⚲

Editorial : आरक्षण पर फुजूल का बवाल

Editorial. दिल्ली के जंतरमंतर पर कुछ दिन पहले आरक्षण हटाओ के लिए धरना प्रदर्शन हुआ. खासी भीड़ थी और जो मौजूद थे उन में से ज्यादा ने कलेवे बांधे हुए थे, तिलक लगाए हुए थे, कुछ के बालों में चोटी भी थी. वे मनुस्मृति का गुणगान कर रहे थे और संविधान की आरक्षण की नीति की आलोचना कर रहे थे.

ये कहां के आरक्षण की बात कर रहे थे? क्या शादियों में जातियों को जो आरक्षण मिला है, उस की बात कर रहे थे? क्या मंदिरों में पुजारियों के पुजारी बनने का जो आरक्षण मिला है, उस की बात कर रहे थे? क्या सरकारी स्कूलों में दाखिले में किसी आरक्षण की बात कर रहे थे?

नहीं. ये बात कर रह थे सिर्फ और सिर्फ सरकारी नौकरियों में आरक्षण की. ये प्राइवेट नौकरियों में भी किसी आरक्षण की बात नहीं कर रहे थे. ये सरकारी नौकरी चाहते हैं क्योंकि सरकारी नौकरी का मतलब पैसा और उस से ज्यादा रुतबा. सरकारी नौकरी के लिए इस जमात के लोग पौराणिक कहानियों में भी खूब आते हैं कि फलां ऋषि या फलां मुनि राजा के पास गया और उस ने राजा से धन, गाय, औरतें मांगीं और मिल गईं और वह आशीर्वाद देता लौट गया.

आज उन्हीं की संतानें फिर से वही हक मांग रही हैं. मुसलमानों के 1,000 साल के राज में इन्हें सरकारी नौकरियां नहीं मिलीं. इन में से कुछ के पुरखों ने जरूर दरबारों में छोटीमोटी नौकरियां कीं पर जो उन का हाकिम, जो मुसलिम था, रुतबा नहीं मिला जबकि वे पौराणिक कथाकहानियां चाहते थे जो शायद कभी असल में था ही नहीं.

मुसलमानों से पहले भी जो इतिहास मिलता है उस के हिसाब से इन ऊंची जाति के आरक्षण विरोध करने वालों को कोई जगह कभी नहीं मिली, मौर्य काल में नहीं मिली. शकों के राज में नहीं मिली, हूणों के राज में नहीं मिली.

अंगरेजों के राज में गोरे साहबों के जूते चमकाने पर मिली क्योंकि गोरे साहबों ने इन्हें पढ़ालिखा दिया. उस समय इन लोगों के पुरखों ने बाकियों को तो सही ढंग से बोलना भी नहीं सिखाया था. कहने को सारा ज्ञान इन के पुरखों के दिमाग में था पर उन्होंने अपनी बिरादरियों के अलावा किसी के साथ कभी शेयर नहीं किया.

जब अंगरेज आए तो उन्हें सम झदार चाहिए थे जो लिखापढ़ा सम झ सके. उन्होंने इन्हीं के पुरखों को 1707 के बाद गोरी फौजों में शामिल करना शुरू किया और उस से इस जमात का रुतबा बढ़ा. इन के पास बंदूकें, राइफलें भी आ गईं. इन का समाज पर दबदबा बढ़ गया. कांग्रेस पर कब्जा कर लिया. कांग्रेसी नेताओं ने धर्मकर्म को खूब बढ़ावा दिया और जाति का जहर खूब फैलाया. जो बात पहले सिर्फ मुंह से जबानी एक से दूसरे तक जाती थी अब छप कर बांटी जानी लगी, पर नुकसान हुआ सदियों से समाज में व सरकारों के हाथों सताए लोगों का. पर उन में से कुछ ने इस साजिश को सम झ लिया, पढ़ लिया.

इसी की वजह से आरक्षण जन्मा. महज 3-4 फीसदी नौकरियां के लिए यह बड़ा जमावड़ा इकट्ठा हुआ क्योंकि थोड़ी सी नौकरियों के बल पर सैकड़ों नहीं करोड़ों और छोटे काम धंधे पनप जाते हैं जो सेवा करने के लिए नहीं सेवा करवाने के लिए तैयार होते हैं. आरक्षण उस दरवाजे का रोड़ा है जो जन्म से बड़ों को इन पैसे और रुतबे वाली नौकरियों के आम जनता से शेयर करने को फोर्स करता है.

आरक्षण खत्म नहीं हो सकता. ये लोग जानते हैं पर जमा यह जताने के लिए हुए कि जिन के पास सत्ता है वे सम झें कि ये ही असल में उन की रीढ़ की हड्डी, स्टील फ्रेम हैं. यह धरना प्रदर्शन सिर्फ बताने के लिए था कि इन की मौजूदगी को वोटों के चक्कर में भुला न दिया जाए. यह बताने केलिए था कि ये लोग भाषा पर अपनी पकड़ से  झूठ को आखिरी सच साबित करने की कला अपनाते हैं और सच को जमीन में गहरे गाड़़ना भी जानते हैं.

सरकार, पौलिटिकल पार्टियां, बिजनैसमैन, आम आदमी यह न सम झे कि ये लोग अपना वजूद भूल चुके हैं और आम जनता में घुलमिल गए हैं. यह रैली बताने के लिए थी कि  यह जमात खास है, अभी भी अलग है, अभी भी पूजी जाती है, अभी भी समाज का कंट्रोल इन्हीं के पास है, कौकरोचों से निबटना जानती है. इन्हें कोई हलके में न ले.  Editorial

Editorial : गहरी पैठ – न्याय को तरसता आम आदमी

Editorial. आम आदमी को तो अदालतों से न्याय की राहत कम ही मिलती है और अगर मिलती है तो दादा के बाद पोतों को मिलती है. अब खास लोगों को भी बड़े वकीलों से न्याय भी मिलना कम होता जा रहा है. न्याय की जरूरत आदमी को आमतौर पर सरकार या सरकारी आदमी से होती है जब वह अपने लाखों कानूनों की धाराओं में से एक अपने मन की चुन कर आम आदमी के धंधे, घर, बच्चों, पैसे, काम पर लगा देता है और फिर आराम से बैठ जाता है.

अपने घर, जमीन, पैसे को बचाने का अब एक ही तरीका आम आदमी के पास बचा है, पुलिस वाले को, सरकारी बाबू को, सत्ता में बैठे नेता को एक बड़ा हिस्सा उस में से दे दो. अगर वह सम?ो कि भीमराव अंबेडकर और जवाहरलाल नेहरू के बनाए संविधान, कानूनों में लिखी या मंचों पर कही गई मीठीमीठी बातों में दम है तो भूल जाओ.

यह देश अब उस जगह पर आ गया है जब प्रधानमंत्री एक दिन पैट्रोल की बचत करते हैं और दूसरे दिन 20-25 गाडि़यों का काफिला और सैकड़ों वाहन रास्तों को रोकने में लग जाते हैं जब उन्हें विदेश जाना होता है, 8,000 करोड़ के विमान में जिस में न अफसर होते हैं, न मंत्री, न प्रैस के लोग. जो विमान 300 लोगों को बैठा सकता है उस में एक तरह से वे अकेले होते हैं.

यह देश अब उस जगह आ गया है जब सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश एक रोज बैंच से युवा वकील को कौकरोच कहते हैं और कुछ दिन बाद इंगलैंड जा कर कानून मंत्री और कई दूसरों के साथ बैडमिंटन खेलते नजर आते हैं.

यह देश उस जगह आ गया है जहां दिल्ली शहर में आग में झुलस कर देशीविदेशी 20 से ज्यादा लोग मर जाते हैं पर कोई जज, कोई प्रधानमंत्री, कोई मुख्यमंत्री, कोई अफसर अपनी पोस्ट छोड़ने को मजबूर नहीं होता. यह देश अन्याय का घूंट इस तरह पीने लगा है कि 24 लाख लड़केलड़कियां 1,29,000 मैडिकल सीटों के लिए दोबारा तपती गरमी में एग्जाम देने चले आते हैं और कोई जिम्मेदार नहीं ठहराया जाता कि पेपर पहले लीक किस ने किया.

