सुप्रीम कोर्ट ने दलितों को जगाया

भारतीय जनता पार्टी बहुत कोशिश कर रही है कि देश में राजनीति पर बात हिंदूमुसलिम को ले कर हो पर उस के वार बेकार जा रहे हैं और बात बारबार जाति पर आ जाती है. जब से सुप्रीम कोर्ट ने शैड्यूल कास्ट और शैड्यूल ट्राइब्स में क्रीमी लेयर बनाने और उन को आपसी कोटे में कोटे का फैसला दिया है, बात जाति पर होने लगी है और वक्फ ऐक्ट हो या सैक्यूलर यूनिफौर्म सिविल कोड पर बात का दही जम ही नहीं रहा.

सुप्रीम कोर्ट के फैसले को लागू करना सरकारों, खासतौर पर भाजपा सरकारों के लिए मुश्किल होगा. शैड्यूल कास्टों को डिवाइड करना एक टेढ़ी खीर है. हालांकि हरेक को अपनी जातिउपजाति पता है पर सिर्फ सरकारी नौकरी के लिए अपने को किसी और से कमतर मानने के लिए उस उपजाति के सभी लोग मान जाएंगे, यह नामुमकिन है. इस पर खूब जूते चलेंगे.

आजकल जाति का सर्टिफिकेट लेना आसान हो गया है. 75 सालों से चले आ रहे सिस्टम की खराबियां काफी दूर हो चुकी हैं. कुछ बातें ढकी हुई हैं. ऊंचनीच का भेद मालूम नहीं है और अगर मालूम है तो भी शादी तक ही रह जाता है. अब तहसीलदार को सर्टिफिकेट देना होगा कि कौन किस उपजाति का है. इस से पहले सरकार को तय करना होगा कि कौम की उपजाति दूसरी उपजाति से अलग है.

हमारे यहां कोई इतिहास तो है नहीं जिस में लिखा हो कि कौन ऊंचा, कौन नीचा. पौराणिक ग्रंथ तो एससीएसटी की बात करते तक नहीं हैं. वे शूद्रों की बात करते हैं और यही माना जाता है कि ये शूद्र अछूत नहीं थे और आज की अदर बैकवर्ड क्लासें हैं. कानूनों को सुबूत चाहिए होंगे, जिन की चर्चा न पुराणों में है. न बाद के लिए संस्कृत ग्रंथों में, न मुसलिम इतिहासकारों की किताबों में, उन्हें कैसे परखा जाए?

अंगरेजों ने जनगणना में जाति का नाम लिखा पर कौन ऊंचा, कौन नीचा और नीचों में कौन ज्यादा नीचा इस से उन्हें मतलब नहीं था क्योंकि उन्हें नौकरियां थोड़े ही देनी थीं. अब नौकरियों का सवाल है, ऐसी नौकरियां जो पक्की हैं और जिन में ऊपरी कमाई भरपूर हो. ऊंची जातियों की पहले ही इन नौकरियों पर नजर हैं चाहे वे चपरासी की क्यों न हों. शैड्यूल कास्टों को यह भी डर है कि बिल्ली बिल्ली की लड़ाई में बंदर ही सारा माल हड़प न ले.

कहने को ऊंची जातियां कहती रहें कि जाति है ही कहां जब केंद्रीय मंत्री राहुल गांधी को जाति जनगणना पर जवाब दें कि, ‘जिन्हें अपनी जाति का पता नहीं वे जाति जनगणना की बात कैसे कर सकते हैं.’ तो साफ है कि उन के दिमाग में जाति भरी है. शैड्यूल कास्ट वोटर उसे समझ नहीं पा रहे हों, यह भूल जाएं.

उत्तर प्रदेश और राजस्थान के लोकसभा चुनावों ने साफ कर दिया कि जाति का सवाल अभी भी अहम है. इन दोनों राज्यों के ऊंची जातियों के मुख्यमंत्रियों ने भाजपा के सपनों की नाव को डुबाया है क्योंकि वे जाति के नाम पर नाव में खुद चूहे छोड़ रहे थे जो नाव को कुतर रहे थे.

अब सुप्रीम कोर्ट ने सोए दलितों को जगा दिया है. वे अपनी जाति की पोटली संभालने लगेंगे तो ऊंची जातियों में यह बीमारी फैलेगी. ओबीसी भी कोटे में कोटा मांगेंगे. धर्म की देन जाति ने 2000 साल से ज्यादा धर्म को संभाला है. अब यह हाथी डायनासोर न बन जाए.

बेबस दलित औरतें, वर्णवादी व्यवस्था की शिकार 

राजनीति और अफसरशाही में दलित औरतों को आगे देख कर यह मत सोचिए कि जातीय भेदभाव केवल गरीब और अनपढ़ लोगों के शब्दकोश में ही है, चमकदमक की दुनिया में भी जातीय भेदभाव कम नहीं है. दलित औरतें हर लैवल पर भेदभाव और शोषण की शिकार हैं. इस के बाद भी वे जिस वर्णवादी व्यवस्था की शिकार हैं उस में ही रहना भी चाहती हैं.

ज्यादातर को लगता है कि वे अपने को छिपाने के लिए वे काम करें जो ऊंची जातियों के लोग करते हैं. इस में पूजापाठ को एक जरीया मनाने वाला सब से बड़ा तबका है. यही वजह है कि बड़ी तेजी से निचले तबके में ऐसे लोगों की तादाद बढ़ रही है जो वर्ण व्यवस्था की तो खिलाफत करते हैं, पर पूजापाठ और हिंदू पहचान के साथ बने रहना चाहते हैं.

शादी के पहले मीना का सपना था कि अपने साथ पढ़ने वाली लड़कियों की तरह वह भी खूब पढ़ेगी और समाज के लिए कुछ करेगी. उस की टीचर भी यही कहती थी कि मीना बहुत होशियार है. पर 8वीं जमात तक पढ़ाई करने के बाद ही उस के घर वालों ने उस की शादी करने का फैसला कर दिया.

