह में घुल कर बिखर गई.

‘‘भैया यही जानते तो बाहर क्यों पड़े होते? हीरे की कदर तो जौहरी ही जानता है,’’ श्यामू ने हंस कर कहा.

बात छमिया के मन में उतर गई. श्यामू इतना प्यारा उसे पहले कभी नहीं लगा था. उस का मन तन को भी पिघला रहा था. पर छमिया बहू थी, जिस पर अपनी नहीं, समाज की बेडि़यां हैं. दरवाजे पर बैठी 40 साल की विधवा ननद की नजरें, सास की नजरें, ससुर की मर्यादा उस के मन की लहरों पर भारी पड़ रही थीं. वह पकौड़े खाना भूल गई थी.

श्यामू ने कहा, ‘‘मेरी बात बुरी लगी हो, तो माफ करना. तुम तो पकौड़े खाना तक भूल गई हो. अब मैं भी नहीं खाऊंगा.’’

श्यामू उठने को हुआ, तो अनजाने ही छमिया ने हाथ पकड़ कर उसे बैठा लिया. अब श्यामू से न रहा गया. उस ने छमिया के मुंह में पकौड़ा ठूंसते हुए कहा, ‘‘तुम न खाओगी, तो मैं भी नहीं बैठूंगा.’’

छमिया को मुंह खोलना पड़ा. एक पल में बेतकल्लुफी बढ़ गई और वह श्यामू की ओर ऐसे अपनेपन से देखने लगी, जिस का अनुभव श्यामू ने सारी जिंदगी नहीं किया था. उसे लगा कि ऊपर से सुखी छमिया भाभी के मन में जाने कितनी सावनभादों की घटाएं हैं, जो बरसने को बेचैन हैं.

श्यामू को जाना अच्छा नहीं लग रहा था, पर छमिया की मर्यादा की खातिर उठने लगा, तो कमरे के दरवाजे तक आई छमिया ने कहा, ‘‘रात 11 बजे आना. मेरे कमरे की कुंडी खुली रहेगी. और हां, छत पर पैर न रखना. मुंडेरमुंडेर ही आना, नहीं तो दारोगा साहब यानी तुम्हारी दीदी कुत्ते की नींद सोती हैं, तूफान मचा देंगी,’’ उस ने श्यामू का हाथ पकड़ लिया.

श्यामू ने अपनी बांहें उस के गले में डाल कर आंखों में झांकते हुए कहा, ‘‘और अगर दीदी अपने बाहरी कमरे का दरवाजा खोल कर आंगन में इधरउधर झांकीं तो?’’

‘‘इतना डरते हो? आंगन की तरफ से कुंडी बंद कर लूंगी. वे बाहर भले ही चली जाएं, अंदर आने का रास्ता ही न रहेगा,’’ छमिया ने श्यामू का शक दूर करते हुए उसे विदा किया.

कई दिन बीत जाने पर अन्ना दीदी को लगा कि छमिया आजकल बहुत खिली सी रहती है. खानेपीने की चीजें अच्छी बनती हैं. उन की कुटिल बुद्धि ने सोचा कि हो न हो, दाल में कुछ काला है. उन्हें लगा कि श्यामू के आने के बाद से ही यह बदलाव हुआ है. वह पता लगाएंगी. यों भी उन्हें नींद कम ही आती थी, पर उस रात तो वे सोई नहीं.

रात के 11 बजे अन्ना दीदी को लगा जैसे कोई छत से नीचे उतरा है. वे बोलीं, ‘‘बहू, यह आवाज किस की थी?’’

‘‘बिल्ली कूदी है. दूधमट्ठा खा कर इस पर जवानी चढ़ी है न. दिनभर काम में मरोखपो, बाद में ये नींद में खलल करें,’’ छमिया ने जवाब दिया.

अन्ना दीदी ने चुप रहना ही ठीक समझा. वे ननद हैं, पर मायके पर बहू जैसा उन का हक कैसे होगा. यह बेटे की बहू है, तभी झल्लाती है. होगी बिल्ली, उन्हें क्या? वे तो चोरचकार के मारे बोली थीं.

वे अनमनी हो कर लेट गईं. तब तक उन के कानों में श्यामू की हंसी गूंजी.

वह धीरे से बोला, ‘‘उलटा चोर कोतवाल को डांटे.’’

‘‘कोतवाली सहतेसहते प्राण घुट गए हैं,’’ छमिया की आंखों में आंसू थे.

अब अन्ना दीदी से रहा न गया. उन्होंने कुछ सुना, कुछ न सुना. पर उन के मन का शक बढ़ गया. मरदानी हंसी के होने का शक बढ़ गया. अजीब बात है, दरवाजा उन के कमरे से ही है. कोई है, तो आया कहां से? पूछने पर बहू गुर्राती है.

वे दरवाजा खोल कर खुद नजर डाल लेंगी, इसी सोच से आंगन की ओर का दरवाजा खोला, पर वह खुल न सका. खुलता भी कैसे? छमिया ने उस में कुंडी जो लगा दी थी.

दीदी के दरवाजा भड़भड़ाने पर छमिया बोली, ‘‘दिनभर हाड़ जला कर काम करो, रात में बारबार दरवाजा मुझ से न खोला जाएगा.’’

‘‘तुम ने दरवाजा बंद ही क्यों किया?’’ दीदी ने अपना सब से बड़ा दांव चल दिया.

‘‘अब मैं अपने घर में दरवाजा भी बंद नहीं कर सकती. तुम्हारे कमरे में आ कर आवारा कुत्ते बंद रह जाते हैं. सवेरे उन की गंदगी क्या मेरा बाप साफ करेगा?’’ बात इतने ताव में कही गई थी कि अन्ना दीदी सन्न रह गई थीं.

अब उन के पास यही चारा था कि भाई से कह कर जी हलका करें, ताकि उन पर समय रहते चेताने का दोष न लगे. घर में एक मोबाइल फोन है, वह इन्हीं रानी के पास रहता है. पड़ोस के मोबाइल वालों के मोबाइल पर हर बात कही नहीं जा सकती है.

फिर भी उन्होंने भाई को फोन किया और वह आया भी. दीदी ने उस से अपने कमरे में ही कहासुना भी.

जब त्योरी चढ़ाए सुशील कमरे में घुसा, तो छमिया टपटप आंसू बहा रही थी. वह बोला, ‘‘रोओ नहीं, साफसाफ बताओ?’’

‘‘मेरी मानोगे? मैं तो यहां पराई हाड़ हूं. और तो सब तुम्हारे अपने ही हैं. उन की सुनो. मुझे  मेरे मायके छोड़ दो या जहर की गोलियां ला दो. न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी,’’ छमिया ने सुशील के गले में बांहें डाल कर कहा. उस की हिचकियां बंध गई थीं.

सुशील सोच में पड़ गया. हो सकता है, दीदी को धोखा हुआ हो, पर इसे दरवाजा तो अंदर से बंद न रखना चाहिए था. वह बोला, ‘‘अच्छा, तुम ने आंगन का दरवाजा अंदर से बंद क्यों किया था?’’

‘‘अब मेरा मुंह मत खुलवाओ,’’ छमिया आंसू पोंछते हुए बोली.

‘‘क्यों, क्या बात है?’’ यह कहते हुए सुशील सकते में आ गया.

‘‘यह जांघ खोलो तो अपनी लाज जाती है, वह खोलो तो…’’ आगे की बात उस ने अधूरी सी छोड़ दी.

‘‘साफसाफ कहो, पहेली न बुझाओ,’’ सुशील सुनने को बेचैन था.

‘‘इन के कमरे में जाने कौनकौन आता है और क्याक्या होता है. यह देखने से अच्छा है, मैं इधर का दरवाजा ही बंद कर लेती हूं. सुनोगे, तो हैरान रह जाओगे. इन का क्या बिगड़ेगा? तुम जेल में होगे या फिर मैं इन्हीं की तरह विधवा हो जाऊंगी. ये तो यही चाहती हैं.

‘‘अब या तो मुझे मायके छोड़ दो या अपने साथ लिए चलो. जिस इज्जत के लिए तुम रातदिन एक किए हो, उस का उछलना मैं न देख सकूंगी,’’ सुशील के गले में बांहें डाल कर सिसकसिसक कर छमिया ने कहा.

सुशील ने अपने हाथों से उस के आंसू पोंछ कर कहा, ‘‘मायके जाने का नाम न लो. यहां तुम्हारे जिम्मे घर की मर्यादा है. मैं खुद अब यहीं रहूंगा, कमाई बहुत हो गई. हराम का खाखा कर झूठमूठ का लांछन लगाने वालों की असलियत मैं भी देखूंगा.’’

