मंहगी होती ‘लोकतंत्र’ की राह

चुनावी खर्च जिस तरह बेलगाम होते जा रहे हैं उस पर यह एक टिप्पणी बहुत महत्वपूर्ण है –
” बेहतर होगा की चुनाव आयोग इन मामलों की स्वयं जांच करे. पता लगाए कि अवैध बरामदगी के पीछे कौन-सा प्रत्याशी या दल है और फिर उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई हो.इस तरह की सख्ती के बिना चुनावों में धनबल का दखल नहीं रूकेगा.

यह सही है कि चुनाव में धनबल का प्रयोग रोकने के लिए चुनाव आयोग की सतर्कता बढ़ी है, लेकिन यह सिर्फ धर-पकड़ तक सीमित है.ऐसे मामलों में सजा की दर बहुत कम है, क्योंकि चुनाव के बाद स्थानीय प्रशासन और पुलिस मामले को गंभीरता से नहीं लेते। अक्सर असली सरगना छुट भैय्यों को फंसा कर बच जाते हैं.

-बृजेश माथुर
सोशल मीडिया पर दरअसल , लोकतंत्र महा कुंभ कहलाने वाला लोकसभा चुनाव में आज जिस तरह चुनाव में करोड़ों रुपए प्रत्येक लोकसभा संसदीय क्षेत्र में खर्च हो रहे हैं उससे साफ हो जाता है कि आम आदमी या कोई सामान्य योग्य व्यक्ति संसद में पहुंचने के लिए सात जन्म लेगा तो भी नहीं पहुंच पाएगा.
लोकसभा चुनाव 2024 में माना जा रहा है कि खर्च के मामले में पिछले सारे रेकार्ड ध्वस्त हो जाएंगे और दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश कहलाने वाले भारत राष्ट्र में चुनाव खर्च अपनी पर पराकाष्ठा में होंगे अर्थात भारत दुनिया की सबसे खर्चीली चुनावी व्यवस्था होगी.

चुनाव पर गंभीरता से नजर रखने वाले जानकारों के अनुसार इस बार लोकसभा चुनाव 2024 में अनुमानित खर्च के 1.35 लाख करोड़ रुपए तक पहुंचने की संभावना है.अगर बात की जाए लोकसभा चुनाव 2019 में खर्च की तो 60,000 करोड़ रुपये से दोगुने से भी अधिक है.

दरअसल, चुनाव को विहंगम दृष्टि से देखा जाए तो राजनीतिक दलों और संगठनों, उम्मीदवारों, सरकार और निर्वाचन आयोग सहित चुनावों से संबंधित प्रत्यक्ष या परोक्ष सभी खर्च शामिल हैं. चुनाव संबंधी खर्चों पर बीते चार दशक से नजर रख रहे गैर-लाभकारी संगठन के अध्यक्ष एन भास्कर राव के दावे के अनुसार लोकसभा चुनाव में अनुमानित खर्च के 1.35 लाख करोड़ रुपए तक पहुंचने की उम्मीद है. विशेषज्ञों का मानना है कि भारत में राजनीतिक वित्तपोषण में पारदर्शिता की अत्यंत कमी का खुलासा हुआ है.चुनावी बांड के खुलासे से साफ हो गया है कि पार्टियों के पास खुलकर खर्च करने के लिए धन है. राजनीतिक दलों ने उस धन को खर्च करने के रास्ते तैयार कर लिए है.

जैसा कि हम जानते हैं देश में काले धन की बात की जाती है, भ्रष्टाचार की बात की जाती है. यह सब कुछ चुनाव के दरमियान देखा जा सकता है और चौक चौराहे पर इस पर चर्चा होने लगी है कि आखिर प्रमुख राष्ट्रीय दलों के प्रत्याशी करोड़ों रुपए जो खर्च कर रहे हैं वह आता कहां से है मगर इस दिशा में न तो सरकार ध्यान दे रही है और न ही चुनाव आयोग या फिर उच्चतम न्यायालय या सरकार की कोई जांच एजेंसी.

