Hindi Love Crime Story : फांस

Hindi Love Crime Story. ‘‘अरे, मुझे  दुकान जाने में देर हो रही है. खाना तैयार हुआ कि नहीं?’’ रमेश की बात का कोई जवाब उन की पत्नी लीला दे पातीं, इस से पहले ही फोन जोर से घनघनाया. फोन पर बात करती लीला को बीच में टोकने के लिए जैसे ही रमेश उन के पास पहुंचे, तो उन के चेहरे पर आनेजाने वाले भावों को देख कर चुप हो गए. लीला के चेहरे पर घबराहट साफ दिख रही थी.

फोन रख माथे पर आई पसीने की बूंदों को अपने पल्लू से पोंछते हुए लीला बोलीं, ‘‘सुनते हो, गजब हो गया. बड़ी भाभी का फोन था. वे कह रही थीं कि हमारी बेटी किसी यादव के लड़के के साथ घूम रही है. वह जो गांव के बाहर पुराना शिव मंदिर है न, उस के पंडित ने उन्हें कई बार साथ देखा है.’’

‘‘यह तुम क्या कह रही हो लीला? ऐसा कैसे हो सकता है? हमारी बेटी ऐसा कैसे कर सकती है?’’ रमेश को अभी भी यकीन नहीं हो रहा था.

‘‘भला, बड़ी भाभी झठ क्यों बोलेंगी? उन की हम से कोई दुश्मनी थोड़े ही है,’’ लीला का सब्र जवाब दे रहा था.

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‘‘तुम्हारी लाड़ली है कहां… बुलाओ उसे. अभी सब साफ हो जाएगा. हमारे संस्कारों की इस तरह कैसे वह धज्जियां उड़ा सकती है,’’ रमेश किसी चोट खाए सांप की तरह फुफकार रहे थे.

‘‘वह क्या घर में है, जो उसे बुलाऊं. कब की कालेज जा चुकी है. कह रही थी कि आजकल किसी समारोह की तैयारी चल रही है, इसलिए रोज सुबह जल्दी जा रही है और रात को भी देर से आती है.’’

लीला की यह बात सुन कर रमेश और भड़क उठे, ‘‘यानी कालेज जाने के नाम पर गुलछर्रे उड़ा रही है. बात और फैले, उस से पहले ही उस का घर से निकलना बंद कर दो. मैं जल्दी ही कोई अपनी बिरादरी का लड़का देख कर उस की शादी तय कर देता हूं.’’

अपने कागज संभालते हुए रमेश बिना खाना लिए ही दुकान के लिए निकल गए. बेटा अभी तैयार हो रहा था. रोज की तरह उस के लिए भी नहीं ठहरे.

लीला काफी देर तक अपना सिर पकड़े यों ही बैठी रहीं.

‘‘क्या बात है अम्मां, ऐसे क्यों बैठी हो?’’ महेश ने पूछा. उस के पीछे बहू भी खाने का डब्बा थामे खड़ी थी.

‘‘अम्मां, बाऊजी आज इन के लिए ठहरे नहीं? क्या कहीं और जाना था उन्हें?’’ बहू ने पूछा, तो लीला की आंखों से आंसुओं की धार बह निकली.

‘‘अब क्या बताऊं तुम दोनों को. आभा ने हमारे मुंह पर कालिख पोत दी है. वह किसी जोगिंदर नाम के यादव के लड़के से मिलतीजुलती है. तुम्हारी ताई का फोन आया था. वे बता रही थीं कि पुराने शिव मंदिर का पंडित यह बात सब से कहता फिर रहा है और उस ने तो पंचायत बुलाने की भी धमकी दी है?’’

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यह सुनते ही महेश एकदम भड़क उठा, ‘‘काट दूंगा उस यादव के बच्चे को. मेरी बहिन की ओर आंख उठा कर देखने की उस की हिम्मत भी कैसे हुई. लगता है, वह अपनी औकात भूल गया है. तुम तो बस आभा को समझाओ. वह अभी नादान है, जरूर यादव के लड़के ने उसे बरगलाया होगा.’’

महेश तो बौखलाता हुआ दुकान के लिए निकल गया, पर घर में तो जैसे मातम छा गया था. इस बीच बड़ी भाभी का फोन फिर आया था. वे बता रही थीं कि उन के पड़ोस में रहने वाली श्यामा काकी को पंडित मिला था और कह रहा था कि आभा और जोगिंदर तो घर से भाग कर शादी करने का प्रोग्राम बना रहे हैं.

यह सुन कर लीला और परेशान हो गई थीं.

शाम को जब आभा घर लौटी, तो घर के माहौल में हुए बदलाव को उस ने साफ महसूस किया.

‘‘आ गई गुलछर्रे उड़ा कर. अपने मांबाप की इज्जत दांव पर लगाते तुझे  शर्म नहीं आई. क्या इसी दिन के लिए तुझे  पालपोस कर बड़ा किया था,’’ लीला आभा के सामने तन कर खड़ी हो गई थीं.

‘‘अब आप को पता लग ही गया है, तो अच्छा ही है. वैसे भी कुछ दिनों बाद मैं आप को बताने वाली थी. जोगिंदर अच्छा लड़का है, पढ़ालिखा है, अच्छा कमाता है. हमारी बिरादरी वालों की तरह आप को दहेज भी नहीं जुटाना पड़ेगा. उसे कुछ नहीं चाहिए.

‘‘वैसे भी शहर में उस की नौकरी लग गई है, हम शादी कर के वहीं चले जाएंगे. इस में आप की नाक कैसे कट गई?’’ आभा का बेबाक जवाब सुन कर सासबहू के सीने पर सांप लोटने लगे.

‘‘और अम्मां, साफ सुन लो, हम कोई गुलछर्रे उड़ाने कहीं नहीं जाते हैं. किस ने कह दिया तुम्हें कि हम गांव के बाहर कहीं जाते हैं. हम दोनों एकदूसरे को चाहते हैं, यह सच है,्र पर अभी मेरा सारा ध्यान पढ़ाई पर है.’’

‘‘बस बहुत हो गई तेरी पढ़ाई. आज से तेरा घर से निकलना बंद. तेरे बाऊजी का हुक्म है यह. और सुन ले, जल्दी ही अपनी बिरादरी के लड़के से हम तेरी शादी कर देंगे. उस जोगिंदर की बात भी मन से निकाल दे. तुम दोनों की शादी नहीं हो सकती,’’ लीला की आवाज में इस बार थोड़ी नरमी थी. वे चाहती थीं कि बात बिना बिगड़े सुलझ जाए. आभा ने खुद को कमरे में बंद कर लिया.

आभा का घर से निकलना बंद हो गया था. रमेश और महेश लगातार जोगिंदर को धमका रहे थे कि वह गांव छोड़ कर चला जाए.

बड़ी भाभी जब लीला से मिलने आईं, तो उन्होंने कहा कि पंडित ने उन्हें आभा के लिए अपनी बिरादरी का एक लड़का सुझाया है. ज्यादा पढ़ालिखा तो नहीं है, लेकिन बात फैले, उस से पहले उसी से आभा को बांध देना ठीक रहेगा.

अपनी बेटी को यों ही किसी के साथ ब्याह देने की बात हालांकि लीला को पसंद नहीं आई, पर जेठानी के सामने वे चुप ही रहीं.

आभा ने जिद पकड़ ली थी कि वह अगर शादी करेगी तो सिर्फ जोगिंदर से, वरना अपनी जान दे देगी.

जोगिंदर पर भी लगातार दबाव बढ़ रहा था और उस के परिवार वाले भी उसे समझा रहे थे कि वह यह बेवकूफी न करे, पर दोनों मानने को तैयार नहीं थे.

समाज की खोखली परंपराओं और धर्म के नाम पर फैलाए जाने वाले जातिवाद के दोनों ही पक्ष में नहीं थे.

2 दिन बाद एक खेत में दोनों की लाशें मिलीं. सब कह रहे थे कि उन्होंने आत्महत्या कर ली, पर आसपास कहीं सुसाइड नोट नहीं मिला था.

आभा के सिर पर गोली लगी थी और जोगिंदर की कनपटी पर. खबर सुनते ही बड़ी भाभी दौड़ी चली आईं.

‘‘लीला, वह पंडित कह रहा था कि जोगिंदर ने पहले आभा को गोली मारी और फिर अपनी जान ले ली. वे दोनों शायद भागने की तैयारी कर रहे थे, पर किसी ने उन्हें देख लिया था.’’

अपनी बेटी की मौत की खबर से दुखी लीला को समझ  नहीं आ रहा था कि वे अपने दुख में रोएं या घर की इज्जत बच जाने पर राहत की सांस लें. क्या हो जाता, अगर जोगिंदर से आभा की शादी की सब मंजूरी दे देते. वे जोरजोर से रोने लगीं.

लीला इस बात को कैसे किसी को बतातीं कि जिसे लोग आत्महत्या समझ रहे हैं, वह हकीकत में हत्या है. समाज में अपनी इज्जत बचाने और यह साबित करने के लिए हत्या की गई कि धर्म के साथ खिलवाड़ कभी नहीं हो सकता.

तभी बगल वाली रमा चाची उन के कंधे थपथपाते हुए बोलीं, ‘‘दुख न कर लीला, कल ही मैं ने एक चैनल पर सुना था कि बाबा अमृतानंदजी प्रवचन देते हुए कह रहे थे कि मृत्यु का क्या शोक मनाना. जो आया है, वह जाएगा भी.’’

लीला को लगा कि उन के भीतर की फांस की चुभन बढ़ती ही जा रही है.  Hindi Love Crime Story

Hindi Story : बदला धानी का

Hindi Story: 

‘चोली के पीछे क्या है

चोली के पीछे,

चुनरी के नीचे क्या है

चुनरी के नीचे…’

इस गाने पर जबरदस्त सैक्सी नाच चल रहा था. नाचने वाला अपने सीने को उचकाउचका कर कामुक इशारे कर रहा था और नाच देखने वाले लोग जैसे सिसकारियां भरे जा रहे थे.

कामुक नाच देख कर दर्शक ‘औरऔर’ की मांग किए जा रहे थे, पर आखिरकार गाना खत्म हो गया और नाचने वाला परदे के पीछे चला गया. दर्शक अब भी शोर किए जा रहे थे.

कमरे के अंदर पहुंच कर नाचने वाले ने अपना पसीना पोंछा और अपनी चोली को उतार दिया. उस ने चोली के अंदर एक ब्रा पहने हुई थी जिस में छोटे कपड़ों को गोल गेंद बना कर इस तरह पहना गया था जिस से सीने के उभार एकदम औरत के सीने की तरह दिखें और इसे पहन कर औरतों जैसा डांस किया जा सके. इसे पहनने वाला मीठा नाम का 24 साल का एक नौजवान था.

मीठा लौंडा डांस करने के लिए आसपास के गांव में थोड़ाबहुत फेमस था. वह जाति से तो दलित था, पर उस ने अपने पिता की तरह सफाई का काम नहीं किया, बल्कि कसबे की एक ड्रामा कंपनी वालों के साथ रह कर औरतों का वेश धरना सीखा और औरतों की तरह कमर मचका कर नाचना सीख लिया. अब आसपास के गांवों में जब भी कोई नाटकनौटंकी होता तो लौंडा डांस करने के लिए मीठा को बुलाया जाता.