दरवाजे की ओट से सबकुछ सुनती अन्ना दीदी के तो होश उड़ गए. वे सोच नहीं पा रही थीं, किस जगह जमीन फटे और वे समा जाएं.

इस ठगिनी के इस ढंग से समझने के बाद क्या सुशील उन की बात सुनेगा या मानेगा? वे खुद अपनी ससुराल के झोपड़े में रहेंगी, लेकिन यह लांछन न सहेंगी. औरत के सामने बकरा बने आदमी से बहस करना बेकार है.

और छमिया सोच रही थी, ‘पहले ही यह अक्ल आ जाती, तो यह नौबत ही क्यों आती. खैर, मैं आगे से श्यामू को मना कर दूंगी. श्यामू कोई मेरा मर्द तो है नहीं, जिस से कोई नाता हो.’ Manoranjak Kahanhi

–मदनमोहन पांडेय

Hindi Superstition Story : अशुभ

Hindi Superstition Story. मेरी नानी कहती हैं कि अगर सुबह दूध गिर जाए, तो बहुत अशुभ होता है. अम्मां खड़ीखड़ी पैर से ले कर सिर तक थरथर कांप रही थीं. मैं ने देखा कि उन के हाथ से सुबहसुबह आधा लिटर दूध गिर कर बहने लगा था.

दरअसल, अम्मां लो ब्लडप्रैशर की मरीज थीं. उन्हें चक्कर आना, दिल घबराना, पूरा जिस्म हिलना जैसी तमाम शिकायतें थीं. वे इतनी पतलीदुबली थीं कि  झटका खाते ही गिर जाएं.

महीनेभर से अम्मां की तबीयत ज्यादा खराब थी. कमजोरी के चलते उन के हाथ से दूध का डब्बा गिर गया था.

अम्मां को अपनी जानकारी के मुताबिक मैं ने लंबाचौड़ा फलसफा सुनाया कि दूध गिरना बुरा नहीं है, बुरे तो इनसान के खयालात होते हैं.

अम्मां थोड़ी शांत हुईं, लेकिन तभी पीछे से नानी ने 5 नंबर चप्पल से मेरी पीठ पर निशाना लगाया.

मैं ने पीछे पलट कर देखा. नानी खतरनाक शिकारी बिल्ली की तरह कड़े तेवर लिए मु झे घूर रही थीं.

‘‘नानी…’’ मैं कुछ कहने ही जा रहा था कि उन्होंने एक जोरदार तमाचा मेरे गाल पर रसीद कर दिया.

‘‘बेहया, तु झे पता नहीं है कि दूध गिरना कितना अशुभ होता है. हाय…हाय, अब क्या होगा? कलमुंही, तु झे कितना सम झाया करूं,’’ नानी ने अम्मां को घूरते हुए कहा.

मेरे पिता बड़ेबड़े शहरों में बने मकानों की पुताई करते थे. वे साल में 1-2 बार आ कर हमारे ऊपर प्यार की बरसात कर देते थे. फिर मु झे और अम्मां को अपनी चहेती दकियानूसी सास के पास छोड़ कर चले जाते थे.

मैं जहर का घूंट पी कर रह गया. नानी कह रही थीं, ‘‘ऐसे ही मियांजी की पोती के हाथ से दूध गिर गया था और मियांजी का एकलौता बेटा मर गया था.’’

मियांजी के परिवार के साथ हुआ वह हादसा मैं भी कहां भूला था. बेचारी बीना को कितनी कठोर सजा भुगतनी पड़ी थी. उस हादसे को गुजरे 4 महीने बीत चुके थे, मगर लगता था कि कल की ही बात हो.

मेरी नानी के इस पक्के घर के अलावा इस गांव में सिर्फ 12-13 पक्के घर और थे. 50-60 घर कच्ची मिट्टी के बने हुए थे, जिन में से एक घर मियांजी का भी था. वे अपने छोटे से परिवार के साथ हंसीखुशी से रहते थे. उन के परिवार में उन की बीवी, एक बेटा, बहू और पोती बीना थी.

मियांजी बुजुर्ग थे. उन की सू झबू झ के पूरे गांव में चर्चे होते थे. मैं भी उन की सम झदारी का कायल था.

एक दिन मैं किसी काम से मियांजी के घर गया था. मियांजी ने बड़ी इज्जत से मु झे आंगन में बैठाया और अपनी जवान पोती से कहा, ‘‘बीना, जल्दी से बाबू के लिए दूध ले कर आओ. यह हमारे यहां कभीकभार ही आता है.’’

मियांजी ने मेरा नाम बेहद अपनेपन से ले कर कहा, तो मैं बहुत खुश हो गया था.

फिर 2-3 मिनट बाद अंदर से कुछ गिरने की आवाज आई, तभी बीना की मां और दादी लपक कर अंदर गईं. थोड़ी देर बाद भीतर से रोने की आवाज भी आने लगी. मैं घबरा गया और तुरंत मियांजी के साथ अंदर गया.

‘‘बीना, यह तू ने क्या किया?’’ बीना की मां बेदर्दी से उसे पीट रही थीं. दादी उसे कोस रही थीं.

‘‘यह आप क्या कर रही हैं?’’ मैं ने बीना की मां से कहा. दर्द से बेहाल बेचारी बीना बुरी तरह रो रही थी.

मियांजी ने जल्दी से दूध लाने को क्या कहा कि बीना हड़बड़ा गई. इसी जल्दबाजी में बीना का पैर ऊंचीनीची जगह पर आ गया और दूध के साथ नीचे आ गिरी. उस के दाएं पैर में मोच आ गई थी.

मियांजी बिना कुछ कहे कमरे से निकल कर चले गए. उन्होंने अपनी बीवी को सम झाने की जरा भी कोशिश नहीं की. मु झे लगा कि इन औरतों से ज्यादा तो मियांजी अंधविश्वासी हैं.

मैं अपना सा मुंह ले कर घर लौट आया.

शाम को मैं ने अम्मां से कहा, ‘‘अम्मां, चाय के साथ पकौड़े भी बना दो. मु झे भूख लग रही है.’’

‘‘अम्मां… भूख,’’ मैं ने दोबारा लाड़ से अम्मां का ध्यान अपनी ओर खींचने की कोशिश की.

‘‘चुप रहो. 3 दिन तक रसोई में न कड़ाही चढ़ेगी, न सब्जी में किसी तरह का तड़का लगेगा,’’ अम्मां के बजाय नानी ने आ कर मु झे 8-10 साल के बच्चे की तरह लताड़ दिया.

‘‘क्यों नानी?’’ मैं ने पूछा.

‘‘किस दुनिया में रहता है. कुछ खबर है. मियांजी का एकलौता बेटा बस हादसे में मर गया.

‘‘अरे, बस हादसे का नाम है. उसे तो दूध गिरने के अशुभ ने खा लिया. बेचारे मियांजी कितने गरीब हैं. 2 हजार रुपए मौलवी को दे दिए थे इस अशुभ को उतरवाने के वास्ते, लेकिन दूध का घोर अशुभ उतरा ही नहीं,’’ नानी पिघला हुआ लोहा मेरे कानों में उड़ेल कर अम्मां को साथ लिए मियांजी के घर चली गईं.

अब मु झे बीना की चिंता होने लगी. ये बेदर्द समाज बीना को कहां छोड़ने वाला था. मैं ने बीना को बचाने की खातिर एक फैसला ले लिया.

मैं ने उस बस हादसे की पूरी छानबीन कर डाली और मियांजी को सम झाने की हर मुमकिन कोशिश की कि नशे में धुत्त ड्राइवर तेज बस चला रहा था. मगर मेरे लाख सम झाने पर भी किसी ने मेरी बात नहीं मानी.

दूध गिरना अशुभ नहीं था, लेकिन बीना को 2 दिन तक खाना नहीं दिया गया, वह यकीनन अशुभ था.

अब मैं ने तय कर लिया था, यह घटना मैं दोबारा नहीं होने दूंगा. बीना 2 दिन तक भूख  झेल गई, मगर मेरी अम्मां इतनी बीमार थीं कि शाम तक ही मर जातीं और मेरे लिए यह सब से बड़ा अशुभ दिन होता.

तब मैं ने कड़े तेवर अपनाते हुए नानी से कहा, ‘‘खबरदार, जो मेरे बाप की मेहनत की कमाई किसी  झोलाछाप, पाखंडी मौलवी के आगे डाली. अगर आप ने मेरी बात नहीं मानी और मेरी अम्मां के साथ जुर्म किया या उन्हें किसी तरह परेशान किया, तो हम आप को इस उम्र में छोड़ कर चले जाएंगे. फिर शायद आप की जिंदगी का यह सब से बड़ा अशुभ दिन होगा.’’