अगर एक किसान पड़ोसी किसान की कब्जाई जमीन वापस लेना चाहता है तो उसे न पुलिस थाने से न्याय मिलेगा न पहली पास की अदालत से. अगर किसी किसान की फसल को कोई आवारा गाय खा जाए तो उस की शिकायत न कोई गौरक्षक, न मुख्यमंत्री या मुख्य पुजारी सुनेगा. अगर किसी औरत को बच्चा न पैदा कर पाने पर उस का आदमी घर से निकाल दे तो कोई अदालत 2-4 दिन में उस का मामला नहीं सुलटाएगी. अगर कोई लड़की किसी की जबरन से पेट से हो गई तो न तो जबरन करने वाले को सजा मिलेगी, न बच्चे से गर्भ में छुटकारा मिलेगा.

हर काम में ऊपरी पैसा, ऊपरी इंफ्लुएंर्स, ऊपरी सिफारिश चाहिए. देश में न्याय खत्म हो गया है. भाजपा सरकार ने अपने सांसदों और विधायकों को कठपुतली बना डाला है, पुलिस को हुक्म मानने को मजबूर कर रखा है. जज सरकार और सरकारी वकील की मुट्ठी में हैं, यहां तक कि वोट का हक भी चुनाव आयोग ने छीन लिया है. अब हर जना गुलाम है, गौरों का नहीं अपनों का.  Editorial

Editorial : जिमखाना क्लब पर सरकार की टेढ़ी नजर

Editorial. दिल्ली में प्रधानमंत्री के आजकल के घर से सटे एकड़ों में फैले जिमखाना क्लब पर फिलहाल सरकार ने एक टंटा छेड़ रखा है. जब देश महंगाई, बेरोजगारी, जरूरी सामान की किल्लत, गिरते न्याय, जाति और धर्म को ले कर विवादों में उलझा हुआ है, केंद्र सरकार के मंत्री अपने ही लोगों के क्लब के पीछे पड़े हैं.

देशभर में अंगरेजों के काल में जिमखाना क्लब बने थे जहां अंगरेज गोरे सरकारी साहब और थोड़े से गोरे बिजनैसमैन आ कर शामें बिताते थे. भारत की गरमी, धूल और कांग्रेस की नीतियों से परेशान साहब लोगों के ये अड्डे थे और हर शाम जम कर नाचगाना और बढि़या खाना होता था. ठाठों की बात ही अलग थी. बहुतों के आगे तो बोर्ड भी लगे थे कि कुत्तों और भारतीयों को अंदर घुसने की इजाजत नहीं है. हालांकि सारे बैरे, कुक, माली, सफाई वाले भारतीय ही होते थे.

अब दिल्ली में सरकार को सोते हुए जागते हुए देख कर थोड़ा आश्चर्य हो रहा है कि 2014 में जब अच्छी सरकार आ चुकी थी तो वह 2026 तक क्या कर रही थी कि अब बीसियों एकड़ में फैले साहबों के क्लब को अचानक देश की सुरक्षा के लिए खतरा मान लिया गया है जबकि वहां से न तो कोई बंदूकें चलीं और न ही इस जगह से कूदफांद कर किसी आतंकवादी के प्रधानमंत्री के घर में घुसने की खबर है. यह मामला इसलिए उछाला जा रहा है ताकि आम जनता को भरोसा दिलाया जा सके कि भारतीय जनता पार्टी अभी भी मंदिरों की पार्टी है क्लबों की नहीं. भाजपा को अब यह भरोसा हो चला है कि इन क्लबों के मैंबर रिटायर्ड साहब हों या काम कर रहे साहब असल में बिना रीढ़ की हड्डी वाले हैं. इन्हें तो उस हड्डी की आदत पड़ी है जो सरकार या नेता या लोग इन के सामने फेंकते हैं. ये क्लब इस तरह की हड्डियां हैं और जिस भी शहर में हैं वहां डरेसहमे लोगों के जमावड़े की जगह ही हैं.

इन में चूंकि नएनए शाखाओं से आए हिंदी या देशी भाषाओं को बोलने वालों के घुसने पर एक तरह की बिना लिखी अनुमति नहीं है, कुछ बाबुओं ने मंत्रियों से मिल कर इन का सफाया करने की ठान ली है. जनता को ये कह भी सकते हैं कि देखो हमें आम जनता कितनी प्यारी है कि गोरे साहबों की एक और निशानी तोड़ दी है.

जिमखाना क्लबों से देश को कोई फायदा नहीं है पर फायदा तो उन लाखों मंदिरों से भी नहीं है जो यह सरकार हर कोने में बनवा रही है. फायदा तो उन भाजपा कार्यालयों से भी नहीं हो रहा है जो हर तहसील, जिले और प्रदेश के शहर में बन रहे हैं जहां भगवा दुपट्टा डाले लोग कैसे चंदा उगाहें की चर्चा करते रहते हैं.

जिमखाना क्लब हो या कैसे भी क्लब हों असल में लोगों के उठनेबैठने की चौपाल हैं और इन को तूल देना ही गलत है. यह लोगों का ध्यान उन मामलों की ओर बंटाने की साजिश भर है जिन का कोई मतलब नहीं है. यह पक्का थोड़े दिन दूध के भगोने में उबाल जैसा आएगा, कुछ दूध गिरेगा, फिर पानी के छींटें मार कर यह ठंडा हो जाएगा.

आज लोग उसी तरह दड़बों में रहते रहेंगे, गंदी गलियों में कीचड़ और पेशाब के भरे गड्ढों से निकलते रहेंगे, धुएं और भीड़ से जूझते रहेंगे. जो मनोहरलाल खट्टर इस क्लब को हटाने की फाइलों को खंगाल रहे हैं उन्हीं के पास शहरी मकानों, गलियों, सड़कों, नए मकानों की योजनाओं का मंत्रालय है. वहां वे कुछ कर रहे हों, पता नहीं, जरूरत भी क्या है कुछ करने की.

Editorial: गहरी पैठ – जनता को उलझाने के लिए धर्म है न

Editorial: पैट्रोल की बचत के नारे पर जनता ने मंत्रियों के लंबे काफिलों पर हल्ला मचाया तो 2-4 दिन मंत्रियों ने काफिला छोटा कर लिया और गरीब मूर्ख जनता समझा कि वह जीत गई. मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने युवाओं को कौकरोच कह दिया तो किसी ने कौकरोच जनता पार्टी सोशल मीडिया पर बना डाली और लाखों फौओलर्स हो गए तो जनता ने सोचा कि वह जीत गई.

नरेंद्र मोदी ने अपील की कि लोग सोना न खरीदें तो लोगों ने बीसियों सुनारों की दुकानों पर चाय बेचते हुए ज्वैलर्स की रील्स बना दीं और उन के लाखों व्यूज हो गए तो जनता ने सोचा कि वह जीत गई. नरेंद्र मोदी ने अमीरों को विदेश न जाने की सलाह दी और अमीरों के अखबारों में देशी टूर्स के इश्तिहार छपने लगे पर जब नरेंद्र मोदी ने खुद विदेश जा कर पैसा बरबाद किया तो सोशल मीडिया पर खूब खिल्ली उड़ी. जनता ने मजाक बनाकर समझा कि वह जीत गई.

यह सब बहकावा है. जनता कहीं नहीं जीती है. जनता से जो वसूलना है वह वसूला जा रहा है, जाएगा, जाता रहेगा. जनता तो सरकार और सरकार के पिट्ठुओं के लिए काम हमेशा करती रही है और करती रहेगी. जनता को उलझाए रखने के लिए सरकार और ऊंचे लोगों के पास आखिर धर्म है न, मंदिर हैं न, पूजापाठ है न, हिंदूमुसलमान हैं न. इन का सहारा ले कर जो भी मजाक उड़ाया जा रहा है वह 4 दिन में गंदी नाली में बहा दिया जाएगा और फिर इसी पानी में जनता को नंगे पांव चलने पर मजबूर होना होगा.

आज देश के सामने खाड़ी में लड़ाई की वजह से तेल का जो संकट आया है यह तो कोढ़ में खाज की तरह है. यह तो 2-4 सप्ताह में खत्म हो जाएगा क्योंकि अमेरिका ईरान से ज्यादा दिन लड़ नहीं सकता. सुलह तो करनी ही होगी. उस के बाद तेलगैस मिलेगी, सस्ती मिलेगी पर तब तक सरकार बाजार में महंगा बेच चुकी होगी और दाम घटेंगे नहीं.

आज जनता की आवाज को घंटोंघडि़यालों ने इसी तरह से दबा दिया है जैसे पहले हिंदू राजाओं ने पुरोहितों के कहने पर दबाया था, फिर खैबर दर्रे से आने वाले घुड़सवारों ने तलवारों से दबाया था और उस के बाद गोरों ने नावों में आ कर दबाया था. आज जनता की आवाज ही नहीं, उस के हाथपैर भी बांध दिए गए हैं.

