Social Story: मध्य प्रदेश में चित्रकूट के पाठा इलाके में जब बारिश होती है, तो पानी सिर्फ खेतों में नहीं गिरता, बल्कि वह स्कूल की छत से टपकता हुआ बच्चों की कौपियों तक पहुंच जाता है. यह कोई एक जगह की कहानी नहीं है. यह उस बड़ी सच्चाई का हिस्सा है, जो देश के कई गांवों में अलगअलग रूप में दिखती है. पिछले कुछ सालों में भारत ने पढ़ाईलिखाई के मामले में काफी तरक्की की है. स्कूल बढ़े हैं, बच्चों का दाखिला बढ़ा है, योजनाएं भी आई हैं, लेकिन सवाल यह है कि क्या यह सब मिल कर अच्छी तालीम में बदला है? यहीं सेयोजनाएंऔरहकीकतअलगअलग रास्ते पकड़ लेती हैं. तादाद बनाम असलियत भारत में पढ़ाईलिखाई का सिस्टम बहुत बड़ा है. करोड़ों बच्चे, लाखों स्कूल और बहुत सारे टीचर.

यह अपनेआप में एक उपलब्धि है, क्योंकि इस से पता चलता है कि सरकार ने पढ़ाईलिखाई पर ध्यान दिया है, लेकिन किसी भी सिस्टम को सिर्फ तादाद से नहीं, उस के असर से परखा जाता है. यहीं पहली बड़ी समस्या दिखती है कि स्कूल हैं, लेकिन पढ़ाई नहीं होती. बच्चे आते हैं, लेकिन सीख नहीं पाते. ईसीएआर जैसी रिपोर्टें बारबार बताती रही हैं कि गांवों में पढ़ाईलिखाई की बुनियादी हालत कमजोर है. क्लास 5 के बच्चे क्लास 2 का पाठ ठीक से नहीं पढ़ पाते. गणित की हालत उस से भी ज्यादा खराब है. यह सिर्फ बच्चों की कमजोरी नहीं है, बल्कि यह पूरे सिस्टम की कमी है, जहां सिर्फ बच्चों को स्कूल तक लाने पर ध्यान है, उन्हें सिखाने पर नहीं. स्कूल तक पहुंच गांवों में पहले सब से बड़ी दिक्कत थी स्कूल तक पहुंच. सरकार ने इस पर काम किया.

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