मीठा के बदन में कमाल की लचक थी और वह औरतों की तरह ही हावभाव करता था. अभी 2 साल पहले ही उस की शादी हुई थी. उस की पत्नी धानी को मीठा का इस तरह औरतों की तरह नाचना अच्छा नहीं लगता था.

धानी कई बार मीठा से कोई और काम करने को कहती थी, मगर मीठा उस की बात सुन कर कह देता था कि काम तो काम है और यह काम तो उस की कला है. फिर इस के अलावा उसे कोई और काम आता भी तो नहीं है.

इसी गांव में धीमन सिंह नाम का 35 साल का दबंग आदमी रहता था. उस के  पुरखे गांव के जमींदार हुआ करते थे. समय बीतने के साथ जमींदारी तो चली गई, पर धीमन सिंह जैसे लोगों की हेकड़ी अब भी बाकी थी.

धीमन सिंह की पत्नी अल्पना एक सुंदर और सुशील औरत थी और अपने पति की हर पसंदनापसंद का खयाल रखती थी, पर फिर भी धीमन सिंह उस पर अपनी धौंस जमाया करता था और अपने पैर की जूती समझता था. इस का एक बड़ा कारण था अल्पना का मां न बन पाना. हालांकि इस का कारण धीमन सिंह ही था. उस के पास मर्दाना ताकत तो थी पर जरूरी स्पर्म काउंट नहीं था जो औलाद को जन्म देने के लिए चाहिए होता है. यह बात डाक्टरी रिपोर्ट में साबित भी हो चुकी थी. अल्पना विद्रोह न कर दे इसीलिए धीमन सिंह उसे अपने दंभ से दबा कर रखता था.

धीमन सिंह अपनी हवेली के आंगन में धूप खाने बैठता तो गांव के तमाम चाटुकार वहां आ जाते और तरहतरह के किस्सेकहानियों से धीमन सिंह का मनोरंजन किया करते.

उस दिन धीमन सिंह खुली जीप में अपने कुछ लोगों के साथ कसबे से वापस आ रहा था कि तभी मीठा अपनी पत्नी धानी को साइकिल पर बैठा कर  अस्पताल ले कर जा रहा था.

धीमन सिंह की नजर धानी की सांवली कमर और गहरी नाभि पर पड़ी, तो वह धानी की सुंदरता पर मोहित हो गया और उसे घूरता रह गया.

धीमन सिंह की मंशा देख कर उस का एक साथी कहने लगा, ‘‘ठाकुर साहब, यह मीठा है न, अरे वही जो लौंडिया बन कर नाचता है, उस की घरवाली मस्त आइटम है एकदम. उस के जिस्म का स्वाद तो आप ने चखा ही नहीं है अब तक, देखो तो कितनी तीखी है.’’

धानी को देख कर धीमन सिंह के मुंह में पानी और आंखों में हवस की चमक आ गई थी.

‘‘अरे नहीं, अब समय बदल गया है. अब तो दलित लोग और इन की औरतें बड़ी जागरूक हो गई हैं. इन को दबाना अब आसान नहीं रहा,’’ धीमन सिंह ने कहा तो उस के एक दूसरे चाटुकार ने कहा, ‘‘अरे ठाकुर साहब, आप भी वही करिए जो आप के पुरखे किया करते थे.’’

इस के बाद उस ने धीमन सिंह को समझाया कि मीठा अपनेआप को बड़ा कलाकार समझता है और अपनी नाच की कला को आगे ले जाने के लिए उसे पैसों की जरूरत है.

इतिहास गवाह है कि किसी जमींदार का कर्जा कोई दलित कभी चुका ही नहीं पाया है, इसलिए धीमन सिंह उसे अपने कर्जे के नीचे दबा दे और फिर धानी कब्जे में आ जाएगी.

धीमन सिंह की सम?ा में सारी बात आ गई थी और उसी प्लान के तहत मीठा को बुलावा भेजा और उस के लड़की बन कर नाचने की जम कर तारीफ की. फिर उस से कहा कि शहरों के थिएटर आदि में इस तरह के रोल निभाने वालों की खूब कद्र होती है, तो वह भी शहर में जा कर आगे बढ़ कर कुछ बड़ा क्यों नहीं करता, जिस से वह भी फेमस हो जाए.

‘‘अब मालिक, क्या बताएं कि शहर में जा कर डांस ग्रुप बनाने जैसा कुछ करने के लिए पैसों की जरूरत होती है और हम गरीबों के पास इतना पैसा कहां…’’

बस, यही वह समय था जब धीमन सिंह ने अपनी चाल चली और 10,000 रुपए का कर्जा देने की बात कही. मीठा खुश हो गया था, पर अपनी खुशी को दबाता हुआ बोला, ‘‘पर इतना सारा पैसा मैं चुकता कैसे कर पाऊंगा मालिक…’’ मीठा ने कहा.

धीमन सिंह ने बड़ा दिल दिखाते हुए कहा कि वह चिंता न करे, पर इस दरियादिली के पीछे धीमन सिंह की चालाकी समझ नहीं पाया मीठा.

मीठा को पैसे दे दिए गए और एक सादे कागज पर उस का दस्तखत ले लिया गया.

मीठा खुश हो कर घर आया तो धानी बुखार में तप रही थी. मीठा उसे दवा दिला कर गया था, पर वह उसे फायदा नहीं कर रही थी. वैसे भी धानी को अंगरेजी दवाओं पर भरोसा नहीं था. वह तो अपने बाबूजी के साथ बचपन से ही जंगलों में जाजा कर पेड़पौधों के रस से इलाज करना जानती थी, इसलिए मीठा के घर आते ही उस ने और दवा खाने से मना कर दिया और जंगली जड़ीबूटी से ही अपना इलाज कर लेने की बात कही.

मीठा ने धानी की बात पर ध्यान देना जरूरी नहीं सम?ा, क्योंकि उस के पास तो इस समय 10,000 रुपए थे और वह इन से अपनी नाचने की कला को आगे बढ़ाने के खयाल में खोया हुआ था. उस ने धानी की कोई खैरखबर नहीं ली.

अगले दिन ही मीठा पैसे ले कर पास के कसबे में फीनिक्स डांस ग्रुप वालों से मिलने जा रहा था. वह बस में बैठा था कि बस में न जाने कहां से 4-5 गुंडे आए, उसे मारापीटा और सारे रुपए छीन लिए.

मीठा बिलखता रहा पर किसी ने मदद नहीं की. मीठा को सम?ा ही नहीं आया था कि यह सब धीमन सिंह की चाल का ही एक हिस्सा था.

मीठा घर वापस आया तो धानी ने अपना बुखार छोड़ कर उस के घावों पर पत्तियों का लेप आदि लगाया. ठीक होने पर मीठा ने अपने साथ हुई मारपीट और पैसे छीने जाने की रिपोर्ट पुलिस में दर्ज कराई, पर कोई फायदा नहीं निकला.

एक महीना बीत चला था पर मीठा धीमन सिंह का पैसा वापस नहीं कर सका. इस बार धीमन सिंह ने कुछ नहीं कहा. धीरेधीरे जब 5 महीने बीत गए तब मीठा को तलब किया गया और पैसे मांगे गए तो मीठा गिड़गिड़ाने लगा, ‘‘थोड़ी मोहलत दे दें मालिक, आसपास के गांव में 2-4 प्रोग्राम मिले हैं. जम कर नाचूंगा तो ज्यादा पैसे आएंगे, फिर जल्द ही आप का कर्जा पूरा हो जाएगा.’’

धीमन सिंह ने बड़ा दिल दिखाते हुए ‘ठीक है’ कह तो दिया, पर मीठा नहीं जानता था कि इस के पीछे क्या चालाकी भरी हुई है.

मीठा सिर झुका कर धीमन सिंह की जयजयकार करते हुए वापस जा रहा था कि उसे किसी औरत की आवाज सुनाई दी.

धीमन सिंह की पत्नी अल्पना हवेली के पिछले दरवाजे पर खड़ी थी. मीठा सकुचाता हुआ सा अल्पना के पास पहुंचा.

‘‘सुना है तू बड़ा अच्छा नाचता है… मुझे  भी सिखा दे अपने जैसा नाचना,’’ फुसफुसाते हुए अल्पना ने कहा तो मीठा ने शरमाते और डरते हुए किसी ठाकुर जाति वाली औरत को नाच सिखाने से मना कर दिया.

इस पर अल्पना ने मीठा को हिम्मत बंधाई और कहा कि शाम को 5 बजे धीमन सिंह शहर जाने वाली सड़क पर दूर तक सैर के लिए जाते हैं. मीठा उसी समय पीछे के दरवाजे से आ कर उसे नाचना सिखा दिया करे.

इतना कहते हुए अल्पना ने मीठा की हथेली पर 500 रुपए पेशगी के तौर पर रख दिए.

मीठा इस छुअन से रोमांचित हो गया था, पर उस ने नजरें झुका लीं और वहां से चला गया.

शाम को मीठा जब दूसरे गांव में लड़की बन कर नाच रहा था, तब योजना के अनुसार धीमन सिंह उस के घर पर पहुंचा और दरवाजा खटखटाया पर धानी ने किसी अनहोनी के डर से दरवाजा नहीं खोला तो धीमन सिंह के गुरगों ने दरवाजे को जबरदस्ती तोड़ दिया.

नशा धीमन सिंह पर हावी हो रहा था. उस ने धानी को अपनी बांहों में भर लिया और उस के सांवले शरीर पर अपनी जबान फेरने लगा. धानी उस के चंगुल से छूट जाना चाहती थी, लेकिन बाहुपाश की मजबूती के चलते वह कुछ नहीं कर पा रही थी.

धानी की चोली फट चुकी थी और धीमन सिंह ने उसे खटिया पर पटक दिया. धानी की चीख सुन कर भी कोई बचाने नहीं आया था और धीमन सिंह ने धानी का सबकुछ लूट गया था.

एक कुटिल मुसकराहट थी धीमन सिंह के चेहरे पर. उस ने धानी को एक कागज दिखाते हुए कहा, ‘‘तेरे मर्द ने खुद है इस पर साइन किया है कि अगर हमारा कर्जा वह न दे सके तो हम तुम्हारी इज्जत लूट सकते हैं. हम ने गलत नहीं किया, हम ने तो अपना कर्जा वसूला है,’’ कहते हुए वह अपने गुरगों के साथ बाहर निकल गया.

अगली सुबह तकरीबन 8 बजे मीठा वापस लौटा तो धानी की हालत देख कर परेशान हो उठा. उसे अपने ऊपर अफसोस हो रहा था और वह धानी के गले लग कर रोने लगा.

‘‘अब हमारे पास खुदकुशी करने के अलावा और कोई रास्ता नहीं है,’’ मीठा कराह उठा था, पर धानी ने गुस्से में कहा, ‘‘खुदकुशी किसी समस्या का हल  नहीं है.’’

इस के बाद धानी उठी और कुछ देर बाद नहा कर वापस आई. उस की आंखों में लाचारी की जगह बदले की चिनगारी साफ झलक रही थी और उस के दिमाग में अंधड़ चल रहा था.

वह कब, क्या और कैसे अपना बदला लेगी यह बात सिर्फ धानी ही जानती थी.

समय बीतने के साथसाथ मीठा का नाचने का काम फिर से शुरू हो गया था. जीने के लिए कमाना जरूरी था और इस काम के अलावा उसे और कुछ करना भी तो नहीं आता था.