मैं अम्मां को अपने साथ लिए कमरे में आ गया. उन्हें खाट पर लिटा कर चादर ओढ़ाई. जैसे ही मैं पलटा, हैरानी के कई  झटके खातेखाते बचा.

तावीज के बजाय नानी कसबे के अस्पताल की लेडी डाक्टर के साथ खड़ी थीं. कब्रिस्तान में धकेल देने वाली नानी अब सुखशांति के बौर्डर पर खड़ी लग रही थीं. मु झे लगा कि मौके पर दी गई धमकी अब निशाने पर जा लगी थी.

डाक्टर ने चैकअप कर के दवा लिखी और परची नानी के हाथ में थमा कर चली गईं.

मैं ने खुश हो कर नानी से कहा, ‘‘अच्छा हुआ, आप सुधर गईं, वरना…’’ इस से आगे मैं कुछ और कहता कि नानी ने फिर जोरदार थप्पड़ से मेरा गाल लाल कर दिया.

‘‘मु झे छोड़ कर मत जाना. मैं किसी को नहीं भड़काऊंगी,’’ इतना कह कर नानी रोने लगीं.

आग या पानी, मैं नानी को सम झ नहीं पाया. पहले गुस्सा, फिर रोना. खैर, मैं ने नानी को कंधे से थाम लिया, क्योंकि वे सुधर जो गई थीं.  Hindi Superstition Story

Story in Hindi : कहानी एक रात की

Story in Hindi. नए बौस की बीमारी की खबर सुन कर जयंत ने घर आए अपने पुराने बौस को पत्नी मंजुला के हवाले कर दिया और खुद अस्पताल चला गया. पति के प्यार को तरस रही मंजुला के सामने एक जवां मर्द और रात की तनहाई थी. क्या हुआ उस रात को?

तबादले के बाद जब जयंत रामपुर वाले नए दफ्तर में पहुंचा, तो उसे वहां का माहौल काफी अच्छा लगा. साथ काम करने वालों की मदद से उसे दफ्तर के पास ही एक अच्छा किराए का मकान भी मिल गया. उस की पत्नी मंजुला को भी वह मकान काफी पसंद आया.

शादी के 10 साल बाद भी जयंत और मंजुला के कोई औैलाद नहीं हुई थी.

मंजुला का गोरा, खूबसूरत और गदराया बदन भी जयंत को अपनी ओर खींच नहीं पाता था. जिंदगी की तमाम परेशानियों ने जयंत के अरमान कुचल डाले थे.

वक्त के थपेड़ों ने धीरेधीरे जयंत से उस की मर्दानगी भी छीन ली थी और तब मंजुला मन से ही नहीं तन से भी गरीब हो गई थी.

शाम के 7 बजे थे. जयंत दफ्तर से लौट आया था और बिस्तर पर लेट कर टैलीविजन पर क्रिकेट मैच देखने का मजा ले रहा था, तभी मंजुला चाय ले कर कमरे में आई और चाय की प्याली जयंत की ओर बढ़ाते हुए बोली, ‘‘आज आप ने लौटने में इतनी देर क्यों कर दी?’’

चाय की चुसकी लेता हुआ जयंत कुछ जवाब देता, इस के पहले ही दरवाजे की घंटी बज उठी.

जयंत ने दरवाजा खोला, तो अपने पुराने बौस वीरेंद्र को देख कर खुशी से बोल उठा, ‘‘सर, आप… आप को अपने घर में देख कर बेहद खुशी हुई. आइए, अंदर आइए.’’

वीरेंद्र ने सोफे पर बैठते हुए कहा, ‘‘हां जयंत, तुम्हारे जैसे ईमानदार और मेहनती सहयोगी के तबादले से मैं परेशान था और तुम से मिलना चाह रहा था. आज यहां मेरी एक बैठक थी. बैठक खत्म होते ही मैं सीधा तुम्हारे दफ्तर पहुंचा, वहां से तुम्हारे मकान का पता ले कर यहां आया हूं.’’

‘‘यह तो आप की मेहरबानी है सर. मेरे नए बौस विशालजी भी आप की वजह से मुझ बहुत चाहते हैं.’’

‘‘लेकिन जयंत, आज की बैठक में तुम्हारे बौस विशाल को नहीं देखा,’’ वीरेंद्र ने पूछा.

‘‘दरअसल, वे कल से ही काफी बीमार हैं और छुट्टी पर हैं. बच्चे बाहर गए हुए हैं. घर में सिर्फ उन की पत्नी और नौकर दीपू ही हैं,’’ जयंत ने उत्तर दिया.

तभी मंजुला ट्रे में चायनाश्ता ले कर वहां आ पहुंची. ‘नमस्ते’ कह कर उस ने ट्रे वीरेंद्र के सामने मेज पर रख दी. फिर तीनों ने साथसाथ चाय पी.

बहुत देर तक दफ्तर की बातें होती रहीं. फिर जयंत ने वीरेंद्र से कपड़े बदलने और फ्रैश हो कर आराम करने को कहा. तभी फोन बजा. मंजुला ने फोन उठाया, ‘‘हैलो?’’

उधर से आवाज आई, ‘मैं विशाल की पत्नी माया बोल रही हूं. इन की तबीयत अचानक ज्यादा खराब हो गई है. डाक्टर ने इन्हें फौरन भरती करने को कहा है. इन्होंने जयंतजी को तुरंत बुला लेने को कहा है. जरा जयंतजी से बात करा दीजिए.’

मंजुला फोन जयंत की ओर बढ़ाते हुए बोली, ‘‘मायाजी का फोन है. वे बहुत घबराई हुई हैं… आप बात कर लें.’’

‘‘हैलो मैडम, मैं जयंत बोल रहा हूं. क्या बात है?’’

उधर से माया ने बताया, ‘आप यहां जल्दी चले आइए. इन की तबीयत बहुत खराब हो गई है. इन्हें तुरंत डाक्टर मिश्र के क्लिनिक में भरती कराना है. इन्होंने आप को जल्दी बुला लेने को कहा है. शायद आप को रात में क्लिनिक पर ही रुकना पड़े. मैं अकेली हूं. प्लीज, जल्दी आ जाइए.’

जयंत और मंजुला एकदूसरे को देखने लगे. उन की खामोशी देख वीरेंद्र ने पूछा, ‘‘क्या बात है जयंत? तुम लोग चुप क्यों हो?’’

जयंत ने उन्हें माया से हुई बात बताई और जाने के लिए उन से इजाजत चाही.

वीरेंद्र ने कहा, ‘‘इस में हिचक कैसी? दुख की घड़ी में दूसरों की मदद करना तो हर इनसान का फर्ज है.’’

जयंत ने बिना एक पल गंवाए मंजुला की ओर मुड़ कर कहा, ‘‘मंजुला, मैं चलता हूं. तुम इन का ध्यान रखना. इन्हें यहां किसी चीज की दिक्कत नहीं हो.’’

रात में दरवाजा ठीक से बंद कर लेने की हिदायत दे कर जयंत विशाल के घर की ओर चल पड़ा. उस समय रात के 10 बज रहे थे.

जयंत कुछ ही देर में विशाल के घर पहुंच गया. उस के पहुंचते ही माया विशाल को ले कर कार से क्लिनिक की ओर चल पड़ी.

क्लिनिक पहुंचते ही डाक्टर ने विशाल को आईसीयू में भरती कर लिया और उन का बाकायदा इलाज शुरू कर दिया.

इस के बाद जयंत ने मोबाइल से घर का नंबर मिलाया. फोन की घंटी बजते ही वीरेंद्र ने फोन उठा कर ‘हैलो’ कहा.

वीरेंद्रजी की आवाज सुन कर जयंत ने कहा, ‘सर, विशालजी की हालत चिंताजनक है. उन्हें आईसीयू में भरती कर लिया गया है. मैं रात को घर नहीं आ सकूंगा.’

फोन पर हो रही बात सुन कर मंजुला भी वहां आ गई. वीरेंद्र ने फोन मंजुला को थमा दिया.

जयंत ने मंजुला से कहा, ‘मंजुला, मैं आज रात नहीं आ सकूंगा. तुम वीरेंद्रजी का ध्यान रखना. उन्हें कोई तकलीफ न हो.’

मंजुला सोच रही थी कि आज की रात एक पराए मर्द की मौजूदगी में अकेले गुजारनी होगी. उधर वीरेंद्र के दिल की धड़कन तो जयंत के न लौटने की खबर से बढ़ गई थी. दोनों खामोश एकदूसरे को अपलक देख रहे थे.

मंजुला ने खामोशी तोड़ते हुए पूछा, ‘‘खाना लगाऊं?’’

वीरेंद्र ने कहा, ‘‘नहीं मंजुला, खाना तो रोज खाता हूं. आज कुछ पीने की इच्छा हो रही है… पिलाओगी?’’

वीरेंद्र की इस अजीब बात पर मंजुला एकाएक घबरा उठी. इस पर उन्होंने कहा, ‘‘घबराओ नहीं. बस, उधर रखा मेरा ब्रीफकेस उठा कर मुझे दे दो.’’

मंजुला ने जब ब्रीफकेस ला कर वीरेंद्र के सामने रख दिया, तो वे उसे खोलते हुए बड़े प्यार से बोले, ‘‘मैं पहली बार तुम्हारे घर आया हूं. जल्दबाजी में कुछ ले कर नहीं आया,’’ यह कहते हुए उन्होंने अपने ब्रीफकेस से सौसौ रुपए के 2 बंडल निकाले और मंजुला की ओर बढ़ाते हुए कहा, ‘‘बुरा मत मानना. इसे अपने पास रख लो और अपनी पसंद से अपने लिए सोने की चेन और कुछ अच्छी साडि़यां खरीद लेना.

‘‘देखो, यह पैसा मेरा नहीं है… यह तुम्हारा ही है. जयंत के जरीए मैं ने बहुत रुपए कमा लिए हैं, लेकिन उस ने कभी अपना हिस्सा नहीं लिया. अगर तुम भी इनकार कर दोगी, तो मेरा दिल टूट जाएगा और मुझे बहुत दुख होगा.’’

मंजुला का दिल ही नहीं, बदन भी कांप रहा था. उस ने एकसाथ 20 हजार रुपए कभी देखे भी नहीं थे. उस के अंदर उथलपुथल मची थी.

उस ने दूसरे ही पल सोचा, ‘इस 20 हजार रुपए पर उस का ही हक होगा, जिसे जयंत भी कभी जान नहीं सकेंगे. मन की कितनी दबी ख्वाहिशें एकसाथ पूरी हो सकती हैं,’ और उस ने रुपए थाम लिए और वीरेंद्र का चेहरा खुशी से दमक उठा.

वीरेंद्र ने कहा, ‘‘मंजुला, मैं ने कहा था न कि आज कुछ खाने की नहीं, पीने की इच्छा है. क्या तुम मुझे  पिलाओगी?’’ इतना कह कर उन्होंने ब्रीफकेस से शराब की एक बोतल निकालते हुए उस से पैग तैयार कर देने को कहा और वह मना न कर सकी.

सोफे पर बैठ कर मंजुला वीरेंद्र के लिए पैग तैयार करने लगी.

मंजुला के चेहरे पर उठते हुए भावों को वीरेंद्र ने पढ़ने की कोशिश की, जिस में झिझक तो थी, लेकिन हामी भी दिख रही थी.

मंजुला से पैग ले कर वीरेंद्र ने उस के हाथों पर अपना हाथ रखते हुए कहा, ‘‘मंजुला, हालात ने हमें यह मौका दिया है. यहां मेरा अचानक आना, जयंत का रातभर के लिए बाहर जाना, यह मस्ती भरा आलम, सुहानी रात और हम दोनों का घर में रातभर के लिए अकेले होना, क्या यह सब सिर्फ इत्तिफाक भर है? ऐसा मौका जिंदगी में शायद ही कभी किसी को मिलता है.

‘‘आओ मंजुला, हम एकदूसरे को प्यार करें…’’ और इतना कह कर वीरेंद्र ने मंजुला को अपनी बांहों में भर लिया और उस के रसीले होंठों को चूम लिया.

इस के बाद तो वीरेंद्र के चुंबनों की बौछार ने मंजुला को मदहोश कर दिया.

वीरेंद्र ने मंजुला के जिस्म से कपड़े उतार कर नीचे फेंकने शुरू कर दिए और फिर देखते ही देखते वे दो जिस्म एक जान हो गए.

मंजुला मस्ती के इस आलम में इस कदर खो गई कि उसे अच्छेबुरे का एहसास नहीं रहा. फिर तूफान शांत हो गया. जब दोनों की आंखें खुलीं, तो दोनों मुसकरा रहे थे. उस समय रात के 2 बज रहे थे.

मंजुला ने कहा, ‘‘अब तो कुछ खा लीजिए, नहीं तो जयंत कहेंगे कि मैं ने उन के बौस की खातिरदारी नहीं की.’’

‘‘नहीं, ऐसी कोई बात नहीं है. तुम ने तो मेरी ऐसी खातिरदारी की है कि मैं जिंदगीभर नहीं भूल सकूंगा,’’ वीरेंद्र ने कहा, पर मंजुला नहीं मानी और रसोई से खाना ले आई और दोनों ने एकसाथ खाना खाया.

मंजुला जब सोने के लिए दूसरे कमरे में जाने लगी, तो वीरेंद्र ने मंजुला को अपने साथ सोने को मजबूर कर दिया.

दोनों की आंखें तब खुलीं, जब सुबह के 7 बज गए. मंजुला ने उठ कर पहले अपने कपड़ों को ठीक किया और अपने कमरे की ओर जाने लगी, तभी वीरेंद्र ने कहा, ‘‘मंजुला, अगर मुझ से कोई गलती हुई हो, तो मुझे माफ कर देना. हम शायद ही कभी इस तरह दोबारा मिल सकेंगे. हमें कभी इस के लिए अफसोस नहीं करना चाहिए.’’

मंजुला चुपचाप खड़ी वीरेंद्र की बातें सुन रही थी. उस के चेहरे पर भी कहीं अफसोस का भाव नहीं था.

वीरेंद्र ने कहा, ‘‘मुझे अभी 8 बजे की ट्रेन से लौटना है. क्या एक कप चाय पिला सकोगी?’’

‘‘क्यों नहीं,’’ कह कर मंजुला चाय बनाने चल पड़ी.

जैसे ही वह चाय ट्रे में ले कर गई, तभी दरवाजे की घंटी बज उठी. उस ने लपक कर दरवाजा खोला. सामने जयंत खड़ा था. उस की आंखें थकीथकी सी थीं और चेहरे पर उदासी थी.

तभी जयंत की नजर वीरेंद्र पर पड़ी, जो तैयार हो कर बैठे चाय पी रहे थे.

वीरेंद्र ने पूछा, ‘‘जयंत, तुम्हारे बौस का क्या हाल है? मैं तो एक जरूरी काम से अभी 8 बजे की गाड़ी से लौट रहा हूं, वरना क्लिनिक पर जा कर उन से जरूर मिलता.’’

जयंत ने जवाब दिया, ‘‘मैं अभीअभी अपने नए बौस को अंतिम यात्रा पर विदा कर के लौटा हूं और अपने पुराने बौस को ठीक से खातिरदारी किए बगैर विदा कर रहा हूं.

‘‘काश, ऐसी रात फिर कभी मुझे न देखनी पड़े. सचमुच यह रात मेरे लिए अंधेरा ले कर आई, जिस में मैं ने बहुतकुछ खोया है.’’

मंजुला चुपचाप खड़ी सूनी आंखों से उन दोनों को देख रही थी.  Story in Hindi

–पुरुषोत्तम

Hindi Story : दाढ़ी की आड़ में – क्या मिल पाया शेखू मियां को औलाद का सुख

Hindi Story. शेखू मियां के घर पर ठहरे मौलाना ने बताया कि हर मुसलिम को शौक के साथ दाढ़ी रखना लाजिम है. यह खुदा का नूर है. इस से मोमिन की अलग पहचान होती है.

‘बात हक और सच की है,’ कहते हुए सभी ने हां में हां मिलाई.

मौलाना रोज शरीअत की बातें बताते. धीरेधीरे यह बात फैली और आसपास के लोग इकट्ठा हो कर उन की हर बात ध्यान से सुनते और उन पर अमल करते.

जब भी उन के चाहने वालों ने उन से उन का नामपता जानना चाहा, तो वे बात को टाल देते. खुद शेखू मियां को नहीं मालूम कि वे कहां से आए?

शेखू मियां के औलाद नहीं थी. गांव के आसपास के इलाकों में उन की काफी शोहरत थी. वे नौकरचाकर, खेती को देखते और 5 वक्त की नमाज करते. मौलाना की बातों से वे उन के दीवाने हो गए.

मौलाना ने कहा, ‘‘मेरा दुनिया में कोई नहीं. दो वक्त का खाना और कपड़े, सिर छिपाने के लिए छत और इबादत… इस के सिवा मुझे कुछ नहीं चाहिए.’’

मौलाना की बात पर यकीन कर शेखू मियां ने उन्हें मसजिद में रख लिया.

‘‘शादाब बेटा, तुम्हें हम आलिम बनाना चाहते हैं,’’ अब्बू ने कहा. ‘‘ठीक है अब्बू, मैं मदरसे में जाने को तैयार हूं.’’ ‘‘तो ठीक है,’’ अब्बा ने कहा.

