दलित समाज: एक पिछड़ा वर्ग

कांवड़ ढोने, मंदिरों में लंगरोंके बाद फैली पत्रलों को बटोरने वाले, मंदिरों और मठों के बाहर की सफाई करने वाली दलित धर्म और मंदिरों के लिए जरूरी हैं पर अगर जो जोशीमठ धंस रहा है और उस में उन की बल्लियां भी धंस रही हैं तो यह उन के पिछले जन्मों के कर्मों का फल है, सरकारी, प्रशासन, तिलकधारी उन को न सहायता देंगे, न फिर बसाएंगे.

उत्तराखंड के जोशीमठ शहर में चल रहे राहत के काम में वहां की गांधी के कालोनी के लोगों को न रजिस्टर किया जा रहा और न पूरी सहायता दी जा रही है क्योंकि वे शड्यूल कास्ट हैं, रामचरित मानस ने जिस अब फिर चर्चा में आए ढोर, गंवार, शूद्र, पशु अब नारी दोहन उस हर जने की ताकत का स्रोत है जो किसी ओहदे पर बैठा है.

असल में ङ्क्षहदूमुसलिम झगड़ा इसीलिए खड़ा किया जाता है कि शूद्र यानी पिछड़े ओबीसी अपना हक मांगते हुए तुलसीदास के कानून को याद रखें. उन्हें पीटना चाहिए. दिया नहीं जाने चाहिए. तुलसीदास ने तो उन दलितों की तो बात भी नहीं की जो जोशीमठ की गांधी कालोनी में रहते हैं. दलितों की बात तो पूरे पौराणिक साहित्य में न के बराबर की गई है.

पिछड़े और दलित उलझे रहें और पिछड़े लठैत एससी दलितों को दबा कर रखते रहें इसलिए उन्हें भगवा टुपट्टे दे दिए है और नारे मुसलमानों के खिलाफ दिए हैं. इस शोर में कि दलितों का रोल किसे सुनाई देगा. संविधान ने इन के लिए खास जगह अंबेडकर गांधी के पूना पैक्ट के हिसाब से बनाई पर वह जमीन पर लागू नहीं हो पाती. दलितों की बस्तियां हर शहर में कूढ़े के ढेरों की तरह दिखती हैं. उन के मायावती और प्रकाश अंबेडकर जैसे नेता भी अपने सुखों की खातिर में खुद को कभी इस पार्टी को तो कभी उस पार्टी को भेंट करते रहते हैं. जोशीमठ में उन के साथ क्या हो रहा है. इस पर किसी के आंसू नहीं बह रहे जबकि वहां के धंसने से परेशान ऊंचे लोगों का पैसा, जमीन, चिकित्सा सब दिया जा रहा है.

ये वे दलित है जिन्हें उत्तराखंड के मंदिरों में आज भी घुसने नहीं दिया जाता. यह बात दूसरी है कि वे अगर घुस भी जाएं तो अपनी जेब ढीली करके आएंगे क्योंकि मूॢतयां तो भोगती हैं, देती नहीं. ये मूॢतयों के नाम पर कुछ को सजा मिलती है, कुछ के व्यापार चमकते हैं, कुछ जमीनें हड़पते हैं, कुछ अंधभक्तों को लूटने का लाइसेंस पाते हैं. दलितों को मूॢतयों से क्या मिलेगा जब मूॢतयों के नाम ही उन्हें ढोर, गंवार, शूद्र और पशु भी मानने को तैयार नहीं हैं.

लैक्ट कहे जाने वाले ऊंची जातियों के युवाओं को जो लोग हर समय गालियां देते हैं क्योंकि वे अंधभक्ति को नकारते हैं और हिमालय को बनाना चाहते हैं, वे भला उन दलितों की क्या सुनेंगे जो हजारों सालों से बात करने लायक भी नहीं समझे गए. बाहरी आक्रमण करने वालों ने उन को बराबर का दर्जा दिया, काम दिया, मौका दिया पर जब फिर ऊंची जातियों की सरकारें या ऊंचे राजा रजवाड़ों का युग आया, उस से सब कुछ छीन लिया गया.

देश भर में जो बुल्डोजर झुग्गियों पर चलते हैं उन में आमतौर पर यही लोग रहते हैं और अगर ङ्क्षजदा रहते हैं तो इसलिए कि वे ऊंचों की सेवा कर सकें. जोशीमठ के घंसने के समय उन की सेवा ऊंचे करेंगे, यह उम्मीद करना ही बेवकूफी है.

मध्य प्रदेश : दांव पर सब दलों की साख

ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कांग्रेस छोड़ कर मध्य प्रदेश की जनता और चुनी गई कांग्रेसी सरकार से गद्दारी की थी या फिर अपनी गैरत की हिफाजत की थी, इस का सटीक फैसला अब मीडिया या चौराहों पर नहीं, बल्कि जनता की अदालत में 10 नवंबर, 2020 को होगा जब 28 सीटों पर हुए उपचुनावों के वोटों की गिनती हो रही होगी. इन 28 सीटों में से 16 सीटें ग्वालियरचंबल इलाके की हैं, जहां वोट जाति की बिना पर डलते हैं और इस बार भी भाजपा और कांग्रेस के भविष्य का फैसला हमेशा की तरह एससीबीसी तबके के लोग ही करेंगे, जिन का मूड कोई नहीं भांप पा रहा है.

साल 2018 के विधानसभा के चुनाव में इन वोटों ने भाजपा और बसपा को अंगूठा दिखाते हुए कांग्रेस के हाथ के पंजे पर भरोसा जताया था, लेकिन तब हालात और थे. ये हालात बारीकी से देखें और समझें तो महाराज कहे जाने वाले ज्योतिरादित्य सिंधिया का असर कम, बल्कि एट्रोसिटी ऐक्ट से पैदा हुई दलितों और सवर्णों की भाजपा से नाराजगी ज्यादा थी.

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दलित इस बात से खफा थे कि भाजपा सवर्णों को शह दे रही है और इस मसले पर अदालत भी उस के साथ है, इस के उलट ऊंची जाति वाले इस बात से गुस्साए हुए थे कि संसद में अदालत के फैसले को पलट कर मोदी सरकार उन की अनदेखी करते हुए दलितों को सिर चढ़ा रही है, जबकि वे हमेशा उसे वोट देते आए हैं.

इसी इलाके में बड़े पैमाने पर एट्रोसिटी ऐक्ट को ले कर हिंसा हुई थी. इस का नतीजा यह हुआ कि इन दोनों ही तबकों के वोट भाजपा से कट कर कांग्रेस की झोली में चले गए और वह इस इलाके की 36 सीटों में से 26 सीटें ले गई.

भाजपा राज्य में 230 सीटों में से महज 109 सीटें ले जा पाई और कांग्रेस 114 सीटें ले जा कर बसपा, सपा और निर्दलीय विधायकों की मदद से अल्पमत की सही सरकार बना ले गई.

दिग्गज और तजरबेकार कमलनाथ ने बहैसियत मुख्यमंत्री जोरदार शुरुआत की जिस से लोगों को आस बंधी थी कि 15 साल बाद सत्ता में आई कांग्रेस सरकार भाजपा से बेहतर साबित होगी, लेकिन सवा साल में ही कांग्रेस की खेमेबाजी और फूट उजागर हुई तो हुआ वही जिस का हर किसी को डर था.

कमलनाथ और परदे के पीछे से सरकार हांक रहे पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने ज्योतिरादित्य सिंधिया की अनदेखी शुरू कर दी नतीजतन वे राम भक्तों की पार्टी से जा मिले जिस के एवज में भाजपा ने उन्हें राज्यसभा में ले लिया और उन के 22 समर्थक विधायकों की मदद से सरकार बना ली जिस की अगुआई एक बार फिर वही शिवराज सिंह चौहान कर रहे हैं, जिन्हें जनता ने 2018 में खारिज कर दिया था.

इतना ही नहीं, भाजपा ने सिंधिया समर्थक 14 विधायकों को मंत्री पद से भी नवाजा और वादे या सौदे के मुताबिक सभी को उन की सीटों से ही टिकट भी दिए.

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सब की हालत पतली

अब क्या ये सभी कांग्रेसी भाजपा के हो कर दौबारा जीत पाएंगे, यह सवाल बड़ी दिलचस्पी से सियासी गलियारों में पूछा जा रहा है जिस का सटीक जवाब तो 10 नवंबर को ही मिलेगा, पर इन नए भगवाइयों की हालत खस्ता है, जो पहले भाजपा की बुराई करते थकते नहीं थे और अब जनता को बता रहे हैं कि भाजपा क्यों कांग्रेस से बेहतर है. लेकिन ऐसा करते और कहते वक्त उन की आवाज में वह दमखम नहीं रह जाता जो 2018 के चुनाव प्रचार के वक्त हुआ करती था. कांग्रेस इन्हें गद्दार और दागी कह तो रही है, लेकिन उस के पास भी इस सवाल का कोई जवाब नहीं है कि आखिर क्यों वह अपने विधायकों को बांधे रखने में नाकाम रही और क्यों उन्हें अपनी ही पार्टी की सरकार गिराने मजबूर होना पड़ा.

अब ज्यादातर सीटों पर मुकाबला कांग्रेस बनाम कांग्रेस छोड़ चुके नए भाजपाइयों के बीच हो रहा है. भाजपा को बहुमत के लिए 9 सीटें और चाहिए, जबकि कांग्रेस को सरकार बनाने पूरी 28 सीटों पर जीत की दरकार है. लेकिन राह दोनों की ही आसान नहीं है, तो इस की अपनी वजहें भी हैं. मुख्यमंत्री शिवराज सिंह पहले जैसे लोकप्रिय नहीं रह गए हैं और भाजपा कार्यकर्ता सिंधिया खेमे की खातिरदारी में जुटने से बच रहा हैं, क्योंकि उसे मालूम है कि ये जीत भी गए तो उन्हें कोई फायदा नहीं होने वाला. हालांकि ज्योतिरादित्य सिंधिया जनता को यह बताने लगे हैं कि वे और उन के समर्थक दिलोदिमाग दोनों से भाजपाई हो चुके हैं. इस के लिए वे जयजय श्रीराम का नारा सड़कों पर आ कर लगाने लगे हैं और भाजपाई उसूलों पर चलते हुए संघ के दफ्तर की भी परिक्रमा करने लगे हैं.

दूसरी तरफ पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ को यह एहसास है कि उन के पास खासतौर से इस इलाके में जमीनी कार्यकर्ताओं का टोटा है और 16 में से कोई 10 सीटों पर सिंधिया खेमे के उम्मीदवारों की खुद की अपनी भी साख है जिसे तोड़ पाने के लिए उन के पास काबिल और लोकप्रिय उम्मीदवार नहीं हैं जिस की भरपाई करने वे सिंधिया की गद्दारी को चुनावी मुद्दा बनाने की जुगत में भिड़े हैं.

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भाजपा निगल रही बसपा वोट

कोई मुद्दा न होने और कोरोना महामारी के चलते वोटिंग फीसदी कम होने के डर से भी सभी पार्टियां हलकान हैं. ऐसे में जो पार्टी अपने वोटर को बूथ तक ले आएगी, तय है कि वह फायदे में रहेगी. साफ यह भी दिख रहा है कि कोरोना के डर के चलते बूढ़े वोट डालने नहीं जाएंगे. इस इलाके में कभी मजबूत रही बसपा अब दम तोड़ती नजर आ रही है. 2018 के चुनाव में वह यहां महज एक सीट जीत पाई थी जो अब तक का उस का सब से खराब प्रदर्शन था, इस के बाद भी 6 सीटों पर उस ने भाजपा और कांग्रेस दोनों का खेल बराबरी से बिगाड़ा था. बसपा के वोटरों पर इन दोनों पार्टियों की नजर है, जिस के चलते दोनों का दलित प्रेम उमड़ा जा रहा है.

मायावती का भाजपा के लिए झुकाव किसी सुबूत का मुहताज नहीं है. नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद दलित समुदाय कई फाड़ हो चुका है. सामाजिक समरसता के जरीए भाजपा एससीबीसी तबके में थोड़ीबहुत ही सही सेंध लगा चुकी है. उसे उम्मीद है कि अगर इस तबके के 30 फीसदी वोट भी उसे मिले तो सवर्ण वोटों के सहारे दिनोंदिन मुश्किल होती जा रही इस जंग को वह जीत लेगी. दूसरी तरफ कांग्रेस को उम्मीद है कि पिछली बार की तरह ये वोट उसे ही मिलेंगे. बसपा के खाते में अब वही वोट जा रहे हैं जो 20 साल से उसे मिलते रहे हैं, लेकिन मायावती के ढुलमुल रवैए के चलते दलित नौजवान वोटर यह तय नहीं कर पा रहे हैं कि कौन सी पार्टी हकीकत में उस की हिमायती है.

साख का सवाल

ज्योतिरादित्य सिंधिया को यह साबित करने में पसीने आ रहे हैं कि 2018 की तरह वोट उन के नाम पर पड़ेंगे तो शिवराज सिंह भी यह साबित नहीं कर पा रहे हैं कि भाजपा और वे खुद पहले की तरह अपराजेय हैं, इसलिए उन्होंने ‘शिवज्योति ऐक्सप्रेस’ का नारा दिया है. ज्योतिरादित्य सिंधिया की बूआ कैबिनेट मंत्री यशोधरा राजे भी अपने बबुआ के लिए हाड़तोड़ मेहनत कर रही हैं.

साख मायावती की भी दांव पर लगी है कि बसपा अगर इस बार भी सिमट कर रह गई तो आगे के लिए उस के दामन में कुछ नहीं रहेगा. कमलनाथ को भी साबित करना है कि वे एक बेहतर मुख्यमंत्री थे जो अपनों की ही साजिश का शिकार हुए थे.

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यानी अब जो जीता वह सिकंदर हो जाएगा और हारे के पास हरि नाम भी नहीं बचेगा, इसलिए सारे नेता वोटरों को लुभाने के लिए साम, दाम, दंड, भेद सब का सहारा ले रहे हैं, जिन्हें मालूम है कि यह चुनाव आम चुनाव से भी ज्यादा अहम उन के वजूद के लिए है और जानकारों की दिलचस्पी इस इलाके में बिहार के बराबर ही है. फर्क सिर्फ इतना है कि अगर कांग्रेस वोटर के दिमाग में यह बात बैठा पाई कि भाजपा ने जोड़तोड़ कर सरकार बना कर राज्य का भला नहीं किया है तो बाजी भगवा खेमे को महंगी भी पड़ सकती है, क्योंकि विकास और रोजगार के मुद्दों पर तो वोटर की नजर में दोनों ही पार्टियां नकारा हैं.

नागौर में बर्बरता की हद पार: पेट्रोल से गीले कपड़े को प्राइवेट पार्ट में डाला

राजस्थान के नागौर जिले के एक गांव पांचौड़ी में चोरी के आरोप में 2 दलित नौजवानों को इतनी बुरी तरह पीटा गया कि देखने वालों के होश फाख्ता हो गए. उन दलित लडक़ों को अपनी जान बचाने के लाले पड़ गए. जो हुआ सो हुआ, पर इस घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया और राजनीतिक सरगर्मी तेज हो गई.

पीडि़त ने अपनी शिकायत में कहा है कि वह 16 फरवरी को अपने चचेरे भाई के साथ बाइक की ठीक कराने के लिए करणु गांव में एजेंसी में गया था. वहां कुछ लोगों ने उन पर ही चोरी का आरोप लगा दिया. जब उन युवकों ने कहा कि उन्होंने ऐसा नहीं किया तो वे उन दोनों युवकों को एजेंसी के पीछे ले गए और वहां जम कर पिटाई की. इतना ही नहीं, आरोपियों ने पेट्रोल से गीले कपड़े को पेचकस से लपेट कर उनके प्राइवेट पार्ट में डाल दिया. भयावह नजारा. वहां मौजूद लोग तमाशबीन बने रहे. परंतु इस बेरहमी का यह वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया और राजनीतिक सियासत गरमा गई.

वीडियो हुआ वायरल…

वीडियो वायरल होते ही एक ओर जहां भारतीय जनता पार्टी ने राजस्थान में कांग्रेस शासित सरकार पर हमला किया, वहीं कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी और राहुल गांधी से भी इस घटना को ले कर सवाल भी पूछे गए. पर वे सटीक जवाब नहीं दे पाए. इतना ही कहा कि राजस्थान सरकार इस घटना पर फौरन कार्यवाही करे.

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राहुल गांधी ने किया ट्ववीट…

राहुल गांधी ने अपने ट्वीट में लिखा है कि राजस्थान के नागौर में 2 दलित लडक़ों को बुरी तरह से पीटने का मामला सामने आया है. मैं राज्य सरकार से आग्रह करता हूं कि वह इस घटना को संज्ञान में ले कर कार्यवाही करे, ताकि पीडि़तों को इंसाफ मिल सके.

The recent video of two young Dalit men being brutally tortured in Nagaur, Rajasthan is horrific & sickening. I urge the state Government to take immediate action to bring the perpetrators of this shocking crime to justice.

— Rahul Gandhi (@RahulGandhi) February 20, 2020

वहीं, उत्तर प्रदेश भाजपा के प्रवक्ता शलभमणि त्रिपाठी ने सोशल मीडिया पर लिखा है कि ‘राहुल जी, प्रियंका जी, ये भी दलित हैं. बस, फर्क केवल इतना है कि ये बर्बर अत्याचार आप की हुकूमत वाले राजस्थान में हो रहा है, इसीलिए इन का दर्द आप को नजर नहीं आएगा. सहानुभूति का सियासी नाटक फैलाने के लिए तो आप को भाजपा शासित राज्य चाहिए. हद है इस ओछी सियासत की.’

अशोक गहलोत ने दी सफाई…

जैसे ही विपक्ष ने इस मामले पर कांग्रेस को घेरा, तो तुरंत ही राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने सफाई दी कि नागौर में हुई भयावह घटना के बाद तुरत कार्यवाही करते हुए सभी सातों आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया गया है. कानून के मुताबिक अपराधियों को सजा मिलेगी.

In the horrific incident in Nagaur, immediate and effective action has been taken and seven accused have been arrested so far. Nobody will be spared. The culprits will be punished according to the law and we will ensure that the victims get justice.

— Ashok Gehlot (@ashokgehlot51) February 20, 2020

पर ऐसा करने से पहले उन्हें आगापीछा भी सोचना चाहिए. यह तो बेरहमी की हद ही है. इन दलित लडक़ों का क्या कुसूर जो बिना वजह का आरोप इन पर थोपा गया.  यह तो आने वाला समय ही बताएगा कि आरोपियों की सजा क्या तय हुई, पर इन दलित नौजवानों के साथ जो हुआ, बहुत बुरा हुआ.

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गहरी पैठ

दिल्ली में तुगलकाबाद के एक मंदिर को ले कर जमा हुए दलितों के समाचारों को जिस तरह मीडिया ने अनदेखा किया और जिस तरह दलित नेता मायावती ने पहले इस आंदोलन का समर्थन किया और फिर हाथ खींच लिए, साफ करता है कि दलितों के हितों की बात करना आसान नहीं है. ऊंची जातियों ने पिछले 5-6 सालों में ही नहीं 20-25 सालों में काफी मेहनत कर के एक ऐसी सरकार बनाई है जिस का सपना वे कई सौ सालों से देखते रहे हैं और वे उसे आसानी से हाथ से निकलने देंगे, यह सोचना गलत होगा.

दलित नेताओं को खरीदना बहुत आसान है. भारतीय जनता पार्टी, कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, कम्यूनिस्ट पार्टी, तृणमूल कांग्रेस, राष्ट्रीय जनता दल आदि में दलित हैं पर उन के पास न तो कोई पद है और न उन की चलती है. कांशीराम के कारण पंजाब और उत्तर प्रदेश में दलित समर्थक बहुजन समाज पार्टी ने अपनी जगह बनाई पर उस में जल्दी ही ऊंची जातियों की घुसपैठ इस तरह की हो गई कि वह आज ऊंची जातियों का हित देख रही है, दलितों का नहीं.

दलितों की समस्याएं तुगलकाबाद का मंदिर नहीं हैं. वे तो कदमकदम पर समस्याओं से घिरे हैं. उन पर हर रोज अत्याचार होते हैं. उन्हें पढ़नेलिखने पर भी सही जगह नहीं मिलती. ऊंची जातियां उन्हें हिकारत से देखती हैं. उन को जम कर लूटा जाता है. उन का उद्योगों, व्यापारों, कारखानों में सही इस्तेमाल नहीं होता. उन्हें पहले शराब का चसका दिया हुआ था अब धर्म का चसका भी दे दिया गया है. उन्हें भगवा कपड़े पहनने की इजाजत दे कर ऊंची जातियों के मंदिरों में सेवा का मौका दे दिया गया है पर फैसलों का नहीं.

हर समाज में कमजोर वर्ग होते ही हैं. गरीब और अमीर की खाई बनी रहती है. इस से कोई समाज नहीं बच पाया. कम्यूनिस्ट रूस भी नहीं. वहां भी कमजोर किसानों को बराबरी की जगह नहीं मिली. पार्टी और सरकार में उन लोगों ने कब्जा कर लिया था जिन के पुरखे जार राजाओं के यहां मौज उड़ाते थे. कम्यूनिज्म के नाम पर उन्हें बराबरी का ओहदा दे दिया गया पर बराबरी तो जेलों में ही मिली.

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आज भारत में संविधान के बावजूद धर्मजनित एक व्यवस्था बनी हुई है, कायम है और अब फलफूल रही है. दिल्ली का आंदोलन इसी का शिकार हुआ. इसे दबाना पुलिस के बाएं हाथ का काम रहा क्योंकि इस में हल्ला ज्यादा था. पुलिस ने पहले उन्हें खदेड़ा और फिर जैसा हर ऐसी जगह होता है, उन्हें हिंसा करने का मौका दे कर 100-200 को पकड़ लिया. उन के नेता को लंबे दिनों तक पकड़े रखा जाएगा. दलितों का यह आंदोलन ऐसे ही छिन्नभिन्न हो जाएगा जैसे 20-25 साल पहले महेंद्र सिंह टिकैत का किसान आंदोलन छिटक गया था.

जब तक ऊंचे ओहदों पर बैठे दलित आगे नहीं आएंगे और अपना अनुभव व अपनी ट्रेनिंग पूरे समाज के लिए इस्तेमाल न करेंगे, चाहे चुनाव हों या सड़कों का आंदोलन, वे सफल न हो पाएंगे. हां, दलितों को भी इंतजार करना होगा. फिलहाल ऊंची जातियों को जो अपनी सरकार मिली है वह सदियों बाद मिली है. दलितों को कुछ तो इंतजार करना होगा, कुछ तो मेहनत करनी होगी. कोई समाज बिना मेहनत रातोंरात ऊंचाइयों पर नहीं पहुंच सकता.

देशभर में पैसे की भारी तंगी होने लगी है. यह किसी और का नहीं, सरकार के नीति आयोग के वाइस चेयरमैन राजीव कुमार का कहना है. पिछले 70 सालों में ऐसी हालत कभी नहीं हुई जब व्यापारियों, उद्योगों, बैंकों के पास पैसा न हो. हालत यह है कि अब किसी को किसी पर भरोसा नहीं है. सरकार के नोटबंदी, जीएसटी और दिवालिया कानून के ताबड़तोड़ फैसलों से अब देश में कोई कहीं पैसा लगाने को तैयार ही नहीं है और देश बेहद मंदी में आ गया है.

राजीव कुमार ने यह पोल नहीं खोली कि पिछले 2-3 दशकों में जिस तरह पैसा धर्म के नाम पर खर्च किया गया है वह अब हिसाब मांग रहा है. पिछले 5-7 सालों में तो यह खर्च कई गुना बढ़ गया है क्योंकि पहले यह पैसा लोग खुद खर्च करते थे पर अब सरकार भी खर्च करती है.

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कश्मीर में ऐक्शन से पहले सरकार को अमरनाथ यात्रा पर गए लोगों को निकालना पड़ा. हजारों को लौटना पड़ा. पर ये लोग क्या देश को बनाने के लिए गए थे? देश तो खेतों, कारखानों, बाजारों से बनता है. जब आप किसानों को खेतों में मंदिरों को बनवाने को कहेंगे, कारखानों में पूजा करवाएंगे, बाजारों में रामनवमी और हनुमान चालीसा जुलूस निकलवाएंगे तो पैसा खर्च भी होगा, कमाई भी कम होगी ही.

जो समाज निकम्मेपन की पूजा करता है, जो समाज काम को निचले लोगों की जिम्मेदारी समझता है, जो समाज मुफ्तखोरी की पूजा करता है, वह चाहे जितने नारे लगा ले, जितनी बार चाहे ‘जय यह जय वह’ कर ले भूखों मरेगा ही. चीन में माओ ने यही किया था और बरसों पूरी कौम को भूखा मरने पर मजबूर किया था. जब चीन कम्यूनिज्म के पाखंड के दलदल से निकला तो ही चमका.

भारत का गरीब आज काम के लिए छटपटा रहा है. पहली बार उस ने सदियों में आंखें खोली हैं. उसे अक्षरज्ञान मिला है. उसे समझ आया है कि काम की कीमत केवल आधा पेट भरना नहीं, उस से कहीं ज्यादा है. धर्म के नाम पर उस का यह सपना तोड़ा जा रहा है और नतीजा यह है कि वह फिर लौट रहा है दरिद्री की ओर और साथ में पूरे बाजार को डुबा रहा है.

सरकार की कोई भी स्कीम काम करने का रास्ता नहीं बना रही है. सब रुकावटें डाल रही हैं. कश्मीर के नाम पर देश का अरबों रुपया हर रोज बरबाद हो रहा है. अयोध्या पर सुप्रीम कोर्ट दिनोंदिन खर्च कर रहा है. बड़ी मूर्तियां बनाई जा रही हैं. कारखाने न के बराबर लग रहे हैं. उलटे छंटनी हो रही है. पहले अमीरों के उद्योग गाडि़यों के कारखानों में छंटनी हुई अब बिसकुट बनाने वाले भी छंटनी कर रहे हैं. नीति आयोग के राजीव कुमार में इतनी हिम्मत कैसे आ गई कि उन्होंने सरकार की पोल खोल दी. अब उन की छुट्टी पक्की पर जो उन्होंने कहा वह तो हो ही रहा है. अमीरों के दिन तो खराब होंगे पर गरीब भुखमरी की ओर बढ़ चलें तो बड़ी बात न होगी.

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