सोशल मीडिया पर जो दिख या सुन पड़ रहा है यह परेशान जनता की चीख है, सिसकियां हैं, इन रील्स में मजाक चाहे जितना हो, यह बूढ़ी विधवा के बेटों को कोसने से ज्यादा नहीं है क्योंकि इन रील्स और कौकरोच पार्टियों में सत्ता नहीं बदलने वाली. सत्ता बदल भी गई तो नए लोग वैसे ही होंगे, क्योंकि जनता अपनी आजादी मांग ही नहीं रही.

जनता की मांग रिश्वत उगलने वाली नौकरियां हैं, जनता की मांग 200 यूनिट सस्ती बिजली है, जनता की मांग तो मसजिद तोड़ना है, जनता की मांग तो सिर्फ खाते में मुफ्त के एकदम 2,000 रुपए आ जाने चाहिए की है. ऐसी जनता के सोशल मीडिया पर हल्ले से कोई नहीं डरने वाला. सरकारी चाबुक से अकाउंट ही बंद हो जाएंगे और जनता के रोने की आवाज भी मोबाइल से नहीं निकलेगी.Editorial

Editorial: किसानों के नाम पर राजनीति, असल में सिर्फ व्यापार

Editorial: सरकार का मानना है या कहिए कि उस का बहाना है कि उस ने अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की बात इसलिए नहीं मानी कि वह भारत के बाजार को अमेरिका के खेतों से आए अनाज और डेयरी प्रोडक्ट्स को सस्ते में देश में बिकने की छूट नहीं देना चाहती थी. सरकार ने अमेरिका को भारत से जाने वाले सामान पर 25 से 40 फीसदी की कस्टम ड्यूटी लगने दी पर अपने किसानों को बचा लिया है.

अफसोस यह है कि सरकार इस बात में उतनी ही गलतबयानी कर रही है जितनी वह नोटबंदी, टैक्सबंदी, तालाबंदी और अब बिहार वाली वोटबंदी में कर रही है. सरकार को, इस सरकार को किसानों से कोई प्यार नहीं उमड़ रहा. इस सरकार के लिए पुराणों के अनुसार किसान आम वैश्य या शूद्र हैं जो ऊंची जातियों की सेवा करने के लिए बने हैं. हमारी वर्णव्यवस्था में तो वैश्यों का काम खेती करना था क्योंकि उस युग में शायद व्यापार न के बराबर था.

शूद्र जो शायद आज के पिछड़े हैं और किसान बन गए हैं और वैश्य जो दुकानदार बन गए हैं, सरकार यानी राज्य के लिए बेमतलब के हैं. सरकार उन्हें नहीं बचा रही, वह उन मुट्ठी भर धन्ना सेठों को बचा रही है जिन्होंने आज किसानों की बनाई चीजों पर पूरी तरह कब्जा कर लिया है. आज किसान को अपना सामान घरों में सीधे बेचने नहीं दिया जाता. उसे मंडी में बेचना होता है या सरकार को.

सरकार ने इस तरह का ढांचा बना लिया है कि देश का किसान मेहनत कर के जो भी अनाज, दूध, गन्ना, फलफूल पैदा करता है तुरंत बड़ी, बहुत बड़ी कंपनियों के हाथों में चला जाता है, वह भी मनमाने दामों पर. मंडी और सुपर मंडी कौमेडिटी ऐक्सचेंज पर धन्ना सेठों का कब्जा है या सरकारों का. यही ताकत है जिस से वोटों को खरीदा जाता है.

भारत चाहे दुनिया की चौथी सब से बड़ी अर्थव्यवस्था है और सब से तेज बढ़ने वाली हो, उस की 80 फीसदी जनता, चाहे गांवकसबों में रह रही हो या शहरों की स्लम बस्तियों में, जानवरों की तरह रहती है. 2 डौलर प्रति व्यक्ति प्रतिदिन आय पर. 700-800 डौलर सालाना. अमेरिका में किसानों की प्रति व्यक्ति आय 20,000 डौलर सालाना के आसपास है.

अमेरिका को भारत के खेती के सामान न आने देने का मतलब है कि सदियों से जो किसानों को लूटने का ढांचा बना है जिसे पौराणिक युग से आज तक चलाया जा रहा है, टूट न जाए. अमेरिकी जिस क्षेत्र में घुसते हैं वहां का नक्शा बदल देते हैं. वे गाडि़यों में घुसे तो अंबेसडर गाड़ी बननी बंद हो गई. मशीनों में घुसे तो लुहारों की जगह नईनई मशीनें आ गईं. अमेरिका के पीछेपीछे यूरोप, चीन और जापान भी आ जाएंगे और वे न सिर्फ खेती में उथलपुथल कर देंगे, गांवों का सामाजिक नक्शा भी बदल देंगे. सवर्णों की सामाजिक, सरकारी व राजनीतिक रोबदारी का युग खत्म कर देंगे.

भारत ने डोनाल्ड ट्रंप से बैर लिया है क्योंकि यहां के नेता, चाहे किसी की तरफ बैठे हों, नौकरशाह, व्यापारी, किसी भी तरह से गांवों का कायापलट होता नहीं देखना चाहते. उन्होंने पहले जम कर जीएम बीजों को नहीं आने दिया था. आज की फर्टिलाइजर व पैस्टीसाइड व इनसैक्टिसाइड को जमीन के लिए नुकसानदेय कह कर रोकते हैं. डोनाल्ड ट्रंप भारत का भला नहीं चाहते पर असल में अमेरिकी सामान के साथसाथ अमेरिकी सोच, जो अब खुद सड़ने लगी है, आएगी. भारत के आका उसे गांवों में नहीं घुसने देना चाहते क्योंकि वहीं से सस्ते, भूखे, जानवरों की तरह रहने वाले मजदूर मिल रहे हैं.

डोनाल्ड ट्रंप जैसे तो आतेजाते रहेंगे पर एक बार अमेरिकियों के लिए भारत की खेती के दरवाजे खुल गए तो वे ऐसे छा जाएंगे जैसे अमेरिकी तकनीक पर बने मोबाइल देश पर छा गए हैं जिन के बलबूते पर किसान अब मजबूत सरकार को हिला सकते हैं.

॥॥॥

भारतीय जनता पार्टी बिहार में मतदाता सूचियों को महज जांच करने का काम कर के वही कर रही है जो उस का पुराना, बहुत पुराना मकसद रहा है. भारतीय जनता पार्टी नहीं चाहती कि किसी भी तरह से देश के दलित, शूद्र (पिछड़े) जो हिंदू आबादी के 80-85 फीसदी हैं, ऊंची जातियों के बराबर बैठ सकें.

1757 में अंगरेजों ने जब प्लासी की लड़ाई के बाद राज करना शुरू किया तो उन्हें सिपाहियों की जरूरत हुई. उन्होंने बंगाल इंफैंट्री खड़ी की पर उस में उन्हें 5 फुट 6 इंच से ऊपर के केवल ऊंची जातियों के ब्राह्मण और राजपूत जो बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश में खाली घरों में बैठे पुरोहिताई कर रहे थे या कुछ भूमिहार बन कर खेती कर रहे थे, अंगरेजों के यहां नौकरी कर के भारतीयों पर गोलियां चलाना तो उन्होंने सीख लिया पर अपना ऊंचापन नहीं छोड़ पाए और इन की अपनी जाति का सवाल अंगरेज कमांडर के हुक्म से ऊपर होता?था. कितनी ही बार इन लोगों ने उस कंपनी के खिलाफ विद्रोह किया जहां नौकरी कोई गुलामी नहीं थी-क्यों-इसलिए कि ये नीची जातियों के लोगों के साथ उठबैठ नहीं सकते थे.

आजादी के बाद पंडित जवाहरलाल नेहरू की सरकार ने न जाने क्यों इन दबदबे वाले ऊंची जातियों के संविधान सभा में भारी नंबरों में होने के बावजूद हरेक को वोट का हक दे दिया. नेहरूअंबेडकर ने 21 साल से ऊपर वालों को वोट का हक दिया तो राजीव गांधी ने इस घटा कर 18 साल कर दिया. जिन का इस बार जन्म ही पिछले जन्मों के पापों के कारण दलित या शूद्र जाति में हुआ है, वे भला कैसे ऊंची जातियों के साथ कंधे से कंधा मिला कर बैठ सकते हैं, रामविलास पासवान जैसे के बेटे चिराग पासवान या जतिन राम मांझी की यह जुर्रत कैसे है कि वे ऊंची जातियों के साथ एक टेबल पर बैठे सकें.

उन के पर काटना जरूरी है और अब भारतीय जनता पार्टी ने यह काम चुनाव आयोग को दिया है, विदेशी वोटरों को ढूंढ़ने के बहाने. असल में मतदाता सूचियों से दलितों अतिदलितों, पिछड़ों और अतिपिछड़ों में से काफियों के वोट काटने का काम ही चुनाव आयोग को दिया गया है. टीएन शेषन का जमाना गया जब चुनाव आयोग प्रधानमंत्री तक को आदेश दे सकता था. आज तो चुनाव आयोग जीहुजूर है.

वोट का हक ही ऐसा है जिस से भारतीय जनता पार्टी में अब कईकई लैवलों पर पिछड़ों को बैठाना पड़ रहा है. वे लोग जिन्होंने 1757 से 1857 तक अपने गोरे मालिकों के खिलाफ वे बंदूकें बारबार उठाई थीं जिन से वे हिंदुस्तानियों को ही डराया करते थे, अब पौराणिक राज लाना चाहते हैं. बिहार की गहन मतदाता सूची जांच उसी का पहला पर आखिरी कदम नहीं है.

क्या पिछड़े और दलित इस खेल को समझेंगे? शायद नहीं. उन के दिमागों में पिछले जन्मों के कर्मों के फल की कहानी इस तरह से फिट है कि वोट का हक छिनने को भी वे पिछले जन्म के पाप का फल मानेंगे. वे इस जन्म में और ज्यादा सेवा कर के अगले जन्म में ऊंची जाति में पैदा होने का इंतजार करेंगे, सुप्रीम कोर्ट के फैसले का नहीं. Editorial

Editorial : गहरी पैठ – अपने लाड़लों के खो जाने का दुख

Editorial : अपने लाड़लों के खो जाने का दुख हरेक परिवार को होता है. गांवों में तो अकसर होता है कि 5-7 बच्चों में से जब एक गायब हो जाता है तो लोग इधरउधर ढूंढ़ने में समय बरबाद कर देते हैं और जब तक पुलिस तक पहुंचते हैं, देर हो चुकी होती है. मजेदार बात यह है कि शहरोंकसबों में से भी बच्चे, वे भी लड़के, गायब हो जाते हैं और 15-20 साल तक परिवार इंतजार करते रहते हैं.

राजस्थान के एक छोटे से गांव के एक लड़के ने लोगों की इस अपने खोए बच्चे की तड़प का जम कर फायदा उठाना शुरू किया और किसी घर में 30 साल पहले खोया बच्चा कह कर घुस गया तो किसी घर में 15 साल पहले खोया. उसे आमतौर पर खोया बच्चा, जो अब जवान हो गया है, मान लिया गया. जब एक परिवार के घर 30 साल पहले खोए बच्चे का लौटने पर समाचार छपा तो पुलिस चौकन्नी हुई और उस ने इस जवान की खोजबीन करनी शुरू की.

पुलिस को यह जान कर हैरानी हुई कि वह इस तरह 8 घरों में खोया बच्चा बन कर 5-7 महीने रह कर मौजमस्ती करता था और फिर गायब हो जाता था. पहले कोई समाचार नहीं बनता था इसलिए पुलिस को शक नहीं होता था. इस बार जब दिल्ली के निकट साहिबाबाद के एक गांव के पुलिस स्टेशन में पहुंच कर उस ने 10 साल की उम्र में अपने किडनैप हो जाने की कहानी बताई और मांबाप का नाम बताया था तो मांबाप दौड़े आए और उसे अपना बच्चा जान कर सीने से लगा कर घर ले गए.

पुलिस को शक हुआ तो उस ने जांच की तो पता चला कि वह तो 8 घरों के साथ ऐसा कर चुका है.

असल में बहुत छोटे से व्यस्कों तक के खोने के किस्से सारे देश में होते रहते हैं. मांबाप अपने बच्चे को ढूंढ़ते हैं पर ढूंढ़ना आसान तो नहीं होता. कौन दुर्घटना का शिकार हो गया, पानी में गिर गया, ट्रेन के नीचे कुचला गया, भाग कर कहीं गया और वहां भूख से जान दे दी, पता नहीं चलता. हर शहर में कितनी ही लावारिस लाशें मिलती हैं जो 5-10 दिन बाद फूंक दी जाती हैं.

मानव तस्करी भी जम कर होती है. लड़केलड़कियों को उठा कर ले जाया जाता है और उन से बंधुआ मजदूरी या देह धंधा कराया जाता है. कुछ को इतना मारापीटा जाता है या इतनी दूर ले जाया जाता है कि उन की अपनी पहचान तक उन्हें याद नहीं रहती या वापस पहुंचने के लिए पैसे नहीं होते.

घरों में आमतौर पर बच्चों को अपना नाम, पता, पिता, मां का नाम, शहर का नाम, पुलिस थाने का नाम याद नहीं कराया जाता. ऐसे बच्चे यदि खेलतेखालते भटक जाएं, किसी गलत बसट्रेन में मजा लेने के लिए चढ़ जाएं, कोई उठा ले जाए तो खोना नामुमकिन नहीं होता. बच्चेबच्ची को ढंग से अपना पता बताना ही नहीं आता. जो बहुत दूर चले जाते हैं या ले जाए जाते हैं, वापस नहीं आते पर घर वाले उन्हें याद करते रहते हैं.

इस राजू ने किसी घर को नुकसान नहीं पहुंचाया, बस कुछ दिन मौजमस्ती कर के फिर भाग जाता था. चूंकि वह 30-32 साल का हो चुका होता था, पुलिस ज्यादा जोरशोर से शिकायत मिलने पर भी पता नहीं करती थी.

अब जब बच्चे कम होने लगे हैं, खोए बच्चे का दुख ज्यादा होने लगा है. यह बड़ी समस्या नहीं है पर जिस के घर से कोई खो जाए, चाहे बच्चा हो, जवान हो या बूढ़ा हो, वह मौत से भी ज्यादा दुख देता है क्योंकि बरसों तक लौटने की राह देखी जाती है. ममता का मामला ऐसा ही है. खोए के बारे में प्यार कभी खत्म नहीं होता.

॥॥॥

वै से तो कभी भी राजाओं ने जनता के सुख या समृद्धि की ज्यादा चिंता नहीं की. उन की नजर अपनी शानशौकत के लिए टैक्स जमा करने, जनता से बेगार कराने, जनता के आपसी झगड़ों में बंदरबांट करने, धर्म के सहारे सैनिक तैयार कर के उन्हें मरने के लिए निरर्थक लड़ाइयों में भेजता रहा है.

फिर भी उम्मीद थी कि अगर वोटों से बन कर सरकार आई है तो वह जनता के हित की सोचेगी. आजकल वोट खरीदने के लिए पैसे तो बंट रहे हैं पर वे नाकाफी हैं क्योंकि देश में धर्म के व्यापार के अथवा बाकी सब धंधे कमजोर हो रहे हैं. भारत के युवा विदेशों में रोतेपिटते जा रहे हैं और वहां अपनी जान पर खेल कर या अनजानों के बीच रहते हैं कि घर वालों को दो रोटी मुहैया करा सकें.

इस विदेश जाने के चक्कर में लोगों को कर्ज लेना पड़ता है. कर्ज दूसरे कामों के लिए भी लेना पड़ता है जिन में धार्मिक काम भी बहुत हैं. हरेक का ब्रेनवाश हुआ है कि धर्म पर जितना खर्च करोगे, दस गुना ऊपर वाला देगा. ऊपर वाला तो कुछ नहीं देता पर जिस से कर्ज लिया वह जान के पीछे पड़ जाता है.

आजकल ऐसे एप्स की बाढ़ आई हुई है जो तुरंत फुल, बिना क्रैडिट हिस्ट्री के कर्ज देने को तैयार रहते हैं. 2 से 5 फीसदी का मासिक ब्याज और फिर ब्याज पर पीनल ब्याज लगा कर वे 10,000 रुपए के लोन को लाख रुपए में महीनों में बदल सकते हैं. कुछ एप चीनी हैं जो आदमी का आधारकार्ड, पैन नंबर, काम करने की जगह की जानकारी के साथसाथ मोबाइल पर जितने कौंटैक्ट हैं उन के नामपते, फोटो जमा कर लेते हैं. कर्जदार का कच्चापक्का छिपा चिट्ठा उन के पास होता है. बीवी के अलावा किसी से संबंध हैं तो उस की काल रिकौर्ड भी हो सकती है.

इस के नाम पर वे काल सैंटर से तो फोन कर कर के हैरेस करते ही हैं, फोन हमेशा के लिए बंद कर देने पर रिश्तेदारों, मकान मालिक, एंप्लायर को हड़काने लगते हैं. ये एप चलाने वाले लोकल माफिया गैंग को भी किराए पर लगा लेते हैं जो घरबाहर बारबार तकाजा करता है.

बजाय इस के कि सरकार गरीबों की बीमारी, धार्मिक, पढ़ाई, नौकरी के खर्च को कम करने के, इस आफत का उपचार एप चलाने वालों या कर्ज देने वाली छोटीबड़ी कंपनियों को बंद कराने का कानून ला रही है. कर्ज देना अपराध हो जाएगा और 10 साल की सजा और 1 करोड़ का फाइन हो सकता है. सरकार और पुलिस के मजे ही मजे हैं. इन लोगों से मोटी रिश्वत मिलने लगेगी. जो थोड़ाबहुत काम आज कागजों पर होता था, वह सब कच्चे में चला जाएगा.

सरकार इस से बैंकों को फायदा दिलाने का काम भी करेगी. गोल्ड लोन के नाम पर आज कंपनियां गरीबों का सारा सोना बेतहाशा लूटने में लगी हैं. नादिरशाह से भी ज्यादा क्रूरता के साथ. इसी तरह इन कंपनियों को कानूनी ढांचे में फंसा कर सरकारी अफसरों को इन को पार्टनर बनाना होगा. अब सरकार, एप्स, सूदखोर, माफिया मिल कर लूटेंगे. यह लोगों की सरकार है.

डोनाल्ड ट्रंप के हथकड़ियों के फैसले पर खामोश हैं Narendra Modi

Narendra Modi : भारत ही क्या सारी दुनिया में यह बात मशहूर है कि भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच गहरे दोस्ताना संबंध हैं. ऐसे संबंध कि वे एकदूसरे का सम्मान करते हैं और नरेंद्र मोदी का तो वे कहना मानते हैं. शायद यही वजह है कि नरेंद्र मोदी जिस तरह काम करते हैं, वैसा ही काम डोनाल्ड ट्रंप भी करते दिखाई दे रहे हैं.

एक और बड़ा उदाहरण सामने है. जैसे नरेंद्र मोदी चुनाव लड़ते रहे हैं, बहुतकुछ वैसी ही शैली डोनाल्ड ट्रंप ने भी अपनाई. इस से यह संदेश और भी मजबूत हो गया कि दोनों ही नेताओं में बड़ी अच्छी ट्यूनिंग है और वे एकदूसरे को सम झते हैं, मगर जिस तरह डोनाल्ड ट्रंप ने दोबारा अमेरिका का राष्ट्रपति बनते ही एकदम से भारत के प्रति कड़ा रुख अपनाया है, वह बताता है कि दोनों के ही संबंध कितने छत्तीसी हैं.

अमेरिका में अवैध प्रवासियों का निर्वासन एक खास मुद्दा बन कर सामने है. एक अनुमान के अनुसार, अमेरिका में तकरीबन 11 मिलियन अवैध प्रवासी रहते हैं, जिन में से ज्यादातर मैक्सिको और दूसरे लैटिन अमेरिकी देशों से आए हैं. इसी के मद्देनजर डोनाल्ड ट्रंप ने राष्ट्रपति बनने के बाद अवैध प्रवासियों के प्रति सख्त नीति अपनाई है.

ट्रंप प्रशासन ने अवैध प्रवासियों को निर्वासित करने के लिए कई सख्त कदम उठाए हैं, जिन में सीमा सुरक्षा को मजबूत करना, अवैध प्रवासियों की पहचान करने के लिए डाटाबेस का उपयोग करना और अवैध प्रवासियों को निर्वासित करने के लिए अधिक अधिकारियों की नियुक्ति करना शामिल है.

अब 205 भारतीय नागरिकों को ले कर सी-17 विमान सैन एंटोनियो, टैक्सास से भारत आ गया है, जिस से देश में सकते के हालात हैं. हर बात में प्रतिक्रिया देने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और विदेश मंत्री जयशंकर तो मानो खामोश हैं.

दरअसल, अमेरिकी सरकार के इस ऐक्शन का नतीजा यह होगा कि अवैध प्रवासी अपने देश वापस जाएंगे. लेकिन इस ऐक्शन का विरोध भी हो रहा है, खासकर उन लोगों द्वारा, जो अवैध प्रवासियों के अधिकारों की रक्षा करते हैं. उन का मानना है कि अवैध प्रवासी भी इनसान हैं और उन्हें भी सम्मान और अधिकार मिलने चाहिए.

अमेरिकी सरकार की अवैध प्रवासियों को निर्वासित करने की कार्यवाही एक जटिल मुद्दा है, जिस में कई पक्ष और विपक्ष हैं, जबकि यह कार्यवाही अवैध प्रवास को रोकने के लिए एक कदम हो सकती है, लेकिन इस का नतीजा यह भी हो सकता है कि अवैध प्रवासी अपने देश वापस जाएंगे और उन के अधिकारों का उल्लंघन होगा.

भारत की प्रतिक्रिया इस मुद्दे पर मिलीजुली बनी हुई है. एक ओर भारत सरकार ने अवैध प्रवासियों के मुद्दे पर अमेरिकी सरकार के साथ सहयोग करने की बात कही है, वहीं दूसरी ओर  विपक्षी दलों और मानवाधिकार संगठनों ने यह कह कर इस कदम की आलोचना की है कि यह अवैध प्रवासियों के मानवाधिकारों का उल्लंघन है.

इस मुद्दे पर आम लोगों की राय भी मिलीजुली है. कुछ लोगों का मानना है कि अवैध प्रवासी भारत की सुरक्षा और अर्थव्यवस्था के लिए खतरा हैं, जबकि दूसरे लोगों का मानना है कि उन्हें इनसानियत के नजरिए से देखा जाना चाहिए और उन्हें वापस भेजने से पहले उन के मामलों की समीक्षा की जानी चाहिए.

ऐसा लगता कि इस मामले में अमेरिका भी चीन के रास्ते पर चल रहा है. दोनों देशों की आव्रजन नीतियां और उन के कार्यान्वयन में काफी फर्क है. अमेरिका में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अवैध प्रवासियों को निर्वासित करने के लिए सख्त नीतियों का प्रस्ताव किया है, जबकि चीन में आव्रजन नीतियां ज्यादा सख्त और प्रतिबंधात्मक हैं. चीन में अवैध प्रवासियों को निर्वासित करने के लिए विशेष कानून और नियम हैं.

हालांकि, अमेरिका और चीन के माली, राजनीतिक और सामाजिक हालात अलगअलग हैं, जो उन की आव्रजन नीतियों पर असर करती हैं. मगर यह भी नहीं भूलना चाहिए कि अमेरिका लोकतंत्र का हिमायती है, मानवाधिकार का प्रहरी माना जाता है और वह ऐसा कदम उठाएगा, यह कोई सोच भी नहीं सकता था.

मगर अब जल्दी ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ऐसे मामले में कई कदम उठाने चाहिए. सब से पहले उन्हें अमेरिकी सरकार के साथ बातचीत करनी चाहिए और अवैध प्रवासियों के मुद्दे पर एक सम झौता करना चाहिए, जो भारतीय नागरिकों के हितों की हिफाजत करे.

इस के अलावा भारत सरकार को अवैध प्रवासियों के परिवारों को मदद देनी चाहिए, जो भारत में रहते हैं. सरकार को उन्हें माली मदद, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाएं देनी चाहिए.

सरकार को अवैध प्रवास रोकने के लिए भी कदम उठाने चाहिए. सीमा सुरक्षा को मजबूत करना चाहिए  और अवैध प्रवासियों को रोकने के लिए तकनीकी उपायों का उपयोग करना चाहिए.

यही नहीं, सरकार को अवैध प्रवासियों के मुद्दे पर जागरूकता बढ़ाने के लिए अभियान चलाना चाहिए. उन्हें लोगों को अवैध प्रवास के खतरों और इस के बुरे नतीजों के बारे में बताना चाहिए. इन कदमों से सरकार अवैध प्रवासियों के मुद्दे का समाधान कर सकती है और भारतीय नागरिकों के हितों की हिफाजत कर सकती है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के संबंधों में पिछले कुछ समय में काफी उतारचढ़ाव देखा गया है. ट्रंप प्रशासन ने यूएसएआईडी को बंद करने की घोषणा की थी, जिस से भारत को मिलने वाली माली मदद पर असर पड़ सकता है.

गहरी पैठ : Donald Trump का तालिबानी राज

Donald Trump : अमेरिका में 20 जनवरी, 2025 से नए प्रैजिडैंट डोनाल्ड ट्रंप वहां पर राज कर रहे हैं और उन का राज एक संवैधानिक, कानून की इज्जत करने वाला नहीं है. उन का राज पहले 2 हफ्तों में ही तालिबानी टाइप का है.

अमेरिका एक तरह की इमर्जैंसी वाले जमाने में पहुंच गया है जिस में इंदिरा गांधी और सोवियत कम्यूनिस्टों जैसे फैसले लिए जा रहे हैं. जो काम डोनाल्ड ट्रंप दुनिया की सब से अच्छी डैमोक्रैसी को तोड़ने में कर रहे हैं, उस से बहुत से डैमोक्रैसी का दंभ भरने वाले सबक सीखेंगे पक्का है.

डोनाल्ड ट्रंप गरीबों को दी जाने वाली बहुत सी सुविधाओं को खत्म कर रहे हैं ताकि अमीरों का टैक्स कम किया जाए. ऐसा ही कुछ हमारे यहां नरेंद्र मोदी के नए बजट में किया गया है जिस में इनकम टैक्स पहले के 7 लाख रुपए के मुकाबले अब 12 लाख रुपए तक जीरो कर दिया गया है.

डोनाल्ड ट्रंप ने विश्व स्वास्थ्य संगठन को पैसे देने बंद कर दिए हैं. हमारे यहां कितने ही राज्यों में सरकारी अस्पतालों को पैसा नहीं दिया जा रहा ताकि लोग महंगे और बहुत महंगे प्राइवेट अस्पतालों में जाएं या फिर ओझाओं, वैद्यों के पास जाएं जिन के पास न डिगरियां हैं, न दवाएं और जो अफीम और धतूरे से इलाज करते हैं.

डोनाल्ड ट्रंप एकएक कर के सरकारी मुफ्त पढ़ाई पर हमला भी कर रहे हैं. वे चाहते हैं कि सिर्फ अमीर गोरों के बच्चे स्कूलों में जाएं और कमजोर वर्गों खासतौर पर काले और मिक्स गोरे व मूल अमेरिकियों की संतानों के बच्चे पढ़ें ही नहीं. गोरों का महान देश वापस आए ये शब्द ऐसे ही हैं जो हमारे यहां भारत को विश्वगुरु और रूस में व्लादिमीर पुतिन जारों के जमाने के ग्रेट रशिया के लिए कहते थे.

डोनाल्ड ट्रंप से यूरोप के, एशिया के कट्टरपंथियों को खूब सीखने को मिल रहा है कि कैसे गरीबों का खून चूसने वाला राज फिर से लाया जाए जिस में या तो धन्ना सेठ फलेंफूलें या मंदिरों के महंत. भारत इस ओर 10 साल पहले कदम रख चुका है और अब यह काम और तेजी से होगा क्योंकि अब अमेरिका से भारत में लोकतंत्र की हत्या पर सवाल नहीं उठेंगे.

डोनाल्ड ट्रंप वही कर रहे हैं जो हमारे यहां पंडे, ठाकुर और अमीर सेठ करना चाहते हैं. राज उन का हो, काम शूद्रों का और अछूतों का. ‘एक देश एक चुनाव’ का नारा लगा कर सरकार जनता से वोट का हक छीनने की तैयार कर रही है तो उसे डोनाल्ड ट्रंप का पक्का साथ मिलेगा क्योंकि ट्रंप अपने चुनावी भाषणों में कह चुके हैं कि 2024 के चुनावों में वे जीते तो फिर अमेरिका में चुनाव नहीं होंगे.

भारत, जरमनी, कोरिया, फ्रांस, इटली में वैसी ही ताकतें मजदूरों और गरीबों को धर्म के सहारे बहका कर समझा रही हैं कि राज तो सिर्फ खास गोरों का होना चाहिए, काले भूरों को बाहर निकालो. वैसे ही जैसे हमारे यहां राज खास जातियों का होना चाहिए और बाकियों को पानी में डुबकियां लगा कर खुशी पाने के लिए बहकाया जा रहा है.

दुनिया ने जो आजादी के सपने देखे थे, अब फीके पड़ रहे हैं. अब अमीरों का राज आ रहा है. वे इंटरनैट की जंजीरों से हर गरीब को कंट्रोल करना सीख गए हैं, ठीक वैसे ही जैसे पहले धर्मजाति के नाम पर कंट्रोल किया जाता था.

॥॥॥

सरकारें किस तरह से निकम्मी और बेरहम हो कर अपनी सुविधा के एकतरफा फैसले लेती हैं इस के नमूने इधरउधर लोगों को महसूस होते रहते हैं पर इन को गंभीरता से कम लिया जाता है कि ये छोटे मामले हैं.

बिहार सरकार के शिक्षा विभाग ने 8 फरवरी को अखबारों में हिंदी में एक विज्ञापन छपवाया, जो अंगरेजी के अखबारों में भी क्यों प्रकाशित हुआ पता नहीं, कि ‘अनुसूचित जाति प्रवेशिकोत्तर छात्रवृत्ति योजना’ व ऐसी ही 2 और योजनाओं के अंतर्गत ‘2023-24 एवं 2022-23 में शैक्षणिक संस्थान स्तर पर लंबित सभी आवेदनों का सत्यापन 15-2-25 से पूर्व करना सुनिश्चित’ किया गया है.

इस संस्कृत के अनजाने शब्दों से भरे इश्तिहार से लगता है कि बिहार राज्य कोई स्कौलरशिप दलित जातियों के छात्रों को देता है पर 2022 से दिया जाना पैंडिंग है. अब 3 साल बाद इसे देने का काम शुरू किया जा रहा है. इसे देने में पहला कदम उठाया जा रहा है. बहुत अच्छी बात है. लगता है कि यह स्कौलरशिप देने की एप्लीकेशनें बहुत पहले मांगी गई थीं वे भी कंप्यूटर पोर्टल पर. ऐसा इसलिए लगता है क्योंकि उसी इश्तिहार में लिखा है कि ‘सभी आवेदनों का सत्यापन दिनांक 15.2.25 से पूर्व पूर्ण करना सुनिश्चित किया गया है. इस के उपरांत सत्यापन हेतु पीएमएस पोर्टल बंद कर दिया जाएगा’.

यह नहीं समझ आता कि जो स्कौलरशिपें सरकारी फाइलों में 2-3 सालों से रोशनी का इंतजार कर रही थीं उन को खोलने की कोशिश में सिर्फ 20 दिन का समय क्यों दिया गया? अगर यह समझा जाए कि स्कौलरशिप पाने वाला हर एससीएसटी युवकयुवती हर रोज इंडियन ऐक्सप्रैस खरीदते हैं और उस के बारीक अक्षरों में छपी सरकारी सूचनाएं पढ़ते हैं तो भई वाकई कमाल की बात है. यह तो स्वर्ग के आ जाने की सी बात होगी कि एससीएसटी के बच्चों ने अखबार हर रोज खरीदना और पढ़ना शुरू कर दिया है.

साफ है कि अफसरों को इस देरी के लिए न कोई दुख है, न उन्हें लगता है कि उन की कोई गलती है. वे अपने निकम्मेपन का ठीकरा दूसरों पर फोड़ना चाहते हैं और किसी तरह यह स्कौलरशिप जो 2-3 साल से पैंडिंग है अब बहुतों के लिए खत्म ही कर देना चाहते हैं.

इसी सरकारी इश्तिहार में आगे लिखा गया है कि ‘निर्धारित अवधि के पश्चात सत्यापन लंबित रखने वाले शैक्षणिक संस्थानों के विरुद्ध नियमानुसार कार्यवाही की जाएगी’. यानी आगे भी कहीं कोई रास्ता उन गरीब एससीएसटी के 10वीं, 12वीं के बच्चों के लिए नहीं छोड़ा गया है जो अब 3 साल बाद पढ़ाई छोड़ चुके हैं.

इस सूचना से कहीं नहीं लगता कि बिहार के निदेशक, माध्यमिक शिक्षा को कोई अफसोस है कि यह स्कौलरशिप देने में देरी हुई है. इस सूचना में भी ‘संस्थानों के विरुद्ध नियमानुसार कार्यवाही’ और ‘जिला शिक्षा पदाधिकारी एवं जिला कार्यक्रम पदाधिकारी सभी आवश्यक कार्यवाही करने के उत्तरदायी होंगे’ जैसे वाक्य हैं.

उन बेचारों के बारे में कोई 2 शब्द नहीं हैं जिन्हें इस योजना में कुछ पैसे मिलने थे. सरकारी फाइलों पर कैसे उन अफसरों की भाषा में नरमी तक नहीं है, अपनी देरी के लिए कोई गिला तक नहीं है. सरकार चाहे केंद्र की हो जो एससीएसटी को हमेशा पिछड़ा और गुलाम देखना चाहती हो या नीतीश कुमार की समाजवादी किस्म की हो जो उन का सहारा ले कर वोट पाती है, एक ही तरह से काम करती है.

गहरी पैठ : Cyber Fraud से सावधान!

Cyber Fraud : दिल्ली के एक अखबार में एक ही दिन एक पेज पर 6 खबरें छपीं जिन में औनलाइन फ्राडों का जिक्र था. 2 मामले डिजिटल अरैस्ट के थे. एक मामले में तो शिकार खुद पढ़ीलिखी डाक्टर थी जिसे घंटों तक शातिरों ने ‘डिजिटल अरैस्ट’ कर रखा था. डिजिटल अरैस्ट में कुछ अरैस्ट नहीं होता. बस शिकार को कहा जाता है कि अपना ह्वाट्सएप वीडियो औन रखो और वहीं उस के सामने बैठे रहो. दूसरी तरफ एक पुलिस अफसर के वेश में बैठा शख्स होता है जो कहता है कि किसी औनलाइन ट्रांजैक्शन की वजह से कोई जुर्म हुआ है.

धमकी दी जाती है कि अगर डिजिटल अरैस्ट की शर्तें नहीं मानी गईं तो असल में पुलिस कई गाडि़यों में आ कर गिरफ्तार कर लेगी और पूरे समाज में बदनाम हो जाओगे. इस दौरान रिश्वत के नाम पर मामले को रफादफा करने के लिए 27 लाख रुपए ट्रांसफर भी करवा लिए गए. शर्तों में एक शर्त यह भी होती है कि कोई दूसरा उस कमरे में न हो. बारबार धमकी दी जाती है कि पुलिस वाले घर के आसपास ही हैं और कभी भी धावा बोल कर असली अरैस्ट कर सकते हैं.

दूसरे मामले में 48 घंटे तक डिजिटल अरैस्ट कर के रखा गया और 5 लाख वसूल कर लिए गए. तीसरे में एक ग्राफिक डिजाइनर को 4 घंटे तक डिजिटल अरैस्ट कर के 2 लाख ठगे.

एक और मामले में मुनाफा दिलाने का लालच दे कर एक लैफ्टिनैंट कमांडर से 25 लाख रुपए झटक लिए गए. एक मामले में पुलिस ने नोएडा में काल सैंटर चलाते शख्स को पकड़ा जो देशविदेश में कंप्यूटर इस्तेमाल करने वालों को सौफ्टवेयर अपग्रेड करने का झांसा दे कर कंप्यूटर का पूरा डाटा इकट्ठा कर लेता था और फिर उस में से जरूरत की चीजें खंगाल कर या तो अकाउंट साफ करता या ब्लैकमेल करता था.

ये सब क्या लोगों की गलती से अपराध हो रहे हैं? नहीं, इन के लिए सरकार और सिर्फ सरकार जिम्मेदार है. मोबाइल की पहुंच लोगों की बातचीत के लिए थी पर सरकार ने बैंकों, जीएसटी, इनकम टैक्स, रिटर्नों, म्यूनिसिपल टैक्सों के लिए मोबाइल को पहचानपत्र, आईडैंटिटी कार्ड बना दिया. अब यह मोबाइल तो लोगों के हाथों में है पर इस के अंदर क्या तकनीक है यह लोगों को क्या पता. जिन्हें पता है वे सरकारी घोड़ों पर चढ़ कर अब लूटमार कर रहे हैं.

सरकार हर चीज के लिए पहले औनलाइन एप्लाई करने को कहती है, फिर ओटीपी आता है, फिर उसे औनलाइन डालना पड़ता है तो सरकारी काम होता है. सरकार ने अपने दफ्तरों के दरवाजों पर ताला डाल दिया है, वहां सिर्फ कंप्यूटर वायर जा रहे हैं तो जनता को कंप्यूटरों और मोबाइलों पर भरोसा तो करना ही पड़ेगा न.

टैलीकौम कंपनियों, इंटरनैट कंपनियों, मोबाइल कंपनियों ने दुनियाभर के बैंकों, सरकारों, कंपनियों, इंश्योरैंस कंपनियों को फांस लिया कि हर काम मोबाइल पर कराओ ताकि उन के मोबाइल बिकें, डाटा बिके और साथ ही हर नागरिक को पूरी तरह गिरफ्त में रखा जा सके. शातिर इसी का फायदा उठा रहे हैं.

मोबाइल इस्तेमाल कराने की जबरदस्ती सरकार ने की है, सरकार के बैंकों ने की है. सारे अपराधों की जमीन उस ने ही तैयार की है. सरकार 4 अखबारों में इश्तिहार दे कर बच नहीं सकती कि उस ने तो जनता को बता दिया था.

जिस दिन एक पेज में 6 घटनाएं छपीं, उस दिन देश के अलगअलग हिस्सों में सैकड़ों मामले हुए होंगे. गरीब लोगों को भी लूटा गया होगा, अमीरों को भी. अभी जैसे एक नंबर पर एक काल आई +245311151.

यह पक्के तौर पर फ्राड काल थी और अगर फोन उठा लिया जाता तो कोई बुरी बात ही होती. यह नंबर गुआना, कांगो, अंगोला कहीं का भी हो सकता है. फोन कहीं और से भी किया जा सकता है.

आम आदमी जिसे सरकार ने धकेला है कि हर फोन को उठाओ क्योंकि यह बैंक से हो सकता, टैक्स वालों का हो सकता है, पुलिस वालों का हो सकता है, कौरपोरेशन का हो सकता है कैसे पता करे कि वह जाल में फंसेगा नहीं. जिम्मेदार वह सरकार है जो मोबाइल को जबरन थोप रही है.

॥॥॥

शादीशुदाओं के प्यार में पड़ने और किसी पराए के साथ सोने के किस्से कभी भी कम नहीं होते थे. हमारी स्मृतियों में, जिन में हिंदू कानूनों को लिखा गया, ऐसी बहुत सी सजाओं के बारे में लिखा गया है जो उन मर्दों और औरतों को दी जाती थीं जो शादी के बाहर के बंधन बनाते थे. सतयुग, त्रेता युग, द्वापर युग भी जब उन से भरा हो तो किस संस्कार, किस संस्कृति, किस पुराने काल के अच्छे होने की बात की जा सकती है.

अभी उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर में अदालत ने एक औरत को अपने मर्द को गोली से मारने की सजा सुनाई क्योंकि मर्द उस के एक लड़के के सैक्स संबंध पर एतराज कर रहा था और झगड़ रहा था. मजेदार बात यह है कि औरत के प्रेमी, पिता और भाई को भी सजा दी गई क्योंकि हत्या में तीनों का भी हाथ था. मर्द को सिर में गोली मारी गई थी.

इस मामले में औरत के 6 साल के बच्चे ने सच उगल दिया वरना तो पुलिस के पास सुबूत भी नहीं थे.

अपने मर्द से नाराज हो कर दूसरे के साथ सोना कोई नई बात नहीं है और अमेरिका में ऐसे बहुत से मामले नेताओं और चर्चों के पुजारियों के भी खूब सामने आते हैं. वहां के चुने गए राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को तो लंपट माना गया है फिर भी उन को वहां की जनता ने जीत का सेहरा बांध दिया.

असल में मर्द अभी भी यह नहीं भूले हैं कि औरतें तो उन के लिए खिलौना हैं. बस फर्क यह हुआ?है कि अब औरतें अपनी मरजी कुछ ज्यादा चलाने लगी हैं और कुछ कानून पिछले 60-70 सालों में बने हैं जिन में औरतों की बात को पहला सच माना जाता है. जहां पहले औरतें समाज के डर की वजह से मुंह छिपाती थीं और किसी की ज्यादती या अपना प्यार छिपाती थीं, अब वे खुल कर सामने आने को तैयार हैं.