जहां तक बात है भारतीय जनता पार्टी की इस चुनाव में सत्ता प्राप्त करने के लिए नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी वह सब कुछ कर रही है जो कोई कल्पना भी नहीं कर सकता. इसका आज की तारीख में आकलन नहीं लगाया जा सकता. हो सकता है आने वाले समय में इसका खुलासा हो पाए की भाजपा ने लोकसभा 2024 में कितना खर्च किया. माना जा रहा है चुनाव प्रचार में हो रहे खर्च के मामले में यह पार्टी देश के विपक्षी पार्टियों को बहुत पीछे छोड़ देगी.

एनजीओ के माध्यम से इस पर निगाह रखने वाले संगठन के पदाधिकारी के मुताबिक, उन्होंने प्रारंभिक व्यय अनुमान को 1.2 लाख करोड़ रुपए से संशोधित कर 1.35 लाख करोड़ रुपए कर दिया, जिसमें चुनावी बांड के खुलासे के बाद के आंकड़े और सभी चुनाव-संबंधित खचों का – हिसाब शामिल है. ‘एक अन्य संगठन ने हाल में भारत में राजनीतिक वित्तपोषण में पारदर्शिता की अत्यंत कमी की ओर इशारा किया था. उन्होंने दावा किया – 2004-05 से 2022-23 तक, देश के छह प्रमुख राजनीतिक दलों को कुल 19,083 करोड़ रुपए का लगभग 60 फीसद योगदान अज्ञात स्रोतों से मिला, जिसमें चुनावी बाण्ड से प्राप्त धन भी शामिल था.

एक अन्य महत्वपूर्ण संगठन ने- ‘चुनाव पूर्व गतिविधियां पार्टियों और उम्मीदवारों के प्रचार खर्च
का अभिन्न अंग हैं, जिनमें राजनीतिक रैलियां, परिवहन, कार्यकर्ताओं की नियुक्ति और यहां तक कि नेताओं की विवादास्पद खरीद-फरोख्त भी शामिल है.’ उन्होंने कहा – चुनावों के प्रबंधन के लिए निर्वाचन आयोग का बजट कुल व्यय अनुमान का 10-15 फीसद होने की उम्मीद है.

इसी तरह विदेश में बैठे एक चुनाव पर निगाह रखने वाले सम्मानित संगठन के अनुसार-” भारत में 96.6 करोड़ मतदाताओं के साथ प्रति मतदाता खर्च लगभग 1,400 रुपए होने का अनुमान है. उसने कहा कि यह खर्च 2020 के अमेरिकी चुनाव के खर्च से ज्यादा है, जो 14.4 अरब डालर या लगभग 1.2 लाख करोड़ रुपए था. एक विज्ञापन एजंसी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी अमित वाधवा के मुताबिक -लोकसभा 2024 के इस चुनाव में डिजिटल प्रचार बहुत बहुत ज्यादा हो रहा है. उन्होंने कहा – राजनीतिक दल कारपोरेट ब्रांड की तरह काम कर रहे हैं और पेशेवर एजेंसियों की सेवाएं ले रहे हैं.”

इस तरह लोकसभा चुनाव जो आज हमारे देश में लड़ा जा रहा है उसमें राजनीतिक पार्टियों सत्ता प्राप्त करने के लिए सीमा से अधिक खर्च कर रही हैं यह सभी मान रहे हैं ऐसे में अगर हम नैतिकता की बात करें तो जब कोई पार्टी या प्रत्याशी करोड़ों रुपए खर्च करके चुनाव जीतते है तो स्पष्ट है कि वह आम जनता के लिए उत्तरदाई नहीं हो सकते जिन लोगों ने उन्हें रुपए पैसे की मदद की है या गलत तरीकों से रुपया कमाया गया है तो फिर चुने हुए प्रतिनिधि निश्चित रूप से अपने आकाओं के लिए काम करेंगे या फिर अपना स्वास्थ्य साधन करेंगे.

लोकतंत्र में बढ़ती तानाशाही

लोकतंत्र का मतलब यह माना जाता है कि जो भी काम होंगे, वे जनता के हित में उन के चुने हुए प्रतिनिधि करेंगे. जिस देश में जितने ज्यादा नागरिकों को वोट देने का हक रहता है, उस देश को उतना ही ज्यादा लोकतांत्रिक समझ जाता है. इस तरह भारत दुनिया के लोकतांत्रिक देशों में सब से बड़ा है. यहां वोट देने वाले नागरिकों की तादाद दुनियाभर में सब से बड़ी है.

भारतीय संविधान ने अनुच्छेद 326 के तहत बालिगों को वोट डालने का हक दिया है. वोटर के लिए जरूरी है कि वह 18 साल या उस से ज्यादा उम्र का हो, साथ ही भारत का निवासी भी हो.

भारत में 1935 के ‘गवर्नमैंट औफ इंडिया ऐक्ट’ के मुताबिक, तब केवल 13 फीसदी जनता को वोट का हक हासिल था. वोटर का हक हासिल करने की बड़ीबड़ी शर्तें थीं. केवल अच्छी सामाजिक और माली हालत वाले नागरिकों को यह हक दिया जाता था. इस में खासतौर पर वे लोग ही थे, जिन के कंधों पर विदेशी शासन टिका हुआ था. पर आजाद भारत में वोट का हक सभी को दिया गया.

लोकतंत्र के बाद भी हमारे देश में लोक यानी जनता की जगह पर तंत्र यानी अफसर और नेताओं का राज चलता है. इस में जनता घरेलू मामलों से ले कर अदालतों तक के बीच चक्की में गेहूं की तरह पिसती है. आखिर में उस का आटा ही बन जाता है. अब शायद कोई ही ऐसा हो, जो इस चक्की में पिस न रहा हो. घर के अंदर तक कानून घुस गया है. पतिपत्नी के बीच से ले कर घर के बाहर सीढ़ी और छत आप की अपनी नहीं है. जो जमीन आप अपनी समझ कर रखते हैं, असल में वह आप की नहीं होती है.

लोकतंत्र में जो तंत्र का हिस्सा है, वह लोक को अपनी जायदाद समझाता है. कानून लोक के लिए तंत्र के हिसाब से चलता है. अगर हम इस को घर के अंदर से देखें तो आप अपनी सुविधा के मुताबिक न तो छत पर कोई कमरा बनवा सकते हैं और न ही घर से बाहर निकलने के लिए सीढ़ियां. तंत्र को देख रहे अफसर अपने हिसाब से नियम बनाते हैं. हाउस टैक्स, प्रौपर्टी टैक्स जैसे नियम अफसर बनाते हैं. जनता से कभी पूछा नहीं जाता है. यही अफसर जनता के हित में अलग तरह से काम करते हैं, जबकि अफसरों, नेताओं के हित में अलग तरह से काम होता है.

लोकतंत्र में तानाशाही बढ़ती जा रही है. वोट पाने के लिए वोटर को लुभाया जा रहा है और विपक्ष को डराया जा रहा है. यह उसी तरह से है, जैसे घर के मालिक को तमाम तरह के टैक्स से परेशान किया जा रहा है. रोजगार पाने के लिए भटक रहे छात्रों को परेशान किया जा रहा है.

नौकरी के लिए इम्तिहान होता है, तो पेपर आउट करा दिया जाता है. बेरोजगारी का आलम यह है कि चपरासी की नौकरी के लिए पीएचडी वाले छात्र लाइन लगा कर खड़े होते हैं. नेताओं के पास इतना पैसा है कि वे वोट को मैनेज करते हैं.

सत्ता को बनाए रखने के लिए यह कोशिश होती है कि विपक्षी को चुनाव न लड़ने दिया जाए. बाहुबली नेता धनंजय सिंह के मसले में उन का कहना है कि ‘चुनाव लड़ने से रोकने के लिए यह किया जा रहा है’. ऐसे उदाहरण कई हैं, जहां लोकतंत्र में तानाशाही दिखती है.

आम आदमी पार्टी का मसला हो, सांसद महुआ मोइत्रा का मामला हो, तमाम उदाहरण सामने हैं. कांग्रेस नेता राहुल गांधी को ले कर भी उन की ऐसी ही घेराबंदी की गई थी.

असल में लोकतंत्र की बात करने वाला या लोकतंत्र के जरीए ही सत्ता संभालने वाला कब तानाशाह बन जाता है, इस का पता नहीं चलता.

दुनियाभर में इस के तमाम उदाहरण भरे पड़े हैं. नैपोलियन, हिटलर और पुतिन जैसे शासकों ने अपनी शुरुआत लोकतंत्र से की, बाद में तानाशाह बन गए. भारत में जिस तरह से विरोधी नेताओें को चुनाव लड़ने से रोका जा रहा है, उस से तानाशाही बढ़ने का खतरा साफतौर पर दिख रहा है.

लोकतंत्र: कीचड़ में भाजपा और चंडीगढ़ का संदेश

कहा जाता है कि कुछ लोग होते हैं जो 100 जूते खाकर भी हंसते हैं. भारतीय राजनीति में भी अब धीरे-धीरे कुछ यही स्थितियां बनती चली जा रही हैं जहां राजनीति में शुचिता और जनता का भय खत्म होता चला जा रहा है. यही कारण है कि देश भर ने देखा कि चंडीगढ़ में महापौर चुनाव में किस तरह नग्न खेल हुआ. अच्छा होता कि भारतीय जनता पार्टी जो देशभक्ति की बात करती है, सिद्धांतों की बात करती थी स्वयं आगे आकर के चंडीगढ़ में हुए महापौर चुनाव पर पहले प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए अपने मेयर, चुने गए व्यक्ति को हटाकर संदेश देती की निष्पक्ष चुनाव नहीं हुए हैं. और पापा यह सब पसंद नहीं करती है. मगर हुआ यह की मामला उच्चतम न्यायालय पहुंच गया देश भर में धांधली का वीडियो प्रसारित हो गया मगर भाजपा के छोटे से बड़े नेता तक के मुंह से एक शब्द नहीं निकला.

उल्टा हुआ यह की आप पार्टी के तीन पार्षदों को तोड़ने का प्रयास जारी हो गया. अब वह समय आ गया है जब चुनाव के बाद किसी भी तरह की दल बदल को गैरकानूनी घोषित कर दिया जाए चंडीगढ़ में महापौर चुनाव का यही संदेश है कि देश की राजनीति में आज स्वच्छता और ईमानदारी भाईचारे की स्थापना की जाए. यह नहीं होना चाहिए कि अगर कोई एक दल सत्ता में है तो दूसरा दल, रुपए पैसों और पदों की लालच देकर विधायकों, पार्षदों या सांसदों को तोड़े.

यही कारण है कि आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने चंडीगढ़ महापौर चुनाव पर आए सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को ऐतिहासिक बताते हुए भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) पर तीखा हमला बोला है. केजरीवाल ने कहा- ” न्यायालय के फैसले के बाद भाजपा पूरे देश में बेनकाब हो गई है. यह भारतीय राष्ट्रीय विकासात्मक समावेशी (इंडिया) गठबंधन की पहली और बहुत बड़ी जीत है. मैं इसके लिए शीर्ष न्यायालय का बहुत-बहुत शुक्रिया करता हूं. ”

इससे पहले सोशल मीडिया मंच एक्स पर एक पोस्ट साझा कर केजरीवाल ने कहा -” कुलदीप कुमार एक गरीब घर का लड़का है. इंडिया गठबंधन की ओर से चंड़ीगढ़ का महापौर बनने पर बहुत-बहुत बधाई. ये केवल भारतीय जनतंत्र और माननीय सर्वोच्च न्यायालय की वजह से संभव हुआ है. हमें किसी भी हालत में अपने जनतंत्र और स्वायत्त संस्थाओं की निष्पक्षता को बचाकर रखना है. सर्वोच्च न्यायालय का फैसला एक ऐसे समय में आया है जब देश में हालात बहुत कठिन है, तानाशाही चल रही है और स्वायत्त संस्थानों को कुचला जा रहा है.ऐसे में जनतंत्र को बचाने के लिए यह फैसला काफी मायने रखता है.”

राजनीति का चंडीगढ़ बॉर्डर 

भारतीय राजनीति में पंजाब के चंडीगढ़ महापौर चुनाव , उसके परिणाम और उच्चतम न्यायालय में मामले के पहुंचने के बाद कुलदीप कुमार के महापौर पर मोहर लगाया जाना,अपने आप में एक ऐसा संदेश है जिसे हर राजनीतिक पार्टी को सहर्ष स्वीकार करना चाहिए और देश की जनता को याद रखना चाहिए कि आगे कभी कोई ऐसा मामला न होने पाए.

संभव तो यही कारण है कि आप पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष केजरीवाल ने कहा -” चंड़ीगढ़ में बीस वोट इंडिया गठबंधन के थे, सोलह वोट भाजपा के थे. सबने यह देखा है कि किस तरह से गठबंधन के वोट गलत तरीके से अवैध घोषित कर दिए गए और हमारे उम्मीदवार कुलदीप कुमार को हारा हुआ और भाजपा उम्मीदवार को जीता हुआ घोषित कर दिया गया. लेकिन न्यायालय ने तीव्र गति से मामले की सुनवाई में ‘दूध का दूध और पानी का पानी’ कर दिया.यह भारतीय राष्ट्रीय विकासात्मक समावेशी (इंडिया) गठबंधन की पहली और बहुत बड़ी जीत है.”

सच तो यह है कि सारे देश और दुनिया ने देखा है कि उच्चतम न्यायालय ने लोकतंत्र को निरंकुश भाजपा के जबड़े से बचाया है भाजपा चुनावी हेर फेर का सहारा लिया . यह भारतीय जनता पार्टी के नेताओं की हट धर्मिता है कि मामला उच्चतम न्यायालय में होने के बावजूद आप पार्टी के तीन पार्षदों को तोड़ने का प्रयास चलता रहा. अब जब उच्चतम न्यायालय से फैसला आ गया है तब भी सवाल यह है कि क्या भारतीय जनता पार्टी मौन रहेगी या फिर आप या कांग्रेस पार्टी के पार्षदों को तोड़कर महापौर बनने का प्रयास करवाएगी.

गौरतलब है कि पीठ ने अदालत के समक्ष गलत बयान देने के लिए चंडीगढ़ महापौर चुनाव के पीठासीन अधिकारी अनिल मसीह के खिलाफ अपराध प्रक्रिया संहिता की धारा 340 के तहत आपराधिक कार्यवाही भी कर दी है. अदालत ने सुनवाई के दौरान मतपत्र और रिकार्ड पेश करने का आदेश दिया था. इन्हें पांच फरवरी को पिछले आदेश के अनुसार पंजाब व हरियाणा उच्च न्यायालय ने अपने कब्जे में ले लिया था. उच्चतम न्यायालय द्वारा चंडीगढ़ का महापौर घोषित किए जाने के बाद आम आदमी पार्टी (आप) के पार्षद कुलदीप कुमार ने कहा -” यह लोकतंत्र और शहर के निवासियों की जीत है.” कुमार ने न्यायालय के फैसले पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा अगर चंडीगढ़ महापौर चुनाव में भाजपा ने धांधली नहीं की होती तो यह पहले ही महापौर बन गए होते कुमार ने कहा, ‘यह लोकतंत्र की जीत है, चंडीगढ़ निवासियों की जीत है और सच्चाई की जीत है.”न्यायालय के फैसले के बाद महापौर बने कुमार ने कहा-“‘आज, मेरी आंखों में खुशी के आंसू हैं.”

हेमंत सोरेन और लोकतंत्र का बुझता दीया

झारखंड में एक चुने हुए मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के साथ जो कुछ हुआ है उससे लोकतंत्र का सर नीचा हुआ है . यह सीधा-सीधा लोकतंत्र का चीर हरण कहा जाना चाहिए, क्योंकि हेमंत सोरेन की पार्टी संविधान के बताएं रास्ते के अनुसार चुनाव में गई और अपनी सरकार बनाने में सफल हुए. मगर आज फिजाओं में जो सवाल है वह यह है कि हेमंत सोरेन आदि भारतीय जनता पार्टी और उसके नेताओं को विशेष रूप से प्रधानमंत्री नरेंद्र दामोदरदास मोदी की आंख की किरकिरी बन गए हैं.

सत्ता का ऐसा दुरुपयोग आजादी के बाद पहली बार देखने को मिला जब परिवर्तन निदेशालय को अपने विरोधी चेहरों को निपटने में लगा दिया गया है. भाजपा के चेहरे चाहते हैं कि झारखंड में हेमंत सोरेन की सरकार को किसी तरह तोड़ करके अपनी सरकार बना ले मगर यह अच्छा हुआ कि मुख्यमंत्री चंपई सोरेन के नेतृत्व वाली झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) नीत गठबंधन सरकार ने सोमवार को झारखंड विधानसभा में विश्वास मत हासिल कर लिया.

यही नहीं अदालत की अनुमति के बाद पूर्व मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने कार्यवाही में हिस्सा लिया. विधानसभा से हेमंत सोरेन ने अपनी बात जो देश की जनता के सामने रखी है उसे ध्यान से सुना और समझना आवश्यक है अगर देश में लोकतंत्र को बचाना है तो हमें हेमंत सोरेन की बात को अमल में लाना होगा.

विश्वास मत प्रस्ताव पर अपने भाषण में हेमंत सोरेन ने आरोप लगाया -” केंद्र द्वारा साजिश रचे जाने के बाद राजभवन ने उनकी गिरफ्तारी में अहम भूमिका निभाई.” झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने आरोप साबित करने की चुनौती देते हुए कहा -” अगर आरोप साबित हो गए तो वह राजनीति छोड़ देंगे.”इससे बड़ी बात कोई और क्या कह सकता है.

हेमंत है तो हिम्मत है     

जिस तरह दिल्ली में केजरीवाल सरकार को गिराने की कोशिश हो रही है जैसा छत्तीसगढ़ में भूपेश बघेल सरकार के साथ हुआ. यह सब लोकतांत्रिक देश में कतई उचित नहीं कहा जा सकता और एक तरह से लोकतंत्र को मजबूत बनाने वाले चारों स्तंभ आज हिलते हुए दिखाई दे रहे हैं.  उल्लेखनीय है कि झारखंड राज्य की 81 सदस्यीय विधानसभा में 47 विधायकों ने विश्वास मत प्रस्ताव के पक्ष में वोट दिया, जबकि 29 विधायकों ने इसके खिलाफ मतदान किया. निर्दलीय विधायक सरयू राय ने मतदान में हिस्सा नहीं लिया. विधानसभा में मतदान के दौरान 77 विधायक उपस्थित थे.विश्वास मत हासिल करने के बाद, चंपई सोरेन ने कहा कि अगले दो-तीन दिनों में मंत्रिमंडल का विस्तार किया जाएगा.

दरअसल प्रवर्तन निदेशालय ने

ने धनशोधन के एक मामले में  हेमंत सोरेन को गिरफ्तार किया था. इसके बाद झामुमो के विधायक दल के नेता चंपई सोरेन ने दो फरवरी को झारखंड के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी. सोरेन अभी ईडी की हिरासत में हैं. उन्हें विशेष पीएमएलए अदालत ने विश्वास मत में हिस्सा लेने की अनुमति दी थी .हेमंत सोरेन ने कहा, -“31 जनवरी का दिन भारत के इतिहास में एक काला अध्याय है. राजभवन के आदेश पर एक मुख्यमंत्री को गिरफ्तार कर लिया गया. भाजपा झारखंड में किसी आदिवासी मुख्यमंत्री को पांच साल का कार्यकाल पूरा करते नहीं देखना

चाहती, उन्होंने अपनी विरोधी सरकारों में ऐसा नहीं होने दिया.” दरअसल, सच तो यह है कि केंद्र में सत्ता में बैठी हुई नरेंद्र मोदी की भाजपा के गैर आदिवासी नेता रघुवर दास के अलावा उसके या झामुमो के 10 अन्य पूर्व मुख्यमंत्रियों में से कोई भी राज्य में पांच साल का कार्यकाल पूरा नहीं कर पाया है. इस राज्य का गठन साल 2000 में हुआ था.

पूर्व मुख्यमंत्री ने विधानसभा में बड़े ही साहस के साथ  कहा, ‘हालांकि, मैं अब आंसू नहीं बहाऊंगा. मैं उचित समय पर सामंती ताकतों को मुंहतोड़ जवाब दूंगा.”‘ उन्होंने दावा किया -” आदिवासियों को अपना धर्म छोड़ने के लिए मजबूर किया जाएगा क्योंकि बीआर आंबेडकर को भी बौद्ध धर्म में परिवर्तन के लिए मजबूर किया गया था.” उन्होंने आरोप लगाया -” भाजपा आदिवासियों को ‘अछूत’ समझती है.”  अद्भुत नजारा था जब पूर्व मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन विधानसभा में पहुंचे तो सत्तारूढ़ झामुमो नीत गठबंधन के विधायकों ने ‘हेमंत सोरेन जिंदाबाद’ जैसे नारों के साथ उनका स्वागत किया.इससे पहले, चंपई सोरेन ने 81 सदस्यीय विधानसभा में विश्वास प्रस्ताव पेश किया. उन्होंने कहा, ‘भाजपा ने लोकतांत्रिक रूप से निर्वाचित झारखंड सरकार को अस्थिर करने की कोशिश की है.’ चंपई ने कहा, -‘हेमंत है तो हिम्मत है.’ उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें गर्व है कि उनकी सरकार हेमंत सोरेन सरकार का ‘दूसरा भाग’ है.

लोकतंत्र और नरेंद्र मोदी का अंधा कुआं

देश में ऐसा पहले कभी न सुना गया और न ही हुआ है. भाजपा के नेतृत्व में नरेंद्र मोदी की सरकार जिस तरह संवैधानिक संस्थाओं पर अंकुश लगाती चली जा रही है, वह लोकतंत्र के लिए एक अंधा कुआं बन कर सामने आ सकता है. लोकतंत्र के उजाले में एक ऐसा अंधेरा छा सकता है, जिस का खमियाजा देश और देश की जनता को आगामी समय में उठाना पड़ सकता है.

नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद की उन की अब तक की सत्ता यात्रा पर अगर हम नजर डालें तो पाते हैं कि उन का सब से पहला आगाज था कि नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद सच्ची आजादी तो अब आई है और दूसरी कोई हिंदू मोदी सरकार कई शताब्दियों के बाद. यह बात बड़े गर्व के साथ प्रचारित की गई, लेकिन नरेंद्र मोदी के सवा 8 साल के कार्यकाल के बाद अगर हम देखें तो चाहे वह सुप्रीम कोर्ट हो या चुनाव आयोग, सूचना आयोग हो या फिर प्रवर्तन निदेशालय, केंद्रीय जांच ब्यूरो, सब एक नई चाल से चलते दिखाई दे रहे हैं, जो संविधान से इतर है.

नैशनल हैराल्ड वाले मामले पर की गई कार्यवाही को देखें तो पाते हैं कि पूरे देश की निगाह आज ईडी पर है. राहुल गांधी के बाद सोनिया गांधी से पूछताछ और नैशनल हैराल्ड के दफ्तर को सील करना संकेत दे रहा है कि आने वाले समय में राजनीतिक घमासान के साथ हालात बेकाबू हो सकते हैं. शायद इन्हीं हालात को देखते हुए अखिल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस, आम आदमी पार्टी और तृणमूल कांग्रेस समेत 17 विपक्षी दलों ने धनशोधन निवारण अधिनियम (पीएमएलए) के तहत प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) को मिले हकों के सिलसिले में आए सुप्रीम कोर्ट के हाल के फैसले को ले कर 3 जुलाई, 2022 को निराशा जताई और कहा कि इस फैसले से ‘राजनीतिक प्रतिशोध’ में लगी सरकार के हाथ और मजबूत होंगे.

अगर देश के ज्यादातर राजनीतिक दल सुप्रीम कोर्ट से गुहार लगा रहे हैं और प्रवर्तन निदेशालय और केंद्रीय सरकार पर सवालिया निशान लगा रहे हैं, तो यह एक चिंता का सबब है. क्या लोकतंत्र खतरे में है सच तो यह है कि संविधान के मुताबिक चुनी हुई सरकार को सिर्फ 5 साल तक संविधान के संरक्षण में देश को चलाने का अधिकार और कर्तव्य होता है. वह कोई सर्वकालिक सत्ता नहीं होती. किसी भी चुनी सरकार का यह मानना है कि वह आजीवन सत्तासीन रहेगी, लोकतंत्र के लिए बेहद खतरनाक बात है. लोकतंत्र में तो राजनीतिक पार्टियों की सत्ता आनी और जानी चाहिए,

इसी में लोकतंत्र का और जनता का भला है. जैसा कि आज हम देख रहे हैं कि केंद्र की नरेंद्र मोदी की सरकार और उस के पिछलग्गू यह गर्व के साथ कह रहे हैं कि हम तो 50 साल तक सत्ता को नहीं छोड़ेंगे. इन हालात के होते हुए ही कांग्रेस और दूसरी 17 राजनीतिक पार्टियों ने एक साझा बयान में यह उम्मीद भी जताई कि सब से बड़ी अदालत का यह फैसला बहुत कम समय के लिए होगा और आगे संवैधानिक प्रावधानों की जीत होगी. इस साझा बयान पर कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस, आम आदमी पार्टी (आप), द्रविड़ मुन्नेत्र कषगम (द्रमुक), इंडियन यूनियन मुसलिम लीग (आईयूएमएल), मार्क्सवादी कम्यूनिस्ट पार्टी (माकपा), भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी (भाकपा),

एमडीएमके, राष्ट्रीय जनता दल, रिवोल्यूशनरी सोशलिस्ट पार्टी (आरएसपी), शिव सेना समेत 17 दलों के नेताओं और निर्दलीय राज्यसभा सदस्य और कानून मंत्री रह चुके कपिल सिब्बल ने दस्तखत किए हैं. संविधान निर्माण सदस्यों और भारत देश को आजादी दिलाने वाले महान नेताओं ने पहले ही यह समझ लिया था कि देश में सत्ता हासिल करने के बाद कोई निरंकुश हो सकता है, इसलिए सुप्रीम कोर्ट, चुनाव आयोग और भारतीय सेना को कुछ इस तरह अधिकार और कर्तव्यों के साथ एक माला में पिरोया गया कि सभी अपनाअपना काम अपने विवेक और बिना किसी दबाव व असर के कर सकें. द्य

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