दलित लड़कियों को दबंग लड़के कब पकड़ कर जबरदस्ती न कर डालें, इसलिए शादी करना जरूरी होता था. हमारा धर्म ऐसी कहानियों से भरा पड़ा है जिन में गरीब दलित लड़कियों को ऋषियोंमुनियों ने भी जम कर भोगा है.

मीना के घर वालों के मुताबिक, उस की उम्र शादी लायक हो गई थी. मीना की शादी हो गई. शादी के बाद वह ससुराल आ गई. वहां उस का कुछ समय तो ठीक बीता, पर उस के बाद उस पर दबाव पड़ने लगा कि वह भी घर की दूसरी औरतों की तरह खेतों में काम करने जाए.

मीना खेत में काम नहीं करना चाहती थी. घर में इस बात को ले कर झगड़े शुरू हो गए. मीना ने पति को समझाया तो वह काम करने शहर आ गया. कुछ दिनों बाद मीना भी पति के पास रहने शहर चली आई.

पति के मुकाबले मीना ज्यादा समझदार थी और देखने में खूबसूरत भी थी. शहर में रहने से उस की खूबसूरती और बढ़ गई थी. मीना अपने घर के पास एक अस्पताल में सफाई का काम करने लगी. दिन में मीना 2 से 4 औफिसों में झाड़ूपोंछा लगाने लगी. इस में वह महीने के तकरीबन 5,000 रुपए पाने लगी. उस के पास अपना पैसा आया तो खुद पर यकीन बढ़ गया.

थोड़े समय बाद मीना के चरित्र को ले कर पति के मन में शक बैठने लगा. मीना को इस तरह काम करता देख सास हैरान रह गई. उसे गांव में मीना का खेत में काम करने देना भले ही पसंद था, पर शहर में लोगों के बीच काम करने से मीना के बहक जाने का खतरा था.

मां की शह पा कर मीना के पति ने उस के बाहर जाने का विरोध शुरू किया.

जब मीना नहीं मानी तो पति ने अपना कामधंधा छोड़ दिया और गांव लौटने को तैयार हो गया. पति के पास गांव में कोई काम नहीं था. वह दूसरों के खेतों में काम करता था.

मीना गांव में खेतों में काम करने लगी. ऐसे में उस के साथ वही सब होने लगा जो दूसरी औरतों के साथ होता था.

पर मीना शहर से वापस आ कर  थोड़ी बदल गई थी. ऐसे में उस की पूछ ज्यादा थी. मीना घरबाहर दोनों जगह शोषण की शिकार होने लगी.

मीना की कहानी अकेली नहीं है. ऐसी तमाम दलित लड़कियां हैं जो अपने सपनों को पूरा नहीं कर पातीं और घरबाहर दोनों ही जगहों पर शोषण की शिकार होती हैं.

गरीबी का असर

दलित चिंतक रामचंद्र कटियार कहते हैं, ‘‘दलित तबके की 80 फीसदी लड़कियां 5वीं या 8वीं जमात से आगे नहीं पढ़ पाती हैं. उन की शादी हो जाती है. शादी के बाद ससुराल वाले उन की पढ़ाई को जारी नहीं रख पाते हैं.

‘‘ज्यादातर लड़कियों के पति कोई कामधंधा नहीं करते हैं. वे जब दूर शहरों में नौकरी करने चले जाते हैं तो उन की पत्नियों पर तमाम तरह के आरोप लगने लगते हैं. ज्यादातर के पति नशा करते हैं. ऐसे में मारपीट और झगड़े बढ़ते जाते हैं. पढ़ीलिखी लड़की भी ऐसे माहौल में खुद को लाचार पाती है.’’

कई जगहों से लोग गरीबी का फायदा उठा कर दलित लड़कियों को शहर ले जाते हैं. वहां उन्हें गलत धंधों में भी लगा देते हैं. रैड लाइट एरिया में लाई जाने वाली लड़कियों में बढ़ी तादाद ऐसी दलित लड़कियों की ही होती है, जो पैसों की तंगी या गरीबी की वजह से वहां पहुंच जाती हैं.

दलित लड़कियों के शोषण की अलगअलग कहानियां हैं. समाज में जिस तरह से दलितों के खराब हालात हैं उन से भी खराब हालात दलित औरतों के हैं. हर दिन 3 दलित औरतों से औसतन बलात्कार की वारदात होती है.

बदल नहीं रही सोच

ज्यादातर दलित औरतें गांव में रहती हैं. वे खेतों में मजदूरी करती हैं. ऐसे में एक तबका उन के शोषण को अपना हक समझता है. धर्मग्रंथ की कई कहानियों में ऐसी घटनाओं का जिक्र है जिस की वजह से अभी भी ऊंची जातियों की सोच नहीं बदल रही है.

पुराने रिवाजों को देखें तो ज्यादातर मामलों को देख कर लगता है कि केवल हिंदी राज्यों में ही दलितों की हालत खराब है, पर असल में ऐसा नहीं है.

केरल के इतिहास में सौ साल पहले ऐसी व्यवस्था थी कि छोटी जातियों की औरतों को कपड़े पहनते समय छाती न ढकने का आदेश था. ऐसा न करने वाली औरतों को टैक्स देना पड़ता था.

इस का मकसद केवल जातिवाद को बनाए रखना था. दक्षिण भारत में देवदासी प्रथा में जाने वाली लड़कियों में ज्यादातर निचली जाति की ही होती थीं.

आज भी कई जगहों से ऐसी खबरें आती हैं जहां ऊंची जातियों की तरह दलित लड़कियों की शादी में धूमधड़ाका करना गलत समझा जाता है और इस से जातीय टकराव होने लगता है.

परदा प्रथा अभी भी दलित औरतों में सब से ज्यादा है. ऐसी घटनाएं केवल गांव या कम पढ़ेलिखे लोगों के बीच ही नहीं हैं, बल्कि पढ़ेलिखे तबके में भी यह होता है. वहां भी गैरबराबरी का माहौल बना हुआ है.

तमाम सरकारी स्कूलों में मिड डे मील के समय ऐसी घटनाएं सामने आती हैं जहां पर दलित रसोइए के हाथ का बना खाना खाने में कई लोगों को एतराज होने लगा है. वोट लेने के लिए भले ही नेता तमाम दलितों के साथ खाना खाने का दिखावा करते हों.

बदल जाता है बरताव

लखनऊ के एक कौंवैंट स्कूल में पढ़ने वाली लड़की दिशा बताती है, ‘‘जब तक लोगों को मेरी जाति का पता नहीं चलता तब तक ठीक रहता है, पर जैसे ही जाति का पता चलता है सबकुछ बदल जाता है. साथ पढ़ने और काम करने वाले लोगों का बरताव ही बदल जाता है.

‘‘मुझे 9वीं जमात में पता चला कि मैं दलित हूं. उस समय कालेज में एक फार्म भरना था. उस के बाद स्कूल के दोस्तों को भी पता चल गया. अब वे मुझ से दूर होने लगे हैं.’’

दिशा ने एमबीए तक की पढ़ाई की, इस के बाद वह नौकरी में आई. उस ने कई मल्टीनैशनल कंपनियों में काम किया और वहां उस के नीचे काम करने वालों की बड़ी तादाद थी.

कंपनियों के लोगों को जैसे ही यह पता चलता था कि वह दलित है, उन का बरताव बदल जाता था. दिशा बताती है कि उस ने कहीं किसी भी तरह के रिजर्वेशन का फायदा नहीं लिया. उस जैसी कई लड़कियां हैं जो प्राइवेट सैक्टर में बिना किसी काबिलीयत के काम कर रही हैं. वे अपनी जाति को नहीं बताती हैं. असल में वे भी सोचती हैं कि जाति बताने से लोग अपना बरताव बदल लेते हैं. इस वजह से वे अपनी जाति छिपाने की कोशिश करती हैं.

दीपक नामक लड़के का कहना है, ‘‘मैं नीची जाति का हूं. पढ़ालिखा और अच्छी नौकरी करता हूं. मैं ने ऊंची जाति की लड़की से शादी की है. लड़की के घर वालों ने शादी का विरोध तो नहीं किया, पर वे हमारे साथ संबंध नहीं रखते हैं. उन लोगों ने अपनी लड़की के साथ भी संबंध तोड़ लिए हैं.

‘‘हमारी शादी को 8 साल हो चुके हैं, पर अभी भी वे हमारे घर नहीं आते हैं. मेरी पत्नी जब मायके जाती है तो केवल उस की मम्मी और बहन ही बात करती हैं. उस के पापा कभी उस से बात नहीं करते. मेरी पत्नी भी एक रात से ज्यादा अपनी मां के घर में नहीं रुकती है. एक तरह से उस का अपना घर अब उस के लिए बेगाना ही हो चुका है.’’

खराब सेहत

दलित औरतें अपनी सेहत का खुद ध्यान नहीं रख पाती हैं. स्वास्थ्य सेवाओं को ले कर काम कर रही सोनिया सिंह बताती हैं, ‘‘हम लोगों ने माहवारी के दौरान कपड़े के इस्तेमाल पर बातचीत की तो पाया कि सब से खराब हालत दलित औरतों की ही है. किसी भी गांव में 1-2 से ज्यादा दलित औरतें नहीं मिलतीं जो यह कहती हों कि वे माहवारी में पैड का इस्तेमाल करती हैं.’’

परिवार नियोजन में नसबंदी के टारगेट को पूरा करने के लिए सब से ज्यादा दलित औरतों का ही आपरेशन कराया जाता है. गांव की गरीब औरतों को छोड़ भी दें तो अच्छी पढ़ीलिखी औरतों में भी जाति का पता चलते

ही भेदभाव दिखने लगता है. शहरी जीवन में इस भेदभाव से बचने के लिए दलित औरतें अपनी पहचान बदलने लगी हैं.

रिजर्वेशन और भेदभाव

रिजर्वेशन का फायदा पा कर कुछ दलित परिवारों के पास पैसा और साधन  हैं. इस के बाद भी समाज में भेदभाव में कमी नहीं आई है.

मौका मिलते ही ऊंची जातियों के लोग यह कहने में नहीं चूकते हैं कि आरक्षण के चलते ही ये आगे हैं और रिजर्वेशन के चलते ही समाज की यह हालत है.

पुलिस और दूसरी ऐसी संस्थाओं में काम करने वाली औरतों का कहना है कि हमारे साथ भी जातीय भेदभाव होता है. खराब से खराब गंदगी वाले काम करने के लिए हम से कहने में किसी को कोई हिचक नहीं होती है, पर ऊंची जातियों की औरतों को वही काम कहने में लोगों को हिचक होने लगती है. काम के गलत होने से हमारी जाति का कोई मतलब नहीं होता है, पर काम के गलत होते ही हमारी जाति और रिजर्वेशन को ले कर टिप्पणी होने लगती है.

सोशल मीडिया के बाद यह बात और भी तेजी से उभर कर सामने आ रही है. जहां पर ऐसे तमाम मैसेज इधर से उधर होते हैं जो जातीय भेदभाव को बढ़ाने वाले होते हैं. इन में एक ही संदेश दिया जाता है कि रिजर्वेशन के चलते ही देश के हालात खराब हैं और इस के चलते ही दलित नौकरियों में हैं. तमाम दलित गैरसरकारी नौकरियों में हैं और वहां पर वे अच्छा काम कर रहे हैं. उन की तारीफ कभी नहीं होती.

शादी के पहले मीना का सपना था कि अपने साथ पढ़ने वाली लड़कियों की तरह वह भी खूब पढ़ेगी और समाज के लिए कुछ करेगी. उस की टीचर भी यही कहती थी कि मीना बहुत होशियार है.

मल्लिकार्जुन खड़गे : ‘इंडिया’ का कितना मजबूत दलित चेहरा

वोट के लिहाज से देखें, तो ओबीसी के बाद सब से ज्यादा तादाद दलित वोटर की है. यही वजह है कि ‘इंडिया’ गठबंधन लगातार इस कोशिश में था कि बहुजन समाज पार्टी की नेता मायावती को गठबंधन का हिस्सा बनाया जा सके.

इस पर कांग्रेस में 2 विचार थे. राहुल गांधी चाहते थे कि अखिलेश यादव ‘इंडिया’ गठबंधन का हिस्सा रहें, वहीं प्रियंका गांधी और उत्तर प्रदेश के कांग्रेस नेता चाहते थे कि मायावती को ‘इंडिया’ गठबंधन से जोड़ा जाए.

‘इंडिया’ गठबंधन की दिल्ली में मीटिंग के बाद कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश के अपने नेताओं की मीटिंग भी बुलाई थी. इस मीटिंग में कांग्रेस प्रदेश में अपनी जमीनी हालत देखना चाहती थी. प्रदेश कांग्रेस के नेताओं ने 2 बातें प्रमुख रूप से कहीं. पहली यह कि गांधी परिवार के तीनों सदस्य उत्तर प्रदेश से लोकसभा का चुनाव लड़ें. दूसरी बात यह कि अखिलेश यादव के मुकाबले मायावती से गठबंधन फायदेमंद रहेगा.

मायावती का अड़ियल रुख

इस मीटिंग से कांग्रेस को लगा कि उत्तर प्रदेश में वह बेहद कमजोर है. बिना गांधी परिवार और गठबंधन के वह आगे नहीं बढ़ना चाहती. मीटिंग में प्रदेश कांग्रेस के एक भी नेता ने यह नहीं कहा कि वह मुख्यमंत्री बनने के लिए मेहनत कर सकता है.

कांग्रेस ने जब उत्तर प्रदेश की तुलना तेलंगाना से कर के देखी, तो लगा कि कांग्रेस वहां भी सत्ता से बाहर थी. इस के बाद भी वहां कांग्रेस के पास 6 नेता ऐसे थे, जो मुख्यमंत्री बनने के लिए मेहनत कर रहे थे.

उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को अपनी कमजोरी का पता चल गया. मायावती को ले कर दुविधा यह है कि वे खुल कर बात नहीं करतीं. प्रियंका गांधी उन से मिल कर ‘इंडिया’ गठबंधन में उन्हें लाना चाहती थीं, लेकिन मायावती की तरफ से कोई सिगनल नहीं मिला. चुनाव करीब आने और 3 राज्यों में हार के बाद कांग्रेस दबाव में थी. ऐसे में उस ने यह फैसला कर लिया कि अब मायावती वाला चैप्टर बंद कर दिया जाए.

डर क्या है

अब चुनाव के पहले मायावती ‘इंडिया’ गठबंधन का हिस्सा नहीं बनेंगी. मायावती ने अपने सोशल मीडिया पर पोस्ट कर के यह जरूर कहा कि ‘राजनीति में संबंध ऐसे रखने चाहिए कि जरूरत पड़ने पर सहयोग लिया जा सके’.

इस का मतलब यह लगाया जा रहा है कि मायावती चुनाव के बाद सीटों के नंबर के मुताबिक अपना साथी चुन सकती हैं.

मायावती के इस ऊहापोह की वजह समाजवादी पार्टी है. 2 जून, 1995 को उत्तर प्रदेश के स्टेट गैस्ट हाउस कांड की खौफनाक यादें अभी भी उन के मन पर छाई हैं. सामाजिक स्तर पर भी ओबीसी और एससी वोटर के बीच उसी तरह की हालत है. साल 2019 के लोकसभा चुनाव में अखिलेश यादव और मायावती के बीच सम?ाता हुआ था, पर उस का अंत भी बुरा ही रहा.

मायावती खुद को समाजवादी पार्टी से कमतर नहीं आंकतीं. साल 2019 में जब सपाबसपा गठबंधन हुआ था, तो मायावती ने बसपा के लिए सपा से एक सीट ज्यादा ली थी. ‘इंडिया’ गठबंधन में मायावती के हिस्से सीटें कम आतीं. वे अखिलेश यादव से कमजोर दिखना नहीं चाहतीं. इस वजह से वे ‘इंडिया’ गठबंधन का हिस्सा नहीं बनीं.

चुनाव बाद के लिए मायावती ने हर समझेते के रास्ते खुले रखे हैं. कहीं न कहीं प्रधानमंत्री पद की इच्छा मायावती के भी मन में है. लिहाजा, मायावती चुनाव के पहले अपने पत्ते नहीं खोलना चाहतीं.

मल्लिकार्जुन कितने मजबूत

मायावती के विकल्प के रूप में ‘इंडिया’ गठबंधन ने कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे का नाम पीएम फेस के रूप में आगे किया है. यह फैसला जिस रणनीति के तहत हुआ, उस पर मेहनत करना ‘इंडिया’ गठबंधन की जिम्मेदारी है. केवल दलित होने के चलते नाम घोषित होने से दलित वोट नहीं मिलने वाले. पंजाब विधानसभा का चुनाव इस का उदाहरण है.

पंजाब में विधानसभा चुनाव के पहले चरनजीत सिंह चन्नी को मुख्यमंत्री बना कर कांग्रेस ने सोचा था कि दलित वोट उन को मिल जाएंगे. कांग्रेस ने इस के लिए मेहनत नहीं की. लिहाजा, पंजाब में कांग्रेस चुनाव हार गई.

मल्लिकार्जुन खड़गे का नाम आगे करने से दलित वोट नहीं मिलेंगे. इस के लिए ‘इंडिया’ गठबंधन को पूरी ईमानदारी के साथ काम करना होगा. केवल कांग्रेस के चाहने से भी यह नहीं होगा.