आज की औरत अपनी मेहनत, अपनी अक्ल के साथसाथ अपने बदन की भी पूरीपूरी कीमत वसूलना सीख रही है. वह न पिता की गुलाम रह गई है, न पति की या किसी और मर्द की. प्रेमी भी धोखा दे तो उसे भी थानेकचहरी में घसीटने में वह हिचकती नहीं है.

आदमी अभी भी पुरानी सोच वाले हैं कि औरत पैर की जूती है, उसे जैसे मरजी फेंको. अब औरतें अपनी दमदार हैसियत रखने वाली हैं. मुंबई में एक ऐक्टर ने एक लड़की को फेसबुक पर उस का लिखा देख कर बुलाया और फिर उस से जोरजबरदस्ती करने लगा. लड़की ने तुरंत शिकायत कर दी और अब ऐक्टर बंधाबंधा बरसों घूमेगा. वह कचहरियों से बच जाए शायद पर जिसे जूती समझ रहा था वह उस के सिर पर पड़ने लगी है.

गांवदेहातों की लड़कियां तो शहरी लड़कियों से आगे हैं. वे दमखम में कम नहीं हैं और उन के साथ 4 जने आसानी से खड़े हो जाते हैं. यह बदलाव धर्म के बावजूद आया है. अगर औरतों ने धर्म का पल्लू छोड़ दिया होता तो वे कब की आजाद हो चुकी होतीं. धर्म उन्हें असल में गुलाम बने रहने की पट्टी रोजाना 4 बार पढ़ाता है. उस के बावजूद अगर यह सब हो रहा है तो खुशी की ही बात है.

यह कैसी राजनीति के प्रहरी बने श्रीमान Narendra Modi

Narendra Modi : आजादी के बाद राजनीति अपने आदर्श और विपक्षियों को भी सम्मान देने के संदर्भ में जिस ऊंचाई पर थी, नरेंद्र दामोदरदास मोदी के साल 2014 में प्रधानमंत्री बनने के बाद धीरेधीरे यह पतन की ओर आगे बढ़ रही है. ऐसा कई बार देखा गया है जब नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री पद पर रहते हुए राजनीति और इस पद को गरिमा को कम किया है. इस का एक बड़ा उदाहरण आप के सामने आया है दिल्ली विधानसभा चुनाव के दरमियान जब अरविंद केजरीवाल की राजनीतिक पार्टी ‘आप’ को नरेंद्र मोदी ‘आप दा’ कर कर कर बुला पुकार रहे हैं.

नरेंद्र मोदी ने 22 जनवरी, 2025 को भाजपा कार्यकताओं से विधानसभा चुनाव में 50 फीसदी से ज्यादा बूथों पर जीत का लक्ष्य रखने का आह्वान किया और कहा कि लोग अब खुल कर आम आदमी पार्टी (आप) की सरकार के खिलाफ गुस्सा जाहिर कर रहे हैं और उसे उस के वादों की याद दिला रहे हैं.

‘नमो एप’ के जरीए ‘मेरा बूथ, सब से मजबूत’ कार्यक्रम के तहत भाजपा के कार्यकर्ताओं से संवाद करते हुए नरेंद्र मोदी ने ‘आप’ को एक बार फिर राष्ट्रीय राजधानी के लोगों के लिए ‘आप दा’ करार दिया और कहा, जब इस से मुक्ति मिलेगी तभी दिल्ली को ‘विकसित भारत’ की ‘विकसित राजधानी’ बनाने का संकल्प सिद्ध हो पाएगा.

नरेंद्र मोदी ने यह दावा भी किया कि ‘आप दा’ वाले विधानसभा चुनाव में इतने डरे हुए हैं कि उन्हें हर दिन एक नई घोषणा करनी पड़ रही है.

नरेंद्र मोदी के मुताबिक, दिल्ली वाले आप वालों की ‘आप दा’ और उन के झूठ और फरेब से अब ऊब चुके हैं. पहले कांग्रेस ने और फिर आप वालों की ‘आप दा’ ने दिल्ली के लोगों से बहुत विश्वासघात किया है. ये ‘आप दा’ वाले अब हर दिन एक नई घोषणा कर रहे हैं. इस का मतलब है कि उन को रोज पराजय की नईनई खबरें मिल रही हैं. ये इतने डरे हुए हैं कि इन्हें रोज सुबह एक नई घोषणा करनी पड़ रही है. लेकिन अब दिल्ली की जनता इन का खेल समझ गई है.

प्रधानमंत्री ने कहा कि इन दिनों वे अपनी चुनावी सभाओं में दावा करते हैं कि ‘फिर आएंगे’ लेकिन अब जनता उन्हें बोलती है कि वे ‘फिर खाएंगे.

इस तरह नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री पद पर उड़ते हुए देश की राजनीति राजनीतिक दल और आम जनता के समक्ष क्या कर रहे हैं, वह रेखांकित करता है कि राजनीति कितने नीचे चली गई है. पद और सत्ता प्राप्त करने के लिए प्रधानमंत्री पद पर बैठे नरेंद्र मोदी यह भूल जाते हैं कि इसे राजनीति और प्रधानमंत्री पद तारतार हो रहा है.

नरेंद्र मोदी ने कार्यकर्ताओं से ‘आप दा’ वालों की पोल खोलने और केंद्र की उपलब्धियां गिनाने का आह्वान किया. उन्होंने ‘आप’ पर पूर्वांचल के लोगों को दिल्ली से बाहर निकालने की साजिश रचने का आरोप लगाया और दावा किया कि दिल्ली की सत्ताधारी पार्टी में उन के लिए नफरत भरी हुई है. पानी जैसी बुनियादी जरूरतों को पूरा करने में विफल रहने के लिए दिल्ली सरकार पर निशाना साधते हुए उन्होंने कहा कि शराब उपलब्ध है, लेकिन पानी उपलब्ध नहीं है.

नरेंद्र मोदी के मुताबिक, भाजपा यह सुनिश्चित करने के लिए व्यापक अभियान चलाएगी कि यहां सत्ता में आने पर हर किसी तक पीने का पानी पहुंचे. उन्होंने लोगों के बिजली बिलों में वृद्धि के लिए दिल्ली सरकार को जिम्मेदार ठहराया. अरविंद केजरीवाल पर निशाना साधते हुए कहा
कि ‘शीशमहल’ आप के झूठ और छल का जीताजागता उदाहरण है.

नरेंद्र मोदी ने कहा कि अरविंद केजरीवाल ने यमुना नदी को साफ करने का वादा किया था, लेकिन पूर्व मुख्यमंत्री अब कह रहे हैं कि यमुना को साफ करने के लिए वोट नहीं मिलते. आप गरीबों के लिए घर बनाने के अपने वादे को पूरा करने में भी विफल रही, जबकि केंद्र ने उन के लिए हजारों घर बनाए हैं. भाजपा अपने बूथ कार्यकर्ताओं के बल पर भारी जीत दर्ज करेगी और लोग, विशेषकर महिलाएं उस के अभियान की अगुआई कर रही हैं. कांग्रेस अकसर झूठे वादे करती है और दावा किया कि ‘आप’ इस मामले में मुख्य विपक्षी पार्टी से काफी आगे निकल गई है. कांग्रेस में बरबादी व बुराइयां आने में सात दशक लग गए. इन में तो 7 माह में कांग्रेस की सारी बुराइयां आ गईं और अब तो पिछले 9 साल में इन्होंने उन बुराइयों को भी दोगुना कर दिया है.

नरेंद्र दामोदरदास मोदी देश के सर्वोच्च पद पर बैठे हुए हैं मगर उन्होंने हमेशा विपक्ष का माहौल उड़ाया है. इस का एक बड़ा उदाहरण विपक्षी पार्टियों के गठबंधन के नाम को ‘इंडी’ पुकाराना भी शामिल हैं.

सम्मानजनक इंडिया कहने में क्या उन्हें गुरेज है, यह देश की जनता को समझना चाहिए. और अब विधानसभा चुनाव में ‘आप’ पार्टी को ‘आप दा’ कहना, सीधासीधा नरेंद्र मोदी के द्वारा राजनीति को गंदी राजनीति में बदलने का एक उदाहरण है.

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें