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Hindi Story : शन्नो

Hindi Story. अमीना ने लाइन से लेटे हुए अपने बच्चों की बेमतलब गिनती करनी शुरू कर दी, तो हैरान रह गई.

इन 14 सालों में अमीना ने 7 बच्चों को पैदा कर लिया था. उसे खुद पर तरस आने लगा कि क्या वह मशीन थी? बच्चों का भविष्य क्या था? शायद कुछ भी नहीं था.

अमीना खुद से जिरह करती हुई अपनी 3 साल की बेटी के पास लेटी ही थी, तभी उस का पति अख्तर किराने की दुकान से लौट आया. रात के 10 बजे थे.

अख्तर पेशे से मकान बनाने का मिस्त्री था. सुबह 8 बजे से ले कर शाम 5 बजे तक वह काम करता था. उस के बाद वह महल्ले में ही जमीर अहमद की किराने की दुकान पर बैठा करता था. वह पैसे भी बहुत खर्च कर देता था.

‘‘रुपए कहां हैं?’’ उसे देखते ही अमीना ने कड़वे लहजे में पूछा.

‘‘काहे के रुपए,’’ अख्तर ने मुंह खोला, तो अमीना को तेज बदबू आई. अख्तर ने शराब पी रखी थी.

‘‘तुम ने आज फिर शराब पी है. अब तुम्हारे बच्चों को मैं क्या खिलाऊंगी?’’ अमीना को गुस्सा आ गया था.

‘‘बेशर्म… मैं ने कहा था इतने बच्चे पैदा करने को,’’ अख्तर उसे गालियां देते हुए पीटने लगा.

उन की लड़ाई का शोर सुन कर सभी बच्चे उठ कर रोने लगे.

‘‘जब से तू आई है, तब से मेरी जिंदगी जहन्नुम हो गई है. अब मैं अपनी शन्नो से शादी करूंगा और खुश रहूंगा. तु झे तो…’’ अख्तर कुछ ज्यादा ही नशे की हालत में था, इसलिए उलटे मुंह पलंग पर गिर पड़ा. वह कुछ देर तक बड़बड़ाता रहा, फिर सो गया.

तब खिसिया कर अमीना ने सातों बच्चों को पीटना शुरू कर दिया. शन्नो का नाम सुन कर उस के तनबदन में आग लग जाती थी.

अख्तर का पिछले एक साल से शन्नो से इश्क का चक्कर चल रहा था. शन्नो को ले कर घर में अकसर लड़ाई होती रहती थी. वह आधी से ज्यादा कमाई शन्नो पर खर्च कर देता था. इस वजह से बच्चे एक दिन खाना खाते, तो दूसरे दिन भूखे ही सो जाते थे.

अब अमीना ने तय कर लिया था कि अपने पति की सारी करतूतें बस्ती वालों को बताएगी और अपने ऊपर हो रहे जोरजुल्मों का हिसाब मांगेगी.

अमीना ने बस्ती वालों को सबकुछ बता दिया. वे सभी उस के साथ हो गए. उन्होंने अख्तर की अच्छी पिटाई कर दी थी. कुछ औरतों को शन्नो के घर भी भेज दिया था.

‘‘अच्छेभले घर की है, तु झे शर्म नहीं आई? बोल, तू खिलाएगी अमीना के बच्चों को? ममता का सहारा दे सकेगी?’’ एक औरत ने इतना कहा ही था, बाकी औरतों ने शन्नो के बाल पकड़ कर उसे बुरी तरह पीट दिया.

शन्नो के तो होश ठिकाने आ चुके थे, मगर अख्तर के अभी बाकी थे.

बस्ती वालों ने सोचा कि अब अख्तर की अक्ल ठिकाने आ जाएगी, लेकिन हुआ उलटा. अख्तर ने अमीना के साथ बच्चों को भी घर से निकाल दिया.

अमीना का जिस्म सुन्न पड़ गया. तब उस से कुछ सोचे न बना, तो वह बच्चों को ले कर शन्नो के कदमों में आ पड़ी, ‘‘शन्नो, मु झे बरबाद होने से बचा लो. मैं कहां जाऊंगी? मेरे बच्चों को अनाथ होने से बचा लो. मैं तुम्हारे आगे हाथ जोड़ती हूं,’’ अमीना गिड़गिड़ाने लगी.

‘‘तुम बस्ती वालों को इकट्ठा करो,’’ शन्नो ने कहा और उस के सामने से हट गई. आधे घंटे में तकरीबन सभी बस्ती वाले इकट्ठा हो गए थे.

एक कोने में खड़ी अमीना अपने बच्चों को दाएंबाएं दबोचे खड़ी थी, जैसे कोई उस के बच्चों को छीन कर मार डालेगा.

सामने जीत की मुसकान लिए अख्तर खड़ा था. वह सोचने लगा था कि वह शन्नो को जीत चुका है, लेकिन शन्नो के अगले जुमले पर तमाम बस्ती वालों के होंठों पर चुप्पी लग गई.

‘‘तुम मु झे कितना चाहते हो?’’ शन्नो ने अख्तर से पूछा. ‘‘बहुत ज्यादा,’’ अख्तर बोला.

‘‘मेरे लिए क्या कर सकते हो?’’ ‘‘घर, बीवी, यहां तक कि बच्चों को भी छोड़ सकता हूं,’’ अख्तर ने कहा.

इस पर शन्नो जोर से हंसी, फिर नजरों को तलवार से भी ज्यादा तेज करते हुए बोली, ‘‘तु झ जैसे शैतान से मैं निकाह करूंगी. ऐसे आदमी की तरफ देख कर शन्नो थूके भी नहीं, जो अपनी बीवी और 7-7 बच्चों को किसी के लिए भी छोड़ दे. क्या भरोसा, कल को तू मु झे भी छोड़ दे.’’

‘‘शन्नो,’’ अख्तर ने कहा, तो शन्नो ने पूरी ताकत से अख्तर के मुंह पर अपनी दाईं हथेली जमा दी. उसे दिन में तारे नजर आने लगे. उस की इश्कबाजी उड़नछू हो गई.

शन्नो एक नजर अमीना पर डाल कर चली गई और अगले दिन वह बस्ती से हमेशा के लिए जा रही थी, तब अमीना ने शन्नो की आंखों में आंसू देखे थे, मगर वह कुछ कह नहीं सकी थी. हां, अमीना के लिए उस के मन में बहुत इज्जत जरूर बढ़ गई थी.  Hindi Story

Special Story : प्यार किया तो परिवार छोड़ो

Special Story. राहुल और नेहा कालेज में साथ पढ़ते थे. दोनों ने नौकरी लगने के बाद शादी कर ली. राहुल के मातापिता इस शादी के खिलाफ थे, लेकिन बेटे की जिद के आगे झुक गए. शादी के बाद नेहा ससुराल में रहने लगी. मगर वहां हर छोटी बात पर उस की तुलना उस की जेठानी से होने लगी.

दरअसल, राहुल के बड़े भाई की शादी उस के मातापिता की पसंद की लड़की से हुई थी, जो दहेज भी खूब लाई थी. ऐसे में नेहा को अपनी ससुराल में खूब तानेउलाहने मिलने लगे. शादी के बाद नेहा नौकरी पर भी जाती थी, मगर सुबह जल्दी उठ कर उसे जेठानी के साथ पूरे घर का काम खत्म करना होता था और फिर भी वह ढेर सारा तनाव ले कर औफिस पहुंचती थी.

शाम को थकीहारी नेहा घर लौटती तो सास की वही जलीकटी कान में गरम सीसे सी घुसती, ‘‘हम ने तो छोटी बहू लाने के लिए बड़े सपने देखे थे. कितने अच्छेअच्छे रिश्ते आ रहे थे राहुल के लिए. इसे तो कुछ करनाधरना ही नहीं आता. अगर हमारी पसंद की लड़की आती तो ऐसा नहीं होता… अपने घर से क्या लाई है? मुंह उठाए खाली हाथ चली आई. मेरा बेटा तो फंस गया.’’

कुछ सालों बाद हालात इतने खराब हो गए कि राहुल को अलग घर लेना पड़ा. अलग रहने के बाद रोज का टकराव खत्म हो गया. नेहा भी अपने औफिस शांति से जाने लगी.

यह कहानी केवल राहुल और नेहा की नहीं है, बल्कि भारत के ऐसे हजारों जोड़ों की है जिन्होंने लव मैरिज की है.

भारत में प्रेम विवाह आज भी केवल 2 लोगों का नहीं, बल्कि 2 विचारधाराओं का टकराव है. एक ओर नई पीढ़ी है, जो अपने जीवनसाथी का चुनाव खुद करना चाहती है, तो दूसरी ओर पारंपरिक परिवार व्यवस्था है, जो शादी को केवल 2 लोगों का नहीं, बल्कि 2 परिवारों का मिलन मानती है. यही कारण है कि प्रेम विवाह करने वाले हजारों नौजवान शादी के बाद ऐसे तनाव का सामना करते हैं, जिस की उन्होंने कभी कल्पना भी नहीं की होती है.

प्रेम विवाह और बहू पर पहला हमला

भारतीय परिवारों में प्रेम विवाह के बाद सब से ज्यादा दबाव लड़की पर पड़ता है. लड़के के मातापिता और रिश्तेदार अकसर यह मानने को तैयार नहीं होते कि उन के बेटे ने उन की इच्छा के खिलाफ अपनी अपनी पसंद से किसी लड़की को चुना है. वे लड़की को ताना मारते हैं कि इस ने हमारे बेटे को फंसा लिया… दानदहेज तो कुछ लाई नहीं… आवारा है, मेरा लड़का फंस गया…

ये केवल शब्द नहीं होते, बल्कि ये धीरेधीरे लड़की को सताने का रूप ले लेते हैं. लड़की को हर छोटीबड़ी बात पर यह एहसास कराया जाता है कि वह इस परिवार में जबरन घुसी है.

इस का नतीजा यह होता है कि शादी के शुरुआती सालों में ही पतिपत्नी का जीवन तनाव से भरा हो जाता है. कई बार पति अपनी पत्नी और मातापिता के बीच संतुलन नहीं बना पाता है. घर 2 गुटों में बंट जाता है और सब से ज्यादा नुकसान उस लड़की का होता है, जिस ने केवल अपने पसंद के इनसान से शादी करने का हौसला दिखाया था.

जब प्रेम विवाह अपराध जैसा लगे

आज भी देश के अनेक हिस्सों में प्रेम विवाह को परिवार की इज्जत से जोड़ कर देखा जाता है. लड़की या लड़का हर अपनी पसंद से शादी कर ले तो इसे मातापिता की हार सम?ा लिया जाता है. अखबार और टीवी चैनल ऐसे समाचारों से भरे पड़े हैं, जिन में प्रेम विवाह करने वाले जोड़ों को सामाजिक बहिष्कार, धमकियों, हिंसा और यहां तक कि औनर किलिंग का सामना करना पड़ा है. अनेक मामलों में लड़की को ससुराल में लगातार सताया जाता है, क्योंकि उसे परिवार की पसंद के बजाय बेटे की पसंद माना जाता है.

संयुक्त परिवार की असली चुनौती

प्रेम विवाह की ज्यादातर समस्याओं का संबंध केवल प्रेम विवाह से नहीं, बल्कि विवाह के बाद की रहने की व्यवस्था से भी है. भारत में अभी भी बड़ी तादाद में नौजवान शादी के बाद अपने मातापिता के साथ ही रहते हैं. यह व्यवस्था अरेंज मैरिज में तो किसी तरह चल जाती है, क्योंकि दोनों परिवारों की मरजी और रजामंदी उस शादी से जुड़ी होती है, लेकिन प्रेम विवाह में अकसर टकराव रहता है.

पश्चिमी देशों में नहीं होता ऐसा

पश्चिमी देशों में भी परिवार होते हैं, मातापिता होते हैं और पीढि़यों के बीच मतभेद भी होते हैं. लेकिन वहां शादी के बाद एक खास फर्क दिखाई देता है. पश्चिमी देशों में यहां की तरह अपने जवान बच्चों के लिए दूल्हा या दुलहन मातापिता नहीं ढूंढ़ते, बल्कि वहां ज्यादातर प्रेम विवाह ही होते हैं. कालेज में, औफिस में लड़कालड़की एकदूसरे को पसंद कर लेते हैं, डेट करते हैं और बात बन गई तो शादी कर लेते हैं. शादी के बाद ज्यादातर जोड़े अपना घर बसाते हैं. वे अपने मातापिता से प्यार और इज्जत का रिश्ता बनाए रखते हैं, लेकिन उन की रोजमर्रा की घरेलू जिंदगी अलग होती है.

इस व्यवस्था के चलते सासबहू, बहूननद या दामादससुर के बीच होने वाले दैनिक टकराव का डर बहुत कम हो जाता है. नया शादीशुदा जोड़ा अपनी शर्तों पर जिंदगी शुरू करता है और अपने रिश्ते को विकसित होने का समय देता है.

इस का मतलब यह नहीं है कि पश्चिमी समाज में कोई समस्या नहीं है. वहां तलाक की दर ज्यादा है और दूसरी तमाम सामाजिक चुनौतियां भी हैं. लेकिन प्रेम विवाह को ले कर पारिवारिक दुश्मनी काफी कम दिखाई देती है, क्योंकि शादी के बाद निजी आजादी को अहमियत दी जाती है. वहां दहेज हत्याएं नहीं होती हैं, बहू को जला कर नहीं मार डालते हैं, उस को फांसी पर नहीं लटका देते हैं या उसे समाज के सामने बेइज्जत नहीं करते हैं.

अलग रहना है हल

भारतीय संस्कृति में मातापिता से अलग रहने की बात अकसर लालच या काहिली से जोड़ दी जाती है. लेकिन हर  बार ऐसा नहीं होता है. अगर 2 पीढि़यों के विचारों में लगातार टकराव हो रहा हो, अगर घर का माहौल जहरीला बन चुका हो, अगर पतिपत्नी का रिश्ता लगातार दबाव में हो, तो अलग रहना कई बार रिश्तों को बचाने का अच्छा जरीया बन सकता है.

अलग रहने का मतलब मातापिता को छोड़ देना नहीं है. इस का मतलब केवल इतना है कि हर परिवार को अपनी निजता और आजादी मिले. कई परिवारों में देखा गया है कि अलग घर में रहने के बाद बहू और सास के संबंध पहले से बेहतर हो जाते हैं, क्योंकि रोजरोज की दखलअंदाजी खत्म हो जाती है.

कुछ बातों पर गौर कर लें

आज प्रेम विवाह करने वाले नौजवानों के सामने सब से बड़ा मुद्दा केवल प्यार नहीं, बल्कि माली और सामाजिक समस्याओं का भी है, इसलिए शादी से पहले कुछ सवालों पर विचार कर लेना जरूरी है, जैसे :

* क्या लड़का और लड़की दोनों अपने पैरों पर खड़े हैं?

* क्या दोनों नौकरी या किसी कारोबार से अपना घर चला सकते हैं?

* क्या वे किराए का घर लेने या अलग रहने के हालात में हैं?

* क्या वे परिवार के विरोध का मानसिक दबाव झेल सकते हैं?

* क्या वे दोनों एकदूसरे के प्रति इतने प्रतिबद्ध हैं कि मुश्किल समय में साथ खड़े रह सकें?

केवल प्यार की बुनियाद पर लिया गया फैसला कई बार जिंदगी की चुनौतियों के सामने कमजोर पड़ जाता है, इसलिए प्रेम विवाह करने से पहले भावनाओं के साथसाथ माली और सामाजिक तैयारी भी जरूरी है.

मांबाप को भी बदलना होगा

सारी जिम्मेदारी केवल नौजवान पीढ़ी पर नहीं डाली जा सकती है. मातापिता को भी यह सम?ाना होगा कि बच्चे कोई जायदाद नहीं हैं, जिन की जिंदगी के हर फैसले पर उन का आखिरी हक हो. अगर बेटा या बेटी पढ़लिख कर अपने जीवनसाथी का चुनाव करता है, तो उसे अपराध की तरह नहीं देखा जाना चाहिए. जो बहू या दामाद परिवार में आया है, उसे इज्जत मिलनी चाहिए, फिर चाहे शादी लव मैरिज हो या पारंपरिक तरीके से की गई हो.

आखिरकार किसी भी शादी की कामयाबी इस बात से तय नहीं होती कि रिश्ता किस ने तय किया था. उस की कामयाबी इस बात से तय होती है कि उस में प्यार, इज्जत और विश्वास कितना है.

प्रेम विवाह न तो सभी समस्याओं का समाधान है और न ही सभी समस्याओं की जड़. लेकिन एक सच बारबार सामने आता है कि प्रेम विवाह करने वाले अनेक जोड़े पारिवारिक टकराव का सामना करते हैं, खासकर तब जब वे ऐसे घर में रहते हैं जहां उन्हें पूरी स्वीकृति नहीं मिलती है, इसलिए आज के नौजवानों को प्रेम विवाह करने से पहले केवल दिल की नहीं, बल्कि दिमाग की भी सुननी चाहिए. अपनी जेब पर भी नजर डाल लेनी चाहिए.

नएनवेले जोड़े किराए के घर में रह कर भी अपनी नई जिंदगी शुरू कर सकते हैं. रिश्तों की कामयाबी की बुनियाद मकान का मालिक होना नहीं, बल्कि आपसी इज्जत, आर्थिक सम?ादारी और पारिवारिक सहयोग होता है. जब आप किसी तीसरेचौथे शख्स की दखलअंदाजी के बिना एकदूसरे के साथ होते हैं और एकदूसरे को वक्त देते हैं, तो आप का आपसी रिश्ता, जो अभी नयानया बना है, जल्दी ही मजबूत होने लगता है. एकदूसरे पर विश्वास जमता है, जो लंबी और कामयाब शादीशुदा जिंदगी के लिए जरूरी है. आप अलग घर ले कर रहेंगे तो तनाव से दूर रहेंगे. खुश रहेंगे, जिम्मेदार बनेंगे और भविष्य की प्लानिंग बेहतर तरीके से कर पाएंगे. Special Story

Story in Hindi : लहूलुहान लव लैटर

Story in Hindi. आदिल अपनी बीवी महविश को दिलोजान से चाहता था. एक दिन महविश ने उस से अजीब सी डिमांड रख दी कि उसे किसी का लव लैटर पढ़ना है. आदिल ने बड़ी मेहनत से लव लैटर लिखा, पर महविश को पसंद नहीं आया. आगे क्या हुआ?

आ दिल जब अपने कमरे में पहुंचा, तो उस की बीवी सो चुकी थी. उस ने धीरे से कबर्ड खोला, अपना कोट उतारा और कबर्ड के एक हैंगर में टांग दिया. फिर बहुत ही आहिस्ता से कबर्ड को पुश कर दिया. ‘खट…’ की आवाज पूरे कमरे में गूंज गई.

सुर्ख जोड़े में दुलहन की तरह सजी आदिल की बीवी चौंक कर उठ बैठी. बिलकुल उसी तरह जैसे वह एक साल पहले शादी की पहली रात उठ कर बैठी थी.

आदिल को शादी की पहली रात का पूरा मंजर याद आ गया. वह अपनी बीवी के पास पहुंचा. उस की बीवी सिमट कर लजाने लगी. घूंघट उस के सिर से गायब था. उस ने अपने सिर पर घूंघट का पल्लू डालने की कोशिश की.

आदिल ने मना कर दिया, ‘‘नहीं, ऐसे ही ठीक है,’’ उस के हाथ में उस की बीवी का हाथ आ गया. नरम और नाजुक हाथ, ‘‘ऐसे ही ठीक है. बिना बदली का चांद. बेवजह घूंघट उठाने की जहमत करनी पड़ती.’’

‘‘मैं सो गई थी.’’ ‘‘मैं जानता हूं. सफर की थकान है.’’ आदिल की बीवी महविश ने अपना हाथ छुड़ाने की कोशिश की. ‘‘अब तो यह हाथ जिंदगीभर नहीं छोडं़ूगा, कहीं भागने नहीं दूंगा.’’

महविश शरमा गई. आदिल ने उस के शरमाए हुए वजूद को अपने आगोश में ले लिया.

‘‘कहीं भी भागने नहीं दूंगा,’’ कहते हुए आदिल ने करीब की मेज पर रखा हुआ मिठाई का डब्बा उठाया, उसे खोला. काजू बर्फी का एक पीस उठा कर खिलाने लगा. फिर महविश ने भी उसे खिलाया.

‘‘कौन दूर भागना चाहेगा आप से… कोई बेवकूफ ही होगी, जो आप की मुहब्बत को ठुकराएगी, आप से दूर जाएगी,’’ महविश बोली.

‘‘फिर भी मेरे प्यार में कहीं कोई कमी रही हो तो मु?ो बता दीजिए. ऐसी कोई चीज जो मैं आप को नहीं दे पाया हूं, मु?ो बताइए,’’ आदिल ने बच्चे की तरह जिद की.

महविश ने आदिल के बालों में उंगलियां फेरते हुए कहा, ‘‘एक ख्वाहिश है मेरी, कहीं दिल में दबी हुई.’’ ‘‘कैसी ख्वाहिश?’’

‘‘मैं ने अपनी जिंदगी में कभी भी कोई लव लैटर नहीं पढ़ा है, पढ़ा क्या देखा तक नहीं है. मु?ो कहीं से लव लैटर ला दीजिए. किसी का लव लैटर, किसी को लिखा हुआ. मैं लव लैटर पढ़ना चाहती हूं. देखना चाहती हूं कि लव लैटर कैसा होता है,’’ महविश ने धीरे से कहा. आदिल हड़बड़ा कर उठ बैठा, ‘‘यह कैसी ख्वाहिश है…’’

आदिल यादों से बाहर आ गया. उस की नजर दीवार घड़ी पर पड़ी. रात के तकरीबन 3 बज रहे थे. उस ने एक नजर अपनी बीवी पर डाली. वह बेसुध पड़ी सो रही थी. बहुत ही खूबसूरत लग रही थी.

आदिल कमरे से निकाल कर बालकनी पर आ गया. घर के सामने गार्डन में शाम के प्रोग्राम की निशानियां अब भी बाकी थीं. एक तरफ स्टेज बना था. एक बड़ी सी मेज पड़ी थी. वही मेज जिस पर मैरिज एनिवर्सरी का केक काटा गया था.

केक कटते ही सब ने ‘हैप्पी मैरिज एनिवर्सरी’ बोला था. ‘मुबारकबाद’ बोल कर गिफ्ट पैक भी दिए थे.

आदिल ने सभी के सामने महविश के गले में डायमंड का नेकलेस भी पहनाया था. फिर ‘भटाभट’ गुब्बारे फूटने लगे थे. मेज पर फटे हुए गुब्बारे अब भी नजर आ रहे थे. कुछेक गुब्बारे टैंट की सीलिंग और साइड के परदों पर अब भी चिपके हुए लटक रहे थे. गार्डन के दाएं और बाएं साइड में टेबल और कुरसियों के इर्दगिर्द डिस्पोजल गिलास और पत्तल पड़े हुए थे. स्टेज के साइड में छोटा सा डीजे सिस्टम भी था, जिस पर कुछ जिस्म थिरके भी थे.

आदिल अंदर अपने स्टडी रूम में आ गया. उस ने मेज के नीचे से कुरसी अपनी तरफ खींची. कुरसी पर बैठ गया. लव लैटर लिखने के लिए कागज और कलम उठाया.

‘कैसे लिखूं… कहां से शुरुआत करूं…’ आदिल सोच में पड़ गया. इस मोबाइल फोन ने तो खत लिखना ही भुला दिया. रोजाना सैकड़ो मैसेज लिखते हैं हम… सोशल मीडिया पर, मगर खत लिखना हम भूल गए.

पर कुछ तो लिखना पड़ेगा. आखिर आदिल की प्यारी बीवी महविश को लव लैटर जो पढ़ना है. कुछ सोच कर आदिल ने लिखा :

जानेमन… जाने तमन्ना… जाने अदा.

तु?ो जैसा है सोचा पाया वही

सूरज की किरनों सा इक चेहरा

देखा है तुम सा मैं ने नहीं…

जानेमन, तुम बहुत खूबसूरत हो. इतनी खूबसूरत कि मेरे पास अल्फाज नहीं हैं… मैं कैसे बयान करूं… तुम्हारे गाल गुलाब से हैं. आंखें बहुत ही नशीली और लब संतरे के दो फांक. तुम न मिलती, तो मैं अधूराअधूरा सा लगता. आई लव यू वैरी मच.

तुम्हारा सिर्फ तुम्हारा

आदिल

चलो हो गया. लिख गया खत. आदिल ने राहत की सांस ली. वह अपने कमरे में लौट आया. महविश अब भी सो रही थी. आदिल ने खत को फोल्ड कर के उस के तकिए के नीचे रख दिया.

सुबह हो गई. आदिल रोजाना की तरह समय पर अपने कालेज पहुंचा. तभी उस के स्टाफ ने आ कर उसे घेर लिया.

‘‘यह बात ठीक नहीं है सर,’’ कंप्यूटर टीचर अजीत वर्मा ने कहा.

‘क्या बात ठीक नहीं है?’ कई और टीचर एकसाथ बोल पड़े.

‘‘कल सर की मैरिज एनिवर्सरी थी… बड़ी धूमधाम से.’’

‘‘नहीं, ऐसे ही छोटीमोटी रस्म मना ली थी केक मंगा कर,’’ आदिल बोला.

‘‘आप ?ाठ बोल रहे हैं सर. यह देखिए मेरे पास सुबूत हैं,’’ अजीत फेसबुक की पोस्ट दिखाने लगा. अजीत रोज ही सोशल साइट पर जा कर चैक कर लेता था. देख लेता था कि कौन कहां है और क्या कर रहा है. आज किस का बर्थडे है. किस की मैरिज एनिवर्सरी.

आदिल ने सिर्फ एक फोटो पोस्ट किया था. अपने घर के गार्डन में डैकोरेट किए गए स्टेज का, जिस पर बड़ेबड़े अल्फाज में लिखा था ‘हैप्पी मैरिज एनिवर्सरी’.

‘‘यह तो गलत बात है आदिल साहब. आप को यहां भी पार्टी देनी पड़ेगी,’’ एक सीनियर टीचर ने कहा.

‘‘ठीक है सर मिल जाएगी, लंच टाइम में,’’ आदिल बोला.

लंच टाइम में आदिल को खत के बारे में याद आया. पता नहीं महविश ने खत पढ़ा है या नहीं, पढ़ा होता तो अब तक उस का फोन आ जाता. शायद खत पर उसकी नजर ही न पड़ी हो. शायद उसे फुरसत ही न मिली हो. कल का सबकुछ बिखरा हुआ पड़ा था. उसे गार्डन भी साफ करवाना पड़ा होगा. टैंट का सामान भी भिजवाना पड़ा होगा.

हालांकि, घरबाहर का सारा काम आदिल का छोटा भाई कामरान ही करता है, लेकिन महविश को भी तो देखना ही पड़ता है. घर पर काम वाली भी आती है, मगर उस के पीछेपीछे भी तो दौड़ना पड़ता है.

आदिल ने फोन मिलाया. पूरी घंटी गई. फोन नहीं उठा. उस ने दोबारा मिलाया.

उधर से फोन आदिल की बहन आलिया ने उठाया, ‘‘भैया मैं हूं आलिया… भाभी छत पर हैं. कपड़े धूप में डाल रही हैं…  मोबाइल अभी देती हूं.’’

आलिया मोबाइल फोन ले कर छत पर पहुंची, ‘‘भाभी, भैया का फोन.’’

‘‘हैलो जी, कैसे हैं आप?’’ आलिया बालटी से कपड़े निकालनिकाल कर छत पर बंधे हुए तार पर फैलने लगी. छत पर नरम धूप फैली हुई थी, जो बहुत भली लग रही थी.

‘‘ठीक हूं,’’ आदिल बोला. ‘‘आप को थकान लग रही होगी…’’ ‘‘थोड़ीबहुत. ज्यादा नहीं. अच्छा, तुम्हें कुछ मिला?’’ आदिल ने पूछा. ‘‘क्या?’’ महविश ने पूछा. ‘‘कुछ भी,’’ आदिल ने कहा. ‘‘कल मु?ो बहुतकुछ मिला था. लोगों से गिफ्ट पैक, आप से डायमंड का नेकलेस.’’ ‘‘इस के अलावा… आज कुछ नहीं मिला… तकिए के नीचे?’’

‘‘अच्छा… वह खत. हां, मिला. आप ने लिखा था? लव लैटर ऐसे तो नहीं होते होंगे. सपाट सीधेसादे. न जज्बात, न एहसास… मु?ो असली लव लैटर चाहिए, नकली नहीं. एक महबूब का, उस की महबूबा के नाम या महबूबा का उस के महबूब के नाम. मियांबीवी का भी चलेगा, लेकिन उस में प्यार हो, मुहब्बत हो, जज्बात हों, एहसास हो.’’

महविश बात करतेकरते नीचे उतर आई. उधर आलिया जब कपड़े फैला चुकी, तो वह रैलिंग के पास पहुंची. बाएं साइड वाले घर के गार्डन में एक लड़की खड़ी थी. सजीधजी. मुसकराती हुई.

गली के मोड़ से एक लड़का आता हुआ दिखाई दिया. दुबलापतला. हाथ में कलावा पहने. छोटेछोटे बालों में एक मोटी सी चोटी. माथे पर तिलक. वह लड़का उस लड़की के घर के गेट के बहुत पास से गुजरा. लड़की से कुछ बोला. क्या बोला? आलिया को सुनाई नहीं पड़ा. लड़की हंस दी. लड़का मुसकराता हुआ गली में आगे बढ़ गया.

शाम को आदिल ने महविश से कहा, ‘‘यार, मैं ने बड़ी मेहनत से वह लव लैटर लिखा था. दिमाग पर कितना जोर डाला था, तब कहीं जा कर अल्फाज कागज  पर उतरे थे. और तुम ने मेरा लव लैटर रिजैक्ट कर दिया.’’

‘‘आप ने खत लिखने में बेशक मेहनत की होगी, लेकिन वह सिर्फ लैटर था, लव लैटर नहीं. उस में मुहब्बत नदारद थी.’’

‘‘अच्छा महविश, यह बताइए कि यह लव लैटर वाली ख्वाहिश तुम्हारे दिल में कब पैदा हुई और कैसे?’’

महविश मुसकराई, ‘‘बचपन की बात है. मैं जमात 4 या 5 में पढ़ रही थी. मेरे क्लास में एक लड़का था. जैसे बहुत से लड़केलड़कियां साथ पढ़ते हैं, वह भी पढ़ता था. जैसे सब साथ में खेलतेकूदते हैं, बोलते हैं, लड़ते?ागड़ते हैं. वह भी साथ में खेलता था,  बोलता था. बचपना था. नासम?ा थी मैं. शायद वह नासम?ा नहीं था. शायद वह नादान था. पता नहीं क्या था वह. किस का बेटा था, मैं नहीं जानती.’’ आदिल के चेहरे पर कई भाव आ

रहे थे, जा रहे थे. महविश उस के चेहरे को देख कर शांत हो गई, ‘‘आप कुछ उलटासीधा तो नहीं सोचने लगे. ऐसीवैसी कोई बात नहीं थी. आप गलतफहमी मत पाल लेना.’’

‘‘मैं इतने छोटे दिल का भी नहीं हूं. आगे बताइए. कहानी इंटरस्टिंग लग रही है.’’

‘‘मिस्टर, यह कहानी नहीं है, बल्कि हकीकत है. सुनिए, एक दिन सुबहसवेरे पहले ही घंटे में मेरे स्कूल के हैडमास्टर साहब उस लड़के को बेतहाशा पीटने लगे. वह चिल्ला रहा था. आखिरकार किसी तरह वह लड़का स्कूल से भाग पड़ा था.

‘‘हैडमास्टर साहब के कहने पर कई लड़कों ने उस का पीछा भी किया था, पर वह लड़का पकड़ में नहीं आया. अरहर के खेतों से होता हुआ वह अपने गांव निकल गया था.

‘‘कहते हैं कि वह लड़का अपनी मौसी के यहां पढ़ने के लिए आया था और मौसी के घर में ही रहता था.’’

‘‘लेकिन हैडमास्टर साहब ने उसे इतनी बेदर्दी से मारा क्यों? क्या गलती थी उस की?’’ आदिल के मुंह से अचानक  निकला.

‘‘उस लड़के ने एक लव लैटर लिखा था और वह लव लैटर हैडमास्टर साहब के हाथ लग गया था.’’

‘‘लेकिन वह लव लैटर किस लड़की के नाम था?’’ आदिल ने जिज्ञासु हो कर पूछा.

‘‘मेरे नाम था वह लव लैटर. मु?ो यह बात बहुत बाद में पता चली. तब जब मैं प्राइमरी स्कूल पास कर के जूनियर में आ गई थी.’’ यह सुन कर आदिल अवाक रह गया. बात आईगई हो गई.

आलिया ने छत से देखा कि आज वह लड़का अपनी बाइक से आ रहा था. गली के उसी मोड़ से. बनाठना. वह लड़का पड़ोस के घर के गार्डन में ?ांकता हुआ है या यों कहें कि खुद को उस लड़की को दिखाता हुआ गुजरा. लड़की तैयार खड़ी थी. मुसकराई.  लड़का भी मुसकराया. लड़का बाइक की स्पीड बढ़ा कर तेजी से गली से ओ?ाल हो गया.

थोड़ी देर बाद वह लड़की भी अपने घर से बाहर निकली. बुरके में. सड़क पर आई. एक आटोरिकशा पकड़ा. आटोरिकशा उसी दिशा में चल दिया, जिधर वह लड़का गया था.

आदिल के कालेज में सालाना इम्तिहान शुरू हो चुके थे. आज अंगरेजी का पेपर था. तकरीबन एक घंटा हो चुका था. एक घंटे के पूरा होने पर एक घंटी बजी.

‘‘चलिए सर, राउंड पर चलते हैं,’’ आदिल के एक साथी टीचर अजीत वर्मा ने कहा.

आदिल, अजीत वर्मा और अमित राठौर तीनों राउंड पर चल दिए. उन्होंने रूम नंबर एक से शुरुआत की. वे छात्रों के पास जाते और पेपर उठा कर देखते कि कहीं कोई निशान तो नहीं लगा है. कोई जवाब तो नहीं लिखा है. कौपियां भी उलटपुलट कर देखते. जिस छात्र पर शक होता उस की तलाशी भी लेते. ऐसा  ही करते हुए जब वे रूम नंबर 3 में पहुंचे, तो आदिल को एक लड़के पर शक हुआ, ‘‘स्टैंडअप.’’

लड़का खड़ा हो गया. आदिल ने उस की शर्ट की तलाशी ली. उस की पैंट की दोनों जेबों की तलाशी ली. कुछ भी नहीं निकला. उस की बैल्ट के हुक में भी देखा. वहां भी कुछ नहीं था.

आदिल का शक गलत निकला. उस छात्र के पास नकल नहीं थी. आदिल ने उस लड़के पास वाले लड़के को इशारा किया. वह उठ खड़ा हुआ.

‘‘कुछ नहीं है सर, मैं नकल नहीं लाता हूं,’’ वह लड़का बोला.

आदिल ने उस लड़के की दोनों जब में हाथ डाला. कुछ नहीं मिला. फिर बैक पौकेट में देखा. एक पर्स था, जिस में 100-100 और 200-200 रुपए के कई नोट थे.

‘‘इतने रुपए क्यों ले कर आते हो? 9वीं जमात में पढ़ते हो, कहां खर्च करते हो इतने पैसे? और यह क्या है… रुपयों के बीच में यह परची कैसी है?’’

‘‘सर, यह नकल नहीं है. सर, यह परची मु?ो वापस कर दीजिए… प्लीज सर.’’

‘‘नकल ले कर आते हो, इतना सम?ाने पर भी.’’ ‘‘नहीं सर, यह नकल नहीं है.’’ ‘‘फिर क्या है?’’ आदिल ने पूछा.

लड़के ने सिर झुका लिया. आदिल ने पर्स लड़के को वापस कर दिया.

आदिल की नजर कागज पर लिखी इबारत पर पड़ी. लिखा था, ‘मेरी जान दीपाली…’

‘यह तो लव लैटर है…’ आदिल ने मन ही मन सोचा. उस की आंखों में ऐसी चमक दौड़ गई जैसे कि उस के हाथ कोई खजाना लग गया हो. ‘‘बैठ जाओ,’’ आदिल ने उस लड़के से कहा और परची अपने हाथ में दबा ली. आदिल के दोनों साथी टीचर उस के पास दौड़ आए. एक ने पूछा, ‘‘क्या निकला? लव लैटर है क्या?’’

‘‘लव लैटर नहीं है, न ही नकल सामग्री है. ऐसे ही फालतू की शायरी लिखी है.’’

शाम को आदिल अपने घर बहुत खुशखुश पहुंचा. महविश गार्डन में ही मिल गई आदिल का इंतजार करते हुए.

आदिल को देखते ही महविश भांप गई कि आज कुछ खास बात हुई है.

‘‘क्या बात है, आज आप बहुत खुश नजर आ रहे हैं? प्रमोशन हो गया क्या?’’

‘‘इधर तो आइए… अभी दिखाता हूं… आप भी खुश हो जाएंगी,’’ आदिल ने बाइक खड़ी करते हुए कहा. फिर दोनों साथसाथ घर के अंदर आ गए.

आदिल ने शर्ट की जेब से लैटर निकाल कर महविश के हाथ पर रख दिया और कहा, ‘‘यह रही आप की ख्वाहिश.’’

महविश ने खत को अनफोल्ड किया. खत सुर्ख रोशनाई से लिखा हुआ था :

मेरी जान दीपाली,

फूलों सा चेहरा तेरा, कलियों सी मुसकान है.

रंग तेरा देख के, रूप तेरा देख के, कुदरत भी हैरान है.

आई लव यू. तुम मुझे बहुत अच्छी लगती हो. मेरे नंबर पर काल करना.  क्या तुम भी लव मी? तुम्हारा दीवाना.

महविश जैसेजैसे खत पढ़ती गई, वैसेवैसे उस के चेहरे पर चमक फैलती गई. ऐसी चमक आदिल ने पहले कभी नहीं देखी थी. आदिल उसे खुश देख कर बहुत खुश हुआ.

‘‘हां , यह है लव लैटर… ऐसे होते होंगे लव लैटर… लफ्ज भले ही ठीक से नहीं लिखे हैं, लेकिन जज्बात और एहसास कितने क्लियर हैं. कहां मिला आप को?’’

आदिल महविश के खिले चेहरे को अपलक देख रहा था, चौंक पड़ा और बोला, ‘‘कालेज में एक छात्र के पास.’’

अगले दिन आलिया शाम के समय अपने गार्डन में बैठी पढ रही थी. एकदम से बगल वाले घर से जोरजोर की आवाजें आने लगीं. लड़ाईझगड़े की आवाजें.

‘‘इस पर नजर रखिए अम्मी, यह नाक कटवाएगी. बदतमीज हो गई है यह.’’

‘‘अम्मी, सुहेल से कहिए, मुंह बंद कर ले अपना… चिल्लाए नहीं.’’

‘‘चिल्लाऊंगा… खूब चिल्लाऊंगा. तू बदतमीज हो गई है, बेहया हो गई है. रातदिन मोबाइल पर लगी रहती है, इधरउधर घूमती फिरती है.’’

‘‘क्यों गला फाड़ रहा है? क्या किया है मेरी बेटी ने?’’ अम्मी की आवाज सुनाई पड़ी.

‘‘अम्मी, इसी से पूछिए कि यह कल कहां गई थी?’’

‘‘बेटी, सच बता कि तू किस के साथ घूमती फिरती है. महल्ले में तु?ो ले कर दबी जबान से बातें हो रही हैं.’’

‘‘अम्मी, मेरे साथ पढ़ता है वह लड़का.’’

इसी बीच मौका पा कर सुहेल ने उस लड़की के हाथ से मोबाइल फोन छीन लिया, ‘‘यह देखिए अम्मी, उस लड़के के साथ इस के कैसेकैसे फोटो और वीडियो हैं… देखिए.’’

अम्मी ने देखा, तो उन के होश उड़ गए, ‘‘हायहाय… तौबातौबा… यह सब क्या है… तेरे अब्बू जानेंगे, तो कयामत बरपा हो जाएगी… तेरी पढ़ाईलिखाई बंद हो जाएगी.’’

तभी अब्बू आ गए, ‘‘क्या हो रहा है? कैसा हंगामा है?’’

सुहेल अब्बू के पास दौड़ गया, ‘‘अब्बू, यह देखिए… आप की परी क्या गुल खिला रही है… यह देखिए.’’

अब्बू ने देखा कि उन की लाडली कलावा, तिलक और चोटी वाले के साथ. उन के होश उड़ गए. सोचने लगे कि परवरिश में कहां कमी रह गई. वे ‘धड़ाम’ से सोफे में धंस गए.

तकरीबन एक हफ्ते बाद की बात है. शाम को महविश अपने गार्डन में पौधों को पानी दे रही थी. हर छोटेबड़े पौधे के पास जाजा कर. पानी पा कर पौधे तरोताजा नजर आने लगते. फूलों की मुसकराहट और बढ़ जाती.

पानी देतेदेते जब महविश कौर्नर वाले पौट के पास पहुंची, तो उसे घास पर कागज की एक गेंद सी दिखाई पड़ी.

महविश ने उठा कर देखा. एक पत्थर पर कागज को लपेट कर गेंद बना दिया गया था… दूर फेंकने के लिए.

महविश ने कागज को सीधा कर के देखा. कागज एक खत था. खत भी साधारण नहीं, बल्कि लव लैटर.

लिखा था :

मेरी प्यारी आलिया,

इधर एक हफ्ते से मैं बहुत परेशान हूं. रातदिन चैन नहीं पड़ता. मेरी तुम से बात नहीं हो पा रही है. मिलनाजुलना, तुम्हें देखना तो दूर की बात. उस दिन तुम्हारे भाई ने तुम्हारे घर पर बड़ा तांडव मचाया. इसी बीच तुम्हारे पिताजी भी आ गए. उन्हें मेरे और तुम्हारे बारे में सबकुछ पता चल गया… कहां तक छिपता. आज नहीं तो कल पता चल ही जाता.

उसी दिन से तुम पर पाबंदी लगा दी गई. तुम्हारा कोचिंग जाना बंद कर दिया गया. तुम्हारा मोबाइल तोड़ कर फेंक दिया गया.  तुम से कोई संपर्क नहीं हो पा रहा है, इसलिए मजबूर हो कर मैं चिट्ठी लिख रहा हूं.

तुम जानती हो कि मैं तुम्हें कितना प्यार करता हूं. तुम्हारे बिना जिंदा नहीं रह सकता. तुम्हारे लिए मैं अपना धर्म बदल सकता हूं. इसलाम धर्म अपना सकता हूं. प्लीज, अपने अम्मीअब्बू को सम?ाओ… मनाओ… तुम नहीं मिली, तो मैं जान दे दूंगा.

तुम्हारा आशीष.

खत पढ़ कर महविश का वजूद कांप गया. उस के मुंह से चीख निकल गई. जोरदार डरावनी चीख. ऐसे जैसे कि सामने जहरीला सांप देख लिया हो.

‘‘आलिया…’’ महविश चिल्लाई. आलिया किचन में थी. सब्जी काट रही थी. छुरी रख कर भागती हुई आई, ‘‘क्या हुआ भाभी?’’

महविश बुत बनी खड़ी थी. ‘‘क्या हुआ भाभी?’’ आलिया ने पूछा. महविश ने उस के हाथों में लैटर थमा दिया, ‘‘यह क्या है आलिया?’’

आलिया ने लैटर हाथ में लिया. पहली ही लाइन पढ़ कर वह चकरा गई, ‘‘मेरी प्यारी आलिया… भाभी यह मेरा नहीं है…  मतलब किसी ने मेरे लिए नहीं लिखा है. आलिया एक दूसरी लड़की भी है, जो इस बाजू वाले घर में रहती है.’’

यह सुन कर महविश के चेहरे पर मुसकान दौड़ गई, ‘‘हां, जानती हूं, पर है तो यह लव लैटर है.’’ ‘‘हां भाभी, लव लैटर ही है,’’ आलिया पसीनेपसीने हो गई थी.

‘‘कितना जज्बाती लेटर है यह,’’ महविश की खुशी का ठिकाना नहीं रहा. उस ने अपनी जिंदगी में यह दूसरा लव लैटर देखा था. उस ने आलिया के हाथों से लव लैटर ले कर दोबारा पढ़ना चाहा.

इसी बीच न जाने कहां से कामरान आ गया. उस ने ?ापटा मार कर वह कागज छीन लिया.

‘‘अच्छा, तो यह सब चल रहा है,’’ कामरान ने जल्दीजल्दी पूरा खत पढ़ डाला. खत पढ़ कर वह आगबबूला हो गया. गुस्से से कांपने लगा, ‘‘तुम इसीलिए यहां रह रही हो. तुम्हें शर्म नहीं आती. आजकल महल्ले में हर तरफ आलियाआलिया ही हो रहा है. आज सुबूत मेरे हाथ लगा है. पहले बोलता, तो कोई मानता ही नहीं. सब मुझे सनकी समझते है न…’’

‘‘नहीं, ऐसी बात नहीं है कामरान,’’ महविश ने कहा. आलिया ने भी सफाई दी, ‘‘कामरान, तुम्हें गलतफहमी हुई है. यह लड़की मैं नहीं हूं. यह लड़की दूसरी है. इस पास वाले घर में रहती है.’’

कामरान पर मानो गुस्से का भूत सवार हो गया था, ‘‘तुम यही सब करती रहती हो. गांव में भी तुम्हारे पास लव लैटर मिला था, इसीलिए अब्बा ने तुम्हें यहां शहर में भेज दिया था. तुम भैया का नाम बदनाम करना चाहती हो. भैया की कितनी इज्जत है… लोग क्या कहेंगे?’’

‘‘कामरान, ऐसा कुछ नहीं है,’’ महविश ने समझाना चाहा.

‘‘भाभी, आप नहीं जानतीं… आजकल क्या चल रहा है… हिंदू लड़के मुसलिम लड़कियों को… इस के जैसी बेवकूफ लड़कियों को भगवा ट्रैप में फंसाते हैं… भगा ले जाते हैं… एक मुहिम चला रखी है. उन लड़कों को मकान मिलता है, दुकान भी और नकद पैसा भी. वे लड़के मुसलिम लड़कियों को हिंदू धर्म में दाखिल कर लेते हैं… जहन्नुमी बना देते हैं.

‘‘दूसरी तरफ, अगर मुसलिम लड़का और हिंदू लड़की शादी करना चाहते हैं, तो नहीं कर पाते. मौब लिंचिंग हो जाती है. कचहरी हो या थाना… कहीं भी… यह सब हो रहा है भाभी… और आज अपने घर में भी…’’

‘‘अपने घर में ऐसा नहीं है. यह खत इस बाजू वाले घर की लड़की के लिए है, उस का नाम भी आलिया है.’’

तभी कामरान के हाथ में एक डंडा आ गया. उस ने आलिया पर जोरदार वार कर दिया. आलिया चीख पड़ी. वह चिल्लाती हुई भागी. कामरान ने एक और डंडा मार दिया. आलिया गिर पड़ी और बोली, ‘‘भाभी, बचाओ… समझाओ इसे.’’

‘‘कामरान, रुकोरुको… मारना मत,’’ महविश ने मौका पा कर उस के हाथों से डंडा छीन लिया, ‘‘कामरान, पागल मत बनो…  बात को समझ.’’

उधर आलिया किसी तरह उठी. वह लंगड़ाती हुई भाग पड़ी. कामरान भी उस की तरफ दौड़ पड़ा. आलिया ने अपनी चाल तेज की. करीब ही किचन था. वह किचन में घुस गई. अंदर से दरवाजा बंद करने लगी. तब तक कामरान भी पहुंच चुका था. उस ने जोर से धक्का मारा. दरवाजा खुल गया.

सब्जी के पास छुरी अब भी पड़ी हुई थी. तेज धारदार छुरी. छुरी कामरान के हाथ में आ गई. उस ने आव देखा न ताव छुरी सीधे आलिया के पेट में भोंक दी. एक तेज बहुत तेज खून का फव्वारा फूटा, जो कामरान की आस्तीन के अंदर से होता हुआ, उस की भुजा पर चढ़ गया. आलिया की चीख पूरे घर में गूंज गई. साथ ही साथ महविश की भी.

Hindi Story: चाहत

Hindi Story: जमीन के लालच में चाहत के पति और पिता को उस के अपनों ने ही मार डाला. गोद में रह गया बेटा उदय, पर चाहत ने हिम्मत नहीं हारी और उदय को प्रौफेसर बना दिया. फिर वह अपने मायके लौटी. आगे क्या हुआ?

खेत से लौट कर प्रेम शंकर ने अपने गले से गमछा हटाया और चबूतरे पर बैठ गए. बीड़ी सुलगा कर फूंक से धुआं हवा में उछाला. माथे के पसीने की बूंदों को पोंछते हुए और थकी आवाज में पुकार लगाई, ‘‘चाहत की अम्मां… अभी तक मेहमान गांव से नहीं लौटे हैं क्या?’’ सवाल पूछ कर वे बेचैनी से चारों तरफ टहलने लगे. चाहत की मां राजौरी हड़बड़ाती हुई बाहर निकल आई. चाहत भी पीछे से अपने बेटे उदय को गोद में ले कर आ गई. ‘‘इतनी जल्दी आप आ गए? कुछ हुआ है क्या? कभी सोहन के बारे में नहीं पूछते… आज?’’ राजौरी की सांसें फूलने लगीं. प्रेम शंकर उस का हाथ पकड़ कर बोले, ‘‘अरे, शांत हो जा राजौरी. मैं ने बस इतना पूछ लिया कि शाम हो गई और अभी तक नहीं लौटे.’’ राजौरी की घबराहट कुछ कम हुई, फिर अपने पति के लिए पानी लाने चली गई.

राजौरी पानी का लोटा और कटोरी में थोड़ा सा गुड़ ले कर आई और प्रेम शंकर को पकड़ाया. वे उठ कर आंगन में नली के पास जा कर कुल्ला करने लगे, फिर चबूतरे पर बैठ गए. गुड़ खा कर पानी पिया. थोड़ी तरावट महसूस हुई. आज मौसम में खुश्की थी. नीम और पकड़ी के पेड़ की पत्तियां भी हिलने से मना कर रही थीं. ‘‘चाहत की मां, हम आते हैं दालान से घूम कर,’’ प्रेम शंकर की आवाज में सुस्ती थी.
‘‘कोई बात है क्या चाहत के बापू? कुछ तो है जो हम सब से छिपा रहे हैं?’’
प्रेम शंकर ने अपनी गरदन को एक ?ाटका दिया और हौले से मुसकरा कर बोले, ‘‘कुछ नहीं है. उमस के मारे दम निकल रहा है और धान रोपनी का समय हो रहा है. बहुत काम है, इसी मारे चिंता लगी हुई है.’’
प्रेम शंकर असल बात राजौरी को बता नहीं पाए. दरअसल, जब वे रास्ते में सुरेश से मिल कर आ रहे थे, तो एक बात पता चली थी उन्हें. मारे घबराहट के उन को पसीना आने लगा था.

इस गांव की रीत है कि जायदाद अपने बेटे को ही देनी होती है. अगर बेटा नहीं है तो भतीजे को. बेटियों को जायदाद का एक हिस्सा भी नहीं दिया जा सकता है. प्रेम शंकर को एक ही बेटी है चाहत. वह छोटी थी तब प्रेम शंकर सोचते थे कि खेतखलिहान भतीजे को दे देंगे, पर बाद के दिनों में भाईभतीजे के रंगढंग ठीक नहीं लगने से उन का मन बदल गया था. चाहत की शादी राजौरी की बहन की ननद के बेटे रोहन से हुई थी, जिस के सिर से मांबाप का साया उठ गया था. हालांकि, गांव में अफवाह है कि चाहत और सोहन के बीच प्रेम था. बातों को दबाने के लिए उन दोनों की शादी करा दी गई. प्रेम शंकर ने सोहन और चाहत के नाम सारी जायदाद लिख दी. पूरे कुनबे में यह बात आग की तरह फैल गई. सब तिलमिलाहट से भर गए. सब के सब प्रेम शंकर और उन के परिवार से कट कर रहने लगे, पर प्रेम शंकर और उन के दामाद सोहन को गांव के लोग बहुत प्यार और इज्जत देते थे.

आज जो बात सुरेश ने बताई, उस के लिए प्रेम शंकर कभी सोच भी नहीं सकते थे. इतनी नीचता पर कैसे उतर सकते थे मथुरा भैया और भतीजे. ‘‘प्रेम शंकर, जरा बच कर रहना अपने भाईभतीजे से. उन लोगों ने प्लानिंग की है कि सोहन को जान से मार देंगे और उदय को भी.’’इतना सुनते ही प्रेम शंकर अचानक खांसने लगे थे. उन की छाती में कुछ अटका हुआ महसूस हो रहा था. उन की बेचैनी बढ़ गई थी. आखिर वे करें तो क्या करें? क्या प्रेम शंकर को पुलिस के पास जाना चाहिए? क्या यह बात सच हो सकती है? उन्होंने तय किया कि कल सुबह वे थाने में जा कर शिकायत दर्ज करा आएंगे. अपनी खुशियों को इस तरह दूसरों की हथेलियों में बंद नहीं होने देंगे. अजीब सा खालीपन चारों तरफ पसर गया था. परिंदे भी अपने अपने घोंसलों की ओर जा रहे थे, पर प्रेम शंकर को वापस घर जाने का मन नहीं हुआ.

हलका अंधेरा गहरा आया था. प्रेम शंकर धीमे कदमों से घर की ओर न आ कर खेत की ओर चले गए. जिंदगी किस करवट लेगी, इस सोच ने उन का मन उथलपुथल से भर दिया. एक ऐसा समय भी था, जब प्रेम शंकर सिंह और उन के परिवार की जिंदगी आराम से कट रही थी. एक तरह का आनंद था उन के घर के चारों ओर. चाहत की नौकरी शिक्षामित्र में लग गई थी और सोहन भी पास के गांव में सरकारी टीचर हो गया था. उदय के पैदा होने के बाद तो प्रेम शंकर के घर में हर दिन उत्सव जैसा माहौल रहता था. फिलहाल प्रेम शंकर टहलतेटहलते कुछ दूर आगे अपने खेत के आसपास निकल आए. अचानक उन्हें कुछ आवाज सुनाई दी. पीछे मुड़ कर देखा. उन की आंखों के आगे अंधेरा छा गया. दुश्मन के रूप में उन के भाईभतीजे हाथ में गंडासा लिए खड़े थे. अभी प्रेम शंकर संभल पाते कि उन पर हमला शुरू हो गया. उन के मुंह को अपने हाथों से दबाए उन का एक भतीजा कह रहा था, ‘‘बहुत मर्दानगी छाई है न. अब सब भुला जाओगे. हमारे रहते तू सोहन को मालिक बना देगा, ले अब भुगत.’’

गंडासे से प्रेम शंकर का सिर काट कर उन्हीं के सगे भाई ने ‘जय भवानी’ के नारे से जीत का जश्न मनाया.
अचानक राजौरी का दिल जोर से धड़का. कुछ अपशकुन होने का सोच कर उस की आंखों में आंसू आ गए. दिल रहरह कर धड़क रहा था. पैर भी लड़खड़ा रहे थे. अपने अंदर कुछ रेंगता हुआ महसूस हुआ. मन बेचैन हुआ तो उदय को ले कर पड़ोस में चली गई. चाहत स्कूल की कौपियां जांचने बैठ गई. उस के चेहरे पर संतोष की चमक थी. तभी सोहन की आवाज सुनाई दी, ‘‘चाहत, एक लोटा पानी देना.’’ पानी और गुड़ लिए जब चाहत बाहर आई तो सोहन के हाथों को पकड़े हुए चाचा और भैया लोग को देखा. एक अनजाने डर से उस का मन कांप गया. उन के हाथों में कुल्हाड़ी और गंडासा था. चाहत दौड़ कर चाचा के पैरों से लिपट गई, ‘‘सोहन को कुछ मत करिए मथुरा चाचाजी.’’ ‘‘यहां से हट चाहत. आज प्रेम के खानदान को खत्म कर देंगे. बहुते गरमी चढ़ी है शरीर में.’’


‘‘चाचाजी, हम आप की गोद में खेले हैं. हमारा सुहाग मत उजाडि़ए. रजनीश भैया, धीरज भैया, छोड़ दीजिए सोहन को. हम सब जायदाद आप के नाम कर देंगे. इस गांव से हम सब बाहर चले जाएंगे. सोहन को कुछ मत करिए चाचाजी.’’ चाहत की दर्दभरी आवाज को अनदेखा कर धीरज ने कहा, ‘‘चल हट, ज्यादा अंगरेजी मत ?ाड़. आज हमारी आंखों में खून उतर आया है.’’ ‘‘अरी ओ अम्मां, कहां गई रे… जल्दी आओ अम्मां, वरना सोहन को ये लोग मार देंगे. अरे गांव के लोग, आओ बचाओ न इन को. सब कहां चले गए हो? कोई तो इन कसाइयों सब को रोको,’’ चाहत की कातर आवाज चारों तरफ गूंजने लगी.
तभी कुल्हाड़ी और गंडासे से सोहन के पूरे शरीर पर वार होने लगे. चाहत की आंखों के सामने सोहन मर रहा था. उस की दर्दभरी आवाज से पूरा गांव रो रहा था, पर दुश्मन की आंखों पर जायदाद की पट्टी बंधी थी. राजौरी उदय को लिए घर की ओर आ रही थी कि तभी मुसहर टोले के परदेसी ने उदय को उन की गोद से ले लिया और रोते हुए बोला, ‘‘जल्दी घर जाओ मालकिन. प्रेम मालिक और सोहन बबुआ की जान…’’

राजौरी वहीं से चिल्लाते हुए घर की तरफ भागी आई, ‘‘चाहत के बाबू, जल्दी आओ… हमारा घर उजड़ गया है…’’ घर के पास आ कर राजौरी की आंखें फटी की फटी रह गईं. सोहन का शरीर कई टुकड़ों में इधरउधर फैला हुआ था. पास ही चाहत बेहोश पड़ी हुई थी. दुश्मन वहां से खूनी खेल खेल कर चले गए थे.
राजौरी प्रेम शंकर की खोज में खेत की तरफ गई. देखा गांव के लोग प्रेम शंकर की लाश लिए चले आ रहे
थे. इस सदमे से राजौरी का वहीं दम निकल गया. चाहत को गांव की औरतें पानी का छींटा दे कर होश में लाने की कोशिश कर रही थीं. होश आते ही वह ‘सोहनसोहन’ चिल्लाने लगती थी और फिर बेहोश हो जाती थी. रात को पुलिस की गाडि़यां आईं. गांव के लोगों आंखों देखा सब बयान कर दिए. चाहत का भी बयान लिया गया. 3 लाशों का एकसाथ दाह संस्कार किया गया. श्मशान घाट पर धूंधूं कर चिताएं जल रही थीं. तेज हवा से लपटें कांप उठती थीं. पूरे गांव में मातमी सन्नाटा पसरा हुआ था. सब एकदूसरे से आंखें चुरा रहे थे. पुलिस मथुरा और उस के बेटों को खोजने में लगी हुई थी.

उस रात खौफ से पूरा गांव थर्रा गया था. चाहत को जब होश आया तब उदय का खयाल आया. मुसहर टोले के विशंभर ने बताया कि परदेसी बाबा उस को गांव से बाहर ले गए हैं. सुनने में आया है कि उदय बाबू को भी मारने की प्लानिंग है. ‘‘मु?ो ले चलो उदय के पास. पता नहीं वह कैसे रात में रहा होगा. एक दिन भी वह मेरे बगैर नहीं रहा है,’’ रोते हुए चाहत ने कहा. ‘‘उदय बाबू ठीक हैं बहन. परदेसी बाबा से बात हुई है. कल सुबह हम उदय को ले कर आएंगे.’चाहत के पास अब उदय बचा था. हिम्मत से काम लेना होगा उसे. उस ने सोचा कि गांव में रह कर इंसाफ की गुहार नहीं लगा सकती है और उदय को भी खतरे में नहीं डाल सकती है. रात के 10 बजे जब गांव के सारे लोग सो रहे थे, तब चाहत विशंभर के साथ अपनी मौसी के गांव चली आई. सुबह विशंभर उदय को परदेसी से ले कर चाहत के पास आया. आंसुओं पर बंधा हुआ बांध अचानक से टूट गया. उदय को गोद में ले कर चाहत फूटफूट कर रोने लगी.

उस का मन किया कि उदय को अपने सीने में छिपा ले. जिसे कोई न देख पाए, जिसे कोई न छू पाए.
मथुरा और उस के बेटे को पुलिस खोज नहीं पा रही थी. तब कोर्ट के आदेश पर उस के घर का कुर्की जब्ती का वारंट आया. एक दिन के बाद मथुरा और उस के बेटों ने पुलिस के हवाले कर दिया. ताउम्र कैद की सजा हुई. चाहत गांव लौट कर नहीं आई. उस ने अपना घर परदेसी बाबा के नाम कर दिया. खेतखलिहान उन लोगों को बेच दिया, जिन्होंने पुलिस के सामने मथुरा और उस के बेटों के खिलाफ गवाही
दी थी. दिन गुजरने लगे, महीने बीतने लगे. दुखों का मौसम बहुत लंबा होता है. इन बीते सालों में चाहत ज्यादातर चुप ही रहती थी. आंखें सूनी रहती थीं. वह कहीं भी आनाजाना छोड़ चुकी थी. उस का सपना बेटे को ऊंचाई पर देखना था. उदय 7 साल का हो गया था. उस पर वक्त के पहले ही गंभीरता आ गई थी. उस का सारा समय मां के साथ और पढ़ाई में गुजरता था.


एक दिन उदय ने पूछा, ‘‘मां, मेरे पिताजी कहां हैं? सभी के पिता उन के साथ रहते हैं, मेरे पिता तो कभी मु?ो देखने भी नहीं आते हैं.’’ चाहत बेबसी से मुसकराई. कुरसी से उठ कर उदय को सीने से लगा कर बोली, ‘‘तुम्हारे पिता अब इस दुनिया में नहीं हैं बेटा. उन की मौत हो गई है.’’ ‘‘कैसे मौत हो गई मां?’’ उदय ने हैरान हो कर पूछा. ‘‘इस बारे में मैं कभी बाद में बताऊंगी, तब जब तुम बड़े और सम?ाने लायक हो जाओगे,’’ कहते हुए चाहत ने अपनी मुट्ठियों को कस कर बांध लिया. चाहत भरसक कोशिश करती कि उदय को कोई तकलीफ न हो. वह मां और पिता दोनों की भूमिका निभा रही थी. कभी भी उदय के सामने उदास नहीं रहती और न कभी गुस्सा होती. एक दिन स्कूल की जल्दी छुट्टी हो गई. उदय घर आया तो मां को एक साड़ी को हाथों से सहलाते हुए देखा. उस को देख कर मां बक्से में उस साड़ी को रखने लगी.
‘‘मां, यह क्या रख रही हो? मु?ो दिखाओ,’’ उदय जिज्ञासा से पूछा.

‘‘कुछ नहीं रख रही. जाओ हाथमुंह धो लो. खाना साथ खाएंगे,’’ कहते हुए चाहत ने जल्दी से उस साड़ी को बक्से में रख दिया. ‘‘बताओ न मां, क्या छिपा रही हो?’’ उदय ने जिद पकड़ ली. ‘‘अभी नहीं बेटा, अभी तुम सम?ाने लायक नहीं हो. बाद में इस बारे में बताऊंगी,’’ चाहत अपने सूखे होंठों पर जीभ फेर कर रसोईघर में चली गई. दिन बीतते रहे. उदय ने 10वीं के बोर्ड इम्तिहान में जिले में टौप किया था. पूरे गांव में उत्सव का माहौल था. चाहत सुबह से ही मिलनेमिलाने में बिजी थी. सभी की जबान पर एक ही बात थी कि बिना बाप का बेटा है, इस को हर क्षेत्र में कामयाबी मिले. रात के 10 बज रहे थे. उदय की नींद खुली. मां को अपने पलंग पर न देख कर वह उसे खोजने लगा. स्टोररूम का दरवाजा खुला हुआ था. अंदर गया तो देखा कि मां साड़ी को गोद में ले कर बैठी हुई है. आहट सुन कर चाहत ने ?ाट से वह साड़ी बक्से में रख दी. ‘‘मां , इस साड़ी में ऐसी क्या बात है… आप जबतब इस को ले कर चूमती रहती हैं…’’


‘‘अभी नहीं बता सकती. बाद में बताऊंगी. जब मु?ो लगेगा कि तुम को बताना चाहिए,’’ चाहत की बातों में
इतनी मजबूती थी कि उदय कुछ नहीं पूछ सका. इस के बाद भी उदय ने कई बार अपनी मां को उस साड़ी के साथ तड़पते देखा, लेकिन फिर कुछ पूछने की हिम्मत नहीं कर सका. उदय को ऊंची तालीम हासिल करने के लिए चाहत ने उस को दिल्ली के एक होस्टल में भेज दिया. समय पंख लगा कर उड़ रहा था. उदय हरेक इम्तिहान में टौप करता गया. हर बार चाहत का सिर गर्व से ऊपर उठ जाता था. अब वह फिर से मुसकराने लगी थी. गांव के गरीब बच्चों और अनपढ़ औरतों को पढ़ाना उस का मकसद हो गया था.
आखिरकार ख्वाबों को मंजिल मिल गई. चाहत की इच्छा और उदय की मेहनत रंग लाई. उदय बनारस
हिंदू यूनिवर्सिटी में प्रोफैसर बन गया. एक चमकीली उम्मीद चाहत के आंचल में समा गई. वह सुनहरे भविष्य घोंसला बनाने के लिए फिर से उम्मीदों के तिनके जुटाने लगी.

उस के पैरों में पंख लग गए. अब तक का रोका हुआ बांध ढहने लगा. चाहत उदय के कंधे पर सिर रख कर फूट पड़ी, ‘‘आज मेरा जीवन सफल हो गया उदय. तुम्हारे नानानानी और पिता जहां भी होंगे, खुशी का जश्न मना रहे होंगे.’’ रात में वह साड़ी निकाल कर चाहत उदय के पास बैठ गई, ‘‘जो जिज्ञासा तुम्हारे अंदर बचपन से है, अब उस साड़ी और तुम्हारे पिता के बारे में बताने का समय आ गया है उदय.’’ चाहत ने गहरी सांस ली, ‘‘तुम्हारे पिता, नाना और नानी को उन के अपनों ने ही मारा, जायदाद के लिए. आज भी मैं उस जायदाद को कोसती हूं, जिस के चलते हमारा पूरा परिवार बेमौत मारा गया.’’ बीते हुए दिनों को बताते हुए चाहत उसी दुख से गुजर रही थी, जिसे याद कर के वह सालों से रोती आ रही है. कहा जाता है कि दुख बांटने से दुख कम होता है… पता नहीं कितना कम हुआ. पर चाहत के चेहरे पर शांति छा गई थी.
उदय सन्नाटे में था. अचानक वह चौंक कर उठा और बोला, ‘‘मां, चलो नाना के गांव. मैं देखना चाहता हूं उस गांव को मेरे मेरे पिता की मौत हुई थी.’’


दूसरे दिन चाहत उदय को ले कर उस गांव में गई, जहां उस का सारा संसार उजड़ गया था. चाहत और उदय के साथ गाड़ी में उदय का मामा विशंभर भी बैठा था. उस की आंखें बारबार नम हो जा रही थीं.
चाहत गाड़ी से उतरी. परदेसी का बेटा उस को देखते ही खुशी से चिल्ला उठा, ‘‘हम सब की चाहत बहन आ गई.’’ आवाज सुन कर गांव के लोग इकट्ठा होने लगे. विशंभर के साथ उदय भी गाड़ी से उतरा.
उदय ने सब को प्रणाम किया. विशंभर ने सब को बताया कि यह चाहत का बेटा उदय है और बनारस के कालेज में पढ़ाता है. सब की जबान पर एक ही बात थी, ‘हम सब के उदय बबुआ आ गए हमारे गांव…’
चाहत के घाव पर जैसे कोई मरहम लग रहा था. उसी पल महसूस हुआ, जैसे हवा में एक खुशबू बिखर रही है… सोहन के देह की खुशबू. ‘‘कुरसी लाओ जरा, उदय बबुआ के बैठने के खातिर,’’ विशंभर उल्लास से बोला.


तभी परदेसी की पत्नी बनवारी हांफते हुए आई. उस के हाथों में गुड़ और पानी का लोटा देख कर चाहत को अपना वही दिन याद आ गया, जब सोहन को पानी देने गई थी और अपनी आंखों से दर्दनाक मौत देखी थी. धुंधली नजर से उस ने बनवारी काकी को देखा और उन के गले लग कर रोने लगी. ‘‘काकी का पैर छुओ उदय. परदेसी काका अगर नहीं होते तो आज तुम जिंदा नहीं रहते,’’ चाहत ने कहा. उदय पैर छूने के लिए ?ाका, तभी बनवारी काकी ने कांपते हाथों से उसे गले लगा लिया. ‘‘बबुआ, तेरी माई के साथ बहुत बुरा हुआ. हम ने अपनी आंखों से सब देखा, पर कुछ कर नहीं पाई. आज भी वही हालात हैं. कुछ नहीं बदला बीते सालों में. बेटियों का हिस्सा आज भी भाईभतीजा के पास जा रहा है,’’ बनवारी काकी ने कहा. उदय कुछ देर के लिए वहीं चबूतरे पर बैठ गया और हाथ जोड़ कर बोला, ‘‘मु?ो कुरसी नहीं चाहिए और न किसी तरह का स्वागतसत्कार. यह मेरे नाना का गांव है. आप सब मेरे अपने हैं.

मेरी एक छोटी सी चाहत है. आप चाहें तो इसे आशीर्वाद के रूप में मु?ो दे सकते हैं… क्या आप लोग दीजिएगा?’’ उदय के बोलते ही पूरा गांव चिल्ला उठा, ‘मांगो बच्चा, हम सब से जो बन पड़ेगा, दे देंगे.’‘‘आज के बाद इस गांव की बेटियों को भी उन के हिस्से का हक देना होगा. जो मेरी मां के साथ हुआ, वह अब किसी बेटी के साथ न हो. ‘‘आज बरसों बाद मेरी मां उसी साड़ी को पहन कर आई है, जिस साड़ी को पहने हुए अपने पति की लाश को गले लगाया था, चूमा था. देखिए, खून के छींटे अभी भी साड़ी पर लगे हुए हैं. क्या आप सब फिर ऐसी जिंदगी अपनी बेटियों के नाम लिखना चाहते हैं?’’ कहते हुए उदय की आंखों में आंसुओं का मानो समंदर उतर आया. इस माफी को किसी में ठुकराने की हिम्मत नहीं हुई. चाहत को लगा कोई अनजाना उस के पीछे खड़ा मुसकरा रहा है.                                 

कात्यायनी सिंह

  

Family Problem: मेरा छोटा भाई पैसों के लिए मम्मी पर हाथ उठाने लगा है

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सवाल –

मेरी उम्र 20 साल है और मैं बिहार का रहने वाला हूं. हमारे घर में मेरे मांबाप और हम 2 भाई रहते हैं. मेरा भाई मुझसे छोटा है और उसकी उम्र 17 साल है. मेरा भाई ज्यादातक वक्त अपने दोस्तों के साथ ही बिताता है और देर रात घर आता है. हाल ही में मुझे अपने दोस्तों से पता चला कि मेरा भाई अपने दोस्तों के साथ मिलकर नशे करने लगा है. जब हमें यह पता चला तो मम्मी पापा ने उसे पैसे देना बंद कर दिया. ऐसा करने से वे सबके साथ बद्तमीजी करने लगा और यहां तक की मांबाप का लिहाज किए बिना घर में गालियां भी देने लगा. उसकी गालियों से ही पता चल रहा था कि वे किसी गलत संगत में है. जब 2-3 दिन हमने उसे पैसे नहीं दिए तो उसने जो कदम उठाया जो हम कभी सोच भी नहीं सकते थे. वे मम्मी से पैसे छीनने लगा और जब मम्मी ने नहीं दिए तो उसने मम्मी को धक्का तक दे दिया और पैसे छीन के भाग गया. उसके ऐसा करने से मम्मी को चोट तक आ गई लेकिन उसे इस बात का कोई पछतावा नहीं हुआ. मुझे समझ नहीं आ रहा मैं क्या करूं क्योंकि उसका ऐसा रूप हमने पहले कभी नहीं देखा था.

जवाब –

आज के समय में अक्सर ऐसा सुनने और देखने को मिल रहा है कि बच्चे अपने ही मांबाप पर हाथ उठाने लगे हैं. जहां एक तरफ अब मांबाप यह सोचते हैं कि बच्चों पर हाथ नहीं उठाना चाहिए तो ऐसे में अब उल्टा बच्चे ही यह सब कर रहे हैं और समझ नहीं आता आखिर वे ऐसा सीख कहां से रहे हैं.

आपके भाई की बात की जाए तो आपकी बातों से साफ पता चल रहा है कि वे अपने यारों दोस्तों के साथ अय्याशी और नशा करने में इतना डूब चुका है कि उसे सही और गलत की पहचान ही नहीं रही. जब आप सबने उसे पैसा देने से मना किया तो जाहिर है कि वे नशे नहीं कर पा रहा होगा जिसके चलते जब उसे नशा करने की तलब हुआ तो उसने अपनी ही मां की जान जोखिम में डाल कर पैसे ले भागा.

अभी आप उसे कुछ भी समझाएंगे या फिर मारेंगे भी तो उसे कुछ समझ नहीं आएगा. आप किसी डौक्टर या काउंसलर की सलाह लेकर उसकी काउंसलिंग कराएं और जरूरत पड़े तो उसे नशा मुक्ति केंद्र भी भेजें क्योंकि हो सकता है वे नशे में इस कदर डूब चुका है कि वे क्या कर रहा है उसे खुद समझ नहीं आ रहा. आप उसके दोस्तों के मांबाप के पास भी जा सकते हैं और पूछताछ कर सकते हैं क्योंकि जाहिर है कि उसके दोस्तों के मांबाप भी परेशान होंगे.

व्हाट्सऐप मैसेज या व्हाट्सऐप औडियो से अपनी समस्या इस नम्बर पर 8588843415 भेजें. Family Problem

Social Issue: मेरे छोटे भाई को पैसे चुराने और घर का सामान बेचने की आदत लग गई है

Social Issue: अगर आप भी अपनी समस्या भेजना चाहते हैं, तो इस लेख को अंत तक जरूर पढ़ें.

सवाल –

मेरी उम्र 25 साल है और मेरा एक छोटा भाई है जिस की उम्र 19 साल है. हम मेरठ के रहने वाले हैं. हाल ही में मैं ने नोटिस किया कि मेरा भाई आजकल अपने दोस्तों के साथ कुछ ज्यादा ही घूमने लगा है और खर्चा करने लगा है. उस की पौकेट मनी इतनी कम होने के बावजूद वह इतना खर्चा कैसे कर सकता है. इसी के चलते मैं ने उस के दोस्तों के बात की तो उन्होनें बताया कि मेरे भाई के पास पैसे तो रोज ही होते हैं. जब मैं ने उस पर नजर रखनी शुरू की तो पता चला कि वे आएदिन पापा की पौकेट से पैसे चुराने लगा है. मैं ने उसे इस बात पर खूब डांटा और समझाया भी, साथ ही पापा को बता देने की धमकी भी दी लेकिन वह अभी तक नहीं सुधरा. आएदिन हमारे घर से कोई न कोई चीज गायब हो जाती है और मुझे पूरा शक है कि उसे अब घर की चीजें बेचने की आदत लग गई है. मुझे उसे सुधारने के लिए क्या करना चाहिए?

जवाब –

आप के भाई की उम्र ऐसी है जिस में अकसर लोगों को दोस्तों के साथ घूमनाफिरना, मस्ती करना और ऐयाशी करने की आदत लग जाती है. ऐसे में जब उन के पास पैसे नहीं होते तो वे घर के पैसों और कीमती चीजों को चुराने लगते हैं. आप को ऐसे में सावधान रहना चाहिए, क्योंकि ज्यादा पैसों के लालच में इनसान कुछ भी करने लगता है और इस से नशे करने की आदत भी स्वाभाविक है.

आप को सब से पहले यह बात अपने घर वालों का बतानी चाहिए ताकि वे आप के छोटे भाई पर और उस की हरकतों पर नजर रख सकें. साथ ही, आप उस का पीछा कर के भी देखें की वे कहां जा कर सामान बेचता है और उन पैसों का आखिर करता क्या है, क्योंकि हो सकता है कि उस के दोस्त आप को सारी बात सच न बताएं.

जब आप के पास सारी जानकारी हो तब उसे बैठ के प्यार से समझाएं कि वह जो भी कर रहा है बिलकुल गलत कर रहा है. हमारे मांबाप बहुत ही मेहनत से पैसे कमाते हैं तो उसे खर्च भी हमें सोच समझ कर करना चाहिए और अगर सच में कभी पैसों की जरूरत हो तो मांग कर ले लेने चाहिए.

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Suicide Story: पत्नी से शराब पीने से रोका तो तेजाब पी कर दी जान

Suicide Story: गुस्सा, लालच और हवस, ये 3 ऐसी भावनाएं हैं जो इनसान को उस की असली पहचान से दूर ले जाती हैं. इस के असर में आ कर इनसान सहीगलत की पहचान भूल जाता है और ऐसे फैसले कर बैठता है जो न केवल उस की जिंदगी को, बल्कि उस के अपने और आसपास के लोगों की जिंदगी को भी बरबाद कर देता है. यही बातें इनसान को मौत के मुंह तक पहुंचा देती हैं, तो कभी उसे अपनी ही जान लेने पर मजबूर कर देती हैं.

ऐसा ही कुछ हुआ उधना के मफत नगर में रहने वाले 60 साल के श्यामराव भाई मणिक बोड़से के साथ, जो सिक्योरिटी गार्ड का काम करते थे. उन्होंने तेजाब पी कर अपनी जान दे दी. इस गलत कदम से उन्होंने न सिर्फ अपनी जिंदगी खत्म कर ली, बल्कि अपने परिवार के बारे में भी एक बार नहीं सोचा.

मीडिया खबरों के मुताबिक, खुदकुशी की वजह उन की पत्नी से होने वाला विवाद था. उन की पत्नी अकसर उन्हें शराब पीने पर डांटती थी और इसी बात से परेशान हो कर उन्होंने यह फैसला लिया. श्यामराव मूल रूप से उत्तर प्रदेश के रहने वाले थे और लंबे समय से अपने परिवार के साथ उधना में रह रहे थे.

इस घटना से एक बात साफ समझ आती है कि गुस्सा इनसान की सोचनेसमझने की ताकत को छीन लेता है. अगर श्यामराव एक पल के लिए ठहर कर अपने परिवार के बारे में सोचते, तो शायद उन्हें यह कदम उठाने की जरूरत ही नहीं पड़ती. आखिर इस खुदकुशी करने से उन्हें हासिल क्या हुआ? वे चाहते तो शराब की लत छोड़ कर अपने परिवार के साथ चैन और सुकून से जी सकते थे, लेकिन उन्होंने अपनी जान दे कर सबकुछ खत्म कर दिया. सच तो यह है कि अगर कोई इनसान शांत मन से एक बार सोच ले कि उस के जाने के बाद उस की पत्नी और बच्चों पर क्या गुजरेगी, तो शायद वह कभी खुदकुशी करने जैसा कदम नहीं उठाएगा. Suicide Story

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