यह बात सच है कि कांग्रेस मल्लिकार्जुन खड़गे की बहुत इज्जत करती है. कांग्रेस के अध्यक्ष रह चुके और सांसद राहुल गांधी हमेशा खुद मल्लिकार्जुन खड़गे की कार में उन के पीछे बैठते हैं, जिस से पार्टी और लोगों को यह संदेश जाए कि खड़गे ‘डमी कैंडिडेट’ नहीं हैं. पार्टी चलाने में वे आजाद हैं.

दिक्कत यह है कि देश के तमाम राज्यों में कांग्रेस मजबूत नहीं है. ऐसे में वह अपने सहयोगी दलों पर निर्भर है. साल 2024 के आम चुनाव में अगर ‘इंडिया’ गठबंधन सरकार बनाने की हालत में आता भी है, तो राहुल गांधी पीएम नहीं बनेंगे. राहुल गांधी यह सोच कर चल रहे हैं कि अभी उन की उम्र जिस दौर में है, वहां उन के पास पीएम बनने के लिए 10 साल का समय है.

ऐसे में मल्लिकार्जुन खड़गे ही पीएम बनेंगे, यह तय है. ‘इंडिया’ गठबंधन तभी सरकार बना पाएगा, जब कांग्रेस के पास अपने 120 से 150 के बीच सांसद आएं. ऐेसे में मल्लिकार्जुन खड़गे को पीएम का चेहरा बनाने से काम नहीं चलने वाला. उस के लिए ‘इंडिया’ गठबंधन और उस में शामिल हर दल को पूरी ईमानदारी से यह सोच कर मेहनत करनी होगी कि मल्लिकार्जुन खड़गे को प्रधानमंत्री बनाना है.

दबंग कर रहे दलित दूल्हों की दुर्गति

Society News in Hindi: यह घटना इसी साल के जून महीने की है. मध्य प्रदेश (Madhya Pradesh) के छतरपुर (Chhatarpur) में चौराई गांव का रितेश अपनी शादी पर जैसे ही घोड़ी पर चढ़ा, गांव के कुछ लोगों ने इस बात का विरोध किया. हंगामा बढ़ा, तो पुलिस आई. लेकिन पुलिस की मौजूदगी में ही बरात पर पत्थरबाजी शुरू हो गई. दरअसल, रितेश अहिरवार दलित था. उस की बरात पर पत्थरबाजी इसलिए हुई कि कैसे कोई दलित घोड़ी पर चढ़ कर अपनी बरात ले जा सकता है? इस पूरे मामले में सरकारी काम में बाधा डालने, मारपीट करने और हरिजन ऐक्ट (Harijan Act) के तहत एफआईआर हुई थी. देश का संविधान (constitution) कहने को ही सभी को बराबरी का हक देता है, लेकिन एक कड़वा और अकसर देखा जाने वाला सच यह है कि जो दलित दूल्हा घोड़ी चढ़ने की हिमाकत या जुर्रत करता है, दबंग लोग उस की ऐसी दुर्गति करते हैं कि कहने में झिझक होती है कि वाकई देश में कोई लोकतंत्र वजूद में है, जिस का राग सरकार, नेता, समाजसेवी, राजनीतिक पार्टियां और पढ़ेलिखे समझदार लोग अलापा करते हैं.

छुआछूत दूर हो गई, जातपांत का भेदभाव खत्म हो गया और अब सभी बराबर हैं, ये कहने भर की बातें हैं. हकीकत यह है कि यह प्रचार खुद दबंग और उन के कट्टरवादी संगठन करते रहते हैं, जिस से समाज की अंदरूनी हालत और सच दबे रहें और वे दलितों पर बदस्तूर सदियों से चले आ रहे जुल्मोसितम ढाते हुए ऊंची जाति वाला होने का अपना गुरूर कायम रखें.

जड़ में है धर्म

किसी भी गांव, कसबे या शहर में देख लें, कोई न कोई छोटा या बड़ा बाबा पंडाल में बैठ कर प्रवचन या भागवत बांचता नजर आएगा. ये बाबा लोग कभी बराबरी की, छुआछूत दूर करने की या जातपांत खत्म करने की बात नहीं करते. वजह सिर्फ इतनी भर नहीं है कि धार्मिक किताबों में ऐसा नहीं लिखा है, बल्कि यह भी है कि इन की दुकान चलती ही जातिगत भेदभाव से है.

अपनी दुकान चमकाए रखने के लिए धर्म की आड़ में समाज में पड़ी फूट को हवा दे रहे बाबा घुमाफिरा कर दबंगों को उकसाते हैं और दलितों को उन के दलितपने का एहसास कराते हुए नीचा दिखाने में लगे रहते हैं. इन पर न तो कोई कानून लागू होता है, न ही कोई इन की मुखालफत कर पाता है, क्योंकि मामला धर्म का जो होता है.

फसाद की असल जड़ धर्म और उस के उसूल हैं, जिन के मुताबिक शूद्र यानी छोटी जाति वाले जानवरों से भी गएबीते हैं. उन्हें घोड़ी पर बैठ कर बरात निकालने का हक तो दूर की बात है, सवर्णों के बराबर बैठने का भी हक नहीं है, इसलिए आएदिन ऐसी खबरें पढ़ने में आती रहती हैं कि दलितों को पानी भरने से रोका, वे नहीं माने तो उन की औरतोंबच्चों को बेइज्जत किया, मर्दों को पीटा और इस पर भी नहीं माने तो गांव से ही खदेड़ दिया.

यही वजह है कि करोड़ों दलित दबंगों के कहर का शिकार हो कर घुटन भरी जिंदगी जी रहे हैं, पर उन की सुनने वाला कोई नहीं.

इस पर तुर्रा यह कि हम एक आजाद लोकतांत्रिक देश की खुली हवा में सांस लेते हैं, जिस में संविधान सभी को बराबरी का हक देता है. यह मजाक कब और कैसे दूर होगा, कोई नहीं जानता.

चिंता की बात यह भी है कि दलितों पर जोरजुल्म लगातार बढ़ रहे हैं, जिन की तरफ किसी राजनीतिक पार्टी, नेता या समाज के ठेकेदारों का ध्यान नहीं जो बड़ीबड़ी बातें करते हैं, रैलियां निकालते हैं और दलितों को बरगलाने के लिए बुद्ध और अंबेडकर जयंतियां मनाते हैं. इस साजिश को, जो धर्म और राजनीति की देन है, दलित समझ पाएं तभी वे इज्जत और गैरत की जिंदगी जी पाएंगे.

रैलियों में भीड़ बढ़ाने में दलितपिछड़ों का इस्तेमाल

मध्य प्रदेश में उज्जैन जिले की बड़नगर विधानसभा क्षेत्र में इन दिनों कांग्रेस उम्मीदवार मुरली मोरवाल की नामांकन रैली का एक वीडियो तेजी से वायरल हो रहा है, जिस में कुछ नाबालिग बच्चे हाथों में कांग्रेस का झंडा ले कर ‘मुरली मोरवाल जिंदाबाद’ के नारे लगा रहे हैं और यह भी कह रहे हैं कि हमें झाबुआ, पेटलावद से इस रैली में लाया गया है और रैली में आने के लिए हमें 500-500 रुपए भी दिए गए हैं.

इस पूरे मामले पर मुरली मोरवाल का कहना था कि उन पर जो आरोप लगाए गए हैं, वे सरासर गलत हैं. विधानसभा क्षेत्र में उन के कई व्यापार हैं. ईंटभट्ठे और कंस्ट्रक्शन के क्षेत्र में सैकड़ो लोग उन से जुड़े हुए हैं. इन लोगों को जब पता चला कि उन के सेठ को कांग्रेस पार्टी ने टिकट दिया है तो वे सभी लोग परिवार समेत नामांकन रैली में शामिल हुए थे. झाबुआ, पेटलावद से लोगों को पैसे दे कर बुलाने की बात झूठी है. जो भी ऐसी बात कर रहे हैं, वे गलत कह रहे हैं.

इसी साल जुलाई महीने में छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले में एक बस का भीषण ऐक्सीडैंट हो गया है. तेज रफ्तार बस ने हाईवे में खड़े हाइवा ट्रक को पीछे से जोरदार टक्कर मार दी थी, जिस में बस सवार 3 लोगों की मौके पर मौत हो गई थी. वहीं, 6 से ज्यादा लोग गंभीर रूप से घायल हो गए थे.

जानकारी के मुताबिक, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रैली में शामिल होने के लिए बस सवार यात्री अंबिकापुर से रायपुर जा रहे थे. यह सड़क हादसा तड़के हुआ, जब बस अंबिकापुर से रवाना बेलतरा पहुंची थी. इसी दौरान बेलतरा के पास हाईवे पर खड़े हाइवा को तेज रफ्तार बस ने पीछे से जोरदार टक्कर मार दी थी.

अब एक बहुत बड़ी खबर का रुख करते हैं. नवंबर महीने में होने वाले विधानसभा चुनावों में एससीएसटी जातियों को अपने पक्ष में लुभाने के लिए 24 फरवरी, 2023 को मध्य प्रदेश के सतना में कोल जाति का महाकुंभ आयोजित किया गया, जिस में शामिल होने के लिए सीधी और सिंगरौली जिले से बसों में सवार हो कर कोल समाज के लोग शामिल हुए थे.

इस महाकुंभ में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह आए हुए थे. उस दिन शाम को तकरीबन 5 बजे इस रैली के खत्म होने के बाद सभी लोग बसों में सवार हो कर सीधीसिंगरौली अपने घर जा रहे थे.

रास्ते में 2 बसें रात के तकरीबन 9 बजे मोहनिया टनल से 300 मीटर दूर बडखरा गांव के पास रुकीं. वहां सवारियों के लिए चायनाश्ते का इंतजाम किया गया था.

कोल समाज के लोगों को बसों में जब नाश्ते के पैकेट दिए जा रहे थे, तभी रीवा की ओर से आ रहे एक तेज रफ्तार ट्रक ने एक बस को पीछे से टक्कर मार दी. टक्कर इतनी तेज थी कि आगे वाली बस बीच सड़क पर पलट गई, जबकि जिस बस में टक्कर लगी थी, वह डिवाइडर से टकरा कर बीच सड़क पर आ गई.

उसी दौरान सीधी की ओर से आ रही एक और बस भी टकरा कर पलट गई. जबकि, ट्रक टक्कर मारते हुए नीचे गिर कर पलट गया. इस हादसे में 15 लोगों की मौत हो गई और सैकड़ों लोग घायल हो गए.

अमित शाह के सामने अपनी ताकत दिखाने के लिए मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने जिस कोल महाकुंभ का आयोजन सतना में किया था, उस में शामिल हुए ये एससीएसटी तबके के लोग चायनाश्ता, भोजनपानी और एक दिन की मजदूरी के बदले बड़ीबड़ी बसों में भर कर लाए गए थे. रैली में भीड़ जुटाने के लिए सरकारी अफसरों और मुलाजिमों की भी ड्यूटी लगाई गई थी.

बताया जाता है कि इस रैली में 10 स्कूल मास्टर और 7 पटवारी भी घायल हुए थे. इन‌ मास्टरों और पटवारियों की ड्यूटी अमित शाह की रैली में भीड़ जुटाने के लिए लगाई गई थी.

रैली में भीड़ जुटाने की यह घटना न‌ई नहीं है. जब भी कहीं किसी सत्तारूढ़ राजनीतिक दल की रैली होती है, सरकारी मुलाजिमों की ड्यूटी इस तरह के कार्यक्रम में लगाई जाती है. वे अपना कामकाज छोड़ कर नेताओं की रैली में भीड़ जुटाने का काम करते हैं. कायदेकानून की अनदेखी कर के एक जिले से दूसरे जिले में बसों को बिना परमिट भेजा जाता है.

इन रैलियों में सब से ज्यादा एससीओबीसी तबके के लोगों का इस्तेमाल किया जाता है. इन जातियों का बड़ा तबका अभी भी रोजीरोटी के‌ लिए जद्दोजेहद करता है. अपने परिवार का पेट पालने के लिए रोज कड़ी मेहनत करता है, तभी उन के घरों का चूल्हा जलता है.

यही वजह है कि जब राजनीतिक दलों के लोग उन्हें दिनभर की मजदूरी और खानेपीने का लालच देते हैं, तो वे यह सोच कर आसानी से तैयार हो जाते हैं कि एक दिन की मजदूरी भी मिल जाएगी.

रैलियों की भीड़ जीत का पैमाना नहीं

राजनीतिक दलों की रैलियों में जुट रही भीड़ से इस बात का अंदाजा नहीं लगाया जा सकता कि वोटर का रुख किस के पक्ष में है. क‌ई बार वोटर सभी दलों की रैलियों में बतौर मेहनताना शामिल होता है.

साल 2019 के लोकसभा चुनाव के समय भी जब प्रियंका गांधी ने उत्तर प्रदेश कांग्रेस की कमान संभाली थी, तब उन की रैलियों में काफी भीड़ जुटती थी. इसी तरह से साल 2017 के विधानसभा चुनाव में भी अखिलेश यादव और राहुल गांधी की रैलियों में भी भीड़ बहुत रहती थी, मगर चुनाव में जीत भारतीय जनता पार्टी की हुई थी. भाजपा ने 300 से ज्यादा सीटें हासिल की थीं.

दलितों की हिमायती मायावती की रैलियों में भी भारी भीड़ उमड़ती थी. बसपा सुप्रीमो मायावती के बारे में तो यहां तक कहा जाता है कि वे एकलौती ऐसी नेता हैं, जिन के लिए मैदान छोटा पड़़ जाता था, इसलिए किसी की रैली में उमड़ी भीड़़ के आधार पर किसी पार्टी या नेता की जीत का दावा नहीं किया जा सकता.

बिहार में पिछले विधानसभा चुनाव में सभी दल वोटरों को लुभाने में लगे थे, रैलियों में भीड़ भी दिखाई दे रही थी, लेकिन बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार हैरानपरेशान थे, क्योंकि उन की रैलियों से भीड़ न जाने कहां गायब हो गई थी.

रैलियों से नदारद भीड़ को देख कर नीतीश कुमार यह मान चुके थे कि सत्ता उन के हाथ से फिसल कर राष्ट्रीय जनता दल की की झोली में जा रही है, लेकिन जब वोटिंग मशीनों से नतीजे निकले तो राजनीतिक पंडित ही नहीं, बल्कि नीतीश कुमार भी हैरान रह गए थे.

उस समय नीतीश कुमार की जीत में महिला वोटरों ने अहम रोल निभाया था, जो नीतीश सरकार द्वारा प्रदेश में शराबबंदी किए जाने से नीतीश सरकार की मुरीद हो गई थीं. इस के अलावा कानून व्यवस्था में सुधार भी एक अहम मुद्दा था. बिहार में महिला वोटरों को लगता था कि अगर बिहार में राष्ट्रीय जनता दल की सरकार बन जाएगी, तो बिहार में फिर से जंगलराज कायम हो जाएगा.

नरेंद्र मोदी की भीड़ भी नहीं दिला पाई जीत

आज भी देश के ज्यादातर इलाकों में आदिवासी और दलितपिछड़े तबके के लोग कम पढ़ेलिखे हैं, उस की वजह सरकारी योजनाओं का फायदा उन तक नहीं पहुंच पाना है. इसी वजह से आदिवासी और दलितपिछड़ों के वोट बैंक का इस्तेमाल राजनीतिक पार्टियां अपने लिए आसानी से करती रहती है.

साल 2018 के विधानसभा चुनाव के वक्त 24 अप्रैल को मध्य प्रदेश के मंडला जिले में भी एक बड़ी रैली का आयोजन सरकार द्वारा किया गया था, जिस में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आए थे.

रमपुरा गांव में रहने वाले आदिवासी वंशीलाल गौड़ बताते हैं कि उन्हें बस द्वारा मंडला ले जाया गया था. रास्ते में खानेपीने के इंतजाम के साथ रैली से लौटने पर 500 रुपए बतौर मेहनताना दिए गए थे. इस रैली में लाखों की तादाद में आदिवासियों को मध्य प्रदेश के ‌क‌ई जिलों से बसों में भर कर लाया गया था.

इस भीड़ को देख कर भाजपा ने यही अंदाजा लगाया जा कि उस की सरकार फिर से बनेगी, लेकिन उस समय कांग्रेस की सरकार बनी और कमलनाथ मुख्यमंत्री बने थे. यह अलग बात है कि 15 महीने बाद भाजपा ने सिंधिया समर्थक विधायकों की खरीदफरोख्त कर फिर से सरकार बना ली थी.

पश्चिम बंगाल में साल 2021 में विधानसभा चुनाव के समय भी यही नजारा देखने को मिला था, जहां भाजपा की रैलियों में जनसैलाब उमड़ रहा था. ऐसा लग रहा था कि ममता बनर्जी की सत्ता से विदाई तय है. भाजपा की रैलियों में जनता की मोदी के प्रति दीवानगी देखने लायक थी.

पश्चिम बंगाल के कोलकाता में ब्रिगेड मैदान में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रैली में उमड़े जनसैलाब की तसवीरों को कौन भूल सकता है, क्योंकि पिछले कुछ दशकों में यहां किसी भी नेता को सुनने के लिए इतने लोगों की भीड़ एकसाथ जमा नहीं हुई थी.

इस मैदान के बारे में यह कहा जाता रहा है कि केवल कम्यूनिस्टों की रैली में ही यह पूरा भर पाता था. तृणमूल की रैली में भी इस मैदान में काफी भीड़ जमा होती थी, पर भाजपा की यहां हुई रैली में जुटी भीड़ माने रखती थी. इस रैली के जरिए भाजपा ने पश्चिम बंगाल में अपनी ताकत को दिखाया था.

भारतीय जनता पार्टी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रैली के लिए 10 लाख लोगों की भीड़़ जुटाने का टारगेट रखा था. इस के लिए भाजपा ने राज्य के हर शहर, हर गांव से कार्यकर्ताओं को कोलकाता पहुंचने का आदेश दिया था.

दरअसल, भारतीय जनता पार्टी के लिए यह रैली पश्चिम बंगाल में इज्जत का सवाल बन गई थी. इसी वजह से भारतीय जनता पार्टी के बड़े नेताओं ने पश्चिम बंगाल के नेताओं को साफ निर्देश दिया था कि किसी भी कीमत पर इस रैली को कामयाब बनाना है.

मध्य प्रदेश के भाजपा नेता कैलाश विजयवर्गीय इस रैली की देखरेख खुद कर रहे थे. उन्हीं के नेतृत्व में पश्चिम बंगाल के लोकल भाजपा नेताओं ने कोलकाता के ब्रिगेड मैदान में इतनी बड़ी तादाद में जनसैलाब जुटाया था. लेकिन जब नतीजे आए तो भाजपा चारों खाने चित नजर आई और ममता बनर्जी फिर से मुख्यमंत्री बनीं.

वैसे तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कोलकाता के ब्रिगेड मैदान में पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव से पहले भी साल 2014 और साल 2019 के लोकसभा चुनाव में रैली की थी, जो भीड़ के हिसाब से ऐतिहासिक थी, पर नतीजों के लिहाज से फेल ही रहीं.

एक दौर था जब लोग नेताओं के भाषण सुनने जाते थे और नेता नुक्कड़ सभाओं के जरीए अपनी बात जनता के बीच रखते थे. किसी दल या नेता की रैलियों में जुटने वाली भीड़ से अंदाजा लगा लिया जाता था कि किस दल का पलड़ा हलका या भारी है.

इस के पीछे की मुख्य वजह यही थी कि तब वोटर अपनी मरजी से अपने चहेते नेताओं के भाषण सुनने और उसे देखने आया करते थे, लेकिन अब समय बदल चुका है. धीरेधीरे भीड़ जुटाने के लिए रणनीति बनने लगीं. लोगों को खानेपीने और पैसे का लालच दे कर रैली की जगह पर बुलाया जाने लगा, इसीलिए कई बार भीड़ में जो चेहरे एक पार्टी के रैली में दिखाई देते थे, वही चेहरे दूसरी पार्टी की रैली में भी दिख जाते हैं. अब भीड़ के बिना नेता भाषण भी देना नहीं चाहता.

पंजाब का वाकिआ लोगों को याद ही होगा जब सभा में भीड़ न जुटने के चलते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सुरक्षा में खामी बता कर वापस लौट आए थे.

हैलीकौप्टर और फिल्मी ऐक्टर देखने उमड़ती है भीड़

चुनावी रैलियों में भीड़ जुटाने के लिए राजनीतिक दलों के लोग तमाम तरह के हथकंडे अपनाते हैं. गांवकसबों में भी चुनाव के वक्त बड़े नेताओं, फिल्मी ऐक्टरों की रैली और सभाएं होती हैं, जिन में लोग केवल फिल्म ऐक्टर और हैलीकौप्टर को देखने जाते हैं.

साल 2018 के विधानसभा चुनाव में गाडरवारा विधानसभा में भाजपा उम्मीदवार के पक्ष में प्रचार करने फिल्म हीरोइन हेमा मालिनी आई थीं, जिन्हें देखने के लिए भारी तादाद में भीड़ जुटी थी, लेकिन यह भीड़ भाजपा उम्मीदवार को जीत नहीं दिला सकी.

चुनाव लड़ रहे उम्मीदवार की कोशिश रहती है कि उस के प्रचार में कोई स्टार प्रचारक हैलीकौप्टर से आए और उस बहाने बड़ी तादाद में भीड़ जमा हो जाए. पार्टी आलाकमान के कहने पर स्टार प्रचारक हैलीकौप्टर में सवार हो कर दिनभर में 4-5 सभाएं करते हैं, जिन्हें देखने के लिए भीड़ लगती है और पार्टी उम्मीदवार समझता है कि उस की जीत पक्की हो गई है. कई बार तो इस तरह की रैली में भाषण देने आए इन स्टार प्रचारकों को उम्मीदवार का नाम ही पता नहीं रहता है.

रणनीतिकार बाकायदा दावा करते हैं कि अमुक नेता की रैली में इतने लाख की भीड़ जुटेगी और भीड़ जुटती भी है, लेकिन इस में कौन किस पार्टी को वोट देगा, कोई नहीं जानता. अब रैलियों की भीड़ से किसी दल या नेता की लोकप्रियता का अंदाजा लगाना मुश्किल हो गया है.

चुनाव का वक्त आते ही सभी राजनीतिक दलों के नेता दलितपिछड़े लोगों के हिमायती बन जाते हैं और चुनाव जीतने के बाद कोई उन की सुध तक नहीं लेता. इसी तरह चुनाव में शराब और पैसे का लालच दे कर इन भोलेभाले लोगों के वोट हासिल किए जाते हैं और फिर पूरे 5 साल तक उन की अनदेखी की जाती है.

विकास की मुख्यधारा से हमेशा दूर रहने वाले इस तबके के लोगों का चुनावी रैलियों में इस तरह से इस्तेमाल करना लोकतंत्र का मजाक नहीं तो और क्या है. दलितपिछड़े तबके के लोगों को जागरूक होने की जरूरत है.

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