मीठा नाचता, पैसे कमाता और अपने इस काम के बीच उस ने धीमन सिंह की गैरहाजिरी में उस की हवेली पर चुपके से जाना भी जारी रखा.

अल्पना को नाच का शौक तो था ही, पर उस से ज्यादा उसे मीठा से बात करना अच्छा लगता था, क्योंकि उस हवेली में मीठा ही एकलौता मर्द था जिस से वह अपने मन का दुखदर्द कह सकती थी.

मीठा का सिर्फ सुन भर लेना अल्पना को बहुत भाता था. अपनी बातें बतातेबताते वह अकसर मीठा के करीब आ जाती तो मीठा असहज हो उठता. एक अजीब सी खुशबू आती थी अल्पना के पास आने से.

उस दिन की बात है मीठा अल्पना को नाचने के कुछ टिप्स बता रहा था कि बाहर अचानक बरसात शुरू हो गई और हवेली की बत्ती गुल हो गई. मीठा बिस्तर पर किनारे बैठ गया और अल्पना ने एक मोमबत्ती जला ली और इधरउधर की बात करने लगी.

मीठा सोच रहा था कि जल्दी से बारिश रुक जाए और वह यहां से चला जाए, पर अचानक से अल्पना ने मीठा की हथेली को पकड़ा और अपने सीने पर रख लिया और दबाव बढ़ाने लगी.

मीठा के लिए यह सब बहुत चौंकाने वाला था. अचानक से अल्पना ने फूंक मार कर मोमबत्ती बुझा दी और मीठा के पैरों के बीच बैठ गई.

अब मीठा नीचे था और अल्पना उस के ऊपर अपनी कामुकता को एक मुक्त आकाश देना चाहती थी.

अल्पना ने मीठा को चूमना जारी रखा था. बाहर बारिश थम चुकी थी और हवेली के अंदर अल्पना की हवस का तूफान भी शांत हो गया था.

इधर पिछले कुछ दिनों से धानी जड़ीबूटी और पत्तियों के साथ ज्यादा समय बिता रही थी. वह उन्हें साफ करती, उबालती, छानती और फिर मिट्टी के बरतनों में भर कर रखती थी. मीठा की कुछ समझ  में नही आता था कि वह क्या कर रही है, पर धानी को अच्छी तरह पता था कि उसे क्या करना है.

उस दिन मीठा को धीमन सिंह और उस के गुरगों ने रोक लिया और धमकाते हुए कहा, ‘‘तेरा लौंडा डांस बहुत हो गया अब. तू बता हमारे 10,000 कब वापस करेगा?’’

‘‘जल्द ही मालिक,’’ मीठा घिघिया उठा था.

इस के बाद धीमन सिंह ने मीठा को धमकी देते हुए कहा, ‘‘अगर तू पैसे नहीं दे सकता तो शाम को अपनी बीवी धानी को हवेली पर हमारा मन बहलाने के लिए भेज दे, नही तो हम उसे उठा कर ले जाएंगे और सब के सामने उसे नंगा कर के उस की इज्जत लूट लेंगे.’’

यह बात सुन कर मीठा कांप उठा था. वह तुरंत घर गया और उस ने यह बात धानी बताई, तो धानी घबराने के बजाय मुसकरा उठी थी. मीठा अवाक रह गया था उस के मुसकराने पर, लेकिन कुछ समझ नहीं पाया था.

‘‘शाम को मैं अकेली नहीं, बल्कि हम दोनों धीमन सिंह के घर पर जाएंगे… बस मुझे थोड़ी सी तैयारी कर लेने दो,’’

यह कह कर धानी कमरे के कोने में रखी हुई कुछ जड़ीबूटियां पीस कर उन का रस निचोड़ने में बिजी हो गई थी. उस के चेहरे पर बदले की भावना साफ नजर आ रही थी और आंखों में एक तीखी सी चमक भी दिखाई दे रही थी.

शाम को मीठा और धानी दोनों ही धीमन सिंह की हवेली पर पहुंच गए थे. उस समय वह अपने गुरगों के साथ अपने कमरे में बैठा हुआ था.

धानी को देख कर उस के मुंह में पानी आ गया था. उस की नजर धानी के बड़े उभारों और गहरी नाभि पर टिक गई थी.

‘‘वैसे तो हम ने आज धानी को नचाने के लिए बुलाया था, पर कुछ बदलाव करते हैं. आज मीठा अपना नाच दिखाएगा और धानी हमारी गोद में बैठ कर हमें शराब के जाम पिलाएगी,’’ धीमन सिंह ने घमंड में भर कर कहा तो धानी मन ही मन खुश हो गई. उस ने सोचा कि आज तो शिकार खुद ही जाल में फंस गया.

धानी ने मीठा को नाचने के लिए मानसिक रूप से पहले से ही तैयार कर रखा था, इसलिए वह नाचने की तैयारी करने लगा और धीमन सिंह जमीन पर बिछे मोठे गद्दे पर टांगें पसार कर बैठ गया था और धानी उस के करीब ही बैठ गई.

धानी के साथ एक छोटी मटकी भी थी. धीमन सिंह ने धानी से उस मटकी के बारे में पूछा तो धानी ने मदहोश अंदाज में उसे बताया कि यह मर्दाना जोश बढ़ाने वाली दवा है.

‘‘अब क्या करूं सरकार, इस मीठे में जोश जगाने के लिए इन दवाओं का सहारा लेना ही पड़ता है,’’ धानी ने कहा तो धीमन मन ही मन कुछ सोच कर मुसकरा उठा.

इतने में मीठा ने गाना बजा दिया था और वह गाने की ताल पर थिरकने लगा था, ‘मार दिया जाए या छोड़ दिया जाए, बोल तेरे साथ क्या सुलूक किया जाए…’

कुछ देर बाद मजा सा नहीं आया तो मीठा ने इस गाने को बदल कर थोड़ा भड़काऊ गाना बजा दिया, ‘महबूबा ओ महबूबा… गुलशन में गुल खिलते हैं जब सेहरा में मिलते हैं मैं और तू ऊ ऊ ऊ…’

मीठा कमर मचका कर नाच रहा था और धीमन सिंह शराब पीने लगा था. उस ने अपना हाथ धानी की सांवली कमर के चारों ओर डाल दिया था.

धानी को लगा कि अब सही समय है इसलिए उस ने मटकी में लाया हुआ पेय धीमन सिंह के गिलास में डाला और उस में शराब मिला कर उसे पिला दिया.

धीमन सिंह उसे गटगट पी गया.

उस के गुरगे भी नशे में चूर हो कर गिर चुके थे.

कुछ देर के बाद धीमन सिंह ने महसूस किया कि धीरेधीरे उस की कमर के नीचे का हिस्सा सुन्न पड़ रहा है. उस ने धानी की तरफ देखा जिस के चेहरे पर हलकी सी मुसकराहट तैर रही थी.

कुछ देर बाद ही धीमन सिंह की कमर के नीचे का हिस्सा पूरी तरह से लकवाग्रस्त हो चुका था. अब वह सबकुछ देख तो सकता था, पर चलनेफिरने में नाकाम हो चुका था. बचपन में अपने बाबूजी से सीखे हुए प्राकृतिक नुसखों और जड़ीबूटी आदि को मिला कर धानी ने यह काढ़ा बना कर धीमन सिंह को पिला कर उसे लकवाग्रस्त कर दिया था.

धीमन सिंह का बहुत उपचार चला, पर वह कभी ठीक नही हो सका. अब वह अपने कमरे में बिस्तर पर अकेले पड़ा रहता है. अल्पना ने उस की देखभाल के लिए एक कंपाउंडर रख दिया है. धीमन सिंह ने जो बोया था, वह अब वही काट रहा है.

धानी के बदले में अल्पना के साथ थोड़ी ज्यादती तो जरूर हो गई थी, पर क्या किया जाए, क्योंकि गेहूं के साथ घुन तो पिसता ही है. तकरीबन 5 महीने बीत जाने के बाद अल्पना ने एक बेटी को जन्म दिया और उस का नाम रखा ‘मीठी’.

अब सबकुछ साफ था कि इस लड़की का पिता धीमन सिंह नहीं, बल्कि मीठा था. वह मीठा, जिसे लोग साधारण सा नाचने वाला समझते थे, अब शान के साथ हवेली में आताजाता है और कभीकभी रातरात अल्पना के साथ ही सोता है.

मीठा अल्पना का हर तरीके से खयाल रखता है और धानी भी अल्पना से मिलने जाती रहती है और तब वह धीमन सिंह के पास जा कर उसे अपना सांवला नंगा पेट और गहरी नाभि दिखा कर तड़पाना नही भूलती.

धीमन सिंह धानी की सांवली कमर और गहरी नाभि देख कर तड़प तो सकता था, पर कुछ कर नहीं सकता था. यही था धानी का बदला.

Hindi Story : जिस्म के सौदागर

Hindi Story. इंटर में पढ़ने वाली प्रिया तो खूबसूरत थी ही, उस की 35 साल मां चंपा भी कम खूबसूरत नहीं थी. वैसे, प्रिया अपने बाप की औलादों में खुद और एक उस का 8 साल का छोटा भाई था.

प्रिया के पिता रामेश्वर के पास खेतीबारी तो कोई खास नहीं थी, पर प्राइवेट नौकरी करने की वजह से घर में किसी चीज की कमी नहीं थी.

रामेश्वर तनख्वाह के पैसे में से ही घर खर्च के लिए भी भेजा करता था और बैंक में जमा भी करता था. वह जानता था कि अगर पैसे नहीं बचाएंगे, तो प्रिया की शादी कैसे कर सकेंगे? उस की शादी में भी तो 5-7 लाख रुपए लग ही जाएंगे.

रामेश्वर के बाहर रहने की वजह से घर पर बेटे और बेटी के साथ चंपा को अकेले रहना पड़ता था. बाजार के लिए भी चंपा को ही जाना पड़ता था, जबकि उस का गांव राज्य के आला मंत्री का गांव था, इसलिए गांव में बिजली, सड़क वगैरह जैसी सुविधाएं शहरों से कम नहीं थीं.

किसी चीज की कमी तो थी नहीं, इसलिए चंपा भी हमेशा शहरी औरतों की तरह ही दिखती थी. उस के बच्चे भी गांव के अच्छे घरानों के बच्चों से कम अच्छे नहीं दिखते थे.

पति से दूर रहने की वजह से गांव के कई जिस्म के सौदागर चंपा पर गिद्ध की नजर लगाए रहते थे. बगल के ही एक नौजवान राकेश को चंपा के यहां आनेजाने से वैसे नौजवान जलतेभुनते भी रहते थे.

लोगों को लगता था कि राकेश रामेश्वर के न होने का नाजायज फायदा जरूर उठाता होगा और तभी चंपा दूसरों के जाल में नहीं फंस रही है. चंपा भी उन लोगों की नीयत को अच्छी तरह समझने लगी थी, इसलिए वह हमेशा सावधान ही रहा करती थी.

पिछले कोरोना काल में जब कंपनी बंद हो गई, तो एकाध महीने तो रामेश्वर गुजरात में जैसेतैसे रहा था, पर जैसे ही सुविधाओं की कमी होने लगी, वैसे ही वह जैसेतैसे घर आ गया था.