2 दिन बाद शादाब के अब्बू शहर के मदरसे में उसे भरती करा आए.

‘‘देखो बेगम, तुम्हें परेशान होने की जरूरत नहीं. मैं ने खाने व रहने का बंदोबस्त मदरसे में ही कर दिया है. वहां और भी लड़के हैं, जो तालीम ले रहे हैं,’’ मौलाना ने बीवी को सम?ाया.

उन का बेटा शादाब शहर में तालीम पाने लगा. अभी उस की तालीम पूरी भी नहीं हो पाई थी कि एक सड़क हादसे में उस के अब्बूअम्मी का इंतकाल हो गया. शादाब पढ़ाई छोड़ कर घर आ गया.

घर पर उस के चाचाचाची, 2 बच्चे थे. शादाब वहीं उन के साथ रहने लगा. शादाब की चाची पढ़ीलिखी, निहायत खूबसूरत, चुस्तचालाक व आजाद खयालों की औरत थी.

वह शादाब से खूब हंसीमजाक करती, उस के आसपास मंडराती रहती. घर पर उस का ही हुक्म चलता.

‘‘सुनो शादाब मियां, जवानी में बु?ाबु?ा सा चेहरा, दाढ़ी अच्छी नहीं लगती. नए जमाने के साथ चलो. अब कौन मदरसे में पढ़ाई कर रहे हो.’’

चाची के कहने पर उस ने दाढ़ी साफ करा ली. नए फैशन के कपड़े पहनना शुरू कर दिया. वह चाची का दिल नहीं तोड़ना चाहता था, बल्कि वह चाची को मन ही मन चाहने लगा था.

चाचा को शादाब की यह हरकत बिलकुल पसंद नहीं थी कि वह उस की बीवी के पास रहे.

तभी एक दिन नौकरानी ने कहा, ‘‘अंदर जा कर देखिए… क्या तमाशा हो रहा है?’’

इधर एक कचरा उड़ कर शादाब की चाची की आंख में चला गया था.

‘‘शादाब देखना… मेरी आंख में कचरा चला गया है, जरा निकाल दो,’’ कह कर वह पलंग पर लेट गई और शादाब ?ाक कर उस की आंख से कचरा निकालने लगा.

शादाब का पूरा जिस्म चाची पर ?ाका देख कर चाचा जोर से चिल्लाया, ‘‘यह क्या हो रहा है?’’

‘‘कुछ नहीं, आंख में कचरा चला गया था. शादाब से निकालने को कहा… और क्या?’’ कह कर वह पलंग से उठ कर खड़ी हो गई.

चाचा शादाब की खोटी नीयत को पहचान गया. उस ने गांव वालों के साथ मिल कर ऐसी चाल चली कि उस की खूबसूरत बीवी शादाब की बुरी नीयत से बच जाए और शादाब की जायदाद भी हड़पी जा सके.

‘‘क्यों मियां, मदरसे में यही तालीम मिली है कि तुम मदरसा छोड़ते ही दाढ़ीमूंछ रखना भूल जाओ? कौन कहेगा तुम्हें आलिमहाफिज?’’

खोटी नीयत, नए पहनावे, बगैर दाढ़ी के पा कर पंचायत ने उसे खूब खरीखोटी सुनाई. पंचायत में मौजूद मुल्लामौलवी ने शादाब को गांव से बाहर रहने का तालिबानी हुक्म सुना दिया.

शादाब भटकता हुआ शेखू मियां के गांव पहुंचा. उस ने सालभर में नमाजियों की तादाद बढ़ा ली. उस के चाहने वालों की तादाद में इजाफा होता गया. इसी बीच उस ने ऐसी शैतानी हरकत की, जिसे सुन कर इनसानियत भी शर्मसार हो गई.

वह शेखू मियां को भाई साहब और उस की बीवी को भाभीजान कहता था.

एक दिन उस ने शेखू मियां से कहा, ‘‘भाभी बीमारी से परेशान हैं. इन्हें दवा के साथ दुआ की भी जरूरत है. भाभी जल्दी ठीक हो जाएंगी.’’

‘‘वह तो ठीक है. आदमी ढूंढ़ना पड़ेगा,’’ शेखू ने कहा.

‘‘उस की जरूरत नहीं. मैं जो हूं…’’ शादाब ने कहा, ‘‘आप कहें, तो मैं कल से भाभीजान के लिए तावीज फूंकने का इंतजाम करा दूं.’’

‘‘ठीक है,’’ शेखू मियां ने कहा.

अगले दिन शादाब ने भाभीजान को तावीज दिया. इस से शेखू की बीवी को आराम लगने लगा. उन्होंने राहत की सांस ली.

अब दवा और दुआ दोनों साथसाथ चलने लगीं.

शेखू मियां की खूबसूरत बीवी के बदन पर सोने के गहने को देख कर शादाब के अंदर का शैतान जाग उठा. वह भूल गया कि मदरसे में बच्चों को तालीम देने के साथसाथ नमाज भी पढ़ता है. नमाजी परहेजी मौलाना है. लोग उस की इज्जत करते हैं.

‘‘मौलाना, आज मेरा पूरा जिस्म दर्द कर रहा है. सीने में जलन हो रही है,’’ शेखू मियां की बीवी ने कहा.

‘‘ठीक है, मैं राख से ?ाड़ देता हूं,’’

और फिर हाथ में कुछ राख ले कर शादाब बुदबुदाया. फिर राख को ही बेगम की बांहों पर मलने लगा. पराए मर्द के हाथ लगाते ही उसे अजीब सा महसूस हुआ, पर उसे अच्छा लगा शादाब का जिस्म छूना.

और फिर सिलसिला चल पड़ा. दोनों करीब आते गए और उन में जिस्मानी ताल्लुकात बन गए.

दोनों के बीच सालभर रंगरलियां चलीं. धीरेधीरे उन के बीच इतनी मुहब्बत बढ़ गई कि वे दुनिया को भूल बैठे.

यह खबर शेखू मियां तक पहुंची, पर वह मौलाना को नेकनीयत, काबिल इनसान, नमाजीपरहेजी सम?ा कर इसे सिर्फ बदनाम करने की साजिश सम?ा बैठा और जब बात हद से ज्यादा गुजर गई, तो उस ने इस की आजमाइश करनी चाही.

‘‘सुनो बेगम, मैं एक हफ्ते के लिए बाहर जा रहा हूं. तुम घरखेती पर नजर रखना. नौकर भी मेरे साथ जा रहा है. हफ्तेभर की तो बात है,’’ शेखू ने कहा.

‘‘जी, आप बेफिक्र रहें, मैं सब संभाल लूंगी,’’ बेगम ने कहा.

‘‘देखो मौलाना, अब हम एक हफ्ते के लिए बेफिक्र हैं. तुम्हारे भाई साहब एक हफ्ते बाद लौटेंगे, तब तक हम जी भर के मिलेंगे. डर की कोई बात नहीं,’’ बेगम ने मौलाना शादाब से कहा.

अब शेखू की गैरहाजिरी में दिल खोल कर मिलनेजुलने का सिलसिला चला. तीसरे दिन शेखू मियां अचानक रात में घर आ पहुंचे.

अपनी बीवी को मौलाना की गिरफ्त में देख कर शेखू मियां का खून खौल उठा. गवाही के लिए नौकर को भी बुला कर अपनी मालकिन का नजारा दिखा दिया. फिर चुपके से वह खेत के घर में जा कर सो गए.

सुबह गांव की पंचायत शेखू के बुलावे पर जमा हुई. कानाफूसी का दौर चला.

‘‘पंचायत की कार्यवाही शुरू की जाए,’’ एक बुजुर्ग ने कहा.

‘‘अरे भई, मौलाना को तो आने दो,’’ एक सदस्य ने कहा.

‘‘उन की ही तो पंचायत है,’’ एक नौजवान ने कहा.

‘वह कैसे?’ सभी एकसाथ कह उठे.

शेखू मियां ने तफसील से बात पंचों को बताई. लोगों का शक ठीक था.

‘‘बीवी का शौहर रहते हुए पराए मर्द से हमबिस्तरी करना, दाढ़ी की आड़ में एक नमाजी का मसजिदमदरसे में तालीम के नाम पर वहशीपन करना मजहब की आड़ में घिनौनी साजिश है.’’

‘‘अनपढ़ औरतें जल्दी ही मजहब के नाम पर ढोंग, अंधविश्वास, तांत्रिक के बहकावे में तावीज, गंडे, ?ाड़नेफूंकने के नाम पर अपना सबकुछ लुटा देती हैं, इसलिए औरतमर्द का पढ़ालिखा, सम?ादार होना जरूरी है, ताकि वे धर्म के इन ठेकेदारों, शैतानों के बहकावे में न आ सकें,’’ कह कर शेखू चुप हो गए.

तभी एक बुजुर्ग ने कहा, ‘‘दोनों को पंचायत में बुलाया जाए.’’

जमात के कहने पर 2 आदमी मौलाना और शेखू की बीवी को लेने गए.

लौट के आ कर उन्होंने बताया कि मसजिद में न तो मौलाना है और न घर पर शेखू की बेगम Hindi Story

Hindi Family Story : अंत भला तो सब भला – नन्द-भाभी की लड़ाई में कौन जीता

Hindi Family Story. संगीता को यह एहसास था कि आज जो दिन में घटा है, उस के कारण शाम को रवि से झगड़ा होगा और वह इस के लिए मानसिक रूप से तैयार थी. लेकिन जब औफिस से लौटे रवि ने मुसकराते हुए घर में कदम रखा तो वह उलझन में पड़ गई.

‘‘आज मैं बहुत खुश हूं. तुम्हारा मूड हो तो खाना बाहर खाया जा सकता है,’’ रवि ने उसे हाथ से पकड़ कर अपने पास बैठा लिया.

‘‘किस कारण इतना खुश नजर आ रहे हो ’’ संगीता ने खिंचे से स्वर में पूछा.

‘‘आज मेरे नए बौस उमेश साहब ने मुझे अपने कैबिन में बुला कर मेरे साथ दोस्ताना अंदाज में बहुत देर तक बातें कीं. उन की वाइफ से तो आज दोपहर में तुम मिली ही थीं. उन्हें एक स्कूल में इंटरव्यू दिलाने मैं ही ले गया था. मेरे दोस्त विपिन के पिताजी उस स्कूल के चेयरमैन को जानते हैं. उन की सिफारिश से बौस की वाइफ को वहां टीचर की जौब मिल जाएगी. बौस मेरे काम से भी बहुत खुश हैं. लगता है इस बार मुझे प्रमोशन जरूर मिल जाएगी,’’ रवि ने एक ही सांस में संगीता को सारी बात बता डाली. संगीता ने उस की भावी प्रमोशन के प्रति कोई प्रतिक्रिया जाहिर करने के बजाय वार्त्तालाप को नई दिशा में मोड़ दिया, ‘‘प्रौपर्टी डीलर ने कल शाम जो किराए का मकान बताया था, तुम उसे देखने कब चलोगे ’’

‘‘कभी नहीं,’’ रवि एकदम चिड़ उठा.

‘‘2 दिन से घर के सारे लोग बाहर गए हुए हैं और ये 2 दिन हम ने बहुत हंसीखुशी से गुजारे हैं. कल सुबह सब लौट आएंगे और रातदिन का झगड़ा फिर शुरू हो जाएगा. तुम समझते क्यों नहीं हो कि यहां से अलग हुए बिना हम कभी खुश नहीं रह पाएंगे…हम अभी उस मकान को देखने चल रहे हैं,’’ कह संगीता उठ खड़ी हुई.

‘‘मुझे इस घर को छोड़ कर कहीं नहीं जाना है. अगर तुम में जरा सी भी बुद्धी है तो अपनी बहन और जीजा के बहकावे में आना छोड़ दो,’’ गुस्से के कारण रवि का स्वर ऊंचा हो गया था. ‘‘मुझे कोई नहीं बहका रहा है. मैं ने 9 महीने इस घर के नर्क में गुजार कर देख लिए हैं. मुझे अलग किराए के मकान में जाना ही है,’’ संगीता रवि से भी ज्यादा जोर से चिल्ला पड़ी. ‘‘इस घर को नर्क बनाने में सब से ज्यादा जिम्मेदार तुम ही हो…पर तुम से बहस करने की ताकत अब मुझ में नहीं रही है,’’ कह रवि उठ कर कपड़े बदलने शयनकक्ष में चला गया और संगीता मुंह फुलाए वहीं बैठी रही.

उन का बाहर खाना खाने का कार्यक्रम तो बना ही नहीं, बल्कि घर में भी दोनों ने खाना अलगअलग और बेमन से खाया. घर में अकेले होने का कोई फायदा वे आपसी प्यार की जड़ें मजबूत करने के लिए नहीं उठा पाए. रात को 12 बजे तक टीवी देखने के बाद जब संगीता शयनकक्ष में आई तो रवि गहरी नींद में सो रहा था. अपने मन में गहरी शिकायत और गुस्से के भाव समेटे वह उस की तरफ पीठ कर के लेट गई. किराए के मकान में जाने के लिए रवि पर दबाव बनाए रखने को संगीता अगली सुबह भी उस से सीधे मुंह नहीं बोली. रवि नाश्ता करने के लिए रुका नहीं. नाराजगी से भरा खाली पेट घर से निकल गया और अपना लंच बौक्स भी मेज पर छोड़ गया. करीब 10 बजे उमाकांत अपनी पत्नी आरती, बड़े बेटे राजेश, बड़ी बहू अंजु और 5 वर्षीय पोते समीर के साथ घर लौटे. वे सब उन के छोटे भाई के बेटे की शादी में शामिल होने के लिए 2 दिनों के लिए गांव गए थे.

फैली हुई रसोई को देख कर आरती ने संगीता से कुछ तीखे शब्द बोले तो दोनों के बीच फौरन ही झगड़ा शुरू हो गया. अंजु ने बीचबचाव की कोशिश की तो संगीता ने उसे भी कड़वी बातें सुनाते हुए झगड़े की चपेट में ले लिया. इन लोगों के घर पहुंचने के सिर्फ घंटे भर के अंदर ही संगीता लड़भिड़ कर अपने कमरे में बंद हो गई थी. उस की सास ने उसे लंच करने के लिए बुलाया पर वह कमरे से बाहर नहीं निकली. ‘‘यह संगीता रवि भैया को घर से अलग किए बिना न खुद चैन से रहेगी, न किसी और को रहने देगी, मम्मी,’’ अंजु की इस टिप्पणी से उस के सासससुर और पति पूरी तरह सहमत थे. ‘‘इस की बहन और मां इसे भड़काना छोड़ दें तो सब ठीक हो जाए,’’ उमाकांत की विवशता और दुख उन की आवाज में साफ झलक रहा था.

‘‘रवि भी बेकार में ही घर से कभी अलग न होने की जिद पर अड़ा हुआ है. शायद किराए के घर में जा कर संगीता बदल जाए और इन दोनों की विवाहित जिंदगी हंसीखुशी बीतने लगे,’’ आरती ने आशा व्यक्त की.‘‘किराए के घर में जा कर बदल तो वह जाएगी ही पर रवि को यह अच्छी तरह मालूम है कि उस के घर पर उस की बड़ी साली और सास का राज हो जाएगा और वह इन दोनों को बिलकुल पसंद नहीं करता है. बड़े गलत घर में रिश्ता हो गया उस बेचारे का,’’ उमाकांत के इस जवाब को सुन कर आरती की आंखों में आंसू भर आए तो सब ने इस विषय पर आगे कोई बात करना मुनासिब नहीं समझा.

शाम को औफिस से आ कर रवि उस से पिछले दिन घटी घटना को ले कर झगड़ा करेगा, संगीता की यह आशंका उस शाम भी निर्मूल साबित हुई. रवि परेशान सा घर में घुसा तो जरूर पर उस की परेशानी का कारण कोई और था. ‘‘मुझे अस्थाई तौर पर मुंबई हैड औफिस जाने का आदेश मिला है. मेरी प्रमोशन वहीं से हो जाएगी पर शायद यहां दिल्ली वापस आना संभव न हो पाए,’’ उस के मुंह से यह खबर सुन कर सब से ज्यादा परेशान संगीता हुई.

‘‘प्रमोशन के बाद कहां जाना पड़ेगा आप को ’’ उस ने चिंतित लहजे में पूछा.

‘‘अभी कुछ पता नहीं. हमारी कंपनी की कुछ शाखाएं तो ऐसी घटिया जगह हैं, जहां न अच्छा खानापीना मिलता है और न अस्पताल, स्कूल जैसी सुविधाएं ढंग की हैं,’’ रवि के इस जवाब को सुन कर उस का चेहरा और ज्यादा उतर गया.

‘‘तब आप प्रमोशन लेने से इनकार कर दो,’’ संगीता एकदम चिड़ उठी, ‘‘मुझे दिल्ली छोड़ कर धक्के खाने कहीं और नहीं जाना है.’’ ‘‘तुम पागल हो गई हो क्या  मैं अपनी प्रमोशन कैसे छोड़ सकता हूं ’’ रवि गुस्सा हो उठा.

‘‘तब इधरउधर धक्के खाने आप अकेले जाना. मैं अपने घर वालों से दूर कहीं नहीं जाऊंगी,’’ अपना फैसला सुना कर नाराज नजर आती संगीता अपने कमरे में घुस गई.

आगामी शनिवार को रवि हवाईजहाज से मुंबई चला गया. उस के घर छोड़ने से पहले ही अपनी अटैची ले कर संगीता मायके चली गई थी. रवि के मुंबई चले जाने से संगीता की किराए के अलग घर में रहने की योजना लंगड़ा गई. उस के भैयाभाभी तो पहले ही से ऐसा कदम उठाए जाने के हक में नहीं थे.

उस की दीदी और मां रवि की गैरमौजूदगी में उसे अलग मकान दिलाने का हौसला अपने अंदर पैदा नहीं कर पाईं. विवाहित लड़की का ससुराल वालों से लड़झगड़ कर अपने भाईभाभी के पास आ कर रहना आसान नहीं होता, यह कड़वा सच संगीता को जल्द ही समझ में आने लगा. कंपनी के गैस्टहाउस में रह रहा रवि उसे अपने पास रहने को बुला नहीं सकता था और संगीता ने अपनी ससुराल वालों से संबंध इतने खराब कर रखे थे कि वे उसे रवि की गैरमौजूगी में बुलाना नहीं चाहते थे.

सब से पहले संगीता के संबंध अपनी भाभी से बिगड़ने शुरू हुए. घर के कामों में हाथ बंटाने को ले कर उन के बीच झड़पें शुरू हुईं और फिर भाभी को अपनी ननद की घर में मौजूदगी बुरी तरह खलने लगी. संगीता की मां ने अपनी बेटी की तरफदारी की तो उन का बेटा उन से झगड़ा करने लगा. तब संगीता की बड़ी बहन और जीजा को झगड़े में कूदना पड़ा. फिर टैंशन बढ़ती चली गई. ‘‘हमारे घर की सुखशांति खराब करने का संगीता को कोई अधिकार नहीं है, मां. इसे या तो रवि के पास जा कर रहना चाहिए या फिर अपनी ससुराल में. अब और ज्यादा इस की इस घर में मौजूदगी मैं बरदाश्त नहीं करूंगा,’’ अपने बेटे की इस चेतावनी को सुन कर संगीता की मां ने घर में काफी क्लेश किया पर ऐसा करने के बाद उन की बेटी का घर में आदरसम्मान बिलकुल समाप्त हो गया. बहू के साथ अपने संबंध बिगाड़ना उन के हित में नहीं था, इसलिए संगीता की मां ने अपनी बेटी की तरफदारी करना बंद कर दिया. उन में आए बदलाव को नोट कर के संगीता उन से नाराज रहने लगी थी.

संगीता की बड़ी बहन को भी अपने इकलौते भाई को नाराज करने में अपना हित नजर नहीं आया था. रवि की प्रमोशन हो जाने की खबर मिलते ही उस ने अपनी छोटी बहन को सलाह दी, ‘‘संगीता, तुझे रवि के साथ जा कर ही रहना पड़ेगा. भैया के साथ अपने संबंध इतने ज्यादा मत बिगाड़ कि उस के घर के दरवाजे तेरे लिए सदा के लिए बंद हो जाएं. जब तक रवि के पास जाने की सुविधा नहीं हो जाती, तू अपनी ससुराल में जा कर रह.’’ ‘‘तुम सब मेरा यों साथ छोड़ दोगे, ऐसी उम्मीद मुझे बिलकुल नहीं थी. तुम लोगों के बहकावे में आ कर ही मैं ने अपनी ससुराल वालों से संबंध बिगाड़े हैं, यह मत भूलो, दीदी,’’ संगीता के इस आरोप को सुन कर उस की बड़ी बहन इतनी नाराज हुई कि दोनों के बीच बोलचाल न के बराबर रह गई. रवि के लिए संगीता को मुंबई बुलाना संभव नहीं था. संगीता को बिन बुलाए ससुराल लौटने की शर्मिंदगी से हालात ने बचाया.

दरअसल, रवि को मुंबई गए करीब 2 महीने बीते थे जब एक शाम उस के सहयोगी मित्र अरुण ने संगीता को आ कर बताया, ‘‘आज हमारे बौस उमेश साहब के मुंह से बातोंबातों में एक काम की बात निकल गई, संगीता… रवि के दिल्ली लौटने की बात बन सकती है.’’

‘‘कैसे ’’ संगीता ने फौरन पूछा.

अनुंकपा के आधार पर उस की पोस्टिंग यहां हो सकती है.’’

‘‘मैं कुछ समझी नहीं ’’ संगीता के चेहरे पर उलझन के भाव उभरे.

‘‘मैं पूरी बात विस्तार से समझाता हूं. देखो, अगर रवि यह अर्जी दे कि दिल के रोगी पिता की देखभाल के लिए उस का उन के पास रहना जरूरी है तो उमेश साहब के अनुसार उस का तबादला दिल्ली किया जा सकता है.’’ ‘‘लेकिन रवि के बड़े भैयाभाभी भी तो मेरे सासससुर के पास रहते हैं. इस कारण क्या रवि की अर्जी नामंजूर नहीं हो जाएगी ’’

‘‘उन का तो अपना फ्लैट है न ’’

‘‘वह तो है.’’

‘‘अगर वे अपने फ्लैट में शिफ्ट हो जाएं तो रवि की अर्जी को नामंजूर करने का यह कारण समाप्त हो जाएगा.’’

‘‘यह बात तो ठीक है.’’

‘‘तब आप अपने जेठजेठानी को उन के फ्लैट में जाने को फटाफट राजी कर के उमेश साहब से मिलने आ जाओ,’’ ऐसी सलाह दे कर अरुण ने विदा ली. संगीता ने उसी वक्त रवि को फोन मिलाया.

‘‘तुम जा कर भैयाभाभी से मिलो, संगीता. मैं भी उन से फोन पर बात करूंगा,’’ रवि सारी बात सुन कर बहुत खुश हो उठा था. संगीता को झिझक तो बड़ी हुई पर अपने भावी फायदे की बात सोच कर वह अपनी ससुराल जाने को 15 मिनट में तैयार हो गई. रवि के बड़े भाई ने उस की सारी बात सुन कर गंभीर लहजे में जवाब दिया, ‘‘संगीता, इस से ज्यादा खुशी की बात और क्या हो सकती है कि रवि का तबादला दिल्ली में हो जाए पर मुझे अपने फ्लैट को किराए पर मजबूरन चढ़ाना पढ़ेगा. उस की मासिक किस्त मैं उसी किराए से भर पाऊंगा.’’ रवि और संगीता के बीच फोन पर 2 दिनों तक दसियों बार बातें हुईं और अंत में उन्हें बड़े भैया के फ्लैट की किस्त रवि की पगार से चुकाने का निर्णय मजबूरन लेना पड़ा.

सप्ताह भर के अंदर बड़े भैया का परिवार अपने फ्लैट में पहुंच गया और संगीता अपना सूटकेस ले कर ससुराल लौट आई. रवि ने कूरियर से अपनी अर्जी संगीता को भिजवा दी. उसे इस अर्जी को रवि के बौस उमेश साहब तक पहुंचाना था. संगीता ने फोन कर के उन से मिलने का समय मांगा तो उन्होंने उसे रविवार की सुबह अपने घर आने को कहा. ‘‘क्या मैं आप से औफिस में नहीं मिल सकती हूं, सर ’’ संगीता इन शब्दों को बड़ी कठिनाई से अपने मुख ने निकाल पाई.

‘‘मैं तुम्हें औफिस में ज्यादा वक्त नहीं दे पाऊंगा, संगीता. मैं घर पर सारे कागजात तसल्ली से चैक कर लूंगा. मैं नहीं चाहता हूं कि कहीं कोई कमी रह जाए. यह मेरी भी दिली इच्छा है कि रवि जैसा मेहनती और विश्वसनीय इनसान वापस मेरे विभाग में लौट आए. क्या तुम्हें मेरे घर आने पर कोई ऐतराज है ’’

‘‘न… नो, सर. मैं रविवार की सुबह आप के घर आ जाऊंगी,’’ कहते हुए संगीता का पूरा शरीर ठंडे पसीने से नहा गया था. उस के साथ उमेश साहब के घर चलने के लिए हर कोई तैयार था पर संगीता सारे कागज ले कर वहां अकेली पहुंची. उन के घर में कदम रखते हुए वह शर्म के मारे खुद को जमीन में गड़ता महसूस कर रही थी. उमेश साहब की पत्नी शिखा का सामना करने की कल्पना करते ही उस का शरीर कांप उठता था. रवि के मुंबई जाने से कुछ दिन पूर्व ही वह शिखा से पहली बार मिली थी. उस मुलाकात में जो घटा था, उसे याद करते ही उस का दिल किया कि वह उलटी भाग जाए. लेकिन अपना काम कराने के लिए उसे उमेश साहब के घर की दहलीज लांघनी ही पड़ी.

अचानक उस दिन का घटना चक्र उस की आंखों के सामने घूम गया. उस दिन रवि शिखा को एक स्कूल में इंटरव्यू दिलाने ले जा रहा था. रवि का बैंक उस स्कूल के पास ही था. उसे बैंक में कुछ पर्सनल काम कराने थे. जितनी देर में शिखा स्कूल में इंटरव्यू देगी, उतनी देर में वह बैंक के काम करा लेगा, ऐसा सोच कर रवि कुछ जरूरी कागज लेने शिखा के साथ अपने घर आया था. संगीता उस दिन अपनी मां से मिलने गई हुई थी. वह उस वक्त लौटी जब शिखा एक गिलास ठंडा पानी पी कर उन के घर से अकेली स्कूल जा रही थी. वह शिखा को पहचानती नहीं थी, क्योंकि उमेश साहब ने कुछ हफ्ते पहले ही अपना पदभार संभाला था.

‘‘कौन हो तुम  मेरे घर में किसलिए आना हुआ ’’ संगीता ने बड़े खराब ढंग से शिखा से पूछा था.

‘‘रवि और मेरे पति एक ही औफिस में काम करते हैं. मेरा नाम शिखा है,’’ संगीता के गलत व्यवहार को नजरअंदाज करते हुए शिखा मुसकरा उठी थी.

‘मेरे घर मेें तुम्हें मेरी गैरमौजूदगी में आने की कोई जरूरत नहीं है… अपने पति को धोखा देना है तो कोई और शिकार ढूंढ़ो…मेरे पति के साथ इश्क लड़ाने की कोशिश की तो मैं तुम्हारे घर आ कर तुम्हारी बेइज्जती करूंगी,’’ उसे यों अपमानित कर के संगीता अपने घर में घुस गई थी. तब उसे रोज लगता था कि रवि उस के साथ उस के गलत व्यवहार को ले कर जरूर झगड़ा करेगा पर शिखा ने रवि को उस दिन की घटना के बारे में कुछ बताया ही नहीं था. अब रवि की दिल्ली में बदली कराने के लिए उसे शिखा के पति की सहायता चाहिए थी. अपने गलत व्यवहार को याद कर के संगीता शिखा के सामने पड़ने से बचना चाहती थी पर ऐसा हो नहीं सका.

उन के ड्राइंगरूम में कदम रखते ही संगीता का सामना शिखा से हो गया.

‘‘मैं अकारण अपने घर आए मेहमान का अपमान नहीं करती हूं. तुम बैठो, वे नहा रहे हैं,’’ उसे यह जानकारी दे कर शिखा घर के भीतर चल दी.

‘‘प्लीज, आप 1 मिनट मेरी बात सुन लीजिए,’’ संगीता ने उसे अंदर जाने से रोका.

‘‘कहो,’’ अपने होंठों पर मुसकान सजा कर शिखा उस की तरफ देखने लगी.

‘‘मैं…मैं उस दिन के अपने खराब व्यवहार के लिए क्षमा मांगती हूं,’’ संगीता को अपना गला सूखता लगा.

‘‘क्षमा तो मैं तुम्हें कर दूंगी पर पहले मेरे एक सवाल का जवाब दो…यह ठीक है कि तुम मुझे नहीं जानती थीं पर अपने पति को तुम ने चरित्रहीन क्यों माना ’’ शिखा ने चुभते स्वर में पूछा.

‘‘उस दिन मुझ से बड़ी भूल हुई…वे चरित्रहीन नहीं हैं,’’ संगीता ने दबे स्वर में जवाब दिया.

‘‘मेरी पूछताछ का भी यही नतीजा निकला था. फिर तुम ने हम दोनों पर शक क्यों किया था ’’

‘‘उन दिनों मैं काफी परेशान चल रही थी…मुझे माफ कर…’’

‘‘सौरी, संगीता. तुम माफी के लायक नहीं हो. तुम्हारी उस दिन की बदतमीजी की चर्चा मैं ने आज तक किसी से नहीं की है पर अब मैं सारी बात अपने पति को जरूर बताऊंगी.’’

‘‘प्लीज, आप उन से कुछ न कहें.’’

‘‘मेरी नजरों में तुम कैसी भी सहायता पाने की पात्रता नहीं रखती हो. मुझे कई लोगों ने बताया है कि तुम्हारे खराब व्यवहार से रवि और तुम्हारे ससुराल वाले बहुत परेशान हैं. अपने किए का फल सब को भोगना ही पड़ता है, सो तुम भी भोगो. शिखा को फिर से घर के भीतरी भाग की तरफ जाने को तैयार देख संगीता ने उस के सामने हाथ जोड़ दिए, ‘‘मैं आप से वादा करती हूं कि मैं अपने व्यवहार को पूरी तरह बदल दूंगी…अपनी मां और बहन का कोई भी हस्तक्षेप अब मुझे अपनी विवाहित जिंदगी में स्वीकार नहीं होगा…मेंरे अकेलेपन और उदासी ने मुझे अपनी भूल का एहसास बड़ी गहराई से करा दिया है.’’

‘‘तब रवि जरूर वापस आएगा… हंसीखुशी से रहने की नई शुरुआत के लिए तुम्हें मेरी शुभकामनाएं संगीता…आज से तुम मुझे अपनी बड़ी बहन मानोगी तो मुझे बड़ी खुशी होगी.’’ Hindi Family Story

‘‘थैंक यू, दीदी,’’ भावविभोर हो इस बार संगीता उन के गले लग कर खुशी के आंसू बहाने लगी थी. उमेश साहब के प्रयास से 4 दिन बाद रवि के दिल्ली तबादला होने के आदेश निकल गए. इस खबर को सुन कर संगीता अपनी सास के गले  लग कर खुशी के आंसू बहाने लगी थी. उसी दिन शाम को रवि के बड़े भैया उमेश साहब का धन्यवाद प्रकट करने उन के घर काजू की बर्फी के डिब्बे के साथ पहुंचे.

‘‘अब तो सब ठीक हो गया न राजेश ’’

‘‘सब बढि़या हो गया, सर. कुछ दिनों में रवि बड़ी पोस्ट पर यहीं आ जाएगा. संगीता का व्यवहार अब सब के साथ अच्छा है. अपनी मां और बहन के साथ उस की फोन पर न के बराबर बातें होती हैं. बस, एक बात जरा ठीक नहीं है, सर.’’

‘‘कौन सी, राजेश ’’

‘‘सर, संयुक्त परिवार में मैं और मेरा परिवार बहुत खुश थे. अपने फ्लैट में हमें बड़ा अकेलापन सा महसूस होता है,’’ राजेश का स्वर उदास हो गया.

‘‘अपने छोटे भाई के वैवाहिक जीवन को खुशियों से भरने के लिए यह कीमत तुम खुशीखुशी चुका दो, राजेश. अपने फ्लैट की किस्त के नाम पर तुम रवि से हर महीने क्व10 हजार लेने कभी बंद मत करना. यह अतिरिक्त खर्चा ही संगीता के दिमाग में किराए के मकान में जाने का कीड़ा पैदा नहीं होने देगा.’’

‘‘आप ठीक कह रहे हैं, सर. वैसे रवि से रुपए ले कर मैं नियमित रूप से बैंक में जमा कराऊंगा. भविष्य में इस मकान को तोड़ कर नए सिरे से बढि़या और ज्यादा बड़ा दोमंजिला मकान बनाने में यह पैसा काम आएगा. तब मैं अपना फ्लैट बेच दूंगा और हम दोनों भाई फिर से साथ रहने लगेंगे,’’ राजेश भावुक हो उठा. ‘‘पिछले दिनों रवि को मुंबई भेजने और तुम्हारे फ्लैट की किस्त उस से लेने की हम दोनों के बीच जो खिचड़ी पकी है, उस की भनक किसी को कभी नहीं लगनी चाहिए,’’ उमेश साहब ने उसे मुसकराते हुए आगाह किया. ‘‘ऐसा कभी नहीं होगा, सर. आप मेरी तरफ से शिखा मैडम को भी धन्यवाद देना. उन्होंने रवि के विवाहित जीवन में सुधार लाने का बीड़ा न उठाया होता तो हमारा संयुक्त परिवार बिखर जाता.’’

‘‘अंत भला तो सब भला,’’ उमेश साहब की इस बात ने राजेश के चेहरे को फूल सा खिला दिया था. Hindi Family Story

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें