Hindi Story : अध्यात्म से अकड़ तक – जब तक मूर्ख हैं तब तक धूर्त हैं

Hindi Story. कौर्पोरेट गुरु डबल श्री ने फरमाया है कि हिंसक नक्सली इलाकों के सरकारी स्कूल बंद कर वहां निजी स्कूल खोले जाएं क्योंकि इन इलाकों के सरकारी स्कूलों से आतंकी पैदा होते हैं.

हवाई सफर करने वाले, एयरकंडीशंड कमरे में बैठ कर दुखी जनता को जीने की राह दिखाने वाले फाइवस्टार संत ने यह कह कर गरीबों की देशभक्ति पर वार किया है. यदि उन की बात पर विश्वास किया जाए तो इन इलाकों के सरकारी स्कूल हर साल आतंकी ही उगल रहे हैं और यदि डबल श्री की राय नहीं मानी गई तो देश का आधा हिस्सा आतंकियों के हाथों में जाने वाला है.

डबल श्री का स्तर रामदेव और आसाराम जैसे बाबाओं से भी ऊंचा है. जहां रामदेव और आसाराम के भक्त कमजोर वर्ग और कमजोर दिमाग के हैं वहीं डबल श्री के भक्त मोटी जेब वाले हैं. दिमाग के बारे में कहा नहीं जा सकता क्योंकि अकसर ये आईआईटी या आईआईएमशुदा होते हैं, जिन्हें जमीन से ऊपर माना जाता है. इन की सनक को देश के शिक्षा जगत का बंटाधार करने को कमर कस कर तैयारी में लगी सरकारें इज्जत देती हैं. आखिरकार इन के अध्यात्म गुरु ने ही बिचौलिया बन कर कई बार उन की नाक कटने से बचाई है.

डबल श्री का सरकारी स्कूल बंद करवाने की सनक के पीछे एक कारण यह भी हो सकता है कि वे जताना चाहते हों कि सरकारी स्कूलों से सरकार को मिलता क्या है? उलट, अपनी जेब से मास्टरों को वेतन देना पड़ता है. उधर, निजी स्कूल कमाई का सब से फायदेमंद धंधा है. पाठ्यक्रम के बाहर ढेर सारी गैरजरूरी किताबें रखवाने और हर सप्ताह तीसरी कक्षा के बच्चों से प्रोजैक्ट रिपोर्ट तैयार करवाने से किताब माफिया और स्टेशनरी माफिया की रोटीरोजी चल रही है. इस बहाने शिक्षाविदों और अफसरों की भी कमाई हो जाती है.

सरकारी स्कूलों के अध्यापक महज मास्टर होते हैं, गुरु नहीं. सालभर वे या तो जानवर गिनते हैं या फिर गटरें और शौचालय. 10 साल में एक बार वे इंसान भी गिन लेते हैं. मतदाता सूची बनाने के काम में भी ये ही जोत दिए जाते हैं. बारबार होने वाले चुनावों में वे ड्यूटी भी दे आते हैं. बचाखुचा समय शिक्षा में जरा भी दिलचस्पी न लेने वालों को पढ़ाने में लगाते हैं. और पढ़ाना भी ऐसा कि सभी ढक्कन छात्रोंछात्राओं का उत्तीर्ण होना जरूरी है वरना इंक्रीमैंट को लाल झंडी.

अब तो अंगरेज आकाओं की देखादेखी सरकारें भी अध्यापकों को ठेके पर रखने लगी हैं. यानी, सूखा वेतन. भविष्य निधि या ग्रैच्युटी भूल जाओ. पक्की नौकरी की कोई गारंटी नहीं. बेइज्जती न हो, इसलिए इन्हें संविदा शिक्षक कहा जाता है. यानी, सम्मानित हम्माल. ऐसे में बेचारे मास्टर से ही देश का भविष्य संवारने की उम्मीद की जाती है, जो सरासर अनुचित है.

सरकारी स्कूलों के भवनों की हालत तो ऐसी है कि पुरातत्त्व विभाग वाले इन्हें आसानी से धरोहर की श्रेणी में रख लें. पुताई की बात तो जाने ही दीजिए, कई स्कूलों में दरवाजेखिड़कियां तक नहीं हैं. रात को शराबखोरी होती है. नशीली दवाओं और शरीर का व्यापार होता है. फर्श उखड़ा होता है. लड़कियों के लिए पेशाबघर नहीं होते.

नेताओं के जन्मदिन और विवाह की पार्टियां होती हैं. बरातें ठहराई जाती हैं. ऐसा नहीं कि हमारे शिक्षा शिकारी इस सब से अनजान हैं. अखबारों के पृष्ठ कई बार रंगे जा चुके हैं. लेकिन अध्यापकों को गधाहम्माली में जोते रखने वाले ये फाइवस्टार विद्वान इसे कोई मुद्दा नहीं मानते. डबल श्री ने शिक्षा के अधिकार को शायद शिक्षा की दुक?ान का अधिकार समझ लिया हो. उन जैसे लोगों को स्कूलों में पढ़ाने के लिए अच्छा वेतन मिलता है. क्यों न मिले? फीस जो जबरदस्त होती है.

घोषणा करते समय अध्यात्म गुरु भूल गए कि आतंकी इलाकों के मातापिता के पास क्या इतनी फीस देने की हैसियत है? क्या प्राणायाम से उन की गरीबी दूर हो जाएगी? क्या सुदर्शन क्रिया उन्हें अच्छा जीवन देगी? क्या ओउम उच्चारने से उन की सेहत ठीक हो जाएगी? डबल श्री का कहना है कि सदैव मुसकराते रहना चाहिए. फिर ये गिनती कर बताते हैं कि बचपन में हम इतनी बार मुसकराते हैं, जवानी में उस से कम और बुढ़ापे में उस से भी कम. लगता है उन्होंने मुसकराहट गिनने में पीएचडी की है.

यदि कोई इन का कहना मान कर किसी की मैयत में मुसकराता रहे तो उस के साथ क्या होगा, यह डबल श्री के अलावा सभी को मालूम है. अध्यात्म की दुकानें लगाने वालों से पूछा जाना चाहिए कि ये फाइवस्टार स्कूल खोलने के अलावा कितना सामाजिक काम करते हैं. उस में भी बच्चे भिश्तियों की तरह पीने का पानी अपने घर से ले जाते हैं. सिर्फ गरमी के दिनों में रेलवेस्टेशनों पर प्याऊ चालू कर देने से ही समाजसेवा नहीं होती.

भजन में तालियां पीटने से किसी की हालत नहीं सुधरती. उस के लिए कर्म करना होता है. जो भारत में भाग्य के सामने ओछा माना जाता है. देश को पुराने काल में बांधे रखने वालों को देख कर ही स्टीव जौब घबरा कर स्वदेश चला गया था. उस ने सूचना क्षेत्र में जो क्रांति की, क्या वह धार्मिक कर्मकांड के कीचड़ में रह कर हो पाती? उस का भाग जाना दुनिया के लिए फायदेमंद रहा. यहां रहता तो वह क्या कर पाता, सिवा भभूत रमा कर, बाबा बन कर उपदेश पिलाने के.

आज महंगी शिक्षा ही बेहतर शिक्षा का पैमाना मानी जाती है. यदि ऐसा है तो इन फाइवस्टार स्कूलों में पढ़ने वाले अब तक तो भारत की तसवीर बदल चुके होते. इन का हर विद्यार्थी आईटी के ख्वाब देखता है. हर साल कितने ही आईआईटियंस निकलते रहते हैं. डिगरी मिली नहीं, कि वीजा के लिए भटकते रहते हैं. पासपोर्ट पर ठप्पा लगवाने के लिए बेताब हो उठते हैं. इस से तो सरकारी स्कूलों से निकले विद्यार्थी ही अच्छे जो देश के लिए कुछ करने को तैयार रहते हैं.

फौज में देखिए, पुलिस में देखिए, ज्यादातर जवान सरकारी स्कूल वाले ही मिलेंगे. फाइवस्टार स्कूलों के विद्यार्थियों को देश से कोई मतलब नहीं होता. वास्तविकता का सामना करने की उन में हिम्मत नहीं होती. देश में शिक्षा के अड्डे दिनोंदिन बढ़ते जा रहे हैं और सरकारी स्कूल बंद होते जा रहे हैं. सरकार भी तो यही चाहती है कि गरीबों के बच्चे पढ़ें नहीं. यदि वे पढ़लिख कर आगे आ गए तो उन के कभी पूरे न किए जाने वाले वादों का क्या होगा?

निजी स्कूलों में विशेष अतिथि बन कर भाषण पिलाने वाले हमारे नेतामंत्री कभी सरकारी स्कूलों के बारे में चिंता नहीं करते. हां, मास्टरजी का स्थानांतर करवाने या रुकवाने में जरूर दिलचस्पी लेते हैं. छोटे शहरों में दो सौ से भी ज्यादा बड़ी निजी शिक्षण संस्थाएं… माफ कीजिए इंस्टिट्यूट हैं. उन्हें सस्ती जमीन मिल जाती है. नैपोलियन के शब्दकोष में असंभव शब्द नहीं है तो इन के पाठ्यक्रम में अनुत्तीर्ण शब्द नहीं है. सब के सब पास होते हैं. क्यों न हों जब लक्ष्मी ने सरस्वती को खरीद लिया है तो फिर किस में हिम्मत है कि रोक ले?

अब राष्ट्रीय संत की बात करें. वैसे तो हर तिलकधारी खुद को राष्ट्रीय संत कहलवाने की इच्छा रखता है. ये लोग अमीरों को बताते हैं कि जिंदगी कैसे जिएं. ज्ञान देने की बाकायदा तगड़ी फीस लेते हैं, देने वाले की जेब जो भरी हुई है. हमारे यहां विद्यादान को महादान कहा जाता है. लेकिन अब यह महाव्यापार बन गया है. बाप की अथाह कमाई वाले अमीरजादों के पास फुरसत ही फुरसत है.

मनोरंजन और जनसंपर्क बढ़ाने के लिए सत्संग से बढ़ कर और क्या विकल्प हो सकता है. सभी संत कहे जाने वाले महाव्यापारी हैं. इन का सारा कामकाज इंग्लिश में चलता है. यानी, देश से वे वैसे ही कटे हुए हैं. वे कभी गंदी बस्तियों में नहीं जाते. न ही उन के शिष्य जाते हैं. ध्यान का कैंप लगाते हैं लेकिन मलिन बस्तियों में सफाई कैंप नहीं लगाते. जगहजगह शिक्षा के अड्डे तो खोलते हैं लेकिन गरीब बच्चों की फीस का इंतजाम नहीं करते. जो कभी पैदल नहीं चलते, हमेशा एसी गाडि़यों या हवाई जहाज में उड़ते फिरते हैं, उन्हें जमीनी हकीकत कैसे मालूम हो सकती है?

जहां भी जाना हो तो दस दिन पहले ही शहर की दीवारें इन के शुभागमन के पोस्टरों से रंग दी जाती हैं. फिर ये महाराजा की तरह अपने लावलशकर के साथ पधारते हैं. हवाई अड्डे पर इन का शानदार स्वागत होता है. इन के प्रवचनों से फायदा होता किस को है? शिक्षा के नएनए अड्डे खोलने के लिए ये शहर से दूर सस्ते में जमीन लेते हैं. कुछ साल चलाया, फिर ऊंचे दाम पर बेच देते हैं. झाडि़यां और पेड़ शिक्षा के नाम पर बलिदान कर दिए जाते हैं. गांवों में शौचालय नहीं हैं. पहले बेचारी महिलाएं झाडि़यों की आड़ में निबट लेती थीं लेकिन शिक्षा माफिया उन का लाज का यह परदा भी छीन लेते हैं.

कितने संतों ने अपने अड्डे बनाने की जगह महिला शौचालय बनाने की समझ दिखाई है? इन्हें जगहजगह आश्रम बनाने की क्या जरूरत है. यह साफ जाहिर है कि ये सस्ते में जमीन खरीदना चाहते हैं ताकि वे अपना धंधा आगे बढ़ा सकें. ये धर्म के व्यापारी अपनी पत्रिका भी निकालते हैं और विज्ञापन बटोरते हैं. पत्रिका की सामग्री एकदूसरे से ली हुई होती है. नया लाएंगे कहां से? लगे हाथों दवाएं भी बनाने लगते हैं. आयुर्वेद और हर्बल के नाम पर पता नहीं क्याक्या बनातेबेचते हैं.

ये अध्यात्म गुरु अपनी मार्केटिंग के लिए महंगी मार्केटिंग एजेंसी हायर करते हैं. जिस शिविर में इन के त्याग, ईमानदारी, अपरिग्रह के डोज दिए जाते हैं, वहां इन के चित्र, प्रवचनों की सीडी, मालाएं, अंगूठियां, झोले, बटुए, किताबें, दवाएं वगैरा भी बेची जाती हैं. इन पर न तो बिक्रीकर लगाया जाता है और न ही सेवाकर. कमाई का तो हिसाब ही नहीं. निर्मल बाबा ने तो अपने बटुए का नाम तक बरकत का बटुआ रख दिया था.

बटुआ खरीदने वाले की बरकत हो या न हो, पर बाबा की जेब जरूर भर जाती है. टीवी चैनलों पर खरीदे हुए भक्त प्रायोजित सवाल पूछते हैं और बाबा उन के जवाब देते हैं. सालभर में ऐसे कई हंगामे होते हैं और जनता अपनी गाढ़ी कमाई इन ठगों के हवाले कर देती है. झबरैले साईं बाबा की पोल उस की मौत के बाद खुल गई कि उसे तरहतरह के विदेशी परफ्यूम लगाने का शौक था, वह सोने के पलंग पर सोता था, उस

के शयनकक्ष से करोड़ों का बेहिसाब धन मिला. नित्यानंद के पुरुषनापुरुष होने के किस्से कई दिनों तक जबान पर चढ़े रहे. कई संत शराबकबाब और शबाब के आशिक हैं. धार्मिक, सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक धाक जमाने के लिए संत बनने से अच्छा और सस्ता कोई दूसरा रास्ता नहीं है. सही है, जब तक मूर्ख हैं तब तक धूर्त हैं. Hindi Story

Education System : क्यों लड़खड़ा रहा है सीबीएसई का सिस्टम

Education System. इम्तिहान का डर बच्चों के लिए नया नहीं है, मगर इस बार सीबीएसई ने डर की नई इबारत लिख दी है. रिजल्ट आने के बाद बच्चे प्रश्नपत्र पर नहीं, अपनी ही उत्तर पुस्तिका पर शक कर रहे हैं.

12वीं बोर्ड 2025-26 में औनस्क्रीन मार्किंग यानी ओएसएम को पारदर्शिता का पुल बताया गया था, पर बोर्ड की लापरवाही और तकनीकी चूकों ने उस पुल को ही ढहा दिया. नतीजे में 4,04,319 छात्र यानी हर चौथा बच्चा, बोर्ड से अपनी कौपी मांग रहा है.

यह सामूहिक अविश्वास है, जिस ने सीबीएसई के प्रति विश्वास की सारी हदें पार कर दी हैं.

इस साल 17,68,962 छात्र 12वीं में बैठे. रिजल्ट के बाद 11,31,960 स्कैन कौपियों के लिए आवेदन आया. पहले यह आंकड़ा 2-3 फीसदी रहता था. इस बार 22 फीसदी से ऊपर पहुंचना बताता है कि कुछ बहुत गलत हुआ है.

संकट की जड़ ओएसएम लागू करने की हड़बड़ी में है. कौपियां स्कैन करने में एक महीना देर हुई. समय कम बचा तो शिक्षकों पर दबाव बढ़ा. टारगेट पूरा करने को रोज 12 से 15 कौपियां जांचनी पड़ीं.

नियम था कि धुंधली कौपी रिजैक्ट कर दोबारा स्कैन हो, मगर 2 दिन बचाने को ब्लर कौपी ही जांच दी गई. ऐसी कौपी पर शून्य अंक मिले या परीक्षक ने अंदाज से नंबर दे दिए. 2 दिन बचाने के लिए किसी बच्चे का पूरा साल बरबाद कर दिया गया.

12वीं के छात्र वेदांत श्रीवास्तव को फिजिक्स में कम अंक मिले. कौपी मंगाई तो पता चला वह उस की थी ही नहीं. उस ने ‘एक्स’ पर लिखा कि वह टूट गया था क्योंकि सीबीएसई ने जो फिजिक्स की आंसरशीट अपलोड की थी वह उस की थी ही नहीं.

पोस्ट वायरल हुई तो इंसाफ नहीं, बल्कि गालियां मिलीं. दूरदर्शन के एंकर अशोक श्रीवास्तव ने उसे ‘पाकिस्तानी’ तक कह दिया. आखिरकार सीबीएसई ने गलती मानी और सही कौपी भेजी.

पर सवाल जो बाकी है वह यह कि पहली गलत कौपी किस की थी? उस दूसरे अज्ञात छात्र को इंसाफ मिला? जब तक बोर्ड उसे ढूंढ़ कर सार्वजनिक रूप से न्याय नहीं देता, शक बना रहेगा.

ओएसएम से पहले 3 लैवल पर मैन्युअल क्रौस चैक था. 2 इवैल्यूएटर आपस में कौपियां बदल कर जांचते थे. फिर हैड एग्जामिनर रैंडम चैक करते थे. नई व्यवस्था में यह सुरक्षा कवच हटा दिया गया. कंप्यूटर तय कर रहा है कि कौपी किसे मिलेगी. मतलब, डबल वैरिफिकेशन बंद.

यह व्यवस्था गरीब बच्चों के लिए और क्रूर है. नवोदय के बच्चे बस्तर, लद्दाख, अरुणाचल से आते हैं. पिता खेतिहर मजदूर, मां मनरेगा में. महीने की कमाई 4-5 हजार. रिजल्ट के बाद बोर्ड कहता है 100 रुपए प्रति विषय दो, तब कौपी दिखाएंगे. 5 विषय के 500 रुपए. पहले यह शुल्क 700 रुपए प्रति विषय था.

सुप्रीम कोर्ट कह चुका है कि उत्तर पुस्तिका सूचना है और आरटीआई में 2 रुपए प्रति पेज पर मिलनी चाहिए, फिर 100 रुपए भी क्यों? यह शुल्क नहीं, गरीब के भरोसे पर जुर्माना है.

बोर्ड 2025 में खुद मान चुका है कि पुनर्मूल्यांकन के बाद 4,632 मामलों में अंक बढ़े और 214 शिक्षकों पर कार्रवाई हुई. हर साल 12,000 से 13,000 छात्रों के अंक बढ़ते हैं. ये सिर्फ वे हैं जिन्होंने फीस दे कर अपील की, जिन की फीस देने की हैसियत नहीं थी, उन का क्या?

क्या होना चाहिए

* रिजल्ट के साथ हर छात्र को डिजीलौकर पर मुफ्त स्कैन्ड कौपी मिले.

* ओएसएम में डबल चैक सिस्टम तुरंत बहाल हो.

* शिक्षकों पर अमानवीय दबाव बंद हो.

* जवाबदेही तय हो. जिस ने ब्लर कौपी जांची, कौपियां बदलीं, उस पर कार्रवाई हो.

सीबीएसई ने आधुनिक बनने की कोशिश की, मगर तकनीक जब मानवीय जवाबदेही को खा जाए तो वह विकास नहीं, विनाश बन जाती है. 4 लाख बच्चों को तनाव और सिस्टम से नफरत मिली है. यह नफरत उन के भविष्य के लिए जहर है.

17 लाख, 68 हजार बच्चों का भरोसा तब लौटेगा जब दिल्ली से दंतेवाड़ा तक हर बच्चे को अपनी कौपी बिना फीस दिए मिले. साथ ही यह भी पक्का हो कि इंसाफ मांगने पर बच्चे को गाली न खानी पड़े.

– अंजनी सक्सेना

Education Inequality :दाखिला मिल गया खर्च कहां से लाएं

Education Inequality. कहते हैं, मेहनत करने वालों की हार नहीं होती. लेकिन जब मेहनत करने के बाद भी सपने की मंजिल तक पहुंचने में सब से बड़ा रोड़ा पैसे की दीवार बन जाए, तो हार का अहसास भीतर तक चुभ जाता है.

आज के भारत का यही सब से बड़ा विरोधाभास है, हुनर सब के पास है, मौके नहीं. हर साल लाखों नौजवान अच्छे नंबर ला कर नामी कालेजों और इंस्टीट्यूटों में दाखिला पाते हैं, पर जब फीस, होस्टल और रोजमर्रा के खर्चों की बात आती है, तो वही नौजवान हालात के आगे झुक जाते हैं.

सपनों का आगाज और हकीकत की दीवार

हर गांवकसबे में कुछ आंखें होती हैं जो बड़े शहरों के कालेजों की ओर टकटकी लगाए रहती हैं. कभी नीट की तैयारी करने वाला सुदीप, कभी आईआईटी का सपना देखने वाली आरती, तो कभी बीएड की डिगरी पाने को बेताब मनीषा, सब की मंजिल एक है, अपना और अपने परिवार का भविष्य बदलना.

पर जब ये बच्चे अपनी मेहनत से एडमिशन लैटर ले कर लौटते हैं, तो घर में खुशी और चिंता दोनों साथ आती हैं. खुशी इसलिए कि बेटाबेटी अब ‘काबिल’ कहलाएंगे और इसलिए कि अब फीस, किताबें, चिंता होस्टल, लैपटौप, कपड़े और सफर का खर्च कैसे उठेगा?

छात्रों के अनुभव, दर्द जो शब्दों से परे है

अभिषेक बिहार के गया जिले का रहने वाला है. उस के पिता किसान हैं, जिन की सालाना आमदनी मुश्किल से एक लाख रुपए है. अभिषेक ने जेईई एडवांस्ड में शानदार रैंक पाई और आईआईटी कानपुर में दाखिला मिला. लेकिन एडमिशन फीस समेत दूसरे खर्च के 90,000 रुपए कहां से आएं?

अभिषेक बताता है, ‘‘मैं ने पापा की आंखों में पहली बार बेबसी देखी. उन्होंने हमारी 2 गायें बेच दीं, ताकि मेरे पहले सैमेस्टर का पैसा भर सकें. होस्टल और मैस की फीस मैं बाद में ट्यूशन पढ़ा कर चुकाता रहा.’’ अभिषेक दिन में क्लास करता और रात को औनलाइन बच्चों को गणित पढ़ाता था. 2 साल तक उस के पास लैपटौप नहीं था. वह दोस्तों के कंप्यूटर पर प्रोजैक्ट पूरे करता रहा. अभिषेक कहता है, ‘‘मैं हर बार जब दोस्तों को कैफे में कौफी पीते देखता था, तो सोचता था कि मेरी दुनिया इतनी अलग क्यों है?’’

प्रिया बिहार के अरवल जिले की रहने वाली है. 12वीं जमात में उस ने 95 फीसदी अंक ला कर दिल्ली यूनिवर्सिटी के नामी कालेज में दाखिला पाया. मगर दिल्ली आकर उसे महसूस हुआ कि सपनों का शहर जितना चमकता है, उतना महंगा भी है. पहले महीने रूम रैंट और किताबों में ही सब पैसे चले गए. उस ने लाइब्रेरी में असिस्टैंट की पार्टटाइम नौकरी कर ली. वहीं पढ़ाई भी होती और थोड़ा जेबखर्च भी निकल आता. प्रिया कहती है, ‘‘जब दोस्त ब्रांडेड कपड़े या फूड कोर्ट में पार्टी करते थे, मैं उन की तसवीरें देख कर मुसकराती थी, लेकिन मन में एक खालीपन होता था. पर मैं ने खुद से वादा किया था कि गरीबी मुझे हरा नहीं सकती.’’ आज वही प्रिया दिल्ली यूनिवर्सिटी में अच्छे नंबर लाई है और अपने गांव की लड़कियों के लिए औनलाइन मुफ्त काउंसलिंग चलाती है.

फैज ने क्लास 12वीं में 94 फीसदी अंक ला कर निजी इंजीनियरिंग कालेज में एडमिशन लिया. पहले साल उस ने पिता के रिटायरमैंट फंड से फीस भरी, लेकिन दूसरे साल फीस बढ़ गई. फैज ने बताया, ‘‘मैं ने जोमैटो में पार्टटाइम डिलीवरी का काम शुरू किया. दिन में क्लास, रात में बाइक ले कर और्डर की डिलीवरी. कई बार थक कर सो भी जाता था. लेकिन जब किसी ने कहा कि ‘इंजीनियर बनने चला था, डिलीवरी बौय बन गया’, तो दिल टूट गया.’’ फैज की आवाज में वह दर्द है जो किसी आंकड़े में नहीं दिखता. उसे कभीकभी लगता था कि मेहनत बेकार चली गई, लेकिन मां के एक शब्द ‘बेटा, हिम्मत मत हार’ ने सब थकान मिटा दी.

बराबर मौका, सिर्फ किताबों की बात नहीं

हमारा संविधान कहता है कि पढ़ाईलिखाई पर सब का हक है, पर क्या वाकई सब के लिए बराबर मौके हैं? सिर्फ एडमिशन मिल जाना बराबरी का मौका नहीं है. उसे पूरा करने के साधन मिलना ही असली बराबरी है.

कई सरकारी और निजी कालेजों मे स्कौलरशिप मिलती है, पर यह प्रोसैस इतना पेचीदा है कि छात्र कई बार पढ़ाई के साथसाथ दफ्तरों के चक्कर काटते रहते हैं. कुछ को स्कौलरशिप समय पर नहीं मिलती, तो कुछ को इसलिए नहीं मिलती क्योंकि उन का पिता ‘गरीबी रेखा से ऊपर’ दिखाया गया होता है, जबकि असल में घर में खाने तक की कमी होती है.

मानसिक बोझ और आत्मसम्मान की कसौटी

पैसे की कमी का असर केवल जेब पर नहीं, आत्मविश्वास पर भी पड़ता है. कई छात्र ऐसे हैं जो भीड़ में भी अकेले पड़ जाते हैं. क्लास में किसी से बात करने में झिझक, कालेज फैस्ट में जाने में संकोच और बाहर खाने में अपराधबोध, यह सब उन के भीतर एक दीवार बना देता है.

मनोवैज्ञानिक डाक्टर पंकज अग्रवाल कहते हैं कि आर्थिक असमानता शिक्षा संस्थानों में अदृश्य मानसिक विभाजन पैदा करती है. जो छात्र खर्च नहीं उठा पाते, वे अकसर खुद को कमतर मानने लगते हैं. ऐसे कई केस आए हैं जहां आर्थिक दबाव ने छात्रों को डिप्रैशन के कगार तक पहुंचा दिया.

साल 2023 में हुए एक सर्वे के मुताबिक, भारत में तकरीबन 35 फीसदी छात्र पैसे की कमी से मानसिक तनाव झेलते हैं.

संघर्ष से निकली रोशनी

लेकिन इस संघर्ष की धरती पर भी कुछ फूल खिलते हैं. आईआईटी मुंबई के अमोल जगताप की कहानी प्रेरणा देती है. वह किसान परिवार से था. खेतों में काम करते हुए उस ने आईआईटी की परीक्षा पास की. पर कैंपस में एडमिशन लेने के बाद पैसे नहीं थे, तो उस ने लैब में रिसर्च असिस्टैंट बन कर काम किया. आज वही अमोल अमेरिका की एक नामी कंपनी में सौफ्टवेयर इंजीनियर है.

अमोल कहता है, ‘‘ मुझे किसी ने कुछ दिया नहीं, मैं ने हर चीज खुद बनाई. जब मुश्किलें हों, तो याद रखना कि तुम्हारे सपनों की कीमत कोई और नहीं चुकाएगा, तुम्हें ही चुकानी होगी.’’

क्या कर सकते हैं संस्थान और समाज

अगर देश को सच्चे माने में ‘शिक्षित भारत’ बनाना है, तो हमें केवल डिगरियां बांटने वाली व्यवस्था नहीं, समान अवसरों वाली व्यवस्था बनानी होगी. इस के लिए कुछ ठोस कदम हो सकते हैं, जैसे फीस ढांचे में लचीलापन. आर्थिक रूप से कमजोर छात्रों को इंस्टौलमैंट या स्लैब पर आधारित भुगतान की सुविधा मिले.

कौर्पोरेट सोशल रिस्पौंन्सिबिलिटी. बड़ी कंपनियां गरीब विद्यार्थियों को गोद लेने की योजना चलाएं, जहां वे एक छात्र की शिक्षा का पूरा खर्च उठाएं. स्कौलरशिप वितरण की पारदर्शिता, आवेदन प्रक्रिया सरल और डिजिटल हो, ताकि छात्र परेशान न हों.

मैंटल हैल्थ सैल

कौलेजों में ऐसे काउंसलर हों जो आर्थिक दबाव झेल रहे छात्रों की मदद कर सकें. हर वह नौजवान जो आर्थिक अभाव में पढ़ रहा है, वह असल में भारत की आत्मा है. वह ही है जो अपने हालात से लड़ कर समाज को नई दिशा देता है.

पैसे की कमी उसे रोक सकती है, लेकिन हरा नहीं सकती. कठिनाइयां इनसान को तोड़ती नहीं, गढ़ती हैं. और जो संघर्ष में गढ़ा जाता है, वह इतिहास में दर्ज होता है.

शिक्षा का हक सब का है, सुविधा कुछ की नहीं

शिक्षा अगर रोशनी है, तो वह किसी एक वर्ग तक सीमित नहीं होनी चाहिए. आज जरूरत है कि हम सिर्फ मेधावी नहीं, मेहनती छात्रों को भी पहचानें.

जो छात्र गरीबी में भी हौसला रखते हैं, वही असली राष्ट्रनिर्माता हैं. देश तभी आगे बढ़ेगा जब हर अभिषेक, प्रिया और फैज को बराबर मौका मिलेगा. फीस भरने की चिंता से मुक्त हो कर सपने पूरे करने की आजादी मिलेगी. डिगरी सब ले लेते हैं, मगर असली शिक्षा वही पाता है जो संघर्ष की आग में जल कर अपने सपनों को सच कर दिखाता है. Education Inequality

Social Story: जागरूकता स्कूलों पर नजर रखे समाज

Social Story: मध्य प्रदेश में चित्रकूट के पाठा इलाके में जब बारिश होती है, तो पानी सिर्फ खेतों में नहीं गिरता, बल्कि वह स्कूल की छत से टपकता हुआ बच्चों की कौपियों तक पहुंच जाता है. यह कोई एक जगह की कहानी नहीं है. यह उस बड़ी सच्चाई का हिस्सा है, जो देश के कई गांवों में अलगअलग रूप में दिखती है. पिछले कुछ सालों में भारत ने पढ़ाईलिखाई के मामले में काफी तरक्की की है. स्कूल बढ़े हैं, बच्चों का दाखिला बढ़ा है, योजनाएं भी आई हैं, लेकिन सवाल यह है कि क्या यह सब मिल कर अच्छी तालीम में बदला है? यहीं सेयोजनाएंऔरहकीकतअलगअलग रास्ते पकड़ लेती हैं. तादाद बनाम असलियत भारत में पढ़ाईलिखाई का सिस्टम बहुत बड़ा है. करोड़ों बच्चे, लाखों स्कूल और बहुत सारे टीचर.

यह अपनेआप में एक उपलब्धि है, क्योंकि इस से पता चलता है कि सरकार ने पढ़ाईलिखाई पर ध्यान दिया है, लेकिन किसी भी सिस्टम को सिर्फ तादाद से नहीं, उस के असर से परखा जाता है. यहीं पहली बड़ी समस्या दिखती है कि स्कूल हैं, लेकिन पढ़ाई नहीं होती. बच्चे आते हैं, लेकिन सीख नहीं पाते. ईसीएआर जैसी रिपोर्टें बारबार बताती रही हैं कि गांवों में पढ़ाईलिखाई की बुनियादी हालत कमजोर है. क्लास 5 के बच्चे क्लास 2 का पाठ ठीक से नहीं पढ़ पाते. गणित की हालत उस से भी ज्यादा खराब है. यह सिर्फ बच्चों की कमजोरी नहीं है, बल्कि यह पूरे सिस्टम की कमी है, जहां सिर्फ बच्चों को स्कूल तक लाने पर ध्यान है, उन्हें सिखाने पर नहीं. स्कूल तक पहुंच गांवों में पहले सब से बड़ी दिक्कत थी स्कूल तक पहुंच. सरकार ने इस पर काम किया.

हर गांव के पास स्कूल, मुफ्त किताबें, मिड डे मील, स्कौलरशिप दी. इस से बच्चे स्कूल तक तो आने लगे, लेकिन असली फर्क यहां समझ आता है कि स्कूल पहुंच जाना और पढ़ाई हो जाना, 2 अलगअलग बातें हैं.
पाठा जैसे इलाकों में बच्चे स्कूल तो जाते हैं, लेकिन वहां का माहौल, जैसे टूटी छत, कम संसाधन, कम टीचर, उन की पढ़ाई रोक देता है यानी रास्ता बन गया, लेकिन मंजिल अभी दूर है. समस्या सिर्फ दूरी की नहीं अकसर कहा जाता है कि गांवों में दिक्कत इसलिए है, क्योंकि वे दूरदराज बसे हैं. जंगल, पहाड़, खराब सड़कें, लेकिन यह आधी सच्चाई है. अगर सिर्फ दूरी ही वजह होती, तो हर ऐसे इलाके की हालत एकजैसी होती. लेकिन केरल और तमिलनाडु जैसे राज्य दिखाते हैं कि मुश्किल हालात में भी बेहतर तालीम दी जा सकती है. इस का मतलब साफ है कि समस्या सिर्फ जगह की नहीं, काम करने के तरीके की भी है.

टीचर सब से जरूरी कड़ी किसी भी स्कूल की सब से बड़ी ताकत उस का टीचर होता है. भारत में टीचर हैं, लेकिन सही जगह नहीं हैं. कहीं एक स्कूल में ज्यादा, तो कहीं एक ही टीचर कई क्लास संभाल रहा है.
इस के अलावा उन्हें पढ़ाने के अलावा कई काम दिए जाते हैं जैसे जनगणना, चुनाव ड्यूटी, मिड डे मील की देखरेख. नतीजा यह होता है कि उन का समय पढ़ाने में कम और बाकी कामों में ज्यादा जाता है. सवाल सीधा है कि क्या हम टीचर को टीचर रहने दे रहे हैं? सब से बड़ी दिक्कत यह है कि यह समस्या दिखती नहीं है. स्कूल खुलते हैं, बच्चे आते हैं, इम्तिहान होते हैं सबकुछ सामान्य लगता है, लेकिन जब असली सीखने की बात आती है, तो तसवीर कमजोर निकलती है. यह एक धीमी नाकामी है. कोई शोर नहीं, लेकिन असर गहरा.

डिजिटल तालीम का सच आजकल पढ़ाईलिखाई में तकनीक पर बहुत जोर है, जैसे स्मार्ट क्लास, औनलाइन पढ़ाई. लेकिन सवाल है कि क्या गांव इस के लिए तैयार हैं? जहां बिजली ही ठीक से नहीं आती, इंटरनैट कमजोर है, वहां डिजिटल एजूकेशन सिर्फ एक योजना बन कर रह जाती है. यानी नीति आगे की सोच रही है, लेकिन जमीन अभी पीछे अटकी है. गांवों में पढ़ाईलिखाई सिर्फ स्कूल की बात नहीं है. गरीबी, घर के काम, बाल मजदूरी, सामाजिक दबाव, ये सब बच्चों की पढ़ाई पर असर करते हैं. लड़कियों के मामले में यह और ज्यादा दिखता है यानी तालीम सिर्फ स्कूल की जिम्मेदारी नहीं, समाज की भी है.
योजनाएं क्यों फेल होती हैं भारत में योजनाओं की कमी नहीं है.

समस्या उन के लागू होने में है. योजनाएं एकजैसे मौडल पर बनती हैं, लेकिन भारत एकजैसा नहीं है. जो फार्मूला शहर में काम करता है, वही गांव में काम करे, यह जरूरी नहीं. जब स्थानीय जरूरतों को नजरअंदाज किया जाता है, तो योजनाएं धीरेधीरे असर खो देती हैं. अब क्या किया जाए? समस्या साफ है, तो अब जरूरत है छोटेछोटे, लेकिन पक्के सुधारों की :
* जहां टीचर कम हैं, वहां सही तैनाती हो.
* गांव के लैवल पर निगरानी को मजबूत करना होगा.
* स्कूल के ढांचे को ठीक करना और बच्चों की सीखने की ताकत पर ध्यान देना.
* लेकिन इन सब के बीच सब से जरूरी चीज है ईमानदारी से काम करना.
जब पाठा का बच्चा टपकती छत के नीचे बैठ कर पढ़ता है, तो वह सिर्फ अपनी हालत नहीं दिखा रहा होता, वह पूरे सिस्टम से सवाल पूछ रहा होता है. क्या हम सिर्फ स्कूल खोल कर खुश हो जाएंगे या सच में बच्चों को पढ़ाना भी चाहेंगे, क्योंकि जब तक हर बच्चे को अच्छी और बराबर तालीम नहीं मिलेगी, तब तक विकास की कोई भी बात अधूरी ही रहेगी.

क्या मांबाप चुप रहेंगे गांवदेहात में पढ़ाई की चर्चा अकसर सरकार और सिस्टम तक सीमित रह जाती है, लेकिन एक बड़ा सच यह भी है कि इस में समाज का रोल भी उतना ही अहम है, खासतौर पर मांबाप का.
सरकारी स्कूलों को ले कर गांवों में एक अजीब सी सोच बन गई है. जो है, जैसा है, चलने दो. यहीं सब से बड़ी चूक होती है. कम लोग इस बात पर ध्यान देते हैं कि सरकारी स्कूलों में भी हर बच्चे पर अच्छाखासा खर्च होता है. फर्क सिर्फ इतना है कि प्राइवेट स्कूल में पैसा मांबाप सीधे देते हैं और सरकारी स्कूल में वही पैसा सरकार के जरीए खर्च होता है यानी पढ़ाई की कीमत दोनों जगह चुकाई जा रही है, बस तरीका अलग है. फिर सवाल उठता है कि अगर खर्च हो रहा है, तो पढ़ाई क्यों नहीं हो रही? इस सवाल का जवाब तभी निकलेगा, जब यह सवाल बारबार पूछा जाएगा.

अगर गांव के 10-20 मांबाप भी मिल कर स्कूल के सामने खड़े हो कर पूछें कि टीचर समय पर क्यों नहीं आते? बच्चों का लैवल इतना कमजोर क्यों है? स्कूल की हालत सुधर क्यों नहीं रही? तो यह सिर्फ शोर नहीं होगा, यह एक संकेत होगा कि अब लोग जाग रहे हैं. अकसर सरकारी स्कूलों में जवाबदेही इसलिए नहीं बनती, क्योंकि कोई पूछने वाला नहीं होता. जहां सवाल नहीं होते, वहां सुधार भी नहीं होता. धरना नहीं, दबाव जरूरी यह बात भी समझनी होगी कि केवल हंगामा करने से स्थायी बदलाव नहीं आता. जरूरी यह है कि मांबाप संगठित और समझदारी से कदम उठाएं, जैसे :
* स्कूल मैनेजमैंट कमेटी को सक्रिय करें.
* बच्चों की पढ़ाईलिखाई का लैवल खुद देखें.
* लिखित शिकायत करें, सिर्फ मौखिक नहीं.
* पंचायत और अफसरों तक बात पहुंचाएं यानी आवाज उठे, लेकिन सही दिशा में.
हर टीचर गलत नहीं होता. कई जगह टीचर भी सिस्टम की कमियों में फंसे होते हैं, कम संसाधन, ज्यादा काम, गलत तैनाती, इसलिए आंदोलन का निशाना किसी एक को बनाना नहीं होना चाहिए, बल्कि पूरे सिस्टम को बेहतर बनाना होना चाहिए.

सरकारी स्कूल हमारे हैं सब से बड़ा बदलाव सोच में आना चाहिए. प्राइवेट स्कूल में मांबाप अपने पैसे के चलते जागरूक रहते हैं, लेकिन सरकारी स्कूल में वही मांबाप चुप हो जाते हैं. यहीं फर्क पैदा होता है.
जब तक मांबाप यह नहीं मानेंगे कि यह स्कूल हमारे बच्चों का है और इस की जिम्मेदारी भी हमारी है, तब तक असली बदलाव मुश्किल है. पाठा के स्कूल की टपकती छत सिर्फ एक इमारत की कमजोरी नहीं है, यह समाज की चुप्पी का भी संकेत है. अब सवाल यह नहीं है कि सरकार क्या कर रही है, सवाल यह है कि क्या मांबाप अपने बच्चों के भविष्य के लिए खड़े होने को तैयार हैं?                

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