रामेश्वर घर तो जरूर आ गया था, पर कोरोना का शिकार हो गया था और अस्पताल ले जाने के समय में ही उस की मौत हो गई थी.

अब तो चंपा पर दुख का पहाड़ टूट पड़ा था. पर करती भी तो क्या? तनाव में ही किसी तरह जिंदगी बसर करती जा रही थी. बच्चों के भविष्य की चिंता सताती जा रही थी, जिस की वजह से वह हाई ब्लडप्रैशर और दिल की बीमारी का शिकार हो गई थी, जबकि डाक्टरों ने बताया भी था कि अगर आप चिंता छोड़ दें, तो इन बीमारियों से आप को काफी राहत मिल सकती है.

इधर गांव के मनचले नौजवानों को लगने लगा था कि अब तो चंपा घर की समस्याओं से जूझती चली जाएगी. कटी हुई घास आखिर कितने दिनों तक काम आएगी, इसलिए जाल में यकीनन फंस सकती है.

तब तक प्रिया भी जवानी की दहलीज पर पहुंच चुकी थी. वह भी अपनी मां के जैसी ही थी. वैसे लोगों की नजरें कभी मां से गिरतीं, तो बेटी पर अटक जातीं और बेटी से गिरतीं, तो मां पर अटक जातीं, पर कभी दाल गल नहीं पाती थी, जिस की वजह से उन लोगों को काफी चिढ़ भी होती थी.

अगले साल जब फिर कोरोना की दूसरी लहर आई, तो चंपा उस से बच नहीं सकी, क्योंकि दोनों बच्चों को बुखार आया, तो छूटने का नाम ही नहीं ले रहा था, जिस की वजह से चंपा को बारबार कभी डाक्टर, तो कभी कैमिस्ट की दौड़ लगानी पड़ रही थी. उसे बस यही लग रहा था कि किसी तरह दोनों बच्चे ठीक हो जाएं.

वही हुआ भी. बच्चे तो ठीक हो गए, पर चंपा की तबीयत बिगड़ गई. कुछ दिनों तक तो घर पर ही दवा खाती रही, पर बुखार में सुधार नहीं हुआ. उसे देखने एक दिन गांव का मृत्युंजय नामक नौजवान आया और बोला, ‘‘आप लोगों ने नहीं कहा, गांवघर का होने के नाते हम लोगों का भी तो कुछ फर्ज होता है. आखिर गांवघर का आदमी होता है किसलिए? इन्हें ले चलिए. पटना के एक अच्छे अस्पताल में मेरी जानपहचान के कई लोग हैं.

‘‘अच्छा अस्पताल होने की वजह से वहां का चार्ज तो बहुत ज्यादा है, पर मैं चलूंगा तो काफी कम पैसे में इलाज हो जाएगा.’’

ऐसे हालात में चंपा की भी मजबूरी हो गई. भला जान किसे प्यारी नहीं होती, लिहाजा उस नौजवान के साथ चंपा चल दी, तो प्रिया भी साथ हो ली.

मृत्युंजय ने चंपा को अस्पताल में भरती करवा दिया. वह भी वहीं रहने लगा, जबकि प्रिया को कहा गया कि यहां मरीज की देखभाल अस्पताल वाले ही करते हैं, इसलिए आप को वार्ड के बाहर ही रहना पड़ेगा. हां, 24 घंटे में एक बार थोड़ी देर के लिए मिल सकती हो.

प्रिया अस्पताल के बाहर रह रही थी, पर रोज सुबह अपनी मां से मिलने जाती थी. चंपा की हालत में थोड़ा सुधार भी होता जा रहा था.

प्रिया को लगा कि 2-3 दिनों के अंदर ही अस्पताल से छुट्टी हो जाएगी, पर दूसरे दिन जब प्रिया मिलने गई तो देखा कि मां के हाथपैर रस्सी से बंधे हुए थे.

चंपा ने बताया, ‘मेरे साथ 5 लोगों ने बारीबारी से जबरदस्ती की है…’’

प्रिया ने अपनी मां के बयान का वीडियो बना कर सोशल मीडिया पर वायरल कर दिया. अस्पताल वाले सफाई देते रहे कि चंपा की दिमागी हालत अच्छी नहीं थी, इसलिए हाथपैर बांधे गए थे.

चंपा ने प्रिया से कहा, ‘‘बेटी, इस अस्पताल से बाहर निकालो, वरना ये भेडि़ए मुझे नोच खाएंगे. यहां तो जिस्म के सौदागर भरे पड़े हैं.’’

प्रिया ने अपनी मां को दूसरे अस्पताल में ले जाने के लिए कहा, तो अस्पताल वालों ने जो बिल बताया, जिसे  सुन कर उस के पैरों तले से जमीन ही खिसक गई. उस ने मृत्युंजय को फोन लगाया.

मृत्युंजय ने कहा, ‘‘मैं घर आ गया हूं. मेरे जीजाजी की तबीयत काफी खराब है, इसलिए मैं दिल्ली जा रहा हूं…’’ और फोन काट दिया.

प्रिया को समझ में नहीं आ रहा था कि अब वह क्या करे. उस रात प्रिया को नींद भी नहीं आई, पर रातभर जागने की वजह से भोर में नींद आ गई थी.

सुबहसुबह अस्पताल से फोन आया कि चंपा की हालत ज्यादा बिगड़ गई थी, इसलिए उसे बचाया नहीं जा सका.

प्रिया की आंखों के आगे अंधेरा छा गया. वह किसी तरह अपनी मां के बिस्तर के पास पहुंची. जब वह जोरजोर से रोने लगी, तो अस्पताल वालों ने रोने से मना कर दिया.

वैसे तो अस्पताल में मरे मरीज को उस के परिवार वाले के सुपुर्द कर दिया जाता था, पर चंपा की लाश को पहले से ही बाहर खड़ी एंबुलैंस में डाला गया. उस में प्रिया को बैठाया गया. पीछेपीछे पुलिस की गाड़ी थी.

लाश को श्मशान घाट पहुंचाया गया और झटपट दाह संस्कार करवा दिया गया, ताकि प्रिया के पास कोई सुबूत न बचने पाए.      Hindi Story

लेखक : अलखदेव प्रसाद ‘अचल’        

Hindi Story: काम हो गया

‘‘रे, निर्मला सुन तो सही…’’ ठेकेदार रतन सिंह जैसे ही गाड़ी बाहर खड़ी कर अपने ड्राइंगरूम में आए, तब उन के चेहरे पर अपार खुशियां छाई थीं.
निर्मला सिंह ड्राइंगरूम में कर बोली, ‘‘हां, रतनजी, क्या कहना चाहते हैं? आज आप के चेहरे पर इतनी खुशियां क्यों झलक रही हैं?’’
‘‘अरे निर्मला, मुझे 65 करोड़,
40 लाख रुपए का सरकारी ठेका मिल गया है.’’
‘‘सचमुच रतनजी, यह तो मेरे लिए भी खुशी की बात है. बहुत शुक्रिया रतनजी.’’
‘‘अरे, शुक्रिया तो उस औरत का करो निर्मलाहमारी मेहरी कमला ने उस औरत को सरकारी अफसर के यहां एक रात के लिए भेजा था. क्या नाम था उस कामीनाक्षी. उसी की वजह से मुझे यह ठेका मिला है.’’
‘‘आप की बहुत इच्छा थी यह ठेका पाने की. आप को यह ठेका मिल भी गया,’’ निर्मला सिंह ने यह बात कही और फिर वह अपने काम में लग गई. मगर उस का मन काम में कहां लगा. उस का मन तो पुरानी यादों में खो गया.

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निर्मला सिंह के पति रतन सिंह ठेकेदार थे. वे सरकारी या गैरसरकारी दोनों तरह के ठेके लेते थे, फिर चाहे मकान बनाना हो चाहे पुल बनाना हो. वे शहर के नामी ठेकेदार थे. कमला उन के यहां मेहरी का काम करती थी. 30 साल की खूबसूरत जवान औरत कमला अपना काम ईमानदारी से करती थी. उसे अभी काम पर आए 2 महीने भी नहीं हुए थे, मगर बंगले की झाड़ूबुहारी, बरतन मांजना और पोंछा लगाना वही करती थी. उस के काम से निर्मला सिंह खुश थी. उस दिन जब कमला पोंछा लगा रही थी, तब ठेकेदार रतन सिंह सोफे पर बैठे हुए थे. उन कोनमस्तेकर के अपना पेटीकोट घुटनों तक चढ़ा कर कमला फर्श पर पोंछा लगाने लगी. तब रतन सिंह कनखियों से उस की गोरी पिंडलियों को बारबार देख रहे थे. मगर कमला भी बेफ्रिक हो कर पोंछा लगा रही थी.

थोड़ी देर बाद रतन सिंह बोले, ‘‘कमला, मेरे पास आना.’’
‘‘जी साहब, आती हूं,’’ कमला पोंछा वहीं रख कर रतन सिंह के पास कर बोली, ‘‘हां साहब, कहिए.’’
‘‘मेरा एक काम करोगी, उस का अलग से पैसा दूंगा. करोगी?’’
‘‘कौन सा काम है साहब?’’
‘‘काम तो खास है, पर तुम कर सकती हो,’’ जब रतन सिंह ने यह कहा, तब कमला सोच में पड़ गई. फिर वह बोली, ‘‘ऐसा कौन सा काम है, जो मैं कर सकती हूं. पहले आप काम तो बताइए साहब?’’
‘‘बस, एक अफसर के यहां एक रात गुजारनी है. इतना सा काम है. क्या कर सकोगी? उस सरकारी अफसर ने इसलिए काम अटका भी रखा है,’’ जब रतन सिंह ने यह बात कही, तब भीतर से कमला आगबबूला हो उठी, मगर उस गुस्से को बाहर नहीं आने दिया. कमला नाराज हो कर बोली, ‘‘मैं बिकाऊं औरत नहीं हूं साहब. मैं गरीब और लाचार जरूर हूं, मगर मेरी भी इज्जत है,’’ कमला अभी यह बात कह रही थी कि तभी रतन सिंह का फोन गया. वे फोन सुनने बाहर चले गए.

इसी बीच आड़ में रह कर निर्मला रतन सिंह और कमला की सारी बातें
सुन रही थी. वह बोली, ‘‘कमला, मैं
ने साहब की और तेरी सारी बातें सुन ली हैं.’’
‘‘देखो मेमसाहब, साहब मुझ से घिनौना काम करवाना चाहते हैं. हम गरीबों की इज्जत जैसे सस्ती है. जब चाहे खरीद लेंगे, ये पैसे वाले,’’ नाराजगी से कमला ने यह बात कही.
निर्मला सिंह बोली, ‘‘गुस्सा मत कर कमला. तू मत जाना. मगर मेरी निगाह में एक औरत है. तू साहब से उसे भेजने का कहना. इतना तो कर सकती है ?’’
‘‘मगर वह औरत कौन है मेमसाहब? साहब पूछेंगे उस औरत का नामपता,’’ कमला ने पूछा.
‘‘हां, उस औरत का नाम मीनाक्षी कहना. साहब से आज ही पता और समय ले लेना, बाकी की बात मैं मीनाक्षी को सब समझा दूंगी. समझी
‘‘और सुन, साहब अभी फोन पर बात करने बाहर गए हैं. वे जैसे भीतर आएंगे, मैं आड़ में रह कर सारी बातें सुन लूंगी.’’

तभी रतन सिंह ड्राइंगरूम में आए. कमला उन्हें देख कर बोली, ‘‘साहब, आप काम हो जाएगा.’’
‘‘सच कमला, तुम ने जाने के लिए अपनेआप को तैयार कर लिया?,’’ खुश हो कर रतन सिंह बोले.
‘‘साहब, आप जैसे फोन सुनने बाहर गए, तब मेरे मन में एक बात आई. मेरी एक सहेली है मीनाक्षी, वह यह काम भी करती है. पर उस ने यह कहा…’’
‘‘क्या कहा?’’ बीच में बात काट कर रतन सिंह ने पूछा.
‘‘मैं ने उस से फोन पर बात की. वह जाने को तैयार हो गई है, पर कब और किस समय जाना है? वह खुद ही आप के बताए गए पते पर पहुंच जाएगी?’’
‘‘ठीक है, मैं सरकारी अफसर को आज का ही समय देता हूं. वैसे भी मुझे रात को गांव जाना है. वहां कारीगर और मजदूरों के बीच कोई झगड़ा हो गया है और स्कूल भवन बनाने का काम रुक गया है,’’ कह कर रतन सिंह ने सरकारी अफसर को फोन लगाया और मीनाक्षी के बारे में बताया.
इस के बाद निर्मला सिंह खुद मीनाक्षी बन कर साहब के बताए समय और जगह पर पहुंच गई. साहब
विदेशी शराब पी रहे थे. चौकीदार ने अंदर जाने दिया.

जाते ही निर्मला सिंह बोली, ‘‘मैं मीनाक्षी हूं साहब, ठेकेदार रतन सिंह ने मुझे भेजा है.’’
‘‘आओ मीनाक्षी, मैं तुम्हारा ही इंतजार कर रहा था. आओ, बैठो मेरे पास,’’ सरकारी अफसर ने नशे में झूमते हुए मीनाक्षी को खींच कर अपने पास बैठा लिया.
तब मीनाक्षी बोली, ‘‘साहब, आप ठेकेदार रतनजी को यह ठेका दे
देंगे ?’’
‘‘कागज तो तमाम उन के नाम के पड़े हैं, बस इंतजार तो था तुम्हारा ही. सारे कागज सुबह ले जाना,’’ सरकारी अफसर ने जब यह कहा, तब मीनाक्षी बोली, ‘‘नहीं साहब, कागज तो आप रतनजी साहब को ही देना. मैं क्या करूंगी?’’
‘‘ठीक है, उन्हीं को देंगे,’’ कह कर सरकारी अफसर ने एक जाम और हलक में गटक लिया.
‘‘निर्मला, निर्मला,’’ जब रतन सिंह ने कर कहा, तब वह यादों से आज में लौट आई और बोली, ‘‘हां, रतनजी, बोलिए?’’
‘‘किस सोच में डूबी हुई थी?
अरे, वह कमला आई क्या?’’ रतन सिंह ने पूछा.


‘‘अरे, अभी तो नहीं आई,’’ निर्मला सिंह ने जवाब दिया.
तभी वहां कमला गई. तब निर्मला सिंह बोली, ‘‘लो, कमला का नाम लिया और वह हाजिर हो गई. बड़ी लंबी उम्र है कमला तेरी. अभी तुझे ही याद किया था.’’
‘‘मेमसाहब, मुझे क्यों याद किया?’’ कमला ने पूछा.
‘‘अरे कमला, उस मीनाक्षी को शुक्रिया कहना. उस की वजह से
मुझे यह ठेका मिला है,’’ रतन सिंह ने जब यह कहा, तब कमला बोली, ‘‘कह दूंगी साहब.’’
‘‘अरे, उसे बुला कर लाना, मैं
देखूं तो सही कौन है मीनाक्षी?’’ रतन सिंह बोले.
‘‘साहब, उस ने आप से मिलने से मना कर दिया है. जब आप का काम हो गया, तब क्या मिलना?’’
‘‘ठीक है कमला. वह नहीं मिलना चाहती है, तब कोई बात नहीं. बस, अपना काम हो गया,’’ कह कर रतन सिंह बाथरूम में चले गए.
कमला रसोईघर में जा घुसी. इधर निर्मला मंदमंद मुसकरा रही थी

Hindi Story: शेरनी की दहाड़

सुनीता के सपनों की उड़ान उस के गांव की पगडंडियों से शुरू हो कर शहर की यूनिवर्सिटी तक जा पहुंची थी. ऊंची कदकाठी, दोहरा बदन और आंखों में आत्मविश्वास की चमक. वह सिर्फ खूबसूरत और सुशील ही नहीं, बल्कि फौलादी इरादों वाली लड़की थी. जब वह अपनी मोटरसाइकिल पर सवार हो कर निकलती, तो उस की सख्त शख्सीयत और स्वाभिमान देखने लायक होता. सुनीता के मामा शहर के नामी वकील थे. वही उस के आदर्श थे. वह भी उन्हीं की तरह काला कोट पहन कर गरीबों को इंसाफ दिलाने का सपना देखती थी. कानून की पढ़ाई के साथसाथ वह यह भी जानती थी कि इंसाफ की पहली सीढ़ी बेखौफ और नाइंसाफी के खिलाफ खड़ा होना है.

लेकिन उस शहर की चमक के पीछे अपराध का अंधेरा भी था. जिस इलाके में सुनीता रहती थी, वहां राजा नाम के एक बदमाश का खौफ था. राजा और उस के साथी आएदिन राहगीरों को लूटते और लड़कियों के साथ बदतमीजी करते थे. राजा अकसर सुनीता को दूर से घूरता था, पर उस की आंखों की तेज चमक और कड़क स्वभाव को देख कर वह सामने आने की हिम्मत नहीं जुटा पाता था. उसे सुनीता के कड़क स्वभाव से डर लगता था. शांति तब भंग हुई, जब सुनीता को पता चला कि पड़ोस की मासूम दिव्या ने स्कूल जाना छोड़ दिया है. कई दिनों से वह खामोश और डरी हुई थी. दिव्या को राजा ने बीच सड़क पर रोक कर उस के साथ बदतमीजी की थी.

दिव्या के मातापिता डर के मारे पुलिस के पास जाने की हिम्मत भी नहीं जुटा पा रहे थे. उन का खामोश डर और दिव्या की सिसकियां सुनीता के कानों में गूंज उठीं. उसे लगा कि अगर आज वह चुप रही तो उस की पढ़ाई लिखाई, उस की हिम्मत और वकालत का उस का सपना, सब बेकार है. उस के खून में उबाल गया. अगले दिन सूरज की तपिश के बीच सुनीता ने अपनी चमचमाती बाइक सीधे उस चौराहे पर रोकी, जहां राजा अपने चमचों के साथ बैठा था. इंजन बंद हुआ, चारों तरफ सन्नाटा छा गया. सुनीता ने धीमे से हैलमैट उतारा, उस के खुले बाल हवा में लहराए और उस की तीखी नजरों ने सीधे राजा को भेदा. ‘‘भाई, जरा यहां तो आना,’’ सुनीता की आवाज गूंजी, जिस में चेतावनी और शालीनता दोनों थे.

राजा अपनी अकड़ में साथियों के साथ बाइक के पास पहुंचा. उसे लगा, शायद कोई मदद मांग रही है, पर सुनीता की आंखों में अंगारे थेसुनीता ने बिना डरे, सीधे राजा की आंखों में ?ांकते हुए कहा, ‘‘तुम्हारी हरकतें हदें पार कर रही हैं राजा. अपनी ताकत निहत्थों पर आजमाना बंद करो. बेहतर होगा कि आज के बाद तुम यहां किसी लड़की की तरफ आंख उठा कर भी देखो, वरना याद रखनाकानून की पढ़ाई बाद में काम आएगी, मेरा हाथ पहले चलेगा.’’ सुनीता की आवाज में ऐसी दहाड़ और आत्मविश्वास था कि राजा के पैर कांपने लगे. उस ने हड़बड़ाते हुए कहा, ‘‘मैं नेमैं ने क्या किया?’’ सुनीता ने कड़क कर जवाब दिया, ‘‘वही, जो एक बुजदिल करता है. तुम्हें शर्म नहीं आती बहनबेटियों को छेड़ते हुए? मैं ने तुम्हेंभाईकह कर पुकारा है, इस शब्द की लाज रख लो, वरना अंजाम भुगतने के लिए तैयार रहना.’’

वह दबंग राजा, जिस से पूरा महल्ला थरथर कांपता था, सुनीता के सामने बौना पड़ गया. उस ने हाथ जोड़ लिए और वहां से चला गया. वह डर सिर्फ पुलिस का नहीं था, वह एक स्वाभिमानी लड़की के तेज का डर था. कुछ ही दिनों में बदलाव साफ दिखने लगा. सुनीता ने केवल उसे सुधारा, बल्कि उसे उस की रुकी हुई पढ़ाई दोबारा शुरू करने के लिए भी बढ़ावा दिया, ‘‘कुछ बन कर दिखाओ. मातापिता का मान बढ़ाओ. यह जिंदगी घरपरिवार, समाज और देश का मान बढ़ाने के लिए मिली है.’’ ‘‘सम? गया दीदी,’’ राजा ने हाथ जोड़ कर कहा. राजा के बदमाश साथी, जो कल तक लड़कियों को छेड़ते थे, भी सुनीता कोदीदीकह कर सम्मान देने लगे थे. कालोनी के लोगों ने राहत की सांस ली. वे अब सुनीता कोशेरनीकहने लगे थे. सुनीता ने साबित कर दिया कि आत्मविश्वास और हिम्मत ही एक महिला का सब से बड़ा गहना और सब से ताकतवर हथियार है.         

पप्पू यादव के दावे पर बवाल   
बिहार में पूर्णिया से सांसद पप्पू यादव ने दावा किया है कि भारतीय जनता पार्टी सीमांचल और पश्चिम बंगाल के कुछ जिलों को मिला कर केंद्रशासित प्रदेश बनाने की साजिश रच रही है. इस योजना के तहत पहले पश्चिम बंगाल में राष्ट्रपति शासन लागू कराया जा सकता है. इस के बाद बिहार विधानसभा से एक प्रस्ताव पास करवाने की कोशिश की जाएगी. इस पूरे प्रोसैस के बाद सीमांचल क्षेत्र के साथ पश्चिम बंगाल के मालदा, मुर्शिदाबाद, रायगंज और दिनाजपुर जैसे कुछ जिलों को जोड़ कर एक नया केंद्रशासित प्रदेश बनाया जा सकता है, जबकि केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने साफ शब्दों में कहा कि ये दावे तथ्यों के बिलकुल उलट हैं और इन में रत्तीभर भी सच्चाई नहीं है.   

Anjali Pawan Controversy: पवन सिंह को अंजलि से छेड़छाड़ मामले में राहत

Anjali Pawan Controversy: भोजपुरी स्टार पवन सिंह पर छेड़खानी का आरोप लगाने वाली हरियाणवी अभिनेत्री अंजली राघव हरियाणा महिला आयोग के सामने पेश हुईं. लेकिन पवन सिंह नदारत रहे. इस मामले की सुनवाई आयोग की अध्यक्ष रेनू भाटिया की अध्यक्षता में हुई. सुनवाई के दौरान अंजली राघव ने अपने पहले लगाए गए आरोपों को लेकर आयोग को बताया कि लखनऊ में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान पवन सिंह ने उनके साथ अनुचित व्यवहार किया. जब विवाद बढ़ा तो पवन सिंह ने इंस्टाग्राम स्टोरी के जरिए उनसे सार्वजनिक रूप से माफी मांगी थी. इसके बाद उन्होंने पवन सिंह को माफ कर दिया है.

अंजली राघव ने आयोग के सामने कहा कि उनकी शिकायत पवन सिंह के खिलाफ नहीं है, बल्कि उनकी शिकायत उन 2‑3 लोगों को लेकर थी जिन्होंने उनके आपत्तिजनक वीडियो बनाए और उसे वायरल किया. वीडियो वायरल करने वाले लोगों ने उनकी निजी तस्वीरें और मोबाइल नंबर आपत्तिजनक वेबसाइट्स पर अपलोड कर उनकी छवि को जानबूझकर खराब करने की कोशिश की.

इस पूरे मामले में पवन सिंह को बड़ी राहत मिली है. हरियाणा राज्य महिला आयोग ने आधिकारिक रूप से पवन सिंह का नाम इस केस से हटा दिया है. आयोग की चेयरपर्सन रेनू भाटिया ने बताया कि पवन सिंह द्वारा माफी मांगे जाने और अंजली के स्वीकार किए जाने के बाद उनके खिलाफ चल रही कार्रवाई बंद कर दी गई है.

पवन सिंह को राहत देते हुए महिला आयोग की अध्यक्ष रेणु भाटिया ने कहा कि जो लोग सोशल मीडिया पर अंजली राघव के खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणियां कर रहे थे या वीडियो वायरल कर रहे थे, उनके नाम मामले में शामिल किए जाएं और उनके खिलाफ कार्रवाई की जाए. महिला आयोग ने इस मामले की अगली सुनवाई 6 अप्रैल को पंचकूला में तय की है. आयोग ने निर्देश दिए हैं कि जिन-जिन लोगों के नाम इस मामले में दर्ज किए गए हैं, उन्हें अगली सुनवाई में आयोग के सामने पेश होना होगा.

Politics: आईना-मुफ्तखोरी से चुनाव जीतने की चाल

सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली कमेटी ने राजनीतिक दलों के द्वारा चुनावों के समय मुफ्त की घोषणाओं पर चिंता जाहिर की. इस से पहले जस्टिस एनवी रमन्ना ने भी अगस्त, 2022 में राजनीतिक दलों के द्वारा मुफ्त की घोषणाओं पर सवाल खड़ा किया था.

राजनीतिक दल सत्ता में बने रहने के लिए या सत्ता में वापसी के लिए लोकलुभावनी घोषणाएं करते हैं, जो खुलेतौर पर लालच होता है. चुनावों की इन घोषणाओं से मुफ्तखोरी की सोच को खूब बढ़ावा मिला है.
यह शुरुआत साल 1987 के हरियाणा विधानसभा चुनावों के समय से हुई थी. तब चौधरी देवीलाल ने वादा किया था कि अगर वे मुख्यमंत्री बनेंगे तो किसानों का कर्जा माफ कर देंगे और उस समय चौधरी देवीलाल की पार्टी को हरियाणा में भारी बहुमत मिला था और किसानों का कर्जा माफ हुआ था. तब से राजनीतिक दलों ने किसानों की कर्जमाफी को अपनी चुनावी जीत का अमोघ अस्त्र बना लिया. पिछले 10 साल से तो मुफ्त चुनावी घोषणाओं की बाढ़ सी गई है.

जब राजनीतिक दल और नेता मुफ्तखोरी की लालच वाली घोषणा करते हैं तो उन्हें खुद नहीं पता होता है कि मुफ्त घोषणाओं से होने वाले पैसे के नुकसान का कौन जवाबदेह होगा. मुफ्तखोरी को बढ़ावा देने के मामले में राजनीतिक दल और नेता बेलगाम घोड़े की तरह हो गए हैं. मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे शिवराज सिंह चौहान ने मुफ्तखोरी के लालच की इतनी घोषणाएं की थीं कि उन्हें खुद पता नहीं है कि कौन सी घोषणा कब कहां की गई, जिस में लाड़ली बहना योजना में महिलाओं को लगातार लालच दिया गया.
वर्तमान मुख्यमंत्री मोहन यादव ने कहा है कि लाड़ली बहनों के खाते में 3,000  नहीं 5,000 रुपए दिए जाएंगे. इसी तरह महाराष्ट्र में भी लाड़ली बहना योजना का चुनावी मौडल पेश किया गया.

हाल ही में प्रधानमंत्री ने तमिलनाडु के आगामी विधानसभा चुनाव के मद्देनजर महिलाओं के खाते में 5,000-5,000 रुपए डालने की घोषणा की. राजनीतिक दलों ने भांप लिया है कि मुफ्तखोरी का टुकड़ा फेंक कर वोट बटोरना बहुत आसान है और यह राजनीतिक दलों के पक्ष में गए चुनाव नतीजों से पता चलता है. प्रयागराज के कुंभ के समय उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री ने घोषित कर दिया था कि प्रयागराज आने वाले रेल यात्री अगर बगैर टिकट रेल यात्रा करें तो उन से टिकट के बारे में पूछताछ नहीं होनी चाहिए.
इस का नतीजा यह हुआ कि मुफ्त की भीड़ ने पूरी ट्रेनों पर कब्जा कर लिया. रिजर्व्ड डब्बों में मुफ्त की भीड़ जबरन तोड़फ़ोड़ कर के घुस गई. रेलवे के कानूनकायदे और पुलिस दोनों बेबस हो गए थे.

मुफ्त की भीड़ ने रेलवे का बहुत ज्यादा नुकसान किया और सीना तान कर मुख्यमंत्री जिंदाबाद के नारे लगाए. जिन लोगों ने ऐसी फर्स्ट, सैकंड, थर्ड या स्लीपर में अपना यात्रा रिजर्वेशन बहुत पहले से करा लिया था उन पर भी मुफ्त की भीड़ ने अपना हक जमा लिया था. एक तरह से मुफ्तखोरी, चोरी और सीनाजोरी को खुद सरकार ने खुला मैदान दे दिया था. महात्मा गांधी ने कहा था कि असल भारत गांवों में रहता है. भारत के असल गांव मुंशी प्रेमचंद की कहानियों में रहते हैं. ठीक उसी तरह से भारत का असल वोट बैंक ?ांपड़पट्टियों और पिछड़े लोगों में रहता है. किसानों के कर्ज में रहता है. सरकारी स्कूलों में भले ही तालीम मिले या मिले मुफ्त मिड डे मील जरूर मिलता है. मुफ्त किताबें मुफ्त यूनिफौर्म, लाड़ली बहना का मुफ्त रुपया, मुफ्त अनाज, बुढ़ापे की मुफ्त पैंशन से मुफ्तखोरी खूब फलफूल गई है.

आम मतदाता अपनी सम? से वोट देने के बजाय मुफ्त की घोषणाओं का और कर्जमाफी का इंतजार करता है, उसी बुनियाद पर वोट डालता है. चुनाव से पहले वोट डालने और वोट नहीं डालने का मुआवजा राजनीतिक दल ठिकानों पर भेज देते हैं. चुनाव आयोग के नियमकायदे कागजी घोड़े से ज्यादा कुछ भी नहींहैं. आचार संहिता महज चुनाव आयोग की पारंपरिक औपचारिकता है, चुनाव आयोग की आंख में धूल ?ांकना या खुलेतौर पर चुनाव आयोग के नियमों को रौंद डालना राजनीतिक दलों के बाएं हाथ का मामूली खेल है. जिन लोगों ने चुनावों में मतदान केंद्रों पर ड्यूटी की है और रिटायर हो चुके हैं, उन से पूछा जाए
तो बता देंगे कि चुनाव का गेम कैसे होता है?

सरकारी महकमें से कहीं ज्यादा पावरफुल राजनीतिक दल का पोलिंग एजेंट होता है, चुनाव में ड्यूटी करने वालों को राजनीतिक दल सम? देते हैं कि आप हमारे काम में अड़ंगा मत डालिए, आप को यहीं हमारे बीच ही रहना, चुनाव आज आया है कल चला जाएगा इसलिए आप होश में रहें. चुनाव आयोग से कहीं ज्यादा मजबूत नैटवर्क राजनीतिक दलों के बूथ मैनेजमैंट का होता है. बाकी काम तो मुफ्त की चुनावी घोषणाएं और मुफ्त का लालच करते ही हैं. इसे रोका जाना मुमकिन नहीं है, क्योंकि राजनीति देशसेवा नहीं, बल्कि राजनीति देशसेवा के नाम पर भ्रष्टाचार का सफेदपोश कारोबार है. अगर नेता और राजनीतिक दल सत्ता में हैं तो इतना कमा लेते हैं कि आने वाले 2-3 युगों तक अगर पीढि़यां बैठ कर खाएं, उड़ाएं तो भी भ्रष्टता से बनाया खजाना खाली होने वाला नहीं है.

चुनाव आयोग खुद राजनीतिक दलों की शरणागत हो गया हो तो राजनीतिक दलों की मनमानी पर कंट्रोल करना नामुमकिन है. होना तो यह चाहिए कि मुफ्त की घोषणाओं की सप्लाई सरकारी खजाने के बजाय राजनीतिक दलों के राष्ट्रीय कोष से और नेताओं की निजी आमदनी से होनी चाहिए. आज लोग इनकम टैक्स देते हैं, अलगअलग टैक्स देते हैं, सरकारी ड्यूटी देते हैं, टोल टैक्स देते हैं. आम जनता सरकार का एटीएम बन गई है. सरकारी खजाने का बहुत बड़ा भाग सत्ता के सुख पर खर्च होता है. मध्य प्रदेश के एक मंत्री ने कुछ महीने पहले कहा था कि राजनीतिक दलों को मुफ्त की घोषणाओं से बाज आना चाहिए. मुफ्त की ऐसी घोषणाएं बजट पर और सरकारी खजाने पर भारी पड़ती हैं. सुप्रीम कोर्ट और जज कुछ भी नहीं कर सकते हैं. भांग सारे कुओं में है. कोई भी राजनीतिक दल मुफ्त की घोषणाओं से अछूता नहीं है. अगर कोई राजनीतिक दल या नेता मुफ्त की घोषणा नहीं करे तो उस की जमानत जब्त होना तय है.

राजनीति ने आम वोटरों को लालच की बहुत अच्छी आदत डाल दी है, मुफ्त के माल को कौन छोड़ना चाहेगा. इस के लिए राजनीतिक दल और वोट बैंक दोनों ही जवाबदेह है. बीते दशकों पहले जब एक घोर ईमानदार महापौर का कार्यकाल पूरा हो गया तो उन्हें आटेदाल के भाव याद गए. लोग आपसी चर्चाओं में कहते फिरते थे कि इतना इंतजाम तो कर लेना था कि परिवार को खाक नहीं छानना पड़ती.
मध्य प्रदेश के ही एक और मंत्री ने भ्रष्टाचार पर कहा है कि थोड़ाबहुत तो चलता है. मंत्रीजी भूल गए कि थोड़ा नहीं बहुत ज्यादा चलता है. रिश्वत लेना देना दंडनीय अपराध है.

बिना लेनदेन के कोई काम नहीं होता यह सौ फीसदी सच है. बिना लालच के असल वोट बैंक भी मतदान केंद्र तक जाता ही नहीं है, लालच ही उसे याद कराता है कि वह किस राजनीतिक दल के वोट बैंक की जमा पूंजी है और उसे किस राजनीतिक दल के हक में मतदान करना है. जब तक राजनीतिक लालच का वोट बैंक कायम है, तब तक चुनावी जीत और बहुमत पाना बहुत आसान है. बेवकूफ कोई नहीं है. वोटर और राजनीतिक दल दोनों ही बहुत होशियार हैं. असल वोट बैंक ही फैसला करता है कि देश की सत्ता का मसीहा कौन रहेगा.               

अरुण कुमार चौबे

Bhojpuri Star: हर महिला बने बोल्ड-अपर्णा मलिक

Bhojpuri Star: कबड्डी की स्टेट चैंपियन रह चुकी अपर्णा मलिक ने अपने कैरियर की शुरुआत साउथ फिल्म इंडस्ट्री से की, जहां उन्होंने तेलुगु फिल्मों में काम कर अपनी एक्टिंग का लोहा मनवाया. इस के बाद उन्होंने भोजपुरी सिनेमा की ओर रुख किया और यहां भी अपनी दमदार अदाकारी से दर्शकों के दिलों में जगह बना ली.
पटना में आयोजित 7वें सरस सलिल भोजपुरी सिने अवार्ड्स शो के दौरान अपर्णा मलिक से हुई खास मुलाकात में उन्होंने खुल कर बात की. पेश हैं, उन से हुई बातचीत के खास अंश :

कबड्डी की स्टेट चैंपियन से एक्ट्रेस बनने तक, यह ट्रांजिशन कितना फिल्मी रहा?
स्पोर्ट्स बैकग्राउंड होने का बहुत फायदा मिला है. इस से मेरे अंदर हमेशा स्पोर्ट्स स्पिरिट बनी रहती है, जिस से हैल्दी कंपीटिशन की भावना आती है.

क्या आप किसी फिल्म में स्पोर्ट्स गर्ल का रोल करना चाहेंगी?
मैं आप को बताना चाहूंगी कि मेरी एक फिल्म आने वाली है, जिस का नाम हैधाकड़ सासजिस में स्पोर्ट्स गर्ल होते हुए गांव की सीधीसादी लड़की कैसे एक बौक्सिंग चैंपियन बनती है, यह देखने को मिलेगी. मेरी एक तेलुगु फिल्म जो अभी जल्दी ही थिएटर में रिलीज हुई है, ‘वन/4’ जिस में मैं स्विमर बनी हूं, इसलिए मेरी यह हसरत बहुत कम समय में ही पूरी हो चुकी है.

अररिया से सिनेमा तक का सफर, सब से टफ मोमैंट कौन सा था?
अररिया से सिनेमा तक आने का सफर की अगर बात करूं तो मेरा सब से टफ मोमैंट लोगों को सम?ाना रहा क्योंकि अररिया एक छोटी सिटी है. वहां पर लोगों की सोच अभी उतनी विकसित नहीं है कि वे इस चीज को एक्सैप्ट करें कि लड़कियां यहां से निकल के बाहर जा कर या विदेश में जा कर पढ़ाई भी करें, तो फिर सिनेमा जगत में आना तो उन के लिए बहुत बड़ी बात हो जाती है.

आप का पहला आडिशन कैसा गया था?
पहला आडिशन मेरी जिंदगी का बेहद खास अनुभव था. मैं ने उस आडिशन को बहुत ही ध्यान से तैयार किया, 3-4 बार रिकौर्ड किया, अलगअलग स्टेट्स में शूट किया और जब लगा कि यह बिलकुल नैचुरल
और संतोषजनक है, तभी फाइनल वीडियो भेजा. मेरा वह आडिशन बहुत पसंद किया गया. इस के बाद मेरा लुक टैस्ट हुआ, फिर फोटोशूट हुआ और आखिर में मु? तेलुगु फिल्मडैडलाइनऔफर हुई.

क्या ग्लैमरस दिखना इंडस्ट्री की जरूरत है या पर्सनल चौइस?
हर किसी के लिए ग्लैमर की परिभाषा अलग होती है. कई बार लोगों के चेहरे पर ही एक नैचुरल ग्लैमरस लुक होता है, जो उन्हें सब से अलग बनाता है. मेरे हिसाब से ग्लैमरस दिखने के लिए सबसे जरूरी चीज है, आप का कौन्फिडैंस और आप का एटीट्यूड. अगर आप के अंदर खुद को कैरी करने का आत्मविश्वास है, तो वही असली ग्लैमर है.

क्या आप को लगता है कि आज की हीरोइन को ज्यादा बोल्ड होना पड़ता है?
मेरे हिसाब से बोल्ड होने का मतलब है कि आप अपने लिए खड़े हो सकें, अपनी बात खुल कर रख सकें और गलत के खिलाफ आवाज उठा सकें. अगर आप के साथ या किसी और के साथ कुछ गलत हो रहा है और आप उस के खिलाफ बोल पा रहे हैं, तो वही असली बोल्डनैस है, इसलिए मु? लगता है कि सिर्फ हीरोइन को ही नहीं, बल्कि हर महिला को बोल्ड होना चाहिए. हर किसी को अपने हक के लिए खड़ा होना आना चाहिए.

आप का दिल जीतने के लिए किसी में क्या क्वालिटी होनी चाहिए?
हमेशा से सादगी बहुत पसंद है. मेरे लिए सब से जरूरी है कि इनसान दिल का सच्चा हो, अच्छा हो और सम्मान देना जानता हो. अगर किसी में ये गुण हैं, तो मेरे दिल को जीतने के लिए इतना ही काफी है.

इंस्टाग्राम पर फेमस होना कितना चैलेंजिंग है?
आज के समय में इंस्टाग्राम पर फेमस होना काफी चैलेंजिंग हो गया है. कई बार ऐसा लगता है कि वहां
फेमस होने के लिए लोगों को बहुतओवर टौपजा कर काम करना पड़ता हैज्यादा एक्सप्रैसिव होना, कभीकभी जरूरत से ज्यादा ओवर एक्टिंग करना. मैं ने कई ऐसे कलाकारों को देखा है, जो सिर्फ फेमस होने के लिए इस तरह के तरीके अपनाते हैं. लेकिन मेरे हिसाब से ये चीजें ज्यादा समय तक टिकती नहीं हैं. जो चीजें जल्दी वायरल होती हैं, उन का असर भी उतनी ही जल्दी खत्म हो जाता है, जैसे वायरल फीवर कुछ दिनों में उतर जाता है.

फैंस के कमैंट्स आप को मोटिवेट करते हैं या प्रैशर देते हैं?
मेरे इंस्टाग्राम और बाकी सोशल मीडिया प्लेटफार्म्स पर हमेशा फैंस का बहुत प्यार और सपोर्ट मिलता है. उन के कमैंट्स प्रैशर नहीं देते, बल्कि और ज्यादा मोटिवेट करते हैं. उन का यही प्यार और सपोर्ट हर दिन बेहतर करने के लिए प्रेरित करता है.

क्या कभी भोजपुरी के किसी कोस्टार ने आप को सरप्राइज किया?
मेरा पहला काम जब पवन सिंह के साथ आया, तो मैं ने उन के बारे में पहले काफीकुछ सुन रखा था, इसलिए थोड़ा सा संशय था. लेकिन जब मैं ने उन के साथ काम किया, तो मेरा अनुभव बिलकुल अलग और बेहद पौजिटिव रहा. वे बहुत ही स्वीट, डीसैंट और सहयोगी इनसान हैं. इसी तरह, खेसारीलाल यादव के बारे में भी लोगों से कई तरह की बातें सुनने को मिली थीं, लेकिन जब मैं ने उनके साथ काम किया, तो लगा ही नहीं कि वे वैसे हैं जैसा अकसर कहा जाता है. वे बहुत ही सरल, विनम्र और सहयोगी हैं.

आप को साउथ और भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री में सब से बड़ा फर्क क्या लगा?
साउथ फिल्म इंडस्ट्री आज के समय में बहुत बड़ी हो चुकी है और कई मामलों में इंटरनैशनल लैवल तक पहुंच चुकी है. वहीं भोजपुरी इंडस्ट्री में अभी बहुत संभावनाएं हैं और आगे बढ़ने की काफी गुंजाइश है. हालांकि, एक चीज जो दोनों इंडस्ट्री में समान लगी, वह है अपनापन. दोनों ही जगह लोगों का बरताव बहुत ही सहयोगी और आत्मीय होता है. मेरा एक सपना यह भी है कि मैं मलयालम फिल्मों में काम करूं. अभी तक वहां काम करने का मौका नहीं मिला है, लेकिन अगर सबकुछ अच्छा रहा, तो मैं जरूर मलयालम इंडस्ट्री का हिस्सा बनना चाहूंगी.

क्या आप पैन इंडिया स्टार बनने का सपना देखती हैं?
जी हां, मैं पैन इंडिया स्टार बनने का सपना जरूर देखती हूं. अभी तक मैं ने 5 अलगअलग भाषाओं में काम किया है और मेरा मानना है कि जिस दिन मैं इन सभी भाषाओं में एकसाथ एक बड़ी फिल्म कर पाऊंगी, उसी दिन खुद को सही माने में पैन इंडिया स्टार कह सकूंगी.
अपने फैंस के लिए कोई मैसेज?
अपने फैंस के लिए मैं बस इतना कहना चाहूंगी, ‘दिल में हो तुम, सांसों में तुमज् बोलो तुम्हें और क्या दूं…’ आप लोगों का जो प्यार और आशीर्वाद मिला है, वही मेरी सब से बड़ी ताकत है.                         

 

Crime Story: संभल में शर्मनाक हत्याकांड

Crime Story: उत्तर प्रदेश के संभल जिले के गांव मतावली पट्टी जग्गू में नाक की खातिर अपनों की जान लेने का शर्मनाक मामला सामने आया, जहां 19 फरवरी, 2026 को एक भाई ने अपनी ही सगी बहन रूपजहां का गला घोंट कर उस कत्ल कर दिया, क्योंकि वह गांव के ही एक लड़के शिवम सैनी से प्यार करती थी.

जब इस हत्याकांड की खबर पुलिस को लगी और वह मौका वारदात पर पहुंची, तो मंजर दिल दहला देने वाला था. घर के आंगन में बिछी एक चारपाई पर रूपजहां का बेजान शरीर पड़ा था. उसी घर के एक कोने में उस का भाई जाने आलम और पिता नौशे आलम मौजूद थे. जाने आलम ने खुद पुलिस को फोन कर के कहा था, ‘साहब, मैं ने अपनी बहन को मार डाला है, कर मु? ले जाओ.’ पिता का कुबूलनामा
रूपजहां के पिता नौशे आलम ने इस औनर किलिंग पर दो टूक शब्दों में कहा, ‘‘मेरी बेटी शिवम सैनी नाम के लड़के से प्यार करती थी.

वह उस से शादी करना चाहती थी और वह उस के साथ भाग गई थी. ‘‘गांव वाले मेरा मजाक उड़ा रहे थे, गलियों से गुजरना मुश्किल हो गया था. मैं परेशान था. 2 दिन पहले वह शिवम के साथ भाग गई थी. हम ने उसे सम?ाने की कोशिश की, लेकिन वह नहीं मानी. ‘‘हम मुसलमान हैं. बेटी का प्रेमी सैनी (हिंदू) है. हम ऐसी शादी कैसे कर देते? अगर हमारी बिरादरी में शादी की बात होती, तो हम करा देते.’’ क्या प्रधान ने मांगी घूस इस पूरी साजिश में रूपजहां के चाचा दुलारे हुसैन ने मीडिया को बताया कि इस पूरी वारदात के पीछे गांव के प्रधान और पुलिस भी शक के घेरे में है.

दुलारे के मुताबिक, जब रूपजहां और शिवम थाने पहुंचे थे, तो वहां पंचायत हुई. थाने के एसओ साहब दोनों के फेरे कराने को तैयार थे. उन्होंने कहा था कि लड़की बालिग है. उन्होंने हम से अंगूठा लगवाने को कहा, तो हम वहां से भाग आए. इस के बाद प्रधान लेखराज ने बीचबचाव किया और बेटी को वापस लाने के बदले 3 लाख रुपए मांगे. प्रधान ने कहा कि पुलिस और मामले को रफादफा करने के लिए पैसे लगेंगे. हम ने किसी तरह डेढ़ लाख रुपए दिए.


परिवार वालों का आरोप है कि पैसे देने के बाद वे बेटी को घर तो ले आए, लेकिन उस कीआजादीछीनने के लिए. जब घर के भीतर बंद रूपजहां ने फिर से शिवम का नाम लिया, तो भाई जाने आलम का खून खौल उठा और उस ने यह कांड कर डाला. एक साल का इश्क रूपजहां और शिवम सैनी के घर एकदूसरे से महज 400 मीटर की दूरी पर हैं. पिछले एक साल से दोनों के बीच इश्क का मामला चल रहा था. शिवम के परिवार को इस रिश्ते से एतराज नहीं था, लेकिन रूपजहां का परिवार इसे हिंदूमुसलिम के एंगल से देख रहा था.


शिवम की मां का बयान शिवम सैनी की मां हरप्यारी ने बताया, ‘‘मेरे बेटे और रूपजहां ने 2 महीने पहले ही चोरीछिपे शादी कर ली थी. वे एकदूसरे के हो चुके थे. रूपजहां हमारी बहू थी. जब वे घर से भागे थे, तो अपनी सुरक्षा की गुहार लगाने थाने गए थे.’’ साजिश के तहत बुलाया गया इस कांड से पहले जब रूपजहां और शिवम थाने पहुंचे, तो पुलिस ने उन्हें बालिग होने के नाते साथ रहने की इजाजत दे दी थी.

शिवम सुरक्षा के लिहाज से रूपजहां को ले कर अमरोहा में अपनी एक रिश्तेदारी में चला गया था. रूपजहां को लगा था कि वे दोनों अब महफूज हैं. लेकिन घर पर पिता और भाई ने उसे वापस लाने का जाल बुना. रूपजहां को गांव के प्रधान की मदद सेसब ठीक हो जाएगाका ?ांसा दे कर घर बुलाया गया. पर जब रूपजहां अपने घर लौटी तो खबरों के मुताबिक घर में सिर्फ जाने आलम और रूपजहां ही थे. इसी दौरान उन दोनों में ?ागड़ा हुआ और जाने आलम ने दुपट्टे का फंदा बना कर अपनी बहन को मार डाला. इस हत्याकांड में ग्राम प्रधान, लड़की के पिता और भाई समेत 5 और लोगों को भी आरोपी बनाया गया.       

Hindi Story: ‘शेयर’ का इस्तेमाल

Hindi Story: संदीप को पुलिस महकमे में सबइंस्पैक्टर बने अभी एक महीना भी पूरा नहीं हुआ था. नए जोश, नए सपने और एक सच्चा पुलिस वाला बनने के वादे के साथ वह काम में जुटा हुआ था.
एक सुबह पुलिस हैडक्वार्टर से एक कांस्टेबल संदीप के दफ्तर में आया. वह सलाम ठोंकते हुए जोर से बोला, ‘‘जय हिंद सर,’’ और फिर जेब से एक सफेद लिफाफा निकाल कर संदीप की ओर बढ़ाते हुए बोला, ‘‘बड़े साहब ने आप के लिए भेजा है.’’

संदीप ने कौतूहल से लिफाफा खोला. भीतर ?ांक कर देखा कि 500 रुपए के 20 नोट सलीके से रखे थे. एक पल को वह कुछ सम? ही नहीं पाया. उस ने कांस्टेबल से पूछा, ‘‘यह क्या है?’’ कांस्टेबल ने कंधे उचकाए, जैसे उसे खुद कुछ पता हो और चुपचाप जाने की इजाजत मांगने लगा. शक बढ़ चुका था. संदीप ने उसे रोकते हुए बड़े साहब को फोन लगाया.

‘‘जय हिंद सर,’’  कहते हुए ने संदीप सारी बात बताई और पूछा, ‘‘सर, ये पैसे?’’
साहब की आवाज आई, ‘‘हां
हांरख लो. यह तुम्हारा शेयर है इस महीने का.’’
अब सारी तसवीर साफ हो चुकी थी. यहशेयरदरअसलघूसके जमा होने वाले पैसे का हिस्सा था, जो महकमे में बड़ी नियमितता से बंटा करता था.
संदीप स्वाभिमानी नौजवान था. उसे रिश्वत, घूस, दहेजसब से चिढ़ थी. उस ने पुलिस की नौकरी इसीलिए चुनी थी, ताकि समाज और देश के लिए कुछ कर सके. फोन पर उस ने कहा, ‘‘सर, मु? इस की जरूरत नहीं है. मैं इसे वापस भेज रहा हूं.’’
उधर से जवाब आया, ‘‘अरे, क्यों ड्रामा कर रहे हो? सब लेते हैं. तुम्हारा हक है यह.’’
संदीप ने हिम्मत जुटा कर कहा, ‘‘सर, मेरे आत्मसम्मान के खिलाफ
है यह.’’

अब आवाज का लहजा सख्त हो चुका था, ‘‘मतलब हम सब बेईमान हैं? ठीक है, भेज दो वापस.’’
कुछ पल की चुप्पी के बाद संदीप सम? गया कि अगर वह सिस्टम में बना रहना चाहता है, तो विरोध करना आसान नहीं होगा. कुछ सोच कर उस ने धीरे से कहा, ‘‘सौरी, सर. ठीक है, मैं रख लेता हूं.’’
‘‘गुड,’’ इतना कह कर फोन कट गया.
हाथ में लिफाफा थामे बैठे संदीप के भीतर मानो तूफान उठ रहा था. नई नौकरी, बढ़ती जिम्मेदारियां और स्वाभिमान, तीनों एकदूसरे से लड़ रहे थे. वह सम? चुका था कि यह लिफाफा अब हर महीने आया करेगा. सवाल यह था, इस का क्या करे?

उसी शाम संदीप ने बाहर ?ांक कर देखा, सामने के सरकारी स्कूल से कुछ बच्चे फटे हुए बस्तों और घिसी हुई चप्पलों के साथ घर लौट रहे थे. उन की आंखों में पढ़ाई का जोश तो था, पर साधन कम थे. बस, यहीं उसे जवाब मिल गया. अगले ही दिन संदीप ने उन्हीं पैसों से कौपी, किताबें, पैनपैंसिल और कुछ स्कूल बैग खरीदे. फिर स्कूल के प्रिंसिपल से मिल कर बताया कि वह इन सामग्री को जरूरतमंद बच्चों में बांटना चाहता है. प्रिंसिपल ने मुसकरा कर सहमति दे दी.

कार्यक्रम रविवार को रखा गया.
संदीप ने जानबू? कर बड़े साहब को मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित किया. साहब बड़े गर्व के साथ आए, यह सोच कर कि शायद महकमे की इमेज सुधारने का यह अच्छा मौका है. जब बच्चों में सामग्री बांटी जाने लगी, तो छोटेछोटे हाथ मुसकान के साथ आगे बढ़ते गए. बड़े साहब के चेहरे पर भी संतोष की ?ालक थी. बच्चे उन्हें धन्यवाद दे रहे थे, फोटो खिंच रहे थे और बड़े साहब गर्व से सीना फुलाए खड़े थे. उन्हें यह नहीं पता था कि सामग्री उन्हीं के भेजेशेयरसे खरीदी गई है.


संदीप एक तरफ खड़ा यह सब देख रहा था. उसे ग्लानि थी, पछतावा. बस मन में यह संतोष था कि कम से कम गलत पैसे का इस्तेमाल सही जगह हो रहा है. कार्यक्रम खत्म हुआ. लौटते समय बड़े साहब ने संदीप के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा, ‘‘अच्छा काम किया है. संदीप. समाजसेवा ऐसे ही होती है.’’संदीप मुसकराया, ‘‘थैंक यू, सर,’’ पर उस के मन में एक विचार धीरे से उभरा, ‘अगर सारी रिश्वतें इसी तरह समाज में लौट जाएं, तो शायद देश का आधा दर्द कम हो जाए.’


लेकिन हकीकत यह थी कि यह अपवाद था, नियम नहीं. उस रात संदीप देर तक सोचता रहा कि, क्या उस ने सही किया? शायद हां, क्योंकि उस ने स्वाभिमान और सिस्टम के बीच एक सेतु बना लिया था. रिश्वत स्वीकार नहीं की, पर उसे समाज के लिए समर्पित कर दिया. उसे लगा, ‘अगर मैं इसे ठुकरा दूंगा तो कोई कोई दूसरा लेगा ही और साहब दूसरे पदाधिकारियों की नाराजगी भी ?ोलनी पड़ेगी, सो अलग.
कम से कम इस से किसी जरूरतमंद का भला तो हो रहा है, क्योंकि ईमानदारी सिर्फ घूस लेने में नहीं, सही जगह देने में भी होती है.’


यह समाधान पूरी तरह सही नहीं था, पर गलत भी नहीं था. समय बीतने लगा. हर महीने वही लिफाफा आता रहा. संदीप भी हर बार उस से कुछ कुछ सामाजिक काम करता. कभी बच्चों के जूते, कभी दीवाली पर मिठाइयां, कभी गरीब मरीजों की दवाएं. धीरेधीरे लोग उसेसमाजसेवी अफसरकहने लगे, पर असल वजह कोई नहीं जानता था.


एक दिन वही बड़े साहब निरीक्षण पर आए. उन्होंने देखा कि थाने में व्यवस्था अच्छी है, जनता का सम्मान हो रहा है, शिकायतें सुनी जा रही हैं. जाते समय हलकी मुसकान के साथ वे बोले, ‘‘तुम्हारे अंदर ईमानदारी भी है और संवेदनशीलता भी. सिस्टम में रह कर ऐसे लोग बहुत कम मिलते हैं.’’ संदीप ने शांत भाव से कहा, ‘‘सर, सिस्टम में रहते हुए भी इनसान रहना जरूरी है.’’ संदीप की बातें सुन कर साहब गंभीरता से मुसकराने लगे. शायद वे सम? चुके थे कि संदीप ने स्वाभिमान के साथ सिस्टम और समाज में बने रहने का रास्ता निकाल लिया है.       

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